Tuesday, December 29, 2009

तो साल 2009, बीजेपी में जो हारा, वही सिकंदर

इंडिया गेट से
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तो साल 2009, बीजेपी में
जो हारा, वही सिकंदर
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 संतोष कुमार
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        तुम जियो हजारों साल, साल के दिन हों पचास हजार। पर न कोई हजार साल जी सकता। न साल के दिन पचास हजार हो सकते। सो 365 दिन बाद 2009 भी विदा ले रहा। अब महज कुछ घंटों का इंतजार, फिर 2010 का स्वागत। सो आखिरी दिन में लेखाजोखा भी जरूरी। तो आज शुरुआत बीजेपी के सफरनामे से। साल 2008 का अंत न देश के लिए शुभ रहा, न बीजेपी के लिए। देश ने 26/11 का दंश झेला। तो बीजेपी सेमीफाइनल में कांग्रेस से पिछड़ गई। राजस्थान का मजबूत किला ढह गया। तो हंगामे का आगाज भी वहीं से हुआ। यों शेखावत को चुनाव लडऩा नहीं था। पर वसुंधरा से नाराज बाबोसा ने पासा फेंका। सो समूची बीजेपी हिल गई। राजनाथ सिंह को मैदान में उतरना पड़ा। तो उन ने लोक-लिहाज नहीं किया। अलबत्ता शेखावत को गंगा स्नान के बाद कुंए में न नहाने की सलाह दी। अब जब रात हो इतनी मतवाली। तो सुबह का आलम क्या होगा। यह तो बीजेपी से पूछिए। शुरुआत पुरोधा ने की। तो बाकी कहां पीछे रहते। बीस जनवरी को कल्याण सिंह ने बीजेपी छोड़ दी। लोकसभा का चुनावी समर शुरू हुआ। तो आडवाणी खुद को भावी पीएम कम, मौजूदा पीएम की तरह व्यवहार करने लगे। हर अहम मसले पर विशेषज्ञों की मीटिंग। फिर नई कार्ययोजना का एलान। सो इर्द-गिर्द ऐसे लोगों का जमावड़ा हो गया। आडवाणी जमीनी हकीकत भांप नहीं पाए। समर में कांग्रेस से मुकाबला तो बाद में। पर पहले बीजेपी ने आपस में नेट प्रेक्टिस की। जेतली, वेंकैया में पोल मैनेजर बनने की होड़। बीजेपी में जूरासिक पार्क जैसा माहौल था। नागपुर में ही राजनाथ ने भी हिंदुत्व एक्सप्रेस दौड़ाई। पर दिल्ली आते ही जैसे बीजेपी का ब्रेक डाउन हो गया। राजनाथ की सत्ता को पोल मैनेजर अरुण जेतली की चुनौती मिल गई। एक-दो दिन नहीं, पूरे बारह दिन ड्रामा चला। जेतली ने राजनाथ की रहनुमाई वाली सीईसी का बॉयकॉट किया। मुद्दा सिर्फ इतना था, राजनाथ ने सुधांशु मित्तल को पूर्वोत्तर का इंचार्ज बनाया था। आडवाणी भी जेतली को मना नहीं पाए। पूरे चुनाव के टिकट बंट गए। पर जेतली-राजनाथ की रार ठनी रही। यों अरुण का संकट सुलझा भी नहीं था। तभी गांधी-नेहरू खानदान के भाजपाई वारिस वरुण गांधी का भड़काऊ भाषण आ गया। बीजेपी ने वरुण का जमकर बचाव किया। पर आखिर में फोरेंसिक लैब ने पुष्टिï कर दी। भड़काऊ बयान वरुण का ही। सो बीजेपी अपने किए पर औंधे मुंह गिरी। लगा, जैसे वक्त भी बीजेपी का साथ देने को तैयार नहीं। चुनावी समर में ही उड़ीसा में नवीन पटनायक से गठजोड़ टूटा। कंधार प्रकरण पर बीजेपी बचाव में ही उलझी रही। ऐसा लगा, मानो कंधार एपीसोड बीजेपी का। आडवाणी कहीं भी साझीदार नहीं। सो चुनाव नतीजे चौंकाने वाले रहे। आडवाणी का सपना चूर हो गया। तो पद छोडऩे की पेशकश की। पर हाई वोल्टेज ड्रामे के बाद फिर खिवैया बन गए। फिर हार पर बीजेपी में जो आपसी मर्दन हुआ। किसी से छुपा नहीं। जसवंतनामा, यशवंतनामा, शौरीनामा सब में एक ही आवाज। हराने वाले को इनाम क्यों? निशाने पर जेतली ही, जिन्हें आडवाणी ने राज्यसभा में नेता बना दिया। पर आडवाणी के इर्द-गिर्द चौकड़ी में शामिल सुधींद्र कुलकर्णी, स्वप्रदास गुप्त जैसे लोग चुनाव से पहले सलाहकार थे। बीजेपी हार गई, तो पत्रकार बनकर खाल खींचने लगे। फिर शिमला चिंतन बैठक। जसवंत के जिन्ना प्रेम पर बर्खास्तगी। हार का मंथन हुआ। तो घाव केंद्र में था, ऑपरेशन राज्यों का कर दिया। यशवंत ने कामराज फार्मूले की मांग की। पर कुर्सी कौन छोड़ रहा। बीजेपी के कर्ता-धर्ता इसी में खुश। भले खुद न जीते, पर लेफ्ट तो हार गया। उत्तराखंड से बी.सी. खंडूरी की विदाई। राजस्थान में ओम प्रकाश माथुर का इस्तीफा। फिर कई राज्यों के क्षत्रप बदल दिए। पर वसुंधरा की बारी आई। तो अगस्त से अक्टूबर तक जो हुआ। बीजेपी नहीं भुला सकती। सो शिमला चिंतन में बीजेपी की चिंता कम, चिता ज्यादा दिखी। अरुण शौरी का राजनाथ को हंप्टी-डंप्टी कहना। बीजेपी में नेतृत्व परिवर्तन पर संघ के मुखिया मोहन भागवत का डी-4 फार्मूला। मनोहर पारिकर का आडवाणी को सड़ा अचार कहना। वसुंधरा प्रकरण पर पार्लियामेंट्री बोर्ड में आडवाणी-राजनाथ का टकराना। कर्नाटक में रेड्डïी बंधु के दबाव में बीजेपी का येदुरप्पा को झुकाना। महाराष्टï्र चुनाव में भी नितिन गडकरी की रहनुमाई वाली बीजेपी की लुटिया डूबना। सो कुल मिलाकर सुर्खियों में बीजेपी रही। पर सिर्फ नकारात्मक खबरों से। आखिर में हार का यही मंथन। जिन-जिन ने रणनीति बनाई। सबका प्रमोशन हो गया। या यों कहें, सबने राज्यों पर ठीकरा फोड़ कुर्सी बांट लीं। आडवाणी भीष्म हो गए। जेतली, सुषमा को भी बड़ा पद। गडकरी तो चुनाव जीते और जिताए बिना ही राष्टï्रीय अध्यक्ष हो गए। राजस्थान का संगठन चुनाव वाला विवाद तो याद होगा। अब वहां भी सबको कुर्सी मिल गई। तो फिलहाल ऊं शांति। यानी 2009 में बीजेपी, जो हारा, वही सिकंदर। और अब साल के आखिर में नैतिकता की आहुति दे शिबू से हाथ मिला लिया। सो 2010 कैसा होगा, राम ही राखा। विपक्ष के तौर पर बीजेपी भरोसा खो चुकी। यह खुलासा खुद बीजेपी के सर्वेक्षण में हो चुका। चुनाव के वक्त जीवीएल नरसिंह राव का सर्वे आया। बानवै फीसदी लोगों ने महंगाई को बड़ा मुद्दा माना। पर चौंकाने वाली बात, समाधान करने वालों में 90 फीसदी लोगों ने मनमोहन को वोट दिए। महज सात फीसदी ने आडवाणी को। सो विपक्ष का भरोसा कितना, खत्म हो चुका। आप देख लो।
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29/12/2009

Monday, December 28, 2009

कैसे हो 'रिफॉर्म', जब चालू आहे चापलूसी

इंडिया गेट से
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कैसे हो 'रिफॉर्म', जब
चालू आहे चापलूसी
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 संतोष कुमार
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          अब पुलिस थाने में शिकायत ही एफआईआर। रुचिका गिरहोत्रा प्रकरण तूल पकड़ चुका। इंसाफ की जंग कोर्ट से बाहर सड़कों पर शुरु हुई। तो संवेदनशीलता दिखाने की होड़ मच गई। सो सोमवार को होम मिनिस्ट्री ने सभी स्टेट को सर्कुलर जारी कर दिया। थाने में की गई शिकायत को ही एफआईआर माना जाए। पर शिकायत यानी तहरीर भी कोई पुलिस वाला न ले। तो कौन क्या कर लेगा। जब देश में पीएम की चि_ïी का सीएम पर कोई असर नहीं पड़ता। तो आम आदमी की राठौर जैसे पुलिसिए के सामने क्या बिसात। अब बीजेपी नेता शांताकुमार ने खुलासा किया। रुचिका केस को सुन तबके पीएम वाजपेयी रो पड़े थे। उनने हरियाणा के सीएम ओमप्रकाश चौटाला को कड़ी चि_ïी लिखी थी। तो खुद चौटाला-भजनलाल अपनी तरफ से कड़े कदम उठाने की दलील दे रहे। पर क्या देश की व्यवस्था इतनी नाकारी हो चुकी। जो पीएम-सीएम सबकी पहल के बाद भी रुचिका को इंसाफ मिलने में 19 साल लग गए? यों अभी भी रुचिका को अधूरा इंसाफ मिला। अधेड़ उम्र के राठौर ने 14 साल की लड़की से जबर्दस्ती करनी चाही। आखिर उस लड़की को सुसाइड करना पड़ा। फिर भी केस इतना कमजोर बनाया गया। राठौर को महज छह महीने की सजा मिली। सो तहरीर को एफआईआर बनाने से क्या होगा। जब तक पुलिस तंत्र न बदले। रुचिका केस में तो यही हुआ। रुचिका केस में दोषी हरियाणा के पूर्व डीजीपी एसपीएस राठौर तब आईजी थे। सो महीने-साल नहीं, अलबत्ता पूरे नौ साल तक एफआईआर दर्ज नहीं हुई। उल्टा रुचिका के परिवार को प्रताडऩा सहनी पड़ी। पुलिस ने ही झूठे केस में फंसा परिवार को हरियाणा छोडऩे को मजबूर कर दिया। सो सिर्फ सर्कुलर जारी होने से समस्या खत्म नहीं होने वाली। जब तक पुलिस का अंदाज नहीं बदलेगा। तब तक लोग पुलिस से खौफ खाते रहेंगे। और पुलिसिए भी अंग्रेजों की मानसिकता से ऊपर नहीं उठेंगे। सो जब तक पुलिस रिफॉर्म पर अमल नहीं होता। तहरीर को एफआईआर मानने से कुछ नहीं होगा। जरुरत तो इस बात की है, पुलिस रिफॉर्म की बातें सिर्फ कागजों तक सिमट कर न रहे। हर बार पुलिस रिफॉर्म को शोर मचता। पर बिल्ली के गले में घंटी कौन बांधे। बस इसी चक्कर में फिर फाइलों में गुम हो जाता। जबकि सुप्रीम कोर्ट तक पुलिस रिफॉर्म की बात कह चुका। पर राज्यों की फंडिंग के चक्कर में गाड़ी आगे नहीं खिसक रही। सो न पुलिस बदल रही, न पुलिसिया चेहरा और खौफ। आज भी, आम आदमी की आंखों के सामने पुलिस गुजर जाए। तो मन में सुरक्षा का भाव नहीं, अलबत्ता आंखों में खौफ का साया दिखता। आखिर हो क्यों ना। पुलिस वाले तो हुकूमत के इशारे पर चलते। सो जब जिसकी सरकार बनी। पसंद के ऑफीसर मलाईदार-रुतबेदार पदों पर काबिज हो जाते। सो राजनेता भी मौजूदा पुलिस तंत्र के ही आदी। अब वही होम मिनिस्ट्री राठौर का मैडल छीनने जा रही। पर 19 साल तक कहां सोई रही सरकार? यों मैडल कैसे लोगों को मिलता, अब किसी से यह बात छुपी नहीं। मैडल तो छोडि़ए, अब पद्मश्री हो या पद्मविभूषण। हर जगह घालमेल और सत्ता का साया साफ दिख जाता। सो मैडल के लिए फर्जी मुठभेड़ की खबरें आम हो चुकीं। लोकशाही में भी नेतागण राजशाही चाहते। सो प्रतिबद्ध नौकरशाही की दरकार सबको। सनद रहे, सो याद दिलाते जाएं। दिसंबर 1969 में तबकी पीएम इंदिरा गांधी ने नौकरशाही से प्रतिबद्धता की मांग की थी। नौकरशाहों से अपनी राजनीतिक विचारधारा का समर्थन करने को कहा। सो बवाल मचा, तो उन ने नौ फरवरी 1970 को इंस्टीट्यूट ऑफ इंजीनियर्स में सफाई दी। चाटुकार सरकारी कर्मचारी तंत्र नहीं चाहिए। पर इंदिरा को जो कहना था, वह कह चुकी थीं। सो नेताओं में रूतबे का, तो नौकरशाही में चमचागिरी का रोग। यानी अब अगर पुलिस तंत्र का सुधार करना पड़ा। तो राजनीति में भी आमूल-चूल बदलाव लाने होंगे। पर न नौ मन तेल होगा, न राधा नाचेगी। एफआईआर से पूर्व पीएम नरसिंह राव पर भी हुए। पर क्या कभी सजा मिली? शिबू सोरेन की झामुमो को खरीद कर राव ने अल्पमत सरकार बचाई। पर 17 साल हो गए। नरसिंह राव तो अब दुनिया में नहीं रहे। पर शिबू का भी कुछ नहीं बिगड़ा। अलबत्ता सत्ता के समीकरण जरुर बदल गए। शिबू कभी कांग्रेस खेमे में बैठते थे। अबके सत्ता की खातिर बीजेपी के साथ हो लिए। पर शिबू की पार्टी तो एक क्षेत्र विशेष की ठहरी। पर बीजेपी की नैतिकता कहां गई? जिस शिबू की खातिर मनमोहन को दागी केबिनेट का मुखिया कहा। शिबू के नाम पर संसद से सड़क तक खूब घोड़े दौड़ाए। अब उसी शिबू के साथ गलबहियां। पर जरा नितिन गडकरी की नई दलील सुनिए। सत्ता की राजनीति अलग और संगठन की अलग। कांग्रेस तो 125 वीं सालगिरह पर ही खूब इतरा रही। पीएम मनमोहन हों या सोनिया गांधी। गांधी-नेहरू खानदान को ही देश का पर्याय बता रहे। मनमोहन ने सोमवार को कहा- 'अगर कांग्रेस कमजोर हुआ, तो भारत कमजोर होगा। सो कांग्रेस को मजबूत करे।' उनने सोनिया के ऐसे कसीदे पढ़े। अपने राजनीतिक गुरु नरसिंह राव को भूला दिया। नई आर्थिक नीति का श्रेय भी राजीव गांधी को दे दिया। यानी सोनिया ने दो बार पीएम बनाया। तो मनमोहन ने भी अपनी उदारीकरण की नीति बतौर रिटर्न गिफ्ट गांधी-नेहरु खानदान को थमा कर्ज उतार लिया। अब पुलिस तंत्र हो या राजनीतिक तंत्र। जब तक चापलूसी बंद नहीं होगी। तब तक व्यवस्था का राम ही राखा।
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28/12/2009

Friday, December 25, 2009

वाजपेयी को तोहफे में बीजेपी ने दिया झारखंड

इंडिया गेट से
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वाजपेयी को तोहफे में
बीजेपी ने दिया झारखंड
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 संतोष कुमार
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           राजनीति के पुरोधा अटल बिहारी वाजपेयी का 86वां जन्मदिन धूमधाम से मना। हर बार की तरह पीएम मनमोहन चलकर अटल को बधाई देने पहुंचे। भले कांग्रेस-बीजेपी में बैर जगजाहिर। पर मनमोहन की वाजपेयी के प्रति अगाध श्रद्धा। तभी तो भरी संसद में मनमोहन ही वह शख्स थे। जिन ने वाजपेयी को बीजेपी नहीं, अलबत्ता राजनीति का भीष्म पितामह कहा था। सो अपने भीष्म पितामह को अबके नई बीजेपी ने बधाई दी। बीजेपी दफ्तर में रक्तदान शिविर लगे। तो शाम को फिक्की में अनूप जलोटा की भजन संध्या। भजन संध्या में बीजेपी के तमाम दिग्गजों के अलावा जेडीयू के शरद यादव, सपा के मुलायम-अमर भी पहुंचे। शिवसेना के मनोहर जोशी आए। तो एक नाम उड़ीसा में बीजेपी को धकिया चुकी बीजद का भी। बीजद के बी.जे. पंडा भी लिस्ट में शुमार। यानी वाजपेयी दलगत राजनीति से ऊपर उठ चुके। सो किसी भी दल के नेता को वाजपेयी की खातिर बीजेपी के मंच पर आने में हिचक नहीं। सचमुच बीजेपी में वाजपेयी की जगह कोई नहीं ले सकता। वाजपेयी में कभी बनावटीपन नहीं रहा। सो जनता के दिल में दशकों से राज कर रहे। पंडित नेहरू को भी वाजपेयी में भावी पीएम की छवि दिख गई थी। फिर इंदिरा राज हो या बाकी सरकारें। वाजपेयी की छवि जन-जन के दिल में बस गई। तभी तो पिछले साल दिसंबर में आडवाणी ने वाजपेयी के लिए भारत रत्न मांगा। तो ऐसी घुड़दौड़ मची। सरकार ने किसी को भी भारत रत्न नहीं दिया। तब यहीं पर लिखा था। वाजपेयी को भारत रत्न मिले या न मिले। लोगों के दिलों के रत्न हमेशा रहेंगे। पर बात वाजपेयी के 86वें जन्मदिन की। अबके आम आदमी वाजपेयी के पास नहीं पहुंच सका। वाजपेयी का स्वास्थ्य ठीक नहीं। सो जन्मदिन को वीवीआईपी तक ही सीमित रखा। पर बीजेपी में लंबे झंझावातों के बाद बड़े बदलाव हो चुके। सो तमाम दिग्गज बधाई देने पहुंचे। पर लगातार हार का मुंह देख रही बीजेपी ने अबके अटल को गिफ्ट देने की ठान ली। सो देर शाम झारखंड में सरकार गठन के लिए समझौते का एलान हो गया। झारखंड में खिचड़ी जनादेश आया। पर बीजेपी-जेडीयू ने झामुमो और आजसू से हाथ मिला लिया। सो 81 के सदन में नए गठबंधन का आंकड़ा बहुमत के जादुई आंकड़े से दो ज्यादा यानी 43 हो गया। कांग्रेस पॉवर-पैसा के बावजूद मुंह ताकती रह गई। जबसे कांग्रेस ने सहयोगी दलों को लंगड़ी मारने की रणनीति बनाई। एकला चलो की खातिर सहयोगियों को कमजोर किया। तबसे कांग्रेस को यही गुमान, जब जनता चुनाव जितवा रही। तो बाकी सत्ता भी अपनी कीमत पर हथिया लेंगे। सो शिबू सोरेन की शर्त मानने से इनकार कर दिया। अलबत्ता कांग्रेस ने शिबू की पार्टी में तोडफ़ोड़ की कवायद शुरू कर दी। ताकि शिबू के 18 में से 12 एमएलए टूट जाएं। उधर लालू के पांच में से तीन टूट जाएं। तो कांग्रेस और बाबूलाल मरांडी सत्ता का समीकरण बना लेंगे। बाकी कमी-बेशी रही, तो केंद्र में अपनी सरकार। सो गवर्नर कब काम आएंगे। पर बीजेपी ने पहले ही अपना कमाल दिखा दिया। राजनाथ अध्यक्षी की स्टेयरिंग छोड़ चुके। सो पूरा फोकस झारखंड पर लगा दिया। भले बीजेपी अबके तीस से खिसक कर 18 सीट पर आ गई। पर सरकार बनाने का मंसूबा नहीं छोड़ा। यों नितिन गडकरी ने सत्ता की नहीं, विकास और सेवा की राजनीति पर जोर दिया। पर शिबू के साथ नए गठजोड़ को आप क्या कहेंगे। शायद बीजेपी ने यही ठान रखा था। बहुत हार सह ली। अबके वाजपेयी को बर्थ-डे गिफ्ट में चुनाव जीते बिना सत्ता समर्पित करेंगे। सो झारखंड से लौटे राजनाथ की गडकरी से मीटिंग हुई। उधर रांची में यशवंत सिन्हा और अर्जुन मुंडा ने गुरु जी (शिबू) को पटाया। शनिवार को गवर्नर के सामने दावा पेश होगा। सो फार्मूला तय हुआ, शिबू सोरेन सीएम होंगे। साथ ही झामुमो के चार और मंत्री। बीजेपी का स्पीकर होगा। साथ में चार मंत्री भी। इसी कोटे में बीजेपी और झामुमो का एक-एक डिप्टी सीएम भी होगा। आजसू के दो मंत्री होंगे। तो एक जेडीयू का। यानी 81 के सदन में सिर्फ 12 मंत्री बनाए जा सकते। सो गठबंधन ने सत्ता की बंदरबांट शपथ से पहले ही कर ली। पर झारखंड में सत्ता इतनी आसान नहीं। शिबू के कई अल्पसंख्यक एमएलए बीजेपी के साथ जाने के खिलाफ। अब नाराज लोगों को ही शिबू मंत्री बना दें। तो फिर बात अलग। वैसे भी मंत्रियों की अपनी एक अलग जात होती। जिसमें लाल बत्ती और बाकी रुतबा। पर क्या अवसरवादी गठजोड़ को विकास करने वाला माना जा सकता? झारखंड का इतिहास तो ऐसा मानने को तैयार नहीं। सो नितिन गडकरी भले विकास की बात करें। पर राजनीति में एक ही फार्मूला चलता। न नीति, न नैतिकता, सबसे बड़ी सत्ता। याद करिए कर्नाटक का 20-20 महीने वाला जेडीएस-बीजेपी फार्मूला। कुमार स्वामी ने समझौता नहीं निभाया। तो सरकार गिर गई। फिर 20 दिन बाद दोनों एक हो गए। तो सरकार बन गई। भले सरकार हफ्ते भर ही चली। पर तब बीजेपी के एक बड़े नेता ने कहा था। जिसका जिक्र यहीं पर 28 अक्टूबर 2007 को हमने किया। उस नेता ने कहा था- 'हवन तीन बजे न सही, छह बजे हो। जेडीएस ने हमारी बात मान ली। सो हम भी तो कोई सन्यासी नहीं। आखिर राजनीति इसलिए तो कर रहे।'
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25/11/2009

Wednesday, December 23, 2009

जीता त्रिगुट, हार गया बीजेपी हाईकमान

इंडिया गेट से
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जीता त्रिगुट, हार गया
बीजेपी हाईकमान
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 संतोष कुमार
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         झारखंड में भी बीजेपी की बत्ती गुल हो गई। यों कामयाब कांग्रेस भी नहीं हुई। अलबत्ता विधानसभा फिर लंगड़ी हो गई। पर शिबू सोरेन की किस्मत जरूर खुल गई। सत्ता की चाबी लेकर बिकवाली को बाजार में खड़े हो गए। अब लुटी-पिटी बीजेपी के पास देने को तो कुछ नहीं। सो कांग्रेस फिर कोयला मंत्रालय देकर पटाने की कोशिश में। पर शिबू हैं कि मानते नहीं। शिबू को तो सीएम की कुर्सी चाहिए। पर कांग्रेस एकला नहीं, अलबत्ता बीजेपी से निकले बाबूलाल मरांडी के साथ गठबंधन। दोनों मिलकर बड़े गठबंधन के तौर पर उभरे। सो मरांडी अपना दावा यों ही नहीं छोड़ेंगे। अब सरकार किसी की भी बने, झारखंड फिर अस्थिरता के गर्त में। यों बुधवार को केंद्र सरकार ने आंध्र को अस्थिरता के दौर से बाहर निकालने की कोशिश की। तेलंगाना की तलवार आम सहमति की म्यान में डाल दी। पी. चिदंबरम ने तेलंगाना के गठन की कवायद का एलान किया था। सो आंध्र में भड़की आग को थामने के लिए सरकार ने चिदंबरम से ही ताजा बयान दिलवाया। चिदंबरम ने दस दिसंबर को तेलंगाना वाला बयान दिया था। आग भड़की, तो सरकार ने कदम खींच लिए। सो 15 दिसंबर को यहीं पर लिखा था- 'आम सहमति की म्यान में तेलंगाना की तलवार।'  पर कोई पूछे, सिर्फ दो लाइन के एलान में दस दिन क्यों लगाए? आंध्र में हिंसा से रोजाना सौ करोड़ का नुकसान हो रहा। खुद सीएम रोसैया ने इश्तिहार जारी कर लोगों से अपील की। पर शायद चिदंबरम काम के बोझ तले दबे होंगे। सो आंध्र को हिंसा की आग में जलने दिया। तभी तो बुधवार को चिदंबरम ने काम के बोझ का रोना रोया। अब ऐसा भी क्या, जो देश का होम मिनिस्टर सुरक्षा को भगवान भरोसे बताए। चिदंबरम ने 26/11 के बाद हमला न होने का क्रेडिट लक को दिया। अलग से आंतरिक सुरक्षा मंत्रालय बनाने की पैरवी की। यों ऐसा ही मंत्रालय पाकिस्तान में भी। पर पाक के हालात बताने की जरूरत नहीं। सो अगर इच्छाशक्ति हो और कोई जिम्मेदारी को बोझ न समझे। तो मंत्रालय बंटे या न बंटे, देश की सुरक्षा की जा सकती। सो अब बात बीजेपी की। कांग्रेस बुधवार को आंध्र का बवाल थामने में जुटी रही। तो बीजेपी राजस्थान को सुलझाने में मशगूल। दोपहर ढाई बजे से मीटिंगों का दौर शुरू हुआ। तो रात के नौ बजे तक मीटिंग-मीटिंग का खेल होता रहा। वसु, माथुर, रामदास का त्रिगुट किस तरह रण के मूड में। यह तो आपको पिछले गुरुवार यहीं पर बता चुके। सो दिल्ली पहुंचते ही त्रिगुट का रामदास के घर जमावड़ा हुआ। ठीक ढाई बजे तिकड़ी ष्ठरु९ष्ट ङ्ख ३५९७ नंबर की कार में एकसाथ बीजेपी हैड क्वार्टर पहुंची। नितिन गडकरी पहले ही रामलाल के साथ बैठे थे। सो पहले राउंड की मीटिंग घंटे भर चली। बीच में वेंकैया और विनय कटियार आए-गए। फिर माथुर कटियार के पास चले गए। तो रामदास रामलाल के पास। वसुंधरा गडकरी से ही अकेले बतियाती रहीं। फिर तिकड़ी कटियार के कमरे में इक_ïी हुई। तो इधर दूसरा गुट चौकड़ी बनाकर गडकरी के कमरे में घुसा। अरुण चतुर्वेदी, गुलाब चंद कटारिया, वासुदेव देवनानी और फूलचंद भिंडा बैक डोर से मीटिंग के लिए पहुंचे। तो 20 मिनट में पहला राउंड निपटा। दूसरे राउंड से पहले गडकरी पार्लियामेंट्री बोर्ड की मीटिंग में चले गए। फिर मीटिंगों का दौर चलता रहा। कभी चतुर्वेदी एंड कंपनी गडकरी के कमरे में। तो त्रिगुट वेंकैया के कमरे में। विनय कटियार पर्यवेक्षक के नाते कभी इधर तो कभी उधर होते रहे। बाल आप्टे भी गडकरी के साथ मीटिंग में शामिल हुए। तो आखिरी दौर की मीटिंग में अरुण जेतली भी आ गए। यानी राजस्थान संगठन चुनाव का पेच सुलझाने में दोपहर से रात हो गई। पर रार खत्म नहीं हुई। अब गडकरी को भी इल्म हो गया होगा, महाराष्टï्र और देश के किले में कितना फर्क। जब राजस्थान की चुनौती ने गडकरी के पसीने छुड़ा दिए। तो सोचो, खुदा न खास्ता कभी राजनाथ सिंह की तरह गडकरी को भी अरुण जेतली, सुषमा या नरेंद्र मोदी जैसे घाघ से चुनौती मिल गई। तब क्या होगा। यों अभी तक गडकरी को नरेंद्र मोदी की बधाई नहीं मिली। पर बात राजस्थान की। केंद्रीय चुनाव अधिकारी थावर चंद गहलोत से लेकर संगठन मंत्री रामलाल तक। चुनाव में धांधली की वसुंधरा खेमे की दलील से सहमत नहीं थे। सो गडकरी का सहमत न होना लाजिमी। पर स्थिति विस्फोटक होने लगी। वसुंधरा खेमे ने साफ कर दिया, संगठन चुनाव गुरुवार को हुए। तो नहीं माना जाएगा। जयपुर में 25 हजार वर्करों के जमावड़े की तैयारी थी। सो साख बचाने को गडकरी ने संगठन चुनाव टालना मुफीद समझा। अगर चुनाव न टलते, तो बीजेपी के अनुशासन के परखचे उड़ जाते। अब भले वसु, माथुर, रामदास के त्रिगुट को पूरी जीत नहीं मिली। पर दाव काम आ गया। त्रिगुट ने दलील दी, चतुर्वेदी से एतराज नहीं। प्रक्रिया से नाराजगी। आखिर पंचायत चुनाव के बहाने फरवरी के दूसरे हफ्ते तक चुनाव टलवा त्रिगुट ने आलाकमान को झुका दिया। किले के भीतर से हुए विद्रोह को गढ़ के रक्षक गडकरी संभाल नहीं पाए। पहली ही चुनौती में गडकरी के संगठन कौशल की पोल खुल गई। यों दोपहर से रात तक मीटिंग और सौदेबाजी का ऐसा दौर चला। देर रात खफा होकर कटियार मीटिंग से निकल गए। कह दिया- जो भी सूचना देनी है, फोन पर दे देना।
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23/11/2009

Tuesday, December 22, 2009

चारों तरफ पंगे ही पंगे, फिर भी हर-हर गंगे

इंडिया गेट से
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चारों तरफ पंगे ही पंगे,
फिर भी हर-हर गंगे
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 संतोष कुमार
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           संसद का शीत सत्र मंगल को विधिवत खत्म हो गया। पर लिब्राहन रपट हो या महंगाई की बहस। तेलंगाना हो या ग्लोबल वार्मिंग। बहस का कोई निचोड़ नहीं निकला। अलबत्ता सरकार ने जो चाहा, वही हुआ। पर विपक्ष इसी में खुश, संसद में जनहित के खूब मुद्दे उठाए। अब सत्र उठ गया, तो राज्यसभा में विपक्ष के नेता अरुण जेतली ने संसदीय जिम्मेदारी का मुद्दा उठाया। करीब महीने भर के सत्र में अपने पीएम तीन विदेश दौरे कर आए। सो जेतली इसे गलत परंपरा बता रहे। बोले- 'सत्र के दौरान पीएम के विदेश दौरे से संसद के प्रति सरकार की जिम्मेदारी का स्तर घटता जा रहा है। सो भविष्य के लिए संज्ञान ले सरकार।'  यों पीएम का संसद सत्र के वक्त विदेश जाना कोई नई बात नहीं। अगर पीएम देश में भी हों। तो भी सदन में आने की परंपरा कम ही रही। इंदिरा गांधी जब पीएम थीं। तब भी ऐसा ही माहौल था। सो तब अटल बिहारी वाजपेयी ने जो कहा, आज भी सभी प्रधानमंत्रियों पर मौजूं। वाजपेयी ने कहा था- 'पंडित जवाहरलाल नेहरू संसद से सिर्फ तब बाहर रहते थे, जब उनके पास कोई चारा नहीं होता था। पर इंदिरा गांधी सिर्फ तब संसद आया करतीं, जब उसे टालना संभव नहीं होता था।'  यही सवाल पी.वी. नरसिंह राव के काल में भी उठा। तब तत्कालीन संसदीय कार्यमंत्री विद्याचरण शुक्ल ने कबूला, नेहरू के बाद परंपरा बदल गई। शुक्ल ने कहा था- 'जवाहर लाल नेहरू के बाद हर प्रधानमंत्री ने सिर्फ आवश्यक महसूस होने पर ही संसद में आना उचित समझा। सो आप नरसिंह राव पर संसद को अधिक समय न देने का आरोप नहीं लगा सकते।'  अब संसदीय कार्य मंत्री ऐसी दलीलें दें, तो काहे की संसद। और काहे की जिम्मेदारी। पर मनमोहन के हालिया विदेश दौरे को ही देखें। तो कुछ ऐसा हासिल नहीं हुआ। जिसकी खातिर संसद को नजरअंदाज किया। अलबत्ता जैसे न्यूक्लीयर डील और शर्म-अल-शेख के साझा बयान में चूक हुई। अब कोपेनहेगन में क्लाइमेट चेंज पर अमेरिका के जाल में फंस गए। भले क्योटो प्रोटोकॉल रद्द नहीं करा पाए विकसित देश। पर विकासशील देशों को फंसा लिया। विकसित देश अपने यहां कार्बन में कितनी कटौती करेंगे। इसका खुलासा जनवरी के आखिर तक होगा। बाकायदा विकासशील देश पीकिंग एयर को भी राजी हो गए। यानी जैसे न्यूक्लीयर डील पर भारत ने मॉनीटरिंग की छूट दे दी। अब कोपेनहेगन के बाद भारत को दो साल पर रपट देनी होगी। वह भी तय गाइड लाइंस के तहत। जिस पर विकसित देश सलाह-मशविरा और विश£ेषण करेंगे। यानी कार्बन कटौती में खर्च करेगा भारत। मॉनीटरिंग करेगा अमेरिका। सो अरुण जेतली ने मौजूं टिप्पणी की। मनमोहन का नाम नहीं लिया। पर बोले- 'सरकार का मौजूदा नेतृत्व अमेरिकी अध्यापक के सामने सबसे अच्छा स्टूडेंट बनने की कोशिश में। सो भारत दुनिया के जाल में फंस रहा।'  तभी तो बराक ओबामा के सरकारी अधिकारी एक्सल रॉड ने हकीकत बता दी। कह दिया, अब भारत हमारी पकड़ में आ गया। यानी खाया-पीया कुछ नहीं, गिलास तोड़ा बारह आना। पर लगातार चुनावी जीत से गदगद कांग्रेस को कोई फर्क नहीं पड़ रहा। अब बुधवार को झारखंड के चुनाव नतीजों की बारी। सो ऊंट किस करबट बैठा, यह ईवीएम ही बताएगा। पर दावा दोनों कर रहे। कांग्रेस जीती, तो पांव जमीं पर नहीं टिकेंगे। अगर बीजेपी जीती, तो समझो संजीवनी मिल गई। विदा ले चुके राजनाथ को क्रेडिट मिलेगा। गडकरी के कदम शुभ कहलाएंगे। अगर नतीजा उलटा हुआ, तो श्रेय भी उलटा ही मिलेगा। पर नितिन गडकरी को झटके मिलने शुरू हो गए। बुधवार को राजस्थान से वसुंधरा ब्रिगेड दिल्ली धमकेगा। तो संगठन चुनाव पर रोक की मांग होगी। पर शनिवार को इस बाबत वेंकैया और गडकरी की बात हो चुकी। तो गडकरी चुनाव रोकने के पक्ष में नहीं बताए जा रहे। पर बवाल बढ़ चुका। सो बुधवार को राजस्थान बीजेपी का झगड़ा कहीं गडकरी के लिए वाटरलू साबित न हो जाए। वसुंधरा-माथुर-रामदास का त्रिगुट तो रण के मूड में। अगर बुधवार को राजस्थान का झगड़ा न सुलझा। तो राज्य में बीजेपी का कहीं उड़ीसा जैसा हाल न हो जाए। उड़ीसा में जबसे नवीन पटनायक से बीजेपी का रिश्ता टूटा। बीजेपी बिखरती जा रही। राज्य से बीजेपी के छह सांसद हुआ करते थे। पर अबके सौ बट्टïे सन्नाटा। एक भी सांसद जीतकर नहीं आ सका। विधायकों की गिनती भी तीस से छह पर सिमट गई। अब खरबला स्वेन ने भी बीजेपी छोड़ दी। तो उड़ीसा बीजेपी में भूचाल आ गया। हाईकमान ने फौरन मुख्तार अब्बास नकवी को उड़ीसा भेजा। ताकि कोई और पार्टी न छोड़े। पर खरबला का बीजेपी छोडऩा कोई आम बात नहीं। खरबला जब पिछली लोकसभा में सांसद थे। तो अपनी योग्यता और नॉलेज से स्पीकर सोमनाथ चटर्जी की नाक में दम कर रखा था। आज के जमाने में जब सांसद खुद को भगवान से कम नहीं समझते। खरबला हर विषय में पूरी तैयारी करते थे। कुल मिलाकर बीजेपी के बड़े इंटलेक्चुअल में शुमार होते थे खरबला। यानी भले बीजेपी में चेहरे बदल गए। पर चाल, चरित्र रंचमात्र नहीं बदला। वही अनुशासनहीनता। वही बगावत। वही बौद्धिक लोगों का बीजेपी से पलायन। वही श्रेष्ठïता की लड़ाई। वही बीजेपी का झंडा, जिसमें संघ का डंडा। और नेताओं का अपना-अपना एजंडा। अब चारों तरफ बीजेपी में पंगे ही पंगे दिख रहे। फिर भी गडकरी हर-हर गंगे कह रहे।
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22/10/2009

Friday, December 18, 2009

तो पद छोड़ भी आडवाणी बीजेपी के वटवृक्ष हो गए

इंडिया गेट से
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तो पद छोड़ भी आडवाणी

बीजेपी के वटवृक्ष हो गए
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 संतोष कुमार
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             तो एक बात साफ हो गई। बीजेपी की एक ही वाणी यानी आडवाणी। भले आडवाणी ने अपोजीशन लीडर की कुर्सी छोड़ दी। पर रिटायरमेंट लेने को राजी नहीं। अलबत्ता बीजेपी में महामहिम जैसी कुर्सी कब्जा ली। बीजेपी के संविधान में ऐसा बदलाव हुआ। आडवाणी अब दोनों सदनों में नेता मनोनीत कर सकते। जैसे कांग्रेस में सोनिया गांधी पॉवर सेंटर। वैसे ही अब आडवाणी। सो उन ने पार्लियामेंट्री पार्टी का चेयरमैन बनते ही सुषमा स्वराज को लोकसभा। तो अरुण जेतली को राज्यसभा में नेता मनोनीत कर दिया। बिसात तो पहले ही बिछ चुकी थी। सो शुक्रवार को देर शाम एनेक्सी में सांसद जमा हुए। तो मंच पर सिर्फ राजनाथ सिंह बैठे। आडवाणी की शान में राजनाथ ने खूब कसीदे पढ़े। फिर पार्टी संविधान में संशोधन का प्रस्ताव रखा। बीजेपी संविधान की धारा- 6 (ए) में दो बिंदु जोड़े गए। पहला- संसद में बीजेपी का एक चेयरमैन होगा। जिसका चुनाव दोनों सदनों के सांसद करेंगे। दूसरा- चेयरमैन दोनों सदनों में नेता, उपनेता और चीफ व्हिप्स को मनोनीत करेगा। सो राजनाथ ने प्रस्ताव रखा। तो वेंकैया, मुंडे ने अनुमोदन किया। फिर सभागार में बैठे सांसदों ने सहमति में हाथ खड़े किए। तो आडवाणी चुपचाप बैठे रहे। सो राजनाथ ने चुटकी ली। बोले- 'संशोधन प्रस्ताव पर आडवाणी जी ने हाथ नहीं उठाया। सो मैं यह मानता हूं आडवाणी को छोड़ यह प्रस्ताव सर्वसम्मत पारित हुआ।' फिर यशवंत सिन्हा ने नए पद के लिए आडवाणी का नाम प्रस्तावित किया। तो करतल ध्वनि के बीच आडवाणी निर्वाचित घोषित हुए। राजनाथ ने मंच पर लिवा मिठाई खिलाई। सो मंच पर आते ही आडवाणी ने भी राजनाथ की चुटकी का जवाब दिया। बोले- 'संशोधन से पहले राजनाथ सिंह ने जैसी भूमिका रखी। किसी और नाम का विकल्प ही नहीं छोड़ा। सो मेरे लिए इस प्रस्ताव का समर्थन करना कठिन हो गया।'  पर संशोधन हो या आडवाणी का प्रमोशन। सब प्रक्रिया का मामला। पर सबसे अहम बात, आडवाणी बीजेपी में और मजबूत होकर उभरे। भले संघ ने युवा हाथ में कमान सौंपने का फार्मूला दिया। पर आडवाणी ने बीरबल जैसी चतुराई दिखाई। लकीर में कोई छेड़छाड़ किए बिना एक बड़ी लकीर खींच दी। युवा हाथ में कमान भी सौंप दी। पर खुद मुखिया बन गए। दोनों सदनों में युवा नेताओं का मनोनयन आडवाणी ने किया। सो आडवाणी ने भी संघ को जतला दिया, बूढ़ी हड्डिïयों में अभी दम बाकी। आडवाणी की विदाई को लेकर अखबारों में खूब सुर्खियां छपीं। पर आडवाणी को एक सुर्खी नागवार गुजरी। लिखा था- 'रथयात्री आज रथ से उतरेंगे।'  सो आडवाणी संसदीय दल का मुखिया बनने के बाद बोले- 'यात्रा तो मेरे जीवन से जुड़ी हुई। सो अगर कोई पद छोडऩे का मतलब यह निकालता है कि आडवाणी सक्रियता छोड़ देंगे या संसद छोड़ देंगे, तो वह मुगालते में। मैं 14 साल की उम्र से रथयात्री बना। पर वक्त के साथ मकसद बदलता गया। सो मैं कभी रथयात्रा छोडऩे वाला नहीं। जीवन भर यात्रा चलेगी।'  यानी आडवाणी ने साफ कर दिया। पद छोड़ा है, सन्यास नहीं लिया। अब आडवाणी संसदीय दल के अध्यक्ष की जिम्मेदारी को राजनीतिक पारी का नया चैप्टर मान रहे। दिल में सुकूं संवैधानिक जिम्मेदारी से मुक्त होने का। पर संतोष, बीजेपी पर अपनी पकड़ कमजोर नहीं होने दी। अब जब डी-4 वाले धुरंधर नेता आडवाणी के मातहत। तो नितिन गडकरी कितनी चला पाएंगे। आडवाणी अब बीजेपी के वटवृक्ष हो गए। तभी तो राजनाथ सिंह रिटायर होकर कहीं जगह नहीं पा रहे। तो आडवाणी पद छोड़कर भी खुद को टायर्ड नहीं मान रहे। सो गडकरी हों या डी-4, आडवाणी की छत्रछाया में ही रहना होगा। शनिवार को गडकरी की ताजपोशी का भी एलान हो जाएगा। शुक्रवार को गडकरी अपनी शादी की 25 वीं सालगिरह को यादगार बना रहे थे। जब उन ने शनिवार को दिल्ली पहुंच चार्ज लेने का एलान कर दिया। यों राजनाथ शनिवार को एलान और संगठन चुनाव के बाद चार्ज सौंपने की सोच रहे थे। पर संघ ने साफ कर दिया। अब ना कोई मुहूर्त, ना नक्षत्र-ग्रह की टेढ़ी चाल। अलबत्ता जैसे वक्त का पहिया घूम रहा। बीजेपी में बदलाव होने दो। अब नितिन गडकरी की टीम का भी एलान जल्द होगा। पर एकतरफा संघ की नहीं, आडवाणी की खूब चलेगी। सो महासचिव के तौर पर वसुंधरा, धर्मेंद्र प्रधान, शाहनवाज के नाम शुक्रवार को ही उछलने लगे। यानी बदलाव की पूरी कवायद में जीत आडवाणी की ही दिख रही। तभी तो जेतली ने भी कहा- 'हमने अटल-आडवाणी से राजनीति सीखी। सो अभी भी मार्गदर्शन चाहिए।'  सुषमा स्वराज ने तो पूरा खुलासा कर दिया। बोलीं- 'जब मुझे नेता बनने का प्रस्ताव आया। तो मैंने आडवाणी की छत्रछाया की व्यवस्था की अपील की। अब संशोधन के बाद आडवाणी संसदीय दल के अध्यक्ष हो गए। सो सिर्फ पदों का परिवर्तन हुआ है, छाया वैसी ही चलेगी।'  अब आप इशारा खुद समझ लें। जीत किसकी हुई? संघ की या आडवाणी की? रही बात राजनाथ की। तो अब कोई पद नहीं बचा। सो संघ और बीजेपी के बीच पुल बनकर शायद अपनी अहमियत बनाए रखने की कोशिश करें।
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18/12/2009

वाजपेयी को हैप्पी बर्थ-डे कहेगी 'नई भाजपा'

इंडिया गेट से
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वाजपेयी को हैप्पी बर्थ-
डे कहेगी 'नई भाजपा'
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 संतोष कुमार
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              महीने भर में ही अपने सांसद उकता गए। सो सदन के कामकाज में दिल नहीं लग रहा। सरकार भी अपना कामकाज निबटा चुकी। सो सदन चले या न चले, कोई फर्क नहीं पड़ता। महंगाई पर बुधवार को लोकसभा ठप रही। लगे हाथ तेलंगाना का मुद्दा समूचे सदन पर भारी पड़ रहा। तेलुगुदेशम के चार एमपी हाथ में बैनर-पोस्टर लिए रोजाना वैल में घुस आते। तो उधर कुछेक कांग्रेसी भी उछलने लगते। यूनाइटेड आंध्र के लिए रोज यही ड्रामा चल रहा। बाकी कुछ ऐसे भी सांसद, जो बोडोलैंड की तख्ती उठाकर उछलने लगते। तो कोई मिथिलांचल, तो कोई विदर्भ, तो कोई पूर्वांचल का मुद्दा उठा शोर मचाते। यानी कुल चार-छह सांसद मिलकर सदन ठप करा रहे। गुरुवार को तो महिला आरक्षण बिल पर स्टेंडिंग कमेटी की रपट ने ही बखेड़ा खड़ा करा दिया। कमेटी ने गीता मुखर्जी कमेटी की रपट को ही जस का तस अमल में लाने की सिफारिश कर दी। यानी संसद और विधानसभा में महिलाओं को 33 फीसदी आरक्षण का रास्ता साफ हो गया। पर स्टेंडिंग कमेटी की रपट से ही हंगामा हो गया। लोकसभा में रपट पेश हुई। तो मुलायमवादी वैल में घुस आए। पीछे-पीछे लालू भी आ गए। तो स्टेंडिंग कमेटी की रपट वापस लो, के नारे लगे। यों नेताओं की चुस्ती-फुर्ती का नमूना देखिए। स्टेंडिंग कमेटी की रपट में सिर्फ मुलायमवादियों ने ही असहमति का नोट दिया। बाकी लालू हों या शरद यादव। असहमति नोट देने की जहमत नहीं उठाई। अब अगर शुक्रवार को भी हालात ऐसे ही रहे। तो सरकार लोकसभा को अनिश्चितकाल के लिए स्थगित करा लेगी। पर राज्यसभा शायद सोमवार को भी चले। यों बीजेपी की मुराद तो यही थी, संसद के दोनों सदन सोमवार तक चलें। ताकि सदन में क्लाइमेट चेंज पर बहस हो। सोमवार को ही पार्लियामेंट्री पार्टी की मीटिंग का भी 'क्लाइमेट' बदल जाए। अब राज्यसभा में तो सोमवार तक का कामकाज। पर लोकसभा में सरकार का रुख साफ नहीं। सो बीजेपी ऊहापोह में फंस गई थी। पार्लियामेंट्री पार्टी की मीटिंग कब करे। आडवाणी पर संघ का दबाव बढ़ चुका। सो आडवाणी अपनी विरासत सुषमा स्वराज को सौंपने को तैयार हो गए। बाकायदा तय हुआ, सोमवार को आडवाणी बतौर नेता विपक्ष आखिरी बार सांसदों को संबोधित करेंगे। पर सरकारी ऊहापोह था। सो सुषमा स्वराज ने कहा, अगर लोकसभा सोमवार तक नहीं चली। तो पार्लियामेंट्री पार्टी मीटिंग नहीं होगी। पर बीजेपी में कुछ अहम फैसले सुषमा के बयान के उलट होते। अब देखो, सुषमा ने एक-दो दफा नहीं, बार-बार कहा- 'आडवाणी पंद्रहवीं लोकसभा के लिए नेता विपक्ष चुने गए। सो पूरे पांच साल पद पर रहेंगे।' पर आडवाणी की विदाई की तारीख तय हो गई। सुषमा खुद आडवाणी की उत्तराधिकारी होने जा रहीं। सो आडवाणी की पैरवी में ऐसा कहा, तो कुछ गलत भी नहीं। थोड़ा और पीछे जाएं, तो जिन्ना एपीसोड याद करिए। आडवाणी ने पद से इस्तीफा दे दिया। तो बीजेपी ने तब मना लिया। पर संघ ने अध्यक्षी छोडऩे का अल्टीमेटम थमा दिया। फिर भी सुषमा स्वराज से बीजेपी हैड क्वार्टर में सवाल हुआ। तो सुषमा का जवाब क्या था, आप खुद देखिए। उन ने तमतमाते हुए कहा था- 'क्या आप लोगों को थाली पीट-पीटकर बताऊं कि आडवाणी पार्टी अध्यक्ष का अपना टर्म पूरा करेंगे।' पर हुआ क्या। सुषमा ने इधर बयान दिया, करीब दो-तीन महीने बाद ही चेन्नई वर्किंग कमेटी में आडवाणी ने अध्यक्षी छोडऩे की तारीख का एलान कर दिया। अब इन उदाहरणों का हवाला इसलिए दिया, ताकि कुछ बड़े मुद्दों पर सुषमा के बयान का मतलब आप खुद से भी निकाल सकें। अब यह तो तय हो गया, शुक्रवार को शाम साढ़े पांच बजे एनेक्सी में पार्लियामेंट्री पार्टी की अहम बैठक होगी। आडवाणी पद छोडऩे की पेशकश करेंगे। तो 'परंपरा' के मुताबिक आडवाणी की मनुहार होगी। फिर कुछ देर बाद पार्लियामेंट्री पार्टी से संविधान संशोधन की हामी भरवाई जाएगी। ताकि आडवाणी को संसदीय दल का अध्यक्ष बनाया जा सके। जैसे कांग्रेस में सोनिया गांधी। फिर अगले दिन शनिवार को बीजेपी दफ्तर में संसदीय बोर्ड की मीटिंग होगी। तो शायद प्रस्ताव पारित कर आडवाणी के कसीदे पढ़े जाएं। फिर वहीं सुषमा स्वराज के नाम को हरी झंडी दी जाएगी। यों संसदीय बोर्ड की मीटिंग का मकसद नितिन गडकरी के नाम पर मुहर लगाना। पर पार्लियामेंट्री पार्टी की मीटिंग सोमवार के बजाए शुक्रवार को ही हो रही। सो आडवाणी-राजनाथ की विदाई और नितिन गडकरी की ताजपोशी का औपचारिक एलान शनिवार को होगा। यानी 25 दिसंबर तक बीजेपी का चेहरा बदल जाएगा। क्रिसमस और वाजपेयी के जन्मदिन से पहले बीजेपी सजधज कर तैयार होगी। ताकि वाजपेयी को हैप्पी बर्थ-डे कहने जाएगी नई बीजेपी। बीजेपी के एक बड़े नेता ने आडवाणी के कमरे में अनौपचारिक मीटिंग के बाद दो-टूक कहा- '25 दिसंबर तक बीजेपी में सभी बड़े बदलाव हो जाएंगे। फिर 25 दिसंबर से दो जनवरी तक छुट्टïी होगी। ताकि सब हल्के-फुल्के माहौल में नया साल मना सकें।'
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17/12/2009