इंडिया गेट से
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लोकतंत्र की परिपक्वता की
मिसाल रहेगा बीता साल
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संतोष कुमार
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समय और लहरें किसी का इंतजार नहीं करतीं। सो 2009 आया और नौ-दो-ग्यारह हो गया। अब समय का चक्र 2010 में। सो नूतन वर्ष की आपको शुभकामना। पर बीता साल रोजमर्रा की जिंदगी में ग्रहण लगाता रहा। अबके नए साल की शुरुआत ही चंद्र ग्रहण से। चांद पर यों दाग बहुतेरे। सो विज्ञान के दौर में शुभ-अशुभ के फेर में पड़ हम-आप क्यों वक्त गंवाएं। अब चंद्र ग्रहण लगे या सूर्य ग्रहण, कोई फर्क नहीं पड़ता। बीते साल अपना चंद्रयान चांद पर पहुंच गया। तो ऐसा रहस्योद्घाटन। दुनिया ताकती रह गई। भले अपना चंद्रयान नाकाम हो गया। पर नाकामी से भी भारत ने नई इबारत लिख दी। चांद पर पानी की खोज करने वाला देश बन गया भारत। पर अमेरिका की नासा को लगा, बादशाहत टूट रही। तो चांद पर और धब्बा लगाने क्रेटर भेज दिया। क्रेटर ने चांद पर जोरदार टक्कर मारी। ताकि पानी की थाह विस्तार से लगा सके। वैसे भी अमेरिका अब जुगाड़ में माहिर हो चुका। तभी तो 2009 में ही बराक ओबामा पहले अश्वेत राष्टï्रपति बने। उसी साल शांति का नोबल भी मिल गया। शायद यही कमाल की बात रही। सो जहां 2008 में भारत औसतन हर महीने आतंकी हमले का शिकार रहा। वहां 2009 में कोई हमला नहीं। अपने होम मिनिस्टर पी. चिदंबरम ने क्रेडिट किस्मत को दिया, खुफिया विभाग को नहीं। सो किस्मत की चाबी किसके हाथ, आप खुद समझ लो। पर आतंकी हमले न सही, नक्सलियों ने नाक में दम कर दिया। पुलिस बल की नाक में घुसकर बाल नोंच डाले। लालगढ़ से लेकर राजधानी एक्सप्रेस नक्सली कब्जे में गया। अब चिदंबरम नक्सलियों से निपटने में दो-तीन साल का वक्त लगने की बात कर रहे। सो सिर्फ साल बीता, संकट नहीं। चुनौतियां 2010 में भी मुंह बाए खड़ीं। बीते साल देश की गरीबी पर अंग्रेज डायरेक्टर ने 'स्लमडॉग मिलेनियर' फिल्म बनाई। तो ऑस्कर मिल गया। ऑस्कर से सबसे ज्यादा खुशी कांग्रेस को हुई। फिल्म के गाने का पेटेंट करा लिया। पर गरीबी के प्रदर्शन पर काहे की खुशी। सो जब मनमोहन दुबारा सत्ता में लौटे। तो राष्टï्रपति अभिभाषण में वादा किया। पांच साल में देश स्लम मुक्त होगा। पर गाड़ी कितनी आगे बढ़ी, अपने को मालूम नहीं। अकेले मुंबई की 54 फीसदी आबादी झुग्गियों में रहती। गरीबी के मामले में भी देश पीछे नहीं। सो कहीं पांच साल बाद मनमोहन यही वादा न दोहरा दें। महंगाई और मंदी पर तो यही हुआ। महंगाई बढ़ती रही, मनमोहन-चिदंबरम-मोंटेक और अब प्रणव दिलासा देते रहे। विदा लेते साल में खाद्य वस्तुओं की महंगाई दर 20 फीसदी तक पहुंच गई। भले जनता ने समस्या देने वाली कांग्रेस पर ही एतबार किया। पर शेक्सपीयर ने कहा था- 'जिसने एक बार धोखा दे दिया हो, उसका विश्वास नहीं करना चाहिए।' फिर भी जनता ने मनमोहन पर भरोसा जताया। तो अबके हिसाब-किताब चाहिए। पर योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह आहलूवालिया अब महंगाई शब्द सुनकर ही कुर्सी से खड़े हो जाते। अब मोंटेक कुर्सी से खड़े हों या बैठे रहें। पर आम आदमी की तो खाट खड़ी हो चुकी। सो अब कांग्रेस और सरकार के पास कोई बहानेबाजी नहीं। जनता एक सीमा तक ही धैर्य रख सकती। जिसकी मिसाल 26/11 के हमले के बाद राजनेताओं को मिल चुकी। वाकई 2009 अपने लोकतंत्र की परिपक्वता का साल रहा। जनता ने तमाम रणनीतिकारों और क्षत्रपों को ऐसी धूल चटाई। लालू-पासवान-मुलायम-माया-चंद्रबाबू-जयललिता-कारत-वर्धन-देवगौड़ा जैसे क्षत्रप घर-घर जाकर पानी मांग रहे। मार्च 2009 तक जिन लेफ्टियों-लालुओं को महंगाई नहीं दिखती थी। अब महंगाई पर आंदोलन कर रहे। क्षेत्रीय ताकतें कांग्रेस के बढ़ते ग्राफ से इस कदर सहमीं। सबको जमीन दिखने लगी। सो 2009 में जनता ने कमाल दिखाया। तो दिग्गज अब जमीन पर जड़ें जमाने में जुटे। इसी साल अक्टूबर में बिहार के चुनाव। फिर कई और चुनाव आएंगे। सो क्षेत्रीय दल फिर पैर जमाने में लग गए। यानी 2009 समूची राजनीति के लिए सबक। भले जनता बीती ताहि बिसार देगी। पर आगे की सुध नहीं ली। तो जनता की लाठी में आवाज नहीं, सिर्फ चोट होती। अगर चोट का असली दर्द पूछना हो। तो बीजेपी से पूछ लो। सो 2010 में बीजेपी नई शुरुआत की सोच रही। नितिन गडकरी ने फिल्मी गीत गुनगुना दिया- 'छोड़ो कल की बातें, कल की बात पुरानी।' पर बीजेपी को सिर्फ संगठन की फिक्र। सरकार के सामने 2010 में कई बड़ी चुनौतियां। महंगाई पर नकेल हो। तेलंगाना की सुलगी आग पर पानी डालना। संसद पर हमले का दोषी अफजल तिहाड़ में। मुंबई हमले का एकमात्र जिंदा आतंकी कसाब पर फैसला आना बाकी। सो सरकार को आतंकवाद पर वोट की फिक्र किए बिना मजबूत जिगरा दिखाना होगा। बीते साल में महिला बिल पर स्टेंडिंग कमेटी की रपट आ चुकी। सो 2010 में बिल पारित कराने की चुनौती। पर सबसे अहम, देश की साख बचाना। जो नेतागिरी के जाल में उलझ चुकी। जी हां, बात कॉमन वैल्थ गेम्स की। जिसकी तैयारी पर 2009 में खूब सवाल उठे। नए साल के आखिरी महीनों में खेल होना। पर कहीं ऐसा न हो, अपने राजनेता देश की साख को भी 'खेल' बना दें। जैसे 2009 के आखिर में क्रिकेट के कोटला मैदान ने कलंकित किया। पर नया साल है। तो सोच पुरानी क्यों रहे। सो 2010 में उम्मीद यही। व्यवस्था की जड़ों में पहुंचे खाद-पानी। तो कम हो आम आदमी की समस्या। पर कहीं ऐसा न हो, नए साल की उमंग मौसम के करबट लेते ही हवा हो जाए।
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31/12/2009
Thursday, December 31, 2009
Wednesday, December 30, 2009
तो साल 2009: कांग्रेस ने सिर्फ दर्द दिया, दवा नहीं
इंडिया गेट से
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तो साल 2009: कांग्रेस ने
सिर्फ दर्द दिया, दवा नहीं
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संतोष कुमार
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तो सफरनामा- 2009 में आज बात कांग्रेस की। शुरुआती दिन 26/11 की कालिमा में ही गुजरे। पर अरसे बाद देश में जागरूकता दिखी। जब जनता ने आतंकवाद को राजनीतिक मुद्दा नहीं बनने दिया। अलबत्ता ऐसी लहर चली। कांग्रेस हो या बीजेपी, मुंह छुपाती दिखीं। पर सेमीफाइनल में बीजेपी का राजस्थान किला ढहना। कांग्रेस की उम्मीद बढ़ा गया। सो आतंकवाद के मसले पर स्ट्रेटजिक बैटिंग की। पाक से युद्ध जैसा माहौल बना वैश्विक कूटनीति पर फोकस किया। ताकि चुनावी जीत का आधार बुना जा सके। सो राजस्थान की जीत का क्रेडिट राहुल गांधी को गया। तो फोटोजनिक फेस वाले राहुल पर भी धुन सवार हुई। सो फौरन कांग्रेस का चापलूस तंत्र एक्टिव हो गया। मनमोहन 2009 की शुरुआत में ही अस्वस्थ हो गए। गणतंत्र दिवस की परेड में शामिल न हो सके। सोनिया ने मनमोहन का आधा काम प्रणव दा को दिया। तो आधा ए.के. एंटनी को। गणतंत्र दिवस से दो दिन पहले एम्स में मनमोहन की हर्ट सर्जरी हुई। लगा, मनमोहन की पारी खत्म। सो राहुल बाबा को साउथ ब्लॉक भेजने की मांग शुरू हो गई। पर सोनिया गांधी ने चतुराई दिखाई। मैनीफेस्टो एलान के दिन 24 मार्च को मनमोहन को ही पीएम प्रोजैक्ट कर दिया। गांधी-नेहरू खानदान से इतर पहली बार कांग्रेस ने पीएम प्रोजैक्ट किया। सो मनमोहन के हौसले भी बुलंद। पर सोनिया ने राहुल को प्रोजैक्ट न कर 2014 की नींव रखी। सो 2009 का चुनाव लैब टेस्ट के आधार पर हुआ। राहुल ने शॉर्ट टर्म और लाँग टर्म स्ट्रेटजी बनाई। कांग्रेस ने यूपीए का नेशनल अलायंस नहीं बनाया। अलबत्ता राज्यों में तालमेल का फार्मूला रखा। तो लालू-पासवान तमतमा उठे। सो यूपीए बिखरने लगा। राहुल ने भी एकला मोर्चा संभाला। तो वोटरों में नई उम्मीद जगी। राहुल का दलितों के घर जाना तो विरोधियों को आज भी चुभ रहा। पर राहुल की मंजिल तय। सो राहुल तैयार स्क्रिप्ट से आगे बढ़ रहे। तभी तो कांग्रेस के युवा नेतृत्व में वंशवाद की झलक। पर राहुल का चेहरा सुर्खियां दिलाने लगा। तो कांग्रेस समस्याओं का चोला फेंक इतिहास से उपलब्धियों का झोला ले आई। आम चुनाव के लिए 'जय होÓ की धुन एक करोड़ में खरीद ली। भले खुद को गांधी की कांग्रेस बताने वाली मौजूदा कांग्रेस बापू के चश्मा, घड़ी, खड़ाऊं, चम्मच आदि नीलामी में खरीद नहीं पाई। वह तो शराब किंग विजय माल्या को थेंक्स। जिन ने भले शराब के पैसे से, पर बापू की अमानत तो बचा ली। पर कांग्रेस ने 'जय हो' गीत से फील गुड का अहसास कराया। यों कांग्रेसी रणनीतिकारों को बात जल्द समझ आ गई। महंगाई और मंदी बेलगाम घोड़े की तरह बढ़ती गई। तो कांग्रेस ने 'जय हो' की पैरोडी वापस ले ली। फिर चुनावी समर के बीच जूता प्रकरण। सिख विरोधी दंगों के आरोपियों सज्जन, टाइटलर को टिकट मिला। तो सिख समुदाय का घाव हरा हो गया। ऊपर से मनमोहन की मातहत सीबीआई ने कोर्ट में केस बंद करने की रपट दे दी। सो सरकार की लीपापोती देख जरनैल सिंह का पत्रकार मन मजहबी हो गया। भले नैतिक रूप से जरनैल का पी. चिदंबरम पर जूता फेंकना गलत। पर एक समाज का दर्द था। सो सात अप्रैल को जूता उछला। दो दिन के भीतर सज्जन, टाइटलर का टिकट कट गया। पर सीबीआई के बेजा इस्तेमाल की कहानी सिर्फ यही नहीं। बोफोर्स दलाली का मामला भी सीबीआई ने बंद करने की ठानी। क्वात्रोची को क्लीन चिट देने की रपट कोर्ट में। भले बवाल मचा। पर कांग्रेस ने राजनीति की ठसक नहीं छोड़ी। चुनाव आयुक्त नवीन चावला को हटाने की सिफारिश गोपाल स्वामी ने की। पर कांग्रेस ने चावला को हटाना तो दूर, सीईसी बना दिया। फिर भी विपक्ष लड़ाई को अंजाम तक नहीं पहुंचा सका। अलबत्ता बीजेपी आपस में इस कदर लड़ी-मरी। जनता का भरोसा सत्ता से ज्यादा विपक्ष से उठ गया। सो महंगाई, महामंदी जैसी विकराल समस्या के बावजूद कांग्रेस जीती। तो सत्ता के नशे में मगरूर। जनता का दुख-दर्द भुला दिया। सो हर जीत के साथ जनता की जेब पर डाका। आम चुनाव के बाद मीरा कुमार को पहली महिला स्पीकर बनाना। फिर सौ दिनी योजना की होड़ में बंटाधार की नीति। सो मनमोहन के सौ दिन छोडि़ए, 222 दिन बीत गए। पर महंगाई न थमी, न थमने वाली। सो सत्ता के नशे में चूर कांग्रेस ने पहले सत्र में ही कई गलतियां कीं। शर्म-अल-शेख का साझा बयान। सी.पी. जोशी का सदन में फंसना। जजों की संपत्ति वाला बिल वापस लेने की नौबत। स्वाइन फ्लू की मार और सरकार की नाकामी। पर जब जनता की समस्या कांग्रेस के बूते से बाहर हो गई। तो ध्यान बंटाने को सादगी का खेल। कैसे मनमोहन के मंत्री कृष्णा, थरूर का फाइव स्टार में मौज उड़ाना। राहुल का ट्रेन से जाना। सोनिया का 'कैटल क्लास' में सफर। चीन की धौंस-पट्टïी पर मनमोहन का गांधारी बनना। आतंकी डेविड हैडली के मामले में अमेरिका का दोगलापन। पर मनमोहन अभी भी अमेरिका के बेस्ट स्टूडेंट बनने में लगे। अब साल के अंत में एन.डी. तिवारी का सेक्स स्कैंडल वाला दाग। लिब्राहन और रंगनाथ मिश्र रपट की आंच तो बाद में। तेलंगाना की आग बुझ नहीं रही। आंध्र में वाई.एस.आर. की हादसे में मौत से कांग्रेस को भारी क्षति। सो अब आंध्र संभाले न संभल रहा। चिदंबरम ने अगले साल पांच जनवरी को फिर मीटिंग बुला ली। सो अब कोई पूछे, कहां है करिश्माई चेहरा? यानी कुल मिलाकर 2009 में कांग्रेस की नहीं, परिस्थितियों की जीत हुई। तीसरे मोर्चे ने आधार खोया। बीजेपी खुद में उलझी। सो मजबूर जनता ने कांग्रेस से ही अर्जी लगाई- 'तुम्हीं ने दर्द दिया है, तुम्हीं दवा देना।'
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30/12/2009
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तो साल 2009: कांग्रेस ने
सिर्फ दर्द दिया, दवा नहीं
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संतोष कुमार
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तो सफरनामा- 2009 में आज बात कांग्रेस की। शुरुआती दिन 26/11 की कालिमा में ही गुजरे। पर अरसे बाद देश में जागरूकता दिखी। जब जनता ने आतंकवाद को राजनीतिक मुद्दा नहीं बनने दिया। अलबत्ता ऐसी लहर चली। कांग्रेस हो या बीजेपी, मुंह छुपाती दिखीं। पर सेमीफाइनल में बीजेपी का राजस्थान किला ढहना। कांग्रेस की उम्मीद बढ़ा गया। सो आतंकवाद के मसले पर स्ट्रेटजिक बैटिंग की। पाक से युद्ध जैसा माहौल बना वैश्विक कूटनीति पर फोकस किया। ताकि चुनावी जीत का आधार बुना जा सके। सो राजस्थान की जीत का क्रेडिट राहुल गांधी को गया। तो फोटोजनिक फेस वाले राहुल पर भी धुन सवार हुई। सो फौरन कांग्रेस का चापलूस तंत्र एक्टिव हो गया। मनमोहन 2009 की शुरुआत में ही अस्वस्थ हो गए। गणतंत्र दिवस की परेड में शामिल न हो सके। सोनिया ने मनमोहन का आधा काम प्रणव दा को दिया। तो आधा ए.के. एंटनी को। गणतंत्र दिवस से दो दिन पहले एम्स में मनमोहन की हर्ट सर्जरी हुई। लगा, मनमोहन की पारी खत्म। सो राहुल बाबा को साउथ ब्लॉक भेजने की मांग शुरू हो गई। पर सोनिया गांधी ने चतुराई दिखाई। मैनीफेस्टो एलान के दिन 24 मार्च को मनमोहन को ही पीएम प्रोजैक्ट कर दिया। गांधी-नेहरू खानदान से इतर पहली बार कांग्रेस ने पीएम प्रोजैक्ट किया। सो मनमोहन के हौसले भी बुलंद। पर सोनिया ने राहुल को प्रोजैक्ट न कर 2014 की नींव रखी। सो 2009 का चुनाव लैब टेस्ट के आधार पर हुआ। राहुल ने शॉर्ट टर्म और लाँग टर्म स्ट्रेटजी बनाई। कांग्रेस ने यूपीए का नेशनल अलायंस नहीं बनाया। अलबत्ता राज्यों में तालमेल का फार्मूला रखा। तो लालू-पासवान तमतमा उठे। सो यूपीए बिखरने लगा। राहुल ने भी एकला मोर्चा संभाला। तो वोटरों में नई उम्मीद जगी। राहुल का दलितों के घर जाना तो विरोधियों को आज भी चुभ रहा। पर राहुल की मंजिल तय। सो राहुल तैयार स्क्रिप्ट से आगे बढ़ रहे। तभी तो कांग्रेस के युवा नेतृत्व में वंशवाद की झलक। पर राहुल का चेहरा सुर्खियां दिलाने लगा। तो कांग्रेस समस्याओं का चोला फेंक इतिहास से उपलब्धियों का झोला ले आई। आम चुनाव के लिए 'जय होÓ की धुन एक करोड़ में खरीद ली। भले खुद को गांधी की कांग्रेस बताने वाली मौजूदा कांग्रेस बापू के चश्मा, घड़ी, खड़ाऊं, चम्मच आदि नीलामी में खरीद नहीं पाई। वह तो शराब किंग विजय माल्या को थेंक्स। जिन ने भले शराब के पैसे से, पर बापू की अमानत तो बचा ली। पर कांग्रेस ने 'जय हो' गीत से फील गुड का अहसास कराया। यों कांग्रेसी रणनीतिकारों को बात जल्द समझ आ गई। महंगाई और मंदी बेलगाम घोड़े की तरह बढ़ती गई। तो कांग्रेस ने 'जय हो' की पैरोडी वापस ले ली। फिर चुनावी समर के बीच जूता प्रकरण। सिख विरोधी दंगों के आरोपियों सज्जन, टाइटलर को टिकट मिला। तो सिख समुदाय का घाव हरा हो गया। ऊपर से मनमोहन की मातहत सीबीआई ने कोर्ट में केस बंद करने की रपट दे दी। सो सरकार की लीपापोती देख जरनैल सिंह का पत्रकार मन मजहबी हो गया। भले नैतिक रूप से जरनैल का पी. चिदंबरम पर जूता फेंकना गलत। पर एक समाज का दर्द था। सो सात अप्रैल को जूता उछला। दो दिन के भीतर सज्जन, टाइटलर का टिकट कट गया। पर सीबीआई के बेजा इस्तेमाल की कहानी सिर्फ यही नहीं। बोफोर्स दलाली का मामला भी सीबीआई ने बंद करने की ठानी। क्वात्रोची को क्लीन चिट देने की रपट कोर्ट में। भले बवाल मचा। पर कांग्रेस ने राजनीति की ठसक नहीं छोड़ी। चुनाव आयुक्त नवीन चावला को हटाने की सिफारिश गोपाल स्वामी ने की। पर कांग्रेस ने चावला को हटाना तो दूर, सीईसी बना दिया। फिर भी विपक्ष लड़ाई को अंजाम तक नहीं पहुंचा सका। अलबत्ता बीजेपी आपस में इस कदर लड़ी-मरी। जनता का भरोसा सत्ता से ज्यादा विपक्ष से उठ गया। सो महंगाई, महामंदी जैसी विकराल समस्या के बावजूद कांग्रेस जीती। तो सत्ता के नशे में मगरूर। जनता का दुख-दर्द भुला दिया। सो हर जीत के साथ जनता की जेब पर डाका। आम चुनाव के बाद मीरा कुमार को पहली महिला स्पीकर बनाना। फिर सौ दिनी योजना की होड़ में बंटाधार की नीति। सो मनमोहन के सौ दिन छोडि़ए, 222 दिन बीत गए। पर महंगाई न थमी, न थमने वाली। सो सत्ता के नशे में चूर कांग्रेस ने पहले सत्र में ही कई गलतियां कीं। शर्म-अल-शेख का साझा बयान। सी.पी. जोशी का सदन में फंसना। जजों की संपत्ति वाला बिल वापस लेने की नौबत। स्वाइन फ्लू की मार और सरकार की नाकामी। पर जब जनता की समस्या कांग्रेस के बूते से बाहर हो गई। तो ध्यान बंटाने को सादगी का खेल। कैसे मनमोहन के मंत्री कृष्णा, थरूर का फाइव स्टार में मौज उड़ाना। राहुल का ट्रेन से जाना। सोनिया का 'कैटल क्लास' में सफर। चीन की धौंस-पट्टïी पर मनमोहन का गांधारी बनना। आतंकी डेविड हैडली के मामले में अमेरिका का दोगलापन। पर मनमोहन अभी भी अमेरिका के बेस्ट स्टूडेंट बनने में लगे। अब साल के अंत में एन.डी. तिवारी का सेक्स स्कैंडल वाला दाग। लिब्राहन और रंगनाथ मिश्र रपट की आंच तो बाद में। तेलंगाना की आग बुझ नहीं रही। आंध्र में वाई.एस.आर. की हादसे में मौत से कांग्रेस को भारी क्षति। सो अब आंध्र संभाले न संभल रहा। चिदंबरम ने अगले साल पांच जनवरी को फिर मीटिंग बुला ली। सो अब कोई पूछे, कहां है करिश्माई चेहरा? यानी कुल मिलाकर 2009 में कांग्रेस की नहीं, परिस्थितियों की जीत हुई। तीसरे मोर्चे ने आधार खोया। बीजेपी खुद में उलझी। सो मजबूर जनता ने कांग्रेस से ही अर्जी लगाई- 'तुम्हीं ने दर्द दिया है, तुम्हीं दवा देना।'
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30/12/2009
Tuesday, December 29, 2009
तो साल 2009, बीजेपी में जो हारा, वही सिकंदर
इंडिया गेट से
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तो साल 2009, बीजेपी में
जो हारा, वही सिकंदर
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संतोष कुमार
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तुम जियो हजारों साल, साल के दिन हों पचास हजार। पर न कोई हजार साल जी सकता। न साल के दिन पचास हजार हो सकते। सो 365 दिन बाद 2009 भी विदा ले रहा। अब महज कुछ घंटों का इंतजार, फिर 2010 का स्वागत। सो आखिरी दिन में लेखाजोखा भी जरूरी। तो आज शुरुआत बीजेपी के सफरनामे से। साल 2008 का अंत न देश के लिए शुभ रहा, न बीजेपी के लिए। देश ने 26/11 का दंश झेला। तो बीजेपी सेमीफाइनल में कांग्रेस से पिछड़ गई। राजस्थान का मजबूत किला ढह गया। तो हंगामे का आगाज भी वहीं से हुआ। यों शेखावत को चुनाव लडऩा नहीं था। पर वसुंधरा से नाराज बाबोसा ने पासा फेंका। सो समूची बीजेपी हिल गई। राजनाथ सिंह को मैदान में उतरना पड़ा। तो उन ने लोक-लिहाज नहीं किया। अलबत्ता शेखावत को गंगा स्नान के बाद कुंए में न नहाने की सलाह दी। अब जब रात हो इतनी मतवाली। तो सुबह का आलम क्या होगा। यह तो बीजेपी से पूछिए। शुरुआत पुरोधा ने की। तो बाकी कहां पीछे रहते। बीस जनवरी को कल्याण सिंह ने बीजेपी छोड़ दी। लोकसभा का चुनावी समर शुरू हुआ। तो आडवाणी खुद को भावी पीएम कम, मौजूदा पीएम की तरह व्यवहार करने लगे। हर अहम मसले पर विशेषज्ञों की मीटिंग। फिर नई कार्ययोजना का एलान। सो इर्द-गिर्द ऐसे लोगों का जमावड़ा हो गया। आडवाणी जमीनी हकीकत भांप नहीं पाए। समर में कांग्रेस से मुकाबला तो बाद में। पर पहले बीजेपी ने आपस में नेट प्रेक्टिस की। जेतली, वेंकैया में पोल मैनेजर बनने की होड़। बीजेपी में जूरासिक पार्क जैसा माहौल था। नागपुर में ही राजनाथ ने भी हिंदुत्व एक्सप्रेस दौड़ाई। पर दिल्ली आते ही जैसे बीजेपी का ब्रेक डाउन हो गया। राजनाथ की सत्ता को पोल मैनेजर अरुण जेतली की चुनौती मिल गई। एक-दो दिन नहीं, पूरे बारह दिन ड्रामा चला। जेतली ने राजनाथ की रहनुमाई वाली सीईसी का बॉयकॉट किया। मुद्दा सिर्फ इतना था, राजनाथ ने सुधांशु मित्तल को पूर्वोत्तर का इंचार्ज बनाया था। आडवाणी भी जेतली को मना नहीं पाए। पूरे चुनाव के टिकट बंट गए। पर जेतली-राजनाथ की रार ठनी रही। यों अरुण का संकट सुलझा भी नहीं था। तभी गांधी-नेहरू खानदान के भाजपाई वारिस वरुण गांधी का भड़काऊ भाषण आ गया। बीजेपी ने वरुण का जमकर बचाव किया। पर आखिर में फोरेंसिक लैब ने पुष्टिï कर दी। भड़काऊ बयान वरुण का ही। सो बीजेपी अपने किए पर औंधे मुंह गिरी। लगा, जैसे वक्त भी बीजेपी का साथ देने को तैयार नहीं। चुनावी समर में ही उड़ीसा में नवीन पटनायक से गठजोड़ टूटा। कंधार प्रकरण पर बीजेपी बचाव में ही उलझी रही। ऐसा लगा, मानो कंधार एपीसोड बीजेपी का। आडवाणी कहीं भी साझीदार नहीं। सो चुनाव नतीजे चौंकाने वाले रहे। आडवाणी का सपना चूर हो गया। तो पद छोडऩे की पेशकश की। पर हाई वोल्टेज ड्रामे के बाद फिर खिवैया बन गए। फिर हार पर बीजेपी में जो आपसी मर्दन हुआ। किसी से छुपा नहीं। जसवंतनामा, यशवंतनामा, शौरीनामा सब में एक ही आवाज। हराने वाले को इनाम क्यों? निशाने पर जेतली ही, जिन्हें आडवाणी ने राज्यसभा में नेता बना दिया। पर आडवाणी के इर्द-गिर्द चौकड़ी में शामिल सुधींद्र कुलकर्णी, स्वप्रदास गुप्त जैसे लोग चुनाव से पहले सलाहकार थे। बीजेपी हार गई, तो पत्रकार बनकर खाल खींचने लगे। फिर शिमला चिंतन बैठक। जसवंत के जिन्ना प्रेम पर बर्खास्तगी। हार का मंथन हुआ। तो घाव केंद्र में था, ऑपरेशन राज्यों का कर दिया। यशवंत ने कामराज फार्मूले की मांग की। पर कुर्सी कौन छोड़ रहा। बीजेपी के कर्ता-धर्ता इसी में खुश। भले खुद न जीते, पर लेफ्ट तो हार गया। उत्तराखंड से बी.सी. खंडूरी की विदाई। राजस्थान में ओम प्रकाश माथुर का इस्तीफा। फिर कई राज्यों के क्षत्रप बदल दिए। पर वसुंधरा की बारी आई। तो अगस्त से अक्टूबर तक जो हुआ। बीजेपी नहीं भुला सकती। सो शिमला चिंतन में बीजेपी की चिंता कम, चिता ज्यादा दिखी। अरुण शौरी का राजनाथ को हंप्टी-डंप्टी कहना। बीजेपी में नेतृत्व परिवर्तन पर संघ के मुखिया मोहन भागवत का डी-4 फार्मूला। मनोहर पारिकर का आडवाणी को सड़ा अचार कहना। वसुंधरा प्रकरण पर पार्लियामेंट्री बोर्ड में आडवाणी-राजनाथ का टकराना। कर्नाटक में रेड्डïी बंधु के दबाव में बीजेपी का येदुरप्पा को झुकाना। महाराष्टï्र चुनाव में भी नितिन गडकरी की रहनुमाई वाली बीजेपी की लुटिया डूबना। सो कुल मिलाकर सुर्खियों में बीजेपी रही। पर सिर्फ नकारात्मक खबरों से। आखिर में हार का यही मंथन। जिन-जिन ने रणनीति बनाई। सबका प्रमोशन हो गया। या यों कहें, सबने राज्यों पर ठीकरा फोड़ कुर्सी बांट लीं। आडवाणी भीष्म हो गए। जेतली, सुषमा को भी बड़ा पद। गडकरी तो चुनाव जीते और जिताए बिना ही राष्टï्रीय अध्यक्ष हो गए। राजस्थान का संगठन चुनाव वाला विवाद तो याद होगा। अब वहां भी सबको कुर्सी मिल गई। तो फिलहाल ऊं शांति। यानी 2009 में बीजेपी, जो हारा, वही सिकंदर। और अब साल के आखिर में नैतिकता की आहुति दे शिबू से हाथ मिला लिया। सो 2010 कैसा होगा, राम ही राखा। विपक्ष के तौर पर बीजेपी भरोसा खो चुकी। यह खुलासा खुद बीजेपी के सर्वेक्षण में हो चुका। चुनाव के वक्त जीवीएल नरसिंह राव का सर्वे आया। बानवै फीसदी लोगों ने महंगाई को बड़ा मुद्दा माना। पर चौंकाने वाली बात, समाधान करने वालों में 90 फीसदी लोगों ने मनमोहन को वोट दिए। महज सात फीसदी ने आडवाणी को। सो विपक्ष का भरोसा कितना, खत्म हो चुका। आप देख लो।
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29/12/2009
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तो साल 2009, बीजेपी में
जो हारा, वही सिकंदर
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संतोष कुमार
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तुम जियो हजारों साल, साल के दिन हों पचास हजार। पर न कोई हजार साल जी सकता। न साल के दिन पचास हजार हो सकते। सो 365 दिन बाद 2009 भी विदा ले रहा। अब महज कुछ घंटों का इंतजार, फिर 2010 का स्वागत। सो आखिरी दिन में लेखाजोखा भी जरूरी। तो आज शुरुआत बीजेपी के सफरनामे से। साल 2008 का अंत न देश के लिए शुभ रहा, न बीजेपी के लिए। देश ने 26/11 का दंश झेला। तो बीजेपी सेमीफाइनल में कांग्रेस से पिछड़ गई। राजस्थान का मजबूत किला ढह गया। तो हंगामे का आगाज भी वहीं से हुआ। यों शेखावत को चुनाव लडऩा नहीं था। पर वसुंधरा से नाराज बाबोसा ने पासा फेंका। सो समूची बीजेपी हिल गई। राजनाथ सिंह को मैदान में उतरना पड़ा। तो उन ने लोक-लिहाज नहीं किया। अलबत्ता शेखावत को गंगा स्नान के बाद कुंए में न नहाने की सलाह दी। अब जब रात हो इतनी मतवाली। तो सुबह का आलम क्या होगा। यह तो बीजेपी से पूछिए। शुरुआत पुरोधा ने की। तो बाकी कहां पीछे रहते। बीस जनवरी को कल्याण सिंह ने बीजेपी छोड़ दी। लोकसभा का चुनावी समर शुरू हुआ। तो आडवाणी खुद को भावी पीएम कम, मौजूदा पीएम की तरह व्यवहार करने लगे। हर अहम मसले पर विशेषज्ञों की मीटिंग। फिर नई कार्ययोजना का एलान। सो इर्द-गिर्द ऐसे लोगों का जमावड़ा हो गया। आडवाणी जमीनी हकीकत भांप नहीं पाए। समर में कांग्रेस से मुकाबला तो बाद में। पर पहले बीजेपी ने आपस में नेट प्रेक्टिस की। जेतली, वेंकैया में पोल मैनेजर बनने की होड़। बीजेपी में जूरासिक पार्क जैसा माहौल था। नागपुर में ही राजनाथ ने भी हिंदुत्व एक्सप्रेस दौड़ाई। पर दिल्ली आते ही जैसे बीजेपी का ब्रेक डाउन हो गया। राजनाथ की सत्ता को पोल मैनेजर अरुण जेतली की चुनौती मिल गई। एक-दो दिन नहीं, पूरे बारह दिन ड्रामा चला। जेतली ने राजनाथ की रहनुमाई वाली सीईसी का बॉयकॉट किया। मुद्दा सिर्फ इतना था, राजनाथ ने सुधांशु मित्तल को पूर्वोत्तर का इंचार्ज बनाया था। आडवाणी भी जेतली को मना नहीं पाए। पूरे चुनाव के टिकट बंट गए। पर जेतली-राजनाथ की रार ठनी रही। यों अरुण का संकट सुलझा भी नहीं था। तभी गांधी-नेहरू खानदान के भाजपाई वारिस वरुण गांधी का भड़काऊ भाषण आ गया। बीजेपी ने वरुण का जमकर बचाव किया। पर आखिर में फोरेंसिक लैब ने पुष्टिï कर दी। भड़काऊ बयान वरुण का ही। सो बीजेपी अपने किए पर औंधे मुंह गिरी। लगा, जैसे वक्त भी बीजेपी का साथ देने को तैयार नहीं। चुनावी समर में ही उड़ीसा में नवीन पटनायक से गठजोड़ टूटा। कंधार प्रकरण पर बीजेपी बचाव में ही उलझी रही। ऐसा लगा, मानो कंधार एपीसोड बीजेपी का। आडवाणी कहीं भी साझीदार नहीं। सो चुनाव नतीजे चौंकाने वाले रहे। आडवाणी का सपना चूर हो गया। तो पद छोडऩे की पेशकश की। पर हाई वोल्टेज ड्रामे के बाद फिर खिवैया बन गए। फिर हार पर बीजेपी में जो आपसी मर्दन हुआ। किसी से छुपा नहीं। जसवंतनामा, यशवंतनामा, शौरीनामा सब में एक ही आवाज। हराने वाले को इनाम क्यों? निशाने पर जेतली ही, जिन्हें आडवाणी ने राज्यसभा में नेता बना दिया। पर आडवाणी के इर्द-गिर्द चौकड़ी में शामिल सुधींद्र कुलकर्णी, स्वप्रदास गुप्त जैसे लोग चुनाव से पहले सलाहकार थे। बीजेपी हार गई, तो पत्रकार बनकर खाल खींचने लगे। फिर शिमला चिंतन बैठक। जसवंत के जिन्ना प्रेम पर बर्खास्तगी। हार का मंथन हुआ। तो घाव केंद्र में था, ऑपरेशन राज्यों का कर दिया। यशवंत ने कामराज फार्मूले की मांग की। पर कुर्सी कौन छोड़ रहा। बीजेपी के कर्ता-धर्ता इसी में खुश। भले खुद न जीते, पर लेफ्ट तो हार गया। उत्तराखंड से बी.सी. खंडूरी की विदाई। राजस्थान में ओम प्रकाश माथुर का इस्तीफा। फिर कई राज्यों के क्षत्रप बदल दिए। पर वसुंधरा की बारी आई। तो अगस्त से अक्टूबर तक जो हुआ। बीजेपी नहीं भुला सकती। सो शिमला चिंतन में बीजेपी की चिंता कम, चिता ज्यादा दिखी। अरुण शौरी का राजनाथ को हंप्टी-डंप्टी कहना। बीजेपी में नेतृत्व परिवर्तन पर संघ के मुखिया मोहन भागवत का डी-4 फार्मूला। मनोहर पारिकर का आडवाणी को सड़ा अचार कहना। वसुंधरा प्रकरण पर पार्लियामेंट्री बोर्ड में आडवाणी-राजनाथ का टकराना। कर्नाटक में रेड्डïी बंधु के दबाव में बीजेपी का येदुरप्पा को झुकाना। महाराष्टï्र चुनाव में भी नितिन गडकरी की रहनुमाई वाली बीजेपी की लुटिया डूबना। सो कुल मिलाकर सुर्खियों में बीजेपी रही। पर सिर्फ नकारात्मक खबरों से। आखिर में हार का यही मंथन। जिन-जिन ने रणनीति बनाई। सबका प्रमोशन हो गया। या यों कहें, सबने राज्यों पर ठीकरा फोड़ कुर्सी बांट लीं। आडवाणी भीष्म हो गए। जेतली, सुषमा को भी बड़ा पद। गडकरी तो चुनाव जीते और जिताए बिना ही राष्टï्रीय अध्यक्ष हो गए। राजस्थान का संगठन चुनाव वाला विवाद तो याद होगा। अब वहां भी सबको कुर्सी मिल गई। तो फिलहाल ऊं शांति। यानी 2009 में बीजेपी, जो हारा, वही सिकंदर। और अब साल के आखिर में नैतिकता की आहुति दे शिबू से हाथ मिला लिया। सो 2010 कैसा होगा, राम ही राखा। विपक्ष के तौर पर बीजेपी भरोसा खो चुकी। यह खुलासा खुद बीजेपी के सर्वेक्षण में हो चुका। चुनाव के वक्त जीवीएल नरसिंह राव का सर्वे आया। बानवै फीसदी लोगों ने महंगाई को बड़ा मुद्दा माना। पर चौंकाने वाली बात, समाधान करने वालों में 90 फीसदी लोगों ने मनमोहन को वोट दिए। महज सात फीसदी ने आडवाणी को। सो विपक्ष का भरोसा कितना, खत्म हो चुका। आप देख लो।
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29/12/2009
Monday, December 28, 2009
कैसे हो 'रिफॉर्म', जब चालू आहे चापलूसी
इंडिया गेट से
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कैसे हो 'रिफॉर्म', जब
चालू आहे चापलूसी
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संतोष कुमार
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अब पुलिस थाने में शिकायत ही एफआईआर। रुचिका गिरहोत्रा प्रकरण तूल पकड़ चुका। इंसाफ की जंग कोर्ट से बाहर सड़कों पर शुरु हुई। तो संवेदनशीलता दिखाने की होड़ मच गई। सो सोमवार को होम मिनिस्ट्री ने सभी स्टेट को सर्कुलर जारी कर दिया। थाने में की गई शिकायत को ही एफआईआर माना जाए। पर शिकायत यानी तहरीर भी कोई पुलिस वाला न ले। तो कौन क्या कर लेगा। जब देश में पीएम की चि_ïी का सीएम पर कोई असर नहीं पड़ता। तो आम आदमी की राठौर जैसे पुलिसिए के सामने क्या बिसात। अब बीजेपी नेता शांताकुमार ने खुलासा किया। रुचिका केस को सुन तबके पीएम वाजपेयी रो पड़े थे। उनने हरियाणा के सीएम ओमप्रकाश चौटाला को कड़ी चि_ïी लिखी थी। तो खुद चौटाला-भजनलाल अपनी तरफ से कड़े कदम उठाने की दलील दे रहे। पर क्या देश की व्यवस्था इतनी नाकारी हो चुकी। जो पीएम-सीएम सबकी पहल के बाद भी रुचिका को इंसाफ मिलने में 19 साल लग गए? यों अभी भी रुचिका को अधूरा इंसाफ मिला। अधेड़ उम्र के राठौर ने 14 साल की लड़की से जबर्दस्ती करनी चाही। आखिर उस लड़की को सुसाइड करना पड़ा। फिर भी केस इतना कमजोर बनाया गया। राठौर को महज छह महीने की सजा मिली। सो तहरीर को एफआईआर बनाने से क्या होगा। जब तक पुलिस तंत्र न बदले। रुचिका केस में तो यही हुआ। रुचिका केस में दोषी हरियाणा के पूर्व डीजीपी एसपीएस राठौर तब आईजी थे। सो महीने-साल नहीं, अलबत्ता पूरे नौ साल तक एफआईआर दर्ज नहीं हुई। उल्टा रुचिका के परिवार को प्रताडऩा सहनी पड़ी। पुलिस ने ही झूठे केस में फंसा परिवार को हरियाणा छोडऩे को मजबूर कर दिया। सो सिर्फ सर्कुलर जारी होने से समस्या खत्म नहीं होने वाली। जब तक पुलिस का अंदाज नहीं बदलेगा। तब तक लोग पुलिस से खौफ खाते रहेंगे। और पुलिसिए भी अंग्रेजों की मानसिकता से ऊपर नहीं उठेंगे। सो जब तक पुलिस रिफॉर्म पर अमल नहीं होता। तहरीर को एफआईआर मानने से कुछ नहीं होगा। जरुरत तो इस बात की है, पुलिस रिफॉर्म की बातें सिर्फ कागजों तक सिमट कर न रहे। हर बार पुलिस रिफॉर्म को शोर मचता। पर बिल्ली के गले में घंटी कौन बांधे। बस इसी चक्कर में फिर फाइलों में गुम हो जाता। जबकि सुप्रीम कोर्ट तक पुलिस रिफॉर्म की बात कह चुका। पर राज्यों की फंडिंग के चक्कर में गाड़ी आगे नहीं खिसक रही। सो न पुलिस बदल रही, न पुलिसिया चेहरा और खौफ। आज भी, आम आदमी की आंखों के सामने पुलिस गुजर जाए। तो मन में सुरक्षा का भाव नहीं, अलबत्ता आंखों में खौफ का साया दिखता। आखिर हो क्यों ना। पुलिस वाले तो हुकूमत के इशारे पर चलते। सो जब जिसकी सरकार बनी। पसंद के ऑफीसर मलाईदार-रुतबेदार पदों पर काबिज हो जाते। सो राजनेता भी मौजूदा पुलिस तंत्र के ही आदी। अब वही होम मिनिस्ट्री राठौर का मैडल छीनने जा रही। पर 19 साल तक कहां सोई रही सरकार? यों मैडल कैसे लोगों को मिलता, अब किसी से यह बात छुपी नहीं। मैडल तो छोडि़ए, अब पद्मश्री हो या पद्मविभूषण। हर जगह घालमेल और सत्ता का साया साफ दिख जाता। सो मैडल के लिए फर्जी मुठभेड़ की खबरें आम हो चुकीं। लोकशाही में भी नेतागण राजशाही चाहते। सो प्रतिबद्ध नौकरशाही की दरकार सबको। सनद रहे, सो याद दिलाते जाएं। दिसंबर 1969 में तबकी पीएम इंदिरा गांधी ने नौकरशाही से प्रतिबद्धता की मांग की थी। नौकरशाहों से अपनी राजनीतिक विचारधारा का समर्थन करने को कहा। सो बवाल मचा, तो उन ने नौ फरवरी 1970 को इंस्टीट्यूट ऑफ इंजीनियर्स में सफाई दी। चाटुकार सरकारी कर्मचारी तंत्र नहीं चाहिए। पर इंदिरा को जो कहना था, वह कह चुकी थीं। सो नेताओं में रूतबे का, तो नौकरशाही में चमचागिरी का रोग। यानी अब अगर पुलिस तंत्र का सुधार करना पड़ा। तो राजनीति में भी आमूल-चूल बदलाव लाने होंगे। पर न नौ मन तेल होगा, न राधा नाचेगी। एफआईआर से पूर्व पीएम नरसिंह राव पर भी हुए। पर क्या कभी सजा मिली? शिबू सोरेन की झामुमो को खरीद कर राव ने अल्पमत सरकार बचाई। पर 17 साल हो गए। नरसिंह राव तो अब दुनिया में नहीं रहे। पर शिबू का भी कुछ नहीं बिगड़ा। अलबत्ता सत्ता के समीकरण जरुर बदल गए। शिबू कभी कांग्रेस खेमे में बैठते थे। अबके सत्ता की खातिर बीजेपी के साथ हो लिए। पर शिबू की पार्टी तो एक क्षेत्र विशेष की ठहरी। पर बीजेपी की नैतिकता कहां गई? जिस शिबू की खातिर मनमोहन को दागी केबिनेट का मुखिया कहा। शिबू के नाम पर संसद से सड़क तक खूब घोड़े दौड़ाए। अब उसी शिबू के साथ गलबहियां। पर जरा नितिन गडकरी की नई दलील सुनिए। सत्ता की राजनीति अलग और संगठन की अलग। कांग्रेस तो 125 वीं सालगिरह पर ही खूब इतरा रही। पीएम मनमोहन हों या सोनिया गांधी। गांधी-नेहरू खानदान को ही देश का पर्याय बता रहे। मनमोहन ने सोमवार को कहा- 'अगर कांग्रेस कमजोर हुआ, तो भारत कमजोर होगा। सो कांग्रेस को मजबूत करे।' उनने सोनिया के ऐसे कसीदे पढ़े। अपने राजनीतिक गुरु नरसिंह राव को भूला दिया। नई आर्थिक नीति का श्रेय भी राजीव गांधी को दे दिया। यानी सोनिया ने दो बार पीएम बनाया। तो मनमोहन ने भी अपनी उदारीकरण की नीति बतौर रिटर्न गिफ्ट गांधी-नेहरु खानदान को थमा कर्ज उतार लिया। अब पुलिस तंत्र हो या राजनीतिक तंत्र। जब तक चापलूसी बंद नहीं होगी। तब तक व्यवस्था का राम ही राखा।
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28/12/2009
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कैसे हो 'रिफॉर्म', जब
चालू आहे चापलूसी
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संतोष कुमार
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अब पुलिस थाने में शिकायत ही एफआईआर। रुचिका गिरहोत्रा प्रकरण तूल पकड़ चुका। इंसाफ की जंग कोर्ट से बाहर सड़कों पर शुरु हुई। तो संवेदनशीलता दिखाने की होड़ मच गई। सो सोमवार को होम मिनिस्ट्री ने सभी स्टेट को सर्कुलर जारी कर दिया। थाने में की गई शिकायत को ही एफआईआर माना जाए। पर शिकायत यानी तहरीर भी कोई पुलिस वाला न ले। तो कौन क्या कर लेगा। जब देश में पीएम की चि_ïी का सीएम पर कोई असर नहीं पड़ता। तो आम आदमी की राठौर जैसे पुलिसिए के सामने क्या बिसात। अब बीजेपी नेता शांताकुमार ने खुलासा किया। रुचिका केस को सुन तबके पीएम वाजपेयी रो पड़े थे। उनने हरियाणा के सीएम ओमप्रकाश चौटाला को कड़ी चि_ïी लिखी थी। तो खुद चौटाला-भजनलाल अपनी तरफ से कड़े कदम उठाने की दलील दे रहे। पर क्या देश की व्यवस्था इतनी नाकारी हो चुकी। जो पीएम-सीएम सबकी पहल के बाद भी रुचिका को इंसाफ मिलने में 19 साल लग गए? यों अभी भी रुचिका को अधूरा इंसाफ मिला। अधेड़ उम्र के राठौर ने 14 साल की लड़की से जबर्दस्ती करनी चाही। आखिर उस लड़की को सुसाइड करना पड़ा। फिर भी केस इतना कमजोर बनाया गया। राठौर को महज छह महीने की सजा मिली। सो तहरीर को एफआईआर बनाने से क्या होगा। जब तक पुलिस तंत्र न बदले। रुचिका केस में तो यही हुआ। रुचिका केस में दोषी हरियाणा के पूर्व डीजीपी एसपीएस राठौर तब आईजी थे। सो महीने-साल नहीं, अलबत्ता पूरे नौ साल तक एफआईआर दर्ज नहीं हुई। उल्टा रुचिका के परिवार को प्रताडऩा सहनी पड़ी। पुलिस ने ही झूठे केस में फंसा परिवार को हरियाणा छोडऩे को मजबूर कर दिया। सो सिर्फ सर्कुलर जारी होने से समस्या खत्म नहीं होने वाली। जब तक पुलिस का अंदाज नहीं बदलेगा। तब तक लोग पुलिस से खौफ खाते रहेंगे। और पुलिसिए भी अंग्रेजों की मानसिकता से ऊपर नहीं उठेंगे। सो जब तक पुलिस रिफॉर्म पर अमल नहीं होता। तहरीर को एफआईआर मानने से कुछ नहीं होगा। जरुरत तो इस बात की है, पुलिस रिफॉर्म की बातें सिर्फ कागजों तक सिमट कर न रहे। हर बार पुलिस रिफॉर्म को शोर मचता। पर बिल्ली के गले में घंटी कौन बांधे। बस इसी चक्कर में फिर फाइलों में गुम हो जाता। जबकि सुप्रीम कोर्ट तक पुलिस रिफॉर्म की बात कह चुका। पर राज्यों की फंडिंग के चक्कर में गाड़ी आगे नहीं खिसक रही। सो न पुलिस बदल रही, न पुलिसिया चेहरा और खौफ। आज भी, आम आदमी की आंखों के सामने पुलिस गुजर जाए। तो मन में सुरक्षा का भाव नहीं, अलबत्ता आंखों में खौफ का साया दिखता। आखिर हो क्यों ना। पुलिस वाले तो हुकूमत के इशारे पर चलते। सो जब जिसकी सरकार बनी। पसंद के ऑफीसर मलाईदार-रुतबेदार पदों पर काबिज हो जाते। सो राजनेता भी मौजूदा पुलिस तंत्र के ही आदी। अब वही होम मिनिस्ट्री राठौर का मैडल छीनने जा रही। पर 19 साल तक कहां सोई रही सरकार? यों मैडल कैसे लोगों को मिलता, अब किसी से यह बात छुपी नहीं। मैडल तो छोडि़ए, अब पद्मश्री हो या पद्मविभूषण। हर जगह घालमेल और सत्ता का साया साफ दिख जाता। सो मैडल के लिए फर्जी मुठभेड़ की खबरें आम हो चुकीं। लोकशाही में भी नेतागण राजशाही चाहते। सो प्रतिबद्ध नौकरशाही की दरकार सबको। सनद रहे, सो याद दिलाते जाएं। दिसंबर 1969 में तबकी पीएम इंदिरा गांधी ने नौकरशाही से प्रतिबद्धता की मांग की थी। नौकरशाहों से अपनी राजनीतिक विचारधारा का समर्थन करने को कहा। सो बवाल मचा, तो उन ने नौ फरवरी 1970 को इंस्टीट्यूट ऑफ इंजीनियर्स में सफाई दी। चाटुकार सरकारी कर्मचारी तंत्र नहीं चाहिए। पर इंदिरा को जो कहना था, वह कह चुकी थीं। सो नेताओं में रूतबे का, तो नौकरशाही में चमचागिरी का रोग। यानी अब अगर पुलिस तंत्र का सुधार करना पड़ा। तो राजनीति में भी आमूल-चूल बदलाव लाने होंगे। पर न नौ मन तेल होगा, न राधा नाचेगी। एफआईआर से पूर्व पीएम नरसिंह राव पर भी हुए। पर क्या कभी सजा मिली? शिबू सोरेन की झामुमो को खरीद कर राव ने अल्पमत सरकार बचाई। पर 17 साल हो गए। नरसिंह राव तो अब दुनिया में नहीं रहे। पर शिबू का भी कुछ नहीं बिगड़ा। अलबत्ता सत्ता के समीकरण जरुर बदल गए। शिबू कभी कांग्रेस खेमे में बैठते थे। अबके सत्ता की खातिर बीजेपी के साथ हो लिए। पर शिबू की पार्टी तो एक क्षेत्र विशेष की ठहरी। पर बीजेपी की नैतिकता कहां गई? जिस शिबू की खातिर मनमोहन को दागी केबिनेट का मुखिया कहा। शिबू के नाम पर संसद से सड़क तक खूब घोड़े दौड़ाए। अब उसी शिबू के साथ गलबहियां। पर जरा नितिन गडकरी की नई दलील सुनिए। सत्ता की राजनीति अलग और संगठन की अलग। कांग्रेस तो 125 वीं सालगिरह पर ही खूब इतरा रही। पीएम मनमोहन हों या सोनिया गांधी। गांधी-नेहरू खानदान को ही देश का पर्याय बता रहे। मनमोहन ने सोमवार को कहा- 'अगर कांग्रेस कमजोर हुआ, तो भारत कमजोर होगा। सो कांग्रेस को मजबूत करे।' उनने सोनिया के ऐसे कसीदे पढ़े। अपने राजनीतिक गुरु नरसिंह राव को भूला दिया। नई आर्थिक नीति का श्रेय भी राजीव गांधी को दे दिया। यानी सोनिया ने दो बार पीएम बनाया। तो मनमोहन ने भी अपनी उदारीकरण की नीति बतौर रिटर्न गिफ्ट गांधी-नेहरु खानदान को थमा कर्ज उतार लिया। अब पुलिस तंत्र हो या राजनीतिक तंत्र। जब तक चापलूसी बंद नहीं होगी। तब तक व्यवस्था का राम ही राखा।
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28/12/2009
Friday, December 25, 2009
वाजपेयी को तोहफे में बीजेपी ने दिया झारखंड
इंडिया गेट से
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वाजपेयी को तोहफे में
बीजेपी ने दिया झारखंड
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संतोष कुमार
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राजनीति के पुरोधा अटल बिहारी वाजपेयी का 86वां जन्मदिन धूमधाम से मना। हर बार की तरह पीएम मनमोहन चलकर अटल को बधाई देने पहुंचे। भले कांग्रेस-बीजेपी में बैर जगजाहिर। पर मनमोहन की वाजपेयी के प्रति अगाध श्रद्धा। तभी तो भरी संसद में मनमोहन ही वह शख्स थे। जिन ने वाजपेयी को बीजेपी नहीं, अलबत्ता राजनीति का भीष्म पितामह कहा था। सो अपने भीष्म पितामह को अबके नई बीजेपी ने बधाई दी। बीजेपी दफ्तर में रक्तदान शिविर लगे। तो शाम को फिक्की में अनूप जलोटा की भजन संध्या। भजन संध्या में बीजेपी के तमाम दिग्गजों के अलावा जेडीयू के शरद यादव, सपा के मुलायम-अमर भी पहुंचे। शिवसेना के मनोहर जोशी आए। तो एक नाम उड़ीसा में बीजेपी को धकिया चुकी बीजद का भी। बीजद के बी.जे. पंडा भी लिस्ट में शुमार। यानी वाजपेयी दलगत राजनीति से ऊपर उठ चुके। सो किसी भी दल के नेता को वाजपेयी की खातिर बीजेपी के मंच पर आने में हिचक नहीं। सचमुच बीजेपी में वाजपेयी की जगह कोई नहीं ले सकता। वाजपेयी में कभी बनावटीपन नहीं रहा। सो जनता के दिल में दशकों से राज कर रहे। पंडित नेहरू को भी वाजपेयी में भावी पीएम की छवि दिख गई थी। फिर इंदिरा राज हो या बाकी सरकारें। वाजपेयी की छवि जन-जन के दिल में बस गई। तभी तो पिछले साल दिसंबर में आडवाणी ने वाजपेयी के लिए भारत रत्न मांगा। तो ऐसी घुड़दौड़ मची। सरकार ने किसी को भी भारत रत्न नहीं दिया। तब यहीं पर लिखा था। वाजपेयी को भारत रत्न मिले या न मिले। लोगों के दिलों के रत्न हमेशा रहेंगे। पर बात वाजपेयी के 86वें जन्मदिन की। अबके आम आदमी वाजपेयी के पास नहीं पहुंच सका। वाजपेयी का स्वास्थ्य ठीक नहीं। सो जन्मदिन को वीवीआईपी तक ही सीमित रखा। पर बीजेपी में लंबे झंझावातों के बाद बड़े बदलाव हो चुके। सो तमाम दिग्गज बधाई देने पहुंचे। पर लगातार हार का मुंह देख रही बीजेपी ने अबके अटल को गिफ्ट देने की ठान ली। सो देर शाम झारखंड में सरकार गठन के लिए समझौते का एलान हो गया। झारखंड में खिचड़ी जनादेश आया। पर बीजेपी-जेडीयू ने झामुमो और आजसू से हाथ मिला लिया। सो 81 के सदन में नए गठबंधन का आंकड़ा बहुमत के जादुई आंकड़े से दो ज्यादा यानी 43 हो गया। कांग्रेस पॉवर-पैसा के बावजूद मुंह ताकती रह गई। जबसे कांग्रेस ने सहयोगी दलों को लंगड़ी मारने की रणनीति बनाई। एकला चलो की खातिर सहयोगियों को कमजोर किया। तबसे कांग्रेस को यही गुमान, जब जनता चुनाव जितवा रही। तो बाकी सत्ता भी अपनी कीमत पर हथिया लेंगे। सो शिबू सोरेन की शर्त मानने से इनकार कर दिया। अलबत्ता कांग्रेस ने शिबू की पार्टी में तोडफ़ोड़ की कवायद शुरू कर दी। ताकि शिबू के 18 में से 12 एमएलए टूट जाएं। उधर लालू के पांच में से तीन टूट जाएं। तो कांग्रेस और बाबूलाल मरांडी सत्ता का समीकरण बना लेंगे। बाकी कमी-बेशी रही, तो केंद्र में अपनी सरकार। सो गवर्नर कब काम आएंगे। पर बीजेपी ने पहले ही अपना कमाल दिखा दिया। राजनाथ अध्यक्षी की स्टेयरिंग छोड़ चुके। सो पूरा फोकस झारखंड पर लगा दिया। भले बीजेपी अबके तीस से खिसक कर 18 सीट पर आ गई। पर सरकार बनाने का मंसूबा नहीं छोड़ा। यों नितिन गडकरी ने सत्ता की नहीं, विकास और सेवा की राजनीति पर जोर दिया। पर शिबू के साथ नए गठजोड़ को आप क्या कहेंगे। शायद बीजेपी ने यही ठान रखा था। बहुत हार सह ली। अबके वाजपेयी को बर्थ-डे गिफ्ट में चुनाव जीते बिना सत्ता समर्पित करेंगे। सो झारखंड से लौटे राजनाथ की गडकरी से मीटिंग हुई। उधर रांची में यशवंत सिन्हा और अर्जुन मुंडा ने गुरु जी (शिबू) को पटाया। शनिवार को गवर्नर के सामने दावा पेश होगा। सो फार्मूला तय हुआ, शिबू सोरेन सीएम होंगे। साथ ही झामुमो के चार और मंत्री। बीजेपी का स्पीकर होगा। साथ में चार मंत्री भी। इसी कोटे में बीजेपी और झामुमो का एक-एक डिप्टी सीएम भी होगा। आजसू के दो मंत्री होंगे। तो एक जेडीयू का। यानी 81 के सदन में सिर्फ 12 मंत्री बनाए जा सकते। सो गठबंधन ने सत्ता की बंदरबांट शपथ से पहले ही कर ली। पर झारखंड में सत्ता इतनी आसान नहीं। शिबू के कई अल्पसंख्यक एमएलए बीजेपी के साथ जाने के खिलाफ। अब नाराज लोगों को ही शिबू मंत्री बना दें। तो फिर बात अलग। वैसे भी मंत्रियों की अपनी एक अलग जात होती। जिसमें लाल बत्ती और बाकी रुतबा। पर क्या अवसरवादी गठजोड़ को विकास करने वाला माना जा सकता? झारखंड का इतिहास तो ऐसा मानने को तैयार नहीं। सो नितिन गडकरी भले विकास की बात करें। पर राजनीति में एक ही फार्मूला चलता। न नीति, न नैतिकता, सबसे बड़ी सत्ता। याद करिए कर्नाटक का 20-20 महीने वाला जेडीएस-बीजेपी फार्मूला। कुमार स्वामी ने समझौता नहीं निभाया। तो सरकार गिर गई। फिर 20 दिन बाद दोनों एक हो गए। तो सरकार बन गई। भले सरकार हफ्ते भर ही चली। पर तब बीजेपी के एक बड़े नेता ने कहा था। जिसका जिक्र यहीं पर 28 अक्टूबर 2007 को हमने किया। उस नेता ने कहा था- 'हवन तीन बजे न सही, छह बजे हो। जेडीएस ने हमारी बात मान ली। सो हम भी तो कोई सन्यासी नहीं। आखिर राजनीति इसलिए तो कर रहे।'
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25/11/2009
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वाजपेयी को तोहफे में
बीजेपी ने दिया झारखंड
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संतोष कुमार
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राजनीति के पुरोधा अटल बिहारी वाजपेयी का 86वां जन्मदिन धूमधाम से मना। हर बार की तरह पीएम मनमोहन चलकर अटल को बधाई देने पहुंचे। भले कांग्रेस-बीजेपी में बैर जगजाहिर। पर मनमोहन की वाजपेयी के प्रति अगाध श्रद्धा। तभी तो भरी संसद में मनमोहन ही वह शख्स थे। जिन ने वाजपेयी को बीजेपी नहीं, अलबत्ता राजनीति का भीष्म पितामह कहा था। सो अपने भीष्म पितामह को अबके नई बीजेपी ने बधाई दी। बीजेपी दफ्तर में रक्तदान शिविर लगे। तो शाम को फिक्की में अनूप जलोटा की भजन संध्या। भजन संध्या में बीजेपी के तमाम दिग्गजों के अलावा जेडीयू के शरद यादव, सपा के मुलायम-अमर भी पहुंचे। शिवसेना के मनोहर जोशी आए। तो एक नाम उड़ीसा में बीजेपी को धकिया चुकी बीजद का भी। बीजद के बी.जे. पंडा भी लिस्ट में शुमार। यानी वाजपेयी दलगत राजनीति से ऊपर उठ चुके। सो किसी भी दल के नेता को वाजपेयी की खातिर बीजेपी के मंच पर आने में हिचक नहीं। सचमुच बीजेपी में वाजपेयी की जगह कोई नहीं ले सकता। वाजपेयी में कभी बनावटीपन नहीं रहा। सो जनता के दिल में दशकों से राज कर रहे। पंडित नेहरू को भी वाजपेयी में भावी पीएम की छवि दिख गई थी। फिर इंदिरा राज हो या बाकी सरकारें। वाजपेयी की छवि जन-जन के दिल में बस गई। तभी तो पिछले साल दिसंबर में आडवाणी ने वाजपेयी के लिए भारत रत्न मांगा। तो ऐसी घुड़दौड़ मची। सरकार ने किसी को भी भारत रत्न नहीं दिया। तब यहीं पर लिखा था। वाजपेयी को भारत रत्न मिले या न मिले। लोगों के दिलों के रत्न हमेशा रहेंगे। पर बात वाजपेयी के 86वें जन्मदिन की। अबके आम आदमी वाजपेयी के पास नहीं पहुंच सका। वाजपेयी का स्वास्थ्य ठीक नहीं। सो जन्मदिन को वीवीआईपी तक ही सीमित रखा। पर बीजेपी में लंबे झंझावातों के बाद बड़े बदलाव हो चुके। सो तमाम दिग्गज बधाई देने पहुंचे। पर लगातार हार का मुंह देख रही बीजेपी ने अबके अटल को गिफ्ट देने की ठान ली। सो देर शाम झारखंड में सरकार गठन के लिए समझौते का एलान हो गया। झारखंड में खिचड़ी जनादेश आया। पर बीजेपी-जेडीयू ने झामुमो और आजसू से हाथ मिला लिया। सो 81 के सदन में नए गठबंधन का आंकड़ा बहुमत के जादुई आंकड़े से दो ज्यादा यानी 43 हो गया। कांग्रेस पॉवर-पैसा के बावजूद मुंह ताकती रह गई। जबसे कांग्रेस ने सहयोगी दलों को लंगड़ी मारने की रणनीति बनाई। एकला चलो की खातिर सहयोगियों को कमजोर किया। तबसे कांग्रेस को यही गुमान, जब जनता चुनाव जितवा रही। तो बाकी सत्ता भी अपनी कीमत पर हथिया लेंगे। सो शिबू सोरेन की शर्त मानने से इनकार कर दिया। अलबत्ता कांग्रेस ने शिबू की पार्टी में तोडफ़ोड़ की कवायद शुरू कर दी। ताकि शिबू के 18 में से 12 एमएलए टूट जाएं। उधर लालू के पांच में से तीन टूट जाएं। तो कांग्रेस और बाबूलाल मरांडी सत्ता का समीकरण बना लेंगे। बाकी कमी-बेशी रही, तो केंद्र में अपनी सरकार। सो गवर्नर कब काम आएंगे। पर बीजेपी ने पहले ही अपना कमाल दिखा दिया। राजनाथ अध्यक्षी की स्टेयरिंग छोड़ चुके। सो पूरा फोकस झारखंड पर लगा दिया। भले बीजेपी अबके तीस से खिसक कर 18 सीट पर आ गई। पर सरकार बनाने का मंसूबा नहीं छोड़ा। यों नितिन गडकरी ने सत्ता की नहीं, विकास और सेवा की राजनीति पर जोर दिया। पर शिबू के साथ नए गठजोड़ को आप क्या कहेंगे। शायद बीजेपी ने यही ठान रखा था। बहुत हार सह ली। अबके वाजपेयी को बर्थ-डे गिफ्ट में चुनाव जीते बिना सत्ता समर्पित करेंगे। सो झारखंड से लौटे राजनाथ की गडकरी से मीटिंग हुई। उधर रांची में यशवंत सिन्हा और अर्जुन मुंडा ने गुरु जी (शिबू) को पटाया। शनिवार को गवर्नर के सामने दावा पेश होगा। सो फार्मूला तय हुआ, शिबू सोरेन सीएम होंगे। साथ ही झामुमो के चार और मंत्री। बीजेपी का स्पीकर होगा। साथ में चार मंत्री भी। इसी कोटे में बीजेपी और झामुमो का एक-एक डिप्टी सीएम भी होगा। आजसू के दो मंत्री होंगे। तो एक जेडीयू का। यानी 81 के सदन में सिर्फ 12 मंत्री बनाए जा सकते। सो गठबंधन ने सत्ता की बंदरबांट शपथ से पहले ही कर ली। पर झारखंड में सत्ता इतनी आसान नहीं। शिबू के कई अल्पसंख्यक एमएलए बीजेपी के साथ जाने के खिलाफ। अब नाराज लोगों को ही शिबू मंत्री बना दें। तो फिर बात अलग। वैसे भी मंत्रियों की अपनी एक अलग जात होती। जिसमें लाल बत्ती और बाकी रुतबा। पर क्या अवसरवादी गठजोड़ को विकास करने वाला माना जा सकता? झारखंड का इतिहास तो ऐसा मानने को तैयार नहीं। सो नितिन गडकरी भले विकास की बात करें। पर राजनीति में एक ही फार्मूला चलता। न नीति, न नैतिकता, सबसे बड़ी सत्ता। याद करिए कर्नाटक का 20-20 महीने वाला जेडीएस-बीजेपी फार्मूला। कुमार स्वामी ने समझौता नहीं निभाया। तो सरकार गिर गई। फिर 20 दिन बाद दोनों एक हो गए। तो सरकार बन गई। भले सरकार हफ्ते भर ही चली। पर तब बीजेपी के एक बड़े नेता ने कहा था। जिसका जिक्र यहीं पर 28 अक्टूबर 2007 को हमने किया। उस नेता ने कहा था- 'हवन तीन बजे न सही, छह बजे हो। जेडीएस ने हमारी बात मान ली। सो हम भी तो कोई सन्यासी नहीं। आखिर राजनीति इसलिए तो कर रहे।'
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25/11/2009
Wednesday, December 23, 2009
जीता त्रिगुट, हार गया बीजेपी हाईकमान
इंडिया गेट से
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जीता त्रिगुट, हार गया
बीजेपी हाईकमान
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संतोष कुमार
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झारखंड में भी बीजेपी की बत्ती गुल हो गई। यों कामयाब कांग्रेस भी नहीं हुई। अलबत्ता विधानसभा फिर लंगड़ी हो गई। पर शिबू सोरेन की किस्मत जरूर खुल गई। सत्ता की चाबी लेकर बिकवाली को बाजार में खड़े हो गए। अब लुटी-पिटी बीजेपी के पास देने को तो कुछ नहीं। सो कांग्रेस फिर कोयला मंत्रालय देकर पटाने की कोशिश में। पर शिबू हैं कि मानते नहीं। शिबू को तो सीएम की कुर्सी चाहिए। पर कांग्रेस एकला नहीं, अलबत्ता बीजेपी से निकले बाबूलाल मरांडी के साथ गठबंधन। दोनों मिलकर बड़े गठबंधन के तौर पर उभरे। सो मरांडी अपना दावा यों ही नहीं छोड़ेंगे। अब सरकार किसी की भी बने, झारखंड फिर अस्थिरता के गर्त में। यों बुधवार को केंद्र सरकार ने आंध्र को अस्थिरता के दौर से बाहर निकालने की कोशिश की। तेलंगाना की तलवार आम सहमति की म्यान में डाल दी। पी. चिदंबरम ने तेलंगाना के गठन की कवायद का एलान किया था। सो आंध्र में भड़की आग को थामने के लिए सरकार ने चिदंबरम से ही ताजा बयान दिलवाया। चिदंबरम ने दस दिसंबर को तेलंगाना वाला बयान दिया था। आग भड़की, तो सरकार ने कदम खींच लिए। सो 15 दिसंबर को यहीं पर लिखा था- 'आम सहमति की म्यान में तेलंगाना की तलवार।' पर कोई पूछे, सिर्फ दो लाइन के एलान में दस दिन क्यों लगाए? आंध्र में हिंसा से रोजाना सौ करोड़ का नुकसान हो रहा। खुद सीएम रोसैया ने इश्तिहार जारी कर लोगों से अपील की। पर शायद चिदंबरम काम के बोझ तले दबे होंगे। सो आंध्र को हिंसा की आग में जलने दिया। तभी तो बुधवार को चिदंबरम ने काम के बोझ का रोना रोया। अब ऐसा भी क्या, जो देश का होम मिनिस्टर सुरक्षा को भगवान भरोसे बताए। चिदंबरम ने 26/11 के बाद हमला न होने का क्रेडिट लक को दिया। अलग से आंतरिक सुरक्षा मंत्रालय बनाने की पैरवी की। यों ऐसा ही मंत्रालय पाकिस्तान में भी। पर पाक के हालात बताने की जरूरत नहीं। सो अगर इच्छाशक्ति हो और कोई जिम्मेदारी को बोझ न समझे। तो मंत्रालय बंटे या न बंटे, देश की सुरक्षा की जा सकती। सो अब बात बीजेपी की। कांग्रेस बुधवार को आंध्र का बवाल थामने में जुटी रही। तो बीजेपी राजस्थान को सुलझाने में मशगूल। दोपहर ढाई बजे से मीटिंगों का दौर शुरू हुआ। तो रात के नौ बजे तक मीटिंग-मीटिंग का खेल होता रहा। वसु, माथुर, रामदास का त्रिगुट किस तरह रण के मूड में। यह तो आपको पिछले गुरुवार यहीं पर बता चुके। सो दिल्ली पहुंचते ही त्रिगुट का रामदास के घर जमावड़ा हुआ। ठीक ढाई बजे तिकड़ी ष्ठरु९ष्ट ङ्ख ३५९७ नंबर की कार में एकसाथ बीजेपी हैड क्वार्टर पहुंची। नितिन गडकरी पहले ही रामलाल के साथ बैठे थे। सो पहले राउंड की मीटिंग घंटे भर चली। बीच में वेंकैया और विनय कटियार आए-गए। फिर माथुर कटियार के पास चले गए। तो रामदास रामलाल के पास। वसुंधरा गडकरी से ही अकेले बतियाती रहीं। फिर तिकड़ी कटियार के कमरे में इक_ïी हुई। तो इधर दूसरा गुट चौकड़ी बनाकर गडकरी के कमरे में घुसा। अरुण चतुर्वेदी, गुलाब चंद कटारिया, वासुदेव देवनानी और फूलचंद भिंडा बैक डोर से मीटिंग के लिए पहुंचे। तो 20 मिनट में पहला राउंड निपटा। दूसरे राउंड से पहले गडकरी पार्लियामेंट्री बोर्ड की मीटिंग में चले गए। फिर मीटिंगों का दौर चलता रहा। कभी चतुर्वेदी एंड कंपनी गडकरी के कमरे में। तो त्रिगुट वेंकैया के कमरे में। विनय कटियार पर्यवेक्षक के नाते कभी इधर तो कभी उधर होते रहे। बाल आप्टे भी गडकरी के साथ मीटिंग में शामिल हुए। तो आखिरी दौर की मीटिंग में अरुण जेतली भी आ गए। यानी राजस्थान संगठन चुनाव का पेच सुलझाने में दोपहर से रात हो गई। पर रार खत्म नहीं हुई। अब गडकरी को भी इल्म हो गया होगा, महाराष्टï्र और देश के किले में कितना फर्क। जब राजस्थान की चुनौती ने गडकरी के पसीने छुड़ा दिए। तो सोचो, खुदा न खास्ता कभी राजनाथ सिंह की तरह गडकरी को भी अरुण जेतली, सुषमा या नरेंद्र मोदी जैसे घाघ से चुनौती मिल गई। तब क्या होगा। यों अभी तक गडकरी को नरेंद्र मोदी की बधाई नहीं मिली। पर बात राजस्थान की। केंद्रीय चुनाव अधिकारी थावर चंद गहलोत से लेकर संगठन मंत्री रामलाल तक। चुनाव में धांधली की वसुंधरा खेमे की दलील से सहमत नहीं थे। सो गडकरी का सहमत न होना लाजिमी। पर स्थिति विस्फोटक होने लगी। वसुंधरा खेमे ने साफ कर दिया, संगठन चुनाव गुरुवार को हुए। तो नहीं माना जाएगा। जयपुर में 25 हजार वर्करों के जमावड़े की तैयारी थी। सो साख बचाने को गडकरी ने संगठन चुनाव टालना मुफीद समझा। अगर चुनाव न टलते, तो बीजेपी के अनुशासन के परखचे उड़ जाते। अब भले वसु, माथुर, रामदास के त्रिगुट को पूरी जीत नहीं मिली। पर दाव काम आ गया। त्रिगुट ने दलील दी, चतुर्वेदी से एतराज नहीं। प्रक्रिया से नाराजगी। आखिर पंचायत चुनाव के बहाने फरवरी के दूसरे हफ्ते तक चुनाव टलवा त्रिगुट ने आलाकमान को झुका दिया। किले के भीतर से हुए विद्रोह को गढ़ के रक्षक गडकरी संभाल नहीं पाए। पहली ही चुनौती में गडकरी के संगठन कौशल की पोल खुल गई। यों दोपहर से रात तक मीटिंग और सौदेबाजी का ऐसा दौर चला। देर रात खफा होकर कटियार मीटिंग से निकल गए। कह दिया- जो भी सूचना देनी है, फोन पर दे देना।
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23/11/2009
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जीता त्रिगुट, हार गया
बीजेपी हाईकमान
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संतोष कुमार
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झारखंड में भी बीजेपी की बत्ती गुल हो गई। यों कामयाब कांग्रेस भी नहीं हुई। अलबत्ता विधानसभा फिर लंगड़ी हो गई। पर शिबू सोरेन की किस्मत जरूर खुल गई। सत्ता की चाबी लेकर बिकवाली को बाजार में खड़े हो गए। अब लुटी-पिटी बीजेपी के पास देने को तो कुछ नहीं। सो कांग्रेस फिर कोयला मंत्रालय देकर पटाने की कोशिश में। पर शिबू हैं कि मानते नहीं। शिबू को तो सीएम की कुर्सी चाहिए। पर कांग्रेस एकला नहीं, अलबत्ता बीजेपी से निकले बाबूलाल मरांडी के साथ गठबंधन। दोनों मिलकर बड़े गठबंधन के तौर पर उभरे। सो मरांडी अपना दावा यों ही नहीं छोड़ेंगे। अब सरकार किसी की भी बने, झारखंड फिर अस्थिरता के गर्त में। यों बुधवार को केंद्र सरकार ने आंध्र को अस्थिरता के दौर से बाहर निकालने की कोशिश की। तेलंगाना की तलवार आम सहमति की म्यान में डाल दी। पी. चिदंबरम ने तेलंगाना के गठन की कवायद का एलान किया था। सो आंध्र में भड़की आग को थामने के लिए सरकार ने चिदंबरम से ही ताजा बयान दिलवाया। चिदंबरम ने दस दिसंबर को तेलंगाना वाला बयान दिया था। आग भड़की, तो सरकार ने कदम खींच लिए। सो 15 दिसंबर को यहीं पर लिखा था- 'आम सहमति की म्यान में तेलंगाना की तलवार।' पर कोई पूछे, सिर्फ दो लाइन के एलान में दस दिन क्यों लगाए? आंध्र में हिंसा से रोजाना सौ करोड़ का नुकसान हो रहा। खुद सीएम रोसैया ने इश्तिहार जारी कर लोगों से अपील की। पर शायद चिदंबरम काम के बोझ तले दबे होंगे। सो आंध्र को हिंसा की आग में जलने दिया। तभी तो बुधवार को चिदंबरम ने काम के बोझ का रोना रोया। अब ऐसा भी क्या, जो देश का होम मिनिस्टर सुरक्षा को भगवान भरोसे बताए। चिदंबरम ने 26/11 के बाद हमला न होने का क्रेडिट लक को दिया। अलग से आंतरिक सुरक्षा मंत्रालय बनाने की पैरवी की। यों ऐसा ही मंत्रालय पाकिस्तान में भी। पर पाक के हालात बताने की जरूरत नहीं। सो अगर इच्छाशक्ति हो और कोई जिम्मेदारी को बोझ न समझे। तो मंत्रालय बंटे या न बंटे, देश की सुरक्षा की जा सकती। सो अब बात बीजेपी की। कांग्रेस बुधवार को आंध्र का बवाल थामने में जुटी रही। तो बीजेपी राजस्थान को सुलझाने में मशगूल। दोपहर ढाई बजे से मीटिंगों का दौर शुरू हुआ। तो रात के नौ बजे तक मीटिंग-मीटिंग का खेल होता रहा। वसु, माथुर, रामदास का त्रिगुट किस तरह रण के मूड में। यह तो आपको पिछले गुरुवार यहीं पर बता चुके। सो दिल्ली पहुंचते ही त्रिगुट का रामदास के घर जमावड़ा हुआ। ठीक ढाई बजे तिकड़ी ष्ठरु९ष्ट ङ्ख ३५९७ नंबर की कार में एकसाथ बीजेपी हैड क्वार्टर पहुंची। नितिन गडकरी पहले ही रामलाल के साथ बैठे थे। सो पहले राउंड की मीटिंग घंटे भर चली। बीच में वेंकैया और विनय कटियार आए-गए। फिर माथुर कटियार के पास चले गए। तो रामदास रामलाल के पास। वसुंधरा गडकरी से ही अकेले बतियाती रहीं। फिर तिकड़ी कटियार के कमरे में इक_ïी हुई। तो इधर दूसरा गुट चौकड़ी बनाकर गडकरी के कमरे में घुसा। अरुण चतुर्वेदी, गुलाब चंद कटारिया, वासुदेव देवनानी और फूलचंद भिंडा बैक डोर से मीटिंग के लिए पहुंचे। तो 20 मिनट में पहला राउंड निपटा। दूसरे राउंड से पहले गडकरी पार्लियामेंट्री बोर्ड की मीटिंग में चले गए। फिर मीटिंगों का दौर चलता रहा। कभी चतुर्वेदी एंड कंपनी गडकरी के कमरे में। तो त्रिगुट वेंकैया के कमरे में। विनय कटियार पर्यवेक्षक के नाते कभी इधर तो कभी उधर होते रहे। बाल आप्टे भी गडकरी के साथ मीटिंग में शामिल हुए। तो आखिरी दौर की मीटिंग में अरुण जेतली भी आ गए। यानी राजस्थान संगठन चुनाव का पेच सुलझाने में दोपहर से रात हो गई। पर रार खत्म नहीं हुई। अब गडकरी को भी इल्म हो गया होगा, महाराष्टï्र और देश के किले में कितना फर्क। जब राजस्थान की चुनौती ने गडकरी के पसीने छुड़ा दिए। तो सोचो, खुदा न खास्ता कभी राजनाथ सिंह की तरह गडकरी को भी अरुण जेतली, सुषमा या नरेंद्र मोदी जैसे घाघ से चुनौती मिल गई। तब क्या होगा। यों अभी तक गडकरी को नरेंद्र मोदी की बधाई नहीं मिली। पर बात राजस्थान की। केंद्रीय चुनाव अधिकारी थावर चंद गहलोत से लेकर संगठन मंत्री रामलाल तक। चुनाव में धांधली की वसुंधरा खेमे की दलील से सहमत नहीं थे। सो गडकरी का सहमत न होना लाजिमी। पर स्थिति विस्फोटक होने लगी। वसुंधरा खेमे ने साफ कर दिया, संगठन चुनाव गुरुवार को हुए। तो नहीं माना जाएगा। जयपुर में 25 हजार वर्करों के जमावड़े की तैयारी थी। सो साख बचाने को गडकरी ने संगठन चुनाव टालना मुफीद समझा। अगर चुनाव न टलते, तो बीजेपी के अनुशासन के परखचे उड़ जाते। अब भले वसु, माथुर, रामदास के त्रिगुट को पूरी जीत नहीं मिली। पर दाव काम आ गया। त्रिगुट ने दलील दी, चतुर्वेदी से एतराज नहीं। प्रक्रिया से नाराजगी। आखिर पंचायत चुनाव के बहाने फरवरी के दूसरे हफ्ते तक चुनाव टलवा त्रिगुट ने आलाकमान को झुका दिया। किले के भीतर से हुए विद्रोह को गढ़ के रक्षक गडकरी संभाल नहीं पाए। पहली ही चुनौती में गडकरी के संगठन कौशल की पोल खुल गई। यों दोपहर से रात तक मीटिंग और सौदेबाजी का ऐसा दौर चला। देर रात खफा होकर कटियार मीटिंग से निकल गए। कह दिया- जो भी सूचना देनी है, फोन पर दे देना।
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23/11/2009
Tuesday, December 22, 2009
चारों तरफ पंगे ही पंगे, फिर भी हर-हर गंगे
इंडिया गेट से
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चारों तरफ पंगे ही पंगे,
फिर भी हर-हर गंगे
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संतोष कुमार
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संसद का शीत सत्र मंगल को विधिवत खत्म हो गया। पर लिब्राहन रपट हो या महंगाई की बहस। तेलंगाना हो या ग्लोबल वार्मिंग। बहस का कोई निचोड़ नहीं निकला। अलबत्ता सरकार ने जो चाहा, वही हुआ। पर विपक्ष इसी में खुश, संसद में जनहित के खूब मुद्दे उठाए। अब सत्र उठ गया, तो राज्यसभा में विपक्ष के नेता अरुण जेतली ने संसदीय जिम्मेदारी का मुद्दा उठाया। करीब महीने भर के सत्र में अपने पीएम तीन विदेश दौरे कर आए। सो जेतली इसे गलत परंपरा बता रहे। बोले- 'सत्र के दौरान पीएम के विदेश दौरे से संसद के प्रति सरकार की जिम्मेदारी का स्तर घटता जा रहा है। सो भविष्य के लिए संज्ञान ले सरकार।' यों पीएम का संसद सत्र के वक्त विदेश जाना कोई नई बात नहीं। अगर पीएम देश में भी हों। तो भी सदन में आने की परंपरा कम ही रही। इंदिरा गांधी जब पीएम थीं। तब भी ऐसा ही माहौल था। सो तब अटल बिहारी वाजपेयी ने जो कहा, आज भी सभी प्रधानमंत्रियों पर मौजूं। वाजपेयी ने कहा था- 'पंडित जवाहरलाल नेहरू संसद से सिर्फ तब बाहर रहते थे, जब उनके पास कोई चारा नहीं होता था। पर इंदिरा गांधी सिर्फ तब संसद आया करतीं, जब उसे टालना संभव नहीं होता था।' यही सवाल पी.वी. नरसिंह राव के काल में भी उठा। तब तत्कालीन संसदीय कार्यमंत्री विद्याचरण शुक्ल ने कबूला, नेहरू के बाद परंपरा बदल गई। शुक्ल ने कहा था- 'जवाहर लाल नेहरू के बाद हर प्रधानमंत्री ने सिर्फ आवश्यक महसूस होने पर ही संसद में आना उचित समझा। सो आप नरसिंह राव पर संसद को अधिक समय न देने का आरोप नहीं लगा सकते।' अब संसदीय कार्य मंत्री ऐसी दलीलें दें, तो काहे की संसद। और काहे की जिम्मेदारी। पर मनमोहन के हालिया विदेश दौरे को ही देखें। तो कुछ ऐसा हासिल नहीं हुआ। जिसकी खातिर संसद को नजरअंदाज किया। अलबत्ता जैसे न्यूक्लीयर डील और शर्म-अल-शेख के साझा बयान में चूक हुई। अब कोपेनहेगन में क्लाइमेट चेंज पर अमेरिका के जाल में फंस गए। भले क्योटो प्रोटोकॉल रद्द नहीं करा पाए विकसित देश। पर विकासशील देशों को फंसा लिया। विकसित देश अपने यहां कार्बन में कितनी कटौती करेंगे। इसका खुलासा जनवरी के आखिर तक होगा। बाकायदा विकासशील देश पीकिंग एयर को भी राजी हो गए। यानी जैसे न्यूक्लीयर डील पर भारत ने मॉनीटरिंग की छूट दे दी। अब कोपेनहेगन के बाद भारत को दो साल पर रपट देनी होगी। वह भी तय गाइड लाइंस के तहत। जिस पर विकसित देश सलाह-मशविरा और विश£ेषण करेंगे। यानी कार्बन कटौती में खर्च करेगा भारत। मॉनीटरिंग करेगा अमेरिका। सो अरुण जेतली ने मौजूं टिप्पणी की। मनमोहन का नाम नहीं लिया। पर बोले- 'सरकार का मौजूदा नेतृत्व अमेरिकी अध्यापक के सामने सबसे अच्छा स्टूडेंट बनने की कोशिश में। सो भारत दुनिया के जाल में फंस रहा।' तभी तो बराक ओबामा के सरकारी अधिकारी एक्सल रॉड ने हकीकत बता दी। कह दिया, अब भारत हमारी पकड़ में आ गया। यानी खाया-पीया कुछ नहीं, गिलास तोड़ा बारह आना। पर लगातार चुनावी जीत से गदगद कांग्रेस को कोई फर्क नहीं पड़ रहा। अब बुधवार को झारखंड के चुनाव नतीजों की बारी। सो ऊंट किस करबट बैठा, यह ईवीएम ही बताएगा। पर दावा दोनों कर रहे। कांग्रेस जीती, तो पांव जमीं पर नहीं टिकेंगे। अगर बीजेपी जीती, तो समझो संजीवनी मिल गई। विदा ले चुके राजनाथ को क्रेडिट मिलेगा। गडकरी के कदम शुभ कहलाएंगे। अगर नतीजा उलटा हुआ, तो श्रेय भी उलटा ही मिलेगा। पर नितिन गडकरी को झटके मिलने शुरू हो गए। बुधवार को राजस्थान से वसुंधरा ब्रिगेड दिल्ली धमकेगा। तो संगठन चुनाव पर रोक की मांग होगी। पर शनिवार को इस बाबत वेंकैया और गडकरी की बात हो चुकी। तो गडकरी चुनाव रोकने के पक्ष में नहीं बताए जा रहे। पर बवाल बढ़ चुका। सो बुधवार को राजस्थान बीजेपी का झगड़ा कहीं गडकरी के लिए वाटरलू साबित न हो जाए। वसुंधरा-माथुर-रामदास का त्रिगुट तो रण के मूड में। अगर बुधवार को राजस्थान का झगड़ा न सुलझा। तो राज्य में बीजेपी का कहीं उड़ीसा जैसा हाल न हो जाए। उड़ीसा में जबसे नवीन पटनायक से बीजेपी का रिश्ता टूटा। बीजेपी बिखरती जा रही। राज्य से बीजेपी के छह सांसद हुआ करते थे। पर अबके सौ बट्टïे सन्नाटा। एक भी सांसद जीतकर नहीं आ सका। विधायकों की गिनती भी तीस से छह पर सिमट गई। अब खरबला स्वेन ने भी बीजेपी छोड़ दी। तो उड़ीसा बीजेपी में भूचाल आ गया। हाईकमान ने फौरन मुख्तार अब्बास नकवी को उड़ीसा भेजा। ताकि कोई और पार्टी न छोड़े। पर खरबला का बीजेपी छोडऩा कोई आम बात नहीं। खरबला जब पिछली लोकसभा में सांसद थे। तो अपनी योग्यता और नॉलेज से स्पीकर सोमनाथ चटर्जी की नाक में दम कर रखा था। आज के जमाने में जब सांसद खुद को भगवान से कम नहीं समझते। खरबला हर विषय में पूरी तैयारी करते थे। कुल मिलाकर बीजेपी के बड़े इंटलेक्चुअल में शुमार होते थे खरबला। यानी भले बीजेपी में चेहरे बदल गए। पर चाल, चरित्र रंचमात्र नहीं बदला। वही अनुशासनहीनता। वही बगावत। वही बौद्धिक लोगों का बीजेपी से पलायन। वही श्रेष्ठïता की लड़ाई। वही बीजेपी का झंडा, जिसमें संघ का डंडा। और नेताओं का अपना-अपना एजंडा। अब चारों तरफ बीजेपी में पंगे ही पंगे दिख रहे। फिर भी गडकरी हर-हर गंगे कह रहे।
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22/10/2009
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चारों तरफ पंगे ही पंगे,
फिर भी हर-हर गंगे
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संतोष कुमार
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संसद का शीत सत्र मंगल को विधिवत खत्म हो गया। पर लिब्राहन रपट हो या महंगाई की बहस। तेलंगाना हो या ग्लोबल वार्मिंग। बहस का कोई निचोड़ नहीं निकला। अलबत्ता सरकार ने जो चाहा, वही हुआ। पर विपक्ष इसी में खुश, संसद में जनहित के खूब मुद्दे उठाए। अब सत्र उठ गया, तो राज्यसभा में विपक्ष के नेता अरुण जेतली ने संसदीय जिम्मेदारी का मुद्दा उठाया। करीब महीने भर के सत्र में अपने पीएम तीन विदेश दौरे कर आए। सो जेतली इसे गलत परंपरा बता रहे। बोले- 'सत्र के दौरान पीएम के विदेश दौरे से संसद के प्रति सरकार की जिम्मेदारी का स्तर घटता जा रहा है। सो भविष्य के लिए संज्ञान ले सरकार।' यों पीएम का संसद सत्र के वक्त विदेश जाना कोई नई बात नहीं। अगर पीएम देश में भी हों। तो भी सदन में आने की परंपरा कम ही रही। इंदिरा गांधी जब पीएम थीं। तब भी ऐसा ही माहौल था। सो तब अटल बिहारी वाजपेयी ने जो कहा, आज भी सभी प्रधानमंत्रियों पर मौजूं। वाजपेयी ने कहा था- 'पंडित जवाहरलाल नेहरू संसद से सिर्फ तब बाहर रहते थे, जब उनके पास कोई चारा नहीं होता था। पर इंदिरा गांधी सिर्फ तब संसद आया करतीं, जब उसे टालना संभव नहीं होता था।' यही सवाल पी.वी. नरसिंह राव के काल में भी उठा। तब तत्कालीन संसदीय कार्यमंत्री विद्याचरण शुक्ल ने कबूला, नेहरू के बाद परंपरा बदल गई। शुक्ल ने कहा था- 'जवाहर लाल नेहरू के बाद हर प्रधानमंत्री ने सिर्फ आवश्यक महसूस होने पर ही संसद में आना उचित समझा। सो आप नरसिंह राव पर संसद को अधिक समय न देने का आरोप नहीं लगा सकते।' अब संसदीय कार्य मंत्री ऐसी दलीलें दें, तो काहे की संसद। और काहे की जिम्मेदारी। पर मनमोहन के हालिया विदेश दौरे को ही देखें। तो कुछ ऐसा हासिल नहीं हुआ। जिसकी खातिर संसद को नजरअंदाज किया। अलबत्ता जैसे न्यूक्लीयर डील और शर्म-अल-शेख के साझा बयान में चूक हुई। अब कोपेनहेगन में क्लाइमेट चेंज पर अमेरिका के जाल में फंस गए। भले क्योटो प्रोटोकॉल रद्द नहीं करा पाए विकसित देश। पर विकासशील देशों को फंसा लिया। विकसित देश अपने यहां कार्बन में कितनी कटौती करेंगे। इसका खुलासा जनवरी के आखिर तक होगा। बाकायदा विकासशील देश पीकिंग एयर को भी राजी हो गए। यानी जैसे न्यूक्लीयर डील पर भारत ने मॉनीटरिंग की छूट दे दी। अब कोपेनहेगन के बाद भारत को दो साल पर रपट देनी होगी। वह भी तय गाइड लाइंस के तहत। जिस पर विकसित देश सलाह-मशविरा और विश£ेषण करेंगे। यानी कार्बन कटौती में खर्च करेगा भारत। मॉनीटरिंग करेगा अमेरिका। सो अरुण जेतली ने मौजूं टिप्पणी की। मनमोहन का नाम नहीं लिया। पर बोले- 'सरकार का मौजूदा नेतृत्व अमेरिकी अध्यापक के सामने सबसे अच्छा स्टूडेंट बनने की कोशिश में। सो भारत दुनिया के जाल में फंस रहा।' तभी तो बराक ओबामा के सरकारी अधिकारी एक्सल रॉड ने हकीकत बता दी। कह दिया, अब भारत हमारी पकड़ में आ गया। यानी खाया-पीया कुछ नहीं, गिलास तोड़ा बारह आना। पर लगातार चुनावी जीत से गदगद कांग्रेस को कोई फर्क नहीं पड़ रहा। अब बुधवार को झारखंड के चुनाव नतीजों की बारी। सो ऊंट किस करबट बैठा, यह ईवीएम ही बताएगा। पर दावा दोनों कर रहे। कांग्रेस जीती, तो पांव जमीं पर नहीं टिकेंगे। अगर बीजेपी जीती, तो समझो संजीवनी मिल गई। विदा ले चुके राजनाथ को क्रेडिट मिलेगा। गडकरी के कदम शुभ कहलाएंगे। अगर नतीजा उलटा हुआ, तो श्रेय भी उलटा ही मिलेगा। पर नितिन गडकरी को झटके मिलने शुरू हो गए। बुधवार को राजस्थान से वसुंधरा ब्रिगेड दिल्ली धमकेगा। तो संगठन चुनाव पर रोक की मांग होगी। पर शनिवार को इस बाबत वेंकैया और गडकरी की बात हो चुकी। तो गडकरी चुनाव रोकने के पक्ष में नहीं बताए जा रहे। पर बवाल बढ़ चुका। सो बुधवार को राजस्थान बीजेपी का झगड़ा कहीं गडकरी के लिए वाटरलू साबित न हो जाए। वसुंधरा-माथुर-रामदास का त्रिगुट तो रण के मूड में। अगर बुधवार को राजस्थान का झगड़ा न सुलझा। तो राज्य में बीजेपी का कहीं उड़ीसा जैसा हाल न हो जाए। उड़ीसा में जबसे नवीन पटनायक से बीजेपी का रिश्ता टूटा। बीजेपी बिखरती जा रही। राज्य से बीजेपी के छह सांसद हुआ करते थे। पर अबके सौ बट्टïे सन्नाटा। एक भी सांसद जीतकर नहीं आ सका। विधायकों की गिनती भी तीस से छह पर सिमट गई। अब खरबला स्वेन ने भी बीजेपी छोड़ दी। तो उड़ीसा बीजेपी में भूचाल आ गया। हाईकमान ने फौरन मुख्तार अब्बास नकवी को उड़ीसा भेजा। ताकि कोई और पार्टी न छोड़े। पर खरबला का बीजेपी छोडऩा कोई आम बात नहीं। खरबला जब पिछली लोकसभा में सांसद थे। तो अपनी योग्यता और नॉलेज से स्पीकर सोमनाथ चटर्जी की नाक में दम कर रखा था। आज के जमाने में जब सांसद खुद को भगवान से कम नहीं समझते। खरबला हर विषय में पूरी तैयारी करते थे। कुल मिलाकर बीजेपी के बड़े इंटलेक्चुअल में शुमार होते थे खरबला। यानी भले बीजेपी में चेहरे बदल गए। पर चाल, चरित्र रंचमात्र नहीं बदला। वही अनुशासनहीनता। वही बगावत। वही बौद्धिक लोगों का बीजेपी से पलायन। वही श्रेष्ठïता की लड़ाई। वही बीजेपी का झंडा, जिसमें संघ का डंडा। और नेताओं का अपना-अपना एजंडा। अब चारों तरफ बीजेपी में पंगे ही पंगे दिख रहे। फिर भी गडकरी हर-हर गंगे कह रहे।
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22/10/2009
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