Wednesday, January 20, 2010

महंगाई पर भी क्यों न हो इमरजेंसी जैसी एकजुटता?

 संतोष कुमार
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           जे बात। इसे कहते हैं पवारनामा। अब दूध की कीमतें भी बढ़ेंगी। ज्योतिषी शरद पवार की काली जुबान से ब्रह्मïवाक्य निकल गया। पवार चले थे चीनी की कीमत कम करने। पर जरा कीमतों में कटौती का पवार फार्मूला देखिए। दूध महंगा होगा, तो लोगबाग चाय और दूध कम पीएंगे। चीनी की खपत कम होगी, तो मांग कम होगी। सो चीनी के दाम खुद-ब-खुद गिरेंगे। पर दूध की कीमतें तीन महीने पहले ही बढ़ी थीं। अब बुधवार को पवार दूध उत्पादकों की भाषा बोले। उत्तर भारत में दूध की किल्लत बताई। तो पवार उवाच सुन ऐसा लगा, मानो कल रात सोते वक्त पवार को पीने को दूध नहीं मिला। सो तड़के भन्नाते हुए उठ किल्लत का एलान कर दिया। अब तो पवार के हर बयान में निजी झुंझलाहट ज्यादा नजर आती। तभी तो दूध की किल्लत पर जो भाषा बोले। आम आदमी के नहीं, दूधियों के मंत्री दिखे। बोले- 'कीमतें बढ़ाने का फैसला नहीं हुआ, तो राज्यों को दूध खरीदने में मुश्किल पेश आएगी।'  यानी दूधियों को पवार का इशारा हो गया। अब कोई मंत्री किल्लत पैदा करने का इशारा करे। तो दूध ही क्या, आम आदमी पानी को भी तरस जाए। पर अब कोई पवार-मनमोहन से पूछे, क्या हुआ तेरा वादा। कहां दस दिन में महंगाई कम करने का दावा। पिछले बुधवार को केबिनेट कमेटी ऑन प्राइस की मीटिंग के बाद पवार ने दस में बस का खम ठोका था। पर जुमा-जुमा आठ दिन ही हुए। चीनी और रोजमर्रा की वस्तुओं की कीमतें तो कम नहीं हुईं। अलबत्ता बाबू मोशाय ने दूध की कीमतें बढ़वाने के लिए दूधियों के सिर पर हाथ रख दिया। सो दूध की कीमतें बढऩी तय। साथ ही पेट्रोल-डीजल भी कतार में। अब तो यही लग रहा, चुनाव के वक्त सत्तारूढ़ दल को चंदा देने वाले जमाखोर पूरी भरपाई नहीं कर लेते। महंगाई कम होना तो दूर, थमने वाली भी नहीं। चुनाव के वक्त राजनीतिक दल इस बात की फिक्र कहां करते। चुनावी चंदा चोरी से आ रहा या मंदिर की दानपेटी से। अब जिन जमाखोरों ने चंदे दिए होंगे, उन पर कार्रवाई कैसे होगी। पिछले हफ्ते महंगाई का शोर ज्यादा मचा। तो कांग्रेस-मनमोहन के कान में भी आवाज पड़ी। सो दिखाने को मीटिंगबाजी कर ली। शायद सोचा होगा, दो-चार रुपए महंगाई कम करा देंगे। पर जब चंदा देने वालों से बात हुई होगी। तो उन लोगों ने बैलेंस शीट दिखा दी होगी। आम आदमी को निचोडऩे के लिए कुछ और वक्त मांग लिया होगा। अपना अंदाजा यों ही नहीं। जब सरकार कभी महंगाई पर हाथ खड़ा करे। कभी दस दिन में नकेल कसने का दावा। तो आप ही सोचो, है ना कहीं न कहीं दाल में काला। शरद पवार ने दस दिन में चीनी की कीमत घटाने का वादा किया। तो पूरा करने को दूध की कीमत बढ़ाएंगे। अपने प्रणव मुखर्जी तो कई दफा हाथ खड़े कर चुके। पर सरकार के मुखिया होने के नाते पीएम मनमोहन का राग, कोशिश कर रहे। अब राहुल गांधी का बयान देखिए। राहुल बाबा बीजेपी के गढ़ मध्य प्रदेश में घुसे हुए। सो अपनी जानकारी के आधार पर कहा या ज्योतिषी पवार के दावे पर। यह तो पता नहीं, पर राहुल बोले- 'महंगाई अब थोड़े दिनों की मेहमान।' मनमोहन के एक मंत्री सलमान खुर्शीद ने फर्रुखाबाद में बयान दिया। महंगाई के लिए सिर्फ केंद्र नहीं, राज्य सरकार भी दोषी। चलो देर से ही सही, केंद्र को दोषी तो माना। यानी राहुल हों या सलमान, महंगाई पर इजहार-ए-जुर्म तो कर ही लिया। अब बताओ- कौन सच्चा, कौन झूठा। किसका मुंह काला और किसका बोलबाला। कांग्रेस को जब-जब महंगाई की चिंता हुई। खबरें प्लांट करने में बीजेपी को भी मात दे दी। कभी कहा, मनमोहन ने पवार को डांट लगा दी। तो कभी पवार की क्षमता पर सवाल उठाए। अब मनमोहन केबिनेट के जूनियर मंत्री जयराम रमेश ने बीटी बैंगन का गुस्सा पवार पर उतार दिया। बीटी बैंगन के प्रमोशन को देश में घूम रहे जयराम रमेश पर्यावरणवादियों के विरोध को झेल रहे। सो मंगलवार को अहमदाबाद में सवाल हुआ। बैंगन का मामला कृषि मंत्रालय का। तो जयराम क्यों घूम रहे। बस फिर क्या था, जयराम तुनक पड़े। बोले- 'कृषि मंत्रालय में आज-कल क्रिकेट चल रहा। मंत्री खेल में व्यस्त।'  यानी कांग्रेस-पवार का रिश्ता तो पति-पत्नी जैसा। तुम्हें सहा न जाए, तुम बिन रहा भी न जाए। पर फिर भी विपक्ष दबाव बनाने में नाकाम। यों बुधवार को आडवाणी-गडकरी की रहनुमाई में बीजेपी ने पीएम के घर अलख जगाई। पर भरोसा वही मिला, जो आम आदमी को मिलता। राज्यों में क्षत्रप खुद उलझे हुए। मायावती को तो मौके की तलाश थी। सो दूध के बहाने मनमोहन को धमकी दे दी। बुधवार को होने वाली सीएम मीटिंग से पहले पवार को बर्खास्त करो। वरना मीटिंग का बॉयकॉट करेंगे। वैसे भी माया मीटिंग में गईं। तो चीनी किल्लत पर सवालों में उलझेंगी। सो न जाने का पवार ने बहाना दे दिया। मुलायम, माया, लालू, पासवान, नीतिश, करुणा तमाम राजनीतिक क्षत्रपों को भी महंगाई की चिंता। पर सिर्फ राजनीतिक वजह से। सो महंगाई सियासी चाल में उलझ चुकी। अगर विपक्षी आम आदमी के हित में एकजुट हो जाएं। जैसे इंदिरा गांधी की इमरजेंसी के खिलाफ समूचा विपक्ष एकजुट हुआ। तो इंदिरा की ईंट से ईंट बज गई थी। कुछ ऐसा महंगाई पर हो जाए। तो मनमोहन सरकार की चूलें हिल जाएं। पर असलियत तो यह, न सत्तापक्ष और न विपक्ष ईमानदारी से कीमतें कम कराना नहीं चाहते।
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20/01/2010

Tuesday, January 19, 2010

नौ जून 2006 को भी तो सुध ली थी मनमोहन ने!

 संतोष कुमार
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         काम के, न काज के, दुश्मन अनाज के। साउथ ब्लॉक में मनमोहन सर की क्लास लगी। तो राज्य मंत्रियों का यही दर्द उमड़ पड़ा। जब घर में बड़ा भाई छोटे को खिलौना देना तो दूर, छूने भी न दे। तो छोटा रोता-भागता मां के पास जाता। शाम को थका-हारा पिता घर आए। तो बड़े भाई की जमकर शिकायत होती। पर पिता की नजर में तो दोनों बच्चे एक जैसे प्यार के हकदार। सो बेचारे पिता की मुश्किल लाजिमी। मनमोहन के सरकारी परिवार की कहानी भी यही। सो जब मंगलवार को मनमोहन ने सुध ली। तो कुछ ने भावना का खुलकर इजहार किया। तो कुछ राजनीतिक कारीगरी दिखा गए। मनमोहन मंत्रिमंडल में कुल 78 मेंबर। केबिनेट में मनमोहन को मिला 33 बड़े भैया। सात इंडिपेंडेंट चार्ज वाले मझोले। बाकी 38 छोटे भाई लोग। सो मनमोहन की क्लास में 33 छोटे भाई पहुंचे। तो दर्जन भर ने खुलकर दुखड़ा रोया। ममतावादी को शिकायत कांग्रेसियों से। तो कांग्रेसी केएच मुनिअप्पा को ममता से। शिशिर अधिकारी का दर्द तो शनिवार को यहीं बता चुके। पर अब अधिकारी को मौका मिला। तो अपने सीपी जोशी को कैसे छोड़ते। अगर राज्यमंत्रियों में कोई संतुष्टï था। तो सिर्फ करुणानिधिवादी एसएस पलानिमणिक्कम। जो अपने प्रणव दा के मातहत वित्त राज्यमंत्री। पर डीएमके से विभागों की डील में रेवेन्यू मिला हुआ। वैसे भी करुणानिधि समर्थन की एवज में सत्ता का लिखित समझौता करने वाले। सो अपने सचिन पायलट गठबंधन की मजबूरी बखूबी समझ रहे। वैसे भी ए. राजा डीएमके के कोटे से। सो शिकायत करना, मतलब सरकार को मुश्किल में डालना। सो सचिन ने चुप रहना बेहतर समझा। यानी जिन राज्यमंत्रियों के सीनियर पावरफुल। उनने शिकायत के बजाए सुझाव का फार्मूला अपनाया। अब अंदाज भले कुछ भी हो। पर शिकायतों का लब्बोलुवाब एक जैसा। केबिनेट मंत्री फाइल नहीं आने देते। मीटिंग तक में नहीं बुलाया जाता। कार्यक्रम की सूचना नहीं मिलती। नीतिगत मामलों में राय नहीं ली जाती। सो जब सीनियर मंत्री ही भाव नहीं देते। तो सैक्रेट्री कहां तवज्जो देने वाले। कुछ राज्य मंत्रियों ने तो यहां तक कहा। जब सैक्रेट्री से फाइल मांगी, तो जवाब मिला- 'केबिनेट मंत्री ने मना कर रखा है।'  पर कोई फाइल नहीं, तो काम क्या। तो उसका जवाब भी सैक्रेट्री के जरिए ही जूनियर मंत्रियों को मिल रहा। केबिनेट मंत्री जूनियरों को कह रहे। तुम उद्घाटन करो, फीता काटो, मौज करो, बाकी हम देख लेंगे। पर मनमोहन के सामने शिकायतों की लिस्ट यहीं तक नहीं रुकी। अलबत्ता राज्यमंत्रियों ने जो इजहार किया। वह तथ्य चौंकाने वाले। राज्यमंत्रियों को अपने विभाग का बजट भी मालूम नहीं। यों सरकारी वेबसाइट पर सब उपलब्ध। फिर भी राज्यमंत्री को नहीं पता। तो फिर राज्यमंत्रियों की दिलचस्पी का अंदाजा भी आप लगा लें। पर पीएम ने सबकी सुन ली। आखिर में पीएमओ से दो लाइन की रिलीज जारी हुई। तो कहा- 'पीएम ने राज्य मंत्रियों की क्षमता के बेहतर इस्तेमाल के तौर-तरीकों पर चर्चा की। राज्य मंत्रियों को पीएम ने शासन में प्रभावी भूमिका निभाने का अनुरोध भी किया।'  पर राज्यमंत्रियों का यह दर्द कोई नया नहीं। वाजपेयी सरकार के वक्त कृषि राज्यमंत्री हुकुमदेव नारायण यादव का अपने सरकारी निवास में ही खेती करने का किस्सा आपको बता चुके। पर मनमोहन राज की कहानी के क्या कहने। पिछले टर्म में भी राज्यमंत्री इसी कदर रुसवा थे। तो मनमोहन ने कांतीलाल भूरिया से फिशरी विभाग लेकर लालूवादी तस्लीमुद्दीन को दिया था। फिर भी दर्द बढ़ता ही गया। तो मनमोहन ने नौ जून 2006 को एक चि_ïी सभी काबिना मंत्रियों को लिखी। अब उस चि_ïी का मजमून भी देख लो- 'आप सभी जानते हैं कि हमारे पास पूरे समय के लिए राज्यमंत्री हैं, जो विभिन्न विभागों के केबिनेट मंत्रियों के मातहत जुड़े हैं। लेकिन पिछले कुछ समय से मैं बहुत से मामलों में यह देख रहा हूं कि राज्यमंत्रियों को दफ्तर के कामकाज के संदर्भ में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां नहीं दी जा रहीं। जिससे हम सुशासन के लिए नीति निर्धारण में उन मंत्रियों के अनुभवों और क्षमताओं से वंचित रह जाते हैं। इन सब पृष्ठïभूमि के तहत मैं आपसे अनुरोध करता हूं कि इस पर विचार करते हुए राज्यमंत्रियों को ज्यादा से ज्यादा जिम्मेदारियां दें। ताकि हम एक तरफ सरकार की कार्य प्रणाली को मजबूत कर सकें और दूसरी तरफ अपने नेतृत्व में उन मंत्रियों की क्षमता और अनुभवों को विकसित करने में सहयोग करें। आप इस बात को मानेंगे कि इससे न सिर्फ हमारी सरकार की छवि सुधरेगी, बल्कि हमारी सरकार के कामकाज की धारणा के बारे में भी सुधार होगा।' अब पीएमओ की ताजा रिलीज और नौ जून 2006 की उस चि_ïी की तुलना करें। कोई फर्क नजर आया? पर पीएम ने अबके फिर राज्य मंत्रियों को भरोसा दिलाया। केबिनेट की अगली मीटिंग में सीनियरों से बात करूंगा। केबिनेट सैक्रेट्री को नोट तैयार करने की हिदायत दी। पर होगा क्या। यही ना, मनमोहन तारीख बदल वही चि_ïी फिर भिजवा देंगे। या जुबानी बात करेंगे। पर केबिनेट मंत्री अपना वजन क्यों घटाएंगे? यों सिर्फ सीनियरों का ही दोष नहीं। राज्यमंत्री मुस्तैद हों। तो काम करने से कोई कब तक रोक सकेगा। पर लाल बत्ती मिल जाए। तो कामकाज में रुचि कहां रह जाती। सो काबिना मंत्री जूनियर की अरुचि का फायदा क्यों न उठाएं।
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19/01/2010

Monday, January 18, 2010

'गर अमर समाजवादी, तो पूंजीवादी कौन?

इंडिया गेट से
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 संतोष कुमार
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         कॉमरेड ज्योति बसु की अंतिम यात्रा में मंगलवार को सोनिया, आडवाणी, गडकरी जैसे दिग्गज पहुंचेंगे। यों राजनीति की अच्छी पहल। कम से कम मृत्यु के बाद तो विरोध नहीं। जब केरल के पूर्व मुख्यमंत्री ई.एम.एस. नंबूदरीपाद का 1998 में निधन हुआ। तो रायसिना हिल में अटल बिहारी वाजपेयी उसी दिन 19 मार्च को शपथ ले रहे थे। आडवाणी पहली बार होम मिनिस्टर बने। तो वाजपेयी ने नंबूदरीपाद की अंतिम यात्रा में सरकारी नुमाइंदा भेजना चाहा। आडवाणी ने विचारधारा को किनारे रख खुद जाने की इच्छा जताई। अब वही मिसाल ज्योति दा के निधन पर। सो लग रहा, राजनीति में थोड़ा लोक-लिहाज अभी बाकी। वैसे ज्योति दा वाम राजनीति के पुरोधा रहे। सो उनकी कमी हमेशा खलेगी। भले कई राजनीतिक दलों के विचार ज्योति दा से न मिलते हों। पर अंदर खाने उनकी कार्यशैली के कायल सभी। खास तौर से बंगाल में कैडर खड़ा करने की कला। जब 2004 में वाजपेयी सत्ता से हटे। तो वर्करों की निराशा देख बीजेपी को बंगाल से सीख लेने की नसीहत दी थी। सो लोगों के दिलों में खास जगह बनाने वाले ज्योति दा को अपनी भी श्रद्धांजलि। पर श्रद्धांजलि में भी कोई राजनीतिक चालबाजी दिखाए। तो आप क्या कहेंगे? यही ना... अमर सिंह। जी हां, अपना इशारा भी समाजवाद के नए-नए पहरुआ बाबू मोशाय अमर सिंह की ओर। अमर को तो बस मौका मिलना चाहिए अपनी वाणी सुनाने का। सो ज्योति दा को श्रद्धांजलि तो दी। पर मुलायम सिंह का कुनबा भाव नहीं दे रहा। तो कांग्रेस में ठौर ढूंढ रहे। सो ब्लॉगिए अमर ने लिख दिया- 'पीएम पद ठुकराने जैसा बड़ा बलिदान 1996 में ज्योति बसु के बाद 2004 में सोनिया गांधी ने किया।'  यों ये वही अमर सिंह हैं, जिन ने 18-19 मई 2004 को कसमें खाई थीं। जब बिन बुलाए अमर-मुलायम कॉमरेड हरकिशन सिंह सुरजीत के साथ दस जनपथ चले गए। पर भाव तो छोडि़ए, कांग्रेसियों ने अमर को ऐसा दुत्कारा। खाना-पानी के बजाए कड़वा घूंट पीकर लौटे। फिर आदतन मीडिया के सामने राग। अब कभी दस जनपथ नहीं जाऊंगा। पर अमर अपनी बात पर कायम रह जाएं। तो फिर काहे के अमर। यों आखिरकार मुलायम के कुनबे ने बेदखल कर दिया। मुलायम ने अमर का इस्तीफा मंजूर कर लिया। तो अब अमर सिंह का क्षत्रिय खून उबाल मार रहा। सौ-सौ जूते खाकर भी सपा में रहने की रार ठान ली। प्रेस कांफ्रेंस की। तो संजय दत्त और मुस्लिम चेहरों की फौज भी साथ लाए। ताकि मुलायम को चिढ़ा सकें। अब देश भर में क्षत्रिय सम्मेलन भी करेंगे। यों अपने जसवंत सिंह राजस्थान में यह नुस्खा अपना चुके। सो अपना तो यही कहना- जाकी रही भावना जैसी, प्रभु मूरत देखी तिन्ह तैसी। अब जरा खुद को शुरुआती कांग्रेसी कहने वाले और सोनिया के मुरीद अमर को कांग्रेस की सलामी देखिए। अपने दिग्गी राजा अर्जी डालने की सलाह दे चुके। पर अमर को जुबानी जंग में जवाब देने वाले सत्यव्रत चतुर्वेदी का अंदाज ही कुछ और। अमर को चिरकुट उन ने ही कहा था। अब कह दिया- 'जब अमर खुद को बीमार कह रहे। तो कांग्रेस में क्यों आना चाहते हैं। क्या कांग्रेस कोई सराय या नर्सिंग होम है? वाकई अमर को इलाज की जरूरत है।' यह तो रहा कांग्रेसी अंदाज। पर सही मायने में इलाज मुलायम ने कर दिया। अमर ने छह जनवरी को इस्तीफा भेजा। तो मुलायम ने सोचा, मान जाएंगे। पर अमर ब्लैकमेलिंग को उतर आए। तो शायद मुलायम का समाजवादी मन होश में आया। यों कहते हैं- बाप बड़ा ना भैया, सबसे बड़ा रुपैया। पर मुलायम ने अबके कहावत झुठला दी। अमर के साथ मुलायम परिवार की जंग में आखिर जीत परिवार की हुई। मुलायम ने भी खम ठोक दिया। कहा- 'अमर पर अब कोई बात नहीं। मैं आगे देखता हूं, पीछे नहीं।'  यानी अमर को इशारा- जो जी में आए, कर लें। सो अमर तो धड़ाम से जमीन पर आ गिरे। कहां मुंबई से ही दुबई लौटने की सोची थी। अब सोमवार को सीधे दिल्ली आ गए। पर अभी भी बिना जूता खाए सपा छोडऩे को तैयार नहीं। ठीक वैसे ही, जैसे पंचों की बात सिर-माथे, पतनाला वहीं रहेगा। अब खुद को आजाद महसूस कर रहे। सो न कुछ बोलेंगे, न कुछ करेंगे। बाकायदा मुलायम को थैंक यू भी बोला। पर बौखलाहट और पैसे का जोर कहां चुप रहने देगा। सो अमर ने कुनबा-ए-मुलायम को यदुकुल कहा। मुलायम पर व्यंग्य कसने में कोर-कसर नहीं छोड़ी। अमरवाणी का दर्द-ए-निचोड़ यही। खून के रिश्ते के आगे दोस्ती हार गई। वर्कर नहीं, परिवार बड़ा हो गया। अब दोनों गुर्दे बदल गए। जख्मी सिपाही बन गया। तो योद्धा मुलायम पीछे मुड़कर जख्मी सिपाही को क्यों देखेंगे। अब अमर सिंह प्रासंगिक नहीं। सो सहानुभूति क्यों जताएंगे मुलायम। यानी अपनी हैसियत अमर को भी दिखने लगी। सो आखिर में अमर की जो टिप्पणी लिख रहा। उसे पढ़ हंसना मत। अमर ने कहा- 'अब मैं मुलायमवादी नहीं, समाजवादी बनूंगा।' आप सोचो, गर अमर जैसे लोग समाजवादी। तो पूंजीवादी और दलाली व्यवस्था के पहरुआ कौन? अमर ने सोशलिस्ट मोहन सिंह की पैसे से मदद की। तो सोचा, समाजवाद जेब में। तभी तो मोहन सिंह ने आलोचना क्या कर दी। अमर इलाज के लिए मोहन को दी मदद वापस मांगने लगे। कहा- पहले पैसे लौटाओ, फिर आलोचना करना। सो अमर का समाजवाद आप खुद ही देख लो।
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18/01/2010

Friday, January 15, 2010

कैलेंडर, फोटू और व्यथा राज्यमंत्री की

संतोष कुमार
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           नए साल में कैलेंडरों की धूम न हो। तो नया साल नया सा नहीं लगता। पर बात किंगफिशर के कैलेंडर की नहीं। जिसकी शूटिंग पर करोड़ों खर्च होते। बंटते महज सौ-एक कॉपी। वैसे भी आम आदमी के घर किंगफिशर के कैलेंडर सज भी नहीं सकते। लोगों को मिल जाए, तो शायद घर की शोभा बढ़ाने के बजाए जलाना पसंद करेंगे। यों कैलेंडर तो सिर्फ तारीख देखने के मकसद से। पर अपने विजय माल्या पता नहीं क्या-क्या दिखाना पसंद करते। यों 'रंगीन'  कैलेंडर का रंग अब राजनीति पर भी। फर्क सिर्फ इतना, विजय माल्या का अपना अंदाज। तो राजनीति में खुद को चमकाना और चापलूसी ही मकसद। अब आप खुद ही देख लीजिए। लोकसभा चुनाव में राहुल-सोनिया गांधी कांग्रेस का बीड़ा उठाए देश भर में घूम रहे थे। तो प्रियंका ने अमेठी-रायबरेली की कमान संभाली। सो अपना चौबीसों घंटों वाले भोंपू का एक कैमरा वहीं पहुंच गया। अब प्रियंका रोज-रोज नई बात तो कहेंगी नहीं। सो कभी साडिय़ों के रंग, तो कभी साडिय़ों का इंदिरा स्टाइल। बोलने-चलने का भी इंदिरा अंदाज कैमरों में खूब कैद हुआ। चैनलों पर खूब विशेष प्रोग्राम भी चले। सो एक कांग्रेसी भक्त ने बारह फोटू छांटे और नए साल का कैलेंडर बना दिया। यानी मेहनत, न दौड़-धूप, बैठे-ठाले दरबार में नंबर बढ़ाने की स्ट्रेटजी। अब नंबर कितना बढ़ा, यह तो बाद की बात। पर एक कैलेंडर ऐसा भी, जिससे सीनियर पर जूनियर खफा हो गया। यों डीएवीपी के जरिए सालाना सरकारी कैलेंडर बनता। बीते साल के अंत में ही सूचना प्रसारण मंत्री उसका विमोचन करते। अबके भी ऐसा हुआ। सरकारी कैलेंडर में मनरेगा के साथ-साथ स्वास्थ्य मिशन, शहरीकरण जैसी यूपीए की तमाम फ्लैगशिप योजनाएं फोटू सहित। यानी परंपरा के मुताबिक सरकारी कैलेंडर में सरकारी उपलब्धियों का खूब बखान। एक कैलेंडर संसद के पीठासीन अधिकारी के दफ्तर से सालाना जारी होता। एक साल राज्यसभा सचिवालय, तो दूसरे साल लोकसभा सचिवालय की ओर से। पर अबके सीपी जोशी ने अपने मंत्रालय का अलग कैलेंडर जारी कर दिया। यों पिछले साल के सरकारी कैलेंडर में बारहों महीने नरेगा को ही समर्पित थे। तो फोटुओं में मजदूरों का काम। यानी साइट फोटू ही छाए हुए थे। पर उस कैलेंडर में अपने सीपी जोशी की भूमिका नहीं थी। अलबत्ता जोशी वाला मंत्रालय तब आरजेडी के रघुवंश बाबू के जिम्मे था। सो कांग्रेस ने सिर्फ योजनाओं को जगह देने की सोची होगी। ताकि मंत्री का फोटू देख क्रेडिट लालू की पार्टी न ले जाए। पर अबके कांग्रेसी सीपी जोशी मंत्री। तो सब कुछ अपने 'हाथ'  में। सो मंत्रालय का कैलेंडर छपा। तो सोनिया-मनमोहन के साथ जोशी भी छा गए। पर असली चूक कैलेंडर के सितंबर महीने वाले पन्ने में हुई। जोशी ने राष्टï्रपति के साथ अपना और दो सहयोगी राज्यमंत्रियों के फोटू डलवाए। पर जोशी के साथ तीन राज्यमंत्री। सो तीसरे मंत्री शिशिर अधिकारी का गुस्सा सातवें आसमान पर। वैसे भी अधिकारी ममता दीदी के सिपहसालार। सो आव देखा न ताव, सीपी जोशी पर भड़क उठे। कैलेंडर में मंत्रियों की फोटू पर आपत्ति जताई। दलील दी, मंत्री के बजाए विकास योजना को कैलेंडर में जगह दी जानी चाहिए थी। अब सुनते हैं, विवाद आगे न बढ़े। सो भले जनवरी बीतने को। पर दूसरा कैलेंडर छपवाने की तैयारी। अब जरा सोचिए, कैलेंडर में शिशिर अधिकारी का भी फोटू होता। तो विकास योजना वाली दलील देते? पर फोटू नहीं, तो एतराज जताने के लिए जनता से ज्यादा बड़ी ढाल और क्या। अब देखना होगा कि नए कैलेंडर में विकास होगा या फोटू। पर अधिकारी की नाराजगी सिर्फ कैलेंडर नहीं। कैलेंडर तो तात्कालिक कारण बना। मौलिक कारण तो राज्य मंत्रियों के दिल में हमेशा रहता। केबिनेट मंत्री अपने जूनियर राज्य मंत्रियों को काम नहीं देते। सो एनडीए राज हो या मनमोहन की पहली-दूसरी पारी। राज्यमंत्री कुढ़ते ही रहे। पिछले टर्म में मनमोहन ने तो बाकायदा केबिनेट मंत्रियों को चि_ïी भी लिखी थी। पर नतीजा वही ढाक के तीन पात रहा। कुछ दिन पहले शिशिर अधिकारी और कुछ राज्य मंत्रियों ने प्रणव मुखर्जी से दुखड़ा भी रोया था। पर केबिनेट मंत्री शायद रसूख दिखाने के आदी हो चुके। एक जमाना था, जब 1980 के दशक में बंसीलाल रेलमंत्री थे। तो माधवराव सिंधिया एमओएस थे। उन ने साफ हिदायत दे रखी थी। मेरे पास आने वाली फाइलें सिंधिया की नजरों से होकर आएं। पर क्या आज के वक्त में कोई केबिनेट मंत्री ऐसी दरियादिली दिखाएगा? शिवराज पाटिल के गृह मंत्री रहते उनके जूनियर सिर्फ बयान मंत्री रह गए थे। मनमोहन की दूसरी पारी में श्रीकांत जेना राज्यमंत्री बनने को तैयार नहीं थे। वजह, जेना यूएफ सरकार में केबिनेट मंत्री रह चुके। एनडीए राज में हुकुम देव नारायण यादव कृषि राज्यमंत्री थे। पर कुछ समय कृषि मंत्री रहे नीतिश कुमार ने कुछ काम नहीं दिया। तो खफा होकर अपने सरकारी निवास 19 कुश्क रोड पर फावड़ा-कुदाल लेकर काम पर जुट गए। साथ में मीडिया भी बुला लिया। इजहार-ए-दर्द का यादवी नमूना और क्या होगा। कृषि राज्यमंत्री को मंत्रालय में काम नहीं। तो निवास पर ही खेती करने लगे।
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15/01/2010

Thursday, January 14, 2010

मकर संक्रांति पर लो अपनी भी खिचड़ी!

संतोष कुमार
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         सूर्य उत्तरायण हो गया। हरिद्वार में आस्था के महाकुंभ की शुरुआत भी हो गई। पर सूर्य का उत्तरायण होना सभी राजनीतिक दलों के लिए शुभ नहीं रहा। यूपी में मायावती विधानसभा के बाद विधान परिषद में भी झंडाबरदार। विधान परिषद के आखिरी तीन नतीजे भी माया के हक में गए। सो दोनों सदनों में मायाराज हो गया। पर सबकी किस्मत माया जैसी नहीं। यों कांग्रेस ने शुभ मौका देख संगठन चुनाव का एलान कर दिया। पहला शुभ एलान सोनिया गांधी के चुनाव का। ताकि सब शुभ-शुभ हो। तभी तो जो औपचारिकताएं 25 जुलाई को पूरी होनी। एलान मकर संक्रांति पर ही कर दिया। पर क्या एक नाम जप से जुलाई तक कोई संकट नहीं आएगा? संकट तो पहले दिन ही, जब पटना में जगदीश टाइटलर और अनिल शर्मा के खिलाफ दलित एक्ट में एफआईआर दर्ज हो गई। बिहार कांग्रेस कार्यकारिणी की लिस्ट गुरुवार को जारी हुई थी। तो सत्ता के नशे में चूर कांग्रेस ने स्पीकर मीरा कुमार को भी मेंबर बना दिया। सिर्फ मेंबरी ही नहीं, सबके नाम के आगे जाति भी लिख दी। पर टाइटलर अब लिस्ट को कांग्रेस का अंदरूनी दस्तावेज बता रहे। अब आप ही देखो, जात-पांत से ऊपर उठने की बात करने वाले राजनेता कितने ढोंगी। यानी हजारों साल क्यों न बीत जाएं, अगर राजनीति का यही ढर्रा रहा। तो न जाति प्रथा मिटेगी, न भेदभाव और ना ही जाति के नाम पर वोट बटोरने की परंपरा। अब भले कांग्रेसी सोनिया गांधी को इस फजीहत से बचाने में जुटे। पर राजनीति का चेहरा फिर बेनकाब तो हो ही गया। राहुल गांधी के दलित बस्तियों में ठहरने पर राजनीतिक सवाल उठने लगे। तो राहुल ने खुद सफाई दी थी- 'मैं जाति पूछकर किसी के घर नहीं जाता। मैं सिर्फ यह देखता हूं कि वह इनसान गरीब है।'  अब राहुल कांग्रेस को कितना बदल पाएंगे, यह तो भविष्य के गर्भ में। पर सूर्य का उत्तरायण बीजेपी के लिए कुछ अच्छा नहीं रहा। नितिन गडकरी खरमास में ही बीजेपी के अध्यक्ष बने। अभी कुल 26 दिन ही हुए। गडकरी को अपने ही बयान पर खंडन जारी करना पड़ गया। इतना ही नहीं, गुरुवार को जब हम-आप सूर्य ग्रहण के साये में होंगे। दिल्ली के जंतर-मंतर पर नितिन गडकरी के पुतले फूंके जा रहे होंगे। जानते हैं, पुतले फूंकने वाले कौन होंगे। कांग्रेस-सपा-बसपा-वामपंथी जैसी विरोधी पार्टियां नहीं। अलबत्ता बीजेपी की दिल-अजीज सबसे बड़ी सहयोगी पार्टी जेडीयू। दिल्ली की जेडीयू शाखा गडकरी के उस बयान से नाराज। जिसमें उन ने दिल्ली-मुंबई जैसे महानगरों के लिए बाहरी लोगों को 'समस्या'  बताया। पर गुरुवार को खंडन किया। तो बोले- 'मैंने बड़े शहरों की समस्या पर ईमानदार पहल की बात कही। भारत एक है। किसी को भी देश में कहीं भी आने-जाने-बसने का संवैधानिक हक।'  यों गडकरी दो दिन पहले ही कह रहे थे- 'मीडिया से दूर रहना ही पार्टी हित में। मीडिया लिखे, तो भला। ना लिखे, तो भला। मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता।'  अब गडकरी को क्यों फर्क पड़ा, जो खंडन जारी करने की नौबत आन पड़ी। गडकरी खुद महाराष्टï्र से। सो राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने के बाद क्षेत्रीयता के सवालों पर एहतियात बरतना चाहिए था। पता नहीं किस बात से आग भड़क उठे। राज ठाकरे-बाल ठाकरे-शीला-शिवराज-तेजेंद्र खन्ना की टिप्पणियां पहले भी आग बन चुकीं। राष्टï्रीय नेता को हर बात तोल-मोल कर बोलनी चाहिए। अब क्षेत्रीयता की बात चली। तो बाल ठाकरे का नया फरमान, आस्ट्रेलिया को अब महाराष्टï्र में मैच नहीं खेलने देंगे। पाकिस्तान से भी मैच न होने का आंदोलन किया था। तो शिवसेनिकों ने वानखेड़े स्टेडियम खोद डाला। यों ठाकरे की भावना से अपना भी इत्तिफाक। आखिर आस्ट्रेलिया में भारतीयों पर नस्ली हमले थमने का नाम नहीं। अपनी सरकार तो सिर्फ गाल बजा रही। पर सवाल बाल ठाकरे से। अगर आपको आस्ट्रेलिया में रहने वाले भारतीयों से इतनी सहानुभूति। तो भारत में ही हिंदी भाषियों से इतनी नफरत क्यों? आप तो अपने देश में ही अपने लोगों को पीट या पिटवा रहे। क्या आप और आपके भतीजे की ओर से उत्तर भारतीयों पर यह नस्ली हमला नहीं? ठाकरे साहब, हिंदी भाषियों पर हमला कर आपके परिवार ने देश की एकता खोद डाली। अब शुभ-अशुभ की बात चली। तो बेचारगी के दौर से गुजर रही सपा क्यों छूटे। सूर्य ने दिशा बदली। तो अमर सिंह भी दुबई से मुंबई आ गए। पर सपा की कहानी विचित्र मोड़ पर आ गई। अब अमर ने मुलायम को एक-दूसरे का राजदार बताया। तो राजनीतिक हलकों में सीडी का बाजार गर्म हो गया। यानी अमर शुद्ध रूपेण ब्लैक मेलिंग पर उतर आए। अब अमर हमाम में कैसे, यह तो सबको मालूम। पर अमर ने ठान ली, मुलायम को भी नहीं छोड़ेंगे। यों राजनीति में सीडी का बड़ा महत्व। बुढ़ापे में एनडी तिवारी शिकार हुए। बीजेपी में संजय जोशी के अपने ही दुश्मन थे। तो मुंबई से ही दिसंबर 2005 में सैक्स सीडी जारी हुई। एक बार बिहार निवास में कुछेक सांसदों की रंगीन सीडी भी खूब चलीं। हरियाणा के पिछले चुनाव के वक्त भजनलाल की अश£ील सीडी ने खेल बिगाड़ दिया था। अमर सिंह का फोन टेपिंग कांड अभी भी सुप्रीम कोर्ट में लंबित। तब अमर और अंबिका सोनी में जैसी तकरार हुई, लिखना भी मुनासिब नहीं। सो राजनीति मा सीडी की बड़ी आग है। अब मौका मकर संक्रांति का। तो बेहतर यही, क्यों न सभी नेता कुंभ हो आएं।
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14/01/2010

Wednesday, January 13, 2010

सुबह कीमत घटाने, तो शाम को बढ़ाने पर चर्चा

'राही मनवा दुख की चिंता क्यों सताती है। दुख तो अपना साथी है। सुख है एक छांव ढलती, आती है, जाती है...।'  आम आदमी के लिए अपनी सरकार का यही संदेश। मंगलवार को टली केबिनेट कमेटी ऑन प्राइस (सीसीपी) की मीटिंग बुधवार को हो गई। पर नतीजा दोस्ती फिल्म के गीत जैसा ही। वैसे भी सरकार और आम आदमी के बीच दोस्ती हो। तो चुनावी साल से पहले राहत की उम्मीद ही बेमानी। सो सीसीपी की मीटिंग हुई। तो ऐसा कोई चौंकाऊ फैसला नहीं। जो महंगाई पर हमला बोल सके। अलबत्ता पुराने फैसले रिन्यू हो गए। अब सफेद हाथी बनी चीनी को बिना ड्यूटी आयात करने की छूट। कच्ची चीनी के आयात को पहले ही दिसंबर 2010 तक छूट मिली हुई। खुले बाजार में और भी गेहूं-चावल उतरेंगे। सब्सिडी वाले खाद्य तेलों के वितरण की समय सीमा बढ़कर 31 अक्टूबर 2010 तक। दालों पर दस रुपए की सब्सिडी पुरजोर ढंग से लागू होगी। सीसीपी में कुल 11 बिंदु तय हुए। फिर भी महंगाई की तेरहवीं के आसार नहीं। यूपी की सीएम मायावती ने कच्ची चीनी की प्रोसेसिंग पर रोक लगा रखी। सीसीपी के फैसलों में एक बिंदु यूपी सरकार के लिए भी। पर माया यों ही मान जाएं। तो फिर काहे की माया। सो अब पीएम मनमोहन सिंह सभी चीफ मिनिस्टर की मीटिंग लेंगे। सरकारी प्रेस नोट में तारीख का खुलासा नहीं। यों गणतंत्र दिवस का जश्र मनाकर अगली सुबह शायद मीटिंग हो। पर लानत-मलानत हुई। तो अब 'ज्योतिषी'  शरद पवार का अंदाज भी बदल गया। अब पवार ने खम ठोककर महंगाई को ललकारा। बोले- 'चार से आठ दिन में रोजमर्रा की वस्तुओं की और दस दिन में चीनी की कीमतों पर काबू पा लेंगे।'  पर जरा सोचिए, कैसे काबू में करेंगे महंगाई को मनमोहन और पवार? कहीं वही फार्मूला तो नहीं, जो कल आपको बताया। पहले कीमतें बढ़ा दो। फिर सेल लगाकर तीस फीसदी छूट का ऑफर। यानी गुरुवार को चीनी की कीमत 48 रुपए किलो। तो शायद दस दिन बाद 44 रुपए हो जाए। भले आपको राहत मिले, न मिले। सरकार के लिए तो बड़ी राहत की बात। सो आप 14-16 रुपए किलो वाली चीनी का जमाना गुड़ी-गुड़ी सपने की तरह भुला दें, तो ही आपकी सांस नहीं उखड़ेगी। सो पेट की आग के साथ-साथ सेहत की भी चिंता रखें। पर महंगाई की आदत अभी भी नहीं पड़ी। तो कुछ आसान नुस्खे अपनाइए। शुरुआत में थोड़े पैसे खर्च करिए। एक फर्जी मेडिकल रपट बना खुद को डायबिटिक दिखा दें। गृहणी खुद-ब-खुद चीनी में कटौती कर देंगी। एक लीटर दूध में दो लीटर पानी मिलाएं। दाल-सब्जी रसेदार (रस ट्रांसपेरेंट दिखे) हों। दिल्ली में घर है, तो ठंड के महीने में नहाना बंद कर दें। पानी की बचत तो होगी ही, कांग्रेसी सीएम शीला की बढ़ाई कीमत का बोझ भी कम पड़ेगा। अगर कोई पवार जैसे वजनदार हैं। तो जिम जाने के बजाए कम भोजन करें। यही है अपनी सरकार का महंगाई भगाओ मूल मंत्र। अपने लालबहादुर शास्त्री ने देश की शान की खातिर हफ्ते में एक दिन उपवास की अपील की थी। तो देश की जनता ने शास्त्री जी को सर-आंखों पर बिठाया था। पर मनमोहन राज में कहीं ऐसा न हो, हफ्ते में एक दिन भोजन करने की अपील जारी हो जाए। वैसे भी जनता को महंगाई में जीने में मजा आने लगा। कांग्रेस भी यही समझा रही, अगर महंगाई होती, तो हम चुनाव कैसे जीतते। पर अंदरखाने कांग्रेस को इल्म हो चुका। बिल्ली के भाग्य से हर बार छींका नहीं टूटता। पर महंगाई थामने को भी कोई उपाय नहीं सूझ रहा। सो सीसीपी में तय हो गया- आओ मीटिंग-मीटिंग खेलें। पर सनद रहे, सो बताते जाएं। मंगलवार को सीसीपी की मीटिंग टलने की वजह थी सरकार में एकराय न होना। सो बुधवार को मीटिंग हुई। तो सरकार का एक सुर सामने आया- आओ आम आदमी को मूर्ख बनाएं। सो महंगाई पर अर्थशास्त्री मनमोहन का चेहरा फिर सामने रखा। पर पीएम खुद कूदे, तो भी कोई बड़ा फैसला नहीं हुआ। सो सीएम की मीटिंग में क्या होगा। वही राज्य केंद्र पर और केंद्र राज्य पर ठीकरा फोड़ेगा। जमाखोरों पर कार्रवाई की मांग होगी। पर सवाल वही, मियां अब तक कहां आराम फरमा रहे थे। यों मीटिंग-मीटिंग का खेल भी रिन्यू हो रहा। पिछले टर्म में मनमोहन ने 21 फरवरी 2007 को सभी सीएम को चि_ïी लिखी। तो पिछले एक साल में पीएमओ की ओर से उठाए गए कदमों का जिक्र कर सहयोग मांगा। फिर 17 सितंबर 2008 को गवर्नरों की मीटिंग में भी पीएम ने चिंता जताई। पर महंगाई कम तो नहीं हुई, मनमोहन दुबारा पीएम जरूर बन गए। सो दूसरे टर्म में भी पुराना नुस्खा अपना रहे। पर काठ की हांडी बार-बार नहीं चढ़ती। पिछले टर्म में भी महंगाई रोकने को कभी ब्याज दर बढ़ाई। तो कभी पेट्रोल-डीजल के दाम। पर आम आदमी बोझ से दबता ही चला गया। अब दूसरे टर्म का दिलचस्प पहलू देखिए। सुबह सीसीपी की मीटिंग में कीमतें घटाने पर चर्चा हुई। तो देर शाम पीएमओ में पेट्रोल-डीजल की कीमतें बढ़ाने की। महंगाई घटाने का 'मनमोहिनी अर्थशास्त्र'  भी बहुत खूब। पेट्रोलियम मंत्री मुरली देवड़ा की दलील, तेल कंपनियों पर सब्सिडी का बोझ बढ़ रहा। सो पेट्रोल की कीमतें बढऩी चाहिए। कीमतों का फैसला भी कंपनियों पर छोडऩे की दलील दे रहे देवड़ा। वैसे सही भी, सरकारी कंपनी बोझ क्यों उठाए। बोझ उठाने का काम तो आम आदमी का। सरकारी कंपनी वालों को मोटी सेलरी-सुविधा भी दो। कंपनियों का खुला खेल फर्रुखाबादी भी करने दो। ----------
13/01/2010

Tuesday, January 12, 2010

तो गलत फिल्म के गाने से ही सुलझ गया बीजेपी का झगड़ा

इंडिया गेट से
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तो गलत फिल्म के गाने से ही
सुलझ गया बीजेपी का झगड़ा
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 संतोष कुमार
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            अलटा मार पलटा, शरद पवार पलट गए। केबिनेट कमेटी ऑन प्राइस की मीटिंग भी बुधवार के लिए टल गई। वैसे भी महंगाई रुकने वाली नहीं। सो मीटिंग आज हो या कल। मनमोहन को क्या फर्क पड़ता। चीनी रात भर में 44 से 48 रुपए किलो क्यों न हो जाए। मार्केटिंग का तो फंडा भी ऐसा ही। कीमतें बढ़ाकर सेल लगा दो। फिर 30-40 फीसदी छूट दे दो। शायद मनमोहन सरकार भी इसी फार्मूले की फिराक में। बढ़ी कीमतों में से दो-चार रुपए कम करा देंगे। फिर कांग्रेसी ढोल-नगाड़े ले 24 अकबर रोड पर धप-धप बजाएंगे। यही कांग्रेसी कल्चर बन चुकी। पर कल्चर के मामले में तो बीजेपी की सानी ही नहीं। अब नितिन गडकरी के हाथ कमान। सो गडकरी रोज नए फंडे गढ़ रहे। अब मंगलवार को रीजनल मीडिया के कुछ पत्रकारों से मिले। तो कई चौंकाने वाली बातें सामने आईं। यानी बिना फंड के फंडे चाहिए। तो गडकरी से मिलिए। महाराष्टï्र की राजनीति से मिले अनुभव के बेस पर ही बीजेपी जैसी राष्ट्रीय पार्टी चलाने की सोच रहे। सो पहले तो अपने धंधे गिनाए। राजनीति का समाजकरण और राष्टï्रकरण फार्मूला बताया। फिर बीजेपी का भावी एजंडा। गडकरी बीजेपी को फिर राजनीतिक शिखर पर लाने की संघ योजना से आए। सो बोले- 'बीजेपी के वोट बैंक में और दस फीसदी का इजाफा करना ही मेरा लक्ष्य।'  सो बीजेपी का नया फंडा, अपना कामगार संगठन होगा। अब तक भारतीय मजदूर संघ ही बीजेपी का श्रमिक संगठन रहा। पर अब बीजेपी को खुद के श्रमिक संगठन की कमी महसूस हो रही। सो नितिन गडकरी ने वामपंथी राह पर चलने की योजना बना ली। भले अपने गढ़ में वामपंथी खुद हांफ रहे। पर बीजेपी को वामपंथी राह ही तारणहार नजर आ रही। गडकरी की दलील, कांग्रेस की इंटक जैसी संस्था बीजेपी के पास नहीं। सो अब एससी-एसटी, महिलाओं और असंगठित कामगारों के लिए अपना संगठन बनाएगी। ताकि शहरों में खत्म हो रहे जनाधार को बढ़ा सके। यों सनद रहे, सो बता दें। जब 2004 में बीजेपी सत्ता से बाहर हुई। फिर एक बार दिल्ली में वर्किंग कमेटी हुई। तो अटल बिहारी वाजपेयी ने पार्लियामेंट एनेक्सी में नेताओं को मंत्र दिया था। कैसे वर्करों का दिल जीता जाए। सीखना हो, तो सीपीएम के गढ़ बंगाल जाओ। तब राजस्थान में वसुंधरा राजे सीएम थीं। उन ने तो फौरन दो सरकारी नुमाइंदे एसएन गुप्त और ओम बिड़ला कोलकाता भेज दिए। भले 2008 के चुनाव में बीजेपी हार गई। अब एक और चौंकाने वाली बात। खुद नितिन गडकरी सीपीआई महासचिव एबी वर्धन के अंडर में लेबरों की यूनियनबाजी कर चुके। एक बार तो गडकरी कांग्रेस के श्रमिक संगठन इंटक के अध्यक्ष भी चुन लिए गए थे। यह खुलासा कोई अपनी ओर से नहीं। खुद गडकरी ने ही किया। भारतीय मजदूर संघ वाले दत्तोपंत ठेंगड़ी भी वर्धन की एटक में काम कर चुके। सो गडकरी फार्मूला संघ की ही देन। पर गडकरी की मानें, तो संघ कभी बीजेपी में सीधे दखल नहीं देता। चलो, सीधे न सही, पीछे से ही। पर दखल देता है, ऐसा तो मान ही लिया। गडकरी ने बीजेपी के कांग्रेसीकरण से इनकार किया। पर यहां भी कबूला, अभी भी कई मायनों में पार्टी विद डिफरेंस। यानी कहीं न कहीं थोड़ी-बहुत गिरावट तो मान ली। अब गडकरी बीजेपी को राजनीतिक कम, सामाजिक-आर्थिक संगठन की तरह ज्यादा चलाना चाह रहे। सो विपक्ष की जगह विजिलेंस शब्द की मांग कर दी। अब जहां-जहां राज्यों में पार्टी विपक्ष की भूमिका में। वहां के नेताओं की मीटिंग लेंगे। ताकि बेहतर विपक्ष की भूमिका निभा सकें। उन ने तेलंगाना पर सरकार को कोसा। तो विदर्भ पर शिवसेना से इतर भुवनेश्वर वर्किंग कमेटी का प्रस्ताव दोहरा दिया। अब इंदौर में वर्किंग कमेटी होगी। तो नेताओं को टेंट में ही रहना होगा। होटल का खर्चा बीजेपी नहीं उठाएगी। भले टेंट का खर्चा होटल से ज्यादा क्यों न हो। पर यही नहीं, अब पदाधिकारियों पर भी नकेल होगी। जैसे संघ के पदाधिकारी ज्यादातर प्रवास में ही वक्त गुजारते। बीजेपी पर भी वही फार्मूला लागू होगा। सो गडकरी ने कह दिया- 'दिल्ली-मुंबई में बैठकर काम नहीं होगा। पदाधिकारियों को गांव-गांव प्रवास करना होगा। मैंने स्टेट थीम बना ली है।'  पर सवाल बीजेपी के कुछ संकटों पर हुए। तो गडकरी ने राजस्थान, पंजाब का उदाहरण दिया। बोले- 'आज सुबह राजस्थान से मुझे फोन आया। आप लोग तो छापते ही नहीं। अब राजस्थान में समूची बीजेपी एकजुटता से पंचायत चुनाव में जुटी हुई।'  पर राजस्थान का झगड़ा सुलझाने का फार्मूला पूछा। तो गदगद होकर बोले- 'मैंने सबको नया दौर का गाना सुनाया। आपको भी सुनाता हूं।... छोड़ो कल की बातें। कल की बात पुरानी...।'  पिछले पखवाड़े भर में सभी वरिष्ठï नेताओं के सहयोग और राजस्थान सुलझाने की खुशी चेहरे पर दिखी। पर जरा एक दिलचस्प पहलू देखिए। वसुंधरा गुट हो या चतुर्वेदी खेमा। नितिन गडकरी के गलत फिल्मी गाने से ही सारा झगड़ा-झंझट भूल गए। यों छोड़ो कल की बातें... गाना फिल्म नया दौर का नहीं। अलबत्ता फिल्म 'हम हिंदुस्तानी'  का गाना। पर शायद गडकरी नए अध्यक्ष। सो राजस्थान के भाजपाइयों को इशारा, अब नया दौर आ गया। गडकरी गलत फिल्म का नाम 20-22 दिनों से सुना रहे। पर देखिए, फिल्मों के शौकीन आडवाणी भी गलती सुधारने में मदद नहीं कर रहे।
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12/01/2010