संतोष कुमार
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अपने सरकारी स्कूल में रोजाना प्रार्थना के बाद एक प्रतिज्ञा ली जाती थी। सभी छात्र-छात्राएं दांया हाथ आगे कर कहते थे- 'भारत हमारा देश है। हम सब भारतवासी भाई-बहन हैं...।' पर क्या अब प्रतिज्ञा बदलनी होगी। जो महाराष्टï्र के हैं, वो सिर्फ महाराष्टï्र को ही देश बताएंगे। और जो बाहर के हैं, क्या यह कहेंगे- 'महाराष्टï्र को छोड़कर बाकी हम सब भारतवासी हैं?' अगर राजनीति के धुरंधर यों ही जुबान चलाते रहे। तो शायद वह दिन भी दूर नहीं हो। जब राज ठाकरे के गुर्गों ने 2008 में तांडव मचाया। तो बीजेपी हो या कांग्रेस, सिर्फ आलोचना कर चुप रहीं। जेहन में तब महाराष्टï्र चुनाव थे। अब बिहार चुनाव की बारी। तो बिहारियों के हितैशी बनने में कोई पीछे नहीं। अब बीजेपी को शिवसेना से रिश्ते तोडऩे में भी शायद गुरेज न हो। विनय कटियार ने तो नितिन गडकरी की बीजेपी को नसीहत दे दी। शिवसेना से रिश्तों की समीक्षा पर जोर दिया। पर बीजेपी अभी तेल की धार देखना चाह रही। सो मंगलवार को बीजेपी ने कटियार की राय को निजी बता पल्ला झाड़ लिया। पर टेक्सी परमिट से शुरू विवाद अब वाया संघ गडकरी तक। गडकरी से कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी तक। सो शिवसेना को तो मानो संजीवनी मिल गई। कहां राज ठाकरे ने मिट्टïी पलीद करने का बीड़ा उठा लिया था। अब मराठी मानुष की लड़ाई में शिवसेना राज से बढ़त ले रही। पर चचा-भतीजे में गुरु-चेले वाली कहावत। सो चचा मराठी भाषा की बात कर रहे। तो भतीजे ने अब महाराष्टï्र में पैदा होने वाले मराठियों का नारा उछाल दिया। पर चचा-भतीजे की फुफकार को आप जाने दो। अब तो कोई शक-शुबहा नहीं। ठाकरे बंधुओं को देश की नहीं, अपनी सियासत की फिक्र। सो चंद गुंडों के सहारे तोड़-फोड़ की राजनीति पर उतारू। अब ऐसे लोगों को तरजीह देना ही बेकार। सो सवाल तो सत्ता में बैठे क्षत्रपों से पूछा जाना चाहिए। राहुल गांधी बिहार की टोह लेने पहुंचे। तो कहीं बिहारियों का दर्द समझ आया। सोमवार को मिथिला यूनिवर्सिटी में राहुल का करिश्मा नहीं चला। अलबत्ता आग-बबूला छात्रों ने सवालों की बौछार की। तो राहुल की बोलती बंद हो गई। वाकई सवाल चुभने वाले थे। अव्वल ऐसे सवाल तो हर क्षेत्र में नेताओं से पूछे जाने चाहिए। एक छात्र ने पूछा- 'जब केंद्र में आपकी सरकार, महाराष्टï्र में आपकी सरकार। तो तब आपने आवाज क्यों नहीं उठाई, जब मुंबई में बिहारियों को मारा जा रहा था।' सवाल में दम ही नहीं, विस्फोटक सवाल भी। देश में पीएम कांग्रेस का, महाराष्टï्र में सीएम कांग्रेस का। यानी पीएम-सीएम और डीएम अपनी हुकूमत का। तो कांग्रेस ने तब एकशन क्यों नहीं लिया। अगर तब घाव पर मरहम लग जाता। दोषियों को सजा मिलती। तो शायद भाषाई हुड़दंग आज नासूर नहीं बनता। पर छात्रों के सवालों के आगे निरुत्तर राहुल बिहार के गया पहुंचे। तो उन ने शिवसेना और राज ठाकरे के खिलाफ आवाज बुलंद की। याद दिलाया, 26/11 के हमले में मुंबई को बचाने वाले एनएसजी जवानों में बिहार, यूपी के थे। तब ठाकरे बंधुओं ने क्यों नहीं कहा, इन जवानों में से पहले बिहारी-यूपी वालों को हटाओ। सो राहुल की बात शिवसेना को चुभ गई। तड़के फिर जुबान चलाई। तो कहा- 'राहुल मराठी शहीदों का अपमान कर रहे।' माना, करकरे, काम्टे, सालस्कर जैसे जांबाज आफीसर ने शहादत दी। पर मुंबई की बाकी पुलिस क्या कर रही थी। बेहतर होगा, ठाकरे बंधु राम प्रधान कमेटी की रपट पढ़ लें। अब राहुल गांधी कह रहे, उत्तर भारतीयों के लिए चुप नहीं बैठेंगे। देश का दुर्भाग्य नहीं, तो और क्या। जब राहुल गांधी तक को बार-बार सफाई देनी पड़ रही। भारत हर भारतीय का। अक्टूबर में बिहार विधानसभा चुनाव होने। सो राहुल महाराष्टï्र, पंजाब, हरियाणा जैसे राज्यों की मजबूती के पीछे बिहारियों की भूमिका खुलकर बखान कर रहे। पर जब 27 अक्टूबर 2008 को राज ठाकरे की नफरत से खफा बिहार का एक छात्र राहुल राज मुंबई की बस में घुसकर राज का पता पूछ रहा था। मुंबई की पुलिस ने उस राहुल राज के ऊपर इतनी गोलियां बरसाईं। गिनना मुश्किल हो गया। पर तब होम मिनिस्टर आर.आर. पाटिल ने पुलिस कार्रवाई को जायज ठहराया। क्या कभी ऐसी फौरी कार्रवाई नफरत फैलाने वाले ठाकरे बंधुओं पर हुई? राज ठाकरे कभी गिरफ्तार हुए, तो पुलिस याचक की मुद्रा में दिखी। गिरफ्तारी के वक्त में भी राज के हाथों में सिगरेट होती थी। अब आप ही सोचो, बिहार चुनाव न होते। तो क्या राहुल गांधी के ज्ञान चक्षु यों ही बंद पड़े रहते। राज ठाकरे ने भाषाई हुड़दंग किया। तो कांग्रेस के विलासराव देशमुख से अशोक चव्हाण तक सबने सियासत के ओछे खेल में साथ निभाया। पर अब भी ठाकरे बंधुओं की जुबान जहर उगल रही। कोई जुबां बंद कराने का साहस नहीं दिखा रहा। शायद बिहार चुनाव तक जुबान के सहारे ही मामला खिंचेगा। फिर चुनाव बाद सब ठंडा। यही तो हुआ महाराष्टï्र चुनाव से पहले। हिंदी भाषियों पर हमले हुए। तो लोकसभा से जेडीयू के सांसदों ने इस्तीफा दे दिया। पर बीजेपी तब शिवसेना के डर से दुबकी रही। वही हाल कांग्रेस का। अगर तभी राज ठाकरे की नकेल कस दी होती। तो आज ऐसी नौबत न आती। अब राहुल चुप न बैठने की बात कर रहे। पर कब तक? क्या जब कांग्रेस विपक्ष में आएगी, तब शिवसेना को माकूल जवाब देंगे? पर राजनीति में नई शुरुआत का जोखिम कोई नहीं उठाना चाहता। चाहे युवा गडकरी-राहुल हों या बुजुर्ग मनमोहन-आडवाणी।
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02/02/2010
Tuesday, February 2, 2010
Monday, February 1, 2010
चोर-चोर मौसेरे भाई नहीं, सब गोलमाल है
संतोष कुमार
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महाराष्टï्र पर महासंग्राम होने लगा। शाहरुख खान-आमिर खान से आगे बढ़ जंग अब संघ बनाम शिवसेना हो गई। संघ प्रमुख मोहन भागवत ने हिंदी भाषियों की रक्षा का एलान क्या किया। मुंबई की अपनी मांद में बैठा शेर दहाड़ उठा। बीजेपी से 26 साल की दोस्ती का कोई लिहाज नहीं। अब तक शिवसेना का बूढ़ा शेर मुखपत्र 'सामना' के जरिए दहाड़ रहा था। पर संघ परिवार से लड़ाई ठनी। तो उद्धव ठाकरे ने मोर्चा संभाला। संघ को खरी-खरी सुनाने में देर नहीं की। कहा- 'हमें देशभक्ति और एकता का पाठ न पढ़ाए संघ। जब 1992 में हिंदू-मुस्लिम दंगे हुए, तो हमने हिंदुओं की रक्षा की। तब कहां था संघ परिवार। अगर हिंदी की चिंता है, तो संघ प्रवक्ता राम माधव दक्षिण भारत में जाकर हिंदी सिखाएं।' अब बीजेपी की मुश्किल तो लाजिमी थी। आगे कुआं, तो पीछे खाई। पर नितिन गडकरी संघ के दुलारे। संघ ने बीजेपी ठीक-ठाक करने का जिम्मा सौंपा। सो बीजेपी को संघ के पक्ष में उतरना ही था। वैसे भी बीजेपी वाले संघ को मातृ संगठन मानते। सो मातृ अपमान भला बीजेपी कैसे बर्दाश्त करे। पर गडकरी ठहरे महाराष्टï्र से। सो बयान में वैसी तल्खी नहीं, जैसी उद्धव के बयान में। गडकरी ने 13 लाइन का बयान मीडिया के सामने पढ़ दिया। सो कइयों ने चुटकी ली। नागपुर से जो लिखकर आया, वही पढ़ दिया। वैसे भी कोई अपना बयान बेसुरे ढंग से क्यों पढ़ेगा। अब देखो, बीजेपी कहां आ गई। एक जमाना था, जब सोनिया गांधी लोकसभा में लिखा भाषण पढ़ती थीं। तो बीजेपी वाले कभी मणिशंकर, तो कभी जनार्दन का लिखा भाषण बता खिल्ली उड़ाते थे। पर अब गडकरी संविधान और राष्ट्रीय अस्मिता से जुड़े मुद्दे पर भी लिखित बयान पढ़े। तो आप क्या कहेंगे, अपना बयान या वाकई नागपुर से लिखकर आया? अब बयान अपना हो या नागपुर का। पर राष्ट्रीयता के मुद्दे पर जैसी बुलंद आवाज विपक्ष की होनी चाहिए, बीजेपी की नहीं थी। पूरे बयान में गडकरी ने न तो शिवसेना का नाम लिया। न किसी कार्रवाई की मांग की। अलबत्ता जनसंघ जमाने का सिद्धांत उड़ेल दिया। जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद 370 को राष्टï्रीय एकता में रोड़ा का अपना पुराना राग अलापा। पर क्या वाकई गडकरी की बीजेपी जनसंघ जमाने की? तब श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने पंडित नेहरू की पहली केबिनेट को छोड़ परमिट सिस्टम के खिलाफ जंग छेड़ी थी। आखिरकार जेल में ही शहीद हो गए। पर अबके बीजेपी में वह बात नहीं दिखी। अलबत्ता संविधान के अनुच्छेद 19 (1-ई) का जिक्र किया। देश के किसी भाग में बसने का अधिकार। भाषा, क्षेत्र या धर्म के आधार पर संघर्ष को बीजेपी स्वीकार नहीं करेगी। पर शिवसेना तो ठीक इसके उलट बात कर रही। वह सिर्फ कह नहीं रही। अलबत्ता शिवसेना और चचा को छोड़कर अलग हुए भतीजे राज ठाकरे की भी कारस्तानी देश देख चुका। सो बीजेपी शिवसेना के खिलाफ सख्त क्यों नहीं हो रही? पर शायद असली कहानी कुछ और। शिवसेना लाख जतन कर तीसरी बार भी महाराष्टï्र की कुर्सी हासिल नहीं कर पाई। शिवसेना की बौखलाहट तो नतीजों के बाद सबने देखी। जब बाल ठाकरे ने लिखा- 'मराठी मानुष ने खंजर घोंपा।' पर बदले जमाने में वोटर कट्टïरवाद की हांडी उतार चुका। फिर भी ठाकरे जुगाड़ ढूंढ रहे। उन्माद पैदा कर सत्ता तक पहुंचने की कोशिश। पर चुनाव तो कोसों दूर। सो बीजेपी-संघ परिवार बनाम शिवसेना की तनातनी एकता कपूर के सास भी कभी बहू थी धारावाहिक जैसी। सो पहले शिवसेना को देखिए। हालत खस्ता हो चुकी। बाल ठाकरे जीते जी बेटे उद्धव को सीएम बनाने का मंसूबा पाले बैठे थे। पर खुद के भतीजे ने गुड़-गोबर कर दिया। यही हाल संघ का। जबसे संघ के भेजे प्रचारक बीजेपी में राजनीति के चस्सू हो गए। संघ की बत्ती गुल होने लगी। देश भर में शाखाएं चौपट होने लगीं। रही-सही कसर सुदर्शन-भागवत के मीडिया प्रेम ने पूरी कर दी। सो जैसे शिवसेना मराठी मानुष के नाम से अपनी जमीन उपजाऊ बनाने में लगी। संघ परिवार हिंदी, हिंदू, हिंदुस्थान के बहाने शाखाओं की पैदावार बढ़ाने की जुगत में। बीजेपी में भी सब अच्छा नहीं। सो गडकरी ने मराठी-हिंदी विवाद के बहाने अनुच्छेद 370 का मामला उछाल दिया। पूरे खेल में बची कांग्रेस। तो उसका हाल, चित भी मेरी, पट भी मेरी...। मराठी वोट में सेंध लगाने को कभी राज को शह दी। तो कभी उत्तर भारतीयों के जख्म पर मरहम लगाने की कोशिश। यानी वोट बंटे, कांग्रेस को सत्ता मिली। अब ठाकरे-संघ में ठनी। तो होम मिनिस्टर पी. चिदंबरम ने भी खूंटा गाड़ दिया। बोले- 'मुंबई सबकी। कोई भी जाए और बसे।' चिदंबरम ने ऑस्ट्रेलिया, पाक के खिलाडिय़ों को मुंबई में क्रिकेट खेलने पर सुरक्षा की पूरी गारंटी ली। अब आप ही इन गोलमाल नेताओं का मतलब निकालिए। भाषाई विवाद में राजनीति के ये सभी धुरंधर सिर्फ चोर-चोर मौसेरे भाई नहीं, सगे भाई कहिए। यानी इस विवाद में सब गोलमाल है। कहने को कांग्रेस-बीजेपी संविधान की दलील दे रहीं। पर जरा सोचिए, राज ठाकरे हों या बाल ठाकरे। अगर कोई संविधान-कानून को खुली चुनौती दे। और विपक्ष-सत्तापक्ष सिर्फ जुबानी पलटवार करे। तो क्या कहेंगे आप। अगर सब गोलमाल न होता। तो महाराष्टï्र चुनाव से पहले जब राज ठाकरे के गुंडे उत्तर भारतीयों को सड़कों पर दौड़ा-दौड़ा कर मार रहे थे। तब चिदंबरम कहां थे। कांग्रेस कहां थी। बीजेपी के गडकरी कहां थे। तब तो गडकरी महाराष्टï्र बीजेपी के अध्यक्ष थे। वैसे भी शिवसेना बीजेपी-शिवसेना के बीच कोई पहली बार तलवार नहीं खिंची। राष्ट्रपति चुनाव में तकरार, फिर इकरार सबने देखी।
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01/02/2010
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महाराष्टï्र पर महासंग्राम होने लगा। शाहरुख खान-आमिर खान से आगे बढ़ जंग अब संघ बनाम शिवसेना हो गई। संघ प्रमुख मोहन भागवत ने हिंदी भाषियों की रक्षा का एलान क्या किया। मुंबई की अपनी मांद में बैठा शेर दहाड़ उठा। बीजेपी से 26 साल की दोस्ती का कोई लिहाज नहीं। अब तक शिवसेना का बूढ़ा शेर मुखपत्र 'सामना' के जरिए दहाड़ रहा था। पर संघ परिवार से लड़ाई ठनी। तो उद्धव ठाकरे ने मोर्चा संभाला। संघ को खरी-खरी सुनाने में देर नहीं की। कहा- 'हमें देशभक्ति और एकता का पाठ न पढ़ाए संघ। जब 1992 में हिंदू-मुस्लिम दंगे हुए, तो हमने हिंदुओं की रक्षा की। तब कहां था संघ परिवार। अगर हिंदी की चिंता है, तो संघ प्रवक्ता राम माधव दक्षिण भारत में जाकर हिंदी सिखाएं।' अब बीजेपी की मुश्किल तो लाजिमी थी। आगे कुआं, तो पीछे खाई। पर नितिन गडकरी संघ के दुलारे। संघ ने बीजेपी ठीक-ठाक करने का जिम्मा सौंपा। सो बीजेपी को संघ के पक्ष में उतरना ही था। वैसे भी बीजेपी वाले संघ को मातृ संगठन मानते। सो मातृ अपमान भला बीजेपी कैसे बर्दाश्त करे। पर गडकरी ठहरे महाराष्टï्र से। सो बयान में वैसी तल्खी नहीं, जैसी उद्धव के बयान में। गडकरी ने 13 लाइन का बयान मीडिया के सामने पढ़ दिया। सो कइयों ने चुटकी ली। नागपुर से जो लिखकर आया, वही पढ़ दिया। वैसे भी कोई अपना बयान बेसुरे ढंग से क्यों पढ़ेगा। अब देखो, बीजेपी कहां आ गई। एक जमाना था, जब सोनिया गांधी लोकसभा में लिखा भाषण पढ़ती थीं। तो बीजेपी वाले कभी मणिशंकर, तो कभी जनार्दन का लिखा भाषण बता खिल्ली उड़ाते थे। पर अब गडकरी संविधान और राष्ट्रीय अस्मिता से जुड़े मुद्दे पर भी लिखित बयान पढ़े। तो आप क्या कहेंगे, अपना बयान या वाकई नागपुर से लिखकर आया? अब बयान अपना हो या नागपुर का। पर राष्ट्रीयता के मुद्दे पर जैसी बुलंद आवाज विपक्ष की होनी चाहिए, बीजेपी की नहीं थी। पूरे बयान में गडकरी ने न तो शिवसेना का नाम लिया। न किसी कार्रवाई की मांग की। अलबत्ता जनसंघ जमाने का सिद्धांत उड़ेल दिया। जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद 370 को राष्टï्रीय एकता में रोड़ा का अपना पुराना राग अलापा। पर क्या वाकई गडकरी की बीजेपी जनसंघ जमाने की? तब श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने पंडित नेहरू की पहली केबिनेट को छोड़ परमिट सिस्टम के खिलाफ जंग छेड़ी थी। आखिरकार जेल में ही शहीद हो गए। पर अबके बीजेपी में वह बात नहीं दिखी। अलबत्ता संविधान के अनुच्छेद 19 (1-ई) का जिक्र किया। देश के किसी भाग में बसने का अधिकार। भाषा, क्षेत्र या धर्म के आधार पर संघर्ष को बीजेपी स्वीकार नहीं करेगी। पर शिवसेना तो ठीक इसके उलट बात कर रही। वह सिर्फ कह नहीं रही। अलबत्ता शिवसेना और चचा को छोड़कर अलग हुए भतीजे राज ठाकरे की भी कारस्तानी देश देख चुका। सो बीजेपी शिवसेना के खिलाफ सख्त क्यों नहीं हो रही? पर शायद असली कहानी कुछ और। शिवसेना लाख जतन कर तीसरी बार भी महाराष्टï्र की कुर्सी हासिल नहीं कर पाई। शिवसेना की बौखलाहट तो नतीजों के बाद सबने देखी। जब बाल ठाकरे ने लिखा- 'मराठी मानुष ने खंजर घोंपा।' पर बदले जमाने में वोटर कट्टïरवाद की हांडी उतार चुका। फिर भी ठाकरे जुगाड़ ढूंढ रहे। उन्माद पैदा कर सत्ता तक पहुंचने की कोशिश। पर चुनाव तो कोसों दूर। सो बीजेपी-संघ परिवार बनाम शिवसेना की तनातनी एकता कपूर के सास भी कभी बहू थी धारावाहिक जैसी। सो पहले शिवसेना को देखिए। हालत खस्ता हो चुकी। बाल ठाकरे जीते जी बेटे उद्धव को सीएम बनाने का मंसूबा पाले बैठे थे। पर खुद के भतीजे ने गुड़-गोबर कर दिया। यही हाल संघ का। जबसे संघ के भेजे प्रचारक बीजेपी में राजनीति के चस्सू हो गए। संघ की बत्ती गुल होने लगी। देश भर में शाखाएं चौपट होने लगीं। रही-सही कसर सुदर्शन-भागवत के मीडिया प्रेम ने पूरी कर दी। सो जैसे शिवसेना मराठी मानुष के नाम से अपनी जमीन उपजाऊ बनाने में लगी। संघ परिवार हिंदी, हिंदू, हिंदुस्थान के बहाने शाखाओं की पैदावार बढ़ाने की जुगत में। बीजेपी में भी सब अच्छा नहीं। सो गडकरी ने मराठी-हिंदी विवाद के बहाने अनुच्छेद 370 का मामला उछाल दिया। पूरे खेल में बची कांग्रेस। तो उसका हाल, चित भी मेरी, पट भी मेरी...। मराठी वोट में सेंध लगाने को कभी राज को शह दी। तो कभी उत्तर भारतीयों के जख्म पर मरहम लगाने की कोशिश। यानी वोट बंटे, कांग्रेस को सत्ता मिली। अब ठाकरे-संघ में ठनी। तो होम मिनिस्टर पी. चिदंबरम ने भी खूंटा गाड़ दिया। बोले- 'मुंबई सबकी। कोई भी जाए और बसे।' चिदंबरम ने ऑस्ट्रेलिया, पाक के खिलाडिय़ों को मुंबई में क्रिकेट खेलने पर सुरक्षा की पूरी गारंटी ली। अब आप ही इन गोलमाल नेताओं का मतलब निकालिए। भाषाई विवाद में राजनीति के ये सभी धुरंधर सिर्फ चोर-चोर मौसेरे भाई नहीं, सगे भाई कहिए। यानी इस विवाद में सब गोलमाल है। कहने को कांग्रेस-बीजेपी संविधान की दलील दे रहीं। पर जरा सोचिए, राज ठाकरे हों या बाल ठाकरे। अगर कोई संविधान-कानून को खुली चुनौती दे। और विपक्ष-सत्तापक्ष सिर्फ जुबानी पलटवार करे। तो क्या कहेंगे आप। अगर सब गोलमाल न होता। तो महाराष्टï्र चुनाव से पहले जब राज ठाकरे के गुंडे उत्तर भारतीयों को सड़कों पर दौड़ा-दौड़ा कर मार रहे थे। तब चिदंबरम कहां थे। कांग्रेस कहां थी। बीजेपी के गडकरी कहां थे। तब तो गडकरी महाराष्टï्र बीजेपी के अध्यक्ष थे। वैसे भी शिवसेना बीजेपी-शिवसेना के बीच कोई पहली बार तलवार नहीं खिंची। राष्ट्रपति चुनाव में तकरार, फिर इकरार सबने देखी।
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01/02/2010
Friday, January 29, 2010
जब हाथों में हो जाम, तो निधन पर शोक कैसा?
संतोष कुमार
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जब महंगाई काबू में नहीं। तो भला जुबान क्यों काबू में रहे। अब तो महंगाई भी परेशान हो चुकी होगी, कहां राजनीति में आकर फंस मरी। बेचारी महंगाई ने सौ मीटर के धावक उसैन बोल्ट का भी रिकार्ड तोड़ दिया। पर नेता महंगाई को आराम देने के बजाए राजनीति चमकाने में जुटे हुए। बीजेपी 18 जनवरी से महंगाई के खिलाफ आंदोलन कर रही। पर कहीं सड़कों पर वर्कर नहीं दिख रहे। कांग्रेस तो सिर्फ गाल बजाकर महंगाई रोकने का दावा कर रही। अब शुक्रवार को रिजर्व बैंक ने सीआरआर बढ़ा दिया। यानी अब बैंकों को आरबीआई के पास कैश का रिजर्व बढ़ाना होगा। पर बैंक अपनी तरलता कम क्यों होने दें। सो बैंक लोन धारकों पर बोझ डाल अपने खजाने की भरपाई करेंगे। अब आप ही सोचो, महंगाई रोकने का यह कैसा तरीका। मार्केट से पैसा कम कर दो। लोग खरीदना कम कर देंगे। मांग घटेगी, तो पूर्ति के बराबर में आ जाएगी। यानी महंगाई के साथ सिर्फ खेल हो रहा। तभी तो गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी भी पीएम या पवार को चि_ïी नहीं लिख रहे। अलबत्ता सोनिया गांधी को चि_ïी लिखी। गुजरात के पाटन में मोदी ने बाकायदा गरीब मेला लगाया। तो गरीबों को चैक के जरिए राहत देने की कोशिश हुई। पर जब लिफाफा खुला। तो खोदा पहाड़, निकली चुहिया की कहावत से आगे निकल गई। कहावत में कम से कम चुहिया तो निकलती है। पर मोदी के हाथों से बंटे लिफाफे कोरे निकले। फिर भी राजनीति का मौका मोदी नहीं चूके। महंगाई पर सोनिया गांधी को लपेटा। बोले- 'महंगाई पर नियंत्रण को मैंने सोनिया गांधी को हिंदी में कई चि_िïयां लिखीं। पर न तो जवाब आया, न महंगाई रुकी। अब मैं क्या करूं। क्या इतालवी में चि_ïी लिखूं?' अब सोनिया गांधी के खिलाफ कोई ऐसी भाषा इस्तेमाल करे। तो परंपरा के मुताबिक कांग्रेस का आग-बबूला होना लाजिमी। वैसे भी किसी ऐरे-गैरे ने सोनिया पर निशाना नहीं साधा। अलबत्ता उस मोदी ने, जिनके और कांग्रेस के बीच सांप-नेवले का बैर। सो कांग्रेस प्रवक्ता मनीष तिवारी ने झट मोदी पर हमला बोल दिया। कहा- 'मोदी सठिया गए हैं।' यों मोदी अभी साठ साल के नहीं हुए। पर आका को खुश करने के चक्कर में भला कौन उम्र का हिसाब-किताब रखे। यों महंगाई के बहाने मोदी और कांग्रेस के बीच जुबानी जंग का कोई पहला राउंड नहीं। मोदी के मुखारविंद से इटली की... और जर्सी बछड़ा जैसी भाषा निकल चुकी। गुजरात चुनाव में सोनिया गांधी की ओर से मोदी को मौत का सौदागर कहा गया। यानी अब जनता का भला हो, न हो। नेता अपना भला करने की ठान चुके। सो महंगाई पर कांग्रेस-मोदी की जुबानी जंग। तो उधर महाराष्टï्र में बाल ठाकरे मुकेश अंबानी पर उबल पड़े। अंबानी ने मुंबई को पूरे देश की बता दिया। तो ठाकरे ने शुक्रवार को सिर्फ अंबानी को नहीं, शाहरुख खान को भी लपेटा। धमकी दी, पाकिस्तानी खिलाडिय़ों को कोलकाता नाइट राइडर्स में शामिल किया। तो ईंट से ईंट बजा देंगे। लगता है, चचा-भतीजे ठाकरे के पास विध्वंस के सिवा कोई विचार ही नहीं। पर अपनी सरकार हाथ पर हाथ धरे बैठी। इधर महाराष्टï्र में अपने-अपनों को पीट रहे। तो उधर ऑस्ट्रेलिया में हमले थम नहीं रहे। अब, जब सरकार कुछ नहीं कर पाई। तो शुक्रवार को एडवाइजरी जारी कर दी। फिलहाल कोई छात्र ऑस्ट्रेलिया न जाए। अब सरकार हो या विपक्ष, आंखों का पानी मर चुका। शुक्रवार को दो घटनाएं हुईं। एक बीजेपी, एक कांग्रेस में। सो दोनों का हाल देख आप खुद अंदाजा लगा लीजिए। बीजेपी दफ्तर से दिसंबर 2008 में ढाई करोड़ रुपए चोरी हो गए। तब प्राइवेट डिटेक्टिव का सहारा लेकर बीजेपी ने अंदरूनी पड़ताल की। अकाउंटेंट नलिन टंडन निकाले गए। पर अंदरूनी गुटबाजी तेज हो गई। कभी रामदास अग्रवाल को हटाने, तो कभी श्याम जाजू पर गाज गिराने की कोशिश हुई। अब साल भर बाद बीजेपी में निजाम बदला। तो नया किस्सा हुआ। श्याम जाजू का आंध्रा बैंक में अकाउंट। एक व्यक्ति गुरुवार को बैंक में खाते की पड़ताल करने पहुंच गया। पर मैनेजर को शक हुआ। तो जाजू तक बात पहुंची। उस व्यक्ति ने अपना नाम चंदन झा और साधना चैनल का रिपोर्टर बताया। पर साधना चैनल ने इससे इनकार किया। सो जाजू के गुर्गों के हाथ पिट अब वह व्यक्ति दिल्ली पुलिस की हिरासत में। यानी पिछले साल जिस बही-खाते की लड़ाई को बीजेपी ने छुपाने की कोशिश की। अबके सार्वजनिक हो गई। सो जब बीजेपी में अपने ही अपनों की जासूसी करा रहे। तो आपसी विश्वास कैसे बहाल होगा, यह तो गडकरी ही जानें। पर आप दूसरा किस्सा कांग्रेस का देखिए। अपने रामनिवास मिर्धा का शुक्रवार को निधन हो गया। गहलोत सरकार ने एक दिन का राजकीय शोक रखा। दिल्ली में सोनिया-मनमोहन ने श्रद्धांजलि दी। पर अपने राजस्थान से ही राज्यसभा सांसद अभिषेक मनु सिंघवी की कॉकटेल पार्टी में खूब जाम छलके। नए साल के जश्र का आयोजन मिर्धा के शोक पर भारी रहा। सिंघवी का न्योता था। सो मंत्री अंबिका सोनी, सचिन पायलट और सुबोध कांत सहाय भी पहुंचे। अब आप ही सोचिए, राजनीति में विश्वास की उम्मीद किससे। यों बीजेपी में भी ऐसा हो चुका। दत्तोपंत ठेंगड़ी का जिस दिन निधन हुआ। उस दिन मुख्तार अब्बास नकवी ने अपने घर बर्थ डे पार्टी में खूब कॉकटेल की थी। पर जब नए साल की पार्टी के लिए 28 दिन रुका जा सकता। तो एक और दिन टालने में क्या जाता। राजस्थान कांग्रेस के बड़े नेता का निधन हो। और वहीं का कांग्रेसी सांसद ऐसी पार्टी जारी रखे। तो क्या संदेश जाएगा।
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29/01/2010
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जब महंगाई काबू में नहीं। तो भला जुबान क्यों काबू में रहे। अब तो महंगाई भी परेशान हो चुकी होगी, कहां राजनीति में आकर फंस मरी। बेचारी महंगाई ने सौ मीटर के धावक उसैन बोल्ट का भी रिकार्ड तोड़ दिया। पर नेता महंगाई को आराम देने के बजाए राजनीति चमकाने में जुटे हुए। बीजेपी 18 जनवरी से महंगाई के खिलाफ आंदोलन कर रही। पर कहीं सड़कों पर वर्कर नहीं दिख रहे। कांग्रेस तो सिर्फ गाल बजाकर महंगाई रोकने का दावा कर रही। अब शुक्रवार को रिजर्व बैंक ने सीआरआर बढ़ा दिया। यानी अब बैंकों को आरबीआई के पास कैश का रिजर्व बढ़ाना होगा। पर बैंक अपनी तरलता कम क्यों होने दें। सो बैंक लोन धारकों पर बोझ डाल अपने खजाने की भरपाई करेंगे। अब आप ही सोचो, महंगाई रोकने का यह कैसा तरीका। मार्केट से पैसा कम कर दो। लोग खरीदना कम कर देंगे। मांग घटेगी, तो पूर्ति के बराबर में आ जाएगी। यानी महंगाई के साथ सिर्फ खेल हो रहा। तभी तो गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी भी पीएम या पवार को चि_ïी नहीं लिख रहे। अलबत्ता सोनिया गांधी को चि_ïी लिखी। गुजरात के पाटन में मोदी ने बाकायदा गरीब मेला लगाया। तो गरीबों को चैक के जरिए राहत देने की कोशिश हुई। पर जब लिफाफा खुला। तो खोदा पहाड़, निकली चुहिया की कहावत से आगे निकल गई। कहावत में कम से कम चुहिया तो निकलती है। पर मोदी के हाथों से बंटे लिफाफे कोरे निकले। फिर भी राजनीति का मौका मोदी नहीं चूके। महंगाई पर सोनिया गांधी को लपेटा। बोले- 'महंगाई पर नियंत्रण को मैंने सोनिया गांधी को हिंदी में कई चि_िïयां लिखीं। पर न तो जवाब आया, न महंगाई रुकी। अब मैं क्या करूं। क्या इतालवी में चि_ïी लिखूं?' अब सोनिया गांधी के खिलाफ कोई ऐसी भाषा इस्तेमाल करे। तो परंपरा के मुताबिक कांग्रेस का आग-बबूला होना लाजिमी। वैसे भी किसी ऐरे-गैरे ने सोनिया पर निशाना नहीं साधा। अलबत्ता उस मोदी ने, जिनके और कांग्रेस के बीच सांप-नेवले का बैर। सो कांग्रेस प्रवक्ता मनीष तिवारी ने झट मोदी पर हमला बोल दिया। कहा- 'मोदी सठिया गए हैं।' यों मोदी अभी साठ साल के नहीं हुए। पर आका को खुश करने के चक्कर में भला कौन उम्र का हिसाब-किताब रखे। यों महंगाई के बहाने मोदी और कांग्रेस के बीच जुबानी जंग का कोई पहला राउंड नहीं। मोदी के मुखारविंद से इटली की... और जर्सी बछड़ा जैसी भाषा निकल चुकी। गुजरात चुनाव में सोनिया गांधी की ओर से मोदी को मौत का सौदागर कहा गया। यानी अब जनता का भला हो, न हो। नेता अपना भला करने की ठान चुके। सो महंगाई पर कांग्रेस-मोदी की जुबानी जंग। तो उधर महाराष्टï्र में बाल ठाकरे मुकेश अंबानी पर उबल पड़े। अंबानी ने मुंबई को पूरे देश की बता दिया। तो ठाकरे ने शुक्रवार को सिर्फ अंबानी को नहीं, शाहरुख खान को भी लपेटा। धमकी दी, पाकिस्तानी खिलाडिय़ों को कोलकाता नाइट राइडर्स में शामिल किया। तो ईंट से ईंट बजा देंगे। लगता है, चचा-भतीजे ठाकरे के पास विध्वंस के सिवा कोई विचार ही नहीं। पर अपनी सरकार हाथ पर हाथ धरे बैठी। इधर महाराष्टï्र में अपने-अपनों को पीट रहे। तो उधर ऑस्ट्रेलिया में हमले थम नहीं रहे। अब, जब सरकार कुछ नहीं कर पाई। तो शुक्रवार को एडवाइजरी जारी कर दी। फिलहाल कोई छात्र ऑस्ट्रेलिया न जाए। अब सरकार हो या विपक्ष, आंखों का पानी मर चुका। शुक्रवार को दो घटनाएं हुईं। एक बीजेपी, एक कांग्रेस में। सो दोनों का हाल देख आप खुद अंदाजा लगा लीजिए। बीजेपी दफ्तर से दिसंबर 2008 में ढाई करोड़ रुपए चोरी हो गए। तब प्राइवेट डिटेक्टिव का सहारा लेकर बीजेपी ने अंदरूनी पड़ताल की। अकाउंटेंट नलिन टंडन निकाले गए। पर अंदरूनी गुटबाजी तेज हो गई। कभी रामदास अग्रवाल को हटाने, तो कभी श्याम जाजू पर गाज गिराने की कोशिश हुई। अब साल भर बाद बीजेपी में निजाम बदला। तो नया किस्सा हुआ। श्याम जाजू का आंध्रा बैंक में अकाउंट। एक व्यक्ति गुरुवार को बैंक में खाते की पड़ताल करने पहुंच गया। पर मैनेजर को शक हुआ। तो जाजू तक बात पहुंची। उस व्यक्ति ने अपना नाम चंदन झा और साधना चैनल का रिपोर्टर बताया। पर साधना चैनल ने इससे इनकार किया। सो जाजू के गुर्गों के हाथ पिट अब वह व्यक्ति दिल्ली पुलिस की हिरासत में। यानी पिछले साल जिस बही-खाते की लड़ाई को बीजेपी ने छुपाने की कोशिश की। अबके सार्वजनिक हो गई। सो जब बीजेपी में अपने ही अपनों की जासूसी करा रहे। तो आपसी विश्वास कैसे बहाल होगा, यह तो गडकरी ही जानें। पर आप दूसरा किस्सा कांग्रेस का देखिए। अपने रामनिवास मिर्धा का शुक्रवार को निधन हो गया। गहलोत सरकार ने एक दिन का राजकीय शोक रखा। दिल्ली में सोनिया-मनमोहन ने श्रद्धांजलि दी। पर अपने राजस्थान से ही राज्यसभा सांसद अभिषेक मनु सिंघवी की कॉकटेल पार्टी में खूब जाम छलके। नए साल के जश्र का आयोजन मिर्धा के शोक पर भारी रहा। सिंघवी का न्योता था। सो मंत्री अंबिका सोनी, सचिन पायलट और सुबोध कांत सहाय भी पहुंचे। अब आप ही सोचिए, राजनीति में विश्वास की उम्मीद किससे। यों बीजेपी में भी ऐसा हो चुका। दत्तोपंत ठेंगड़ी का जिस दिन निधन हुआ। उस दिन मुख्तार अब्बास नकवी ने अपने घर बर्थ डे पार्टी में खूब कॉकटेल की थी। पर जब नए साल की पार्टी के लिए 28 दिन रुका जा सकता। तो एक और दिन टालने में क्या जाता। राजस्थान कांग्रेस के बड़े नेता का निधन हो। और वहीं का कांग्रेसी सांसद ऐसी पार्टी जारी रखे। तो क्या संदेश जाएगा।
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29/01/2010
Thursday, January 28, 2010
ईको फ्रेंडली तो ठीक, पर वोटर फ्रेंडली कब?
संतोष कुमार
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भले बीजेपी आपस में लड़ती-भिड़ती रहे। पर पर्यावरण से दोस्ताना करेगी। नितिन गडकरी नित नए नुस्खे निकाल रहे। अभी अध्यक्ष पद पर न औपचारिक चुनाव हुआ, न राष्ट्रीय परिषद से अनुमोदन। पर इंदौर में बीजेपी कॉउंसिल की तैयारी ऐसे हो रही। मानो, अश्वमेघ यज्ञ का आयोजन हो। और आहुति के बाद यज्ञ का घोड़ा देश की राजनीति पर भगवा झंडा लहराएगा। सो पहले टेंट का शिगूफा छेड़ा। तय हो गया, नेता टेंट में ही रहेंगे। जिस नेता को टेंट न सुहाए, अपनी जेब ढीली कर होटल का लुत्फ उठाए। अब टेंट के साथ ईको फ्रेंडली का भी फार्मूला बन गया। यानी बीजेपी के नए निजाम सब कुछ नया करना चाह रहे। सो वैलेंटाइन डे के तीसरे दिन इंदौर में तीन दिन बीजेपी की मीटिंग चलेगी। तो टेंट से नेतागण एंबेसडर कार या लग्जरी गाडिय़ों में नहीं, अलबत्ता ट्रिन-ट्रिन कर साइकिल की घंटी बजाते ओमेक्स सिटी पहुंचेंगे। यों तीन दिन के लिए ओमेक्स सिटी का नाम भी बदला होगा। सो बीजेपी नेता-वर्कर कुशाभाऊ ठाकरे नगर पहुंचेंगे। पर जिन्हें साइकिल चलाना न आता हो, या स्वास्थ्य साथ नहीं दे। तो उसका भी मुकम्मल इंतजाम। बैट्री चालित और बायो डीजल से चलने वाली गाडिय़ों का बंदोबस्त होगा। कुछ इंतजाम शिवराज करेंगे। बाकी बगल के राज्य छत्तीसगढ़ से रमन सिंह लिवा लाएंगे। रमन सिंह ही छत्तीसगढ़ में बायो डीजल का प्रयोग कर रहे। सो बीजेपी अपने प्रयोग का प्रदर्शन भी करेगी। यानी फाइनल हो चुका, नो पेट्रोल-नो डीजल। तीन दिन तक नेता और वर्कर केले की पत्तल में खाना खाएंगे। लिखने के लिए भी हाथों से निर्मित कागज बंटेंगे। थैला भी जूट का बना होगा। स्थानीय आयोजकों को दो-टूक हिदायत मिल चुकी। कहीं प्लास्टिक का टुकड़ा भी नजर नहीं आना चाहिए। यानी कुल मिलाकर गडकरी ने ईको फ्रेंडली और सादगी से भरी मीटिंग का पुख्ता बंदोबस्त कर लिया। यों देखने-सुनने में तो ईको फ्रेंडली और सादगी की बात ठीक। पर सादगी के प्रदर्शन में खर्च कितना बैठेगा? टेंट लगाने को आयोजन स्थल पर मिट्टïी का भराव हो रहा। जहां टेंट भी होंगे, वीआईपी के हेलीकॉप्टर के लिए हेलीपैड भी। टेंट भी कोई अपने सुरक्षा बलों जैसा खस्ता हाल नहीं होगा। अलबत्ता जिसका जितना बड़ा कद, टेंट की लग्जरी भी उसी हिसाब से। अब स्विस टेंट हो, तो लग्जरी का अंदाजा भी आप लगा लें। किसी फाइव स्टार से कम तो नहीं, भले ज्यादा हो। यानी कहने को तो टेंट, पर खजाना खाली होगा। लैदर-रैक्सीन की जगह जूट के बैग कहीं महंगे पड़ेंगे। साधारण कागज की जगह हस्त निर्मित कागज की कीमत भी ज्यादा होगी। यानी बीजेपी की महंगी सादगी। पर गडकरी तो ईको फ्रेंडली से दुनिया को मैसेज देना चाह रहे। साथ ही अपनी निजामशाही को यादगार बनाने की भी कोशिश। पर कोई पूछे, यह कैसी सादगी। यह तो वही बात हो गई। जैसे महंगाई के जमाने में अगर किसी गरीब को दाल नसीब नहीं हो रही। तो उसे जूस पीने की नसीहत दे दो। यानी बीजेपी की सादगी महंगाई के जमाने में दाल की जगह जूस पीने वाली। माना, सादगी और ईको फ्रेंडली का विचार उम्दा। पर सिर्फ तीन दिन ही क्यों? तीन दिन इंदौर में बीजेपी सादगी और ईको फ्रेंडली का प्रदर्शन कर पर्यावरण का कौन सा भला कर लेगी। अगर वाकई कोई दिल से सादगी दिखाए। ईको फ्रेंडली बनना चाहे। तो जो चीजें गडकरी इंदौर में तीन दिन के लिए करवा रहे। उसे समूची बीजेपी अपनी दिनचर्या का हिस्सा क्यों नहीं बना लेती? सही मायने में तो इससे पर्यावरण का भला होगा। सो बीजेपी की इंदौर मीटिंग पर्यावरण की रक्षा कम। शोशेबाजी और स्टंट ज्यादा लग रही। सो अकेले इंदौर मीटिंग से बीजेपी ग्लोबल वार्मिंग कम नहीं कर सकती। पर भोंडा प्रदर्शन कर जनता को बरगलाना ही राजनीति। सादगी की मिसाल सही मायने में देखनी हो। तो 11 अशोका रोड में ही दिख जाएगी, बस नजरिया चाहिए। प्यारेलाल खंडेलवाल बीजेपी के वरिष्ठï नेताओं में से एक रहे। संगठन के लिए जिंदगी गुजार दी। आखिरी पड़ाव में राज्यसभा भेजे गए। तो भी उन ने बड़ा सरकारी बंगला नहीं लिया। अलबत्ता बीजेपी हैड क्वार्टर के ही एक छोटे से कमरे में आखिरी सांस ली। पर गडकरी का नए अध्यक्ष के तौर पर जोश लाजिमी। गडकरी की इच्छाशक्ति पर भी संदेह जताने का अपना कोई इरादा नहीं। पर सादगी की बात, तो कुछ सवाल उठाने ही होंगे। गडकरी वाकई टेंट के मुरीद। तो बीजेपी दफ्तर के पीछे ही अपना ठिकाना क्यों नहीं बना लेते? क्यों टाइप-8 सरकारी बंगला चाहिए? दिल्ली में गडकरी जबसे आए, तबसे अपनी सादगी बता रहे। दफ्तर आने-जाने के लिए किराए की टेक्सी ले रखी। यों किराए की टेक्सी, सुनने में तो वाकई सादगी लग रही। पर उस टेक्सी की कार का नाम है- 'कैमरी'। टोयोटा की लग्जरी कार। भले कोई किसी गाड़ी में बैठे, एतराज नहीं। पर वर्कर और आम वोटर तीन दिन के दिखावे से क्या क्लाइमेट चेंज समझेगा और क्या सादगी। उसे तो जीवन-यापन को साधारण सी जिंदगी चाहिए। जो आज के महंगाई के दौर में दुश्वार हो रहा। जनता को तो जमीन पर काम दिखना चाहिए। तभी वोट मिलता। सो ईको फ्रेंडली तो ठीक है, पर वोटर फ्रेंडली कब होंगे जनाब। स्टंट से वोट नहीं मिलता। वोट के लिए वोटर फ्रेंडली होना बेहद जरूरी। पर तीन दिन के बाद जब बीजेपी वापस उसी ढर्रे पर होगी। तो वोटर यही पूछेंगे ना- प्रवचन नहीं, अमल करिए जनाब।
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28/01/2010
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भले बीजेपी आपस में लड़ती-भिड़ती रहे। पर पर्यावरण से दोस्ताना करेगी। नितिन गडकरी नित नए नुस्खे निकाल रहे। अभी अध्यक्ष पद पर न औपचारिक चुनाव हुआ, न राष्ट्रीय परिषद से अनुमोदन। पर इंदौर में बीजेपी कॉउंसिल की तैयारी ऐसे हो रही। मानो, अश्वमेघ यज्ञ का आयोजन हो। और आहुति के बाद यज्ञ का घोड़ा देश की राजनीति पर भगवा झंडा लहराएगा। सो पहले टेंट का शिगूफा छेड़ा। तय हो गया, नेता टेंट में ही रहेंगे। जिस नेता को टेंट न सुहाए, अपनी जेब ढीली कर होटल का लुत्फ उठाए। अब टेंट के साथ ईको फ्रेंडली का भी फार्मूला बन गया। यानी बीजेपी के नए निजाम सब कुछ नया करना चाह रहे। सो वैलेंटाइन डे के तीसरे दिन इंदौर में तीन दिन बीजेपी की मीटिंग चलेगी। तो टेंट से नेतागण एंबेसडर कार या लग्जरी गाडिय़ों में नहीं, अलबत्ता ट्रिन-ट्रिन कर साइकिल की घंटी बजाते ओमेक्स सिटी पहुंचेंगे। यों तीन दिन के लिए ओमेक्स सिटी का नाम भी बदला होगा। सो बीजेपी नेता-वर्कर कुशाभाऊ ठाकरे नगर पहुंचेंगे। पर जिन्हें साइकिल चलाना न आता हो, या स्वास्थ्य साथ नहीं दे। तो उसका भी मुकम्मल इंतजाम। बैट्री चालित और बायो डीजल से चलने वाली गाडिय़ों का बंदोबस्त होगा। कुछ इंतजाम शिवराज करेंगे। बाकी बगल के राज्य छत्तीसगढ़ से रमन सिंह लिवा लाएंगे। रमन सिंह ही छत्तीसगढ़ में बायो डीजल का प्रयोग कर रहे। सो बीजेपी अपने प्रयोग का प्रदर्शन भी करेगी। यानी फाइनल हो चुका, नो पेट्रोल-नो डीजल। तीन दिन तक नेता और वर्कर केले की पत्तल में खाना खाएंगे। लिखने के लिए भी हाथों से निर्मित कागज बंटेंगे। थैला भी जूट का बना होगा। स्थानीय आयोजकों को दो-टूक हिदायत मिल चुकी। कहीं प्लास्टिक का टुकड़ा भी नजर नहीं आना चाहिए। यानी कुल मिलाकर गडकरी ने ईको फ्रेंडली और सादगी से भरी मीटिंग का पुख्ता बंदोबस्त कर लिया। यों देखने-सुनने में तो ईको फ्रेंडली और सादगी की बात ठीक। पर सादगी के प्रदर्शन में खर्च कितना बैठेगा? टेंट लगाने को आयोजन स्थल पर मिट्टïी का भराव हो रहा। जहां टेंट भी होंगे, वीआईपी के हेलीकॉप्टर के लिए हेलीपैड भी। टेंट भी कोई अपने सुरक्षा बलों जैसा खस्ता हाल नहीं होगा। अलबत्ता जिसका जितना बड़ा कद, टेंट की लग्जरी भी उसी हिसाब से। अब स्विस टेंट हो, तो लग्जरी का अंदाजा भी आप लगा लें। किसी फाइव स्टार से कम तो नहीं, भले ज्यादा हो। यानी कहने को तो टेंट, पर खजाना खाली होगा। लैदर-रैक्सीन की जगह जूट के बैग कहीं महंगे पड़ेंगे। साधारण कागज की जगह हस्त निर्मित कागज की कीमत भी ज्यादा होगी। यानी बीजेपी की महंगी सादगी। पर गडकरी तो ईको फ्रेंडली से दुनिया को मैसेज देना चाह रहे। साथ ही अपनी निजामशाही को यादगार बनाने की भी कोशिश। पर कोई पूछे, यह कैसी सादगी। यह तो वही बात हो गई। जैसे महंगाई के जमाने में अगर किसी गरीब को दाल नसीब नहीं हो रही। तो उसे जूस पीने की नसीहत दे दो। यानी बीजेपी की सादगी महंगाई के जमाने में दाल की जगह जूस पीने वाली। माना, सादगी और ईको फ्रेंडली का विचार उम्दा। पर सिर्फ तीन दिन ही क्यों? तीन दिन इंदौर में बीजेपी सादगी और ईको फ्रेंडली का प्रदर्शन कर पर्यावरण का कौन सा भला कर लेगी। अगर वाकई कोई दिल से सादगी दिखाए। ईको फ्रेंडली बनना चाहे। तो जो चीजें गडकरी इंदौर में तीन दिन के लिए करवा रहे। उसे समूची बीजेपी अपनी दिनचर्या का हिस्सा क्यों नहीं बना लेती? सही मायने में तो इससे पर्यावरण का भला होगा। सो बीजेपी की इंदौर मीटिंग पर्यावरण की रक्षा कम। शोशेबाजी और स्टंट ज्यादा लग रही। सो अकेले इंदौर मीटिंग से बीजेपी ग्लोबल वार्मिंग कम नहीं कर सकती। पर भोंडा प्रदर्शन कर जनता को बरगलाना ही राजनीति। सादगी की मिसाल सही मायने में देखनी हो। तो 11 अशोका रोड में ही दिख जाएगी, बस नजरिया चाहिए। प्यारेलाल खंडेलवाल बीजेपी के वरिष्ठï नेताओं में से एक रहे। संगठन के लिए जिंदगी गुजार दी। आखिरी पड़ाव में राज्यसभा भेजे गए। तो भी उन ने बड़ा सरकारी बंगला नहीं लिया। अलबत्ता बीजेपी हैड क्वार्टर के ही एक छोटे से कमरे में आखिरी सांस ली। पर गडकरी का नए अध्यक्ष के तौर पर जोश लाजिमी। गडकरी की इच्छाशक्ति पर भी संदेह जताने का अपना कोई इरादा नहीं। पर सादगी की बात, तो कुछ सवाल उठाने ही होंगे। गडकरी वाकई टेंट के मुरीद। तो बीजेपी दफ्तर के पीछे ही अपना ठिकाना क्यों नहीं बना लेते? क्यों टाइप-8 सरकारी बंगला चाहिए? दिल्ली में गडकरी जबसे आए, तबसे अपनी सादगी बता रहे। दफ्तर आने-जाने के लिए किराए की टेक्सी ले रखी। यों किराए की टेक्सी, सुनने में तो वाकई सादगी लग रही। पर उस टेक्सी की कार का नाम है- 'कैमरी'। टोयोटा की लग्जरी कार। भले कोई किसी गाड़ी में बैठे, एतराज नहीं। पर वर्कर और आम वोटर तीन दिन के दिखावे से क्या क्लाइमेट चेंज समझेगा और क्या सादगी। उसे तो जीवन-यापन को साधारण सी जिंदगी चाहिए। जो आज के महंगाई के दौर में दुश्वार हो रहा। जनता को तो जमीन पर काम दिखना चाहिए। तभी वोट मिलता। सो ईको फ्रेंडली तो ठीक है, पर वोटर फ्रेंडली कब होंगे जनाब। स्टंट से वोट नहीं मिलता। वोट के लिए वोटर फ्रेंडली होना बेहद जरूरी। पर तीन दिन के बाद जब बीजेपी वापस उसी ढर्रे पर होगी। तो वोटर यही पूछेंगे ना- प्रवचन नहीं, अमल करिए जनाब।
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28/01/2010
Wednesday, January 27, 2010
अब सम्मान भी मांग रहा अपना 'सम्मान'
संतोष कुमार
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'अंधा बांटे रेवड़ी, अपने-अपनों को देय।' पर अपना देश कोई अंधेर नगरी नहीं। जो सब कुछ टके सेर हो और लोग बिन सोचे-समझे गटक जाएं। आखिर देश के प्रतिष्ठिïत अवार्ड की प्रतिष्ठïा का सवाल। सो पद्म अवार्ड पर विवाद होना ही था। रेलवे ने 26/11 के जांबाज हैड कांस्टेबल जिल्लू यादव को मैडल की सिफारिश नहीं की। पर रेल राज्यमंत्री ई. अहमद के निजी सचिव जहूर जैदी पुलिस मैडल पा गए। जिल्लू यादव ने आतंकियों से जमकर लोहा लिया। तबके रेल मंत्री लालू यादव ने दस लाख का पुरस्कार भी दिया। फिर भी रेलवे ने जिल्लू यादव को पुलिस मैडल के काबिल नहीं समझा। पर रेल मंत्रालय की कारगुजारी यहीं तक नहीं। ओलंपिक में कुश्ती के लिए कांस्य जीतने वाले सुशील कुमार को भी पद्म अवार्ड नहीं। पर बॉक्सिंग में कांस्य दिलाने वाले विजेंद्र सिंह पद्म श्री की लिस्ट में शामिल। विजेंद्र के पद्म श्री पर शायद ही किसी को एतराज हो। पर सुशील का क्या कसूर? पहली बार कुश्ती में देश के लिए ओलंपिक पदक जीता। फिर कुश्ती के वल्र्ड कप में भी परचम लहराया। पर ऐसी अनदेखी हो। तो किसका दिल नहीं दुखेगा। पर सरकार के पास दिल ही कहां, जो दुखे। दिल होता, तो हिरणों के दिल पर तीर चलाने वाले सैफ अली खान पद्म श्री कैसे हो जाते। अभी तक सैफ के खिलाफ केस चल रहा। पर शायद सत्तारूढ़ दल से नवाब पटौदी-शर्मिला की नजदीकियां पद्म श्री दिला गईं। सो अपने राजस्थान के विश्रोई समाज के लोग खफा। वाकई सैफ ने ऐसा क्या कर दिया, जो कला क्षेत्र गौरवान्वित हो। कहीं ऐसा तो नहीं, हाथों पर करीना के नाम का गोदना गुदवा सैफ सुर्खियों में रहे। तो सरकार की आंखें चौंधिया गई हों। महाराष्टï्र में बीजेपी-शिवसेना ने तो खुला विरोध जताया। पर विरोध के मायने तो तब, जब सरकार भूल स्वीकार करने का साहस रखे। यहां तो समूची सरकार खुलेआम बचाव में उतरी। अमेरिका में रहने वाले एनआरआई संतसिंह चटवाल का नाम पद्म भूषण की लिस्ट में आया। तो बीजेपी के गोपीनाथ मुंडे ने फौरन पीएम को चि_ïी लिख मारी। चटवाल के खिलाफ सीबीआई जांच। बिल क्लिंटन के साथ भारत आए थे। तो बाकायदा गिरफ्तार भी हो चुके। खुद को दिवालिया भी घोषित किया था। पर पद्म भूषण मिला। तो एटमी करार में अपनी भूमिका का बखान कर रहे। विपक्षी दलों को भी लताड़ा। सो प्रकाश जावडेकर ने पूछा- 'क्या अब दलालों को भी पद्म अवार्ड मिलने लगा?' पर चटवाल की भाषा ऐसी, जैसे अवार्ड के भूखे हों। बोले- 'राजनीतिक दलों की परवाह नहीं। वे आते-जाते रहते हैं।' आखिर चटवाल का मिजाज चढ़े भी क्यों ना। अपना विदेश से लेकर गृह मंत्रालय तक चट्टïान की तरह पीछे खड़ा। गृह मंत्रालय ने बयान जारी किया। तो खुद केसों का हवाला दिया। जरा आप खुद ही गौर फरमा लें। पहले तो चटवाल के कसीदे पढ़े गए। फिर पांच केस का हवाला। जिनमें सीबीआई ने खुद ही तीन केस बंद कर दिए। बाकी दो मामलों में अदालत से बरी। अब आप ही सोचो, इतने विवादास्पद लोगों को पद्म भूषण देना कहां तक उचित? अवार्ड तो वाकई रेवड़ी बन गए। सरकार जिसे चाहे, बांटती फिरे। चेहरा छिपाने को बाबा आम्टे, जोहरा सहगल जैसे कुछ योग्य नाम शामिल किए जाते। ताकि ईमानदार छवि के आभा मंडल में कुछ यों ही बाईपास हो जाएं। अगर सरकार अवार्ड को रेवड़ी की तरह न बांटे। तो कभी परमवीर चक्र विजेता अब्दुल हामिद की पत्नी अनाज के लिए राशन कार्ड मांगती न दिखे। पर अपने साठ साल के गणतंत्र पर तमाचा नहीं तो और क्या। जो अब्दुल हामिद की पत्नी दाने-दाने को मोहताज। पर साठ साल में ही शायद देश की हालत ऐसी हो चुकी। मानो, अवार्ड या मैडल सिर्फ शो केस में सजाने की चीज। वाकई अवार्ड या मैडल में राजनीति-अफसरशाही की घुसपैठ न होती। तो ऐसा नहीं होता कि राजीव गांधी को मृत्यु के छह महीने बाद ही भारत रत्न मिल जाता। और अपने लौह पुरुष सरदार बल्लभ भाई पटेल को भारत रत्न मिलने में 41 साल लग जाते। इंदिरा गांधी, वी.वी. गिरि, कामराज तो 70 के दशक में ही भारत रत्न हो गए। पर संविधान रचयिता भीमराव अंबेडकर को 1990 में भारत रत्न मिला। आजादी के अहम सेनानी मौलाना अबुल कलाम आजाद 1992 में औपचारिक भारत रत्न हुए। असम के स्वतंत्रता सेनानी गोपीनाथ वारदोलोई को मरणोपरान्त 41 साल बाद तब भारत रत्न मिला। जब असम गण परिषद वाजपेयी सरकार में थी। जयप्रकाश नारायण, जिन ने राजनीति की दिशा बदल दी। उन्हें भी मृत्यु के 19 साल बाद तब भारत रत्न से नवाजा गया। जब यूनाइटेड फ्रंट की केंद्र में सरकार बनी। जेपी के चेले हुकूमत के अगुआ बने। अमत्र्यसेन को पहले नोबल मिला। फिर भारत रत्न। आखिरी भारत रत्न 2001 में उस्ताद बिस्मिल्ला खां हुए। तबसे नौ साल हो गए। किसी को भारत रत्न नहीं। वैसे भी जब अवार्डों पर राजनीति हावी हो। तो भारत रत्न पर विवाद की मुसीबत कौन मोल ले। सो सरकार पद्म विभूषण, भूषण और श्री में ही गोल-गपाड़ा कर रही। वैसे भी अब जमाना काफी बदल चुका। नौ महीने में बराक ओबामा शांति का नोबल ले जाते। तो फिर चटवाल, सैफ को अवार्ड पर एतराज बेवजह। आखिर जब जमाना ही फिक्सिंग का। तो इकलौता अवार्ड ही अछूता क्यों रहे? सो लोगों को सम्मानित करने वाला सम्मान अब खुद के लिए 'सम्मान' मांग रहा।
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27/01/2010
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'अंधा बांटे रेवड़ी, अपने-अपनों को देय।' पर अपना देश कोई अंधेर नगरी नहीं। जो सब कुछ टके सेर हो और लोग बिन सोचे-समझे गटक जाएं। आखिर देश के प्रतिष्ठिïत अवार्ड की प्रतिष्ठïा का सवाल। सो पद्म अवार्ड पर विवाद होना ही था। रेलवे ने 26/11 के जांबाज हैड कांस्टेबल जिल्लू यादव को मैडल की सिफारिश नहीं की। पर रेल राज्यमंत्री ई. अहमद के निजी सचिव जहूर जैदी पुलिस मैडल पा गए। जिल्लू यादव ने आतंकियों से जमकर लोहा लिया। तबके रेल मंत्री लालू यादव ने दस लाख का पुरस्कार भी दिया। फिर भी रेलवे ने जिल्लू यादव को पुलिस मैडल के काबिल नहीं समझा। पर रेल मंत्रालय की कारगुजारी यहीं तक नहीं। ओलंपिक में कुश्ती के लिए कांस्य जीतने वाले सुशील कुमार को भी पद्म अवार्ड नहीं। पर बॉक्सिंग में कांस्य दिलाने वाले विजेंद्र सिंह पद्म श्री की लिस्ट में शामिल। विजेंद्र के पद्म श्री पर शायद ही किसी को एतराज हो। पर सुशील का क्या कसूर? पहली बार कुश्ती में देश के लिए ओलंपिक पदक जीता। फिर कुश्ती के वल्र्ड कप में भी परचम लहराया। पर ऐसी अनदेखी हो। तो किसका दिल नहीं दुखेगा। पर सरकार के पास दिल ही कहां, जो दुखे। दिल होता, तो हिरणों के दिल पर तीर चलाने वाले सैफ अली खान पद्म श्री कैसे हो जाते। अभी तक सैफ के खिलाफ केस चल रहा। पर शायद सत्तारूढ़ दल से नवाब पटौदी-शर्मिला की नजदीकियां पद्म श्री दिला गईं। सो अपने राजस्थान के विश्रोई समाज के लोग खफा। वाकई सैफ ने ऐसा क्या कर दिया, जो कला क्षेत्र गौरवान्वित हो। कहीं ऐसा तो नहीं, हाथों पर करीना के नाम का गोदना गुदवा सैफ सुर्खियों में रहे। तो सरकार की आंखें चौंधिया गई हों। महाराष्टï्र में बीजेपी-शिवसेना ने तो खुला विरोध जताया। पर विरोध के मायने तो तब, जब सरकार भूल स्वीकार करने का साहस रखे। यहां तो समूची सरकार खुलेआम बचाव में उतरी। अमेरिका में रहने वाले एनआरआई संतसिंह चटवाल का नाम पद्म भूषण की लिस्ट में आया। तो बीजेपी के गोपीनाथ मुंडे ने फौरन पीएम को चि_ïी लिख मारी। चटवाल के खिलाफ सीबीआई जांच। बिल क्लिंटन के साथ भारत आए थे। तो बाकायदा गिरफ्तार भी हो चुके। खुद को दिवालिया भी घोषित किया था। पर पद्म भूषण मिला। तो एटमी करार में अपनी भूमिका का बखान कर रहे। विपक्षी दलों को भी लताड़ा। सो प्रकाश जावडेकर ने पूछा- 'क्या अब दलालों को भी पद्म अवार्ड मिलने लगा?' पर चटवाल की भाषा ऐसी, जैसे अवार्ड के भूखे हों। बोले- 'राजनीतिक दलों की परवाह नहीं। वे आते-जाते रहते हैं।' आखिर चटवाल का मिजाज चढ़े भी क्यों ना। अपना विदेश से लेकर गृह मंत्रालय तक चट्टïान की तरह पीछे खड़ा। गृह मंत्रालय ने बयान जारी किया। तो खुद केसों का हवाला दिया। जरा आप खुद ही गौर फरमा लें। पहले तो चटवाल के कसीदे पढ़े गए। फिर पांच केस का हवाला। जिनमें सीबीआई ने खुद ही तीन केस बंद कर दिए। बाकी दो मामलों में अदालत से बरी। अब आप ही सोचो, इतने विवादास्पद लोगों को पद्म भूषण देना कहां तक उचित? अवार्ड तो वाकई रेवड़ी बन गए। सरकार जिसे चाहे, बांटती फिरे। चेहरा छिपाने को बाबा आम्टे, जोहरा सहगल जैसे कुछ योग्य नाम शामिल किए जाते। ताकि ईमानदार छवि के आभा मंडल में कुछ यों ही बाईपास हो जाएं। अगर सरकार अवार्ड को रेवड़ी की तरह न बांटे। तो कभी परमवीर चक्र विजेता अब्दुल हामिद की पत्नी अनाज के लिए राशन कार्ड मांगती न दिखे। पर अपने साठ साल के गणतंत्र पर तमाचा नहीं तो और क्या। जो अब्दुल हामिद की पत्नी दाने-दाने को मोहताज। पर साठ साल में ही शायद देश की हालत ऐसी हो चुकी। मानो, अवार्ड या मैडल सिर्फ शो केस में सजाने की चीज। वाकई अवार्ड या मैडल में राजनीति-अफसरशाही की घुसपैठ न होती। तो ऐसा नहीं होता कि राजीव गांधी को मृत्यु के छह महीने बाद ही भारत रत्न मिल जाता। और अपने लौह पुरुष सरदार बल्लभ भाई पटेल को भारत रत्न मिलने में 41 साल लग जाते। इंदिरा गांधी, वी.वी. गिरि, कामराज तो 70 के दशक में ही भारत रत्न हो गए। पर संविधान रचयिता भीमराव अंबेडकर को 1990 में भारत रत्न मिला। आजादी के अहम सेनानी मौलाना अबुल कलाम आजाद 1992 में औपचारिक भारत रत्न हुए। असम के स्वतंत्रता सेनानी गोपीनाथ वारदोलोई को मरणोपरान्त 41 साल बाद तब भारत रत्न मिला। जब असम गण परिषद वाजपेयी सरकार में थी। जयप्रकाश नारायण, जिन ने राजनीति की दिशा बदल दी। उन्हें भी मृत्यु के 19 साल बाद तब भारत रत्न से नवाजा गया। जब यूनाइटेड फ्रंट की केंद्र में सरकार बनी। जेपी के चेले हुकूमत के अगुआ बने। अमत्र्यसेन को पहले नोबल मिला। फिर भारत रत्न। आखिरी भारत रत्न 2001 में उस्ताद बिस्मिल्ला खां हुए। तबसे नौ साल हो गए। किसी को भारत रत्न नहीं। वैसे भी जब अवार्डों पर राजनीति हावी हो। तो भारत रत्न पर विवाद की मुसीबत कौन मोल ले। सो सरकार पद्म विभूषण, भूषण और श्री में ही गोल-गपाड़ा कर रही। वैसे भी अब जमाना काफी बदल चुका। नौ महीने में बराक ओबामा शांति का नोबल ले जाते। तो फिर चटवाल, सैफ को अवार्ड पर एतराज बेवजह। आखिर जब जमाना ही फिक्सिंग का। तो इकलौता अवार्ड ही अछूता क्यों रहे? सो लोगों को सम्मानित करने वाला सम्मान अब खुद के लिए 'सम्मान' मांग रहा।
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27/01/2010
गणतंत्र भले साठ का हुआ पर सठिया गए नेता
गणतंत्र के सालाना जश्र को राजपथ सज गया। हर बार की तरह कदम से कदम मिलाते अपने जवान दिखेंगे। रंग-बिरंगी झांकियां होंगी। कुल मिलाकर भारत की अद्भुत क्षमता का प्रदर्शन होगा। पर आम आदमी को झलकियां पहले ही दिख गईं। जब कांग्रेस और शरद पवार ने महंगाई-महंगाई खेलने की ठानी। पिछले हफ्ते दस दिन बीत गए। पर चीनी हो या बाकी जरूरत के सामान। कीमतें कम होनी तो दूर, अलबत्ता बढ़ गईं। सो ग्यारहवें दिन इतवार को फिर पवार उवाच। अबके पवार ने महंगाई के लिए पीएम को भी लपेटा। तो संदेश यही था, महंगाई रोकना सरकार के बूते में नहीं। यों सोमवार को पवार आदतन पलट गए। पर कांग्रेस ने नसीहत दे दी। मनीष तिवारी बोले- 'कृषि मंत्रालय को राज्यों के साथ सक्रियता से काम करने की जरूरत।' पर पवार खफा न हों, सो उनके बयान को केबिनेट की सामूहिक जिम्मेदारी से जोड़ दिया। यानी कांग्रेस-पवार के बीच नूरा-कुश्ती जारी। सो गणतंत्र से गण गायब हुआ। सिर्फ तंत्र ही शेष। सो अब 'जनता द्वारा, जनता का, जनता के लिए' सिर्फ कहने भर की बात। तंत्र पर राजनीति, अफसरशाही हावी। संविधान रचयिताओं के गणतंत्र के मंसूबों पर मौजूदा तंत्र ने पानी फेर दिया। समूची व्यवस्था पर अपना लबादा ओढ़ा दिया। सिर्फ न बदला, तो सालाना जश्र पर दिखावे का दस्तूर। सो अबके सिर्फ गणतंत्र की 60वीं सालगिरह नहीं। वोट की व्यवस्था देखने वाला चुनाव आयोग भी 60 साल का हो गया। सोमवार को हीरक जयंती मनाई। तो इतिहास पर खूब इतराया। पर राजनीति की छाप से अछूता नहीं रहा समारोह। गुजरात में नरेंद्र मोदी ने अनिवार्य वोटिंग का कानून बना दिया। कांग्रेस के दिग्गी राजा तो पहले ही तानाशाही रवैया बता खारिज कर चुके। अब सीईसी नवीन चावला ने भी व्यवहारिक बताया। यों अनिवार्य वोटिंग का मामला कोई आज-कल का मुद्दा नहीं। पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एसपी सेन वर्मा ने 1968 में वोट न डालने वालों पर जुर्माने का सुझाव दिया था। उन ने बेल्जियम, नीदरलैंड, आस्ट्रेलिया, क्यूबा, आस्ट्रिया जैसे देशों में 'मनी फाइन प्लान' की नजीर भी दी। पर चुनाव सुधार की बातें हमेशा आईं-गईं। उन ने आयोग पर राजनीतिक दबाव की बातें भी स्वीकार की थीं। अब नवीन चावला भले खुद को बेदाग बताएं। पर चावला का इतिहास शक की गुंजाइश छोड़ जाता। सो जब वोट का पहरुआ आयोग ही राजनीतिक पिट्ठू होगा। तो काहे का गणतंत्र। संविधान बनाने वालों ने रात-दिन एक कर नि:स्वार्थ भाव से देश के भविष्य का खाका खींचा। पर साठ साल में ही व्यवस्था चलाने वालों ने देश को बूढ़ा कर दिया। कहीं देश को छोटे-छोटे राज्यों में बांटने की कोशिश। तो कहीं राज ठाकरे जैसे सूबेदार पैदा हो चुके। अब गणतंत्र के मुंह पर इससे बड़ा तमाचा क्या होगा। जो राज ठाकरे खुलेआम पोस्टर लगाकर हिंदी भाषियों को धमका रहे। मुंबई में रहना है, तो मराठी सीखनी होगी। जो सीखना नहीं चाहता, घर लौट जाए। क्या मुंबई राज ठाकरे की बपौती हो गई? पर सैंया भए कोतवाल, तो डर काहे का। विलासराव देशमुख सीएम थे। तो भी राज के खिलाफ सिर्फ जुबान चलाई। अब अशोक चव्हाण, तो वह भी राज को इशारा कर ही रहे। पर राज जैसी जुबान की कमी नहीं। जब सितंबर 2007 में वंदे मातरम के सामूहिक गान पर विवाद हुआ। मुस्लिम समाज का एतराज था। तो देहरादून में बीजेपी की वर्किंग कमेटी चल रही थी। तब विनय कटियार ने जोश में नारा दिया- 'भारत में रहना है, तो वंदे मातरम कहना होगा।' पर भला हो वाजपेयी का। जिन ने मीटिंग के भीतर बात संभाल ली। फिर नारा आया था- 'भारत में रहना होगा, वंदे मातरम कहना होगा।' यानी अपने पास संविधान तो है। पर अमल कराने की इ'छाशक्ति किसी में नहीं। संविधान और कानून का फायदा एक खास वर्ग ही उठा पा रहा। व्यवस्था के रहनुमाओं ने साठ साल में संविधान को सही तरीके से लागू ही नहीं होने दिया। अलबत्ता गांव-गरीब के बीच एक ही संदेश गया। संविधान और कानून उसी का, जिसकी लाठी। नक्सलबाडी से शुरू नक्सलवाद भले 13 राज्यों में फैल गया। शिक्षा का स्तर आज भी रटंत से ऊपर नहीं। स्वास्थ्य सेवा निजी मकडज़ाल में। राजनीति का तो कहना ही क्या। अब साठ साल में गणतंत्र का सठियाना न कहें। तो और क्या कहेंगे। मनमोहन सरकार की मंत्री कृष्णा तीरथ ने इश्तिहार में पाकिस्तानी एयर चीफ मार्शल का फोटू छपवा दिया। हल्ला मचा, तो पीएमओ ने माफी मांग ली। पर कृष्णा तीरथ का तुर्रा देखिए। खेद जताया, पर कोई अफसोस नहीं। अलबत्ता बोलीं- 'फोटू नहीं, संदेश देखिए।' कृष्णा उवाच देख-सुन यही लगा। गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर कृष्णा को भी पद्म विभूषण मिल जाए। तो ठीक रहेगा। आखिर यह कोई छोटा-मोटा काम नहीं। कोई 'सपूत' ढूंढते-ढूंढते पाकिस्तान चला जाए। वहां से तनवीर अहमद महमूद का फोटू ढूंढ लाए। तो यह आसान काम नहीं। पर पद्म अवार्ड की लिस्ट में कृष्णा का नाम तो नहीं। अपनी व्यवस्था की उम्मीद के हिसाब से कुछ नाम मिल ही गए। पीएम वाजपेयी के घुटने का आपरेशन कर चितरंजन राणावत पद्म भूषण हुए थे। अब मनमोहन की सर्जरी करने वाले डाक्टर रमाकांत मदनमोहन पांडा भी पद्म भूषण हो गए। सो फिर वही सवाल। क्या पीएम का आपरेशन पद्म अवार्ड का पैमाना? पर जब कोई बांटे रेवड़ी। तो अपना क्या, पैमाना क्या। सो कुल मिलाकर अपना गणतंत्र भले साठ का हुआ पर सठिया गए नेता और चौपट हुई व्यवस्था। -------
25/01/2010
25/01/2010
Thursday, January 21, 2010
क्षेत्रीय दलों के भंवर में फंसी बीजेपी-कांग्रेस
संतोष कुमार
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कहते हैं, तोल-मोल के बोल। पर राजनीति में फार्मूला उल्टा। पहले बोल, फिर तोल-मोल। सो कांग्रेस हो या बीजेपी, अपने ही जाल में उलझ गईं। मकर संक्रांति के दिन जब यहीं पर राजनीति की खिचड़ी लिखी। तो ऑस्ट्रेलिया में भारतीयों पर नस्ली हमले की तुलना ठाकरे बंधुओं के कारनामों से की। पर तब उम्मीद न थी, ठाकरे बंधु इतनी जल्दी कोई शिगूफा ढूंढ लाएंगे। अब संयोग ही देखिए। जब गुरुवार को ऑस्ट्रेलियाई पीएम केविन रूड नस्ली हमले पर अफसोस जता रहे थे। मुंबई में चचा-भतीजे की जोड़ी उत्तर भारतीयों, खास तौर से गरीब टेक्सी चालकों पर ल_ï बरसाने की तैयारी में जुटे थे। अब राज के गुंडे सड़कों पर फिर वही दृश्य दोहराएंगे, जो करीब डेढ़ साल पहले दिखा चुके। अबके भी आग तो पहले से ही लगाई जा रही थी। जब राज ठाकरे ने खुलेआम धमकी दी। सरकार इस साल के 4500 टेक्सी परमिट सिर्फ मराठियों को दे। वरना सड़कों पर नॉन मराठियों की टेक्सी चलने नहीं देंगे। पर राज की आग को सरकार के मुखिया अशोक चव्हाण ने भी हवा दे दी। बिना तोल-मोल के राज के समर्थन में बोल गए। तो दिल्ली तक कांग्रेसियों की घिग्घी बंध गई। सो गुरुवार को अशोक चव्हाण पलटी मार गए। अब बोले- 'टेक्सी चालकों के लिए स्थानीय भाषा आनी चाहिए, चाहे वह मराठी हो या हिंदी-गुजराती।' कांग्रेस ने भी ऐसी ही दलील दी। महाराष्टï्र में ऐसा कानून इक्कीस साल पुराना। पर चचा-भतीजा इतने में कहां मानने वाले। चचा लंबे समय से कुर्सी से महरूम। तो भतीजा पहली बार तेरह सीटें जीत नशे में चूर। हिंदी के खिलाफ राज ठाकरे का एपीसोड तो अबू आजमी के साथ विधानसभा में हो चुका। पर राज जब तक नाम को हकीकत में न बदल दें, चुप नहीं बैठने वाले। सो चालीस साल पहले जो चचा ने दक्षिण भारतीयों के खिलाफ किया। बदले जमाने में भतीजा वही नुस्खा उत्तर भारतीयों के खिलाफ अपना रहा। कांग्रेस ने भी ठाकरे परिवार में फूट का फायदा उठाया। ताकि तीसरी बार भी सत्ता मिल जाए। कांग्रेस को वाकई फायदा भी हुआ। पर अशोक चव्हाण की कल की जुबां ऐसी। अब तक सिर्फ शह देती रही सरकार पूरी तरह से राज के रंग में रंगने लगी। यानी ऑस्ट्रेलिया हो या महाराष्टï्र, सत्तारूढ़ कांग्रेस का रुख एक जैसा। ऑस्ट्रेलिया में नस्ली हमले पर भी केंद्र की कांग्रेसी सरकार गाल बजा रही। तो महाराष्टï्र में ठाकरे बंधुओं का उत्तर भारतीयों पर नस्ली हमला भी कांग्रेसी सरकार के संरक्षण में ही। पर कांग्रेस शायद इतिहास भूल रही। भिंडरांवाला भी कांग्रेस की ही पैदाइश रहे। पर बाद में वही कांग्रेस के लिए नासूर बन गया। विश्व का इतिहास भी कुछ ऐसा ही। ओसामा बिन लादेन सोवियत संघ के खिलाफ अमेरिका की पैदाइश। पर अब वही लादेन अमेरिका पर कितना लद चुका। यह आप खुद ही देख रहे। अमेरिका पूरे घोड़े खोल चुका। पर अभी तक लादेन जिंदा या मुर्दा नहीं मिला। सो भविष्य में राज ठाकरे भी कांग्रेस के लिए नासूर ही साबित होंगे। फिलहाल कांग्रेस ने तीन स्थानीय भाषाओं में हिंदी का नाम लेकर बचाव तो कर लिया। पर राज का रोडछाप नाटक अभी बाकी। सो कांग्रेस तो राज ठाकरे के क्षेत्रीय भंवर में उलझ ही चुकी। वही हाल बड़ी राष्टï्रीय पार्टी बीजेपी का भी। यों नितिन गडकरी फिलहाल संभल-संभल कर बोल रहे। पर टेक्सी परमिट के मामले में बीजेपी की सहयोगी शिवसेना की भाषा राज जैसी ही। खुद उद्धव मुंबई में आने-जाने वालों के लिए भी परमिट की पैरवी कर चुके। अब देखो, कहां बीजेपी। जिसके आदर्श श्यामाप्रसाद मुखर्जी परमिट सिस्टम के खिलाफ शहीद हो गए। अब टेक्सी परमिट हो या महाराष्टï्र में घुसने का परमिट। बीजेपी का शिवसेवा से नाता तोडऩा तो दूर, उसके खिलाफ बोल भी नहीं पा रही। पर बीजेपी की मुश्किल सिर्फ महाराष्टï्र नहीं। महाराष्टï्र से आए नितिन गडकरी ने सबसे पहले बीजेपी को झारखंड में सत्ता दिलाई। अपने फैसले को जायज ठहराया। पर अब शिबू सोरेन का समर्थन करना गले की फांस बन गया। शिबू ने चुनावों में नक्सलियों की खूब मदद ली। सो सीएम बनने के बाद कर्ज अदा कर रहे। नक्सलवादियों के खिलाफ चल रहे ऑपरेशन रुकवा दिए। झारखंड में नक्सलियों के होने का सवाल ही खारिज कर दिया। पर बीजेपी केंद्रीय स्तर पर नक्सलवाद के खिलाफ निर्णायक जंग की पैरोकार। सो नक्सलवाद के मुद्दे पर झारखंड में सरकार दांव पर लगी। तो केंद्र में प्रतिष्ठïा। पर राजनाथ सिंह अभी शिबू से बात करने की दलील दे रहे। यानी जब दोनों बड़ी राष्ट्रीय पार्टियां क्षेत्रीय दलों के भंवर में फंसी हों। तो फिर क्या आम आदमी, क्या उत्तर भारतीय। और क्या देश की सुरक्षा।
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21/01/2010
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कहते हैं, तोल-मोल के बोल। पर राजनीति में फार्मूला उल्टा। पहले बोल, फिर तोल-मोल। सो कांग्रेस हो या बीजेपी, अपने ही जाल में उलझ गईं। मकर संक्रांति के दिन जब यहीं पर राजनीति की खिचड़ी लिखी। तो ऑस्ट्रेलिया में भारतीयों पर नस्ली हमले की तुलना ठाकरे बंधुओं के कारनामों से की। पर तब उम्मीद न थी, ठाकरे बंधु इतनी जल्दी कोई शिगूफा ढूंढ लाएंगे। अब संयोग ही देखिए। जब गुरुवार को ऑस्ट्रेलियाई पीएम केविन रूड नस्ली हमले पर अफसोस जता रहे थे। मुंबई में चचा-भतीजे की जोड़ी उत्तर भारतीयों, खास तौर से गरीब टेक्सी चालकों पर ल_ï बरसाने की तैयारी में जुटे थे। अब राज के गुंडे सड़कों पर फिर वही दृश्य दोहराएंगे, जो करीब डेढ़ साल पहले दिखा चुके। अबके भी आग तो पहले से ही लगाई जा रही थी। जब राज ठाकरे ने खुलेआम धमकी दी। सरकार इस साल के 4500 टेक्सी परमिट सिर्फ मराठियों को दे। वरना सड़कों पर नॉन मराठियों की टेक्सी चलने नहीं देंगे। पर राज की आग को सरकार के मुखिया अशोक चव्हाण ने भी हवा दे दी। बिना तोल-मोल के राज के समर्थन में बोल गए। तो दिल्ली तक कांग्रेसियों की घिग्घी बंध गई। सो गुरुवार को अशोक चव्हाण पलटी मार गए। अब बोले- 'टेक्सी चालकों के लिए स्थानीय भाषा आनी चाहिए, चाहे वह मराठी हो या हिंदी-गुजराती।' कांग्रेस ने भी ऐसी ही दलील दी। महाराष्टï्र में ऐसा कानून इक्कीस साल पुराना। पर चचा-भतीजा इतने में कहां मानने वाले। चचा लंबे समय से कुर्सी से महरूम। तो भतीजा पहली बार तेरह सीटें जीत नशे में चूर। हिंदी के खिलाफ राज ठाकरे का एपीसोड तो अबू आजमी के साथ विधानसभा में हो चुका। पर राज जब तक नाम को हकीकत में न बदल दें, चुप नहीं बैठने वाले। सो चालीस साल पहले जो चचा ने दक्षिण भारतीयों के खिलाफ किया। बदले जमाने में भतीजा वही नुस्खा उत्तर भारतीयों के खिलाफ अपना रहा। कांग्रेस ने भी ठाकरे परिवार में फूट का फायदा उठाया। ताकि तीसरी बार भी सत्ता मिल जाए। कांग्रेस को वाकई फायदा भी हुआ। पर अशोक चव्हाण की कल की जुबां ऐसी। अब तक सिर्फ शह देती रही सरकार पूरी तरह से राज के रंग में रंगने लगी। यानी ऑस्ट्रेलिया हो या महाराष्टï्र, सत्तारूढ़ कांग्रेस का रुख एक जैसा। ऑस्ट्रेलिया में नस्ली हमले पर भी केंद्र की कांग्रेसी सरकार गाल बजा रही। तो महाराष्टï्र में ठाकरे बंधुओं का उत्तर भारतीयों पर नस्ली हमला भी कांग्रेसी सरकार के संरक्षण में ही। पर कांग्रेस शायद इतिहास भूल रही। भिंडरांवाला भी कांग्रेस की ही पैदाइश रहे। पर बाद में वही कांग्रेस के लिए नासूर बन गया। विश्व का इतिहास भी कुछ ऐसा ही। ओसामा बिन लादेन सोवियत संघ के खिलाफ अमेरिका की पैदाइश। पर अब वही लादेन अमेरिका पर कितना लद चुका। यह आप खुद ही देख रहे। अमेरिका पूरे घोड़े खोल चुका। पर अभी तक लादेन जिंदा या मुर्दा नहीं मिला। सो भविष्य में राज ठाकरे भी कांग्रेस के लिए नासूर ही साबित होंगे। फिलहाल कांग्रेस ने तीन स्थानीय भाषाओं में हिंदी का नाम लेकर बचाव तो कर लिया। पर राज का रोडछाप नाटक अभी बाकी। सो कांग्रेस तो राज ठाकरे के क्षेत्रीय भंवर में उलझ ही चुकी। वही हाल बड़ी राष्टï्रीय पार्टी बीजेपी का भी। यों नितिन गडकरी फिलहाल संभल-संभल कर बोल रहे। पर टेक्सी परमिट के मामले में बीजेपी की सहयोगी शिवसेना की भाषा राज जैसी ही। खुद उद्धव मुंबई में आने-जाने वालों के लिए भी परमिट की पैरवी कर चुके। अब देखो, कहां बीजेपी। जिसके आदर्श श्यामाप्रसाद मुखर्जी परमिट सिस्टम के खिलाफ शहीद हो गए। अब टेक्सी परमिट हो या महाराष्टï्र में घुसने का परमिट। बीजेपी का शिवसेवा से नाता तोडऩा तो दूर, उसके खिलाफ बोल भी नहीं पा रही। पर बीजेपी की मुश्किल सिर्फ महाराष्टï्र नहीं। महाराष्टï्र से आए नितिन गडकरी ने सबसे पहले बीजेपी को झारखंड में सत्ता दिलाई। अपने फैसले को जायज ठहराया। पर अब शिबू सोरेन का समर्थन करना गले की फांस बन गया। शिबू ने चुनावों में नक्सलियों की खूब मदद ली। सो सीएम बनने के बाद कर्ज अदा कर रहे। नक्सलवादियों के खिलाफ चल रहे ऑपरेशन रुकवा दिए। झारखंड में नक्सलियों के होने का सवाल ही खारिज कर दिया। पर बीजेपी केंद्रीय स्तर पर नक्सलवाद के खिलाफ निर्णायक जंग की पैरोकार। सो नक्सलवाद के मुद्दे पर झारखंड में सरकार दांव पर लगी। तो केंद्र में प्रतिष्ठïा। पर राजनाथ सिंह अभी शिबू से बात करने की दलील दे रहे। यानी जब दोनों बड़ी राष्ट्रीय पार्टियां क्षेत्रीय दलों के भंवर में फंसी हों। तो फिर क्या आम आदमी, क्या उत्तर भारतीय। और क्या देश की सुरक्षा।
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21/01/2010
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