संतोष कुमार
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बीजेपी में हल्दी की रस्म पूरी हो गई। नितिन गडकरी अब मनोनीत नहीं, निर्वाचित अध्यक्ष हो गए। तेरह राज्यों और संसदीय दल को मिलाकर कुल 19 सैट में परचा दाखिल हुआ। बस तीन घंटे में परचा दाखिल से लेकर जांच और चुनाव तमाम हो गया। पहली दफा बीजेपी में चुने हुए अध्यक्ष को सर्टिफिकेट भी मिला। अब बाराती अगले हफ्ते इंदौर पहुंचेंगे। तो बाकायदा अनुमोदन भी होगा। पर इंदौर और बीजेपी का संयोग देखिए। सात साल पहले अप्रैल 2003 में यहीं वर्किंग कमेटी हुई। तब भी बीजेपी के खेवनहार युवा नेता ही थे। वेंकैया नायडू अध्यक्ष थे। फर्क सिर्फ इतना, तब मध्य प्रदेश में कांग्रेस की सरकार थी। केंद्र में वाजपेयी नीत एनडीए सरकार। अबके मध्य प्रदेश में बीजेपी की सरकार, पर केंद्र में कांग्रेस नीत सरकार। तब बीजेपी सत्ता के नशे में चूर थी। सो पूरी वर्किंग कमेटी अपनी पीठ ठोकने में ही लगी रही। वेंकैया नायडू के तबके अध्यक्षीय भाषण में संगठन पर कम, कांग्रेस को ज्यादा निशाने पर लिया। वर्करों को सिर्फ तीन अगस्त 2002 के दिल्ली संकल्प की याद दिलाई। फिर नवंबर 2003 में राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ की जीत ने तो बीजेपी को सातवें आसमान पर पहुंचा दिया। फील गुड की ऐसी बयार चली, छह महीने पहले ही लोकसभा भंग करा समर में कूद पड़े। कांग्रेस को सौ से नीचे समेटने और बीजेपी अपने बूते तीन सौ सीट लाने का दंभ भरती दिखी। वेंकैया नायडू ने फील गुड में यहां तक कह दिया- 'तीन सौ सीट लाकर बीजेपी सरकार बनाएगी। पर एनडीए के सहयोगियों को भी साथ में रखेगी।' ऐसा लगा, जैसे बीजेपी सहयोगियों पर अहसान करेगी। पर नतीजे क्या हुए, दोहराने से क्या फायदा। फिर महाराष्टï्र चुनाव की हार। वेंकैया का पत्नी की बीमारी के बहाने इस्तीफा। सन्यास का एलान और फिर आडवाणी का खेवनहार बनना। सच तो यह, वेंकैया वाजपेयी-आडवाणी का वरदहस्त पाकर भी जेतली-प्रमोद के आगे बौने ही दिखे। जेतली-प्रमोद ने हमउम्र वेंकैया को भाव नहीं दिया। उमा भारती तो तू-तड़ाक भी कर चुकीं। सो वेंकैया ने जब इस्तीफा दिया, तो संक्रमण काल में आडवाणी से ही खिवैया बनने की गुहार लगाई। आडवाणी को भी लगा, सब संभाल लेंगे। पर जिन्ना एपीसोड ने गुड़-गोबर कर दिया। फिर संघ की पसंद राजनाथ सिंह अध्यक्ष हुए। पर इन चार सालों में भी बीजेपी का खटराग जारी रहा। लोकसभा चुनाव की लगातार दूसरी हार ने तो मानो बीजेपी को हिला दिया। नेता सार्वजनिक बयानबाजी पर उतर आए। किसी ने काम और पुरस्कार में समानता की आवाज उठाई। तो किसी ने संघ से बीजेपी को टेक ओवर करने की गुहार। संघ में भी बदलाव हो चुका था। मोहन भागवत ने कमान संभाल ली। तो पहला एजंडा बीजेपी ही बनी। आखिरकार संघ ने अपनी पसंद गडकरी को अध्यक्ष बनवा ही लिया। यानी बीजेपी का रिमोट अब सीधे संघ के हाथ। अटल-आडवाणी युग में संघ की भूमिका तो थी। पर वीटो हमेशा इन दोनों दिग्गजों का हाथ ही रहा। अब बीजेपी नए युग में प्रवेश कर चुकी। तो अटल-आडवाणी जैसा कोई दिग्गज नहीं। सो दूसरी पीढ़ी के सूरमा संघ को रिमोट सौंप आए। अब सूरमाओं में जंग हुई। तो वीटो संघ के पास। सो सूरमाओं में सबसे जूनियर नितिन गडकरी फिलहाल वीटो पॉवर से लैस। अब गडकरी वाकई बीजेपी को कुछ नया देंगे या फिर संघ का बौद्धिक पिलाएंगे। यह तो इंदौर में ही मालूम पड़ेगा। यों बीजेपी में हार के बाद जब-जब बदलाव हुए। बैक टू बेसिक की परंपरा दिखी। चुनाव से पहले एजंडा अलग होता। नतीजे सही नहीं रहे। तो संघ को खुश करने के लिए वर्किंग कमेटी में हिंदुत्व से सराबोर भाषण। पर शायद गडकरी अबके कुछ संभलकर बोलेंगे। ताकि बिहार चुनाव में दांव उल्टा न पड़े। सो गडकरी ने औपचारिक अध्यक्ष चुने जाने पर रुख में थोड़ा बदलाव किया। अब तक राजनीति को सामाजिक-आर्थिक जाल में उलझाते रहे। पर मंगलवार को आने वाले वक्त में चुनावी जीत की बात की। बोले- 'चुनावी जीत का दौर आएगा। पार्टी को देश के भाग्य विधाता के तौर पर उभारूंगा।' यों गडकरी हों या आडवाणी-राजनाथ। पुराने भाषणों को पलट कर देखिए। तो बीजेपी हमेशा जो कहती रही, उसका लब्बोलुवाब यही- 'नियति ने बीजेपी के हाथों देश का उद्धार लिखा है।' अब गडकरी भाग्य विधाता बनाने की बात कर रहे। पर इतिहास पलटकर देखिए। जब बीजेपी सत्ता में आई, तो महज छह साल में बीजेपी के नेता 'विधाता' बन बैठे। और पार्टी को सींचने वाले वर्कर 'भाग्य' भरोसे रह गए। अब कोई पूछे, शिवसेना और शरद पवार पर नरम रहने वाले गडकरी देश का क्या भाग्य लिखेंगे? गडकरी अध्यक्ष चुने गए। पर बीजेपी हैड क्वार्टर में बामुश्किल डेढ़-एक सौ वर्कर ही नजर आए। यों पंजाब का भंगड़ा, चेन्नई से शहनाई, उत्तराखंड से पांडव नृत्य, तो हरियाणा से नगाड़े आए। पटाखे तो बीजेपी के स्टॉक में पहले से ही पड़े। यानी अबके परिस्थितियां बदल चुकीं। गडकरी के सामने चुनौतियों का अंबार। सो अब संघ के साधक गडकरी बीजेपी को कैसे भाग्य विधाता बनाएंगे, यह वक्त बताएगा। फिलहाल तो बीजेपी इंदौर में बारात सजने की तैयारी कर रही।
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09/02/2010
Tuesday, February 9, 2010
Monday, February 8, 2010
'इंडिया' तो जीता, पर 'हिंदुस्तान' हार गया
संतोष कुमार
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छज बोले, सो बोले। छलनी भी बोलती, जिसमें हजारों छेद। चीन तो आंखें दिखा ही रहा था। अब पाक भी हेकड़ी दिखा रहा। भारत ने बातचीत की पेशकश क्या रख दी। अपने मुंह मियां मि_ïू होने लगे। मुंबई हमले के बाद भारत कूटनीतिक दबाव बनाने में सफल रहा। पाक विदेश मंत्री शाह महमूद कुरैशी ऐसे दबे, कभी सूरत न दिखी। कभी-कभार रहमान मलिक भारत के दिए डोजियर पर चूं-चपड़ करते दिखे। अब महमूद कुरैशी वैसे ही उछल रहे। जैसे हलाल होने वाले बकरे को वापस बाड़े में डाल दिया हो। भारत ने सवा साल बाद पाक को सांस लेने का मौका दिया। तो पाक हुक्मरानों की पसली चलने लगी। महमूद कुरैशी इतवार को मुल्तान में सुल्तान बनने की कोशिश करते दिखे। आवाम के सामने चीखकर बोले- 'भारत हार गया। भारत ने पहले कहा था, मुंबई हमले के आरोपियों को सजा मिलने तक हमसे से बातचीत नहीं करेगा। अब तैयार हो गया। यह सब पाक की ताकत से संभव हुआ। हमने कभी अपना स्टैंड नहीं बदला, चाहे कश्मीर हो या मुंबई। इसी वजह से हमारी जीत हुई।' एक चुटकुला बहुत पुराना। पर पाक के लिए मौजूं। एक व्यक्ति पत्नी और बच्चों के साथ स्कूटर पर जा रहा था। रास्ते में किसी से झड़प हो गई। तो सामने वाले व्यक्ति ने थप्पड़ जड़ दिया। अब वह व्यक्ति पत्नी-बच्चों के सामने पिटा। सो तिलमिला गया। फिर चुनौती दी- 'मुझे मारा, कोई बात नहीं। मेरी बीवी को मारकर दिखाओ, फिर बताता हूं।' उस व्यक्ति ने उसकी बीवी को भी थप्पड़ मार दिया। फिर उसने यही फार्मूला अपने बच्चे के लिए कहा। और तीनों थप्पड़ खाकर चल दिए। घर जाकर बीवी ने पूछा- 'आपने तीनों को क्यों थप्पड़ मरवाया?' व्यक्ति ने जवाब दिया- 'ताकि घर जाकर तुम मां-बेटे मेरा मजाक न उड़ा सको, मैं पिटकर आ गया।' पाकिस्तान भारत से एकाध बार पिटा हो। तो कोई बात समझ में आए। चार बार ऐसा पिट चुका। पाक में घुसकर अपनी फौज ने जीवन-दान दिया। जनरल नियाजी का पूरी फौज के साथ आत्म-समर्पण शायद पाक भूल चुका। सो कुरैशी सिर चढ़कर बोल रहे। पर अपने राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर ने 'रश्मि रथी' में बहुत खूब लिखा- '... क्षमा शोभती उस भुजंग को, जिसके पास गरल हो। उसे क्या, जो दंतहीन, विषहीन, विनीत-सरल हो।...' सो भारत ने खुद की ओर से पहल की। ताकि दुनिया को बता सके, भारत शांति चाहता। पर पाक की बचकानी कूटनीति देख लो। पिटा हुआ मोहरा अपने दड़बे में चीखकर शेर बनने की सोच रहा। कुरैशी भारत को हारा हुआ बता रहे। सो पाकिस्तान की नीयत फिर साफ हो गई। पाक ने कभी आरोपियों पर कार्रवाई नहीं की। चाहे संसद पर हमले का मामला हो, या 26/11 के मुंबई हमले का। हर बार पाक ने सबूत मांगे। फिर उन सबूतों में नुक्स निकाल दोषियों को कोर्ट से बरी करवा दिया। पाक की अदालतें भी स्वतंत्र नहीं। वैसे भी जब लोकतंत्र ही नहीं, तो फिर कोर्ट का क्या भरोसा। पाक अपने साठ साल में करीब पचास साल तो तानाशाही दौर से ही गुजरा। सैनिक हुक्मरानों ने समूची व्यवस्था को एक डंडे से हांका। परवेज मुशर्रफ के वक्त चीफ जस्टिस इफ्तिखार चौधरी समेत कई जजों की बर्खास्तगी ही तानाशाही शासन के ताबूत की आखिरी कील साबित हुई। पर राजनीति ने ऐसी करवट ली। कभी टेन परसेंट दलाल के नाम से मशहूर, जेल की सजा भुगत चुके आसिफ अली जरदारी पाक के राष्ट्रपति हो गए। सो पहले तो पाक अपना इतिहास ठीक करे। फिर कश्मीर के भूगोल की बात। यों भले पाक के विदेश मंत्री दिल बहलाने को शेखी बघार रहे। बातचीत की पेशकश को भारत की हार बता रहे। पर कश्मीर और मुंबई के बारे में कुरैशी ने जो कहा। आखिर उस पर मनमोहन सरकार की चुप्पी क्यों? कम से कम भारत को एतराज तो जताना चाहिए था। अगर वाकई पाक का स्टैंड नहीं बदला। तो हम बातचीत करने को बेताब क्यों? अपनी सरकारें भी ऐसा क्यों करतीं, जैसा कुरैशी कर रहे। अवाम का दिल जीतने के लिए एनडीए सरकार ने संसद पर हमले के बाद ऑपरेशन पराक्रम किया। सीमा पर फौजों का जमावड़ा बढ़ाया। फिर लौटकर बातचीत की मेज पर आ गए। वही मनमोहन सरकार भी कर रही। मुंबई हमले के बाद शुरुआती छह महीने ऐसे बयान दिए। मानो अब-तब युद्ध हुआ। पर अमेरिकी दबाव में पाक को न्योता देकर वहां के हुक्मरानों को भारत ने हीरो बना दिया। आखिर कब तक चूहे-बिल्ली का यह खेल चलता रहेगा? पाक की नीयत को समझने के लिए सरकार को कितना वक्त चाहिए? अब देश की विडंबना नहीं, तो क्या कहें। बीजेपी भी मनमोहन सरकार पर घुटने टेकने का आरोप लगा रही। तो उधर पाकिस्तान भी भारत को घुटने टेकने को मजबूर बता रहा। वाकई पाक ने दिखावे को भी ऐसा कुछ नहीं किया। जो मनमोहन सरकार बातचीत को उतावली हो। पर न्योता दिया जा चुका। भले अमेरिकी दबाव में ही। पाक भी अमेरिकी शह पा अपनी पीठ ठोक रहा। तो कांग्रेस भी क्या करे। सो सोमवार को कांग्रेस ने बातचीत की पेशकश को जायज ठहराया। अब तक पाक की कार्रवाई से कांग्रेस संतुष्टï। सो जब सत्ताधारी दल संतुष्टï हो। तो बाकी अवाम की फिक्र क्यों? सो कुरैशी की बदजुबानी दरकिनार कर दें। तो मुंबई-कश्मीर जैसे मुद्दे पर स्टैंड देख यही लग रहा। अमेरिकी दबाव में 'इंडिया' तो जीत गया। पर 'हिंदुस्तान' हार गया। अमेरिका तो इंडिया की आवाज बना। सो जनता का हिंदुस्तान क्या कर पाता?
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08/02/2010
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छज बोले, सो बोले। छलनी भी बोलती, जिसमें हजारों छेद। चीन तो आंखें दिखा ही रहा था। अब पाक भी हेकड़ी दिखा रहा। भारत ने बातचीत की पेशकश क्या रख दी। अपने मुंह मियां मि_ïू होने लगे। मुंबई हमले के बाद भारत कूटनीतिक दबाव बनाने में सफल रहा। पाक विदेश मंत्री शाह महमूद कुरैशी ऐसे दबे, कभी सूरत न दिखी। कभी-कभार रहमान मलिक भारत के दिए डोजियर पर चूं-चपड़ करते दिखे। अब महमूद कुरैशी वैसे ही उछल रहे। जैसे हलाल होने वाले बकरे को वापस बाड़े में डाल दिया हो। भारत ने सवा साल बाद पाक को सांस लेने का मौका दिया। तो पाक हुक्मरानों की पसली चलने लगी। महमूद कुरैशी इतवार को मुल्तान में सुल्तान बनने की कोशिश करते दिखे। आवाम के सामने चीखकर बोले- 'भारत हार गया। भारत ने पहले कहा था, मुंबई हमले के आरोपियों को सजा मिलने तक हमसे से बातचीत नहीं करेगा। अब तैयार हो गया। यह सब पाक की ताकत से संभव हुआ। हमने कभी अपना स्टैंड नहीं बदला, चाहे कश्मीर हो या मुंबई। इसी वजह से हमारी जीत हुई।' एक चुटकुला बहुत पुराना। पर पाक के लिए मौजूं। एक व्यक्ति पत्नी और बच्चों के साथ स्कूटर पर जा रहा था। रास्ते में किसी से झड़प हो गई। तो सामने वाले व्यक्ति ने थप्पड़ जड़ दिया। अब वह व्यक्ति पत्नी-बच्चों के सामने पिटा। सो तिलमिला गया। फिर चुनौती दी- 'मुझे मारा, कोई बात नहीं। मेरी बीवी को मारकर दिखाओ, फिर बताता हूं।' उस व्यक्ति ने उसकी बीवी को भी थप्पड़ मार दिया। फिर उसने यही फार्मूला अपने बच्चे के लिए कहा। और तीनों थप्पड़ खाकर चल दिए। घर जाकर बीवी ने पूछा- 'आपने तीनों को क्यों थप्पड़ मरवाया?' व्यक्ति ने जवाब दिया- 'ताकि घर जाकर तुम मां-बेटे मेरा मजाक न उड़ा सको, मैं पिटकर आ गया।' पाकिस्तान भारत से एकाध बार पिटा हो। तो कोई बात समझ में आए। चार बार ऐसा पिट चुका। पाक में घुसकर अपनी फौज ने जीवन-दान दिया। जनरल नियाजी का पूरी फौज के साथ आत्म-समर्पण शायद पाक भूल चुका। सो कुरैशी सिर चढ़कर बोल रहे। पर अपने राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर ने 'रश्मि रथी' में बहुत खूब लिखा- '... क्षमा शोभती उस भुजंग को, जिसके पास गरल हो। उसे क्या, जो दंतहीन, विषहीन, विनीत-सरल हो।...' सो भारत ने खुद की ओर से पहल की। ताकि दुनिया को बता सके, भारत शांति चाहता। पर पाक की बचकानी कूटनीति देख लो। पिटा हुआ मोहरा अपने दड़बे में चीखकर शेर बनने की सोच रहा। कुरैशी भारत को हारा हुआ बता रहे। सो पाकिस्तान की नीयत फिर साफ हो गई। पाक ने कभी आरोपियों पर कार्रवाई नहीं की। चाहे संसद पर हमले का मामला हो, या 26/11 के मुंबई हमले का। हर बार पाक ने सबूत मांगे। फिर उन सबूतों में नुक्स निकाल दोषियों को कोर्ट से बरी करवा दिया। पाक की अदालतें भी स्वतंत्र नहीं। वैसे भी जब लोकतंत्र ही नहीं, तो फिर कोर्ट का क्या भरोसा। पाक अपने साठ साल में करीब पचास साल तो तानाशाही दौर से ही गुजरा। सैनिक हुक्मरानों ने समूची व्यवस्था को एक डंडे से हांका। परवेज मुशर्रफ के वक्त चीफ जस्टिस इफ्तिखार चौधरी समेत कई जजों की बर्खास्तगी ही तानाशाही शासन के ताबूत की आखिरी कील साबित हुई। पर राजनीति ने ऐसी करवट ली। कभी टेन परसेंट दलाल के नाम से मशहूर, जेल की सजा भुगत चुके आसिफ अली जरदारी पाक के राष्ट्रपति हो गए। सो पहले तो पाक अपना इतिहास ठीक करे। फिर कश्मीर के भूगोल की बात। यों भले पाक के विदेश मंत्री दिल बहलाने को शेखी बघार रहे। बातचीत की पेशकश को भारत की हार बता रहे। पर कश्मीर और मुंबई के बारे में कुरैशी ने जो कहा। आखिर उस पर मनमोहन सरकार की चुप्पी क्यों? कम से कम भारत को एतराज तो जताना चाहिए था। अगर वाकई पाक का स्टैंड नहीं बदला। तो हम बातचीत करने को बेताब क्यों? अपनी सरकारें भी ऐसा क्यों करतीं, जैसा कुरैशी कर रहे। अवाम का दिल जीतने के लिए एनडीए सरकार ने संसद पर हमले के बाद ऑपरेशन पराक्रम किया। सीमा पर फौजों का जमावड़ा बढ़ाया। फिर लौटकर बातचीत की मेज पर आ गए। वही मनमोहन सरकार भी कर रही। मुंबई हमले के बाद शुरुआती छह महीने ऐसे बयान दिए। मानो अब-तब युद्ध हुआ। पर अमेरिकी दबाव में पाक को न्योता देकर वहां के हुक्मरानों को भारत ने हीरो बना दिया। आखिर कब तक चूहे-बिल्ली का यह खेल चलता रहेगा? पाक की नीयत को समझने के लिए सरकार को कितना वक्त चाहिए? अब देश की विडंबना नहीं, तो क्या कहें। बीजेपी भी मनमोहन सरकार पर घुटने टेकने का आरोप लगा रही। तो उधर पाकिस्तान भी भारत को घुटने टेकने को मजबूर बता रहा। वाकई पाक ने दिखावे को भी ऐसा कुछ नहीं किया। जो मनमोहन सरकार बातचीत को उतावली हो। पर न्योता दिया जा चुका। भले अमेरिकी दबाव में ही। पाक भी अमेरिकी शह पा अपनी पीठ ठोक रहा। तो कांग्रेस भी क्या करे। सो सोमवार को कांग्रेस ने बातचीत की पेशकश को जायज ठहराया। अब तक पाक की कार्रवाई से कांग्रेस संतुष्टï। सो जब सत्ताधारी दल संतुष्टï हो। तो बाकी अवाम की फिक्र क्यों? सो कुरैशी की बदजुबानी दरकिनार कर दें। तो मुंबई-कश्मीर जैसे मुद्दे पर स्टैंड देख यही लग रहा। अमेरिकी दबाव में 'इंडिया' तो जीत गया। पर 'हिंदुस्तान' हार गया। अमेरिका तो इंडिया की आवाज बना। सो जनता का हिंदुस्तान क्या कर पाता?
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08/02/2010
Friday, February 5, 2010
घरेलू ही नहीं, कूटनीति में भी फिसड्डी सरकार
संतोष कुमार
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इंतिहा हो गई इंतजार की। पर अपने पीएम अभी भी यही कह रहे, थोड़ा और इंतजार करिए। कांग्रेस की वर्किंग कमेटी महंगाई पर सीएम मीटिंग से ठीक पहले हुई। तो मनमोहन ने कुछ हफ्तों में सरकारी कदम के असर की सफाई दी। शरद पवार ने दस दिन में महंगाई कम होने का दावा किया था। अपने पीएम पिछले साल अगस्त की वर्किंग कमेटी में भी कुछ ऐसी ही दलील दे चुके। पर महंगाई का कुछ नहीं बिगड़ा। अलबत्ता महंगाई 'पुराण' बन गई। मौके-बेमौके नेतागण बांच रहे। अब शनिवार को सीएम मीटिंग में बेपर्दा हों। कांग्रेस ने शुक्रवार को ही वर्किंग कमेटी कर अपनी गंभीरता का ढोंग रचाया। अब आशंकाएं तो यहां तक जताई जा रहीं। यूपीए के अर्थशास्त्रीगण कृषि में विदेशी निवेश यानी एफडीआई का रास्ता खोलने की जुगत में। सो महंगाई को जानबूझकर बेलगाम होने दिया गया। ताकि मांग-आपूर्ति, भंडारण और लचर सिस्टम पर सवाल उठे। फिर बेहतर कोल्ड स्टोरेज, मांग-आपूर्ति में संतुलन और डिस्ट्रीब्यूशन की पूरी शृंखला को दुरुस्त करने के बहाने एफडीआई की पैरवी हो। इसलिए दलील दी जा रही, कृषि क्षेत्र का उचित प्रबंधन न होने से 40 फीसदी अनाज बेकार हो रहा। कहीं ट्रांसपोर्टेशन की दिक्कत। तो कहीं स्टोरेज की। सो बेहतरी के नाम पर निवेश फार्मूला सोच रही सरकार। अब सचमुच ऐसा हुआ। तो सोचिए, कांग्रेस का 'हाथ' किसके साथ? पर शुक्रवार को कांग्रेस ने सिर्फ महंगाई पर ढोंग नहीं किया। सुरक्षा अमले से घिरे राहुल गांधी ने मुंबई जाकर शिवसेना को चुनौती दी। एटीएम से पैसे निकाले। लोकल ट्रेन का टिकट लाइन में लग खरीदा। फिर चाक-चौबंद सुरक्षा के बीच 'आम मुसाफिरों' की माफिक सफर किया। अब महाराष्टï्र का गृह राज्यमंत्री जूता उठाने को बैठा हो। तो ऐसी यात्रा कोई भी कर ले। राहुल की सुरक्षा में समूची सरकार और प्रशासन सड़कों पर उतरा था। सीएम अशोक चव्हाण राहुल की अगवानी में इतने तन, मन, धन से लगे रहे। सीडब्ल्यूसी की बैठक में आना भी मुनासिब न समझा। यों राहत की बात, शिवसेनिक दड़बे में ही बांध दिए गए। राहुल सकुशल मुंबई का दौरा पूरा कर पुडिचेरी चले गए। पर अपना एक छोटा सा सवाल विलासराव देशमुख, अशोक चव्हाण, आरआर पाटिल और बड़े नेता सोनिया-मनमोहन से। जब 2008 में राज ठाकरे मुंबई की सड़कों पर तांडव कर रहे थे। क्या तब महाराष्टï्र में कोई सीएम था या नहीं? पुलिस थी या नहीं? क्या सिर्फ सरकार और पुलिस सिर्फ वीआईपी के लिए होती? अगर नहीं, तो ऐसा सुरक्षा बंदोबस्त तब उत्तर भारतीयों के लिए क्यों नहीं किया गया? माना, शिवसेना को उसके गढ़ में चुनौती देकर राहुल ने माकूल जवाब दिया। पर क्या इस दौरे से शिवसेना-राज ठाकरे की ओछी सियासत बंद हो जाएगी? आखिर इस दौरे का क्या संदेश गया? यही ना, अगर शासन और प्रशासन ईमानदारी दिखाए। तो मुंबई में उत्तर भारतीय बेखौफ रह सकते हैं। अगर कांग्रेस वाकई ईमानदार। तो चचा-भतीजा ठाकरे पर कड़ी कार्रवाई का साहस दिखाए। वरना राहुल का दौरा भी महंगाई जैसा ही महज ढोंग माना जाएगा। पर शिवसेना कहां मुंह बंद रखने वाली। राहुल ने एटीएम से पैसा निकाला। तो उद्धव ठाकरे बोले- 'दिल्ली के नेता मुंबई को एटीएम यानी ऑल टाइम मनी समझते। यही मानसिकता हमें बदलनी है।' अब उद्धव ने छोटी बात से अपने वोटरों को बड़ा संदेश दे दिया। यानी अनजाने में ही सही, शिवसेना को छोटी बात से बड़ा फायदा मिल गया। सो जरूरत जुबानी जंग की नहीं। अलबत्ता कुछ करने की है, ताकि चचा-भतीजा ठाकरे पर नकेल कसी जा सके। पर अपनी सरकार जैसे घरेलू मोर्चे पर असहाय दिख रही। अब कूटनीतिक मोर्चे पर भी नाकामी का सेहरा बंध गया। कहां 26/11 के हमले के बाद भारत ने पाक को दुनिया के कटघरे में खड़ा किया। मनमोहन ने दो-टूक कह दिया। जब तक पाक दोषियों पर कार्रवाई नहीं, बातचीत नहीं। पर जुलाई 2009 में ही शर्म अल शेख जाकर पाक पीएम गिलानी संग साझा बयान कर आए। अमेरिकी दबाव में पहली बार बलूचिस्तान साझा बयान में आ गया। पर देश में बवाल मचा। बीजेपी ने सरकार को बेपर्दा किया। तो कांग्रेस घबरा गई। घबराहट में तबके विदेश सचिव और मौजूदा एनएसए ने ड्राफ्टिंग एरर कहा। तो विदेश राज्यमंत्री शशि थरूर ने साझा बयान को बंदिश नहीं माना। पर चूक तो थी, सो संसद के दोनों सदनों में मनमोहन को सफाई देनी पड़ी। फिर वही वायदा, जब तक पाक 26/11 के दोषियों पर कार्रवाई नहीं करता। सार्थक बातचीत नहीं होगी। पर ओबामा के दबाव में अब खुद भारत ने आगे बढ़ पाक के सामने बातचीत की पेशकश कर दी। इसी महीने की दो तारीखें भी सुझाईं। तो जैसे गिलानी ने शर्म अल शेख को अपनी जीत बताया था। अब भारत की पेशकश को दुनिया का दबाव बता रहे। भारत से बातचीत का विषय और एजंडा पहले साफ करने की शर्त रख दी। इसे कहते हैं, चोरी और सीनाजोरी। याद है, 22 जनवरी को ही गिलानी ने क्या कहा था। पाक 26/11 नहीं दोहराने की गारंटी नहीं दे सकता। अब पाक पीएम ऐसा बयान दे। फिर भी भारत अपनी ओर से बातचीत की पेशकश करे। तो क्या कहेंगे आप। विपक्ष को तो मनमोहन की नीयत पर संदेह। अब बजट सत्र में बीजेपी पीएम से नया वादा मांगेगी। अरुण जेतली बोले- 'संसद में हमें पीएम से स्पष्टï वायदा चाहिए कि कश्मीर पर 1994 के प्रस्ताव से नहीं हटेंगे। और ना ही सीमा के बारे में भारत की पुरानी स्थिति को छोड़ेंगे।'
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इंतिहा हो गई इंतजार की। पर अपने पीएम अभी भी यही कह रहे, थोड़ा और इंतजार करिए। कांग्रेस की वर्किंग कमेटी महंगाई पर सीएम मीटिंग से ठीक पहले हुई। तो मनमोहन ने कुछ हफ्तों में सरकारी कदम के असर की सफाई दी। शरद पवार ने दस दिन में महंगाई कम होने का दावा किया था। अपने पीएम पिछले साल अगस्त की वर्किंग कमेटी में भी कुछ ऐसी ही दलील दे चुके। पर महंगाई का कुछ नहीं बिगड़ा। अलबत्ता महंगाई 'पुराण' बन गई। मौके-बेमौके नेतागण बांच रहे। अब शनिवार को सीएम मीटिंग में बेपर्दा हों। कांग्रेस ने शुक्रवार को ही वर्किंग कमेटी कर अपनी गंभीरता का ढोंग रचाया। अब आशंकाएं तो यहां तक जताई जा रहीं। यूपीए के अर्थशास्त्रीगण कृषि में विदेशी निवेश यानी एफडीआई का रास्ता खोलने की जुगत में। सो महंगाई को जानबूझकर बेलगाम होने दिया गया। ताकि मांग-आपूर्ति, भंडारण और लचर सिस्टम पर सवाल उठे। फिर बेहतर कोल्ड स्टोरेज, मांग-आपूर्ति में संतुलन और डिस्ट्रीब्यूशन की पूरी शृंखला को दुरुस्त करने के बहाने एफडीआई की पैरवी हो। इसलिए दलील दी जा रही, कृषि क्षेत्र का उचित प्रबंधन न होने से 40 फीसदी अनाज बेकार हो रहा। कहीं ट्रांसपोर्टेशन की दिक्कत। तो कहीं स्टोरेज की। सो बेहतरी के नाम पर निवेश फार्मूला सोच रही सरकार। अब सचमुच ऐसा हुआ। तो सोचिए, कांग्रेस का 'हाथ' किसके साथ? पर शुक्रवार को कांग्रेस ने सिर्फ महंगाई पर ढोंग नहीं किया। सुरक्षा अमले से घिरे राहुल गांधी ने मुंबई जाकर शिवसेना को चुनौती दी। एटीएम से पैसे निकाले। लोकल ट्रेन का टिकट लाइन में लग खरीदा। फिर चाक-चौबंद सुरक्षा के बीच 'आम मुसाफिरों' की माफिक सफर किया। अब महाराष्टï्र का गृह राज्यमंत्री जूता उठाने को बैठा हो। तो ऐसी यात्रा कोई भी कर ले। राहुल की सुरक्षा में समूची सरकार और प्रशासन सड़कों पर उतरा था। सीएम अशोक चव्हाण राहुल की अगवानी में इतने तन, मन, धन से लगे रहे। सीडब्ल्यूसी की बैठक में आना भी मुनासिब न समझा। यों राहत की बात, शिवसेनिक दड़बे में ही बांध दिए गए। राहुल सकुशल मुंबई का दौरा पूरा कर पुडिचेरी चले गए। पर अपना एक छोटा सा सवाल विलासराव देशमुख, अशोक चव्हाण, आरआर पाटिल और बड़े नेता सोनिया-मनमोहन से। जब 2008 में राज ठाकरे मुंबई की सड़कों पर तांडव कर रहे थे। क्या तब महाराष्टï्र में कोई सीएम था या नहीं? पुलिस थी या नहीं? क्या सिर्फ सरकार और पुलिस सिर्फ वीआईपी के लिए होती? अगर नहीं, तो ऐसा सुरक्षा बंदोबस्त तब उत्तर भारतीयों के लिए क्यों नहीं किया गया? माना, शिवसेना को उसके गढ़ में चुनौती देकर राहुल ने माकूल जवाब दिया। पर क्या इस दौरे से शिवसेना-राज ठाकरे की ओछी सियासत बंद हो जाएगी? आखिर इस दौरे का क्या संदेश गया? यही ना, अगर शासन और प्रशासन ईमानदारी दिखाए। तो मुंबई में उत्तर भारतीय बेखौफ रह सकते हैं। अगर कांग्रेस वाकई ईमानदार। तो चचा-भतीजा ठाकरे पर कड़ी कार्रवाई का साहस दिखाए। वरना राहुल का दौरा भी महंगाई जैसा ही महज ढोंग माना जाएगा। पर शिवसेना कहां मुंह बंद रखने वाली। राहुल ने एटीएम से पैसा निकाला। तो उद्धव ठाकरे बोले- 'दिल्ली के नेता मुंबई को एटीएम यानी ऑल टाइम मनी समझते। यही मानसिकता हमें बदलनी है।' अब उद्धव ने छोटी बात से अपने वोटरों को बड़ा संदेश दे दिया। यानी अनजाने में ही सही, शिवसेना को छोटी बात से बड़ा फायदा मिल गया। सो जरूरत जुबानी जंग की नहीं। अलबत्ता कुछ करने की है, ताकि चचा-भतीजा ठाकरे पर नकेल कसी जा सके। पर अपनी सरकार जैसे घरेलू मोर्चे पर असहाय दिख रही। अब कूटनीतिक मोर्चे पर भी नाकामी का सेहरा बंध गया। कहां 26/11 के हमले के बाद भारत ने पाक को दुनिया के कटघरे में खड़ा किया। मनमोहन ने दो-टूक कह दिया। जब तक पाक दोषियों पर कार्रवाई नहीं, बातचीत नहीं। पर जुलाई 2009 में ही शर्म अल शेख जाकर पाक पीएम गिलानी संग साझा बयान कर आए। अमेरिकी दबाव में पहली बार बलूचिस्तान साझा बयान में आ गया। पर देश में बवाल मचा। बीजेपी ने सरकार को बेपर्दा किया। तो कांग्रेस घबरा गई। घबराहट में तबके विदेश सचिव और मौजूदा एनएसए ने ड्राफ्टिंग एरर कहा। तो विदेश राज्यमंत्री शशि थरूर ने साझा बयान को बंदिश नहीं माना। पर चूक तो थी, सो संसद के दोनों सदनों में मनमोहन को सफाई देनी पड़ी। फिर वही वायदा, जब तक पाक 26/11 के दोषियों पर कार्रवाई नहीं करता। सार्थक बातचीत नहीं होगी। पर ओबामा के दबाव में अब खुद भारत ने आगे बढ़ पाक के सामने बातचीत की पेशकश कर दी। इसी महीने की दो तारीखें भी सुझाईं। तो जैसे गिलानी ने शर्म अल शेख को अपनी जीत बताया था। अब भारत की पेशकश को दुनिया का दबाव बता रहे। भारत से बातचीत का विषय और एजंडा पहले साफ करने की शर्त रख दी। इसे कहते हैं, चोरी और सीनाजोरी। याद है, 22 जनवरी को ही गिलानी ने क्या कहा था। पाक 26/11 नहीं दोहराने की गारंटी नहीं दे सकता। अब पाक पीएम ऐसा बयान दे। फिर भी भारत अपनी ओर से बातचीत की पेशकश करे। तो क्या कहेंगे आप। विपक्ष को तो मनमोहन की नीयत पर संदेह। अब बजट सत्र में बीजेपी पीएम से नया वादा मांगेगी। अरुण जेतली बोले- 'संसद में हमें पीएम से स्पष्टï वायदा चाहिए कि कश्मीर पर 1994 के प्रस्ताव से नहीं हटेंगे। और ना ही सीमा के बारे में भारत की पुरानी स्थिति को छोड़ेंगे।'
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Thursday, February 4, 2010
बटला पर कितनी बार 'टकला' होगी कांग्रेस?
संतोष कुमार
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बटला हाउस की सियासी गूंज फिर सड़कों पर। अब कोई पूछे, चचा-भतीजा ठाकरे क्या कम थे। जो कांग्रेस के दिग्गी राजा ने बटला राग अलाप दिया। अभी भाषाई सियासत की आग बुझी भी नहीं। मजहबी सियासत को हवा मिल गई। बटला हाउस मुठभेड़ के वक्त फरार शहजाद पुलिस के शिकंजे में आया। तो दिग्विजय सिंह आजमगढ़ पहुंच गए। मुठभेड़ में मारे गए आतंकी सैफ के घर सहानुभूति जता आए। मुठभेड़ की न्यायिक जांच की मांग फिर कर दी। सो विपक्ष को हमला करने का मौका मिल गया। शिवसेना की वजह से बीजेपी बचाव की मुद्रा में थी। पर दिग्गी राजा के शिगूफे ने मुद्दा थमा दिया। सो रविशंकर प्रसाद ने दिग्गी राजा को फौरन बीमार राजनीतिक मानसिकता का शिकार बता दिया। मुठभेड़ पर अब तक हुई सियासत का कच्चा चि_ïा भी खोला। कांग्रेस से पूछा, एक तरफ ऑपरेशन बटला हाउस में शहीद इंस्पेक्टर मोहन चंद शर्मा को अशोक चक्र। तो दूसरी तरफ बार-बार जांच की मांग और आतंकियों के घर जाना किस बात का परिचायक। बीजेपी ने कांग्रेस से एक और सवाल पूछा। आतंकियों के परिवार से सहानुभूति। तो आतंक के शिकार लोगों की फिक्र क्यों नहीं। क्या कभी कोई कांग्रेसी आतंक के शिकार लोगों के घर गया? यों सवाल सोलह आने सही। पर राजनेताओं से कैसी उम्मीद। यूपीए-वन में सरकार आतंकवादियों के आश्रितों की खातिर विशेष पैकेज लाने की सोच रही थी। मानवाधिकार के नाम पर ऐसी पहल हुई। ताकि आतंकियों के बेसहारा परिवार को पेंशन मिल सके। पर विवाद की संभावना से सरकार पीछे हट गई। अब बटला हाउस मुठभेड़ का सियासतनामा देखो। तो दिल्ली बम धमाकों की जांच करते हुए पुलिस को बटला हाउस की भनक मिली। जहां कुछ आतंकी अगली साजिश रच रहे थे। सो 18 सितंबर 2008 को पुलिस ने धावा बोला। दो आतंकी मौके पर मार गिराए गए। बाकी दो-तीन फरार हो गए। ऑपरेशन में दिल्ली पुलिस के जांबाज आफीसर मोहन चंद शर्मा शहीद हो गए। पर शर्मा की चिता की आग ठंडी भी नहीं पड़ी थी। सियासत करने वाले बटला हाउस पहुंच गए। तब अमर-मुलायम कांग्रेस के करीब थे। सो अमर ने हल्ला बोला। एक तरफ अमर सिंह ने मोहन चंद शर्मा के परिवार को प्रोत्साहन के तौर पर चैक भी दिया। दूसरी तरफ मुठभेड़ की न्यायिक जांच की मांग की। सो खफा परिजनों ने अमर का चैक लौटा दिया। पर बात यहीं खत्म नहीं हुई। तब भी दिग्विजय सिंह ने न्यायिक जांच की मांग का मोर्चा खोला। मामला सोनिया से लेकर पीएम मनमोहन के दरबार तक पहुंचा। कांग्रेस के अल्पसंख्यक मोर्चा के चीफ इमरान किदवई पूरे दल-बल के साथ पीएम से मिले। पर पीएम ने बैरंग लौटा बटला हाउस मुठभेड़ की जांच की मांग खारिज कर दी। आखिर मनमोहन के पास कोई चारा नहीं था। सितंबर में इस्पेक्टर शर्मा शहीद हुए। जनवरी 2009 में अशोक चक्र से सम्मानित किया गया। वैसे भी दिल्ली पुलिस कोई शीला सरकार के मातहत नहीं। केंद्रीय गृह मंत्रालय के ही अधीन। सो न्यायिक जांच होती, तो भी कटघरे में कांग्रेस ही खड़ी होती। अब दिग्गी राजा ने फिर सुर्रा छोड़ा। तो सपा से आउट अमर सिंह कहां चुप रहने वाले। उन ने एक नया सुर्रा छोड़ दिया। कह रहे, सोनिया जांच को तैयार थीं। मनमोहन राजी नहीं हुए। अब अमर के सुर्रे का मतलब आप समझ लें। अमर अपने लिए कोई ठौर ढूंढ रहे। सो कभी सोनिया के मुरीद, तो कभी मायावती के। पर बात सिर्फ दिग्गी राजा की। सो गुरुवार को जब चौतरफा घिर गए। खुद कांग्रेस ने दिग्गी से किनारा कर लिया। तो दिग्गी भी पलटी मार गए। अब कह रहे, मुठभेड़ को फर्जी नहीं कहा। सिर्फ पूछा- 'मारे गए लड़के के सिर पर गोली कैसे?' पर दिग्गी राजा किससे पूछ रहे? केंद्र में कांग्रेस की सरकार। दिल्ली में भी कांग्रेस की सरकार। दिग्गी कोई ऐरे-गैरे छुटभैये नेता भी नहीं। कांग्रेस के जनरल सैक्रेट्री। वह भी यूपी जैसे बड़े सूबे के इंचार्ज। तो क्या डेढ़ेक साल में भी अपनी सरकार से जवाब नहीं ले पाए। पर दिग्गी राजा की यह कैसी पलटी। मानवाधिकार आयोग ने जांच में मुठभेड़ को सही पाया। हाईकोर्ट-सुप्रीम कोर्ट ने अलग जांच की याचिका ठुकरा दी। पर दिग्गी कह रहे, मानवाधिकार आयोग कोई जांच एजेंसी नहीं। यों दिग्गी का समुदाय विशेष के प्रति प्रेम का दिखावा जगजाहिर। हिंदू आतंकवाद शब्द दिग्गी राजा की ही देन। फिर भी आजमगढ़ में घुसने पर उलेमा काउंसिल का विरोध था। सो बटला हाउस सियासत का पारा चढ़ा दिया। अब कांग्रेस से कोई क्या उम्मीद करे। कभी तुष्टिïकरण के नाम पर मजहब की सियासत। तो महाराष्टï्र में मराठी की सियासत में भी कांग्रेस कम जिम्मेदार नहीं। चचा और भतीजे के बीच आगे बढऩे की होड़। अब भतीजा राज अलग महाराष्टï्र देश की धमकी दे रहा। शिवसेना ने इटालियन मम्मी कह राहुल गांधी पर हमला बोला। तो राज ठाकरे ने राहुल को रोम पुत्र कहा। राहुल शुक्रवार को मुंबई जाएंगे। तो शिवसेनिक काला झंडा दिखाने की तैयारी में। पर कांग्रेस की सरकार अभी भी सिर्फ गीदड़-भभकी दे रही। सो दो साल पहले राज ठाकरे ने गुंडई की। तो भी कांग्रेस सवालों के घेरे में थी। अब भी जुबान चलाने के सिवा कुछ नहीं कर रही। वही पुराना राग, एडवोकेट जनरल से राय-कानूनी सलाह-मशविरा आदि-आदि। सो भाषाई सियासत हो या बटला कांड, कांग्रेस हर बार टकला यानी बेनकाब हुई।
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04/02/2010
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बटला हाउस की सियासी गूंज फिर सड़कों पर। अब कोई पूछे, चचा-भतीजा ठाकरे क्या कम थे। जो कांग्रेस के दिग्गी राजा ने बटला राग अलाप दिया। अभी भाषाई सियासत की आग बुझी भी नहीं। मजहबी सियासत को हवा मिल गई। बटला हाउस मुठभेड़ के वक्त फरार शहजाद पुलिस के शिकंजे में आया। तो दिग्विजय सिंह आजमगढ़ पहुंच गए। मुठभेड़ में मारे गए आतंकी सैफ के घर सहानुभूति जता आए। मुठभेड़ की न्यायिक जांच की मांग फिर कर दी। सो विपक्ष को हमला करने का मौका मिल गया। शिवसेना की वजह से बीजेपी बचाव की मुद्रा में थी। पर दिग्गी राजा के शिगूफे ने मुद्दा थमा दिया। सो रविशंकर प्रसाद ने दिग्गी राजा को फौरन बीमार राजनीतिक मानसिकता का शिकार बता दिया। मुठभेड़ पर अब तक हुई सियासत का कच्चा चि_ïा भी खोला। कांग्रेस से पूछा, एक तरफ ऑपरेशन बटला हाउस में शहीद इंस्पेक्टर मोहन चंद शर्मा को अशोक चक्र। तो दूसरी तरफ बार-बार जांच की मांग और आतंकियों के घर जाना किस बात का परिचायक। बीजेपी ने कांग्रेस से एक और सवाल पूछा। आतंकियों के परिवार से सहानुभूति। तो आतंक के शिकार लोगों की फिक्र क्यों नहीं। क्या कभी कोई कांग्रेसी आतंक के शिकार लोगों के घर गया? यों सवाल सोलह आने सही। पर राजनेताओं से कैसी उम्मीद। यूपीए-वन में सरकार आतंकवादियों के आश्रितों की खातिर विशेष पैकेज लाने की सोच रही थी। मानवाधिकार के नाम पर ऐसी पहल हुई। ताकि आतंकियों के बेसहारा परिवार को पेंशन मिल सके। पर विवाद की संभावना से सरकार पीछे हट गई। अब बटला हाउस मुठभेड़ का सियासतनामा देखो। तो दिल्ली बम धमाकों की जांच करते हुए पुलिस को बटला हाउस की भनक मिली। जहां कुछ आतंकी अगली साजिश रच रहे थे। सो 18 सितंबर 2008 को पुलिस ने धावा बोला। दो आतंकी मौके पर मार गिराए गए। बाकी दो-तीन फरार हो गए। ऑपरेशन में दिल्ली पुलिस के जांबाज आफीसर मोहन चंद शर्मा शहीद हो गए। पर शर्मा की चिता की आग ठंडी भी नहीं पड़ी थी। सियासत करने वाले बटला हाउस पहुंच गए। तब अमर-मुलायम कांग्रेस के करीब थे। सो अमर ने हल्ला बोला। एक तरफ अमर सिंह ने मोहन चंद शर्मा के परिवार को प्रोत्साहन के तौर पर चैक भी दिया। दूसरी तरफ मुठभेड़ की न्यायिक जांच की मांग की। सो खफा परिजनों ने अमर का चैक लौटा दिया। पर बात यहीं खत्म नहीं हुई। तब भी दिग्विजय सिंह ने न्यायिक जांच की मांग का मोर्चा खोला। मामला सोनिया से लेकर पीएम मनमोहन के दरबार तक पहुंचा। कांग्रेस के अल्पसंख्यक मोर्चा के चीफ इमरान किदवई पूरे दल-बल के साथ पीएम से मिले। पर पीएम ने बैरंग लौटा बटला हाउस मुठभेड़ की जांच की मांग खारिज कर दी। आखिर मनमोहन के पास कोई चारा नहीं था। सितंबर में इस्पेक्टर शर्मा शहीद हुए। जनवरी 2009 में अशोक चक्र से सम्मानित किया गया। वैसे भी दिल्ली पुलिस कोई शीला सरकार के मातहत नहीं। केंद्रीय गृह मंत्रालय के ही अधीन। सो न्यायिक जांच होती, तो भी कटघरे में कांग्रेस ही खड़ी होती। अब दिग्गी राजा ने फिर सुर्रा छोड़ा। तो सपा से आउट अमर सिंह कहां चुप रहने वाले। उन ने एक नया सुर्रा छोड़ दिया। कह रहे, सोनिया जांच को तैयार थीं। मनमोहन राजी नहीं हुए। अब अमर के सुर्रे का मतलब आप समझ लें। अमर अपने लिए कोई ठौर ढूंढ रहे। सो कभी सोनिया के मुरीद, तो कभी मायावती के। पर बात सिर्फ दिग्गी राजा की। सो गुरुवार को जब चौतरफा घिर गए। खुद कांग्रेस ने दिग्गी से किनारा कर लिया। तो दिग्गी भी पलटी मार गए। अब कह रहे, मुठभेड़ को फर्जी नहीं कहा। सिर्फ पूछा- 'मारे गए लड़के के सिर पर गोली कैसे?' पर दिग्गी राजा किससे पूछ रहे? केंद्र में कांग्रेस की सरकार। दिल्ली में भी कांग्रेस की सरकार। दिग्गी कोई ऐरे-गैरे छुटभैये नेता भी नहीं। कांग्रेस के जनरल सैक्रेट्री। वह भी यूपी जैसे बड़े सूबे के इंचार्ज। तो क्या डेढ़ेक साल में भी अपनी सरकार से जवाब नहीं ले पाए। पर दिग्गी राजा की यह कैसी पलटी। मानवाधिकार आयोग ने जांच में मुठभेड़ को सही पाया। हाईकोर्ट-सुप्रीम कोर्ट ने अलग जांच की याचिका ठुकरा दी। पर दिग्गी कह रहे, मानवाधिकार आयोग कोई जांच एजेंसी नहीं। यों दिग्गी का समुदाय विशेष के प्रति प्रेम का दिखावा जगजाहिर। हिंदू आतंकवाद शब्द दिग्गी राजा की ही देन। फिर भी आजमगढ़ में घुसने पर उलेमा काउंसिल का विरोध था। सो बटला हाउस सियासत का पारा चढ़ा दिया। अब कांग्रेस से कोई क्या उम्मीद करे। कभी तुष्टिïकरण के नाम पर मजहब की सियासत। तो महाराष्टï्र में मराठी की सियासत में भी कांग्रेस कम जिम्मेदार नहीं। चचा और भतीजे के बीच आगे बढऩे की होड़। अब भतीजा राज अलग महाराष्टï्र देश की धमकी दे रहा। शिवसेना ने इटालियन मम्मी कह राहुल गांधी पर हमला बोला। तो राज ठाकरे ने राहुल को रोम पुत्र कहा। राहुल शुक्रवार को मुंबई जाएंगे। तो शिवसेनिक काला झंडा दिखाने की तैयारी में। पर कांग्रेस की सरकार अभी भी सिर्फ गीदड़-भभकी दे रही। सो दो साल पहले राज ठाकरे ने गुंडई की। तो भी कांग्रेस सवालों के घेरे में थी। अब भी जुबान चलाने के सिवा कुछ नहीं कर रही। वही पुराना राग, एडवोकेट जनरल से राय-कानूनी सलाह-मशविरा आदि-आदि। सो भाषाई सियासत हो या बटला कांड, कांग्रेस हर बार टकला यानी बेनकाब हुई।
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04/02/2010
Wednesday, February 3, 2010
तो बवाल के बीच जेब में उबाल की तैयारी
संतोष कुमार
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आखिर भाषाई हुड़दंग भाषा की लक्ष्मण रेखा लांघ ही गया। नेता गाली-गलौज पर उतर आए। बीजेपी के विनय कटियार ने बाल ठाकरे से पूछा। क्या मुंबई आपके बाप की। पर बीजेपी कटियार से इत्तिफाक नहीं रख रही। सो शिवसेना अभी बीजेपी पर संयत। पर राहुल गांधी ने चचा-भतीजे ठाकरे को चुनौती दी। तो मुंहफट ठाकरे की भाषा संयत नहीं रही। सो मुखपत्र 'सामना' में बूढ़े शेर की गर्जना हुई। राहुल ने महाराष्टï्र सबका बताया। तो ठाकरे ने सोनिया गांधी के विदेशी मूल पर हमला बोल कांग्रेसियों को फिर चिढ़ाया। लिखा- 'महाराष्टï्र भारतीयों का तो हो सकता। पर इटालियन मम्मी का कैसे हो सकता। जो महाराष्टï्र के रास्ते में अड़ता है। महाराष्टï्र उसे घुटने टेकने पर मजबूर कर देता है। मुंबई को धर्मशाला नहीं बनाओ। वरना अंजाम बुरा होगा।' पर सबको पता, विदेशी मूल का मुद्दा टांय-टांय फिस्स हो चुका। सो कांग्रेसियों ने ठाकरे की टिप्पणियों को भाव नहीं दिया। वैसे भी चुनाव से पहले राहुल मराठी विवाद से बिहार में पैर जमा रहे। सो कांग्रेस रफ्ता-रफ्ता कार्ड आजमा रही। ठाकरे जितनी कठोर भाषा राहुल के लिए इस्तेमाल करेंगे। कांग्रेस को उतना ही फायदा। हवा का यह रुख कांग्रेस कई बार देख चुकी। नरेंद्र मोदी से लेकर प्रमोद महाजन तक। सोनिया गांधी के खिलाफ शब्दों के खूब तीर चलाए। हताशा में भाषा की मर्यादा इस कदर लांघी गई। खुद बीजेपी के पुरोधा अटल बिहारी वाजपेयी को मर्यादा का पाठ पढ़ाना पड़ा। पर यहां तो शिवसेना के पुरोधा ही मर्यादा की आहुति दे रहे। राहुल गांधी के बयान से इस कदर बौखलाई। बाल ठाकरे ने अपने मुखपत्र में बयानबाजी की हदें पार कर दीं। मुद्दे से परे हट राहुल को जो कहा। आप भी देख लें- 'राहुल गांधी के सिर पर सींग निकल आए हैं। इसलिए अनाप-शनाप बयान दे रहे हैं। राहुल की उम्र ज्यादा हो गई। फिर भी शादी नहीं हुई। सो राहुल का मानसिक संतुलन बिगड़ गया।' क्या जिनकी शादी नहीं होती, उनका मानसिक संतुलन बिगड़ जाता? शायद शिवसेना भूल गई, पूर्व राष्टï्रपति कलाम ने शादी नहीं की। पर बड़े वैज्ञानिक और भारत रत्न बने। अपने वाजपेयी भी कुंवारे। पर देश के पीएम बने। सो शिवसेना के बयान का क्या मतलब। कहीं ऐसा तो नहीं, बाल ठाकरे ने नाम तो राहुल का लिया। निशाना संघ प्रमुख मोहन भागवत हों। संघ के सभी पूर्ण कालिक प्रचारक कुंवारे ही तो होते। आखिर उत्तर भारतीयों की रक्षा का बीड़ा उठा मोहन भागवत ने ही शिवसेना की दुखती रग पर हाथ रखा था। पर ठाकरे ने संघ को संयत भाषा में जवाब दिया। बाकी शाहरुख खान हों या राहुल गांधी। शिवसेना ने हर बयान पर पलटवार किया। अगर किसी पर पलटवार नहीं हुआ, तो वह सिर्फ नितिन गडकरी का बयान। संघ ने मोर्चा खोला। तो नितिन गडकरी ने संविधान की दुहाई देकर एक पन्ने का बयान पढ़ दिया। नाम शिवसेना का नहीं लिया। सो शायद शिवसेना ने लिहाज रखा। तभी तो मराठी विवाद पर बयानों के जहर बुझे तीर हवा में टकरा रहे। पर बीजेपी दो दिन पुराने बयान से इतर एक शब्द कहने को राजी नहीं। कांग्रेस और राहुल की आलोचना करने में बीजेपी देर नहीं कर रही। पर ज्यों ही सवाल शिवसेना का आता। गाड़ी घूमकर गडकरी के बयान पर पहुंच जाती। अब एक और बात सामने आ रही। आडवाणी ने खुद बाल ठाकरे से फोन पर बात की। अब बीजेपी के बयान पर शिवसेना पलटवार नहीं कर रही। तो क्या यह सांठगांठ का सबूत नहीं? राज ठाकरे का बढ़ता दायरा और शिवसेना का सिमटता कुनबा बीजेपी के लिए भी चिंता की बात। सो घालमेल कर दोनों खेल रहे। मराठी कार्ड से शिवसेना को हीरो बनाने की कोशिश। ताकि राज ठाकरे का मक्कू कसा जा सके। यानी महाराष्टï्र में शिवसेना को मराठी पिच। तो इसी बहाने बीजेपी अनुच्छेद 370 को उछाल हिंदुत्व कार्ड खेलने की तैयारी में। ऐसा हुआ, तो कांग्रेस भी घिरेगी। सो अब लड़ाई शिवसेना बनाम कांग्रेस करा बीजेपी मौज ले रही। बीजेपी के एक मराठी नेता तो खुद बता रहे थे। ताजा विवाद तो 15 दिन में थम जाएगा। पर तीन-चार महीने में इस तरह के तीन-चार और राउंड होंगे। अब हाथ कंगन को आरसी क्या, पढ़े-लिखे को फारसी क्या। अब करुणानिधि भी शिवसेना-मनसे पर लगाम की बात कर रहे। खुद भी हिंदी विरोधी न होने की सफाई दे रहे। पर इतिहास करुणा की निधि देख चुका। सो लोकसभा स्पीकर मीरा कुमार का विचार उम्दा लगा। ठाकरे जैसे लोगों को तवज्जो मत दो। विवाद खुद-ब-खुद ठंडा पड़ जाएगा। यानी अपना मीडिया भी जिम्मेदार हो। पर जब तक नेता ईमानदार न हो, कुछ नहीं होने वाला। अभी भी शिवसेना शाहरुख खान को धमकी दे रही। तो बीजेपी सुर में सुर मिला रही। खेल को राजनीति से अलग रखने की दलील भी, साथ में शाहरुख को नसीहत भी। पर यह क्या बात हुई, खेल संघों में राजनीति तो घुन की तरह घुसी हुई। सो इधर देश भाषाई विवाद में उलझा। रोजाना बयानों से बवाल मच रहे। तो दूसरी तरफ सरकार 'हाथ' की सफाई दिखाने में जुटी हुई। बवाल के बीच आम आदमी की जेब में उबाल की तैयारी। सरकार की एक्सपर्ट किरीट पारिख कमेटी ने रपट दे दी। पेट्रोल तीन रुपए, डीजल तीन से चार रुपए, केरोसिन छह रुपए और एलपीजी पर सौ रुपए प्रति सिलेंडर बढ़ाने की सिफारिश। साथ में प्राइस पॉलिसी को सरकारी नियंत्रण से हटाने का फार्मूला। जैसे विलासराव देशमुख ने राज के गुंडों को सरकारी नियंत्रण से मुक्त कर हिंदी भाषियों के खिलाफ तांडव की छूट दी। सो आप तो यही मानो, राजनीति की जय-जय।
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03/02/2010
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आखिर भाषाई हुड़दंग भाषा की लक्ष्मण रेखा लांघ ही गया। नेता गाली-गलौज पर उतर आए। बीजेपी के विनय कटियार ने बाल ठाकरे से पूछा। क्या मुंबई आपके बाप की। पर बीजेपी कटियार से इत्तिफाक नहीं रख रही। सो शिवसेना अभी बीजेपी पर संयत। पर राहुल गांधी ने चचा-भतीजे ठाकरे को चुनौती दी। तो मुंहफट ठाकरे की भाषा संयत नहीं रही। सो मुखपत्र 'सामना' में बूढ़े शेर की गर्जना हुई। राहुल ने महाराष्टï्र सबका बताया। तो ठाकरे ने सोनिया गांधी के विदेशी मूल पर हमला बोल कांग्रेसियों को फिर चिढ़ाया। लिखा- 'महाराष्टï्र भारतीयों का तो हो सकता। पर इटालियन मम्मी का कैसे हो सकता। जो महाराष्टï्र के रास्ते में अड़ता है। महाराष्टï्र उसे घुटने टेकने पर मजबूर कर देता है। मुंबई को धर्मशाला नहीं बनाओ। वरना अंजाम बुरा होगा।' पर सबको पता, विदेशी मूल का मुद्दा टांय-टांय फिस्स हो चुका। सो कांग्रेसियों ने ठाकरे की टिप्पणियों को भाव नहीं दिया। वैसे भी चुनाव से पहले राहुल मराठी विवाद से बिहार में पैर जमा रहे। सो कांग्रेस रफ्ता-रफ्ता कार्ड आजमा रही। ठाकरे जितनी कठोर भाषा राहुल के लिए इस्तेमाल करेंगे। कांग्रेस को उतना ही फायदा। हवा का यह रुख कांग्रेस कई बार देख चुकी। नरेंद्र मोदी से लेकर प्रमोद महाजन तक। सोनिया गांधी के खिलाफ शब्दों के खूब तीर चलाए। हताशा में भाषा की मर्यादा इस कदर लांघी गई। खुद बीजेपी के पुरोधा अटल बिहारी वाजपेयी को मर्यादा का पाठ पढ़ाना पड़ा। पर यहां तो शिवसेना के पुरोधा ही मर्यादा की आहुति दे रहे। राहुल गांधी के बयान से इस कदर बौखलाई। बाल ठाकरे ने अपने मुखपत्र में बयानबाजी की हदें पार कर दीं। मुद्दे से परे हट राहुल को जो कहा। आप भी देख लें- 'राहुल गांधी के सिर पर सींग निकल आए हैं। इसलिए अनाप-शनाप बयान दे रहे हैं। राहुल की उम्र ज्यादा हो गई। फिर भी शादी नहीं हुई। सो राहुल का मानसिक संतुलन बिगड़ गया।' क्या जिनकी शादी नहीं होती, उनका मानसिक संतुलन बिगड़ जाता? शायद शिवसेना भूल गई, पूर्व राष्टï्रपति कलाम ने शादी नहीं की। पर बड़े वैज्ञानिक और भारत रत्न बने। अपने वाजपेयी भी कुंवारे। पर देश के पीएम बने। सो शिवसेना के बयान का क्या मतलब। कहीं ऐसा तो नहीं, बाल ठाकरे ने नाम तो राहुल का लिया। निशाना संघ प्रमुख मोहन भागवत हों। संघ के सभी पूर्ण कालिक प्रचारक कुंवारे ही तो होते। आखिर उत्तर भारतीयों की रक्षा का बीड़ा उठा मोहन भागवत ने ही शिवसेना की दुखती रग पर हाथ रखा था। पर ठाकरे ने संघ को संयत भाषा में जवाब दिया। बाकी शाहरुख खान हों या राहुल गांधी। शिवसेना ने हर बयान पर पलटवार किया। अगर किसी पर पलटवार नहीं हुआ, तो वह सिर्फ नितिन गडकरी का बयान। संघ ने मोर्चा खोला। तो नितिन गडकरी ने संविधान की दुहाई देकर एक पन्ने का बयान पढ़ दिया। नाम शिवसेना का नहीं लिया। सो शायद शिवसेना ने लिहाज रखा। तभी तो मराठी विवाद पर बयानों के जहर बुझे तीर हवा में टकरा रहे। पर बीजेपी दो दिन पुराने बयान से इतर एक शब्द कहने को राजी नहीं। कांग्रेस और राहुल की आलोचना करने में बीजेपी देर नहीं कर रही। पर ज्यों ही सवाल शिवसेना का आता। गाड़ी घूमकर गडकरी के बयान पर पहुंच जाती। अब एक और बात सामने आ रही। आडवाणी ने खुद बाल ठाकरे से फोन पर बात की। अब बीजेपी के बयान पर शिवसेना पलटवार नहीं कर रही। तो क्या यह सांठगांठ का सबूत नहीं? राज ठाकरे का बढ़ता दायरा और शिवसेना का सिमटता कुनबा बीजेपी के लिए भी चिंता की बात। सो घालमेल कर दोनों खेल रहे। मराठी कार्ड से शिवसेना को हीरो बनाने की कोशिश। ताकि राज ठाकरे का मक्कू कसा जा सके। यानी महाराष्टï्र में शिवसेना को मराठी पिच। तो इसी बहाने बीजेपी अनुच्छेद 370 को उछाल हिंदुत्व कार्ड खेलने की तैयारी में। ऐसा हुआ, तो कांग्रेस भी घिरेगी। सो अब लड़ाई शिवसेना बनाम कांग्रेस करा बीजेपी मौज ले रही। बीजेपी के एक मराठी नेता तो खुद बता रहे थे। ताजा विवाद तो 15 दिन में थम जाएगा। पर तीन-चार महीने में इस तरह के तीन-चार और राउंड होंगे। अब हाथ कंगन को आरसी क्या, पढ़े-लिखे को फारसी क्या। अब करुणानिधि भी शिवसेना-मनसे पर लगाम की बात कर रहे। खुद भी हिंदी विरोधी न होने की सफाई दे रहे। पर इतिहास करुणा की निधि देख चुका। सो लोकसभा स्पीकर मीरा कुमार का विचार उम्दा लगा। ठाकरे जैसे लोगों को तवज्जो मत दो। विवाद खुद-ब-खुद ठंडा पड़ जाएगा। यानी अपना मीडिया भी जिम्मेदार हो। पर जब तक नेता ईमानदार न हो, कुछ नहीं होने वाला। अभी भी शिवसेना शाहरुख खान को धमकी दे रही। तो बीजेपी सुर में सुर मिला रही। खेल को राजनीति से अलग रखने की दलील भी, साथ में शाहरुख को नसीहत भी। पर यह क्या बात हुई, खेल संघों में राजनीति तो घुन की तरह घुसी हुई। सो इधर देश भाषाई विवाद में उलझा। रोजाना बयानों से बवाल मच रहे। तो दूसरी तरफ सरकार 'हाथ' की सफाई दिखाने में जुटी हुई। बवाल के बीच आम आदमी की जेब में उबाल की तैयारी। सरकार की एक्सपर्ट किरीट पारिख कमेटी ने रपट दे दी। पेट्रोल तीन रुपए, डीजल तीन से चार रुपए, केरोसिन छह रुपए और एलपीजी पर सौ रुपए प्रति सिलेंडर बढ़ाने की सिफारिश। साथ में प्राइस पॉलिसी को सरकारी नियंत्रण से हटाने का फार्मूला। जैसे विलासराव देशमुख ने राज के गुंडों को सरकारी नियंत्रण से मुक्त कर हिंदी भाषियों के खिलाफ तांडव की छूट दी। सो आप तो यही मानो, राजनीति की जय-जय।
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03/02/2010
Tuesday, February 2, 2010
जब पीएम-सीएम अपना, तो सिर्फ जुबानी तीर क्यों?
संतोष कुमार
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अपने सरकारी स्कूल में रोजाना प्रार्थना के बाद एक प्रतिज्ञा ली जाती थी। सभी छात्र-छात्राएं दांया हाथ आगे कर कहते थे- 'भारत हमारा देश है। हम सब भारतवासी भाई-बहन हैं...।' पर क्या अब प्रतिज्ञा बदलनी होगी। जो महाराष्टï्र के हैं, वो सिर्फ महाराष्टï्र को ही देश बताएंगे। और जो बाहर के हैं, क्या यह कहेंगे- 'महाराष्टï्र को छोड़कर बाकी हम सब भारतवासी हैं?' अगर राजनीति के धुरंधर यों ही जुबान चलाते रहे। तो शायद वह दिन भी दूर नहीं हो। जब राज ठाकरे के गुर्गों ने 2008 में तांडव मचाया। तो बीजेपी हो या कांग्रेस, सिर्फ आलोचना कर चुप रहीं। जेहन में तब महाराष्टï्र चुनाव थे। अब बिहार चुनाव की बारी। तो बिहारियों के हितैशी बनने में कोई पीछे नहीं। अब बीजेपी को शिवसेना से रिश्ते तोडऩे में भी शायद गुरेज न हो। विनय कटियार ने तो नितिन गडकरी की बीजेपी को नसीहत दे दी। शिवसेना से रिश्तों की समीक्षा पर जोर दिया। पर बीजेपी अभी तेल की धार देखना चाह रही। सो मंगलवार को बीजेपी ने कटियार की राय को निजी बता पल्ला झाड़ लिया। पर टेक्सी परमिट से शुरू विवाद अब वाया संघ गडकरी तक। गडकरी से कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी तक। सो शिवसेना को तो मानो संजीवनी मिल गई। कहां राज ठाकरे ने मिट्टïी पलीद करने का बीड़ा उठा लिया था। अब मराठी मानुष की लड़ाई में शिवसेना राज से बढ़त ले रही। पर चचा-भतीजे में गुरु-चेले वाली कहावत। सो चचा मराठी भाषा की बात कर रहे। तो भतीजे ने अब महाराष्टï्र में पैदा होने वाले मराठियों का नारा उछाल दिया। पर चचा-भतीजे की फुफकार को आप जाने दो। अब तो कोई शक-शुबहा नहीं। ठाकरे बंधुओं को देश की नहीं, अपनी सियासत की फिक्र। सो चंद गुंडों के सहारे तोड़-फोड़ की राजनीति पर उतारू। अब ऐसे लोगों को तरजीह देना ही बेकार। सो सवाल तो सत्ता में बैठे क्षत्रपों से पूछा जाना चाहिए। राहुल गांधी बिहार की टोह लेने पहुंचे। तो कहीं बिहारियों का दर्द समझ आया। सोमवार को मिथिला यूनिवर्सिटी में राहुल का करिश्मा नहीं चला। अलबत्ता आग-बबूला छात्रों ने सवालों की बौछार की। तो राहुल की बोलती बंद हो गई। वाकई सवाल चुभने वाले थे। अव्वल ऐसे सवाल तो हर क्षेत्र में नेताओं से पूछे जाने चाहिए। एक छात्र ने पूछा- 'जब केंद्र में आपकी सरकार, महाराष्टï्र में आपकी सरकार। तो तब आपने आवाज क्यों नहीं उठाई, जब मुंबई में बिहारियों को मारा जा रहा था।' सवाल में दम ही नहीं, विस्फोटक सवाल भी। देश में पीएम कांग्रेस का, महाराष्टï्र में सीएम कांग्रेस का। यानी पीएम-सीएम और डीएम अपनी हुकूमत का। तो कांग्रेस ने तब एकशन क्यों नहीं लिया। अगर तब घाव पर मरहम लग जाता। दोषियों को सजा मिलती। तो शायद भाषाई हुड़दंग आज नासूर नहीं बनता। पर छात्रों के सवालों के आगे निरुत्तर राहुल बिहार के गया पहुंचे। तो उन ने शिवसेना और राज ठाकरे के खिलाफ आवाज बुलंद की। याद दिलाया, 26/11 के हमले में मुंबई को बचाने वाले एनएसजी जवानों में बिहार, यूपी के थे। तब ठाकरे बंधुओं ने क्यों नहीं कहा, इन जवानों में से पहले बिहारी-यूपी वालों को हटाओ। सो राहुल की बात शिवसेना को चुभ गई। तड़के फिर जुबान चलाई। तो कहा- 'राहुल मराठी शहीदों का अपमान कर रहे।' माना, करकरे, काम्टे, सालस्कर जैसे जांबाज आफीसर ने शहादत दी। पर मुंबई की बाकी पुलिस क्या कर रही थी। बेहतर होगा, ठाकरे बंधु राम प्रधान कमेटी की रपट पढ़ लें। अब राहुल गांधी कह रहे, उत्तर भारतीयों के लिए चुप नहीं बैठेंगे। देश का दुर्भाग्य नहीं, तो और क्या। जब राहुल गांधी तक को बार-बार सफाई देनी पड़ रही। भारत हर भारतीय का। अक्टूबर में बिहार विधानसभा चुनाव होने। सो राहुल महाराष्टï्र, पंजाब, हरियाणा जैसे राज्यों की मजबूती के पीछे बिहारियों की भूमिका खुलकर बखान कर रहे। पर जब 27 अक्टूबर 2008 को राज ठाकरे की नफरत से खफा बिहार का एक छात्र राहुल राज मुंबई की बस में घुसकर राज का पता पूछ रहा था। मुंबई की पुलिस ने उस राहुल राज के ऊपर इतनी गोलियां बरसाईं। गिनना मुश्किल हो गया। पर तब होम मिनिस्टर आर.आर. पाटिल ने पुलिस कार्रवाई को जायज ठहराया। क्या कभी ऐसी फौरी कार्रवाई नफरत फैलाने वाले ठाकरे बंधुओं पर हुई? राज ठाकरे कभी गिरफ्तार हुए, तो पुलिस याचक की मुद्रा में दिखी। गिरफ्तारी के वक्त में भी राज के हाथों में सिगरेट होती थी। अब आप ही सोचो, बिहार चुनाव न होते। तो क्या राहुल गांधी के ज्ञान चक्षु यों ही बंद पड़े रहते। राज ठाकरे ने भाषाई हुड़दंग किया। तो कांग्रेस के विलासराव देशमुख से अशोक चव्हाण तक सबने सियासत के ओछे खेल में साथ निभाया। पर अब भी ठाकरे बंधुओं की जुबान जहर उगल रही। कोई जुबां बंद कराने का साहस नहीं दिखा रहा। शायद बिहार चुनाव तक जुबान के सहारे ही मामला खिंचेगा। फिर चुनाव बाद सब ठंडा। यही तो हुआ महाराष्टï्र चुनाव से पहले। हिंदी भाषियों पर हमले हुए। तो लोकसभा से जेडीयू के सांसदों ने इस्तीफा दे दिया। पर बीजेपी तब शिवसेना के डर से दुबकी रही। वही हाल कांग्रेस का। अगर तभी राज ठाकरे की नकेल कस दी होती। तो आज ऐसी नौबत न आती। अब राहुल चुप न बैठने की बात कर रहे। पर कब तक? क्या जब कांग्रेस विपक्ष में आएगी, तब शिवसेना को माकूल जवाब देंगे? पर राजनीति में नई शुरुआत का जोखिम कोई नहीं उठाना चाहता। चाहे युवा गडकरी-राहुल हों या बुजुर्ग मनमोहन-आडवाणी।
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02/02/2010
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अपने सरकारी स्कूल में रोजाना प्रार्थना के बाद एक प्रतिज्ञा ली जाती थी। सभी छात्र-छात्राएं दांया हाथ आगे कर कहते थे- 'भारत हमारा देश है। हम सब भारतवासी भाई-बहन हैं...।' पर क्या अब प्रतिज्ञा बदलनी होगी। जो महाराष्टï्र के हैं, वो सिर्फ महाराष्टï्र को ही देश बताएंगे। और जो बाहर के हैं, क्या यह कहेंगे- 'महाराष्टï्र को छोड़कर बाकी हम सब भारतवासी हैं?' अगर राजनीति के धुरंधर यों ही जुबान चलाते रहे। तो शायद वह दिन भी दूर नहीं हो। जब राज ठाकरे के गुर्गों ने 2008 में तांडव मचाया। तो बीजेपी हो या कांग्रेस, सिर्फ आलोचना कर चुप रहीं। जेहन में तब महाराष्टï्र चुनाव थे। अब बिहार चुनाव की बारी। तो बिहारियों के हितैशी बनने में कोई पीछे नहीं। अब बीजेपी को शिवसेना से रिश्ते तोडऩे में भी शायद गुरेज न हो। विनय कटियार ने तो नितिन गडकरी की बीजेपी को नसीहत दे दी। शिवसेना से रिश्तों की समीक्षा पर जोर दिया। पर बीजेपी अभी तेल की धार देखना चाह रही। सो मंगलवार को बीजेपी ने कटियार की राय को निजी बता पल्ला झाड़ लिया। पर टेक्सी परमिट से शुरू विवाद अब वाया संघ गडकरी तक। गडकरी से कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी तक। सो शिवसेना को तो मानो संजीवनी मिल गई। कहां राज ठाकरे ने मिट्टïी पलीद करने का बीड़ा उठा लिया था। अब मराठी मानुष की लड़ाई में शिवसेना राज से बढ़त ले रही। पर चचा-भतीजे में गुरु-चेले वाली कहावत। सो चचा मराठी भाषा की बात कर रहे। तो भतीजे ने अब महाराष्टï्र में पैदा होने वाले मराठियों का नारा उछाल दिया। पर चचा-भतीजे की फुफकार को आप जाने दो। अब तो कोई शक-शुबहा नहीं। ठाकरे बंधुओं को देश की नहीं, अपनी सियासत की फिक्र। सो चंद गुंडों के सहारे तोड़-फोड़ की राजनीति पर उतारू। अब ऐसे लोगों को तरजीह देना ही बेकार। सो सवाल तो सत्ता में बैठे क्षत्रपों से पूछा जाना चाहिए। राहुल गांधी बिहार की टोह लेने पहुंचे। तो कहीं बिहारियों का दर्द समझ आया। सोमवार को मिथिला यूनिवर्सिटी में राहुल का करिश्मा नहीं चला। अलबत्ता आग-बबूला छात्रों ने सवालों की बौछार की। तो राहुल की बोलती बंद हो गई। वाकई सवाल चुभने वाले थे। अव्वल ऐसे सवाल तो हर क्षेत्र में नेताओं से पूछे जाने चाहिए। एक छात्र ने पूछा- 'जब केंद्र में आपकी सरकार, महाराष्टï्र में आपकी सरकार। तो तब आपने आवाज क्यों नहीं उठाई, जब मुंबई में बिहारियों को मारा जा रहा था।' सवाल में दम ही नहीं, विस्फोटक सवाल भी। देश में पीएम कांग्रेस का, महाराष्टï्र में सीएम कांग्रेस का। यानी पीएम-सीएम और डीएम अपनी हुकूमत का। तो कांग्रेस ने तब एकशन क्यों नहीं लिया। अगर तब घाव पर मरहम लग जाता। दोषियों को सजा मिलती। तो शायद भाषाई हुड़दंग आज नासूर नहीं बनता। पर छात्रों के सवालों के आगे निरुत्तर राहुल बिहार के गया पहुंचे। तो उन ने शिवसेना और राज ठाकरे के खिलाफ आवाज बुलंद की। याद दिलाया, 26/11 के हमले में मुंबई को बचाने वाले एनएसजी जवानों में बिहार, यूपी के थे। तब ठाकरे बंधुओं ने क्यों नहीं कहा, इन जवानों में से पहले बिहारी-यूपी वालों को हटाओ। सो राहुल की बात शिवसेना को चुभ गई। तड़के फिर जुबान चलाई। तो कहा- 'राहुल मराठी शहीदों का अपमान कर रहे।' माना, करकरे, काम्टे, सालस्कर जैसे जांबाज आफीसर ने शहादत दी। पर मुंबई की बाकी पुलिस क्या कर रही थी। बेहतर होगा, ठाकरे बंधु राम प्रधान कमेटी की रपट पढ़ लें। अब राहुल गांधी कह रहे, उत्तर भारतीयों के लिए चुप नहीं बैठेंगे। देश का दुर्भाग्य नहीं, तो और क्या। जब राहुल गांधी तक को बार-बार सफाई देनी पड़ रही। भारत हर भारतीय का। अक्टूबर में बिहार विधानसभा चुनाव होने। सो राहुल महाराष्टï्र, पंजाब, हरियाणा जैसे राज्यों की मजबूती के पीछे बिहारियों की भूमिका खुलकर बखान कर रहे। पर जब 27 अक्टूबर 2008 को राज ठाकरे की नफरत से खफा बिहार का एक छात्र राहुल राज मुंबई की बस में घुसकर राज का पता पूछ रहा था। मुंबई की पुलिस ने उस राहुल राज के ऊपर इतनी गोलियां बरसाईं। गिनना मुश्किल हो गया। पर तब होम मिनिस्टर आर.आर. पाटिल ने पुलिस कार्रवाई को जायज ठहराया। क्या कभी ऐसी फौरी कार्रवाई नफरत फैलाने वाले ठाकरे बंधुओं पर हुई? राज ठाकरे कभी गिरफ्तार हुए, तो पुलिस याचक की मुद्रा में दिखी। गिरफ्तारी के वक्त में भी राज के हाथों में सिगरेट होती थी। अब आप ही सोचो, बिहार चुनाव न होते। तो क्या राहुल गांधी के ज्ञान चक्षु यों ही बंद पड़े रहते। राज ठाकरे ने भाषाई हुड़दंग किया। तो कांग्रेस के विलासराव देशमुख से अशोक चव्हाण तक सबने सियासत के ओछे खेल में साथ निभाया। पर अब भी ठाकरे बंधुओं की जुबान जहर उगल रही। कोई जुबां बंद कराने का साहस नहीं दिखा रहा। शायद बिहार चुनाव तक जुबान के सहारे ही मामला खिंचेगा। फिर चुनाव बाद सब ठंडा। यही तो हुआ महाराष्टï्र चुनाव से पहले। हिंदी भाषियों पर हमले हुए। तो लोकसभा से जेडीयू के सांसदों ने इस्तीफा दे दिया। पर बीजेपी तब शिवसेना के डर से दुबकी रही। वही हाल कांग्रेस का। अगर तभी राज ठाकरे की नकेल कस दी होती। तो आज ऐसी नौबत न आती। अब राहुल चुप न बैठने की बात कर रहे। पर कब तक? क्या जब कांग्रेस विपक्ष में आएगी, तब शिवसेना को माकूल जवाब देंगे? पर राजनीति में नई शुरुआत का जोखिम कोई नहीं उठाना चाहता। चाहे युवा गडकरी-राहुल हों या बुजुर्ग मनमोहन-आडवाणी।
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02/02/2010
Monday, February 1, 2010
चोर-चोर मौसेरे भाई नहीं, सब गोलमाल है
संतोष कुमार
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महाराष्टï्र पर महासंग्राम होने लगा। शाहरुख खान-आमिर खान से आगे बढ़ जंग अब संघ बनाम शिवसेना हो गई। संघ प्रमुख मोहन भागवत ने हिंदी भाषियों की रक्षा का एलान क्या किया। मुंबई की अपनी मांद में बैठा शेर दहाड़ उठा। बीजेपी से 26 साल की दोस्ती का कोई लिहाज नहीं। अब तक शिवसेना का बूढ़ा शेर मुखपत्र 'सामना' के जरिए दहाड़ रहा था। पर संघ परिवार से लड़ाई ठनी। तो उद्धव ठाकरे ने मोर्चा संभाला। संघ को खरी-खरी सुनाने में देर नहीं की। कहा- 'हमें देशभक्ति और एकता का पाठ न पढ़ाए संघ। जब 1992 में हिंदू-मुस्लिम दंगे हुए, तो हमने हिंदुओं की रक्षा की। तब कहां था संघ परिवार। अगर हिंदी की चिंता है, तो संघ प्रवक्ता राम माधव दक्षिण भारत में जाकर हिंदी सिखाएं।' अब बीजेपी की मुश्किल तो लाजिमी थी। आगे कुआं, तो पीछे खाई। पर नितिन गडकरी संघ के दुलारे। संघ ने बीजेपी ठीक-ठाक करने का जिम्मा सौंपा। सो बीजेपी को संघ के पक्ष में उतरना ही था। वैसे भी बीजेपी वाले संघ को मातृ संगठन मानते। सो मातृ अपमान भला बीजेपी कैसे बर्दाश्त करे। पर गडकरी ठहरे महाराष्टï्र से। सो बयान में वैसी तल्खी नहीं, जैसी उद्धव के बयान में। गडकरी ने 13 लाइन का बयान मीडिया के सामने पढ़ दिया। सो कइयों ने चुटकी ली। नागपुर से जो लिखकर आया, वही पढ़ दिया। वैसे भी कोई अपना बयान बेसुरे ढंग से क्यों पढ़ेगा। अब देखो, बीजेपी कहां आ गई। एक जमाना था, जब सोनिया गांधी लोकसभा में लिखा भाषण पढ़ती थीं। तो बीजेपी वाले कभी मणिशंकर, तो कभी जनार्दन का लिखा भाषण बता खिल्ली उड़ाते थे। पर अब गडकरी संविधान और राष्ट्रीय अस्मिता से जुड़े मुद्दे पर भी लिखित बयान पढ़े। तो आप क्या कहेंगे, अपना बयान या वाकई नागपुर से लिखकर आया? अब बयान अपना हो या नागपुर का। पर राष्ट्रीयता के मुद्दे पर जैसी बुलंद आवाज विपक्ष की होनी चाहिए, बीजेपी की नहीं थी। पूरे बयान में गडकरी ने न तो शिवसेना का नाम लिया। न किसी कार्रवाई की मांग की। अलबत्ता जनसंघ जमाने का सिद्धांत उड़ेल दिया। जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद 370 को राष्टï्रीय एकता में रोड़ा का अपना पुराना राग अलापा। पर क्या वाकई गडकरी की बीजेपी जनसंघ जमाने की? तब श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने पंडित नेहरू की पहली केबिनेट को छोड़ परमिट सिस्टम के खिलाफ जंग छेड़ी थी। आखिरकार जेल में ही शहीद हो गए। पर अबके बीजेपी में वह बात नहीं दिखी। अलबत्ता संविधान के अनुच्छेद 19 (1-ई) का जिक्र किया। देश के किसी भाग में बसने का अधिकार। भाषा, क्षेत्र या धर्म के आधार पर संघर्ष को बीजेपी स्वीकार नहीं करेगी। पर शिवसेना तो ठीक इसके उलट बात कर रही। वह सिर्फ कह नहीं रही। अलबत्ता शिवसेना और चचा को छोड़कर अलग हुए भतीजे राज ठाकरे की भी कारस्तानी देश देख चुका। सो बीजेपी शिवसेना के खिलाफ सख्त क्यों नहीं हो रही? पर शायद असली कहानी कुछ और। शिवसेना लाख जतन कर तीसरी बार भी महाराष्टï्र की कुर्सी हासिल नहीं कर पाई। शिवसेना की बौखलाहट तो नतीजों के बाद सबने देखी। जब बाल ठाकरे ने लिखा- 'मराठी मानुष ने खंजर घोंपा।' पर बदले जमाने में वोटर कट्टïरवाद की हांडी उतार चुका। फिर भी ठाकरे जुगाड़ ढूंढ रहे। उन्माद पैदा कर सत्ता तक पहुंचने की कोशिश। पर चुनाव तो कोसों दूर। सो बीजेपी-संघ परिवार बनाम शिवसेना की तनातनी एकता कपूर के सास भी कभी बहू थी धारावाहिक जैसी। सो पहले शिवसेना को देखिए। हालत खस्ता हो चुकी। बाल ठाकरे जीते जी बेटे उद्धव को सीएम बनाने का मंसूबा पाले बैठे थे। पर खुद के भतीजे ने गुड़-गोबर कर दिया। यही हाल संघ का। जबसे संघ के भेजे प्रचारक बीजेपी में राजनीति के चस्सू हो गए। संघ की बत्ती गुल होने लगी। देश भर में शाखाएं चौपट होने लगीं। रही-सही कसर सुदर्शन-भागवत के मीडिया प्रेम ने पूरी कर दी। सो जैसे शिवसेना मराठी मानुष के नाम से अपनी जमीन उपजाऊ बनाने में लगी। संघ परिवार हिंदी, हिंदू, हिंदुस्थान के बहाने शाखाओं की पैदावार बढ़ाने की जुगत में। बीजेपी में भी सब अच्छा नहीं। सो गडकरी ने मराठी-हिंदी विवाद के बहाने अनुच्छेद 370 का मामला उछाल दिया। पूरे खेल में बची कांग्रेस। तो उसका हाल, चित भी मेरी, पट भी मेरी...। मराठी वोट में सेंध लगाने को कभी राज को शह दी। तो कभी उत्तर भारतीयों के जख्म पर मरहम लगाने की कोशिश। यानी वोट बंटे, कांग्रेस को सत्ता मिली। अब ठाकरे-संघ में ठनी। तो होम मिनिस्टर पी. चिदंबरम ने भी खूंटा गाड़ दिया। बोले- 'मुंबई सबकी। कोई भी जाए और बसे।' चिदंबरम ने ऑस्ट्रेलिया, पाक के खिलाडिय़ों को मुंबई में क्रिकेट खेलने पर सुरक्षा की पूरी गारंटी ली। अब आप ही इन गोलमाल नेताओं का मतलब निकालिए। भाषाई विवाद में राजनीति के ये सभी धुरंधर सिर्फ चोर-चोर मौसेरे भाई नहीं, सगे भाई कहिए। यानी इस विवाद में सब गोलमाल है। कहने को कांग्रेस-बीजेपी संविधान की दलील दे रहीं। पर जरा सोचिए, राज ठाकरे हों या बाल ठाकरे। अगर कोई संविधान-कानून को खुली चुनौती दे। और विपक्ष-सत्तापक्ष सिर्फ जुबानी पलटवार करे। तो क्या कहेंगे आप। अगर सब गोलमाल न होता। तो महाराष्टï्र चुनाव से पहले जब राज ठाकरे के गुंडे उत्तर भारतीयों को सड़कों पर दौड़ा-दौड़ा कर मार रहे थे। तब चिदंबरम कहां थे। कांग्रेस कहां थी। बीजेपी के गडकरी कहां थे। तब तो गडकरी महाराष्टï्र बीजेपी के अध्यक्ष थे। वैसे भी शिवसेना बीजेपी-शिवसेना के बीच कोई पहली बार तलवार नहीं खिंची। राष्ट्रपति चुनाव में तकरार, फिर इकरार सबने देखी।
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01/02/2010
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महाराष्टï्र पर महासंग्राम होने लगा। शाहरुख खान-आमिर खान से आगे बढ़ जंग अब संघ बनाम शिवसेना हो गई। संघ प्रमुख मोहन भागवत ने हिंदी भाषियों की रक्षा का एलान क्या किया। मुंबई की अपनी मांद में बैठा शेर दहाड़ उठा। बीजेपी से 26 साल की दोस्ती का कोई लिहाज नहीं। अब तक शिवसेना का बूढ़ा शेर मुखपत्र 'सामना' के जरिए दहाड़ रहा था। पर संघ परिवार से लड़ाई ठनी। तो उद्धव ठाकरे ने मोर्चा संभाला। संघ को खरी-खरी सुनाने में देर नहीं की। कहा- 'हमें देशभक्ति और एकता का पाठ न पढ़ाए संघ। जब 1992 में हिंदू-मुस्लिम दंगे हुए, तो हमने हिंदुओं की रक्षा की। तब कहां था संघ परिवार। अगर हिंदी की चिंता है, तो संघ प्रवक्ता राम माधव दक्षिण भारत में जाकर हिंदी सिखाएं।' अब बीजेपी की मुश्किल तो लाजिमी थी। आगे कुआं, तो पीछे खाई। पर नितिन गडकरी संघ के दुलारे। संघ ने बीजेपी ठीक-ठाक करने का जिम्मा सौंपा। सो बीजेपी को संघ के पक्ष में उतरना ही था। वैसे भी बीजेपी वाले संघ को मातृ संगठन मानते। सो मातृ अपमान भला बीजेपी कैसे बर्दाश्त करे। पर गडकरी ठहरे महाराष्टï्र से। सो बयान में वैसी तल्खी नहीं, जैसी उद्धव के बयान में। गडकरी ने 13 लाइन का बयान मीडिया के सामने पढ़ दिया। सो कइयों ने चुटकी ली। नागपुर से जो लिखकर आया, वही पढ़ दिया। वैसे भी कोई अपना बयान बेसुरे ढंग से क्यों पढ़ेगा। अब देखो, बीजेपी कहां आ गई। एक जमाना था, जब सोनिया गांधी लोकसभा में लिखा भाषण पढ़ती थीं। तो बीजेपी वाले कभी मणिशंकर, तो कभी जनार्दन का लिखा भाषण बता खिल्ली उड़ाते थे। पर अब गडकरी संविधान और राष्ट्रीय अस्मिता से जुड़े मुद्दे पर भी लिखित बयान पढ़े। तो आप क्या कहेंगे, अपना बयान या वाकई नागपुर से लिखकर आया? अब बयान अपना हो या नागपुर का। पर राष्ट्रीयता के मुद्दे पर जैसी बुलंद आवाज विपक्ष की होनी चाहिए, बीजेपी की नहीं थी। पूरे बयान में गडकरी ने न तो शिवसेना का नाम लिया। न किसी कार्रवाई की मांग की। अलबत्ता जनसंघ जमाने का सिद्धांत उड़ेल दिया। जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद 370 को राष्टï्रीय एकता में रोड़ा का अपना पुराना राग अलापा। पर क्या वाकई गडकरी की बीजेपी जनसंघ जमाने की? तब श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने पंडित नेहरू की पहली केबिनेट को छोड़ परमिट सिस्टम के खिलाफ जंग छेड़ी थी। आखिरकार जेल में ही शहीद हो गए। पर अबके बीजेपी में वह बात नहीं दिखी। अलबत्ता संविधान के अनुच्छेद 19 (1-ई) का जिक्र किया। देश के किसी भाग में बसने का अधिकार। भाषा, क्षेत्र या धर्म के आधार पर संघर्ष को बीजेपी स्वीकार नहीं करेगी। पर शिवसेना तो ठीक इसके उलट बात कर रही। वह सिर्फ कह नहीं रही। अलबत्ता शिवसेना और चचा को छोड़कर अलग हुए भतीजे राज ठाकरे की भी कारस्तानी देश देख चुका। सो बीजेपी शिवसेना के खिलाफ सख्त क्यों नहीं हो रही? पर शायद असली कहानी कुछ और। शिवसेना लाख जतन कर तीसरी बार भी महाराष्टï्र की कुर्सी हासिल नहीं कर पाई। शिवसेना की बौखलाहट तो नतीजों के बाद सबने देखी। जब बाल ठाकरे ने लिखा- 'मराठी मानुष ने खंजर घोंपा।' पर बदले जमाने में वोटर कट्टïरवाद की हांडी उतार चुका। फिर भी ठाकरे जुगाड़ ढूंढ रहे। उन्माद पैदा कर सत्ता तक पहुंचने की कोशिश। पर चुनाव तो कोसों दूर। सो बीजेपी-संघ परिवार बनाम शिवसेना की तनातनी एकता कपूर के सास भी कभी बहू थी धारावाहिक जैसी। सो पहले शिवसेना को देखिए। हालत खस्ता हो चुकी। बाल ठाकरे जीते जी बेटे उद्धव को सीएम बनाने का मंसूबा पाले बैठे थे। पर खुद के भतीजे ने गुड़-गोबर कर दिया। यही हाल संघ का। जबसे संघ के भेजे प्रचारक बीजेपी में राजनीति के चस्सू हो गए। संघ की बत्ती गुल होने लगी। देश भर में शाखाएं चौपट होने लगीं। रही-सही कसर सुदर्शन-भागवत के मीडिया प्रेम ने पूरी कर दी। सो जैसे शिवसेना मराठी मानुष के नाम से अपनी जमीन उपजाऊ बनाने में लगी। संघ परिवार हिंदी, हिंदू, हिंदुस्थान के बहाने शाखाओं की पैदावार बढ़ाने की जुगत में। बीजेपी में भी सब अच्छा नहीं। सो गडकरी ने मराठी-हिंदी विवाद के बहाने अनुच्छेद 370 का मामला उछाल दिया। पूरे खेल में बची कांग्रेस। तो उसका हाल, चित भी मेरी, पट भी मेरी...। मराठी वोट में सेंध लगाने को कभी राज को शह दी। तो कभी उत्तर भारतीयों के जख्म पर मरहम लगाने की कोशिश। यानी वोट बंटे, कांग्रेस को सत्ता मिली। अब ठाकरे-संघ में ठनी। तो होम मिनिस्टर पी. चिदंबरम ने भी खूंटा गाड़ दिया। बोले- 'मुंबई सबकी। कोई भी जाए और बसे।' चिदंबरम ने ऑस्ट्रेलिया, पाक के खिलाडिय़ों को मुंबई में क्रिकेट खेलने पर सुरक्षा की पूरी गारंटी ली। अब आप ही इन गोलमाल नेताओं का मतलब निकालिए। भाषाई विवाद में राजनीति के ये सभी धुरंधर सिर्फ चोर-चोर मौसेरे भाई नहीं, सगे भाई कहिए। यानी इस विवाद में सब गोलमाल है। कहने को कांग्रेस-बीजेपी संविधान की दलील दे रहीं। पर जरा सोचिए, राज ठाकरे हों या बाल ठाकरे। अगर कोई संविधान-कानून को खुली चुनौती दे। और विपक्ष-सत्तापक्ष सिर्फ जुबानी पलटवार करे। तो क्या कहेंगे आप। अगर सब गोलमाल न होता। तो महाराष्टï्र चुनाव से पहले जब राज ठाकरे के गुंडे उत्तर भारतीयों को सड़कों पर दौड़ा-दौड़ा कर मार रहे थे। तब चिदंबरम कहां थे। कांग्रेस कहां थी। बीजेपी के गडकरी कहां थे। तब तो गडकरी महाराष्टï्र बीजेपी के अध्यक्ष थे। वैसे भी शिवसेना बीजेपी-शिवसेना के बीच कोई पहली बार तलवार नहीं खिंची। राष्ट्रपति चुनाव में तकरार, फिर इकरार सबने देखी।
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01/02/2010
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