Wednesday, February 10, 2010

अब शुरू हुआ महंगाई पर राजनीतिक रोना-धोना

 संतोष कुमार
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       महंगाई अब आम आदमी के लिए कैंसर बन चुकी। पर 'सरकारी अस्पताल' में इलाज चल रहा। यूपीए सरकार के डाक्टरों की टीम नब्ज नहीं भांप पा रही। पर वोट लिया, सो इलाज करना भी मजबूरी। यानी आपाधापी में मनमोहन की टीम के डाक्टर अनाप-शनाप दवा की परची लिख रहे। पर कैंसर बढ़ता जा रहा। अब शायद भगवान शिव पर दूध कम चढ़े। सो महाशिवरात्रि के दिन से दिल्ली में दूध महंगा हो जाएगा। यानी पवारनामा यों ही हवा में फुस्स नहीं होगा। दूध की कीमतें बढऩे की तारीखें तय हो चुकीं। तो उधर मुरली अपनी तान छेड़ चुके। सो पेट्रोल-डीजल-रसोई गैस और मिट्टïी तेल की कीमतों में इजाफा महज औपचारिकता भर रह गई। राहुल गांधी ने पिछले महीने ही कहा था। महंगाई अब कुछ दिनों की मेहमान। पर यहां तो पवार-देवड़ा महंगाई की मेहमाननवाजी में जुटे। दिल्ली में कांग्रेसी सीएम शीला दीक्षित को कुछ न सूझा। तो खुद ही दुकान लगाकर बैठ गईं। अब भले कल बूथों से सामान वापस गोदामों में चला जाए। पर शीला को एक दिन रोने का मौका तो मिल गया। अब इधर सरकार की लुकाछिपी। तो उधर विपक्ष को भी महंगाई याद आ गई। यों अब तक तो बीजेपी महंगाई पर आधी नींद में ही दिखी। पर बुधवार को दिल्ली के जंतर-मंतर में प्रदर्शन हुए। तो नए अध्यक्ष नितिन गडकरी के जोश का असर भी दिखा। बीजेपी के बड़ों का जमावड़ा तो हुआ ही। दिल्ली के छुटभैये नेताओं ने अपनी ताकत खूब दिखाई। सो कुल मिलाकर पहली बार बीजेपी का महंगाई पर प्रदर्शन न तो फ्लॉप रहा, न सुपर हिट। पर हिट जरूर रहा। दिल्ली बीजेपी के नेता चार्ज दिखे। पर सनद रहे, सो दिल्ली के भाजपाई नेताओं के चार्ज होने की वजह बताते जाएं। न तो अभी नितिन गडकरी की नई टीम बनी, न ही दिल्ली में संगठन के चुनाव हुए। सो पद की रेवड़ी पाने को बेताब नेताओं ने ईमानदारी से ताकत लगा दी। पर अंदर की खटपट छोड़ दें। तो बड़ी बात यही, ईमानदारी से चाहे। तो विपक्ष जिम्मेदार बन सरकार को घुटने के बल ला दे। पर राजनीति में ईमानदारी सिर्फ पल-दो पल की होती। बाकी तो आप खुद ही समझदार हैं। अब बीजेपी को देखिए। कभी भी 2004 की हार नहीं पची। ऊपर से 2009 की हार ने तो ऐसा बौखलाकर रख दिया। बीजेपी नेता आपस में एक-दूसरे के बाल नोंचने लगे। पर गडकरी ने मोर्चा संभाला। तो शुरुआती फील गुड दिख रहा। जंतर-मंतर पर प्रदर्शन हुआ। तो सुषमा स्वराज फिर प्याज के आंसू का दर्द छुपा न सकीं। कैसे 1998 में महंगी प्याज ने सुषमा को दिल्ली की सीएम पद से रुखसत कर दिया था। वाकई महंगाई का राजनीतिक दर्द पूछना हो। तो सुषमा स्वराज से पूछिए। पर विपक्ष की ईमानदारी देखिए। सोमवार को गडकरी ने महंगाई पर मोर्चा संभाला। महंगाई कैसे और क्यों बढ़ी, इस पर रंगीन बुकलैट जारी की। तो मराठा क्षत्रप शरद पवार के प्रति नरमी बरत गए। पर अगले दिन मीडिया में पवार से नरमी की खबरें छपीं। तो बुधवार को पवार पर खूब गरजे। बानगी आप भी देखिए- 'महंगाई एक दिवसीय मैच हो गई। शरद पवार कोच। सो चीनी अर्ध शतक मार रही, तो दालें शतक। पवार को आईपीएल की चिंता ज्यादा। सो पीएम क्रिकेट मंत्रालय बना पवार को क्रिकेट मंत्री बना दें।' अब कोई पूछे, आखिर इस नरमी-गरमी का क्या राज? सिर्फ इतना ही नहीं, गडकरी ने मनमोहन को महंगाई वाला शासक बताया। कहा- 'जब मनमोहन एफएम थे, तब भी महंगाई दहाई के आंकड़े के पार गई। अब पीएम हैं, तो भी यही हाल।' पर ज्यादा दिन नहीं हुए। पिछले साल की बात है, खुद आडवाणी ने मनमोहन को देश का बेहतरीन एफएम बता तारीफ की थी। गडकरी ने 'डाक्टर' शरद पवार से एक सवाल पूछा। अगर चीनी न खाने से आदमी नहीं मरेगा। तो क्या पैसा न खाने से मंत्री मर जाएंगे? अब जो भी हो, पर गडकरी ने बता दिया, सत्ता में आने के बाद मंत्री ईमानदार नहीं होते। सो गडकरी ने अब एलान-ए-जंग कर दिया। इंदौर मीटिंग के बाद 25 लाख वर्कर दिल्ली ला संसद का घेराव करने और सरकार को अंजाम तक पहुंचाने की चेतावनी दी। पर अपना छोटा सा सवाल। ऐसी आक्रामक भूमिका बीजेपी ने पहले क्यों नहीं ली? महंगाई दो-एक दिन में नहीं बढ़ी। मनमोहन जब पहली बार पीएम बने। छह महीने बाद बीजेपी में आडवाणी अध्यक्ष बने। तो 24-26 नवंबर 2004 की रांची वर्किंग कमेटी में भाषण दिया। महंगाई पर पहली दिसंबर 2004 को संसद घेराव का एलान किया। बड़ा आंदोलन भी हुआ। पर महंगाई नहीं रुकी। सो तबसे लेकर आज तक, बीजेपी इन छह साल में क्या कर रही थी? अब बुधवार का ही किस्सा लो। इधर जंतर-मंतर पर विपक्ष सफल प्रदर्शन कर रहा था। पर सरकार की नजर में विपक्ष की हैसियत देखिए, पीएम के घर कांग्रेस की कोर कमेटी पेट्रोल-डीजल महंगा करने का फैसला कर रही थी। वैसे भी एक तरफ अंजाम की बात। तो दूसरी तरफ सादगी के बहाने इंदौर में सांप-बिच्छू डिपार्टमेंट भी खोल दिया। ताकि टेंट में किसी नेता को नुकसान न हो। पर बीजेपी बुरा न माने। समूची राजनीति के लिए एक कव्वाली के बोल याद आ गए। बोल हैं- 'एक रात सांप ने नेता को डसा। नेता तो मजे में रहा, सांप चल बसा।' पर यह तो कव्वाली है। असल बात यह, भले देर सही, राजनीतिक दल दुरुस्त आए। आम आदमी के बाद महंगाई पर राजनीतिक रोना-धोना भी शुरू हो गया।
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10/02/2010

Tuesday, February 9, 2010

संघ भरोसे बीजेपी बनेगी देश की 'भाग्य विधाता'!

 संतोष कुमार
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         बीजेपी में हल्दी की रस्म पूरी हो गई। नितिन गडकरी अब मनोनीत नहीं, निर्वाचित अध्यक्ष हो गए। तेरह राज्यों और संसदीय दल को मिलाकर कुल 19 सैट में परचा दाखिल हुआ। बस तीन घंटे में परचा दाखिल से लेकर जांच और चुनाव तमाम हो गया। पहली दफा बीजेपी में चुने हुए अध्यक्ष को सर्टिफिकेट भी मिला। अब बाराती अगले हफ्ते इंदौर पहुंचेंगे। तो बाकायदा अनुमोदन भी होगा। पर इंदौर और बीजेपी का संयोग देखिए। सात साल पहले अप्रैल 2003 में यहीं वर्किंग कमेटी हुई। तब भी बीजेपी के खेवनहार युवा नेता ही थे। वेंकैया नायडू अध्यक्ष थे। फर्क सिर्फ इतना, तब मध्य प्रदेश में कांग्रेस की सरकार थी। केंद्र में वाजपेयी नीत एनडीए सरकार। अबके मध्य प्रदेश में बीजेपी की सरकार, पर केंद्र में कांग्रेस नीत सरकार। तब बीजेपी सत्ता के नशे में चूर थी। सो पूरी वर्किंग कमेटी अपनी पीठ ठोकने में ही लगी रही। वेंकैया नायडू के तबके अध्यक्षीय भाषण में संगठन पर कम, कांग्रेस को ज्यादा निशाने पर लिया। वर्करों को सिर्फ तीन अगस्त 2002 के दिल्ली संकल्प की याद दिलाई। फिर नवंबर 2003 में राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ की जीत ने तो बीजेपी को सातवें आसमान पर पहुंचा दिया। फील गुड की ऐसी बयार चली, छह महीने पहले ही लोकसभा भंग करा समर में कूद पड़े। कांग्रेस को सौ से नीचे समेटने और बीजेपी अपने बूते तीन सौ सीट लाने का दंभ भरती दिखी। वेंकैया नायडू ने फील गुड में यहां तक कह दिया- 'तीन सौ सीट लाकर बीजेपी सरकार बनाएगी। पर एनडीए के सहयोगियों को भी साथ में रखेगी।'  ऐसा लगा, जैसे बीजेपी सहयोगियों पर अहसान करेगी। पर नतीजे क्या हुए, दोहराने से क्या फायदा। फिर महाराष्टï्र चुनाव की हार। वेंकैया का पत्नी की बीमारी के बहाने इस्तीफा। सन्यास का एलान और फिर आडवाणी का खेवनहार बनना। सच तो यह, वेंकैया वाजपेयी-आडवाणी का वरदहस्त पाकर भी जेतली-प्रमोद के आगे बौने ही दिखे। जेतली-प्रमोद ने हमउम्र वेंकैया को भाव नहीं दिया। उमा भारती तो तू-तड़ाक भी कर चुकीं। सो वेंकैया ने जब इस्तीफा दिया, तो संक्रमण काल में आडवाणी से ही खिवैया बनने की गुहार लगाई। आडवाणी को भी लगा, सब संभाल लेंगे। पर जिन्ना एपीसोड ने गुड़-गोबर कर दिया। फिर संघ की पसंद राजनाथ सिंह अध्यक्ष हुए। पर इन चार सालों में भी बीजेपी का खटराग जारी रहा। लोकसभा चुनाव की लगातार दूसरी हार ने तो मानो बीजेपी को हिला दिया। नेता सार्वजनिक बयानबाजी पर उतर आए। किसी ने काम और पुरस्कार में समानता की आवाज उठाई। तो किसी ने संघ से बीजेपी को टेक ओवर करने की गुहार। संघ में भी बदलाव हो चुका था। मोहन भागवत ने कमान संभाल ली। तो पहला एजंडा बीजेपी ही बनी। आखिरकार संघ ने अपनी पसंद गडकरी को अध्यक्ष बनवा ही लिया। यानी बीजेपी का रिमोट अब सीधे संघ के हाथ। अटल-आडवाणी युग में संघ की भूमिका तो थी। पर वीटो हमेशा इन दोनों दिग्गजों का हाथ ही रहा। अब बीजेपी नए युग में प्रवेश कर चुकी। तो अटल-आडवाणी जैसा कोई दिग्गज नहीं। सो दूसरी पीढ़ी के सूरमा संघ को रिमोट सौंप आए। अब सूरमाओं में जंग हुई। तो वीटो संघ के पास। सो सूरमाओं में सबसे जूनियर नितिन गडकरी फिलहाल वीटो पॉवर से लैस। अब गडकरी वाकई बीजेपी को कुछ नया देंगे या फिर संघ का बौद्धिक पिलाएंगे। यह तो इंदौर में ही मालूम पड़ेगा। यों बीजेपी में हार के बाद जब-जब बदलाव हुए। बैक टू बेसिक की परंपरा दिखी। चुनाव से पहले एजंडा अलग होता। नतीजे सही नहीं रहे। तो संघ को खुश करने के लिए वर्किंग कमेटी में हिंदुत्व से सराबोर भाषण। पर शायद गडकरी अबके कुछ संभलकर बोलेंगे। ताकि बिहार चुनाव में दांव उल्टा न पड़े। सो गडकरी ने औपचारिक अध्यक्ष चुने जाने पर रुख में थोड़ा बदलाव किया। अब तक राजनीति को सामाजिक-आर्थिक जाल में उलझाते रहे। पर मंगलवार को आने वाले वक्त में चुनावी जीत की बात की। बोले- 'चुनावी जीत का दौर आएगा। पार्टी को देश के भाग्य विधाता के तौर पर उभारूंगा।'  यों गडकरी हों या आडवाणी-राजनाथ। पुराने भाषणों को पलट कर देखिए। तो बीजेपी हमेशा जो कहती रही, उसका लब्बोलुवाब यही- 'नियति ने बीजेपी के हाथों देश का उद्धार लिखा है।' अब गडकरी भाग्य विधाता बनाने की बात कर रहे। पर इतिहास पलटकर देखिए। जब बीजेपी सत्ता में आई, तो महज छह साल में बीजेपी के नेता 'विधाता'  बन बैठे। और पार्टी को सींचने वाले वर्कर 'भाग्य' भरोसे रह गए। अब कोई पूछे, शिवसेना और शरद पवार पर नरम रहने वाले गडकरी देश का क्या भाग्य लिखेंगे? गडकरी अध्यक्ष चुने गए। पर बीजेपी हैड क्वार्टर में बामुश्किल डेढ़-एक सौ वर्कर ही नजर आए। यों पंजाब का भंगड़ा, चेन्नई से शहनाई, उत्तराखंड से पांडव नृत्य, तो हरियाणा से नगाड़े आए। पटाखे तो बीजेपी के स्टॉक में पहले से ही पड़े। यानी अबके परिस्थितियां बदल चुकीं। गडकरी के सामने चुनौतियों का अंबार। सो अब संघ के साधक गडकरी बीजेपी को कैसे भाग्य विधाता बनाएंगे, यह वक्त बताएगा। फिलहाल तो बीजेपी इंदौर में बारात सजने की तैयारी कर रही।
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09/02/2010

Monday, February 8, 2010

'इंडिया' तो जीता, पर 'हिंदुस्तान' हार गया

 संतोष कुमार
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छज बोले, सो बोले। छलनी भी बोलती, जिसमें हजारों छेद। चीन तो आंखें दिखा ही रहा था। अब पाक भी हेकड़ी दिखा रहा। भारत ने बातचीत की पेशकश क्या रख दी। अपने मुंह मियां मि_ïू होने लगे। मुंबई हमले के बाद भारत कूटनीतिक दबाव बनाने में सफल रहा। पाक विदेश मंत्री शाह महमूद कुरैशी ऐसे दबे, कभी सूरत न दिखी। कभी-कभार रहमान मलिक भारत के दिए डोजियर पर चूं-चपड़ करते दिखे। अब महमूद कुरैशी वैसे ही उछल रहे। जैसे हलाल होने वाले बकरे को वापस बाड़े में डाल दिया हो। भारत ने सवा साल बाद पाक को सांस लेने का मौका दिया। तो पाक हुक्मरानों की पसली चलने लगी। महमूद कुरैशी इतवार को मुल्तान में सुल्तान बनने की कोशिश करते दिखे। आवाम के सामने चीखकर बोले- 'भारत हार गया। भारत ने पहले कहा था, मुंबई हमले के आरोपियों को सजा मिलने तक हमसे से बातचीत नहीं करेगा। अब तैयार हो गया। यह सब पाक की ताकत से संभव हुआ। हमने कभी अपना स्टैंड नहीं बदला, चाहे कश्मीर हो या मुंबई। इसी वजह से हमारी जीत हुई।'  एक चुटकुला बहुत पुराना। पर पाक के लिए मौजूं। एक व्यक्ति पत्नी और बच्चों के साथ स्कूटर पर जा रहा था। रास्ते में किसी से झड़प हो गई। तो सामने वाले व्यक्ति ने थप्पड़ जड़ दिया। अब वह व्यक्ति पत्नी-बच्चों के सामने पिटा। सो तिलमिला गया। फिर चुनौती दी- 'मुझे मारा, कोई बात नहीं। मेरी बीवी को मारकर दिखाओ, फिर बताता हूं।'  उस व्यक्ति ने उसकी बीवी को भी थप्पड़ मार दिया। फिर उसने यही फार्मूला अपने बच्चे के लिए कहा। और तीनों थप्पड़ खाकर चल दिए। घर जाकर बीवी ने पूछा- 'आपने तीनों को क्यों थप्पड़ मरवाया?'  व्यक्ति ने जवाब दिया- 'ताकि घर जाकर तुम मां-बेटे मेरा मजाक न उड़ा सको, मैं पिटकर आ गया।'  पाकिस्तान भारत से एकाध बार पिटा हो। तो कोई बात समझ में आए। चार बार ऐसा पिट चुका। पाक में घुसकर अपनी फौज ने जीवन-दान दिया। जनरल नियाजी का पूरी फौज के साथ आत्म-समर्पण शायद पाक भूल चुका। सो कुरैशी सिर चढ़कर बोल रहे। पर अपने राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर ने 'रश्मि रथी' में बहुत खूब लिखा- '... क्षमा शोभती उस भुजंग को, जिसके पास गरल हो। उसे क्या, जो दंतहीन, विषहीन, विनीत-सरल हो।...' सो भारत ने खुद की ओर से पहल की। ताकि दुनिया को बता सके, भारत शांति चाहता। पर पाक की बचकानी कूटनीति देख लो। पिटा हुआ मोहरा अपने दड़बे में चीखकर शेर बनने की सोच रहा। कुरैशी भारत को हारा हुआ बता रहे। सो पाकिस्तान की नीयत फिर साफ हो गई। पाक ने कभी आरोपियों पर कार्रवाई नहीं की। चाहे संसद पर हमले का मामला हो, या 26/11 के मुंबई हमले का। हर बार पाक ने सबूत मांगे। फिर उन सबूतों में नुक्स निकाल दोषियों को कोर्ट से बरी करवा दिया। पाक की अदालतें भी स्वतंत्र नहीं। वैसे भी जब लोकतंत्र ही नहीं, तो फिर कोर्ट का क्या भरोसा। पाक अपने साठ साल में करीब पचास साल तो तानाशाही दौर से ही गुजरा। सैनिक हुक्मरानों ने समूची व्यवस्था को एक डंडे से हांका। परवेज मुशर्रफ के वक्त चीफ जस्टिस इफ्तिखार चौधरी समेत कई जजों की बर्खास्तगी ही तानाशाही शासन के ताबूत की आखिरी कील साबित हुई। पर राजनीति ने ऐसी करवट ली। कभी टेन परसेंट दलाल के नाम से मशहूर, जेल की सजा भुगत चुके आसिफ अली जरदारी पाक के राष्ट्रपति हो गए। सो पहले तो पाक अपना इतिहास ठीक करे। फिर कश्मीर के भूगोल की बात। यों भले पाक के विदेश मंत्री दिल बहलाने को शेखी बघार रहे। बातचीत की पेशकश को भारत की हार बता रहे। पर कश्मीर और मुंबई के बारे में कुरैशी ने जो कहा। आखिर उस पर मनमोहन सरकार की चुप्पी क्यों? कम से कम भारत को एतराज तो जताना चाहिए था। अगर वाकई पाक का स्टैंड नहीं बदला। तो हम बातचीत करने को बेताब क्यों? अपनी सरकारें भी ऐसा क्यों करतीं, जैसा कुरैशी कर रहे। अवाम का दिल जीतने के लिए एनडीए सरकार ने संसद पर हमले के बाद ऑपरेशन पराक्रम किया। सीमा पर फौजों का जमावड़ा बढ़ाया। फिर लौटकर बातचीत की मेज पर आ गए। वही मनमोहन सरकार भी कर रही। मुंबई हमले के बाद शुरुआती छह महीने ऐसे बयान दिए। मानो अब-तब युद्ध हुआ। पर अमेरिकी दबाव में पाक को न्योता देकर वहां के हुक्मरानों को भारत ने हीरो बना दिया। आखिर कब तक चूहे-बिल्ली का यह खेल चलता रहेगा? पाक की नीयत को समझने के लिए सरकार को कितना वक्त चाहिए? अब देश की विडंबना नहीं, तो क्या कहें। बीजेपी भी मनमोहन सरकार पर घुटने टेकने का आरोप लगा रही। तो उधर पाकिस्तान भी भारत को घुटने टेकने को मजबूर बता रहा। वाकई पाक ने दिखावे को भी ऐसा कुछ नहीं किया। जो मनमोहन सरकार बातचीत को उतावली हो। पर न्योता दिया जा चुका। भले अमेरिकी दबाव में ही। पाक भी अमेरिकी शह पा अपनी पीठ ठोक रहा। तो कांग्रेस भी क्या करे। सो सोमवार को कांग्रेस ने बातचीत की पेशकश को जायज ठहराया। अब तक पाक की कार्रवाई से कांग्रेस संतुष्टï। सो जब सत्ताधारी दल संतुष्टï हो। तो बाकी अवाम की फिक्र क्यों? सो कुरैशी की बदजुबानी दरकिनार कर दें। तो मुंबई-कश्मीर जैसे मुद्दे पर स्टैंड देख यही लग रहा। अमेरिकी दबाव में 'इंडिया'  तो जीत गया। पर 'हिंदुस्तान'  हार गया। अमेरिका तो इंडिया की आवाज बना। सो जनता का हिंदुस्तान क्या कर पाता?
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08/02/2010

Friday, February 5, 2010

घरेलू ही नहीं, कूटनीति में भी फिसड्डी सरकार

 संतोष कुमार
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          इंतिहा हो गई इंतजार की। पर अपने पीएम अभी भी यही कह रहे, थोड़ा और इंतजार करिए। कांग्रेस की वर्किंग कमेटी महंगाई पर सीएम मीटिंग से ठीक पहले हुई। तो मनमोहन ने कुछ हफ्तों में सरकारी कदम के असर की सफाई दी। शरद पवार ने दस दिन में महंगाई कम होने का दावा किया था। अपने पीएम पिछले साल अगस्त की वर्किंग कमेटी में भी कुछ ऐसी ही दलील दे चुके। पर महंगाई का कुछ नहीं बिगड़ा। अलबत्ता महंगाई 'पुराण'  बन गई। मौके-बेमौके नेतागण बांच रहे। अब शनिवार को सीएम मीटिंग में बेपर्दा हों। कांग्रेस ने शुक्रवार को ही वर्किंग कमेटी कर अपनी गंभीरता का ढोंग रचाया। अब आशंकाएं तो यहां तक जताई जा रहीं। यूपीए के अर्थशास्त्रीगण कृषि में विदेशी निवेश यानी एफडीआई का रास्ता खोलने की जुगत में। सो महंगाई को जानबूझकर बेलगाम होने दिया गया। ताकि मांग-आपूर्ति, भंडारण और लचर सिस्टम पर सवाल उठे। फिर बेहतर कोल्ड स्टोरेज, मांग-आपूर्ति में संतुलन और डिस्ट्रीब्यूशन की पूरी शृंखला को दुरुस्त करने के बहाने एफडीआई की पैरवी हो। इसलिए दलील दी जा रही, कृषि क्षेत्र का उचित प्रबंधन न होने से 40 फीसदी अनाज बेकार हो रहा। कहीं ट्रांसपोर्टेशन की दिक्कत। तो कहीं स्टोरेज की। सो बेहतरी के नाम पर निवेश फार्मूला सोच रही सरकार। अब सचमुच ऐसा हुआ। तो सोचिए, कांग्रेस का 'हाथ'  किसके साथ? पर शुक्रवार को कांग्रेस ने सिर्फ महंगाई पर ढोंग नहीं किया। सुरक्षा अमले से घिरे राहुल गांधी ने मुंबई जाकर शिवसेना को चुनौती दी। एटीएम से पैसे निकाले। लोकल ट्रेन का टिकट लाइन में लग खरीदा। फिर चाक-चौबंद सुरक्षा के बीच 'आम मुसाफिरों'  की माफिक सफर किया। अब महाराष्टï्र का गृह राज्यमंत्री जूता उठाने को बैठा हो। तो ऐसी यात्रा कोई भी कर ले। राहुल की सुरक्षा में समूची सरकार और प्रशासन सड़कों पर उतरा था। सीएम अशोक चव्हाण राहुल की अगवानी में इतने तन, मन, धन से लगे रहे। सीडब्ल्यूसी की बैठक में आना भी मुनासिब न समझा। यों राहत की बात, शिवसेनिक दड़बे में ही बांध दिए गए। राहुल सकुशल मुंबई का दौरा पूरा कर पुडिचेरी चले गए। पर अपना एक छोटा सा सवाल विलासराव देशमुख, अशोक चव्हाण, आरआर पाटिल और बड़े नेता सोनिया-मनमोहन से। जब 2008 में राज ठाकरे मुंबई की सड़कों पर तांडव कर रहे थे। क्या तब महाराष्टï्र में कोई सीएम था या नहीं? पुलिस थी या नहीं? क्या सिर्फ सरकार और पुलिस सिर्फ वीआईपी के लिए होती? अगर नहीं, तो ऐसा सुरक्षा बंदोबस्त तब उत्तर भारतीयों के लिए क्यों नहीं किया गया? माना, शिवसेना को उसके गढ़ में चुनौती देकर राहुल ने माकूल जवाब दिया। पर क्या इस दौरे से शिवसेना-राज ठाकरे की ओछी सियासत बंद हो जाएगी? आखिर इस दौरे का क्या संदेश गया? यही ना, अगर शासन और प्रशासन ईमानदारी दिखाए। तो मुंबई में उत्तर भारतीय बेखौफ रह सकते हैं। अगर कांग्रेस वाकई ईमानदार। तो चचा-भतीजा ठाकरे पर कड़ी कार्रवाई का साहस दिखाए। वरना राहुल का दौरा भी महंगाई जैसा ही महज ढोंग माना जाएगा। पर शिवसेना कहां मुंह बंद रखने वाली। राहुल ने एटीएम से पैसा निकाला। तो उद्धव ठाकरे बोले- 'दिल्ली के नेता मुंबई को एटीएम यानी ऑल टाइम मनी समझते। यही मानसिकता हमें बदलनी है।' अब उद्धव ने छोटी बात से अपने वोटरों को बड़ा संदेश दे दिया। यानी अनजाने में ही सही, शिवसेना को छोटी बात से बड़ा फायदा मिल गया। सो जरूरत जुबानी जंग की नहीं। अलबत्ता कुछ करने की है, ताकि चचा-भतीजा ठाकरे पर नकेल कसी जा सके। पर अपनी सरकार जैसे घरेलू मोर्चे पर असहाय दिख रही। अब कूटनीतिक मोर्चे पर भी नाकामी का सेहरा बंध गया। कहां 26/11 के हमले के बाद भारत ने पाक को दुनिया के कटघरे में खड़ा किया। मनमोहन ने दो-टूक कह दिया। जब तक पाक दोषियों पर कार्रवाई नहीं, बातचीत नहीं। पर जुलाई 2009 में ही शर्म अल शेख जाकर पाक पीएम गिलानी संग साझा बयान कर आए। अमेरिकी दबाव में पहली बार बलूचिस्तान साझा बयान में आ गया। पर देश में बवाल मचा। बीजेपी ने सरकार को बेपर्दा किया। तो कांग्रेस घबरा गई। घबराहट में तबके विदेश सचिव और मौजूदा एनएसए ने ड्राफ्टिंग एरर कहा। तो विदेश राज्यमंत्री शशि थरूर ने साझा बयान को बंदिश नहीं माना। पर चूक तो थी, सो संसद के दोनों सदनों में मनमोहन को सफाई देनी पड़ी। फिर वही वायदा, जब तक पाक 26/11 के दोषियों पर कार्रवाई नहीं करता। सार्थक बातचीत नहीं होगी। पर ओबामा के दबाव में अब खुद भारत ने आगे बढ़ पाक के सामने बातचीत की पेशकश कर दी। इसी महीने की दो तारीखें भी सुझाईं। तो जैसे गिलानी ने शर्म अल शेख को अपनी जीत बताया था। अब भारत की पेशकश को दुनिया का दबाव बता रहे। भारत से बातचीत का विषय और एजंडा पहले साफ करने की शर्त रख दी। इसे कहते हैं, चोरी और सीनाजोरी। याद है, 22 जनवरी को ही गिलानी ने क्या कहा था। पाक 26/11 नहीं दोहराने की गारंटी नहीं दे सकता। अब पाक पीएम ऐसा बयान दे। फिर भी भारत अपनी ओर से बातचीत की पेशकश करे। तो क्या कहेंगे आप। विपक्ष को तो मनमोहन की नीयत पर संदेह। अब बजट सत्र में बीजेपी पीएम से नया वादा मांगेगी। अरुण जेतली बोले- 'संसद में हमें पीएम से स्पष्टï वायदा चाहिए कि कश्मीर पर 1994 के प्रस्ताव से नहीं हटेंगे। और ना ही सीमा के बारे में भारत की पुरानी स्थिति को छोड़ेंगे।'
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Thursday, February 4, 2010

बटला पर कितनी बार 'टकला' होगी कांग्रेस?

 संतोष कुमार
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         बटला हाउस की सियासी गूंज फिर सड़कों पर। अब कोई पूछे, चचा-भतीजा ठाकरे क्या कम थे। जो कांग्रेस के दिग्गी राजा ने बटला राग अलाप दिया। अभी भाषाई सियासत की आग बुझी भी नहीं। मजहबी सियासत को हवा मिल गई। बटला हाउस मुठभेड़ के वक्त फरार शहजाद पुलिस के शिकंजे में आया। तो दिग्विजय सिंह आजमगढ़ पहुंच गए। मुठभेड़ में मारे गए आतंकी सैफ के घर सहानुभूति जता आए। मुठभेड़ की न्यायिक जांच की मांग फिर कर दी। सो विपक्ष को हमला करने का मौका मिल गया। शिवसेना की वजह से बीजेपी बचाव की मुद्रा में थी। पर दिग्गी राजा के शिगूफे ने मुद्दा थमा दिया। सो रविशंकर प्रसाद ने दिग्गी राजा को फौरन बीमार राजनीतिक मानसिकता का शिकार बता दिया। मुठभेड़ पर अब तक हुई सियासत का कच्चा चि_ïा भी खोला। कांग्रेस से पूछा, एक तरफ ऑपरेशन बटला हाउस में शहीद इंस्पेक्टर मोहन चंद शर्मा को अशोक चक्र। तो दूसरी तरफ बार-बार जांच की मांग और आतंकियों के घर जाना किस बात का परिचायक। बीजेपी ने कांग्रेस से एक और सवाल पूछा। आतंकियों के परिवार से सहानुभूति। तो आतंक के शिकार लोगों की फिक्र क्यों नहीं। क्या कभी कोई कांग्रेसी आतंक के शिकार लोगों के घर गया? यों सवाल सोलह आने सही। पर राजनेताओं से कैसी उम्मीद। यूपीए-वन में सरकार आतंकवादियों के आश्रितों की खातिर विशेष पैकेज लाने की सोच रही थी। मानवाधिकार के नाम पर ऐसी पहल हुई। ताकि आतंकियों के बेसहारा परिवार को पेंशन मिल सके। पर विवाद की संभावना से सरकार पीछे हट गई। अब बटला हाउस मुठभेड़ का सियासतनामा देखो। तो दिल्ली बम धमाकों की जांच करते हुए पुलिस को बटला हाउस की भनक मिली। जहां कुछ आतंकी अगली साजिश रच रहे थे। सो 18 सितंबर 2008 को पुलिस ने धावा बोला। दो आतंकी मौके पर मार गिराए गए। बाकी दो-तीन फरार हो गए। ऑपरेशन में दिल्ली पुलिस के जांबाज आफीसर मोहन चंद शर्मा शहीद हो गए। पर शर्मा की चिता की आग ठंडी भी नहीं पड़ी थी। सियासत करने वाले बटला हाउस पहुंच गए। तब अमर-मुलायम कांग्रेस के करीब थे। सो अमर ने हल्ला बोला। एक तरफ अमर सिंह ने मोहन चंद शर्मा के परिवार को प्रोत्साहन के तौर पर चैक भी दिया। दूसरी तरफ मुठभेड़ की न्यायिक जांच की मांग की। सो खफा परिजनों ने अमर का चैक लौटा दिया। पर बात यहीं खत्म नहीं हुई। तब भी दिग्विजय सिंह ने न्यायिक जांच की मांग का मोर्चा खोला। मामला सोनिया से लेकर पीएम मनमोहन के दरबार तक पहुंचा। कांग्रेस के अल्पसंख्यक मोर्चा के चीफ इमरान किदवई पूरे दल-बल के साथ पीएम से मिले। पर पीएम ने बैरंग लौटा बटला हाउस मुठभेड़ की जांच की मांग खारिज कर दी। आखिर मनमोहन के पास कोई चारा नहीं था। सितंबर में इस्पेक्टर शर्मा शहीद हुए। जनवरी 2009 में अशोक चक्र से सम्मानित किया गया। वैसे भी दिल्ली पुलिस कोई शीला सरकार के मातहत नहीं। केंद्रीय गृह मंत्रालय के ही अधीन। सो न्यायिक जांच होती, तो भी कटघरे में कांग्रेस ही खड़ी होती। अब दिग्गी राजा ने फिर सुर्रा छोड़ा। तो सपा से आउट अमर सिंह कहां चुप रहने वाले। उन ने एक नया सुर्रा छोड़ दिया। कह रहे, सोनिया जांच को तैयार थीं। मनमोहन राजी नहीं हुए। अब अमर के सुर्रे का मतलब आप समझ लें। अमर अपने लिए कोई ठौर ढूंढ रहे। सो कभी सोनिया के मुरीद, तो कभी मायावती के। पर बात सिर्फ दिग्गी राजा की। सो गुरुवार को जब चौतरफा घिर गए। खुद कांग्रेस ने दिग्गी से किनारा कर लिया। तो दिग्गी भी पलटी मार गए। अब कह रहे, मुठभेड़ को फर्जी नहीं कहा। सिर्फ पूछा- 'मारे गए लड़के के सिर पर गोली कैसे?' पर दिग्गी राजा किससे पूछ रहे? केंद्र में कांग्रेस की सरकार। दिल्ली में भी कांग्रेस की सरकार। दिग्गी कोई ऐरे-गैरे छुटभैये नेता भी नहीं। कांग्रेस के जनरल सैक्रेट्री। वह भी यूपी जैसे बड़े सूबे के इंचार्ज। तो क्या डेढ़ेक साल में भी अपनी सरकार से जवाब नहीं ले पाए। पर दिग्गी राजा की यह कैसी पलटी। मानवाधिकार आयोग ने जांच में मुठभेड़ को सही पाया। हाईकोर्ट-सुप्रीम कोर्ट ने अलग जांच की याचिका ठुकरा दी। पर दिग्गी कह रहे, मानवाधिकार आयोग कोई जांच एजेंसी नहीं। यों दिग्गी का समुदाय विशेष के प्रति प्रेम का दिखावा जगजाहिर। हिंदू आतंकवाद शब्द दिग्गी राजा की ही देन। फिर भी आजमगढ़ में घुसने पर उलेमा काउंसिल का विरोध था। सो बटला हाउस सियासत का पारा चढ़ा दिया। अब कांग्रेस से कोई क्या उम्मीद करे। कभी तुष्टिïकरण के नाम पर मजहब की सियासत। तो महाराष्टï्र में मराठी की सियासत में भी कांग्रेस कम जिम्मेदार नहीं। चचा और भतीजे के बीच आगे बढऩे की होड़। अब भतीजा राज अलग महाराष्टï्र देश की धमकी दे रहा। शिवसेना ने इटालियन मम्मी कह राहुल गांधी पर हमला बोला। तो राज ठाकरे ने राहुल को रोम पुत्र कहा। राहुल शुक्रवार को मुंबई जाएंगे। तो शिवसेनिक काला झंडा दिखाने की तैयारी में। पर कांग्रेस की सरकार अभी भी सिर्फ गीदड़-भभकी दे रही। सो दो साल पहले राज ठाकरे ने गुंडई की। तो भी कांग्रेस सवालों के घेरे में थी। अब भी जुबान चलाने के सिवा कुछ नहीं कर रही। वही पुराना राग, एडवोकेट जनरल से राय-कानूनी सलाह-मशविरा आदि-आदि। सो भाषाई सियासत हो या बटला कांड, कांग्रेस हर बार टकला यानी बेनकाब हुई।
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04/02/2010

Wednesday, February 3, 2010

तो बवाल के बीच जेब में उबाल की तैयारी

 संतोष कुमार
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       आखिर भाषाई हुड़दंग भाषा की लक्ष्मण रेखा लांघ ही गया। नेता गाली-गलौज पर उतर आए। बीजेपी के विनय कटियार ने बाल ठाकरे से पूछा। क्या मुंबई आपके बाप की। पर बीजेपी कटियार से इत्तिफाक नहीं रख रही। सो शिवसेना अभी बीजेपी पर संयत। पर राहुल गांधी ने चचा-भतीजे ठाकरे को चुनौती दी। तो मुंहफट ठाकरे की भाषा संयत नहीं रही। सो मुखपत्र 'सामना'  में बूढ़े शेर की गर्जना हुई। राहुल ने महाराष्टï्र सबका बताया। तो ठाकरे ने सोनिया गांधी के विदेशी मूल पर हमला बोल कांग्रेसियों को फिर चिढ़ाया। लिखा- 'महाराष्टï्र भारतीयों का तो हो सकता। पर इटालियन मम्मी का कैसे हो सकता। जो महाराष्टï्र के रास्ते में अड़ता है। महाराष्टï्र उसे घुटने टेकने पर मजबूर कर देता है। मुंबई को धर्मशाला नहीं बनाओ। वरना अंजाम बुरा होगा।'  पर सबको पता, विदेशी मूल का मुद्दा टांय-टांय फिस्स हो चुका। सो कांग्रेसियों ने ठाकरे की टिप्पणियों को भाव नहीं दिया। वैसे भी चुनाव से पहले राहुल मराठी विवाद से बिहार में पैर जमा रहे। सो कांग्रेस रफ्ता-रफ्ता कार्ड आजमा रही। ठाकरे जितनी कठोर भाषा राहुल के लिए इस्तेमाल करेंगे। कांग्रेस को उतना ही फायदा। हवा का यह रुख कांग्रेस कई बार देख चुकी। नरेंद्र मोदी से लेकर प्रमोद महाजन तक। सोनिया गांधी के खिलाफ शब्दों के खूब तीर चलाए। हताशा में भाषा की मर्यादा इस कदर लांघी गई। खुद बीजेपी के पुरोधा अटल बिहारी वाजपेयी को मर्यादा का पाठ पढ़ाना पड़ा। पर यहां तो शिवसेना के पुरोधा ही मर्यादा की आहुति दे रहे। राहुल गांधी के बयान से इस कदर बौखलाई। बाल ठाकरे ने अपने मुखपत्र में बयानबाजी की हदें पार कर दीं। मुद्दे से परे हट राहुल को जो कहा। आप भी देख लें- 'राहुल गांधी के सिर पर सींग निकल आए हैं। इसलिए अनाप-शनाप बयान दे रहे हैं। राहुल की उम्र ज्यादा हो गई। फिर भी शादी नहीं हुई। सो राहुल का मानसिक संतुलन बिगड़ गया।'  क्या जिनकी शादी नहीं होती, उनका मानसिक संतुलन बिगड़ जाता? शायद शिवसेना भूल गई, पूर्व राष्टï्रपति कलाम ने शादी नहीं की। पर बड़े वैज्ञानिक और भारत रत्न बने। अपने वाजपेयी भी कुंवारे। पर देश के पीएम बने। सो शिवसेना के बयान का क्या मतलब। कहीं ऐसा तो नहीं, बाल ठाकरे ने नाम तो राहुल का लिया। निशाना संघ प्रमुख मोहन भागवत हों। संघ के सभी पूर्ण कालिक प्रचारक कुंवारे ही तो होते। आखिर उत्तर भारतीयों की रक्षा का बीड़ा उठा मोहन भागवत ने ही शिवसेना की दुखती रग पर हाथ रखा था। पर ठाकरे ने संघ को संयत भाषा में जवाब दिया। बाकी शाहरुख खान हों या राहुल गांधी। शिवसेना ने हर बयान पर पलटवार किया। अगर किसी पर पलटवार नहीं हुआ, तो वह सिर्फ नितिन गडकरी का बयान। संघ ने मोर्चा खोला। तो नितिन गडकरी ने संविधान की दुहाई देकर एक पन्ने का बयान पढ़ दिया। नाम शिवसेना का नहीं लिया। सो शायद शिवसेना ने लिहाज रखा। तभी तो मराठी विवाद पर बयानों के जहर बुझे तीर हवा में टकरा रहे। पर बीजेपी दो दिन पुराने बयान से इतर एक शब्द कहने को राजी नहीं। कांग्रेस और राहुल की आलोचना करने में बीजेपी देर नहीं कर रही। पर ज्यों ही सवाल शिवसेना का आता। गाड़ी घूमकर गडकरी के बयान पर पहुंच जाती। अब एक और बात सामने आ रही। आडवाणी ने खुद बाल ठाकरे से फोन पर बात की। अब बीजेपी के बयान पर शिवसेना पलटवार नहीं कर रही। तो क्या यह सांठगांठ का सबूत नहीं? राज ठाकरे का बढ़ता दायरा और शिवसेना का सिमटता कुनबा बीजेपी के लिए भी चिंता की बात। सो घालमेल कर दोनों खेल रहे। मराठी कार्ड से शिवसेना को हीरो बनाने की कोशिश। ताकि राज ठाकरे का मक्कू कसा जा सके। यानी महाराष्टï्र में शिवसेना को मराठी पिच। तो इसी बहाने बीजेपी अनुच्छेद 370 को उछाल हिंदुत्व कार्ड खेलने की तैयारी में। ऐसा हुआ, तो कांग्रेस भी घिरेगी। सो अब लड़ाई शिवसेना बनाम कांग्रेस करा बीजेपी मौज ले रही। बीजेपी के एक मराठी नेता तो खुद बता रहे थे। ताजा विवाद तो 15 दिन में थम जाएगा। पर तीन-चार महीने में इस तरह के तीन-चार और राउंड होंगे। अब हाथ कंगन को आरसी क्या, पढ़े-लिखे को फारसी क्या। अब करुणानिधि भी शिवसेना-मनसे पर लगाम की बात कर रहे। खुद भी हिंदी विरोधी न होने की सफाई दे रहे। पर इतिहास करुणा की निधि देख चुका। सो लोकसभा स्पीकर मीरा कुमार का विचार उम्दा लगा। ठाकरे जैसे लोगों को तवज्जो मत दो। विवाद खुद-ब-खुद ठंडा पड़ जाएगा। यानी अपना मीडिया भी जिम्मेदार हो। पर जब तक नेता ईमानदार न हो, कुछ नहीं होने वाला। अभी भी शिवसेना शाहरुख खान को धमकी दे रही। तो बीजेपी सुर में सुर मिला रही। खेल को राजनीति से अलग रखने की दलील भी, साथ में शाहरुख को नसीहत भी। पर यह क्या बात हुई, खेल संघों में राजनीति तो घुन की तरह घुसी हुई। सो इधर देश भाषाई विवाद में उलझा। रोजाना बयानों से बवाल मच रहे। तो दूसरी तरफ सरकार 'हाथ'  की सफाई दिखाने में जुटी हुई। बवाल के बीच आम आदमी की जेब में उबाल की तैयारी। सरकार की एक्सपर्ट किरीट पारिख कमेटी ने रपट दे दी। पेट्रोल तीन रुपए, डीजल तीन से चार रुपए, केरोसिन छह रुपए और एलपीजी पर सौ रुपए प्रति सिलेंडर बढ़ाने की सिफारिश। साथ में प्राइस पॉलिसी को सरकारी नियंत्रण से हटाने का फार्मूला। जैसे विलासराव देशमुख ने राज के गुंडों को सरकारी नियंत्रण से मुक्त कर हिंदी भाषियों के खिलाफ तांडव की छूट दी। सो आप तो यही मानो, राजनीति की जय-जय।
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03/02/2010

Tuesday, February 2, 2010

जब पीएम-सीएम अपना, तो सिर्फ जुबानी तीर क्यों?

 संतोष कुमार
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         अपने सरकारी स्कूल में रोजाना प्रार्थना के बाद एक प्रतिज्ञा ली जाती थी। सभी छात्र-छात्राएं दांया हाथ आगे कर कहते थे- 'भारत हमारा देश है। हम सब भारतवासी भाई-बहन हैं...।'  पर क्या अब प्रतिज्ञा बदलनी होगी। जो महाराष्टï्र के हैं, वो सिर्फ महाराष्टï्र को ही देश बताएंगे। और जो बाहर के हैं, क्या यह कहेंगे- 'महाराष्टï्र को छोड़कर बाकी हम सब भारतवासी हैं?'  अगर राजनीति के धुरंधर यों ही जुबान चलाते रहे। तो शायद वह दिन भी दूर नहीं हो। जब राज ठाकरे के गुर्गों ने 2008 में तांडव मचाया। तो बीजेपी हो या कांग्रेस, सिर्फ आलोचना कर चुप रहीं। जेहन में तब महाराष्टï्र चुनाव थे। अब बिहार चुनाव की बारी। तो बिहारियों के हितैशी बनने में कोई पीछे नहीं। अब बीजेपी को शिवसेना से रिश्ते तोडऩे में भी शायद गुरेज न हो। विनय कटियार ने तो नितिन गडकरी की बीजेपी को नसीहत दे दी। शिवसेना से रिश्तों की समीक्षा पर जोर दिया। पर बीजेपी अभी तेल की धार देखना चाह रही। सो मंगलवार को बीजेपी ने कटियार की राय को निजी बता पल्ला झाड़ लिया। पर टेक्सी परमिट से शुरू विवाद अब वाया संघ गडकरी तक। गडकरी से कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी तक। सो शिवसेना को तो मानो संजीवनी मिल गई। कहां राज ठाकरे ने मिट्टïी पलीद करने का बीड़ा उठा लिया था। अब मराठी मानुष की लड़ाई में शिवसेना राज से बढ़त ले रही। पर चचा-भतीजे में गुरु-चेले वाली कहावत। सो चचा मराठी भाषा की बात कर रहे। तो भतीजे ने अब महाराष्टï्र में पैदा होने वाले मराठियों का नारा उछाल दिया। पर चचा-भतीजे की फुफकार को आप जाने दो। अब तो कोई शक-शुबहा नहीं। ठाकरे बंधुओं को देश की नहीं, अपनी सियासत की फिक्र। सो चंद गुंडों के सहारे तोड़-फोड़ की राजनीति पर उतारू। अब ऐसे लोगों को तरजीह देना ही बेकार। सो सवाल तो सत्ता में बैठे क्षत्रपों से पूछा जाना चाहिए। राहुल गांधी बिहार की टोह लेने पहुंचे। तो कहीं बिहारियों का दर्द समझ आया। सोमवार को मिथिला यूनिवर्सिटी में राहुल का करिश्मा नहीं चला। अलबत्ता आग-बबूला छात्रों ने सवालों की बौछार की। तो राहुल की बोलती बंद हो गई। वाकई सवाल चुभने वाले थे। अव्वल ऐसे सवाल तो हर क्षेत्र में नेताओं से पूछे जाने चाहिए। एक छात्र ने पूछा- 'जब केंद्र में आपकी सरकार, महाराष्टï्र में आपकी सरकार। तो तब आपने आवाज क्यों नहीं उठाई, जब मुंबई में बिहारियों को मारा जा रहा था।'  सवाल में दम ही नहीं, विस्फोटक सवाल भी। देश में पीएम कांग्रेस का, महाराष्टï्र में सीएम कांग्रेस का। यानी पीएम-सीएम और डीएम अपनी हुकूमत का। तो कांग्रेस ने तब एकशन क्यों नहीं लिया। अगर तब घाव पर मरहम लग जाता। दोषियों को सजा मिलती। तो शायद भाषाई हुड़दंग आज नासूर नहीं बनता। पर छात्रों के सवालों के आगे निरुत्तर राहुल बिहार के गया पहुंचे। तो उन ने शिवसेना और राज ठाकरे के खिलाफ आवाज बुलंद की। याद दिलाया, 26/11 के हमले में मुंबई को बचाने वाले एनएसजी जवानों में बिहार, यूपी के थे। तब ठाकरे बंधुओं ने क्यों नहीं कहा, इन जवानों में से पहले बिहारी-यूपी वालों को हटाओ। सो राहुल की बात शिवसेना को चुभ गई। तड़के फिर जुबान चलाई। तो कहा- 'राहुल मराठी शहीदों का अपमान कर रहे।'  माना, करकरे, काम्टे, सालस्कर जैसे जांबाज आफीसर ने शहादत दी। पर मुंबई की बाकी पुलिस क्या कर रही थी। बेहतर होगा, ठाकरे बंधु राम प्रधान कमेटी की रपट पढ़ लें। अब राहुल गांधी कह रहे, उत्तर भारतीयों के लिए चुप नहीं बैठेंगे। देश का दुर्भाग्य नहीं, तो और क्या। जब राहुल गांधी तक को बार-बार सफाई देनी पड़ रही। भारत हर भारतीय का। अक्टूबर में बिहार विधानसभा चुनाव होने। सो राहुल महाराष्टï्र, पंजाब, हरियाणा जैसे राज्यों की मजबूती के पीछे बिहारियों की भूमिका खुलकर बखान कर रहे। पर जब 27 अक्टूबर 2008 को राज ठाकरे की नफरत से खफा बिहार का एक छात्र राहुल राज मुंबई की बस में घुसकर राज का पता पूछ रहा था। मुंबई की पुलिस ने उस राहुल राज के ऊपर इतनी गोलियां बरसाईं। गिनना मुश्किल हो गया। पर तब होम मिनिस्टर आर.आर. पाटिल ने पुलिस कार्रवाई को जायज ठहराया। क्या कभी ऐसी फौरी कार्रवाई नफरत फैलाने वाले ठाकरे बंधुओं पर हुई? राज ठाकरे कभी गिरफ्तार हुए, तो पुलिस याचक की मुद्रा में दिखी। गिरफ्तारी के वक्त में भी राज के हाथों में सिगरेट होती थी। अब आप ही सोचो, बिहार चुनाव न होते। तो क्या राहुल गांधी के ज्ञान चक्षु यों ही बंद पड़े रहते। राज ठाकरे ने भाषाई हुड़दंग किया। तो कांग्रेस के विलासराव देशमुख से अशोक चव्हाण तक सबने सियासत के ओछे खेल में साथ निभाया। पर अब भी ठाकरे बंधुओं की जुबान जहर उगल रही। कोई जुबां बंद कराने का साहस नहीं दिखा रहा। शायद बिहार चुनाव तक जुबान के सहारे ही मामला खिंचेगा। फिर चुनाव बाद सब ठंडा। यही तो हुआ महाराष्टï्र चुनाव से पहले। हिंदी भाषियों पर हमले हुए। तो लोकसभा से जेडीयू के सांसदों ने इस्तीफा दे दिया। पर बीजेपी तब शिवसेना के डर से दुबकी रही। वही हाल कांग्रेस का। अगर तभी राज ठाकरे की नकेल कस दी होती। तो आज ऐसी नौबत न आती। अब राहुल चुप न बैठने की बात कर रहे। पर कब तक? क्या जब कांग्रेस विपक्ष में आएगी, तब शिवसेना को माकूल जवाब देंगे? पर राजनीति में नई शुरुआत का जोखिम कोई नहीं उठाना चाहता। चाहे युवा गडकरी-राहुल हों या बुजुर्ग मनमोहन-आडवाणी।
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02/02/2010