संतोष कुमार
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जन, गण, मन और महामहिम के अभिभाषण से नए साल का पहला सत्र शुरू हो गया। अभिभाषण भले राष्टï्रपति के नाम से होता। पर सही मायने में यह केबिनेट का ही दस्तावेज। सो अभिभाषण को लेकर वही पुराना राग। सत्ताधारी दल सरकार की वाहवाही कर रहे। तो विपक्षी दल नाम के अनुरूप। बीजेपी में किसी ने सरकारी इश्तिहार कहा। तो किसी ने पुरानी बोतल में पुरानी शराब। पर कांग्रेस ने उपलब्धियों और भविष्य की सोच का दस्तावेज बताया। अब भविष्य का दस्तावेज आम आदमी को हड़काने वाला हो। तो फिर यह दस्तावेज कांग्रेस को ही मुबारक। आखिर महंगाई पर कितने बहाने बनाएगी सरकार। कभी बीजिंग ओलंपिक, कभी महामंदी, कभी एनडीए राज पर दोषारोपण, तो कभी आम आदमी के खाने की आदत में बदलाव बहाने बने। मौसम की तो पूछो ही मत। जब-जब मौसम बदला, शरद पवार ने सुर्रा छोड़ महंगाई बढ़वा दी। जो चीज महंगी न होनी थी, पवार के बयान से रातों-रात महंगी हो गई। महंगाई के हर आंकड़े के साथ सरकार ने अपने माथे की लकीरें भी दिखाईं। पर महंगाई न रुकनी थी, न रुकी। दस दिन में महंगाई रोकने के दावे तो कबके फुस्स हो गए। अब दो महीने का वक्त लिया। तो वक्त से पहले नया बहाना ढूंढ लिया। राष्टï्रपति अभिभाषण में सरकार की दलील वाकई शर्मनाक। जरा और भी गौर फरमाइए। सरकार ने किसानों को उपज मूल्य ज्यादा दिया। इसलिए महंगाई बढ़ी। सरकार ने सोशल सैक्टर में ज्यादा धन लगाया। इसलिए महंगाई बढ़ी। सरकार ने नरेगा जैसी योजनाओं में लोगों को काम दिया। सो सौ रुपए से कम दिहाड़ी पाने वाले ज्यादा अमीर हो गए। क्रय शक्ति अचानक बढ़ गई। सो मांग बढ़ी, आपूर्ति घट गई। अब सरकार की इस दलील को क्या कहेंगे आप। अपनी नजर में यही, सरकार आम आदमी को अब सिर्फ चिढ़ा ही नहीं रही। अलबत्ता अहसानफरामोश भी बता रही। अभिभाषण में कहा- 'महंगाई सर्वांगीण विकास की स्कीमों में कार्यान्वयन की झलक है।' दलील ऐसी, मानो आम आदमी की गैरत को दुत्कारते हुए यही कह रही- 'तुम्हें इतना कुछ दिया। आमदनी बढ़ा दी, विकास दर बढ़ा दी, फिर भी थोड़ी सी महंगाई बर्दाश्त नहीं कर पा रहे। शर्म आनी चाहिए।' अब सरकार आम आदमी के हित में ऐसी दलील दे। तो संसद में बहसबाजी बेमायने ही समझो। यानी सरकार भी अपनी मजबूरी समझ चुकी। सो विपक्ष के तीखे तेवर देख सहम गई। बीजेपी सबसे पहले महंगाई पर बहस चाहती। ताकि इंदौर से जो संकल्प लेकर लौटी, उसे पूरा कर सके। सो बीजेपी ने ठान लिया। बहस होगी, तो कामरोको प्रस्ताव के तहत। कामरोको प्रस्ताव के तहत आखिर में वोटिंग का प्रावधान। सो सरकार को डर, महंगाई पर विपक्ष के साथ कुछ घटक दलों ने भी जुगलबंदी कर ली। तो भरी संसद में मुंह काला होगा, इस्तीफे का नैतिक दबाव भी। वैसे भी विपक्ष की बदली सूरत और सीरत सरकार की नींद उड़ा चुकीं। बीजेपी की कमान अब पूरी तरह से युवा नेतृत्व के हाथ। सो युवा अब बड़ी जिम्मेदारी और बड़े ओहदे के साथ भविष्य की लड़ाई लड़ेंगे। आडवाणी तो युवा खासतौर से नितिन गडकरी के इतने मुरीद हो चुके। इंदौर में मंच पर तारीफ कर नहीं थके। सो अब सोमवार को ब्लॉग पर गडकरीनामा लिख दिया। मंगलवार को पहली बार गडकरी संसदीय दल की मीटिंग में शिरकत करेंगे। तो वहां भी इंदौर जैसा जोश भरने की कोशिश होगी। यानी कुल मिलाकर महंगाई से ज्यादा विपक्ष की बदली सूरत-सीरत सरकार को चौकन्नी कर रही। तभी तो दिखाने को परंपरा तोड़ धन्यवाद प्रस्ताव से पहले सरकार बहस को राजी हो गई। पर कोमरोको प्रस्ताव का जोखिम उठाने से कतरा रही। यों महंगाई इतनी बेलगाम हो चुकी। कामरोको आए या दामरोको, आम आदमी को राहत मिलती नहीं दिख रही। वैसे भी पिछले कुछ सालों से संसद के हर सत्र में महंगाई पर चर्चा धार्मिक अनुष्ठïान बन चुकी। सत्र से पहले राजनीतिक दल महंगाई पर कुर्ता फाड़ते। पर सदन में बहस होती, तो महज मु_ïीभर सांसद हाजिरी बजाने को रह जाते। सो सरकार भी आनन-फानन में बहस पूरी करा लेती। पर विपक्ष अबके खम ठोककर यही कह रहा। अगर 21 अप्रैल से पहले महंगाई पर नकेल न कसी। तो मनमोहन को गद्दी से उतार कर ही दम लेंगे। अब बीजेपी जनता में खोया अपना भरोसा कितना लौटा पाई। यह तो 21 अप्रैल को ही दिखेगा, जब महंगाई के खिलाफ संसद पर हल्ला बोल होगा। पर अब तो मनमोहन सरकार के सहयोगी ही नहीं, कांग्रेसी भी महंगाई को बला मान रहे। सोमवार को मीडिया ने संसद के अहाते में कुछ नेताओं से सवाल पूछे। क्या देश को महंगाई मंत्री चाहिए? तो विपक्ष का जवाब छोडि़ए। कांग्रेसी लालसिंह हों या जगदंबिका पाल या मंत्री सलमान खुर्शीद। जवाब का अंदाज अलग, पर मान लिया, महंगाई बड़ी बलवान। पर अपनी सरकार तो कबकी हार मान चुकी। अभिभाषण की दलीलें भी यही साफ कर रहीं, महंगाई काबू से बाहर जा चुकी। अब एकमात्र उम्मीद देश की संसद से। पर अपनी संसद सत्ता की कटपुतली हो चुकी। सो मंगलवार को महंगाई और अपनी संसद के बीच महामुकाबला होगा। तो उम्मीद यही, जीतेगी महंगाई, हारेगा संसद। अब ऐसा हुआ, तो संसद से भी राहत की उम्मीद खो चुका आम आदमी क्या स्वर्ग की बाट जोहेगा? गौरव दिखाने को संसद में जन, गण, मन तो हुआ। पर आम आदमी का जन, गण, मन कब? क्या आम आदमी स्वर्ग से ही राहत की उम्मीद करे?
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22/02/2010
Monday, February 22, 2010
Friday, February 12, 2010
तो सवाल, बीजेपी को जनता ने हराया या ईवीएम ने?
संतोष कुमार
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क्या वाकई अपना लोकतंत्र जोखिम में है? क्या दो टर्म से मनमोहन की सरकार सचमुच जनता ने नहीं चुनी? आप मानें या न मानें, पर देश की प्रमुख विपक्षी पार्टी यही मान रही। भले शब्दों को घुमाफिरा कर सवाल उठा रही। पर निचोड़ यही- ईवीएम में बड़ा गड़बड़झाला। इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन से छेड़छाड़ संभव बता बीजेपी वापस बैलट की पैरवी कर रही। अब आगे बढऩे से पहले थोड़ा विवाद की शुरुआत देख लीजिए। मौजूदा लोकसभा चुनाव नतीजों के बाद सवाल उठे। दिल्ली के पूर्व चीफ सैक्रेट्री उमेश सहगल ने सुर्रा छोड़ा। तो बीजेपी ने फौरन कैच कर लिया। आडवाणी ने सवाल उठाए। तो यहीं पर हमने भी सवाल का स्वागत किया। तब चुनाव आयोग से यही उम्मीद भी जताई थी कि अगर विपक्ष को एतराज है। तो परीक्षण होने दे। ऐसा हुआ भी, चुनाव आयोग ने तीन दिन की खुली चुनौती दी। पर ईवीएम को झुठलाने वाला कोई शख्स नहीं पहुंचा। अभी 25 जनवरी को जब चुनाव आयोग ने अपनी हीरक जयंती मनाई। तो आडवाणी ने फिर सवाल उठाए। पर कहीं बहस शुरू नहीं हुई। सो अब बीजेपी वर्किंग कमेटी के मेंबर और मशहूर सैफोलॉजिस्ट जीवीएल नरसिम्हा राव ने किताब लिख दी। किताब का नाम 'डैमोक्रेसी एट रिस्क!' रखा। जिसकी प्रस्तावना खुद आडवाणी ने लिखी। शुक्रवार को नितिन गडकरी ने लोकार्पण किया। तो मौके पर तीन-तीन विदेशी एक्सपर्ट ईवीएम झुठलाने को बुलाए गए थे। जर्मनी, नीदरलैंड और यूएसए के एक्सपर्टों का लब्बोलुवाब यही रहा। ईवीएम के साथ पेपर बैकअप भी हो। पर बीजेपी की असली पोल तो समारोह के अहम गैस्ट पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त जीवीजी कृष्णमूर्ति ने खोलकर रख दी। उन ने बीजेपी की बैलट सिस्टम वाली मांग पर कुछ नहीं कहा। अलबत्ता बीजेपी को उम्दा सुझाव दे गए। अब बीजेपी कितना अमल करेगी, यह तो मालूम नहीं। पर शायद आप-हम कृष्णमूर्ति की राय से सहमत होंगे। उन ने जो कहा, उसका लब्बोलुवाब यही- 'ईवीएम की क्वालिटी इंप्रूव होनी चाहिए। यह आरोप लगाना सही नहीं होगा कि कांग्रेस शासित राज्यों में ही ईवीएम का दुरुपयोग हो रहा। बीजेपी शासित राज्यों में भी दुरुपयोग संभव। सो बेहतर यही होगा, आरोप-प्रत्यारोप के बजाए ईवीएम की क्वालिटी इंप्रूव करने के लिए सभी पार्टियों की कमेटी बने और फिर व्यापक चर्चा हो।' पर बीजेपी नेता ने तो किताब में दुनिया भर से खूब तथ्य जुटाए। कैसे जर्मनी की फैडरल कोर्ट ने ईवीएम के इस्तेमाल को असंवैधानिक बताया। कैसे दुनिया भर के बड़े अखबारों में इस बाबत लेख छपे। यानी अब अदालती लड़ाई में बीजेपी के राव तमाम तथ्य परोसेंगे। पर सवाल, बीजेपी हो या सैफोलॉजिस्ट जीवीएल नरसिम्हा राव। अबके आखिर ऐसा क्या हो गया, जो ईवीएम पर एतबार नहीं। अपना मानना तो यही, यह वक्त का दोष। जब नरसिम्हा राव महज सैफोलॉजिस्ट थे। तो अरुण जेतली ने इन्हीं के आंकड़ों से कर्नाटक, बिहार आदि चुनावों में जीत की बिसात बिछाई थी। पर नागपुर अधिवेशन में जैसे ही उन्हें वर्किंग कमेटी मेंबर बनाया गया। उसके बाद के सारे अनुमान फेल होते गए। अब राव अपनी गलती तो स्वीकारेंगे नहीं। सो बेजुबान मशीन पर ही हमला बोल दिया। यही हाल बीजेपी का। याद है ना, 2004 में ऐसा फील गुड था। कांग्रेस तक को यही उम्मीद थी, एनडीए ही सत्ता में लौटेगा। बीजेपी में तो तब कई सूरमा नए सिरे से मंत्रालय का विभाग भी तय कर चुके थे। पर जब 13 मई 2004 को नतीजे आए। तो वही आसमान से गिरे, खजूर पर अटके वाली कहावत हो गई। पर तब ईवीएम में खोट नजर नहीं आया। आखिर आता भी कैसे। खुद एनडीए ने देश भर में ईवीएम को हरी झंडी दी। ईवीएम का प्रयोग 1982 में केरल की परुर विधानसभा के 50 बूथों पर हुआ। फिर 1989-90 में मध्य प्रदेश, राजस्थान की पांच-पांच और दिल्ली की छह सीटों में। पर 2002 से पूरे देश में अनिवार्य। तब मौजूदा सवाल उठाने वाले सत्तानशीं थे। अब बीजेपी में 2004 वाली स्थिति 2009 में भी रही। बीजेपी को लंगड़ी लोकसभा की उम्मीद थी। खुद सबसे बड़ी पार्टी बनने का अनुमान था। यूपीए के बिखराव को मनमोहन की विदाई माने बैठी थी। बीजेपी के रणनीतिकार आंध्र, तमिलनाडु और उड़ीसा की स्थानीय राजनीति का गुणा-भाग कर बहुमत का कागजी आंकड़ा बना चुके थे। पर पूरी ताकत लगाने के बाद भी सत्ता नसीब नहीं हुई। तो लोकतंत्र में कोई भी पार्टी सीधे जनता पर दोष कैसे मढ़े। सो नया टोटका निकला। जनता ने नहीं, ईवीएम ने हराया। यानी जनता का भरोसा जीतने की कोशिश नहीं की। पर लगातार हार की झेंप मिटाने के लिए लोकतंत्र को जोखिम में बता रही। पर बीजेपी भूल गई, 2004 से 2009 के बीच सिवा आपसी खींचतान के पार्टी ने ऐसा कुछ नहीं किया, जो जनता का भरोसा लौट सके। अगर ईवीएम का दुरुपयोग मान भी लें। तो फिर गुजरात, हिमाचल, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, कर्नाटक, उत्तराखंड, बिहार, पंजाब जैसे राज्यों में बीजेपी-एनडीए कैसे जीती? गुजरात में मोदी की हैट्रिक क्या मशीनी छेड़छाड़ से हुई? बिहार में तो लालू-राबड़ी राज तब खत्म हुआ, जब लालू केंद्र में पॉवरफुल थे। तब लालू ने कपार्ट के महानिदेशक सप्तर्षि की चि_ïी आगे कर चुनाव आयोग को कटघरे में खड़ा किया था। पर बीजेपी ने आयोग का बचाव किया। अब बीजेपी हाथ पीछे से घुमाकर वही कान पकड़ रही, जो लालू ने पकड़ा था। बेहतर तो यही होता, बीजेपी फिर जनता का भरोसा हासिल करने में जुटती। ईवीएम से नुकसान होता, तो बीजेपी आंकड़ों में इतनी मजबूत विपक्ष न होती।
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12/02/2010
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क्या वाकई अपना लोकतंत्र जोखिम में है? क्या दो टर्म से मनमोहन की सरकार सचमुच जनता ने नहीं चुनी? आप मानें या न मानें, पर देश की प्रमुख विपक्षी पार्टी यही मान रही। भले शब्दों को घुमाफिरा कर सवाल उठा रही। पर निचोड़ यही- ईवीएम में बड़ा गड़बड़झाला। इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन से छेड़छाड़ संभव बता बीजेपी वापस बैलट की पैरवी कर रही। अब आगे बढऩे से पहले थोड़ा विवाद की शुरुआत देख लीजिए। मौजूदा लोकसभा चुनाव नतीजों के बाद सवाल उठे। दिल्ली के पूर्व चीफ सैक्रेट्री उमेश सहगल ने सुर्रा छोड़ा। तो बीजेपी ने फौरन कैच कर लिया। आडवाणी ने सवाल उठाए। तो यहीं पर हमने भी सवाल का स्वागत किया। तब चुनाव आयोग से यही उम्मीद भी जताई थी कि अगर विपक्ष को एतराज है। तो परीक्षण होने दे। ऐसा हुआ भी, चुनाव आयोग ने तीन दिन की खुली चुनौती दी। पर ईवीएम को झुठलाने वाला कोई शख्स नहीं पहुंचा। अभी 25 जनवरी को जब चुनाव आयोग ने अपनी हीरक जयंती मनाई। तो आडवाणी ने फिर सवाल उठाए। पर कहीं बहस शुरू नहीं हुई। सो अब बीजेपी वर्किंग कमेटी के मेंबर और मशहूर सैफोलॉजिस्ट जीवीएल नरसिम्हा राव ने किताब लिख दी। किताब का नाम 'डैमोक्रेसी एट रिस्क!' रखा। जिसकी प्रस्तावना खुद आडवाणी ने लिखी। शुक्रवार को नितिन गडकरी ने लोकार्पण किया। तो मौके पर तीन-तीन विदेशी एक्सपर्ट ईवीएम झुठलाने को बुलाए गए थे। जर्मनी, नीदरलैंड और यूएसए के एक्सपर्टों का लब्बोलुवाब यही रहा। ईवीएम के साथ पेपर बैकअप भी हो। पर बीजेपी की असली पोल तो समारोह के अहम गैस्ट पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त जीवीजी कृष्णमूर्ति ने खोलकर रख दी। उन ने बीजेपी की बैलट सिस्टम वाली मांग पर कुछ नहीं कहा। अलबत्ता बीजेपी को उम्दा सुझाव दे गए। अब बीजेपी कितना अमल करेगी, यह तो मालूम नहीं। पर शायद आप-हम कृष्णमूर्ति की राय से सहमत होंगे। उन ने जो कहा, उसका लब्बोलुवाब यही- 'ईवीएम की क्वालिटी इंप्रूव होनी चाहिए। यह आरोप लगाना सही नहीं होगा कि कांग्रेस शासित राज्यों में ही ईवीएम का दुरुपयोग हो रहा। बीजेपी शासित राज्यों में भी दुरुपयोग संभव। सो बेहतर यही होगा, आरोप-प्रत्यारोप के बजाए ईवीएम की क्वालिटी इंप्रूव करने के लिए सभी पार्टियों की कमेटी बने और फिर व्यापक चर्चा हो।' पर बीजेपी नेता ने तो किताब में दुनिया भर से खूब तथ्य जुटाए। कैसे जर्मनी की फैडरल कोर्ट ने ईवीएम के इस्तेमाल को असंवैधानिक बताया। कैसे दुनिया भर के बड़े अखबारों में इस बाबत लेख छपे। यानी अब अदालती लड़ाई में बीजेपी के राव तमाम तथ्य परोसेंगे। पर सवाल, बीजेपी हो या सैफोलॉजिस्ट जीवीएल नरसिम्हा राव। अबके आखिर ऐसा क्या हो गया, जो ईवीएम पर एतबार नहीं। अपना मानना तो यही, यह वक्त का दोष। जब नरसिम्हा राव महज सैफोलॉजिस्ट थे। तो अरुण जेतली ने इन्हीं के आंकड़ों से कर्नाटक, बिहार आदि चुनावों में जीत की बिसात बिछाई थी। पर नागपुर अधिवेशन में जैसे ही उन्हें वर्किंग कमेटी मेंबर बनाया गया। उसके बाद के सारे अनुमान फेल होते गए। अब राव अपनी गलती तो स्वीकारेंगे नहीं। सो बेजुबान मशीन पर ही हमला बोल दिया। यही हाल बीजेपी का। याद है ना, 2004 में ऐसा फील गुड था। कांग्रेस तक को यही उम्मीद थी, एनडीए ही सत्ता में लौटेगा। बीजेपी में तो तब कई सूरमा नए सिरे से मंत्रालय का विभाग भी तय कर चुके थे। पर जब 13 मई 2004 को नतीजे आए। तो वही आसमान से गिरे, खजूर पर अटके वाली कहावत हो गई। पर तब ईवीएम में खोट नजर नहीं आया। आखिर आता भी कैसे। खुद एनडीए ने देश भर में ईवीएम को हरी झंडी दी। ईवीएम का प्रयोग 1982 में केरल की परुर विधानसभा के 50 बूथों पर हुआ। फिर 1989-90 में मध्य प्रदेश, राजस्थान की पांच-पांच और दिल्ली की छह सीटों में। पर 2002 से पूरे देश में अनिवार्य। तब मौजूदा सवाल उठाने वाले सत्तानशीं थे। अब बीजेपी में 2004 वाली स्थिति 2009 में भी रही। बीजेपी को लंगड़ी लोकसभा की उम्मीद थी। खुद सबसे बड़ी पार्टी बनने का अनुमान था। यूपीए के बिखराव को मनमोहन की विदाई माने बैठी थी। बीजेपी के रणनीतिकार आंध्र, तमिलनाडु और उड़ीसा की स्थानीय राजनीति का गुणा-भाग कर बहुमत का कागजी आंकड़ा बना चुके थे। पर पूरी ताकत लगाने के बाद भी सत्ता नसीब नहीं हुई। तो लोकतंत्र में कोई भी पार्टी सीधे जनता पर दोष कैसे मढ़े। सो नया टोटका निकला। जनता ने नहीं, ईवीएम ने हराया। यानी जनता का भरोसा जीतने की कोशिश नहीं की। पर लगातार हार की झेंप मिटाने के लिए लोकतंत्र को जोखिम में बता रही। पर बीजेपी भूल गई, 2004 से 2009 के बीच सिवा आपसी खींचतान के पार्टी ने ऐसा कुछ नहीं किया, जो जनता का भरोसा लौट सके। अगर ईवीएम का दुरुपयोग मान भी लें। तो फिर गुजरात, हिमाचल, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, कर्नाटक, उत्तराखंड, बिहार, पंजाब जैसे राज्यों में बीजेपी-एनडीए कैसे जीती? गुजरात में मोदी की हैट्रिक क्या मशीनी छेड़छाड़ से हुई? बिहार में तो लालू-राबड़ी राज तब खत्म हुआ, जब लालू केंद्र में पॉवरफुल थे। तब लालू ने कपार्ट के महानिदेशक सप्तर्षि की चि_ïी आगे कर चुनाव आयोग को कटघरे में खड़ा किया था। पर बीजेपी ने आयोग का बचाव किया। अब बीजेपी हाथ पीछे से घुमाकर वही कान पकड़ रही, जो लालू ने पकड़ा था। बेहतर तो यही होता, बीजेपी फिर जनता का भरोसा हासिल करने में जुटती। ईवीएम से नुकसान होता, तो बीजेपी आंकड़ों में इतनी मजबूत विपक्ष न होती।
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12/02/2010
Thursday, February 11, 2010
कार, कूटनीति, भगवान और अपनी सरकार
संतोष कुमार
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तो पाकिस्तान बातचीत को राजी हो गया। फरवरी की 25 तारीख भी तय हो गई। सो अब एजंडा-एजंडा खेल रहे दोनों देश। पाक पीएम यूसुफ रजा गिलानी कश्मीर का राग अलाप रहे। तो अपनी सरकार ने वैलेंटाइन डे से पहले दिल बड़ा कर लिया। फिलहाल कोई शर्त नहीं रखी। अलबत्ता रक्षा मंत्री ए.के. एंटनी ने बेलाग फरमाया- 'घुसपैठ का वार्ता पर कोई असर नहीं पड़ेगा।' तो दूसरी तरफ होम मिनिस्टर पी. चिदंबरम ने पाक अधिकृत कश्मीर पर भारत का दावा दोहरा दिया। यानी पाक पीएम गिलानी की शर्त फुस्स करने चिदंबरम ने कमान संभाली। तो दुनिया को दिखाने के लिए एंटनी ने। अब सब ठीक-ठाक रहा, तो तय तारीख को द्विपक्षीय वार्ता होगी। पर विपक्ष ने सरकार को घेरना शुरू कर दिया। गुरुवार को लालकृष्ण आडवाणी ने वार्ता की मुखालफत की। दलील दी, एजंडे में आतंकवाद को शामिल किए बिना बातचीत बेमानी। आगरा शिखर वार्ता की नजीर पेश की। कैसे आगरा में परवेज मुशर्रफ ने जेहादियों को कश्मीर की आजादी का स्वाधीनता सेनानी बताया। अपनी सरजमीं से आतंक की सरपरस्ती से इनकार किया। तो शिखर वार्ता ऐसी टूटी, मुशर्रफ अजमेर ख्वाजा की दरगाह गए बिना ही इस्लामाबाद लौट गए। यों आडवाणी का एतराज सोलह आने सही। आखिर मुंबई का हमला अपने संसद पर हुए हमले से कम नहीं था। तेरह दिसंबर 2001 को लोकतंत्र का सबसे बड़ा मंदिर लहूलुहान हुआ। तो 26/11 को देश की शान मुंबई। आतंकवादियों ने भारत की सुरक्षा व्यवस्था को चुनौती दी। तो सरकार की पाक के प्रति सख्ती लाजिमी थी। सो संसद हमले के वक्त वाजपेयी सरकार हो या मुंबई हमले के वक्त मनमोहन सरकार। बयानों का उबाल इतना था कि समूचे देश में युद्ध जैसा माहौल पैदा हो गया। हां, मनमोहन ने इतिहास से इतना सबक जरूर लिया कि सीमा पर फौजें तैनात नहीं कीं। यों एनडीए राज में तो न सिर्फ दस हजार सैनिक दस्ते सीमा पर तैनात किए गए। अलबत्ता बाकायदा अभियान को 'ऑपरेशन पराक्रम' नाम भी दिया गया। पर यह कैसा पराक्रम, जो करीब 6,500 करोड़ खर्चे और करीब 1,800 हताहत फौजियों के साथ सात महीने बाद लौट आए। एशिया के इतिहास में ऑपरेशन पराक्रम से बड़ा कोई सैन्य अभियान नहीं। फिर भी इतिहास में यह ऐसा ऑपरेशन साबित हुआ। जिसका न मकसद मालूम पड़ा, ना ही कोई नतीजा निकला। वैसे भी सरकार का मकसद साफ हो। तो इतिहास साक्षी, 1965 का युद्ध हमने सिर्फ 22 दिन में जीता और 1971 में महज 14 दिन ही पाकिस्तानी रेंजरों को धूल चटाने के लिए काफी रहे। सो सात महीने जमावड़े का मकसद भी क्या हो सकता था। देश को भ्रम में रखा गया। सो ऑपरेशन पराक्रम में नुकसान के सिवा कुछ नहीं मिला। पर इतना जरूर हुआ, परमाणु हमले की आशंका से भारत-पाक दोनों जबर्दस्त सैन्य तैयारियों में जुट गए। अब भारत तो जिम्मेदार देश, परमाणु हमला नहीं करेगा। पर पाक का क्या भरोसा, जिसका कोई दीन-ईमान नहीं। सो ऑपरेशन पराक्रम में सरकार की लचर नीति का खुलासा बाद में पूर्व सेना प्रमुख एस. पद्मनाभन ने किया। जनरल पद्मनाभन की मानें, तो तबकी केबिनेट में ऑपरेशन पर रुख साफ नहीं था। सरकार का मकसद भी ऊहापोह भरा था। इतना ही नहीं, सैन्य बेड़ों के सीमा पर धीरे-धीरे जमावड़े से पाक को बचाव की तैयारी का मौका मिल गया और आखिरकार भारत को अपना ही ऑपरेशन बंद करना पड़ा। पर बाद में वही हुआ, जो अमेरिका ने चाहा। भारत को फिर पाक से दोस्ती का हाथ बढ़ाना पड़ा। वाजपेयी खुद इस्लामाबाद गए। यों तब भारत को इतनी सफलता जरूर मिली, छह जनवरी 2004 के साझा बयान में मुशर्रफ ने वादा किया। पाक अपनी सरजमीं का इस्तेमाल आतंक के लिए नहीं होने देगा। यों आदतन पाक ने कभी यह वायदा नहीं निभाया। पर तब कांग्रेस ने बीजेपी की टांग खिंचाई की। अब करीब-करीब वही स्थिति। तो बीजेपी कांग्रेस की टांग खींच रही। आडवाणी यूपीए सरकार के बदले रुख को बराक ओबामा का दबाव बता रहे। पर एनडीए राज में किसका दबाव था? यों तब वाजपेयी ने मौजूं दलील दी थी। कहा था- 'हम दोस्त बदल सकते हैं, पड़ोसी नहीं।' उन ने एक और बात कही- 'दिल मिले न मिले, हाथ तो मिलाना ही चाहिए।' वाकई अगर हम पड़ोसी से बात न करें, तो वह और बेलगाम होगा। अगर कूटनीतिक स्तर पर वार्ता के जरिए घेरें, तो पाक जैसा पड़ोसी दुनिया में बेनकाब भी होगा। आतंकवाद पर ठोस कार्रवाई करने को भी मजबूर होना पड़ेगा। अपने देश की ढुलमुल नीति ही कहेंगे कि अपना कोई भी पड़ोसी आज की सूरत में भला दोस्त नहीं दिख रहा। दुनिया के झंडाबरदार देश भी वक्त आने पर भारत विरोधी लॉबी में ही खड़े दिखते। अगर खुदा न खास्ता अपने साथ खड़ा भी होता। तो पूरी सौदेबाजी करने के बाद। सो पहले तो अपने देश की राजनीति ठीक करनी होगी। यह कैसी राजनीति, जब बीजेपी का राज हो तो कांग्रेस आलोचना करे। और कांग्रेस का राज हो तो बीजेपी। कम से कम कूटनीतिक मामलों में तो ऐसा कतई नहीं हो। पर सुधार करेगा कौन। गुरुवार को आडवाणी ने फिर कबूला, राजनेताओं की छवि खराब हो चुकी। नेताओं को उन ने कविता की कुछ पंक्तियों से बेपरदा किया। कहा- 'नए-नए मंत्री ने ड्राइवर से कहा, कार मैं खुद चलाऊंगा। ड्राइवर ने कहा, मैं उतर जाऊंगा। यह कार है, सरकार नहीं, जो भगवान भरोसे चल जाएगी।' आडवाणी ने मनमोहन पर यह फब्ती कसी। पर कूटनीति का हिसाब-किताब करिए। तो दोनों ही सरकारें भगवान भरोसे।
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तो पाकिस्तान बातचीत को राजी हो गया। फरवरी की 25 तारीख भी तय हो गई। सो अब एजंडा-एजंडा खेल रहे दोनों देश। पाक पीएम यूसुफ रजा गिलानी कश्मीर का राग अलाप रहे। तो अपनी सरकार ने वैलेंटाइन डे से पहले दिल बड़ा कर लिया। फिलहाल कोई शर्त नहीं रखी। अलबत्ता रक्षा मंत्री ए.के. एंटनी ने बेलाग फरमाया- 'घुसपैठ का वार्ता पर कोई असर नहीं पड़ेगा।' तो दूसरी तरफ होम मिनिस्टर पी. चिदंबरम ने पाक अधिकृत कश्मीर पर भारत का दावा दोहरा दिया। यानी पाक पीएम गिलानी की शर्त फुस्स करने चिदंबरम ने कमान संभाली। तो दुनिया को दिखाने के लिए एंटनी ने। अब सब ठीक-ठाक रहा, तो तय तारीख को द्विपक्षीय वार्ता होगी। पर विपक्ष ने सरकार को घेरना शुरू कर दिया। गुरुवार को लालकृष्ण आडवाणी ने वार्ता की मुखालफत की। दलील दी, एजंडे में आतंकवाद को शामिल किए बिना बातचीत बेमानी। आगरा शिखर वार्ता की नजीर पेश की। कैसे आगरा में परवेज मुशर्रफ ने जेहादियों को कश्मीर की आजादी का स्वाधीनता सेनानी बताया। अपनी सरजमीं से आतंक की सरपरस्ती से इनकार किया। तो शिखर वार्ता ऐसी टूटी, मुशर्रफ अजमेर ख्वाजा की दरगाह गए बिना ही इस्लामाबाद लौट गए। यों आडवाणी का एतराज सोलह आने सही। आखिर मुंबई का हमला अपने संसद पर हुए हमले से कम नहीं था। तेरह दिसंबर 2001 को लोकतंत्र का सबसे बड़ा मंदिर लहूलुहान हुआ। तो 26/11 को देश की शान मुंबई। आतंकवादियों ने भारत की सुरक्षा व्यवस्था को चुनौती दी। तो सरकार की पाक के प्रति सख्ती लाजिमी थी। सो संसद हमले के वक्त वाजपेयी सरकार हो या मुंबई हमले के वक्त मनमोहन सरकार। बयानों का उबाल इतना था कि समूचे देश में युद्ध जैसा माहौल पैदा हो गया। हां, मनमोहन ने इतिहास से इतना सबक जरूर लिया कि सीमा पर फौजें तैनात नहीं कीं। यों एनडीए राज में तो न सिर्फ दस हजार सैनिक दस्ते सीमा पर तैनात किए गए। अलबत्ता बाकायदा अभियान को 'ऑपरेशन पराक्रम' नाम भी दिया गया। पर यह कैसा पराक्रम, जो करीब 6,500 करोड़ खर्चे और करीब 1,800 हताहत फौजियों के साथ सात महीने बाद लौट आए। एशिया के इतिहास में ऑपरेशन पराक्रम से बड़ा कोई सैन्य अभियान नहीं। फिर भी इतिहास में यह ऐसा ऑपरेशन साबित हुआ। जिसका न मकसद मालूम पड़ा, ना ही कोई नतीजा निकला। वैसे भी सरकार का मकसद साफ हो। तो इतिहास साक्षी, 1965 का युद्ध हमने सिर्फ 22 दिन में जीता और 1971 में महज 14 दिन ही पाकिस्तानी रेंजरों को धूल चटाने के लिए काफी रहे। सो सात महीने जमावड़े का मकसद भी क्या हो सकता था। देश को भ्रम में रखा गया। सो ऑपरेशन पराक्रम में नुकसान के सिवा कुछ नहीं मिला। पर इतना जरूर हुआ, परमाणु हमले की आशंका से भारत-पाक दोनों जबर्दस्त सैन्य तैयारियों में जुट गए। अब भारत तो जिम्मेदार देश, परमाणु हमला नहीं करेगा। पर पाक का क्या भरोसा, जिसका कोई दीन-ईमान नहीं। सो ऑपरेशन पराक्रम में सरकार की लचर नीति का खुलासा बाद में पूर्व सेना प्रमुख एस. पद्मनाभन ने किया। जनरल पद्मनाभन की मानें, तो तबकी केबिनेट में ऑपरेशन पर रुख साफ नहीं था। सरकार का मकसद भी ऊहापोह भरा था। इतना ही नहीं, सैन्य बेड़ों के सीमा पर धीरे-धीरे जमावड़े से पाक को बचाव की तैयारी का मौका मिल गया और आखिरकार भारत को अपना ही ऑपरेशन बंद करना पड़ा। पर बाद में वही हुआ, जो अमेरिका ने चाहा। भारत को फिर पाक से दोस्ती का हाथ बढ़ाना पड़ा। वाजपेयी खुद इस्लामाबाद गए। यों तब भारत को इतनी सफलता जरूर मिली, छह जनवरी 2004 के साझा बयान में मुशर्रफ ने वादा किया। पाक अपनी सरजमीं का इस्तेमाल आतंक के लिए नहीं होने देगा। यों आदतन पाक ने कभी यह वायदा नहीं निभाया। पर तब कांग्रेस ने बीजेपी की टांग खिंचाई की। अब करीब-करीब वही स्थिति। तो बीजेपी कांग्रेस की टांग खींच रही। आडवाणी यूपीए सरकार के बदले रुख को बराक ओबामा का दबाव बता रहे। पर एनडीए राज में किसका दबाव था? यों तब वाजपेयी ने मौजूं दलील दी थी। कहा था- 'हम दोस्त बदल सकते हैं, पड़ोसी नहीं।' उन ने एक और बात कही- 'दिल मिले न मिले, हाथ तो मिलाना ही चाहिए।' वाकई अगर हम पड़ोसी से बात न करें, तो वह और बेलगाम होगा। अगर कूटनीतिक स्तर पर वार्ता के जरिए घेरें, तो पाक जैसा पड़ोसी दुनिया में बेनकाब भी होगा। आतंकवाद पर ठोस कार्रवाई करने को भी मजबूर होना पड़ेगा। अपने देश की ढुलमुल नीति ही कहेंगे कि अपना कोई भी पड़ोसी आज की सूरत में भला दोस्त नहीं दिख रहा। दुनिया के झंडाबरदार देश भी वक्त आने पर भारत विरोधी लॉबी में ही खड़े दिखते। अगर खुदा न खास्ता अपने साथ खड़ा भी होता। तो पूरी सौदेबाजी करने के बाद। सो पहले तो अपने देश की राजनीति ठीक करनी होगी। यह कैसी राजनीति, जब बीजेपी का राज हो तो कांग्रेस आलोचना करे। और कांग्रेस का राज हो तो बीजेपी। कम से कम कूटनीतिक मामलों में तो ऐसा कतई नहीं हो। पर सुधार करेगा कौन। गुरुवार को आडवाणी ने फिर कबूला, राजनेताओं की छवि खराब हो चुकी। नेताओं को उन ने कविता की कुछ पंक्तियों से बेपरदा किया। कहा- 'नए-नए मंत्री ने ड्राइवर से कहा, कार मैं खुद चलाऊंगा। ड्राइवर ने कहा, मैं उतर जाऊंगा। यह कार है, सरकार नहीं, जो भगवान भरोसे चल जाएगी।' आडवाणी ने मनमोहन पर यह फब्ती कसी। पर कूटनीति का हिसाब-किताब करिए। तो दोनों ही सरकारें भगवान भरोसे।
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Wednesday, February 10, 2010
अब शुरू हुआ महंगाई पर राजनीतिक रोना-धोना
संतोष कुमार
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महंगाई अब आम आदमी के लिए कैंसर बन चुकी। पर 'सरकारी अस्पताल' में इलाज चल रहा। यूपीए सरकार के डाक्टरों की टीम नब्ज नहीं भांप पा रही। पर वोट लिया, सो इलाज करना भी मजबूरी। यानी आपाधापी में मनमोहन की टीम के डाक्टर अनाप-शनाप दवा की परची लिख रहे। पर कैंसर बढ़ता जा रहा। अब शायद भगवान शिव पर दूध कम चढ़े। सो महाशिवरात्रि के दिन से दिल्ली में दूध महंगा हो जाएगा। यानी पवारनामा यों ही हवा में फुस्स नहीं होगा। दूध की कीमतें बढऩे की तारीखें तय हो चुकीं। तो उधर मुरली अपनी तान छेड़ चुके। सो पेट्रोल-डीजल-रसोई गैस और मिट्टïी तेल की कीमतों में इजाफा महज औपचारिकता भर रह गई। राहुल गांधी ने पिछले महीने ही कहा था। महंगाई अब कुछ दिनों की मेहमान। पर यहां तो पवार-देवड़ा महंगाई की मेहमाननवाजी में जुटे। दिल्ली में कांग्रेसी सीएम शीला दीक्षित को कुछ न सूझा। तो खुद ही दुकान लगाकर बैठ गईं। अब भले कल बूथों से सामान वापस गोदामों में चला जाए। पर शीला को एक दिन रोने का मौका तो मिल गया। अब इधर सरकार की लुकाछिपी। तो उधर विपक्ष को भी महंगाई याद आ गई। यों अब तक तो बीजेपी महंगाई पर आधी नींद में ही दिखी। पर बुधवार को दिल्ली के जंतर-मंतर में प्रदर्शन हुए। तो नए अध्यक्ष नितिन गडकरी के जोश का असर भी दिखा। बीजेपी के बड़ों का जमावड़ा तो हुआ ही। दिल्ली के छुटभैये नेताओं ने अपनी ताकत खूब दिखाई। सो कुल मिलाकर पहली बार बीजेपी का महंगाई पर प्रदर्शन न तो फ्लॉप रहा, न सुपर हिट। पर हिट जरूर रहा। दिल्ली बीजेपी के नेता चार्ज दिखे। पर सनद रहे, सो दिल्ली के भाजपाई नेताओं के चार्ज होने की वजह बताते जाएं। न तो अभी नितिन गडकरी की नई टीम बनी, न ही दिल्ली में संगठन के चुनाव हुए। सो पद की रेवड़ी पाने को बेताब नेताओं ने ईमानदारी से ताकत लगा दी। पर अंदर की खटपट छोड़ दें। तो बड़ी बात यही, ईमानदारी से चाहे। तो विपक्ष जिम्मेदार बन सरकार को घुटने के बल ला दे। पर राजनीति में ईमानदारी सिर्फ पल-दो पल की होती। बाकी तो आप खुद ही समझदार हैं। अब बीजेपी को देखिए। कभी भी 2004 की हार नहीं पची। ऊपर से 2009 की हार ने तो ऐसा बौखलाकर रख दिया। बीजेपी नेता आपस में एक-दूसरे के बाल नोंचने लगे। पर गडकरी ने मोर्चा संभाला। तो शुरुआती फील गुड दिख रहा। जंतर-मंतर पर प्रदर्शन हुआ। तो सुषमा स्वराज फिर प्याज के आंसू का दर्द छुपा न सकीं। कैसे 1998 में महंगी प्याज ने सुषमा को दिल्ली की सीएम पद से रुखसत कर दिया था। वाकई महंगाई का राजनीतिक दर्द पूछना हो। तो सुषमा स्वराज से पूछिए। पर विपक्ष की ईमानदारी देखिए। सोमवार को गडकरी ने महंगाई पर मोर्चा संभाला। महंगाई कैसे और क्यों बढ़ी, इस पर रंगीन बुकलैट जारी की। तो मराठा क्षत्रप शरद पवार के प्रति नरमी बरत गए। पर अगले दिन मीडिया में पवार से नरमी की खबरें छपीं। तो बुधवार को पवार पर खूब गरजे। बानगी आप भी देखिए- 'महंगाई एक दिवसीय मैच हो गई। शरद पवार कोच। सो चीनी अर्ध शतक मार रही, तो दालें शतक। पवार को आईपीएल की चिंता ज्यादा। सो पीएम क्रिकेट मंत्रालय बना पवार को क्रिकेट मंत्री बना दें।' अब कोई पूछे, आखिर इस नरमी-गरमी का क्या राज? सिर्फ इतना ही नहीं, गडकरी ने मनमोहन को महंगाई वाला शासक बताया। कहा- 'जब मनमोहन एफएम थे, तब भी महंगाई दहाई के आंकड़े के पार गई। अब पीएम हैं, तो भी यही हाल।' पर ज्यादा दिन नहीं हुए। पिछले साल की बात है, खुद आडवाणी ने मनमोहन को देश का बेहतरीन एफएम बता तारीफ की थी। गडकरी ने 'डाक्टर' शरद पवार से एक सवाल पूछा। अगर चीनी न खाने से आदमी नहीं मरेगा। तो क्या पैसा न खाने से मंत्री मर जाएंगे? अब जो भी हो, पर गडकरी ने बता दिया, सत्ता में आने के बाद मंत्री ईमानदार नहीं होते। सो गडकरी ने अब एलान-ए-जंग कर दिया। इंदौर मीटिंग के बाद 25 लाख वर्कर दिल्ली ला संसद का घेराव करने और सरकार को अंजाम तक पहुंचाने की चेतावनी दी। पर अपना छोटा सा सवाल। ऐसी आक्रामक भूमिका बीजेपी ने पहले क्यों नहीं ली? महंगाई दो-एक दिन में नहीं बढ़ी। मनमोहन जब पहली बार पीएम बने। छह महीने बाद बीजेपी में आडवाणी अध्यक्ष बने। तो 24-26 नवंबर 2004 की रांची वर्किंग कमेटी में भाषण दिया। महंगाई पर पहली दिसंबर 2004 को संसद घेराव का एलान किया। बड़ा आंदोलन भी हुआ। पर महंगाई नहीं रुकी। सो तबसे लेकर आज तक, बीजेपी इन छह साल में क्या कर रही थी? अब बुधवार का ही किस्सा लो। इधर जंतर-मंतर पर विपक्ष सफल प्रदर्शन कर रहा था। पर सरकार की नजर में विपक्ष की हैसियत देखिए, पीएम के घर कांग्रेस की कोर कमेटी पेट्रोल-डीजल महंगा करने का फैसला कर रही थी। वैसे भी एक तरफ अंजाम की बात। तो दूसरी तरफ सादगी के बहाने इंदौर में सांप-बिच्छू डिपार्टमेंट भी खोल दिया। ताकि टेंट में किसी नेता को नुकसान न हो। पर बीजेपी बुरा न माने। समूची राजनीति के लिए एक कव्वाली के बोल याद आ गए। बोल हैं- 'एक रात सांप ने नेता को डसा। नेता तो मजे में रहा, सांप चल बसा।' पर यह तो कव्वाली है। असल बात यह, भले देर सही, राजनीतिक दल दुरुस्त आए। आम आदमी के बाद महंगाई पर राजनीतिक रोना-धोना भी शुरू हो गया।
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10/02/2010
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महंगाई अब आम आदमी के लिए कैंसर बन चुकी। पर 'सरकारी अस्पताल' में इलाज चल रहा। यूपीए सरकार के डाक्टरों की टीम नब्ज नहीं भांप पा रही। पर वोट लिया, सो इलाज करना भी मजबूरी। यानी आपाधापी में मनमोहन की टीम के डाक्टर अनाप-शनाप दवा की परची लिख रहे। पर कैंसर बढ़ता जा रहा। अब शायद भगवान शिव पर दूध कम चढ़े। सो महाशिवरात्रि के दिन से दिल्ली में दूध महंगा हो जाएगा। यानी पवारनामा यों ही हवा में फुस्स नहीं होगा। दूध की कीमतें बढऩे की तारीखें तय हो चुकीं। तो उधर मुरली अपनी तान छेड़ चुके। सो पेट्रोल-डीजल-रसोई गैस और मिट्टïी तेल की कीमतों में इजाफा महज औपचारिकता भर रह गई। राहुल गांधी ने पिछले महीने ही कहा था। महंगाई अब कुछ दिनों की मेहमान। पर यहां तो पवार-देवड़ा महंगाई की मेहमाननवाजी में जुटे। दिल्ली में कांग्रेसी सीएम शीला दीक्षित को कुछ न सूझा। तो खुद ही दुकान लगाकर बैठ गईं। अब भले कल बूथों से सामान वापस गोदामों में चला जाए। पर शीला को एक दिन रोने का मौका तो मिल गया। अब इधर सरकार की लुकाछिपी। तो उधर विपक्ष को भी महंगाई याद आ गई। यों अब तक तो बीजेपी महंगाई पर आधी नींद में ही दिखी। पर बुधवार को दिल्ली के जंतर-मंतर में प्रदर्शन हुए। तो नए अध्यक्ष नितिन गडकरी के जोश का असर भी दिखा। बीजेपी के बड़ों का जमावड़ा तो हुआ ही। दिल्ली के छुटभैये नेताओं ने अपनी ताकत खूब दिखाई। सो कुल मिलाकर पहली बार बीजेपी का महंगाई पर प्रदर्शन न तो फ्लॉप रहा, न सुपर हिट। पर हिट जरूर रहा। दिल्ली बीजेपी के नेता चार्ज दिखे। पर सनद रहे, सो दिल्ली के भाजपाई नेताओं के चार्ज होने की वजह बताते जाएं। न तो अभी नितिन गडकरी की नई टीम बनी, न ही दिल्ली में संगठन के चुनाव हुए। सो पद की रेवड़ी पाने को बेताब नेताओं ने ईमानदारी से ताकत लगा दी। पर अंदर की खटपट छोड़ दें। तो बड़ी बात यही, ईमानदारी से चाहे। तो विपक्ष जिम्मेदार बन सरकार को घुटने के बल ला दे। पर राजनीति में ईमानदारी सिर्फ पल-दो पल की होती। बाकी तो आप खुद ही समझदार हैं। अब बीजेपी को देखिए। कभी भी 2004 की हार नहीं पची। ऊपर से 2009 की हार ने तो ऐसा बौखलाकर रख दिया। बीजेपी नेता आपस में एक-दूसरे के बाल नोंचने लगे। पर गडकरी ने मोर्चा संभाला। तो शुरुआती फील गुड दिख रहा। जंतर-मंतर पर प्रदर्शन हुआ। तो सुषमा स्वराज फिर प्याज के आंसू का दर्द छुपा न सकीं। कैसे 1998 में महंगी प्याज ने सुषमा को दिल्ली की सीएम पद से रुखसत कर दिया था। वाकई महंगाई का राजनीतिक दर्द पूछना हो। तो सुषमा स्वराज से पूछिए। पर विपक्ष की ईमानदारी देखिए। सोमवार को गडकरी ने महंगाई पर मोर्चा संभाला। महंगाई कैसे और क्यों बढ़ी, इस पर रंगीन बुकलैट जारी की। तो मराठा क्षत्रप शरद पवार के प्रति नरमी बरत गए। पर अगले दिन मीडिया में पवार से नरमी की खबरें छपीं। तो बुधवार को पवार पर खूब गरजे। बानगी आप भी देखिए- 'महंगाई एक दिवसीय मैच हो गई। शरद पवार कोच। सो चीनी अर्ध शतक मार रही, तो दालें शतक। पवार को आईपीएल की चिंता ज्यादा। सो पीएम क्रिकेट मंत्रालय बना पवार को क्रिकेट मंत्री बना दें।' अब कोई पूछे, आखिर इस नरमी-गरमी का क्या राज? सिर्फ इतना ही नहीं, गडकरी ने मनमोहन को महंगाई वाला शासक बताया। कहा- 'जब मनमोहन एफएम थे, तब भी महंगाई दहाई के आंकड़े के पार गई। अब पीएम हैं, तो भी यही हाल।' पर ज्यादा दिन नहीं हुए। पिछले साल की बात है, खुद आडवाणी ने मनमोहन को देश का बेहतरीन एफएम बता तारीफ की थी। गडकरी ने 'डाक्टर' शरद पवार से एक सवाल पूछा। अगर चीनी न खाने से आदमी नहीं मरेगा। तो क्या पैसा न खाने से मंत्री मर जाएंगे? अब जो भी हो, पर गडकरी ने बता दिया, सत्ता में आने के बाद मंत्री ईमानदार नहीं होते। सो गडकरी ने अब एलान-ए-जंग कर दिया। इंदौर मीटिंग के बाद 25 लाख वर्कर दिल्ली ला संसद का घेराव करने और सरकार को अंजाम तक पहुंचाने की चेतावनी दी। पर अपना छोटा सा सवाल। ऐसी आक्रामक भूमिका बीजेपी ने पहले क्यों नहीं ली? महंगाई दो-एक दिन में नहीं बढ़ी। मनमोहन जब पहली बार पीएम बने। छह महीने बाद बीजेपी में आडवाणी अध्यक्ष बने। तो 24-26 नवंबर 2004 की रांची वर्किंग कमेटी में भाषण दिया। महंगाई पर पहली दिसंबर 2004 को संसद घेराव का एलान किया। बड़ा आंदोलन भी हुआ। पर महंगाई नहीं रुकी। सो तबसे लेकर आज तक, बीजेपी इन छह साल में क्या कर रही थी? अब बुधवार का ही किस्सा लो। इधर जंतर-मंतर पर विपक्ष सफल प्रदर्शन कर रहा था। पर सरकार की नजर में विपक्ष की हैसियत देखिए, पीएम के घर कांग्रेस की कोर कमेटी पेट्रोल-डीजल महंगा करने का फैसला कर रही थी। वैसे भी एक तरफ अंजाम की बात। तो दूसरी तरफ सादगी के बहाने इंदौर में सांप-बिच्छू डिपार्टमेंट भी खोल दिया। ताकि टेंट में किसी नेता को नुकसान न हो। पर बीजेपी बुरा न माने। समूची राजनीति के लिए एक कव्वाली के बोल याद आ गए। बोल हैं- 'एक रात सांप ने नेता को डसा। नेता तो मजे में रहा, सांप चल बसा।' पर यह तो कव्वाली है। असल बात यह, भले देर सही, राजनीतिक दल दुरुस्त आए। आम आदमी के बाद महंगाई पर राजनीतिक रोना-धोना भी शुरू हो गया।
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10/02/2010
Tuesday, February 9, 2010
संघ भरोसे बीजेपी बनेगी देश की 'भाग्य विधाता'!
संतोष कुमार
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बीजेपी में हल्दी की रस्म पूरी हो गई। नितिन गडकरी अब मनोनीत नहीं, निर्वाचित अध्यक्ष हो गए। तेरह राज्यों और संसदीय दल को मिलाकर कुल 19 सैट में परचा दाखिल हुआ। बस तीन घंटे में परचा दाखिल से लेकर जांच और चुनाव तमाम हो गया। पहली दफा बीजेपी में चुने हुए अध्यक्ष को सर्टिफिकेट भी मिला। अब बाराती अगले हफ्ते इंदौर पहुंचेंगे। तो बाकायदा अनुमोदन भी होगा। पर इंदौर और बीजेपी का संयोग देखिए। सात साल पहले अप्रैल 2003 में यहीं वर्किंग कमेटी हुई। तब भी बीजेपी के खेवनहार युवा नेता ही थे। वेंकैया नायडू अध्यक्ष थे। फर्क सिर्फ इतना, तब मध्य प्रदेश में कांग्रेस की सरकार थी। केंद्र में वाजपेयी नीत एनडीए सरकार। अबके मध्य प्रदेश में बीजेपी की सरकार, पर केंद्र में कांग्रेस नीत सरकार। तब बीजेपी सत्ता के नशे में चूर थी। सो पूरी वर्किंग कमेटी अपनी पीठ ठोकने में ही लगी रही। वेंकैया नायडू के तबके अध्यक्षीय भाषण में संगठन पर कम, कांग्रेस को ज्यादा निशाने पर लिया। वर्करों को सिर्फ तीन अगस्त 2002 के दिल्ली संकल्प की याद दिलाई। फिर नवंबर 2003 में राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ की जीत ने तो बीजेपी को सातवें आसमान पर पहुंचा दिया। फील गुड की ऐसी बयार चली, छह महीने पहले ही लोकसभा भंग करा समर में कूद पड़े। कांग्रेस को सौ से नीचे समेटने और बीजेपी अपने बूते तीन सौ सीट लाने का दंभ भरती दिखी। वेंकैया नायडू ने फील गुड में यहां तक कह दिया- 'तीन सौ सीट लाकर बीजेपी सरकार बनाएगी। पर एनडीए के सहयोगियों को भी साथ में रखेगी।' ऐसा लगा, जैसे बीजेपी सहयोगियों पर अहसान करेगी। पर नतीजे क्या हुए, दोहराने से क्या फायदा। फिर महाराष्टï्र चुनाव की हार। वेंकैया का पत्नी की बीमारी के बहाने इस्तीफा। सन्यास का एलान और फिर आडवाणी का खेवनहार बनना। सच तो यह, वेंकैया वाजपेयी-आडवाणी का वरदहस्त पाकर भी जेतली-प्रमोद के आगे बौने ही दिखे। जेतली-प्रमोद ने हमउम्र वेंकैया को भाव नहीं दिया। उमा भारती तो तू-तड़ाक भी कर चुकीं। सो वेंकैया ने जब इस्तीफा दिया, तो संक्रमण काल में आडवाणी से ही खिवैया बनने की गुहार लगाई। आडवाणी को भी लगा, सब संभाल लेंगे। पर जिन्ना एपीसोड ने गुड़-गोबर कर दिया। फिर संघ की पसंद राजनाथ सिंह अध्यक्ष हुए। पर इन चार सालों में भी बीजेपी का खटराग जारी रहा। लोकसभा चुनाव की लगातार दूसरी हार ने तो मानो बीजेपी को हिला दिया। नेता सार्वजनिक बयानबाजी पर उतर आए। किसी ने काम और पुरस्कार में समानता की आवाज उठाई। तो किसी ने संघ से बीजेपी को टेक ओवर करने की गुहार। संघ में भी बदलाव हो चुका था। मोहन भागवत ने कमान संभाल ली। तो पहला एजंडा बीजेपी ही बनी। आखिरकार संघ ने अपनी पसंद गडकरी को अध्यक्ष बनवा ही लिया। यानी बीजेपी का रिमोट अब सीधे संघ के हाथ। अटल-आडवाणी युग में संघ की भूमिका तो थी। पर वीटो हमेशा इन दोनों दिग्गजों का हाथ ही रहा। अब बीजेपी नए युग में प्रवेश कर चुकी। तो अटल-आडवाणी जैसा कोई दिग्गज नहीं। सो दूसरी पीढ़ी के सूरमा संघ को रिमोट सौंप आए। अब सूरमाओं में जंग हुई। तो वीटो संघ के पास। सो सूरमाओं में सबसे जूनियर नितिन गडकरी फिलहाल वीटो पॉवर से लैस। अब गडकरी वाकई बीजेपी को कुछ नया देंगे या फिर संघ का बौद्धिक पिलाएंगे। यह तो इंदौर में ही मालूम पड़ेगा। यों बीजेपी में हार के बाद जब-जब बदलाव हुए। बैक टू बेसिक की परंपरा दिखी। चुनाव से पहले एजंडा अलग होता। नतीजे सही नहीं रहे। तो संघ को खुश करने के लिए वर्किंग कमेटी में हिंदुत्व से सराबोर भाषण। पर शायद गडकरी अबके कुछ संभलकर बोलेंगे। ताकि बिहार चुनाव में दांव उल्टा न पड़े। सो गडकरी ने औपचारिक अध्यक्ष चुने जाने पर रुख में थोड़ा बदलाव किया। अब तक राजनीति को सामाजिक-आर्थिक जाल में उलझाते रहे। पर मंगलवार को आने वाले वक्त में चुनावी जीत की बात की। बोले- 'चुनावी जीत का दौर आएगा। पार्टी को देश के भाग्य विधाता के तौर पर उभारूंगा।' यों गडकरी हों या आडवाणी-राजनाथ। पुराने भाषणों को पलट कर देखिए। तो बीजेपी हमेशा जो कहती रही, उसका लब्बोलुवाब यही- 'नियति ने बीजेपी के हाथों देश का उद्धार लिखा है।' अब गडकरी भाग्य विधाता बनाने की बात कर रहे। पर इतिहास पलटकर देखिए। जब बीजेपी सत्ता में आई, तो महज छह साल में बीजेपी के नेता 'विधाता' बन बैठे। और पार्टी को सींचने वाले वर्कर 'भाग्य' भरोसे रह गए। अब कोई पूछे, शिवसेना और शरद पवार पर नरम रहने वाले गडकरी देश का क्या भाग्य लिखेंगे? गडकरी अध्यक्ष चुने गए। पर बीजेपी हैड क्वार्टर में बामुश्किल डेढ़-एक सौ वर्कर ही नजर आए। यों पंजाब का भंगड़ा, चेन्नई से शहनाई, उत्तराखंड से पांडव नृत्य, तो हरियाणा से नगाड़े आए। पटाखे तो बीजेपी के स्टॉक में पहले से ही पड़े। यानी अबके परिस्थितियां बदल चुकीं। गडकरी के सामने चुनौतियों का अंबार। सो अब संघ के साधक गडकरी बीजेपी को कैसे भाग्य विधाता बनाएंगे, यह वक्त बताएगा। फिलहाल तो बीजेपी इंदौर में बारात सजने की तैयारी कर रही।
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09/02/2010
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बीजेपी में हल्दी की रस्म पूरी हो गई। नितिन गडकरी अब मनोनीत नहीं, निर्वाचित अध्यक्ष हो गए। तेरह राज्यों और संसदीय दल को मिलाकर कुल 19 सैट में परचा दाखिल हुआ। बस तीन घंटे में परचा दाखिल से लेकर जांच और चुनाव तमाम हो गया। पहली दफा बीजेपी में चुने हुए अध्यक्ष को सर्टिफिकेट भी मिला। अब बाराती अगले हफ्ते इंदौर पहुंचेंगे। तो बाकायदा अनुमोदन भी होगा। पर इंदौर और बीजेपी का संयोग देखिए। सात साल पहले अप्रैल 2003 में यहीं वर्किंग कमेटी हुई। तब भी बीजेपी के खेवनहार युवा नेता ही थे। वेंकैया नायडू अध्यक्ष थे। फर्क सिर्फ इतना, तब मध्य प्रदेश में कांग्रेस की सरकार थी। केंद्र में वाजपेयी नीत एनडीए सरकार। अबके मध्य प्रदेश में बीजेपी की सरकार, पर केंद्र में कांग्रेस नीत सरकार। तब बीजेपी सत्ता के नशे में चूर थी। सो पूरी वर्किंग कमेटी अपनी पीठ ठोकने में ही लगी रही। वेंकैया नायडू के तबके अध्यक्षीय भाषण में संगठन पर कम, कांग्रेस को ज्यादा निशाने पर लिया। वर्करों को सिर्फ तीन अगस्त 2002 के दिल्ली संकल्प की याद दिलाई। फिर नवंबर 2003 में राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ की जीत ने तो बीजेपी को सातवें आसमान पर पहुंचा दिया। फील गुड की ऐसी बयार चली, छह महीने पहले ही लोकसभा भंग करा समर में कूद पड़े। कांग्रेस को सौ से नीचे समेटने और बीजेपी अपने बूते तीन सौ सीट लाने का दंभ भरती दिखी। वेंकैया नायडू ने फील गुड में यहां तक कह दिया- 'तीन सौ सीट लाकर बीजेपी सरकार बनाएगी। पर एनडीए के सहयोगियों को भी साथ में रखेगी।' ऐसा लगा, जैसे बीजेपी सहयोगियों पर अहसान करेगी। पर नतीजे क्या हुए, दोहराने से क्या फायदा। फिर महाराष्टï्र चुनाव की हार। वेंकैया का पत्नी की बीमारी के बहाने इस्तीफा। सन्यास का एलान और फिर आडवाणी का खेवनहार बनना। सच तो यह, वेंकैया वाजपेयी-आडवाणी का वरदहस्त पाकर भी जेतली-प्रमोद के आगे बौने ही दिखे। जेतली-प्रमोद ने हमउम्र वेंकैया को भाव नहीं दिया। उमा भारती तो तू-तड़ाक भी कर चुकीं। सो वेंकैया ने जब इस्तीफा दिया, तो संक्रमण काल में आडवाणी से ही खिवैया बनने की गुहार लगाई। आडवाणी को भी लगा, सब संभाल लेंगे। पर जिन्ना एपीसोड ने गुड़-गोबर कर दिया। फिर संघ की पसंद राजनाथ सिंह अध्यक्ष हुए। पर इन चार सालों में भी बीजेपी का खटराग जारी रहा। लोकसभा चुनाव की लगातार दूसरी हार ने तो मानो बीजेपी को हिला दिया। नेता सार्वजनिक बयानबाजी पर उतर आए। किसी ने काम और पुरस्कार में समानता की आवाज उठाई। तो किसी ने संघ से बीजेपी को टेक ओवर करने की गुहार। संघ में भी बदलाव हो चुका था। मोहन भागवत ने कमान संभाल ली। तो पहला एजंडा बीजेपी ही बनी। आखिरकार संघ ने अपनी पसंद गडकरी को अध्यक्ष बनवा ही लिया। यानी बीजेपी का रिमोट अब सीधे संघ के हाथ। अटल-आडवाणी युग में संघ की भूमिका तो थी। पर वीटो हमेशा इन दोनों दिग्गजों का हाथ ही रहा। अब बीजेपी नए युग में प्रवेश कर चुकी। तो अटल-आडवाणी जैसा कोई दिग्गज नहीं। सो दूसरी पीढ़ी के सूरमा संघ को रिमोट सौंप आए। अब सूरमाओं में जंग हुई। तो वीटो संघ के पास। सो सूरमाओं में सबसे जूनियर नितिन गडकरी फिलहाल वीटो पॉवर से लैस। अब गडकरी वाकई बीजेपी को कुछ नया देंगे या फिर संघ का बौद्धिक पिलाएंगे। यह तो इंदौर में ही मालूम पड़ेगा। यों बीजेपी में हार के बाद जब-जब बदलाव हुए। बैक टू बेसिक की परंपरा दिखी। चुनाव से पहले एजंडा अलग होता। नतीजे सही नहीं रहे। तो संघ को खुश करने के लिए वर्किंग कमेटी में हिंदुत्व से सराबोर भाषण। पर शायद गडकरी अबके कुछ संभलकर बोलेंगे। ताकि बिहार चुनाव में दांव उल्टा न पड़े। सो गडकरी ने औपचारिक अध्यक्ष चुने जाने पर रुख में थोड़ा बदलाव किया। अब तक राजनीति को सामाजिक-आर्थिक जाल में उलझाते रहे। पर मंगलवार को आने वाले वक्त में चुनावी जीत की बात की। बोले- 'चुनावी जीत का दौर आएगा। पार्टी को देश के भाग्य विधाता के तौर पर उभारूंगा।' यों गडकरी हों या आडवाणी-राजनाथ। पुराने भाषणों को पलट कर देखिए। तो बीजेपी हमेशा जो कहती रही, उसका लब्बोलुवाब यही- 'नियति ने बीजेपी के हाथों देश का उद्धार लिखा है।' अब गडकरी भाग्य विधाता बनाने की बात कर रहे। पर इतिहास पलटकर देखिए। जब बीजेपी सत्ता में आई, तो महज छह साल में बीजेपी के नेता 'विधाता' बन बैठे। और पार्टी को सींचने वाले वर्कर 'भाग्य' भरोसे रह गए। अब कोई पूछे, शिवसेना और शरद पवार पर नरम रहने वाले गडकरी देश का क्या भाग्य लिखेंगे? गडकरी अध्यक्ष चुने गए। पर बीजेपी हैड क्वार्टर में बामुश्किल डेढ़-एक सौ वर्कर ही नजर आए। यों पंजाब का भंगड़ा, चेन्नई से शहनाई, उत्तराखंड से पांडव नृत्य, तो हरियाणा से नगाड़े आए। पटाखे तो बीजेपी के स्टॉक में पहले से ही पड़े। यानी अबके परिस्थितियां बदल चुकीं। गडकरी के सामने चुनौतियों का अंबार। सो अब संघ के साधक गडकरी बीजेपी को कैसे भाग्य विधाता बनाएंगे, यह वक्त बताएगा। फिलहाल तो बीजेपी इंदौर में बारात सजने की तैयारी कर रही।
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09/02/2010
Monday, February 8, 2010
'इंडिया' तो जीता, पर 'हिंदुस्तान' हार गया
संतोष कुमार
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छज बोले, सो बोले। छलनी भी बोलती, जिसमें हजारों छेद। चीन तो आंखें दिखा ही रहा था। अब पाक भी हेकड़ी दिखा रहा। भारत ने बातचीत की पेशकश क्या रख दी। अपने मुंह मियां मि_ïू होने लगे। मुंबई हमले के बाद भारत कूटनीतिक दबाव बनाने में सफल रहा। पाक विदेश मंत्री शाह महमूद कुरैशी ऐसे दबे, कभी सूरत न दिखी। कभी-कभार रहमान मलिक भारत के दिए डोजियर पर चूं-चपड़ करते दिखे। अब महमूद कुरैशी वैसे ही उछल रहे। जैसे हलाल होने वाले बकरे को वापस बाड़े में डाल दिया हो। भारत ने सवा साल बाद पाक को सांस लेने का मौका दिया। तो पाक हुक्मरानों की पसली चलने लगी। महमूद कुरैशी इतवार को मुल्तान में सुल्तान बनने की कोशिश करते दिखे। आवाम के सामने चीखकर बोले- 'भारत हार गया। भारत ने पहले कहा था, मुंबई हमले के आरोपियों को सजा मिलने तक हमसे से बातचीत नहीं करेगा। अब तैयार हो गया। यह सब पाक की ताकत से संभव हुआ। हमने कभी अपना स्टैंड नहीं बदला, चाहे कश्मीर हो या मुंबई। इसी वजह से हमारी जीत हुई।' एक चुटकुला बहुत पुराना। पर पाक के लिए मौजूं। एक व्यक्ति पत्नी और बच्चों के साथ स्कूटर पर जा रहा था। रास्ते में किसी से झड़प हो गई। तो सामने वाले व्यक्ति ने थप्पड़ जड़ दिया। अब वह व्यक्ति पत्नी-बच्चों के सामने पिटा। सो तिलमिला गया। फिर चुनौती दी- 'मुझे मारा, कोई बात नहीं। मेरी बीवी को मारकर दिखाओ, फिर बताता हूं।' उस व्यक्ति ने उसकी बीवी को भी थप्पड़ मार दिया। फिर उसने यही फार्मूला अपने बच्चे के लिए कहा। और तीनों थप्पड़ खाकर चल दिए। घर जाकर बीवी ने पूछा- 'आपने तीनों को क्यों थप्पड़ मरवाया?' व्यक्ति ने जवाब दिया- 'ताकि घर जाकर तुम मां-बेटे मेरा मजाक न उड़ा सको, मैं पिटकर आ गया।' पाकिस्तान भारत से एकाध बार पिटा हो। तो कोई बात समझ में आए। चार बार ऐसा पिट चुका। पाक में घुसकर अपनी फौज ने जीवन-दान दिया। जनरल नियाजी का पूरी फौज के साथ आत्म-समर्पण शायद पाक भूल चुका। सो कुरैशी सिर चढ़कर बोल रहे। पर अपने राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर ने 'रश्मि रथी' में बहुत खूब लिखा- '... क्षमा शोभती उस भुजंग को, जिसके पास गरल हो। उसे क्या, जो दंतहीन, विषहीन, विनीत-सरल हो।...' सो भारत ने खुद की ओर से पहल की। ताकि दुनिया को बता सके, भारत शांति चाहता। पर पाक की बचकानी कूटनीति देख लो। पिटा हुआ मोहरा अपने दड़बे में चीखकर शेर बनने की सोच रहा। कुरैशी भारत को हारा हुआ बता रहे। सो पाकिस्तान की नीयत फिर साफ हो गई। पाक ने कभी आरोपियों पर कार्रवाई नहीं की। चाहे संसद पर हमले का मामला हो, या 26/11 के मुंबई हमले का। हर बार पाक ने सबूत मांगे। फिर उन सबूतों में नुक्स निकाल दोषियों को कोर्ट से बरी करवा दिया। पाक की अदालतें भी स्वतंत्र नहीं। वैसे भी जब लोकतंत्र ही नहीं, तो फिर कोर्ट का क्या भरोसा। पाक अपने साठ साल में करीब पचास साल तो तानाशाही दौर से ही गुजरा। सैनिक हुक्मरानों ने समूची व्यवस्था को एक डंडे से हांका। परवेज मुशर्रफ के वक्त चीफ जस्टिस इफ्तिखार चौधरी समेत कई जजों की बर्खास्तगी ही तानाशाही शासन के ताबूत की आखिरी कील साबित हुई। पर राजनीति ने ऐसी करवट ली। कभी टेन परसेंट दलाल के नाम से मशहूर, जेल की सजा भुगत चुके आसिफ अली जरदारी पाक के राष्ट्रपति हो गए। सो पहले तो पाक अपना इतिहास ठीक करे। फिर कश्मीर के भूगोल की बात। यों भले पाक के विदेश मंत्री दिल बहलाने को शेखी बघार रहे। बातचीत की पेशकश को भारत की हार बता रहे। पर कश्मीर और मुंबई के बारे में कुरैशी ने जो कहा। आखिर उस पर मनमोहन सरकार की चुप्पी क्यों? कम से कम भारत को एतराज तो जताना चाहिए था। अगर वाकई पाक का स्टैंड नहीं बदला। तो हम बातचीत करने को बेताब क्यों? अपनी सरकारें भी ऐसा क्यों करतीं, जैसा कुरैशी कर रहे। अवाम का दिल जीतने के लिए एनडीए सरकार ने संसद पर हमले के बाद ऑपरेशन पराक्रम किया। सीमा पर फौजों का जमावड़ा बढ़ाया। फिर लौटकर बातचीत की मेज पर आ गए। वही मनमोहन सरकार भी कर रही। मुंबई हमले के बाद शुरुआती छह महीने ऐसे बयान दिए। मानो अब-तब युद्ध हुआ। पर अमेरिकी दबाव में पाक को न्योता देकर वहां के हुक्मरानों को भारत ने हीरो बना दिया। आखिर कब तक चूहे-बिल्ली का यह खेल चलता रहेगा? पाक की नीयत को समझने के लिए सरकार को कितना वक्त चाहिए? अब देश की विडंबना नहीं, तो क्या कहें। बीजेपी भी मनमोहन सरकार पर घुटने टेकने का आरोप लगा रही। तो उधर पाकिस्तान भी भारत को घुटने टेकने को मजबूर बता रहा। वाकई पाक ने दिखावे को भी ऐसा कुछ नहीं किया। जो मनमोहन सरकार बातचीत को उतावली हो। पर न्योता दिया जा चुका। भले अमेरिकी दबाव में ही। पाक भी अमेरिकी शह पा अपनी पीठ ठोक रहा। तो कांग्रेस भी क्या करे। सो सोमवार को कांग्रेस ने बातचीत की पेशकश को जायज ठहराया। अब तक पाक की कार्रवाई से कांग्रेस संतुष्टï। सो जब सत्ताधारी दल संतुष्टï हो। तो बाकी अवाम की फिक्र क्यों? सो कुरैशी की बदजुबानी दरकिनार कर दें। तो मुंबई-कश्मीर जैसे मुद्दे पर स्टैंड देख यही लग रहा। अमेरिकी दबाव में 'इंडिया' तो जीत गया। पर 'हिंदुस्तान' हार गया। अमेरिका तो इंडिया की आवाज बना। सो जनता का हिंदुस्तान क्या कर पाता?
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08/02/2010
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छज बोले, सो बोले। छलनी भी बोलती, जिसमें हजारों छेद। चीन तो आंखें दिखा ही रहा था। अब पाक भी हेकड़ी दिखा रहा। भारत ने बातचीत की पेशकश क्या रख दी। अपने मुंह मियां मि_ïू होने लगे। मुंबई हमले के बाद भारत कूटनीतिक दबाव बनाने में सफल रहा। पाक विदेश मंत्री शाह महमूद कुरैशी ऐसे दबे, कभी सूरत न दिखी। कभी-कभार रहमान मलिक भारत के दिए डोजियर पर चूं-चपड़ करते दिखे। अब महमूद कुरैशी वैसे ही उछल रहे। जैसे हलाल होने वाले बकरे को वापस बाड़े में डाल दिया हो। भारत ने सवा साल बाद पाक को सांस लेने का मौका दिया। तो पाक हुक्मरानों की पसली चलने लगी। महमूद कुरैशी इतवार को मुल्तान में सुल्तान बनने की कोशिश करते दिखे। आवाम के सामने चीखकर बोले- 'भारत हार गया। भारत ने पहले कहा था, मुंबई हमले के आरोपियों को सजा मिलने तक हमसे से बातचीत नहीं करेगा। अब तैयार हो गया। यह सब पाक की ताकत से संभव हुआ। हमने कभी अपना स्टैंड नहीं बदला, चाहे कश्मीर हो या मुंबई। इसी वजह से हमारी जीत हुई।' एक चुटकुला बहुत पुराना। पर पाक के लिए मौजूं। एक व्यक्ति पत्नी और बच्चों के साथ स्कूटर पर जा रहा था। रास्ते में किसी से झड़प हो गई। तो सामने वाले व्यक्ति ने थप्पड़ जड़ दिया। अब वह व्यक्ति पत्नी-बच्चों के सामने पिटा। सो तिलमिला गया। फिर चुनौती दी- 'मुझे मारा, कोई बात नहीं। मेरी बीवी को मारकर दिखाओ, फिर बताता हूं।' उस व्यक्ति ने उसकी बीवी को भी थप्पड़ मार दिया। फिर उसने यही फार्मूला अपने बच्चे के लिए कहा। और तीनों थप्पड़ खाकर चल दिए। घर जाकर बीवी ने पूछा- 'आपने तीनों को क्यों थप्पड़ मरवाया?' व्यक्ति ने जवाब दिया- 'ताकि घर जाकर तुम मां-बेटे मेरा मजाक न उड़ा सको, मैं पिटकर आ गया।' पाकिस्तान भारत से एकाध बार पिटा हो। तो कोई बात समझ में आए। चार बार ऐसा पिट चुका। पाक में घुसकर अपनी फौज ने जीवन-दान दिया। जनरल नियाजी का पूरी फौज के साथ आत्म-समर्पण शायद पाक भूल चुका। सो कुरैशी सिर चढ़कर बोल रहे। पर अपने राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर ने 'रश्मि रथी' में बहुत खूब लिखा- '... क्षमा शोभती उस भुजंग को, जिसके पास गरल हो। उसे क्या, जो दंतहीन, विषहीन, विनीत-सरल हो।...' सो भारत ने खुद की ओर से पहल की। ताकि दुनिया को बता सके, भारत शांति चाहता। पर पाक की बचकानी कूटनीति देख लो। पिटा हुआ मोहरा अपने दड़बे में चीखकर शेर बनने की सोच रहा। कुरैशी भारत को हारा हुआ बता रहे। सो पाकिस्तान की नीयत फिर साफ हो गई। पाक ने कभी आरोपियों पर कार्रवाई नहीं की। चाहे संसद पर हमले का मामला हो, या 26/11 के मुंबई हमले का। हर बार पाक ने सबूत मांगे। फिर उन सबूतों में नुक्स निकाल दोषियों को कोर्ट से बरी करवा दिया। पाक की अदालतें भी स्वतंत्र नहीं। वैसे भी जब लोकतंत्र ही नहीं, तो फिर कोर्ट का क्या भरोसा। पाक अपने साठ साल में करीब पचास साल तो तानाशाही दौर से ही गुजरा। सैनिक हुक्मरानों ने समूची व्यवस्था को एक डंडे से हांका। परवेज मुशर्रफ के वक्त चीफ जस्टिस इफ्तिखार चौधरी समेत कई जजों की बर्खास्तगी ही तानाशाही शासन के ताबूत की आखिरी कील साबित हुई। पर राजनीति ने ऐसी करवट ली। कभी टेन परसेंट दलाल के नाम से मशहूर, जेल की सजा भुगत चुके आसिफ अली जरदारी पाक के राष्ट्रपति हो गए। सो पहले तो पाक अपना इतिहास ठीक करे। फिर कश्मीर के भूगोल की बात। यों भले पाक के विदेश मंत्री दिल बहलाने को शेखी बघार रहे। बातचीत की पेशकश को भारत की हार बता रहे। पर कश्मीर और मुंबई के बारे में कुरैशी ने जो कहा। आखिर उस पर मनमोहन सरकार की चुप्पी क्यों? कम से कम भारत को एतराज तो जताना चाहिए था। अगर वाकई पाक का स्टैंड नहीं बदला। तो हम बातचीत करने को बेताब क्यों? अपनी सरकारें भी ऐसा क्यों करतीं, जैसा कुरैशी कर रहे। अवाम का दिल जीतने के लिए एनडीए सरकार ने संसद पर हमले के बाद ऑपरेशन पराक्रम किया। सीमा पर फौजों का जमावड़ा बढ़ाया। फिर लौटकर बातचीत की मेज पर आ गए। वही मनमोहन सरकार भी कर रही। मुंबई हमले के बाद शुरुआती छह महीने ऐसे बयान दिए। मानो अब-तब युद्ध हुआ। पर अमेरिकी दबाव में पाक को न्योता देकर वहां के हुक्मरानों को भारत ने हीरो बना दिया। आखिर कब तक चूहे-बिल्ली का यह खेल चलता रहेगा? पाक की नीयत को समझने के लिए सरकार को कितना वक्त चाहिए? अब देश की विडंबना नहीं, तो क्या कहें। बीजेपी भी मनमोहन सरकार पर घुटने टेकने का आरोप लगा रही। तो उधर पाकिस्तान भी भारत को घुटने टेकने को मजबूर बता रहा। वाकई पाक ने दिखावे को भी ऐसा कुछ नहीं किया। जो मनमोहन सरकार बातचीत को उतावली हो। पर न्योता दिया जा चुका। भले अमेरिकी दबाव में ही। पाक भी अमेरिकी शह पा अपनी पीठ ठोक रहा। तो कांग्रेस भी क्या करे। सो सोमवार को कांग्रेस ने बातचीत की पेशकश को जायज ठहराया। अब तक पाक की कार्रवाई से कांग्रेस संतुष्टï। सो जब सत्ताधारी दल संतुष्टï हो। तो बाकी अवाम की फिक्र क्यों? सो कुरैशी की बदजुबानी दरकिनार कर दें। तो मुंबई-कश्मीर जैसे मुद्दे पर स्टैंड देख यही लग रहा। अमेरिकी दबाव में 'इंडिया' तो जीत गया। पर 'हिंदुस्तान' हार गया। अमेरिका तो इंडिया की आवाज बना। सो जनता का हिंदुस्तान क्या कर पाता?
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08/02/2010
Friday, February 5, 2010
घरेलू ही नहीं, कूटनीति में भी फिसड्डी सरकार
संतोष कुमार
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इंतिहा हो गई इंतजार की। पर अपने पीएम अभी भी यही कह रहे, थोड़ा और इंतजार करिए। कांग्रेस की वर्किंग कमेटी महंगाई पर सीएम मीटिंग से ठीक पहले हुई। तो मनमोहन ने कुछ हफ्तों में सरकारी कदम के असर की सफाई दी। शरद पवार ने दस दिन में महंगाई कम होने का दावा किया था। अपने पीएम पिछले साल अगस्त की वर्किंग कमेटी में भी कुछ ऐसी ही दलील दे चुके। पर महंगाई का कुछ नहीं बिगड़ा। अलबत्ता महंगाई 'पुराण' बन गई। मौके-बेमौके नेतागण बांच रहे। अब शनिवार को सीएम मीटिंग में बेपर्दा हों। कांग्रेस ने शुक्रवार को ही वर्किंग कमेटी कर अपनी गंभीरता का ढोंग रचाया। अब आशंकाएं तो यहां तक जताई जा रहीं। यूपीए के अर्थशास्त्रीगण कृषि में विदेशी निवेश यानी एफडीआई का रास्ता खोलने की जुगत में। सो महंगाई को जानबूझकर बेलगाम होने दिया गया। ताकि मांग-आपूर्ति, भंडारण और लचर सिस्टम पर सवाल उठे। फिर बेहतर कोल्ड स्टोरेज, मांग-आपूर्ति में संतुलन और डिस्ट्रीब्यूशन की पूरी शृंखला को दुरुस्त करने के बहाने एफडीआई की पैरवी हो। इसलिए दलील दी जा रही, कृषि क्षेत्र का उचित प्रबंधन न होने से 40 फीसदी अनाज बेकार हो रहा। कहीं ट्रांसपोर्टेशन की दिक्कत। तो कहीं स्टोरेज की। सो बेहतरी के नाम पर निवेश फार्मूला सोच रही सरकार। अब सचमुच ऐसा हुआ। तो सोचिए, कांग्रेस का 'हाथ' किसके साथ? पर शुक्रवार को कांग्रेस ने सिर्फ महंगाई पर ढोंग नहीं किया। सुरक्षा अमले से घिरे राहुल गांधी ने मुंबई जाकर शिवसेना को चुनौती दी। एटीएम से पैसे निकाले। लोकल ट्रेन का टिकट लाइन में लग खरीदा। फिर चाक-चौबंद सुरक्षा के बीच 'आम मुसाफिरों' की माफिक सफर किया। अब महाराष्टï्र का गृह राज्यमंत्री जूता उठाने को बैठा हो। तो ऐसी यात्रा कोई भी कर ले। राहुल की सुरक्षा में समूची सरकार और प्रशासन सड़कों पर उतरा था। सीएम अशोक चव्हाण राहुल की अगवानी में इतने तन, मन, धन से लगे रहे। सीडब्ल्यूसी की बैठक में आना भी मुनासिब न समझा। यों राहत की बात, शिवसेनिक दड़बे में ही बांध दिए गए। राहुल सकुशल मुंबई का दौरा पूरा कर पुडिचेरी चले गए। पर अपना एक छोटा सा सवाल विलासराव देशमुख, अशोक चव्हाण, आरआर पाटिल और बड़े नेता सोनिया-मनमोहन से। जब 2008 में राज ठाकरे मुंबई की सड़कों पर तांडव कर रहे थे। क्या तब महाराष्टï्र में कोई सीएम था या नहीं? पुलिस थी या नहीं? क्या सिर्फ सरकार और पुलिस सिर्फ वीआईपी के लिए होती? अगर नहीं, तो ऐसा सुरक्षा बंदोबस्त तब उत्तर भारतीयों के लिए क्यों नहीं किया गया? माना, शिवसेना को उसके गढ़ में चुनौती देकर राहुल ने माकूल जवाब दिया। पर क्या इस दौरे से शिवसेना-राज ठाकरे की ओछी सियासत बंद हो जाएगी? आखिर इस दौरे का क्या संदेश गया? यही ना, अगर शासन और प्रशासन ईमानदारी दिखाए। तो मुंबई में उत्तर भारतीय बेखौफ रह सकते हैं। अगर कांग्रेस वाकई ईमानदार। तो चचा-भतीजा ठाकरे पर कड़ी कार्रवाई का साहस दिखाए। वरना राहुल का दौरा भी महंगाई जैसा ही महज ढोंग माना जाएगा। पर शिवसेना कहां मुंह बंद रखने वाली। राहुल ने एटीएम से पैसा निकाला। तो उद्धव ठाकरे बोले- 'दिल्ली के नेता मुंबई को एटीएम यानी ऑल टाइम मनी समझते। यही मानसिकता हमें बदलनी है।' अब उद्धव ने छोटी बात से अपने वोटरों को बड़ा संदेश दे दिया। यानी अनजाने में ही सही, शिवसेना को छोटी बात से बड़ा फायदा मिल गया। सो जरूरत जुबानी जंग की नहीं। अलबत्ता कुछ करने की है, ताकि चचा-भतीजा ठाकरे पर नकेल कसी जा सके। पर अपनी सरकार जैसे घरेलू मोर्चे पर असहाय दिख रही। अब कूटनीतिक मोर्चे पर भी नाकामी का सेहरा बंध गया। कहां 26/11 के हमले के बाद भारत ने पाक को दुनिया के कटघरे में खड़ा किया। मनमोहन ने दो-टूक कह दिया। जब तक पाक दोषियों पर कार्रवाई नहीं, बातचीत नहीं। पर जुलाई 2009 में ही शर्म अल शेख जाकर पाक पीएम गिलानी संग साझा बयान कर आए। अमेरिकी दबाव में पहली बार बलूचिस्तान साझा बयान में आ गया। पर देश में बवाल मचा। बीजेपी ने सरकार को बेपर्दा किया। तो कांग्रेस घबरा गई। घबराहट में तबके विदेश सचिव और मौजूदा एनएसए ने ड्राफ्टिंग एरर कहा। तो विदेश राज्यमंत्री शशि थरूर ने साझा बयान को बंदिश नहीं माना। पर चूक तो थी, सो संसद के दोनों सदनों में मनमोहन को सफाई देनी पड़ी। फिर वही वायदा, जब तक पाक 26/11 के दोषियों पर कार्रवाई नहीं करता। सार्थक बातचीत नहीं होगी। पर ओबामा के दबाव में अब खुद भारत ने आगे बढ़ पाक के सामने बातचीत की पेशकश कर दी। इसी महीने की दो तारीखें भी सुझाईं। तो जैसे गिलानी ने शर्म अल शेख को अपनी जीत बताया था। अब भारत की पेशकश को दुनिया का दबाव बता रहे। भारत से बातचीत का विषय और एजंडा पहले साफ करने की शर्त रख दी। इसे कहते हैं, चोरी और सीनाजोरी। याद है, 22 जनवरी को ही गिलानी ने क्या कहा था। पाक 26/11 नहीं दोहराने की गारंटी नहीं दे सकता। अब पाक पीएम ऐसा बयान दे। फिर भी भारत अपनी ओर से बातचीत की पेशकश करे। तो क्या कहेंगे आप। विपक्ष को तो मनमोहन की नीयत पर संदेह। अब बजट सत्र में बीजेपी पीएम से नया वादा मांगेगी। अरुण जेतली बोले- 'संसद में हमें पीएम से स्पष्टï वायदा चाहिए कि कश्मीर पर 1994 के प्रस्ताव से नहीं हटेंगे। और ना ही सीमा के बारे में भारत की पुरानी स्थिति को छोड़ेंगे।'
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इंतिहा हो गई इंतजार की। पर अपने पीएम अभी भी यही कह रहे, थोड़ा और इंतजार करिए। कांग्रेस की वर्किंग कमेटी महंगाई पर सीएम मीटिंग से ठीक पहले हुई। तो मनमोहन ने कुछ हफ्तों में सरकारी कदम के असर की सफाई दी। शरद पवार ने दस दिन में महंगाई कम होने का दावा किया था। अपने पीएम पिछले साल अगस्त की वर्किंग कमेटी में भी कुछ ऐसी ही दलील दे चुके। पर महंगाई का कुछ नहीं बिगड़ा। अलबत्ता महंगाई 'पुराण' बन गई। मौके-बेमौके नेतागण बांच रहे। अब शनिवार को सीएम मीटिंग में बेपर्दा हों। कांग्रेस ने शुक्रवार को ही वर्किंग कमेटी कर अपनी गंभीरता का ढोंग रचाया। अब आशंकाएं तो यहां तक जताई जा रहीं। यूपीए के अर्थशास्त्रीगण कृषि में विदेशी निवेश यानी एफडीआई का रास्ता खोलने की जुगत में। सो महंगाई को जानबूझकर बेलगाम होने दिया गया। ताकि मांग-आपूर्ति, भंडारण और लचर सिस्टम पर सवाल उठे। फिर बेहतर कोल्ड स्टोरेज, मांग-आपूर्ति में संतुलन और डिस्ट्रीब्यूशन की पूरी शृंखला को दुरुस्त करने के बहाने एफडीआई की पैरवी हो। इसलिए दलील दी जा रही, कृषि क्षेत्र का उचित प्रबंधन न होने से 40 फीसदी अनाज बेकार हो रहा। कहीं ट्रांसपोर्टेशन की दिक्कत। तो कहीं स्टोरेज की। सो बेहतरी के नाम पर निवेश फार्मूला सोच रही सरकार। अब सचमुच ऐसा हुआ। तो सोचिए, कांग्रेस का 'हाथ' किसके साथ? पर शुक्रवार को कांग्रेस ने सिर्फ महंगाई पर ढोंग नहीं किया। सुरक्षा अमले से घिरे राहुल गांधी ने मुंबई जाकर शिवसेना को चुनौती दी। एटीएम से पैसे निकाले। लोकल ट्रेन का टिकट लाइन में लग खरीदा। फिर चाक-चौबंद सुरक्षा के बीच 'आम मुसाफिरों' की माफिक सफर किया। अब महाराष्टï्र का गृह राज्यमंत्री जूता उठाने को बैठा हो। तो ऐसी यात्रा कोई भी कर ले। राहुल की सुरक्षा में समूची सरकार और प्रशासन सड़कों पर उतरा था। सीएम अशोक चव्हाण राहुल की अगवानी में इतने तन, मन, धन से लगे रहे। सीडब्ल्यूसी की बैठक में आना भी मुनासिब न समझा। यों राहत की बात, शिवसेनिक दड़बे में ही बांध दिए गए। राहुल सकुशल मुंबई का दौरा पूरा कर पुडिचेरी चले गए। पर अपना एक छोटा सा सवाल विलासराव देशमुख, अशोक चव्हाण, आरआर पाटिल और बड़े नेता सोनिया-मनमोहन से। जब 2008 में राज ठाकरे मुंबई की सड़कों पर तांडव कर रहे थे। क्या तब महाराष्टï्र में कोई सीएम था या नहीं? पुलिस थी या नहीं? क्या सिर्फ सरकार और पुलिस सिर्फ वीआईपी के लिए होती? अगर नहीं, तो ऐसा सुरक्षा बंदोबस्त तब उत्तर भारतीयों के लिए क्यों नहीं किया गया? माना, शिवसेना को उसके गढ़ में चुनौती देकर राहुल ने माकूल जवाब दिया। पर क्या इस दौरे से शिवसेना-राज ठाकरे की ओछी सियासत बंद हो जाएगी? आखिर इस दौरे का क्या संदेश गया? यही ना, अगर शासन और प्रशासन ईमानदारी दिखाए। तो मुंबई में उत्तर भारतीय बेखौफ रह सकते हैं। अगर कांग्रेस वाकई ईमानदार। तो चचा-भतीजा ठाकरे पर कड़ी कार्रवाई का साहस दिखाए। वरना राहुल का दौरा भी महंगाई जैसा ही महज ढोंग माना जाएगा। पर शिवसेना कहां मुंह बंद रखने वाली। राहुल ने एटीएम से पैसा निकाला। तो उद्धव ठाकरे बोले- 'दिल्ली के नेता मुंबई को एटीएम यानी ऑल टाइम मनी समझते। यही मानसिकता हमें बदलनी है।' अब उद्धव ने छोटी बात से अपने वोटरों को बड़ा संदेश दे दिया। यानी अनजाने में ही सही, शिवसेना को छोटी बात से बड़ा फायदा मिल गया। सो जरूरत जुबानी जंग की नहीं। अलबत्ता कुछ करने की है, ताकि चचा-भतीजा ठाकरे पर नकेल कसी जा सके। पर अपनी सरकार जैसे घरेलू मोर्चे पर असहाय दिख रही। अब कूटनीतिक मोर्चे पर भी नाकामी का सेहरा बंध गया। कहां 26/11 के हमले के बाद भारत ने पाक को दुनिया के कटघरे में खड़ा किया। मनमोहन ने दो-टूक कह दिया। जब तक पाक दोषियों पर कार्रवाई नहीं, बातचीत नहीं। पर जुलाई 2009 में ही शर्म अल शेख जाकर पाक पीएम गिलानी संग साझा बयान कर आए। अमेरिकी दबाव में पहली बार बलूचिस्तान साझा बयान में आ गया। पर देश में बवाल मचा। बीजेपी ने सरकार को बेपर्दा किया। तो कांग्रेस घबरा गई। घबराहट में तबके विदेश सचिव और मौजूदा एनएसए ने ड्राफ्टिंग एरर कहा। तो विदेश राज्यमंत्री शशि थरूर ने साझा बयान को बंदिश नहीं माना। पर चूक तो थी, सो संसद के दोनों सदनों में मनमोहन को सफाई देनी पड़ी। फिर वही वायदा, जब तक पाक 26/11 के दोषियों पर कार्रवाई नहीं करता। सार्थक बातचीत नहीं होगी। पर ओबामा के दबाव में अब खुद भारत ने आगे बढ़ पाक के सामने बातचीत की पेशकश कर दी। इसी महीने की दो तारीखें भी सुझाईं। तो जैसे गिलानी ने शर्म अल शेख को अपनी जीत बताया था। अब भारत की पेशकश को दुनिया का दबाव बता रहे। भारत से बातचीत का विषय और एजंडा पहले साफ करने की शर्त रख दी। इसे कहते हैं, चोरी और सीनाजोरी। याद है, 22 जनवरी को ही गिलानी ने क्या कहा था। पाक 26/11 नहीं दोहराने की गारंटी नहीं दे सकता। अब पाक पीएम ऐसा बयान दे। फिर भी भारत अपनी ओर से बातचीत की पेशकश करे। तो क्या कहेंगे आप। विपक्ष को तो मनमोहन की नीयत पर संदेह। अब बजट सत्र में बीजेपी पीएम से नया वादा मांगेगी। अरुण जेतली बोले- 'संसद में हमें पीएम से स्पष्टï वायदा चाहिए कि कश्मीर पर 1994 के प्रस्ताव से नहीं हटेंगे। और ना ही सीमा के बारे में भारत की पुरानी स्थिति को छोड़ेंगे।'
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