Thursday, March 4, 2010

गांधी जी का जंतर, कांग्रेस का मंतर और प्रतापगढ़ की आह!

खाद्य पदार्थों की महंगाई दर 18 फीसदी के करीब पहुंच गई। पर कांग्रेस को आम आदमी के खाली पेट की नहीं, सरकारी खजाने की फिक्र। अब सोनिया गांधी ने भी पेट्रोल-डीजल की बढ़ी कीमतें जायज बता दीं। प्रणव दा के बजट को संतुलित बताया। अब कोई पूछे, सरकारी खजाना भरने को सिर्फ आम आदमी ही बोझ उठाए? देश के धनकुबेर क्या सिर्फ चुनावी चंदा देकर छूट पाते रहेंगे? बढ़ी कीमतों का तो धनकुबेरों पर कोई असर नहीं पड़ेगा। पर गरीब इस बोझ से और गरीब हो जाएगा। यानी अमीरी-गरीबी की खाई बढ़ती जा रही। फिर भी कोई इस कदर रार ठान ले। तो आम आदमी हमेशा आम ही रहेगा। अब अगर आम आदमी को यों ही बोझ उठाना था। तो कांग्रेस वर्किंग कमेटी में प्रस्ताव पारित करा सोनिया गांधी ने बार-बार चिंता क्यों जताई? हर बार ढांढस क्यों बंधाया, महंगाई अब थमी, तब थमी। याद है, जनवरी के आखिर में केबिनेट कमेटी ऑन प्राइस की मीटिंग के बाद पवार ने महंगाई को भागने के लिए दस दिन का अल्टीमेटम दिया था। तब अपने राहुल बाबा ने इतराते हुए यही कहा था। महंगाई बस कुछ दिनों की मेहमान। पर महंगाई तो नहीं भागी, कांग्रेस और उसकी सरकार भागी-भागी फिर रही। अब तो यही लग रहा, कांग्रेस ने आम आदमी को बरगलाने का अनोखा फार्मूला अपना लिया। एक झूठ को सौ बार चीख-चीखकर बोलो, तो सफेद झूठ भी सच दिखेगा। कांग्रेस या सरकार ने महंगाई पर काबू के जितने दावे किए, सब सफेद झूठ साबित हुए। कांग्रेस हर बार यही कहती रही, सरकार ने कई कदम उठाए। पर कहते हैं ना, झूठ के पांव नहीं होते। सो झूठे कदम के जमीन पर निशान ही नहीं पड़े। अब सोनिया गांधी ने कांग्रेस पार्लियामेंट्री पार्टी की मीटिंग में सांसदों को संबोधित किया। तो सिर्फ प्रणव दा की बाजीगरी की ही तारीफ नहीं की। अलबत्ता शरद पवार की नीतियों का भी समर्थन किया। अब अगर पवार की महंगाई लाओ नीतियां इतनी रास आ रहीं। तो पिछले महीने ही कांग्रेस के गुणवान प्रवक्तागण पवार को कटघरे में क्यों खड़ा कर रहे थे। खुल्लमखुल्ला तो पवार को कई नसीहतें दीं। दबी जुबान में कांग्रेसियों ने बेसिर-पैर की खबरें भी खूब उड़ाईं। जैसे एक खबर थी- मनमोहन ने पवार को डांट पिलाई। नतीजे दो, वरना विभाग मुझे खुद संभालना होगा। अब सोचिए, क्या पवार ऐसी बात सुन सकते? अगर पवार को छोड़ दें, तो क्या मनमोहन इस लफ्ज में पवार को कह सकते? पर जनता को बरगलाना कांग्रेसियों का मकसद था। सो जो जी में आया, खबरें बांच दीं। पर याद है ना, तब कैसे पवार और एनसीपी ने पलटवार किया था। कांग्रेसी आस्तीनें चढ़ा पवार को महंगाई मंत्री साबित करने में जुट गए थे। तो पवार ने दो-टूक कह दिया था- 'महंगाई के लिए पूरी केबिनेट जिम्मेदार। प्रधानमंत्री की रहनुमाई में सारे फैसले लिए जाते।' यानी समझदार को इशारा ही काफी। सो तबसे कांग्रेसियों के सुर बदल गए। अब जबसे समूचा विपक्ष एकजुट हुआ, वैसे भी सत्तापक्ष की एकजुटता मजबूरी बन चुकी। सो अब महंगाई से देश का ध्यान शिफ्ट करने के लिए महिला आरक्षण बिल एजंडे में सबसे ऊपर आ गया। सोमवार को राज्यसभा में बिल आएगा। पर बिल के फच्चरबाज भी कम नहीं। कांग्रेस यही चाह रही, सदन में फच्चर फंसे। तो विपक्ष की यादवी त्रिमूर्ति आलोचना के राडार पर हो। पर कांग्रेस शायद भूल रही, भले सूरज डूबना भूल जाए। चांद निकलना, पर पेट की आग धधकना नहीं भूलती। लोगों को भूख शांत करने के लिए खाना चाहिए। जो कांग्रेस राज में इतना महंगा, कि आम आदमी की औकात से बाहर हो चुका। अब इस सच को कौन झुठलाएगा? सोनिया गांधी ने सीपीपी में कीमतें बढ़ाने की मजबूरी तो बता दीं। पर ठीक दूसरी तरफ यूपी के प्रतापगढ़ में स्थित कृपालु महाराज के आश्रम में मुफलिसी का तांडव दिखा। कृपालु महाराज तो महज धर्मगुरु। पर धन संपदा अकूत। वैसे भी धर्मगुरुओं की तादाद इतनी हो चुकी, किसको गुरु बनाएं, समझ नहीं आता। लोगों की आस्था 'कैश' करने में गुरुओं का कोई सानी नहीं। आस्था के नाम पर देश के धनकुबेर धर्मस्थलों और गुरुओं को करोड़ों का चैक थमा आते। ताकि गुरुओं की भी मौज, धनकुबेर भी टेक्स बचा लेते। हाल में दिल्ली से धरे गए इच्छाधारी संत और कर्नाटक के स्वामी नित्यानंद के स्कैंडल की चर्चा खूब हो रही। पर धर्मगुरुओं की बात फिर कभी। बात हो रही थी महंगाई और गरीबी की। कृपालु महाराज अपनी पत्नी के श्राद्ध कार्यक्रम में भंडारा दे रहे थे। एलान हो चुका था, थाली-लोटा और बीस रुपए मिलेंगे। सो गरीब बीवी-बच्चों समेत भंडारे में पहुंचे। पर भगदड़ ऐसी मची, 26 महिलाएं और 37 बच्चे मौत की नींद सो गए। ढाई सौ के करीब घायल। महिला बिल भले पास हो जाए। पर क्या इन 26 महिलाओं में कोई ऐसी महिला थी, जिसे इस बिल का फायदा मिलता? अब घटना का जिम्मेदार कौन, यह तो जांच की बात। पर देश के विकास का चेहरा यहीं से दिख रहा। कांग्रेस खुद को महात्मा गांधी के विचारों का ठेकेदार बताती। पर महात्मा ने एक जंतर दिया था। जब तुम्हें संदेह हो या तुम्हारा अहं हावी होने लगे, तो सबसे गरीब-कमजोर की शक्ल याद करो। दिल से पूछो, तुम्हारा कदम उस आदमी के लिए कितना उपयोगी होगा...। अब क्या सचमुच कांग्रेस गांधी की अनुयायी? यहां तो गरीब ही पिस रहा। धनकुबेर मंदी के दौर में भी दुगुनी-तिगुनी कमाई कर चुके। पर कांग्रेस ने खूंटा गाड़ दिया, आम आदमी पर बोझ सही।
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04/03/2010

Wednesday, March 3, 2010

विपक्षी महाजोट से कितने परेशान, पीएम ने बता दिया

तेल के कुंए में बेधड़क डुबकी तो लगा ली। पर अब बाहर निकलने को कांग्रेस हाथ-पैर मार रही। बुधवार को भी दोपहर तक संसद के दोनों सदन ठप रहे। प्रणव दादा को इतनी मशक्कत बजट बनाने में भी न करनी पड़ी होगी। जितनी बजट से लगी चोट को सहलाने में करनी पड़ रही। अब दादा कभी कांग्रेसी सांसदों को सफाई देते फिर रहे। तो कभी यूपीए के घटक दलों की मान-मनोव्वल कर रहे। अगर कीमतें बढ़ानी ही थीं, तो जैसे बजट से पहले फर्टीलाइजर की बढ़ाईं। पेट्रोल-डीजल के कुएं में भी तभी डुबकी लगा लेते। तो भले संसद में शुरुआती हंगामा होता। पर विपक्ष को कटौती प्रस्ताव लाने का हथियार नहीं मिलता। वैसे भी 22 फरवरी को संसद का सत्र शुरू हुआ। पर अब तक एक भी दिन प्रश्रकाल नहीं चला। ऊपर से विपक्ष की अनौखी एकजुटता ने सरकार को बेदम कर रखा। पर सरकार की अकड़ देखिए। कीमतें वापस लेने को राजी नहीं। अलबत्ता फूट डालो, राज करो की नीति बना ली। विपक्ष की एकता में सेंध लगाने को महिला आरक्षण बिल पर तेजी दिखा दी। आठ मार्च को अंतर्राष्टï्रीय महिला दिवस। सो सरकार बिल पास कराने को कदम बढ़ाएगी। ताकि महिला बिल में कोटा तय करने के पैरोकार तीनों यादव विपक्षी महाजोट से अलग हो जाएं। तीनों यादव- यानी शरद, मुलायम, लालू। पर यह कैसा महिला हित? एक तरफ तो 33 फीसदी आरक्षण दिलाने की कोशिश। दूसरी तरफ पेट्रोल-डीजल की कीमतें बढ़ाकर हर घर की किचन मिनिस्टर यानी महिलाओं का बजट बिगाड़ दिया। पर शरद हों या मुलायम, अपना इरादा साफ कर दिया। विपक्ष की एकजुटता मुद्दों पर बनी। सो टूटेगी नहीं, अलबत्ता सरकार को तोड़ देगी। अब विपक्ष ने जनता तक आवाज पहुंचा बुधवार को संसद चलने दी। ताकि सरकार को सदन के भीतर घेरा जाए। बीजेपी और लेफ्ट ने तो मंगलवार की शाम ही तय कर लिया था। सिर्फ हंगामा खड़ा करना अपना मकसद नहीं। सुषमा स्वराज ने खुद वासुदेव आचार्य और गुरुदास दासगुप्त से बात की। फिर बुधवार को सुबह एनडीए की मीटिंग हुई। तो शरद यादव ने बताया, मुलायम सिंह यादव सदन चलने देने के पक्ष में नहीं। सो फिर सुषमा-शरद-दासगुप्त ने मुलायम से बात की। पर मुलायम एकदम से पीछे हटने को राजी नहीं। आखिर विपक्ष की एकजुटता बरकरार रखना भी बीजेपी के लिए इस वक्त बड़ी चुनौती। सो तय हुआ- हंगामा भी करेंगे, बहस भी करेंगे। दोपहर दो बजे तक दोनों सदन ठप रहे। लोकसभा में पीएम का प्रश्रकाल था। सो पीएम से सवाल पूछा गया। ऐसी क्या मजबूरी थी, जो आकाश में ही कीमतें वापस न लेने का खम ठोका। विपक्ष को गुस्सा इस बात का, पीएम ने अकड़ क्यों दिखाई। अगर पीएम सदन में बात रखते। तो विपक्ष को नागवार न गुजरता। पर हंगामे की रणनीति पहले से तय थी। सो दोनों सदन ठप हो गए। दोपहर में राष्टï्रपति के अभिभाषण पर बहस शुरू हुई। तो कांग्रेस के राव इंद्रजीत सिंह ने मोर्चा संभाला। यों राव इंद्रजीत मनमोहन की पहली पारी में रक्षा राज्यमंत्री रह चुके। सो बहस में कुछ ज्यादा ही रक्षात्मक मुद्रा में दिखे। जैसे महंगाई पर बहस में संजय निरुपम गोल-गोल घुमाते रहे। राव इंद्रजीत उनसे कहीं कम नहीं दिखे। लालू यादव को तो दो बार उठकर पूछना पड़ा, आखिर राव इंद्रजीत कहना क्या चाह रहे। तीसरे नंबर पर जब आडवाणी खड़े हुए। तो उन ने भी कहा- राव इंद्रजीत ने क्या मुद्दे उठाए, समझ नहीं आया। पर विपक्ष के हमलों से सरकार कितनी परेशान, यह पीएम के बार-बार दखल देने से साफ हो गया। एनडीए का कार्यकारी अध्यक्ष बनने और बीजेपी संसदीय दल का अध्यक्ष चुने जाने के बाद आडवाणी की पहली स्पीच थी। सो लगा, आडवाणी जिम्मेदारी के बोझ से मुक्त होकर बोल रहे। उन ने पुराने मुद्दे ही उठाए। पर एक-एक मुद्दा इस तरीके से उठाया, मानो दिल से व्यवस्था में आमूल-चूल बदलाव चाह रहे। आडवाणी के भाषण के वक्त सदन में मनमोहन-सोनिया भी मौजूद थे। अब आडवाणी ने पुरानी बात ही कही। पर सरकार किस कदर परेशान, पीएम ने भड़ककर दिखाया। आडवाणी ने वन रेंक, वन पेंशन का वादा याद दिलाया। तो पीएम ने कहा, वादा पूरा किया। फिर इसी मुद्दे पर दुबारा उठकर बोले, वित्तमंत्री ने जो कहा, उसे लागू किया जा रहा। आडवाणी को नसीहत दी, असैन्य और सैन्य वर्ग में दरार पैदा न करें। फिर कश्मीर नीति पर बात हुई। आडवाणी ने ओबामा के आगे सरकार को सरेंडर बताया। तो पीएम भड़क गए। जवाब दिया- 'मुझे हैरानी हो रही, आप इस फोरम पर यह मुद्दा उठा रहे। मैंने कई बार ओबामा से बात की है। पर यूएस की पॉलिसी में कोई बदलाव नहीं आया।Ó फिर आडवाणी ने कश्मीर पर बातचीत का ब्यौरा मांगा। तो भड़के पीएम बोले- 'मैं आपसे सवाल पूछता हूं, जब आपके राज में जसवंत सिंह ने अमेरिकी विदेश उपमंत्री स्ट्रोव टालबोट से दर्जनों बार बातचीत की। तो क्या आपने संसद को इसकी जानकारी दी। आप कैसे उम्मीद करते हैं कि मैं आपके काल्पनिक सवालों का जवाब दूंगा।Ó अब यूएस की नीति में क्या बदला, नहीं बदला। इसकी जानकारी मनमोहन देंगे? बेहतर होता, मनमोहन यह कहते, किसी का दखल नहीं, हम 1994 के प्रस्ताव से बंधे हुए। पर उन ने अमेरिका की तरफ से सफाई दी। तभी तो जब कश्मीर नीति पर आडवाणी ने सवाल उठाए। तो जैसे चोर की दाड़ी में तिनका, कांग्रेस के श्रीप्रकाश जायसवाल खड़े हो गए। बोले- 'पीएम की नीयत पर शक करना ठीक नहीं। आडवाणी की बात सदन के रिकार्ड से हटाई जाए।'

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03/03/2010

Tuesday, March 2, 2010

व्हाट एन 'आइडिया' सोनिया जी!

होली में अबके महंगाई ने खूब हुल्लड़ मचाया। रंगों का त्योहार बेरंग न कहलाए। सो आम आदमी ने भी राजनीतिक पैंतरा आजमाया। सादगी की चादर ओढ़ हल्के में होली मना ली। ताकि बच्चे यह न कहें, गरीबी ने होली का रंग फीका कर दिया। पर तंगहाली को आम आदमी कब तक सादगी की चादर में ढांपेगा। राजनेता को तो देश पर राज भी करना, नेतागिरी भी। सो दोहरी जिंदगी नेताओं की फितरत में। तभी तो नेता विलासिता की जिंदगी भी जीते। दिखावे को सादगी का ढिंढोरा भी पीटते। अब आम आदमी राजनीति के पेच में इतना माहिर कहां। यों कहावत है, घूरे के दिन तो बारह साल बाद फिरते। पर अपने संविधान निर्माताओं का धन्यवाद करिए। जिन ने आम आदमी को पांच साल में दिन फिराने का हथियार दे रखा। पर लोकतंत्र के इस हथियार में भी नेताओं ने भ्रष्टïाचार का घुन घुसेड़ रखा। सो चुनावी माहौल में दारू से लेकर पैसा बंटने की खबरें आम हो जातीं। अगर नेताओं की नजर में वोट बिकाऊ न होते। तो सोचिए, पेट्रोल-डीजल की बढ़ी कीमतों पर सत्ताधारी ऐसी हेकड़ी दिखाते? बजट पास हुआ नहीं, जनता की जेब से पैसे झपटने शुरू कर दिए। क्या आम आदमी इसी बजट का इंतजार कर रहा था? माना, सरकार ने भविष्य को ध्यान में रखा। तो क्या देश के भविष्य निर्माण में आम आदमी का कोई महत्व नहीं? क्या जिनकी आमदनी महीने में पचास हजार से ऊपर, सिर्फ वही देश के भविष्य निर्माता? आप ही सोचिए, पचास हजार कमाने वालों को टेक्स में थोड़ी छूट न मिलती। वही रकम आम आदमी के फायदे में इस्तेमाल हो जाती। तो क्या देश पीछे चला जाता? क्या महंगाई टीम मनमोहन को नहीं दिख रही? आखिरकार पेट्रोल-डीजल की बढ़ी कीमत का सबसे ज्यादा असर किस पर पड़ेगा? अब ऐसा तो होगा नहीं, पेट्रोल-डीजल की कीमतें बढ़ीं। तो पीएम मनमोहन के काफिले में से एक गाड़ी कम हो जाएगी। अगर सचमुच कुछ कम होगा, तो वह आम आदमी का पेट होगा। फिर भी आम आदमी के हित में कोई सहानुभूतिपूर्ण बयान नहीं। अलबत्ता पीएम ने उडऩखटोले में से ही देश को आकाशवाणी दी। पेट्रोल-डीजल की बढ़ी कीमतें वापस नहीं होंगी। भविष्य को देखकर फैसले लिए, वैसे भी सबको खुश करना संभव नहीं। यों बीजेपी ने पीएम की आकाशवाणी को अहंकारवाणी कहा। अब बुधवार को भी विपक्ष संसद चलने देगा, ऐसी उम्मीद नहीं दिख रही। होली की थकान के बावजूद आंध्र में टीडीपी सड़कों पर उतरी। केरल में लेफ्ट का यूनियन और दिल्ली में बीजेपी। पर सिर्फ विपक्ष ही नहीं, होली से पहले यूपीए के घटक करुणानिधि और ममता अपने तेवर दिखा चुके। अब अगर ममता-करुणा को छोड़ दें। तो भी समूचे विपक्ष की एकजुटता सरकार की नाक में दम कर चुकी। पर कांग्रेस ने रार ठान ली, कम से कम विपक्ष के आगे घुटने नहीं टेकेंगे। सो प्रणव मुखर्जी बजट पेश करने के बाद कीमत वापसी पर कभी हां, कभी ना की मुद्रा में। पर सऊदी अरब से लौटते हुए पीएम ने आकाशवाणी सुनाई। तो कुछ समय के लिए कीमत वापस न लेने की गांठ और मजबूती से बांध ली। पर विपक्ष का महाजोट कांग्रेस की चूलें हिला चुका। बीजेपी ने तो कट मोशन लाने का एलान कर दिया। यानी भले महंगाई पर कामरोको प्रस्ताव के तहत बहस को सरकार राजी नहीं हुई। पर कट मोशन को कैसे टालेगी? अगर समूचा विपक्ष अड़ गया, तो सदन में वोटिंग अनिवार्य। ऐसे में मुश्किल होगी, तो सरकार के करुणा और ममता की। विपक्षी महाजोट भी कितने पानी में, यह साबित हो जाएगा। पर विपक्षी तेवर देख कांग्रेस सोचने को मजबूर। सो पीएम आकाशवाणी कर जैसे ही धरती पर उतरे। सात रेसकोर्स रोड में दरबार सज गया। कांग्रेस कोर कमेटी ने सोनिया गांधी की रहनुमाई में खूब मत्थापच्ची की। पर सिर दर्द एक हो, तो इलाज हो। मनमोहन केबिनेट के बवाली मंत्री कहिए या विदेश राज्यमंत्री। शशि थरूर फिर बयान बहादुरी की जंग में अव्वल निकले। पर कांग्रेस की कोर कमेटी थरूर के बारे में कुछ भी फैसला करे। आम आदमी को कोई सरोकार नहीं। आम आदमी तो यही पूछ रहा, महंगाई आसमान से कब जमीं पर आएगी। अब महंगाई का तो पता नहीं, पर कांग्रेस ने विपक्ष की धार भौंथरी करने की बिसात बिछा दी। अभी कीमत में कुछ कटौती की, तो क्रेडिट विपक्ष को जाएगा। पर चूल्हा-चौका अपना, तो खाना विपक्ष कैसे पकाए। सो कोर कमेटी ने तय किया, फिलहाल कीमत वापस नहीं लेंगे। इससे पीएम की बात रह जाएगी। पर बुधवार को प्रणव दादा बजट पर कांग्रेसी सांसदों से मिलेंगे। गुरुवार को कांग्रेस पार्लियामेंट्री पार्टी की मीटिंग होगी। तो सोनिया गांधी की जनहित वाणी निकलेगी। फिर कहा जाएगा, कांग्रेसी सांसदों की भावना का ध्यान रख सोनिया गांधी ने सरकार से पेट्रोल-डीजल की कीमतें घटाने की अपील की। ऐसा नहीं हुआ, तो दस जनपथ से साउथ ब्लॉक एक चि_ïी जरूर पहुंचेगी। फिर पूरा रोलबैक तो नहीं, डीजल में बड़ी कटौती कर जनमुखी चेहरा दिखाएगी। कांग्रेस में यह परंपरा कोई नई नहीं। हर बार जनहितैशी फैसले का क्रेडिट दस जनपथ को दिया जाता। देखी कांग्रेस की रणनीति। इसे कहते हैं, 'व्हाट एन आइडिया सोनिया जी।' वाकई कांग्रेस की रणनीति आम आदमी समझ जाए। तो वह आम क्यों कहलाए। साठ साल से आम आदमी को इसी सियासत ने तो खास न होने दिया।
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02/03/2010

Friday, February 26, 2010

जब चला काला जादू, आंख बंद, डिब्बा गायब

बंगाल काला जादू के लिए खूब मशहूर। सो अबके बजट में प्रणव दा का जादू सिर चढ़कर बोला। अब कोई बड़ा चुनाव होता। तो ऐसा जादू दादा क्या, कोई भी न दिखाता। ले-देकर बिहार के चुनाव इसी साल। जहां कांग्रेस की हालत वैसी ही, जैसे महंगाई के मारे आम आदमी की। सो जादूगर की जादूगरी देखिए। टेक्स स्लैब में बड़ा बदलाव कर शर्ट की जेब में पैसे डाले, पेंट की जेब से निकाल लिए। यों टेक्स छूट में अपने जैसों को कोई राहत नहीं मिली। अलबत्ता हायर-मिडिल क्लास की बल्ले-बल्ले। पर पलक झपकते ही पेट्रोल-डीजल की एक्साइज ड्यूटी बढ़ गई। बजट तो बाद में पारित होगा। कीमतें शुक्रवार की आधी रात से ही बढ़ गईं। सो जिनको भी राहत मिली, उन लोगों के चेहरे पर मोनालिसा सी मुस्कान। आखिर हंसे या रोए, कोई समझ नहीं पा रहा। महंगाई पर एक दिन पहले संसद में महाभारत हो। दूसरे दिन सरकार महंगाई की आग में पेट्रोल-डीजल डाल देगी, ऐसा किसी ने सपने में भी सोचा न होगा। सो विपक्ष को तो संजीवनी मिल गई। अरसे बाद पहली बार विपक्ष में ऐसी एकजुटता दिखी। जब बिना फ्लोर स्ट्रेटजी बनाए समूचा विपक्ष वाक आउट कर गया। क्या लेफ्ट, क्या लालू, क्या मुलायम। सब बीजेपी के संग हो लिए। इंदिरा राज में जैसे इमरजेंसी के खिलाफ विपक्ष एकजुट था। अबके महंगाई पर मनमोहन सरकार के खिलाफ। मुलायम सिंह ने तो यही एलान किया, इमरजेंसी जैसी जंग लड़ेंगे। पर कहीं होली के हुल्लड़ में विपक्षी तेवर हैंग ओवर न हो जाएं। वैसे हैंग ओवर उतारने के लिए संसद में होली के अगले दिन भी छुट्टी हो गई। अब विपक्ष की धार बुधवार को दिखेगी। पर प्रणव दादा ने तो पेट्रोल-डीजल के दाम बढ़ा आम आदमी को कह दिया। बुरा न मानो, होली है। अब कांग्रेस ने यों ही ऐसी जुर्रत नहीं की। अलबत्ता मौका देख कड़े फैसले लिए। सोशल सैक्टर में आवंटन बढ़ाया। ताकि चुनाव आते-आते असर दिखने लगे। फिलहाल महंगाई का शोर। तो कांग्रेसियों को मानसून का भरोसा। अपने प्रणव दा ने भाषण की शुरुआत में ही इंद्र देवता के सामने हाथ फैला दिए। बेहतर मानसून की उम्मीद जताई। कांग्रेस यही मानकर चल रही। मानसून के बाद नई फसल आएगी। तो महंगाई खुद दम तोड़ देगी। सो सोशल सैक्टर और कर्मचारी वर्ग के लिए बजट का पिटारा खुल गया। प्रणव दा ने आंकड़ों की बाजीगरी जमकर दिखाई। टेक्स में राहत दी। तो ढिंढोरा पीटा, 26,000 करोड़ राजस्व की हानि होगी। यानी कर्मचारियों पर अहसान जताने की कोशिश। पर बजट में ही खुलासा हो गया। डीजल-पेट्रोल जैसी चीजों पर अप्रत्यक्ष कर लगा सरकार 46,500 करोड़ की उगाही करेगी। यानी कुल जमा 20,500 करोड़ का मुनाफा। पर आम आदमी को क्या मिला। जिन लोगों को टेक्स में छूट मिली। उनके लिए न छूट बड़ी बात, न पेट्रोल-डीजल की बढ़ी कीमतें। जिंदगी तो मुहाल उस आम आदमी की। जो दाल-रोटी सस्ती होने की उम्मीद लगाए बैठा था। पर बदले में क्या मिला। भले पेट्रोल-डीजल से गरीब का सीधा सरोकार नहीं। पर ढुलाई के बहाने फिर कीमतों में उछाल आएगा। शहरी महिलाओं के लिए माइक्रोवेब ओवन सस्ते तो हो गए। पर सोना-चांदी थोड़ी-बहुत मात्रा में ही सही, हर महिला इस्तेमाल करती। फिर भी प्रणव दा ने फिक्र नहीं की। अलबत्ता सोना-चांदी, हीरे-जवाहरात सब महंगी कर दीं। वैसे भी सोना आम महिलाओं को तो चिढ़ा ही रहा था। अब प्रणव दा ने ऐसी कारीगरी दिखाई। सपने में भी देख आम महिला डर जाएगी। अब गांव-गरीब की बात करने वाली सरकार का भी हिसाब-किताब देखिए। राहुल बाबा दलित एजंडे पर मायावती से मोर्चा ले रहे। सो मुकुल वासनिक के मंत्रालय का बजट 80 फीसदी बढ़ गया। पर नरेगा की नब्ज देखिए। पिछले बजट में 39,000 करोड़ के करीब था। अबके 40,100 करोड़ रुपए। अपनी संसद पिछले सत्र में शिक्षा के मौलिक हक का कानून पास कर चुकी। पर पिछले बजट में 26,800 करोड़ आवंटन हुआ था। अबके नया कानून बन जाने के बाद भी आवंटन 31,036 करोड़ पर अटका। हरित क्रांति पर प्रणव दा ने खूब जोर दिया। झारखंड, उड़ीसा, छत्तीसगढ़, पूर्वी यूपी, बंगाल में क्रांति का विस्तार करेंगे। पर बजट आवंटन हुआ महज 400 करोड़। यानी ऊंट के मुंह में जीरा। आज भी देश का 58 फीसदी रोजगार कृषि से जुड़ा। पर 400 करोड़ से क्या होगा। देश में पैदावार घट रही। अंधाधुंध औद्योगिकीकरण से कृषि का रकबा घट रहा। आर्थिक समीक्षा में कृषि क्षेत्र की गिरावट स्पष्टï हो चुकी। बजट में कृषि ऋण की ब्याज दर पांच फीसदी कर दी। किसान कर्ज माफी की सीमा छह माह के लिए बढ़ा दी। फिर भी दादा का हाथ तंग दिखा। कृषि का विकास कैसे हो, इसकी कहीं फिक्र नहीं। पर खाद्य सुरक्षा बिल जल्द आएगा। अपने रुपए का निशान बनेगा। ताकि दुनिया के मनी क्लब में भारत भी शामिल हो। यूनिक आईडी कार्ड से लेकर परियोजनाओं की मॉनीटरिंग, नक्सलवाद से निपटने की भी योजना। पर बजट भाषण के सवा घंटे बाद दादा ने बजट का मजा किरकिरा कर दिया। मुरली देवड़ा की फांस सीधे अपने गले में ले ली। कुल मिलाकर बजट का निचोड़ यही। चुनाव की दीर्घकालिक रणनीति बना कांग्रेस ने कृषि और महंगाई को भगवान भरोसे छोड़ दिया।
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26/02/2010

Thursday, February 25, 2010

इतना विकास, बाप रे बाप!

चलो, संसद भी महंगाई से निपट ली। यूपीए के छह साल में नौवीं बार बहस हुई। तो पहली मर्तबा सांसदों में दिलचस्पी दिखी। भले कामरोको प्रस्ताव खारिज हो गया। पर अबके नियम 193 के तहत विशेष चर्चा हुई। प्रश्रकाल को स्थगित करना पड़ा। सो विपक्ष इसी से गदगद हो गया। गुरुवार को संसद ने ठाना, सातवें आसमान की महंगाई सात घंटे में निपटा देंगे। अब बहस तो निपट गई, बाकी महंगाई की तो आप ही जानें। पर राजनीति के चंगुल में फंसी महंगाई की चर्चा तो ऐसी रही- 'तुम्हारी भी जय-जय, हमारी भी जय-जय। न तुम हारे, न हम हारे।' विपक्ष ने जनता की आवाज बुलंद कर दी। तो सरकार ने भी अपने गीत सुना दिए। वैसे भी अपनी संसद यों ही गोल नहीं। नेता गोल संसद की तरह आम आदमी को गोल-मोल घुमाने में माहिर हो चुके। अब संसद भवन का डिजाइन बनाने वाले ब्रिटिश वास्तुकार हरबर्ट बेकर ने क्या सोचकर संसद गोल बनाई, पता नहीं। पर अपने नेताओं ने इसका यही निचोड़ निकाला, एक बार चुनकर लोकतंत्र के मंदिर में आ जाओ। फिर आम आदमी तो खुद-ब-खुद मंदिर की परिक्रमा करता फिरेगा। सो संसद में शरद पवार ने बहस का जवाब दिया। तो लगा, मानो शरद पवार आम आदमी से पूछ रहे- महंगाई किस चिडिय़ा का नाम? पवार ने सरकारी आंकड़े गिनाए। कुछ राज्यों की चि_िïयां सुनाईं। तो महंगाई कहीं नहीं दिखी। पवार ने एक और करिश्मा दिखाया। कल के पांच बड़े अखबारों की खबरें भी लोकसभा में सुनाईं। तो उसमें महंगाई कम होने की खबरें थीं। अब जरा अखबारों के नाम देखिए। फाइनेंशियल एक्सप्रेस, अमर उजाला, हिंदुस्तान टाइम्स, बिजनेस लाइन के नाम गिनाए। अब अमर उजाला को छोड़ दें, तो बाकी कौन से अखबार सुदूर गांव तक पहुंचते? अब देश का मंत्री अखबारी खबरों को महंगाई घटने का आधार बनाए। तो आप क्या कहेंगे। पर सरकार का आपसी विरोधाभास ही देखिए। पवार ने तमाम ऐसी दलीलें दीं। जिनमें दावा किया, महंगाई तेजी से घट रही। पर दूसरी तरफ प्रणव मुखर्जी की आर्थिक समीक्षा कुछ और कह रही। समीक्षा की मानें, तो महंगाई पर फिलहाल नियंत्रण संभव नहीं। महंगाई के लिए प्रबंधन नीति को खूब कोसा। समीक्षा में कहा गया- 'खाद्यान्न फसलों के मामले में संतोषजनक स्थिति और रबी की सुधरी हुई फसल का ध्यान नहीं रखा गया। आयातित चीनी को बाजार में लाने की देरी से अनिश्चितता पैदा हुई। सो चीनी की कीमतें चढ़ गईं।Ó यानी निशाने पर शरद पवार। पर पवार कहां मानने वाले। वह तो महंगाई को चिढ़ाते हुए आ बैल मुझे मार कह रहे। पर गोल संसद में गोलमाल यहीं खत्म नहीं होता। पवार हों या प्रणव, बहस में शामिल हुए। तो राज्यों पर ठीकरा फोडऩे में पीछे नहीं रहे। अब कोई पूछे, अगर महंगाई के लिए राज्य सरकारें जिम्मेदार। तो फिर कांग्रेसी राज्यों में महंगाई क्यों नहीं कम हो रही। अब प्रणव दा की समीक्षा ने तो पेट्रोल-डीजल के दाम बढ़ाने का भी इशारा कर दिया। यानी संसद की बहस का निचोड़ यही, राजनीतिक छींटाकशी में आम आदमी का दर्द छू-मंतर हो गया। बहस की शुरुआत विपक्ष के हमलावर तेवरों से हुई। वैसे भी बीजेपी नए नेतृत्व के साथ मुस्तैद हो चुकी। सो लोकसभा में सुषमा स्वराज ने मोर्चा खोला। तो राज्यसभा में अरुण जेतली ने समान संभाली। लखनऊ में राजनाथ सिंह ने लाठियां खाईं। पर बहस के वक्त सत्तापक्ष की बेशर्मी भी खूब दिखी। मंत्री हो या सत्तापक्ष की बैंचों पर बैठे सांसद। ठीक वैसे ही मुस्करा रहे थे, जैसे रुचिका छेड़छाड़ कांड के दोषी एसपीएस राठौर के चेहरे पर कोर्ट से बाहर आते दिखी थी। भले आम आदमी महंगाई से त्रस्त हो। पर कांग्रेसियों की ठसक ही कहेंगे कि आंकड़ों में जनता का दर्द उलझा दिया। सुषमा ने महंगाई को महाघोटाला बता ताबड़तोड़ हमले किए। सरकार की इधर का माल उधर करने की नीति पर सवाल उठाए। तो कांग्रेस की गंभीरता का अंदाजा आप इसी से लगा लें कि महंगाई पर कांग्रेस की नुमाइंदगी शिवसेना से आयातित संजय निरुपम ने की। सो निरुपम शिवसेनिक वाले अंदाज में ही दिखे। कुतर्कों से विपक्ष के आरोपों का जवाब देने की कोशिश की। पर होना तो यह चाहिए था, समूचा सदन महंगाई के खिलाफ एकजुट होकर संकल्प लेता। पर विपक्ष ने आरोप लगाए, सरकार ने जवाब दे दिया। बस महंगाई गायब हो गई। अब अगर सरकार की दलील मान भी लें। बफर स्टॉक से लेकर विपक्ष के तमाम आरोप निराधार मान लें। तो फिर सवाल वही, महंगाई क्यों बढ़ रही? यों आर्थिक समीक्षा में मंदी से उबरने का एलान। पर महंगाई अभी और मुंह फैलाएगी। सरकार अब भी मानसून पर निगाह टिकाए बैठी। नई फसल आए, और महंगाई कम हो। पर सोचो, मानसून ने फिर ठेंगा दिखाया, तो क्या होगा। पर कांग्रेस को फिक्र नहीं। फिलहाल बिहार को छोड़ कोई बड़ा चुनाव नहीं। सो आर्थिक सुधार की नई पहल होगी। विनिवेश का दायरा बढ़ेगा। ताकि खाद्य सुरक्षा बिल और शिक्षा के मौलिक हक कानून के लिए धन जुटा सके। पर देश के खजाने की खस्ता हालत खुद देख लो। कृषि विकास दर में तीन गुनी गिरावट दर्ज हुई। राजकोषीय घाया बढ़कर छह फीसदी हो गया। फिर भी सरकार ने 2010-11 में 8.75 फीसदी विकास दर का दावा किया। चार साल बाद दुनिया की सबसे तेज अर्थव्यवस्था बनने का दंभ भरा। पर यह कैसा विकास? जहां देश तो तरक्की कर रहा, पर आम आदमी फटेहाल। महंगाई ऐसे छलांग मार रही, आम आदमी की जुबां से यही आवाज निकल रही- 'बाप रे बाप, इतनी महंगाई।' बेहतर यही, शुक्रवार को प्रणव दा के बजट से ज्यादा उम्मीद करना बेमानी।
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25/02.2010

Wednesday, February 24, 2010

आखिर कब तक बेचारा रेलवे बिन 'चारा' दूध दे?

वाकई सचिन जैसा कोई नहीं। दोहरा शतक मार ग्वालियर में इतिहास रच दिया। कैरियर के आखिरी पड़ाव पर भी जोशीले जवानों को बता दिया। गर हो जज्बा, तो उम्र आड़े नहीं आ सकती। सचिन तेंदुलकर के रिकार्ड कभी टूटें या न टूटें, वह तो सही मायने में भविष्य के आदर्श हो गए। उधर सचिन ने युवाओं को भविष्य दिखाया। इधर ममता बनर्जी ने रेलवे के भविष्य का खाका परोस दिया। अबके ममता एक्सप्रेस विजन की पटरी पर दौड़ी। यों माल भाड़ा और यात्री किराए में बढ़ोतरी न कर सामाजिक सरोकार का संकल्प भी दोहराया। पर मुख्य फोकस रेलवे का भविष्य संवारना रहा। सो विजन-2020 का संकल्प जताया। सालाना एक हजार किलोमीटर रेल लाइन बिछाने का लक्ष्य। अगले दस साल में नेटवर्क में 25 हजार किलोमीटर इजाफे की तैयारी। काम को अंजाम देने के लिए सौ दिन के भीतर टास्क फोर्स बनेगी, जो निवेश के मामले तेजी से निपटाएगी। रेलवे का निजीकरण नहीं होगा। पर बिजनेस कम्युनिटी को निवेश का न्योता दे दिया। यों लक्ष्य तो वाकई सुहाना। पर कहीं यह सपना बनकर न रह जाए। खुद ममता ने बजट भाषण में बताया। जब देश आजाद हुआ, तो 1950 में रेल के पास 53,596 किलोमीटर की लाइन थी। अ_ïावन साल बीत गए। पर आंकड़ा कहां पहुंचा, मालूम है। अपने रेल नेटवर्क का विस्तार महज 64,015 किलोमीटर पर सिमटा हुआ। यानी 58 साल में न जाने कितने मंत्री आए-गए। पर नई लाइनें बिछीं सिर्फ 10,419 किलोमीटर। सालाना औसत देखिए। तो महज 180 किलोमीटर लाइन हर साल बिछी। ऐसा क्यों न हो। अपने देश में जितने भी रेल मंत्री आए-गए। सबने शपथ तो संविधान की ली। पर रेलवे को राजनीतिक टूल बनाकर चुनाव में इस्तेमाल किया। जिस प्रदेश का मंत्री, उस प्रदेश की तो हमेशा से मौजां ही मौजां होती रहीं। सो अबके ममता अपने बंगाल पर मेहरबान। तो कोई अचरज नहीं। पर लालू को रेलवे रिवर्स गियर में जाता दिख रहा। यों लालू भूल गए, उन ने तो रेलवे को ऐसा चूसा। जितना बिहार को भी पंद्रह साल नहीं चूस पाए होंगे। पर बात रेल मंत्री के क्षेत्र प्रेम की। तो ममता बनर्जी की कर्मभूमि पर जन्मभूमि भारी पड़ी। ममता ने सबको सौगातें दीं। पर बंगाल को कुछ ज्यादा मिला। वैसे भी मंत्री बंगाल की वजह से बनीं। सो जैसे बाकी मंत्री रेल को अपना आधार मजबूत करने का जरिया बनाते रहे। वैसा उन ने भी किया। अब जरा बंगाल को क्या मिला। आप खुद देख लें। विश्व स्तरीय स्टेशन दस एलान हुए। तो दो बंगाल के खाते में गए। मल्टीफंकशनल कॉप्लेक्स 93 में से आधा दर्जन बंगाल गए। छह बॉटलिंग प्लांट में से एक बागल गया। डबल डेकर की शुरुआत दिल्ली-कोलकाता के बीच होगी। चौवन नई ट्रेनों में 28 बंगाल के खाते में। टेगोर जयंती के नाम पर हावड़ा-बोलपुर में म्यूजियम। संगीत अकादमी, सांस्कृतिक परिसर, अनुसंधान केंद्र, डिब्बों के आधुनिकीकरण, किसानों के लिए रेफ्रीजिरेटेड कंटेनर भी बाया बंगाल। बाकी सर्वे आदि आप छोड़ दो। तो कुल मिलाकर ममता ने बंगाल चुनाव की बड़ी बिसात बिछा दी। उन ने सिर्फ रेलवे नहीं, किसान, स्वास्थ्य, शिक्षा जैसे तमाम पहलू छूकर बता दिया। अपनी रेल का यार्ड रायटर्स बिल्डिंग में ही बनेगा। ममता गठबंधन की सरकार में मंत्री ठहरीं। सो कांग्रेस की मांग को भी बजट में पूरी जगह दी। अमेठी हो या रायबरेली, कांग्रेस को ममता ने खुश कर दिया। अब रेलवे के जरिए राजनीति की बिसात बिछे। तो रेलवे का विजन कहां पूरा होगा। वाहवाही लूटने को बजट में हर साल सैकड़ों ट्रेन का एलान होता। पर कभी ट्रेनों में भीड़ कम होती दिखी? समय पर ट्रेनें स्टेशन पहुंचीं? साफ-सफाई और खान-पान तो ऐसा, मुसाफिर यही कहकर मंजिल तक पहुंच जाते। छोड़ो, एक दिन की ही तो बात है। पर बंगाल एक्सप्रेस दौड़ाकर भी ममता रेलवे के कायापलट का दावा कर रहीं। बांग्ला में एक विचार रखा- 'नहीं नहीं भय, होबे होबे जय। खुले जाबे एई द्वार।' यानी डरो नहीं, तो जीत अवश्य मिलेगी। रास्ते अपने आप खुल जाएंगे। पर कब तक रेलवे बिना 'चारा' दूध देगा। नेताओं ने रेलवे को दुधारू गाय बना खूब दुहा। पर विकास धेला न हुआ। सो अब धड़ाधड़ दुर्घटनाएं हो रहीं और मुसाफिर को मंजिल तक पहुंचाने वाली ट्रेन मुसाफिरों का ही खून पी रही। लालू ने सरप्लस दिखाने के चक्कर में रेल को निचोड़ दिया। सो मुसीबत ममता के बजट में साफ दिख रही। योजनाओं का एलान तो खूब हुआ। पर धन कहां से आएगा, किसी को मालूम नहीं। अब आप ही सोचो, रेलवे का विजन-2020 कैसे पूरा होगा। आजादी के 58 साल बाद रेलवे का नेटवर्क रेंगता दिखा। बजट में ममता ने भारत-चीन युद्ध के बाद निराशा से उबरने के लिए नेहरू के अनुरोध पर लगा मंगेशकर का गाया गीत... जरा याद करो कुर्बानी... गाया। तो चीन की रेलवे का इतिहास बता दें। अपनी आजादी के वक्त भारत की तुलना में चीन के पास एक चौथाई रेल लाइनें भी नहीं थीं। चीन की राजधानी बीजिंग से गूंगजाऊ की 1100 किलोमीटर की दूरी तय करने में तीन से चार दिन लग जाते थे। पर आज हर रोज चीनी यात्री महज तीन घंटे में यह यात्रा पूरी कर रहे। वर्ष 2012 तक चीन में रेल लाइनों की लंबाई 79,900 किलोमीटर से बढ़कर 1,10,000 किलोमीटर पहुंच जाएगी। भारत में कैसी हालत, खुद ममता ने बजट में बता दिया। सो कब तक यों ही रेलवे को नेतागण राजनीति की दुधारू गाय बना दुहेंगे? मुसाफिरों की जिंदगी मुश्किल में डालेंगे?
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24/02/2010

Tuesday, February 23, 2010

क्या जब जले बस, बरपे हंगामा तभी होगी बहस?

वैसे तो नियम-कायदे ताक पर रखने में अपने नेताओं का कोई सानी नहीं। कायदे बनते बाद में, उसके नुक्स पहले ही निकाल लेते। पता नहीं अपने ही बनाए कायदे कब गले आ पड़ें। सो खतरे के वक्त नुक्स आपातकालीन दरवाजे की तरह काम आते। फिर भी मुसीबत का फंदा कस जाए। तो अपनी संसद, अपनी सरकार। सो खूबसूरत फिल्म का गाना अपनी राजनीति पर मौजूं। फिल्म में सास के अत्याचार के खिलाफ रेखा-अशोक कुमार आदि यह गाना गाते हैं- 'सारे नियम तोड़ दो, नियम पर चलना छोड़ दो। इंकलाब जिंदाबाद।' जब चौदहवीं लोकसभा में लाभ के पद का मामला सुर्खियां बना। जया बच्चन की बर्खास्तगी से लगी आग की आंच सोनिया गांधी तक पहुंची। तो कांग्रेसियों को लगा, प्रलय आ गई। सो सोनिया ने सांसदी छोड़ नैतिकता का ढोल पीटा। दो सत्र के गैप में ही दुबारा चुनकर लोकसभा लौट आईं। इधर मनमोहन ने भी रेवड़ी तैयार कर लीं। सो पलक झपकते ही लाभ के पद का बिल पास हो गया। जिन-जिन पदों में लाभ की गुंजाइश दिखी, सारे पद कानून से राहत पा गए। तभी तो सोमनाथ चटर्जी को भी सांसदी नहीं छोडऩी पड़ी। सरकार ने विपक्ष से भी लाभ के पद की लिस्ट मांग ली। पर विपक्ष ने नैतिकता दिखा लिस्ट नहीं दी। तबके राष्टï्रपति कलाम ने बिल को देश के लिए एक समान न बता संसद को वापस लौटा दिया। तो कांग्रेसियों को शर्म नहीं आई। अलबत्ता कलाम को ही चुनौती देने लगे। अगले सत्र में वही बिल जस का तस फिर भेज दिया। पर भला हो भैरोंसिंह शेखावत का। जिन ने बीच-बचाव कर देश को संवैधानिक संकट से बचा लिया। कलाम और सरकार के बीच शेखावत ने नया रास्ता निकाला। इधर संसद ने लाभ के पद पर सुधार के लिए जेपीसी गठित की। उधर कलाम ने बिल को मंजूरी दे दी। यानी जब बात नेताओं के अपने फायदे की हो। तो कायदा-कानून गया भाड़ में। अब महंगाई पर बहस की बात हुई। तो नेताओं ने आम आदमी के हित की चिंता को नियम-कायदे के पेच में उलझा दिया। वैसे भी आम आदमी का पेट कोई नेशनल एडवाइजरी काउंसिल का दफ्तर नहीं। जो सरकार आनन-फानन में उपाय ढूंढ ले। याद है ना, सोनिया इसी एनएसी की मुखिया थीं। लाभ के पद विवाद में यही पद छोडऩा पड़ा था। अब एनएसी समेत कई ऐसे पद, जिन पर बैठ सांसद दोहरा लाभ उठा सकते। आखिर सांसद कोई ऐरा-गैरा तो होता नहीं। लाखों की जनता ने आंखों का नूर बना सिर पर बिठाया। सो बोझ उठाना उसी जनता की मजबूरी। नेताओं का क्या, वह तो सरकारी आवास में सरकारी भोजन का लुत्फ उठा सरकारी खर्चे पर ही सैर-सपाटा कर रहे। यानी नेताओं के लिए महंगाई तो जाके पैर न फटी बिवाई, सो का जाने पीर पराई वाली कहावत जैसी। सो पहले दिन ही संसद पर भारी पड़ी महंगाई। अब तो ऐसी रार ठन चुकी। रेल बजट, आम बजट को छोड़ बाकी दिन शायद हंगामे में ही गुजरें। विपक्ष को सिर्फ कामरोको प्रस्ताव के तहत बहस चाहिए। तो सरकार में इतना बूता नहीं, जो महंगाई पर वोटिंग का जोखिम उठा ले। महंगाई पर वाकई पहली बार विपक्ष की ऐसी एकजुटता दिखी। जब वैचारिक मतभेद भुला लेफ्ट-बीजेपी-सपा-बसपा-आरजेडी सुर में सुर मिला रहे। अंदरखाने सत्तापक्ष के दो बड़े घटक ममता और करुणानिधि भी महंगाई पर त्यौरियां चढ़ा चुके। सो सरकार को डर, कहीं वोटिंग में विपक्ष से हारे। तो जनता को क्या मुंह दिखाएंगे। महंगाई ऐसी विकराल, हारने पर इस्तीफे का नैतिक दबाव बढ़ जाएगा। सो संसदीय कार्यमंत्री पी.के. बंसल से लेकर खुद प्रणव दा तक। साफ कर दिया, सदन के नियम सांसदों ने ही बनाए। सो नियम से ही काम होगा। बंसल की दलील, कामरोको प्रस्ताव हाल के गंभीर विषयों पर लाए जाते। महंगाई तो लंबे समय से चली आ रही। सो सामान्य चर्चा ही होगी। वाकई यूपीए के पहले टर्म में सात बार, दूसरे टर्म में एक बार महंगाई पर बहस हो चुकी। पर महंगाई नहीं रुकी। विपक्ष की नई नेता सुषमा स्वराज ने सदन में परिचय के बाद यही दलील दी। तो सरकार नियमों में महंगाई को बांधने की कोशिश कर रही। कौन नहीं जानता, जब नियम 193 के तहत चर्चा होती। तो सदन में कोरम के भी लाले पड़ जाते। अगर कामरोको प्रस्ताव में चर्चा होती। तो समूची मीडिया और देश की निगाहें टिक जातीं। नियमों के फेर में गंभीरता का पुट होता। पर कांग्रेसी और सरकार उल्टा चोर कोतलाव को डांटे की मुद्रा में। विपक्ष को हंगामाई साबित करने में जुटी। महंगाई को सामान्य मुद्दा बता रही। सो गुरुदास दासगुप्त ने सवाल पूछा। क्या कामरोको प्रस्ताव लाने के लिए बसें जलानी पड़ेंगी? वाकई अपनी सरकार शायद हिंसा की भाषा ही समझती। क्या महंगाई पर संसद में बहस के लिए दासगुप्त का ही फार्मूला अपनाना पड़ेगा? नक्सलवादी जब हिंसा का तांडव मचा रहे। तो सरकार बातचीत को तैयार हो रही। पर जब नक्सलबाड़ी में असमानता से नक्सलवाद का बीज पनपा। तब सरकार खामोश बैठी रही। यों नक्सली जो कर रहे, लोकतंत्र में जायज नहीं। पर महंगाई का हाल भी कुछ वैसा ही। देश के तेरह अमीर मंदी के दौर में अपनी संपत्ति ढाई गुनी कर गए। पर बीस रुपए दिहाड़ी पर जिंदगी जीने वाली 77 फीसदी आबादी महंगाई के बोझ तले पिस गई। तो क्या संसद या सरकार महंगाई से पिसी आम जनता की फिक्र तभी करेगी। जब सड़कों पर बसें जलेंगी, चौतरफा हंगामा बरपेगा? क्या सड़कों पर हिंसा ही कामरोको प्रस्ताव का आधार? क्या पेट की आग अपनी संसद और सरकार के लिए गंभीर मुद्दा नहीं? ----------
23/02/2010