Wednesday, April 28, 2010

यही होगा, जब अटल बिहारी की बीजेपी में हों गगन विहारी

तो वाजपेयी को दिया बर्थ-डे गिफ्ट बीजेपी ने वापस ले लिया। चार महीने पहले 25 दिसंबर को ही बीजेपी-झामुमो गठबंधन का एलान हुआ था। तो सत्ता की खातिर हुए समझौते को बीजेपी ने वाजपेयी को तोहफा बताया। पर हनीमून पीरियड में ही तलाक हो गया। बीजेपी सचमुच कटी पतंग हो गई। कट मोशन पर मुंह की तो खाई ही, अब झारखंड में बेवक्त सरकार गई सो अलग। यानी खाया-पीया कुछ नहीं, गिलास तोड़ा बारह आना। शिबू सोरेन को वोट के लिए बीजेपी ने बुलावा भेजा था। पर शिबू ने मनमोहन को वोट दे दिया। जैसे महाभारत में नकुल-सहदेव के मामा शल्य आए तो थे पांडवों की ओर से लडऩे। पर बीच रास्ते में दुर्योधन ने ऐसी आवभगत की। शल्य भ्रमित हो गए और बाद में कौरवों की ओर से लडऩा पड़ा। अब जब महाभारत युग में ऐसी भूल हुई, तो कलियुग में शिबू ने क्या गुनाह कर दिया। अब मनमोहन सरकार में कोयला मंत्री रह चुके। दिल्ली आए होंगे, तो कुछ पुरानी दोस्ती से आवभगत हो गई होगी। सो शिबू भूल गए होंगे, सीएम रहते संसद में क्या करने आए। चार महीने से शिबू को विधायकी की खातिर कोई सीट नहीं मिली। सो सांसदी अब तक नहीं छोड़ी। ऐसे में तो कोई भी कनफ्यूज हो जाएगा। सो शिबू ने मनमोहन के पक्ष में बटन दबा दिया। बीजेपी ने देखा, तो फौरन निशिकांत दुबे भेजे गए। सो शिबू ने कह दिया- जो हो गया, सो ठीक। पर बीजेपी का पारा चढऩे लगा। तो बुधवार को शिबू ने कहा- ऐसे ही हो गया। शिबू के बेटे हेमंत ने सफाई दी- भूलने की बीमारी, सो मानवीय भूल हो गई। पर जब मंगलवार को लोकसभा में मशीन खराब होने की वजह से परची से वोट पड़े। तो शिबू ने मांगकर मनमोहन के समर्थन वाली लाल परची ली। तो क्या इसे कलर ब्लाइंडनेस कहें? पर शिबू सोरेन की बात छोडि़ए। शिबू के पैंतरों के कहने ही क्या। शिबू को तो आज नहीं, दो महीने बाद ही सही, जाना ही था। पर बीजेपी के बारे में क्या कहें। क्या बीजेपी भी अल्जाइमर की मरीज? शिबू ने खिलाफ वोट किया। तो बीजेपी ने विश्वासघाती बता समर्थन खींच लिया। पार्लियामेंट्री बोर्ड की इमरजेंसी मीटिंग बुला फैसला हुआ। तो संदेश दे रही, महंगाई के मुद्दे पर समझौता नहीं। पर क्या सचमुच महंगाई की खातिर बीजेपी ने झारखंड में सरकार की शहादत दी? या खुद कट मोशन की बलि चढ़ गई? पर अब बीजेपी को शिबू विश्वासघाती दिख रहे। तो कोई पूछे, विश्वासपात्र कब दिखे? आखिर कितने घात खाने के बाद बीजेपी को विश्वासपात्र और विश्वासघाती में फर्क दिखेगा? या कहीं ऐसा तो नहीं, बीजेपी को दुलत्ती खाने की आदत पड़ चुकी। सनद रहे, सो बताते जाएं। कर्नाटक की पिछली विधानसभा की तस्वीर याद करिए। पहले बीस महीने कांग्रेस-देवगौड़ा ने सरकार चलाई। पर बाद में देवगौड़ा के बेटे कुमारस्वामी ने बीजेपी से गठजोड़ किया। सत्ता की खातिर बीजेपी ने सिद्धांत ताक पर रख दिए। पर बीस महीने सीएम रहने के बाद कुमारस्वामी ने बीजेपी को कुर्सी ट्रांसफर नहीं की। तो बीजेपी के यशवंत सिन्हा ने तब बोर्ड के फैसले का एलान किया था। देवगौड़ा को भी ऐसे ही विश्वासघाती बताया। सो कर्नाटक में राष्ट्रपति राज लगा। पर बीस दिन बाद ही बीजेपी-देवगौड़ा एक हो गए। भले सरकार हफ्ते भर में ही गिर गई। पर तब बीजेपी के एक बड़े नेता ने मौजूं टिप्पणी की थी। कहा था- हवन तीन बजे न सही, छह बजे हो। जेडीएस ने हमारी बात मान ली, सो हम भी कोई सन्यासी नहीं। आखिर राजनीति इसीलिए तो कर रहे। अब कोई पूछे, जब सत्ता ही सब कुछ। तो चाल, चरित्र, चेहरा और पार्टी विद डिफरेंस का ढकोसला क्यों? क्यों नहीं सिद्धांत का चोला फेंक कह देती, राजनीति में सब जायज। सिर्फ कर्नाटक नहीं, यूपी में मायावती को बीजेपी ने ही सीएम की कुर्सी तक पहुंचाया। पर वक्त आने पर माया ने बीजेपी को औकात दिखा दी। सो यूपी में आज माया कहां और बीजेपी कहां, जगजाहिर। हरियाणा में चौटाला से ऐसे ही मौकापरस्ती की दोस्ती और दुश्मनी। उड़ीसा में नवीन पटनायक ने कैसे धूल चटाई, सबको पता। तब बीजेपी मुगालते में थी, उड़ीसा में नवीन का ताज छिनेगा। पर जनता ने चुनाव में बैसाखी ही तोड़ दी और नवीन पूर्ण बहुमत से सत्ता में लौट आए। अब ताजा किस्सा शिबू सोरेन का। तो सुषमा कह रहीं- आडवाणी तो सीएम शिबू को बुलाने के हक में नहीं थे। पर शिबू खुद आ गए। अब इस झूठ को क्या कहें। एस.एस. आहलूवालिया ने सोमवार को एनडीए मीटिंग के बाद प्रेस कांफ्रेंस में एलान किया था- एनडीए के 153 सदस्यों को सदन में लाने का बंदोबस्त हो रहा। जिसमें सीएम शिबू और उनके ही जेल में बंद सांसद कामेश्वर बैठा भी शामिल। पर अब सवाल शिबू और झारखंड का नहीं। सवाल, कितने घात खाकर सुधरेगी बीजेपी? वर्करों की भावना से खेल झारखंड में सरकार बनाई थी। तब राजनाथ बीजेपी की स्टेयरिंग छोड़ चुके थे। गडकरी ने कुर्सी संभाल ली थी। सो दोनों को वर्कर नहीं, अपना रिकार्ड बनाने की फिक्र थी। गठबंधन बनाकर चलाना कोई गिल्ली-डंडे का खेल नहीं। वाजपेयी ने पहली बार में ही 22 दलों का इंद्रधनुषी गठबंधन बनाकर उसे बखूबी चलाया था। पर अब बीजेपी में वाजपेयी जैसे साख वाले नेता ही नहीं। अलबत्ता अटल बिहारी की बीजेपी में गगन विहारी की पूरी जमात जम चुकी। जिनका आपस में ही अहं टकराता, किसी का एक-दूसरे से सामंजस्य नहीं। हालत ऐसी हो चुकी, छोटा सा फैसला लेने में अब महीने नहीं, साल लग रहे। ऐसे में गठबंधन के दल क्या खाक साथ रहेंगे।
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28/04/2010

Tuesday, April 27, 2010

'तो जो सरकार निकम्मी है, वो सरकार बचानी है'

तो मंगलवार का दिन सरकार के लिए मंगलमय हो गया। सिख विरोधी दंगे में सीबीआई ने आखिर जगदीश टाइटलर को क्लीन चिट दिला ही दी। वाकई सीबीआई बड़े काम की चीज। तभी तो लोकसभा में विपक्ष का कट मोशन औंधे मुंह गिरा। महंगाई के मुंह में अब सेक्युलरिज्म घुस गया। सो विपक्षी एकता ढहनी ही थी। पर कट मोशन इतनी कटुता पैदा कर जाएगा, उम्मीद नहीं थी। लालू-मुलायम ने लोकसभा में ऐसा रंग बदला, गिरगिट भी देखकर शर्मसार हो जाए। आम बजट के दिन यही लालू-मुलायम सेक्युलरिज्म को किनारे रख आम आदमी की दुहाई दे रहे थे। संसद से सडक़ तक सरकार की सिट्टी-पिट्टी गुम करने की कसमें खाईं। पर अब लालू-मुलायम को याद आ गया, बीजेपी तो सांप्रदायिक पार्टी। सो लेफ्ट को चुनौती दी। बीजेपी संग वोट नहीं करो, तो सरकार के खिलाफ हम भी वोट करेंगे। पर लालू से कोई पूछे, संख्या कहां से जुटाएंगे। खुद लालू ने कटौती प्रस्ताव को रस्म अदायगी बताया। पर सेक्युलरिज्म का झंडा उठा कौन सी सरकार गिरा लेते? अब कोई पूछे, महंगाई में सांप्रदायिकता कहां से आ गई? क्या दाल, चावल, सब्जी, आटे में भी कुछ हिस्से सांप्रदायिक होने लगे? या फिर महंगाई किसी खास धर्म या जाति को ही परेशान कर रही? आखिर राजनीतिक दल किसे बेवकूफ बना रहे? मंगलवार को तेरह दलों ने महंगाई पर भारत बंद किया। संसद के दोनों सदनों में सुबह से एकजुटता दिखाई। पर जब महंगाई के खिलाफ सरकार को घेरने का निर्णायक वक्त आया, तो भाई लालू-मुलायम कट लिए। मुलायम ने वाकआउट से पहले किसान, गरीब, बेरोजगारों के लिए अनुदान की मांग रखी। पर ऐसा क्या हुआ, जो पहले ही मैदान छोड़ गए। क्या निजी तौर पर कोई अनुदान मिल गया? या कहीं कांग्रेस ने लालू-मुलायम को यह डायलॉग तो नहीं सुना दिया- मेरे पास सीबीआई है। अब जरा लालू की सुनिए। कहा- आईपीएल पर सरकार की विदाई तय थी। आईपीएल में गरीबों, बेकारों का पैसा लूटा गया। पर आडवाणी कह रहे, आईपीएल बहुत हो चुका। लालू का इतना कहना था कि बीजेपी भडक़ गई। पर लालू से पूछे, आईपीएल में किस गरीब अंबानी, विजय माल्या, श्रीनिवासन, राज कुंद्रा, प्रीति जिंटा, शाहरुख खान का पैसा लगा हुआ। आखिर लालू के लिए महंगाई से बड़ा मुद्दा आईपीएल कैसे हो गया। लगता है, अब लालू-मुलायम राजनीति की थाली के बैंगन हो गए। पर एक सीबीआई ने सिर्फ लालू-मुलायम मैनेज नहीं किए। अलबत्ता कट मोशन पर सरकार की साख बचाई। विपक्षी महाजोट की खटिया खड़ी कर दी। मायावती ने सरकार को समर्थन की पूरी कीमत वसूल ली। सुप्रीम कोर्ट में चल रहे आय से अधिक संपत्ति के मामले में सीबीआई से केस कमजोर कराया। तो जाकर मंगलवार को लखनऊ में समर्थन का एलान किया। पर जरा लालू-मुलायम की तरह मायावती की माया देखिए। प्रेस कांफ्रेंस की शुरुआत यूपीए सरकार को आड़े हाथों लेते हुए की। केंद्र पर यूपी से भेदभाव का आरोप लगाया। महंगाई, गरीबी, भुखमरी, बेरोजगारी जैसी तमाम समस्याओं की जड़ में मनमोहन सरकार की नीतियां बताईं। बोलीं- इन समस्याओं के मद्देनजर बसपा को सरकार के खिलाफ वोट करना चाहिए था। लेकिन हम नहीं चाहते कि सांप्रदायिक ताकतें सत्ता में आ जाएं। इसलिए कटौती प्रस्ताव पर यूपीए का समर्थन करेंगी। यानी सीधे शब्दों में मायावती की प्रेस कांफ्रेंस का निचोड़ बताएं। तो राजनीति का नया स्लोगन बनेगा- जो सरकार निकम्मी है, वो सरकार बचानी है। पर मायावती ने यह भी कहा- समर्थन का सीबीआई से कोई लेना-देना नहीं। अब कोई अनाड़ी ही माया पर भरोसा करेगा। याद है 2008 में जब मनमोहन विश्वास मत की तैयारी कर रहे थे। मायावती ने समर्थन नहीं दिया। तो लोकसभा में तबके बीएसपी नेता बृजेश पाठक ने आरोप लगाया था, सीबीआई का अधिकारी उनके घर आया था। दस्तावेज दिखाकर धमकी दे गया, समर्थन दो, नहीं तो शिकंजा कस देंगे। तबके स्पीकर सोमनाथ चटर्जी ने मामला होम मिनिस्ट्री को रैफर किया था। पर जब 2007 में राष्ट्रपति चुनाव हुए। तो ताज कॉरीडोर केस से समर्थन की सौदेबाजी हुई। सो बीजेपी ने सरकार पर सीबीआई के बेजा इस्तेमाल का आरोप मढ़ा। तो सबसे मौजूं बात सीताराम येचुरी ने कही। उन ने कहा- कांग्रेस ने वर्षों तक देश पर कैसे राज किया, उस अनुभव को दिखा दिया। सरकार बचाने की जोड़-तोड़ में कांग्रेस विशेषज्ञ है। वाकई कट मोशन किसी और सरकार के खिलाफ होता। तो राजनीतिक माहौल अलग होता। पर कांग्रेस की राजनीति हमेशा धौंस की रही। सो अबके भी खम ठोककर कीमतें बढ़ाईं। विपक्ष ने लाख घोड़े दौड़ाए। पर रेस में दौड़ रहे कुछ घोड़ों पर बेखौफ बंदूक तान दी। अब कांग्रेस ने विपक्षी एकता का बंटाधार कर दिया। पर माया से नजदीकी अपनी ही फांस बन गई। आखिर राहुल बाबा यूपी में माया को दुश्मन नंबर एक बताते। माया के बुतों से लेकर मनरेगा आदि मुद्दों पर कांग्रेस ने घेराबंदी की। पर अब माया ने समर्थन दिया। तो कांग्रेस प्रवक्ता जयंती नटराजन बोलीं- तबकी टिप्पणी तबके मुद्दे पर थी। वक्त के हिसाब से राजनीतिक जरूरतें बदलती कहीं। सो अब यूपी की राजनीतिक रणनीति का खुलासा वक्त आने पर करेंगे। पर कांग्रेस यह भूल रही, यूपीए-वन में कांग्रेस कमजोर थी। तो साढ़े चार साल बाद गिनती की नौबत आई। अबके कांग्रेस मजबूत, पर बहुमत की गिनती 11 वें महीने में ही करनी पड़ी। अभी तो सरकार के चार साल एक महीना बाकी।
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27/04/2010

Monday, April 26, 2010

कटौती प्रस्ताव पर कटी विपक्षी एकता की पतंग

संसद में शोरगुल थमने का नाम नहीं। पर संसद से पहले राज्यपाल प्रभा राव को अपनी श्रद्धांजलि। सोमवार को दिल का दौरा पडऩे से निधन हो गया। वाकई सहज, सीधी, सरल थीं प्रभा राव। पर कहते हैं, किसी व्यक्ति की खासियत जाननी हो, तो विरोधियों के शब्दों को देखो। संवैधानिक पद पर आसीन होने से पहले प्रभा राव कांग्रेस में थीं। पर उनके निधन के बाद बीजेपी के सांसद अर्जुन राम मेघवाल का संदेश काबिल-ए-गौर। मेघवाल ने लिखा- प्रभा राव ने सार्वजनिक जीवन में कुछ ऐसे मापदंड तय किए हैं, जिससे सार्वजनिक जीवन जीने वाला हमेशा प्रेरणा लेता रहेगा। यानी राजस्थान ही नहीं, देश के लिए अपूरणीय क्षति। अब मंगलवार को संसद भी श्रद्धांजलि देगा, फिर देर शाम वर्धा में दाह संस्कार। सो अब बात संसद में चल रहे स्यापे की। विपक्ष की तरकश में रोज नए मुद्दे जुट रहे। सरकार ऐसे मुद्दे थमा रही कि विपक्ष भी कनफ्यूज हो चुका। किस मुद्दे को उठाएं, किसे छोड़ें, समझ नहीं पा रहा। सो एक दिन आम आदमी का, तो दूसरे दिन खास आदमी का और तीसरे दिन अपनी भलाई भी देख लेता। सो पहले महंगाई का मुद्दा उठाया। फिर बीच में आईपीएल और मोदी-थरूर आ गए। अब नया मुद्दा राजनेताओं के फोन टेपिंग का। सो सोमवार को भी संसद की छुट्टी हो गई। दोनों सदनों में विपक्ष का रिंग टोन इस कदर गरजा, कामकाज ठप करना पड़ा। लोकसभा में आडवाणी ने मोर्चा संभाला, तो इमरजेंसी की याद दिलाई। जेपीसी गठित करने की मांग हुई। लगे हाथ अंग्रेज जमाने के टेलीग्राफ एक्ट में बदलाव की मांग कर दी। पर बात आगे तब बढ़े, जब सरकार टेपिंग का आरोप मान ले। यहां तो होम मिनिस्टर पी. चिदंबरम ने टेपिंग से इनकार कर दिया। पीएम ने जेपीसी की मांग ठुकरा दी। यों संसद में अभी पीएम का बयान नहीं हुआ। सोमवार को प्रणव दा ने लाख मिन्नतें कीं, साढ़े तीन बजे मनमोहन जवाब देंगे। पर विपक्ष को तो अपने मुद्दे की धार बनानी थी। भले संसद का कीमती वक्त कौड़ी क्यों न हो जाए। पर बात मुद्दे की, तो हमाम में नंगा कौन नहीं। सिस्टम तो सत्ताधारी दल का रखैल बन चुका। सो दुरुपयोग करने में कोई पीछे नहीं। तभी तो गाहे-ब-गाहे फोन टेपिंग के मुद्दे उठते रहते। अब सोमवार को टेपिंग मुद्दे का कोई हल नहीं निकला। पर मंगलवार को संसद में नया मुद्दा होगा। लोकसभा में सरकार गिलोटिन लाएगी। यानी सभी मंत्रालयों की अनुदान मांगें एक साथ वोट के लिए रखी जाएंगी। जिसका इंतजार विपक्ष समेत समूचे देश को। पेट्रोल-डीजल की कीमतें प्रणव दा ने बजट में बढ़ाई थीं। तो दो महीने पहले 26 फरवरी को हाथों में हाथ लेकर समूचे विपक्ष ने एलान किया था- कटौती प्रस्ताव लाकर कीमतें रोल बैक को मजबूर कर देंगे। पर ठीक दो महीने बाद विपक्षी कुनबा बिखर गया। यों अब भी एनडीए-लेफ्ट संग होने का दंभ भर रहे। पर लालू-मुलायम की चाल टेढ़ी हो गई। बीएसपी से तो हमेशा की तरह कांग्रेस ने सौदेबाजी कर ली। यानी अब विपक्षी एकता पस्त, तो कांग्रेस मस्त हो रही। कांग्रेस ने तो कह दिया- विपक्ष यह न भूले, यूपीए-वन से मजबूत है यूपीए-टू। सो वित्तीय प्रस्ताव पास हो जाएंगे। अब विपक्ष बिखर रहा हो, तो सरकार गदगद क्यों न हो। यों एहतियातन कांग्रेस ने सांसदों को व्हिप जारी कर दिया। व्हिप तो बीजेपी ने भी जारी किया। पर जरा राजनीति के असल दांव-पेच देखते जाइए। कहां 26 फरवरी को समूचे विपक्ष ने खम ठोका था, महंगाई के खिलाफ सरकार के घुटने टिकवा देंगे। पर दो महीने बाद खुद घुटने टेकता दिख रहा। बीजेपी ने पांच दिन पहले ही विशाल रैली भी की। पर विपक्षी कुनबे में बिखराव ने हालत पस्त की, या सरकार से कुछ सांठगांठ, यह मालूम नहीं। अब बीजेपी सरकार को मजबूर करने का खम नहीं ठोक रही। अलबत्ता बीजेपी सिर्फ इतना चाह रही, कम से कम एनडीए के 153 सांसदों के वोट रजिस्टर्ड हो जाएं। कटौती प्रस्ताव को लेकर इतनी हायतौबा मचाई। अब नहीं लाए, तो भद्द पिटेगी। सो रस्म अदा करने को मंगलवार को कटौती प्रस्ताव आएगा। बीजेपी को डर, कहीं ऐसा न हो, हंगामे में सरकार वित्तीय प्रस्ताव पास करा ले जाए। वैसे भी हंगामाई सरदारों लालू-मुलायम से सरकार की जुगलबंदी हो चुकी। सो कहीं कटौती प्रस्ताव के पक्ष में नंबर अधिक दिखा। तो हंगामे के लिए आईपीएल और फोन टेपिंग जैसे बड़े मुद्दे। वैसे भी सोमवार को विपक्षी एकता में दरार यहीं से पड़ी। बीजेपी-लेफ्ट ने फोन टेपिंग उठाया। तो लालू-मुलायम आईपीएल चाहते थे। सो लालू को यह भी मालूम न था, मंगलवार को कटौती प्रस्ताव आने वाला। अब जरा आम आदमी के पहरेदार विपक्षी दलों के चेहरे आप खुद देख लो। मंगलवार को गैर यूपीए, गैर एनडीए वाले तेरह दलों ने भारत बंद का एलान कर रखा। सो उधर महंगाई के खिलाफ भारत बंद होगा। तो इधर संसद में महंगाई का मुद्दा ही डंप हो जाएगा। विपक्ष का आखिरी हथियार है कटौती प्रस्ताव। सो उसके बाद विपक्ष से कैसी उम्मीद। विपक्ष को तो अब आईपीएल के पोस्टमार्टम और फोन टेपिंग मुद्दे में सुर्खियां नजर आ रहीं। सो आम आदमी के हित में अब मजबूती से खड़ी नहीं। सिर्फ और सिर्फ विरोध दर्ज कराने की रस्म निभाना चाहती है बीजेपी। सो जब विपक्ष ही सरेंडर कर चुका। तो भला आम आदमी की क्या बिसात। सो कटौती प्रस्ताव आएगा तो मंगलवार को। पर विपक्षी एकता की पतंग तो सोमवार को ही कट गई।
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26/04/2010

Friday, April 23, 2010

तो राजनीतिक आईपीएल में भी मैच फिक्सिंग!

यों आईपीएल का फाइनल इतवार को हो जाएगा। पर संसद में चल रहा लीग मैच खत्म नहीं हो रहा। सो शुक्रवार को संसद के दोनों सदनों में कामकाज ठप रहा। अबके समूचा विपक्ष जेपीसी की मांग पर अड़ा। तो सरकार के होश फाख्ता हो गए। विवाद में शरद पवार-प्रफुल्ल पटेल का नाम गले की हड्डी बना। संसद में कुछ ने इस्तीफा मांगा। तो कुछ जांच की मांग पर ही सिमटे रहे। सो प्रणव मुखर्जी ने मोर्चा संभाला। चेहरे पर थोड़ा गुस्सा, थोड़ा धैर्य दिखा। तो दादा ने जेपीसी का एलान नहीं किया, पर विचार का झुनझुना थमा गए। फिर भी विपक्ष नहीं माना। सो देर शाम कांग्रेस कोर ग्रुप में मंथन हुआ। पर जेपीसी को लेकर कांग्रेस ऊहापोह में फंस गई। कोर ग्रुप में दो मत उभरे। पहला- जेपीसी को भी आखिर मौजूदा एजेंसी पर ही निर्भर रहना होगा। दूसरा- जेपीसी बनी, तो अब तक जो राज सिर्फ सरकार के पास, सबको मालूम हो जाएगा। सो प्रणव दा ने अब तक की जांच का ब्यौरा रखा। फिर तय हुआ, सरकारी एजेंसी सही काम कर रही। पर विपक्ष का हंगामा जारी रहा, तो क्या होगा। सो मामला पीएम पर छोड़ दिया। अब सरकार तेल और तेल की धार देखेगी। वित्त विधेयक का फच्चर न होता, तो शायद जेपीसी की हां या ना शुक्रवार को ही हो जाती। पर सरकार की बड़ी चुनौती वित्त विधेयक पास कराने की। सो अगर अगले हफ्ते संसद में स्थितियां बदलीं। तो सरकार मामले को लटकाएगी। तब तक शायद ललित मोदी की विदाई भी हो जाए। अगर विपक्ष ने रार ठान ली। तो शायद जेपीसी गठित हो जाए। पर बीजेपी ने तो शुक्रवार को ही साफ कर दिया। सोमवार के हंगामाई एजंडे में फोन टेपिंग मुद्दा होगा। अरुण जेतली ने भी तैयारी कर ली। सो दोनों सदनों में फोन टेपिंग पर हंगामा बरपेगा। एक मैगजीन में खुलासा हुआ, यूपीए सरकार 2006 से ही कई बड़े राजनेताओं के फोन टेप करा रही। जिसमें करीब-करीब सभी दलों के नेता शामिल। कांग्रेस भी यही चाह रही, हंगामा आईपीएल से दूसरे मुद्दे पर शिफ्ट हो। पर कोर ग्रुप में एक और आकलन हुआ। भले विपक्ष जेपीसी की मांग पर एकजुट हो। पर पवार-पटेल के इस्तीफे को लेकर बंटा हुआ। अब देखो, शुक्रवार को शरद यादव, बासुदेव आचार्य, गुरुदास दासगुप्त ने इस्तीफा मांगा। पर बीजेपी जेपीसी की मांग से आगे नहीं बढ़ी। अब भले जेपीसी के बाद पवार-पटेल का इस्तीफा बीजेपी अनिवार्य बता रही। पर सोचो, जेपीसी का दायरा सीमित रखा गया, तो क्या होगा। सो बीजेपी शुक्रवार को बुरी तरह घिर गई। शशि थरूर का इस्तीफा मांगने में बीजेपी ने तनिक भी देर नहीं की। या यों कहें, ट्विटर को राजनीतिक तेवर बीजेपी ने ही दिया। सो थरूर को इस्तीफा देना पड़ा। पर अब पवार-पटेल का नाम आया। तो बीजेपी को मानो सांप सूंघ गया। इस्तीफा मांगना तो दूर, पवार-पटेल के बचाव में बीजेपी इस कदर उतरी, जितनी एनसीपी भी नहीं। सो प्रेस कांफ्रेंस में एस.एस. आहलूवालिया पहुंचे। तो मीडिया ने सवालों की झड़ी लगा दी। चौतरफा घुमाफिरा कर वही सवाल। सो आहलूवालिया खीझ गए। मीडिया से ही सवाल पूछना शुरु कर दिया। पटेल-पवार के खिलाफ एक भी सबूत दिखा दें। अब कोई पूछे, थरूर के बारे में कौन सा सबूत मिल गया था। महज ट्विटर पर ललित मोदी ने सुनंदा पुष्कर के शेयर का खुलासा किया। तो बीजेपी ने मोदी का कहा सच मान लिया। तब बीजेपी नेताओं ने सुनंदा-थरूर के रिश्ते पर खूब चुटकियां लीं। अब विवाद में प्रफुल्ल पटेल की बेटी पूर्णा का नाम आया। पूर्णा आईपीएल से जुड़ी हुई। उसने आईपीएल के सीईओ सुंदर रमन का भेजा ई-मेल अपने पिता के पीए को भेजा। फिर वही मेल थरूर तक पहुंचा। पर आहलूवालिया कह रहे, उस ई-मेल में ऐसा कुछ नहीं। उन ने मीडिया को नसीहत दी, पहले मेल पढि़ए। फिर तय करिए, वह दोषी है या नहीं। आहलूवालिया की खीझ यहीं तक नहीं। उन ने तो बाकायदा मीडिया को नैतिकता का पाठ पढ़ाना शुरू कर दिया। पर सवाल उठा, बीजेपी के ही यशवंत ने पवार-पटेल का इस्तीफा मांगा। तो असहज आहलूवालिया बोले- यशवंत ने जो कहा, उससे असहमत नहीं। जरा गौर करिए, आहलूवालिया ने यह नहीं कहा, सहमत हैं। सो सवाल, कहीं ऐसा तो नहीं, बीजेपी को डर लग रहा। आंच पवार-पटेल तक पहुंची। तो बीजेपी भी झुलसेगी। सचमुच आईपीएल विवाद पर बीजेपी में दो खेमे बन चुके। बीजेपी के कनफ्यूजन की वजह भी यही। वैसे भी आईपीएल या बीसीसीआई से जुड़े नेता चैरिटी के लिए नहीं जुड़े। दुनिया को मालूम, अपनी बीसीसीआई के पास कितना माल। सो मोदी को हटाने के बाद राजनीतिक आईपीएल के मैच फिक्सिंग की तैयारी। ललित मोदी तो अब आत्मघाती दस्ता हो गए। भले खुद जाएं, पर कइयों को बेनकाब करने की ठान चुके। सो जेपीसी की चर्चा तेज हो गई। पर इतिहास साक्षी, जेपीसी ने मामले को जितना सुलझाया नहीं, उतना लटकाए रखा। हर्षद मेहता घोटाला हो या केतन पारिख घोटाला, जेपीसी तो बनी, पर रपट आने में तीन से चार साल लग गए। यानी जेपीसी का मतलब साफ, मोदी को हटाओ, फिर जांच के नाम पर विवाद ठंडे बस्ते में। पर जेपीसी क्या तीर मार लेगी। आखिर जेपीसी को भी सरकार की जांच एजेंसियों का ही सहयोग लेना पड़ेगा। सो विवाद के बाद भी बेफिक्र शरद पवार कह रहे- जिसे जो करना है, करने दीजिए। खुद सत्ता में, प्रमुख विपक्ष बीजेपी भी साथ। तो पवार क्यों हों फिक्रमंद। बीजेपी भी आईपीएल की पिच से पवार से गठजोड़ की बिसात बिछा रही।
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23/04/2010

Thursday, April 22, 2010

मोदी को हटाने की रस्म भर न रह जाए जांच

क्या ललित मोदी देश और क्रिकेट की जरूरत बन गए हैं? क्या मोदी-आईपीएल के सिवा देश की कोई समस्या ही नहीं? फटाफट क्रिकेट से फटाफट पैसे कइयों ने बनाए। पर जांच सरकारी अंदाज में ही क्यों चल रही? क्या सोमवार या मोदी के हटने तक यही खेल चलता रहेगा? बीसीसीआई के चीफ तो शशांक मनोहर। उन ने मोदी पर गैरकानूनी ढंग से काम करने का आरोप लगाया। बिन मोदी भी 26 अप्रैल की मीटिंग का खम ठोका। तो सवाल, अगर मोदी गलत, तो फिर आईपीएल सीजन-थ्री खत्म होने का इंतजार क्यों? आखिर बाकी लोग ईमानदार, तो एक बेईमान को क्यों नहीं हटा पा रहे? पर सच्चाई शायद कुछ और। आईपीएल के हमाम में सिर्फ मोदी नहीं, बड़े-बड़े सूरमा नंगे। सो शशि थरूर के ट्विटर से निकला आईपीएल का जिन्न अब बोतल में जाने को राजी नहीं। अब ट्विटर प्रेम से थरूर नपे। तो प्रफुल्ल पटेल के गले ई-मेल का फंदा। सरकार में पटेल नागरिक उड्डयन मंत्री का ओहदा संभाल रहे। सो दो-चार दिन की ना-नुकर के बाद अब खुद प्रफुल्ल पटेल ने मान लिया। थरूर की मदद करने के लिए ललित मोदी से बात की थी। पर ई-मेल का खेल देखिए। कोच्चि-पुणे टीम की नीलामी से दो दिन पहले आईपीएल के सीईओ सुंदर रमन ने प्रफुल्ल की बेटी पूर्णो पटेल को ई-मेल भेजा। पूर्णो आईपीएल में बतौर कर्मचारी तैनात। पूर्णो ने ई-मेल अपने पिता के निजी सचिव चंपा को भेजा। फिर चंपा ने शशि थरूर को। ई-मेल में बोली लगने वाली दोनों टीमों के बारे में आय-व्यय का अनुमान था। अब एनसीपी इसे गोपनीय नहीं, साधारण दस्तावेज बता रही। पर सवाल, मेल इतने रास्तों से होता हुआ थरूर तक क्यों पहुंचा? अब झूठ-सच का भी खेल देखिए। सुंदर रमन को पता नहीं पूर्णो ने मेल पिता के पीए को क्यों भेजा। पर पूर्णो की दलील, सुंदर के कहने पर ऐसा किया। अब कोई पूछे, नीलामी से पहले ही नफा-नुकसान का ब्यौरा भेजने का क्या मतलब? पर सिर्फ प्रफुल्ल का ही नाम नहीं, खुद पवार के समधी बी. आर. सुले का भी नाम। सो गुरुवार को पवार की सांसद पुत्री सुप्रिया सुले ने आईपीएल में अपने पति की हिस्सेदारी का खंडन किया। पर श्वसुर का प्रसारण कंपनी एमएसएम में दस फीसदी शेयर 1992 से। यही बात एनसीपी प्रवक्ता डी.पी. त्रिपाठी ने भी कही। बोले- सुले का शेयर तबसे, जब आईपीएल का जन्म भी नहीं हुआ था। चुनौती दी, अगर किसी के पास सबूत हों, तो दिखाए। एनसीपी का आईपीएल से कोई लेना-देना नहीं। अब एनसीपी की सफाई तो ठीक, पर डी.पी. त्रिपाठी ने एक और बात कही। बोले- हम खेल के राजनीतिकरण में विश्वास नहीं करते। शायद इससे बड़ा मजाक नहीं हो सकता। पर त्रिपाठी से जब पूछा गया- थरूर ने इस्तीफा दिया, तो पटेल-पवार क्यों नहीं। तपाक से जवाब आया- ऐसा सवाल ही नहीं उठता। त्रिपाठी ने लगे हाथ यह भी कह दिया, बीजेपी के लोग भी तो बीसीसीआई से जुड़े। कांग्रेस कोई दबाव नहीं डाल रही। हमारा गठबंधन ठीक-ठाक चल रहा। अब गठबंधन ठीक-ठाक कैसे न चले। आईपीएल की वित्तीय अनियमितता पर बवाल मचा हुआ। तो इधर सरकार का वित्त विधेयक संकट में। समूचा विपक्ष एकजुट होकर 27 अप्रैल को कटौती प्रस्ताव लाने की तैयारी कर रहा। ऐसे में कांग्रेस भला सहयोगियों को नाराज करने का जोखिम क्यों उठाए। सो थरूर की विदाई के बाद जब प्रणव-चिदंबरम-पवार मंगलवार को बैठे थे। तब यही तय हुआ, कम से कम मोदी को हटाओ। पवार भी मान गए। तभी तो गुरुवार को प्रणव दा ने प्रफुल्ल पटेल का नाम उछलने पर चुप्पी साध ली। दो-टूक कहा- जांच चल रही है, उसके बाद ही कुछ कहेंगे। सो पवार के दूध में मक्खी बने ललित मोदी बौखला गए। चौतरफा घिरे मोदी कभी गवर्निंग कॉउंसिल की मीटिंग को अवैध ठहरा रहे। तो अब कोर्ट जाने की धमकी। पर मोदी कहीं भी जाएं, जैसे राजस्थान क्रिकेट एसोसिएशन से विदाई हुई। आईपीएल की कमिश्नरी भी जानी तय। मोदी शायद भूल गए, आईपीएल उनके घर की दुकान नहीं, अलबत्ता बीसीसीआई के मातहत। पर मोदी की बौखलाहट की वजह पवार की कांग्रेस से राजनीतिक सांठगांठ। सो मोदी बीसीसीआई के अमर सिंह हो गए। ब्लैकमेल पर उतर आए। कभी राज खोलने की धमकी दे रहे। तो कभी ऐसा दिखा रहे मानो, मोदी बिन आईपीएल सून। सपा से विदाई से पहले अमर सिंह ने हू-ब-हू यही किया था। पहले ब्लॉग लिख नाराजगी जाहिर की। फिर मुलायम सिंह के राज खोलने की धमकी। कभी कुछ, तो कभी कुछ बोलते रहे। यही हाल ललित मोदी का। ट्विटर से खेल शुरू हुआ। पर अब इनकम टेक्स से लेकर प्रवर्तन निदेशालय तक पीछे पड़ चुका। अब तक की जांच में 275 करोड़ के घोटाले की खबर। सो कभी आईटी, तो कभी ईडी मोदी से घंटों पूछताछ कर रहा। यानी एनसीपी, सरकार, बीसीसीआई, बीजेपी हर जगह से एक बात बिलकुल साफ हो रही। ललित मोदी 26 अप्रैल को विदा होंगे। यानी आईपीएल में राजनीति का खेल घुस चुका। हर रोज छापे पड़ रहे। दस्तावेज खंगाले जा रहे। पर हैवीवेट नए नामों से सबको सांप सूंघ रहा। प्रणव दा भी जांच की बात कर रहे। थरूर के इस्तीफे के लिए संसद ठप कराने वाली बीजेपी भी। पवार-प्रफुल्ल का नाम उछला। तो गोपीनाथ मुंडे बोले- चाहे कोई भी हो, जांच होनी चाहिए। पर इस्तीफा नहीं होगा। सो कहीं ऐसा न हो, मोदी को डंप करने के बाद भ्रष्टाचार का आईपीएल दब जाए। और जांच के बाद लोग यह कहने को मजबूर न हों- ना बाप बड़ा ना भइया, सबसे बड़ा रुपैया।
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22/04/2010

Wednesday, April 21, 2010

गडकरी तो पास हुए, पर मनमोहन क्यों फेल?

महंगाई पर रैली की बात करें उससे पहले के.एल. वाल्मीकि को श्रद्धांजिल। बुधवार को लोकसभा से बीजेपी ने वॉकआउट किया। पर राज्यसभा वाल्मीकि को श्रद्धांजलि देकर उठ गई। पिछली सर्दी में ही निमोनिया के शिकार वाल्मीकि का मंगलवार आधी रात करीब साढ़े बारह बजे निधन हो गया। सचमुच जमीन से जुड़े सांसद थे वाल्मीकि। सांसद होकर भी कभी सांसदी वाला गुरूर नहीं दिखा। हमेशा अपने समाज की फिक्र करते दिखे। बीजेपी हो या कांग्रेस, अब कर्तव्य के प्रति इतने समर्पित नेता इक्के-दुक्के ही मिलते। नेता हवा-हवाई हो चुके। सो जनता का भरोसा टूट चुका। अब बुधवार का ही किस्सा लो। बीजेपी ने महंगाई के खिलाफ संघर्ष का शंखनाद किया। सचमुच विपक्ष की जिम्मेदारी का अहसास कराया। पर मौसम की मार बीजेपी की रैली पर भारी पड़ी। वर्करों ने तो जैसे-तैसे गर्मी झेल ली। पर खुद सेनापति नितिन गडकरी गश खा गए। वर्कर तो हमेशा इस मौसमी थपेड़ों के बीच ही जीता। पर मुश्किल होती है नेताओं को। अब कोई पूछे, जब मौसमी कहर बर्दाश्त नहीं। तो गर्मी में रैली बुलाई ही क्यों? इंदौर अधिवेशन में ही फैसला किया था। सो बजट सत्र के पहले चरण में ही हल्ला बोल देते। पर ऐसा नहीं, पहले माहौल बनाएंगे। ताकि वोट बैंक की राजनीति कर सकें। अब खुद पर मार पड़ी। तो जुबां पर वही शब्द, उफ ये गर्मी! बात पुरानी नहीं, महज पिछले साल के अप्रैल महीने की ही। गर्मी ने तब बीजेपी ही नहीं, तमाम राजनेताओं का हाल बेहाल कर रखा था। पर मजबूरी थी, लोकसभा चुनाव की खातिर नेता दर-दर की खाक छान रहे थे। पर जब तीसरे राउंड की वोटिंग 30 अप्रैल को निपटे। वोटिंग की रफ्तार बेहद धीमी दिखी। यों शाम तक वोटिंग पचास फीसदी तक पहुंच गया था। पर दिन में सूर्य की तपिश देख तबके पीएम इन वेटिंग उखड़ गए। आडवाणी गर्मी में चुनाव के ही खिलाफ हो गए। कहा था- ‘गर्मी के मौसम में वोटिंग परसेंटेज गिर जाता है। सो चुनाव फरवरी महीने में कराए जाने चाहिए।’ गर्मी की आड़ में उन ने उसी दिन लगे हाथ तीन सुझाव भी दे डाले। पहला- लोकसभा-विधानसभा के चुनाव इक_ïे फरवरी में हों। दूसरा- लोकसभा का पांच साल टर्म फिक्स हो। और तीसरा- वोटिंग को अनिवार्य बनाया जाए। यों गर्मी में चुनाव अवसरवादी राजनीति की ही देन। फील गुड की हवा में आडवाणी ने ही छह महीने पहले चुनाव करवाए थे। सो पांच साल बाद 2009 में भी वही मौसम आ गया। यों आम आदमी तो हर मौसम में अपनी दिनचर्या निपटाने को मजबूर होता। पर कभी-कभार दर्शन देने वाले नेता महीने-डेढ़ महीने में ही उकता जाते। अगर नेतागण हमेशा जनता का हालचाल जानने फील्ड में उतरें। तो शायद गर्मी के तीखेपन का कम अहसास हो। पर नेता अपनी कमी नहीं सुधारेंगे। अलबत्ता वोटिंग अनिवार्य करने की बात करेंगे। अब बीजेपी हो या कांग्रेस या कोई और। नेताओं की यही आदत, अपना दोष नहीं देखेंगे और मतदाताओं पर जोर-जबरदस्ती थोपने की कोशिश करेंगे। अगर नेता ईमानदारी से क्षेत्र की जनता का ध्यान रखने लगें। तो वोटरों में खुद उत्साह पैदा होगा। पर राजनीति अपनी विश्वसनीयता खो चुकी। अब गडकरी निकले तो थे सरकार को होश में लाने। पर खुद ही बेहोश हो गए। तो सवाल उठा, एयर कंडीशंड कमरों में बैठकर जनता का क्या भला होगा? यों मनमोहन सरकार के छह साल में महंगाई ने माउंट एवरेस्ट से भी बड़ी चोटी बना ली। चाहकर भी मनमोहन चोटी नहीं चढ़ पा रहे। सो नितिन गडकरी ने विपक्ष की जिम्मेदारी का निर्वाह किया। अरसे बाद बीजेपी ने जनहित से जुड़े मुद्दे पर ऐसी ताकत दिखाई। सो गडकरी अपने पहले इम्तिहान में पास हो गए। संघ की छाप रैली में दिखी, जब पोस्टरों पर सिवा श्यामा प्रसाद मुखर्जी-दीनदयाल उपाध्याय के किसी नेता की तस्वीर नहीं। बीजेपी ने महंगाई के खिलाफ संघर्ष को सफल बनाने के लिए पूरी तैयारी की। सो महंगाई से परेशान जनता मौसमी मार को झेलते हुए दिल्ली पहुंच गई। क्या बच्चे, क्या बूढ़े, क्या जवान और क्या महिलाएं सबके चेहरे पर मौसम से अधिक महंगाई की मार दिख रही थी। करीब एक लाख की संख्या में लोग जुटे। सो दिल्ली ठहर गई। पर सवाल, क्या महंगाई भी ठहरेगी? क्या महंगाई के खिलाफ गुस्से का इजहार करने दिल्ली पहुंचे लाखों लोगों का असर सरकार पर पड़ेगा? छह साल से कांग्रेस जिस तरह महंगाई से जूझ रही। उससे तो यह सवाल ही बेमानी लगता। तभी तो बुधवार को कांग्रेस या सरकार ने महंगाई पर चिंता तक नहीं जताई। यों पीएम ने आईपीएल में खूब रुचि दिखाई। तडक़े ही राजीव शुक्ल को बुला पूरा ब्यौरा लिया। तो राजीव शुक्ल ने बाहर आकर कह दिया, 26 अप्रैल की मीटिंग में कड़े फैसले लेंगे। यानी पीएम ने सीधे दखल दिया। तो ललित मोदी की विदाई तय हो गई। अब भले मोदी रार ठानें। पर यह बीसीसीआई को तय करना, कैसे होगी मोदी की विदाई। यानी पीएम के आईपीएल में कूदने के बाद मोदी के बचने का कोई रास्ता नहीं। पर कभी महंगाई की खातिर मनमोहन ऐसे क्यों नहीं कूदते? मोदी की विदाई में रुचि दिखाने वाले मनमोहन महंगाई को कब विदा करेंगे? आखिर ऐसी क्या वजह, जो एक मीटिंग में आईपीएल का भविष्य तय हो रहा। पर महंगाई से परेशान जनता के लिए सिर्फ मीटिंग-मीटिंग हो रही। अब देखना, कैसे थरूर की शानदार वापसी होगी। कहीं ऐसा तो नहीं, दूसरी चुनावी जीत ने सरकार को निरंकुश बना दिया?
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21/04/2010

Tuesday, April 20, 2010

तो क्या विजन सिर्फ थरूर के लिए, महंगाई पर नहीं?

अपने देश में नेताओं-नौकरशाहों का विजन शायद कहीं गुम हो गया। एक छोटा सा किस्सा बताएं। दिल्ली मैट्रो में आजकल एक इश्तिहार देखने को मिल रहा। भारत सरकार के अधीन एक जनसंख्या नियंत्रण का विभाग है। जिसने अखबारी कतरन के अंदाज में लिखा है- सोमवार, 20 मार्च 2030, भारत से हारने पर चीन में जश्न का माहौल। इश्तिहार का मतलब, 2030 में अपनी जनसंख्या आज के दर के हिसाब से चीन को पीछे छोड़ देगी। यों जागरुकता पैदा करने के लिए इश्तिहार वाकई बहुत अच्छा। पर डेटलाइन देख अपना दिमाग ठनका। ख्याल आया, वाकई कितनी लंबी सोचकर आइडिया निकाला। सो तसल्ली के लिए अपना मोबाईल निकाल डेट चेक किया। तो जितनी इश्तिहार के संदेश से खुशी हुई, उतना ही दुख डेट और दिन देख कर हुआ। सही मायने में 20 मार्च 2030 को दिन सोमवार नहीं, अलबत्ता बुधवार होगा। अब कहने वाले कहेंगे, दिन से क्या फर्क पड़ता, संदेश देखो। पर देश का भविष्य बनाने वाले अगर मन में जो आया, वही करने लगे। तो फिर देश का भविष्य कैसा होगा? यों बात बहुत छोटी है, पर सरकार के विजन की पोल खोल रही। जिसे पता करने में अपने जैसे को महज तीन-चार सेकेंड लगे। क्या कोई सरकारी मुलाजिम इतनी जहमत नहीं उठा सकता? अब जवाब मांगें भी, तो किससे। महंगाई का भूत 2004 से पीछा कर रहा। अब तो महंगाई सुरसा के मुंह से अधिक फैल चुकी। पर विजन का नमूना आप खुद देख लो। आरबीआई ने मंगलवार को एलान किया। मार्च 2011 तक महंगाई दर को कम कर 5.5 फीसदी वार्षिक दर पर लाएंगे। पर महंगाई काबू करने का फिर वही पुराना नुस्खा आजमाया। सीआरआर से लेकर ब्याज दर बढ़ा दिए। यानी महंगाई के आदी लोगों पर एक और बोझ। पर महंगाई के रुप अनेक। याद होगा, हाल ही में विपक्ष ने कैसे महंगाई के खिलाफ इमरजेंसी जैसी एकजुटता दिखाई। अब बुधवार को बीजेपी की महारैली। रामलीला मैदान से संसद मार्च होगा। इंदौर में नितिन गडकरी ने तो दस लाख भीड़ जुटाने का खम ठोका था। पर मौसम का मिजाज देख बीजेपी अब आंकड़ेबाजी से परहेज कर रही। मौसम की मार रैली पर न पड़े। सो दिल्ली में प्याज के मुद्दे पर सरकार गंवाने वाली बीजेपी ने मौसम से निपटने के लिए प्याज ककी बोरियों का पूरा बंदोबस्त किया। ताकि वर्करों को लू न लगे। वर्करों को प्याज के साथ नींबू और कुछ हर्बल टॉफियां भी बांटने की तैयारी। प्रदर्शनकारियों पर वाटर कैनन छोड़े जाएं, इसकी गुहार खुद बीजेपी ने संबंधित विभाग से लगाई। अब बीजेपी के संसद घेरो संघर्ष का भले पल भर को सरकार पर असर पड़े। पर महंगाई का बाल बांका भी होता नहीं दिख रहा। वैसे जब विपक्षी एकजटुता में भी महंगाई अलग-अलग हों। तो सरकार क्यों परेशान हो। बुधवार को बीजेपी की रैली, तो अगले मंगलवार यानी 27 अप्रैल को लेफ्ट की रहनुमाई में 13 दलों ने भारत बंद का एलान कर रखा। सो संसद में सरकार को घेरने में सफल विपक्षी महाजोट ने फिर पहल की। लेफ्ट ने एनडीए को भारत बंद में शामिल होने का न्योता भेजा। एनडीए के संयोजक शरद यादव ने न्योता बीजेपी को अग्रेषित कर दिया। पर बीजेपी ने अभी जवाब नहीं दिया। पहले बीजेपी बुधवार की अपनी रैली देखेगी। गडकरी की रहनुमाई में बीजेपी के पहले विशाल प्रदर्शन की ताकत का इम्तिहान। पर संसद में एकजुट विपक्ष सडक़ पर साथ नहीं। बीजेपी की दलील, संसद में सरकार को घेरने के लिए मुद्दों पर आधारित सहमति के लिए विपक्षी महाजोट बना। सो संसद के बाहर ऐसी एकजुटता का फिलहाल कोई सवाल ही नहीं। यानी जनता के आंदोलन में महंगाई की आग पर सबकी अपनी-अपनी राजनीतिक रोटी। या यों कहें कि बीजेपी की महंगाई अलग और लेफ्ट की अलग। सो आप ही सोचिए, कैसे कम होगी महंगाई? वैसे भी महंगाई का असर आम आदमी पर हो रहा। सो आजकल बड़े लोगों की चर्चा संसद और मीडिया में खूब हो रही। शशि थरूर ने भले इस्तीफा दे दिया। पर मंगलवार को अचानक सफाई देने लोकसभा पहुंचे। अपना दर्द फिर उड़ेला। पीएम से गुहार लगाई, सभी आरोपों की जांच कराएं। अब तक के लंबे सार्वजनिक जीवन में बेदाग होने की दुहाई दी। एक कवि की पंक्ति सुनाकर बोलें, भारत का नाम आने पर गर्व का अहसास होता है। केरल का नाम आने पर रगों में खून दौडऩे लगता है। पर केरल की बात आई, तो सीताराम येचुरी ने बखूबी जवाब दिया। पूछा, केरल के बीपीएल के लिए खून क्यों नहीं दौड़ता। क्या सिर्फ आईपीएल के लिए खून दौड़ रहा। पर सोमवार के बजाए मंगलवार को थरूर की सफाई से अपना माथा ठनका। जो थरूर पीएम के आने से पहले तक इस्तीफे को राजी नहीं थे। अब इस्तीफे को नैतिकता बता रहे। सो लगा, देर-सबेर थरूर फिर मनमोहन केबिनेट की शोभा बढ़ाएंगे। जैसे तहलका कांड के बाद जार्ज फर्नांडिस गए और फिर रक्षा मंत्री पद पर ही लौट आए थे। यानी थरूर की खातिर सरकार ने अपने विजन का घोड़ा दौड़ा दिया। भले आम आदमी को महंगाई से निजात दिलाने में सरकार का विजन कुंद पड़ गया हो। कुछ यही हाल आईपीएल का भी। जैसे थरूर इस्तीफे को राजी नहीं थे। वैसे ही अब ललित मोदी तैयार नहीं। पर मंगलवार को संसद भवन में प्रणव-पवार-चिदंबरम बैठे। तो तय हो गया, मोदी को जाना होगा। बीसीसीआई चीफ शशांक मनोहर दिल्ली आकर पवार से मिले। पवार ने अरुण जेतली से बात की। पर मोदी का गेम ओवर शाायद आईपीएल फाइनल के बाद होगा।
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20/04/2010