Friday, May 21, 2010

तो मजबूत होकर और भी मजबूर हुए मनमोहन

शनिवार को यूपीए की दूसरी पारी की पहली सालगिरह। सो सरकारी खेमा सजधज कर तैयार हो गया। पीएम के घर भोज की तैयारी। फिर सोमवार को उपलब्धियों के पिटारे के साथ मनमोहन मीडिया से रू-ब-रू होंगे। यानी पहले पेट, फिर जनता से भेंट। पर समूची कांग्रेस हफ्ते भर से फील गुड कर रही। उपलब्धियां ऐसे गिना रही, जैसे दिलीप कुमार सूट-बूट पहन कर साला मैं तो साहब बन गया.. .. गीत गुनगुना रहे। अब ऐसा नहीं कि कांग्रेस या सरकार को हकीकत मालूम न हो। जनता महंगाई से कितनी त्रस्त, किसान-गरीब की हालत कैसी, यह जगजाहिर। पर कांग्रेस अपनी नाकामी कैसे स्वीकारे। राजनीति में इतनी ईमानदारी होने लगे, तो राजनीति काजनीति हो जाए। पर यहां तो राजनीति का मतलब जनता के लिए काम से नहीं, जनता पर राज करना हो चुका। अब आप यूपीए का पिछला पांच साल छोड़ दो। सिर्फ दूसरी पारी के पहले साल का ही हिसाब-किताब देखिए। कांग्रेस ने जनता से जुड़े गंभीर से गंभीर मुद्दों पर मैदान छोडऩे की रणनीति अपनाई। विपक्ष जब-जब एकजुट हुआ, कांग्रेस ने एकता को तार-तार करने की शतरंजी चाल चल दी। महंगाई पर संसद से सडक़ तक आवाज बुलंद हुई। तो कांग्रेस ने महिला बिल का लंगड़ा घोड़ा दौड़ा दिया। अब साल पूरा हुआ, देश को हिसाब-किताब देने का वक्त। तो कहीं महंगाई, आंतरिक सुरक्षा जैसे अहम मुद्दे जश्न पर हावी न हो जाएं। सो बहस छेडऩे वाले बुद्धिजीवियों को नक्सलवाद की बहस में उलझा दिया। नक्सली हमले बढ़े, नक्सलवाद पर चिदंबरम के सख्त कदम उठे। तो कांग्रेस ने चिदंबरम की ही टांग खींच दी। नक्सलवाद पर ऐसी बहस छेड़ दी, जिसका ओर न छोर। भले नक्सली अपनी हिंसक वारदात को लगातार अंजाम दे रहे। पर गिनाने के लिए कांग्रेस के पास क्या उपलब्धि, जरा देखिए। यूनिक आई-डी कार्ड बन रहा। नरेगा का बजट बढ़ा दिया। फूड सिक्यूरिटी बिल आ रहा। नेशनल हैल्थ बिल आएगा। शिक्षा के हक को मौलिक अधिकार बनाया। महिला बिल राज्यसभा से पारित कराया। कांग्रेस की नजर में यही जनकल्याण के मुद्दे। पर असलियत तो यही, पहली पारी के मुकाबले मनमोहन की दूसरी पारी कहीं अधिक दुश्वार। महज साल भर में सरकार असहमति के भंवर में घूमती दिखी। शर्म अल शेख में विदेश नीति का चौथा हुआ। तो देश में आकर मंत्रियों-नौकरशाहों ने तेरहवीं कर दी। पहली बार बलूचिस्तान का जिक्र पाक के साथ साझा बयान में आया। मुंबई हमले के बाद अपना स्टैंड साफ था। जब तक पाक दोषियों पर कार्रवाई नहीं करेगा, बात नहीं होगी। पर कूटनीति का चालीसा तो तब हो गया, जब भारत ने खुद आगे बढक़र बातचीत की पहल की। तब पाक ने भारत को खुलेआम घुटना टेकू कहा। अमेरिकी दबाव में भारत ने वार्ता शुरू की। पर अमेरिका ने आतंकवादी डेविड हैडली से भारत को पूछताछ नहीं करने दी। सादगी को लेकर मनमोहन के दोनों विदेश मंत्रियों की संस्कृति तो सबने देखी। दस जनपथ से फटकार लगी, तब फाइव स्टार होटल छोड़ा। शशि थरूर ने तो साल भर में ही इतनी फजीहत कराई, आखिर सालगिरह से पहले ही बलि चढ़ गए। पर कांग्रेस का मतभेद यहीं खत्म नहीं हुआ। इसी साल मनमोहन के सिपहसालार केबिनेट मीटिंग में एक-दूसरे से खूब भिड़े। ममता ने महिला बिल से लेकर कटौती प्रस्ताव तक कांग्रेस को नचाया। अब पहले साल में ही दोनों के बीच दूरियां बढ़ गईं। स्पेक्ट्रम घोटाले में ए. राजा पर उंगली उठी। फिर भी मनमोहन नहीं हटा पाए। इसी साल मनमोहन और सोनिया के बीच भी दूरी दिखी। जब आरटीआई एक्ट में संशोधन को लेकर दोनों के बीच चिट्ठियों से बात हुई। मनमोहन ने खुद को दस जनपथ के साये से अलग दिखाने की कोशिश की। पर पहली पारी में लाभ के पद के विवाद की वजह से खत्म हुई राष्ट्रीय सलाहकार परिषद अबके बहाल हो गई। यों दूसरी पारी में कांग्रेस बेहद मजबूत होकर उभरी। जनता ने पिछली पारी में 145 सीटें दी थीं। तो अबके कांग्रेस के पास 207 सांसद हो गए। पर मजबूती के बाद भी सरकार मजबूर दिखी। कटौती प्रस्ताव ने मनमोहन सरकार की मजबूती की कलई खोल दी। आजाद भारत के संसदीय इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ, जब बजट में पेट्रोल-डीजल के दाम बढ़े। पहली बार विपक्ष गिलोटिन डिमांड पर कटौती प्रस्ताव लेकर आया। पर मजबूत कांग्रेस ने तिकड़म का सहारा लिया। लालू-मुलायम को लॉलीपाप दिया। तो मायावती को सीबीआई का सहारा। पर लालू-मुलायम के गैरहाजिर रहने और माया के 22 सांसदों के वोट के बाद भी मनमोहन को कुल 289 वोट मिले। अगर 22 सांसद निकाल दो, तो बचे 267 सांसद। लोकसभा में बहुमत का आंकड़ा 272 का। सो साल भर का जमा-खर्च यही, मजबूत होकर भी मजबूर सरकार। पर सिर्फ सत्ता पक्ष का ही हिसाब नहीं, विपक्ष का भी जरूरी। कांग्रेस की नीति भविष्य के हिसाब से बदल रही। युवा नेतृत्व तराशे जा रहे। पर बीजेपी का हाल किसी से छुपा नहीं। पुराने सिर-फुटव्वल छोड़ दो। तो झारखंड की कहानी बीजेपी की हालत बयां कर रही। नितिन गडकरी सिर्फ नाम के लिए गढ़ के रक्षक। खुद की जुबां पर नियंत्रण नहीं। किसी को कुत्ता कह रहे। पर जिसके लिए गडकरी ने ऐसी भाषा का इस्तेमाल किया। कुछ हिसाब उनका भी हो जाए। मुलायम-लालू अपने गिरगिटिया अंदाज की वजह से विश्वसनीयता खो रहे। तो लेफ्ट ले-देकर बंगाल का किला बचाने में जुटा।
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21/05/2010

Thursday, May 20, 2010

तो राजनीति के आगे नहीं जोर किसी का

नक्सलवाद हो या बाबरी विध्वंस या झारखंड का झंझट। हर रोज नए पहलू जुड़ते जा रहे। गुरुवार को नक्सलवाद पर शुरुआत नरेंद्र मोदी से हुई। मोदी अलीगढ़ की मंगलायतन यूनिवर्सिटी में थे। छात्रों से सवाल-जवाब हुए। एक सवाल आया- राह से भटके नौजवानों के लिए क्या मैसेज। तो मोदी ने गांधीवादी जवाब दिया। हिंसा से दुनिया में कहीं भी सफलता नहीं मिली। सो हिंसा का मार्ग छोड़ नौजवान भारतीय संविधान के दायरे में बातचीत से समस्या का हल ढूंढें। यानी मोदी ने कहा तो नक्सलियों के लिए। पर अपने विजुअल मीडिया के एक तबके ने बात घुमा दी। मोदी के हवाले से खबर चलने लगी- नक्सलियों से बातचीत कर सरकार समस्या सुलझाए। अब मोदी की जुबान से नक्सलियों के लिए ऐसी नरमी, वह भी बीजेपी के रुख के बिलकुल उलट हो। तो बीजेपी में बावेला मचना ही था। सो बीजेपी के मैनेजरों ने फुर्ती दिखाई। फौरन गुजरात सरकार के प्रवक्ता का बयान जारी हो गया। बीजेपी ने अपने मंच से भी सफाई दी। तो मोदी जिस यूनिवर्सिटी के प्रोग्राम में गए थे, उसने भी विज्ञप्ति जारी कर दी। सो बीजेपी ने मोदी सरकार के बयान से साबित करने की कोशिश की, नक्सलवाद पर कोई मतभेद नहीं। अलबत्ता हिंसा पर उतारू नक्सलियों को मुंहतोड़ जवाब देने की हिमायती। अब यह मान भी लें, मोदी के बयान को मीडिया ने बात का बतंगड़ बना दिया। तो जरा सफाई पर नजरें इनायत करिए। मोदी ने नक्सलियों से हिंसा छोडऩे की अपील तो की। पर दूसरी तरफ कठोर कार्रवाई की पैरवी। क्या ये दोनों काम साथ-साथ चल सकते? क्या ऐसे में बातचीत हो सकती? यों अपने मीडिया के एक तबके ने कुछ शरारत तो की। पर मोदी की बातचीत की पैरवी क्या सिर्फ नक्सलियों पर लागू, सरकार पर नहीं? यों बीजेपी ने अपने मतभेद छुपाने को शब्दों को इधर से उधर कर दिया। जैसे सोमवार के नक्सली हमले के बाद चिदंबरम ने अपनी लाचारी जताई। कांग्रेस ने एतराज जताया, तो चिदंबरम ने भी अपने बयान की व्याख्या बदल दी। चिदंबरम ने पहले कांग्रेस में ही मतभेद का इशारा किया था। पर बाद में राज्यों से जोड़ते हुए कह दिया- राज्य मांग करे, तो ही हवाई सहायता पर विचार। यों पहले चिदंबरम ने कहा था- पांच राज्य हवाई हमले की पैरवी कर रहे। पर सीसीएस में सबकी राय एक नहीं। अब गुरुवार को नई बात सामने आई। बुद्धदेव, नीतिश, शिबू, शिवराज, रमन ने हवाई हमले की मांग से इनकार कर दिया। सो अब सवाल, क्या खुद चिदंबरम हवाई हमले के हिमायती? तीन साल में नक्सलवाद के सफाये का एलान कहीं इसी सोच का हिस्सा तो नहीं था? अब जो भी हो, कांग्रेस ने तो चिदंबरम की नकेल कस दी। सो चिदंबरम नक्सलवाद पर काम के नहीं, नाम के मंत्री। असली नीति तो दस जनपथ से तय हो रही। यों रमन सिंह ने जब नक्सलियों को आतंकवादी बताया। तो सीधा सवाल पूछा था- वायुसेना का इस्तेमाल अब नहीं, तो कब होगा। पर अब रमन का रुख बदला। तो सिर्फ नरेंद्र मोदी की वजह से। मोदी ने बातचीत की पैरवी क्या की, अब रमन सिंह भी कह रहे- बातचीत को हम भी तैयार। पर नक्सली हिंसा तो छोड़ें। अब बातचीत के लिए राष्ट्रीय सहमति जैसी दिख रही, तो स्पष्ट नीति का एलान क्यों नहीं। आखिर नक्सलवाद पर समूची राजनीति हौचपौच क्यों दिख रही? ऐसे में कैसे निपटेंगे नक्सलवाद से। अब तो यही लग रहा, नक्सलवाद पर नेता राजनीति-राजनीति खेलेंगे। अपनी व्यवस्था का यही शगल बन चुका। दंगे का इतिहास देख लो। तो अब तक कितने मामलों में न्याय हुआ। गुरुवार को बाबरी विध्वंस का एक मामला फिर आया। लखनऊ-इलाहाबाद हाईकोर्ट की बैंच ने सीबीआई की रिवीजन पिटीशन खारिज कर दी। बाबरी से जुड़े मामले रायबरेली और लखनऊ में चल रहे। जब यह मामला सीबीआई को गया था। तो 197 और 198 के तहत दो एफआईआर दर्ज हुईं। लखनऊ में स्पेशल कोर्ट बनाया गया। सीबीआई ने दोनों एफआईआर पर एक ही चार्जशीट दाखिल की। चार्जशीट में चूक हुई, 198 का जिक्र छूट गया। तो तब बीजेपी के वकीलों ने 198 के मुकदमे को विशेष कोर्ट के दायरे से बाहर बताया। सो मामला रायबरेली भेजा गया। यानी एक केस लखनऊ में, तो एक केस रायबरेली कोर्ट भेजने का आदेश। पर मुश्किल, एक ही चार्जशीट दो अदालतों में कैसे जाए। सो सीबीआई हाईकोर्ट गई। पर गुरुवार को भी राहत नहीं मिली। अब खुद बीजेपी वाले कह रहे, इस केस का कुछ होना-जाना नहीं। वाकई 17 साल बाद भी कोई ठोस मुकदमा नहीं चल पाया। वैसे भी राजनीति के आगे किसी का जोर नहीं। अब झारखंड की सियासत ही देखिए। शिबू सोरेन फिर पलट गए। कुर्सी छोडऩे से इनकार कर दिया। यों तीस जून के बाद तो गुरुजी को जाना ही होगा। पर बीजेपी को खूब पानी पिला रहे। फिर भी बीजेपी कुर्सी का मोह नहीं छोड़ पा रही। शिबू स्पीकर की कुर्सी अपने कोटे में लेने पर अड़ गए। पर बीजेपी की दलील, पहले से बीजेपी का स्पीकर। सो दूसरा चुनाव कराने के बजाए झामुमो कुछ और मलाईदार विभाग ले ले। अब सत्ता की बंदरबांट में ठप झारखंड का दोषी कौन? सो नक्सलवाद हो या बाबरी विध्वंस या फिर झारखंड। राजनीति और राजनेताओं के आगे किसी का जोर नहीं।
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20/05/2010

Wednesday, May 19, 2010

नक्सल हो या आतंकवाद, राजनीति की बहस अनंता

नक्सलियों का तांडव जारी। पर राजनीति और अपनी व्यवस्था बहस में ही उलझी। बुधवार को छत्तीसगढ़ के सीएम रमन सिंह ने नक्सलियों को आतंकी करार दिया। लश्कर से संबंध की आशंका जताई। वायुसेना के इस्तेमाल पर जोर दिया। तो कांग्रेस ने भी लक्ष्मण रेखा के पार न जाने का खुला एलान कर दिया। नक्सलवाद के खिलाफ जंग में वायुसेना का इस्तेमाल नहीं होगा। अलबत्ता नक्सलवाद को राष्ट्रीय चुनौती मानने वाली कांग्रेस ने रमन सिंह पर ही ठीकरा फोड़ दिया। कांग्रेस ने पूछ ही लिया, जब आंध्र-महाराष्ट्र संतुलित नजरिए से नक्सलवाद को निपटा चुके। तो छत्तीसगढ़ नकारा साबित क्यों हो रहा। क्यों बीजेपी ने कभी रमन सिंह का इस्तीफा नहीं मांगा। केंद्र सिर्फ सुरक्षा बल मुहैया करा सकता, संसाधन दे सकता। पर इस्तेमाल का संवैधानिक हक राज्य का। सो छह अप्रैल को सीआरपीएफ के जवान मारे गए या सोमवार को हुईं 31 मौतें। सबकी जिम्मेदार सिर्फ राज्य सरकार। कांग्रेस की दलील यहीं खत्म नहीं। कांग्रेस का मानना है, संविधान में संघीय व्यवस्था। सो कानून व्यवस्था से निपटना राज्य की ही जिम्मेदारी। यानी कांग्रेस ने पी. चिदंबरम के बयान को नया मोड़ दे दिया। सोमवार को चिदंबरम ने नक्सलवाद के खिलाफ कार्रवाई पर अपने हाथ बंधे होने और सीमित अधिकार की बात कही। तो कांग्रेस में भूचाल आ गया। आखिर वही हुआ, जो सोनिया उवाच के खिलाफ जाने वालों का होता। कांग्रेस में चिदंबरम अलग-थलग पड़ गए। विपक्ष ने सीधे पीएम से जवाब तलब किया। तो कांग्रेस ने चिदंबरम की चाबी घुमा दी। सो चिदंबरम ने पलटी मारी। जिस बयान में सुरक्षा मामलों की केबिनेट कमेटी और अपनों के मतभेद का इशारा किया था। उसका रुख राज्य की ओर मोड़ दिया। चिदंबरम ने बयान की व्याख्या कुछ यूं कर दी, कई राज्य वायुसेना के इस्तेमाल की पैरवी कर रहे। पर यह मामला उनके अधिकार क्षेत्र में नहीं। अब चिदंबरम के बयान से असहज हुई कांग्रेस संभली। तो बुधवार को नक्सलवाद पर स्पष्ट लाइन तय कर दी। ताकि मनमोहन की दूसरी पारी के पहले सालाना जश्न का जायका न बिगड़े। शनिवार को मनमोहन की दूसरी पारी का पहला साल पूरा हो रहा। सो कांग्रेस को जबर्दस्त फील गुड। भले महंगाई ने जनता का रस निचोड़ लिया। पर कांग्रेस उपलब्धियां गिनाते-गिनाते थक गई। पहले साल में यूनिक आई-डी कार्ड, नरेगा को व्यापक बनाने, खाद्य सुरक्षा बिल, राष्ट्रीय स्वास्थ्य बिल, शिक्षा का अधिकार कानून, राज्यसभा से महिला बिल, कृषि कर्ज पर सात फीसदी ब्याज दर, विकलांगता अवसर बिल प्रमुखता से गिनाए। अब सच्चाई भी देखो। जो दाल 32 रुपए थी, सौ रुपए के करीब पहुंची। खाने-पीने की वस्तुओं के दाम इसी अनुपात में बढ़े। विदर्भ में किसानों की आत्महत्या एक साल में 50 से अधिक हुई। फिर भी कोई फील गुड कर रहा, तो अपना क्या। एनडीए ने तो छह साल राज के बाद फील गुड किया था। यहां तो पहले साल में ही इतना फील गुड। यों मनमोहन की दोनों पारी मिलाओ, तो उसका भी यह छठवां साल। सो फील गुड के मामले में दोनों मौसेरे भाई ही हुए। वैसे भी कहावत है, सावन के अंधे को हरा ही हरा नजर आता है। सो नक्सलवाद पर छिड़ी बहस से इतर कांग्रेस को जश्न ही जश्न दिख रहा। अब कांग्रेस ने साफ किया, संविधान के दायरे में रहकर ही नक्सलवाद से निपटेंगे। भारत राज्यों का संघ है, सो राज्य अपनी जिम्मेदारी निभाएं, केंद्र अपनी निभाएगा। कांग्रेस ने एक सवाल भी उठाया, अगर नक्सलवाद की बढ़ती वारदात के बाद केंद्र अनुच्छेद 355 के तहत एडवाइजरी जारी कर दे और कार्रवाई के लिए अपनी ओर से कोई कदम उठाए। तो क्या विपक्ष स्वागत करेगा? तब तो विपक्ष हो या मीडिया, आलोचना पर उतर आएंगे। ऐसे में नक्सलवाद को और शह मिल जाएगी। सो बेहतर यही, संविधान के तहत केंद्र-राज्य अपनी-अपनी जिम्मेदारी निभाएं। अब कांग्रेस की यह दलील, तो क्या चिदंबरम को संविधान की समझ नहीं? चिदंबरम ने ही तो एलान किया था, तीन साल में नक्सलवाद का सफाया कर देंगे। पिछले महीने छह अप्रैल को दंतेवाड़ा में सीआरपीएफ के 76 जवान मारे गए। तो चिदंबरम ने गृहयुद्ध बता मुंहतोड़ जवाब का खम ठोका था। पर जबसे दिग्विजय ने लेख लिखा। सोनिया ने कांग्रेसजन के नाम संदेश दिया। चिदंबरम सचमुच असहाय हो गए। सो चिदंबरम ने साफ कह दिया- सामूहिक बुद्धिमता निजी फैसले से हमेशा बेहतर होती। सचमुच चिदंबरम हवाई हमले की राज्यों की मांग से सहमत। पर अपने ही राजी नहीं। सो अपनी मजबूरी का इजहार किया। तो अलग-थलग पड़ गए। पर सिर्फ नक्सलवाद ही राजनीति का शिकार नहीं। अफजल गुरु की फाइल पर शीला और केंद्र में नूरा-कुश्ती। अब कांग्रेस की दलील, सीधे अफजल को फांसी दी। तो गलत मैसेज जाएगा। सो पहले शुरुआत की दो-चार फाइल निपटाएंगे। फिर माहौल बना अफजल को लटकाएंगे। क्या किसी आतंकवादी, वह भी लोकतंत्र के सबसे बड़े मंदिर संसद पर हमले के मास्टर माइंड को फांसी की सजा देने से कानून व्यवस्था बिगड़ जाएगी? यही दलील देकर तब जम्मू-कश्मीर के सीएम गुलाम नबी आजाद ने अफजल की फांसी रुकवाई थी। अब सीएम उमर अब्दुल्ला दबाव बना रहे। सचमुच यह कैसी व्यवस्था। जहां अफजल को सजा सुनाने में नीचे से ऊपर तक सभी अदालतों को मिलाकर कुल 31 महीने लगे। शीला ने दो लाइन की ओपिनियन देने में 43 महीने लगा दिए। पर अड़चनें अभी खत्म नहीं। सो नक्सलवाद हो या आतंकवाद, राजनीति की बहस अनंता।
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19/05/2010

Tuesday, May 18, 2010

चिदंबरम और गडकरी का गांडीव समर्पण

तो सफेद खून वालों का इलाज कैसे होगा। नक्सलवादी अब आमजन का भी खून बहाने लगे। कभी दंतेवाड़ा, कभी जगदलपुर, कभी लालगढ़ और न जाने करीब 12 राज्यों के 200 जिलों में कब जमीन रक्तरंजित हो जाए, पता नहीं। पर राजनीति से रंजित दिग्विजय सिंह जैसों का हाथ अभी भी नक्सलियों के साथ। वैसे भी जिसके सिर सोनिया का हाथ हो। वह चिदंबरम से क्या, खुदा से भी खौफ न खाए। भले नक्सलवादी सुरक्षा बलों को मारते रहें। आम नागरिक का खून बहाते रहें। देश में ही व्यवस्था के खिलाफ हिंसात्मक जंग जारी रखें। फिर भी दिग्विजय सिंह का खून नहीं खौलेगा। सोमवार को नक्सलियों ने मुसाफिर बस उड़ा दी। बस में सवार 16 एसपीओ और 15 मुसाफिरों की मौत हो गई। पर दिग्विजय का दिल है कि मानता नहीं। अभी भी नक्सलियों पर सख्ती के पक्ष में नहीं। मंगलवार को दो-टूक कहा- अगर सेना का इस्तेमाल हुआ। तो उसका भी वही हश्र होगा, जो पैरा मिलिट्री फोर्स का हुआ। ताजा घटना से कुछ दिन पहले की दिग्विजय की दलील सुनिए। नक्सलियों से पार पाना इतना आसान नहीं। बकौल दिग्विजय, दो हेलीकॉप्टर दुर्घटनाग्रस्त होकर जंगलों में गिरे थे। तो एक 28 दिन बाद मिला, एक महीने भर बाद। दिग्गी राजा का मतलब, पहले विकास हो, फिर कार्रवाई की बात। यानी फिर नक्सलवाद की जड़ तक पहुंचने का राग। पिछले महीने छह अप्रैल को नक्सलियों ने दंतेवाड़ा में 76 जवान मार गिराए। अपने होम मिनिस्टर पी. चिदंबरम ने गृह युद्ध बता मुंहतोड़ जवाब का एलान किया। तो हफ्तेभर बाद दिग्विजय सिंह ने लेख लिख दिया। चिदंबरम की नीति पर सवाल उठाए। पर कांग्रेस ने पल्ला झाड़ा। तो लगा, दिग्विजय अलग-थलग पड़ गए। पर हाथ कंगन को आरसी क्या, पढ़े-लिखे को फारसी क्या। पिछले शुक्रवार कांग्रेस का मुख पत्र जारी हुआ। तो सोनिया गांधी ने कांग्रेसजन के नाम लिखी चिट्ठी में दिग्विजय राग ही उवाचा। सोनिया ने भी नक्सलवाद की जड़ तक पहुंचने को जरूरी बताया। पिछड़े आदिवासी जिलों में विकास के न पहुंचने पर चिंता जताई। पर कोई पूछे, आजादी के 63 साल में भी विकास हर जगह नहीं पहुंचा, तो दोषी कौन? अब यह बहस का अलग मुद्दा। पर नक्सलवाद की जड़ तक कोई कैसे पहुंचे, जब खुद नक्सली अपनी जड़ों में मट्ठा डाल रहे। अब क्या नक्सलियों के डर से आम नागरिक बस में भी सफर करना बंद कर दे। अगर नक्सली भी आम नागरिक को ही निशाना बनाने लगे। तो फिर आतंकवादी और नक्सलियों में क्या फर्क? सुकमा जा रही यात्री बस सुरक्षा ड्यूटी की बस नहीं थी। जिस रास्ते पर विस्फोट किया, वह पक्की सडक़ थी। सो सोमवार को ही चिदंबरम ने गांडीव समर्पण कर दिया। नक्सलवाद के खिलाफ चिदंबरम का रुख बेहद सख्त। पर अपनों के बिछाए लैंड माइन से नहीं जूझ पा रहे चिदंबरम। तभी तो जेएनयू और सीआईआई जाकर चिदंबरम को भी दिग्विजय की लाइन बोलनी पड़ी। अब मंगलवार को चिदंबरम ने बातचीत की पेशकश कर दी। कहा- सिर्फ 72 घंटे नक्सली हिंसा रोक दें। तो सरकार बातचीत को तैयार। पर सिर्फ पेशकश में चिदंबरम की लाचारी नहीं दिख रही। अलबत्ता लाचारी का असली दांव सोमवार को ही खेल गए। कह दिया- नक्सलियों से निपटने के लिए मेरे अधिकार सीमित। मैं सिर्फ उन अधिकारों का इस्तेमाल कर सकता हूं, जो मुझे दिए गए हैं। अब देश का होम मिनिस्टर ऐसी लाचारी भरा बयान दे, तो फिर आम नागरिक की सुरक्षा किसके भरोसे? सो बीजेपी के अरुण जेतली ने अब पीएम से रुख पूछ लिया। जब कांग्रेस में इतना कनफ्यूजन। तो बेहतर होगा, पीएम जवाब दें। जेतली ने साफ कहा- आधे-अधूरे मन से लड़ाई नहीं लड़ी जा सकती। वाकई देश के गृह मंत्रालय की ऐसी दयनीय स्थिति क्यों? क्या नक्सली ऐसे ही खून बहाते रहेंगे और हम जड़ में जाने या विकास का ढोल पीटकर बहस करते रहेंगे? मरने वाले आम नागरिक का खून लाल, तो क्या नक्सलवादियों के हमदर्द का खून सफेद? चिदंबरम ने यह भी सवाल उठाया, अब हमदर्दों को जवाब देना होगा। सचमुच सोनिया हों या मनमोहन, देश की जनता को जवाब चाहिए। देश आरपार की लड़ाई चाह रहा। सो मंगलवार को पीएम ने उच्च स्तरीय मीटिंग ली। तो क्या चिदंबरम को फ्री हैंड मिलेगा? सोनिया के रुख के बाद कम से कम ऐसा तो नहीं लग रहा। चिदंबरम के दृष्टिकोण की कायल बीजेपी भी। पर कांग्रेस में चिदंबरम घायल शहीद की हालत में। तो बीजेपी में भी नितिन गडकरी का वही हाल। जब कुर्सी संभाली, तो जैसा हर संघी बौद्धिक झाड़ता। गडकरी ने भी खूब झाड़ी। पर डी-4 नेताओं के सामने एक न चली। सो छह महीने बीतने को, पर अभी तक सारे अहम फैसले पेंडिंग पड़े। टीम में किसी को अभी तक जिम्मेदारी नहीं मिली। मोर्चे भी अपनी बदहाली पर रो रहे। एकाध फैसला हुआ भी, तो टेस्ट क्रिकेट के अंदाज में। झारखंड में वही हुआ, जो शिबू ने चाहा। घुटना टेककर बीजेपी 28-28 महीने की सरकार बनाने पर राजी हो गई। पद पर किसी नए व्यक्ति के लिए छह महीने हनीमून पीरियड माना जाता। पर गडकरी छह महीने बीतने से पहले ही छुट्टी पर चले गए। विदेश दौरे पर सवाल उठने लगे। तो गडकरी ने बयान जारी कर दिया- स्टडी टूर पर यूरोप जा रहे। याद है ना, गोविंदाचार्य ने भी स्टडी के लिए ही छुट्टी ली थी। सो कुल मिलाकर चिदंबरम और गडकरी की हालत एक जैसी। सोच है, पर अपनों का साथ नहीं। सो दोनों का बयान, गांडीव समर्पण ही समझिए।
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18/05/2010

Monday, May 17, 2010

कुम्हलाने लगा विकल्प, पर दोष जनता के सिर

अब कसाब के बहाने अफजल पर नूराकुश्ती शुरू हो गई। कसाब को सजा से पहले ही होम मिनिस्ट्री ने अफजल की फाइल ढूंढनी शुरू की। तो दिल्ली की शीला सरकार को चिट्ठी गई। पूछा गया, कई बार याद दिलाया जा चुका है। पर सरकार का जवाब नहीं आया। सो सरकार अपनी राय जल्द केंद्र को भेजे। पर जवाब तो तब आएगा, जब शीला को चिट्ठी मिलेगी। शीला दीक्षित ने दो-टूक कह दिया- अफजल पर होम मिनिस्ट्री से न चिट्ठी, न कोई संदेश। वैसे भी अभी चार साल से ही फाइल शीला के पास। वाकई चिट्ठी तो भेजी गई दिल्ली के होम सैक्रेट्री को। सो शीला क्या जानें। वैसे भी शीला को अपने होम सैक्रेट्री पर कितना एतबार, आप देख लो। जेसिका लाल हत्याकांड का दोषी मनु शर्मा हरियाणा के वरिष्ठ कांग्रेसी नेता विनोद शर्मा का बेटा। पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले से पहले मनु ने मां की बीमारी के नाम पर पैरोल मांगी थी। दिल्ली के होम सैक्रेट्री ने पंद्रह दिन की सिफारिश की। पर शीला की मेहरबानी देखिए, पैरोल एक महीने का दे दिया। यानी होम सैक्रेट्री की सिफारिश महज संवैधानिक मजबूरी, फैसला तो शीला ने पहले ही कर लिया था।
पिछले साल अप्रैल में शीला ने लोकसभा चुनाव निपटने के बाद कदम उठाने का भरोसा दिलाया। पर साल बीतने को, कोई फैसला नहीं लिया। वैसे भी शीला को आम आदमी को तड़पाने से फुरसत मिले, तो अफजल की फाइल पर सोचें। तीसरी बार सीएम बनते ही शीला को काम से फुरसत ही नहीं मिल रही। पहले बसों का किराया बढ़ाया। महंगाई आसमान छूने लगी। तो राशन-पानी की दुकान लगाई। रसोई गैस, सीएनजी की दरों में इजाफा किया। पानी का बिल तिगुना कर दिया। प्रणव दा ने आम बजट में पेट्रोल-डीजल की कीमतें बढ़ाईं। तो शीला ने भी काफी मेहनत के बाद दाम बढ़ा दिए। दूध-दही, घी, साग-सब्जी की कीमतें थोड़ी-थोड़ी कर बढ़ाईं। अब सोमवार को प्रॉपर्टी की डॉक्यूमेंटेशन फीस सौ रुपए से बढ़ाकर 20 हजार रुपए कर दी। अब कोई इतनी मेहनत करे, फिर भी नाम न ले, तो शीला के साथ न्याय नहीं। पहले चुनाव में व्यस्त थीं। अब कॉमन वैल्थ गेम्स की तैयारी में। सो अफजल पर आई-गई चिट्ठी कहीं दब गई होगी। तभी तो सोमवार को बीजेपी ने पूछ लिया। कहीं ऐसा तो नहीं शीला दीक्षित अफजल को आतंकी नहीं, पर्यटक मान रही हों? अपने संविधान के तहत यह प्रावधान कि माफी याचिका पर उस सरकार की राय ली जाती, जहां अपराध हुआ हो। अब दिल्ली-मुंबई की जनता की राय लो। तो अफजल-कसाब के बारे में जनता की क्या राय होगी, क्या शीला नहीं जानतीं? पर कोई जनता की सोचे, तब कोई बात हो। यहां तो कॉमन वैल्थ के नाम पर किसके वारे-न्यारे हो रहे, पता नहीं। पर बेचारा आम आदमी लुटता-पिटता जा रहा। तभी तो स्टेशन पर भगदड़ हुई, आम यात्री मारा गया। पर ममता यात्रियों को ही जिम्मेदार ठहरा रहीं। राजनीति की ये दो बड़ी महिलाएं संवैधानिक पद पर आसीन। पर क्या सोच सचमुच आम आदमी के हित में? ममता को रेल मंत्रालय नहीं, रायटर्स बिल्डिंग की आस। सो दिल्ली की बजाए कोलकाता में अधिक समय बितातीं। नई दिल्ली स्टेशन पर भगदड़ मची। पर ममता को बंगाल के स्थानीय चुनाव से फुरसत नहीं। आखिर क्या हो गया है अपने नेताओं को। इन नेताओं के घर राजनीति की किस चक्की का आटा पहुंचता, जो खाते ही नेता बौरा जाते। आप खुद देखिए, महंगाई बढ़ी, तो शीला ने कहा- लोगों की आमदनी भी बढ़ी। ममता अपना महकमा संभाल नहीं पा रहीं। तो आम यात्री को ही जिम्मेदार बता दिया। झारखंड में शिबू सोरेन कुर्सी संभाल नहीं पा रहे। तो जनता को ही जिम्मेदार ठहरा रहे। शरद पवार ने तो महंगाई पर आम आदमी के खाने-पीने की आदत में बदलाव और अधिक खाने की प्रवृत्ति को वजह बता दिया था। अब अगर स्टेशन की भगदड़ की घटना को लें। तो नवंबर 2005 में ऐसी ही भगदड़ मची थी। तब जांच कमेटी ने सिफारिश की थी। प्लेटफार्म से वेंडर कम करो। भीड़ की मॉनीटरिंग कैमरे से हो। आखिरी वक्त में प्लेटफार्म न बदले जाएं। पर इतवार को रेलवे ने आखिरी वक्त में प्लेटफार्म बदला। सो आपाधापी में जो हुआ, सबने देखा। क्या ममता को नहीं मालूम, कैसे स्टेशन पर जनरल डिब्बे की सीटें बिकती हैं? गरीब और इज्जत की बात तो खूब करतीं। पर कभी इस ओर ध्यान क्यों नहीं? क्या ऐसे बनेगा विश्व स्तरीय स्टेशन? दिल्ली मैट्रो की व्यवस्था ही देखिए। रोजाना आठ से दस लाख मुसाफिर सफर करते। पर ऐसी अव्यवस्था क्यों नहीं? सो ममता हों या शीला, गुरुजी हों या पवार, एक खतरनाक प्रवृत्ति दिख रही। विजनरी नेताओं का दौर अब खत्म हो चुका। शेखावत, ज्योति बसु, वाजपेयी, चंद्रशेखर जैसी शख्सियत सक्रिय राजनीति में नहीं। एक वक्त था, शेखावत सती प्रथा के खिलाफ खम ठोककर खड़े हो गए। भले पूरा समाज खिलाफ हो गया। अब अपने भैरोंसिंह शेखावत नहीं रहे। राजनीति ही नहीं, इंसानियत की मिसाल थे शेखावत। पर अब नया विकल्प क्या नवीन जिंदल जैसा। पढक़र आए अमेरिका से और वोट की खातिर खड़े हो गए थाप के साथ? हरियाणा में ही बंसीलाल थे। भले चुनाव हार गए, पर मुफ्त बिजली नहीं दी। मुफ्तखोरी का हश्र देख जनता ने आखिर बंसीलाल पर ही भरोसा जताया। अब जबसे वाजपेयी अस्वस्थ। बीजेपी में कैसी मारकाट मची, सभी जानते। सचमुच बड़े दिल, बड़ी सोच वाले नेता अब राजनीति में नहीं रहे। भारतीय राजनीति में विकल्प अब खिलने से पहले ही कुम्हला रहा। अब नक्सलियों ने बस उड़ा दी। पर सरकार की नीतियां अभी भी ढुलमुल ही।
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17/05/2010

Friday, May 14, 2010

तो सोनिया का मुखौटा साबित हुए दिग्विजय

तो अब राज न पूछो नीति का। राजनीतिक दलों की नीतियां सत्ता और वोट के हिसाब से तय होने लगें। तो लोकतंत्र सिर्फ अध्यात्म का विषय भर रह जाएगा। झारखंड का झंझट सत्रहवें दिन भी नहीं सुलझा। तो गुरुजी का धैर्य जवाब दे गया। गुरुजी ने बहुत गुरुअई की, पर तू डाल-डाल मैं पात-पात का खेल खत्म नहीं हुआ। सो शिबू ने राजनीति के नंगेपन का ठीकरा जनता के सिर फोड़ दिया। शिबू मौजूदा हालात के लिए जनता के खंडित जनादेश को कोस रहे। पर झारखंड की जनता ने किसको नहीं आजमाया। झारखंड बना, तो बीजेपी ने बाबूलाल मरांडी को सीएम बना दिया। मरांडी जनता में लोकप्रिय होने लगे, कद और बढऩे लगा। तो अंदरूनी राजनीति के शिकार हो गए। फिर अर्जुन मुंडा सीएम बनाए गए। पहली सरकार ने टर्म पूरा किया। पर जब अलग झारखंड का पहला चुनाव हुआ। तो बीजेपी कमजोर हुई। पर जोड़तोड़ से बीजेपी ने आंकड़ा जुटा लिया। तो कांग्रेस ने तबके गवर्नर सिब्ते रजी से खेल करा दिया। शिबू सीएम हो गए। पर मामला सुप्रीम कोर्ट गया, तो शिबू को हटना पड़ा। फिर अर्जुन भी गाड़ी नहीं खींच सके। तो कांग्रेस ने लिम्का बुक ऑफ रिकार्ड्स में नाम दर्ज करा दिया। एकला एमएलए मधु कोड़ा को सीएम बनवा दिया। फिर शिबू-कांग्रेस-लालू सबने मिलकर मलाई काटी। अब ई.डी. की जांच चल रही। जिसमें मधु कोड़ा पर चार हजार करोड़ की संपत्ति अर्जित करने का आरोप। तब शिबू को जनता क्यों याद नहीं आई? शिबू खुद तीन बार सीएम हो चुके। पर कभी एमएलए क्यों नहीं बन पाए? जनता ने सबको देख लिया। जब मिलीजुली सरकार में कोई अकेला चार हजार करोड़ जमा कर ले। तो सोचो, किसी एक की सरकार होगी, तो क्या होगा? कोई मधु कोड़ा जैसा हुआ, तो कहीं पूरा झारखंड ही न बेच दे। पर मधु कोड़ा गए, तो कांग्रेस ने गवर्नर सिब्ते रजी के जरिए राज किया। अब सिब्ते रजी भी जांच के घेरे में। अब कोई पूछे, इसमें जनता का क्या कसूर? जनता तो यही देखना चाह रही, राजनीतिक दल कितनी ईमानदारी से झारखंड का विकास चाह रहे। पर सत्ता लोलुपों की नीति सिर्फ राज करने तक ही सीमित। तभी तो जो बीजेपी कभी नीति की बात करती थी। चाल, चरित्र, चेहरे की बात करती थी। झारखंड में अपना राज जमाने के चक्कर में चाल, चरित्र, चेहरे का असली राज खोल दिया। सो शुक्रवार को कांग्रेस ने फिर रंग दिखाया। पहले रांची में गवर्नर एम.ओ.एच. फारुख ने सरकार को बड़े फैसले न करने की हिदायत दी। तो इधर कांग्रेस ने एलान कर दिया। अगर जल्द झारखंड का झंझट नहीं सुलझा, तो कांग्रेस संवैधानिक उपचार की मांग करने को मजबूर होगी। सीधे-सपाट शब्दों में कहें, तो कांग्रेस ने धमकी दे दी। पर शकील अहमद से पूछा, कब ऐसी मांग करोगे। तो जैसे बीजेपी कोई समय नहीं बता पा रही, वही कांग्रेस का भी हाल। अगर बीजेपी की नीति का राज झारखंड ने बेनकाब कर दिया। तो कांग्रेस की नीति पर से राज का परदा खुद सोनिया गांधी ने उठाया। दंतेवाड़ा नक्सली हमले में सीआरपीएफ के 74 जवान शहीद हुए। तो समूचा देश हिल उठा। तब कांग्रेस हो या बीजेपी, हर मंच से यही आवाज उठी। नक्सलियों ने देश के खिलाफ जंग छेड़ी। सो मुंहतोड़ जवाब दिया जाए। खुद होम मिनिस्टर चिदंबरम ने यही खम ठोका। पर छह अप्रैल को नक्सली हमला हुआ। ठीक आठवें दिन 14 अप्रैल को कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह का सार्वजनिक लेख छपा। चिदंबरम को दिग्विजय ने बौद्धिक अकड़ू, जिद्दी की संज्ञा दे डाली। नक्सलवाद से निपटने के चिदंबरमी रुख की मुखालफत की। चिदंबरम को केबिनेट की सामूहिक जिम्मेदारी याद कराई। पर मामले ने तूल पकड़ा, तो कांग्रेस ने दिग्विजय के लेख से दूरी बना ली। अब शुक्रवार को कांग्रेस के मुख पत्र कांग्रेस संदेश में सोनिया ने दिग्विजय का ही स्टैंड दोहराया। यों आतंकवाद के खिलाफ सोनिया ने चिदंबरम के रुख को ही दोहराया। पर नक्सलवाद के बारे में लिखा- नक्सलवाद की जड़ों तक पहुंचना जरूरी। नक्सलवाद का बढऩा इस बात का परिचायक कि हमारे विकास की पहल निचले तबकों तक ठीक से नहीं पहुंच पा रही। खास तौर से सबसे पिछड़े आदिवासी जिलों तक। इसलिए हमारी सरकार सबसे अधिक पिछड़े जिलों के लिए और लक्षित विकास योजनाएं लागू कर रही है। हू-ब-हू यही बात दिग्विजय ने अपने लेख में कही थी। तो उसी दिन आपको बताया था, दिग्विजय की यह निजी राय नहीं। अब शुक्रवार को खुद सोनिया ने साबित कर दिया। कलम दिग्विजय की थी, पर शब्द सोनिया के। सो शुक्रवार को दिग्विजय गदगद दिखे। पर शकील अहमद की दलील, चिदंबरम भी इसी रुख के। सो सवाल उठाना सही नहीं। पर दिग्विजय के लेख में सब साफ था। चिदंबरम नक्सलवाद को लॉ एंड आर्डर की तरह डील कर रहे थे। अब सोनिया गांधी का संपादकीय तो पहले ही तैयार था। सो तीन दिन पहले सीआईआई की मीटिंग में चिदंबरम ने कॉरपोरेट हस्तियों से नक्सली क्षेत्र में विकास से जुडऩे की अपील की। यानी सोनिया का हाथ दिग्विजय के साथ दिखा। तो चिदंबरम भी ढर्रे पर आ गए। सोनिया ने लक्ष्मण रेखा खींच दी। वैसे भी सोनिया अपनी नीतियों का राज जब भी खोलतीं, जुबान दिग्विजय की होती। अब दिग्विजय हिंदू आतंकवाद को साबित करने में जुटे। सो आप खुद देख लो, राजनीतिक दलों की नीति का क्या है राज।
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14/05/2010

Thursday, May 13, 2010

अब तो नेता खुद ही एक-दूसरे को जानवर मानने लगे

अपने शहरी विकास मंत्रालय ने सोमवार को साफ-सुथरे शहरों की रपट जारी की थी। तो चंडीगढ़ अव्वल आया। तब किसी ने सोचा भी न होगा, एक दिन बाद ही चंडीगढ़ राजनीतिक गंदगी के लिए सुर्खियों में आएगा। पर संयोग कहें या कुछ और, बुधवार को बीजेपी अध्यक्ष नितिन गडकरी ने चंडीगढ़ को इसका हिस्सा बना दिया। चंडीगढ़ में गडकरी की पहली रैली थी। पर जोश में ऐसा होश खोया, लालू-मुलायम जैसे क्षेत्रीय दिग्गजों को कुत्ता बता गए। सोनिया गांधी का तलवा चाटने वाला कह दिया। सो राजनीतिक भूचाल मचा। तो गडकरी ने जो उगला था, फौरन निगल लिया। विरोधियों की धार तेज न हो, सो हाजमा ठीक करने को माफी भी मांग ली। पर गडकरी की दलील देखो, लालू-मुलायम को कुत्ता नहीं कहा। अलबत्ता मुहावरे का इस्तेमाल किया। पर गडकरी ने भाषाई मर्यादा तोड़ी भी, तो लालू-मुलायम जैसों के खिलाफ। सो लालू ने फौरन जवाब दिया- ऐसा मुहावरा संघ की डिक्शनरी में होता होगा। उन ने गडकरी को संस्कारों का ऐसा सबक सिखाने का खम ठोका, जिससे गडकरी कभी ऐसी भाषा का इस्तेमाल न कर सकें। अब सोचो, लालू-मुलायम संस्कार सिखाएंगे, तो गडकरी का क्या होगा? पर मुलायमवादी कोर्ट में घसीटने की तैयारी कर रहे। कांग्रेस ने तो गडकरी की राजनीतिक हैसियत पर ही सवाल उठा दिए। शकील अहमद और मनीष तिवारी बोले- गडकरी अपने पद के लिए फिट नहीं। खुद भी ऐसा मान चुके, सो ताजा टिप्पणी उनकी संकीर्ण मानसिकता की परिचायक। यानी राजनीति में मौके के हिसाब से नैतिकता और मर्यादा तय होने लगीं। गडकरी की टिप्पणी को लालू ने लोकतंत्र को कलंकित करने वाला बताया। तो कोई पूछे, चौबीस अगस्त 2006 को लोकतंत्र के सबसे बड़े मंदिर लोकसभा में लालू-प्रभुनाथ ने किसका नाम रोशन किया था? मां-बहन की गाली से लेकर किसी राहगीर को दोनों एक-दूसरे का बहनोई बता रहे थे। सदन में जमकर हाथापाई हुई थी। लोकसभा का हालिया किस्सा ही देख लो। बीजेपी के अनंत कुमार ने लालू को गद्दार कह दिया। पर खुद माफी मांगने को तैयार नहीं हुए। सो सुषमा स्वराज ने सदन में माफी मांगी। तृणमूल के सुदीप बंदोपाध्याय ने माकपाई वासुदेव आचार्य पर अभद्र टिप्पणी कर दी। तो विपक्षी खेमे के सभी नेता सदन में नैतिकता झाडऩे लगे। पर भाषाई मर्यादा बेलगाम होने के किस्से यहीं खत्म नहीं। जब एनडीए सत्ता में था, 2004 में चुनावी शंखनाद हुआ। तो प्रमोद महाजन ने सोनिया गांधी की तुलना मोनिका लेविंस्की से की थी। नरेंद्र मोदी ने राहुल को जर्सी बछड़ा, तो सोनिया को इटली की.... कह दिया था। सो तब कांग्रेस नैतिकता का पाठ पढ़ा रही थी। यों तब वाजपेयी राज था, सो वाजपेयी ने अपने नेताओं को फटकार लगाने में तनिक भी देर नहीं की थी। फिर गुजरात चुनाव में मर्यादा की हदें खूब लांघी गईं। सोनिया गांधी ने नरेंद्र मोदी को मौत का सौदागर कहा। दिग्विजय सिंह ने हिंदू आतंकवाद का जुमला दिया। तो जवाब में मोदी ने भी कांग्रेसियों को सोहराबुद्दीन जैसों का पनाहगार बता दिया। अब बुधवार को सिर्फ गडकरी ने नहीं, मध्य प्रदेश में कांग्रेस ने लोकलाज की परवाह नहीं की। यों गडकरी की भावना सोलह आने सही। लालू-मुलायम ने निजी स्वार्थ की खातिर जिस तरह गिरगिट की तरह रंग बदले। उसे जनता की राजनीति तो नहीं कह सकते। एटमी डील हो या महंगाई पर कटौती प्रस्ताव, लालू-मुलायम सुर बदल सत्ता की गोद में जाकर बैठ गए। अब लालू-मुलायम की राजनीति सीमित दायरे में। वन मैन आर्मी वाली पार्टी का वैसे भी कब, क्या स्टैंड होगा, मालूम नहीं। पर गडकरी से ऐसी जुबान की उम्मीद नहीं थी। सो बाद में उन ने माफी मांग ली। पर मध्य प्रदेश में कांग्रेसी एमएलए मर्यादा का क, ख, ग भी भूल गए। स्वर्णिम मध्य प्रदेश के नाम पर विधानसभा का विशेष सत्र चल रहा। पर कांग्रेसी सत्र का बॉयकाट कर रहे। विधानसभा की सीढ़ी पर धरना दे रहे। बुधवार को बीजेपी की एमएलए ललिता यादव थोड़ी देर से विधानसभा पहुंचीं। तो एक कांग्रेसी एमएलए ने चुटकी ली, इतनी लेट हो गईं, कैसे स्वर्णिम मध्य प्रदेश बनेगा। बीच में दूसरे ने टिप्पणी कर दी, ब्यूटी पार्लर में देर हो गई होगी। तीसरे ने जो कहा, उसे लिख नहीं सकते। सो बात विधानसभा स्पीकर ईश्वर दास रोहाणी तक पहुंची। सदन में ललिता रोईं। तो चैंबर में स्पीकर भी फूट-फूट कर रोए। फिर भी कांग्रेस ने गुरुवार को मध्य प्रदेश की घटना पर चुप्पी साधी। पर गडकरी को नैतिकता सिखा रही। आखिर यह राजनीति की कैसी मर्यादा? एक वक्त था, जब नेहरू अपने विरोधियों के खिलाफ चुनाव में या तो उम्मीदवार नहीं देते थे या कमजोर उम्मीदवार उतारते थे। वाजपेयी तक मर्यादा विरोधी और शत्रु में फर्क रहा। पर अब राजनीति निजी रंजिश वाली हो चुकी। राजनीतिक दलों की विचारधारा मर चुकी। सो सिर्फ वोट के लिए सारे तिकड़म हो रहे। तभी तो अनंत कुमार हों या लालू-मुलायम-सुदीप-मणिशंकर जैसे दिग्गज नेता। जिनका राजनीतिक कैरियर दो-तीन दशक पुराना हो चुका। पर स्तर गिर चुका। अब तो बड़े मियां ही सुभान अल्लाह। सोचो, छोटे मियां क्या करेंगे। कलराज मिश्र ने सही फरमाया, नेता संयम में रहकर भाषा का प्रयोग करें, क्योंकि नेता जनता से जुड़ा होता है और जनता पर नेता की बात का फर्क पड़ता है। सो बेहतर होगा, अब नेता जनता को दोष न दें। अब तो खुद नेता ही एक-दूसरे को जानवर बता रहे। तो सोचो, राजनीति का स्तर क्या रह गया।
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13/05/2010