बहरी सरकार तो आम आदमी का दर्द नहीं ही सुन रही थी। अब अगर सरकार अंधी नहीं, तो शायद भारत बंद की झलक देख ली होगी। विपक्ष के बिखराव का फायदा उठा कीमतें तो बढ़ा दीं। पर विपक्ष के बिखराव के बाद भी बंद का ऐसा असर, सरकार के लिए एक इशारा। लालू-माया तो साथ नहीं आए। रामविलास पासवान हैप्पी बर्थ-डे का केक बनवाने में मशगूल रहे। लेफ्ट ने अलग डफली बजाई। फिर भी बंद सफल रहा, तो यह जनता की ओर से बहरी, गंूगी, अंधी सरकार को संदेश। धरती से आकाश तक महंगाई के खिलाफ जनता ने आक्रोश का इजहार किया। पर महंगाई पर मंथन के बजाए सरकार ने रणनीतिक अभियान छेड़ दिया। शुरुआत तो दो दिन पहले ही हो गई, जब देश भर के अखबारों में सरकारी इश्तिहार छपे। मुरली देवड़ा के मंत्रालय से छपे इश्तिहार में कहा गया- 'भारत बंद, समस्या का समाधान नहीं।' यानी महंगाई से कांग्रेस और सरकार का भी तेल निकल रहा। पर दूरदृष्टा नेतृत्व का अभाव संकट बढ़ा रहा। अगर बंद बेमानी होता, तो सरकार इश्तिहारबाजी नहीं करती। सचमुच ऐसा पहली दफा हुआ होगा, जब विपक्ष के बंद के खिलाफ सरकार ने ऐसे इश्तिहार छपवाए। पर सवाल, अगर भारत बंद समाधान नहीं, तो सरकार ने महंगाई के लिए क्या किया? माना, बंद समाधान नहीं। पर सरकार कभी इश्तिहार देकर यह क्यों नहीं बताती, जबसे अर्थशास्त्री मनमोहन पीएम बने, महंगाई सिर्फ बढ़ती ही क्यों जा रही? पिछले छह साल में कभी भी ऐसा क्यों नहीं हुआ, जब महंगाई कुछ महीनों के लिए भी कम हुई हो और जनता ने राहत की सांस ली हो। आखिर ऐसा क्यों, जो सिर्फ महंगाई बढ़ती ही जा रही? अब भले महंगाई को रोकने को सरकार ने कुछ नहीं किया। पर विपक्ष के बंद के आयोजन ने कम से कम इशितहारबाजी में कुछ नौकरशाहों-नेताओं के वारे-न्यारे तो कर ही दिए। कोई भी इश्तिहार बिना कमीशनखोरी के नहीं छपते। अगर सरकार सचमुच ईमानदार होती, तो करोड़ों रुपए इश्तिहार पर लुटाने की बजाए गरीबी पर चोट करने के लिए खर्च करती। पर सोमवार को बंद के असर ने सरकारी इश्तिहार को धता बता दिया। तो मीडिया के एक तबके में बंद के खिलाफ मुहिम शुरू हो गई। शरद यादव ने तो इसे सरकार मैनेजमेंट का ही हिस्सा बताया। नितिन गडकरी ने भी सवाल उठाए, जब विपक्ष सडक़ पर नहीं उतरता है, तो भी मीडिया सवाल उठाता है। अब सडक़ों पर उतरा, तो भी सवाल उठा रहा। उन ने मीडिया को दोनों हाथों से डफली बजाने वाला करार दिया। सचमुच विजुअल मीडिया ने लोकतंत्र के चौथे स्तंभ की भूमिका को धूमिल किया। अगर सरकार की मनमानी पर एतराज जताना विपक्ष की जिम्मेदारी, तो उससे भी बड़ी जिम्मेदारी मीडिया की। पर जिस दिन पेट्रोल-डीजल की कीमतें बढ़ीं, उसी शाम से लगातार विजुअल मीडिया मॉडल विवेका बाबाजी की आत्महत्या में घुसा हुआ। पल-पल की खबर दी जा रही। कहीं चैनल पर ऐसा नहीं दिखा, जो महंगाई के खिलाफ जनता को अपना मीडिया लामबंद कर रहा हो। लगातार विवेका बाबाजी को दिखाते रहे। तो ऐसा लगा, एक विवेका ने अपनी टीवी चैनलों को सचमुच बाबाजी बना दिया। सो बंद को बेमानी बताने वाले मीडिया के सवाल से शरद यादव भडक़े। उन ने पूछा- 'अगर बंद से महंगाई कम नहीं होगी, तो क्या टीवी चैनल पर राखी सावंत के ठुमके और महेंद्र सिंह धोनी की शादी की खबरों से महंगाई कम होगी?' सचमुच अपने मीडिया को शरद यादव ने आईना दिखाया। पर सरकारी हथकंडे का असर यहीं खत्म नहीं हुआ। शाम होते-होते एसोचैम जैसी संस्था ने बंद का आकलन कर दिया। बताया, भारत बंद से दस हजार करोड़ का नुकसान हुआ। पर कांग्रेस की अपनी ट्रांसपोर्ट एसोसिएशन ने सिर्फ ट्रकों का नुकसान 20 अरब बताया। तो किसी ने बीस हजार करोड़ का नुकसान बताया। यानी बहस का मुद्दा घुमाने की कांग्रेसी कोशिश जमकर हुई। यों बंद सचमुच सही नहीं। पर जब सरकार तानाशाही तेवर दिखाए, तो और क्या उपाय? कैसे इतवार को प्रणव बाबू ने ठसक से कहा- कीमतें वापस नहीं लेंगे। पीएम-देवड़ा तो पहले ही तेवर दिखा चुके। पर आजादी के छह दशक बाद भी देश सिर्फ पेट्रोल-डीजल पर ही निर्भर क्यों? क्यों नहीं गैस या बिजली आधारित या कोई और विकल्प ढूंढे गए? दीर्घकालिक नीति नहीं, सिर्फ पेट्रोलियम पर टेक्स का बोझ। फिर भी सरकार कीमत बढ़ोतरी को न्यायसंगत ठहरा रही। यह बेहयाई नहीं, तो और क्या? दूध के दाम फौरन बढ़ गए। पर कांग्रेस प्रवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी बंद का संदेश भांपने के बजाए संवैधानिक पाठ पढ़ा रहे। कहा- 'बंद करना जनविरोधी कदम। विरोध के और भी तरीके हो सकते। विपक्ष संसद में और मीडिया के जरिए आवाज उठा सकता। पर कांग्रेस भूल रही, मनमोहन राज में महंगाई पर संसद में बारह बार बहस हो चुकी। फिर भी महंगाई सचिन की तरह रिकार्ड बनाती गई। सिंघवी ने एक और दलील दी, जब कोई बीमार हो, तो कड़वी दवा जरूरी। अभी न्यूनतम दरें बढ़ाई हैं। पर सिर्फ आम आदमी ही कड़वी दवा क्यों पीये? सरकार या तेल कंपनियां क्यों नहीं? थोथे विकास का राग कब तक? आम आदमी के पेट में अन्न दाना नहीं और सरकार कह रही, आओ कॉमन वैल्थ गेम दिखाएं। कांग्रेसी मणिशंकर अय्यर ने हाल ही में सवाल उठाया था- 'यह कौन सा गेम हो रहा, जिसके लिए एक लाख कंडोम खेल गांव में स्टोर किए गए?' अब आप ही सोचो, जब सरकार ऐसी हो, तो बंद हो या आम आदमी की बंदगी, क्या उम्मीद रखेंगे। बंद हो या महंगाई, परेशान तो सिर्फ आम आदमी हो रहा।
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05/07/2010
Monday, July 5, 2010
Friday, July 2, 2010
तो सचमुच महंगी पड़ी अपनी कांग्रेस
तो दुंदुभी बज उठी। पांच जुलाई को महंगाई का पंचनामा होगा, जब समूचा विपक्ष भारत बंद करेगा। सो शुक्रवार का दिन विपक्षी दलों की प्रेस कांफ्रेंस के नाम रहा। नितिन गडकरी, शरद यादव, प्रकाश कारत और एचडी देवगौड़ा ने राजधानी में मोर्चा संभाला। तो राज्यों में विपक्षी दलों की स्थानीय इकाइयों ने। पर अपने लालू अबके भारत बंद में शामिल नहीं। मायावती तो पिछली दफा भी साथ नहीं थीं। पिछली 27 अप्रैल को लोकसभा में महंगाई पर कटौती प्रस्ताव आया। तो सिर्फ मायावती नहीं, दिन के उजाले में उसी दिन भारत बंद के जलसे में शामिल लालू-मुलायम भी सूरज ढलते ही सरकार के साथ हो गए। दिन में नारा दिया- जो सरकार निकम्मी है, वो सरकार बदलनी है। शाम होते ही नारा बदल गया- जो सरकार निकम्मी है, वो सरकार बचानी है। वैसे भी लालू की पार्टी आरजेडी का राष्ट्रीय वजूद संकट में। सो भारत बंद से लालू का क्या फायदा। उन ने तो दस जुलाई को बिहार बंद का एलान कर रखा। चलो यह भी अच्छा हुआ। कहते हैं ना, तेते पांव पसारिए, जेती लंबी सौर। लालू पिछली बार बिहार की सत्ता से बेदखल हुए। तो मनमोहन की पहली पारी में उम्दा ठौर मिल गया। पर अब न वह देवी रही, न कड़ाह रहा। अब तो लालू सिर्फ कराह रहे। केंद्र में न कांग्रेस पूछ रही, न बिहार में नीतिश के आगे दाल गल रही। पर बिन लालू-माया-पासवान भी अबके भारत बंद की जबर्दस्त तैयारी। पिछली दफा तो बीजेपी ने नखरे दिखाए थे। पर अब समझ आ गया, इतनी गर्मी में अकेले भीड़ जुटाने की कोशिश की। तो फिर कहीं गश खाकर न गिर जाएं। सो सबने एक साथ बंद में शामिल होना कबूल कर लिया। यों पिछली दफा संसद में मुलायम भी लालू-माया के साथ सरकार के साथ खड़े थे। पर अबके पांच जुलाई की तारीख का एलान सबसे पहले मुलायम ने ही किया। यों पहल शरद यादव के नेतृत्व में हुई। तो पहली बार लेफ्ट-बीजेपी साझा सडक़ों पर उतरने को राजी हो गए। पिछली बार बीजेपी की दलील थी, सिर्फ संसद तक ही साथ, सडक़ों पर साथ दिखना वोट बैंक का नुकसान करना होगा। सो पिछली दफा बीजेपी ने अलग रैली की। लेफ्ट की रहनुमाई में तथाकथित तीसरे मोर्चे ने भारत बंद किया। तो मनमोहन सरकार के कान पर जूं नहीं रेंगी। अलबत्ता अबके और मन भरके महंगाई बढ़ा दी। सो अबके साथ तो आए, पर होगा क्या। शुक्रवार को सीधे विपक्षी दलों के शीर्ष नेतृत्व ने कमान संभाली। तो मकसद एक ही था, कैसे बंद का श्रेय अपनी झोली में डालें। गडकरी ने तो अपने सभी राज्य यूनिटों से रपट भी ले ली। फिर बताया, भारत बंद एतिहासिक होगा। अब सोचिए, जब अकेले बीजेपी एतिहासिक बंद का दावा कर रही। तो समूचे विपक्ष का बंद क्या पौराणिक कहलाएगा? कहीं ऐसा तो नहीं, कोई पौराणिक लड़ाइयों का इतिहास टटोलना पड़े। शरद यादव ने तो एलान किया, यह जेपी आंदोलन और 1989 में विपक्षी एकता के बाद महंगाई के मुद्दे पर विपक्षी एकता की सबसे बड़ी कवायद, और यह बंद सरकार की इस गलतफहमी को दूर कर देगा कि विपक्ष बंटा हुआ है। सो सरकार जो चाहे मनमानी कर सकती। पर विपक्ष की यह एकता कब तक कायम रहेगी? क्या मुलायम भरोसे के लायक? मुलायमवादियों ने तो अभी से ही संकेत देने शुरू कर दिए। कह रहे- देश में कोई मध्यावधि चुनाव नहीं चाह रहा। यानी ममता बनर्जी महंगाई पर कड़ा रुख दिखाएं, तो भी मनमोहन सरकार की सेहत पर कोई खतरा नहीं। आखिर मुलायम किस दिन के लिए दुकान खोले बैठे। तभी तो कांग्रेस हो या मनमोहन के मंत्री, तेवर ऐसे दिखा रहे, मानो, देश में लोकशाही नहीं, हिटलरशाही चल रही। जब कीमतें बढ़ाईं, तो पेट्रोलियम मंत्री मुरली देवड़ा ने आम आदमी को भगवान भरोसे छोड़ा। पर शुक्रवार को बेंगलुरु में थे, तो वहीं से गरजे। तेल कंपनियां और सरकार बोझ क्यों सहेंगी। सो कीमतें वापस नहीं लेंगे, भले विपक्ष कितना भी विरोध कर ले। उन ने तो विपक्ष पर देश को गुमराह करने का आरोप लगाया। पर देवड़ा भूल रहे, महंगाई की मार ही इतनी, आम आदमी भला गुमराह होने वाली बातों पर कहां ध्यान दे पाएगा। अब कांग्रेस का बयान देखिए। इधर बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गडकरी ने महंगाई पर कुछ मौजूं सवाल उठाए। पूछा- पीएम को सिर्फ तेल कंपनियों की खस्ता हालत दिखती। क्या जनता की खस्ता हालत नहीं दिख रही? सरकार बताए, उसकी प्राथमिकता आम आदमी है या तेल कंपनी? उन ने सोनिया-राहुल से भी सवाल पूछे। महंगाई रोकने में अर्थशास्त्री पीएम क्यों नाकाम हो रहे। पर कांग्रेस का जवाब सुनेंगे, तो आप भी दांतों तले उंगली दबा लेंगे। कांग्रेस प्रवक्ता मनीष तिवारी तो गडकरी के किसी सवाल का जवाब नहीं दे पाए। पर गडकरी के कद को बौना बता दिया। कहा- गडकरी का राजनीतिक वजन इतना नहीं, जो इस मंच से जवाब दिया जाए। क्या कांग्रेस की नजर में पद की कोई गरिमा नहीं? अगर यही कांग्रेसी फार्मूला, तो फिर यह सवाल मनमोहन को लेकर भी उठ सकता। शायद कांग्रेस अभी भी उसी परंपरा की गुलाम, जहां कोई प्रधानमंत्री तो हो सकता, पर दस जनपथ से बड़ा नहीं। जो सवाल गडकरी ने पूछे, वह सवाल आज आम आदमी की जुबां पर। फिर भी सरकार और कांग्रेस को सिर्फ उन तेल कंपनियों की माली हालत दिख रही, जिनके कर्मचारी मोटी तनख्वाह-भत्ते पाते। हर साल लाभांश का चैक वित्तमंत्री को सौंपते, फोटू खिंचवाते। पर वह आम आदमी नहीं दिखता, जिसके पेट और पीठ में फर्क करना मुश्किल हो चुका। सो महंगी पड़ी कांग्रेस भले बीजेपी का गढ़ा हुआ नारा। पर आज दिल यह कहने को मजबूर, सचमुच महंगी पड़ी कांग्रेस।
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02/07/2010
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02/07/2010
Thursday, July 1, 2010
राजनीति में क्रिकेट मंत्री, क्रिकेट में कृषि मंत्री
तो शरद पवार अब इंटरनेशनल हो गए। गुरुवार को आईसीसी की अध्यक्षी संभाल ली। तो इस पद पर पहुंचने वाले दूसरे भारतीय हो गए। यों जगमोहन डालमिया जब आईसीसी से रिटायर हुए, तो बंगाल क्रिकेट एसोसिएशन की कुर्सी भी बामुश्किल नसीब हुई। पर पवार राजनीति के मंझे हुए खिलाड़ी। सो कब, कहां और कौन सा मोहरा बिठाना, डालमिया से बेहतर जानते। तभी तो बीसीसीआई के अध्यक्ष शशांक मनोहर, पर कोई भी फैसला बिना पवार के नहीं होता। पवार की यही खासियत, जिस रास्ते से होकर गुजरते, वहीं तूती बोलती। चाहे महाराष्ट्र की सियासत हो या यूपीए सरकार में कम सीट होने के बाद भी रुतबा या फिर दुधारू गाय बीसीसीआई। पर विवाद से भी पवार का गहरा नाता। आईपीएल के हमाम में कैसे पवार की पोल खुली, सबको मालूम। बतौर कृषि मंत्री कामकाज भले कांग्रेस को रास नहीं आए। पर यह पवार का पावर ही, जो दूसरे टर्म में भी कृषि के साथ-साथ खाद्य आपूर्ति का भारी-भरकम मंत्रालय लिए बैठे हुए। अबके पवार का पावर इंटरनेशनल हुआ। पर वहां भी विवाद की छाया पड़ गई। आस्ट्रेलिया के पूर्व पीएम जॉन हावर्ड उपाध्यक्ष बनना चाहते थे। ताकि दो साल बाद पवार का उत्तराधिकार मिल सके। पर एफ्रो-एशियाई देशों ने विरोध किया। हावर्ड की काबिलियत पर सवाल उठाए। तो आईसीसी ने भी आस्ट्रेलिया-न्यूजीलैंड के वोट से नए नाम मांग लिए। सो हावर्ड के हिमायती मैल्कम स्पीड खफा हो गए। स्पीड खुद आईसीसी की कमान संभाल चुके। पर 2008 में विवादों के साथ स्पीड का टर्म खत्म हुआ। अब हावर्ड की दावेदारी क्रिकेट की समझ न होने की वजह से खारिज हुई। तो मैल्कम स्पीड ने पवार पर निशाना साधा। कह दिया, पवार भी आईसीसी अध्यक्ष बनने के लायक नहीं। यों स्पीड की टिप्पणी महज भड़ास निकालना। पर स्पीड ने एक और बात कही- 'आईसीसी के अध्यक्ष बनने वाले शरद पवार भारत सरकार में कृषि मंत्री हैं, जो एक अरब बीस करोड़ लोगों के पेट भरने का गंभीर पूर्णकालिक काम है। वह अच्छे और साफ-सुथरी छवि के व्यक्ति हैं, लेकिन वह आईसीसी अध्यक्ष के तौर पर पार्ट टाइम ही काम करेंगे और अगर मेरी मानें, तो उन्हें क्रिकेट प्रशासन के बारे में अधिक जानकारी नहीं है। इसको देखते हुए कहा जा सकता है कि वह आईसीसी अध्यक्ष बनने के लायक नहीं हैं।' यों स्पीड ने बात सही कही, पर अपनी नजर में महज कल्पना। शरद पवार भले एक अरब बीस करोड़ लोगों के पेट से जुड़ा मंत्रालय संभाल रहे हों, पर दिल और दिमाग क्रिकेट में ही बसा। जब बीजेपी में प्रमोद महाजन जिंदा थे, तब आडवाणी-राजनाथ की ट्विन भारत सुरक्षा यात्रा चल रही थी। तब मुंबई-पुणे-सोलापुर के रास्ते में कई जनसभाएं हुईं। लोग आडवाणी से अधिक प्रमोद का भाषण सुनना पसंद करते थे। याद है, तभी प्रमोद महाजन ने शरद भाऊ को क्रिकेट मंत्री का तमगा दिया था। तब पवार बीसीसीआई के अध्यक्ष थे। यानी मैल्कम स्पीड ने जो 2010 में कहा, प्रमोद महाजन 2006 में ही खारिज कर चुके। पवार अगर सचमुच अपनी संवैधानिक जिम्मेदारी निभाते, तो देश खाद्यान्न संकट के कगार पर खड़ा नहीं होता। सही मायने में पवार का पार्ट टाइम क्रिकेट नहीं, अलबत्ता मंत्री पद की जिम्मेदारी। पर राजनीति के धुरंधर पवार के लिए इससे बड़ी विडंबना क्या होगी। जो क्रिकेट वाले कृषि मंत्री बता रहे, तो आम जनता और विरोधी 'क्रिकेट मंत्री'। पर पवार की किस्मत देखिए, गुरुवार को ही आईसीसी में पदभार संभाला। तो इधर महंगाई की दर चार फीसदी गिर गई। यों यह दर पेट्रोल-डीजल-गैस के दाम बढऩे से पहले की। अभी तो दाम बढ़ोतरी ने अपना असर दिखाना शुरू ही किया। साथ में सियासत भी चल रही। गुरुवार को बीजेपी ने देश भर की 26 जगहों पर एक साथ रैली का एलान किया था। पर कई जगह रैली रद्द करनी पड़ी। तो कई जगह ऐसी, जहां सूचीबद्ध नेता पहुंचा ही नहीं। सो शाम वाली रैलियों में दिन वाले कई नेताओं को ओवर टाइम करना पड़ गया। यानी महंगाई पर विरोध की सिर्फ शोशेबाजी हो रही। अब तो कांग्रेस ने विरोध को फुस्स करने की नई रणनीति बना ली। सोनिया गांधी की रहनुमाई वाली नेशनल एडवाइजरी काउंसिल ने खाद्य सुरक्षा और सांप्रदायिक दंगों के खिलाफ वाले बिल पर फुर्ती दिखा दी। सोनिया ने दो कमेटी बना दीं। ताकि किसी भी तरह मानसून सत्र में दोनों बिल लाकर विपक्ष की धार भोंथरी कर सके। इतना ही नहीं, खाद्य सुरक्षा बिल में सोनिया मार्का लगाने को अब 25 किलो की जगह 35 किलो अनाज मुहैया कराने का प्रस्ताव। पर वाजपेयी सरकार में बीपीएल को 35 किलो ही अनाज मिलता था। सो सोनिया मार्का में नया कुछ नहीं। पर महंगाई से ध्यान बंटाने की इससे कारगर कोई और रणनीति भी नहीं। वैसे भी महंगाई पर घेरे में सिर्फ कांग्रेस। पवार तो अब आईसीसी चले गए। वैसे भी पवार कई दफा कह चुके, वह कोई ज्योतिषी नहीं, जो बता सकें, महंगाई कब कम होगी। अपने मुरली देवड़ा तो महंगाई को भगवान भरोसे छोड़ चुके। मनमोहन सरकार के मंत्रियों के कहने ही क्या, जब-जब मुंह खोलते, महंगाई को सिर्फ बढ़ाते। पवार ने दूध, चीनी, प्याज, आलू, दाल, गेहूं, चावल पर जब-जब बयान दिए, महज हफ्ते भर में कीमतें बढ़ गईं। अब तो मनमोहन भी खम ठोककर कह रहे, सब्सिडी का बोझ सरकार नहीं उठाएगी। यानी महंगाई के बोझ तले दबी जनता जमींदोज होने को तैयार हो जाए। पर पवार के लिए क्या कहेंगे। जो राजनीति में तो क्रिकेट मंत्री होने का आरोप झेल ही रहे। तो क्रिकेट वाले भी क्रिकेट का पार्ट टाइमर बता रहे।
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01/07/2010
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01/07/2010
Tuesday, June 29, 2010
जनता के दिल की चिंगारी आखिर कब बनेगी शोला?
अब बढ़ी कीमतों पर दो-दो हाथ की तैयारी। टोरंटो से लौटते हुए पीएम ने खम ठोक दिया, बढ़ी कीमतें वापस नहीं लेंगे। सब्सिडी का बोझ कम करने के लिए कीमत बढ़ोतरी जरूरी थी। यानी साफ हो गया, अंतर्राष्ट्रीय भाव सिर्फ बहाना था। अमेरिका को खुश करने के लिए सरकार ने जनता से राहत का निवाला छीन लिया। बराक ओबामा पहले ही भारत और चीन को अधिक ईंधन खपाऊ देश बता चिंता जता चुके। ओबामा के पूर्ववर्ती जार्ज बुश ने तो महंगाई के लिए भारतीयों को पेटू तक कह दिया था। अगर सचमुच अंतर्राष्ट्रीय भाव पेट्रोल-डीजल की कीमत बढ़ाने की मजबूरी होती। तो सोचिए, जब कच्चे तेल की कीमत 140 डालर प्रति बैरल थी, तब अपने देश में पेट्रोल की कीमत 42-44 रुपए और डीजल 35-37 रुपए प्रति लीटर थी। रसोई गैस की कीमत दिल्ली में 280 रुपए थी। अब अंतर्राष्ट्रीय भाव 77 रुपए प्रति बैरल। पर पेट्रोल 50 के पार, डीजल 40 के और रसोई गैस साढ़े तीन सौ के करीब। यानी अमेरिकी दबाव में अपनी सरकार ने जनता से सब्सिडी छीन ली। पर मनमोहन सरकार अपने सांसदों के वेतन-भत्ते पांच गुना बढ़ाने जा रही। सांसदों-मंत्रियों की फिजूलखर्ची तो रोकी नहीं जा रही। कीमतें बढ़ाकर आम जनता की खपत को कम करने की ठान ली। अमेरिकापरस्ती अपने नेताओं में कोई नया शगल नहीं। छब्बीस साल पहले कैसे एंडरसन को भगाया, जगजाहिर हो चुका। पर मनमोहन का दावा, भोपाल कांड में सरकार कुछ नहीं छुपा रही। अब कह रहे, एंडरसन पर अमेरिका से पूरा सहयोग हासिल करने की कोशिश करेंगे। क्या इतना सबकुछ होने के बाद भी सिर्फ कोशिश? क्या यही है अमेरिका से बराबरी का रिश्ता? अगर पीएम सचमुच एंडरसन को सजा दिलवाने के प्रति गंभीर, तो टोरंटो में ओबामा से हुई मुलाकात में यह बात क्यों नहीं कही? पिछली बार डेविड हेडली से अमेरिका ने पूछताछ नहीं करने दी थी। देश में बवाल मचा, तो मनमोहन ने ओबामा से बात की। पर भोपाल त्रासदी के प्रमुख गुनहगार एंडरसन को लेकर चुप्पी क्यों साधी? बराक ओबामा ने तो टोरंटो में मनमोहन की दिल खोलकर तारीफ की। कहा- जब मनमोहन बोलते हैं, तो दुनिया सुनती है। फिर मनमोहन सुनाने से कतरा क्यों रहे? आखिर कब तक अमेरिका को खुश करने की कीमत भारत की जनता चुकाएगी? पेट्रोलियम पदार्थों से सब्सिडी हटा मनमोहन ने दुनिया को तो खुश कर दिया। पर देश की जनता का क्या? अब मनमोहन कह रहे- तेल की कीमतों को नियंत्रण मुक्त करना बेहद जरूरी था। चलो माना, आर्थिक मजबूरी की वजह से यह जरूरी था। तो क्या महंगाई पर काबू पाना जरूरी नहीं? या फिर जैसे तेल की कीमत को नियंत्रण मुक्त कर दिया, क्या महंगाई को भी वैसे ही छोड़ दिया? अब महंगाई पर सियासत शुरू हो गई। लालू-मायावती को छोड़ समूचे विपक्ष ने पांच जुलाई को भारत बंद का एलान किया। तो इधर कांग्रेस और सरकार ने जवाबी रणनीति बना ली। संयुक्त मोर्चा और राजग सरकार के काल में जारी अधिसूचना को ढाल बनाएगी। नवंबर 1997 में गुजराल सरकार ने और मार्च 2002 में वाजपेयी सरकार ने बाजार भाव से पेट्रोल-डीजल की कीमतें तय करने की समय सीमा बनाई थी। सब्सिडी का बोझ हटाने की पहल भी हुई थी। सो कांग्रेस की दलील, विरोधी दल नौटंकी कर रहे। अगर सत्ता में ये होते, तो वही करते, जो हमने किया। पर कांग्रेस भूल रही, कीमतों को नियंत्रण मुक्त करने का फार्मूला संयुक्त मोर्चा सरकार की देन, जो कांग्रेस की बैसाखी पर चल रही थी। तब वित्तमंत्री पी. चिदंबरम थे। इतना ही नहीं, तबकी सरकार चाहकर भी वह साहस नहीं दिखा पाई, जो कांग्रेस की मौजूदा सरकार ने कर दिखाया। कांग्रेस ने जतला दिया, सत्ता में ठसक के साथ कैसे रहते। भले आम जनता भाड़ में जाए। पर यह कैसी दलील। इंदिरा गांधी ने तो 1971 में ही गरीबी हटाओ का एजंडा हाथ में लिया था। पर किसी भी सरकार ने आज तक गरीबी मिटाई क्या? अलबत्ता अब तो गरीब और बढ़ गए। तो क्या सरकारी नीति का यही मतलब, जनता पर बोझ डालने वाले फैसले फौरन लागू होंगे और जनहित वाले अधर में? सो अब वक्त आ गया, जब जनता को अपने हित का बीड़ा खुद उठाना होगा। विपक्षी दलों ने बंद का एलान तो किया। पर पांच जुलाई को सभी दल अपनी डफली अलग-अलग बजाएंगे। अगर एक साथ बजाते, तो शायद सरकार के बहरे कान तक गूंज पहुंचती। पर नहीं, सबको अपनी-अपनी राजनीतिक रोटियां जो सेकनी। सो अब जनता को क्रांति करनी होगी। बंद में राजनीतिक दलों को मोहरा बनने के बजाए सीधे जनता सडक़ों पर उतरे। जैसे 26/11 के हमले के बाद जब जनता सडक़ों पर उतरी थी। तो सभी राजनीतिक दलों के नेताओं की सिट्टीपिट्टी गुम हो गई थी। सो अब जनता ने सरकार को जगा उसके बहरे कान का इलाज नहीं किया, तो वह दिन दूर नहीं, जब सरकार ऊलजलूल दलील देकर आम जनता के कान भी बहरे कर देगी। सरकार के हर जनविरोधी फैसले के आगे घुटने टेकने के बजाए आम जनता को अब टीपू सुल्तान बनना होगा। आखिर कब तक मन ही मन सरकार को कोसते जिंदगी काटेंगे। टीपू सुल्तान की अत्यंत प्रिय उक्ति थी- 'शेर की तरह एक दिन जीना बेहतर है, लेकिन भेड़ की तरह लंबी जिंदगी जीना अच्छा नहीं।' टीपू सुल्तान ने अंग्रेजों के सामने घुटने नहीं टेके। अलबत्ता लड़ते हुए मरना कबूल किया। आखिर साढ़े पांच साल से मनमोहन सरकार महंगाई पर सिर्फ दिलासा दे रही। महंगाई दूर करना तो दूर, कीमतें बढ़ा और चोट कर रही।
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29/06/2010
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29/06/2010
Monday, June 28, 2010
महंगाई है, तो अच्छा है ना, सांसदों के वेतन जो बढ़ेंगे
अंधा बांटे रेवड़ी, अपनों-अपनों को देय। महंगाई की मार से भले जनता को राहत नहीं मिली। पर अपने सांसदों के वारे-न्यारे होंगे। संसद की ज्वाइंट कमेटी की सिफारिश हो गई। सांसदों का वेतन पांच गुना बढ़े। पर दलील तो महंगाई की, असली वजह अहं आड़े आ रहा। केंद्र सरकार में सचिव स्तर के अधिकारियों के वेतन 80 हजार प्रति माह। सो रुआब झाडऩे वाले सांसद महज 16 हजार से कैसे गुजारा करें। अब सिफारिश हुई, सांसदों का वेतन 80,001 रुपया हो। ताकि सांसद नाम से नहीं, जेब से भी सचिव पर भारी पड़ें। यानी अपने माननीय सांसदों का दर्द महंगाई नहीं, सचिवों का बढ़ा वेतन। जिससे रुआब कम होता दिख रहा। यों सांसद भूल रहे, भले वेतन कम। पर भत्तों और सुविधाओं को मिला दें, तो इतनी सुविधा स्वर्ग लोक में इंद्र को भी नसीब नहीं। अगर सांसदी नहीं भी रही, तो भी सुविधाएं इतनी, जिंदगी मौज में कटे। सो सांसदों को सचिवों से अधिक वेतन क्यों चाहिए? सचिव बनने वाला अधिकारी अखिल भारतीय स्तर का इम्तिहान देकर आता। सचिव बनते-बनते अफसर रिटायरमेंट की उम्र में होता। पर सांसदों की तो कोई योग्यता तय नहीं। लोकसभा में तो चुनाव लडऩे का जोखिम। पर राज्यसभा में तो दल किसी को भी भेज दे। यों सांसदों की दलील सिर्फ सचिवों के वेतन वाली नहीं। अलबत्ता श्रीलंका के सांसदों को मिलने वाली शानदार कार का भी दुख। अमेरिका में एक सिनेटर को अपने स्टाफ में 18 कर्मचारी रखने की छूट। पर सांसद यह भूल रहे, अमेरिका की प्रति व्यक्ति आय और भारत की प्रति व्यक्ति आय में बड़ा अंतर। अपने देश में 45 करोड़ लोग बीपीएल में। इतना ही नहीं, अमेरिकी सिनेटर के काम करने का तरीका और अपने सांसदों का तरीका जगजाहिर। अपने सांसदों को सचिवों से एक रुपया अधिक वेतन चाहिए। पर सांसद कैसे अठन्नी में बिकते, यह ऑपरेशन दुर्योधन और ऑपरेशन चक्रव्यूह के जरिए इतिहास में दर्ज। भ्रष्टाचार रोकने की भी दलील वेतन बढ़ाने के लिए दी जा रही। पर अबके महंगाई के सहारे बेड़ा पार की तैयारी। सचमुच महंगाई की आड़ में इतना बड़ा खेल नेता ही कर सकता। संसद की कमेटी ने सिफारिश की, तो वेतन-भत्तों में बढ़ोतरी महज औपचारिकता समझिए। अब तक की यही परंपरा, कोई भी दल इसका विरोध नहीं करता। अलबत्ता यही बिल ऐसा, जो झटपट बिना बहस के सर्वसम्मति से पारित हो जाता। पर विडंबना देखिए, सांसद अपना वेतन-भत्ता खुद तय करते। अब तक 27 बार सांसदों के लिए वेतन-भत्ते कानून-1954 में संशोधन हो चुके। माननीयों को जब सुविधा में कोई कमी नजर आई, कानून मनमाफिक बदल लिया। इसे कहते हैं अपना हाथ जगन्नाथ। पिछली लोकसभा में सोमनाथ दा स्पीकर थे। उन ने अपना हाथ जगन्नाथ पर एतराज जताया। वेतन आयोग जैसी संस्थागत प्रक्रिया का सुझाव दिया। पर क्या कभी कोई अपने पैर पर कुल्हाड़ी मारता है? पिछली बार 23 अगस्त 2006 को जब वेतन-भत्ते बढ़े थे। तो तबके संसदीय कार्यमंत्री प्रियरंजन दासमुंशी ने सोमनाथ दा के सुझाव के मुताबिक संस्था बनाने पर हामी भरी थी। पर असलियत सबके सामने। मानसून सत्र में बिल तो पास होकर रहेगा। सांसदों का दर्द दूर होकर रहेगा। भले महंगाई जनता को मार क्यों न दे। एक जमाना था, सांसद 400 रुपए वेतन, 21 रुपए भत्ते पर थे। वर्ष 1998 तक महज 1500 रुपए वेतन था। पर एनडीए राज में सीधे 12,000 हो गया। फिर 16,000, अब सीधे 80,001 की तैयारी। संविधान सभा का इतिहास तो और भी रोचक। दिल्ली बैठक में आने वाले मेंबरों को सब कुछ मिलाकर सिर्फ 25 रुपए मिलते थे। जिसमें रहना, खाना-पीना भी शामिल था। पर आज के सांसदों का मुंह तो मानो सुरसा हो गया। ऐसे भी कई सांसद, जो महज एक रुपया वेतन लेते रहे। हसरत मुहानी और डा. कर्ण सिंह इसी श्रेणी में। महात्मा गांधी ने भी यही नसीहत दी थी, सार्वजनिक जीवन जीने वाले लोगों को कम वेतन लेकर सादा जीवन जीना चाहिए। पर अपने माननीय सांसदों के वेतन-भत्ते देख शायद गांधी जी की आत्मा भी बिलख पड़े। यों एक रुपया लेने वालों में अपने मनमोहन सिंह भी। पर मनमोहन की कहानी दूसरी। पहले वल्र्ड बैंक के मुलाजिम रहे। अब वल्र्ड बैंक पेंशन दे रहा, जो बतौर सांसद मिलने वाले वेतन-भत्ते से अधिक। ऊपर से टेक्स का कोई लफड़ा नहीं। यों टेक्स का लफड़ा अपने सांसदों के वेतन में भी नहीं। पर बात मनमोहन की। सुनते हैं, मनमोहन पेंशन ही लेते। सांसद के तौर पर महज एक रुपया उठाते। अब मनमोहन सिंह से आम जनता क्या उम्मीद रखे। पेट्रोल-डीजल-रसोई गैस-कैरोसिन के दाम बढ़ा मनमोहन जी-20 की मीटिंग में गए। तो सदस्य देशों ने खूब पीठ थपथपाई। सब्सिडी खत्म करने में मनमोहन की पहल का जमकर स्वागत किया। तो जाकर मनमोहन का अर्थशास्त्र समझ आया। अब अगली बार मनमोहन की विदेश यात्रा की खबर सुनें। तो दिल थामकर बैठिएगा। भले बीजेपी महंगाई के खिलाफ पहली-दूसरी जुलाई को कॉरपेट बोंबिंग करेगी। मुलायम ने पांच जुलाई को आम हड़ताल का एलान किया। पर मनमोहन के पास हर मर्ज का इलाज। सांसदों का वेतन महंगाई की आड़ में इतना बढ़ा देंगे, सांसदों का मुंह हैरानी से खुला ही रह जाएगा। सांसदों को महंगाई से त्रस्त जनता का दर्द समझ नहीं आता। तभी तो जितना जतन अपने वेतन के लिए कर रहे, आम आदमी की खातिर नहीं किया। अब आम आदमी को मझधार में छोड़ सांसद अपनी बल्ले-बल्ले कराएंगे। यानी महंगाई है, तो अच्छा है। कम से कम सांसदों के वेतन तो बढ़ेंगे।
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28/06/2010
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28/06/2010
Friday, June 25, 2010
तो पैंतीस साल बाद भी मानसिकता 'इमरजेंसी' की
महंगाई सिंह.... माफ करिए मनमोहन सिंह की सरकार तेरह महीने की हो गई। पर तेरह महीने में ही आम आदमी का चौथा निकाल दिया। तो सोचो, बाकी के तीन साल ग्यारह महीने में क्या होगा? मनमोहन सरकार की दूसरी पारी में चौथी बार पेट्रोलियम पदार्थों के दाम बढ़े। बाईस मई 2009 को दूसरी बार शपथ ली। तो जुलाई में दाम बढ़ाए। फिर आम बजट में प्रणव दा ने कीमत बढ़ा इतिहास रचा। पहली अप्रैल से बीएस-4 मानक लागू होने से कीमतें बढ़ीं। अब चौथी बार में कीमतें ऐसी बढ़ाईं, आम आदमी का दम निकाल दिया। जमाखोर, घूसखोर, सूदखोर, यहां तक कि आदमखोर भी सुना। पर कोई चुनी हुई सरकार गरीबखोर और आम आदमी खोर हो जाएगी, किसी ने सपने में भी न सोचा होगा। शुक्रवार को पेट्रोल 3.73 रुपए, डीजल दो रुपए, कैरोसिन तीन रुपए और रसोई गैस 35 रुपए महंगी हो गई। आठ साल बाद पहली बार गांव की रोशनी का सहारा कैरोसिन तेल महंगा हुआ। गांव में बिजली के खंभे और तार भले पहुंच गए हों। पर बिजली नहीं पहुंची, सो गांव में दीये और लालटेन ही सहारा। अब कोई पूछे, क्या यही है आम आदमी की सरकार? पर सरकार और कांग्रेस मजबूरी का रोना रो रहीं। देश की तरक्की के लिए उठाया गया कदम बता रहीं। तो क्या अब आम आदमी की लाश पर देश का विकास होगा? जब गरीब महंगाई की वजह से भूखे मर जाएंगे, तो विकास किसके लिए होगा? कभी कॉमन वैल्थ गेम्स के नाम पर आम आदमी की कमर तोड़ी जा रही, तो कभी विकास दर के नाम पर। आखिर कब तक आम आदमी ही पिसता रहे? अबके जो कीमतें बढ़ीं, सिर्फ पेट्रोल-डीजल तक सीमित नहीं। अलबत्ता अब कुछ भी ऐसा नहीं, जो सस्ता मिल सके। अब तो जहर भी महंगा हो चुका। कुएं, तालाब, नदियां भी सूख चुकीं। सो डूब मरना भी मुश्किल हो चुका। बाकी बची ट्रेन, तो पता नहीं कब केंसिल हो जाए। सो मुरली देवड़ा ने जब कीमतें बढ़ाने का एलान किया। तो दोहरी बेशर्मी भरे अंदाज में कह दिया- 'अभी तो थोड़ा भाव बढ़ाया है। भगवान करेगा, मार्केट में भाव थोड़ा ठीक होगा, तो हम घटा देंगे।' पहली बेशर्मी यह, इतनी कीमतें बढ़ाईं, पर कह रहे- थोड़ा भाव बढ़ाया। दूसरी और सबसे बड़ी बेशर्मी, सब कुछ भगवान भरोसे छोड़ दिया। पर मुरली देवड़ा भगवान के नाम पर भी आम आदमी को ठग रहे। असल में तेल की कीमतें अब सरकारी नियंत्रण से बाहर हो चुकीं। सो मुरली देवड़ा तो क्या, उनके आका भी घटाने की नहीं सोच सकते। अब तो तेल कंपनियां अंतर्राष्ट्रीय बाजार के हिसाब से कीमतें तय करेंगी। हर पखवाड़े नफा-नुकसान का जायजा होगा। तो कंपनियां आम आदमी का हित नहीं, अपना लाभांश देखेंगी। सो तेल पर अब खुला खेल फर्रुखाबादी होगा। पर सवाल, कब तक आम आदमी को ठगेगी अपनी सरकार? हर बार वही देश की तरक्की का रोना-धोना और कीमतें बढ़ाना। पर संयोग देखिए, मनमोहन की पहली पारी खत्म होने को थी। तब भी जून में दाम झटके से बढ़ाए गए। अबके दूसरी पारी का पहला साल पूरा हुआ। तो झटके से आम आदमी को हलाल कर दिया। सनद रहे, सो याद दिलाते जाएं। तब अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत 140 प्रति बैरल पहुंच गई थी। चार जून 2008 को पेट्रोल पांच रुपए, डीजल तीन रुपए, रसोई गैस 50 रुपए महंगा हुआ था। महंगाई की मार झेल रही जनता को मनमोहन ने जुबानी सांत्वना देने की कोशिश की। पहली बार ऐसा हुआ, जब पीएम ने बढ़ी कीमतों पर राष्ट्र को संबोधित किया। तब मनमोहन ने जो कहा, आप देख लो- 'हमने विकास किया, पर चिंता की बात, तरक्की के साथ महंगाई भी बढ़ी। पर बढ़ी कीमतों से तो तेल कंपनियों के घाटे का सिर्फ दसवां हिस्सा पूरा होगा। नब्बे फीसदी बोझ सरकार उठाएगी। कर्ज और बांड समस्या का समाधान नहीं। कंपनियों को घाटे में डालकर हम अपना भविष्य बिगाड़ रहे। हमें अपने लिए नहीं, अपनी पीढ़ी के लिए सोचना चाहिए। पेट्रोल-डीजल-एलपीजी-बिजली-पानी की बचत करें। आपको किफायती बनना होगा। भविष्य में सही दाम चुकाने होंगे।' यानी हर बार एक ही दलील। तो कोई पूछे, आखिर विकास किसका हो रहा? पर नेताओं की नौटंकी का जवाब नहीं। जून 2008 में चुनावी साल था। तो सोनिया गांधी के निर्देश पर कांग्रेस शासित राज्यों में सेल्स टेक्स घटाने का ड्रामा हुआ। दिल्ली में शीला सरकार ने रसोई गैस में 40 रुपए की छूट दी। सिर्फ दस रुपया बढऩे दिया। पर दिल्ली और केंद्र के चुनाव निपटे। तो सब्सिडी वापस ले ली। अबके फिर यह संभव, जनता का विरोध देख सोनिया चिट्ठी लिख दें। दिखावे की खातिर कैरोसिन के दाम घट जाएं। पर सचमुच देश की विडंबना, आज 35 साल बाद भी इमरजेंसी की मानसिकता खत्म नहीं हुई। आज के दिन ही 1975 में इंदिरा ने इमरजेंसी लगाई। पर कांग्रेस की मानसिकता जून 2008 और जून 2010 में वैसी ही दिख रही। समूचा देश महंगाई की मार से कराह रहा। फिर भी तेल-रसोई गैस के दाम में बढ़ोतरी का साहस शायद कांग्रेस ही कर सकती। पर यूपीए के सहयोगियों की नौटंकी भी कम नहीं। ममता, पवार, करुणा की हरी झंडी लेकर ही शुक्रवार को दाम बढ़े। पर तीनों ने बढ़ोतरी पर एतराज जताना शुरू कर दिया। फिर भी सरकार के साथ ही रहेंगे, भले आम आदमी तड़प-तड़प कर क्यों न मर जाए। मानसून सत्र में अपने सांसदों, मंत्रियों के वेतन-भत्ते पांच गुना बढ़ेंगे। सो मन्नू भाई की मोटर तो पम-पम चलेगी। बाकी आम आदमी वही फटे हाल, बदहाल, पैदल।
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25/06/2010
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25/06/2010
Thursday, June 24, 2010
तो जसवंत के भी जिन्ना अब बीजेपी को मंजूर
सुबह का भूला शाम को घर आ जाए, तो उसे भूला नहीं कहते। पर झारखंड में बीजेपी 27 दिन बाद लौटे। बिहार में साढ़े चार साल बाद होश में आए। जसवंत सिंह की किताब समझने में दस महीने चार दिन लगा दे। तो उसे आप भूला कहेंगे या कुछ और। अब आप चाहे जो भी कहें, अपने जसवंत सिंह तो बीजेपी में लौट आए। बीजेपी दफ्तर में खूब ढोल-नगाड़े बजे। आडवाणी-गडकरी-सुषमा ने अगवानी की। पर जैसे जसवंत की दलील सुने बिना बीजेपी से बाहर निकाला। वैसे ही अब बीजेपी वापसी पर कोई दलील नहीं दे पा रही। सो जसवंत की वापसी तो करा ली। पर जून के महीने में बीजेपी नेताओं ने अपनी जुबां पर अघोषित इमरजेंसी थोप ली। आखिर बीजेपी के नेता बोलें भी, तो किस जुबां से। दस महीने पहले जसवंत के लिए बड़े तो बड़े, छुटभैये बीजेपी नेता भी संसदीय भाषा में गाली दे रहे थे। लोकसभा चुनाव की हार के बाद बीजेपी में भूचाल आ गया था। तो तय हुआ, शिमला में चिंतन बैठक कर चिंता दूर करेंगे। पर तभी अपने जसवंत सिंह की किताब 'जिन्ना: भारत विभाजन के आईने में' लांच हुई। यों जसवंत ने अपनी किताब में जिन्ना के बारे में वही लिखा, जो पांच जून 2005 को कराची में आडवाणी कह चुके। पर जसवंत की किताब में सरदार पटेल की भूमिका पर भी सवाल उठे। सो बीजेपी ने शिमला में चिंतन से पहले 19 अगस्त 2009 को जसवंत अध्याय समाप्त कर दिया। पर बीजेपी की अदालत में जसवंत के कोर्ट मार्शल से पहले नेताओं ने जो ताना-बाना बुना, जरा उसकी झलक दिखा दें। जसवंत की किताब 17 अगस्त को लांच हुई। लोकार्पण समारोह में बीजेपी का एक भी नेता नहीं पहुंचा। भूले-बिसरे श्याम जाजू पहुंच गए थे। पर किसी को न देख, उलटे पांव लौट आए। फिर 24 घंटे के भीतर बीजेपी के नेताओं के बयान देखिए। सुषमा स्वराज ने तब कहा था- 'सरदार पटेल का अपमान, देश का अपमान। सो बीजेपी जसवंत से सहमत नहीं।' अगले दिन 18 अगस्त को राजनाथ सिंह का बयान जारी हुआ। तो साथ में दस जून 2005 को जिन्ना पर संसदीय बोर्ड के प्रस्ताव की याद दिलाई। फिर मुरली मनोहर जोशी ने कहा था- 'जिन्ना पाकिस्तानियों के आदर्श हो सकते हैं, भारतीयों के नहीं।' उनका इशारा जसवंत के पाक प्रेम पर था। विनय कटियार ने तो जसवंत को सीधे-सीधे जिन्ना हाउस में जाकर पनाह लेने की नसीहत दी थी। यह तो ऑन रिकार्ड टिप्पणियां थीं। अब जरा ऑफ रिकार्ड भी देख लो। एक वरिष्ठ नेता ने कहा था- 'बीजेपी में रहकर मलाई खाने के बाद अब वैचारिक बदला लेने के लिए जसवंत ने किताब लिखी।' इस नेता ने तो यहां तक कहा- पहले राजस्थान से चुनाव लड़े, अबके गोरखालैंड से। अब अगला चुनाव 'इस्लामाबाद' से लड़ेंगे। क्या बीजेपी के ये नेता दस महीने पहले कही अपनी बात भूल गए। जसवंत को जब निकाला गया, तो आडवाणी हों या जेतली-सुषमा-राजनाथ। दलील दी, जसवंत ने विचारधारा को चुनौती दी, सो बर्खास्तगी का फैसला करना पड़ा। पर क्या अब जसवंत की किताब विचारधारा को आत्मसात हो गई? जसवंत ने बीजेपी में वापसी के बाद वही रुख अपनाया, जो जिन्ना पर आडवाणी ने अपनाया था। जसवंत बोले- 'मैं किताब का लेखक हूं। कोई लेखक अपनी किताब से कैसे मुकर सकता। मैं अपनी किताब पर अटल हूं।' अब जसवंत वापसी के बाद भी वही तेवर दिखा रहे। तो यह साफ हो गया, बीजेपी ने विचारधारा की बलि चढ़ा दी। गुरुवार को जब जसवंत की सम्मान सहित वापसी हुई, तो गडकरी ने वर्करों के लिए आदर व सम्मान का दिन बताया। आडवाणी ने खुशी के साथ-साथ मन का सुकून करार दिया। पर सनद रहे, सो चिंतन बैठक के आखिर में 21 अगस्त 2009 को आडवाणी ने अपना दुखड़ा कुछ यों सुनाया था- 'तीस साल तक साथ रहे जसवंत। सो निकालने से कष्ट होना लाजिमी। पर जसवंत ने बुनियादी सिद्धांतों के खिलाफ काम किया। इसलिए निष्कासन से कम में वर्कर संतुष्ट नहीं होते।' यानी जसवंत की बर्खास्तगी जायज ठहराई। पर कोई पूछे, दस महीने पहले वर्करों की संतुष्टि के लिए निकाला। तो अब जसवंत की वापसी वर्करों के लिए 'आदर-सम्मान' की बात कैसे हो गई? पर गडकरी तबकी बात को बीता हुआ कल बता रहे। तो क्या बीजेपी की नीति चाल, चरित्र, चेहरा भी अब बीती बात हो गई? बीजेपी के तमाम फैसले तो यही बता रहे। जसवंत की वापसी पर चुप्पी साध बता दिया, विचारधारा से कैसे समझौता कर रहे। झारखंड में सिद्धांतों की बलि चढ़ाई। तो राम जेठमलानी को राज्यसभा भेज वाजपेयी जैसे व्यक्तित्व के सम्मान को तिलांजलि दे दी। बाकी बीजेपी में फैसलों की रफ्तार राजस्थान से बेहतर कौन समझेगा। साल होने को, पर विधानसभा में नेता तय नहीं कर पाई। अब जसवंत की वापसी भी अपना असर दिखाएगी। पर पार्टी की मूल नीतियों से गडकरी के हाथों समझौता कहीं अंदरूनी साजिश तो नहीं? आडवाणी भले रिटायर हो चुके। पर 16-17 सितंबर 2005 की चेन्नई वर्किंग कमेटी में संघ के खिलाफ आडवाणी की भड़ास याद करिए। सो कहीं ऐसा तो नहीं, आडवाणी धीरे-धीरे बीजेपी को संघ से मुक्त कराने में लगे? बीजेपी के हालिया फैसले और आडवाणी के प्रभाव यही इशारा कर रहे। जनसंघ जमाने में जब पहली बार 1964 में संघ के स्वयंसेवक बछराज अध्यक्ष बने, तो वाजपेयी ने नहीं माना। विजयवाड़ा अधिवेशन में नहीं गए। आखिर ऐसी परिस्थिति बनी, संघ के नामित बछराज साल भर के भीतर कुर्सी छोडऩे को मजबूर हो गए।
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24/06/2010
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24/06/2010
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