Friday, August 6, 2010

कॉमनवेल्थ से कश्मीर तक कराह रही सरकार

कॉमनवेल्थ का पॉलिटीकल रिहर्सल जमकर हो रहा। शुक्रवार को लोकसभा में घोटाले का घंटा बजा। तो सरकार समझ गई, कलमाडिय़ों का बचाव किया, तो बेभाव की पड़ेगी। सो कांग्रेस और सरकारी खेमे से यही गुहार हो रही, पहले गेम्स निपट जाने दो। फिर कलमाडिय़ों से निपट लेंगे। पर विपक्ष सुनहरा मौका हाथ से क्यों जाने देगा। सो ठान लिया, अब खेल के गड़बड़झाले पर जवाब तो पीएम से ही चाहिए। दलील भी सही, गड़बड़झाले के तार खेल मंत्रालय, शहरी विकास मंत्रालय, विदेश मंत्रालय, ऑर्गनाइजिंग कमेटी, दिल्ली सरकार तक जुड़े। सो एक मंत्री समुचित जवाब नहीं दे सकता। अब अगले हफ्ते बहस होगी, तो घोटाले की कई परतें खुलेंगी। पर शुक्रवार को लोकसभा में जयपाल रेड्डी को विपक्ष ने बोलने नहीं दिया। सो रेड्डी ने बाहर आकर कह दिया- गड़बडिय़ों की जांच सीबीआई से भी कराने को तैयार। पर कॉमनवेल्थ गेम्स के खर्चों का आंकड़ा सही नहीं। सच माइने में 11500 करोड़ खर्च हुए। यानी रेड्डी का आंकड़ा सही मानें, तो घोटाला करने वालों ने भ्रष्टाचार का पूरा सम्मान रखा। किसी भी योजना में अगर 15-20 फीसदी तक भ्रष्टाचार न हो, तो वह योजना सफल नहीं मानी जा सकती। आखिर योजना से जुड़े लोग सरकारी मेहनताने पर कितना काम करेंगे। पर कॉमनवेल्थ गेम्स का भ्रष्टाचार कुछ-कुछ आईपीएल के खेल जैसा ही। याद है ना, पिछले सत्र में आईपीएल के मामले ने क्या-क्या गुल खिलाए थे। सुनंदा के चक्कर में थरूर नपे। होशियारी दिखाकर ललित मोदी खुद बुद्धू बन गए। तब प्रणव दा से लेकर ईडी, सीबीडीटी सबने ताबड़तोड़ जांच शुरू कर दी। ऐसा लगा, अब चार-छह दिन में भ्रष्टाचार की पूरी कलई खुल जाएगी। पर हुआ क्या? आप राज्यसभा में गुरुवार को दिए खेल राज्यमंत्री का जवाब सुन लीजिए। आईपीएल की जांच पर सवाल था। तो सरकारी जवाब आया- मंत्रालय आईपीएल के साथ डील नहीं करता और राष्ट्रीय टीम आईपीएल टूर्नामेंट में हिस्सा नहीं लेती। फिर भी वित्त मंत्रालय ने आयकर नियमों की अवहेलना के कुछ मामलों की जांच शुरू की। पर जांच में समय लगेगा। अब हू-ब-हू वैसा ही शोर कॉमनवेल्थ का मचा। सरकार उसी तरह सच सामने लाने के दावे कर रही। प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने पद से हटाए गए दरबारी और महेंद्रू को नोटिस भेज दिया। सीबीडीटी ने भी जांच में दखल दिया। विपक्ष पिछली बार की तरह अबके भी वही जेपीसी की मांग कर रहा। सो सरकार घिर गई। आईपीएल में तो कारपोरेट घराने का पैसा। पर यहां आम आदमी की गाढ़ी कमाई। सो कहीं ऐसा न हो, हायतौबा के चक्कर में कॉमनवेल्थ भी आईपीएल की तरह कहीं और हो जाए। आईपीएल-टू आखिरी वक्त में दक्षिण अफ्रीका में हुआ था। अगर ऐसा हुआ, तो भारत किस विकास दर का मुंह दिखाएगा? अब सवाल, मनमोहन सरकार आखिरी वक्त में ही क्यों जागती? गेम्स की तैयारियां सात साल से चल रहीं। पर जब भ्रष्टाचार की कलई खुली, तो मनमोहन ने मोर्चा संभाल लिया। कॉमनवेल्थ हो या कश्मीर, सरकार के पास कोई रोडमैप नहीं दिख रहा। अब कश्मीर की हिंसा काबू से बाहर हो चुकी। तो मनमोहन सोमवार को सर्वदलीय मीटिंग करेंगे। पर एजंडा क्या होगा? सरकार का फर्ज यही, एक रोडमैप लेकर आगे बढ़े और बाकी दलों से विचार करे। पर मनमोहन खाली हाथ आएंगे, तो बैठक से कोई झोली भरकर नहीं लौटेंगे। जब कश्मीर की आग बुझाने की पहल करनी थी, तब उमर अब्दुल्ला के भरोसे सब-कुछ छोड़ दिया। उमर के अक्खड़पन ने चिंगारी को शोला बना दिया। जब फाइरिंग की पहली घटना में एक मौत हुई, तो जनाब उमर छुट्टियां मना रहे थे। फिर हिंसा का दौर बढ़ता गया। पर युवा मुख्यमंत्री की अकड़ देखिए, कभी मौका-मुआइना नहीं किया। ऐसे में आवाम का दिल कैसे जीत पाएंगे? होम मिनिस्टर पी. चिदंबरम ने शुक्रवार को राज्यसभा में दिल-दिमाग जीतने का मंत्र दिया। पर उमर से कैसी उम्मीद? लोकसभा के 38 युवा सांसदों ने कश्मीरी युवाओं से शांति की अपील की। तो यह एक अच्छी पहल जरूर। पर सवाल, राहुल बाबा की टीम के युवा जनता से कितने जुड़े हुए? राहुल की टीम के जितने भी युवा मंत्री मनमोहन केबिनेट में, उनमें से कितने अपने क्षेत्र तक की जनता का दिल जीत पा रहे? कश्मीर में अलगाववादियों को आवाम ने पिछले दो चुनाव में सबक सिखा दिया था। कई अलगाववादी नेता चुनाव हार गए। अगर उमर और केंद्र सरकार सजग होतीं, तो अलगाववादियों को दुबारा पनपने का मौका नहीं मिलता। पर युवा मन अहंकार में डूब गया। सो पाकिस्तान ने अपना नापाक चेहरा फिर दिखाया। बम, गोले-बारूद की जगह पत्थरबाजी का ट्रैंड शुरू कर दिया। ताकि दुनिया को दिखे, कश्मीरी आवाम की भावना कैसी। दुनिया में भारत की कश्मीर नीति को फौजी हुकूमत बताने की कोशिश में जुटा पाक। सचमुच जम्मू-कश्मीर को लेकर सरकार की नीति साफ नहीं। अमरनाथ श्राइन बोर्ड जमीन विवाद में जम्मू ठप हुआ था। अब घाटी अलगाववाद की आग में झुलस रही। पर फिर वही सर्वदलीय मीटिंग। वही संसदीय टीम भेजने की मांग। सो कॉमनवेल्थ से कश्मीर तक कराह रही सरकार।
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06/08/2010

Thursday, August 5, 2010

‘शेरू’ आखिर रंगा सियार ही निकला

मणिशंकर अय्यर के भाग्य से कॉमनवेल्थ का छीका टूट ही गया। यों कॉमनवेल्थ के नाम पर मची राष्ट्रीय लूट का खुलासा शरद यादव दो साल से करते आ रहे। पर लोकतंत्र के चारों स्तंभों ने अनसुना कर दिया। अब मणि के बोल से ही सही, परतें उधड़ रहीं। तो सुनने वाले दांतों तले उंगली नहीं, पूरा हाथ दबा रहे। सचमुच जिस फ्रिज की कीमत आठ-दस हजार हो, उसका किराया कोई 45 हजार दे। तो ऐसे आयोजक को मोहम्मद बिन तुगलक ही कहेंगे। छतरी बढिय़ा से बढिय़ा 4100 रुपए की। पर कॉमनवेल्थ आयोजकों ने साढ़ छह हजार के किराए पर ली। ऐसा कोई सामान नहीं, जो दुगुने से पांच गुने अधिक दाम पर नहीं लिया गया हो। लूट मचाने का इससे नायाब फार्मूला क्या होगा। कुछ महीने के लिए अपना सामान किराए पर दो, फिर माल भी अपना और धन भी अपनी जेब में। सो करोड़ों खर्च कर दुरुस्त हुआ स्टेडियम पानी-पानी हो रहा। समूची दिल्ली खुदी हुई दिख रही। अब मौसम विभाग ने अक्टूबर के पहले हफ्ते में बारिश की आशंका जता दी। सो बेचारे शीला-कलमाड़ी की मुसीबत और बढ़ गई। अभी तो देश की जनता के सामने कलई खुल रही, तब विदेशी मेहमानों को क्या मुंह दिखाएंगे। अब तो चुटकी लेने वाले भी खूब हो गए। शीला-कलमाड़ी को सुझाव मिल रहा, जब दिवालिया कंपनियों से समझौता कर सकते हो। तो अक्टूबर में बारिश न हो, इसके लिए इंद्र से 'एमओयू' दस्तखत कर लो। इसी बहाने इंद्र के घर तक जाने का यात्रा भत्ता भी अच्छा-खासा बन जाएगा। और किसी को यह घोटाला मालूम ही नहीं पड़ेगा। किसे मालूम इंद्र कहां रहते हैं और उन तक पहुंचने का क्या रास्ता। अपने मीडिया वाले तो कम से कम नहीं पहुंचेंगे। वैसे भी कॉमनवेल्थ गेम पर जितनी हाय-तौबा मच रही, अभी उतना भ्रष्टाचार तो हुआ भी नहीं। पता नहीं आयोजकों को डाइटिंग किसने सिखा दी। अगर पूरे खेल के आयोजन पर 37,000 करोड़ का खर्चा माना जाए। तो दस से पंद्रह फीसदी का हिस्सा तो ईमानदारी का बनता। पर अभी महज दो हजार करोड़ के ही आरोप लग रहे। यानी 1700 करोड़ कम। यह तो 'भ्रष्टाचार' का अपमान है। याद करिए अपने राजीव गांधी ने क्या कहा था। एक रुपया अपने पड़ाव तक पहुंचते-पहुंचते महज 15 पैसे रह जाता। यानी जब 80-85 फीसदी पैसा खाकर कोई डकार न ले, तब उसे भ्रष्टाचार कहते हैं। पर अपने कॉमनवेल्थ आयोजन से जुड़े लोगों का लीवर कमजोर हो चुका। सो 15 फीसदी भी नहीं डकार पाए, पर देश में हो-हल्ला मच गया। बात संसद तक पहुंच गई। तो तैयारियों का हाल देख कांग्रेस खुलकर नहीं रो पा रही। ना ही कलमाडिय़ों का साथ दे रही। पर अब जैसे भी हो, जनता की लूट पर कॉमनवेल्थ गेम कराना मजबूरी। सो राज्यसभा में गुरुवार को खेल मंत्री एम.एस. गिल ने लाचारी दिखाई। बोले- अब बारात घर आने को तैयार, सो स्वागत करना ही होगा। जलसा पूरा करना होगा। पर बाद में सच सामने लाएंगे। फिलहाल जब कुछ तैयार ही नहीं हुआ, तो जांच किसकी कराएं। अब सोचो, गेम्स के बाद जांच होंगी, तो समूचे दस्तावेज दुरुस्त हो चुके होंगे। सो फिलहाल हल्ला शांत करने को दो-चार की बलि ले ली। आयोजन समिति से कोषाध्यक्ष अनिल खन्ना का इस्तीफा हो गया। खन्ना के बेटे की कंपनी को भी ठेका मिला था। कलमाड़ी के करीबी टीएस दरबारी, संजय महेंद्रू हटाए गए। हैड एकाउंटेंट जयचंद भी नपे। अब एके मट्टू नए कोषाध्यक्ष होंगे। पर सुरेश कलमाड़ी को हटाने की मुहिम उचित नहीं। वैसे भी यह कैसा फार्मूला, खाने-पीने वाले तोंद निकाल कर आराम करने चले जाएं। और जिम्मेदारी संभालने वाला नया व्यक्ति सिर्फ काम करे, खाने-पीने को कुछ न मिले। वैसे भी जांच में होगा क्या। इराक तेल दलाली के मामले में वोल्कर रपट के बाद नटवर सिंह एंड फेमिली कांग्रेस से नप गई। पर जांच का निचोड़ क्या निकला। किसी पर कार्रवाई हुई। यहां भी वही हाल, दो-चार निलंबन हुए। गेम्स के बाद कुछेक और हो जाएंगे। फिर समय के साथ सारा खाया-पीया हजम हो जाएगा। पर बात गेम्स की तैयारी की। जब खेल मंत्री संसद में लाचारी दिखा रहे। तो सोचो, कैसे होगा राष्ट्रमंडल खेल? कैसे बचेगी राष्ट्र की इज्जत? सचमुच अब तो एक ही फार्मूला, जैसे आठ अक्टूबर 2009 को कॉमनवेल्थ गेम्स फैडरेशन के अध्यक्ष के साथ 71 देशों के डेलीगेट्स ने तैयारियों का मौका-मुआइना किया। तो समूची दिल्ली सील कर दी गई थी। ट्रेफिक की बदहाली विदेशी मेहमान न देख सकें, सो पहले ही लोगों को एडवाइजरी दी जा चुकी थी। तब यहीं पर लिखा था- अभी ऐसा हाल, तो 2010 में क्या होगा। सचमुच अब एक ही तरीका, सरकार उम्दा बाड़ तैयार करे। जब तक गेम्स हों, सभी दिल्ली वालों को बाड़ में ठूंस दो। दिल्ली से लगने वाले सभी बार्डर सील कर दो। समूचे खेल का लाइव टेलीकास्ट कराओ। और अपनी इज्जत बचाओ। सात साल में गेम्स की तैयारी का राजधानी में यह हाल। तो मनमोहन किस विकास दर का ढिंढोरा पीट रहे? अब कॉमनवेल्थ गेम्स के भ्रष्टाचार की जांच ईडी करे, या 'डीडी' (देवी-देवता)। पर होना-जाना कुछ नहीं। तभी तो जब सीवीसी ने खामियां उजागर कीं, सीबीआई से केस दर्ज करने को कहा। तो खेल में पीएम भी कूद गए। सो अगले ही दिन सीवीसी का बयान जारी हो गया- हमारी रपट अभी आरंभिक। सो निष्कर्ष न निकाला जाए। अब सोचो, जब सीवीसी का यह हाल। तो सीबीआई का क्या होगा? बेजा इस्तेमाल का आरोप यों ही नहीं लगता। पर बात गेम्स की, तो कॉमनवेल्थ गेम्स का 'शेरू' आखिर रंगा सियार ही निकला। बारिश होते ही भेद खुल गया। 'शेरू' यानी गेम्स का शुभंकर।
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05/08/2010

Wednesday, August 4, 2010

महंगाई पर ये लो अपना ‘गीता सार’

बुरा मत मानना, अब आप महंगाई में जीने की आदत डाल ही लें। संसद की भावना को आवेग मान सरकार ने यही नुस्खा बताया। बुधवार को प्रणव मुखर्जी ने लोकसभा में जवाब दिया। तो चेहरे पर नकारेपन की खीझ बार-बार छलकी। फिर भी महंगाई कम करने का भरोसा नहीं दिलाया। अलबत्ता महंगाई को न्यायसंगत ठहराते रहे। सचमुच प्रणव दा का जवाब गीता सार का कांग्रेसी रूपांतरण भर। पहली बार महंगाई पर संसद की भावना के तहत बहस हुई। पर प्रणव दा का जवाब वही। हे आम आदमी, क्यों व्यर्थ चिंता करते हो। महंगाई से व्यर्थ क्यों डरते हो। महंगाई भला तुम्हें कैसे मार सकती। वह तो न पैदा होती, न मरती, अलबत्ता गैर कांग्रेसी राज में कछुआ चाल, तो कांग्रेस राज में खरगोश की भांति दौड़ती। सो जो हुआ, वह अच्छा हुआ। महंगाई बढ़ रही, वह भी अच्छा हो रहा। महंगाई और बढ़ेगी, वह भी अच्छा ही होगा। तुम एनडीए राज की कम कीमतें याद कर पश्चाताप न करो। ना ही भविष्य में आने वाली सरकार की चुनौतियों की चिंता करो। अलबत्ता वर्तमान में हमारी महंगाई के साथ चलो। प्रणव दा ने भरे सदन में कबूला, वाजपेयी राज के छह साल कीमतें काबू में रहीं। पर दलील दी, वाजपेयी राज में विकास दर, निवेश दर और निर्यात दर नहीं बढ़ीं। यानी विकास दर का झंडा लहरा आम आदमी की कमर पर डंडा चला रही सरकार। प्रणव दा ने ताल ठोककर कहा- यूपीए राज में विकास दर बढ़ी, सो मुद्रास्फीति बढ़ी। इतना ही नहीं, आम लोगों की क्रयशक्ति बढ़ी। यानी गीता सार के तीसरे चरण में प्रणव दा ने खूब कहा। हे आम आदमी, तुम्हारा क्या गया, जो तुम रोते हो। तुम क्या लाए थे, जो तुमने खो दिया। तुमने क्या पैदा किया था, जो नाश हो गया। अरे भाई, तुम्हारी आमदनी बढ़ी। तो थोड़ी महंगाई भी झेल लो। आखिर इतना पैसा लेकर कहां जाओगे। न तुम कुछ लेकर आए। जो लिया, यहीं से लिया। सो देना भी यहीं पड़ेगा। जो लिया, इसी भगवान (हमारी सरकार) से लिया। सो हमको ही देना होगा। तुम तो खाली हाथ आए, खाली हाथ चले जाओगे। वैसे भी जो आज तुम्हारा है, कल किसी और का था, परसों किसी और का होगा। तुम इसे अपना समझकर मग्न हो रहे हो। बस यही प्रसन्नता तुम्हारे दुखों का कारण है। यानी प्रणव दा का प्रवचन यही, हे आम आदमी, सिर्फ अपनी मत सोचो, आने वाली पीढ़ी के बारे में सोचो। परिवर्तन संसार का नियम है। जिसे तुम मृत्यु यानी महंगाई समझते हो, वही तो जीवन है। आज तुम महंगाई झेलोगे, कल महंगाई तुम्हारे बच्चों को झेलेगी। तो तुम्हारे बच्चे तुम्हें पीढिय़ों तक याद रखेंगे। अब बताओ, पल-दो पल की परेशानी के लिए तुम पीढिय़ों की याद दांव पर लगाओगे? पर विकास दर की प्रणवी थीसिस को मुलायम ने आईना दिखाया। मुलायम सिंह बोले- यह कैसा विकास। अगर देश में 125 से 130 अरब-खरबपति परिवार बाहर कर दो, तो देश की विकास दर क्या होगी? सचमुच सवाल मौजूं। देश में जितनी तेजी से करोड़पति अरबपति हुए। अरबपति खरबपति हुए, उतनी ही तेजी से आम आदमी की कंगाली भी बढ़ी। सुषमा स्वराज ने भी पीएम से पूछा- अर्थशास्त्री महोदय, यह आपका कैसा अर्थशास्त्र। एक तरफ आप विकास दर के साथ महंगाई को जायज ठहरा रहे। तो दूसरी तरफ अमीरी-गरीबी की खाई बढ़ रही। पर प्रणव दा यहां भी चालबाजी कर गए। गुड्स एंड सर्विस टेक्स यानी जीएसटी पर राज्यों की ओर से हरी झंडी नहीं मिल पा रही। सो प्रणव दा का दांव देखिए। बोले- जीएसटी लागू हो जाए, तो महंगाई के इलाज में रामबाण होगी। पेट्रोलियम पर टेक्स हो या बाकी और टेक्स, सब समान हो जाएगा। सो प्रणव दा ने आम आदमी को फिर समझाया। हे आम आदमी, वैसे भी एक क्षण में तुम करोड़ों के स्वामी बन जाते हो। दूसरे ही क्षण में दरिद्र बन जाते हो। मेरा-तेरा, छोटा-बड़ा, अपना-पराया यानी बीजेपी-कांग्रेस, लेफ्ट-सपा, एनडीए-यूपीए मन से मिटा दो। सिर्फ कांग्रेस को वोट दो। फिर देश का सारा खजाना तुम्हारा है और तुम सिर्फ कांग्रेस के हो। न यह शरीर तुम्हारा है न तुम शरीर के हो। यह अग्नि, जल, पृथ्वी, आकाश से बना है। सो हमने चारों जगह महंगाई बढ़ा दी। ताकि जीने और मरने में तुम्हें कोई फर्क समझ में न आए। आखिर तुम्हें इसी में मिल जाना है। परंतु आत्मा यानी कांग्रेस पार्टी स्थिर है। फिर तुम क्या चीज हो। तुम अपने आपको कांग्रेस को अर्पित करो, यही सबसे उत्तम सहारा है। जो इसके सहारे को जानता है, वह भय, चिंता, शोक से सर्वदा मुक्ता होकर खरबपति बन जाता है। सो हे आम आदमी, जो कुछ भी तू करता है, उसे कांग्रेस को अर्पण करता चल। ऐसा करने से सदा जीवन मुक्ति का आनंद अनुभव करेगा। यानी महंगाई पर संसद की भावना महज कागजी रह गई। कांग्रेस ने पानी पी-पीकर एनडीए राज के आंकड़े गिनाए। पर शरद यादव ने पूछ लिया- आप सिर्फ इतना बताओ, आपके तमाम प्रयासों के बावजूद महंगाई कम क्यों नहीं हो रही? पर जवाब वही, गांव, गरीब का दर्द समझती है सरकार। लेकिन सुनहरे भविष्य के लिए कठोर कदम लाजिमी। प्रणव दा ने दस किलोमीटर पैदल चलने का बचपन याद किया। दाम बांधो नीति को नकारा। कहा- ऐसा करने से मार्केट में सामान ही नहीं मिलता। पर प्रणव दा, कालाबाजारियों पर कार्रवाई कौन करेगा। कुल मिलाकर प्रणव दा ने यही कहा। देश में महंगाई है, पर आम आदमी परेशान नहीं, क्योंकि उसकी आमद बढ़ चुकी है। यानी आने वाले वक्त में महंगाई नहीं बढ़ी, तो कम भी नहीं ही होगी। सो महंगाई का गीता सार सुनने के बाद अब आप सब खड़े होकर बोलो, ‘महंगाई मैया के सैंया कांग्रेस की जय हो।’
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04/08/2010

Tuesday, August 3, 2010

विपक्षी गठजोड़ ने आखिर उड़ा दिए कांग्रेस के तोते

तो विपक्ष ने अपने हिस्से का महंगाई पुराण बांच दिया। अब बुधवार को प्रणव मुखर्जी लोकसभा में जवाब देंगे। तो आप यह तय समझिए, गीता सार से अधिक कुछ नहीं होगा। सो आम आदमी व्यर्थ चिंता न करे। महंगाई तो कांग्रेस राज का अटल सत्य। अगर सत्य के मार्ग पर चलना सीख सको, तो सीख लो। वरना अपने हाल पर जीते रहो। मंगलवार को महंगाई की बहस में कांग्रेस ने यही निचोड़ थमाया। बहस की शुरुआत तो विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज ने की। उन ने सरकारी दलीलों को आंकड़ों से धोया। पर आखिर में जो कहा, सच की गुंजाइश कम दिखी। सुषमा बोलीं- अगर हम विशुद्ध राजनीति करें, तो चाहेंगे, यह सरकार गिर जाए। पर हम व्यापारी नहीं, प्रहरी हैं, सो सरकार भी जिम्मेदारी समझे। अब आप ही बताओ, कौन सा राजनीतिक दल ऐसा, जो वोट बैंक का व्यापार न करता हो? वोट बैंक का सवाल न होता, तो हफ्ते भर संसद ठप क्यों रहती। पर सत्तापक्ष की बेशर्मी देखिए, राहत का भरोसा देना तो दूर, लोगों को और डरा दिया। सत्तापक्ष से दिल्ली की सीएम शीला आंटी के सांसद बेटे संदीप दीक्षित ने कमान संभाली। तो आप सोच लो, क्या कहा होगा संदीप ने। सचमुच मां की जुबान से बेटा अलग नहीं दिखा। संदीप ने देश के हर व्यक्ति पर महंगाई के असर की बात मानी। पर राहत के बजाए कल्पना के जगत में घुस गए। कहा- अगर अभी एनडीए की सरकार होती, तो पेट्रोल की कीमत 84 रुपए लीटर बढ़ चुकी होती। हमने तो आम आदमी के हित को देखते हुए अनुपात में बढ़ाया। जिस एनडीए ने दो-ढाई रुपए लीटर की कैरोसिन नौ रुपए कर दी, वह हम पर उंगली कैसे उठा सकता। पर विपक्ष के सांसदों ने फौरन जवाब दे दिया। विपक्ष की बैंचों से एक सुर में आवाज आई- इसलिए हम लोग आज यहां आ गए। यानी सत्ता से बेदखल होकर विपक्ष में बैठना पड़ा। सुषमा स्वराज ने तो संदीप के सवाल से पहले ही अपने भाषण में यह कबूला था। कहा था- हमने कीमत बढ़ाने पर महज एक केलकर कमेटी की रपट मान ली, सो आज विपक्ष में बैठने को मजबूर। पर सत्तापक्ष के पास कोई जवाब नहीं। ना ही अपनी मजबूरी का इजहार कर सकते। सो संदीप ने सुनहरे भविष्य की तस्वीर दिखा आम आदमी को फिर डरा दिया। संदीप का लब्बोलुवाब यही रहा। अगर परिस्थितियों के मुताबिक तेल की कीमतें नहीं बढ़ाईं, तो देश का भविष्य दांव पर होगा। हम भी वोट की राजनीति करें, तो देश को दांव पर लगाकर 20-25 रुपए लीटर पेट्रोल कर सकते हैं। पर तीन-चार साल बाद जब अगली सरकार आएगी, वैसे हमारी ही आएगी, तब क्या होगा? आने वाले वक्त में कच्चे तेल की कीमत 200 डालर प्रति बैरल होगी। तब इकट्ठे दाम बढ़ाए गए, तो तबकी पीढ़ी हमें कोसेगी। सो देश की जनता को सरकार की ओर से ठोस संदेश देना होगा। ताकि देश कठोर कदमों के लिए खुद को तैयार कर सके। इतना ही नहीं, संदीप ने दलील दी- महंगाई बढ़ी, तो किसानों को अच्छी कीमत भी मिली। पर यह भी कह दिया- कृषि उत्पादकता नहीं बढ़ रही। सो पीएम-एफएम महेंद्र सिंह धोनी के जमाने में अजीत वाडेकर के जमाने का विशेषज्ञ शामिल न करें। यानी संदीप ने अपनी भद्द खुद पिटवा ली। जब किसानों को अच्छी कीमत कांग्रेस राज में मिल रही, तो कृषि उत्पादकता क्यों नहीं बढ़ रही? पर मुलायम सिंह ने पूरी कलई खोल दी। बोले- अरहर दाल को पूरी प्रोसेसिंग के बाद बाजार में लाया जाए, तो तीस रुपए किलो कीमत बनती। फिर सौ रुपए तक कैसे पहुंची। यानी सरकार ने एक तरफ किसानों को लूटा, तो दूसरी तरफ आम आदमी को मारा। फायदा पहुंचा उन खास लोगों को, जो चुनावी चंदा देते। पर महंगाई के फन से नीली पड़ चुकी कांग्रेस के पास कोई जवाब नहीं। सो विपक्ष के जहर बुझे तीरों से लहूलुहान होकर भी उफ तक नहीं कर पाई। या यों कहें, समूची बहस में कांग्रेसी बैंचों पर मुर्दनी छाई रही, तो गलत नहीं होगा। तभी तो कांग्रेस ने इतने गंभीर मुद्दे पर कोई हैवीवेट नेता नहीं उतारा। अलबत्ता संदीप दीक्षित को उतारा, जो सुषमा-मुलायम-लालू-शरद के आगे बौने दिखे। पर बेचारी कांग्रेस करे भी क्या। विपक्षी एकता हर मुद्दे पर ऐसे घेर रही, कांग्रेस को कोई रास्ता ही नहीं दिख रहा। सचमुच कांग्रेस ने ठसक और हठधर्मिता की जो नीति अपनाई। मुलायम-लालू जैसे दिग्गजों को भी बीजेपी के साथ खड़ा कर दिया। लालू पहले ही कांग्रेस विरोधी साझा मंच की पैरवी कर चुके। तो अबके मुलायम ने इशारा किया। महंगाई पर बहस में मुलायम ने सीबीआई के इस्तेमाल और स्विस बैंक में जमा काले धन का मुद्दा उठाया। जिस मुद्दे को लेकर बीजेपी संसद से सडक़ तक उतर चुकी। मुलायम का दर्द आखिर छलक ही पड़ा। जब बोले- सीबीआई के नाम पर कब तक दबाओगे। कब तक सरकार चलाना चाहते हो। यह कैसी सरकार, मैं और लालू फंसेंगे सीबीआई में, बाकी स्विस बैंक में जमा करने वाले मौज करेंगे। यह देश नहीं चल रहा, सिर्फ सरकार चल रही। अब मुलायम-लालू का दर्द का मतलब समझ लो। लालू-मुलायम ने तो बीजेपी को कह दिया- आप सांप्रदायिकता छोड़ दीजिए। यानी विपक्ष की लामबंदी सरकार का सिरदर्द बन चुकी। कॉमनवैल्थ का भ्रष्टाचार गले की नई फांस। मुलायम ने तो खुलासा कर दिया- अपने चौदह स्टेडियम को दुरुस्त करने में चालीस हजार करोड़ खर्च हो गए। पर इतने में चीन ने चौदह नए स्टेडियम खड़े कर ओलंपिक करा लिए। यानी सीबीआई, ब्लैकमनी, कॉमनवैल्थ और बाकी तमाम मुद्दे, जहां विपक्षी एकता सरकार के कोढ़ में खाज। ---------
03/08/2010

Monday, August 2, 2010

महंगाई पर सरकार के पक्ष में विपक्ष ने डाला ‘वोट’

‘यह सदन अर्थव्यवस्था पर पड़ रहे मुद्रास्फीति के दबाव पर चिंता व्यक्त करता है और सरकार से आह्वान करता है कि आम आदमी पर पड़े रहे मुद्रास्फीति के दुष्प्रभाव को रोकने के लिए कार्रवाई करे।’ संसद में मंचन के लिए आम आदमी की खातिर यही स्क्रिप्ट तैयार हुई। अब जरा संविधान के तहत ली जाने वाली शपथ की भाषा देखिए- ‘मैं.. ईश्वर के नाम पर शपथ लेता हूं कि सत्यनिष्ठा के साथ संविधान के प्रति अपने दायित्व का निर्वहन करूंगा....।’ पर जब राजनेता उस शपथ पर कायम नहीं रह पाते, तो महंगाई पर संसद में आने वाले इस प्रस्ताव से क्या होगा? संसद तो अब सत्ताधीशों की कठपुतली बन चुकी। सो हफ्ते भर बाद गतिरोध टूट गया। पक्ष-विपक्ष की ऐसी जुगलबंदी हुई, बेचारा आम आदमी तमाशबीन ही रह गया। प्रस्ताव में आम आदमी का हित तो दूर, उसकी समझ में आने वाली भाषा तक नहीं। आखिर किस आम आदमी की समझ में मुद्रास्फीति आएगी। विपक्ष ने खूब कोशिश की, मुद्रास्फीति की जगह मूल्य वृद्धि का जिक्र हो। पर सरकार ने नहीं माना। आखिर सरकार खुद को कटघरे में क्यों खड़ी करती। मनमोहन सरकार को तो विकास दर पर गुरूर। अब एक नई रपट आ गई, नेशनल काउंसिल ऑफ एप्लाइड इकनोमिक रिसर्च ने खुलासा किया, देश में गरीब से ज्यादा अमीर लोग हो गए। अब जब ऐसे-ऐसे आंकड़े आएंगे। तो सरकार को महंगाई कहां दिखेगी। दिल्ली की कांग्रेसी सीएम शीला आंटी तो न जाने कब से कह रहीं। लोगों की आमदनी बढ़ चुकी, सो महंगाई कोई मुद्दा नहीं। देखो, अब रिसर्च में शीला आंटी की बात सच साबित हुई। पर विपक्ष वाले मानते ही नहीं थे। अब माई का लाल विपक्षी दल कह देगा, महंगाई से आम आदमी परेशान। अरे भई, जब कोई आम आदमी ही नहीं, तो महंगाई से कौन परेशान? अगर महंगाई बढ़ी, तो अमीरी उससे कहीं अधिक बढ़ी। सो सरकार ने विपक्ष के नेताओं को साफ बतला दिया, भले कुर्ता फाड़ो या बाल नोंचो, चर्चा होगी तो मुद्रास्फीति पर। अब विपक्ष वाले बेचारे क्या करते। सो प्रणव दा यहां नाश्ता किया, चाय पी और मान गए। पर लाज दोनों की रहे, सो दो शब्द विपक्ष के मान लिए, तो एक अपना मनवा लिया। पर मुद्रास्फीति की चिंता से आम आदमी को क्या मिलने वाला? मनमोहन राज में ही मुद्रास्फीति की दर माइनस तक जा चुकी। पर महंगाई कभी कम नहीं हुई। अबके भी मुद्रास्फीति की दर घट रही। सो कांग्रेस इतराते हुए कह रही- सरकार के ठोस कदमों का नतीजा आने लगा। पर महंगाई तो बाजार जाने पर मालूम पड़ती। एयरकंडीशंड कमरों में बैठने वाले नेताओं को महंगाई क्या मालूम। पर महंगाई के बहाने अपने वेतन-भत्ते जमकर बढ़ाने वाले। तभी तो दोनों पक्षों ने सांठगांठ कर ली। वरना शुक्रवार को बीजेपी-एनडीए हुंकार भर रहे थे, नियम 184 के तहत ही बहस चाहिए। शुक्रवार को ही सोमवार के लिए नोटिस लगा दिया। पर सोमवार संसद की कार्यवाही शुरू होने से पहले ही विपक्ष की हुंकार गीदड़ भभकी बनकर रह गई। सोमवार को प्रणव मुखर्जी ने नाश्ते पर विपक्षी नेताओं को न्योता दिया। गतिरोध तोडऩे का मजमून पेश किया। तो विपक्ष भी बिना हील-हुज्जत के मान गया। पर सवाल, जब इसी प्रस्ताव से मानना था, तो सत्र से पहले ही स्पीकर की बात क्यों नहीं मानी? मीरा कुमार ने भी तो आसंदी से प्रस्ताव का फार्मूला दिया था। फिर हफ्ते भर की नौटंकी क्यों? अब बीजेपी की दलील, महंगाई पर हफ्ते भर हंगामा कर लिया। सो अब सीबीआई, भोपाल गैस कांड, भारत-पाक वार्ता जैसे कई मुद्दे संसद में उठाने हैं। बीजेपी के शीर्ष नेताओं ने आडवाणी के साथ बैठकर पहले मंत्रणा की। तो तय कर लिया था, अब सदन चलने देंगे। अगर सरकार नियम 184 नहीं मानी, तो 193 के तहत की बहस का बॉयकाट करेंगे। ताकि संसद सुचारु रूप से चल सके। आडवाणी तो शुक्रवार को राष्ट्रपति भवन में ही गांडीव समर्पण कर चुके। इधर सरकार ने भी ठान लिया था, नियम 193 के सिवा कुछ मंजूर नहीं होगा। अगर विपक्ष संसद नहीं चलने देगा, तो हंगामे में ही कामकाज निपटा चलते बनेंगे। सो सोमवार को नियम 342 के तहत बहस करने, फिर आसंदी से सदन की भावना व्यक्त करने का फार्मूला आया। तो सभी दल खुशी-खुशी राजी हो गए। अब मंगलवार को लोकसभा में जुबानी दंगल होगा। राज्यसभा बुधवार को सुध लेगी। सो झेंप मिटाने को विपक्ष कह रहा- न सरकार जीती, न विपक्ष हारा। सचमुच हारा, तो आम आदमी। सो सोमवार को संसद सुचारु ढंग से चली। तो जातीय जनगणना, जम्मू-कश्मीर की आग का मुद्दा उठा। पर सरकार से क्या उम्मीद करेंगे। जब छह साल से बढ़ रही महंगाई की फिक्र नहीं, तो डेढ़ महीने से जल रहे जम्मू-कश्मीर की क्या फिक्र करेगी। सो संसद अब सिर्फ नाम की सर्वोपरि, असल में राजनीतिक दलों के लिए उपकरण भर रह गई। तभी तो हंगामा संसद में किया, समझौता नाश्ते की टेबुल पर। कल तक विपक्ष कह रहा था- पहले महंगाई की चर्चा, बाकी काम बाद में। ऐसी रार ठनी, लगा, अब तो महंगाई दम तोड़ देगी। पर वोटिंग वाले नियम की मांग करते-करते विपक्ष ऐसा लुढक़ा, अपना ‘वोट’ भी सत्तापक्ष को दे दिया।
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02/08/2010

Friday, July 30, 2010

महंगाई की मझधार में संसद का मानसून सत्र!

संसद लाचार दिख रही। सो कवि सुदामा पांडे धूमिल की कुछ पंक्तियां याद आ रहीं। उन ने लिखा- मुझसे कहा गया कि संसद देश की धडक़न को प्रतिबिंबित करने वाला दर्पण है। जनता को जनता के विचारों का नैतिक समर्पण है, लेकिन क्या यह सच है? पर हकीकत में हफ्ते भर से संसद में क्या हो रहा। सरकार ने गांठ बांध रखी, तो विपक्ष ने रार। यों सरकार ने एक चाल जरूर चली। स्पीकर-चेयरमैन की ओर से कॉमन प्रस्ताव का सुर्रा छेड़ा। महंगाई पर आसंदी से चिंता जता बहस हो जाए। ताकि नियम का फच्चर खत्म हो। पर यह फार्मूला सत्र से पहले खुद मीरा कुमार दे चुकीं। विपक्ष ने तभी प्रस्ताव ठुकरा दिया था। विपक्ष महंगाई को सरकार की नाकामी साबित करना चाह रहा। पर सरकार किसी प्रस्ताव में यह स्वीकार करने को राजी नहीं। सो बीजेपी ने शुक्रवार को कॉमन प्रस्ताव की बात खारिज कर दी। चुनौती दी- अगर सरकार खुद को बहुमत में मानती है, तो बहस की मंजूरी देकर विपक्ष के प्रस्ताव को निरस्त करे। अब अगर कॉमन प्रस्ताव की बात सच मानी जाए, तो क्या संसद के नियम सिर्फ खास लोगों के लिए? अगर संसद सचमुच जनता की धडक़न को प्रतिबिंबित करने वाला दर्पण, तो महंगाई पर नियमों का बंधन क्यों? एटमी डील की खातिर मनमोहन तो सरकार की बलि चढ़ाने को तैयार थे। पर महंगाई से त्रस्त जनता के लिए परहेज क्यों? जनता का दर्द विशेष नियम के जरिए जाहिर करने में क्या एतराज? सचमुच अपना लोकतंत्र भले विस्तृत हो चुका हो। मतदाताओं में जागरूकता भी आ चुकी हो। पर नेताओं के मायाजाल तक जनता अभी नहीं पहुंच पाई। तभी तो सोनिया गांधी और सोमनाथ जैसे दिग्गजों की कुर्सी लाभ के पद से खिसकने लगी, तो इसी संसद को मनमोहन सरकार ने नया कानून बनाने के लिए मजबूर कर दिया। बाकायदा बिल लाया गया। आनन-फानन में दोनों सदनों से पारित करा राष्ट्रपति को भेज दिया। बिल बनाते वक्त सभी दलों को संदेशा भिजवा दिया- आपके जितने भी सांसद लाभ के जिन-जिन पदों पर बैठे, उसकी लिस्ट दे दीजिए। सो कुछ ने लिस्ट थमाई, पर तब बीजेपी ने नैतिकता दिखाई। कानून भी ऐसा बना, जो बना 2007 में, पर 1950 से लागू हो गया। ताकि कोर्ट कोई अड़चन न डाल सके। ऐसा सिर्फ सोनिया और सोमनाथ जैसों के लिए ही संभव। आम आदमी की खातिर न कामरोको मंजूर, न नियम 184 के तहत चर्चा। अलबत्ता खम ठोककर कह दिया- अगर 193 के तहत चर्चा चाहिए, तो लो, वरना फूटो। यानी सरकार की ओर से दो ही फार्मूले। या तो विपक्ष 193 की चर्चा मान ले, या चेयर से कॉमन प्रस्ताव के तहत। पर बीजेपी की मजबूरी, अबके लालू-मुलायम जैसे नेता नियम 184 पर अड़े हुए। अब अगर बीजेपी ने सरकार से अंदरखाने समझौता किया, तो लालू-मुलायम को मौका मिल जाएगा। अब तक बीजेपी लालू-मुलायम पर सीबीआई के डर से तलवे चाटने का आरोप लगाती रही। सो बीजेपी चाहे भी, तो ऐसा नहीं कर सकती। शुक्रवार को एनडीए ने फिर रणनीति बनाई, तो सोमवार के लिए नोटिस स्पीकर को भिजवा दिया। एसएस आहलूवालिया ने एलान कर दिया- नियम 184 के तहत बहस नहीं मानी, तो संसद नहीं चलने देंगे। पर सरकार भी झुकने को तैयार नहीं। यों सरकार के तेवर से तो इतना साफ हो चुका, महंगाई पर चाहे जिस नियम के तहत चर्चा करा लो। महंगाई का बाल बी बांका न होगा। शुक्रवार को कांग्रेस प्रवक्ता मनीष तिवारी का बयान सचमुच आम आदमी के जख्म पर नमक लगाने वाला रहा। बोले- सरकार के रचनात्मक कदमों से महंगाई दर कम हो रही। यह खबर सभी अखबारों में छपी। सो विपक्ष अगर पढऩे की कृपा करे, तो देश और संसद पर कृपा हो जाएगी। पर मनीष तिवारी यह भूल रहे, देश के अखबारों में ही आम आदमी का दर्द कई बार छलका। क्या कांग्रेस या मनमोहन ने सुध ली। अगर सुध ली, तो नतीजा क्या निकला? आज भले महंगाई दर कम हो रही, पर महंगाई कम नहीं हुई। सो संसद में बना गतिरोध अब दूसरे हफ्ते में प्रवेश कर रहा। दोनों पक्षों के तेवर अब भी जस के तस। यों गतिरोध तोडऩे की जिम्मेदारी सत्तापक्ष की। पर हंगामे में जब खुद संसदीय कार्यमंत्री पार्टी बन जाएं, तो भला गतिरोध कहां टूटने वाला। सो फ्लोर मैनेजमेंट में सरकार फिर नकारा साबित हो रही। शुक्रवार को एक वरिष्ठ मंत्री और एक सोनिया के बेहद करीबी नेता ने साफ कर दिया। वोटिंग वाले नियम के तहत बहस कतई मंजूर नहीं करेंगे। अगर अबके मंजूर कर लिया, तो विपक्ष इसे परंपरा बना लेगा और हर छोटे से छोटे मुद्दे पर वोटिंग की मांग करेगा। अगर सचमुच विपक्ष को सरकार की विफलता नजर आ रही, तो सीधे अविश्वास प्रस्ताव लेकर आए, सरकार सामना करने को तैयार। इतना ही नहीं, मंत्री ने यह भी पूछा, क्या बहस होने से महंगाई कम हो जाएगी? अब हाथ कंगन को आरसी क्या, पढ़े-लिखे को फारसी क्या। नियम तो सिर्फ बहाना, महंगाई को तो है बढ़ते ही जाना। यानी सरकार का इरादा साफ। हफ्ते भर का हंगामा बहुत हो चुका। अब विपक्ष सदन चलने दे, वरना हंगामे में ही सारे बिल पास करा सत्र अनिश्चितकाल के लिए स्थगित करा लेंगे। यानी महंगाई के मझधार में मानसून सत्र। वैसे भी मौजूदा सत्र में सरकार के पास जितना काम नहीं, उससे अधिक घिरने वाले मुद्दे। कॉमन वैल्थ का घोटाला, सीबीआई का इस्तेमाल, भोपाल गैस त्रासदी, भारत-पाक वार्ता और अब तेलंगाना की आग भी भडक़ेगी। शुक्रवार को तेलंगाना की बारह सीटों के नतीजे आए, तो कांग्रेस का अध्यक्ष भी चुनाव हार गया।
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30/07/2010

Thursday, July 29, 2010

संसद सरकार की बपौती, महंगाई महज विपक्ष की

सांच को आंच नहीं, सरकार को विपक्ष रास नहीं। सो गुरुवार को भी संसद के दोनों सदन बैठने से पहले ही उठ गए। कामरोको खारिज हुआ। तो विपक्ष ने अबके नियम 184 के तहत नोटिस थमाया। पर बात घुमा-फिरा कर वोटिंग तक ही पहुंचेगी, सो सरकार को गवारा नहीं। स्पीकर मीरा कुमार ने भी तत्काल कोई रूलिंग नहीं दी। संसदीय कार्यमंत्री पवन कुमार बंसल नियम 193 के पहले के नोटिस पर अड़ गए। दलील दी, सुदीप बंदोपाध्याय और सांसद प्रेमदास राय का नोटिस 27 जुलाई को ही आया। सो पहले उस पर विचार होना चाहिए। पर अब मुश्किल मीरा कुमार की। कामरोको प्रस्ताव खारिज किया, तो प्रणव दा की दलील ही दोहरा दी। अब नियम 184 की फांस, सो सरकार की दलील के बाद सुदीप बंदोपाध्याय और राय के नोटिस को प्राथमिकता दी। तो निष्पक्षता पर सवाल उठना लाजिमी। अगर स्पीकर नियम 193 के तहत बहस की मंजूरी देती हैं। तो सवाल होगा- जिस दिन कामरोको खारिज किया, उस दिन ही रूलिंग क्यों नहीं दी? नियम 193 का नोटिस तो तब भी सामने था। पर मीरा ने रूलिंग में सिर्फ कामरोको खारिज किया, साथ ही विपक्ष को किसी और नियम में नोटिस देने को कहा। अब विपक्ष ने नियम 184 का पेच फंसाया। तो इम्तिहान मीरा का। गुरुवार को विपक्ष ने सीधे तो नहीं, इशारों में ही निष्पक्षता पर सवाल उठा दिया। सुषमा स्वराज ने मीरा के फैसले पर निराशा और दुख जताया। तो शरद यादव ने हल्के-फुल्के अंदाज में संदेश दे दिया। कहा- साल बीत गया, आपका प्रेम प्रणव बाबू की तरफ खूब झलकता है। पर हमारी ओर दया कभी नहीं होती। आपके कल के फैसले से देश की जनता को भी बहुत तकलीफ हुई। रात भर हम लोगों को नींद नहीं आई। सोचते रहे, अध्यक्ष से कैसे लड़ें। सो अब हम यह नोटिस लेकर आए। मुलायम सिंह ने भी अपने अंदाज में विरोध जता दिया। बोले- सदन नहीं चल पा रहा, तो सरकार जिम्मेदार है। आप क्यों सरकार की जिम्मेदारी ले रही हैं। विपक्ष को हमेशा स्पीकर से संरक्षण मिला। आप भी हमें संरक्षण दें। यानी कुल मिलाकर स्पीकर की रूलिंग विपक्ष का हाजमा बिगाड़ गई। पर स्पीकर से सीधे मोर्चा लिया, तो मुद्दा ही बदल जाएगा। सो शुक्रवार को फिर विपक्ष अपनी मांग दोहराएगा। यानी सब कुछ तय स्क्रिप्ट के मुताबिक होगा। शुक्रवार को भी संसद नहीं चलेगी। पर सोमवार को सब कुछ सामान्य नहीं, तो कम से कम महंगाई की चर्चा सरकारी हिसाब से निपट जाएगी। यों विपक्ष के तरकश में अभी कई ब्रह्मास्त्र। पर सरकार भी मुख्य विपक्षी दल बीजेपी को किनारे करने का फार्मूला बना चुकी। सो विपक्षी एकता का इम्तिहान अगले हफ्ते होगा। पर महंगाई को लेकर ठनी रार अब खत्म समझिए। गुरुवार को बीजेपी ने दस करोड़ हस्ताक्षरों वाला ज्ञापन महामहिम प्रतिभा पाटिल को सौंप दिया। राष्ट्रपति से मिलकर लौटे। तो महंगाई पर विपक्ष गांडीव समर्पण करता ही दिखा। आडवाणी ने बेहिचक कह दिया- हमने अपना फर्ज पूरा किया। सडक़ से संसद तक और सरकार से अब राष्ट्रपति तक अलख जगा दी। विपक्ष इससे अधिक कुछ नहीं कर सकता। सचमुच विपक्ष अब करे भी क्या। जब सरकार की जिद तानाशाही दिखने लगे। तो विपक्ष नहीं, सिर्फ जनता सबक सिखा सकती। पर मनमोहन सरकार की यह कैसी जिद। अगर सरकार को नंबर गेम का पूरा भरोसा, तो वोटिंग से डर क्यों? अगर सरकार ईमानदारी से दायित्व निभा रही। तो कामरोको या 184 के तहत बहस से परहेज क्यों? आखिर सत्तापक्ष इस जिद पर क्यों अड़ा हुआ कि वोटिंग वाले नियम के तहत बहस नहीं होने देंगे। क्या लोकतंत्र में विपक्ष की कोई हैसियत नहीं? विपक्ष ही लोकतंत्र की सही पहचान। पर विपक्ष को सत्ता के नशे में कुचलना हिटलर-मुसोलिनी से कम नहीं। हिटलर-मुसोलिनी तो विरोधियों को सीधे मरवा देते थे। पर संसद में सरकार का जो रवैया, वह भी कुछ कम नहीं। मनमोहन राज में महंगाई बढ़ी, यह खुद सोनिया-मनमोहन भी कई बार मान चुके। कई बार कांग्रेस वर्किंग कमेटी ने भी चिंता जताई। पर सरकार की दलील, विपक्ष के कामरोको या 184 के तहत चर्चा नहीं हो। अलबत्ता सुदीप बंदोपाध्याय और प्रेमदास राय के 193 वाले नोटिस पर चर्चा हो। क्या यह लोकतंत्र की निशानी? सुदीप और राय कोई विपक्षी दल के सांसद नहीं। एक तृणमूल के, तो दूसरे सिक्किम डेमोक्रेटिक फ्रंट के। दोनों मनमोहन सरकार के खेवनहार। अब सत्तापक्ष आपस में ही विपक्ष की जगह ले ले, अंदरखाने गुणा-भाग कर बहस करने लगें। तो फिर विपक्ष के क्या मायने? क्या संसद सत्तापक्ष की बपौती, जो अपनी मर्जी चलाए? महंगाई पर बहुमत विपक्ष के साथ। फिर भी न स्पीकर और न सरकार बहस को राजी। जिस नियम के तहत बहस को राजी, उसके तहत तेरह बहस हो चुकीं। पर महंगाई तो कम नहीं हुई, आम आदमी की तेरहवीं जरूर हो रही। अब तृणमूल और एसडीएफ के नोटिस का क्या मतलब। यही ना, सरकार के सहयोगी भी कीमत बढ़ोतरी को जायज नहीं मान रहे। क्या यह सरकार की संवैधानिक विफलता नहीं? आखिर सरकार ऐसा व्यवहार क्यों कर रही, मानो महंगाई सिर्फ विपक्ष की और संसद सरकार की बपौती। लोकतंत्र को सचमुच लूटतंत्र बना दिया। कॉमन वेल्थ के नाम पर जो लूट मची, उसकी पोलपट्टी तो अक्टूबर में खुलेगी। पर कलई गुरुवार को सीवीसी ने खोल दी। सतर्कता आयोग ने बता दिया- कई करोड़ का घोटाला हुआ। अधिक कीमत पर अयोग्य कंपनियों को ठेके दिए गए। महंगाई बढ़ाने में कॉमन वेल्थ की भी अहम भूमिका। सो सरकार की सफलता आप खुद देख लें।
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29/07/2010