घाटी की आग को अमेरिकी घी ने शोला बना दिया। पिछले तीन महीने से घाटी का बवाल थम नहीं रहा। अब हालात इतने बदतर हो चुके, एक चिंगारी भी शोला बन जाती। अमेरिका के एक पादरी ने 9/11 की बरसी पर कुरान-ए-पाक जलाने की धमकी दी। पर बराक ओबामा ने दखल दिया। चौतरफा आवाज उठी, तो पादरी ने कदम पीछे खींचा। फिर भी कश्मीर में मुद्दा बन गया। अलगाववादियों ने भावना भडक़ाने में कसर नहीं छोड़ी। सो ईद के दिन से अब तक हिंसक वारदातों में कई जानें जा चुकीं। कई सरकारी इमारतें स्वाहा हो चुकीं। सोमवार को उमर अब्दुल्ला केबिनेट ने शांति की अपील की। अमेरिकी पादरी के कदम की भत्र्सना की। पर कुरान वाली घटना तो महज बहाना बनी। असल में आम्र्ड फोर्सेज स्पेशल पॉवर एक्ट पर केंद्र सरकार की ऊहापोह से नाराजगी। ईद से पहले उमर ने सोनिया-मनमोहन से मुलाकात कर कुछ जगहों से एक्ट को हटाने का फार्मूला रखा था। ताकि घाटी में अमन-चैन बहाल किया जा सके। पर मनमोहन केबिनेट में ही इस पर दो राय हो गईं। रक्षा मंत्री ए.के. एंटनी एक्ट को हटाए जाने से सहमत नहीं। पर राजनीतिक लिहाज से कांग्रेस और गृह मंत्रालय हटाने के पक्ष में। सो दो बार टलने के बाद सोमवार को सुरक्षा मामलों की केबिनेट कमेटी बैठी। तो तीन घंटे की मत्थापच्ची के बाद भी सरकार आगे बढऩे के बजाए एक महीना पीछे चली गई। अब बुधवार को सर्वदलीय मीटिंग होगी। तो आम्र्ड फोर्सेज स्पेशल पॉवर एक्ट पर चर्चा होगी। पर क्या सचमुच मनमोहन राजनीतिक आम सहमति बनाना चाह रहे या सिर्फ दिखावा? सनद रहे सो याद दिलाते जाएं। पिछले महीने दस अगस्त को पीएम ने सर्वदलीय मीटिंग बुलाई थी। तो ओपनिंग स्पीच का लाइव टेलीकास्ट करा कश्मीरी अवाम को भी संबोधित किया था। शांति की तमाम अपील के साथ-साथ बुनियादी ढांचे में सुधार के लिए सी. रंगराजन की रहनुमाई में कमेटी का वादा किया। अपने संबोधन में मनमोहन ने साफ तौर पर आम्र्ड फोर्सेज स्पेशल एक्ट को खत्म करने का इरादा भी जतला दिया। जब कहा था- जम्मू-कश्मीर पुलिस को अब खुद ही जिम्मेदारी लेनी होगी। हम अवाम की भावना समझते हैं। अब कोई पूछे, जब पिछले महीने की सर्वदलीय मीटिंग में ही इरादा साफ कर दिया। तो दुविधा का दिखावा किसके लिए? बीजेपी इस एक्ट को हटाने के खिलाफ। पर जैसे सरकार में दो राय, अब बीजेपी के राम जेठमलानी का अलग राग। जेठमलानी भी इस बात से इत्तिफाक रखते कि प्रयोग के तौर पर कुछ जगहों से स्पेशल एक्ट हटाया जाना चाहिए। जेठमलानी का जिक्र इसलिए जरूरी, क्योंकि पीएम से मिलने गए बीजेपी के शीर्ष प्रतिनिधिमंडल में आडवाणी, जेतली, सुषमा के अलावा चौथे शख्स जेठमलानी थे। सो विपक्ष हो या सरकार, जब आपस में ही कोई एका नहीं। तो अमन बहाली की उम्मीद कैसे करें। घाटी की आग में सब अपनी-अपनी रोटियां सेक रहे। यों तो आम्र्ड फोर्सेज स्पेशल पॉवर एक्ट 1958 में तब बना था, जब पूर्वोत्तर के राज्यों में उग्रवाद हावी हो चुका था। पर आतंकी घटनाओं के मद्देनजर 1990 में जम्मू-कश्मीर में भी लागू कर दिया गया। जिसमें सेना को देश की सुरक्षा की खातिर कुछ विशेष अधिकार दिए गए। पर मानवाधिकारवादियों से लेकर यूएन ने भी इसका विरोध किया। घाटी से पहले मणिपुर में इस एक्ट के खिलाफ तीखे प्रदर्शन हो चुके। मनोरमा बलात्कार कांड से सेना की भूमिका पर कई सवाल उठे थे। इस एक्ट को मणिपुर से हटाने के लिए एक्टिविस्ट शर्मिला की दस साल से भूख हड़ताल चल रही। सो सरकार की मुश्किल सिर्फ कश्मीर नहीं। अलबत्ता कश्मीर से एक्ट हटाया गया। तो एक्शन दूर तलक होगा। तब केंद्र के लिए आंतरिक सुरक्षा का ऐसा खतरा पैदा होगा, जिसे संभालना सरकार के लिए टेढ़ी खीर होगा। पर स्पेशल पॉवर एक्ट को वापस लेने का सुर्रा भी मनमोहनवादियों ने ही छेड़ा। मनमोहन जब पिछली बार कश्मीर दौरे पर गए। तो अलगाववादियों से वार्ता की पेशकश कर दी। अलगाववादी पिछले कुछ चुनावों में अपनी हार और भारतीय लोकतंत्र के प्रति अवाम के जुनून को देख पस्त हो चुके थे। पर जम्मू-कश्मीर के चौकलेटी चेहरे वाले युवा सीएम उमर अब्दुल्ला जमीनी हकीकत को नहीं भांप पाए। जून में सुरक्षा बलों की गोलीबारी से 11 साल के बच्चे की मौत के बाद से भडक़ी हिंसा में अब तक पाच-छह दर्जन लोग मारे जा चुके। पर उमर अभी तक संभाल नहीं पाए। सो उन ने भी राजनीतिक पैकेज के नाम पर स्पेशल एक्ट में नरमी का फार्मूला रख दिया। जो अब मनमोहन के गले की ऐसी फांस बना, जो न निगलते बन रहा, न उगलते। सो अलगाववादियों को फिर से पनपने देने के लिए भी मनमोहन-उमर सरकार ही जिम्मेदार। अगर वक्त रहते उमर ने संवेदना दिखाई होती, मनमोहन ने सक्रियता। तो आज घाटी के हालात काबू से बाहर न होते। उमर ने पिछली लोकसभा में अमरनाथ श्राइन बोर्ड जमीन विवाद के वक्त आग लगाऊ भाषण दिया था। तो कांग्रेस ने खूब मेजें थपथपाई थीं। उसी भाषण से उमर का ग्राफ अवाम की नजर में बढ़ा। पर सचमुच में उमर ने अपरिपक्वता दिखाई थी। जो तब देखने-सुनने में भले अच्छी लगी हो। पर अब घाटी उसका नतीजा भुगत रही। सो बीजेपी उमर को हटाने की मांग कर रही। तो कांग्रेस को कुछ सूझ नहीं रहा। सो बीजेपी की मांग पर सोमवार को पलटवार किया। तो कहा- वाजपेयी राज में बीजेपी ने कौन सा तीर मार लिया था? मतलब साफ, कांग्रेस भी कोई तीर मारने नहीं जा रही। घाटी भले झुलसती रहे।
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13/09/2010
Monday, September 13, 2010
Friday, September 10, 2010
गर लौह पुरुष, तो इतने बेबस क्यों आडवाणी?
अब चाहे आडवाणी विरोध करें या कोई और, अर्जुन मुंडा तो झोला उठाए गुरुजी के साथ चल दिए। जब सिर पर संघ और गढ़ के रक्षक गडकरी का हाथ हो। तो शपथ में कोई आए या न आए, मुंडा को फर्क नहीं। सो आडवाणी खेमे के विरोध से बेपरवाह अर्जुन चिडिय़ा की आंख की तरह सिर्फ गुरुजी को साधने में जुटे। ताकि अस्थिरता की दलील देने वालों को स्थिरता की मिसाल पेश कर सकें। अब अर्जुन और गुरुजी की जोड़ी भले झारखंड में सत्ता का मजा लूटे। पर बीजेपी में महाभारत हो गया। आडवाणी कैंप को झारखंड का फैसला नहीं सुहा रहा। सो शनिवार को शपथ ग्रहण समारोह से दूरी बनाएगा। पर अहम सवाल, आडवाणी की छठी इंद्री देर से क्यों जागती? अगर झारखंड में शिबू संग सरकार बनाने के खिलाफ थे। तो गडकरी के इकतरफा फैसले पर उंगली क्यों नहीं उठाई? क्यों नहीं संसदीय बोर्ड की बैठक बुलाने की मांग की? पर अब जब मेज पर खाना परोसा जा चुका, तो आडवाणी कैंप मैन्यू क्यों बदल रहा? सचमुच फैसला हो जाने के बाद फैसले पर उंगली उठाना आडवाणी की आदत हो चुकी। भारत सुरक्षा यात्रा के वक्त पुणे में आडवाणी ने कंधार प्रकरण से पल्ला झाडऩे की कोशिश की थी। खुद को लौह पुरुष साबित करने को कह दिया- कंधार जाकर आतंकियों को छोडऩे के फैसले के खिलाफ थे। फिर बहस छिड़ी, तो खुद को इस फैसले से भी अनजान बताना शुरू कर दिया। जसवंत सिंह आतंकियों को लेकर कंधार गए, इसकी भी जानकारी से खुद को अनभिज्ञ बताया। मानो कंधार प्रकरण सिर्फ वाजपेयी और बीजेपी का, आडवाणी तो पाक-साफ। पर सांच को आंच नहीं, खुद जसवंत सिंह ने कह दिया था- आडवाणी शायद भूल गए होंगे। सचमुच इतना बड़ा अपहरण कांड हो, मसूद अजहर जैसे तीन खूंखार आतंकी विशेष विमान से कंधार छोडऩे का फैसला हो। और तबके गृहमंत्री आडवाणी पूरे फैसले से पल्ला झाड़ें, तो क्या उन्हें आप लौह पुरुष मानेंगे? सिर्फ कंधार प्रकरण ही नहीं, जिन्ना प्रकरण याद करिए। देश के बंटवारे के लिए जिम्मेदार मोहम्मद अली जिन्ना को कराची जाकर आडवाणी ने सेक्युलर बताया। तो पूरा संघ परिवार खिलाफ खड़ा हो गया था। पर तब आडवाणी न तो अपने बयान से डिगे और ना ही अपने बयान को ठीक से अभिव्यक्त कर पाए। भले अध्यक्षी छोडऩी पड़ी। पर अंदरखाने ऐसा खेल हुआ, संघ ने आडवाणी को पीएम इन वेटिंग बना दिया। राजस्थान बीजेपी के विवाद में आडवाणी की भूमिका हमेशा बदलती रही। जब 2009 के आम चुनाव में आडवाणी पीएम इन वेटिंग ही रह गए। कई राज्यों में बीजेपी का सूपड़ा-साफ हुआ। तो आडवाणी के घर कोर ग्रुप की मीटिंग हुई। हार वाले राज्यों में चरणबद्ध नेतृत्व परिवर्तन का खाका बना। राजस्थान बीजेपी के अध्यक्ष पद से ओम माथुर ने तो लोकसभा नतीजे के चौथे दिन ही इस्तीफा दे दिया था। पर विवाद तब खड़ा हुआ, जब अगस्त में वसुंधरा राजे को नेता विपक्ष से इस्तीफा देने को कहा गया। फिर तीन महीने तक वसुंधरा बनाम राजनाथ जो हाई वोल्टेज ड्रामा चला, जगजाहिर। आडवाणी की शह पर वसुंधरा ने अध्यक्ष को चुनौती दे डाली। फिर जिस फैसले को आडवाणी ने खुद सहमति दी थी, बाद की संसदीय बोर्ड की मीटिंग में पलटने की मांग करने लगे। पर राजनाथ सिंह ने दो-टूक इनकार कर दिया था। आखिर में वसुंधरा का इस्तीफा हुआ। फिर अगस्त में शिमला में चिंतन बैठक से पहले जसवंत सिंह जिन्ना के मुरीद हो गए। तो हार पर चिंतन से पहले बीजेपी ने जसवंत की चिंता की। जसवंत को बिना वकील-दलील-अपील के बीजेपी से बाहर कर दिया। तब चिंतन बैठक के आखिरी दिन सुषमा स्वराज ने आडवाणी के भाषण का सार परोसा। तो साफ-साफ कहा था- आडवाणी ने कहा, जिनके (जसवंत के) साथ तीस साल रहा, उनका निष्कासन दुखद है। लेकिन कार्यकर्ता इससे कम में संतुष्ट नहीं होते। पर याद है ना, पखवाड़े भर बाद ही आडवाणी कैंप से खबरें प्लांट होने लगीं। आडवाणी जसवंत के निष्कासन के खिलाफ थे। अब यह कैसी खिलाफत, यह आडवाणी और उनके समर्थक ही जानें। फिर निष्कासन की बरसी से पहले ही किस शान-ओ-शौकत के साथ जसवंत की बीजेपी में वापसी हुई। आडवाणी ने अहम भूमिका निभा जसवंत की ससम्मान वापसी कराई। पर कोई पूछे, शिमला के संसदीय बोर्ड की बैठक में क्या हो गया था? बी.सी. खंडूरी को सीएम पद से हटाने में भी आडवाणी बनाम राजनाथ जंग हुई थी। अगर आडवाणी जी की तरह थोड़ा और स्मरण करें, तो राजस्थान बीजेपी अध्यक्ष पद पर ओम माथुर की नियुक्ति के वक्त छिड़ा विवाद याद करिए। कैसे गुटबाजी सामने आई थी। उमा भारती को बीजेपी से आडवाणी के अध्यक्ष रहते निकाला गया। पर अब आडवाणी उनकी वापसी चाह रहे। लोकसभा चुनाव के वक्त सुधांशु मित्तल को असम का सह-प्रभारी बनाए जाने पर कैसे जेतली और राजनाथ में ठनी। जेतली ने सीईसी का लगातार बायकाट किया। पर आडवाणी ने पहले कोई बीच-बचाव का कदम नहीं उठाया। संघ को कभी मातृ संगठन तो कभी रोजमर्रा के काम में दखल देने वाला कहा। अब झारखंड में सरकार बनाने के खिलाफ बताए जा रहे। शपथ से दूरी बनाकर छवि बेहतर बनाने की कोशिश। क्या सचमुच झारखंड पर आडवाणी की नहीं चली। या सत्ता की रेवड़ी और छवि के बीच संतुलन बिठाने की कवायद? आडवाणी बीजेपी के वट वृक्ष। सो इतने कमजोर तो नहीं हो सकते। आखिर खुद को लौह पुरुष बताने वाले इतने बेबस क्यों?
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10/09/2010
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10/09/2010
Thursday, September 9, 2010
लोकतंत्र छोड़, जातितंत्र ही क्यों नहीं कहते?
तो राजनीतिबाजों ने कबीर वाणी पलटकर ही दम लिया। अब साधु ही नहीं, सबकी जाति पूछी जाएगी। केबिनेट ने गुरुवार को फैसला ले लिया, 2011 में जातीय गणना होगी। यानी मौजूदा जनगणना से इतर एक और दौर होगा। अब जाति पूछने को करीबन साढ़े तीन-चार हजार करोड़ खर्चे जाएंगे। क्या आजादी के 63 सालों में कभी किसी नेता या सरकार ने आम आदमी के घर जाकर पूछा- तुम्हारे पेट में अन्न का दाना पहुंचा या नहीं? जब कोई नेता आम आदमी के पेट की सुध नहीं ले सकता, तो जाति पूछने वाले कौन? जब दुनिया ग्लोबलाइजेशन के दौर में। संचार क्रांति के युग में जब दुनिया आगे बढ़ रही, तो भारत आजादी से पहले के दिनों में क्यों लौट रहा। सचमुच अपने नेताओं का जाति गणना से जन कल्याण लक्ष्य नहीं। अलबत्ता जाति की आड़ में अपनी राजनीति को अजर-अमर करना चाह रहे। जाति बंधन लगातार टूट रहे। पर जातीय गणना एक बार फिर देश को उलटी दिशा में ले जाएगी। अपने नेताओं को जनता की नहीं, सिर्फ अपनी फिक्र। जिनने कभी जाति बंधन को कमजोर नहीं होने दिया। राजनीतिक दलों में अध्यक्ष का चयन हो या पदाधिकारियों का। चुनाव में उम्मीदवारों को टिकट देना हो या सत्ता में आने वाले दल की बनने वाली केबिनेट का मामला। हर जगह जाति को महत्व दिया जाता। ताकि जातीय संतुलन बना रहे। अंग्रेजों ने भी जातीय जनगणना को इसलिए तरजीह दी थी, ताकि फूट डालो, राज करो की नीति को अमल में ला सके। आजादी का पहला संग्राम 1857 में हुआ। तो राष्ट्रवाद की पैदा हुई लहर ने अंग्रेजों के दांत खट्टे कर दिए थे। सो अंग्रेजों ने 1871 में हिंदुस्तानियों को जाति, मजहब और भाषा में बांटने की नीति बनाई। अंग्रेजों की इसी नीति का असर रहा कि पृथक निर्वाचन मंडल और द्विराष्ट्र सिद्धांत की बात निकली। बात सिर्फ निकली नहीं, दूर तलक गई। जिसका दंश आज भी देश झेल रहा। तब लोगों ने अपनी हैसियत ऊंची दिखाने को जनगणना में अगड़ी जाति का बता दिया। तो आज का वक्त ऐसा, जब आरक्षण के लिए लोग खुद को पिछली जाति में शामिल करने के लिए कभी रेल की पटरी उखाड़ रहे, तो कभी मरने-मारने की बात। ऐसे में आरक्षण की खातिर अगड़े भी खुद को पिछड़े नहीं बताएंगे, इसकी गारंटी कौन लेगा? कोई किस जाति का, इसका प्रमाण क्या होगा? पूछने वाले को लोग जुबानी जो चाहे, बता देंगे। तो क्या इससे देश की सही तस्वीर सामने आ जाएगी? इंदिरा आवास योजना हो या कई अन्य योजनाएं, आप गांवों में जाकर देख लो। बड़े-बड़े जमींदार भी इंदिरा आवास फंड से मकान बना चुके। बड़े नेता तो बड़ी-बड़ी कंपनियां और स्विस बैंक तक पहुंच चुके। सो उनकी बात फिर कभी। पर फायदे के लिए अपना नाम इधर से हटा उधर जुड़वाना आम बात हो चुकी। तभी तो 1931 में जब जातीय जनगणना होनी थी, तबके अंग्रेज सेंसेक कमिश्नर जे.एच. हट्टन ने मुखालफत की थी। उन ने यही दलील दी थी, हर प्रांत में हजारों-लाखों लोग अपनी ऊंची जाति हैसियत दिखाने को फर्जी जातियां लिखवा रहे। पर अंग्रेज जमाने में कोई आरक्षण नहीं था। अब तो अपने देश में आरक्षण की खातिर क्या-क्या हो रहा, बताने की जरूरत नहीं। ओबीसी एससी बनना चाह रहा, एससी एसटी बनना चाह रहा। बाकी बचा जनरल, वह सबको देखकर हाय ये आरक्षण की पुकार कर रहा। भाषायी विवाद ने 1960 के दशक में जो कोहराम मचाया, उसको छोड़ दें, तो आज भी कई ठाकरे उसी की रोटी तोड़ रहे। भाषा के नाम पर देश कैसे बंटा हुआ, यह जगजाहिर। सो आने वाले वक्त में जाति के नाम पर त्राहि-त्राहि मचेगी। फिर उस संकट से कौन निजात दिलाएगा? अगर सचमुच जातीय जनगणना देश के लिए कल्याणकारी, तो आजादी के 63 साल बाद सुध क्यों आई? सच्चाई तो यह, जातीय जनगणना की मांग करने वाले अब अपने वोट बैंक की बैलेंस शीट नहीं बना पा रहे। लालू-मुलायम-बीजेपी-लेफ्ट को मालूम ही नहीं चल रहा, क्यों हार रहे। अगर बीजेपी को सचमुच जातीय जनगणना से जन कल्याण की खुशबू आ रही, तो 2001 में जब सत्ता में थी, तब कदम क्यों नहीं उठाया? तब भी जातीय जनगणना की आवाज उठी थी। पर सत्ता के नशे में चूर बीजेपी को तब समझ नहीं आई। अब विपक्ष की बैंच पर बैठकर जनकल्याण का ख्याल आ रहा। सोचो, जातीय जनगणना के बाद मौजूदा आंकड़ों से हटकर कुछ चौंकाने वाले आंकड़े आए, किसी जाति को अपना हक छिनता दिखा। तो क्या वह संघर्ष पर उतारू नहीं होगी? मानो या न मानो, समाज में दुर्भावना तो जरूर बढ़ेगी। जाति गणना की पैरवी करने वाले भले दलील दे रहे, जब आरक्षण मिल रहा, लोग जाति प्रमाणपत्र बना रहे। तो जाति बताने में गुरेज क्यों करेंगे। पर शायद ऐसी दलील देने वाले भूल रहे, कुछ चीजें परदे में ही अच्छी लगतीं। कोई जरूरी नहीं कि ढोल पीटकर अपनी जाति बताई जाए। फिर भी अगर नेताओं को जातीय गणना की दरकार। तो लोकतंत्र की बात क्यों कर रहे? जब लोगों का मूल जाति, तो क्यों न लोकतंत्र की जगह जातितंत्र शब्द का इस्तेमाल करें। हर जाति का एक सरदार बना दो। देश को कबीलाई भारत घोषित कर दो। फिर कबीले के हिसाब से राजनीतिक हिस्सेदारी तय करिए।
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09/09/2010
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09/09/2010
Wednesday, September 8, 2010
कॉमनवेल्थ का अब तो सचमुच ‘राम’ ही राखा
यों तो दिल्ली के ऊपर का आकाश अब नीला नहीं रहा। काले-घने बादलों ने ऐसा डेरा डाल रखा, शीला दीक्षित की पुकार इंद्र तक नहीं पहुंच पा रही। रोज सुबह उठते ही अर्जी लगातीं, हे इंद्र उतना ही बरसो, जितनी हमारी जरूरत। पर इंद्र पुकार नहीं सुन रहे। सो अब सरकार ने ब्लैकमेल करना शुरू कर दिया। दिल्ली की सडक़ों पर नीली पट्टियां बना डालीं। ताकि इंद्र देव भ्रमित हो जाएं। कुदरत के बनाए इनसान को नीली पट्टी का खौफ दिखाकर परेशान करना शुरू कर दिया। सो बुधवार को दिल्ली और आसपास के इलाके मानो ठहर गए। हर तरफ जाम और रेंगती हुई गाडिय़ां नजर आईं। कोई गलती से नीली पट्टी वाली लेन में घुसा, तो हाथ से गाड़ी भी छूटी, जेब भी ढीली हुई। कॉमनवेल्थ गेम्स में आने वाले मेहमानों के लिए पुलिस-प्रशासन कसरत कर रहे। भले आम लोगों को परेशानियों से दो-चार होना पड़े। यों ट्रेफिक सेंस सिखाना गलत नहीं। पर सिर्फ कॉमनवेल्थ के नाम पर लोगों को कष्ट देना कहां तक उचित। सरकार अगर आखिरी वक्त पर कॉमनवेल्थ के लिए मारामारी न करती, शुरू से ही जिम्मेदारी निभाई होती। तो आज दिल्ली समस्याओं की नगरी न होती। हर जगह मलबा जमा हुआ। दिल्ली के दिल कनॉट प्लेस में कई बैंक पखवाड़े भर से काम नहीं कर रहे। कॉमनवेल्थ की तैयारियों के नाम पर कनॉट प्लेस को उजाड़ तो दिया। पर दुरुस्त करने में देर लग रही। जगह-जगह केबल कटे हुए। सो इंटरनेट काम नहीं कर रहा। कई दफ्तर ऐसे, जहां बिजली की सप्लाई आठ से दस घंटे ठप हो रही। ऊपर से बारिश ने व्यवस्था की पोल खोल रखी। ठहरे हुए पानी में मच्छर पनप चुके। सो डेंगू, मलेरिया का खौफ विदेश से आने वाले खिलाडिय़ों तक पहुंच चुका। खिलाडिय़ों के परिवारों ने तो आने से मना करना शुरू कर दिया। सो कहीं नाम खराब न हो, विदेशी मेहमानों के ठहरने की जगहों पर सुबह से लेकर शाम तक चार-छह बार छिडक़ाव हो रहे। यों अभी उन जगहों पर कोई इनसान नहीं। पर जहां इनसान रह रहे, वहां डेंगू, मलेरिया विकराल रूप ले चुके। लोग मर रहे, फिर भी फिक्र नहीं। दिल्ली के सरकारी अस्पतालों का हाल रोज सुर्खी बन रहा। कहीं गरीब बच्चे के शरीर से बदबू की दलील देकर सरकारी डाक्टर बिना इलाज के भगा रहे। तो कहीं सडक़ों पर बच्चा जनने को मजबूर हो रहीं महिलाएं। अब तो अपने वह होनहार खिलाड़ी भी डेंगू-मलेरिया की चपेट में, जिनसे देश को मैडल की आस। सो कॉमनवेल्थ भले एक आयोजन, देश की साख का सवाल। पर इसमें कोई शक नहीं कि अपनी व्यवस्था की अकर्मण्यता साबित हो गई। साठ साल में देश के बाकी हिस्सों को तो छोडि़ए, राजधानी दिल्ली का ऐसा हाल। तो व्यवस्था पर आम आदमी कैसे एतबार करे। आखिर कब तक आम लोगों को परेशान किया जाएगा? सनद रहे, सो याद दिला दें। जब पिछले साल अक्टूबर में कॉमनवेल्थ गेम्स फैडरेशन के अध्यक्ष माइक फेनेल ने मेजबानी छीनने की चेतावनी दी। तो अपना समूचा तंत्र हिल गया था। फिर आठ अक्टूबर 2009 को 71 देशों के डेलीगेट्स ने तैयारियों का जायजा लिया। तो सुबह के आठ बजे से शाम से सात बजे तक दिल्ली के सभी अहम रोड सील कर दिए गए। बाकायदा इश्तिहार जारी कर लोगों को उन रोड से न गुजरने की हिदायत दे दी गई थी। पर सवाल, ऐसा कब तक होगा कि अपनी नाकामी को छुपाने के लिए जनता को परेशान करेगी सरकार। पर उस घटना को साल भर बीत चुका। फिर भी नतीजा वही ढाक के तीन पात। सो तब यहीं पर लिखा था- क्यों ना दिल्ली वालों को बाड़ में डाल दें। सचमुच जब व्यवस्था के निकम्मे संचालक धौंस जमा लोगों को एक ओर धकेल रहे। तो यह कोई बाड़ से कम नहीं। लोकतंत्र में दिखावे की खातिर अपनी ही जनता पर चाबुक क्यों? क्या इसे ही विकास कहेंगे? अपने राहुल गांधी कई बार बैकवर्ड इंडिया और शाइनिंग इंडिया की बात कर चुके। कांग्रेस को विकास का साथी बताया, तो विपक्ष को दुश्मन। पिछले साल आठ अक्टूबर को जब कॉमनवेल्थ फैडरेशन के डेलीगेट्स दिल्ली में तैयारियों का मुआइना कर रहे थे, तो अपने राहुल गांधी मुंबई के पनवेल में चुनावी सभा कर रहे थे। तो उन ने कहा था- सत्तर साल पहले देश में सभी गरीब थे, आज आधा देश तरक्की कर रहा। राहुल यह बात हाल में भी दोहरा चुके। तो सवाल, देश की बाकी गरीबी दूर करने के लिए क्या कांग्रेस को राज करने के लिए सत्तर साल और चाहिए? पर कॉमनवेल्थ की तैयारी ने बता दिया, देश की राजधानी का कितना विकास हुआ। अब सचमुच एक ही तरीका बचा, पी. चिदंबरम के फार्मूले पर चाबुक चला दिल्ली वालों को सुधारो। वरना टिकट वाले दर्शकों और खिलाडिय़ों को छोडक़र बाकी दिल्ली वालों को नजरबंद कर दो। फिर भी कोई खतरा नजर आए, तो दिल्ली के लेफ्टिनेंट गवर्नर तेजेंद्र खन्ना की ओर से कुछ साल पहले मजाक में कही गई बात को गंभीरता से ले लो। खन्ना से ट्रेफिक समस्या पर सवाल हुए। पूछा गया- क्या दिल्ली स्वर्ग बन जाएगी? तो उन ने मजाक में कहा था- दिल्ली तो तभी स्वर्ग बनेगी, जब सभी स्वर्गवासी हो जाएं। सच भी सही, कॉमनवेल्थ के नाम पर दिल्ली को स्वर्ग बनाने का दावा था। पर अब हालात ऐसे, कहीं ऐसा न हो, कॉमनवेल्थ गेम ही स्वर्गवासी हो जाएं। आयोजन समिति ने साढ़े सात सौ करोड़ का बीमा करा यही संकेत दिया। अब 24 सितंबर को अयोध्या की विवादित जमीन पर मालिकाना हक का फैसला आ रहा। कहीं इतिहास ने खुद को दोहराया। तो कॉमनवेल्थ का ‘राम’ ही राखा। शीला-कलमाड़ी ने तो वैसे ही राम भरोसे छोड़ रखा।
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08/09/2010
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08/09/2010
Tuesday, September 7, 2010
अब तो बीजेपी का चेहरा ही हो गया ‘झारखंडी’
चार महीने बाद ही कहावत दुबारा लिखनी पड़ेगी, ऐसा सोचा नहीं था। मशहूर कहावत है- भानुमती ने खसम किया, बुरा किया। करके छोड़ा, उससे बुरा किया। छोडक़र फिर पकड़ा, ये तो कमाल ही किया। झारखंड में सत्ता की खातिर बीजेपी-शिबू फिर साथ हो गए। तो इस कहावत को भी मात दे दी। पर जब कोई शर्म-हया बेच खाए, तो क्या थूकना-चाटना और क्या जूते-प्याज खाने वाली कहावत। यों राजनीति में कोई भजन करने नहीं आया। सबका लक्ष्य सत्ता हासिल करना ही होता। पर जब कोई खम ठोककर खुद को राजनीति की दुकानदारी से अलग सामाजिक ठेकेदारी की बात करे। अलग चाल, चरित्र, चेहरे का खम ठोके। तो ऐसे सवाल उठना लाजिमी। सो बीजेपी के लिए चाल, चरित्र, चेहरा ही डायन हो गईं। अगर बीजेपी खम ठोककर कांग्रेस की तरह राजनीति करे, तो इतनी टीका-टिप्पणी शायद ही हो। पर बीजेपी कंबल ओढक़र घी पीना चाहती। जैसा अबके झारखंड में हो रहा, हू-ब-हू यही कहानी कर्नाटक में हो चुकी। कर्नाटक की पिछली विधानसभा में तीनों बड़े दलों ने बारी-बारी सत्ता का जायका लिया। कांग्रेस-जेडीएस का गठजोड़ बीस महीने बाद टूटा। तो एचडी देवगौड़ा के बेटे कुमारस्वामी ने बीजेपी को सत्ता का टुकड़ा फेंका। तो बीजेपी बड़ा दल होने के बावजूद छोटेपन की भूमिका को राजी हो गई। पर बीस महीने बाद कुमारस्वामी ने दो अक्टूबर 2007 को कुर्सी नहीं छोड़ी। तो दोनों ने एक-दूसरे की लानत-मलानत करते हुए तलाक ले ली। सो राष्ट्रपति राज लग गया। पर करीब बीस दिन बाद ही देवगौड़ा ने फिर बीजेपी को समर्थन का भरोसा दिया। तो 28 अक्टूबर 2007 को बीजेपी के एक बड़े नेता ने दबी जुबान में कहा था- हवन तीन बजे न सही, छह बजे ही। जेडीएस ने हमारी बात मान ली, सो हम भी तो कोई सन्यासी नहीं, आखिर राजनीति इसलिए तो कर रहे। यही बात बीजेपी कभी खुलकर नहीं कहती। पर कर्नाटक में सात दिन बाद ही देवगौड़ा ने फिर गच्चा दे दिया। तो बेचारी बीजेपी मुंह में खून लगे शेर की तरह देवगौड़ा पर फिर दहाडऩे लगी। सो झारखंड में क्या होगा, यह तो बाद की बात। पर पिछले चार महीने में बीजेपी ने झारखंड की खातिर अपने सिद्धांत की बलि चढ़ा दी। झारखंड में जब बीजेपी ने शिबू संग पिछले साल दिसंबर में सरकार बनाई। तो कई बड़े नेताओं ने विरोध किया था। पर सरकार बन गई। तो 27 अप्रैल को लोकसभा में कटौती प्रस्ताव के वक्त शिबू ने मनमोहन सरकार के पक्ष में वोट कर अपनी पतंग कटवा ली। बीजेपी ने इमरजेंसी मीटिंग कर समर्थन वापसी का एलान कर दिया। पर शिबू सोरेन एंड सन्स ने बीजेपी को सीएम की कुर्सी का ऑफर दिया। तो सिद्धांत और नैतिकता की दुहाई देकर समर्थन वापसी का एलान करने वाली बीजेपी महज 24 घंटे में ही पलटी मार गई। फिर महीने भर बीजेपी-झामुमो के बीच गुरिल्ला युद्ध चला। तो बीजेपी का चेहरा और बेनकाब हो गया। शिबू सोरेन के चेहरे को तो अब नकाब की जरूरत ही नहीं। पर पिछली बार मीडिया में हुई फजीहत से बीजेपी अबके संभली हुई। झारखंड में जब तक झामुमो के संग गोटी फिट नहीं हो गई, खबरें लीक नहीं होने दीं। मंगलवार को अर्जुन मुंडा विधायक दल के नेता चुन लिए गए। फिर गवर्नर के सामने सरकार बनाने का दावा पेश हो गया। अब कोई पूछे, क्या जनहित में बीजेपी-शिबू ने हाथ मिलाया? अगर जनहित का ख्याल होता, तो सरकार गिरती ही क्यों। बीजेपी ने भले कटौती प्रस्ताव पर शिबू सोरेन के धोखे को आधार बनाया था। पर सीएम की कुर्सी देखते ही शिबू पर भरोसा हो गया। यानी झारखंड में जनता का नहीं, किस्सा सिर्फ कुर्सी का। बीजेपी के आका संघ परिवारी पिछली बार भी सरकार गंवाने के मूड में नहीं थे। पर सौदेबाजी में बाजी हाथ से छूट गई। सो अबके मौका मिला, तो बीजेपी तैयार हो गई। यों आडवाणी अभी भी खिलाफ। पर संघ को खुश करने और झारखंड पर अपने पूर्व के फैसले को जायज ठहराने के लिए नितिन गडकरी हाथ-पैर मार रहे। संघ को भी झारखंड में चल रही अपनी मुहिम की फिक्र। वैसे भी अयोध्या पर 17 सितंबर को आने वाले फैसले के बाद की पृष्ठभूमि तैयार हो रही। झारखंड में धर्मांतरण मुहिम रोकने का संघ अभियान तेजी से चल रहा। तो दूसरी तरफ विधायक बैठे-बैठे थक गए। पर अगले चुनाव की तैयारी के लिए बिना सरकार चंदा उगाही संभव नहीं। सो सबने आपस में तय कर लिया, आओ सरकार बनाएं। कुछ तुम कमाओ, कुछ हम। यानी स्वार्थ की खातिर बीजेपी-शिबू साथ आ रहे, जनहित कतई नहीं। अब गवर्नर एमओएच फारुख ने भी अपनी रपट केंद्र सरकार को भेज दी। बीजेपी की ओर से सीएम पद के उम्मीदवार अर्जुन मुंडा के पक्ष में 44 एमएलए के समर्थन को माना। सो केबिनेट आज-कल में शायद राष्ट्रपति राज उठा ले। कांग्रेस भी यही रणनीति अपना रही। या यों कहें, कांग्रेस भी चाह रही, गुरुजी संग बीजेपी की सरकार बन जाए। ताकि बीजेपी पूरी तरह सत्तालोलुप साबित हो जाए। सो झारखंड की हलचल पर कांग्रेस कोर ग्रुप की अहम बैठक में पीएम, सोनिया, चिदंबरम, एंटनी ने मंथन किया। इधर झारखंड कांग्रेस के प्रभारी केशव राव ने दो-टूक कह दिया- हमारे पास नंबर नहीं, सो सरकार नहीं बनाएंगे। पर बीजेपी-शिबू की सरकार स्थायी नहीं होगी। अब कांग्रेस भले बीजेपी को बेनकाब करने की रणनीति बनाए। पर बीजेपी को क्या फर्क पड़ता। अब तो उसने भी अपना चेहरा ‘झारखंडी’ बना लिया। जैसे झारखंड अपने गठन से अब तक स्थिर नहीं। वैसे ही बीजेपी का ‘चेहरा’ भी हो गया।
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07/09/2010
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07/09/2010
Monday, September 6, 2010
कार्यपालिका पर कंट्रोल नहीं, कोर्ट को नसीहत
नक्सली कब्जे से बिहार के तीनों पुलिसिए रिहा हो गए। पर नक्सलियों ने अपना बर्बर चेहरा फिर दिखा दिया। चार बंधकों में से एक सिपाही लूकस टेटे की हत्या कर दबाव बनाया। पर दबाव रंग न लाया, तो आखिर में सारे बंधक छोड़ दिए। ताकि आम जनता की सहानुभूति बटोर सकें। पर नीतिश कुमार ने चुनौती दी, गर नक्सलियों को जनसमर्थन का इतना भरोसा। तो चुनावी समर में उतरकर लड़ें। शाम होते-होते चुनाव आयोग ने भी तारीखों का एलान कर डुगडुगी बजा दी। पर नक्सली खुद में इतने कन्फ्यूज्ड, शायद ही चुनाव लड़ें। अब चुनाव में कहीं गड़बड़ी न हो, सो आयोग ने छह फेज में चुनाव कराने का फैसला किया। आयोग ने तारीखों के चयन में त्योहार का ख्याल रखने की दलील दी। पर शायद आयोग बिहार के त्योहार को समझ ही नहीं पा रहा। दीपावली और छठ के बीच नौ नवंबर को वोटिंग होगी। जिस दिन छठ व्रत रखने वाले महिला-पुरुष उपवास पर होंगे। पर आयोग की तो छोडि़ए, यहां तो अपनी सरकार देश को उपवास कराने पर तुली हुई। भले खुले में पड़ा सरकारी अनाज सड़ जाए, पर मुफ्त नहीं बंटेगा। सुप्रीम कोर्ट ने सड़ते अनाज की खबरों के बाद आदेश क्या दिया। समूची सरकार बौखला गई। पहली बौखलाहट महंगाई बढ़ाने वाले मंत्री शरद पवार ने दिखाई। तो कोर्ट के आदेश को महज सलाह बता निकल लिए। पर मानसून सत्र के आखिरी दिन सुप्रीम कोर्ट ने ठोक बजाकर सरकारी वकील को बताया- जाकर अपने मंत्री को बता दो, मुफ्त अनाज बांटने की सलाह नहीं आदेश दिया। सो संसद में हंगामा बरपा। तो शरद पवार ने आदेश पालन करने का भरोसा दिया। पर सोमवार को साफ हो गया। सुप्रीम कोर्ट के आदेश से सिर्फ पवार नहीं बौखलाए, अलबत्ता समूची सरकार सकते में। मनमोहन ने सोमवार को संपादकों के एक समूह से मुलाकात की। तो दिल का दर्द जुबां से छलक पड़ा। भले सरकारी व्यवस्था आउट ऑफ कंट्रोल हो। पर मनमोहन ने सुप्रीम कोर्ट को लाइन ऑफ कंट्रोल दिखाया। कोर्ट को नीतिगत मामलों में दखल न देने की नसीहत दी। दो-टूक कह दिया- मुफ्त अनाज बांटना संभव नहीं। मनमोहन के इनकार की दलील देखिए। बोले- सेंतीस फीसदी बीपीएल हैं, सो मुफ्त अनाज कैसे बांटा जा सकता। मुफ्त बांटेंगे, तो किसानों को अधिक पैदावार के लिए प्रेरित करने के उपाय फेल हो जाएंगे। फिर अनाज ही नहीं होगा, तो क्या बांटेंगे। मतलब साफ- भले अनाज सड़ जाए, पर मुफ्त नहीं देंगे। सुप्रीम कोर्ट की भावना और मनमोहन की भावना का फर्क देखिए। माना, कोर्ट को नीतिगत मामलों में दखल नहीं देना चाहिए। संविधान में भी कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका की लक्ष्मण रेखा तय। तीनों के बीच संतुलन ऐसा, अगर कोई एक नाकाम हो, तो दूसरा हावी हो जाएगा। यानी कार्यपालिका लंबी तानकर सोएगी। तो न्यायपालिका को दखल का मौका मिलेगा। पर मनमोहन ने कार्यपालिका में सुधार का कोई एजंडा नहीं रखा। अलबत्ता न्यायपालिका को हद में रहने की नसीहत दी। पर सवाल, खुद पीएम 37 फीसदी बीपीएल की बात कर रहे। तो क्या यह देश और पीएम के लिए शर्म की बात नहीं कि बीपीएल के रहते भी देश में अनाज सड़ रहा? आजादी के 63 साल बाद भी बीपीएल परिवारों की संख्या इतनी अधिक, क्या कार्यपालिका की संवेदनहीनता का सबूत नहीं? पिछले छह साल से महंगाई कोहराम मचा रही। पर सरकार सिर्फ जुबानी दिलासा दिला रही। क्यों नहीं पीडीएस को दुरुस्त करने का कदम उठाया मनमोहन ने? न्यायपालिका को कार्यपालिका में दखल देने का कोई शौक नहीं। अलबत्ता हमेशा ऐसा काम करती, जिससे आ बैल मुझे मार वाली कहावत चरितार्थ हो जाती। न्यायपालिका को नसीहत कोई नई बात नहीं। सनद रहे, सो बता दें। दस दिसंबर 2007 को खुद सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस ए.के. माथुर और मार्कंडेय काटजू की बैंच ने न्यायपालिका को हद में रहने की नसीहत दी थी। सो तब भी राजनीतिक बहस छिड़ी। तो राजनेताओं के अहं का कीड़ा कुलबुलाने लगा। कोर्ट का फैसला मनमाफिक हो, तो ठीक। वरना जुडीशियल एक्टिविज्म का शिगूफा छेडऩे में नेतागण माहिर। पर सवाल, कोर्ट दखल क्यों देता? स्कूलों में एडमिशन हो या सरकारी अस्पतालों में इलाज, आम नागरिक के साथ कैसा व्यवहार होता, सभी जानते। पर कार्यपालिका ने कभी पुख्ता बंदोबस्त क्यों नहीं किया? अब अगर कोई अदालत का दरवाजा खटखटाए और अदालत आदेश दे, तो एक्टिविज्म की बात होने लगती। क्या जनता को कोर्ट से गुहार लगाने का हक नहीं? क्या न्यायपालिका में भी नेताओं की मर्जी चले? जैसा 1973 और 1977 में हो चुका। जब 1973 में वरिष्ठता के आधार पर जस्टिस शेलट, हेगड़े और ग्रोवर का नंबर था। पर तब इन तीनों से जूनियर ए.एन. रे को चीफ जस्टिस बना दिया। सो तीनों ने इस्तीफा दे दिया। इसी तरह 1977 में रे के बाद एच. आर. खन्ना का नंबर था। पर बनाए गए मिर्जा हमीदुल्ला बेग। सो खन्ना ने इस्तीफा दे दिया। पर पीआईएल के दौर से कोर्ट एक्टिव हुआ। सरकारी तंत्र ने गलतियों पर परदा डालने की कोशिश की। तो न्यायपालिका ने हथौड़ा चलाया। अगर कोर्ट एक्टिव न होता, तो जैन हवाला, सेंट किट्स मामला, चारा घोटाला, विचाराधीन कैदियों का मामला जैसे कई अहम केस फाइलों में ही दब जाते। पर कोर्ट ने नजीर पेश की। कार्यपालिका की पोल खुली, जनता ने कोर्ट का साथ दिया। सो नेताओं का भडक़ना लाजिमी।
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06/09/2010
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06/09/2010
Friday, September 3, 2010
वर्किंग कमेटी टाल बीजेपी ने खुद की खोली पोल
तो सोनिया गांधी का निर्वाचन भी निपट गया। बारिश ने भले जश्न का माहौल फीका कर दिया। पर सोनिया ने हमेशा की तरह रंग चढ़ा दिया। समारोह की शुरुआत वंदे मातरम से हुई, तो समापन जन, गण, मन से। सचमुच सोनिया ने जब राजनीतिक सफर की शुरुआत की, तब विपक्ष के कई थपेड़े झेले। पर हार नहीं मानी। सो कांग्रेसियों की खातिर सोनिया सफलता का पर्याय बन चुकीं। सोनिया ने निर्वाचन का सर्टिफिकेट हासिल करने के बाद कोई लंबा-चौड़ा भाषण नहीं फेंका, जैसा और पार्टियों के नेता फेंकते। अलबत्ता मंच पर आईं, सबका आभार जताया। बोलीं- अपने टर्म में मैंने महसूस किया कि अध्यक्ष पद देश के प्रति बड़ी जिम्मेदारी। आज कांग्रेस हर कोने, वर्ग और पीढ़ी की भावना-आकांक्षा की प्रतीक। सत्ता में हों या विपक्ष में, हमें अपनी बड़ी भूमिका का अहसास रहना चाहिए। आखिर में कांग्रेस का झंडा बुलंद रखने का भरोसा दिखा धन्यवाद कर गईं। सोनिया ने चौथी बार कांग्रेस की कमान संभाल रिकार्ड कायम किया। पर गुरुवार को सोनिया को त्याग की नसीहत देने वाली बीजेपी शुक्रवार को खामोश रही। बीजेपी के कानूनदां प्रवक्ता रविशंकर प्रसाद ने कांग्रेस का संविधान पढक़र पेच निकाला था। परिवारवाद पर निशाना साधा। अपने नितिन गडकरी ने भी वही बात कही, जो अध्यक्षी संभालने के दिन कही थी। कहा था- बीजेपी में पोस्टर चिपकाने वाला मुझ जैसा छोटा कार्यकर्ता अध्यक्ष बन सकता है। पर कांग्रेस अध्यक्ष के लिए नेहरू-गांधी खानदान का होना जरूरी। यानी बीजेपी ने शीर्ष स्तर से कांग्रेस के लोकतंत्र का मखौल उड़ाया। सो कल यहीं पर लिखा था- कांग्रेस में चेहरा, तो बीजेपी में मोहरा का लोकतंत्र। कैसे कांग्रेस खुद को नेहरू-गांधी परिवार के साये से बाहर नहीं निकाल पा रही। तो बीजेपी में संघ की मर्जी के बिना पत्ता भी नहीं हिलता। सो कल आपको बताया था, कैसे संघ हमेशा अपने मोहरे बीजेपी में फिट करता। सोनिया गांधी का तो औपचारिक चुनाव हुआ। पर बीजेपी में गडकरी पहले अध्यक्ष बने, फिर चुनाव हुआ। सो वर्करों पर अपनी मर्जी थोपने में कोई पीछे नहीं। बीजेपी में तो आज भी संगठन महासचिवों का पद संघ के पूर्णकालिक वर्कर के लिए आरक्षित। यानी बीजेपी भले स्वतंत्र संगठन हो, पर उसे चलाने वाला सीईओ संघ तैनात करता। अगर बीजेपी के वर्करों को इस दलील पर एतराज हो, तो शुक्रवार की एक कहानी देख लें। कहते हैं ना, सांच को आंच नहीं। बीजेपी ने गुरुवार को सोनिया के चयन को अलोकतांत्रिक ठहराने की कोशिश की। पर देर रात जब झंडेवालान में नितिन गडकरी, अरुण जेतली और सुषमा स्वराज की संघ के सरकार्यवाह भैयाजी जोशी से मीटिंग हुई। तो बीजेपी की ऐसी क्लास लगी, शुक्रवार को पौ फटते ही कोर ग्रुप की मीटिंग बुलानी पड़ी। बीजेपी ने 18-19 सितंबर को जम्मू में वर्किंग कमेटी का फैसला कर लिया था। तैयारियां शुरू हो गई थीं। पर संघ ने लताड़ लगाई। पूछा, किस सोच से 18-19 सितंबर को वर्किंग कमेटी करने जा रहे? संघ ने बीजेपी नेताओं को दो-टूक कह दिया- अयोध्या मामले पर 17 सितंबर को कोर्ट का फैसला आ रहा। आप लोगों को दिल्ली में बैठकर आगे की रणनीति बनानी चाहिए। पर आप जम्मू में राजनीतिक-आर्थिक और आंतरिक सुरक्षा का प्रस्ताव पारित करने जा रहे। अब बीजेपी को काटो, तो खून नहीं। सो शुक्रवार को तडक़े एलान हो गया- वर्किंग कमेटी 18-19 सितंबर को नहीं होगी। नई तारीख का एलान बाद में करेंगे। अब कोई गडकरी से पूछे, क्या इसी लोकतंत्र की बात कर रहे थे? खुद में दम नहीं, पर लोकतांत्रिक संगठन का दंभ भर रहे। गडकरी को अध्यक्ष बने साढ़े आठ महीने हो गए। पर क्या यही उपलब्धि? यों गुरुवार को बीजेपी ने कांग्रेस पर चुटकी ली थी। पर शुक्रवार को बीजेपी की चुटकी बीजेपी वालों ने ही ली। गडकरी की उपलब्धि यही, पहली बार आडवाणी खुद चलकर गडकरी के घर हुई कोर ग्रुप की मीटिंग में पहुंचे। वह भी बारहवीं मंजिल पर किराये वाले घर में। राजनाथ सिंह जब तक अध्यक्ष रहे, या तो खुद आडवाणी के घर गए या बीजेपी दफ्तर में ही मीटिंग करनी पड़ी। पर गडकरी ने साढ़े आठ महीने में ही यह उपलब्धि हासिल कर ली। यों यह तो महज चुटकी। पर सच्चाई यही, कोई भी पार्टी लोकतंत्र को तवज्जो नहीं देती। कांग्रेस तो खम ठोककर परिवार के प्रति अपनी निष्ठा जाहिर कर चुकी। पर बीजेपी नीतिगत मामलों पर संघ से दूरी का दंभ भरती। अब जब वर्किंग कमेटी तक की तारीख संघ तय करे, तो बीजेपी किस मुंह से अपनी बड़ाई कर रही? संघ के बीजेपी में दखल का खुल्लमखुल्ला इजहार आडवाणी 16 सितंबर 2005 की चेन्नई वर्किंग कमेटी में कर चुके। जब पानी पिये बिना ही संघ को कोसा था। संघ के दखल से इतने परेशान थे कि पानी पी-पीकर कोसने की फुर्सत नहीं मिली। अब जिस अयोध्या मामले पर आने वाले अदालती फैसले के मद्देनजर संघ ने बीजेपी की वर्किंग कमेटी टलवाई। उसी संघ के आनुषांगिक संगठन आपस में भिड़ते दिख रहे। विश्व हिंदू परिषद विपरीत फैसले की स्थिति में साधु-संतों को आगे करने की रणनीति बना रहा। तो बीजेपी एक बार फिर काठ की हांडी चढ़ाने की सोच रही। पर विहिप ने कह दिया- अब मंदिर मामले में बीजेपी दखल न दे। सो अयोध्या पर फैसला जब आएगा, तब आएगा। फिलहाल बीजेपी के सिर से खिजाब का रंग उतर गया। चौबीस घंटे भी न हुए, आईने की तरह साफ- अगर कांग्रेस का रिमोट दस जनपथ में, तो बीजेपी का रिमोट नागपुर के रेशमबाग में।
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03/09/2010
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03/09/2010
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