Monday, September 20, 2010

डेलीगेशन डाल-डाल, तो पात-पात अलगाववादी

फैसले से पहले फैसला देने वाले ही बंट गए। अयोध्या विवाद पर शुक्रवार को कोर्ट ने सुलहनामे की याचिका खारिज कर जुर्माना लगाया था। पर सोमवार को तीन जजों की बैंच में से एक जस्टिस धर्मवीर शर्मा ने शुक्रवार के फैसले पर असहमति जता दी। जस्टिस एसयू खां और सुधीर अग्रवाल की दलील से इतर जस्टिस शर्मा फैसले से एक दिन पहले तक सुलह की गुंजाइश देख रहे। जस्टिस शर्मा ने याचिकाकर्ता रमेश चंद्र त्रिपाठी पर लगाए जुर्माने की रकम को भी अनुचित ठहराया। यों जस्टिस शर्मा का फैसला अब महज एक टिप्पणी भर, क्योंकि बहुमत जज का फैसला ही लागू होगा। पर अंतिम फैसले से पहले जजों के सार्वजनिक मतभेद से पेचीदगी और बढ़ गई। संघ परिवार फिलहाल संयत रणनीति अख्तियार कर रहा। पर कांग्रेस के दिग्विजय सिंह को एतबार नहीं। बोले- इतिहास गवाह है, सो संघ-बीजेपी-वीएचपी पर भरोसा नहीं किया जा सकता। सरकार की ओर से एहतियातन तैयारी हो रही। माना, संघ परिवार पर कांग्रेस को भरोसा नहीं। तो सवाल, कांग्रेस की तैयारी पर कैसे भरोसा करें? जिस इतिहास की बात दिग्विजय सिंह कर रहे, उस वक्त भी केंद्र में कांग्रेस की सरकार थी। पिछले तीन महीने से कश्मीर घाटी झुलस रही। पर कांग्रेस या उसकी सरकार ने क्या तीर मार लिया? तीन महीने बाद ऑल पार्टी डेलीगेशन भेजने का फैसला हुआ। सोमवार को 42 मेंबरी टीम चिदंबरम की रहनुमाई में श्रीनगर पहुंच गई। पर सुबह से रात तक हुई चर्चाओं के बाद भी कशमकश जारी रही। फिर भी डेलीगेशन उम्मीद की कोई किरण नहीं छोड़ पाया। घाटी की सुलगी आग में सचमुच सबने रोटी सेकने की ठान ली। सो दिल्ली में बिना शर्त बातचीत की पैरवी करने वाली पीडीपी की महबूबा न डेलीगेशन में शामिल हुईं, न मिलीं। अलबत्ता अपने नुमाइंदे भेजे। सो महबूबा की नजर में मुद्दे की गंभीरता आप खुद देख लो। पर सिर्फ महबूबा ही नहीं, रोटी सेकने में नेशनल कांफ्रेंस भी पीछे नहीं रही। एनसी के अध्यक्ष उमर अब्दुल्ला खुद सीएम। तीन महीने से आग की लपटें नहीं बुझा पाए। सो अब उसी आग में रोटी सेकने आ गए। ऑल पार्टी डेलीगेशन पहुंचा समस्या के समाधान के लिए। पर नेशनल कांफ्रेंस ने फिर स्वायत्तता का पुराना राग अलाप दिया। जो हमेशा से इसी का चुनावी मुद्दा रही। एनसी ने 1996 के विधानसभा चुनाव में इसी मुद्दे पर दो तिहाई बहुमत हासिल किया था। फिर स्वायत्तता पर रपट देने के लिए डा. कर्ण सिंह की रहनुमाई में कमेटी बनाई गई। पर उन ने इस्तीफा दे दिया। सो बाद में फारुक अब्दुल्ला केबिनेट के गुलाम मोहिउद्दीन शाह को जिम्मेदारी सौंपी गई। रपट में 1953 से पूर्व की स्थिति बहाल करने की सिफारिश हुई। भारत के संविधान के 21वें भाग में अनुच्छेद 370 के लिए लिखे अस्थायी शब्द को हटा विशेष शब्द जोडऩे की सिफारिश हुई। पर वाजपेयी सरकार के वक्त जब नेशनल कांफ्रेंस राजग का हिस्सा थी, तब भी चार जुलाई 2000 को केबिनेट ने जम्मू-कश्मीर विधानसभा से पारित स्वायत्तता प्रस्ताव को नामंजूर कर दिया था। केबिनेट ने माना था, प्रस्ताव मंजूर करने का मतलब पीछे की ओर लौटना होगा और ऐसी प्रवृत्तियों को बढ़ावा मिलेगा, जो देश की एकता के हित में नहीं। यानी एनसी हो या पीडीपी, हालात पर काबू पाने के बजाए वोट बैंक को संबोधित कर रहीं। भले घाटी में अलगाववादी खुलेआम पाकिस्तानी झंडा लहरा रहे। तमाम कफ्र्यू को धता बता फौजों पर पत्थरबाजी कर रहे। अलगाववादी तो बातचीत की मेज पर भी आने को तैयार नहीं। सचमुच अनुच्छेद 370 के तहत पंडित नेहरू ने कश्मीर को स्पेशल स्टेटस तो दिला दिया। पर क्या सभी मुख्य धारा में लौट आए? आज हालात पंडित नेहरू की सोच से बिलकुल उलट। घाटी में अलगाववादियों का मनोबल सिर चढक़र बोल रहा। सोचिए, उमर के दादा शेख अब्दुल्ला ने अनुच्छेद 370 को स्थायी बनाने के मकसद से इसे देश के सभी राज्यों में लागू करने का दांव खेला था। अगर ऐसा होता, तो आज सिर्फ कश्मीर नहीं, समूचा देश सुलग रहा होता। अलगाववादियों पर नकेल कसने की ईमानदार पहल कभी नहीं हुई। सो मौका पाकर अलगाववादी अवाम को भडक़ाने में पीछे नहीं रहे। सोमवार को तीनों अलगाववादी नेता सैयद अलीशाह गिलानी, मीरवाइज और यासीन मलिक ने डेलीगेशन से मिलने से इनकार कर दिया। फिर भी डेलीगेशन के कुछ मेंबर अलग-अलग दल में तीनों से मिले। पर चूंकि अलगाववादियों ने उपद्रव न रोकने की ठान रखी। सो मेहमाननवाजी कर डेलीगेशन मेंबरों को विदा कर दिया। पर सवाल, जब अलगाववादी वार्ता को राजी नहीं। तो उनके घर जाकर हौसला अफजाई करने की क्या जरूरत? अलगाववादियों से मिलने के बजाए डेलीगेशन एलान करता। अवाम को बताता, देखो, हम बात करने आए हैं। पर ये बात करने को राजी नहीं। सीधे अवाम और पीडि़तों से बात करते। पर जब डेलीगेशन के मेंबर अपने एजंडे के साथ गए हों। तो खुले दिमाग से बातचीत की उम्मीद ही कैसे करें? सो घाटी में इधर डेलीगेशन पहुंचा, उधर 72 घंटे का कफ्र्यू लगा दिया। सरकारी एजंडे के मुताबिक जो तय था, वही डेलीगेशन से मिलने पहुंचा। सो अलगाववादियों की तो छोडि़ए, अवाम में डेलीगेशन कोई भरोसा पैदा नहीं कर पाया। उमर अब्दुल्ला ने भी यही किया था, जब पहली बार 11 जून को घटना हुई। तो उमर मौके पर पहुंचने के बजाए छुट्टी में मशगूल रहे। सो हालात बेकाबू हो गए। सचमुच जिन उमर के काम को राहुल गांधी बेहतर बता रहे थे। सोमवार को कांग्रेसी सैफुद्दीन सोज ने मान लिया, कुछ कमी जरूर रही।
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20/09/2010

Friday, September 17, 2010

गांधीनगर से गडकरी तक गदगद बीजेपी!

अब तय हो गया, अयोध्या पर फैसला शुक्रवार को ही आएगा। हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता की मंशा पर सवाल उठा जुर्माना भी लगा दिया। सुलह के लिए निर्मोही अखाड़े के सिवा कोई राजी नहीं था। वैसे भी फैसले के मोड़ पर आकर सुलह के फार्मूले में कुछ नहीं था। कोर्ट ने याचिकाकर्ता से सुलह का आधार पूछा। तो कोई जवाब नहीं। सो फैसले की उलटी गिनती शुरू हो गई। पर अयोध्या फैसले से पहले कश्मीर की लपटें थामना जरूरी। सो कांग्रेस के संकटमोचक प्रणव मुखर्जी ऑल पार्टी डेलीगेशन लेकर कश्मीर जाएंगे। तीन दिन तक हालात का बारीकी से जायजा लिया जाएगा। ताकि सरकार ऐसे ठोस कदम उठा सके, जिनसे हालात फौरी काबू में आ जाएं। घाटी में शुक्रवार को भी हिंसक वारदातें जारी रहीं। सो सोनिया गांधी ने तमाम वरिष्ठ नेताओं को बुला मंत्रणा की। पर कांग्रेस की परेशानी सिर्फ कश्मीर और अयोध्या पर संभावित फैसला ही नहीं। अलबत्ता कर्नाटक, गुजरात के विधानसभा उपचुनाव के नतीजों ने भी खतरे की घंटी बजा दी। पर बीजेपी को जबर्दस्त फील गुड होने लगा। अयोध्या फैसले से पहले गुजरात में नरेंद्र मोदी का डंका बजा। तो गांधीनगर से गडकरी तक बीजेपी बम-बम दिखी। कठलाल विधानसभा सीट पर पहली बार कमल खिला। सो नरेंद्र मोदी ने अपने खास अंदाज में फिर हुंकार भरी। बोले- कांग्रेस और सीबीआई को जनता ने नकार दिया। अब गांधीनगर में जो स्क्रिप्ट मोदी ने लिखी। दिल्ली में गडकरी ने प्रवक्ता निर्मला सीतारमण के जरिए पढ़वा दी। बीजेपी ने शुक्रवार को न अयोध्या, न कश्मीर पर कुछ कहा। अलबत्ता मोदी की जीत के बाद नितिन गडकरी भाजपा मुख्यालय में रिक्शा पर घूमते दिखे। सोलर और बैटरी चालित रिक्शा का प्रदर्शन हुआ। जिसे बीजेपी अंत्योदय कार्यक्रम के तहत गरीबों में बांटने का मन बना रही। कहा गया- इस रिक्शा को चलाने में कम कैलोरी खर्च होतीं। पर कोई पूछे, जिस गरीब के पेट में दाना नहीं। कैलोरी किस चिडिय़ा नाम, उसे क्या पता। पर बात अंत्योदय की नहीं, उपचुनाव में कांग्रेस के अंत और बीजेपी के उदय की। पर जिन उपचुनावों के नतीजे आए, उनका फाइनल अभी काफी दूर। सो कांग्रेस भी फिलहाल बेफिक्र ही दिख रही। पर बीजेपी इतनी गदगद, मानो किला फतह कर लिया हो। यों कठलाल सीट पहली बार जीतना बीजेपी के लिए उपलब्धि। पर कर्नाटक में क्या हुआ। दो सीटों पर उपचुनाव हुए थे। तो बीजेपी वाली सीट देवगौड़ा की जेडीएस ने जीत ली। कांग्रेस वाली सीट बीजेपी के खाते में आ गई। राजनीतिक दलों की अजीब कहानी बन चुकी। मीठा-मीठा घप और कड़वा-कड़वा थू। उपचुनाव की जीत किसी राष्ट्रीय मुद्दे से नहीं जोड़ी जा सकती। अगर उपचुनाव किसी बड़े बदलाव का संकेत होता, तो छत्तीसगढ़ में पिछली बार बीजेपी लगातार आधा दर्जन विधानसभा उपचुनाव हारी। फिर भी फाइनल चुनाव में बीजेपी की ही सरकार बनी। सो कोई जरूरी नहीं जो उपचुनाव में जीते, बाकी जगह उसी का परचम लहराएगा। पर अहम सवाल, सिर्फ जीत का ही श्रेय क्यों लेते राजनीतिबाज? हार की जिम्मेदारी उठाने का जज्बा जीत जैसा क्यों नहीं दिखता? अब जरा बीजेपी का ही दोहरापन देख लो। स्थानीय उपचुनाव में जीत पर इतरा रही। पर जब गुजरात में जूनागढ़ निकाय चुनाव में लुढक़ी। राजस्थान में विधानसभा के बाद पंचायत चुनाव में भी पटखनी मिली। तो बीजेपी के प्रवक्ता रविशंकर प्रसाद में हार पर सवाल झेलने का भी साहस नहीं रहा। बोले- स्थानीय चुनाव के बारे में स्थानीय नेता टिप्पणी करेंगे। राष्ट्रीय प्रवक्ता से स्थानीय सवाल न पूछें। इसे कहते हैं रस्सी जल गई, पर बल नहीं गया। पर कोई पूछे, जब जूनागढ़, राजस्थान, बंगाल जैसे निकाय चुनाव जिनमें बीजेपी हारी, वह स्थानीय। तो सवाल, पोरबंदर, बेंगलुरु जैसे निकाय चुनाव में जीत पर दिल्ली में बीजेपी संसदीय दल और बोर्ड ने क्यों प्रस्ताव पारित किया? क्यों बीजेपी के मंच से प्रवक्ता जीत का ढोल बजाते दिखे? क्या यह बीजेपी का कांग्रेसी कल्चर नहीं? कांग्रेस में तो यह परंपरा बन चुकी। जीत का श्रेय सिर्फ गांधी-नेहरू खानदान को, हार का ठीकरा स्थानीय नेतृत्व पर। अब ताजा प्रकरण ही देख लो। राहुल गांधी यों तो लोकतांत्रिक प्रक्रिया की बात करते नहीं थक रहे। पर प्रदेश अध्यक्षों के चुनाव में दो लाइन का प्रस्ताव पारित कर अध्यक्ष तय करने का अधिकार सोनिया पर छोड़ा जा रहा। सो बीजेपी भी कम नहीं। जीती, तो बीजेपी आलाकमान, हार गए, तो ठीकरा स्थानीय नेतृत्व पर। लोकसभा चुनाव के बाद जब बीजेपी में हार पर सिर-फुटव्वल होने लगी, तो क्या हुआ। केंद्रीय स्तर पर चुनाव के सर्वेसर्वा अरुण जेतली प्रमोशन पाकर संवैधानिक पद पर जा बैठे। राज्यों में कई प्रदेश अध्यक्षों को जिम्मेदार ठहराया गया। उत्तराखंड में बी.सी. खंडूरी की सीएम की कुर्सी छिन गई। तो राजस्थान में वसुंधरा से जबरन इस्तीफा कराया गया। अपने वामपंथियों को भी कम न समझो। लोकसभा चुनाव में खुद के हारने का मलाल नहीं, पर इस बात की खुशी थी कि बीजेपी हार गई। यही हाल बीजेपी का था, जब नेता कहते फिर रहे थे- भले हम नहीं जीते, पर लेफ्ट तो हार गया। सच कहूं, तो सही मायने में कोई भी पार्टी लोकतांत्रिक नहीं। बीजेपी और कांग्रेस के लोकतंत्र में सिर्फ इतना फर्क- कांग्रेस में पहले स्थानीय नेता प्रस्ताव पारित कर सोनिया पर फैसला छोड़ देते। पर बीजेपी में पहले आलाकमान तय करता। फिर पर्यवेक्षक के जरिए स्थानीय नेतृत्व को एक-एक कर बता दिया जाता।
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17/09/2010

Thursday, September 16, 2010

अयोध्या: फैसला हो, पर फासला न बढ़े

'मोको कहां ढूंढे रे बंदे, मैं तो तेरे पास में। ना मैं मंदिर, ना मैं मस्जिद, ना काबे कैलाश में।' कबीर की इस वाणी को मजहबी ठेकेदारों ने आत्मसात किया होता। तो मंदिर-मस्जिद का कोई झगड़ा न होता। पर आजादी के 63 साल बाद देश एक बार फिर खुद को वहीं खड़ा पा रहा। सो अयोध्या विवाद पर 24 सितंबर को संभावित फैसले से पहले केंद्र सरकार को अपील जारी करनी पड़ी। मनमोहन केबिनेट ने प्रस्ताव पारित कर अदालती फैसले के सम्मान पर जोर दिया। शांति सौहार्द कायम रखते हुए कानूनी विकल्प अख्तियार करने की सलाह दी। प्रस्ताव में साफ कहा गया- सभी तबके के लोगों को अदालती फैसले के बाद धैर्य और शांति रखनी होगी। एक वर्ग की ओर से दूसरे वर्ग को उकसाने का प्रयास नहीं होना चाहिए और ना ही किसी की भावनाएं आहत की जानी चाहिए। केबिनेट की अपील में संस्कृति और सर्व धर्म समभाव की दुहाई देते हुए देश की तरक्की की बात कही गई। यानी अयोध्या पर आने वाला फैसला महज अदालती फैसला नहीं, अलबत्ता विविधता में एकता वाले देश के इम्तिहान की घड़ी। सचमुच साठ साल बाद फैसले की घड़ी आ रही। अयोध्या में विवादित स्थल पर राम जन्मभूमि या बाबरी मस्जिद, इस पर लड़ाई मुगल काल से चली आ रही। मंदिर का दावा करने वालों की दलील, 1538 में बाबर ने मंदिर तोडक़र मस्जिद बनवाई। अंग्रेजों के शासनकाल में 1885 में पहली बार मुकदमा हुआ। तब मस्जिद के पास चबूतरा को भगवान राम का जन्म स्थान बता भजन-कीर्तन की इजाजत मांगी गई। पर अंग्रेज राज में फैजाबाद कोर्ट ने यह अपील खारिज कर दी। कोर्ट की दलील थी- मस्जिद के ठीक सामने मंदिर दो समुदायों के बीच झगड़े की वजह बनेगा। फिर 22-23 दिसंबर 1949 को राम, सीता, लक्ष्मण की मूर्ति वहां रखी गई। पहली जनवरी 1950 को निर्मोही अखाड़े के गोपाल दास विशारद ने अपील की, मूर्ति न हटाई जाए और पूजा-अर्चना की अनुमति मिले। अखाड़े की ओर से 1959 में फिर अपील दायर हुई। तो 1961 में सेंट्रल सुन्नी वक्फ बोर्ड ने नमाज की अनुमति मांगी। फिर 1989 में रिटायर्ड जज देवकीनंदन अग्रवाल ने वीएचपी में शामिल होकर राम के मित्र की हैसियत से याचिका लगाई। जिसमें भगवान राम को भी एक पक्ष बनाया गया। कहा गया- मैं राम हूं, यहीं पैदा हुआ था। मेरे भक्तों को पूजा करने की छूट दी जाए। फिर दोनों पक्षों की ओर से लगातार दलीलें दी जाती रहीं। अदालती आदेश पर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने खुदाई कर अपनी रपट सौंप दी। बीजेपी-वीएचपी की ओर से गुरुनानक देव से लेकर ब्रिटिश किताब की दलील दी गई। हिंदू चिंतन में देव होने की दलील के साथ-साथ इस्लाम धर्म में मस्जिद के लिए जमीन खरीदे जाने वाली दलील का भी जिक्र किया गया। अब जमीन के मालिकाना हक को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बैंच क्या फैसला सुनाएगी, यह तो 24 सितंबर को साफ होगा। पर जहां मंदिर-मस्जिद के पैरोकार अभी से माहौल बनाने में जुटे। वहां सरकार संवेदनशील मुद्दे से निपटने के उपाय में जुटी। मायावती सरकार तो पहले ही अतिरिक्त सुरक्षा बल तैनात करने की मांग कर चुकी। गुरुवार को मनमोहन केबिनेट ने भी एहतियात बरतते हुए शांति की अपील की। यों फैसले का अंदाजा भले देश की जनता को न हो। पर अदालत में अपना पक्ष रखने वाले शायद अपनी दलीलों की ताकत भांप चुके। सो अदालती फैसले से आठ दिन पहले संघ ने बाकायदा एलान कर दिया। संघ प्रमुख मोहन भागवत तीन दिन से दिल्ली में डेरा डाले बैठे। बीजेपी-वीएचपी नेताओं के साथ लगातार मंत्रणा चल रही। सो मंत्रणा का असर गुरुवार को संघ के बयान में दिखा। संघ के प्रवक्ता राम माधव बोले- राम मंदिर करोड़ों लोगों की आस्था का विषय है। संघ का पूरा प्रयास होगा कि संसद से कानून बनाकर ही समाधान ढूंढा जाना चाहिए। अब हाथ कंगन को आरसी क्या, पढ़े-लिखे को फारसी क्या। जब कोर्ट के फैसले पर देश की निगाहें टिकी हों। तब विवाद से जुड़ा एक पक्ष अदालती फैसले के बजाए संसद से कानून बनाने की पैरवी करे। तो मायूसी का अंदाजा लगाया जा सकता। अब कोई पूछे, जब मामले में संघ-वीएचपी की ओर से पैरवी करने वाले रविशंकर प्रसाद जैसे कानूनदां अपनी दलील के प्रति आश्वस्त होकर अपना बखान कर रहे। तो फैसले से ठीक पहले संसद से कानून बनाने की मांग क्यों हो रही? क्या अब बीजेपी-संघ-वीएचपी को अपनी दलील में दम नहीं नजर आ रहा? यों वाजपेयी राज हो या संघ के पुराने तेवर, हमेशा यही कहा गया- अयोध्या विवाद आपसी बातचीत से हल हो या अदालती फैसले से। वीएचपी ने साथ में संसद से कानून पारित करने पर भी जोर दिया। अब अदालती फैसले से पहले बीजेपी में भले खामोशी हो। पर संघ परिवारियों की मंत्रणा कोई यों ही नहीं। जामा मस्जिद के शाही इमाम तो जुमातुल विदा के वक्त ही आगामी रणनीति पर विचार कर चुके। पर फिलहाल संघ में हलचल अधिक हो रही। सो केंद्र सरकार हो या अयोध्या विवाद पर फैसला सुनाने वाली अदालत, कोशिश यही हो रही कि न्यायिक प्रक्रिया का सम्मान हो और कहीं प्रतिक्रिया न हो। सो गुरुवार को केंद्र ने अपील जारी की। तो शुक्रवार को हाईकोर्ट ने सभी पक्षों में सहमति बनाने के लिए बुला रखा। पर संघ सोमनाथ मंदिर जैसा कानून बनाने की दलील देगा। संघ की रणनीति, अगर फैसला मंदिर के हक में नहीं आया, तो सरकार का रुख देखकर अगली रणनीति तय करेंगे। पर अपनी अपील यही, मंदिर-मस्जिद विवाद में अब तक बहुत पानी बह चुका। सो अयोध्या पर फैसला तो हो, पर कोशिश यही हो कि हिंदू-मुसलमान में फासला न बढ़े।
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16/09/2010

Wednesday, September 15, 2010

ऑल पार्टी मीटिंग, फिर भी क्यों नहीं ‘ऑल इज वैल’?

तो दो साल बाद कश्मीर फिर मुहाने पर खड़ा हो गया। घाटी का बवाल नहीं थम रहा। बुधवार को हल ढूंढने को हुई सर्वदलीय मीटिंग भी ढाक के तीन पात ही रही। मीटिंग का हश्र वही हुआ, जिसकी उम्मीद थी। आम्र्ड फोर्सेज स्पेशल पॉवर एक्ट यानी अफ्स्पा पर राजनीतिक अफसाना नहीं बना। सो तय हुआ, ऑल पार्टी डेलीगेशन घाटी का दौरा करेगा। फिर हालात देख फैसले लिए जाएंगे। पर तीन महीने बाद ही मनमोहन सरकार की नींद क्यों उचटती? जब तक धरती खून से न सन जाए, क्या सरकार को खतरे का अंदाजा नहीं होता? सनद रहे, सो याद दिलाते जाएं। दो साल पहले जब देश 61वां स्वाधीनता दिवस मना रहा था। तब घाटी के हालात हू-ब-हू इसी तरह थे। तब अमरनाथ श्राइन बोर्ड जमीन मुद्दे पर जम्मू बनाम कश्मीर जंग सी छिड़ गई थी। शुरुआत में तबके सीएम गुलाम नबी आजाद की चूक ने चिंगारी को शोला बनने दिया। करीबन दो-ढाई महीने बाद मनमोहन सरकार ने घाटी की सुध ली। तो जैसे बुधवार को सर्वदलीय मीटिंग हुई। वैसी ही तब हुई थी और तबके होम मिनिस्टर शिवराज पाटिल की रहनुमाई में डेलीगेशन जम्मू-कश्मीर गया। पर आखिर में वही हुआ, श्राइन बोर्ड को जमीन देनी पड़ी। असल में केंद्र में संयुक्त मोर्चा सरकार के वक्त अमरनाथ यात्रा में असुविधा की वजह से करीबन सौ यात्री मर गए थे। सो नितीश सेन गुप्त कमेटी बनाई गई थी। जिसने श्राइन बोर्ड बनाने की सिफारिश की। फिर 2000 में फारुक अब्दुल्ला सरकार ने एसजीपीसी और वक्फ बोर्ड की तरह जे एंड के श्राइन बोर्ड एक्ट पास किया। पर जमीन सीधे श्राइन बोर्ड को नहीं मिली। तो मामला हाईकोर्ट गया। मुफ्ती मोहम्मद सईद के टर्म में कोर्ट ने जमीन देने का फैसला दिया। फिर आजाद सीएम बने, तो केबिनेट ने मंजूरी दी। पर राजनीतिक फायदे के लिए पीडीपी ने तब भी वही खेल किया, जो आज कर रही। आखिर में जमीन श्राइन बोर्ड को ही देनी पड़ी। पर सोचिए, विवाद का क्या मतलब रहा? अगर सरकार पहले ही कदम उठा लेती। तो घाटी में न तब कफ्र्यू जैसे हालात पैदा होते, न अबके। पर सत्ता में बैठे लोग अब नीरो तो नहीं, पर उसकी मानसिकता वाले हो ही चुके। सो जब तक घाटी के जलने की बू दिल्ली तक न पहुंचे, कोई असर नहीं होता। पर देर से ही सही, सरकार ने सुध ली। फिर भी घाटी में अमन-चैन बहाल होगा, इसकी उम्मीद नहीं दिख रही। सर्वदलीय मीटिंग में फैसला हुआ, एक डेलीगेशन घाटी का दौरा कर अवाम से बात करे। हालात का जायजा ले, फिर सरकार कोई फैसला लेगी। पर फैसला होगा क्या? जब बुधवार की मीटिंग में ही अफ्स्पा पर राजनीतिक दलों ने अपना-अपना तराना सुना दिया। तो मौका-मुआइना के बाद तराना बदलेगा, इसकी उम्मीद नहीं। जैसे तमाम विरोध के बाद भी ए.आर. रहमान ने कॉमनवेल्थ के लिए गाया गाना फिर से बनाने की मांग ठुकरा दी। कुछ ऐसी ही आदत राजनीतिक दलों की। यों तमाम विरोध के बाद भी ऑल पार्टी मीटिंग में सबने ऑल इज वैल की ही कामना की। पहली बार पीडीपी की महबूबा मुफ्ती ऐसी मीटिंग में पहुंचीं। तो मिजाज भी बदले-बदले दिखे। मीटिंग के बाद बोलीं- अलगाववादी हों या सरकार, दोनों पक्षों को बिना शर्त बातचीत करनी चाहिए। हमें मानवीयता के नजरिए से घाटी की समस्या को देखना होगा। महबूबा ने मीटिंग के भीतर भी मनमोहन को वाजपेयी सरकार की पहल याद कराई। जब आडवाणी के डिप्टी पीएम रहते मानवता के दायरे में बिना शर्त बातचीत शुरू हुई। महबूबा ने वाजपेयी-आडवाणी की पहल को गुड स्टार्ट करार दिया। पर अब उनकी शिकायत, कश्मीर को जेल बना दिया गया। यों महबूबा की दिल्ली में हुई अपील अलगाववादी नेता सैयद अली शाह गिलानी को नागवार गुजरी। उन ने बिना शर्त बातचीत से इनकार कर दिया। दो-टूक कह दिया- सर्वदलीय डेलीगेशन के आने का कोई मतलब नहीं। सो वह बात नहीं करेंगे। जब तक कोई ठोस नतीजा नहीं निकलता, घाटी के हालात नहीं बदलने वाले। यानी अलगाववादी नेता आंदोलन की आग को जलाए रखना चाहते। पर गिलानी की जो शर्तें, वह शायद ही मानी जा सकतीं। गिलानी कश्मीर को विवादास्पद मानने, अफ्स्पा हटाने, जेल में बंद लोगों की रिहाई और मानवाधिकार जैसी शर्तें रख रहे। रिहाई और मानवाधिकार पर भले कोई एतराज न हो। पर भारतीय हिस्से वाले ही नहीं, अलबत्ता पाक अधिकृत कश्मीर को भी संसद के प्रस्ताव के जरिए वापस हासिल करने की बात हो चुकी। उसे कोई भी सरकार भला विवादास्पद कैसे माने? अलगाववादी पाकिस्तानी शह से घाटी में हिंसा को हवा दे रहे। हालात फिर 1965 के युद्ध से पहले वाले हो गए। भले पाकिस्तान ने अलगाववादियों की मदद के लिए आर्मी नहीं भेजी। पर बिना पाकिस्तानी शह के अलगाववादी इतने मुखर नहीं हो सकते। जो अलगाववादी पस्त हो चुके थे। उन्हें उमर अब्दुल्ला की अपरिपक्वता ने पनपने का मौका दिया। फिर भी सर्वदलीय मीटिंग में मनमोहन ने उमर की ही सराहना की। अलगाववादी बेखौफ पाकिस्तानी झंडे लहरा रहे। पर सरकार सेना का मनोबल तोडऩे की फिराक में। यों एयर चीफ मार्शल पीवी नाइक ने खुला एतराज जता दिया। पर सीसीएस से सर्वदलीय मीटिंग और डेलीगेशन भेजने तक की कवायद आखिर में अफ्स्पा की अर्थी बनाने के लिए हो रही। पर कोई पूछे, हर बार सरकार देर से क्यों जागती। आखिर कब तक घाटी के हालत बेकाबू होते रहेंगे और सरकारें ऐसे ही सर्वदलीय मीटिंग कर डेलीगेशन भेजती रहेंगी। कोई अंतिम समाधान क्यों नहीं ढूंढ पा रही अपनी सरकार?
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15/09/2010

Tuesday, September 14, 2010

गुरु-शिष्य परंपरा पर भारी ‘गिल सिंड्रोम’

कॉमनवेल्थ से पहले अयोध्या फैसले के खिलाफ अर्जी लग गई। फैसले के बाद प्रतिक्रिया हुई, तो देश की छवि खराब होगी। सो अर्जी में फिलहाल फैसला टालने की अपील। यों एक और अर्जी लगी, जिसमें फैसले के बजाए समझौता कराने की मांग की गई। सो अब हाईकोर्ट की लखनऊ बैंच पहले इन दोनों अर्जियों पर सुनवाई करेगी। पर मंदिर-मस्जिद के नाम पर रोटी सेकने वालों ने दुकानें सजा लीं। संघ का शीर्ष नेतृत्व दिल्ली में डेरा जमा चुका। साधु-संतों को आगे करने की रणनीति। ताकि बीजेपी फिर बंटाधार न करे। पर आडवाणी अपना गौरवगान शुरू कर चुके। सितंबर महीने की महिमा का बखान किया। तो साफतौर पर जतलाया, 24 सितंबर को फैसला आ रहा। अयोध्या मामले पर उनकी पहली रथयात्रा सोमनाथ से 25 सितंबर को शुरू हुई थी। यानी फैसला हक में आया, तो आडवाणी श्रेय लेंगे। पर जिस छह दिसंबर को बाबरी ढांचा ढहाया गया, आडवाणी उसे दुखद और काला दिन करार दे चुके। सो आडवाणी का दिल और दिमाग किधर, वही जानें। पर बीजेपी ने एक बार फिर खोया भरोसा हासिल करने की कवायद शुरू कर दी। फैसले से पहले जनता की नब्ज टटोलने का अभियान चलेगा। तो इधर गडकरी कह रहे- सत्ता से पहले कार्यकर्ता का सम्मान जरूरी। पर जब सत्ता थी, तो बीजेपी के सूरमाओं ने किस तरह कार्यकर्ताओं को दुत्कारा, आज बीजेपी के नेता ही किंवदंती की तरह सुनाते। सो काठ की हांडी चढ़ेगी या नहीं, यह तो बाद की बात। पर कहीं हाईकोर्ट ने फैसला टालने की अर्जी मान ली। तो संघ-बीजेपी की मौजूदा तैयारियों पर पानी फिर जाएगा। पर देश की जनता को फिलहाल कॉमनवेल्थ गेम्स की चिंता। सो अब लोग यही दुआ कर रहे- सब कुछ ठीक से निपट जाए, ताकि देश का नाम खराब न हो। सो देश की जनता को अपने खिलाडिय़ों से भी नाम रोशन करने की उम्मीद। पर गुरु-शिष्य परंपरा वाले इस देश में जब एम.एस. गिल जैसे मंत्री होंगे। तो मैडल की उम्मीद करना बेमानी। मंगलवार को कुश्ती के वल्र्ड चैंपिंयन सुशील कुमार अपने गुरु सतपाल के साथ एम.एस. गिल से मिलने पहुंचे। फोटो सेशन हुआ, तो गिल ने सतपाल सिंह को फोटो शूट से हटा दिया। यह बात चैंपियन सुशील को भी नागवार गुजरी। पर मंत्री के आगे किसकी क्या बिसात। गिल ने कह दिया- यह सिस्टम ठीक नहीं। पर कोई पूछे, गिल किस सिस्टम से कांग्रेस सांसद और मंत्री बने? मुख्य चुनाव आयुक्त पद से रिटायर हुए जुम्मा-जुम्मा आठ दिन भी न हुए होंगे। कांग्रेस ने राज्यसभा का टिकट थमाने का फैसला कर लिया। तब तक गिल कांग्रेस के मेंबर भी नहीं थे। पर रेवड़ी के लिए सब कुछ रातों-रात हुआ। फिर सांसद से मंत्री बन गए। तब विपक्ष ने सवाल उठाया था। पर जब खुद को रेवड़ी मिल रही हो, तो सब जायज हो जाता। सारे सिस्टम सही लगने लगते। पर सवाल, मुख्य चुनाव आयुक्त पद से रिटायर होने वाले गिल कोई विरले नहीं। फिर कांग्रेस ने सिर्फ गिल को ही सांसदी और मंत्री पद की रेवड़ी क्यों थमाई? क्या संवैधानिक पद पर रहते हुए कांग्रेस के लिए कोई राजनीतिक कॉमनवेल्थ तो नहीं खेल रहे थे? पर ब्यूरोक्रेटों को अपना किया खूब अच्छा लगता। या यों कहें, ब्यूरोक्रेटों को यह गफलत हो चुकी कि समूची व्यवस्था वही चला रहे। ब्यूरोक्रेट में यह सिंड्रोम घर कर चुका कि वह कुछ भी कर सकते। ब्यूरोक्रेट के बारे में विधि मंत्री वीरप्पा मोइली ने भी सोमवार को बखूबी फरमाया। बोले- रिटायरमेंट के बाद ब्यूरोक्रेट संत हो जाते। सो कुश्ती चैंपियन सुशील के गुरु के अपमान में गिल का नहीं, गिल के अंदर के ब्यूरोक्रेट का दोष। जो द्रोणाचार्य अवार्डी सतपाल सिंह को नहीं पहचान पाए। साइना नेहवाल के कोच गोपीचंद को भी गिल ने नहीं पहचाना था। अब देखो, अगर किसी मंत्री के साथ ऐसा हो जाए। तो आसमान सिर पर उठा लेंगे। पर गिल ने यहां पहचान कर भी गुरु का अपमान किया। सिस्टम की दुहाई दी। तो क्या ऐसे मनोबल बढ़ेगा खिलाडिय़ों का? जिस गुरु सतपाल सिंह ने सुशील को बचपन से कुश्ती के गुर सिखा आज विश्व चैंपियन बनवाया। जब उस गुरु का अपमान होगा, तो मैडल कैसे देश में आएगा? खेल के प्रति भेदभाव का रवैया कोई नया नहीं। याद करिए, गणतंत्र दिवस समारोह के वक्त पद्म अवार्ड से सम्मानितों के नाम। ओलंपिक में सुशील ने कांस्य जीता। पर बॉक्सर विजेंद्र की तरह सुशील को पद्मश्री नहीं मिला। तब भी सरकार ने सुशील का दिल दुखाया। पर सरकार के पास दिल ही नहीं, जो दुखे। सचमुच सरकार के पास दिल होता, तो हिरणों के दिल पर तीर चलाने वाले सैफ अली खान पद्मश्री नहीं होते। एटमी डील में बिचौलिया बनकर संत सिंह चटवाल पद्मभूषण हो गए। जिनके खिलाफ सीबीआई जांच हुई। बिल क्लिंटन के साथ जब भारत दौरे पर आए, तो गिरफ्तारी भी हुई थी। सो जब नागरिक सम्मान भी फिक्सिंग के शिकार होने लगे। तो सम्मान को मंत्री सम्मान देंगे, इसकी उम्मीद करना बेमानी। मैडल-पदक जैसी चीजों के लिए राजनेता अब उसी नाम पर मुहर लगाते। जो राजनीति की चारणगिरी करे। तभी तो कॉमनवेल्थ में घोटाले की कई परतें उधड़ीं। पर एम.एस. गिल ने संसद में कलमाडिय़ों का बचाव करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। कॉमनवेल्थ में पानी की रह पैसा बहाने को जायज ठहरा चुके। सो कॉमनवेल्थ में खिलाडिय़ों को खिलाने के बजाए गिल को ही मैदान में उतार दो। वैसे भी गिल खुद को बॉक्सिंग, तैराकी और कई खेलों में माहिर बता चुके। अब सब-कुछ गिल खुद ही कर लेंगे। तो न सिस्टम में गिलती मिलेगी, न किसी गुरु का अपमान होगा।
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14/09/2010

Monday, September 13, 2010

तो कश्मीर पर कब तक मीटिंग-मीटिंग खेलेंगे?

घाटी की आग को अमेरिकी घी ने शोला बना दिया। पिछले तीन महीने से घाटी का बवाल थम नहीं रहा। अब हालात इतने बदतर हो चुके, एक चिंगारी भी शोला बन जाती। अमेरिका के एक पादरी ने 9/11 की बरसी पर कुरान-ए-पाक जलाने की धमकी दी। पर बराक ओबामा ने दखल दिया। चौतरफा आवाज उठी, तो पादरी ने कदम पीछे खींचा। फिर भी कश्मीर में मुद्दा बन गया। अलगाववादियों ने भावना भडक़ाने में कसर नहीं छोड़ी। सो ईद के दिन से अब तक हिंसक वारदातों में कई जानें जा चुकीं। कई सरकारी इमारतें स्वाहा हो चुकीं। सोमवार को उमर अब्दुल्ला केबिनेट ने शांति की अपील की। अमेरिकी पादरी के कदम की भत्र्सना की। पर कुरान वाली घटना तो महज बहाना बनी। असल में आम्र्ड फोर्सेज स्पेशल पॉवर एक्ट पर केंद्र सरकार की ऊहापोह से नाराजगी। ईद से पहले उमर ने सोनिया-मनमोहन से मुलाकात कर कुछ जगहों से एक्ट को हटाने का फार्मूला रखा था। ताकि घाटी में अमन-चैन बहाल किया जा सके। पर मनमोहन केबिनेट में ही इस पर दो राय हो गईं। रक्षा मंत्री ए.के. एंटनी एक्ट को हटाए जाने से सहमत नहीं। पर राजनीतिक लिहाज से कांग्रेस और गृह मंत्रालय हटाने के पक्ष में। सो दो बार टलने के बाद सोमवार को सुरक्षा मामलों की केबिनेट कमेटी बैठी। तो तीन घंटे की मत्थापच्ची के बाद भी सरकार आगे बढऩे के बजाए एक महीना पीछे चली गई। अब बुधवार को सर्वदलीय मीटिंग होगी। तो आम्र्ड फोर्सेज स्पेशल पॉवर एक्ट पर चर्चा होगी। पर क्या सचमुच मनमोहन राजनीतिक आम सहमति बनाना चाह रहे या सिर्फ दिखावा? सनद रहे सो याद दिलाते जाएं। पिछले महीने दस अगस्त को पीएम ने सर्वदलीय मीटिंग बुलाई थी। तो ओपनिंग स्पीच का लाइव टेलीकास्ट करा कश्मीरी अवाम को भी संबोधित किया था। शांति की तमाम अपील के साथ-साथ बुनियादी ढांचे में सुधार के लिए सी. रंगराजन की रहनुमाई में कमेटी का वादा किया। अपने संबोधन में मनमोहन ने साफ तौर पर आम्र्ड फोर्सेज स्पेशल एक्ट को खत्म करने का इरादा भी जतला दिया। जब कहा था- जम्मू-कश्मीर पुलिस को अब खुद ही जिम्मेदारी लेनी होगी। हम अवाम की भावना समझते हैं। अब कोई पूछे, जब पिछले महीने की सर्वदलीय मीटिंग में ही इरादा साफ कर दिया। तो दुविधा का दिखावा किसके लिए? बीजेपी इस एक्ट को हटाने के खिलाफ। पर जैसे सरकार में दो राय, अब बीजेपी के राम जेठमलानी का अलग राग। जेठमलानी भी इस बात से इत्तिफाक रखते कि प्रयोग के तौर पर कुछ जगहों से स्पेशल एक्ट हटाया जाना चाहिए। जेठमलानी का जिक्र इसलिए जरूरी, क्योंकि पीएम से मिलने गए बीजेपी के शीर्ष प्रतिनिधिमंडल में आडवाणी, जेतली, सुषमा के अलावा चौथे शख्स जेठमलानी थे। सो विपक्ष हो या सरकार, जब आपस में ही कोई एका नहीं। तो अमन बहाली की उम्मीद कैसे करें। घाटी की आग में सब अपनी-अपनी रोटियां सेक रहे। यों तो आम्र्ड फोर्सेज स्पेशल पॉवर एक्ट 1958 में तब बना था, जब पूर्वोत्तर के राज्यों में उग्रवाद हावी हो चुका था। पर आतंकी घटनाओं के मद्देनजर 1990 में जम्मू-कश्मीर में भी लागू कर दिया गया। जिसमें सेना को देश की सुरक्षा की खातिर कुछ विशेष अधिकार दिए गए। पर मानवाधिकारवादियों से लेकर यूएन ने भी इसका विरोध किया। घाटी से पहले मणिपुर में इस एक्ट के खिलाफ तीखे प्रदर्शन हो चुके। मनोरमा बलात्कार कांड से सेना की भूमिका पर कई सवाल उठे थे। इस एक्ट को मणिपुर से हटाने के लिए एक्टिविस्ट शर्मिला की दस साल से भूख हड़ताल चल रही। सो सरकार की मुश्किल सिर्फ कश्मीर नहीं। अलबत्ता कश्मीर से एक्ट हटाया गया। तो एक्शन दूर तलक होगा। तब केंद्र के लिए आंतरिक सुरक्षा का ऐसा खतरा पैदा होगा, जिसे संभालना सरकार के लिए टेढ़ी खीर होगा। पर स्पेशल पॉवर एक्ट को वापस लेने का सुर्रा भी मनमोहनवादियों ने ही छेड़ा। मनमोहन जब पिछली बार कश्मीर दौरे पर गए। तो अलगाववादियों से वार्ता की पेशकश कर दी। अलगाववादी पिछले कुछ चुनावों में अपनी हार और भारतीय लोकतंत्र के प्रति अवाम के जुनून को देख पस्त हो चुके थे। पर जम्मू-कश्मीर के चौकलेटी चेहरे वाले युवा सीएम उमर अब्दुल्ला जमीनी हकीकत को नहीं भांप पाए। जून में सुरक्षा बलों की गोलीबारी से 11 साल के बच्चे की मौत के बाद से भडक़ी हिंसा में अब तक पाच-छह दर्जन लोग मारे जा चुके। पर उमर अभी तक संभाल नहीं पाए। सो उन ने भी राजनीतिक पैकेज के नाम पर स्पेशल एक्ट में नरमी का फार्मूला रख दिया। जो अब मनमोहन के गले की ऐसी फांस बना, जो न निगलते बन रहा, न उगलते। सो अलगाववादियों को फिर से पनपने देने के लिए भी मनमोहन-उमर सरकार ही जिम्मेदार। अगर वक्त रहते उमर ने संवेदना दिखाई होती, मनमोहन ने सक्रियता। तो आज घाटी के हालात काबू से बाहर न होते। उमर ने पिछली लोकसभा में अमरनाथ श्राइन बोर्ड जमीन विवाद के वक्त आग लगाऊ भाषण दिया था। तो कांग्रेस ने खूब मेजें थपथपाई थीं। उसी भाषण से उमर का ग्राफ अवाम की नजर में बढ़ा। पर सचमुच में उमर ने अपरिपक्वता दिखाई थी। जो तब देखने-सुनने में भले अच्छी लगी हो। पर अब घाटी उसका नतीजा भुगत रही। सो बीजेपी उमर को हटाने की मांग कर रही। तो कांग्रेस को कुछ सूझ नहीं रहा। सो बीजेपी की मांग पर सोमवार को पलटवार किया। तो कहा- वाजपेयी राज में बीजेपी ने कौन सा तीर मार लिया था? मतलब साफ, कांग्रेस भी कोई तीर मारने नहीं जा रही। घाटी भले झुलसती रहे।
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13/09/2010

Friday, September 10, 2010

गर लौह पुरुष, तो इतने बेबस क्यों आडवाणी?

अब चाहे आडवाणी विरोध करें या कोई और, अर्जुन मुंडा तो झोला उठाए गुरुजी के साथ चल दिए। जब सिर पर संघ और गढ़ के रक्षक गडकरी का हाथ हो। तो शपथ में कोई आए या न आए, मुंडा को फर्क नहीं। सो आडवाणी खेमे के विरोध से बेपरवाह अर्जुन चिडिय़ा की आंख की तरह सिर्फ गुरुजी को साधने में जुटे। ताकि अस्थिरता की दलील देने वालों को स्थिरता की मिसाल पेश कर सकें। अब अर्जुन और गुरुजी की जोड़ी भले झारखंड में सत्ता का मजा लूटे। पर बीजेपी में महाभारत हो गया। आडवाणी कैंप को झारखंड का फैसला नहीं सुहा रहा। सो शनिवार को शपथ ग्रहण समारोह से दूरी बनाएगा। पर अहम सवाल, आडवाणी की छठी इंद्री देर से क्यों जागती? अगर झारखंड में शिबू संग सरकार बनाने के खिलाफ थे। तो गडकरी के इकतरफा फैसले पर उंगली क्यों नहीं उठाई? क्यों नहीं संसदीय बोर्ड की बैठक बुलाने की मांग की? पर अब जब मेज पर खाना परोसा जा चुका, तो आडवाणी कैंप मैन्यू क्यों बदल रहा? सचमुच फैसला हो जाने के बाद फैसले पर उंगली उठाना आडवाणी की आदत हो चुकी। भारत सुरक्षा यात्रा के वक्त पुणे में आडवाणी ने कंधार प्रकरण से पल्ला झाडऩे की कोशिश की थी। खुद को लौह पुरुष साबित करने को कह दिया- कंधार जाकर आतंकियों को छोडऩे के फैसले के खिलाफ थे। फिर बहस छिड़ी, तो खुद को इस फैसले से भी अनजान बताना शुरू कर दिया। जसवंत सिंह आतंकियों को लेकर कंधार गए, इसकी भी जानकारी से खुद को अनभिज्ञ बताया। मानो कंधार प्रकरण सिर्फ वाजपेयी और बीजेपी का, आडवाणी तो पाक-साफ। पर सांच को आंच नहीं, खुद जसवंत सिंह ने कह दिया था- आडवाणी शायद भूल गए होंगे। सचमुच इतना बड़ा अपहरण कांड हो, मसूद अजहर जैसे तीन खूंखार आतंकी विशेष विमान से कंधार छोडऩे का फैसला हो। और तबके गृहमंत्री आडवाणी पूरे फैसले से पल्ला झाड़ें, तो क्या उन्हें आप लौह पुरुष मानेंगे? सिर्फ कंधार प्रकरण ही नहीं, जिन्ना प्रकरण याद करिए। देश के बंटवारे के लिए जिम्मेदार मोहम्मद अली जिन्ना को कराची जाकर आडवाणी ने सेक्युलर बताया। तो पूरा संघ परिवार खिलाफ खड़ा हो गया था। पर तब आडवाणी न तो अपने बयान से डिगे और ना ही अपने बयान को ठीक से अभिव्यक्त कर पाए। भले अध्यक्षी छोडऩी पड़ी। पर अंदरखाने ऐसा खेल हुआ, संघ ने आडवाणी को पीएम इन वेटिंग बना दिया। राजस्थान बीजेपी के विवाद में आडवाणी की भूमिका हमेशा बदलती रही। जब 2009 के आम चुनाव में आडवाणी पीएम इन वेटिंग ही रह गए। कई राज्यों में बीजेपी का सूपड़ा-साफ हुआ। तो आडवाणी के घर कोर ग्रुप की मीटिंग हुई। हार वाले राज्यों में चरणबद्ध नेतृत्व परिवर्तन का खाका बना। राजस्थान बीजेपी के अध्यक्ष पद से ओम माथुर ने तो लोकसभा नतीजे के चौथे दिन ही इस्तीफा दे दिया था। पर विवाद तब खड़ा हुआ, जब अगस्त में वसुंधरा राजे को नेता विपक्ष से इस्तीफा देने को कहा गया। फिर तीन महीने तक वसुंधरा बनाम राजनाथ जो हाई वोल्टेज ड्रामा चला, जगजाहिर। आडवाणी की शह पर वसुंधरा ने अध्यक्ष को चुनौती दे डाली। फिर जिस फैसले को आडवाणी ने खुद सहमति दी थी, बाद की संसदीय बोर्ड की मीटिंग में पलटने की मांग करने लगे। पर राजनाथ सिंह ने दो-टूक इनकार कर दिया था। आखिर में वसुंधरा का इस्तीफा हुआ। फिर अगस्त में शिमला में चिंतन बैठक से पहले जसवंत सिंह जिन्ना के मुरीद हो गए। तो हार पर चिंतन से पहले बीजेपी ने जसवंत की चिंता की। जसवंत को बिना वकील-दलील-अपील के बीजेपी से बाहर कर दिया। तब चिंतन बैठक के आखिरी दिन सुषमा स्वराज ने आडवाणी के भाषण का सार परोसा। तो साफ-साफ कहा था- आडवाणी ने कहा, जिनके (जसवंत के) साथ तीस साल रहा, उनका निष्कासन दुखद है। लेकिन कार्यकर्ता इससे कम में संतुष्ट नहीं होते। पर याद है ना, पखवाड़े भर बाद ही आडवाणी कैंप से खबरें प्लांट होने लगीं। आडवाणी जसवंत के निष्कासन के खिलाफ थे। अब यह कैसी खिलाफत, यह आडवाणी और उनके समर्थक ही जानें। फिर निष्कासन की बरसी से पहले ही किस शान-ओ-शौकत के साथ जसवंत की बीजेपी में वापसी हुई। आडवाणी ने अहम भूमिका निभा जसवंत की ससम्मान वापसी कराई। पर कोई पूछे, शिमला के संसदीय बोर्ड की बैठक में क्या हो गया था? बी.सी. खंडूरी को सीएम पद से हटाने में भी आडवाणी बनाम राजनाथ जंग हुई थी। अगर आडवाणी जी की तरह थोड़ा और स्मरण करें, तो राजस्थान बीजेपी अध्यक्ष पद पर ओम माथुर की नियुक्ति के वक्त छिड़ा विवाद याद करिए। कैसे गुटबाजी सामने आई थी। उमा भारती को बीजेपी से आडवाणी के अध्यक्ष रहते निकाला गया। पर अब आडवाणी उनकी वापसी चाह रहे। लोकसभा चुनाव के वक्त सुधांशु मित्तल को असम का सह-प्रभारी बनाए जाने पर कैसे जेतली और राजनाथ में ठनी। जेतली ने सीईसी का लगातार बायकाट किया। पर आडवाणी ने पहले कोई बीच-बचाव का कदम नहीं उठाया। संघ को कभी मातृ संगठन तो कभी रोजमर्रा के काम में दखल देने वाला कहा। अब झारखंड में सरकार बनाने के खिलाफ बताए जा रहे। शपथ से दूरी बनाकर छवि बेहतर बनाने की कोशिश। क्या सचमुच झारखंड पर आडवाणी की नहीं चली। या सत्ता की रेवड़ी और छवि के बीच संतुलन बिठाने की कवायद? आडवाणी बीजेपी के वट वृक्ष। सो इतने कमजोर तो नहीं हो सकते। आखिर खुद को लौह पुरुष बताने वाले इतने बेबस क्यों?
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10/09/2010