Thursday, September 30, 2010

दिलों का फासला भी मिट जाए, अब हो ऐसी सुलह

'तुम्हारी भी जय-जय, हमारी भी जय-जय, न तुम हारे, न हम हारे।' गर सचमुच फैसले को दोनों पक्ष इसी नजरिए से देखें। तो अयोध्या पर अदालती फैसला न सिर्फ एतिहासिक, अलबत्ता राष्ट्रीय एकता की अनूठी मिसाल होगा। इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बैंच के तीनों जजों ने राम जन्मभूमि को कानूनी मान्यता दी। तो बाकी अन्य पक्षों को भी निराश नहीं किया। भले तीनों जजों की राय में फर्क हो। पर फैसला यही, विवादित जमीन तीन हिस्सों में बांटी जाए। रामलला विराजमान यानी मूर्ति वाली जगह का हक भगवान राम को। तो सीता रसोई और राम चबूतरा का हक निर्मोही अखाड़े को। चूंकि लंबे समय से मुस्लिम भी इबादत करते आ रहे। सो एक हिस्सा सुन्नी वक्फ बोर्ड को भी। यों शुक्रवार को रिटायर हो रहे बैंच के एक जज धर्मवीर शर्मा ने तो समूची जमीन भगवान राम की बताई। पर जस्टिस एस.यू. खान और सुधीर अग्रवाल ने तीन हिस्से में बांटने का फैसला दिया। भारतीय पुरातत्व विभाग की रपट से माना गया, मस्जिद किसी इमारत को तोडक़र बनाई गई थी। सो इस्लामिक मान्यता के तहत ऐसी जमीन पर मस्जिद को मान्यता नहीं दी गई। पर दस हजार पन्नों के फैसले में कोर्ट का लब्बोलुवाब यही, रामलला की पूजा अनंतकाल से होती आ रही। सो मंदिर भी बने। निर्मोही अखाड़े को सीता रसोई और राम चबूतरा का कब्जा बरकरार रखा। तो लंबे समय से मुस्लिमों की इबादत को मान वक्फ बोर्ड को भी जमीन में हिस्सा दिया गया। यानी कानून से परे हट अदालत ने शायद पहली मर्तबा आस्था को महत्व दिया। जिस पक्ष का जैसा था, उसको करीब-करीब वैसा ही मिल गया। सचमुच इतने उलझे हुए केस का इससे सुलझा हुआ हल नहीं हो सकता। सो सभी पक्षों को अब लचीला रुख अपनाना चाहिए। अदालती फैसले को आधार बना नए सिरे से बातचीत हो। तो सिर्फ विवादित जमीन ही नहीं, समूची 70 एकड़ जमीन का फैसला हो जाए। सो अब केंद्र सरकार की भूमिका भी अहम, जिसने 1993 में 67 एकड़ जमीन अधिग्रहित कर ली थी। हाईकोर्ट ने तो रामलला और निर्मोही अखाड़े की जमीन तय कर दी। पर मुस्लिमों की इबादत की जगह तय नहीं की। अलबत्ता तीनों के लिए बराबर व्यवस्था करने का जिम्मा सरकार पर छोड़ दिया। अगर केंद्र चाहे, तो अब दोनों पक्षों में समझौता कराने की पहल कर सकता। भले दोनों पक्ष फैसले से पूरी तरह संतुष्ट नहीं। पर पूरी तरह असंतुष्ट भी नहीं। सो सरकार ईमानदार और प्रभावी पहल करे, तो विवाद हाईकोर्ट के फैसले से ही खत्म हो सकता। यों फैसले के बाद सुन्नी वक्फ बोर्ड के वकील जफरयाब जिलानी ने सुप्रीम कोर्ट जाने का एलान कर दिया। तो मंदिर के पैरोकारों में भी कुछ ऐसे कट्टरपंथी, जो मस्जिद के लिए एक तिहाई जमीन के फैसले को चुनौती देने के मूड में। यों फैसले के फौरन बाद संघ-बीजेपी ने इस पर चुप्पी साध ली। सर संघचालक मोहन भागवत ने यह फैसला संत उच्चाधिकार समिति पर छोड़ दिया। पर भागवत-आडवाणी दोनों अपनी खुशी का इजहार चतुराई से कर गए। कहा- हिंदुओं का हक साबित हो गया। सो अब गर्भगृह पर भव्य राम मंदिर बने। हाईकोर्ट का फैसला राष्ट्रीय एकता का नया अध्याय और सांप्रदायिक सौहार्द का नया युग। मोहन भागवत ने फैसले पर खुशी को स्वाभाविक बताया। पर संयम की अपील करते हुए कहा- कोई ऐसा कुछ न करे, जो दूसरे की भावना को ठेस पहुंचाए। संघ परिवार ने मुस्लिम समाज से भूली ताहि बिसारने की अपील करते हुए मंदिर निर्माण में जुटने का न्योता भी दिया। पर संघ की ओर से जारी बयान में मंदिर आंदोलन में मारे गए लोगों की कुर्बानी का भी जिक्र कर गए। यों देश की जनता की परिपक्वता को अपना भी सलाम, जिसने फैसले को न्याय के तौर पर कबूला। फिर भी राजनीति नहीं होगी, ऐसा कहना बेमानी। मायावती ने तो फैसले के फौरन बाद पीएम की चिट्ठी लिख दी। केंद्र की ओर से 67 एकड़ जमीन अधिग्रहण का इतिहास याद कराते हुए माया ने फैसले के मुताबिक यथोचित कार्रवाई करने की मांग की। उन ने बार-बार दोहराया, इस विवाद में जो भी करना है, वह केंद्र ही करेगा। यानी माया ने एक पक्ष की थोड़ी निराशा को देख अपना पल्ला फौरन झाड़ लिया। ताकि कहीं कुछ गड़बड़ हो, तो ठीकरा केंद्र के ही सिर फूटे। पर कांग्रेस कोई बीजेपी-बीएसपी की तरह गबरू जवान पार्टी नहीं। अलबत्ता सवा सौ साल पुरानी तजुर्बेकार पार्टी। सो मामले की संवेदनशीलता देख हर बार की तरह इस बार भी फैसले का स्वागत किया। कांग्रेस के जनार्दन द्विवेदी आध्यात्मिक गुरु बन गए। रामचरित मानस की चौपाई का जिक्र किया- प्रसन्नतां या न गताभिषेकतस्था, न मम्ले वनवास दु:खत:। मुखाम्बुजश्री रघुनंदनस्य मे, सदास्तु सा मञ्जुलमंगलप्रदा।। अर्थात भगवान राम का राज्याभिषेक हुआ या वनवास हुआ। पर चेहरे पर कभी खुशी या दुख नहीं। अलबत्ता स्थिरप्रज्ञ की तरह रहे। यानी राम को शरणागत होकर कांग्रेस ने संयम की अपील की। सचमुच देश के लिए इम्तिहान का दौर। सुबह से ही फैसले के प्रति देश की निगाहें टिकी हुई थीं। हर तरफ बापू के भजन, ईश्वर-अल्लाह.... सन्मति दे भगवान की धुन बजती रही। फैसले के बाद मीटिंगों, बयानबाजियों का दौर चला। पीएम ने भी देश की जनता पर भरोसा जताया। देश की जनता ने भी परिपक्वता दिखा राजनीति की रोटी सेकने वालों को बतला दिया, 1992 का दौर अब खत्म हो चुका। यानी अयोध्या पर फैसला भी आ गया, दोनों समुदायों के बीच फासला भी नहीं बढ़ा। सो अब अपील, जो भी फासला बचा, सुलह के प्रयासों से ही मिट जाए। और किसी को सुप्रीम कोर्ट जाने की जरूरत न पड़े।
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30/09/2010

Wednesday, September 29, 2010

तो क्यों न नेहरू और काटजू के फार्मूले पर हो अमल?

ईश्वर-अल्लाह तेरो नाम, सबको सन्मति दे भगवान। अयोध्या हो या कॉमनवेल्थ, अब बापू भजन ही आसरा। अयोध्या विवाद में गुरुवार को नया अध्याय जुड़ेगा। सो फैसले से पहले शांति की अपील के साथ-साथ सुरक्षा के भी पुख्ता बंदोबस्त हो गए। अब इंतजार तीन जजों की बैंच के फैसले का। कॉमनवेल्थ गेम्स के आगाज से ठीक पहले फैसले ने सरकार के हाथ-पांव फुला रखे। सो बुधवार को होम मिनिस्टर पी. चिदंबरम ने बापू भजन सुना शांति की अपील की। सरकार को पूरा भरोसा, फैसला जो भी हो, आखिर में गेंद सुप्रीम कोर्ट के पाले में ही आएगी। पर हाईकोर्ट के फैसले से राजनीतिक लाभ उठाने की कोशिश में कुछ अनहोनी न हो, यही दुआ कर रही सरकार। अपनी भी कामना यही, इतिहास खुद को न दोहराए। यों कॉमनवेल्थ से पहले अयोध्या से भले सरकार को राहत मिल जाए। पर गेम्स के ठीक बाद कॉमनवेल्थ का भूत सरकार को डराएगा। झलक तो बुधवार को अपने सुप्रीम कोर्ट ने दिखा दी। सुनवाई हो रही थी दिल्ली के जंतर-मंतर के निकट एनडीएमसी के दफ्तर से जुड़े अवैध कंस्ट्रक्शन के मामले पर। कानूनन संरक्षित स्मारकों के सौ मीटर के दायरे में कंस्ट्रक्शन नहीं हो सकता। पर एनडीएमसी ने खुद को कोतवाल मान वह सब कर लिया, जिसकी कानून इजाजत नहीं देता। सो सुप्रीम कोर्ट ने एनडीएमसी को जमकर लताड़ा। कहा- कोई इतना बेदिमाग और कानून विरोधी कैसे हो सकता। क्या इतिहास और संविधान के प्रति आपका कोई सम्मान नहीं? क्या सिर्फ पैसा ही सब कुछ हो गया? अगर यही करना है, तो क्यों नहीं जंतर-मंतर को होटल या मॉल में बदल देते। ताकि भारत की चमक दिख सके। सरकारी अमला जब कानून को बपौती समझ ले। तो सुप्रीम कोर्ट का बिफरना लाजिमी। सो कोर्ट की टिप्पणी एनडीएमसी से आगे बढक़र कॉमनवेल्थ तक पहुंच गई। कोर्ट ने चेतावनी दे दी, वह आंख मूंदकर नहीं बैठने वाली। सत्तर हजार करोड़ पानी में बहा दिए गए। फिर भी नया पुल ताश के पत्तों की तरह ढह जाता है। कोर्ट की तल्खी यहीं नहीं थमी। कहा- इस देश में बिना काम के पेमेंट हो जाते। सत्तर हजार करोड़ की कोई जिम्मेदारी नहीं। भ्रष्टाचार का बोलबाला हो चुका। जिस कॉमनवेल्थ को अभी सार्वजनिक उद्देश्य बताया जा रहा, पंद्रह अक्टूबर के बाद निजी उद्देश्य हो जाएंगे। सचमुच सीवीसी और कैग की ओर से सवाल उठाए जाने के बाद भी कॉमनवेल्थ गेम्स के आयोजकों ने परवाह नहीं की। उखाडऩे-लगाने के खेल में इतना समय गंवाया कि अब शीला-कलमाड़ी-गिल-जयपाल चौबीस घंटे की जगह अड़तालीस घंटे काम कर रहे। सूरज कब निकल रहा, कब डूब रहा, इन चारों को मालूम नहीं। पर सचमुच दिमाग लगाकर आयोजकों ने काम किया होता। तो आज न काम पड़े होते, न देश की फजीहत होती। पर क्या सचमुच कॉमनवेल्थ गेम्स के बाद भ्रष्टाचारियों को सजा मिलेगी? सुप्रीम कोर्ट भले सख्ती दिखाए। पर जांच तो सीबीआई या सरकार की एजेंसी से ही करानी होगी। तब इस बात की गारंटी कौन देगा कि इस केस का भी हश्र लालू-माया-मुलायम के केस जैसा नहीं होगा। लीपापोती में राजनेता और नौकरशाह चोर-चोर मौसेरे भाई ही नहीं, दो जिस्म, एक जान हो जाते। देश की यही बड़ी विडंबना, भ्रष्टाचार कण-कण में व्याप्त हो चुका। पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई। बुधवार को ही बीसीसीआई ने जगमोहन डालमिया से आरोप वापस लेने का फैसला किया। यानी राजनीति में कोई, कब दोस्त और कब दुश्मन बन जाए, पता नहीं। सुप्रीम कोर्ट ने सोलह आने सही कहा- सरकारी अमले में अब कोई नैतिकता नहीं, सिर्फ पैसा ही सब कुछ। पर सुप्रीम कोर्ट अपनी व्यथा का इजहार कई बार कर चुका। सनद रहे, सो बताते जाएं। सात मार्च 2007 को चारा घोटाले के मामले में जस्टिस एस.बी. सिन्हा और जस्टिस मार्कंडेय काटजू सुनवाई कर रहे थे। घोटाले के आरोप के बाद बर्खास्त कर्मचारी बृजभूषण प्रसाद को विशेष अदालत से सजा हो चुकी थी। सो सुप्रीम कोर्ट में जमानत के लिए वकील ने दलील दी कि बृजभूषण तो सिर्फ बजट एकाउंट आफीसर थे। सो जस्टिस काटजू भडक़ गए। कहा- तुम्हें फंड का ऑडिट करना था, पर तुमने क्या किया? हर कोई इस मुल्क को लूट लेना चाहता है। बस एक ही उपाय बचा है कि भ्रष्ट लोगों को लैम्प पोस्ट पर लटका फांसी दे दी जाए। पर क्या करें, कानून हमें इसकी इजाजत नहीं देता। वरना कुछ भ्रष्ट लोगों को सरेआम फांसी की सजा देते, ताकि लोग भ्रष्टाचार के नाम से डरें। जो पीड़ा सुप्रीम कोर्ट के जज ने उड़ेली। हू-ब-हू यही बात देश के पहले पीएम पंडित जवाहरलाल नेहरू भी कह चुके। उन ने भी कहा था- भ्रष्टाचारियों को सबसे पास के लैम्प पोस्ट से लटका कर फांसी दे देनी चाहिए। पर जब नेहरू के काल में भ्रष्टाचार नहीं रुका, तो अब कैसी उम्मीद। कॉमनवेल्थ के नाम पर भ्रष्टाचार का जो खेल हुआ, वह दिल्ली की जनता ने तो खुली आंखों से देखा। हर उखडऩे और बिछने वाले टाइल्स को जुबान मिल जाए, तो भ्रष्टाचार की सत्यकथा सामने आ जाएगी। पर देश में सत्य और अहिंसा की फिक्र अब किसे? कहीं अयोध्या के नाम पर रोटी सेकने के लिए अहिंसा की बलि देने को तैयार। रही बात सत्य की, तो सचमुच वह राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के साथ ही 30 जनवरी 1948 को खत्म हो चुकी। सो कॉमनवेल्थ गेम्स के नाम पर मची लूट का सच सामने आएगा, इसकी गुंजाइश कम। यों राजनीति के लिए हायतौबा जरूर मचेगी। पर फिर आखिर में वही सवाल, कॉमनवेल्थ का भ्रष्टाचार देश की साख को बट्टा लगा गया। सो सच माइने में यह देश के साथ गद्दारी। तो क्यों न अब नेहरू और काटजू के फार्मूले पर अमल हो।
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Tuesday, September 28, 2010

‘यूपीए चैनल’ पर रामायण और ‘महाभारत’ एक साथ

अयोध्या विवाद में नई इबारत लिखने का रास्ता खुल गया। सुप्रीम कोर्ट ने मुकदमे के खामखां रमेश चंद्र त्रिपाठी की याचिका खारिज कर दी। सो हाईकोर्ट की लखनऊ बैंच अब 30 सितंबर को फैसला सुनाएगी। पर फैसले से समाज में फासला न बढ़े। सामाजिक सौहार्द कायम रहे, सो सभी पक्षों ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले का स्वागत किया। फैसले को कबूल करने और शांति बनाए रखने की अपील भी की। सो अब सबकी निगाहें इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बैंच पर टिक गईं। अब फैसला क्या होगा, यह बाद की बात। पर राजनीति की बिसात हफ्ते भर में कुछ अधिक बिछ गईं। बीजेपी-संघ परिवार ने चुप्पी तोड़ी, तो दूसरे पक्ष ने भी जल्द फैसले का दबाव बनाया। सुप्रीम कोर्ट में सिवा निर्मोही अखाड़े के कोई फैसला टालने को राजी नहीं हुआ। सो केंद्र सरकार ने भी दोहरा रुख अपनाया। अटार्नी जनरल जी.ई. वाहनवती ने दलील दी- बातचीत से समाधान निकले, इससे अच्छी बात नहीं हो सकती। पर कानूनी प्रक्रिया में भी अनिश्चितता नहीं रहनी चाहिए। यानी त्रिपाठी से सांठगांठ से केंद्र ने दूरी दिखा दी। सो कोर्ट ने प्रक्रिया में दखल देने से इनकार कर दिया। त्रिपाठी को वक्त से उलटी दिशा में चलने वाला करार दिया। सो अयोध्या मामला अब एक कदम आगे बढ़ेगा। तो फिर सुप्रीम कोर्ट में आना तय। फैसला किसी के लिए खुशी, तो किसी को गम देगा। पर खुशी या गम में कोई बलवा न हो। सो एहतियातन तैयारियां हो गईं। केंद्र सरकार ने फौरन एडवाइजरी जारी कर देश भर में शांति बरतने की सलाह दी। यूपी को अर्धसैनिक बलों की 52 कंपनियां देने का फैसला हुआ। कर्नाटक, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र समेत 19 संवेदनशील जगहों की पहचान कर विशेष तैनाती का फैसला हुआ। देश भर के आठ ठिकानों पर वायुसेना के विमान तैनात रहेंगे। जो दस मिनट में मौके पर पहुंचने में सक्षम। केंद्र सरकार की एडवाइजरी में लोगों से फैसले पर खुशी न मनाने की भी अपील। यूपी की मायावती सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले के फौरन बाद दो लाइन का नोट जारी कर दिया। गड़बड़ी करने वालों से सख्ती से निपटा जाएगा। यों पिछले साठ साल में अयोध्या की सरयू नदी में बहुत पानी बह चुका। अगर छह दिसंबर 1992 को भी देखें, तो अठारह साल बीत चुके। तबसे अब तक पीढिय़ां बदल चुकीं। अब युवा वर्ग मंदिर-मस्जिद के झमेले से अधिक देश की तरक्की की ओर उन्मुख। पर नई पीढ़ी की सोच से जिन लोगों की राजनीतिक दुकान बंद होती दिख रही। सचमुच उनके इरादे न तब नेक थे, न अब। रणनीति यही बन रही- फैसला कुछ भी हो, अपने वोट बैंक के हिसाब से भुनाएंगे। यानी राम-रहीम के नाम पर वोट बटोरने का गुणा-भाग करने में कोई भी राजनीतिक दल पीछे नहीं। संघ-विहिप ने सुप्रीम कोर्ट की हरी झंडी के बाद फिर वही राग अलापा। अदालती फैसला तो हो, पर भगवान राम दुनिया की सभी अदालतों से ऊपर। राम को आस्था का विषय बताया। पर अयोध्या में मंदिर-मस्जिद की ठेकेदारी करने वालों ने क्या कभी उस नगरी की सुध ली। जहां इमारतें खंडहर, सडक़ें बदहाल, बाकी पूजा स्थल चीख-चीख कर अपना कसूर पूछ रहे। अब सोचो, जब भगवान या खुदा आस्था के मुद्दे। तो जमीन के लिए ऐसी कटु लड़ाई क्यों? अब संघ परिवार की दलील देखिए। कोर्ट तो 2.77 एकड़ जमीन पर फैसला सुनाएगा। पर मंदिर के लिए तो समूची 70 एकड़ जमीन चाहिए। यानी केंद्र की ओर से अधिग्रहीत 67 एकड़ जमीन के लिए सोमनाथ की तर्ज पर कानून बनाने की मांग। सो भले कोर्ट के फैसले के बाद पहले जैसा बलवा न हो। पर धर्म के ठेकेदारों ने इस कदर जाल बुन रखा, सामाजिक तनाव का वातावरण बनेगा। सो चुनौती केंद्र और राज्य सरकारों की। अगर वक्त रहते खतरा भांप असामाजिक तत्वों पर काबू पा लिया। तो तथाकथित स्वयंभू ठेकेदारों की मंशा धरी रह जाएगी। सचमुच यूपीए सरकार के लिए अग्नि परीक्षा की घड़ी। देश की सुरक्षा में लगे जवान कई मोर्चों पर लड़ रहे। कश्मीर में अलगाववाद, तो कई राज्यों में नक्सलवाद के खिलाफ जंग चल रही। पर सबसे बड़ी चुनौती कॉमनवेल्थ गेम्स कराने की। हाल ही में जामा मस्जिद के पास हुई फायरिंग की घटना से किरकिरी हो चुकी। सो कॉमनवेल्थ की सुरक्षा भी अभेद्य बनाने की तैयारी हो गई। सुखोई से लेकर मिग-21 तक। मानव रहित विमान के जरिए 24 घंटे निगरानी की व्यवस्था। पर संयोग कहें या कुछ और, अयोध्या का फैसला 24 सितंबर को आना था। अब गुरुवार को फैसला आएगा। इतवार से कॉमनवेल्थ गेम्स का आगाज। यानी कॉमनवेल्थ रूपी महाभारत से जूझ रही सरकार को अब फिक्र, कहीं अयोध्या की रामायण पर कोई ‘महाभारत’ न छिड़ जाए। वैसे भी खेल के महाभारत में आयोजकों ने देश की भद्द तो पिटवा ही दी। अब कहीं अयोध्या के फेर में कुछ गड़बड़ हुई। तो खेल का राम ही राखा। सचमुच यूपीए सरकार के लिए अयोध्या और कॉमनवेल्थ किसी चुनौती से कम नहीं। सो एक बार फिर वही पुरानी अपील। फैसले का सम्मान हो, पर दिलों के बीच फासला न बढ़े। देश की जनता को शांति और धैर्य रखने की जरूरत। किसी के बहकावे या उकसावे में आकर अपना ही नुकसान करेंगे। राजनेताओं का क्या, उनकी तो आदत। जब भी मौका मिलता, उल्लू सीधा कर कुर्सी से चिपक जाते। और फिर राम-खुदा के नाम पर राजनीति की रोटी सेकते रहते। सो पीएम से लेकर देश का हर तबका यही अपील कर रहा- शांति बनाए रखें।
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28/09/2010

Monday, September 27, 2010

पटरी पर कॉमनवेल्थ, मुहाने पर गौरव!

अब कॉमनवेल्थ की पटरी पर शीला-गिल-कलमाड़ी-जयपाल एक्सप्रेस दौडऩे लगी। चारों ट्रेन रास्ते में कहीं फिर तफरी न मारने लगें। सो पैरलल लाइन पर मनमोहन की राजधानी चल रही। पर विवाद है कि थमने का नाम नहीं ले रहा। कॉमनवेल्थ को शाप देने वाले कांग्रेसी दुर्वासा मणिशंकर अय्यर तो सोमवार को विदेश चले गए। कॉमनवेल्थ का बेड़ा गर्क होने की भविष्यवाणी पहले ही कर चुके। सो मणिशंकर अपनी आंखों के सामने भविष्यवाणी सच होते नहीं देखना चाहते। पर दिल में अभी भी वही बात, काश, कॉमनवेल्थ का बेड़ा गर्क हो जाए। यों मणिशंकर का लंदन जाना भले संयोग हो। पर दिलचस्प पहलू बताते जाएं। जब 1962 में चीन ने भारत पर हमला किया, तब भी मणि भाई लंदन में थे। बतौर छात्र मणिशंकर ने कम्युनिस्टों के लिए खूब चंदे इकट्ठे किए थे। पर मणिशंकर की मति मणि ही जानें, फिलहाल फिक्र देश की साख की। सो आखिरी छह दिनों में सरकारी अमला छककर काम कर रहा। शीला खुद दिन में चार-छह दफा खेल गांव के चक्कर लगा रहीं। पर सच कहें, कॉमनवेल्थ गेम्स के अपने आयोजनों ने देश का बेड़ा गर्क कर दिया। कहीं गंदगी का अंबार, तो कहीं खिलाड़ी के बैठने से ही बैड टूट रहे। खेल गांव की लिफ्ट यमुना की मार झेल रही। तो कहीं कमरे में सांप निकल रहे। फिर भी कलमाड़ी जिम्मेदारी लेने को तैयार नहीं। तुर्रा देखिए, सोमवार को बोले- साफ-सफाई करना मेरा काम नहीं। पर कोई पूछे, क्या सिर्फ मलाई मारना ही काम? आखिर आयोजन समिति का अध्यक्ष क्या झक मारने के लिए बने? अगर वक्त पर शहरी विकास मंत्रालय या दिल्ली सरकार या एमसीडी ने काम पूरा करके नहीं दिया। तो कलमाड़ी ने केबिनेट सचिव या पीएम से बात क्यों नहीं की? क्या इसी दिन का इंतजार कर रहे थे कलमाड़ी? सचमुच ये आयोजक देश की इज्जत के दु:शासन बन गए। अब देश के लिए गौरव का कॉमनवेल्थ फजीहत की वजह बन रहा। सो मनमोहन की नींद उसी तरह अब टूटी, जैसे द्रोपदी के चीर हरण के वक्त कौरवों की सभा में अट्टहास से धृतराष्ट्र द्रवित दिखे। तलत महमूद के गीत की तरह मनमोहन अब होश में आए। पर सवाल, सब कुछ लुटा के होश में आए, तो क्या किया। दिन में अगर चिराग जलाए, तो क्या किया। अगर मनमोहन यही चिराग साल भर पहले भी जलाते। तो आज कॉमनवेल्थ गेम्स में दूधिया रोशनी होती। बदनामी की काली छाया नहीं। पर देर से ही सही, अब करीब-करीब सब दुरुस्त होता दिख रहा। भले कुछ जगहों पर अपना देशी जुगाड़ काम आ रहा। जहां-जहां काम पूरे नहीं हुए, बड़े-बड़े फ्लैक्स बोर्ड लगाकर गंदगी को ढकने और सुंदरता बिखेरने का काम हो रहा। खेल गांव में जो भी कमियां पाई जा रहीं, फौरन दुरुस्त कराई जा रहीं। एक दिन में चौबीस घंटे नहीं, अड़तालीस घंटे काम कर रहे। पर मीन-मेख निकालने वाले विदेशी अपनी हरकतों से बाज कहां आएंगे। भारत को नीचा दिखाने की मानसिकता दुनिया के कई देशों ने अभी तक नहीं छोड़ी। पर सबसे अहम बयान कॉमनवेल्थ गेम्स फैडरेशन के सीईओ माइक हूपर का। जिन ने पहले कॉमनवेल्थ के लिए बनी विशेष लेन को चौबीस घंटे रिजर्व रखने की जिद पकड़ी। अपनी सरकार ने ट्रेफिक का हवाला देकर इनकार किया। तो हूपर ने समस्या के लिए दिल्ली की बेतरतीब जनसंख्या पर उंगली उठा दी। कॉमनवेल्थ की तैयारियों में कमी के लिए भारत सरकार को जिम्मेदार ठहरा दिया। पर आलोचना हुई, तो कलमाड़ी एंड कंपनी का नाम लिया। अपने बयान से पलट गए। पर माइक हूपर के बड़े यानी फैडरेशन के अध्यक्ष माइक फेनेल ने हूपर का बचाव किया। सारा दोष अपने नेताओं की तरह मीडिया के सिर मढ़ दिया। पर फैडरेशन के माइक बंधुओं को तैयारियों में कमी आज ही नहीं दिखी। सो सवाल, फैडरेशन ने डे-टू-डे मानीटरिंग क्यों नहीं की? सनद रहे, सो माइक बंधुओं समेत आपको भी बताते जाएं। जब आठ अक्टूबर 2009 को 71 देशों के डेलीगेट्स ने अपनी तैयारियों का जायजा लिया था। तब दो दिन पहले से भडक़ने वाले डेलीगेट्स शाम होते-होते संतुष्ट हो गए थे। मौका-मुआइने से पहले फैडरेशन के मुखिया फैनेल ने मेजबानी छीनने तक की चेतावनी दी थी। सो सवाल, जब पिछले साल अक्टूबर में ही हालात इतने खराब होने की रपट फैनेल तक थी। तो फैनेल ने उसके बाद क्या किया? आखिर ऐसा क्या जुगाड़ हुआ, जो फैनेल तब तैयारियों के प्रति आश्वस्त हो गए? पर माइक बंधुओं की छोडि़ए। कमी सचमुच अपनी। टीवी पर सोमवार को शीला दीक्षित का चार साल पुराना एक बयान दिखा। तब शीला से पूछा गया था- गेम्स में सिर्फ चार साल बचे हैं, काम कैसे पूरा होगा? तो इतराती शीला ने कहा था- ब्रह्मा ने तो सिर्फ छह दिन में पूरी सृष्टि रच दी थी। सोचिए, तब आयोजन से जुड़े सभी महकमों ने फुर्ती दिखाई होती, तो आज विदेशी तो छोडि़ए, कोई भारतीय भी उंगली नहीं उठा पाता। पर अपने आयोजकों ने फैडरेशन के आगे ऐसे घुटने टेके, मानो माइक बंधु अब देश के गौरव को लेन बनाकर उस पर दौड़ेंगे। माइक हूपर ने सोमवार को बेहिचक कह दिया- मुझे भारत के गौरव की फिक्र नहीं। मेरी प्राथमिकता सफल खेल कराने की। पर विवाद अभी खत्म नहीं। तैयारी पटरी पर लौट आई। तो उद्घाटन-समापन समारोह की राजनीति शुरू हो गई। यानी अपने आयोजकों ने देश के लिए गौरव के आयोजन कॉमनवेल्थ को कड़वा घूंट बना दिया।
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27/09/2010

Friday, September 24, 2010

गिल की उड़ी गिल्ली, तो जयपाल हुए ‘रेड्डी’

पंचों की राय सिर-माथे, पर पतनाला वहीं रहेगा। अयोध्या पर फैसला टलना अब दोनों पक्षों को साजिश लग रहा। सो शुक्रवार को बीजेपी-विहिप ने चुप्पी तोड़ दी। विहिप ने फैसले के सम्मान की बात तो की। पर साधु-संतों की अहम बैठक के बाद एलान हो गया। विवादित स्थल पर जैसे भी हो, सिर्फ मंदिर बनेगा। साथ में चेतावनी भी, अगर मंदिर के हक में फैसला नहीं आया। तो देश में जबर्दस्त विरोध होगा। अब देखिए, एक तरफ विहिप फैसला सुनाने की मांग कर रहा। तो दूसरी तरफ फैसला मंदिर के हक में ही चाहिए। कोई और फैसला मंजूर नहीं होगा। साधु-संतों की मीटिंग के बाद अशोक सिंघल बोले- भगवान राम दुनिया की सभी अदालतों से ऊपर। सो हम तो राम का आदेश मानेंगे। अब आप खुद सोचकर देखिए, तो मालूम पड़ जाएगा। समझौते की लाख कोशिशों के बाद भी समझौता क्यों नहीं हो पाया। सचमुच समझौते की मेज पर कोई भी पक्ष खुले मन से नहीं बैठा। अब विहिप को यह भी डर, कहीं ऐसा न हो, हाईकोर्ट जमीन का कुछ हिस्सा मंदिर वालों को दे, तो कुछ मस्जिद वालों को। सो साधु-संतों की बैठक में प्रस्ताव पारित कर कह दिया- हमें समूची 70 एकड़ जमीन चाहिए। परिसर का विभाजन और उसमें किसी दूसरे मजहब का पूजा स्थल नहीं बनेगा। पर बीजेपी अभी संयम बरते हुए। सुप्रीम कोर्ट ने फैसला टाल दिया। तो शुक्रवार को बीजेपी कोर ग्रुप की मीटिंग हुई। आडवाणी हर साल की तरह सोमनाथ चले गए। पर बाकी वरिष्ठों ने दो लाइन की व्यापक अर्थ वाली टिप्पणी तैयार की। मीडिया से मुखातिब होने को सीधे अरुण जेतली भेजे गए। तो बोले- इकसठ साल से न्यायिक प्रक्रिया में जो देरी हुई, उससे अयोध्या में मंदिर निर्माण का विषय हल नहीं हो पाया। पर अब हम उम्मीद करते हैं कि और देरी नहीं होगी। मतलब, बीजेपी हो या विहिप, तेवर एक जैसे, सिर्फ भाषा अलग। बीजेपी-विहिप को अब लग रहा, केंद्र सरकार फैसला टलवाने के मूड में। रमेश चंद्र त्रिपाठी को भी दबी जुबान केंद्र का एजेंट बता रहे। सो बीजेपी-विहिप का बयान केंद्र को इशारा, अब संयम का और इम्तिहान न लो। पर सरकार कांग्रेस की हो या बीजेपी की। अयोध्या जैसे संवेदनशील मुद्दे से निपटना खालाजी का घर नहीं। सो जैसे वाजपेयी राज में समझौते के नाम पर छह साल तक वार्ता-वार्ता खेलते रहे। अब अयोध्या की ओखली में कांग्रेस का सिर। सो समझौते को तरजीह दे रही। तब तो बीजेपी ने सत्ता में बने रहने के लिए राम मंदिर समेत अपने कोर मुद्दे त्याग दिए थे। सनद रहे, सो बता दें। बीजेपी ने 28-30 दिसंबर 1999 को चेन्नई अधिवेशन में एक संकल्प पारित किया था। आडवाणी ने चेन्नई घोषणा पत्र जारी किया। बोले- ‘यही घोषणा पत्र अब बीजेपी की आगे की सोच। राम जन्मभूमि समेत सभी विवादित मुद्दों को दरकिनार कर एनडीए के एजंडे को निष्ठापूर्वक लागू करना है।’ बीजेपी ने चेन्नई घोषणा पत्र के प्रारूप में स्पष्टï तौर पर अपने कार्यकर्ताओं को बताया- ‘हर कार्यकर्ता को यह अच्छी तरह समझना चाहिए कि एनडीए के एजंडे को छोडक़र पार्टी का अपना कोई एजंडा नहीं।’ सो मंदिर की राजनीति से सत्ता तक पहुंची बीजेपी सुलझा नहीं सकी। तो फिर मध्य मार्गी कांग्रेस से उम्मीद क्यों? आखिर कांग्रेस फैसले की आग में खुद का वोट बैंक क्यों झुलसाए? सो वोट की खातिर फैसला लटकाने की कोशिश पहले भी हुई। अब भी हो रही और शायद आगे भी होती रहेगी। देश में अयोध्या के सिवा भी कई अहम मुद्दे, जो सीधे जनता की जिंदगी से जुड़े। यूपीए सरकार की ताजा चुनौती कॉमनवेल्थ गेम्स ठीक से निपटाने की। ताकि देश की साख पर बट्टा न लगे। सचमुच गेम्स के आयोजकों ने अब तक देश की किरकिरी कराई। पर आखिरी वक्त में पूरी ताकत झोंक काम करीब-करीब निपटा लिया। शुक्रवार को केबिनेट में एमएस गिल कुछ प्रजेंटेशन देना चाह रहे थे। पर खफा पीएम ने गिल की गिल्ली उड़ा दी। तैयारियों से जुड़े जीओएम के मुखिया जयपाल रेड्डी को झिडक़ी लगा कह दिया- अब तो रेड्डी हो जाओ। भारत सरकार ने आखिर में कड़े कदम उठाए। तो अब तक ना-नुकर करने वाले खिलाड़ी दिल्ली पहुंचने शुरू हो गए। न्यूजीलैंड की टीम ने आने से इनकार किया था। पर शुक्रवार को न्यूजीलैंड के पीएम ने बयान दिया। अगर वह एथलीट होते, तो दिल्ली जरूर जाते। सो टीम ने आने का एलान कर दिया। इंग्लैंड की टीम पहुंची, पर अभी खेल गांव में नहीं, होटल में रुकी। इंग्लैंड का उपनिवेश खत्म हो चुका। पर मानसिकता अभी भी वही। विदेशी खिलाड़ी और नेता शायद भारत की आंतरिक मजबूती को भूल रहे। यह नहीं भूलना चाहिए, गर हमारे आयोजकों ने गलती की। तो भारत की मीडिया ने ही कान मरोड़ा। अब जरा आस्ट्रेलिया ओलंपिक संघ के अध्यक्ष की टिप्पणी देखिए। कह दिया- भारत को कॉमनवेल्थ की मेजबानी देनी ही नहीं चाहिए थी। पर आस्ट्रेलिया ने शायद आईना नहीं देखा। आयोजन में कमी थी या कुछ और, हमने ही अपनों की क्लास ली। जो अधिकारी काम नहीं कर रहे थे, उनके होश ठिकाने लाए। उस आस्ट्रेलिया की तरह नहीं, जहां नस्लभेद के नाम पर भारतीयों को निशाना बनाया गया। पर भारत उस आस्ट्रेलिया की तरह नहीं। तैयारी में कमी थी, तो हमीं ने माना, हमने ही मिलकर दुरुस्त किया। आस्ट्रेलिया की तरह नहीं, जिसने नस्लभेद की शिकायत मानी ही नहीं। अब कोई पूछे, जब भारतीयों पर हमले हो रहे थे। तब आस्ट्रेलिया की कानून-व्यवस्था कहां थी? सचमुच कुछ देश ऐसे, जो भारत की प्रगति को देखना पसंद नहीं करते। दुनिया में भारत तीसरे नंबर की अर्थव्यवस्था बनने जा रही। तो साम्राज्यवादी मानसिकता वाले देश पचा नहीं पा रहे।
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24/09/2010

Thursday, September 23, 2010

गर नीयत हो साफ, तो सुलह नामुमकिन नहीं?

तो अयोध्या फैसले पर सुप्रीम कोर्ट ने ब्रेक लगा दी। अब 28 सितंबर को फिर सुनवाई होगी। तभी तय होगा, फैसला आ रहा या लटक गया। पर गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट ने हफ्ता भर फैसला टालने का आदेश दिया। तो हू-ब-हू जस्टिस धर्मवीर शर्मा जैसी दलील। सुप्रीम कोर्ट ने माना, गर समझौते की एक फीसदी भी गुंजाईश हो। तो मौका दिया जाना चाहिए। पर जैसे सुलह की याचिका पर इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बैंच में मतभेद। वैसा ही सुप्रीम कोर्ट में दिखा। जब 17 सितंबर को हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता रमेश चंद्र त्रिपाठी की याचिका को शरारतपूर्ण बता मामला खारिज किया। पचास हजार रुपए का जुर्माना भी लगाया। पर बैंच के तीसरे जज जस्टिस धर्मवीर शर्मा ने समझौते की पहल में सहमति दिखाई। दोनों जजों की ओर से दिए गए फैसले पर असहमति दर्ज कराई। अब मामला सुप्रीम कोर्ट आया। तो बुधवार को जस्टिस अल्तमस कबीर और जस्टिस एके पटनायक की बैंच ने सुनावाई से इनकार कर दूसरी पीठ को भेजने को कहा। सो गुरुवार को मामला जस्टिस आरवी रवींद्रन और जस्टिस एच.एस. गोखले की बैंच के सामने आया। पर फैसला टालने को लेकर मतभेद। सो परंपरा के मुताबिक सभी पक्षों को नोटिस जारी किया गया। अब सभी पक्ष और एटार्नी जनरल भी मगंलवार को पहुंचेंगे। फिर सुप्रीम कोर्ट तय करेगा, फैसला टाला जाए या नहीं। यों फैसला टालने के पीछे कॉमनवेल्थ गेम्स की भी दलील दी जा रही। पर अहम पहलू, हाईकोर्ट के तीन जजों की बैंच में से एक जस्टिस धर्मवीर शर्मा इसी महीने रिटायर हो रहे। अगर तब तक फैसला नहीं हुआ। तो मामला 11 जनवरी 2010 की जगह पहुंच जाएगा। तब भी एक जज रिटायर हुए थे। यानी समूची कानूनी प्रक्रिया फिर से नई बैंच के सामने होगी। अगर जज को एक्सटेंशन दिया जाए, तो भी प्रक्रिया लंबी। सो कोई भी राह फिलहाल आसान नहीं। यों फैसले के बाद के माहौल की कोई गारंटी नहीं। सो सुप्रीम कोर्ट की पहल की मकसद यही, अनहोनी की स्थिति में कोई यह न कह सके कि कोर्ट ने सुलह का आखिरी मौका नहीं दिया। यों कहने वाले अब कह रहे, हालात से निपटना सरकार का काम। सो अदालत को तो अपना फैसला सुनाना चाहिए था। अब कोई कुछ भी कहे या भले किसी के मंसूबे पर पानी फिर गया हो। पर सुप्रीम कोर्ट की पहल संवेदनशीलता को ध्यान में रखकर ही आया। सो कांग्रेस ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले का स्वागत किया। तो चुनाव में भुनाने का मंसूबा पाले बैठी बीजेपी की बोलती बंद। अब लालकृष्ण आडवाणी सोमनाथ का संयोग नहीं बिठा पाए। हर साल की तरह सोमनाथ जाएंगे या नहीं, अभी ऊहापोह। आडवाणी ने ब्लॉग लिखकर कहा था- अयोध्या पर 24 सितंबर को फैसला आ रहा और यह एक संयोग कि 25 सितंबर 1990 को ही सोमनाथ से राम रथ यात्रा शुरु की थी। पर बीजेपी का संयोग सच में वियोग बन गया। उम्मीदवारों के चयन में अयोध्या फैसले का असर होना था। पर अब बीजेपी को उम्मीदवारों पर पहले ही मत्थापच्ची करनी होगी। सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद बीजेपी के रविशंकर प्रसाद हों या निर्मला सीतारमण, फैसले पर बोलती बंद। यों रविशंकर ने मन की पीड़ा उजागर कर ही दी। बोले, इस मामले में याचिकाकर्ता रमेश चंद्र त्रिपाठी के पीछे कौन लोग हैं, यह देखा जाना चाहिए। अब भले दोनों पक्ष समझौते की पहल को बेमानी बता रहे। समझौते की गुंजाईश से दूर भाग रहे। पर एक बात काबिल-ए-गौर, रमेशचंद्र त्रिपार्टी के इरादे को दोनों संदेह की नजर से देख रहे। सुन्नी वक्फ बोर्ड के वकील जफरयाब जिलानी बोले- जब देश के तीन-तीन पीएम ने सुलह की कोशिश की, फिर भी कोई नतीजा नहीं निकला। तो ये रमेश चंद्र त्रिपाठी क्या सुलह कराएगा। सो जब दोनों पक्ष फैसला चाह रहे थे, तो ऐसा ही होना चाहिए था। पर जिलानी ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले का सम्मान किया। बोले- जब साठ साल इंतजार किया, तो एकाध हफ्ते और सही। सचमुच फैसले पर रोक के बाद जिस तरह सभी पक्षों ने टिप्पणियां कीं, सुलह की गुंजाईश तो नहीं दिख रही। राम जन्मभूमि पुनरुद्धार समिति की वकील रंजना अग्निहोत्री ने खुद को फैसले से आहत बताया। बोलीं- पूरे मामले में असमाजिक और तथाकथित राजनीतिक तत्वों ने वकीलों की मेहनत पर पानी फिरवा दिया है। यों सच मायने में सुलह के कई प्रयास हो चुके। हाईकोर्ट की बैंच ने भी सुनवाई पूरी करते वक्त 27 जुलाई को आखिरी पहल की थी। पर जब कोई पक्ष समझौते को राजी न हो। तो अदालत जबरन कुछ नहीं करा सकता। अब अदालती फैसला जो भी हो। पर अयोध्या जमीन विवाद को दोनों पक्षों ने सिर्फ प्रतिष्ठा का सवाल बना रखा। सो कभी भी सुलह की दिशा में ईमानदार पहल नहीं हो सकी। सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद सुन्नी वक्फ बोर्ड के वकील जफरयाब जिलानी ने एक और अहम टिप्पणी की। बोले- समझौते की पहल तो पहले भी हुई। पर समझौते के नाम पर हम सरेंडर नहीं कर सकते। आखिर समझौते के उचित बिंदू भी होने चाहिए। यानी जिलानी का इशारा साफ। अगर दोनों पक्ष समझौते के मूड से बैठे। तो समझौते की गुंजाइश। कोई तलवार दिखाकर समझौता नहीं कर सकता। बातचीत से बर्लिन की दीवार टूट सकती। तो अपने घर में ही दो दिलों की दरार क्यों नहीं भर सकती? सो कुल मिलाकर सुप्रीम कोर्ट ने सुलह की जिम्मेदार पहल तो की। पर मजहब के ठेकेदारों का क्या भरोसा। जो लोगों को मजहब की दीवार में घेर इंसान को इंसान का दुश्मन बनाने की कोशिश करते रहते।
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23/09/2010

Wednesday, September 22, 2010

कॉमनवेल्थ के महाभारत में आयोजक ही दुशासन!

जिस देश को महात्मा ने अपने खून से सींचा। भारतवासियों को अपने देश पर गर्व। विविधता में एकता अपने देश की अमिट पहचान। पर 12 साल से दिल्ली की सीएम की कुर्सी पर बैठीं शीला दीक्षित को अब देश से नफरत हो रही। कॉमनवेल्थ गेम्स पर पानी फिर रहा। तो मैडम शीला और आयोजन से जुड़े कलमाडियों-जयपालों-गिलों के होश फाख्ता। मीडिया ने कॉमनवेल्थ की तैयारियों पर सत्य क्या बोल दिया। शीला ऐसे बिफरीं, मानो ‘सत्य’ बोलकर मीडिया ने गुनाह कर दिया हो। हिकारत भरी नजरों के साथ मीडिया पर बरसीं। बोलीं- ‘ऐसा देश नहीं देखा, जो अपने ही देश को बदनाम करे। ये मेरा, इनका या आपका गेम नहीं, देश का गेम है।’ यों सोलह आने सही, ये देश का गेम। पर यह भी सच, देश के इज्जत की डोर आयोजकों ने संभाल रखी। अगर आयोजक अपनी कमजोरी छिपाने की कोशिश करेंगे। तो मीडिया भला चुप क्यों बैठे। लोकतंत्र में मीडिया को चौथा स्तंभ यों ही नहीं माना गया। आखिर कब तक नेताओं को इस बात की छूट दी जाए कि वह देश को द्रोपदी बना खुद ‘दुशासन’ बने रहे? दुशासन बनने वाले नेता यह क्यों भूल जाते, तब भी लाज बचाने भगवान कृष्ण आए थे। अगर देश की इज्जत और आन-बान-शान पर कोई आंच आएगी, तो सबसे पहले मीडिया ही आगे आएगा। पर सवाल, जिन शीलाओं-कलमाडियों-जयपालों से काम नहीं संभल रहा, वे कुर्सी से चिपक उलटा मीडिया को भाषण क्यों पिला रहे? गेम्स से ठीक तेरह दिन पहले मुख्य आयोजन स्थल जवाहर लाल नेहरू स्टेडियम के पास बना फूटओवर ब्रिज की तेरहवीं हो जाए। अगले दिन यानी बुधवार को स्टेडियम के भीतर की सीलिंग उखड़ जाए। तो क्या मीडिया इन नेताओं की पीठ थपथपाए? कुर्सी से जोंक की तरह चिपके नेताओं के अंधे और बहरेपन को कौन नहीं जानता। अगर मीडिया अपनी भूमिका का ईमानदारी से निर्वाह न करे। तो हिटलर की नीति लागू करने में सत्ताधीश कोई कसर नहीं छोड़ेंगे। आखिर शीला दीक्षित मीडिया और भारत देश से इतनी खफा क्यों? क्या महात्मा गांधी के इस देश में ‘सत्य’ बोलना गुनाह हो गया? क्या यह सच नहीं, कॉमनवेल्थ के जो काम 2004-05 से शुरु होने थे। वह 2008 में शुरु हुए? क्या शुरुआती साल में कॉमनवेल्थ के कमीशन तय हो रहे थे? सचमुच अपने देश में राजनीति-नौकरशाही की सांठगांठ ने कमीशनखोरी को प्रथा बना दिया। जहां कोई भी प्रोजैक्ट शुरु होने से पहले कमीशन तय किए जाते। ऊपर से नीचे तक कमीशन का अनुपात बनाया जाता। फिर बचे हुए धन में कांट्रेक्टर अपना मुनाफा निकाल काम करता। सो रोड हो, या पुल या ओवर ब्रिज या सीलिंग, वही हश्र होता। जो नेहरू स्टेडियम के अंदर-बाहर हुआ। पर नेताओं की नाकामी की आंच अब सचमुच देश की साख पर आने लगी। नामी-गिरामी एथलीटों ने गेम्स में आने से इनकार कर दिया। अपने बंदोबस्तों पर ऊंगली उठा दी। सौ मीटर रेस के वल्र्ड चैंपियन वोल्ट काफी पहले दिल्ली आने से इनकार कर चुके। फिर भी शीलाओं-कलमाडियों-जयपालों-एमएस गिलों ने अफसरशाही के भरोसे सबकुछ छोड़ दिया। अब नट यानी कलई ‘ढह’ और ‘गिर’ रहे। तो खिसियानी बिल्ली खंभा नोंचे वाली हालत। ओवर ब्रिज ढहने से 27 मजदूर घायल हो गए। जिनमें चार की हालत गंभीर। पर शीला-जयपाल और टीम कलमाड़ी के ललित भनोट की नजर में यह छोटी-मोटी घटना। सोचिए, उस हादसे में किसी टाटा-बिरला-अंबानी जैसे अमीरों की कार को खरोंच भी आ जाती। तो ऐसा हल्का बयान नहीं आता। शीला के बयान को देख-सुन अब कॉमनवेल्थ गेम नहीं ‘शेम-शेम’ कहने को मजबूर। बुधवार को शीला उवाच की बनागी देखिए। बोलीं- ‘आपलोगों को सकारात्मक चीजें नहीं दिखती। एक हजार क्षमता वाले बस स्टैंड बनवाए, जैसा दुनिया में कहीं नहीं। नेहरू स्टेडियम इतना भव्य बना, पर आप नहीं दिखा रहे।’ यानी मजदूरों का घायल होना शीला के लिए खास बात नहीं। सो दिल्ली हाईकोर्ट ने बुधवार को जमकर क्लास ली। मुआवजे की रकम बढ़ाने के आदेश दिए। सभी खेल स्थलों की जांच के लिए अफसरों को भेजने का हुक्म दिया। अब आप देख लो, कॉमनवेल्थ गेम्स में गड़बड़ी पर विधायिका यानी संसद, न्यायपालिका और मीडिया में आवाज उठ चुकी। तो क्या सिर्फ कार्यपालिका यानी शीला मंडली ही ईमानदार और देशप्रेमी? सो बीजेपी के वेंकैया ने भी हल्ला बोला। शीला-जयपाल को नसीहत दी, हल्के बयान देकर देश का नाम बदनाम न करें। उन ने 26 मामलों में भ्रष्टाचार की जांच की भी मांग की। पर अब तक शीला मंडली का बचाव करने वाली कांग्रेस को ‘ओवरब्रिज’ ने बता दिया। कॉमनवेल्थ गेम्स के लिए बनी दीवारें भले कमजोर, पर भ्रष्टाचार की खाई बहुत गहरी। सो अभिषेक मनु सिंघवी बोले- ‘आप धैर्य रखिए, खेल अच्छे से होंगे और दोषियों की जिम्मेदारी भी तय होंगी।’ यानी कांग्रेस ने इशारा कर दिया। अगर कॉमनवेल्थ गेम्स पर देश को शर्मसार होना पड़ा। तो शीला हो या कलमाड़ी, कुर्सी छोड़ ‘कॉमन’ होना पड़ेगा। पर क्या अब तक देश की कम बदनामी हुई? कनाडा कॉमनवेल्थ गेम्स के एंड्रयू पिप ने टिप्पणी की, भारत के लिए अपनी चमक बिखेरने का मौका था। पर उसने कमियों को दूर करने के बजाए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बदनामी मोल ले ली। सचमुच जब सीवीसी ने काम की क्वालिटी पर सवाल उठाए। तो पीएमओ तक से परदा डालने की कोशिश हुई। संसद में कलमाड़ी घिरे, तो गिल ने नतमस्तक होकर बचाव किया। अब उखड़ते इंतजामों पर मैडम शीला एंड कंपनी बिफर रही।
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22/09/2010