Friday, October 8, 2010

मन की हो, तो वाह, नहीं तो पार्टी की तेरी....!

तो केंद्र सरकार ने भी मान लिया, अलगाववादियों की जुबान बोल रहे उमर। सो उमर से सफाई मांगी। क्षेत्रीय स्वायत्तता और विलय पर दिए बयान का मतलब पूछा। पर केंद्र सरकार गर सचमुच उमर से नाराज। तो सवाल, क्या कोई कार्रवाई करेगी? अगर ऐसा कोई इरादा होता। तो कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह गुरुवार को उमर संग सुर न मिलाते। कांग्रेस उमर के बयान को वजूद बचाने वाला बयान मान रही। सो केंद्र सरकार की जवाबतलबी का मकसद, पाक को बेवजह मौका न मिले। यानी देश या लोकतंत्र की नहीं, नेताओं को सिर्फ अपने वजूद की फिक्र। तभी तो अब्दुल्ला खानदान की तीसरी पीढ़ी बागडोर संभाल रही। पर सोच पहली पीढ़ी से भी गई-गुजरी। सचमुच राजनीति में वजूद बचाने को नेता लोक-लिहाज को रौंदने में तनिक भी संकोच नहीं करते। तभी तो इस होड़ में लेफ्ट को छोड़ कोई भी राजनीतिक दल पीछे नहीं। पर ताजा किस्सा बीजेपी का। वैसे कहते हैं, मुसीबत कभी अकेले नहीं आती। बीजेपी पर यह कहावत सटीक। कर्नाटक में संकट अभी सुलझा भी नहीं, बीजेपी बिहार में उलझ गई। यों कर्नाटक में दल-बदल कानून का डंडा और मंत्री पद का लॉलीपाप दिखा कुछ बागियों को पटा लिया। पर बिहार में पहले चरण की वोटिंग से महज 14 दिन पहले सीपी ठाकुर ने अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया। चुनावी समर के बीच बीजेपी में ऐसा हुड़दंग दिल्ली की ही देन। याद करिए लोकसभा चुनाव का वाकया। तबके बीजेपी अध्यक्ष राजनाथ सिंह और अरुण जेतली के बीच ऐसी जंग छिड़ी। पोल मैनेजर होते हुए भी जेतली ने केंद्रीय चुनाव समिति की मीटिंग का लगातार बॉयकाट किया। संयोग देखिए, तब खींचतान की वजह भले सुधांशु मित्तल थे। पर अधर में बिहार का ही टिकट लटका था। रार ऐसी कि जेतली बैठक में नहीं गए। पर आडवाणी के कहने पर राजनाथ के घर जाकर टिकट बंटवाया। अब जरा सीपी ठाकुर की नाराजगी की वजह भी देख लो। प्रदेश अध्यक्ष रहते हुए भी बेटे विवेक ठाकुर को मनमाफिक सीट से टिकट नहीं दिला पाए। अलबत्ता वह सीट नीतिश कुमार की झोली में आलाकमान ने डाल दी। तो सीपी ठाकुर ने आव देखा न ताव, अपना इस्तीफा दिल्ली भेज दिया। पर जरा खत का मजमून बताते जाएं। ताकि नेताओं के दिल और दिमाग का फर्क साफ हो जाए। सीपी ठाकुर ने अपने इस्तीफे में लिखा- प्रदेश अध्यक्ष पद से मेरे इस्तीफे का यह मतलब नहीं है कि अपने बेटे विवेक ठाकुर को टिकट नहीं दिला पाया। बल्कि प्रदेश में अब तक बहुत से ऐसे निर्णय हुए हैं, जिनमें मुझसे सहमति नहीं ली गई। इससे मैं आहत हूं। यानी सीपी ठाकुर का दिल रो रहा कि बेटे को टिकट नहीं दिला पाए। पर मजबूरी, वही बात जुबां से कह नहीं सकते। सो निर्णय में उपेक्षा की दलील दे रहे। पर सवाल, सीपी ठाकुर को यही वक्त क्यों मिला? गर उपेक्षा हो रही थी, तो पहले ही इस्तीफा क्यों नहीं दिया? अब जब दीघा विधानसभा सीट बीजेपी ने गठबंधन के सहयोगी जेडीयू को दे दी। तो ही ठाकुर को उपेक्षा क्यों नजर आई? अगर दीघा सीट से विवेक ठाकुर उम्मीदवार हो जाते। तो क्या सीपी ठाकुर उपेक्षा का आरोप लगाते? अगर उपेक्षा हुई भी हो, तो बेटे को टिकट मिल जाने से सारे दर्द दूर हो जाते। यों गठबंधन की जिम्मेदारी केंद्रीय नेतृत्व की होती। सो केंद्र ने फैसला लिया, तो इसमें नाराजगी क्यों? आखिर नेताओं में यह कौन सा रोग। जब आलाकमान तमाम विरोधों के बावजूद सीपी ठाकुर को अध्यक्ष बनाए, तो फैसला बहुत अच्छा। पर वही आलाकमान गठबंधन में समझौते के तहत दीघा सीट सहयोगी को दे दे। तो आलाकमान का फैसला गलत कैसे हो गया? राजनीति में किसी प्रदेश इकाई का अध्यक्ष बनने के बाद आलाकमान से यह उम्मीद नहीं की जा सकती कि जो बात राज्य को पसंद हो, वही बात करे। कम से कम सीपी ठाकुर जैसे कद्दावर नेता को यह शोभा नहीं देता। बीजेपी खुद को लोकतांत्रिक पार्टी कहती। नितिन गडकरी हर मंच से कहते- बीजेपी ही ऐसी पार्टी, जहां मेरे जैसा पोस्टर चिपकाने वाला व्यक्ति राष्ट्रीय अध्यक्ष बन सकता। गडकरी ने इस बयान से हमेशा कांग्रेस के वंशवाद पर निशाना साधा। पर ठाकुर बीजेपी में रहकर कांग्रेस जैसा मंसूबा पाले बैठे। कांग्रेस में जहां वंशवाद की पूरी बेल और हर शाख पर वंशवाद का फल दिख रहा। कुछ हद तक बीजेपी में भी यह बेल लगी। जब राजनाथ सिंह अध्यक्ष थे, तो उनने अपने बेटे पंकज सिंह को यूपी के चिरईगांव विधानसभा से उम्मीदवार बना दिया। पर सवाल उठे, तो राजनाथ ने कदम पीछे खींचने में पूरी शालीनता दिखाई। खुद पंकज ने टिकट छोड़ संगठन में रहने की इच्छा जताई। सो आज राजनाथ का अलग वजूद। पर अपने बेटे-बेटियों-रिश्तेदारों को टिकट दिला राजनीतिक वजूद बनाने वाले नेता भी कम नहीं। गोपीनाथ मुंडे बेटी पंकजा को एमएलए बना चुके। दामाद को टिकट दिलाया, पर हार गए। मध्य प्रदेश में विक्रम वर्मा की पत्नी, कैलाश सारंग और कैलाश जोशी का बेटा एमएलए। राजस्थान से अपने दुष्यंत सांसद। हिमाचल से धूमल के बेटे अनुराग का ग्राफ बढ़ रहा। तो भला सीपी ठाकुर पीछे क्यों रहते। यों बीजेपी में सीपी ठाकुर जैसे क्षत्रपों की कमी नहीं। जब कुर्सी मिलती, तो आलाकमान की वाह-वाह। और जब कुछ न मिले या कुर्सी छोडऩे को कहा जाए, तो आलाकमान को आंख दिखाने लगते। अपनों की ऐसी-तैसी और छीछालेदर करने में नहीं हिचकते।
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08/10/2010

Thursday, October 7, 2010

शेख से उमर तक, चालू आहे कश्मीर कथा

तो उमर अब्दुल्ला भी सोलह दूनी आठ ही साबित हुए। दादा से पोते तक दुनिया और राजनीति कई करवट ले चुकी। पर अब्दुल्ला खानदान की सोच नहीं बदली। जब-जब अब्दुल्ला खानदान की कुर्सी खतरे में पड़ी। जुबान पर अलगाववादियों की भाषा चढ़ गई। कश्मीर घाटी 11 जून से सुलग रही। पर युवा उमर की राजनीति बचकानी साबित हुई। घाटी की हिंसा थामने और अवाम का भरोसा जीतने में नाकाम रहे। तो उन ने आखिर में वही तुरुप चल दिया। जो कभी दादा शेख अब्दुल्ला और वालिद फारुख अब्दुल्ला आजमा चुके। अब उमर अब्दुल्ला ने मुखर होकर न सिर्फ स्वायत्तता का राग अलापा। अलबत्ता कश्मीर के भारत में विलय पर ही सवाल उठा दिए। उमर ने कहा- कश्मीर को हैदराबाद, जूनागढ़ से मत जोडि़ए। इन दोनों का पहले सम्मिलन और फिर विलय हुआ था। पर कश्मीर का भारत से सिर्फ सम्मिलन हुआ था, विलय नहीं। हम 1947 के समझौते पर कायम हैं। पर भारत सरकार ने राज्य की स्वायत्तता छीन ली। यानी उमर ने अलगाववादियों की जुबां बोल घाटी का बवाल थामने की कोशिश की। अपने संविधान में जम्मू-कश्मीर को स्पेशल स्टेटस मिला हुआ। पंडित नेहरू ने अनुच्छेद 370 के तहत यह प्रावधान कराया था। ताकि अवाम धीरे-धीरे राष्ट्र की मुख्य धारा से जुड़ सके। पर इन साठ सालों में स्पेशल स्टेटस से सैपरेट स्टेटस की मांग होने लगी। उमर के दादा जान शेख अब्दुल्ला ने तो अनुच्छेद 370 को देश के सभी राज्यों में लागू करने का दाव खेल दिया था। ताकि संविधान का अस्थायी अनुच्छेद स्थायी हो जाए। सोचो, अगर शेख अपने मंसूबे में कामयाब हो जाते। तो आज देश के हालात क्या होते। सचमुच अलगाववाद पर अंकुश लगाने को कभी ईमानदार पहल नहीं हुई। अमेरिका ने भारत-पाक के बीच कश्मीर मुद्दे को हमेशा जिंदा रखा। ताकि दोनों को ब्लैकमेल कर सके। शेख अब्दुल्ला ने डिक्शन प्लान के तहत तीन स्टेट बनाने की लॉबिंग शुरू कर दी थी। सीआईए के चीफ स्टीवन लाई 1953 में भारत आए। तो अब्दुल्ला की लॉबिंग की भनक पंडित नेहरू को भी लगी। आईबी में तबके आईजी बीएन मलिक ने अपनी पुस्तक- माई डेज विद नेहरू में इसकी पुष्टि की। पर नेहरू नहीं माने, तो मामला रफी अहमद किदवई के पास गया। तो शेख गिरफ्तार हुए। बख्शी गुलाम मोहम्मद को जम्मू-कश्मीर का पीएम बनाया गया। शेख पर कश्मीर षडयंत्र का मुकदमा चला। पर 1963 में नेहरू-शेख पैक्ट के बाद केस वापस हुआ। फिर उमर के वालिद फारुख की कहानी कोई अधिक पुरानी नहीं। भावनाओं का आवेग पैदा करने में तो फारुख अपने बाप-बेटे से भी आगे रहे। जब मामला हाथ से निकल जाता, तो रोकर सहानुभूति बटोरने में फारुख का कोई जवाब नहीं। वाजपेयी राज में फारुख एनडीए का हिस्सा थे। नेशनल कांफ्रेंस ने 1996 के विधानसभा चुनाव में स्वायत्तता को मुख्य चुनावी मुद्दा बनाया था। सो जून 2000 में उन ने विधानसभा से प्रस्ताव पारित कर केंद्र को भेज दिया। पर चार जुलाई 2000 को वाजपेयी केबिनेट ने प्रस्ताव नामंजूर करते हुए दलील दी- ऐसा करना देश को पीछे की ओर लौटाना होगा और यह देश की एकता के हित में नहीं। अब उमर अब्दुल्ला की कहानी देखिए। जनवरी 2009 में अपने वालिद को किनारे कर सीएम हो गए। राहुल गांधी से दोस्ती ने खूब रंग दिखाया। तो आस बंधी, युवा सीएम कश्मीर के लिए सचमुच कुछ कर दिखाएगा। पर उमर सच मायने में राजनीति के अनाड़ी निकले। अगर 11 जून को पहली मौत के वक्त ही उमर ने राजनीतिक चतुराई दिखाई होती, तो घाटी के हालात इस कदर नहीं बिगड़ते। पर तब उमर छुट्टी मना रहे थे, जिसे कैंसल नहीं किया। बाद में भी कभी मौके पर पहुंच अवाम को ढांढस बंधाने की कोशिश नहीं की। यों हालात बेकाबू हो गए, तो दो महीने बाद मौके पर पहुंचे। पर तब तक पानी सिर से ऊपर निकल चुका था। फिर सर्वदलीय टीम का घाटी में दौरा, राजनीतिक पैकेज की मांग। केंद्र की सलाह पर स्कूल-कालेज का खुलना, बंदियों की रिहाई। सो ऐसा लगा, उमर केंद्र सरकार की कठपुतली बनकर काम कर रहे। यानी जब उमर चौतरफा घिर गए। तो आखिर में अलगाववादियों पर ठोस कार्रवाई करने की बजाए अलगाववाद की जुबां बोल भरोसा जीतने की आखिरी कोशिश भी कर डाली। बोले- हम केंद्र सरकार की कठपुतलियां नहीं। कोई रिमोट कंट्रोल नहीं, हम अपने लोगों और उनके फायदे के लिए फैसले लेते हैं। भारत को कश्मीर का ऐसा हल ढूंढना चाहिए, जो पाक को भी पसंद हो। पर कोई पूछे, क्या सीएम उमर के पास कोई ऐसा हल है? या फिर कुर्सी बचाने को कोई भी बयान चलेगा? उमर के बयान का मतलब तो यही- न नौ मन तेल होगा, न राधा नाचेगी। कश्मीर पर ऐसा हल निकल ही नहीं सकता, जो भारत-पाक को दिल से कबूल हो। हू-ब-हू यही मांग अलगाववादी भी करते आ रहे। सो गुरुवार को जम्मू-कश्मीर विधानसभा में जमकर हंगामा हुआ। बीजेपी-पैंथर्स पार्टी के एमएलए मार्शल से भिड़ गए। मार-पीट में विधायक और मार्शल दोनों घायल हो गए। बीजेपी उमर अब्दुल्ला के इस्तीफे की मांग कर रही। गर उमर भावना की राजनीति पर उतर आए। तो मारपीट पर उतर बीजेपी भी वही कर रही। सबको अपने वोट बैंक की फिक्र। पर उमर हों या बीजेपी, यह भूल गए, भावना की राजनीति टिकाऊ नहीं होती। पीडीपी ने श्राइन बोर्ड विवाद में बहुत कुछ किया। पर सत्ता से बेदखल हुई। यानी कश्मीर की आग यों ही जलती-बुझती रहेगी। कोई भी नेतृत्व ईमानदार नहीं। सो कश्मीर कथा यों ही चलती रहेगी।
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07/10/2010

Wednesday, October 6, 2010

राजनीतिक चक्की के आटे में सौहार्द-शिष्टाचार क्यों नहीं?

कर्नाटक में बीजेपी का नाटक फिर शुरू हो गया। दक्षिण भारत में पहली बार किला फतह किया। पर कुनबे में ऐसी कलह मची, दो साल में ही किले की चारदीवारी दरकने लगी। अब बीजेपी के डेढ़ दर्जन एमएलए बगावत पर उतर आए। गवर्नर को चिट्ठी लिख समर्थन वापसी का एलान किया। तो येदुरप्पा ने भी चार असंतुष्ट मंत्रियों को फौरन केबिनेट से बर्खास्त कर दिया। बाकी एमएलए को अनुशासनात्मक कार्रवाई की चेतावनी दी। कर्नाटक की खींचतान कई दफा दिल्ली दरबार तक पहुंच चुकी। यानी कर्नाटक में बीजेपी की सरकार जनता नहीं, अपनों के संकट सुलझाने में ही उलझी हुई। सो विपक्ष भी भला मौका क्यों गंवाता। देवगौड़ा-कांग्रेस ने मोर्चा खोला। तो मौजूदा गवर्नर हंसराज भारद्वाज अति सक्रिय हो गए। अबके उन ने विधानसभा का सत्र चालू होने के बावजूद सीएम को बहुमत साबित करने के लिए बारह अक्टूबर तक का समय दे दिया। बीजेपी के नाराज 15 एमएलए और पांच समर्थक निर्दलीय एमएलए ने गवर्नर को चिट्ठी लिखकर समर्थन वापसी का एलान कर दिया। सो कानून की बारीकी से वाकिफ हंसराज भारद्वाज ने कानून को किनारे रख राजनीतिक एजंडा चल दिया। यों हंसराज भारद्वाज कोई पहली बार इतने सक्रिय नहीं। इससे पहले अवैध खनन के मामले में राष्ट्रपति से लेकर पीएम तक अपनी रपट बिन मांगे भेज चुके। मर्यादा लांघ सीएम को बेमतलब नसीहत तक दे चुके। जब गवर्नर ने यहां तक कह दिया था, अगर वह सीएम होते, तो रेड्डी बंधुओं को केबिनेट से फौरन बाहर करते। अब कोई गवर्नर ऐसी भाषा का इस्तेमाल करे। तो उसे संविधान का पहरुआ कहा जाए या किसी पार्टी का, यह आप ही तय करिए। पर बात भाषाई मर्यादा की। तो राजनीति में ऐसी उम्मीद ही बेमानी। अब ताजा किस्सा देखो, अयोध्या फैसले के बाद कैसे हिंदू-मुसलमानों ने कौमी एकता की मिसाल पेश की। राजनीतिबाजों के झांसे का शिकार नहीं बने। तो अब नेताओं के पेट में मरोड़े उठ रहे। सो पहले मुलायम सिंह यादव ने उकसावे की कोशिश की। संघ-विहिप-बीजेपी ने अयोध्या फैसले को अपनी जीत के तौर पर पेश करना शुरू कर दिया। तो कांग्रेस भी मुस्लिम हितैशी होने का ढिंढोरा पीटने लगी। पर राजनीतिबाजों को सामाजिक सौहार्द शायद रास नहीं आ रहा। सो लगातार कोशिश हो रही, कोई एक पक्ष उकसावे में आकर ऐसा बयान दे दे, जिससे अयोध्या पर बंद हुई राजनीति की दुकान फैस्टीवल सीजन में चल पड़े। सो अब खुद राहुल गांधी ने नया सुर्रा छोड़ दिया। प्रतिबंधित आतंकी संगठन सिमी और आरएसएस को एक ही तराजू में तोल दिया। दो दिन पहले मध्य प्रदेश के टीकमगढ़ में राहुल ने कांग्रेस में आने वाले लोगों से बेहिचक कह दिया था। आरएसएस और सिमी की विचारधारा छोडक़र आने वालों को ही कांग्रेस में जगह मिलेगी। बुधवार को भोपाल में जब राहुल के बयान का मतलब पूछा गया। तो राहुल ने कह दिया- आरएसएस और सिमी दोनों ही कट्टरवादी संगठन। वैचारिक कट्टरता की दृष्टि से इनमें कोई फर्क नहीं। यानी राहुल बाबा की नजर में जैसा सिमी, वैसा ही आरएसएस। पर सवाल, अगर आरएसएस को सिमी जैसा मान रहे राहुल। तो मनमोहन-चिदंबरम से कहकर बैन क्यों नहीं लगवाते? सिमी पर बैन यूपीए के पिछले टर्म में ही बढ़ाया गया। अब अचानक ऐसा क्या हो गया, जो राहुल ने संघ को सिमी के बराबर खड़ा कर दिया? अयोध्या फैसले के बाद संघ ने जो संयमित रुख अपनाया, खुद कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह कायल हो गए। फिर राहुल के बयान का क्या मकसद? क्या यह जानबूझ कर उकसाने की कोशिश नहीं? सो राहुल के बयान पर बीजेपी ने पलटवार किया। प्रकाश जावडेकर बोले- मानसिक संतुलन खो चुके हैं राहुल। कांग्रेस लोकसभा चुनाव के बाद के उपचुनावों में लगातार हार रही। सो हताशा में राहुल अंट-शंट बयान दे रहे। बीजेपी ने राहुल को अपरिपक्व और उद्दंड तक करार दे दिया। पर सिर्फ बीजेपी नहीं, जिस संघ को राहुल ने सिमी जैसा बताया। उसके प्रवक्ता राम माधव ने भाषाई मर्यादा को लांघ पलटवार किया। राम माधव बोले- राहुल को राजनीति की लंबी पारी खेलनी। सो सिर्फ इटली-कोलंबिया को समझने से काम नहीं चलेगा। भारतीय समाज को भी समझना पड़ेगा। बयानबाजी से पहले इतिहास पढ़ लेना चाहिए और समाज में रचे-बसे संघ और उसके क्रियाकलापों को भी समझ लेना चाहिए। पर बीजेपी-संघ ने कड़ा जवाब दिया। तो कांग्रेस तिलमिला गई। राहुल को नसीहत देने की हिम्मत किसी कांग्रेसी में नहीं। सो किसी का नाम लिए बिना जनार्दन द्विवेदी बोले- किसी व्यक्ति के बारे में टिप्पणी नहीं, पर सभी राजनीतिक संगठनों को अपने विरोधियों के प्रति भाषा में सभ्यता का ख्याल रखना चाहिए। पर अपने राजनीतिबाजों को आखिर क्या हो गया? क्या राजनीतिक चक्की के आटे में सद्भावना, शिष्टाचार या मर्यादा नहीं पाई जाती? किसी को आरएसएस-सिमी में फर्क नजर नहीं आता। तो मुलायम को अपना वोट बैंक दिख रहा। विहिप को मंदिर के लिए पूरी पंचकोसी चाहिए। तो अयोध्या मामले को निजी विवाद बता कपिल सिब्बल सरकार को बीच में न पडऩे की सलाह दे रहे। पर कोई पूछे, गर अयोध्या विवाद निजी, तो क्या शाहबानो प्रकरण सरकारी था? जिसके लिए संसद ने कानून बना सुप्रीम कोर्ट का फैसला पलट दिया। क्या यही राजनीति की मर्यादा?
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06/10/2010

Tuesday, October 5, 2010

अपनी ही केंचुली में अब छटपटा रही कांग्रेस

जाकी रही भावना जैसी, प्रभु मूरत देखी तिन्ह तैसी। अयोध्या का फैसला वैसा ही आया, जैसा जनता चाहती थी। पर राजनीतिक मठाधीशों ने वोटों का सुरमा आंखों में लगा लिया। सो करीब-करीब सुलझ चुके मंदिर-मस्जिद विवाद को विक्रम-बेताल की कहानी बनाने में जुट गए। मंगलवार को विशेष सुरमा लगा कांग्रेस भी मैदान में उतर आई। सोनिया गांधी की नई टीम अभी बनी नहीं। सो पुरानी वर्किंग कमेटी को स्टेयरिंग कमेटी में बदल मीटिंग बुला ली। अयोध्या पर इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले की चीर-फाड़ हुई। तो कांग्रेस सचमुच झोला छाप डाक्टर नजर आई। सत्तारूढ़ पार्टी से ईमानदार पहल की उम्मीद थी। पर कांग्रेस ने बयान जारी कर कह दिया- सुलहनामे की पहल हम नहीं करेंगे। अगर सभी पक्ष खुद से कोई समझौता करें, तो स्वागत करेंगे। पर हम सबको सुप्रीम कोर्ट के अंतिम फैसले की प्रतीक्षा करनी चाहिए। यानी फिर वही बात। सुप्रीम कोर्ट में कोई गया नहीं। पर कांग्रेस अपील करने का दबाव बना रही। सो महीने भर के भीतर सुप्रीम कोर्ट में अपील का वक्फ बोर्ड ने एलान कर दिया। पर कांग्रेस वर्किंग कमेटी के बयान में बेहद मजबूती के साथ यह जोड़ा गया- मौजूदा फैसला किसी भी तरह छह दिसंबर 1992 के दिन बाबरी मस्जिद गिराने के कृत्य को माफ नहीं करता। वह शर्मनाक और आपराधिक कृत्य था। जिसके लिए दोषियों को सजा भुगतनी होगी। लगे हाथ कांग्रेस ने बीजेपी-संघ परिवार पर भी निशाना साध दिया। अब तक संघ के संयत रुख की मुफीद कांग्रेस अब फैसले को तोड़-मरोड़ कर पेश करने का आरोप लगा रही। यानी कुल मिलाकर कांग्रेस ने मुलायम सिंह से सबक नहीं लिया। अब कांग्रेस का दोहरापन देखिए, मुलायम को कोस भी रही। पर खुद भी वही खेल कर रही। तभी तो कांग्रेस वर्किंग कमेटी में अयोध्या फैसले की बेचैनी दिखी। एक खेमे ने फैसले को आस्था आधारित बताया। तो दूसरे ने सामाजिक सौहार्द के लिए जायज ठहराया। पर कांग्रेस की सबसे बड़ी बेचैनी एक समुदाय विशेष में फैसले से पैदा हुई निराशा की वजह से। कांग्रेस को यही लग रहा, बाबरी विध्वंस के वक्त मुसलमानों का खोया भरोसा लंबे समय बाद कांग्रेस की ओर लौट रहा। सो ताजा फैसला कहीं कांग्रेस को 1996 की तरह भारी न पड़ जाए। तब कांग्रेस सत्ता से ऐसी विमुख हुई, आठ साल तक विपक्ष में बैठना पड़ा। यूपी में तो शरशैय्या तक पहुंच गई थी। पर पिछले चुनाव में कांग्रेस केंद्र ही नहीं, यूपी में भी दौडऩे लगी। सो अयोध्या फैसले से धर्मसंकट में। किधर का रुख करें, यह कांग्रेसियों को समझ नहीं आ रहा। अगर मौजूदा फैसले पर अधिक जोर दे समझौते की कोशिश की। तो मुस्लिम वोट बैंक खिसकने का डर सता रहा। पर फैसले को जल्द लागू नहीं कराया, तो विहिप-संघ-बीजेपी के आंदोलन का डर। सो कांग्रेस ने सुप्रीम कोर्ट से आस बांध ली। भले कोई सुप्रीम कोर्ट नहीं गया। पर कल्पना कर ली, कोई न कोई सुप्रीम कोर्ट जाएगा ही। कांग्रेस को उम्मीद, जैसे ही मामला सुप्रीम कोर्ट जाएगा। अंतरिम आदेश जारी कर हाईकोर्ट के फैसले पर सुप्रीम कोर्ट रोक लगाएगी। फिर मुकदमा और वोट बैंक की सियासत चलती रहेंगी। मंदिर के पैरोकार भी समझौते को लेकर दो हिस्सों में बंटे हुए। हिंदू महासभा सुलहनामे के खिलाफ। तो बाकी मुसलमानों को विवादित स्थल से दूर मस्जिद बनाने के लिए राजी करने में जुटे। खुद मंदिर के पक्षकार भी आपस में बंटे हुए। यानी राजनीतिक बेचैनी दोनों तरफ। सो ज्योतिपीठाधीश्वर बद्रिकाश्रम के जगतगुरु शंकराचार्य माधवाश्रम महाराज ने सोलह आने सही कहा। अगर राजनेता दखल न दें, तो अयोध्या का विवाद सुलझ जाएगा। उन ने फैसले को जायज ठहराया, सुलह की उम्मीद जताई। सचमुच मामला सुप्रीम कोर्ट गया, तो मौजूदा सामाजिक सौहार्द पर तनाव के काले बादल मंडराते रहेंगे। राजनीतिबाज कब भावना भडक़ा जाएं, कोई भरोसा नहीं। अब कांग्रेस का ही रुख देख लो। कैसे अब तक कोर्ट के हर फैसले का स्वागत करती आई। पर मंगलवार को कांग्रेस की सर्वोच्च नीति निर्धारक संस्था की अहम मीटिंग हुई। तो बयान में फैसले का स्वागत नहीं, अलबत्ता शब्दों को बदल सम्मान जोड़ दिया। सचमुच अयोध्या फैसले पर कांग्रेस मुश्किल में। सैक्युलरिज्म का चोला ओढ़ कांग्रेसी पीएम देश के संसाधनों पर मुसलमानों का पहला हक बता चुके। पर सुप्रीम कोर्ट की ओर निगाह टिकाए बैठी कांग्रेस तब क्या करेगी, जब सुप्रीम कोर्ट भी कुछ ऐसा ही फैसला दे? खुद कांग्रेस की केंद्र सरकार ने चौदह सितंबर 1994 को सुप्रीम कोर्ट में कहा था- अगर बातचीत से मसले का समाधान नहीं हुआ, तो केंद्र सरकार सुप्रीम कोर्ट की राय के मुताबिक समाधान लागू करने को प्रतिबद्ध है। अगर यह साबित होता है कि विवादित ढांचे से पूर्व वहां कोई मंदिर था, तो केंद्र का फैसला हिंदू भावना के मुताबिक होगा। और यह साबित नहीं होता है, तो सरकार का फैसला मुस्लिम भावना के अनुरूप होगा। सो मुश्किल में फंसी कांग्रेस अब एक पक्ष को नसीहत, तो दूसरे को दिलासा दे रही। संसद का शीत सत्र नौ नवंबर से शुरू हो रहा। सो कांग्रेस रंगनाथ मिश्र रपट पर बहस को हरी झंडी दिखा हंगामा करा सकती। ताकि खुद को मुस्लिम हितैशी होने का दावा कर सके। पर मुस्लिम समाज भी सियासतदानों की नीयत समझ चुका। सो हाशिम अंसारी जैसे प्रबुद्ध पक्षकार समझौते का बीड़ा उठा चुके। पर कथित सैक्युलरिज्म की केंचुली पहन बैठी कांग्रेस अब खुद ही छटपटा रही।
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05/10/2010

Monday, October 4, 2010

कहीं बीजेपी ‘अल्जाइमर’ की शिकार तो नहीं?

तो देश की जनता ने अपना दम दिखा दिया। राजनीतिबाजों की भडक़ाऊ दाल नहीं गली। अलबत्ता रोटी सेकने वाले मुलायमों को ही फटकार लगा दी। सो अब केंद्र सरकार ने मान लिया, कठिन दौर गुजर गया। एहतियात के तौर पर तैनात सुरक्षा बलों की वापसी शुरू हो गई। केंद्र के लिए सचमुच सुकून का पल, अयोध्या पर अमन बना रहा। तो दूसरी तरफ कॉमनवेल्थ की सुहानी शुरुआत हो गई। दुनिया को भी अपने रंगारंग उदघाटन समारोह की दिल खोलकर तारीफ करनी पड़ी। पर देश के लिए गौरव का यह पल खासतौर से दिल्ली वालों के लिए गाज रहा। समूची दिल्ली मानो बाड़ में बंद कर दी गई हो। गर यह कॉमन लोगों का खेल, तो दिल्ली में अघोषित कफ्र्यू क्यों? आम लोगों को घरों में बंद कर पीठ थपथपाना कोई बहादुरी नहीं। पर उदघाटन समारोह की चमक-दमक में कहीं भ्रष्टाचार का असली मुद्दा दफन न हो जाए। और गेम्स के बाद आयोजक वाहवाही लूट लें। ऐसी चालबाजी को ही तो जुगाड़ की राजनीति कहते हैं। पर अयोध्या और गेम्स के बाद अब नेता सीधे चुनावी समर में कूदेंगे। बिहार विधानसभा चुनाव की रणभेरी बज चुकी। पर चुनाव में धन बल, बाहुबल और ई.वी.एम. को लेकर चुनाव आयोग ने दिल्ली में सर्वदलीय मीटिंग की। तो सबने धनबल, बाहुबल और पेड न्यूज को लेकर चिंता जताई। पर सबसे अहम बात यह कि ई.वी.एम. को लेकर बीजेपी ने भी एतराज नहीं किया। अलबत्ता बीजेपी अब यह कह रही, कभी ई.वी.एम. का विरोध नहीं किया। बीजेपी के रविशंकर प्रसाद बोले- भाजपा ने कभी ईवीएम का विरोध नहीं किया। राव ने ईवीएम के दुरुपयोग पर सवाल खड़े किए थे। जो बीजेपी के मेंबर नहीं, बल्कि सैफोलॉजिस्ट हैं। अब कोई पूछे, तीस साल की जवान पार्टी को छह-आठ महीने पुरानी बात भी याद क्यों नहीं रहती? कहीं बीजेपी शिबू सोरेन के अल्जाइमर वाले रोग की शिकार तो नहीं हो गई? हो न हो संगत का कुछ तो असर होगा ही। तभी तो रविशंकर प्रसाद जीवीएल नरसिम्हा राव को अपना नहीं मान रहे। और न ही आडवाणी सरीखे नेताओं के बयान और ब्लॉग याद आ रहे। सनद रहे, सो याद दिलाते जाएं। जब लोकसभा चुनाव में बीजेपी के वेटिंग पीएम का टिकट कनफर्म नहीं हुआ। तो बीजेपी आपस में ही सिर-फुटव्वल करने लगी। किसी को हार की वजह समझ नहीं आ रही थी। तभी दिल्ली के पूर्व चीफ सैक्रेट्री ओमेश सहगल ने एक सुर्रा छोड़ दिया। ईवीएम की विश्वसनीयता पर सवाल उठाए। मशीन से टेंपरिंग को संभव बताया। तो अपने लालकृष्ण आडवाणी को यही लगा, तमाम विरोधाभासी मुद्दों के बावजूद मनमोहन को जनता ने नहीं जिताया होगा। सो उन ने फौरन सवाल उठाए। चार जुलाई 2009 को आडवाणी ने कहा था- अगर चुनाव आयोग ईवीएम का फूल प्रूफ होना सुनिश्चित नहीं करता, तो बैलेट पेपर प्रणाली शुरू की जानी चाहिए। उन ने अक्टूबर 2009 में होने वाले महाराष्ट्र चुनाव में बैलेट की मांग की थी। जर्मनी और अमेरिका की नजरी भी दी। तब यहीं पर हमने भी लिखा था- अगर विपक्ष को एतराज है, तो आयोग परीक्षण होने दे। फिर आयोग ने सचमुच तीन दिन की खुली चुनौती दी। पर न सुर्रा छेडऩे वाले सहगल और न ही कोई और ईवीएम को झुठलाने चुनाव आयोग पहुंचे। फिर इसी साल 25 जनवरी को जब चुनाव आयोग ने अपने साठ साल पूरे होने पर हीरक जयंती मनाई। तो आडवाणी ने फौरन ब्लॉग लिख मारा। फिर भी कोई बहस शुरू नहीं हुई। तो तब बीजेपी वर्किंग कमेटी के मेंबर जीवीएल नरसिम्हा राव ने किताब लिखी। किताब का नाम रखा- ‘डैमोक्रेसी एट रिस्क!’। जिसकी प्रस्तावना खुद आडवाणी ने लिखी। बारह फरवरी 2010 को नितिन गडकरी ने लोकार्पण किया था। तब मौके पर तीन-तीन विदेशी एक्सपर्ट ईवीएम झुठलाने को बुलाए थे। जर्मनी, नीदरलैंड और यूएसए के एक्सपर्टों का लब्बोलुवाब यही रहा। ईवीएम के साथ पेपर बैकअप भी हो। पर बीजेपी की असली पोल तो समारोह के अहम गैस्ट पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त जीवीजी कृष्णमूर्ति ने खोलकर रख दी थी। जब वह बीजेपी को ही सुझाव दे गए। उन ने जो कहा, उसका लब्बोलुवाब था- ‘ईवीएम की क्वालिटी इंप्रूव होनी चाहिए। पर यह आरोप लगाना सही नहीं होगा कि कांग्रेस शासित राज्यों में ही ईवीएम का दुरुपयोग हो रहा। बीजेपी शासित राज्यों में भी दुरुपयोग संभव। सो बेहतर यही होगा, आरोप-प्रत्यारोप के बजाए ईवीएम की क्वालिटी इंप्रूव करने के लिए सभी पार्टियों की कमेटी बने और फिर व्यापक चर्चा हो।’ लगता है देर से ही सही, कृष्णमूर्ति की बात बीजेपी के पल्ले पड़ गई। अगर बीजेपी हार वाली जगहों पर ईवीएम के दुरुपयोग की बात करे। तो दूसरा पक्ष भी बीजेपी शासित राज्यों में जीत पर यही सवाल उठा सकता। सो बीजेपी अब सैफोलॉजिस्ट जीवीएल नरसिम्हा राव से दूरी दिखा रही। उन्हीं राव से जिन्हें लोकसभा चुनाव से ठीक पहले हुए नागपुर अधिवेशन में बीजेपी वर्किंग कमेटी का मेंबर बनाया गया था। बीजेपी में आने से पहले तक राव के सर्वेक्षण सटीक होते थे। पर पार्टी में आते ही दशा-दिशा बिगड़ गई। सो उन ने भी सारा दोष ईवीएम के सिर ही फोड़ दिया। ऐसी किताब लिखी, जिसमें लोकतंत्र को जोखिम में बता दिया। पर जनता का खोया भरोसा हासिल करने को कोई प्रयास नहीं। अब बीजेपी खुद ही बताए, हारे तो ईवीएम को दोष दिया। अब बिहार चुनाव में बयार खुद के पक्ष में दिख रही। तो अपने रुख को ही क्यों झुठला रही। याददाश्त अब गोल क्यों हो गई? छह महीने पहले मुखालफत, छह महीने बाद भूलना, क्या सचमुच कोई बीमारी?
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04/10/2010

Friday, October 1, 2010

देश तो संतुष्ट, पर वोट के ‘सौदागर’ नहीं!

तो आस्था बनाम तथ्य की बहस शुरू हो गई। फैसले को अहम मोड़ देने वाली भारतीय पुरातत्व विभाग की रपट पर सवाल उठने लगे। लेेफ्ट विंग इतिहासकारों ने एएसआई के निष्कर्ष को गलत ठहराने की कोशिश की। सहमत नामक संस्था से जुड़े इन इतिहासकारों ने बयान जारी कर अपनी चिंता जताई। आस्था के आधार पर रामलला को जमीन दिए जाने को कानून के खिलाफ बताया। यों साहित्य जगत ने फैसले की सराहना की। साहित्यकारों ने फैसले को संतुलित करार देते हुए माना, किसी के साथ अन्याय नहीं हुआ। पर कुछ लोग ऐसे भी, जिन्हें अयोध्या की आग में घी डालने से परहेज नहीं। सो फैसले के अगले दिन ही जैसी बयानबाजी हुई, सुप्रीम कोर्ट जाना तय हो गया। अब देखो, कैसे कल तक अदालती फैसले का सम्मान और शांति की अपील करने वाले रंग बदलने लगे। जामा मस्जिद के शाही इमाम ने फैसला नामंजूर बता दिया। अब्दुल्ला बुखारी ने सीधे-सीधे कांग्रेस को कटघरे में खड़ा किया। तो हाल तक कल्याण सिंह संग बाबा बने मुलायम शुक्रवार को फिर मौलाना मुलायम हो गए। कोर्ट के फैसले को निराशाजनक करार दिया। बोले- आस्था को कानून व सबूतों से ऊपर रखकर फैसला दिया गया। जो देश, संविधान और खुद न्यायपालिका के लिए अच्छा संकेत नहीं। इस फैसले से कई संकट पैदा होंगे। और तो और, इस फैसले से देश का मुसलमान ठगा सा है, पूरे समुदाय में मायूसी। मुलायम फैसले का विरोध करते वक्त यह भी याद दिलाना नहीं भूले, इमारत बचाने के लिए बतौर सीएम उन ने ही कारसेवकों पर गोली चलवाई। अपनी तुलना महाभारत के अर्जुन से करते हुए बोले- संविधान और कानून की रक्षा के लिए अपने ही लोगों पर गोलियां चलवानी पड़ी थीं। पर वोट बैंक को साधने की कोशिश में जुटे मुलायम इतिहास भूल गए। देश की जनता अब अमन-भाईचारे में भरोसा करती। सर्वजन हिताय की बात करने वाला ही आज समाज को मंजूर। मुलायम ने 1991 में जब सिर्फ एक खास वोट बैंक को साधने के लिए गोलियां चलवाईं। तो चुनाव में हश्र भी दिख गया था। सपा महज 29 सीटों पर सिमट कर रह गई थी। तब मुलायम मुस्लिम समाज के हीरो थे। तो कट्टर हिंदुओं की नजर में मौलाना मुलायम हो गए थे। सो फैसले के बाद भी जिस तरह माहौल बन रहा, केंद्र ने चुप्पी साध ली। शुक्रवार को होम मिनिस्टर पी. चिदंबरम ने हाईकोर्ट के फैसले पर टिप्पणी से परहेज किया। पर फैसले के बाद जनता की संयत प्रतिक्रिया को संतोषजनक बताया। कांग्रेस के लिए सचमुच सब्र के इम्तिहान की घड़ी। सो कांग्रेस और सरकार का हर बयान एहतियात की चासनी में सराबोर। कल तक बीजेपी-वीएचपी-संघ परिवार पर भरोसा न करने की बात करने वाले दिग्विजय सिंह का सुर फैसले के बाद बदल गया। उन ने अपनी मौत तक संघ परिवारियों पर भरोसा न करने का दावा किया था। पर शुक्रवार को बोले- संघ प्रमुख मोहन भागवत का बयान आडवाणी से बेहतर और संतुलित। मुझे उनसे यही उम्मीद थी। यों दिग्विजय ने एक अहम बात कही। निर्णय के बाद आपसी सहमति से हल का रास्ता खुला है। पर चिदंबरम ने हल के लिए कोई पहल करने का संकेत नहीं दिया। अलबत्ता पीएम की भावना का जिक्र करते हुए चिदंबरम ने साफ कर दिया, जब तक सुप्रीम कोर्ट का फैसला नहीं आ जाता, यथास्थिति बरकरार रहेगी। यानी सरकार मौजूदा फैसले के मद्देनजर कोई भी कदम उठाने से परहेज कर रही। शाही इमाम, मुलायम, सुन्नी वक्फ बोर्ड फैसले पर आपत्ति जाहिर कर चुके। सो कांग्रेस बर्र के छत्ते में हाथ लगाने से डर रही। यों शाही इमाम बुखारी ने तो खुल्लमखुल्ला कह दिया। कांग्रेस के राज में ही सब कुछ हुआ। अयोध्या में पूजा शुरू हुई, ताले खुले और अब फैसला भी कांग्रेस राज में ही आया। यानी कांग्रेस के लिए सचमुच आगे कुआं, पीछे खाई वाली स्थिति हो गई। सो कांग्रेस और सरकार ने एक पक्ष को संयम, तो दूसरे को सुप्रीम कोर्ट जाने का मंत्र थमाया। चिदंबरम ने उम्मीद जताई, कोई पक्ष सुप्रीम कोर्ट जाएगा। तो सुप्रीम कोर्ट अंतरिम आदेश देगा। सो तब तक केंद्र की कोई जिम्मेदारी नहीं। यूपी की सीएम मायावती ने केंद्र पर दारोमदार छोड़ पल्ला झाडऩे की कोशिश की। सचमुच अपनी राजनीतिक नेतृत्व की विफलता, जो आज कोर्ट के फैसले पर सवाल उठ रहे। माना, कोर्ट का फैसला पूरी तरह कानून के तराजू पर नहीं। पर कोई बताए, इससे बेहतर क्या विकल्प? जस्टिस एसयू खान ने इशारों में ही कबूला, इसके सिवा कोई चारा नहीं था, क्योंकि 1992 दोहराया, तो देश खड़ा नहीं हो पाएगा। पर अपने राजनेताओं को भावनात्मक मुद्दों से खेलना ज्यादा मुफीद लगता। सो दशकों से उलझी मंदिर-मस्जिद की डोर सुलझ गई। तो अब तक मंदिर-मस्जिद की आड़ में राजनीति की रोटी सेकने वालों को अपनी दुकान बंद होती दिख रही। इन्हें लग रहा, जब लोग भाईचारे के साथ रहेंगे, तो इन तथाकथित ठेकेदारों को कौन पूछेगा? इस ठेकेदारी में बीजेपी भी कम नहीं। नितिन गडकरी ने कहा- अयोध्या पर अब न कोई रणनीति, न राजनीति। यानी फैसले से पहले तक खूब राजनीति कर चुके। बीजेपी फिलहाल संयम में। पर भविष्य में मंदिर का श्रेय लूटने की रणनीति बना रही। विहिप के फायर ब्रांड प्रवीण तोगडिय़ा तो मथुरा-काशी का राग छेड़ चुके। तो क्या आस्था के नाम पर मथुरा-काशी-रामसेतु के भी फैसले हों? बेहतर यही, विवाद यहीं खत्म हो जाए। देश की अवाम ने अयोध्या फैसले के बाद संयम और संतुष्टि का इजहार किया। पर लगता है, वोट के सौदागर अभी भी संतुष्ट नहीं। तो क्या खून से लथपथ और लाशों की राजनीति ही अपनी व्यवस्था का शगल हो गया?
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01/10/2010

Thursday, September 30, 2010

दिलों का फासला भी मिट जाए, अब हो ऐसी सुलह

'तुम्हारी भी जय-जय, हमारी भी जय-जय, न तुम हारे, न हम हारे।' गर सचमुच फैसले को दोनों पक्ष इसी नजरिए से देखें। तो अयोध्या पर अदालती फैसला न सिर्फ एतिहासिक, अलबत्ता राष्ट्रीय एकता की अनूठी मिसाल होगा। इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बैंच के तीनों जजों ने राम जन्मभूमि को कानूनी मान्यता दी। तो बाकी अन्य पक्षों को भी निराश नहीं किया। भले तीनों जजों की राय में फर्क हो। पर फैसला यही, विवादित जमीन तीन हिस्सों में बांटी जाए। रामलला विराजमान यानी मूर्ति वाली जगह का हक भगवान राम को। तो सीता रसोई और राम चबूतरा का हक निर्मोही अखाड़े को। चूंकि लंबे समय से मुस्लिम भी इबादत करते आ रहे। सो एक हिस्सा सुन्नी वक्फ बोर्ड को भी। यों शुक्रवार को रिटायर हो रहे बैंच के एक जज धर्मवीर शर्मा ने तो समूची जमीन भगवान राम की बताई। पर जस्टिस एस.यू. खान और सुधीर अग्रवाल ने तीन हिस्से में बांटने का फैसला दिया। भारतीय पुरातत्व विभाग की रपट से माना गया, मस्जिद किसी इमारत को तोडक़र बनाई गई थी। सो इस्लामिक मान्यता के तहत ऐसी जमीन पर मस्जिद को मान्यता नहीं दी गई। पर दस हजार पन्नों के फैसले में कोर्ट का लब्बोलुवाब यही, रामलला की पूजा अनंतकाल से होती आ रही। सो मंदिर भी बने। निर्मोही अखाड़े को सीता रसोई और राम चबूतरा का कब्जा बरकरार रखा। तो लंबे समय से मुस्लिमों की इबादत को मान वक्फ बोर्ड को भी जमीन में हिस्सा दिया गया। यानी कानून से परे हट अदालत ने शायद पहली मर्तबा आस्था को महत्व दिया। जिस पक्ष का जैसा था, उसको करीब-करीब वैसा ही मिल गया। सचमुच इतने उलझे हुए केस का इससे सुलझा हुआ हल नहीं हो सकता। सो सभी पक्षों को अब लचीला रुख अपनाना चाहिए। अदालती फैसले को आधार बना नए सिरे से बातचीत हो। तो सिर्फ विवादित जमीन ही नहीं, समूची 70 एकड़ जमीन का फैसला हो जाए। सो अब केंद्र सरकार की भूमिका भी अहम, जिसने 1993 में 67 एकड़ जमीन अधिग्रहित कर ली थी। हाईकोर्ट ने तो रामलला और निर्मोही अखाड़े की जमीन तय कर दी। पर मुस्लिमों की इबादत की जगह तय नहीं की। अलबत्ता तीनों के लिए बराबर व्यवस्था करने का जिम्मा सरकार पर छोड़ दिया। अगर केंद्र चाहे, तो अब दोनों पक्षों में समझौता कराने की पहल कर सकता। भले दोनों पक्ष फैसले से पूरी तरह संतुष्ट नहीं। पर पूरी तरह असंतुष्ट भी नहीं। सो सरकार ईमानदार और प्रभावी पहल करे, तो विवाद हाईकोर्ट के फैसले से ही खत्म हो सकता। यों फैसले के बाद सुन्नी वक्फ बोर्ड के वकील जफरयाब जिलानी ने सुप्रीम कोर्ट जाने का एलान कर दिया। तो मंदिर के पैरोकारों में भी कुछ ऐसे कट्टरपंथी, जो मस्जिद के लिए एक तिहाई जमीन के फैसले को चुनौती देने के मूड में। यों फैसले के फौरन बाद संघ-बीजेपी ने इस पर चुप्पी साध ली। सर संघचालक मोहन भागवत ने यह फैसला संत उच्चाधिकार समिति पर छोड़ दिया। पर भागवत-आडवाणी दोनों अपनी खुशी का इजहार चतुराई से कर गए। कहा- हिंदुओं का हक साबित हो गया। सो अब गर्भगृह पर भव्य राम मंदिर बने। हाईकोर्ट का फैसला राष्ट्रीय एकता का नया अध्याय और सांप्रदायिक सौहार्द का नया युग। मोहन भागवत ने फैसले पर खुशी को स्वाभाविक बताया। पर संयम की अपील करते हुए कहा- कोई ऐसा कुछ न करे, जो दूसरे की भावना को ठेस पहुंचाए। संघ परिवार ने मुस्लिम समाज से भूली ताहि बिसारने की अपील करते हुए मंदिर निर्माण में जुटने का न्योता भी दिया। पर संघ की ओर से जारी बयान में मंदिर आंदोलन में मारे गए लोगों की कुर्बानी का भी जिक्र कर गए। यों देश की जनता की परिपक्वता को अपना भी सलाम, जिसने फैसले को न्याय के तौर पर कबूला। फिर भी राजनीति नहीं होगी, ऐसा कहना बेमानी। मायावती ने तो फैसले के फौरन बाद पीएम की चिट्ठी लिख दी। केंद्र की ओर से 67 एकड़ जमीन अधिग्रहण का इतिहास याद कराते हुए माया ने फैसले के मुताबिक यथोचित कार्रवाई करने की मांग की। उन ने बार-बार दोहराया, इस विवाद में जो भी करना है, वह केंद्र ही करेगा। यानी माया ने एक पक्ष की थोड़ी निराशा को देख अपना पल्ला फौरन झाड़ लिया। ताकि कहीं कुछ गड़बड़ हो, तो ठीकरा केंद्र के ही सिर फूटे। पर कांग्रेस कोई बीजेपी-बीएसपी की तरह गबरू जवान पार्टी नहीं। अलबत्ता सवा सौ साल पुरानी तजुर्बेकार पार्टी। सो मामले की संवेदनशीलता देख हर बार की तरह इस बार भी फैसले का स्वागत किया। कांग्रेस के जनार्दन द्विवेदी आध्यात्मिक गुरु बन गए। रामचरित मानस की चौपाई का जिक्र किया- प्रसन्नतां या न गताभिषेकतस्था, न मम्ले वनवास दु:खत:। मुखाम्बुजश्री रघुनंदनस्य मे, सदास्तु सा मञ्जुलमंगलप्रदा।। अर्थात भगवान राम का राज्याभिषेक हुआ या वनवास हुआ। पर चेहरे पर कभी खुशी या दुख नहीं। अलबत्ता स्थिरप्रज्ञ की तरह रहे। यानी राम को शरणागत होकर कांग्रेस ने संयम की अपील की। सचमुच देश के लिए इम्तिहान का दौर। सुबह से ही फैसले के प्रति देश की निगाहें टिकी हुई थीं। हर तरफ बापू के भजन, ईश्वर-अल्लाह.... सन्मति दे भगवान की धुन बजती रही। फैसले के बाद मीटिंगों, बयानबाजियों का दौर चला। पीएम ने भी देश की जनता पर भरोसा जताया। देश की जनता ने भी परिपक्वता दिखा राजनीति की रोटी सेकने वालों को बतला दिया, 1992 का दौर अब खत्म हो चुका। यानी अयोध्या पर फैसला भी आ गया, दोनों समुदायों के बीच फासला भी नहीं बढ़ा। सो अब अपील, जो भी फासला बचा, सुलह के प्रयासों से ही मिट जाए। और किसी को सुप्रीम कोर्ट जाने की जरूरत न पड़े।
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30/09/2010