Thursday, October 14, 2010

‘मैडल’ के लिए अब आयोजकों में भिड़ंत

कर्नाटक में गवर्नर ‘हंस’राज ‘मोती’ चुगकर भी चूक गए। बुनकेरे सिद्धलिंगप्पा येदुरप्पा ने आखिर बहुमत सिद्ध कर ही दिया। कांग्रेस-जेडीएस ने विधानसभा में विश्वास मत टलवाने की खूब कोशिश की। हाईकोर्ट के फैसले तक फैसला न सुनाने की स्पीकर से गुहार लगाई। पर स्पीकर ने सदन का फैसला सुना दिया। तो येदुरप्पा के पक्ष में 106 वोट पड़े, विपक्ष सौ वोट पर ही सिमट गया। अब सबकी निगाह सोमवार के हाईकोर्ट के फैसले पर। अगर हाईकोर्ट ने पांच निर्दलीय एमएलए को वोटिंग की अनुमति दे दी। तो भी बीजेपी बहुमत का दावा कर रही। पर कांग्रेस-जेडीएस की हालत अब खिसियानी बिल्ली जैसी। कानून मंत्री वीरप्पा मोइली और कुमारस्वामी के बयान का एक ही मतलब, दस दिन इंतजार करिए, सरकार गिर जाएगी। यानी चुनी हुई सरकार को कांग्रेस-जेडीएस चलने नहीं देना चाह रहीं। सो कर्नाटक में खरीद-फरोख्त का बाजार अपने उफान पर। अब गवर्नर हंसराज की भूमिका पर बीजेपी ही नहीं, जेडीएस भी सवाल उठा रही। बीजेपी विश्वास मत जीत गई, तो अब कुमारस्वामी ने गवर्नर पर किसी अज्ञात के इशारे पर काम करने का आरोप लगाया। हारे हुए विपक्ष की कसक यही, गवर्नर ने दुबारा मौका क्यों दिया। पर क्या बहुमत की सरकार को बर्खास्त करना लोकतांत्रिक कदम होता? सचमुच अपने देश में नेताओं को लोकतंत्र की फिक्र ही कहां। कर्नाटक हो या कॉमनवेल्थ, लोकतंत्र पर जेबतंत्र भारी। कर्नाटक और कॉमनवेल्थ के मुख्य आयोजन का परदा गुरुवार को गिर गया। पर सोमवार से फिर नई बहस छिड़ेगी। कॉमनवेल्थ गेम्स का धूमधड़ाके के साथ समापन हो गया। तो अब श्रेय लेने की गलाकाट होड़ मच गई। सफल आयोजन के लिए दिल्ली की सीएम शीला दीक्षित टीवी चैनलों पर खूब चेहरे चमका रहीं। पर याद करिए, गेम्स से ठीक पहले शीला कैसे मीडिया को काटने दौड़ती थीं। अब सबकुछ ढंग से निपट गया। कॉमनवेल्थ गेम्स फैडरेशन के मुखिया माइक फेनेल ने जमकर तारीफ कर दी। तो रणनीति बनाकर शीला मैदान में उतरीं। खेलगांव को संवारने का जिम्मा आखिरी वक्त में पीएम ने दिल्ली सरकार को सौंपा था। सो अब शीला सारा श्रेय अकेले बटोरने में ऐसे जुट गईं, मानो, बाकी प्रशासनिक अमला घास काट रहा था। सिर्फ शीला और शीला की टीम खेलगांव के हर कमरे में झाड़ू लगा रही थीं। सो दिल्ली के उपराज्यपाल तेजेंद्र खन्ना को शीला की रणनीति फौरन समझ आ गई। उन ने पीएम को चिट्ठी लिखकर शीला की शिकायत कर दी। चिट्ठी में शीला के बयानों पर एतराज जताया। तैयारी में जुटे बाकी लोगों को किनारे करने की साजिश पर नकेल कसने की अपील की। अभी तो सिर्फ शीला और तेजेंद्र खन्ना मैदान में आए। सुरेश कलमाड़ी, जयपाल रेड्डी, एमएस गिल और केबिनेट सेक्रेट्री केएम चंद्रशेखर का कूदना बाकी। यों खेल के बीच में ही कलमाड़ी कह चुके- अब तो ओलंपिक की मेजबानी का दावा करे भारत। पर तैयारियों की असली पोल तो धीरे-धीरे खुलेगी। कहां, कितना घपला हुआ, यह भी सामने आएगा, भले बड़ी मछलियों पर कार्रवाई न हो। पर अहम सवाल, कॉमनवेल्थ गेम्स से क्या सबक ले रहे नेता? कॉमनवेल्थ गेम्स में आखिरी दिन पीएम मनमोहन हाकी का फाइनल देखने गए। पर हाकी में भारत हार गया। यों पीएम की पत्नी गुरशरण कौर सायना नेहवाल का बैडमिंटन देखने गईं, तो गोल्ड मिला। भारत-पाक के हाकी मैच में सोनिया-राहुल गए थे, तो टीम जीती। अब जो भी हो, आखिर में भारत ने पदक तालिका में दूसरा स्थान हासिल कर लिया। कुल 101 मैडल भारत के खाते में आए। मैडल जीतने वालों में खास तौर से ऐसे खिलाड़ी और एथलीट, जिन्हें सरकारी सहूलियतें नाम मात्र की मिलीं। सचमुच सहूलियतें मिलें, तो अपना भारत मैडलों के कई ऐसे सैकड़े लगा सकता। सो आयोजकों के लिए कॉमनवेल्थ गेम्स का समापन जश्न का नहीं, अलबत्ता सबक लेने का वक्त। अगर खिलाडिय़ों को समुचित प्रोत्साहन मिले, तो ओलंपिक में भी परचम लहराए। कॉमनवेल्थ में हम ऊपर से दूसरे पायदान पर आ गए। अफसोस, ओलंपिक में हमारी गिनती नीचे से शुरू होती। अपने देश के सभी खेल फैडरेशनों में नेताओं का कब्जा। सो खेल में राजनीति घुस चुकी। यानी जहां-जहां पांव पड़े संतन के....। तभी तो पिछले साल गणतंत्र दिवस के मौके पर अभिनव-विजेंदर को पद्म पुरस्कार मिल गए। पर ओलंपिक में विजेंदर की तरह ही कुश्ती में कांस्य जीतने वाले सुशील कुमार को इसी मनमोहन सरकार ने ठेंगा दिखा दिया। अब देखिए, कैसे सुशील कॉमनवेल्थ से पहले वल्र्ड चैंपियन बने। कॉमनवेल्थ में कुश्ती का गोल्ड मैडल जीता। इतना ही नहीं, कॉमनवेल्थ में सबसे लोकप्रिय एथलीट होने का भी खिताब मिला। पर चमक-दमक की दुनिया से दूर रहने वाले सुशील को पिछली बार पद्म श्री के लायक भी नहीं समझा गया। यों अबके सरकार भूल सुधार करेगी, यही उम्मीद। पर सुशील के साथ हुई नाइंसाफी खेल में घुसी राजनीति की अनौखी मिसाल। फिर भी कॉमनवेल्थ गेम्स में आए मेहमानों की विदाई से पहले क्रेडिट लेने की जैसी होड़ मची। नेता सुधरेंगे, इसकी गुंजाइश नहीं दिखती। खिलाडिय़ों के मैडल का महाकुंभ तो निपट गया। अब मैडल के लिए आयोजकों में भिड़ंत हो रही। ताकि सिर्फ सफलता का ढोल बजे। और भ्रष्टाचार की सारी कहानी उस शोर में दब जाए। -----------
14/10/2010

Wednesday, October 13, 2010

कॉमनवेल्थ, कर्नाटक और क्लाइमैक्स!

तो कॉमनवेल्थ और कर्नाटक क्लाइमैक्स के दौर में पहुंच गए। गुरुवार को खेल का महाकुंभ भी निपटेगा। कर्नाटक की राजनीतिक उठापटक भी थमेगी। पर संयोग, दोनों 'खेल' निपटाने के बाद भी कर्ताधर्ता राहत की सांस नहीं ले पाएंगे। कॉमनवेल्थ गेम्स के भ्रष्टाचार की परतें फिर से उधड़ेंगी। बेतहाशा खर्च पर सवाल पहले की तरह ही उठेंगे। पर मैडल और उद्घाटन-समापन के जश्न में कहीं भ्रष्टाचार दफन न हो जाए। स्टेडियम के निर्माण पर बेतहाशा खर्च का सवाल संसद में उठा था। तो खेल मंत्री एमएस गिल ने खर्च को जायज ठहराने की नौकरशाही दलीलें खूब दी थीं। सो कॉमनवेल्थ में हुए भ्रष्टाचार को लेकर किसी को सजा मिलेगी, उम्मीद ना के बराबर। अब तो पेट भरने के बाद आयोजकों में पीठ ठोकने की होड़ मच चुकी। शीला अपनी पीठ ठोक रहीं, तो कलमाड़ी अपनी। गिल-जयपाल की भूमिका तो फिलहाल न तीन में, न तेरह में। पर बीजेपी तो इसी से गदगद कि कलमाड़ी ने उद्घाटन समारोह में ही कॉमनवेल्थ गेम्स के लिए पूर्व पीएम अटल बिहारी वाजपेयी का नाम लिया। अगर कॉमनवेल्थ के आयोजन की तारीफ हुई। तो इसमें कोई शक नहीं, श्रेय बटोरने बीजेपी भी मैदान में कूदेगी। पर कॉमनवेल्थ की बात समापन के बाद करेंगे। फिलहाल कर्नाटक में चल रहे राजनीतिक कॉमनवेल्थ की कहानी। बुधवार को बीजेपी ने गवर्नर हंसराज भारद्वाज पर हमला तेज कर दिया। आडवाणी-जेतली-सुषमा-वेंकैया ने मोर्चा उठा पीएम के दर अलख जगाई। हंसराज के समूचे राजनीतिक कैरियर और गवर्नरी का पोथा पीएम के सामने खोल दिया। बीजेपी ने हंसराज को संविधान से हटकर काम करने वाला नेता साबित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। पीएम को सौंपे ज्ञापन में बीजेपी ने कहा- हंसराज भारद्वाज राज्यपाल बनाए जाने के बावजूद राजनीतिक अतीत और राजनीति से खुद को अलग नहीं रख पाए। उन ने यह साबित कर दिया कि वह गवर्नर जैसे संवैधानिक पद के लायक नहीं हैं। अरुण जेतली बोले- कानून मंत्री के रूप में भी हंसराज भारद्वाज ने ऐसे आचरण किए। जिससे यह साफ हो गया कि संविधान से इतर उनकी एक आस्था है और अपनी वफादारी साबित करने में संविधान से इतर काम करना उनकी राजनीतिक रणनीति रही है। इतना ही नहीं, निष्पक्ष रहना हंसराज भारद्वाज के स्वभाव में ही नहीं है। यानी बीजेपी ने अपनी तरफ से सारे तथ्य गिना दिए। जैसे कभी मुख्य चुनाव आयुक्त नवीन चावला और बूटा सिंह, एससी जमीर, सिब्ते रजी के मामले में गिनवा चुकी। पर बीजेपी की शिकायत का हश्र क्या हुआ, सबको मालूम। जब सुप्रीम कोर्ट ने बिहार विधानसभा भंग करने को असंवैधानिक ठहराया, तब भी मनमोहन ने बूटा को न हटाया और न बूटा ने खुद इस्तीफा दिया। अलबत्ता जब कोर्ट ने विस्तृत फैसला दिया। तो बूटा गवर्नरी से चलता हुए। नवीन चावला के मामले में तो मुख्य चुनाव आयुक्त गोपालस्वामी की सिफारिश कूड़े के डिब्बे में डाल दी गई। सो हंसराज पर कोई कार्रवाई होगी, ऐसी उम्मीद फिलहाल तो नहीं। तभी तो बीजेपी नेताओं की शिकायत मनमोहन ने मौनी बाबा की तरह तफ्सील से सुनी। पर कोई भरोसा नहीं दिया। वैसे भी हंसराज पर कार्रवाई मनमोहन के वश की बात नहीं। जब तक हंसराज पर दस जनपथ का साया, उनकी कुर्सी पर कोई काली छाया नहीं पड़ सकती। पर गवर्नर की वजह से कांग्रेस की किरकिरी हो चुकी। यों जेहाद पर उतरे गवर्नर की सिफारिश पर बटन दबाया होता। तो कर्नाटक का मुद्दा कांग्रेस के लिए फिदायीन बन जाता। सो अबके कांग्रेस ने सब्र से काम लिया। गवर्नर की सिफारिश को किनारे कर एक और मौका देने की हिदायत दी। ताकि गवर्नर की लाज बच जाए और बीजेपी को भी शिकायत का मौका न मिले। सचमुच गवर्नर हंसराज ने कर्नाटक में जिस तरह से काम किया, अब कांग्रेस के नेता खुद चूक मान रहे। कांग्रेस मान रही, गवर्नर ने पद की मर्यादा से इतर कांग्रेस के नेता की तरह बयानबाजी की। प्रदेश कांग्रेस भी इस मुद्दे को सही ढंग से हैंडल नहीं कर पाई। अगर कांग्रेस ने पहले से ही आक्रामक तेवर अपनाया होता। तो बीजेपी को राजनीतिक बढ़त नहीं मिलती। रही-सही कसर गवर्नर हंसराज ने अपने नौकरशाह सलाहकारों की वजह से जल्दबाजी दिखाकर पूरी कर दी। अगर राष्ट्रपति की सिफारिश करने में वक्त लेते, तो शायद बीजेपी को भी बहुमत हासिल करने के तरीके पर जवाब देना भारी पड़ता। पर फौरी सिफारिश कर गवर्नर ने हवा का रुख बीजेपी के पक्ष में मोड़ दिया। अब बेभाव की पड़ी, तो गवर्नर अपनी ही चाल में फंस गए। गुरुवार को येदुरप्पा सरकार फिर से विश्वास प्रस्ताव पेश करेगी। तो 208 की विधानसभा में ही बहुमत साबित करना होगा। क्योंकि अयोग्य करार दिए गए सोलह एमएलए हाईकोर्ट जा चुके। जिनका फैसला सोमवार को आएगा। बुधवार को पांच निर्दलीयों ने जल्द राहत की मांग की। सीलबंद लिफाफे में वोट का हक मांगा। पर कोर्ट ने राहत देने से इनकार कर दिया। अब हवा का रुख देख एक निर्दलीय एमएलए की वापस बीजेपी की ओर लौटने की खबर। सो येदुरप्पा ने विश्वास मत जीत लिया। तो गवर्नर की पहली सिफारिश पर सीधे सवाल उठेंगे। यों कर्नाटक का क्लाइमैक्स भले गुरुवार को खत्म हो जाए। पर येदुरप्पा सरकार की स्थिरता पर सस्पेंस बना रहेगा। हाईकोर्ट ने साफ कर दिया- गुरुवार का विश्वास मत उसके सोमवार के फैसले से ही तय होगा।
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13/10/2010

Tuesday, October 12, 2010

दूध की जली कांग्रेस फूंक-फूंक कर पी रही छाछ

अब दिल्ली शिफ्ट हो गया कर-नाटक। सोनिया-आडवाणी के घर फैसलाकुन बैठकों का दौर चला। राष्ट्रपति राज के खौफ में बीजेपी ने अपने 105 एमएलए दिल्ली बुला लिए। ताकि राष्ट्रपति के सामने परेड करा राजनीतिक मुद्दे को धार दे सके। पर तेल की धार देख कांग्रेस ने खुद को फिसलने से बचा लिया। बिहार, झारखंड, गोवा जैसी जल्दबाजी नहीं की। गवर्नर हंसराज भारद्वाज तो बेनकाब हो चुके। सो फैसले पर फौरन मोहर लगाने की तोहमत नहीं ली। अलबत्ता बीजेपी को भी बेनकाब करने की रणनीति बनाई। केबिनेट की मीटिंग टाल गवर्नर को इशारा कर दिया। येदुरप्पा सरकार को दुबारा बहुमत साबित करने की हिदायत दें। सो सोमवार को राष्ट्रपति राज की सिफारिश करने में जेहादी तेवर दिखाने वाले हंसराज मंगलवार को सरेंडर कर गए। येदुरप्पा को फिर से बहुमत साबित करने को गुरुवार का वक्त दिया। अब कोई पूछे, जब सोमवार को गवर्नर राष्ट्रपति राज को मुफीद बता रहे थे। तो चौबीस घंटे में ही क्यों पलट गए? अगर खुद की ऐसी सोच, तो चौबीस घंटे पहले पल्ले क्यों नहीं पड़ी? सोमवार को खुद रपट दी- 120 एमएलए सरकार के खिलाफ। फिर आज क्यों मौका दे रहे? कर्नाटक राष्ट्रीय मुद्दा बन गया। तो गवर्नर हंसराज खुद मीडिया से मुखातिब हुए। करीब पौना-एक घंटे की लंबी प्रेस कांफ्रेंस में गवर्नरी का कम, नेतागिरी का अंदाज अधिक दिखा। राजनीतिक आरोपों का जवाब ऐसे दिया, मानो, गवर्नर नहीं, विपक्ष के नेता हों। बोले- मुझे कोई डिक्टेट नहीं कर सकता, ना ही मैं किसी की स्क्रिप्ट पर काम करता हूं। स्क्रिप्ट पर काम वे लोग (बीजेपी) कर रहे। और भी बहुतेरे सवाल हुए, जिनका हंसराज ने आरोप-प्रत्यारोप के अंदाज में जवाब दिया। पर हंसराज का राजनीतिक कैरियर को जानने वाले बखूबी जानते, हंसराज किसकी स्क्रिप्ट पर काम करते। यों हाथ कंगन को आरसी क्या, पढ़े-लिखे को फारसी क्या। गवर्नर ने येदुरप्पा सरकार को बहुमत साबित करने का मौका दिया। पर इसके संकेत करीब दो-ढाई घंटे पहले कर्नाटक कांग्रेस के प्रभारी महासचिव गुलाम नबी आजाद दिल्ली में दे चुके थे। जब उन ने कहा था- स्पीकर ने गलत काम किया। अयोग्य करार दिए गए विधायकों को बहाल कर येदुरप्पा सरकार फिर से विश्वास मत हासिल करे, तो हमें एतराज नहीं होगा। हू-ब-हू यही बात गवर्नर ने सीएम को लिखी चिट्ठी और प्रेस कांफ्रेंस में कही। अब आप खुद देख लो। केबिनेट कमेटी की मीटिंग नहीं हुई, सिर्फ कांग्रेस कोर ग्रुप और सोनिया की गुलाम नबी-वीरप्पा मोइली से मीटिंग हुई। तो सवाल, गवर्नर ने किसकी सलाह पर अपना फैसला बदल दिया। गवर्नर ने सचमुच पिछले कुछ दिनों से कर्नाटक में खूब खेल किया। सीएम को बिन मांगे सलाह, राष्ट्रपति-पीएम को रपट देना किसी को भी रास नहीं आया। पर जब बीजेपी के कुछेक एमएलए बागी हुए। सरकार बचाने को बीजेपी ने भी कांग्रेसी नुस्खा अपनाया। तो गवर्नर ने स्पीकर को चिट्ठी लिखकर ऐसा निर्देश दिया, कानून पानी भरता दिखा। स्पीकर को बहुमत से एक दिन पहले लिखा- अगर बागी एमएलए की सदस्यता रद्द की, तो विश्वास मत को मंजूर नहीं करेंगे। सो अब सवाल, क्या राजभवन सदन से ऊपर? हंसराज कानून मंत्री रह चुके। पर शायद पद छिनने के साथ ही कानून भूल गए। बड़े बेमन से गवर्नर बने। सो खुद को राजनीतिक धुरंधर साबित करने के चक्कर में अपना खेल खराब कर लिया। अब कर्नाटक का पेच उलझ गया। बागी एमएलए हाईकोर्ट जा चुके। पर हाईकोर्ट ने कोई फौरी फैसला नहीं सुनाया। अलबत्ता अब अगली सुनवाई 18 अक्टूबर को होगी। पर देश में गवर्नर की सिफारिश से बीजेपी ने बवाल खड़ा किया। तो गवर्नर ने दुबारा बहुमत साबित करने के लिए 14 अक्टूबर का समय दिया। अब सोचो, गर 14 अक्टूबर को येदुरप्पा ने मौजूदा 208 की विधानसभा में बहुमत हासिल कर लिया। फिर 18 अक्टूबर को अगर कोर्ट ने बागी विधायकों को अंतरिम राहत दे दी, तो क्या होगा? क्या फिर येदुरप्पा को बहुमत साबित करने के लिए कहा जाएगा? कांग्रेस की रणनीति कुछ अलग। कांग्रेस की सोच, गुरुवार को येदुरप्पा बहुमत साबित नहीं कर पाएंगे। अगर हंगामे में सोमवार का खेल दोहराया गया। तो राष्ट्रपति राज लगाने में देर नहीं होगी। पर बीजेपी पहले हिचकी। रार ठान ली, जब एक बार बहुमत साबित कर चुके। तो दुबारा क्यों करें। पर आडवाणी के घर देर शाम तक चली मीटिंग के बाद 208 की विधानसभा में बहुमत साबित करने को राजी हो गई। सो कांग्रेस और गवर्नर के लिए कर्नाटक चुनौती बना। तो बीजेपी के लिए भी अब प्रतिष्ठा की लड़ाई। कर्नाटक में पहली बार कमल खिला। पर महज दो साल में ही कमल पर इतना कीचड़ उछला, कमल का रंग मालूम नहीं पड़ रहा। भ्रष्टाचार और अंतर्कलह के इतने कारनामे हुए कि बीजेपी की साख खत्म हो चुकी। अब गवर्नर ने राजनीतिक मजबूरी के तहत एक और मौका दिया। तो साख गंवा चुकी बीजेपी के लिए खाल बचाने की चुनौती। कर्नाटक में बीजेपी के रणनीतिकार औंधे मुंह गिर चुके। सो अब बीजेपी को सरकार बचाने की फिक्र नहीं। अलबत्ता गवर्नर पर हमला तीखा कर दिया। कांग्रेस भी थोड़ी सहम गई। गर राष्ट्रपति राज लगाया, तो न सिर्फ विपक्ष से संबंध में कटुता आएगी। राज्यसभा में पास कराना भी टेढ़ी खीर होगा। तब समूची कांग्रेस की भद्द पिटेगी। सो फिलहाल कांग्रेस ने भद्द को हंसराज तक ही सीमित रखा। वैसे भी बिहार, गोवा, झारखंड में कांग्रेस तेवर दिखा भद्द पिटवा चुकी। सो अबके दूध की जली कांग्रेस छाछ भी फूंक-फूंक कर पी रही।
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12/10/2010

Monday, October 11, 2010

‘तुम करो तो लीला, हम करें तो करेक्टर ढीला’

तो हंसराज भारद्वाज भी ‘मिशनरी गवर्नर क्लब’ के मेंबर हो गए। राजनीतिक मिशन में सफल गवर्नरों की लिस्ट में कई नाम। कर्नाटक में ही बोम्मई सरकार को बर्खास्त कर गवर्नर वेंकट सुबैया, आंध्र में एनटीआर को हटा रामलाल, यूपी में कल्याण हटा व जगदंबिका को शपथ दिला रोमेश भंडारी, गोवा में परिक्कर सरकार को बर्खास्त कर एससी जमीर, झारखंड में मुंडा को रोक सैयद सिब्ते रजी, बिहार में नीतिश को रोक गवर्नर बूटा सिंह इतिहास रच चुके। यों मिशनरी गवर्नर क्लब में शामिल होने की कोशिश करने वाले बहुतेरे। पर संविधान का मखौल उड़ाने में सभी कामयाब नहीं। अपने हंसराज भारद्वाज अभी क्लब की मेंबरी से एक कदम दूर। अगर केबिनेट ने कर्नाटक की येदुरप्पा सरकार बर्खास्त करने की सिफारिश मान ली। तो समझो, काम हो गया। गवर्नर हंसराज कर्नाटक की बीजेपी सरकार को विदा करने की कोशिश पहले भी कर चुके। पर उम्दा मौका अब मिला, जब बीजेपी आदतन अंतर्कलह की शिकार। बीजेपी के डेढ़ दर्जन बागी और पांच निर्दलीय एमएलए ने समर्थन वापसी की चिट्ठी सौंप दी। तो गवर्नर ने येदुरप्पा को बहुमत साबित करने को कहा। सो सोमवार को येदुरप्पा ने विश्वास मत तो जीत लिया। पर तरीका वही, जो सत्ता में बने रहने को अपनाया जाता। बहुमत नहीं, तो बागियों को स्पीकर के जरिए वोट से वंचित कर दो। फिर मौजूदा संख्या बल में अपना बहुमत दिखा दो। कर्नाटक विधानसभा के स्पीकर केजी बोपैया ने दल-बदल कानून के तहत बीजेपी के 11 बागी और पांचों निर्दलीयों को अयोग्य करार दे दिया। सो विधानसभा में जो ड्रामा हुआ, उसे लोकतंत्र तो कतई नहीं कहेंगे। विपक्षी कांग्रेस-जेडीएस की शह पर बागियों ने सदन में कुर्ता-बनियान फाड़ डांस किया। हंगामे के बीच ही येदुरप्पा को स्पीकर ने ध्वनिमत से विश्वास मत दिला दिया। सो हंगामा और बरपा। विपक्ष गवर्नर हंसराज तक पहुंचा। तो गवर्नर ने भी अपनी रपट भेजने में देर नहीं लगाई। अयोग्य करार दिए गए पांचों निर्दलीय एमएलए हाईकोर्ट पहुंच गए। सो अब केंद्र सरकार की नजर हाईकोर्ट पर टिकी हुई। मंगलवार को केबिनेट कमेटी गवर्नर की सिफारिश पर फैसला करेगी। सो बीजेपी को डर, दक्षिण का कमल कुम्हला न जाए। नितिन गडकरी ने तडक़े ही चेतावनी दे दी, राष्ट्रपति राज लगाने की हिमाकत न करे केंद्र। पर कर्नाटक में कर-नाटक सभी एक जैसे ही पात्र। सुषमा स्वराज ने इतवार को ही राष्ट्रपति से गवर्नर हंसराज को वापस बुलाने की मांग कर दी थी। यानी विधानसभा और राजभवन में जो हुआ, सब कुछ पहले से तय था। गवर्नरी का खेल तो कांग्रेस हमेशा करती आई। जब मनमोहन पीएम और शिवराज पाटिल एचएम बने। तो चार गवर्नर यह कहकर हटाए गए थे कि इनकी पृष्ठभूमि संघ की है। फिर कांग्रेस राज में जो बने, उन ने कांग्रेसी मापदंड पर खरे उतरने की पूरी कोशिश की। गोवा में गवर्नर एससी जमीर ने पहले बीजेपी की सरकार हटाई। फिर लगातार कांग्रेस की सरकार बचाते आ रहे। परिकर सरकार दो फरवरी 2005 को बर्खास्त हुई। पर ड्रामा देखिए। बीजेपी के तीन एमएलए बागी हो गए थे। तबके स्पीकर विश्वास सतारकर ने तीनों को वोटिंग से रोका। परिकर ने विश्वास मत के लिए तीन फरवरी की तारीख तय की। तो गवर्नर जमीर ने चौबीस घंटे यानी दो फरवरी को ही बहुमत साबित करने का फरमान सुनाया। हंगामे में परिकर ने विश्वास मत जीत लिया। पर महज 25 मिनट के भीतर जमीर ने बीजेपी की सरकार बर्खास्त कर दी। देर रात कांग्रेसी प्रताप सिंह राणे को शपथ दिला बहुमत के लिए तीस दिन का समय दे दिया। सो गवर्नर का ‘जमीर’ इसी से दिख गया। फिर 2007 में बीजेपी ने कांग्रेस की दिगंबर कामथ सरकार के खिलाफ वही काम किया। कुछ विधायक तोड़े, राष्ट्रपति के सामने परेड कराई। पर स्पीकर राणे ने बागी विधायक को वोट से वंचित कर दिया। फिर बीजेपी के एमएलए गवर्नर जमीर के पास गए। तो कार्रवाई नहीं, सिर्फ विचार का भरोसा मिला। यों गोवा उठापटक की फैक्ट्री। जो भी दल सत्ता में होता, पॉवर के बेजा इस्तेमाल से परहेज नहीं। स्पीकर तो सिर्फ नाममात्र के संवैधानिक पद पर। सचमुच में ऐसे विरले ही स्पीकर, जो दलगत भावना से परे रहे। यों एक नजीर झारखंड की। अगर तबके स्पीकर इंदर सिंह नामधारी ने पद का बेजा इस्तेमाल किया होता, तो अर्जुन मुंडा की पिछली सरकार नहीं गिरती। और ना ही मधु कोड़ा जैसे भ्रष्ट सीएम बन पाते। पर उन ने आसंदी के दामन और अपनी पगड़ी पर दाग नहीं लगने दिया। अब कोड़ा को सीएम बनाने वाली कांग्रेस का बयान देखिए। मनीष तिवारी बोले- आजाद भारत में ऐसी गुंडागर्दी की कोई मिसाल नहीं होगी, जो बीजेपी ने कर्नाटक में किया। पर कोई पूछे, सदन में हंगामा करने वाले विधायकों को किस नजरिए से जनता का सेवक माना जाए? अगर बीजेपी के 11 विधायकों को येदुरप्पा पर एतबार नहीं। तो इस्तीफा देकर चुनाव क्यों नहीं लड़ लिया? लोकतंत्र में संख्या बल का महत्व। अब 117 में से 11 एमएलए अपनी मर्जी से तो सरकार नहीं चलवा सकते। पर विपक्ष ने शह दिया, तो बनियान फाडऩे लगे। सो कौन कह सकता, बागी बिके हुए नहीं थे। लोकतंत्र में अब पैसे का ही बोलबाला। करोड़ों रुपए देख किसी का भी मन डोल जाए। खरीद-फरोख्त के खेल में ईमानदार कोई भी नहीं। फर्क सिर्फ कुर्सी के मुंह का। सत्ता में बैठने वाला अपने हर काम को जायज ठहराता। पर जब वही विपक्ष में जाता, तो वही काम लोकतंत्र की हत्या और बलात्कार कहलाने लगते। यानी फर्क सिर्फ कुर्सी का, पर कहावत दोनों के लिए एक- ‘तुम करो तो लीला, हम करें तो करेक्टर ढीला।’
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11/10/2010

Friday, October 8, 2010

मन की हो, तो वाह, नहीं तो पार्टी की तेरी....!

तो केंद्र सरकार ने भी मान लिया, अलगाववादियों की जुबान बोल रहे उमर। सो उमर से सफाई मांगी। क्षेत्रीय स्वायत्तता और विलय पर दिए बयान का मतलब पूछा। पर केंद्र सरकार गर सचमुच उमर से नाराज। तो सवाल, क्या कोई कार्रवाई करेगी? अगर ऐसा कोई इरादा होता। तो कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह गुरुवार को उमर संग सुर न मिलाते। कांग्रेस उमर के बयान को वजूद बचाने वाला बयान मान रही। सो केंद्र सरकार की जवाबतलबी का मकसद, पाक को बेवजह मौका न मिले। यानी देश या लोकतंत्र की नहीं, नेताओं को सिर्फ अपने वजूद की फिक्र। तभी तो अब्दुल्ला खानदान की तीसरी पीढ़ी बागडोर संभाल रही। पर सोच पहली पीढ़ी से भी गई-गुजरी। सचमुच राजनीति में वजूद बचाने को नेता लोक-लिहाज को रौंदने में तनिक भी संकोच नहीं करते। तभी तो इस होड़ में लेफ्ट को छोड़ कोई भी राजनीतिक दल पीछे नहीं। पर ताजा किस्सा बीजेपी का। वैसे कहते हैं, मुसीबत कभी अकेले नहीं आती। बीजेपी पर यह कहावत सटीक। कर्नाटक में संकट अभी सुलझा भी नहीं, बीजेपी बिहार में उलझ गई। यों कर्नाटक में दल-बदल कानून का डंडा और मंत्री पद का लॉलीपाप दिखा कुछ बागियों को पटा लिया। पर बिहार में पहले चरण की वोटिंग से महज 14 दिन पहले सीपी ठाकुर ने अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया। चुनावी समर के बीच बीजेपी में ऐसा हुड़दंग दिल्ली की ही देन। याद करिए लोकसभा चुनाव का वाकया। तबके बीजेपी अध्यक्ष राजनाथ सिंह और अरुण जेतली के बीच ऐसी जंग छिड़ी। पोल मैनेजर होते हुए भी जेतली ने केंद्रीय चुनाव समिति की मीटिंग का लगातार बॉयकाट किया। संयोग देखिए, तब खींचतान की वजह भले सुधांशु मित्तल थे। पर अधर में बिहार का ही टिकट लटका था। रार ऐसी कि जेतली बैठक में नहीं गए। पर आडवाणी के कहने पर राजनाथ के घर जाकर टिकट बंटवाया। अब जरा सीपी ठाकुर की नाराजगी की वजह भी देख लो। प्रदेश अध्यक्ष रहते हुए भी बेटे विवेक ठाकुर को मनमाफिक सीट से टिकट नहीं दिला पाए। अलबत्ता वह सीट नीतिश कुमार की झोली में आलाकमान ने डाल दी। तो सीपी ठाकुर ने आव देखा न ताव, अपना इस्तीफा दिल्ली भेज दिया। पर जरा खत का मजमून बताते जाएं। ताकि नेताओं के दिल और दिमाग का फर्क साफ हो जाए। सीपी ठाकुर ने अपने इस्तीफे में लिखा- प्रदेश अध्यक्ष पद से मेरे इस्तीफे का यह मतलब नहीं है कि अपने बेटे विवेक ठाकुर को टिकट नहीं दिला पाया। बल्कि प्रदेश में अब तक बहुत से ऐसे निर्णय हुए हैं, जिनमें मुझसे सहमति नहीं ली गई। इससे मैं आहत हूं। यानी सीपी ठाकुर का दिल रो रहा कि बेटे को टिकट नहीं दिला पाए। पर मजबूरी, वही बात जुबां से कह नहीं सकते। सो निर्णय में उपेक्षा की दलील दे रहे। पर सवाल, सीपी ठाकुर को यही वक्त क्यों मिला? गर उपेक्षा हो रही थी, तो पहले ही इस्तीफा क्यों नहीं दिया? अब जब दीघा विधानसभा सीट बीजेपी ने गठबंधन के सहयोगी जेडीयू को दे दी। तो ही ठाकुर को उपेक्षा क्यों नजर आई? अगर दीघा सीट से विवेक ठाकुर उम्मीदवार हो जाते। तो क्या सीपी ठाकुर उपेक्षा का आरोप लगाते? अगर उपेक्षा हुई भी हो, तो बेटे को टिकट मिल जाने से सारे दर्द दूर हो जाते। यों गठबंधन की जिम्मेदारी केंद्रीय नेतृत्व की होती। सो केंद्र ने फैसला लिया, तो इसमें नाराजगी क्यों? आखिर नेताओं में यह कौन सा रोग। जब आलाकमान तमाम विरोधों के बावजूद सीपी ठाकुर को अध्यक्ष बनाए, तो फैसला बहुत अच्छा। पर वही आलाकमान गठबंधन में समझौते के तहत दीघा सीट सहयोगी को दे दे। तो आलाकमान का फैसला गलत कैसे हो गया? राजनीति में किसी प्रदेश इकाई का अध्यक्ष बनने के बाद आलाकमान से यह उम्मीद नहीं की जा सकती कि जो बात राज्य को पसंद हो, वही बात करे। कम से कम सीपी ठाकुर जैसे कद्दावर नेता को यह शोभा नहीं देता। बीजेपी खुद को लोकतांत्रिक पार्टी कहती। नितिन गडकरी हर मंच से कहते- बीजेपी ही ऐसी पार्टी, जहां मेरे जैसा पोस्टर चिपकाने वाला व्यक्ति राष्ट्रीय अध्यक्ष बन सकता। गडकरी ने इस बयान से हमेशा कांग्रेस के वंशवाद पर निशाना साधा। पर ठाकुर बीजेपी में रहकर कांग्रेस जैसा मंसूबा पाले बैठे। कांग्रेस में जहां वंशवाद की पूरी बेल और हर शाख पर वंशवाद का फल दिख रहा। कुछ हद तक बीजेपी में भी यह बेल लगी। जब राजनाथ सिंह अध्यक्ष थे, तो उनने अपने बेटे पंकज सिंह को यूपी के चिरईगांव विधानसभा से उम्मीदवार बना दिया। पर सवाल उठे, तो राजनाथ ने कदम पीछे खींचने में पूरी शालीनता दिखाई। खुद पंकज ने टिकट छोड़ संगठन में रहने की इच्छा जताई। सो आज राजनाथ का अलग वजूद। पर अपने बेटे-बेटियों-रिश्तेदारों को टिकट दिला राजनीतिक वजूद बनाने वाले नेता भी कम नहीं। गोपीनाथ मुंडे बेटी पंकजा को एमएलए बना चुके। दामाद को टिकट दिलाया, पर हार गए। मध्य प्रदेश में विक्रम वर्मा की पत्नी, कैलाश सारंग और कैलाश जोशी का बेटा एमएलए। राजस्थान से अपने दुष्यंत सांसद। हिमाचल से धूमल के बेटे अनुराग का ग्राफ बढ़ रहा। तो भला सीपी ठाकुर पीछे क्यों रहते। यों बीजेपी में सीपी ठाकुर जैसे क्षत्रपों की कमी नहीं। जब कुर्सी मिलती, तो आलाकमान की वाह-वाह। और जब कुछ न मिले या कुर्सी छोडऩे को कहा जाए, तो आलाकमान को आंख दिखाने लगते। अपनों की ऐसी-तैसी और छीछालेदर करने में नहीं हिचकते।
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08/10/2010

Thursday, October 7, 2010

शेख से उमर तक, चालू आहे कश्मीर कथा

तो उमर अब्दुल्ला भी सोलह दूनी आठ ही साबित हुए। दादा से पोते तक दुनिया और राजनीति कई करवट ले चुकी। पर अब्दुल्ला खानदान की सोच नहीं बदली। जब-जब अब्दुल्ला खानदान की कुर्सी खतरे में पड़ी। जुबान पर अलगाववादियों की भाषा चढ़ गई। कश्मीर घाटी 11 जून से सुलग रही। पर युवा उमर की राजनीति बचकानी साबित हुई। घाटी की हिंसा थामने और अवाम का भरोसा जीतने में नाकाम रहे। तो उन ने आखिर में वही तुरुप चल दिया। जो कभी दादा शेख अब्दुल्ला और वालिद फारुख अब्दुल्ला आजमा चुके। अब उमर अब्दुल्ला ने मुखर होकर न सिर्फ स्वायत्तता का राग अलापा। अलबत्ता कश्मीर के भारत में विलय पर ही सवाल उठा दिए। उमर ने कहा- कश्मीर को हैदराबाद, जूनागढ़ से मत जोडि़ए। इन दोनों का पहले सम्मिलन और फिर विलय हुआ था। पर कश्मीर का भारत से सिर्फ सम्मिलन हुआ था, विलय नहीं। हम 1947 के समझौते पर कायम हैं। पर भारत सरकार ने राज्य की स्वायत्तता छीन ली। यानी उमर ने अलगाववादियों की जुबां बोल घाटी का बवाल थामने की कोशिश की। अपने संविधान में जम्मू-कश्मीर को स्पेशल स्टेटस मिला हुआ। पंडित नेहरू ने अनुच्छेद 370 के तहत यह प्रावधान कराया था। ताकि अवाम धीरे-धीरे राष्ट्र की मुख्य धारा से जुड़ सके। पर इन साठ सालों में स्पेशल स्टेटस से सैपरेट स्टेटस की मांग होने लगी। उमर के दादा जान शेख अब्दुल्ला ने तो अनुच्छेद 370 को देश के सभी राज्यों में लागू करने का दाव खेल दिया था। ताकि संविधान का अस्थायी अनुच्छेद स्थायी हो जाए। सोचो, अगर शेख अपने मंसूबे में कामयाब हो जाते। तो आज देश के हालात क्या होते। सचमुच अलगाववाद पर अंकुश लगाने को कभी ईमानदार पहल नहीं हुई। अमेरिका ने भारत-पाक के बीच कश्मीर मुद्दे को हमेशा जिंदा रखा। ताकि दोनों को ब्लैकमेल कर सके। शेख अब्दुल्ला ने डिक्शन प्लान के तहत तीन स्टेट बनाने की लॉबिंग शुरू कर दी थी। सीआईए के चीफ स्टीवन लाई 1953 में भारत आए। तो अब्दुल्ला की लॉबिंग की भनक पंडित नेहरू को भी लगी। आईबी में तबके आईजी बीएन मलिक ने अपनी पुस्तक- माई डेज विद नेहरू में इसकी पुष्टि की। पर नेहरू नहीं माने, तो मामला रफी अहमद किदवई के पास गया। तो शेख गिरफ्तार हुए। बख्शी गुलाम मोहम्मद को जम्मू-कश्मीर का पीएम बनाया गया। शेख पर कश्मीर षडयंत्र का मुकदमा चला। पर 1963 में नेहरू-शेख पैक्ट के बाद केस वापस हुआ। फिर उमर के वालिद फारुख की कहानी कोई अधिक पुरानी नहीं। भावनाओं का आवेग पैदा करने में तो फारुख अपने बाप-बेटे से भी आगे रहे। जब मामला हाथ से निकल जाता, तो रोकर सहानुभूति बटोरने में फारुख का कोई जवाब नहीं। वाजपेयी राज में फारुख एनडीए का हिस्सा थे। नेशनल कांफ्रेंस ने 1996 के विधानसभा चुनाव में स्वायत्तता को मुख्य चुनावी मुद्दा बनाया था। सो जून 2000 में उन ने विधानसभा से प्रस्ताव पारित कर केंद्र को भेज दिया। पर चार जुलाई 2000 को वाजपेयी केबिनेट ने प्रस्ताव नामंजूर करते हुए दलील दी- ऐसा करना देश को पीछे की ओर लौटाना होगा और यह देश की एकता के हित में नहीं। अब उमर अब्दुल्ला की कहानी देखिए। जनवरी 2009 में अपने वालिद को किनारे कर सीएम हो गए। राहुल गांधी से दोस्ती ने खूब रंग दिखाया। तो आस बंधी, युवा सीएम कश्मीर के लिए सचमुच कुछ कर दिखाएगा। पर उमर सच मायने में राजनीति के अनाड़ी निकले। अगर 11 जून को पहली मौत के वक्त ही उमर ने राजनीतिक चतुराई दिखाई होती, तो घाटी के हालात इस कदर नहीं बिगड़ते। पर तब उमर छुट्टी मना रहे थे, जिसे कैंसल नहीं किया। बाद में भी कभी मौके पर पहुंच अवाम को ढांढस बंधाने की कोशिश नहीं की। यों हालात बेकाबू हो गए, तो दो महीने बाद मौके पर पहुंचे। पर तब तक पानी सिर से ऊपर निकल चुका था। फिर सर्वदलीय टीम का घाटी में दौरा, राजनीतिक पैकेज की मांग। केंद्र की सलाह पर स्कूल-कालेज का खुलना, बंदियों की रिहाई। सो ऐसा लगा, उमर केंद्र सरकार की कठपुतली बनकर काम कर रहे। यानी जब उमर चौतरफा घिर गए। तो आखिर में अलगाववादियों पर ठोस कार्रवाई करने की बजाए अलगाववाद की जुबां बोल भरोसा जीतने की आखिरी कोशिश भी कर डाली। बोले- हम केंद्र सरकार की कठपुतलियां नहीं। कोई रिमोट कंट्रोल नहीं, हम अपने लोगों और उनके फायदे के लिए फैसले लेते हैं। भारत को कश्मीर का ऐसा हल ढूंढना चाहिए, जो पाक को भी पसंद हो। पर कोई पूछे, क्या सीएम उमर के पास कोई ऐसा हल है? या फिर कुर्सी बचाने को कोई भी बयान चलेगा? उमर के बयान का मतलब तो यही- न नौ मन तेल होगा, न राधा नाचेगी। कश्मीर पर ऐसा हल निकल ही नहीं सकता, जो भारत-पाक को दिल से कबूल हो। हू-ब-हू यही मांग अलगाववादी भी करते आ रहे। सो गुरुवार को जम्मू-कश्मीर विधानसभा में जमकर हंगामा हुआ। बीजेपी-पैंथर्स पार्टी के एमएलए मार्शल से भिड़ गए। मार-पीट में विधायक और मार्शल दोनों घायल हो गए। बीजेपी उमर अब्दुल्ला के इस्तीफे की मांग कर रही। गर उमर भावना की राजनीति पर उतर आए। तो मारपीट पर उतर बीजेपी भी वही कर रही। सबको अपने वोट बैंक की फिक्र। पर उमर हों या बीजेपी, यह भूल गए, भावना की राजनीति टिकाऊ नहीं होती। पीडीपी ने श्राइन बोर्ड विवाद में बहुत कुछ किया। पर सत्ता से बेदखल हुई। यानी कश्मीर की आग यों ही जलती-बुझती रहेगी। कोई भी नेतृत्व ईमानदार नहीं। सो कश्मीर कथा यों ही चलती रहेगी।
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07/10/2010

Wednesday, October 6, 2010

राजनीतिक चक्की के आटे में सौहार्द-शिष्टाचार क्यों नहीं?

कर्नाटक में बीजेपी का नाटक फिर शुरू हो गया। दक्षिण भारत में पहली बार किला फतह किया। पर कुनबे में ऐसी कलह मची, दो साल में ही किले की चारदीवारी दरकने लगी। अब बीजेपी के डेढ़ दर्जन एमएलए बगावत पर उतर आए। गवर्नर को चिट्ठी लिख समर्थन वापसी का एलान किया। तो येदुरप्पा ने भी चार असंतुष्ट मंत्रियों को फौरन केबिनेट से बर्खास्त कर दिया। बाकी एमएलए को अनुशासनात्मक कार्रवाई की चेतावनी दी। कर्नाटक की खींचतान कई दफा दिल्ली दरबार तक पहुंच चुकी। यानी कर्नाटक में बीजेपी की सरकार जनता नहीं, अपनों के संकट सुलझाने में ही उलझी हुई। सो विपक्ष भी भला मौका क्यों गंवाता। देवगौड़ा-कांग्रेस ने मोर्चा खोला। तो मौजूदा गवर्नर हंसराज भारद्वाज अति सक्रिय हो गए। अबके उन ने विधानसभा का सत्र चालू होने के बावजूद सीएम को बहुमत साबित करने के लिए बारह अक्टूबर तक का समय दे दिया। बीजेपी के नाराज 15 एमएलए और पांच समर्थक निर्दलीय एमएलए ने गवर्नर को चिट्ठी लिखकर समर्थन वापसी का एलान कर दिया। सो कानून की बारीकी से वाकिफ हंसराज भारद्वाज ने कानून को किनारे रख राजनीतिक एजंडा चल दिया। यों हंसराज भारद्वाज कोई पहली बार इतने सक्रिय नहीं। इससे पहले अवैध खनन के मामले में राष्ट्रपति से लेकर पीएम तक अपनी रपट बिन मांगे भेज चुके। मर्यादा लांघ सीएम को बेमतलब नसीहत तक दे चुके। जब गवर्नर ने यहां तक कह दिया था, अगर वह सीएम होते, तो रेड्डी बंधुओं को केबिनेट से फौरन बाहर करते। अब कोई गवर्नर ऐसी भाषा का इस्तेमाल करे। तो उसे संविधान का पहरुआ कहा जाए या किसी पार्टी का, यह आप ही तय करिए। पर बात भाषाई मर्यादा की। तो राजनीति में ऐसी उम्मीद ही बेमानी। अब ताजा किस्सा देखो, अयोध्या फैसले के बाद कैसे हिंदू-मुसलमानों ने कौमी एकता की मिसाल पेश की। राजनीतिबाजों के झांसे का शिकार नहीं बने। तो अब नेताओं के पेट में मरोड़े उठ रहे। सो पहले मुलायम सिंह यादव ने उकसावे की कोशिश की। संघ-विहिप-बीजेपी ने अयोध्या फैसले को अपनी जीत के तौर पर पेश करना शुरू कर दिया। तो कांग्रेस भी मुस्लिम हितैशी होने का ढिंढोरा पीटने लगी। पर राजनीतिबाजों को सामाजिक सौहार्द शायद रास नहीं आ रहा। सो लगातार कोशिश हो रही, कोई एक पक्ष उकसावे में आकर ऐसा बयान दे दे, जिससे अयोध्या पर बंद हुई राजनीति की दुकान फैस्टीवल सीजन में चल पड़े। सो अब खुद राहुल गांधी ने नया सुर्रा छोड़ दिया। प्रतिबंधित आतंकी संगठन सिमी और आरएसएस को एक ही तराजू में तोल दिया। दो दिन पहले मध्य प्रदेश के टीकमगढ़ में राहुल ने कांग्रेस में आने वाले लोगों से बेहिचक कह दिया था। आरएसएस और सिमी की विचारधारा छोडक़र आने वालों को ही कांग्रेस में जगह मिलेगी। बुधवार को भोपाल में जब राहुल के बयान का मतलब पूछा गया। तो राहुल ने कह दिया- आरएसएस और सिमी दोनों ही कट्टरवादी संगठन। वैचारिक कट्टरता की दृष्टि से इनमें कोई फर्क नहीं। यानी राहुल बाबा की नजर में जैसा सिमी, वैसा ही आरएसएस। पर सवाल, अगर आरएसएस को सिमी जैसा मान रहे राहुल। तो मनमोहन-चिदंबरम से कहकर बैन क्यों नहीं लगवाते? सिमी पर बैन यूपीए के पिछले टर्म में ही बढ़ाया गया। अब अचानक ऐसा क्या हो गया, जो राहुल ने संघ को सिमी के बराबर खड़ा कर दिया? अयोध्या फैसले के बाद संघ ने जो संयमित रुख अपनाया, खुद कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह कायल हो गए। फिर राहुल के बयान का क्या मकसद? क्या यह जानबूझ कर उकसाने की कोशिश नहीं? सो राहुल के बयान पर बीजेपी ने पलटवार किया। प्रकाश जावडेकर बोले- मानसिक संतुलन खो चुके हैं राहुल। कांग्रेस लोकसभा चुनाव के बाद के उपचुनावों में लगातार हार रही। सो हताशा में राहुल अंट-शंट बयान दे रहे। बीजेपी ने राहुल को अपरिपक्व और उद्दंड तक करार दे दिया। पर सिर्फ बीजेपी नहीं, जिस संघ को राहुल ने सिमी जैसा बताया। उसके प्रवक्ता राम माधव ने भाषाई मर्यादा को लांघ पलटवार किया। राम माधव बोले- राहुल को राजनीति की लंबी पारी खेलनी। सो सिर्फ इटली-कोलंबिया को समझने से काम नहीं चलेगा। भारतीय समाज को भी समझना पड़ेगा। बयानबाजी से पहले इतिहास पढ़ लेना चाहिए और समाज में रचे-बसे संघ और उसके क्रियाकलापों को भी समझ लेना चाहिए। पर बीजेपी-संघ ने कड़ा जवाब दिया। तो कांग्रेस तिलमिला गई। राहुल को नसीहत देने की हिम्मत किसी कांग्रेसी में नहीं। सो किसी का नाम लिए बिना जनार्दन द्विवेदी बोले- किसी व्यक्ति के बारे में टिप्पणी नहीं, पर सभी राजनीतिक संगठनों को अपने विरोधियों के प्रति भाषा में सभ्यता का ख्याल रखना चाहिए। पर अपने राजनीतिबाजों को आखिर क्या हो गया? क्या राजनीतिक चक्की के आटे में सद्भावना, शिष्टाचार या मर्यादा नहीं पाई जाती? किसी को आरएसएस-सिमी में फर्क नजर नहीं आता। तो मुलायम को अपना वोट बैंक दिख रहा। विहिप को मंदिर के लिए पूरी पंचकोसी चाहिए। तो अयोध्या मामले को निजी विवाद बता कपिल सिब्बल सरकार को बीच में न पडऩे की सलाह दे रहे। पर कोई पूछे, गर अयोध्या विवाद निजी, तो क्या शाहबानो प्रकरण सरकारी था? जिसके लिए संसद ने कानून बना सुप्रीम कोर्ट का फैसला पलट दिया। क्या यही राजनीति की मर्यादा?
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06/10/2010