Thursday, December 23, 2010

तिवारी ही नहीं, समूची व्यवस्था का डीएनए हो!

तो शुक्रवार को सीबीआई भ्रष्टाचार के राजा की खैर-खबर लेगी। सो गुरुवार को ही कांग्रेस के संकटमोचक प्रणव दा गरजे। संसद का समूचा सत्र ठप करने के लिए देश से माफी मांगे विपक्ष। प्रणव दा स्पेक्ट्रम घोटाले पर बहस के लिए पहले ही विशेष सत्र की पेशकश कर चुके। पर विपक्ष ने टका सा जवाब दे दिया। अब बहस नहीं, जांच और कार्रवाई चाहिए। सो पक्ष-विपक्ष का यह वाचाल तंत्र कहां थमेगा, मालूम नहीं। पर यूपीए सरकार की पोल सहयोगी ही खोल रहे। अब अगर राजा की गिरफ्तारी हुई, तो कांग्रेस-डीएमके दोराहे पर खड़ी होंगी। पर तलवार सिर्फ कांग्रेस-डीएमके के रिश्ते पर ही नहीं, अब तृणमूल कांग्रेस ने भी मोर्चा खोल दिया। बंगाल में केंद्रीय बल के दुरुपयोग से खफा ममता बनर्जी तो नाता तोडऩे की धमकी दे ही चुकीं। गुरुवार को ममतावादी सुदीप बंदोपाध्याय ने कांग्रेस की कलई खोली। बोले- हम सबसे बड़े घटक, पर सरकार हमसे कोई सलाह-मशविरा नहीं करती। हमें मीडिया के जरिए खबरें मिलतीं। कोई न्यूनतम साझा कार्यक्रम नहीं। भले कांग्रेस और तृणमूल के बीच बंगाल चुनाव में सीट बंटवारे को लेकर एक-दूसरे पर दबाव की रणनीति चल रही हो। पर इसमें भी कोई शक-शुबहा नहीं, मौजूदा परिस्थितियों में यूपीए के घटक दल कांग्रेस के रवैये से असहज हो रहे। चुनावी राज्य तमिलनाडु, बंगाल में घटक दल कांग्रेस की कारगुजारियों का नफा-नुकसान तोलने में जुटे हुए। ममता को खास तौर से डर सता रहा, महंगाई और भ्रष्टाचार पर कांग्रेस की रणनीति से बंगाल में रायटर्स बिल्डिंग का सपना अधूरा न रह जाए। सो तृणमूल ने संसद सत्र के वक्त भी जेपीसी की पैरवी की थी। पर कांग्रेस अपनी जिद पकड़े बैठी। सो तृणमूल ने सहयोगी दलों को न पूछने का आरोप लगाना शुरू कर दिया। अब जब गठबंधन ही इतना असहज हो रहा। कांग्रेस अपने घटक दलों की भी नहीं सुन रही। तो सोचिए, जनता की बात क्या खाक सुनेगी? यों सवाल तृणमूल से भी- जब कांग्रेस मान नहीं दे रही, तो अपमान के साथ सत्ता में क्यों बैठी हुई? अब तृणमूल चाहे जो कहे, पर सत्ता की मलाई तो काट ही रही। कांग्रेस की धौंस की राजनीति का शिकार किसी को होना पड़ रहा, तो वह आम आदमी। प्याज की ‘लाली’ ने अब टमाटर को और ‘लाल’ कर दिया। कांग्रेस के एतिहासिक महाधिवेशन की शुरुआत और अंत ने आम आदमी की जेब पर डाका डाला। दूध के बाद प्याज की कीमत रातों-रात इतिहास बनाने निकल पड़ी। तो पहली बार महंगाई से कांग्रेस की आंखों में आंसू आ गए। शायद इसे प्याज की बादशाहत ही कहेंगे, जिसने 24 घंटे के भीतर राहुल गांधी से लेकर पीएम तक को हिला दिया। प्याज दिल्ली में बीजेपी की सरकार को खून के आंसू रुला चुकी। सो कांग्रेस ने ताबड़तोड़ कदम उठाए। तो प्याज की कीमतों में सीधे 30 फीसदी की गिरावट दर्ज हो गई। निर्यात पर रोक, आयात पर सब्सिडी जैसे सरकारी उपायों से जल्द और गिरावट के आसार। सो आप खुद देख लो, अगर कोई भी सरकार नेक नीयत से काम करे। तो आम आदमी लुटा-पिटा या ठगा महसूस नहीं करेगा। पर असल में हुआ क्या। जब प्याज ने आम आदमी को रुलाना शुरू किया, तो कृषि/क्रिकेट मंत्री शरद पवार ने हमेशा की तरह कालाबाजारियों को इशारा कर दिया। अपने शरद पवार जब भी मुंह खोलते, आम आदमी के खिलाफ ही बोलते। चाहे चीनी की कीमत हो या दूध की, जब-जब पवार बोले, कीमतों ने जबर्दस्त छलांग लगाई। अबके पवार ने फौरन कह दिया- तीन हफ्ते तक प्याज की कीमत नीचे नहीं आने वाली। पर पीएमओ हरकत में आया। तो हफ्तों की बात कौन करे, चौबीस घंटे के भीतर कीमतें उलटी दिशा में लौटने लगीं। पर मनमोहन सरकार के बड़बोले मंत्री सिर्फ पवार ही नहीं। पवार के महकमे में जूनियर मंत्री के.वी. थॉमस ने खीझते हुए कहा- मैं कोई जादूगर नहीं, जो बताऊं, कीमत कब कम होंगी। पर गुरुवार शाम होते-होते कृषि सचिव का बयान आ गया। एक हफ्ते में कीमतें नीचे आ जाएंगी। फिर कृषि मंत्रालय के अधीन संस्था नैफेड ने दो-तीन दिन में कीमत कम होने का दावा किया। सो अब आप खुद ही देख लो, एक ही महकमे के चार लोग यानी कृषि मंत्री, कृषि राज्यमंत्री, कृषि सचिव और नैफेड के अधिकारी बोले, पर चारों के अलग-अलग बोल। पर सबसे पते की बात तो दिल्ली की सीएम शीला आंटी ने की। प्याज के दाम से बेदम शीला मीडिया पर भडक़ते हुए बोलीं- कहां बढ़ रहे हैं दाम, आप लोग बढ़ा रहे हो दाम। अब अपनी इस व्यवस्था को क्या कहेंगे आप? अगर भ्रष्टाचार के वार से चोटिल मनमोहन ने प्याज पर दखल न दिया होता। तो प्याज की कीमत में हुई थोड़ी गिरावट भी नहीं होती। सो गुरुवार को ही जब दिल्ली हाईकोर्ट ने कांग्रेस नेता नारायण दत्त तिवारी को डीएनए टेस्ट कराने का आदेश दिया। तो फैसला देख यही लगा- भले देर हो, पर अंधेर नहीं। रोहित शेखर नाम के शख्स ने तिवारी को अपना जैविक पिता बताया। पर तिवारी मानने को राजी नहीं। सो हाईकोर्ट ने कहा- तिवारी संविधान से ऊपर नहीं। नाजायज औलाद को समाज में कैसा दंश झेलना पड़ता, सबको मालूम। संविधान के तहत रोहित को इस बात का हक कि वह अपने जैविक पिता की खोज करे। इसमें निजता की कोई बात ही नहीं। अब भले रोहित शेखर के हित में एन.डी. तिवारी का डीएनए हो जाए। पर सवाल, देशहित में अपनी समूची व्यवस्था का डीएनए क्यों न हो? भ्रष्टाचार और महंगाई चरम पर। फिर भी प्याज ने यह साफ कर दिया। अगर सरकार सही सोच व ईमानदारी से काम करे, तो क्या नहीं हो सकता।
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23/12/2010

Wednesday, December 22, 2010

तो भ्रष्टाचार पर राजनीति की अपनी-अपनी रणनीति

अब तो प्याज महंगा हो गया। शरद पवार ने जैसे ही मुंह खोला, प्याज रुलाने लगी। कांग्रेस की हालत खराब हो गई। महाधिवेशन जिस दिन शुरू हुआ था, उस दिन दूध की कीमत बढ़ी थीं। अब खत्म हो गया, तो प्याज दम निकाल रहा। सो अपने राहुल गांधी ने पवार-तवार को छोड़ सीधे पीएम पर जिम्मेदारी डाल दी। लाग-लपेट के बिना कह दिया- पीएम इस समस्या का समाधान ढूंढ लेंगे। अब सरकार प्याज बेचे या तेल, जनता तो कड़ाही में प्याजी की तरह भुन रही। सो महंगी प्याज के मारे राजनीतिक दल भ्रष्टाचार पर फिलहाल सिर्फ जूते बरसा रहे। कांग्रेस ने तीन दिन के महाधिवेशन में बीजेपी के भ्रष्टाचार पर जूते बरसाए। तो संसद के बाद बुधवार से विपक्ष ने सडक़ों पर यही काम शुरू कर दिया। पर बीजेपी-कांग्रेस के बीच शुरू भ्रष्टाचार के महासंग्राम से पहले बात अपने राजस्थान में मचे उपद्रव की। गहलोत सरकार को हाईकोर्ट से राहत नहीं मिली। कोर्ट ने गुर्जरों के पांच फीसदी आरक्षण पर साल भर की रोक लगा दी। नए सिरे से सर्वे कराने के निर्देश दिए। अब सरकार के पास सुप्रीम कोर्ट जाने का विकल्प। पर गुर्जर समाज ने हाईकोर्ट में समुचित पक्ष नहीं रखने का आरोप सरकार के सिर मढ़ दिया। बाकायदा आंदोलन को और तेज करने का एलान हो गया। सो अब साल 2010 के बाकी बचे नौ दिन में क्या-क्या होगा। क्या देश आंदोलन की आग में झुलस कर ठहर जाएगा। या फिर जल्द किसी समाधान की उम्मीद? सचमुच 2007 से ऐसा कोई साल नहीं बचा, जब राजस्थान गुर्जर आंदोलन की आग में न झुलसा हो। साल 2010 में उम्मीद नहीं थी। पर जाते-जाते उम्मीद पर पानी फिर गया। सो सडक़ से संसद तक साल 2010 ने सिर्फ संकट पैदा किया। लालकृष्ण आडवाणी ने तो बुधवार को एलान भी कर दिया- साल 2010 घोटालों का वर्ष रहा। पर उन ने पीएम को फार्मूला भी सुझाया- अगर जेपीसी मान लो, तो घोटालों का वर्ष नहीं कहेंगे। यों एनडीए की महासंग्राम रैली के दोनों तरफ साल के दस घोटाले बैनर-पोस्टर चस्पा थे। बीजेपी ने तो बाकायदा घोटालों का वर्ष 2010 नाम से पुस्तिका भी जारी कर दी। जिसमें चालू वर्ष के दस घोटाले गिनाए। जरा आप भी देख लें। टू-जी स्पेक्ट्रम, कॉमनवेल्थ, आदर्श सोसायटी, सड़ा अनाज, मुद्रास्फीति, चावल आयात, जनवितरण प्रणाली, सीवीसी की नियुक्ति, आईपीएल, एलआईसी हाउसिंग लोन और सत्यम घोटाला। सो बीजेपी ने अब कहना शुरू कर दिया- कांग्रेस का हाथ घोटालों के साथ। एनडीए की रैली में अरुण जेतली महफिल लूट ले गए। उन ने पीएम को चुनौती दी- अगर सच छुपाना नहीं चाहते, तो जेपीसी का सामना करें। वरना कुर्सी छोड़ दें। यानी विपक्ष ने अब राजा-राडिया को छोड़ सारा फोकस पीएम पर कर दिया। आडवाणी ने तो एलान कर दिया- अब विपक्ष के इस अभियान में मनमोहन ही हमारे निशाने पर होंगे। रैली में आडवाणी का दर्द भी उभर आया, जब उन ने 2009 के लोकसभा चुनाव की याद ताजा की। बोले- जब 2009 में मैंने कहा था, मनमोहन कमजोर पीएम। तो मेरे साथियों ने एतराज जता ईमानदार बताया था। पर आज साबित हो रहा, पीएम का पद कमजोर नहीं, अलबत्ता उस पद पर बैठा व्यक्ति कमजोर। जो हर अहम फैसले के लिए दस जनपथ की ओर निगाह जमाए बैठता। आडवाणी ने लगे हाथ पीएम को सलाह भी दी- पीएम पद की शक्तियों को इस्तेमाल कर जेपीसी बनाएं। अकाली रतन सिंह अजनाला ने तो यहां तक कह दिया- मनमोहन सिंह ऐसे पीएम, जिनकी कुर्सी के नीचे सारे लुटेरे बैठे हुए। यानी पीएसी के सामने सफाई देने की पेशकश कर मनमोहन ने विपक्ष को घेरने का मौका दे दिया। यों मुरली मनोहर जोशी की रहनुमाई वाली पीएसी 27 दिसंबर को तय करेगी, पीएम को बुलाना है या नहीं। पर कांग्रेस की नजर में पीएम का पीएसी वाला दांव एक साहसिक कदम। दिग्विजय सिंह तो सोमवार को ही इसे मास्टर स्ट्रोक बता चुके। सो बुधवार को जब एनडीए ने महासंग्राम के मंच से सीधा पीएम के खिलाफ बिगुल फूंका। तो कांग्रेस प्रवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने आरोप का जवाब देने के बजाए पलटवार किया। बोले- बीजेपी यानी बंगारू-जूदेव पार्टी को भ्रष्टाचार विरोधी रैली का नैतिक हक नहीं। जिस पार्टी ने भ्रष्टाचार में मील के पत्थर बनाए, जिस पार्टी का अध्यक्ष रिश्वत लेते पकड़ा गया, वह पार्टी भला क्या बात करेगी। यानी राजनीति में भ्रष्टाचार की फिर वही कहानी। भ्रष्टाचार के हमाम में सभी राजनीतिक दल एक जैसे। सो खुद को देखने के बजाए दोनों पक्ष एक-दूसरे को नंगा बता मखौल उड़ा रहे। बीजेपी की रणनीति, अगर राजा जेल गए, तो मुद्दा ठंडा पड़ जाएगा। सो सीधे पीएम को निशाना बनाओ। ताकि बजट सत्र तक मुद्दा जिंदा रखा जा सके। पर कांग्रेस की रणनीति कुछ अलग। भले देखने में कांग्रेस के बयान हताशा भरे लग रहे हों। पर रणनीतिकारों की मानें, तो पलटवार की मजबूत वजह। पिछले लोकसभा चुनाव में तमाम अटकलों को विराम देते हुए कांग्रेस ने 206 सीटें हासिल कीं। तो जीत के पीछे नरेगा जैसी महत्वाकांक्षी सामाजिक योजना अहम फैक्टर रहीं। सो अब कांग्रेस का मानना यही- नरेगा, सूचना का हक, शिक्षा का हक और अब भोजन का हक देने की तैयारी। सो सामाजिक योजनाओं से जमीनी स्तर पर कांग्रेस मजबूत हुई और होगी। इसलिए विपक्ष के आरोपों का मुंहतोड़ जवाब देते हुए उन योजनाओं पर ही फोकस किया जाए। यानी भ्रष्टाचार पर कांग्रेस की आक्रामकता योजनाबद्ध रणनीति का हिस्सा। तो बीजेपी को बोफोर्स दोहराने की उम्मीद।
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22/12/2010

Tuesday, December 21, 2010

अब तो जवाब मांग रहा देश, यह कैसा आंदोलन?

गुर्जर आंदोलन की आग में राजस्थान फिर झुलस उठा। पिछले चार साल में चौथी बार ऐसा आंदोलन हो रहा। हर बार की तरह अबके भी आंदोलन देश का चौथा निकाल रहा। पांच फीसदी आरक्षण का मसला हाईकोर्ट में लंबित। पर आंदोलन के कर्ता-धर्ताओं ने एलान कर दिया- अब पांच फीसदी लेकर ही उठेंगे। तो क्या एक बार फिर देश आंदोलन की आग में झुलसकर अपाहिज बनेगा? आखिर आंदोलन का क्या मकसद? माना, सरकार के बहरे कान बिना शोर-शराबे या हिंसा के नहीं सुनते। पर अपने फायदे के लिए समूचे देश को ठहरा देना कहां तक न्यायसंगत? वसुंधरा सरकार के वक्त 2007 में 29 मई से दो जून तक हिंसक आंदोलन हुए। फिर जून 2008 में 27 दिन तक आंदोलन हुए। तो वसुंधरा सरकार ने पांच फीसदी आरक्षण के साथ-साथ सवर्णों को 14 फीसदी आरक्षण का भी पासा फेंक दिया। पर चुनाव बाद सत्ता बदली। तो गुर्जर आरक्षण का मसला अशोक गहलोत सरकार के गले की हड्डी बन गई। तबके गवर्नर एस.के. सिंह आरक्षण के मुखर विरोधी थे। सो उन ने बीजेपी राज में विधानसभा से पारित प्रस्ताव में फच्चर फंसा दिया। तो बीजेपी को सियासत का मौका मिल गया। वसुंधरा राज में खुद को किसी दल से बाहर का बताने वाले कर्नल किरोड़ी सिंह बैंसला गहलोत सरकार के आते-आते भगवा रंग में रंग चुके थे। बाकायदा बीजेपी के टिकट से कांग्रेसी नमोनारायण मीणा के खिलाफ टोंक-सवाई माधोपुर सीट से चुनावी मैदान में कूदे। पर कांटे की टक्कर में मीणा बच गए, बैंसला को कांटा चुभ गया। सो जब जुलाई 2009 में बीजेपी के समर्थन से बैंसला ने झंडा उठाया। कांग्रेस सरकार पर आठ महीने तक फाइल दबाने का आरोप लगा आंदोलन का एलान किया। तो सरकार के हाथ-पांव फूल गए। विधानसभा में तब जो हुल्लड़ मचा, दोहराने की जरूरत नहीं। बीजेपी के एमएलए ने टेबल पर चढ़ माइक फेंके, कागज लहराए। पर खुद गुर्जर आंदोलन का दंश झेल चुकी बीजेपी का तब और अब शह देने का क्या मकसद? क्या विपक्ष में आ जाने से राजनीतिक जिम्मेदारी का मकसद बदल जाता? ऐसे आंदोलनों के वक्त राजनीतिक एका की जरूरत, ताकि कोई हिंसक घटना न हो। पर लाशों की राजनीति नेताओं के बायोडाटा का हिस्सा बन चुकी। अब चाहे कांग्रेस राज में पिछली बार कोई हिंसक वारदात नहीं हुई। अलबत्ता दिल्ली के दखल से गवर्नर-सीएम ने बीजेपी राज के प्रस्ताव को ही मान लिया। तब चीफ मिनिस्टर ने आंदोलन थामने का क्रेडिट लेते हुए दलील दी थी- आठ महीने का वक्त कानूनविदों की राय लेने में लग गया। हम चाहते थे कि भविष्य में कोई कानूनी अड़चन न आए। पर जैसे गुर्जर आंदोलन में बीजेपी दोषी, वैसी ही कांग्रेस भी। अब कोई पूछे, जब आठ महीने कानूनविदों की राय लेने में बिता दिए। तो अब फिर मामला कोर्ट में क्यों पेंडिंग? यानी वोट बैंक की राजनीति में ईमानदार कोई नहीं। सो अबके कर्नल बैंसला ने एलान किया- चाहे सीएम आ जाएं या मध्यस्थ विश्वेंद्र सिंह या कोई तीस मार खां। जब तक पांच फीसदी आरक्षण नहीं मिलता, नहीं उठेंगे। पर सवाल हुआ- कोर्ट के आगे सरकार के हाथ बंधे हुए। तो बैंसला की दलील- सरकारी भरती की प्रक्रिया कोर्ट के फैसले तक रोक दो। क्या लोकतंत्र में निजी हित के लिए समाज के बाकी तबकों का हित दबाना उचित? रेल की पटरियां उखाडऩे और राजमार्ग को ठप करने से किसका नुकसान होगा? क्या किसी नेता की यात्रा रुक रही या काफिला ठहर रहा? आखिर में नुकसान तो आम नागरिकों को हो रहा। लोग स्टेशनों पर ठंड में ठिठुर रहे। जीवन अस्तव्यस्त हो रहा। सो आंदोलन के रहनुमाओं को जवाब देना होगा, यह कैसा आंदोलन? यह कैसी जिद, जो दूसरों की आजादी में खलल डाले? हर बार आंदोलन से सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचाया जाता। फिर उसी सरकार से अपने हित की मांग क्यों? सत्रहवीं शताब्दी में इंग्लैंड के सिविल वार में आंदोलन शब्द का विशेष प्रचलन हुआ। तब क्राम वेल की सेना के हर रेजीमेंट में प्रतिनिधि निर्वाचित किए गए। हर प्रतिनिधि को आंदोलनकर्ता कहा गया। फिर फ्रांसीसी क्रांति के वक्त आंदोलनकर्ता उन्हें कहा गया, जिन ने दंगा-फसाद कराने की कोशिश की। बाद में इंग्लैंड में इसी शब्द का इस्तेमाल शांतिपूर्ण आंदोलन के लिए हुआ। जिसका मकसद लोकमत से संसद को इस बात के लिए प्रेरित करना था कि वह कानून में सुधार करे। वामपंथियों ने आंदोलन का मतलब उग्र बना दिया। पर अपने देश में जनआंदोलन का श्रेय राष्ट्रपिता महात्मा गांधी को। उन ने शांति, प्रेम और अहिंसा से अंग्रेजों को मजबूर कर दिया। पर उग्र आंदोलन की शुरुआत 1948 में कम्युनिस्टों ने की। जब कलकत्ता थीसिस घोषित किया गया। आजादी को अधूरी बता कम्युनिस्टों ने बल प्रयोग से उलटने का एलान किया। रक्तरंजित क्रांति शुरू कर दी। ट्रेन-बैंक लूटे गए। देश में कड़ा विरोध हुआ। तो केंद्र-राज्य ने मिलकर हिंसा को कुचल दिया। बाद में देश में कई ऐसे आंदोलन हुए। पर अब वोट बैंक की राजनीति ने आंदोलनों को हवा देनी शुरू कर दी। सो अब जवाब आंदोलनकारियों को देना होगा, वह किस प्रकार का आंदोलन कर रहे? हिंसक आंदोलन का दर्द उस परिवार से पूछिए, जिनके घरों के चिराग बुझ गए। सो अपनी अपील, सर्वजन के हित में गुर्जर समाज खुद अमन-चैन का बीड़ा उठाए। अगर सरकार के बहरे कान तक आवाज पहुंचानी। तो रेल की पटरी उखाड़ आम जनता को नुकसान न पहुंचाएं। अलबत्ता महात्मा गांधी की तरह अहिंसा का मार्ग अपनाएं।
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21/12/2010

Monday, December 20, 2010

जनता की छोड़ो, आओ भ्रष्टाचार-भ्रष्टाचार खेलें

कांग्रेस की तीन दिनी महाकथा का समापन हो गया। अब इसे महाधिवेशन कहिए या कार्नीवल। कांग्रेस की यही खूबी, जो भी हो, डंके की चोट पर करती। चाहे वह पाप हो या पुण्य का काम। सो भ्रष्टाचार के साये में कांग्रेस ने मंथन तो किया। पर बीजेपी को खरी-खरी सुना ही कर्तव्य की इतिश्री कर ली। अब कोई विपक्षी दल ऐसा मंथन करे, तो सत्ता से दूरी का दर्द समझा जा सकता। पर जब सत्ता में बैठी कांग्रेस ऐसा कर रही, तो भ्रष्टाचार का भला क्या बिगड़ेगा? बीजेपी ने अगर पाप किया, या कर रही। तो आज वही गठरी सिर पर ढोने को मजबूर। पर कांग्रेस उस पाप से अपना पाप नहीं छुपा सकती। कर्नाटक पर भले बीजेपी दोहरापन दिखा रही। पर क्या विपक्ष के रवैये से देश में कांग्रेस को लूट का लाइसेंस मिल गया? कांग्रेस को स्पेक्ट्रम, आदर्श और कॉमनवेल्थ घोटाले पर जवाब देना था। पर कांग्रेस ने शायद इन घोटालों की मजबूत जड़ें देख लीं। सो अब जब कांग्रेस को कोई सुगम राह नहीं दिख रही। तो आक्रमण ही बेहतर बचाव का मंत्र अपना लिया। संसद का सत्र लोकतंत्र में काला इतिहास बना गया। तो अब कांग्रेसी जेपीसी को ही कमतर बताने में जुट गए। सोनिया-राहुल-पीएम और गाल बजाने वाले दिग्विजय ने एक सुर में पीएसी को बेहतर बताया। मंगलवार को मनमोहन ने तुरुप का पत्ता फेंका। बीजेपी नेता मुरली मनोहर जोशी की रहनुमाई वाली पीएसी के सामने पेश होने का ऑफर कर दिया। बोले- सीएजी रपट के बाद मंत्री को हटाया। सीबीआई, ईडी, सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जज से जांच, सुप्रीम कोर्ट की मॉनीटरिंग और पीएसी की जांच चल रही। पीएसी के पास वह सारी शक्तियां, जो जेपीसी को दी जा सकतीं। सो जेपीसी का कोई मतलब नहीं। पर बीजेपी ने संसद ठप किया, जबकि मेरे पास छुपाने को कुछ नहीं। अब कोई पूछे- छुपाने को कुछ नहीं, तो जेपीसी क्यों नहीं? जब आप आधा दर्जन एजेंसियों से जांच कराने को राजी। तो जेपीसी से भागने का कुछ तो मतलब होगा। बीजेपी के अरुण जेतली ने तो फौरन सवाल उठाया- चुप्पी तोडऩे के लिए पीएम का स्वागत। पर शासनकर्ता जांच के लिए खुद मंच का चयन नहीं कर सकता। अगर पीएम गलत नहीं, तो सीमित अधिकार वाली पीएसी से जांच पर जोर क्यों दे रहे? उन ने आरोप मढ़ा- पीएम देश से बहुत सी बातें छुपा रहे। मसलन, तीन साल तक मनमोहन चुप क्यों रहे? कैग रपट से पहले तक राजा का बचाव क्यों करते रहे? सीवीसी पद पर दागी थॉमस के लिए वीटों क्यों किया? सिर्फ जेतली नहीं, वामपंथी सीताराम येचुरी ने भी पीएम को अपने दिन याद कराए। येचुरी बोले- एनडीए काल में मनमोहन ने जेपीसी के लिए तीन हफ्ते तक संसद का बॉयकाट किया था। सो दोहरे मापदंड न अपनाएं। यानी भ्रष्टाचार अब विशुद्ध रूप से राजनीति के मैदान का फुटबाल बन गया। तू चोर, तो मैं भी चोर की लड़ाई शुरू हो गई। विपक्ष ने संसद के बाद सडक़ पर बिगुल फूंका। तो कांग्रेस महाधिवेशन से सोनिया ने भी हुंकार भरी। जैसे विपक्ष मैदान में, वैसे हम भी कूदेंगे। बाकायदा विपक्ष की रैलियों के जवाब में विधानसभा वार रैली का एलान कर दिया। सोनिया ने अपने समापन भाषण में दो-टूक कहा- हमारा रिकार्ड एनडीए से बेहतर। पी. चिदंबरम ने तो भविष्यवाणी कर दी- अगले एक दशक तक बीजेपी सत्ता में नहीं आने वाली। उन ने विपक्ष को बतलाया, हम शासन करना जानते हैं। ऐसा ही गुरूर कांग्रेस ने बोफोर्स के वक्त भी दिखलाया था। अबके तो 206 सांसद को ही तीन चौथाई बहुमत मानकर फूल रही। पर सवाल- एनडीए से तुलना करना ही शासन? या कांग्रेस सिर्फ शासन करना ही जानती, सुशासन देना नहीं? आखिर यह कैसा मंथन, जब भ्रष्टाचार अपने चरम पर। तो कांग्रेस अपना दामन साफ दिखाने के बजाए बीजेपी के दामन में झांक रही। आतंकवाद के मुद्दे पर तो सख्त कार्रवाई के बजाए मजहबी चासनी लगाई जा रही। अयोध्या फैसले और बिहार की हार के बाद कांग्रेस की तय रणनीति के तहत दिग्विजय सिंह ने मुस्लिम वोट के ध्रुवीकरण की कमान थाम ली। सो अब बीजेपी भी मान रही, दिग्विजय का यह हथकंडा कांग्रेस-बीजेपी दोनों के लिए फायदेमंद। यानी वोट बैंक का चश्मा पहन दोनों खेल रहे। पर महाधिवेशन से आम आदमी को क्या मिला? पीएम ने महंगाई की बात की। तो इस बात की खुशी जताई कि महंगाई दर कम हो रही और मार्च तक साढ़े पांच फीसदी पर ले आएंगे। पर मंगलवार को ही एक खबर सुनने को मिली- चंडीगढ़ में एक व्यक्ति को जब प्याज की कीमत 65 रुपए बताई गई। तो हार्ट अटैक हो गया। मनमोहन राज में महंगाई दर भले ऊपर-नीचे होती रही। पर महंगाई हमेशा बढ़ती रही। चिदंबरम ने एनडीए का मखौल उड़ाया। विकास दर की ढपली बजाई। पर देश की जनता देख रही, किसका कितना विकास हुआ। भ्रष्टाचार के आरोपों को महाधिवेशन के मंच से निराधार बताया गया। तो सवाल- किस आधार पर राजा का इस्तीफा लिया? सीबीआई, ईडी, पाटिल कमेटी, शुंगलू कमेटी, सुप्रीम कोर्ट की मॉनीटरिंग, इनकम टेक्स और सीएजी क्या लकीर पीट रहीं? यानी कुल मिलाकर कांग्रेस महाधिवेशन में भ्रष्टाचार पर भजन तो हुआ। पर भ्रष्टाचार या भ्रष्टाचारियों के खिलाफ कार्रवाई से अधिक बीजेपी को कोसा। भ्रष्टाचार का पर्दाफाश तो नहीं, पर विपक्ष के आरोपों का पर्दाफाश करने का खम ठोक दिया। अब विपक्ष और कांग्रेस दोनों जनजागरण अभियान चलाएंगी। कोई भी भ्रष्टाचार पर उदाहरण पेश करने को तैयार नहीं। अलबत्ता भ्रष्टाचार-भ्रष्टाचार खेल रहीं। ताकि जनता इसी उधेड़बुन में उलझ जाए कि भ्रष्टाचार के इस खेल में कौन सांपनाथ, कौन नागनाथ।
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20/12/2010

Sunday, December 19, 2010

महाधिवेशन में मंथन वोट बैंक का, मुद्दों का नहीं

तो कांग्रेसी महाचौपाल का पहला दिन निपट गया। राजधानी के बुराड़ी में तंबुओं का शहर बसाया। देश भर से करीब 15 हजार डेलीगेट्स पहुंचे। पर भ्रष्टाचार, आतंकवाद जैसी चुनौतियां महज राजनीतिक हथकंडा बनकर रह गईं। सोनिया गांधी ने संसद सत्र के आखिरी दिन विपक्ष को ललकारा था। तो भ्रष्टाचार के मामले में शशि थरूर समेत कांग्रेसी नेताओं पर हुई कार्रवाई का जिक्र किया। सो खफा थरूर ने सोनिया को चिट्ठी लिख दी- भ्रष्टाचारियों की सूची में मेरा नाम न गिनाएं। अब थरूर की चिट्ठी या कोई और बात, सोनिया ने महाधिवेशन में किसी का नाम नहीं लिया। पर भ्रष्टाचार के खिलाफ जितना गरजीं, उससे अधिक बीजेपी पर भडक़ीं। भ्रष्टाचार के लगातार खुलासों ने कांग्रेस को सचमुच शरशैय्या पर पहुंचा दिया। पर इतवार को सोनिया ने न सिर्फ कांग्रेस को उठाने की कोशिश की। अलबत्ता विपक्ष के खिलाफ आक्रामक तेवर अपना लिए। भ्रष्टाचार को बीमारी बता जड़ से खात्मे का इरादा जताया। कलमाड़ी, चव्हाण जैसों पर कार्रवाई का हवाला दे बीजेपी से पूछ लिया- क्या उसके पास ऐसा दावा करने की हिम्मत है? सोनिया ने न सिर्फ कर्नाटक, बीजेपी शासित राज्यों में भ्रष्टाचार के आरोप लगाए। संसद में जेपीसी की मांग पर हंगामे को बंधक बनाने की हरकत बताया। पर सत्ता में बैठे नुमाइंदों का मन कब मचल जाए, ठिकाना नहीं। सो सोनिया ने अपने सभी सीएम को सलाह दी- जमीन आवंटन के विशेषाधिकार की समीक्षा करिए। अब कौनसा सीएम अमल करेगा, यह बाद की बात। सार्वजनिक मंच से ऐसी जुबानी अपील बहुतेरे करते। पर संगठन चलाना खालाजी का घर नहीं। परदे के पीछे बहुत से ऐसे काम करने पड़ते, जो नैतिक मूल्यों की ऐसी-तैसी करते हों। अब अमल की ही बात, तो महाधिवेशन में सोनिया-राहुल ने कार्यकर्ताओं की शिकायत सामने रखी। मां-बेटे दोनों ने केबिनेट मंत्रियों-मुख्यमंत्रियों-मंत्रियों को नसीहत दी- थोड़ा वक्त वर्करों को भी दें। राहुल-सोनिया ने कबूला- लंबे समय से वर्करों की उपेक्षा की शिकायत पर सत्ता में बैठे नेता नहीं समझ रहे। सो सोनिया ने दो-टूक नसीहत दी- सत्ता सुख भोग रहे नेता जमीन पर पांव रख मैला नहीं होने देंगे। तो वह दिन दूर नहीं, जब उनके पांव जमीन पर रखने लायक ही नहीं रहेंगे। सोनिया ने बात तो वर्करों के दिल की कही। पर पीएम की जमकर तारीफ की। अब पीएम अच्छे और बाकी मंत्री नासमझ, तो यह फार्मूला अपनी समझ से परे। यों सचमुच वर्करों की उपेक्षा का दर्द जानना हो, तो किसी बीजेपी नेता से पूछ लो। जब एनडीए राज था, तो वाजपेयी ने मंत्रियों को हफ्ते में एक बार पार्टी दफ्तर में बैठने की सलाह दी। पर वर्करों की अपेक्षा का कोलाहल सुन फाइव स्टार कल्चर मंत्रियों के कान बहरे हो गए। फिर नतीजा क्या हुआ, दोहराने की जरूरत नहीं। सो सोनिया-राहुल ने साफ संदेश दिया- अगर मंत्रालयों में बैठ मौज कर रहे, तो उसके पीछे वर्कर का हाथ। पर अमल कितना होगा, खुद कांग्रेस को भी मालूम नहीं। फिर भी सोनिया-राहुल की पुचकार से कांग्रेसी वर्कर तो फूल गए। सो विपक्ष के खिलाफ महाधिवेशन के मंच से सबने हुंकार भरी। सोनिया ने संयत भाषा में ही सही, पर निशाना संघ को बनाया। सांप्रदायिकता की परिभाषा बता, उन संस्थाओं पर कार्रवाई की बात की, जो धर्म की आड़ में लोगों को उकसा रहीं। पर बवाल न हो, तो उन ने जोड़ा- चाहे बहुसंख्यक का कट्टरपंथ हो या अल्पसंख्यक का, कांग्रेस फर्क नहीं करती। पर जब कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह ने कमान संभाली। तो उन ने साबित कर दिया, अब तक के सारे विवादास्पद बयानों में सोनिया-राहुल का वरदहस्त मिला होगा। वरना खुद को राष्ट्रवादी और समाज के सभी वर्गों का प्रतिनिधि कहने वाली कांग्रेस के इस मंच से दिग्विजय संघ को हिटलर की नाजी पार्टी न बताते। उन ने सीधा आरोप लगाया- जैसे हिटलर ने यहूदियों को निशाना बनाया, संघ मुसलमानों को बना रहा। क्या यह सांप्रदायिकता भरा बयान नहीं? अगर संघ सचमुच ऐसी गतिविधि में संलिप्त, तो सत्ता में बैठी कांग्रेस प्रतिबंध लगाने के बजाए गाल क्यों बजा रही। दिग्विजय ने कांग्रेसियों को संघ के खिलाफ डंडा उठाने की अपील की। तो क्या इसे संवैधानिक कहेंगे? यानी महाधिवेशन के पहले दिन कांग्रेस के मंच से वह सब हुआ, जिसे सोनिया मना कर रही थीं। उन ने सादगी और संयम की बात की। तो कुछ देर बाद ही बिहार कांग्रेस के वर्करों ने मुकुल वासनिक के खिलाफ मोर्चा खोल अफरा-तफरी मचा दी। सोनिया ने गठबंधन में एकता की बात की। तो दीपा दासमुंशी ने तृणमूल कांग्रेस पर हमला बोला। पर सवाल, कांग्रेस की इस पूरी कवायद का अहम एजंडा क्या? पहले दिन ही यह साफ हो गया, संकटों से घिरी कांग्रेस ध्रुवीकरण की दिशा में बढ़ चुकी। कांग्रेस एकमुश्त मुस्लिम वोट बैंक अपनी झोली में वापस लाना चाह रही। सो दिग्विजय की जुबान दस जनपथ की स्क्रिप्ट पढ़ रही। पर कोई पूछे, महाधिवेशन से जनता के लिए क्या संदेश? सोनिया ने महंगाई की बात की। तो संयोग देखिए, दिल्ली में दूध के दाम इतवार से ही बढ़ गए। महंगाई पर वही छह साल से चल रही दलील। न किसान की बात, न गरीब की, न आम आदमी की। राहुल गांधी ने अंतिम व्यक्ति तक पहुंचने की बात कही। पर आजादी के 63 साल में नहीं पहुंचे, तो कब पहुंचेंगे? कांग्रेस ने अपने 125 साल को सेवा और समर्पण से जोड़ा। पर इसमें से आजादी के पहले के 62 साल निकाल दो, तो 63 साल से कैसी सेवा हो रही देश की?
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19/12/2010

Friday, December 17, 2010

राहुल के विचार पर हाय-तौबा जैसा क्या?

 विकीलिक्स के खुलासों ने अब भारत में खलबली मचा दी। आतंकवाद पर राहुल गांधी की अमेरिकी राजदूत से बातचीत ने सियासत का पारा चढ़ा दिया। पर पहले बात सोनिया गांधी के बारे में अमेरिकी मानसिकता की। विकीलिक्स के खुलासे में अमेरिका की ओर से सोनिया को अक्षम नेता कहा गया। एटमी डील के वक्त विपक्ष को साधने में नाकाम बताया। कोई मौका न चूकने वाली नेता भी कहा। तब सरकार के सहयोगी रहे वामपंथी नेता प्रकाश कारत अमेरिकी नजर में बांह मरोडऩे वाले नेता। यानी अमेरिका के मन की बात हो, तो परवेज मुशर्रफ जैसे लोग भी अच्छे हो जाते। पर सोनिया ने 2007 में सरकार बचाए रखने को प्राथमिकता दी। तो अमेरिका अक्षम बता रहा। पर अमेरिका का दोहरापन कोई छुपी हुई बात नहीं। सो शुक्रवार को सोनिया से जुड़े खुलासे पर उतना शोर नहीं मचा, जितना राहुल बाबा को लेकर। विकीलिक्स के हवाले से अपनी मीडिया ने ज्ञान की ऐसी गंगा बहाई, बीजेपी ने राहुल को अज्ञानी करार दे दिया। खबर चली- 'राहुल ने हिंदू कट्टरपंथियों को देश के लिए बड़ा खतरा बताया।' सो बीजेपी और संघ परिवार ने राहुल को नासमझ कहा। बीजेपी के रविशंकर प्रसाद बोले- 'राहुल का बयान बहुत दुर्भाग्यपूर्ण और गैर जिम्मेदाराना। ये भारत के प्रति उनकी सोच का संकेत। राहुल के इस बयान से साफ हो गया कि वे भारतीय राजनीति के बारे में कितना कम जानते हैं।' बीजेपी का गुबार इतने से ही न निकला। रविशंकर बोले- 'राहुल ने एक ही झटके में लश्कर-ए-तोइबा और जमात-उद-दावा जैसे संगठनों और पाकिस्तान के दुष्प्रचार को सही ठहरा दिया। इससे आतंक के खिलाफ भारत की लड़ाई कमजोर होगी।' बीजेपी के बाद संघ के राम माधव ने मोर्चा संभाला। तो बोले- कांग्रेस नेताओं में आतंकवादियों का करीबी बनने की होड़ मची हुई है। इस बयान से राहुल की समझ उजागर हो गई। यानी विपक्षी बीजेपी ने राजनीतिक फायदे के लिए राहुल के बयान को भुनाने में कोई देरी नहीं की। सो जब कांग्रेस को लगा, बीजेपी राजनीतिक बढ़त ले रही। तो फौरन राहुल गांधी के हवाले से कांग्रेस का स्पष्टीकरण जारी हो गया। मामला सीधे राहुल से जुड़ा था। सो कांग्रेस प्रवक्ता मनीष तिवारी हों या महासचिव जनार्दन द्विवेदी, तीन लाइन के बयान से इतर कुछ नहीं बोले। अब जरा राहुल का स्पष्टीकरण देखिए। कहा गया- 'हर प्रकार का आतंकवाद और सांप्रदायिकता देश के लिए खतरा। ऐसी गतिविधियां करने वाला कौन, यह मायने नहीं रखता। पर हमें हर तरह के आतंकवाद के प्रति सतर्क रहना होगा।' कांग्रेस प्रवक्ता ने तो बीजेपी को अपने गिरेबां में झांकने की नसीहत दी। पर जब वोट बैंक की राजनीति करनी हो। तो बीजेपी हो या कांग्रेस, भला कौन अपने गिरेबां में झांकता। अब भले विकीलिक्स पर राहुल और अमेरिकी राजदूत के बीच लंच के दौरान हुई बातचीत से बवाल मच गया। पर जरा विकीलिक्स के खुलासे का पूरा ब्यौरा देख लें। दस्तावेज के मुताबिक जब राहुल गांधी और भारत में अमेरिकी राजदूत टिमोथी रोमर लंच पर बैठे। तो आतंकवाद पर चर्चा में राहुल ने उनसे कहा- 'भारत के कुछ मुस्लिम समुदायों में चरमपंथी गुट लश्कर-ए-तोइबा के समर्थन के सबूत हैं, लेकिन देश के लिए बड़ा खतरा कट्टरपंथी हिंदू गुटों का बढऩा है, जो मुस्लिम समुदाय के साथ धार्मिक तनाव और राजनीतिक टकराव पैदा करते हैं।' यानी राहुल के मुताबिक पाकिस्तान स्थित गुटों से होने वाले आतंकवादी हमलों पर कट्टरपंथी हिंदुओं की प्रतिक्रिया चिंता की बात। सचमुच अगर देश में इस तरह प्रतिक्रिया होने लगे, तो फिर देश के हालात क्या होंगे? माना, राहुल हों या कोई और, वोट बैंक की राजनीति या तुष्टिकरण में पीछे नहीं। सबका अपना-अपना स्वार्थ और वोट बैंक होता। राजनीति करने वाले वैसे भी दूध के धुले नहीं होते। राहुल गांधी अयोध्या फैसले के कुछ दिन बाद ही मध्य प्रदेश दौरे के वक्त संघ और सिमी को एक तराजू में तोल आए थे। पर सियासत के तमाम खुरपेच के बावजूद अगर राहुल और अमेरिकी राजदूत के बीच हुई बातचीत को गहराई से देखें। तो शायद यही कहेंगे, मचा शोर पहलू में बहुत, पर चीरा तो कतरा ए खूं न निकला। राहुल ने किसी जनसभा में यह टिप्पणी नहीं की। सो कम से कम इस बयान को वोट बैंक की राजनीति नहीं कह सकते। अलबत्ता यह राहुल की गंभीर चिंता को दर्शा रहा। सो किसी भी राष्ट्रभक्त नागरिक को सकारात्मक सोच दिखाने की जरूरत। अगर कथित इस्लामिक आतंकवाद के जवाब में कथित हिंदू आतंकवाद विकराल रूप धर ले। तो देश की तस्वीर क्या होगी? ऐसा भी नहीं कि मालेगांव और अजमेर जैसे ब्लास्ट में हिंदू कट्टरपंथियों की भूमिका नहीं। आम तौर पर किसी भी देश में अल्पसंख्यक खुद को थोड़ा असुरक्षित मानते। पर जब बहुसंख्यक आबादी के कुछ लोग बदले की आग भडक़ाएंगे। तो पाक और भारत में क्या फर्क रह जाएगा? पाक आज अपनी ही आग में कैसे झुलस रहा, जगजाहिर। अब राजनीति का सवाल, तो बीजेपी को भी अपना इतिहास याद रखना होगा। अगर राहुल का बयान आतंकवाद पर लड़ाई कमजोर करने वाला। तो फिर 28 जुलाई 2008 को दिया सुषमा स्वराज का बयान क्या था? जब 25-26 जुलाई 2008 को बेंगलुरु-अहमदाबाद में सीरियल बम ब्लास्ट हुए। तो सुषमा ने बम धमाके का आरोप सीधे केंद्र सरकार पर फोड़ दिया। दो बीजेपी शासित राज्यों में एक साथ हुए धमाकों को उन ने मनमोहन के विश्वास मत से जोड़ा था। यों बीजेपी ने बाद में बयान से दूरी बना ली। पर सुषमा ने अपना बयान वापस नहीं लिया। सुषमा ने तो बाकायदा बीजेपी के मंच से बयान दिया था। राहुल ने तो लंच भेंट में अनौपचारिक बातचीत की।
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17/12/2010

Thursday, December 16, 2010

अड़तालीस साल बाद भी चीन के सामने दब्बू क्यों?

चीन की चकल्लसबाजी असर दिखा गई। पिछले साल अक्टूबर में भारत-चीन रिश्तों में जबर्दस्त तल्खी आई। तीन अक्टूबर 2009 को पीएम मनमोहन अरुणाचल के चुनावी दौरे पर गए थे। तब दस दिन बाद यानी तेरह अक्टूबर को चीन ने मनमोहन के दौरे पर सवाल उठाया। अरुणाचल को विवादास्पद बता पीएम के दौरे पर एतराज जताया। तब भारत ने थोड़ी सख्ती दिखाई, चीनी राजदूत को तलब कर लिया था। फिर भी चीन ने अपना डरावना चेहरा दिखाना बंद नहीं किया। भारत पर मनोवैज्ञानिक दबाव बनाने की कोशिश में चीन ने पाक से खूब पींगें बढ़ाईं। पाक पीएम यूसुफ रजा गिलानी और चीनी राष्ट्रपति हू जिन्ताओ के बीच हुई मीटिंग में झेलम पनबिजली प्रोजैक्ट और काराकोरम मार्ग में सहयोग का वादा हो गया। तब जिन्ताओ ने बाकायदा बयान दिया था- भले वैश्विक परिस्थितियां बदल रहीं, पर पाक और चीन के लोग आपस में दिल से जुड़े हुए। यों चीन की ऐसी दिल्लगी कौन नहीं जानता। पंडित नेहरू के जमाने में चीन ने अपने साथ भी दिल्लगी की थी। सो चीन का पाक प्रेम सिर्फ भारत पर हौवा बनाने के लिए। चीनी फार्मूला, दुश्मन का दुश्मन अपना दोस्त। फिर वीजा डिप्लोमैसी का खेल किया। तो कभी अरुणाचल के लोगों को वीजा नहीं, तो कभी कश्मीर के बाशिंदों को स्टेपल्ड वीजा दिया। कश्मीर को भारत से अलग मान चीनी दूतावास लंबे समय से पासपोर्ट के बजाए कोरे कागज पर मुहर लगाता था। चीनी अतिक्रमण के किस्से तो पिछले साल इस कदर बढ़ गए थे कि कभी अरुणाचल तो कभी उत्तराखंड से खबरें आतीं। पर मनमोहन सरकार ने चुप्पी साध ली। यानी पिछले अक्टूबर से लेकर हाल तक चीन ने भारत पर दबाव बनाने के हर पेंतरे आजमाए। पर भारत ने आंखों पर गांधारी की तरह पट्टी बांध ली। सो चीनी प्रधानमंत्री का चार सौ के दल-बल के साथ भारत दौरा हुआ। तो अपनी तैयारी का नमूना देखिए। न स्टेपल्ड वीजा पर भरोसा मिला, न यूएन सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता का। न मुंबई हमले के लिए पाक की निंदा, न सीमा पर चीनी अतिक्रमण की बात। पर चीन की चालाकी देखिए, वेन जियाबाओ जिस मकसद से आए, उसे पूरा कर लिया। भारत का मध्य वर्गीय बाजार अमेरिका-चीन समेत औद्योगिक देशों के लिए हमेशा से आकर्षण का केंद्र। सो पहले ओबामा ने अपना काम किया। पर अमेरिका से भी भारत को रणनीतिक साझेदारी मिली। अमेरिका ने चीन की तरह भारत को पूरी तरह दबाव में नहीं रखा। पर चीनी पीएम वेन जियाबाओ और मनमोहन की वार्ता के बाद छह अहम बिंदुओं पर समझौते हुए। चीन सौ बिलियन डालर के व्यापार का खाका बना गया। पर बदले में भारत ने क्या हासिल किया? भारत-चीन के बीच व्यापार में असंतुलन किसी से छुपा नहीं। स्टेपल्ड वीजा तक के मुद्दे पर जियाबाओ ने टका सा जवाब दिया। खुद भरोसा देने के बजाए अधिकारियों पर टाल दिया। सो कुल मिलाकर चीन की साल भर की कोशिश सफल रही। पर अपनी सरकार की तैयारी ऐसी रही, हर मोर्चे पर डिफेंसिव दिखे। या यों कहें, सरेंडर कर दिया, तो अतिशयोक्ति नहीं। सचमुच मनमोहन सरकार आंतरिक मोर्चे में ही उलझी रह गई। भ्रष्टाचार के भंवर से निकलने की कोशिश में वेन जियाबाओ को वॉकओवर दे दिया। मनमोहन सरकार जेपीसी और सुप्रीम कोर्ट को सफाई देने की तैयारी में ही लगी रही। यों गुरुवार को थोड़ी राहत मिली, जब सुप्रीम कोर्ट ने स्पेक्ट्रम घोटाले की जांच की मॉनीटरिंग कबूल ली। अब विपक्ष की मजबूरी, सुप्रीम कोर्ट की विश्वसनीयता पर सवाल नहीं उठा सकता। सीबीआई, सीवीसी, पीएसी, एक सदस्यीय कमेटी से जांच को ठुकरा चुका। पर सुप्रीम कोर्ट ने निगरानी का बीड़ा उठाया। तो बीजेपी को स्वागत करना ही पड़ा। पर भ्रष्टाचार के मुद्दे से सरकार को घेरने की देशव्यापी रणनीति का एलान हो चुका। सो बीजेपी के राजीव प्रताप रूड़ी बोले- कोर्ट की पहल का स्वागत। पर यह जेपीसी का विकल्प नहीं। यानी अगर जांच की यही रफ्तार रही, तो बजट सत्र आते-आते जेपीसी मांग की हवा निकल चुकी होगी। पर बात चीन की, जिसने साबित कर दिया। बॉर्डर तो बहाना, असली लड़ाई बाजारवाद की। पिछले साल जब दोनों देशों में वार ऑफ वर्ड चरम पर था, तब 15 अक्टूबर को यही बात आपको बताई थी। पर सवाल, हम खुद को चीन से कमजोर मान मनौवैज्ञानिक हार क्यों कबूल रहे? दुनिया अब 1962 जैसी नहीं। भारत को 1962 की भूल से सबक लेकर अपनी बढ़ती ताकत का भरोसा होना चाहिए। जब आर्थिक महामंदी ने दुनिया को झकझोर दिया। तो सिर्फ भारत और चीन ही ऐसे दो देश, जिन ने मंदी को मात दी। सो चीन की कोशिश हमेशा यही होगी, भारत मजबूत ताकत बनकर न उभरे। इतिहास साक्षी, कैसे माओत्सेतुंग ने भारत को सबक सिखाने का एलान किया था। कैसे लाल झंडा बीजिंग से होकर काठमांडू, कलकत्ता और लंदन तक पहुंचाने का दंभ भरा था। यह नहीं भूलना चाहिए। चीन ने आज भी पीओके में 43,180 वर्ग किलोमीटर जमीन पर कब्जा जमा रखा। पर दबाव बनाने को भारत पर पूर्वोत्तर में 90,000 वर्ग किलोमीटर जमीन कब्जाने का दावा ठोक रहा। सो चीन से रिश्तों में सावधानी जरूरी, समर्पण नहीं। यों इस डर की जिम्मेदार भी कांग्रेस। अपने नटवर सिंह ने एक बार कहा था- अगर 1962 की हार का विश्लेषण किया होता, तो डरने की बात नहीं होती। पर तबके पीएम को बचाने के लिए तबके रक्षा मंत्री कृष्ण मेनन ने जिम्मेदारी ओढ़ ली थी। अफसोस, अड़तालीस साल बाद भी चीन संग कूटनीति में दब्बू निकला भारत।
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16/12/2010