तो इसे कहते हैं- 'घर में नहीं दाने, अम्मा चली भुनाने।' लोकसभा चुनाव के वक्त सोनिया गांधी ने मैनीफेस्टो में खाद्य सुरक्षा बिल का वादा तो कर दिया। पर अब वादा निभाने में सरकार को नानी याद आ रही। चुनावी वादों पर अक्सर बाद में यही कहानी देखने को मिलती। जब वोट बटोरने की होड़ मची थी। तब सोनिया ने चुनावी भोजन की झलक दिखा खूब वोट बटोरे। पर अब जब सत्ता में आने के बाद परोसने की बारी आई, तो पीएम की कमेटी ने पत्तल ही छीन ली। मनमोहन की बनाई एक्सपर्ट कमेटी ने सोनिया की एडवाइजरी काउंसिल के प्रस्ताव को बेहिचक नामंजूर कर दिया। रंगराजन कमेटी ने रपट में साफ कर दिया- जितना अनाज बांटने की योजना, उतना अनाज सरकार के पास नहीं। रपट के मुताबिक- एनएसी की सिफारिश मानी जाए, तो योजना के लिए पहले चरण में 66.76 मिलियन टन और अंतिम चरण में 71.98 मिलियन टन अनाज की जरूरत होगी। पर उत्पादन और प्रबंध के मौजूदा ट्रैंड के मुताबिक 2011-12 में 56.35 मिलियन टन और 2013-14 में 57.61 मिलियन टन का स्टॉक ही संभव। सो एनएसी के प्रस्ताव को चरणबद्ध तरीके से भी लागू करना मुमकिन नहीं। यानी चुनावी घोषणा पत्र अब कांग्रेस और सरकार के बीच सिर दर्द बन गया। सो सवाल- चुनावी वायदों से पहले नेता सोचते क्यों नहीं? जब सोनिया गांधी 2009 के लोकसभा चुनाव का मैनीफैस्टो जारी कर रही थीं, तो मंच पर मनमोहन भी मौजूद थे। उसी मंच से सोनिया ने पहली बार नेहरू-गांधी परिवार से इतर मनमोहन को पीएम के उम्मीदवार के तौर पर प्रोजैक्ट किया था। सो मैनीफैस्टो में खाद्य सुरक्षा बिल का वादा कोई तुगलकी फरमान की तरह नहीं आया होगा। अलबत्ता कांग्रेस के धुरंधरों ने पूरा मंथन किया होगा। मनमोहन सरकार की दूसरी पारी के 20 महीने पूरे हो रहे। संसद में राष्ट्रपति के अभिभाषण के जरिए दो बार भोजन के अधिकार वाले इस बिल का राग भी अलापा जा चुका। अब जरा बिल का इतिहास बता दें। शरद पवार की मिनिस्ट्री ने बिल का ड्राफ्ट तैयार किया। पर सरकारी ढर्रे वाले इस बिल को सोनिया की रहनुमाई वाली नेशनल एडवाइजरी काउंसिल ने नामंजूर कर दिया। एनएसी ने बिल की महत्ता को ध्यान में रख अपना ड्राफ्ट तैयार कर पीएम को भेज दिया। पीएम ने अपने आर्थिक सलाहकार सी. रंगराजन की रहनुमाई में एक्सपर्ट कमेटी बना दी। जिसकी रपट ने अब कांग्रेस और सरकार को आमने-सामने कर दिया। सोनिया की एनएसी ने बिल की ऐतिहासिकता और बारीकियों को ध्यान में रख संवेदना दिखाई। एनएसी ने दो चरणों में देश की 72 से 75 फीसदी आबादी तक सस्ता अनाज पहुंचाने का प्रस्ताव रखा। जिसमें बीपीएल परिवार को 35 किलो, तो एपीएल को 20 किलो अनाज प्रति माह दिए जाने का प्रावधान। पर सरकार 25 किलो अनाज देने के पक्ष में। सरकार की ओर से अनाज की जगह पैसे देने का भी प्रस्ताव था। पर भ्रष्टाचार की संभावना जता एनएसी ने खारिज कर दिया। अब जरा पीएम की एक्सपर्ट कमेटी के दो सुझाव भी देखिए। पहले सुझाव को तो कमेटी ने खुद ही मुश्किल बता दिया। सो आप दूसरा विकल्प देखिए- सिर्फ जरूरतमंद परिवारों को दो रुपए किलो गेहूं और तीन रुपए किलो चावल का कानूनी अधिकार दिया जाए। जबकि बाकी के लिए एक्जीक्यूटिव आर्डर निकाल कर स्टॉक में उपलब्धता के आधार पर बांटा जाए। यों कमेटी ने बीपीएल जनसंख्या की एनएसी की राय जरूर मान ली। सोनिया की एनएसी ने सचमुच संवेदना दिखाई। अर्जुन सेन गुप्त कमेटी ने रपट दी थी- देश में 84 करोड़ लोग ऐसे, जो महज 20 रुपए की दिहाड़ी पर गुजर-बसर कर रहे। सो एनएसी ने इस पूरी आबादी को भोजन का मौलिक हक देने का प्रस्ताव बनाया। खाद्य सुरक्षा बिल में कई बारीकियां। अब तक समाज बीपीएल-एपीएल में बंटा दिखता। पर बिल के मुताबिक तीन हिस्से दिखेंगे। बीपीएल-एपीएल के अलावा 25 फीसदी वह आबादी, जो बिल के दायरे से बाहर होगी। फिर अनाज का भंडारण भी कानूनी बाध्यता होगी। पर यहीं एक सवाल- क्या देश उत्पादन बढ़ाने की स्थिति में है? किसानों की सब्सिडी धीरे-धीरे खत्म हो रही। न्यूनतम समर्थन मूल्य में हाल की बढ़ोतरी को छोड़ दें, तो आजादी के बाद से अब तक किसानों को सिर्फ झुनझुना थमाया जाता रहा। अब कानून लागू होगा, तो किसान भी समर्थन मूल्य बढ़ाने की मांग करेंगे। सस्ता अनाज पाने वाले परिवार कीमत बढ़ोतरी का विरोध करेंगे। ऐसे में सरकार की मुश्किल- या तो सब्सिडी दे, या फिर समाज में संघर्ष पैदा होने दे। सब्सिडी के मामले में मनमोहन सरकार का रवैया छुपा नहीं। ऐसे में न बिल का मकसद पूरा होगा, न सोनिया के महत्वाकांक्षी बिल का सपना। आम आदमी के हित में मनमोहन सरकार का हाथ कितना तंग, महंगाई ने दिखा दिया। महंगाई पर गुरुवार को कुछ कदम उठे। पर कोई कदम ऐसा नहीं, जो महंगाई को नीचे ला सके। यानी महंगाई पर तो सोनिया भी कुछ नहीं कर पाईं। अब खाद्य सुरक्षा बिल की बारी, जो नरेगा की तरह आसान नहीं। जैसे सूचना के हक बिल पर सोनिया-मनमोहन में मतभेद थे। अब भोजन के हक वाले बिल पर भी। सो चुनौती सोनिया के लिए, सरकार की दलील मानेंगी या मजबूर करेंगी। पर भोजन को मौलिक हक का वैधानिक दर्जा दिलाना सचमुच सोनिया गांधी के लिए लिटमस टेस्ट जैसा। अब सोनिया चुनावी वादा निभाएंगी या घर में नहीं दाने.. की सरकारी दलील मानेंगी, वक्त ही बताएगा।
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13/01/2011
Thursday, January 13, 2011
Wednesday, January 12, 2011
गठबंधन नहीं, कांग्रेस के लिए सत्ता ही मजबूरी!
तो राहुल के बोल पर राहु सवार हो गया। महंगाई अब गठबंधन पर भी महंगी पड़ रही। सो बुधवार को एनसीपी ने राहुल और कांग्रेस को खरी-खरी सुनाने में कसर नहीं छोड़ी। महंगाई के लिए शरद पवार नहीं, सामूहिक जिम्मेदारी की दलील दी। एनसीपी के प्रवक्ता डी.पी. त्रिपाठी ने राहुल गांधी की टिप्पणी को तथ्यहीन और दुर्भाग्यपूर्ण करार दिया। कांग्रेस को इतिहास याद करा बोले- 'राहुल का बयान जनमत पर हमला है। देश की जनता ने 2004 और 2009 में स्पष्ट कर दिया- बंधन नहीं, गठबंधन की सरकार चाहिए। अगर कांग्रेस एक दलीय शासन का सपना देख रही, तो अब यह मुमकिन नहीं। बिहार में नौ से चार सीट पर आ चुकी कांग्रेस एक दलीय शासन कैसे सोच रही?' त्रिपाठी ने इंदिरा राज के वक्त महंगाई और भ्रष्टाचार के खिलाफ हुए जेपी आंदोलन की भी याद कराई। सवाल उठाया- तब महंगाई पर कंट्रोल क्यों नहीं कर पाई कांग्रेस? त्रिपाठी ने सोनिया गांधी पर भी निशाना साधा। बोले- 'दुनिया के 65 देशों में आज गठबंधन की सरकार चल रहीं, जिनमें इटली भी शामिल।' यों त्रिपाठी की दलील सोलह आने सही। पर सवाल- गठबंधन में सिर्फ एनसीपी को ही मिर्ची क्यों लगीं? पवार के बोल महंगाई को बढ़ाने में कितने असरदार रहे, यह दोहराने की जरूरत नहीं। सो एनसीपी के त्रिपाठी और तारिक अनवर ने राहु की भूमिका निभाई। तो कुछ देर बाद प्रफुल्ल पटेल ने राहु दोष से मुक्ति का मंत्र बांच दिया। यों राजनीतिक गलियारे में यह चर्चा आम हो चुकी, एनसीपी की कमान पवार के बाद जैसे ही दूसरी पीढ़ी के हाथ गई, प्रफुल्ल कांग्रेस की राह पकड़ेंगे। सो बुधवार को प्रफुल्ल का बयान हैरत में डाल गया। उन ने राहुल को सही, अपनी पार्टी के प्रवक्ता को गलत ठहरा दिया। पर मुश्किल में बेचारी कांग्रेस फंस गई। सो कांग्रेस ने राहुल के बयान पर मचे बवाल का सारा ठीकरा मीडिया के सिर फोड़ दिया। अपने अभिषेक मनु सिंघवी बोले- राहुल ने ऐसा कुछ नहीं कहा, वह सिर्फ इतिहास का जिक्र कर रहे थे। पर मीडिया ने बात का बतंगड़ बना दिया। अब आप खुद ही देख लो, लखनऊ में राहुल ने क्या कहा था। एक छात्र का सवाल था- 'इंदिरा जी के राज में तो कांग्रेस की सरकार भ्रष्टाचार और महंगाई पर आसानी से काबू पा लेती थी, आज ऐसा क्यों नहीं कर पा रही?' अब राहुल गांधी का जवाब देखो- 'तब एक पार्टी की सरकार थी, जबकि आज गठबंधन की सरकार है। और गठबंधन की अपनी कुछ मजबूरियां होती हैं।' यानी कांग्रेस प्रवक्ता की भी दलील सही। राहुल ने न एनसीपी का नाम लिया, न महंगाई-भ्रष्टाचार का। पर राहुल की टिप्पणी का मतलब क्या था? उन ने महंगाई और भ्रष्टाचार पर लाचारी की वजह गठबंधन की राजनीति बताई। सो अभिषेक मनु सिंघवी ने बेहिचक कह दिया- हमारी गलती हो गई कि छात्रों और राहुल के बीच वन-टू-वन बातचीत में दो मिनट 50 सैकिंड के लिए मीडिया को जाने दिया। यानी सच का खुलासा हो गया, तो ठीकरा मीडिया के सिर। पर गठबंधन की लाचारी राहुल ही नहीं, मनमोहन भी जता चुके। कांग्रेस मंच से महंगाई का ठीकरा पवार के सिर कई बार फोड़ा जा चुका। सो सवाल- अगर महंगाई के लिए सिर्फ शरद पवार का मंत्रालय जिम्मेदार, तो मनमोहन-प्रणव-आनंद शर्मा-मुरली देवड़ा क्या कर रहे? क्या देश के पीएम, वित्त मंत्री, वाणिज्य मंत्री और पेट्रोलियम मंत्री की कोई जिम्मेदारी नहीं? पेट्रोल की कीमतों को नियंत्रण मुक्त किसने किया? पेट्रोल-डीजल के दाम बजट में किसने बढ़ाए? पहली बार ऐसा हुआ, जब बढ़ी हुई पेट्रोल की कीमत पर पीएम ने राष्ट्र को संबोधित किया। यही हाल भ्रष्टाचार का। माना, ए. राजा गठबंधन की मजबूरी थे। पर कलमाड़ी कौन? भ्रष्टाचार के आरोपी पी.जे. थॉमस को देश की सबसे बड़ी जांच एजेंसी का मुखिया बनाने वाले पीएम किस पार्टी के? भ्रष्टाचार के आरोप में निलंबित प्रसार भारती के मुखिया बी.एस. लाली किसकी सलाह पर बनाए गए थे? महंगाई को सरकार के कंट्रोल से बाहर बताने वाले चिदंबरम किस पार्टी के? आम आदमी को कुत्ते का बिस्कुट खाने की सलाह देने वाले किस पार्टी के महानुभाव थे? क्या महंगाई ने आम आदमी की जेब की तरह सरकार का मानसिक संतुलन बिगाड़ दिया? क्या यही है कांग्रेस की अतीत की नींव पर भविष्य का निर्माण? याद करिए यूपी विधानसभा चुनाव का वाकया। तो राहुल ने 20 मार्च 2007 को कहा था- 'अगर 1992 में नेहरू-गांधी परिवार का कोई सत्ता में होता, तो बाबरी ढांचा न गिरता।' फिर कुछ दिन बाद 16 अप्रैल को पाकिस्तान तोडक़र बांग्लादेश बनाने का श्रेय इंदिरा गांधी को दिया था। तब राहुल ने कहा था- 'गांधी परिवार जो ठान लेता है, उसे पूरा करके ही दम लेता है। चाहे वह आजादी की लड़ाई हो, चाहे पाकिस्तान तोडक़र बांगलादेश का निर्माण, चाहे भारत को 21वीं सदी में ले जाना, सब नेहरू-गांधी परिवार ने किया।' अब महंगाई के लिए गठबंधन को जिम्मेदार ठहरा रहे। तो सवाल- कांग्रेस के लिए आम आदमी का दर्द बड़ा या सत्ता में बैठकर मलाई काटना? अगर कांग्रेस सच में आम आदमी की हितैशी, तो पवार को क्यों झेल रही? चढ़ जाने के गठबंधन की बलि और महंगाई पर काबू करके दिखाए। तो अतीत की नींव पर भविष्य की बुलंद इमारत दिखे। पर 20 मार्च 2007 को राहुल के बयान पर सुषमा स्वराज की टिप्पणी में अब दम नजर आ रहा। उन ने कहा था- 'जब मनमोहन पीएम नहीं होंगे, तो महंगाई का ठीकरा कांग्रेस उनके सिर फोड़ेगी।' अब तो मनमोहन के विकास का ढोल भी फूट रहा। औद्योगिक विकास दर में साढ़े आठ फीसदी की गिरावट दर्ज हुई।
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12/01/2011
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12/01/2011
Tuesday, January 11, 2011
...सुना है महंगाई पर फिर मीटिंग हुई थी!
सुना है कि महंगाई पर फिर मीटिंग हुई थी। बुधवार को फिर मीटिंग होगी। सो आम आदमी उम्मीद की डोर न छोड़े। मीटिंग कोई ऐरे-गैरे नत्थूखैरे ने नहीं, अलबत्ता खुद पीएम मनमोहन ने ली। अपने मनमोहन ने कांग्रेस अधिवेशन में खम ठोककर कहा था- महंगाई दर मार्च तक साढ़े पांच फीसदी तक ले आएंगे। पर पीएम के दावे का उल्टा असर हुआ। महंगाई दर 18.32 फीसदी के रिकार्ड स्तर पर पहुंच गई। सो बेकाबू महंगाई पर काबू करने की नौटंकी दिखाने का सिलसिला शुरू हो गया। पी. चिदंबरम तो पहले ही कह चुके- महंगाई पर काबू पाना सरकार के बूते में नहीं। लोगों की बढ़ी आमदनी महंगाई ही खा रही। अब केबिनेट मंत्री ने जब सच कबूल लिया। तो पीएम के घर मीटिंग का क्या मतलब? आखिर कितनी मीटिंग के बाद महंगाई कम होगी? मनमोहन ने 22 मई 2004 को पीएम पद की शपथ ली। तो अर्थव्यवस्था ने सलामी दी। लोगों की उम्मीद जगी, नई आर्थिक नीति के जनक, देश में खुशहाली भर देंगे। पर महज छह महीने के भीतर ही महंगाई ने अर्थशास्त्री पीएम की पोलपट्टी खोल दी। नवंबर 2004 से महंगाई ने जो रफ्तार भरी, आज तक रुकने का नाम नहीं। अगर कांग्रेस ने तभी अपने सिर पर सत्ता का नशा न चढऩे दिया होता, तो शायद महंगाई बेलगाम न होती। विपक्ष ने महंगाई पर तभी प्रदर्शन किया था। एसपीजी के सुरक्षा घेरे में खुद पूर्व पीएम अटल बिहारी वाजपेयी ने गिरफ्तारी दी थी। पर तब भी कांग्रेस ने बेशर्मी दिखाई। चार दिसंबर 2004 को कांग्रेस ने तो यहां तक कह दिया- महंगाई नहीं बढ़ रही। फिर एक झूठ को छुपाने के लिए सौ झूठ की कहावत चरितार्थ कर दी। शुरुआती दौर में कांग्रेस ने बढ़ती महंगाई को राजग सरकार से मिली विरासत बताया। तो कभी बीजिंग ओलंपिक की तैयारियों के सर ठीकरा फोड़ा। कभी राज्यों की नाकामी, तो कभी कुछ कारण गिनाए। बात सिर्फ कारण तक ही सीमित होती, तो आम आदमी कराह कर बैठ जाता। पर बढ़ती महंगाई ने मनमोहन के मंत्रियों का दिमागी संतुलन ऐसा बिगाड़ा, किसी ने कुत्ते का बिस्किट खाने की सलाह दे दी। जिसे चिदंबरम ने बजट में सस्ता कर दिया था। किसी ने जादुई छड़ी न होने के खीझ भरे बयान दिए। रही-सही कसर तो शरद पवार निकालते ही रहते। सो संसद से सडक़ तक महंगाई पर नेताओं ने खूब गाल बजाए। पर सरकार महंगाई का बाल बांका न कर सकी। संसद में अब तक दर्जनों बार बहस हो चुकी। पर आखिर में निचोड़- हरि अनंत, हरि कथा अनंता ही निकला। कभी सीसीपी, तो कभी कांग्रेस कोर ग्रुप की मीटिंग होती रहीं। पर मार्केट में बैठे चोर ग्रुप की हमेशा चांदी रही। शरद पवार ने दूध, चीनी, चावल, आटा, जिसका नाम लिया, वही अगले दिन महंगा हो गया। सो किससे उम्मीद करे आम आदमी? शरद पवार से महंगाई पर सवाल पूछ लो। तो कह देंगे- मैं कोई ज्योतिषी नहीं। योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह आहलूवालिया से पूछ लो। तो कह देंगे- गांव वाले पेटू हो चुके, सो महंगाई बढ़ी। प्रणव दा चार अगस्त को संसद में कबूल चुके- वाजपेयी राज के छह साल कीमतें काबू में रहीं। पर दलील दी- तब विकास दर, निवेश दर और निर्यात दर नहीं बढ़ीं। अब यूपीए राज में विकास दर बढ़ी, सो महंगाई बढ़ी। लोगों की क्रय शक्ति बढ़ी। यानी सरकार ने भरी संसद में इशारा कर दिया- महंगाई में जीने की आदत डाल लो। प्रणव दा ने तो प्रवचन के अंदाज में यहां तक कह दिया- अपने बजाए आने वाली पीढ़ी के बारे में सोचें। यानी अगर आज पेट्रोल-डीजल महंगा हो रहा। तो आने वाली पीढ़ी के लिए भी शेष बचेगा और बढ़ी विकास दर से सबका विकास होगा। पर कोई पूछे- अगर इस विकास दर से देश के करीबन सवा-एक सौ अरब-खरबपति बाहर कर दो, तो विकास की दर क्या होगी? आखिर यह कैसा विकास, जो आम आदमी को भूखा मार रहा। खुद सोनिया गांधी मान चुकीं, विकास से भ्रष्टाचार को बढ़ावा मिला। तो क्या कांग्रेस राज में सिर्फ राजाओं, कलमाडिय़ों का विकास हुआ? अगर कांग्रेस ऐसा मान रही, तो आम आदमी की फिक्र क्यों नहीं? संसद में वेतन-भत्ते बढऩे की बात हो। तो राजनीतिक एका का अद्भुत नजारा दिखेगा। पर महंगाई के इस दौर में संसद की केंटीन का रेट थोड़ा क्या बढ़ गया। एक रुपए में पांच रोटी तोडऩे वाले सांसदों को बदहजमी होने लगी। सो अब न संसद के पास जवाब, न सरकार के पास। मंगलवार को युवाओं के बीच यूपी पहुंचे राहुल गांधी से तमाम ज्वलंत मुद्दों पर सवाल हुए। तो जवाब में रटंत विद्या ही दिखी। सो बाहर छात्रों में जबर्दस्त रोष दिखा। दलील- जब सीधा जवाब नहीं देना था, तो आए क्यों? पर यह कोई हैरानी में डालने वाली भावना नहीं। मंगलवार को पीएम के घर महंगाई पर डेढ़ घंटे की मीटिंग बेनतीजा रही। तो इंटरनेट पर सरकार के खिलाफ ऐसी-ऐसी गालियां, जिन्हें लिखना भी मुनासिब नहीं। अब फिर मीटिंग होगी। पर मंगलवार की मीटिंग के बीच ही प्रणव मुखर्जी और शरद पवार दूसरे काम के लिए निकल गए। सो सरकार की गंभीरता सबके सामने। प्रणव ने उद्योगपतियों के साथ मीटिंग को तरजीह दी। पर सवाल- जब देश के पीएम ने महंगाई पर डेढ़ घंटे मीटिंग ली। तो भी कोई नतीजा नहीं निकला। पर मनमोहन के सहयोगी रहे ए. राजा ने तो महज 45 मिनट में स्पेक्ट्रम का ऐसा खेल कर दिया। देश एक नील 76 खरब रुपए की गिनती में ही उलझ गया। यानी आम आदमी की बात हो, तो डेढ़ घंटे क्या, छह साल में मनमोहन कुछ नहीं कर सके। पर भ्रष्टाचार करने में सरकार के मंत्रियों ने कुछ पल में सब निपटा दिया। अब महंगाई पर सिर्फ चिंता होगी। कुछ दिन बाद फिर महंगाई बढ़ाकर चिंता जताएंगे। यह खेल तब तक चलेगा, जब तक आम आदमी की चिता न सज जाए।
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11/01/2011
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11/01/2011
Monday, January 10, 2011
उम्मीद की डोर कहीं टूट गई.... तो?
तो सवाल भरोसे का। आखिर देश की जनता किस पर भरोसा करे? पीएम मनमोहन प्रवासियों के सामने व्यवस्था में बदलाव की बात कर रहे। पर जब व्यवस्था के रहनुमा ही आपस में सांप-नेवले का खेल खेल रहे। तो जनता की फिक्र कैसे होगी? भ्रष्टाचार हो या आतंकवाद, किसी भी व्यवस्था की जड़ को खोखला करने के लिए काफी। पर इक्कीसवीं सदी का भारत यही विडंबना ढो रहा। टू-जी स्पेक्ट्रम घोटाले में पहले टेलीकॉम मंत्री कपिल सिब्बल ने काबिलियत का प्रदर्शन कर सीएजी की रपट झुठला दी। अपनी ही संवैधानिक संस्था की क्षमता पर सवाल उठा दिए। तो सोमवार को सीएजी ने भी पलटवार कर सिब्बल को न सिर्फ संवैधानिक हद दिखाई। अलबत्ता घोटाले के अपने आंकड़े पर भी दृढ़। सीएजी ने दो-टूक कह दिया- संसदीय नियमों के तहत जब तक पीएसी रपट पर सुनवाई कर रही, किसी को भी सवाल उठाने का हक नहीं। सिब्बल के दावे पर पीएसी के मुखिया मुरली मनोहर जोशी भी सवाल उठा चुके। कांग्रेस ने फिर दोहरी चाल चली। सिब्बल के बयान से पहले किनारा किया, अब पार्टी मंच से सीएजी की रपट पर सवाल उठाए जा रहे। सो सवाल, कांग्रेस इतनी हताशा में क्यों? जब सुप्रीम कोर्ट जांच की मॉनीटरिंग कर रहा। पीएसी के सामने सीएजी विनोद राय पेश होकर आंकड़ों का आधार बता चुके। तो क्या जांच के नतीजों से पहले विभागीय मंत्री का दावा जांच को प्रभावित करने की कोशिश नहीं? अगर सिब्बल को सचमुच संवैधानिक संस्था पर भरोसा। तो जैसे खुद पीएम ने पीएसी के सामने पेश होने का ऑफर रखा, सिब्बल भी कर सकते थे। पर शायद सिब्बल ने दस जनपथ में अपना नंबर बढ़ाने की खातिर अति उत्साह दिखा दिया। सो सुब्रहमण्यम स्वामी सुप्रीम कोर्ट पहुंच गए। जांच से पहले सिब्बल पर राजा को बरी करने का आरोप लगाया। पर सुप्रीम कोर्ट ने मीडिया रपट के बजाए हलफनामा दाखिल करने के निर्देश दिए। सो अब सुप्रीम कोर्ट का रुख देखना होगा। पर जब जांच एजेंसियां अपना काम कर रहीं, तो सिब्बलनामे का क्या मकसद? सीबीआई वैसे भी अपने आका के हुक्म की गुलाम। सो लाइन आका तय करेगा, सीबीआई उसे पुष्ट करने का आधार। तभी तो सीबीआई सीएजी की रपट से पहले तक सोई हुई थी। अब भी कोर्ट का डंडा और सरकार की फजीहत न होती, तो जांच में फुर्ती नहीं आती। यही किस्सा आतंकवाद का। समझौता, मालेगांव और अजमेर ब्लास्ट में हिंदू कट्टरपंथियों की साजिश उजागर हो रही। तो कार्रवाई के बजाए कांग्रेस-बीजेपी में आरोप-प्रत्यारोप चल रहा। संघ प्रमुख मोहन भागवत एक तरफ कांग्रेस पर साजिश का आरोप मढ़ रहे। तो दूसरी तरफ माना- जितने लोगों के नाम आ रहे, उनका संघ से कोई नाता नहीं। भागवत बोले- कुछ तो खुद ही संघ छोड़ गए। कुछ को संघ ने यह कहते हुए जाने के लिए कह दिया कि यहां उग्रता नहीं चलेगी। तो क्या संघ को कट्टरपंथियों की साजिश की भनक थी? भागवत का बयान तो यही इशारा कर रहा। पर भ्रष्टाचार को लेकर आईसीयू में पहुंची कांग्रेस को इन ताजा खुलासों से आक्सीजन मिल रही। विपक्ष भ्रष्टाचार के मुद्दे पर शंखनाद करता, तो कांग्रेस इसे संघ पर लगे आरोप की बौखलाहट बता कन्नी काट लेती। गुवाहाटी से बीजेपी ने बोफोर्स की तोप सोनिया पर तानी। क्वात्रोची से पारिवारिक रिश्ते को उछाल हमले की धार तेज की। तो सोमवार को कांग्रेस ने भी बदजुबानी की चेतावनी दे दी। जनार्दन द्विवेदी बोले- सार्वजनिक जीवन में शीर्ष नेता निजी आक्षेप से बचें। वरना हम भी वही काम शुरू कर दें, तो न जाने कौन-कहां होगा। अब अगर ऐसी ही राजनीति, तो कांग्रेस हो या बीजेपी, 26/11 के बाद देश में पैदा हुए माहौल को न भूलें। कैसे दलगत भावना का चोगा फेंक जनता ने समूची राजनीतिक व्यवस्था को आड़े हाथों लिया था। जनता सडक़ों पर उतरी थी। तो नेताओं के होश फाख्ता हो गए थे। अब जनता भ्रष्टाचार और आतंकवाद जैसे मुद्दों पर चोचलेबाजी नहीं, ठोस कार्रवाई चाह रही। आरोप-प्रत्यारोप की राजनीति में भले कोई एक-दूसरे से बढ़त ले ले। पर कहीं जनता के दिल की चिंगारी शला बन गई, तो क्या होगा? ताजा किस्सा बिहार के बीजेपी विधायक राजकिशोर केशरी की हत्या का ही लो। आम आदमी हत्या करने वाली रुपम पाठक की हरकत को जायज ठहरा रहा। सब यह मानकर चल रहे, विधायकी के रुआब में महिला का शोषण हुआ होगा। तभी प्रतिशोध की ऐसी ज्वाला भडक़ी। सो जनदबाव में आखिर नीतिश कुमार को सीबीआई जांच की सिफारिश करनी पड़ी। पर जांच और न्याय से पहले जनता का निष्कर्ष निकालना अपनी व्यवस्था के प्रति भरोसे का स्पष्ट संकेत। अब नेताओं के प्रति जनता की ऐसी सोच भले पहली नजर में दिल को भाए। पर लोकतंत्र के लिए अच्छी बात नहीं। यह एक खतरनाक प्रवृत्ति का संकेत। सो नेताओं के लिए आत्म मंथन का वक्त आ गया। आखिर इस छवि को कैसे बदलें? अपने पास 2007 का एक सर्वे, जिसमें पाया गया था- 79 फीसदी लोग नेताओं से नफरत करते। ताजा भ्रष्टाचार और आतंकवाद के मामलों को जोडक़र देखिए। तो नतीजे इससे आगे ही दिखेंगे। ऐसा क्यों न हो। महंगाई पर सिर्फ जुबानी भरोसा मिल रहा। कभी नेता कबूतरबाजी में पाए जाते। कभी चारित्रिक पतन में। लाखों में बिकने वाले सांसद अब करोड़ों में बिक रहे। कोई ऐसा नेता नहीं, जिसका जनता अनुशरण करे। पर हर बार उम्मीद की डोर बांधे जनता वोट डालने पहुंच जाती। सो नेता अब जरूर सोचें- कहीं उम्मीद की डोर टूट गई.... तो?
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10/01/2011
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10/01/2011
Friday, January 7, 2011
सवाल सीएजी पर या कांग्रेस खुद ही सवाल?
तो कपिल सिब्बल ने अपनी ‘काबिलियत’ दिखा ही दी। ए. राजा के इस्तीफे के बाद संचार मंत्रालय संभाला। सो पेशे से वकील सिब्बल ने चार्ज लेने के साठ दिन के भीतर ही ‘चार्जशीट’ पेश कर दी। सिब्बल को मंत्रालय संभाले अभी 53 दिन ही हुए। पर टू-जी स्पेक्ट्रम घोटाले की ऐसी परतें उधेड़ीं। मानो, कोई घोटाला ही नहीं हुआ। सीएजी रपट और विपक्ष की खटिया खड़ी करते सिब्बल ऐसे मुस्करा-मुस्करा कर चुस्की ले रहे थे। मानो, अदालती फैसले से पहले ही केस जीत गए हों। सिब्बल तय एजंडे के साथ पूरे महकमे को लेकर पॉवर प्रजेंटेशन देने पहुंचे। तो सारा फोकस घोटाले के आंकड़े पर ही रखा। सीएजी की रपट में अधिकतम एक नील 76 खरब यानी 1.76 लाख करोड़ का नुकसान बताया गया। पर अपनी 53 दिन की मेहनत में सिब्बल ने न सिर्फ सीएजी के आंकड़ों को झुठलाया। अलबत्ता सीएजी की क्षमता पर भी सवाल उठा दिए। तकनीकी मामलों के आकलन में सीएजी को अनाड़ी बता आंकड़ों की झड़ी लगा दी। अपने सुप्रीम कोर्ट ने तो जांच का दायरा 2001 तक बढ़ाया। पर सिब्बल ने टेलीकॉम पॉलिसी की शुरुआत यानी 1994 से अब तक की जांच कर निष्कर्ष भी दे दिया। सुप्रीम कोर्ट अपनी टिप्पणी में कई बार कह चुका- इस घोटाले में जितना दिख रहा, मामला उससे कहीं आगे है। पर सिब्बल को स्पेक्ट्रम घोटाले में जितना कहा जा रहा, उससे कई गुना कम नजर आ रहा। सो सुप्रीम कोर्ट सही या सिब्बल, यह तो वक्त ही बताएगा। पर सिब्बल ने तो सारा ठीकरा सीएजी और विपक्ष के सिर फोड़, फास्ट ट्रैक कोर्ट के अंदाज में फौरन मामला रफा-दफा कर दिया। सिब्बल ने शुरुआत ही विपक्ष पर हमले से की। जेपीसी पर जाना-पहचाना राग दोहराया। बोले- विपक्ष ने संसद में बोलने का मौका नहीं दिया। सो हम जनता को अपनी बात कहने आए। उन ने सीएजी के अनुमान के तरीके पर सवाल उठाए। घोटाले के आंकड़े 1.76 लाख करोड़ को पूरी तरह गलत बताया। बोले- अगर सीएजी के इस मापदंड को मान लें। तो यह आंकड़ा 1.76 लाख करोड़ ही नहीं, 2.6 लाख करोड़ पहुंच जाएगा। सो सिब्बल ने सीएजी की समझ का मखौल उड़ाते हुए जमकर वकालत झाड़ी। बोले- ए. राजा की ओर से बांटे गए 122 स्पेक्ट्रम के लाइसेंस 4.4 मैगाहार्ट्ज के थे। पर सीएजी ने 6.2 मैगाहार्ट्ज से आकलन किया। यानी 37,154 करोड़ यहीं फालतू जोड़ा। फिर सीएजी ने 2010 के मार्केट रेट के आधार पर जनवरी 2008 में बांटे गए टू-जी स्पेक्ट्रम का आकलन कर दिया। सो 56,000 करोड़ यहीं कम हो गए। इतना ही नहीं, थ्री-जी स्पेक्ट्रम की कीमत को ध्यान में रख भी आकलन हुआ। सो 17,755 करोड़ और कम हुए। फिर टू-जी का लाइसेंस 20 साल के लिए दिया जाना था। लेकिन एक साल देरी हुई, सो 19 साल के लिए ही मिला। यानी 53,000 करोड़ यहीं कम हो गए। कुछ इसी तरह गुणा-भाग करते हुए सिब्बल ने आखिर में कह दिया- टू-जी स्पेक्ट्रम में देश के राजस्व का नुकसान निल रहा। पर सीएजी ने इस मामले में खुद के साथ अन्याय किया, विपक्ष ने आम आदमी के साथ। लगे हाथ सिब्बल 1994 और अब की फोन दरों का जिक्र करना नहीं भूले। बोले- 1994 में 32 रुपए मिनट, तो 1998-99 में 16 रुपए, 2004 में तीन रुपए और अब 30 पैसे प्रति मिनट की दर से फोन हो रहे। टेरिफ में इस कटौती से उपभोक्ताओं को सालाना मिलने वाला फायदा 1,50,000 करोड़ से भी अधिक। सो हमारी नीतियों का सबसे अधिक फायदा आम आदमी को हो रहा। यानी कुल मिलाकर कपिल सिब्बल ने विपक्ष को घेरने और सीएजी को अक्षम साबित करने में सारी काबिलियत लगा दी। एनडीए काल में संचार मंत्री रहे रामविलास पासवान, प्रमोद महाजन, अरुण शौरी की ओर से बांटे गए लाइसेंस का हवाला दिया। एनडीए की ओर से बनाई पहले आओ, पहले पाओ की नीति पर पूर्व राष्ट्रपति के. आर. नारायणन, पूर्व पीएम चंद्रशेखर और बाल ठाकरे के विरोध का जिक्र किया। सिब्बल ने 1999 में बदली गई टेलीकॉम पॉलिसी के लिए वाजपेयी को कटघरे में खड़ा किया। फिर बोले- स्पेक्ट्रम आवंटन में हमने एनडीए की ही नीति का अनुसरण किया। तो 1.76 लाख करोड़ के राजस्व नुकसान की बात कही जा रही, जो जनता के बीच भ्रम फैलाने का प्रयास। अब सवाल- जब सिब्बल एनडीए की नीति को कटघरे में खड़ा कर रहे। तो यूपीए ने क्यों जारी रखी? क्या मंत्री के पास कोई अपनी समझ नहीं? आखिर यह कैसी दलील, जब एक तरफ सिब्बल सीएजी की क्षमता पर सवाल उठा रहे। तो दूसरी तरफ सीएजी की ओर से उठाई कुछ गड़बड़ी की बात कबूल भी कर रहे। खुद सीबीआई भ्रष्टाचार पर मचे इस हंगामे से पहले 22,000 करोड़ के नुकसान का आकलन कर चुकी। पर सिब्बल ने सीएजी की रपट कितनी पढ़ी, आप खुद अंदाजा लगाओ। रपट में घोटाले के आकलन के तीन मापदंड। सबसे कम 58,000 करोड़ का। फिर 66,000 करोड़ और आखिरी आंकड़ा 1.76 लाख करोड़ का। यानी घोटाला 58,000 करोड़ से 1.76 लाख करोड़ के बीच का ही। पर भ्रष्टाचार के मुद्दे ने कांग्रेस की चूलें हिला रखीं। सो अपनी ही एजेंसी पर सवाल उठाने लगी सरकार। वैसे भी कांग्रेस की फितरत, अगर कोई संवैधानिक संस्था या नौकरशाह ‘जो तुमको हो पसंद, वही बात न करे’ तो ऐसे ही सवाल उठाती। जो सुर में सुर मिलाते, नवीन चावला और पी.जे. थॉमस की तरह आंखों के नूर बने रहते। तभी तो इनकम टेक्स ट्रिब्यूनल का फैसला मंजूर नहीं, सीएजी की रपट भी नहीं। सो कहीं सवाल खड़ा करते-करते कांग्रेस एक दिन देश के लिए ही सवाल न बन जाए।
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07/01/2011
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07/01/2011
Thursday, January 6, 2011
रास्ते तो छह सुझाए, पर मंजिल नहीं तेलंगाना की!
तो बोफोर्स केस की फाइल फिलहाल बंद नहीं होगी। कोर्ट ने सीबीआई की नीयत पर शक जाहिर करते हुए अब दस फरवरी की तारीख तय कर दी। यों शर्म का परदा फाड़ चुकी कांग्रेस ने हर हाल में क्वात्रोची को राहत दिलाने की ठान रखी। सो अब इनकम टेक्स ट्रिब्यूनल के फैसले को ही अप्रासंगिक ठहराना शुरू कर दिया। कांग्रेस की ओर से कोई ऐसे बयान आएं, तो बोलने वाले का नाम बताने की जरूरत नहीं। बटला हाउस एनकाउंटर में अपने सुरक्षा बल की शहादत को भुला मारे गए आतंकवादी के प्रति सहानुभूति जतानी हो। आतंकी के घर वालों को दिलासा दिलाने आजमगढ़ जाने की बात हो। नक्सलवादियों से प्यार करने की बात हो। या आतंकवाद पर वोट बैंक की सियासत। सिर्फ हंगामा खड़ा करना ही कांग्रेस के इस वरिष्ठ नेता का काम। सो जो भी मामला कांग्रेस के खिलाफ जाता हो, अपने दिग्विजय सिंह सिर्फ सवाल उठाना ही जानते। अब उनने ट्रिब्यूनल के फैसले के समय पर ही सवाल उठा दिए। दलील दी- फैसला 31 दिसंबर को ही क्यों आया, इसकी जांच हो। अब आप क्या कहेंगे? ट्रिब्यूनल ने जो सबूत दिए, उन पर कांग्रेस गौर नहीं कर रही। सो कहीं ऐसा न हो, हर मुद्दे पर प्रश्नचिन्ह लगाने वाले दिग्विजय देश के लिए ही प्रश्न बन जाएं। कोई भी नागरिक यह सवाल पूछ सकता- आखिर क्वात्रोची के लिए ऐसी जिद क्यों ठान रही कांग्रेस? क्वात्रोची तो एक दलाल। फिर पूरी सरकार ऐसे बचाने में क्यों जुटी, मानो सगा हो। अब भले सरकार ‘फोर्स’ लगाकर बोफोर्स की फाइल बंद करवा ले। पर सवाल फिर भी रहेगा, आखिर दलाली की रकम गई कहां? क्वात्रोची पर इतनी मेहरबानी की क्या वजह रही? यों कांग्रेस ने जितनी क्वात्रोची की फिक्र की। उसकी आधी फिक्र भी आम आदमी के लिए की होती। तो महंगाई की मारी जनता आज खून के आंसू नहीं रोती। चिदंबरम तो कह ही चुके- महंगाई रोकना सरकार के बूते में नहीं। सोनिया-मनमोहन-प्रणव जुबानी चिंता जता रहे। सो खाने-पीने की चीजों की महंगाई दर 18.32 फीसदी पहुंच गई। आखिर यह आम आदमी के साथ कैसी दिल्लगी, जो सीधे दिल को लग रही। पर जनता के साथ वादाखिलाफी शासकों की फितरत बन चुकी। तभी तो तेलंगाना की आग थमने का नाम नहीं ले रही। पिछले साल नौ दिसंबर को केबिनेट ने आनन-फानन में फैसला लिया। चिदंबरम ने तेलंगाना गठन का सार्वजनिक एलान कर दिया। पर ऐसी आग लगी, कांग्रेस दोधारी तलवार पर खड़ी दिखी। सो आम सहमति के नाम पर पल्ला झाडऩे की कोशिश हुई। सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जज बी. श्रीकृष्ण की रहनुमाई में कमेटी बना दी। अब साल भर बाद कमेटी की रपट आ गई। गुरुवार को आंध्र से जुड़े सभी राजनीतिक दलों की मीटिंग में रपट सार्वजनिक हुई। कमेटी ने मसले के समाधान के लिए छह विकल्प सुझाए। पर विकल्प देखकर बचपन की कुछ यादें ताजा हो गईं। गांव का कोई बच्चा शहर से पढक़र छुट्टियों में घर आता। तो दो-चार लोग घेरकर उसकी परीक्षा लेने लगते। अक्सर यह सवाल पूछकर उसकी परीक्षा ली जाती। इसका अंग्रेजी में अनुवाद करो- छब्बू की छत पर छह छछूंदर छह दिनों से छछुआ रहे थे। अब कोई भी व्यक्ति ऐसे सवाल से सिर धुनने लगे। अब आप खुद ही श्रीकृष्ण कमेटी की रिपोर्ट के छह सुझाव देखिए। पहला- संयुक्त आंध्र प्रदेश कायम रखा जाए। दूसरा- आंध्र प्रदेश को तीन हिस्सों में बांटा जाए। तीसरा- आंध्र प्रदेश को रायल तेलंगाना और तटीय आंध्र, दो राज्यों में बांट दिया जाए। चौथा- आंध्र को दो राज्यों में बांटकर वृहत हैदराबाद को केंद्र शासित प्रदेश बनाया जाए। पांचवां- मौजूदा भौगोलिक सीमा के आधार पर ही सीमांध्र और तेलंगाना राज्य का निर्माण हो, साथ ही हैदराबाद को तेलंगाना की राजधानी बना दिया जाए। सीमांध्र अपनी नई राजधानी अलग बना ले। छठवां- आंध्र प्रदेश को संयुक्त रख तेलंगाना क्षेत्र के सामाजिक-आर्थिक विकास के लिए वैधानिक रूप से अलग रीजनल काउंसिल बनाई जाए। अब कोई पूछे- कमेटी ने क्या नया सुझाव दिया? कमेटी ने अपनी छह सिफारिशों में से तीन तो खुद ही अव्यवहारिक बता दीं। सो कमेटी की साल भर की एक्सरसाइज का क्या फायदा मिला? तेलंगाना का मुद्दा जहां था, वहीं अटका पड़ा। तेलंगाना को लेकर ऐसे फार्मूले पहले भी आ चुके। सो कुल मिलाकर कमेटी ने सभी फार्मूलों का संकलन कर रपट सौंप दी। पर रपट आते ही विरोध शुरू हो गया। टीआरएस ने हैदराबाद के साथ तेलंगाना से कम कुछ भी मंजूर न करने का एलान कर दिया। तो अब दोधारी तलवार पर चल रही कांग्रेस और चिदंबरम ने छठे विकल्प को कारगर बताना शुरू कर दिया। यानी रीजनल काउंसिल बना क्षेत्रीय असंतुलन को दूर करने की कोशिश। पर क्या यह फार्मूला भी कारगर होगा? तेलंगाना का आंदोलन 1960 के दशक में शुरू हुआ। तो कांग्रेस से अलग होकर डा. चेन्ना रेड्डी ने तेलंगाना प्रजा समिति बनाई। पर तभी जवाब में जय आंध्र का गठन हुआ। फिर विकास और रोजगार के असंतुलन को दूर करने के लिए 1967 में तेलंगाना के लिए पब्लिक एंप्लायमेंट एक्ट में संरक्षण की व्यवस्था की गई। पर सुप्रीम कोर्ट ने इसे असंवैधानिक ठहरा दिया। अगर तभी सरकार जाग गई होती, तो छठा फार्मूला आज सचमुच कारगर दिखता। पर अब बहुत देर हो चुकी। सो तेलंगाना की खातिर निकली तलवार अब म्यान में वापस पहुंचाना संभव नहीं। शरद यादव ने तो सोलह आने सही कहा- कमेटी की रिपोर्ट दिशाहीन। हम जहां थे, वहीं खड़े हैं। सचमुच कमेटी ने रास्ते तो छह सुझाए। पर मंजिल नहीं मिल रही।
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06/01/2011
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06/01/2011
Wednesday, January 5, 2011
‘महंगाई टैक्स’ से लुटी प्रजा, ‘राजाओं’ का हुआ ‘विकास’!
इधर भ्रष्टाचार का घड़ा बोफोर्स से ओवर-फ्लो हुआ। उधर स्पेक्ट्रम घोटाले ने करुणानिधि के घर में कोहराम मचा दिया। करुणा के बड़े बेटे एम.के. अझागिरी ने बुधवार को केबिनेट मंत्री समेत पार्टी के सभी पदों से इस्तीफा दे दिया। ए. राजा और कनीमोझी को डीएमके से बर्खास्त करने की मांग की। साथ ही शर्त रख दी, विधानसभा चुनाव में सीएम के लिए किसी का नाम प्रोजैक्ट न हो। और स्टालिन या उनमें से जिसका पलड़ा चुनाव बाद भारी हो, वही सीएम बने। यों फिलहाल अझागिरी ने इस्तीफा अपने पिता करुणा को भेजा। सो समकालीन भारत के शाहजहां अब संकट में फंस गए। राजा तो रिश्तेदारी से बाहर, पर कनीमोझी तो उनकी तीसरी बीवी रजाथी से पैदा सांसद बेटी। करुणा सीएम के तौर पर स्टालिन को प्रोजैक्ट करना चाह रहे। पर बड़ा भाई अझागिरी दावा छोडऩे को राजी नहीं। सो तमिलनाडु की राजनीति में डीएमके के पारिवारिक फिल्म का क्लाइमैक्स क्या होगा, यह तो वक्त बताएगा। पर फिलहाल भ्रष्टाचारियों के वक्त सही नहीं चल रहे। ना-नुकर करते आखिरकार बुधवार को सुरेश कलमाड़ी को सीबीआई दफ्तर पहुंचना ही पड़ा। कॉमनवेल्थ घोटाले में घंटों कड़ी पूछताछ हुई। पर सीबीआई ने सजा दिलाने के लिए कड़ी से कड़ी जोड़ी या बचाने के लिए, यह तो भविष्य के गर्भ में। कलमाड़ी-राजा के बाद अब बोफोर्स ने कांग्रेस को मुश्किल में डाल रखा। सो बीजेपी ने भी बुधवार को कोर ग्रुप की मीटिंग कर हमले की धार और तेज करने की रणनीति बनाई। यानी भ्रष्टाचारियों का भले कुछ न बिगड़े। पर भ्रष्टाचार को मुद्दा बना वोटों का हिसाब-किताब हो रहा। सिर्फ भ्रष्टाचार नहीं, अब तो गणतंत्र दिवस से बीस दिन पहले तिरंगे पर तकरार शुरू हो गई। बीजेपी की यूथ विंग के अध्यक्ष अनुराग ठाकुर कोलकाता से श्रीनगर तक की एकता यात्रा पर निकले हुए। पर युवा नेतृत्व की आड़ में बीजेपी के घाघों ने रणनीति बनाई। सो मकसद समझना कोई बड़ी बात नहीं। श्रीनगर में तिरंगा फहराने को लेकर हमेशा विवाद रहा। अलगाववादी ताकतें 26 जनवरी और 15 अगस्त के दिन हमेशा पाकिस्तानी झंडा लहराती दिखतीं। सो बीजेपी ने तिरंगे की आड़ में भावनात्मक लहर पैदा करने का मंसूबा बनाया। रही-सही कसर बुधवार को खुद जम्मू-कश्मीर के सीएम उमर अब्दुल्ला ने पूरी कर दी। उमर ने ऐसा बयान दिया, ‘वैद्या फरमाए वही, जो रोगी चाहे’ वाली कहावत चरितार्थ कर दी। तिरंगे पर तकरार बीजेपी को भी राजनीतिक लिहाज से शूट करती। घाटी के हालात के लिहाज से उमर को भी मुफीद। सो बीजेपी ने उमर के बयान पर फौरन खम ठोका। सीधे अरुण जेतली मैदान में कूदे। कहा- तिरंगा फहराने के लिए किसी की इजाजत की जरूरत नहीं। कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है। पर उमर ने कहा- अब घाटी में हालात बिगड़े, तो बीजेपी जिम्मेदार होगी। अब गुरुवार को तेलंगाना पर सर्वदलीय मीटिंग में भी कांग्रेस का तेल निकलना तय। बीजेपी-टीआरएस पहले ही मीटिंग के बॉयकाट का एलान कर चुकीं। अब आप खुद ही देखिए, राजनीति का यह कैसा स्तर? आखिर अपने नेता देश को कहां ले जाना चाहते? आखिर किसी भी एक मुद्दे पर कभी राजनीतिक एका क्यों नहीं दिखता? हर मुद्दे में वोट बैंक की राजनीति क्यों घुस जाती? सचमुच नजीर पेश करने वाले नेता राजनीति के बियाबां में कहीं खो चुके। अब नेताओं में सिर्फ एक ही बात का एका दिखता। वह है- जनता की गाढ़ी कमाई को लूट-खसोट कर पांच साल में ही अपनी संपदा पचास गुना बढ़ा लेना। ऐसे मामलों में कोई भी राजनीतिक दल अछूता नहीं। क्या आज कोई भी ऐसा दल है- जिसकी चाल टेढ़ी न हो, चरित्र में दाग न हो, चेहरा कुरूप न हो? कोई एक बार नेतागिरी में घुसा, खुदा न खास्ते एमपी-एमएलए-पार्षद बन गया। तो शायद दिल-ओ-दिमाग में यह नारा घर कर जाता- कर लो दुनिया मुट्ठी में। सो राजनीति से लोगों का भरोसा उठ रहा। आखिर जनता का भरोसा क्यों न उठे? महंगाई छह साल से आम आदमी को मुंह चिढ़ा रही। पर मनमोहन हों या सोनिया, सिर्फ जुबानी भरोसा दिला रहे। अब बुधवार को होम मिनिस्टर पी. चिदंबरम ने महंगाई को एक टैक्स बता दिया। बोले- महंगाई से बड़ा कोई टैक्स नहीं। अगर आपकी आमदनी काफी अधिक है, तो उसे महंगाई खा जाती है। उन ने पहली बार कबूला- हमें पक्का विश्वास नहीं है कि खाने-पीने की चीजों की कीमत नियंत्रित करने के लिए हमारे पास सभी तरह के उपाय हैं। अब बोफोर्स पर इनकम टेक्स ट्रिब्यूनल के ताजा फैसले के बाद यह प्रणव मुखर्जी पर हमला या कुछ और। पर सवाल, जब चिदंबरम खुद वित्त मंत्री थे, तब सोचने की शक्ति कहां थी? अब जो भी हो, चिदंबरम के बयान से साफ हो गया। मनमोहन सरकार की विकास दर आम आदमी की छाती पर मूंग दलकर बढ़ी। आम आदमी तो कंगाल ही रह गया। राजाओं-कलमाडिय़ों ने विकास का भरपूर फायदा उठाया। सचमुच विकास दर का ही नमूना, जब मनमोहन वित्तमंत्री थे, तो लाख रुपए में सांसद बिक जाते थे। जब पीएम बने, तो कीमत 25 करोड़ पहुंच गई। अब तो मनमोहन का दावा फिर फेल होता दिख रहा। महंगाई फिर कहर बरपा रही। मनमोहन ने कांग्रेस अधिवेशन में मार्च तक महंगाई दर साढ़े पांच फीसदी लाने का भरोसा दिया था। पर जिस तरह कीमतें बढ़ रहीं, आम आदमी का राम ही राखा। पेट्रोल में तो पहले ही आग लग चुकी। बस महीने-दो महीने का इंतजार करिए। डीजल और रसोई गैस में भी ‘मनमोहिनी विस्फोट’ होंगे।
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05/01/2011
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05/01/2011
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