Monday, January 31, 2011

गर मैं चोर, तो तू डाकू, जय हो लोकतंत्र की!

लोकतंत्र की आड़ में तानाशाही के दिन अब लद चुके। काहिरा की कहानी इसकी ताजा मिसाल। मिस्र के राष्ट्रपति हुस्नी मुबारक ने जन दबाव में नई सरकार बना दी। पहली बार उपराष्ट्रपति भी बनाया। पर जनता ने मुबारक को सत्ता से विदा करने का मन बना लिया। सो आंदोलन थमने का नाम नहीं। पर मुबारक तीन दशक से कुर्सी से ऐसे चिपके हुए, हटने का नाम नहीं ले रहे। आंदोलन कुचलने को तानाशाही तरीका अख्तियार कर लिया। पर इतिहास साक्षी, आखिर में जीत जन आंदोलन की ही होती। सो लोकतंत्र को बपौती समझने वालों के लिए ऐसे आंदोलन एक सबक। जैसे हुस्नी मुबारक कुर्सी छोडऩे को राजी नहीं। कुछ वैसे ही अपने सीवीसी पी.जे. थॉमस। सुप्रीम कोर्ट के सवालों और देश भर में हो रही फजीहत के बावजूद थॉमस ताल ठोक कर कह रहे- मैं तो सीवीसी, इस्तीफा क्यों दूं। मनमोहन सरकार भी समझ नहीं पा रही, थॉमस पर क्या रुख अपनाए? कभी बचाव में उतरती, तो कभी सिट्टी-पिट्टी गुम। गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट में एटार्नी जनरल जी.ई. वाहनवती ने दो-टूक झूठ कह दिया- थॉमस की नियुक्ति करने वाले पैनल के सामने चार्जशीट का मामला संज्ञान में नहीं लाया गया। सो बतौर नेता प्रतिपक्ष पैनल में शामिल सुषमा स्वराज ने फौरन मोर्चा खोल दिया। सरकार पर झूठ बोलने का आरोप लगा, खुद हलफनामा दाखिल करने का एलान कर दिया। पर अगले दिन कांग्रेस ने नया पैंतरा आजमाया। दलील दी- मिनिट्स में चार्जशीट की चर्चा नहीं। पर हाथ कंगन को आरसी क्या, पढ़े-लिखे को फारसी क्या। सुषमा स्वराज ने थॉमस की नियुक्ति के फैसले पर दस्तखत के साथ ही लिख दिया था- आई डिसएग्री। यानी बिना चर्चा के कोई ऐसा क्यों लिखेगा। अब सोमवार को खुद होम मिनिस्टर पी. चिदंबरम ने खुलासा कर दिया- सुषमा स्वराज ने जो कहा, वह सोलह आने सही। पैनल ने थॉमस के चार्जशीट पर चर्चा की थी। पर बहुमत से थॉमस की नियुक्ति का फैसला लिया गया। चिदंबरम ने एक और बात कही- स्वाभाविक रूप से कोई महत्वपूर्ण बात हुई होगी। जिस पर सुषमा असहमत रही होंगी। जब चर्चा हुई होगी, तभी असहमति की बात आई। याद रखिए, बिना चर्चा के असहमति का सवाल ही नहीं उठता। अब होम मिनिस्टर के इस बयान के बाद कांग्रेस क्या कहेगी? चिदंबरम ने तो मिनिट्स की दलील भी खारिज कर दी। कहा- मिनिट्स में चर्चा का ब्यौरा नहीं, सिर्फ फैसला लिखा होता। पर चिदंबरम ने एक बार फिर थॉमस की नियुक्ति को जायज ठहराया। अब एटार्नी जनरल ने सुप्रीम कोर्ट में जो कहा, उसे किसकी दलील मानें? अगर सुषमा ने कोर्ट में हलफनामा दाखिल करने का एलान न किया होता। तो सरकार अपने ही एटार्नी जनरल की राय को खारिज नहीं करती। सुषमा कोर्ट जाएं, उससे पहले ही सरकार ने सच कबूल लिया। पर झूठ बोलने वाले एटार्नी जनरल का क्या होना चाहिए? यों अब ए.जी. के बचाव में कहा जा रहा- उन ने यह नहीं कहा कि पैनल के सामने थॉमस के चार्जशीट की चर्चा नहीं हुई। अलबत्ता उन ने यह कहा कि पेपर और फाइल सर्कुलेट नहीं किए गए। सो फिर वही बात, एक झूठ को छुपाने के लिए सौ झूठ का सहारा। सोमवार को कांग्रेस ने थॉमस के  बचाव में कई फाइलें खंगाल डालीं। बीजेपी और लेफ्ट को आईना दिखाते हुए खुद पीछे खड़ी हो गई। कांग्रेस के कानूनदां युवा प्रवक्ता मनीष तिवारी खासे तेवर में बोले- थॉमस के खिलाफ चार्जशीट की बात करने वाली बीजेपी ने भी तो वाजपेयी सरकार के वक्त अयोध्या केस में चार्जशीटेड प्रभात कुमार को केबिनेट सैक्रेट्री बनाया था। जबकि आई.के. गुजराल के पीएम रहते जब प्रभात कुमार का मामला आया था, तो इसी चार्जशीट के आधार पर खारिज कर दिया गया था। फिर तिवारी ने केरल की वामपंथी सरकार को भी याद दिलाया- कैसे केरल सरकार ने अक्टूबर 2006 में थॉमस के खिलाफ मुकदमे की अनुमति मांगी थी। पर सितंबर 2007 में इसी वामपंथी सरकार ने थॉमस को केरल का चीफ सैक्रेट्री बना दिया। अब इसे मनीषियाई दलील कहें या खिसियाई? ऐसी दलीलों का साफ मतलब- अगर मैं चोर, तो तू डकैत। क्या यह लोकतंत्र की आड़ में मनमर्जी नहीं? आखिर सरकार क्या संदेश देना चाह रही? महंगाई, भ्रष्टाचार ने देश की साख पर बट्टा लगा दिया। स्पेक्ट्रम घोटाले में राजा से फिर पूछताछ हुई। पर अभी तक ठोस कार्रवाई नहीं हुई। सुप्रीम कोर्ट में दस फरवरी को स्टेटस रिपोर्ट देने के लिए सीबीआई तेजी का दिखावा कर रही। इधर सिब्बल की बनाई जस्टिस पाटिल कमेटी ने प्रक्रिया की खामी पर अपनी रपट सौंप दी। राजा समेत कई अधिकारियों को जिम्मेदार बताया गया। पर अभी पूरी रपट का खुलासा होना बाकी। रपट सामने आएगी, तो राजनीति भी तय। पर सवाल, देश इस गर्त से कब निकलेगा? भ्रष्टाचार-महंगाई ने निवेश का माहौल बिगाड़ा। नरेगा के ढोल तो सुहाने, पर अब तक बंटे एक लाख छह हजार करोड़ में साठ फीसदी बांटने वाले ही खा गए। श्रम, बीमा, बैंकिंग सुधार अभी भी अधर में। सरकार और सोनिया की एनएसी में एक राय नहीं। रही-सही कसर पर्यावरण के नाम पर जयराम पूरी कर रहे।
---------
31/01/2011

Friday, January 28, 2011

मनमोहन नहीं, केरल कैडर की सरकार!

 सौ, लाख नहीं, अब खरबों टके का सवाल- पी.जे. थॉमस पर सरकार क्या रुख अपनाएगी? शुक्रवार को दिन भर कांग्रेस खेमे में मत्थापच्ची होती रही। देर शाम हाई-पॉवर वाली कोर ग्रुप की थॉमसाई मीटिंग तय थी। पर आखिरी वक्त में मीटिंग रद्द हो गई। वजह सोनिया गांधी का बीमार होना बताया गया। अस्वस्थता की वजह से ही सोनिया गणतंत्र दिवस समारोह में भी शिरकत नहीं कर पाई थीं। अब शायद सोनिया तो दो-चार दिन में भली-चंगी हो जाएंगी। पर सवाल- सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियों से बीमार मनमोहन सरकार स्वस्थ कैसे होगी? कोर ग्रुप की मीटिंग रद्द हुई। तो पीएम-प्रणव की अकेले में गुफ्तगू हुई। विधि मंत्री वीरप्पा मोइली तो गुरुवार रात ही पीएम से मिल आए। पर थॉमस मुद्दे का हल नहीं मिल रहा। सुषमा स्वराज ने मैदान में कूद सरकार की मुसीबत और बढ़ा दी। अब अगर सुषमा ने बतौर सिलेक्शन कमेटी मेंबर हलफनामा पेश कर दिया। तो सीधे पीएम और होम मिनिस्टर भी पक्षकार हो जाएंगे। सो शुक्रवार को कांग्रेस ने ऑफ द रिकार्ड नया झूठ बांचा। सुषमा ने पीएम-चिदंबरम के सामने थॉमस के खिलाफ चार्जशीट का मामला उठाया था। पर कांग्रेस की ताजा दलील- मीटिंग की मिनिट्स में चार्जशीट की कोई बात नहीं। सुषमा ने चार्जशीट की बात तब उठाई, जब कमेटी थॉमस का नाम एप्रूव कर चुकी थी। अब एक झूठ को छुपाने के लिए कांग्रेस कितना झूठ बोलेगी, आप अंदाजा लगा लें। सुषमा ने एप्रूवल लेटर पर दस्तखत करते हुए ऊपर लिख दिया- ‘आई डिसएग्री’। यानी सुषमा ने असहमति जताई। तो इसका आधार भी दस्तखत से पहले ही बताया होगा। यानी थॉमस के नाम पर मनमोहन-चिदंबरम की ओर से मोहर लगने के बाद सुषमा ने जो समझदारी दिखाई, कांग्रेस बचाव का रास्ता नहीं ढूंढ पा रही। अब आडवाणी ने भी खुलासा किया- जब मैं विपक्ष का नेता था, तभी ऐसे विवाद शुरू हो गए थे। तो मैंने सरकार से कहा था, जिस पैनल में विपक्ष के नेता को रखे जाने का नियम, उसमें किसी भी नियुक्ति के लिए एक से अधिक नाम होना चाहिए। पर सरकार ने सीवीसी के लिए तीन नाम जरूर रखे। फिर भी थॉमस के नाम पर ही अड़ी रही। जबकि सुषमा ने थॉमस को छोड़ बाकी दो नामों में से किसी को भी चुनने का सुझाव दिया था। ये सब बातें अब एक तथ्य, जिन्हें नकारा नहीं जा सकता। पर सवाल- सरकार ने थॉमस नाम पर हठधर्मिता क्यों अपनाई? अब थॉमस गले की फांस बन गए। तो कनफ्यूज्ड सरकार कभी बचाव में उतर आती, तो कभी कदम पीछे खींच लेती। थॉमस को सीवीसी बनाने के लिए सरकार ने खूंटा गाड़ दिया। पर खूंटा उखाडऩे की हिम्मत नहीं। थॉमस ठहरे नौकरशाह। सो नैतिकता को जेब में डाल कुर्सी छोडऩे को राजी नहीं। अब जब सैंया भए कोतवाल, तो भला थॉमस राजनीतिक फायदे के लिए सरकार का मोहरा क्यों बनें? पर थॉमस विवाद ने एक नई थ्योरी शुरू कर दी। आईएएस लॉबी में आजकल दावे के साथ एक गॉसिप चल रहा- थॉमस को हटाना मनमोहन सरकार के बूते में नहीं। वजह- थॉमस केरल कैडर के आईएएस। अब जरा केंद्र सरकार में महत्वपूर्ण पदों पर काबिज नौकरशाहों और उनके राजनीतिक संरक्षकों पर गौर करिए। कैबिनेट सैक्रेट्री के.एम. चंद्रशेखर केरल कैडर से। पीएम के प्रिंसीपल सैक्रेट्री टी.के.ए. नायर केरल कैडर से। देश के होम सैक्रेट्री जी.के. पिल्लई केरल कैडर से। देश के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार शिवशंकर मेनन केरल से। सीवीसी पी.जे. थॉमस के बारे में तो दोहराने की जरूरत नहीं। देश के योजना आयोग में सैक्रेट्री सुधा पिल्लई केरल कैडर से, रिश्ते में होम सैक्रेट्री जी.के. पिल्लई की पत्नी। यानी देश की बागडोर भले राजनीतिक तौर से मनमोहन संभाल रहे। पर प्रशासन पूरी तरह से केरल कैडर के नौकरशाहों के हाथ। अब सवाल- राजनीतिक संरक्षण के बिना नौकरशाह इतने मजबूत कैसे? सरकार में इतने बड़े पदों पर नियुक्ति क्या बिना दस जनपथ की हरी झंडी के संभव? केरल में जब करुणाकरण ने ए.के. एंटनी के खिलाफ मोर्चा खोला था। तो सिर्फ सोनिया के कहने पर ही एंटनी ने सीएम की कुर्सी छोड़ी थी। अब एंटनी केंद्र में रक्षा मंत्री। पर सोनिया के सबसे विश्वस्त सिपहसालार। जिन बड़ी मीटिंगों में सोनिया शामिल नहीं हो सकतीं, उनकी ब्रीफिंग एंटनी ही सोनिया को करते। भले सरकार में कई जीओएम के मुखिया प्रणव दा हों। पर हर जीओएम में एंटनी जरूर मिल जाएंगे। सच्चाई यही, सोनिया कभी भी प्रणव-चिदंबरम जैसे नेताओं को फ्री हैंड नहीं छोड़तीं। सनद रहे, सो 2008 का एक वाकया भी याद दिलाते जाएं। जब एटमी डील पर लेफ्ट ने समर्थन वापसी का मन बना लिया था। प्रणव दा के घर सीताराम येचुरी फैसलाकुन मीटिंग करने पहुंचे। तो उस मीटिंग में एंटनी भी भेजे गए थे। सो मनमोहन लाख चाह लें, थॉमस को नहीं हटा सकते। बाबा रामदेव ने शुक्रवार को सही फरमाया- मनमोहन व्यक्तिगत तौर से ईमानदार। पर राजनीतिक तौर से नहीं। सचमुच थॉमस मामले पर हुई किरकिरी से अब यही लग रहा, देश में मनमोहन नहीं, केरल कैडर की सरकार चल रही।
---------
28/01/2011

Thursday, January 27, 2011

थॉमस पर और कितनी थू-थू कराएगी सरकार?

अब तो टमाटर-प्याज-अंडे महंगे हो गए। तो आम आदमी भला गुस्से में क्या खाक बरसाएगा? सो सरकार अपना जूता अपने ही सिर मारने लगी। अपने गणतंत्र दिवस के अगले दिन ही सुप्रीम कोर्ट में सीवीसी पी.जे. थॉमस मामले में सुनवाई हुई। तो मानो, सरकार को सांप सूंघ गया। यों 17 जनवरी को जब हलफनामा दाखिल किया। तो थॉमस को ईमानदार छवि का काबिल उम्मीदवार बताया। फिर थॉमस ने भी कोर्ट के नोटिस का जवाब दिया। तो अपने ऊपर लगे आरोपों को राजनीतिक षडयंत्र का हिस्सा बताया। पर गुरुवार को चीफ जस्टिस एस.एच. कपाडिय़ा की बैंच ने सिर्फ इतना भर पूछा- क्या सरकार को थॉमस के खिलाफ चार्जशीट की जानकारी थी? क्या सीवीसी की नियुक्ति में सही प्रक्रिया का पालन किया गया था? पर अटार्नी जनरल जी.ई. वाहनवती ने जवाब दिया- कोलेजियम के सामने यह मुद्दा नहीं लाया गया, न ही पेश किए गए बायोडाटा में ऐसा कोई पहलू था। यानी कुल मिलाकर सरकार ने थॉमस के खिलाफ चार्जशीट होने की जानकारी से इनकार कर दिया। अब सवाल- थॉमस की नियुक्ति पर कितना थू-थू कराएगी सरकार? सितंबर में जब थॉमस सीवीसी बनाए गए। तो तीन मेंबरी कोलेजियम में सुषमा स्वराज ने अपना विरोध जताया। उन ने केरल के पॉम ऑयल घोटाले में थॉमस के खिलाफ चार्जशीट का जिक्र किया। पर बाकी दो मेंबर यानी पीएम-होम मिनिस्टर ने तय कर लिया था। सो विपक्ष की नेता की ना के बावजूद थॉमस सीवीसी बनाए गए। बीजेपी ने बाकायदा राष्ट्रपति का दरवाजा खटखटाया। थॉमस की नियुक्ति पर दस्तखत न करने की गुहार लगाई। पर तब होम मिनिस्टर पी. चिदंबरम ने थॉमस को क्लीन चिट दी थी। सो सात सितंबर को थॉमस की बतौर सीवीसी शपथ हो गई। फिर कांग्रेस ने तो किला फतह करने वाले अंदाज में बीजेपी पर कई दिनों तक लगातार हमले बोले। बीजेपी को संवैधानिक संस्था का मान गिराने वाली करार दिया। अब कांग्रेस बताए, सुप्रीम कोर्ट में वाहनवती ने सच बोला या झूठ? अगर सरकार के संज्ञान में थॉमस के खिलाफ चार्जशीट का मामला नहीं था। तो फिर सवाल सरकार की साख का। जब देश का पीएम और होम मिनिस्टर सीवीसी जैसे महत्वपूर्ण पद पर किसी व्यक्ति को तैनात कर रहे हों और उस व्यक्ति के भूत-वर्तमान का पता न हो। तो ऐसी सरकार से क्या उम्मीद। क्या पता कल को ताजमहल, लालकिला और कुतुब मीनार का टेंडर निकल जाए। फिर सरकार कहे- हमें पता नहीं था। किसी भी सरकारी नियुक्ति से पहले वैरीफिकेशन और सिक्युरिटी क्लीयरेंस की प्रक्रिया निभाई जाती। पर थॉमस के मामले में ऐसा क्यों नहीं किया? यों सीवीसी की नियुक्ति में चौतरफा घिरी सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में गुरुवार को जानबूझकर झूठ बोला। थॉमस की शपथ से पहले चिदंबरम क्लीन चिट दे चुके। तो शपथ के बाद मनमोहन-चिदंबरम ने खम ठोकते हुए कहा था- हमने सही कदम उठाया। तीन नामों के पैनल में से सबसे उम्दा उम्मीदवार चुना। अब पीएम-एचएम जवाब दें- जब सही कदम उठाया, उम्दा उम्मीदवार चुना। तो अब सुप्रीम कोर्ट में हेकड़ी क्यों नहीं दिखा पा रहे? नियुक्ति के वक्त क्लीन चिट दी। मामला सुप्रीम कोर्ट गया। पहली सुनवाई में ही 22 नवंबर को कोर्ट ने पूछा- एक अभियुक्त सीवीसी कैसे हो सकता? बैंच ने माना, आपराधिक मुकदमा झेल रहा व्यक्ति अगर सीवीसी होगा। तो हर कदम पर सवाल उठेंगे। ऐसा व्यक्ति दूसरे की आपराधिक फाइल को आगे कैसे बढ़ाएगा? पर तब अटार्नी जनरल वाहनवती ने दलील दी थी- अगर नियुक्ति के मूल मानदंड के मुताबिक सवाल उठने लगे, तो संवैधानिक पद पर किसी की भी नियुक्ति नहीं हो पाएगी। पर थॉमस ने तो बाद में निर्लज्जता की सारी हदें पार करते हुए कहा- तेल घोटाले में मेरे खिलाफ भ्रष्टाचार नहीं, सिर्फ आपराधिक मुकदमा। उन ने सुप्रीम कोर्ट की कई तल्ख टिप्पणियों के बावजूद इस्तीफा देने से इनकार कर दिया। अब फिसल गए, तो हर-हर गंगे कर रही सरकार। सो विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज भी थॉमस विवाद में सीधे कूद पड़ीं। सुप्रीम कोर्ट में अटार्नी जनरल की राय को सफेद झूठ करार देते हुए एफीडेविट डालने का एलान कर दिया। बोलीं- नियुक्ति के वक्त मैंने पॉम ऑयल घोटाले में थॉमस के खिलाफ चार्जशीट का मामला कोलीजियम में उठाया था। लेकिन सच सामने लाने को अब मैं खुद कोर्ट में एफीडेविट दूंगी। सुषमा की बात में दम, क्योंकि बीजेपी ने थॉमस की शपथ से पहले ही यह मुद्दा उछाल राष्ट्रपति से अपील की थी। सो अब कांग्रेस को काटो, तो खून नहीं। गुरुवार को शकील अहमद बोले- यह मामला सरकार और सुप्रीम कोर्ट के बीच। पर सुषमा कोर्ट जाना चाहें, तो जा सकतीं। अब थॉमस मामले की सुनवाई अगले हफ्ते होगी। तो पता नहीं सरकार कौन सा नया राग सुनाएगी। थॉमस के खिलाफ चार्जशीट की जानकारी सरकार को शायद तब मिली, जब करुणाकरण का देहांत हो गया। सुप्रीम कोर्ट ने पॉम ऑयल घोटाले में ट्रायल को हरी झंडी दिखा दी। अब जिस सरकार को अपने मुलाजिम की जानकारी नहीं। वह भला मजबूर जनता की क्या फिक्र करेगी?
----------
27/01/2011

Tuesday, January 25, 2011

अराजक होता ‘तंत्र’, लुटता-पिटता ‘गण’

अंधा बांटे रेवड़ी, अपनों-अपनों को देय। सचमुच नेताओं ने अपने गणतंत्र को सठियाने को मजबूर कर दिया। सो गणतंत्र के इकसठ साल पूरे होने की पूर्व संध्या पर हर साल की तरह पद्म अवार्ड का एलान हुआ। तो मनमोहन सरकार ने अंधा और रेवड़ी की कहावत फिर चरितार्थ कर दी। गांव के लोगों को पेटू बताकर महंगाई से मुंह चुराने वाले योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह आहलूवालिया पद्म विभूषण हो गए। यानी देश के दूसरे सर्वोच्च नागरिक सम्मान से मनमोहन ने अपने दोस्त को नवाज दिया। क्या महंगाई का ठीकरा गांव के गरीबों पर फोडऩा नागरिक सेवा कहलाता? वाजपेयी सरकार में सत्ता की चाबी घुमाने वाले बृजेश मिश्र भी मनमोहन राज में पद्म विभूषण हो गए। एटमी डील पर बीजेपी की नैया डुबो, मनमोहन को पार लगाया। सो देश का दूसरा सर्वोच्च नागरिक सम्मान मिल गया। अब नागरिक सम्मान ऐसे बंटेंगे, तो गणतंत्र का क्या सम्मान होगा? सो संकटों से जूझ रहा अपना देश गणतंत्र के बासठवें साल में प्रवेश कर रहा। पर चुनाव में बेरंग हुआ विपक्ष अब तिरंगे से राजनीति का रंग ढूंढ रहा। तो सरकार ब्लैकमनी के मामले में दिल से ब्लैक दिख रही। गणतंत्र की पूर्व संध्या पर वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी ने ब्लैकमनी पर सफाई पेश की। तो एक बार फिर काले चोरों का नाम बताने से इनकार कर दिया। पर दलील दी- जब आयकर विभाग जांच के बाद मुकदमा दायर करेगा। तो नाम खुद-ब-खुद सामने आ जाएंगे। यों प्रणव दा ने माना, पिछले 18 महीने में 15,000 करोड़ रुपए काले धन का पता चला। जिनसे 34,601 करोड़ रुपए की कर वसूली हुई। पर सवाल- क्या सिर्फ टेक्स चोरी की कार्रवाई से ही काला धन सफेद हो जाएगा? काले चोरों ने देश का धन चुराकर विदेशों में जमा किया। तो क्या यह देश के साथ अपराध नहीं? आखिर समझौते की ओट में चोरों का नाम छुपाने का क्या मतलब? अब प्रणव दा ने पांच सूत्री कार्य योजना का एलान किया। पर बीजेपी का आरोप- नाम खुला, तो कांग्रेस को परेशानी होगी। सो सरकार में काले धन पर संकल्प का अभाव। अगर सरकारें ठान लें, तो क्या कुछ नहीं हो सकता। बीजेपी की तिरंगा यात्रा को रोकने की उमर अब्दुल्ला ने ठान ली। सो मंगलवार को लखनपुर बार्डर पर ही यात्रा को रोक दिया। तमाम छोटे-बड़े नेता गिरफ्तार कर लिए गए। पर गिरफ्तारी के बाद सुषमा-जेतली ने तिरंगे की आन की खातिर खूब तेवर दिखाए। जेतली बोले- आजादी से पहले तिरंगा उठाने वालों को गिरफ्तार किया जाता था। अब जम्मू-कश्मीर में फिर वैसा ही हुआ। सुषमा ने क्रोध का इजहार करते हुए पूछा- हमारा अपराध क्या? हम तो तिरंगा फहराने आए थे। अलगाववादियों की चुनौती स्वीकार की। सो हमें सुरक्षा नहीं चाहिए। भले तिरंगा फहरा कर लाल चौक से हम जिंदा लौटें या मुर्दा। पर सरकार ने तिरंगे पर पहरा लगा अलगाववादियों को संरक्षण दिया। यों सुषमा की दलील सोलह आने सही। पर अपना फिर वही सवाल- लाल चौक पर तिरंगा फहरा लेने से क्या अलगाववाद खत्म हो जाएगा? क्या कश्मीर समस्या सुलझ जाएगी? अगर बीजेपी का जवाब हां, तो फिर सवाल- जम्मू-कश्मीर की सत्ता में भागीदार और केंद्र के छह साल के राज में हर साल झंडा फहरा कर अलगाववाद खत्म क्यों नहीं कर लिया? क्यों आडवाणी हुर्रियत वालों को बुलाकर मेज गोल-गोल करते रहे? कभी कोई नेता आम आदमी के लिए जिंदा या मुर्दा का संकल्प क्यों नहीं लेता? पर बात तिरंगा यात्रा की। तो गिरफ्तारी के बाद सीएम उमर अब्दुल्ला ने भी संदेश दिया। बोले- लाल चौक भारत का हिस्सा। पर शांति भंग नहीं होने दी जाएगी। उमर ने न सिर्फ बीजेपी की यात्रा रोकी। अलबत्ता अलगाववादियों को भी रोकने का बंदोबस्त कर रखा। श्रीनगर के लाल चौक पर जबर्दस्त पहरा। पर चोरी-छिपे बीजेपी के कुछ वर्कर श्रीनगर पहुंच चुके। सुषमा ने खुद इस बात का एलान किया। सो सबकी निगाह गणतंत्र दिवस पर। दिल्ली में राजनाथ सिंह राजघाट पर भूखे पेट धरना दिए बैठे। पर देश का आम आदमी ने कितनी रात भूख में गुजारी, क्या किसी नेता को सही आंकड़ा मालूम? तिरंगे का सम्मान हो, पर तीन रंग के सही अर्थ की तरह। वोट बैंक के लिए रंगों का मतलब नहीं बदलना चाहिए। पर अफसोस, इकसठ साल में ही नेताओं ने गणतंत्र का बैंड बजा दिया। मंगलवार को प्रणव दा ने ब्लैकमनी पर सफाई दी। बीजेपी ने तिरंगे पर रंग दिखाया। महाराष्ट्र के मनमाड़ में तेल माफियाओं ने मिलावट से रोकने वाले एडीएम को जिंदा जला दिया। तो न्याय व्यवस्था की लेटलतीफी, बच्चियों पर जुल्म से आहत उत्सव शर्मा ने गाजियाबाद कोर्ट के बाहर आरुषि के पिता राजेश तलवार पर फरसे से हमला कर दिया। इसी शख्स ने रुचिका गिरहोत्रा कांड के दोषी एसपीएस राठौड़ पर भी हमला किया था। सो अब भले उत्सव शर्मा की मानसिक हालत खराब बताई जा रही। पर अपने गणतंत्र के लिए यह सबक, कैसे इकसठ साल में ही दम घुट रहा। भ्रष्टाचार हो या गरीबी, पानी सिर से निकलने के बाद नया कानून बनाने का सुर्रा भर छोड़ दिया जाता। सो नेताओं की वजह से आज व्यवस्था से भी लोगों का भरोसा उठता दिख रहा। पद्म अवार्ड ने भी मंगलवार को इसका नमूना दिखा दिया। पिछली बार ओलंपिक में जीतने वाले तमाम खिलाडिय़ों को पद्म अवार्ड मिल गए। पर गांव का छोरा और कुश्ती में बाजी मारने वाला सुशील छूट गया था। सो अबके सरकार ने भूल सुधार कर ली। यानी सचमुच आज गणराज्य तो लुट-पिट रहा। तंत्र में बैठने वाले मलाई मार रहे।
----------
25/01/2011

Monday, January 24, 2011

कर्नाटक से कश्मीर तक बीजेपी की कशमकश

कर्नाटक से कश्मीर तक सियासत का पारा चढ़ गया। गवर्नर की फूंक से कर्नाटक में परेशान बीजेपी कश्मीर में झंडा फहराने की ठान चुकी। सो फिलहाल श्रीनगर से पहले दिल्ली में राजनीतिक सरगर्मी। तिरंगे को लेकर टकराव तय हो चुका। पर तिरंगा विवाद से पहले बात कर्नाटक की। सोमवार को आडवाणी-सुषमा-जेतली संग कर्नाटक से बीजेपी के सभी सांसद राष्ट्रपति के दर पहुंचे। गवर्नर हंसराज भारद्वाज को वापस बुलाने की मांग की। अब तक की उनकी गवर्नरी का किस्सा बांच आडवाणी ने दलील दी- हंसराज भारद्वाज को वापस बुलाने से कर्नाटक, संविधान और लोकतंत्र की सेवा होगी। पर सवाल, क्या येदुरप्पा सरकार का भ्रष्टाचार संविधान और लोकतंत्र की सेवा? यों इसमें कोई शक नहीं, गवर्नर हंसराज भारद्वाज ने जेहादी गवर्नरी क्लब में शामिल होने की ठान रखी। एस.सी. जमीर, सिब्ते रजी, बूटा सिंह, रोमेश भंडारी, रामलाल जैसे गवर्नर इतिहास बना चुके। सो कर्नाटक का गवर्नर बनने के वक्त से ही हंसराज मिशन येदुरप्पा में जुटे हुए। पर अबके उन ने येदुरप्पा के खिलाफ मुकदमा चलाने की अनुमति देकर कुछ गलत नहीं किया। आखिर देश की जनता में यह संदेश जाना चाहिए, सीएम हो या डीएम या पीएम, कानून में कोई विशेषाधिकार नहीं। अगर विशेषाधिकार की चादर ओढ़ सत्ता में बैठे नेता-नौकरशाह मुकदमे से बचने लगे, तो भ्रष्टाचार का खात्मा कैसे होगा? अब बीजेपी गवर्नर के संवैधानिक दायरे की दलील दे रही। गवर्नर को केबिनेट की सलाह पर काम करने को जरूरी बता रही। पर सुप्रीम कोर्ट पहले ही साफ कर चुका- ऐसे मामलों में गवर्नर विवेकाधिकार से फैसला कर सकते हैं। जिसके लिए केबिनेट की सलाह मानना जरूरी नहीं। सो अब कोर्ट से येदुरप्पा को कितनी राहत मिलेगी, यह तो बाद की बात। पर क्या कोई गवर्नर चुनी हुई सरकार के मुखिया के खिलाफ इतना बड़ा फैसला जनता की नब्ज भांपे बिना ले सकता? आंध्र में गवर्नर रामलाल ने एन.टी.आर. की सरकार बर्खास्त की थी। तब क्या हुआ था, यह इतिहास किसी से छुपा नहीं। एन.टी.आर. की सरकार जनदबाव में दुबारा बहाल हुई। अगर कर्नाटक में येदुरप्पा सरकार की साख कमजोर न पड़ी होती। तो हंसराज ऐसा कदम उठाने से पहले सौ दफा सोचते। क्या बंगाल में तमाम प्रशासनिक विफलता के बाद भी गवर्नर वहां के सीएम के खिलाफ ऐसा कदम उठाने की सोच सकते? ममता बनर्जी यूपीए को समर्थन की एवज में कई बार राष्ट्रपति शासन की मांग कर चुकीं। पर केंद्र सरकार बयानबाजी के सिवा कुछ नहीं कर पा रही। सो असली वजह, बुद्धदेव की लोकप्रियता। पर कर्नाटक में क्या जनता सडक़ों पर उतरी? सचमुच येदुरप्पा सरकार राज्य में शासन के बजाए अपनों के झंझट से ही जूझ रही। सो जनता के बीच सहानुभूति खो चुके। राजनीति के घाघ गवर्नर हंसराज ने मौके की नजाकत भांप छक्का मार दिया। सो बीजेपी बाउंड्री से बाहर गई बाल को ढूंढ रही। कर्नाटक की किचकिच के बीच कश्मीर में तिरंगा फहराने का दांव भी उलटा पड़ रहा। कर्नाटक से जम्मू जा रही ट्रेन को रात के अंधेरे में ही अहमदनगर से वापस मोड़ दिया। जम्मू से लगी राज्य की सारी सीमाएं सील कर दी गईं। सोमवार को अरुण जेतली, सुषमा स्वराज और अनंत कुमार जहाज से जम्मू पहुंचे। तो रन-वे पर ही रोक दिया गया। वापस जाने का दबाव डाला गया। तो तीनों नेता रन-वे पर ही धरना देकर बैठ गए। सो जब बात नहीं बनी, तो प्रशासन ने तीनों नेताओं को गिरफ्तार कर लिया। इधर दिल्ली में राजघाट पर रात नौ बजे राजनाथ सिंह भूख हड़ताल पर बैठ गए। यानी तिरंगे के लिए राजनीतिक के तरकश से तीर निकलने लगे। पीएम ने तिरंगे पर राजनीति न करने की सलाह दी। तो बीजेपी ने अपनी यात्रा को राष्ट्रभक्ति बताया। पर यह कैसी राष्ट्रभक्ति, जब अपने सहयोगी भी बीजेपी से सहमत नहीं? शरद यादव, नीतिश कुमार ने घाटी की संवेदनशीलता की दलील देते हुए यात्रा को रोकने की सलाह दी। सो सवाल बीजेपी से- अगर मनमोहन और उमर सरकार बीजेपी की कथित राष्ट्रभक्ति के खिलाफ, तो यादव-नीतिश को क्या कहेगी? क्या बीजेपी भूल गई, हाल ही में घाटी किस तरह साढ़े तीन महीने तक सुलग रही थी। अगर बीजेपी अलगाववादियों को मुंहतोड़ जवाब देना चाह रही। तो क्या झंडा फहराने से अलगाववाद दब जाएगा? लाल चौक पर 1992 में मुरली मनोहर जोशी, तो 2008 में बीजेपी के आर.पी. सिंह ने झंडा फहराया था। फिर अलगाववाद खत्म क्यों नहीं हुआ? अगर बीजेपी झंडा फहरा भी ले, तो क्या कश्मीर समस्या सुलझ जाएगी? कश्मीर की संवेदनशीलता और विवाद किसी से छुपे नहीं। सो उन्माद नहीं, राजनीतिक धैर्य से काम लेने की जरूरत। पर लाल चौक की यात्रा रोककर उमर अपना वोट बैंक साध रहे। तो बीजेपी को अपना उल्लू सीधा होता दिख रहा। पर बीजेपी यह भूल रही, आज का युवा राम-रहीम का विवाद नहीं चाहता। तिरंगे को लेकर अपने ही देश में हिंसा का वातावरण नहीं चाहता। सो कहीं ऐसा न हो, युवा वर्ग को जोडऩे की कवायद में बीजेपी की युवा एक्सप्रेस का ब्रेक डाउन हो जाए। अगर लाल चौक पर झंडा फहराना ही राष्ट्रभक्ति, तो जब कश्मीर में फारुक के साथ गठबंधन और केंद्र में छह साल के शासन के वक्त ऐसा क्यों नहीं किया। क्या विपक्ष में रहकर ही राष्ट्रभक्ति याद आती? राष्ट्रीय दल होने के नाते राज्य की संवेदनशीलता को समझना बीजेपी का फर्ज।
----------
24/01/2011

Friday, January 21, 2011

‘जिम्मेदारी’ तो नहीं, नेता सिर्फ ‘जिमदारी’ समझते

इसे कहते हैं, अब आया ऊंट पहाड़ के नीचे। टू-जी स्पेक्ट्रम घोटाले में कैग की रपट को कपिल सिब्बल जमकर कोस रहे थे। कैग के खिलाफ सिब्बल की चार्जशीट कांग्रेस को भी भा गई थी। सो संगठन और सरकार की जुगलबंदी कैग को झुठलाने में जुटी रहीं। पर शुक्र है, शुक्रवार को सिब्बल की शामत आ गई। सुप्रीम कोर्ट ने सिब्बल को कड़ी फटकार लगाई। तो संसद की पीएसी ने भी सवाल उठाए। बीजेपी को हमलावर होने का फिर मौका मिल गया। तो कांग्रेस की बोलती बंद हो गई। सिब्बल की तो सिट्टी-पिट्टी गुम। सो दिन भर सुप्रीम कोर्ट और पीएसी की नसीहत पर मंथन करने के बाद मीडिया से मुखातिब हुए। तो आवाज से हेकड़ी नदारद थी। बोले- हमने अपनी बात जनता के सामने रखी थी। किसी भी संवैधानिक संस्था का निरादर नहीं किया, न किसी के काम में दखल दिया। बतौर टेलीकॉम मंत्री मुझे मेरी जिम्मेदारी का अहसास। मुझे वकील की जिम्मेदारी भी पता। सो मैं संस्था के निरादर की बात सोच भी नहीं सकता। सिब्बल वाणी सुन एक और कहावत याद आई। चौबेजी चले थे छब्बे बनने, दुबे बनकर लौट आए। पर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी में वही आशंका, जो सिब्बल की सात जनवरी की प्रेस कांफ्रेंस के बाद हमने भी जताई थी। जस्टिस जे.एस. सिंघवी और ए.के. गांगुली की बैंच ने सिब्बल की टिप्पणी पर कहा- यह दुर्भाग्यपूर्ण है। मंत्री को जिम्मेदारी का कुछ अहसास होना चाहिए। ताकि उनके बयानों से जांच पर कोई फर्क न पड़े। बैंच ने बाकायदा सीबीआई को हिदायत दी- किसी के भी बयानों से प्रभावित हुए बिना घोटाले की जांच करे। अब कोर्ट सीबीआई को भले लाख हिदायत दे, पर सीबीआई तो सरकार का जिन्न। आका जो हुक्म देता, उसे हर कीमत पर पूरा करता। सो सीबीआई की बात तो होती रहेगी। फिलहाल बात सिब्बल की। जिन ने बतौर टेलीकॉम मंत्री समूचे घोटाले पर परदा डालने की कोशिश की। जब सिब्बल ने सात जनवरी को कैग रपट को झुठलाया, तो मंत्री कम वकील अधिक दिखे। स्पेक्ट्रम घोटाले के आंकड़े पर भारी-भरकम प्रजेंटेशन के साथ खूब दलीलें दीं। और आखिर में जनता को समझाने की कोशिश की, स्पेक्ट्रम घोटाला हुआ ही नहीं। तब सिब्बल सुप्रीम कोर्ट की कई तल्ख टिप्पणियों को नजरअंदाज कर चुके थे। कोर्ट ने एक बार कहा था- इस घोटाले में जितना दिख रहा, मामला उससे कहीं आगे है। पर पेशे से वकील सिब्बल ने कह दिया- जितना कहा जा रहा, उससे कई गुना कम क्या, कुछ नजर ही नहीं आ रहा। सचमुच सिब्बल ने आंकड़ों का ऐसा जाल बुना था, घोटालों को एक नील 76 खरब के बजाए, सीधा निल (शून्य) बता दिया। सो सिब्बल के अनाड़ीपन पर अब पीएसी के अध्यक्ष मुरली मनोहर जोशी ने स्पीकर को चिट्ठी लिख दी। मीरा कुमार को लिखी चिट्ठी में उन ने कई गंभीर सवाल उठाए। क्या संसद में रपट पेश हो जाने के बाद विभागीय मंत्री को टिप्पणी करने का हक है? जबकि मंत्रालय को अपना पक्ष रखने के लिए पूरा वक्त दिया गया। क्या कैग के खिलाफ बयान देने से पहले सिब्बल ने पीएम के संज्ञान में या अनुमति ली थी? अगर इसका जवाब हां है, तो सुप्रीम कोर्ट की निगरानी वाली सीबीआई जांच, पीएसी और कैग का कोई मतलब नहीं। इससे लोकतंत्र पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा। जोशी ने स्पीकर से अनुरोध किया कि मंत्रियों को ऐसी बयानबाजी से रोका जाए। वरना मंत्री और संवैधानिक संस्थाओं में टकराव पैदा हो सकता है। पर क्या इतनी फजीहत के बाद सिब्बल, सरकार और कांग्रेस जिम्मेदारी समझेंगे? सुप्रीम कोर्ट ने जिम्मेदारी की बात की। पर बिहार के कुछ गांवों में जिमदारी शब्द का प्रचलन। जिसका मतलब बपौती से। सो सरकार अपनी जिम्मेदारी क्या समझेगी, यह तो वही जाने। पर इसमें कोई शक नहीं, सत्ता को नेतागण अपनी जिमदारी (बपौती) ही समझते। सो सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी के बाद सरकार को शर्मिंदगी महसूस हो रही होगी, ऐसा नहीं लगता। जब सुप्रीम कोर्ट ने सीधे पीएम और पीएमओ पर सवाल उठाए। अल्टीमेटम देकर पीएमओ से हलफनामा लिया। सरकार और कांग्रेस को तब शर्म नहीं आई, तो भला अब कैसी उम्मीद? संसदीय इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ, जब कोर्ट ने सीधे पीएम पर टिप्पणी की। पर समूची कांग्रेस पीएम के बचाव में उतरी। राहुल गांधी ने पीएम से मुलाकात कर यहां तक कह दिया- कोर्ट की टिप्पणी से शर्मिंदगी वाली कोई बात नहीं। सो मौजूदा सरकार को तो जूते और प्याज खाने की आदत हो चुकी। वैसे भी कोर्ट की कितनी परवाह, यह तो ब्लैकमनी के मामले में भी साफ। स्पेक्ट्रम घोटाले में कोर्ट सख्त न होता, तो सरकार बैक फुट पर न होती। समझौतों की दलील देकर काले धन के चोरों का नाम लेने से परहेज। पर अबू सलेम के मामले में भी तो समझौता। तो क्या न्यायपालिका भी कार्यपालिका के समझौते के दायरे में होंगी? ट्रायल कोर्ट ने तो शुरुआत में ही कह दिया था- कोर्ट अपना काम करेगा, सरकार के समझौते से मतलब नहीं। अब शुक्रवार को सिब्बल पर कोर्ट की फटकार से कांग्रेस को सांप सूंघ गया। तो अभिषेक मनु सिंघवी बोले- मामला कोर्ट में, सो टिप्पणी नहीं करेंगे। फिर सवालों की बौछार हुई। तो बोले- मंत्री से पूछिए। पर क्या कांग्रेस अपना कहा भूल गई? आठ जनवरी को इसी मंच से कांग्रेस ने कैग को खरी-खरी सुना सिब्बल की सराहना की थी। पर अब भ्रष्टाचार से लडऩे का महज संदेश देने में जुटे मनमोहन। शुक्रवार को इधर सुप्रीम कोर्ट ने फटकारा। उधर जीओएम की मीटिंग शुरू हो गई।
-----------
21/01/2011

Thursday, January 20, 2011

अब तो जरूरत ‘सरकार पोर्टेबिलिटी सेवा’ की भी

ना, ना करते मंत्रियों ने नई जिम्मेदारी संभाल ही ली। कल तक वीरभद्र सिंह नए मंत्रालय का पता पूछ रहे थे। गिल की आंखें गीली थीं। पर गुरुवार को सूरज खिला, तो मुरझाए चेहरे वाले मंत्री खिलखिलाते मंत्रालय पहुंच गए। भला कौन लाल बत्ती का रुतबा छोडऩा चाहेगा? रही बात महकमे की, तो कौन मंत्री काम करने के लिए बैठता? हां, इस बात का अफसोस हो सकता कि मलाई काटने वाला मंत्रालय नहीं मिला। वरना जो मंत्री या नेता देश व समाज की सेवा करना चाहे, तो किसी विभाग में रहकर कर सकता। पर जैसी राजा की सोच, वैसी दरबारियों की भी। सो जब महंगाई पर मनमोहन हताशा भरी टिप्पणी कर रहे। तो मंत्रियों से कैसी उम्मीद। सो सुषमा स्वराज ने चुटकी ली- अगर पीएम ज्योतिषी नहीं, तो कम से कम अर्थशास्त्री ही बन जाते। महंगाई ने आम आदमी का जीना मुहाल कर रखा। पर सरकार सिर्फ मुंहजोरी कर रही। यही हाल भ्रष्टाचार के मुद्दे पर भी। जब तक सुप्रीम कोर्ट ने फटकार नहीं लगाई, मनमोहन को काला धन याद नहीं आया। तो गुरुवार को नए-नवेले केबिनेट की पहली मीटिंग में ही पीएम ने देश का मन मोहने की कोशिश की। काले धन पर केबिनेट मीटिंग में चिंता जताई। पर जरा चिंता के कारण देखिए। मीडिया में लगातार खबरें आ रहीं, इस बात से मनमोहन परेशान। सो प्रणव दा ने प्रेस कांफ्रेंस कर जल्द सफाई देने का भरोसा दिया। पर पीएम ने साफ कर दिया- विदेशी बैंकों के खातों से जुड़ी जानकारी वाले नाम का खुलासा सरकार नहीं करेगी। सरकार समझौते से बंधी हुई। अगर सार्वजनिक कर दिया, तो भविष्य में ऐसी जानकारी नहीं मिल पाएगी। यानी कोर्ट की फटकार से ही सही, कुछ ब्लैकमनी वापस ले आएगी सरकार। पर विदेशों में काला धन छुपाने वालों का काला चेहरा आम जनता कभी नहीं देख पाएगी। यानी राजनीतिक दलों की बल्ले-बल्ले। कुछ पैसा सरकारी खजाने में जाएगा, तो कुछ चुनावी चंदे में। अब नवनियुक्त पहली केबिनेट मीटिंग में काले धन पर कहानी गढ़ दी। पर वोटरों को रिझाने का नया नुस्खा अपना लिया। अब हर साल 25 जनवरी राष्ट्रीय मतदाता दिवस के तौर पर मनेगा। जिसका स्लोगन होगा- वोटर होने पर गर्व, वोट के लिए तैयार। भले देश के वोटरों को चुनाव के बाद सिर्फ झुनझुना मिले। पर अब हर साल झुनझुना बजाने का दिन भी मुकर्रर हो गया। काश, महंगाई-भ्रष्टाचार से निजात दिलाने की भी कोई तारीख मुकर्रर होती। तो देश का वोटर वोट देने के बाद कभी रोने को मजबूर न होता। यों मतदाता दिवस का मकसद वोटरों में जागरूकता पैदा करना। देश के मतदाता 2004 और 2009 के चुनाव में अपनी जागरूकता का परिचय दे चुके। पर क्या सियासत करने वालों का हथकंडा बदला? महंगाई, भ्रष्टाचार, आतंकवाद, नक्सलवाद, किसानों की आत्महत्या, ब्लैकमनी पर तो वोट बैंक की राजनीति होती ही थी। अब तिरंगा भी वोट बैंक का हथियार बन गया। तिरंगे की ओट में शुरू हुई बीजेपी की राष्ट्रीय एकता यात्रा गुरुवार को दिल्ली पहुंच गई। तो बीजेपी के युवाओं ने देशभक्ति की हुंकार भरने में अपना गला बैठा लिया। पर बीजेपी के इस तिरंगा प्रेम पर अफसोस तब हुआ। जब मंच के ठीक सामने पहली पंक्ति में दो तिरंगे झंडे एक वर्कर के जूते के नीचे दबे दिखे। जोश में तिरंगे की कोई सुध नहीं। सो बीजेपी मीडिया सेल के एक वर्कर से कहना पड़ा। तब जाकर जूते के नीचे से तिरंगा हटा। अब बीजेपी की इस तिरंगा यात्रा का क्या मकसद? नाम एकता यात्रा, पर काम भावना भडक़ा कर अपना वोट बैंक साधना। सो मौका देख जम्मू-कश्मीर के सीएम उमर अब्दुल्ला भी मैदान में कूद चुके। उमर को अलगावादियों को साधना। सो बीजेपी की यात्रा को श्रीनगर के लालचौक पहुंचने से पहले ही रोकने की कोशिश करेंगे। बीजेपी दिल से यही चाहती। अगर बीजेपी सचमुच लाल चौक पर झंडा फहराना चाहती। तो इतनी बड़ी यात्रा के तामझाम की जरूरत नहीं थी। शायद बीजेपी वाले भूल चुके होंगे। तीन साल पहले ही बीजेपी राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य और जम्मू-कश्मीर के सह प्रभारी सरदार आर.पी. सिंह ने भी लाल चौक पर झंडा फहराया था। आर.पी. सिंह ने राजबाग से लाल चौक तक 1200 मुस्लिम कार्यकर्ताओं के साथ भारत माता की जयकार करते हुए 26 जनवरी 2008 को झंडा फहराया। पर तब ऐसा तामझाम नहीं। सो मकसद तो साफ दिख रहा। अब राजनीति के ऐसे दौर में मतदाता दिवस मनाकर क्या कर लेंगे नेता? जब सुप्रीम कोर्ट चाबुक चलाता, तो भ्रष्टाचार और काले धन पर सरकार की नींद खुल जाती। भ्रष्टाचार का मुद्दा संसद का शीतकालीन सत्र लील चुका। सो 21 फरवरी से शुरू हो रहे बजट सत्र के पहले मनमोहन ने लोगों को ऐसे संदेश देना शुरू किया। मानो, ब्लैकमनी वापस लाने की पहल अपनी मर्जी से कर रहे। आखिर जनता कब तक एक बार वोट डाल पांच साल की सजा भुगतती रहेगी? नए-नवेले ग्रामीण विकास मंत्री विलासराव देशमुख पर सुप्रीम कोर्ट ने दस लाख का जुर्माना लगाया था। एक किसान की खुदकुशी के मामले में बतौर सीएम देशमुख ने अपराधी को बचाने की कोशिश की थी। अब वही गांव-किसान का विकास करेंगे। सो गुरुवार को जब अपने मनमोहन ने देश भर में मोबाइल नंबर पोर्टेबिलिटी सेवा लाँच की। तो जेहन में एक सवाल आया- क्या सरकार पोर्टेबिलिटी सेवा 19 रुपए में नहीं मिल सकती? अगर जनता की उम्मीद पर सरकार खरी न उतरे। तो पांच साल के भीतर सरकार बदलने का भी हक हो।
----------
20/01/2011