Friday, March 11, 2011

तो भ्रष्टाचार के मौसम में बढा दी सांसद निधि

‘क्या पैसा-पैसा करती है.. क्यों पैसे पे तू मरती है.... पैसे की लगा दूं ढ़ेरी.. दे दना दन पैसा-पैसा.. मैं बारिश कर दूं पैसे की जो तू हो जाए मेरी..।’ फ्लॉप हिंदी सिनेमा दे-दना-दन के इस गाने को अपना प्रणव दा ने सांसदों को सुपरहिट बना दिया। दे दना दन सांसदों की निधि बढ़ा दी। भले आम बजट से आम आदमी को कोई फौरी राहत नहीं मिली। पर बजट चर्चा के जवाब में वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी ने सांसदों को मुंहमांगी मुराद थमा दी। सांसद निधि को एक झटके में बढ़ाकर दो से पांच करोड़ कर दिया। सो बहस में सरकार की आलोचना करने वाले सांसद भी गदगद हो गए। क्या विपक्ष, क्या लेफ्ट और क्या सत्ता पक्ष, कुल मिलाकर समूचे सदन ने मेजें थपथपा कर खुशी का इजहार किया। सो प्रणव दा के जवाब के वक्त सदन में शांति रही। प्रणव दा की ओर से पेट्रोल की कीमत बढऩे का एलान भी विपक्ष की मदहोशी नहीं तोड़ पाई। सो उन ने विपक्ष को खूब आड़े हाथों लिया। बजट को रोजगार विहीन बताने पर प्रणव ने मनरेगा की याद दिलाई। यूपीए राज में उठे चार बड़े कदमों- राइट टू एम्पलॉयमेंट, राइट टू इन्फोर्मेशन, राइट टू एजुकेशन और अब राइट टू फूड का जिक्र किया। पर सिवा काले धन के विपक्ष ने टोका-टाकी तक नहीं की। सो सवाल, सांसद निधि क्या सांसदों का मुंह बंद करने के लिए बढ़ाई गई? बजट पर हुई बहस में विपक्ष ने जोर-शोर से महंगाई, किसान, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार का मुद्दा उठाया था। पर प्रणव दा ने यहां भी चतुराई दिखा दी। आम आदमी को तो महंगाई की मार अभी और झेलनी पड़ेगी। सो दादा ने सीधे आम आदमी की आवाज उठाने वाले नुमाइंदों के मुंह पर ‘निधि’ मार दी। प्रणव दा का ऐसा मंत्र देख सोमनाथ दादा की याद आ गई। दोनों बंगाल की राजनीति के पुरोधा। दोनों ने केंद्र की राजनीति में बड़ा मुकाम हासिल किया। पर फर्क देखिए- सोमनाथ दा ने सांसद निधि में घपले का मर्ज समझ हकीम की तरह ईलाज करने की कोशिश की। भले सांसद निधि को खत्म कराने में सफल नहीं हो पाए। पर प्रणव दा ने तो मर्ज को समझकर उसे और हवा दे दी। वह भी तब, जब बिहार जैसे बेहद पिछड़े राज्य ने हाल ही में ऐतिहासिक कदम उठा विधायक निधि खत्म कर दी। नीतिश सरकार की इस पहल के बाद सांसद निधि भी खत्म होने की आस थी। पर प्रणव मुखर्जी ने उसमें ढ़ाई गुना इजाफा कर दिया। सचमुच ईमानदार आदमी हमेशा कोने में खड़ा रोता ही रहेगा, क्योंकि भ्रष्टाचार के इस मौसम में ईमानदारी किसी काम की नहीं। सांसद निधि के मामले में भ्रष्टाचार की शिकायतें कोई नई बात नहीं। ऑपरेशन दुर्योधन में पकड़े गए 11 सांसद सवाल के बदले घूसकांड में बर्खास्त हो चुके। फिर ऑपरेशन चक्रव्यूह में करीब सात सांसद फंसे थे, जो सांसद निधि में घपलेबाजी पर ही आधारित था। पर सांसद निधि के घपलेबाज सांसद चौदहवीं लोकसभा में सस्ते में छूट गए थे। सो सांसद निधि को लेकर हर बार बहस हुई। पर बहुमत सांसद इसे खत्म करने के बजाए बढ़ाने की पैरवी करते रहे। सांसद निधि को दो से पांच करोड़ करने की मांग वाजपेयी सरकार के वक्त से चली आ रही। पर तब अरुण शौरी ने भ्रष्टाचार की कथा सुना वाजपेयी को रोक लिया। अपने ही सांसद शौरी के खिलाफ खड़े हो गए। फिर भी शौरी नहीं माने। पर महंगाई, भ्रष्टाचार के भंवर में गोते लगा रही मनमोहन सरकार ने अबके एक झटके में अमलीजामा पहना दिया। यों इस निधि की शुरुआत महाराष्ट्र से हुई। राम नाईक अस्सी के दशक में विधायक थे। चुनाव क्षेत्र से लोग छोटे-मोटे काम के लिए आते थे। कहीं खरंजा, कहीं सीवर, तो कही पुलिया आदि। सो राम नाईक ने मुहिम चलाई और महाराष्ट्र में निधि तय हो गई। फिर राम नाईक जब सांसद बने, तो वही मुहिम दोहरा दी। आखिर पांच साल की मेहनत ने रंग दिखाया। नरसिंह राव की सरकार ने एक करोड़ की सांसद निधि तय कर दी। शुरुआती साल में ही इसके नतीजे दिखने लगे। ठेकेदार ठेका हासिल करने के लिए सांसदों तक 15 से 20 फीसदी कमीशन पहुंचाने लगे। सो फिर निधि दो करोड़ करने की मांग हुई। और अब पूरे पांच करोड़ तय हो गए। पर क्या कमीशनखोरी बंद हो जाएगी? बीस नहीं, अगर 15 फीसदी भी कमीशन जोड़ें। तो पांच करोड़ का सालाना कमीशन हुआ पिचहत्तर लाख। यानी मासिक कमीशन छह लाख पच्चीस हजार। अब किसी सांसद को बैठे-ठाले 6.25 लाख मिले और क्षेत्र में काम भी दिखे। तो भला कौन सांसद ऐसी निधि का विरोध करेगा। यह तो सांसदों के हाल में बढ़े वेतन-भत्ते से कहीं अधिक। सो सवाल- मनमोहन सरकार ने आम आदमी को राहत देने के बजाए सांसदों को तोहफा क्यों थमाया? प्रणव दा ने खुद माना, इस बढ़ोतरी से खजाने पर 2, 370 करोड़ रुपए का अतिरिक्त बोझ पड़ेगा। अब कोई पूछे, सांसद निधि अभी नहीं बढ़ाते। तो कौन सी आफत टूट पड़ती। आज तो सबसे बड़ी जरुरत आम आदमी को महंगाई से निजात दिलाने की है। पर शुक्रवार को सरकार ने आम आदमी को महंगाई का डर दिखाया। तेल की कीमतें बढ़ाने का इशारा किया। पर सांसदों को रेवड़ी थमा दी। ताकि आम आदमी काटे घास, मलाई काटे सांसद। जैसे ब्लैक मनी के मामले में हसन अली को जमानत मिल गई। सेशन कोर्ट ने माना, जांच एजेंसी के पास पुख्ता सबूत नहीं। यानी सरकार ने जान-बूझकर कमजोर केस बनवाया। सो टू-जी मामले में भले निगरानी सुप्रीम कोर्ट की। पर तथ्य तो सीबीआई को ही जुटाना। सो होगा वही, जो मंजूर-ए-मनमोहन सरकार होगा।
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11/03/2011

Thursday, March 10, 2011

पीएम की ‘सफाई’ और शीला का ‘समाजशास्त्र’

तो थॉमस पर पीएम की ‘सफाई’ पृथ्वी‘राज’ की फांस बन गई। विपक्ष ने देशव्यापी जनसंघर्ष अभियान छेड़ दिया। महाराष्ट्र के सीएम पद से इस्तीफे की मांग तेज कर दी। सो गुरुवार को पृथ्वीराज चव्हाण दिल्ली तलब हो गए। दस जनपथ से लेकर सात रेस कोर्स रोड तक बचाव की रणनीति पर मंथन हुआ। अहमद पटेल से मिलते हुए चव्हाण ने सोनिया गांधी के सामने सफाई पेश की। फिर महाराष्ट्र कांग्रेस के प्रभारी मोहन प्रकाश के साथ बचावी एजंडे पर मंथन। चव्हाण ने अपनी सफाई में हर जगह थॉमसाई इतिहास को दोहराया। पर अब इतिहास बांचने से क्या होगा, जब चुनावी राज्यों में पार्टी का भूगोल खराब होता दिख रहा। वामपंथी दलों ने तो थॉमस मुद्दे को केरल-बंगाल में भुनाने का एलान भी कर दिया। सो अब सवाल- ‘आदर्श’ पर अशोक चव्हाण की बलि लेने वाली कांग्रेस अपने पृथ्वी राज का क्या करेगी? पीएम ने संसद में ‘हाथ’ की ऐसी सफाई दिखाई, पृथ्वी का दामन दागदार हो गया। सो हताशा में चव्हाण ने भी झूठी कथा सुना दी। कह दिया- थॉमस मुद्दे पर केरल सरकार से रिपोर्ट मांगी गई थी, पर उसमें चार्जशीट की कोई जानकारी नहीं थी। पर अब केरल के सीएम वी.एस. अच्युतानंदन ने चव्हाण को झूठा बता दिया। बोले- थॉमस पर सारी जानकारी केंद्र को भेजी थी। यानी थॉमस पर साफ-सफाई के खेल में कांग्रेस ‘सर्फ एक्सेल’ का इश्तिहार बना रही। एक दाग छुड़ाने के चक्कर में दाग पर दाग लगाए जा रही। तभी तो पीएम ने संसद में सफाई दी, तो चव्हाण पर ठीकरा फोड़ दिया। चव्हाण ने केरल सरकार पर। और अब आलाकमान से मुलाकात के बाद चव्हाण ने चुप्पी की चादर ओढ़ ली। गुरुवार को बोले- पीएम की सफाई के बाद थॉमस मामले पर अब मुझे कुछ नहीं कहना। सीवीसी के पैनल के तीन नाम की सूची तैयार करने की जिम्मेदारी मेरी थी। यानी साफ-सफाई के लपेटे में पीएम के बाद सीधे दस जनपथ पर आंच न आए। सो आज की राजनीति के ‘पृथ्वीराज चव्हाण’ ने लड़े बिना ही हथियार डाल दिए। पर पीएम की सफाई हो चव्हाण की चुप्पी, सवाल अभी बहुतेरे। माना, पीएम को कार्मिक मंत्रालय ने थॉमस के केस के बारे में जानकारी नहीं दी। पर जब मीटिंग में सुषमा स्वराज ने मुद्दा उठाया। तो पीएम ने भरोसा क्यों नहीं किया? क्या लोकतंत्र में विपक्ष की अहमियत खत्म हो गई? अगर पीएम 24 घंटे के लिए थॉमस की नियुक्ति रोक तथ्यों की जांच करवा लेते। तो कौन सी आफत टूट पड़ती? अभी भी तो सीवीसी बिना चीफ के काम कर रहा। पर सत्ता का नशा सिर चढ़ कर बोला। सो अब सुप्रीम कोर्ट के डंडे से समूची सरकार सीधी हो गई। राज्यसभा में सीताराम येचुरी ने भी एक मौजूं सवाल उठाया। पूछा- जब टू-जी स्पेक्ट्रम घोटाले के मामले में भी थॉमस पर सूई घूम रही थी, तो पीएम ने खुद पड़ताल क्यों नहीं कराई? इसके अलावा एक और सबसे अहम सवाल। जब तीन नामों के पैनल में सिर्फ थॉमस के नाम पर आपत्ति थी। तो पीएम ने बाकी अन्य दो नामों पर विचार क्यों नहीं किया? आखिर थॉमसाई जिद का क्या मतलब? क्या पैनल में बाकी दो नाम सिर्फ खानापूर्ति के लिए रखे गए थे? पर जैसी सरकार, वैसा ही विपक्ष। कोई मजबूत विपक्ष होता, तो ऐसे हालातों में सरकार की डोली उठ चुकी होती। पर यहां तो दोनों सदनों के नेता विपक्ष ही आपस में लड़ रहे। आडवाणी जैसे वटवृक्षी नेता अफसोस जता रहे कि आज कोई वीपी सिंह जैसा नेता नहीं। यानी विपक्ष ने खुद को कमजोर मान लिया। जबकि टू-जी हो या थॉमस जी, अब बोफोर्स से बड़ा मुद्दा बन चुकी। पर विपक्ष में इतनी ताकत ही नहीं, इसलिए किसी वीपी सिंह की बाट जोह रही। कांग्रेस भी अब हर काम डंके की चोट पर कर रही। तभी तो टूटने की कगार पर पहुंच चुके डीएमके-कांग्रेस गठबंधन को बचा लिया। सीट-सीबीआई का समझौता कर कांग्रेस बाजी मार गई। सो राजनीतिक नैतिकता तो सिर्फ सुनने-सुनाने की कहानी भर। जैसे आज आडवाणी कह रहे- कोई वीपी होता, तो....। वैसा ही एक दिन आएगा, जब नई पीढ़ी को उनके बाप-दादा कहानी सुनाएंगे- राजनीति में कभी नैतिकवान नेता हुआ करते थे..। पर अफसोस, आज के नेता आईना देखने के बजाए मौजूदा समाज को कोस रहे। दिल्ली की महिला सीएम शीला तीसरा टर्म सरकार चला रही। महिला दिवस के दिन सूरज के उजाले में दिल्ली की एक लडक़ी और बुजुर्ग महिला की हत्या हो गई। पर आत्ममंथन के बजाए मैडम शीला समाजशास्त्र पढ़ा रहीं। गुरुवार को बोलीं- राधिका तंवर हत्याकांड में पुलिस के साथ-साथ समाज भी जिम्मेदार। कहने-सुनने में दलील बिल्कुल सही। पर बंदूक थामे व्यक्ति से क्या कोई मुकाबला करेगा? अगर किसी ने हिम्मत दिखा भी दी। तो पुलिस स्टेशन के इतने चक्कर लगाने पड़ते, लोग पुलिस के नाम से सिहर उठते। अपनी पुलिस आज भी ब्रिटिश मानसिकता वाली। किसी भी राजनेता ने पुलिस रिफॉर्म पर ध्यान नहीं दिया। यही वजह है कि आज भी पुलिस को लोग सम्मान नहीं, खौफ की नजरों से देखते हैं। पुलिस को आम लोगों का दोस्त बनाने की राजनीतिक पहल कभी नहीं हुई। ताकि समाज के लोग हिम्मत से आगे बढ़े। पर शीला को तो ऐसी भाषणबाजी की आदत हो चुकी। महिला पत्रकार सौम्या विश्वनाथन की हत्या हुई, तो शीला ने महिलाओं को रात में बाहर न निकलने की नसीहत दे दी। दिल्ली में क्राइम बढ़ा, तो बाहरियों को जिम्मेदार ठहराया। जबकि शीला खुद बाहरी।
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10/03/2011




Friday, March 4, 2011

भ्रष्टाचार के ‘मोड़’ पर क्वात्रोची बरी!

कहने को संसद सर्वोच्च, पर विधानसभा चुनाव भारी पड़ रहा। चुनाव की खातिर बजट सत्र का गला घोंटने पर सत्तापक्ष-विपक्ष में जबर्दस्त सहमति बन गई। सो संसद सत्र रिशिड्यूल होना तय। अब पहला चरण होली के बाद 25 मार्च तक चलेगा। फिर चुनावी शोर खत्म होने के बाद 23 मई से 10 जून के बीच दसेक दिन का सत्र बुलाया जाएगा। सो संसद सत्र पर मंडराए चुनावी बादल से कवि सुदामा पांडे धूमिल की कुछ पंक्तियां याद आ गईं। जिनमें लिखा- संसद तेल की वह घानी है, जिसमें आधा तेल है और आधा पानी है। और यदि यह सच नहीं है, तो यहां एक ईमानदार आदमी को अपनी ईमानदारी का मलाल क्यों है। जिसने सत्य कह दिया है, उसका बुरा हाल क्यों है? धूमल की ये पंक्तियां कवि की कल्पना नहीं, सच्चाई। संसद में कोई भी सरकार सच का सामना नहीं करना चाहती। विपक्ष भी विरोध की रस्म-अदायगी कर चुप बैठ जाता। सो थॉमस मसले पर शुक्रवार को बीजेपी ने चुप्पी की चादर ओढ़ ली। पर पहली बार पीएम ने जम्मू जाकर जुबान खोली। तो बतौर पीएम जिम्मेदारी कबूल ली। सुप्रीम कोर्ट के फैसले के सम्मान की बात दोहराई, भविष्य में ऐसा न होने का भरोसा दिलाया। पर सूखी-सूखी जिम्मेदारी कबूलने का क्या मतलब? अब तो एक और झूठ सामने आया। गुरुवार को कानून मंत्री मोइली ने थॉमस के इस्तीफे की पुष्टि की थी। पर शुक्रवार को थॉमस के वकील ने न सिर्फ इस्तीफे से इनकार किया। अलबत्ता फैसले के खिलाफ अपील करने का खम ठोक दिया। सो अब कांग्रेसी खेमा दलील दे रहा- इस्तीफे की कोई जरूरत ही नहीं। चूंकि सुप्रीम कोर्ट ने नियुक्ति रद्द की। सो अधिसूचना जारी होगी। पर थॉमस का मामला निपटा नहीं, बोफोर्स केस ने विपक्ष को एक और मुद्दा थमा दिया। दिल्ली की तीसहजारी कोर्ट ने सीबीआई की क्लोजर रिपोर्ट मान ली। बोफोर्स सौदे में दलाली खाने वाले ओतावियो क्वात्रोची के खिलाफ अब केस बंद हो गया। सीबीआई ने भ्रष्टाचार के इस मौसम में सबसे बड़ा केस बंद करवा बाकियों को इशारा कर दिया। अब जरा बोफोर्स केस बंद करने की सीबीआई की दलील देखिए- पच्चीस साल बीत चुके। ढाई सौ करोड़ खर्च हो चुके। क्वात्रोची को भारत नहीं लाया जा सका। सो अब केस को आगे चलाने का कोई मतलब नहीं। दलील तो सही, पर सवाल बहुतेरे। आखिर क्वात्रोची को भारत लाने में सीबीआई और सरकार सफल क्यों नहीं हुईं, यह कौन बताएगा? बोफोर्स केस में सरकार बदलने के साथ आए उतार-चढ़ाव का जवाब कौन देगा? अगर क्वात्रोची को कांग्रेस की सरकार आरोपियों की लिस्ट से बाहर कर रही। तो सवाल- क्या आजादी के बाद भी विदेशी हमारे देश के खजाने को यों ही लूट ले जाएंगे? अंग्रेजों ने सोने की चिडिय़ा भारत का खूब दोहन किया। पर आजाद देश को विदेशियों के हाथ लुटाने वालों की यह कैसी राष्ट्रभक्ति? अब निचली अदालत से ही सही। फिलहाल क्वात्रोची बोफोर्स केस से तो बरी ही हो गए। सो मनमोहन सरकार अब चाहे, तो क्वात्रोची की थोड़ी और मदद कर सकती। जैसे दिसंबर 2005 में एडीशनल सोलीसीटर जनरल बी. दत्ता को भेजकर क्वात्रोची के लंदन स्थित बैंक खाते डिफ्रीज करवाए। क्वात्रोची को दलाली की रकम निकालने की इजाजत दे दी। अब किसी कानून के जानकार को भेज दें। ताकि क्वात्रोची भारत सरकार पर मानहानि का मुकदमा कर सके। आखिर 25 साल तक किसी को आरोपी बनाना और फिर आखिर में केस बंद करना किसी यातना से कम नहीं। रेड कार्नर नोटिस की वजह से इंटरपोल ने मलेशिया और अर्जेंटिना में दो बार गिरफ्तार किया। कई दिन जेल में बिताने पड़े। पर आखिरकार भारत ने सोची-समझी देरी कर मलेशिया और अर्जेंटिना की अदालत से भी क्वात्रोची को रिहा होने दिया। सो सीबीआई की क्लोजर रिपोर्ट को मिली अदालती मंजूरी के बाद तो क्वात्रोची मानहानि का दावा करने के हकदार। शायद ऐसा कर दिया। तो जितनी रकम दलाली में नहीं मिली होगी, उससे अधिक मिल जाएगी। वैसे भी भारत की जनता भले गरीब हो। पर नेताओं के लिए देश वैसे ही सोने की चिडिय़ा, जैसे अंग्रेजों के समय थी। तभी तो घोटाले नहीं, यहां एक नील 76 खरब के महाघोटाले होते। सत्तर हजार करोड़ के कॉमनवेल्थ होते। ‘आदर्शों’ की तो कमी नहीं देश में। पर ऐसे माहौल में जब बोफोर्स केस की फाइल बंद करने का फैसला सुनाने चीफ मैट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट विनोद यादव पहुंचे। तो कुर्सी पर बैठते ही मजरूह सुल्तानपुरी की दो लाइन सुना दीं- ‘वो अफसाना जिसे अंजाम तक लाना न हो मुमकिन, उसे एक खूबसूरत मोड़ देकर छोडऩा अच्छा।’ यानी मजिस्ट्रेट ने सीबीआई की दलील मान ली। पर सवाल- क्या भ्रष्टाचार के सागर में डूबे देश के ताजा माहौल को ‘खूबसूरत मोड़’ कहेंगे? आखिर राजाओं-कलमाडिय़ों को क्या संदेश मिलेगा? यही ना, केस को लंबा उलझाओ। आखिर में सत्ता के बलबूते फाइल तो बंद हो ही जाएगी। यों फाइलें तो खुलती और बंद होती रहेंगी। पर शुक्रवार को राजनीति की एक बुलंद आवाज हमेशा के लिए बंद हो गई। वरिष्ठ कांग्रेसी नेता अर्जुन सिंह का निधन हो गया। वह भी उसी दिन, जिस दिन सोनिया गांधी ने अपनी कांग्रेस वर्किंग कमेटी का एलान किया। अर्जुन वर्किंग कमेटी में स्थायी आमंत्रित सदस्य बनाए गए। पर सोनिया की वर्किंग कमेटी मनमोहन के केबिनेट फेरबदल जैसी ही रही।
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04/03/2011

Thursday, March 3, 2011

निर्लज्जता के पार जाएगी कांग्रेस या जाएंगे पीएम?

आखिर चांटा खाकर ही मनमोहन सरकार मानी। गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट ने सीवीसी पी.जे. थॉमस की नियुक्ति को अवैध ठहराया। तो थॉमस ने इस्तीफा दिया। पर कोर्ट की पहली टिप्पणी के बाद जब पहली दिसंबर को होम मिनिस्टर से मिल थॉमस बाहर निकले। तो तेवर दिखाते हुए कहा था- मैं सीवीसी का बिग बॉस। पर सुप्रीम कोर्ट के सवालों से तभी साफ था, थॉमस को जाना होगा। दो दिसंबर को यहीं पर लिखा था- चाहे जो भी हो, थॉमस की विदाई तय। कांग्रेस को तय करना कि सुप्रीम कोर्ट की चपत से ही थॉमस को चलता करती या चांटा खाकर। सचमुच कांग्रेस का इतिहास चांटा खाकर ही मानने का। चाहे बिहार के गवर्नर बूटा सिंह का मामला हो या झारखंड के गवर्नर सिब्ते रजी को लेकर हुई किरकिरी का। या फिर गोवा के गवर्नर एससी जमीर का। सो कांग्रेस का जमीर तो अब चिकना घड़ा हो चुका। सुप्रीम कोर्ट की चाहे जितनी थाप पड़े, असर नहीं पड़ता। पर गुरुवार को कोर्ट ने न सिर्फ थॉमस की नियुक्ति को गैरकानूनी ठहराया। अलबत्ता पहली बार कांग्रेसी चिकने घड़े पर छाप दिखी। चीफ जस्टिस एचएस कपाडिय़ा की रहनुमाई वाली बैंच ने कहा- थॉमस की नियुक्ति में कमेटी ने सीवीसी जैसी संस्था की गरिमा को ध्यान में नहीं रखा। सिर्फ बायोडाटा के आधार पर नियुक्ति गलत। ऐसी नियुक्तियां नौकरशाही तक सीमित न हों। अन्य क्षेत्र के लोगों पर भी विचार हो। कोर्ट ने माना, थॉमस की नियुक्ति में यह नहीं देखा गया कि जिस व्यक्ति को सीवीसी बनाया जा रहा, वह करप्शन से लडऩे में कितना सक्षम। इसलिए थॉमस की नियुक्ति अवैध। सो जैसे ही फैसला आया, समूची सरकार को सांप सूंघ गया। विधि मंत्री वीरप्पा मोइली संसद भवन में भागते-भागते पीएम के पास जाते दिखे। चिदंबरम तो ऐसे निकल गए, मानो, मुंह में जुबान नहीं। शंख की तरह नाद करने वाले कांग्रेसी प्रवक्ता फटे बांस नजर आए। यों कांग्रेस और सरकार ने थॉमस का बचाव करने में कसर नहीं छोड़ी। अटार्नी जनरल तक ने झूठ बोला। जब सुषमा स्वराज ने आंखें दिखाईं। तो चिदंबरम ने सुषमा को सही ठहरा बात संभाल ली। अब दबी जुबान में कह रही- हमने तो थॉमस से कई बार इस्तीफा देने को कहा। पर वह नहीं माने। अब ऐसी दलीलें तो महज खाल बचाने की कोशिश। पर सवाल- जब सुषमा स्वराज ने बतौर नेता प्रतिपक्ष एतराज जताया। तो पीएम-चिदंबरम क्यों नहीं माने? तब चिदंबरम ने थॉमस को पॉमोलिन ऑयल घोटाले में क्लीन चिट दी। खुद मनमोहन-चिदंबरम ने सात सितंबर को थॉमस के शपथ ग्रहण समारोह के बाद खम ठोककर कहा था- हमने सही कदम उठाया। तीन नामों के पैनल में सबसे बेहतर उम्मीदवार चुना। अब मनमोहन बताएं- क्या इसे बेहतर उम्मीदवार कहते हैं? सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद थॉमस नाम की घंटी सीधे मनमोहन के गले बंध गई। गुरुवार को समूचे विपक्ष ने मोर्चा खोल दिया। सो संसद के दोनों सदन ठप हो गए। अब विपक्ष चिदंबरम का इस्तीफा मांग रहा। पीएम को भी इशारा कर दिया। सो पीएम को संसद में सफाई देनी होगी। पर राम जेठमलानी ने तो बेलौस कह दिया- पीएम अपनी ईमानदार छवि का बहुत बेजा फायदा उठा चुके। अब किसी न किसी को संसदीय जवाबदेही तो लेनी होगी। आडवाणी बोले- साठ साल में कभी ऐसा नहीं हुआ, जब पीएम की ओर से हुई नियुक्ति को कोर्ट ने अवैध ठहराया हो। सो पीएम-सोनिया को नैतिक जिम्मेदारी लेनी होगी। अरुण जेतली ने भी कहा- अब सिर्फ पीएम ही जवाब दे सकते। उन्हें गुमराह किया गया या खुद गुमराह हो गए थे। सो टू-जी स्पेक्ट्रम घोटाले पर गठबंधन की मजबूरी का राग अलापने वाले मनमोहन अब कौन सा नया कुतर्क देंगे? यों मोइली ने बाद में माना, कोर्ट का फैसला सरकार के लिए सबक। पर अब बचाव में कांग्रेस क्या करेगी? पीएम खुद अपनी नैतिकता तय करेंगे। या कांग्रेस बहुमत के दम पर उनसे ही गाड़ी खिंचवाएगी, यह देखना होगा। पर अब कांग्रेस के पास कोई तर्क नहीं। यों राजनीति में बचाव के लिए कुतर्कों की भी कमी नहीं। पर मनमोहन के ‘मोहिनी’ रूप का सच अब खुल चुका। सो देर शाम पीएम निवास पर कांग्रेस कोर ग्रुप की इमरजेंसी मीटिंग हुई। पर अब कांग्रेस चाहे जितनी मीटिंगें करे, सरकार की साख को बट्टा लग चुका। थॉमस मामले पर जूते, प्याज, टमाटर, अंडे सब खा लिए। सो अब कांग्रेस को ही तय करना, निर्लज्जता की सारी हदें पार कर कुतर्क गढ़ेगी या पीएम पद छोड़ेंगे? थॉमस तो निर्लज्जता की पराकाष्ठा पार कर ही चुके थे। जब उन ने हलफनामा देकर कहा था- मेरे खिलाफ क्रिमीनल केस, करप्शन का नहीं। बाकायदा सुप्रीम कोर्ट के अधिकार को ही चुनौती दे दी थी कि उनकी नियुक्ति की न्यायिक समीक्षा नहीं की जा सकती। देखिए, कैसा राज आ गया- जब चोर कोतवाल को उसका हक बताने लगे। यों कोर्ट के फैसले का एक असर दिखा। गुरुवार को पीएमओ ने फोन कर अन्ना हजारे को सूचना दी- अपनी सहूलियत के मुताबिक आकर पीएम से मिल सकते हैं। हजारे पिछले पांच महीने से लोकपाल बिल पर बात करने के लिए टाइम मांग रहे थे। अब 27 मार्च से आमरण अनशन की चेतावनी दे दी थी। पर कोर्ट के फैसले ने गुरुवार ही पीएमओ को सद्बुद्धि दे दी। सो थॉमस पर आए फैसले, उस पर हुई सियासत और अब तक के घटनाक्रम का एक ही निचोड़- यह मनमोहन सरकार की राजनैतिक, न्यायिक, संवैधानिक हार।
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03/03/2011

Wednesday, March 2, 2011

तो कांग्रेसी सीएम पर भारी पड़े भाई मोदी

हर-हर महादेव से देश गूंज उठा। दूध की कीमतों में महंगाई का तडक़ा जोरों से लग चुका। सो अबके जल-दूध मिक्स, यानी भगवान शिव का जलदूधाभिषेक हुआ। आखिर महंगाई से मजबूर भक्तों ने अब भगवान के साथ भी मिलावट का खेल शुरू कर दिया। सो अब भगवान का दिल भक्तों के लिए क्या सोच रहा होगा, यह तो वही जानें। पर अपनी सरकार जनता के साथ महंगाई का कैसा कॉमनवेल्थ कर रही। अब कोई लुकाव-छुपाव वाली बात नहीं। आम बजट में प्रणव दा ने भी महंगाई पर खूब चिंता जताई। भाषण दिया- इस साल हमारी मुख्य चिंता कीमतों में लगातार बढ़ोतरी पर रही। शुरुआती छह महीने महंगाई दर उच्च रही। तो दूसरी छमाही में कम भी हुई। प्याज, दूध कुक्कुट और कुछ सब्जियों की कीमतें भी बढ़ीं। यानी प्रणव दा ने महंगाई की समस्या का बखान तो किया। पर उपाय के नाम से ठेंगा थमा गए। बोले- रिजर्व बैंक की ओर से किए गए उपायों से आने वाले महीनों में महंगाई में और कमी की उम्मीद करता हूं। पर बजट पेश करने के दूसरे दिन ही प्रणव दा का सुर बदल गया। मंगलवार को फिक्की के एक प्रोग्राम में बजट से उलट चिंता जताई। बोले- अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल और जिंसों में तेजी से महंगाई बढ़ेगी। वैश्विक कीमतों का देश पर भी असर पड़ेगा। यानी वही बात हुई, जिसका अंदेशा था। प्रणव दा के बजट ने तो पहले दिन ही साफ कर दिया- गांव-गरीब के लिए चिंता, उद्योग जगत के लिए भरपूर प्यार। विशेषज्ञों ने तो उसी दिन इशारा कर दिया था- लीबिया संकट का असर पेट्रोल-डीजल की कीमतों पर पडऩे वाला। सो जैसे ही कीमतें बढ़ीं, सरकार के सारे दावे धराशायी हो जाएंगे। पर कीमत बढऩे से पहले ही प्रणव दा आम आदमी को तलाक दे देंगे, ऐसी उम्मीद नहीं थी। अब बेचारा आम आदमी क्या करेगा? सो भगवान शंकर से यही अरज- जलदूधाभिषेक को मिलावट की भक्ति न मानें। आम भक्त तो मनमोहन सरकार की मर्जी का मारा। सरकार को खुद ही समझ नहीं, महंगाई को कैसे रोके। पी. चिदंबरम बेबाकी से कबूल चुके- महंगाई रोकना सरकार के बूते में नहीं। खीझ में प्रणव दा भी कह चुके- हमारे पास अलादीन का चिराग नहीं। पर संयोग कहें या कुछ और, महाशिवरात्रि के दिन गुजरात के सीएम नरेंद्र मोदी ने मनमोहन-प्रणव को चिराग थमाया। सीएम ने पीएम को समझाया, कैसे महंगाई पर काबू पाया जा सकता। बुधवार को मोदी ने उपभोक्ता मामलों पर वर्किंग ग्रुप की रपट पीएम को सौंप दी। पर रपट का मोदी-सार बताने से पहले वर्किंग ग्रुप का इतिहास बता दें। महंगाई ने जब-जब तांडव मचाया, अपना मीडिया भोंपू और कागज-कलम लेकर पीछे पड़ा। तब-तब मनमोहन सरकार ने मीटिंग-मीटिंग खेली। इसी मीटिंग-मीटिंग के खेल से वर्किंग ग्रुप का आइडिया निकला था। सरकार और कांग्रेस ने हमेशा कोशिश की, महंगाई का ठीकरा राज्यों के सिर फोड़ा जाए। सो कुछ चीफ मिनिस्टरों को ग्रुप में बांटकर अलग-अलग मामलों में रपट देने को कहा गया। नरेंद्र मोदी के जिम्मे उपभोक्ता मामला आया। साथ में महाराष्ट्र, आंध्र और तमिलनाडु के सीएम भी मेंबर बनाए गए। यानी यूपीए शासित राज्यों की टीम में अकेले भाजपाई मोदी। वर्किंग ग्रुप का गठन आठ अप्रैल 2010 को हुआ। पीएम मनमोहन ने मोदी को इस ग्रुप का मुखिया बनाया। मोदी कमेटी ने जनवरी में अपनी रपट फाइनल कर ली थी। जिसे बुधवार को सरकार के हवाले कर दिया। अब जरा रपट का मोदी-सार देखिए। मोदी ने आम जरूरत की चीजों के वायदा कारोबार पर फौरन बैन लगाने की सिफारिश की। भारत सरकार को कीमत स्थिरता फंड बनाने का सुझाव दिया। जिससे अनाजों की खरीद और वितरण के लिए राज्यों को सहायता मिल सके। केंद्र और राज्य स्तर पर मंत्री स्तरीय को-ऑर्डीनेशन मैकेनिज्म की सलाह दी। ताकि समन्वय के साथ पॉलिसी तैयार की जा सके। कृषि क्षेत्र में पिछड़े इलाकों के लिए ढांचागत विकास और उत्पादन में अव्वल क्षेत्र को बाजार से जोडऩे के लिए दस साल की दीर्घकालिक योजना बनाने की भी सलाह दी। अनिवार्य वस्तु अधिनियम के तहत अपराध को गैर जमानती बनाने और विशेष कोर्ट से मुकदमा चलाने पर जोर दिया। कालाबाजारी करने वालों पर शिकंजा कसने के लिए हिरासत में रखने की छह महीने की अवधि को बढ़ाकर एक साल करने का सुझाव दिया। मोदी कमेटी ने 20 सिफारिशें और 64 बिंदु एक्शन के लिए सुझाए। यानी कुल मिलाकर मोदी ने चतुराई से गेंद केंद्र सरकार के पाले में डाल दी। महंगाई के लिए राज्यों पर आरोप लगाने वाली कांग्रेस को मोदी कमेटी ने ऐसा जवाब दिया है, शायद कांग्रेस का मुंह खुला रह जाएगा। मोदी रपट ने साफ कर दिया- कांग्रेसी राज्य सरकारें भी महंगाई पर केंद्र सरकार की राज्य थ्योरी से सहमत नहीं। मोदी ने न सिर्फ महंगाई पर काबू पाने का उपाय बताया, अलबत्ता कांग्रेस-यूपीए के सीएम पर भी भारी पड़े। सो अब इंतजार इस बात का, जिस मनमोहन सरकार ने महंगाई से निपटने को बजट में तो कुछ नहीं किया। वह मोदी कमेटी रपट पर क्या कहेगी? अभी तो संसद में आम बजट पर बहस बाकी। सो विपक्ष के तीर को और धार मिल गई। कांग्रेस अगर मोदी कमेटी रपट को माने, तो भी विपक्ष बम-बम, न माने, तो भी। -------------
02/03/2011

Tuesday, March 1, 2011

‘राज’ हो या ‘राजा’, सत्ता के लिए कुछ भी चलेगा

तो बंगाल, केरल, असम, तमिलनाडु, पुडुचेरी के चुनाव की रणभेरी बज गई। जेपीसी का प्रस्ताव राज्यसभा से भी पास हो गया। कांग्रेस ने कानूनदां रविशंकर प्रसाद के मुकाबले अभिषेक मनु सिंघवी को मैदान में उतारा। पर सिंघवी पहले ही मैदान छोड़ गए। सिंघवी ने जेपीसी में शामिल होने से सोमवार की रात ही इनकार कर दिया। फिर भी प्रस्ताव में नाम शामिल। सो मंगलवार को संसद भवन परिसर में ही बोले- कई टेलीकॉम कंपनियों की ओर से सुप्रीम कोर्ट में मुकदमे की जिरह कर चुका। सो मेरा जेपीसी में होना सही नहीं होगा। सिंघवी की दलील सोलह आने सही। पर कांग्रेस ने अभी सिंघवी को हटाने की कोई राय नहीं बनाई। सो अब देखना होगा, सिंघवी की नैतिकता जीतेगी या कांग्रेस का जोर चलेगा। पर राज्यसभा में कपिल सिब्बल और अरुण जेतली की वकीली जंग जमकर हुई। सिब्बल ने एनडीए सरकार को दोषी ठहराने की पुरानी कोशिश जारी रखी। तो जेतली ने पूछ ही लिया- 2001 की परिस्थितियां 2007 में कैसे दोहराई जा सकतीं? पहले आओ, पहले पाओ की नीति पर सिब्बल लगातार सवाल उठा रहे। ए. राजा को एनडीए की नीति का ही अनुसरण करने वाला बता रहे। सो जेतली ने सिब्बल को याद दिलाया- एनडीए राज के वक्त संचार क्षेत्र में घनत्व बहुत कम था। ओडिशा, पूर्वोत्तर, पूर्वी यूपी जैसे कुछ सर्किलों में तो दो बार टैंडर जारी हुए। पर कोई बोली लगाने वाला नहीं आया। सो पहले आओ, पहले पाओ की नीति अपनाई गई। सचमुच तब और राजा के घोटाले के वक्त के संचार जगत में बहुत फर्क आ चुका था। पर राजा ने तो जानबूझकर 2001 को आधार बना 2007 में कमाल किया। पसंदीदा कंपनियों को फायदा पहुंचाया। पर अपने मीडिया बंधुओं और वकीलों की यही बड़ी कमजोरी। एक बार जो बात कह दी, भले झूठ ही क्यों न हो, आखिरी सांस तक अड़े रहते। सो सिब्बल सब कुछ जानकर भी कुछ समझने को तैयार नहीं। वैसे सिब्बल की मुश्किल, कानूनदां होने के नाते सही साबित करने की चुनौती। आखिर कांग्रेस ने बड़े भरोसे के साथ दो-दो भारी-भरकम मंत्रालय दे रखे। यूपीए की पहली पारी में बड़े बेआबरू वाले हालात में सिब्बल ने राज्यमंत्री का दर्जा कबूला था। सो ओहदा बढ़ा, तो सुर्खियों में रह साबित कर रहे। पर अब वकीलों की दलीलबाजी छोडि़ए। जेपीसी से जनता की उम्मीदें बंधीं। जिसकी खातिर विपक्ष ने संसद का शीत सत्र नहीं चलने दिया। सरकार को घुटने टेकने पड़े। भले दिल बहलाने को कांग्रेस ने लोकतंत्र की थोथी दुहाई दी। संसद को चलाना जरूरी बताया। पर संसद में तो हंगामे का सफर जारी। भ्रष्टाचार के मुद्दे पर विपक्ष की जिद का देश ने समर्थन किया। पर आम बजट के बाद मंगलवार को दोनों सदनों की बैठक शुरू हुई। तो कुछ नए मुद्दों के साथ विपक्ष हंगामे पर उतर आया। जातीय जनगणना के फॉर्मेट, टेलीफोन टेपिंग और सिख विरोधी दंगे के मिले-जुले मुद्दे ने दोपहर तक दोनों सदनों की कार्यवाही ठप करा दी। सचमुच अब संसद में यह परंपरा बन गई। मुद्दा छोटा हो या बड़ा, वैल में कूदकर हंगामा करो। मानो, अपनी बात कहने का सांसदों के पास कोई दूसरा रास्ता ही नहीं। जाति की राजनीति करने वाले क्षेत्रीय दलों ने अपने हिसाब से जातीय गणना कराने को लेकर हंगामा किया। तो अकाली दल ने सिख विरोधी दंगे में नया मुद्दा उठाया। हरियाणा के रिवाड़ी में भी सिखों का नरसंहार हुआ था। पर अब थाने से उसकी एफआईआर गायब हो गई। सो हरियाणा सरकार पर मामले को दबाने का आरोप लगाया। सांसद वैल में आ गए। सो कार्यवाही ठप हो गई। अब जब सिख विरोधी दंगे के मामले में गाहे-ब-गाहे नए खुलासे हो रहे। तो अभी गोधरा-गुजरात दंगे की कई परतें उधडऩी बाकी। साबरमती एक्सप्रेस में गोधरा स्टेशन पर 59 कारसेवकों को जलाने के केस में विशेष अदालत ने मंगलवार को सजा सुना दी। दोषियों में से 11 को फांसी, 20 को उम्रकैद हुई। तो एक पक्ष गदगद हुआ, दूसरे पक्ष ने अपील का एलान कर दिया। यों गोधरा कांड पर अदालती फैसले ने साजिश की बात साबित कर दी। पर इसे आधार बना गुजरात दंगे को जायज नहीं ठहराया जा सकता। क्रिया की प्रतिक्रिया बताकर पल्ला नहीं झाड़ा जा सकता। सो गुजरात दंगे के मामले में भी अदालती फैसले और पक्षकारों की प्रतिक्रिया का इंतजार। पर सवाल- क्रिया की प्रतिक्रिया के नाम पर क्या दंगे को जायजा ठहराया जा सकता? माना, गोधरा कांड में कुछ कट्टरपंथियों ने साजिश की। पर गुजरात दंगे में साजिश को भी इनकार नहीं किया जा सकता। अगर क्रिया की प्रतिक्रिया आधार बनने लगी, तो लोकतंत्र का क्या होगा? जिस लोकतंत्र की सब दुहाई देते, वह तो अराजक हो जाएगा। पर अपने नेताओं को लोकतंत्र से अधिक कुर्सी की फिक्र। सो संसद का हश्र जनता बखूबी देख रही। लगे हाथ विपक्षी बीजेपी के  चाल, चरित्र, चेहरे का नया रंग भी देख लो। महाराष्ट्र की सत्ता से दूरी में बीजेपी पानी बिन मछली बन चुकी। शायद उद्योगपतियों का चंदा कम हो गया होगा। सो अब बीजेपी उस राज ठाकरे से गठजोड़ करना चाह रही। जिसने प्रांतवाद के नाम पर संविधान के साथ होली खेली। खुद आडवाणी ने उत्तर भारतीयों के खिलाफ राज ठाकरे की मुहिम को असंवैधानिक कहा था। पर शिवसेना के एतराज के बाद भी बीजेपी का राज-प्रेम उफान मार रहा। शिवसेना से हामी भराने को हाथ-पैर मार रही। सो लोकतंत्र का पहरुआ किसे कहेंगे आप? भ्रष्टाचारियों को बचाने की हरसंभव कोशिश में जुटे सत्तापक्ष को या संविधान का मखौल उड़ाने वाले राज के साथ पींगें बढ़ाने वाले विपक्ष को?
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01/03/2011

Monday, February 28, 2011

तो चतुर सुजान निकले बाबू मोशाय!

काला जादू तो चला। पर न आंख बंद हुई, न डिब्बा गायब। पिछले साल सिर्फ बिहार में चुनाव था। सो बजट में ही पेट्रोल-डीजल के दाम बढ़ा प्रणव दा ने दादागिरी दिखाई। तो बिहार में सूपड़ासाफ हो गया। पर अबके बंगाल में चुनाव। सो दादा ने आम आदमी से दिल्लगी की। उद्योग जगत को दिखाई दरियादिली। सो उद्योग जगत ने भी दरिया मेें डूब-डूब कर सराहना की। आखिर करे भी क्यों नहीं, प्रणव दा ने अबके सिर्फ जादूगरी दिखाई। बजट को लोक-लुभावन और खजाने के बीच तालमेल बिठाने वाला बनाया। टेक्स ढांचा हर बजट के लिए रीढ़ की हड्डी। सो एक तरफ आम करदाताओं की टेक्स छूट सीमा बढ़ाकर 1.80 लाख की। तो महिलाओं का अलग स्लैब ही खत्म कर दिया। बुजुर्गों को मिलने वाली राहत में भी चतुराई दिखाई। अस्सी पार के बुजुर्गों की नई कैटेगरी बना अति वरिष्ठ कहा। वरिष्ठ नागरिकों की उम्र सीमा घटा साठ साल कर दी। पर छूट के नाम पर दस हजार का ठेंगा थमा दिया। अति वरिष्ठों की छूट पांच लाख कर वाहवाही लूटी। पर आंकड़ों का गोल-मोल देखिए। टेक्स देने वाले अति वरिष्ठों की संख्या एक फीसदी भी नहीं होगी। यानी प्रणव दा ने इस हाथ से छूट दी, उस हाथ से खजाना भर लिया। सो महिलाओं में नाराजगी लाजिमी। सुषमा स्वराज से लेकर गिरिजा व्यास तक खफा दिखीं। दादा के बजट में महंगाई की फिक्र तो थी। पर नहीं था निपटने का उपाय। पिछले कुछ साल में हर मध्यम वर्गीय गृहिणी का किचिन कॉस्ट ढाई से तीन हजार रुपए महीना बढ़ गया। पर दादा ने मध्यम वर्गीय महिलाओं से विशेष टेक्स छूट छीन ली। सो महिलाओं की टेक्स छूट जस की तस रही। यानी महज सालाना दो हजार। अब कोई पूछे- टेक्स सीमा के मुताबिक मिडिल क्लास की मासिक आय हुई 15 हजार रुपए। तो क्या दिल्ली जैसे महानगर में इस वेतन से परिवार का सहज भरण-पोषण संभव? यों आंगनबाड़ी की महिलाओं को दादा ने निहाल कर दिया। सेविका-सहायिका दोनों के वेतन पहली अप्रैल से दुगुने हो जाएंगे। सेल्फ हैल्प ग्रुप बना 500 करोड़ का फंड भी तय कर दिया। सो दादा के बजट से गांव की महिलाओं में खुशी, तो शहरी महिलाओं में गम। अब जरा गरीबों की फिक्र में बजट का हाल देखिए। सरकार की मजबूरी आवंटन में साफ हो गई। पिछली दफा जोर-जोर से मनरेगा का आवंटन बता रहे थे कांग्रेसी। पर अबके सामाजिक क्षेत्र से जुड़ी सारी परियोजनाओं का एकमुश्त आवंटन हुआ, जो पिछले बजट से 17 फीसदी अधिक। भारत निर्माण में भी एकमुश्त आवंटन कर 48 से 58 हजार करोड़ कर दिया। सामाजिक क्षेत्र के आवंटन में सोनिया गांधी की महत्वाकांक्षी योजना राइट टू फूड भी शामिल। इसी साल राइट टू फूड को संसद से पारित करा लागू करने का एलान। सो बजट में 17 फीसदी बढ़ोतरी और सरकारी खजाने की मजबूरी का अंदाजा लगा लीजिए। यों महंगाई की मदद से बढ़ी विकास दर की खुशी भी छलकी। राजकोषीय घाटा 5.5 से घटकर 5.1 फीसदी होने पर दादा गदगद दिखे। एफआरबीएम एक्ट में संशोधन कर इसे और कम करने का दावा किया। पर महंगाई की मार झेल रही आम जनता का घाटा कैसे कम हो, बजट में कुछ नहीं। अलबत्ता प्रणव दा ने पिछले साल भी बजट भाषण में इंद्र देवता के सामने हाथ फैलाए थे। अबके भी उन ने पिछले साल की तरह इंद्र की कृपा मांगी। यानी महंगाई फिर इंद्र के भरोसे। पर जब पिछले साल इंद्र मेहरबान हुए, तो महंगाई कम क्यों नहीं हुई? प्रणव दा ने इंद्र से मानसूनी वर्षा का वरदान मांगा। तो धन की देवी लक्ष्मी से भी अरज लगाई। यानी मानसून के सहारे महंगाई रोकने की उम्मीद। तो विकास के लिए लक्ष्मी से प्रार्थना। पर महज मानसूनी बारिश से क्या होगा, गर किसानों को सहूलियत न मिले। सो दादा ने किसानों के साथ भी आंकड़ों के खूब करतब दिखाए। किसानों के लिए कर्ज लक्ष्य की सीमा 3,75,000 करोड़ से बढ़ाकर 4,75,000 करोड़ कर दी। पर जब राधा ही न नाचे, तो नौ मन तेल का क्या होगा? किसानों को दस्तावेज की आड़ में कभी आसानी से कर्ज मिलते ही नहीं। सो लिमिट बढ़ाकर पूरा बजट ही रख दो, क्या हो जाएगा? बैंकों के पास किसानों के लिए हुआ आवंटन यों ही पड़ा रहेगा। अब किसान कर्ज की ब्याज दर को सात फीसदी बरकरार रखा गया। पर समय पर कर्ज अदा करने वाले किसान को सात की बजाए चार फीसदी ही ब्याज देना होगा। अब कृषि क्षेत्र में हरित क्रांति के लिए ऊंट के मुंह में जीरा के समान 400 करोड़ दिए। कृषि क्षेत्र में समुचित विकास का बजट 37,500 से बढ़ाकर 47,500 करोड़ कर दिया। पर आप आंकड़ों का पुराना खाक देख लो। कृषि मद के करीबन 90 फीसदी पैसे कृषि आधारित उद्योग में खप जाते। सो कैसे होगी कृषि आत्मनिर्भरता? अब प्रणव के बजट में इस साल किसानों को कितना मिला, यह देखना होगा। यों पेंशन में भी नई कैटेगरी बना दादा ने राहत दी। पर कुल मिलाकर काला धन हो या महंगाई, भ्रष्टाचार हो या सब्सिडी, तस्वीर साफ नहीं। कैरोसिन, एलपीजी, खाद पर सब्सिडी के बदले मार्च 2012 से कैश मिलेगा। तो क्या बाकी देश में एलपीजी की सब्सिडी खत्म होगी? यानी पूरे बजट में आम आदमी, गरीब और गांव से जुड़े मुद्दों पर खूब चिंता जताई। उद्योग जगत को वाहवाह कर दिया। मंदी से उबरने के बावजूद 2008 से मिल रही उद्योग जगत की छूट को दादा ने कंटीन्यू कर दिया। अरबपति देश में बढ़ गए। पर बजट की चपेट में कोई उद्योगपति नहीं, ना ही कोई नया कर। सो सोचिए, अब अगर पेट्रोल की कीमतें बढ़ी, तो महंगाई पर भविष्यवाणी का क्या होगा?
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28/02/2011