इंडिया गेट से
---------
संगठन चुनाव पर याचना
नहीं, रण के मूड में तिकड़ी
-----------------
संतोष कुमार
-----------
संसद सत्र खत्म होने को आया। तो विपक्षियों को महंगाई याद आई। ताकि सत्र के बाद जनता के बीच पहुंचें। तो मुंह दिखा सकें। पर चालू सत्र में 26 नवंबर को जब महंगाई पर बहस हुई थी। तब लोकसभा में कोरम के भी लाले पड़ गए थे। सदन का अलार्म तीन बार घनघनाया। फिर भी कोरम पूरा नहीं हुआ। पर किसी ने एतराज नहीं किया। सो बहस चलती रही। देश 26/11 की बरसी में गमगीन था। तभी देर रात सरकार ने बहस का जवाब भी दे दिया। पर इधर संसद में बहस पूरी हुई। उधर महंगाई ने और तेजी दिखा दी। सरकार तो हाथ खड़े कर चुकी। पर विपक्ष के पास भी महंगाई रोकने का कोई फार्मूला नहीं। सो मजबूरी में विपक्ष का हंगामा देख सरकार भी सदन ठप कराना बेहतर समझती। ताकि विपक्ष भी जनता को मुंह दिखा सके। सदन में सरकार की भी फजीहत न हो। पर बात महंगाई रोकने के फार्मूले की। तो जब 26 नवंबर को बहस हुई। तब यहीं पर आपको बताया था। जब आम आदमी को राहत नहीं दे सकते। तो किस विकास का ढोल पीट रहे। अब तो बेहतर यही, अपने नेतागण महंगाई का नाम बदलकर सस्ताई रख दें। संविधान संशोधन कर महंगाई शब्द पर ही बैन लगवा दें। वैसे भी अपने सीपी जोशी ने कुछ ऐसी ही राह दिखा दी। नरेगा को कई राज्य सरकारें अपनी योजना प्रचारित कर रही थीं। तो उसे रोकने के बजाए अपने सीपी जोशी ने नाम ही बदल दिया। पहले राजीव गांधी नाम रखने की सोची। पर बवाल की आशंका से सोनिया ने हरी झंडी नहीं दी। आखिर जोशी ने नरेगा को महात्मा गांधी का मार्का दे दिया। बुधवार को हंगामे के बीच ही नरेगा को मगरेगा करने का संविधान संशोधन बिल पास करा लिया। अब राष्ट्रीय रोजगार गारंटी अधिनियम का नाम महात्मा गांधी रोजगार गारंटी अधिनियम होगा। है ना, नाकामी पर नकेल कसने का उम्दा फार्मूला। तभी तो कहा, महंगाई शब्द को ही बदल दो। संसद तो वैसे भी मंत्रिपरिषद की कठपुतली बन चुका। डा. लक्ष्मीमल सिंघवी ने भी यही बात कही थी। उन ने कहा था- 'भले सर्वोपरि सत्ता संसद में निहित है। पर वास्तविकता यही, विधि अधिनियमों का गर्भाधान और जन्म मंत्रालयों में होता है। संसद में सिर्फ मंत्रोच्चारण के साथ उपनयन संस्कार कर औपचारिक यज्ञोपवीत दे दिया जाता है।' अब भले विपक्ष के हंगामे से भी आम आदमी को कोई राहत न मिले। पर बुधवार को मुख्य विपक्षी बीजेपी को जसवंत सिंह ने बड़ी राहत दे दी। बीजेपी से बर्खास्त जसवंत ने संसद की पीएसी की कुर्सी छोडऩे से इनकार कर दिया था। सुषमा स्वराज ने स्पीकर तक गुहार लगाई। पर नियम का हवाला दे स्पीकर ने हाथ खड़े कर दिए। सो बीजेपी को कड़वा घूंट पीकर रहना पड़ गया। पर सोमवार को लोकसभा में गोरखालैंड पर जसवंत-आडवाणी के बीच संवाद से बर्फ पिघली। सो अब अचानक जसवंत ने पीएसी की अध्यक्षी से इस्तीफा दे दिया। तो इस्तीफे से पहले बाकायदा मिठाइयां बांटीं। मिठाई बीजेपी को अब तक पानी पिलाने के लिए बांटी या किसी गुप्त समझौते के तहत, यह तो मालूम नहीं। पर राजनीतिक पारी के आखिरी मुकाम से गुजर रहे जसवंत के लिए अपने बेटे मानवेंद्र का कैरियर संवारने की चुनौती। अब बीजेपी में काफी कुछ बदल रहा। सो जसवंत ने पीएसी पर रार ठान कटुता बढ़ाने के बजाए नरमी के संकेत दिए। बीजेपी ने किसी दबाव से इनकार किया। तो जसवंत ने भी स्वेच्छा से इस्तीफे की दलील दी। उधर स्पीकर मीरा कुमार ने जसवंत का इस्तीफा मंजूर कर लिया। सो बीजेपी के दिल को चैन आ गया। पर बीजेपी के नसीब में चैन कहां। अब नितिन गडकरी के नाम का एलान शायद 23 दिसंबर की पार्लियामेंट्री बोर्ड से हो जाए। पर राज्यों की मुसीबत कम नहीं हो रही। राजस्थान बीजेपी की खींचतान अब टूट के कगार पर पहुंच गई। त्रिगुट यानी वसुंधरा, माथुर, रामदास ने संगठन चुनाव पर रोक लगवाने को प्रतिष्ठïा का मुद्दा बना लिया। पर अरुण चतुर्वेदी दिल्ली आकर रामलाल और वेंकैया को सफाई दे गए। पचास फीसदी से ज्यादा चुनाव संपन्न हो चुके। सो अध्यक्ष चुनाव की प्रक्रिया पूरी हो। केंद्रीय चुनाव अधिकारी थावर चंद गहलोत ने बाकायदा 24-25 दिसंबर तारीख भी तय कर दी। विनय कटियार को चुनाव आब्जर्वर तैनात कर दिया। यों पहले 19-20 दिसंबर की तारीख तय थी। पर अब दोनों गुटों को वक्त मिल गया। चतुर्वेदी शायद खामी दूर करेंगे। पर त्रिगुट ने आर-पार का मन बना लिया। बुधवार को रामदास अग्रवाल के घर तिकड़ी चार घंटे बैठी। तो राजनाथ सिंह को चि_ïी सौंपने की तैयारी हुई। तमाम विधायकों-सांसदों के एतराज को भी नत्थी कर लिया। अब भी अगर हाईकमान ने संगठन चुनाव पर रोक नहीं लगाई। तो त्रिगुट यानी वसु, माथुर, रामदास पूरे अमले के साथ चुनाव के दिन जयपुर बीजेपी दफ्तर में मौन प्रदर्शन करेंगे। फिर भी चुनाव हो गया। तो तिकड़ी अरुण चतुर्वेदी के चुनाव को मान्यता नहीं देगी। अलबत्ता अपनी ओर से अध्यक्ष घोषित करने की भी रणनीति बना रही। अगर ऐसा हुआ। तो राजस्थान में बीजेपी का दो-फाड़ तय। पर बीजेपी त्रिगुट की होगी, या अरुण चतुर्वेदी की। यह तभी मालूम पड़ेगा। हाईकमान तो खुद दुविधा में। वेंकैया ने चुनाव रोकने का संदेश दे अरुण चतुर्वेदी को दिल्ली बुलाया था। पर राजनाथ ने वीटो लगा दिया। सो अब तिकड़ी संगठन चुनाव पर याचना नहीं, रण के मूड में।
----------
16/12/2009
Wednesday, December 16, 2009
Tuesday, December 15, 2009
टुकड़ा-टुकड़ा राजनीति, चिथड़ा-चिथड़ा शांति-सौहाद्र्र
इंडिया गेट से
---------
टुकड़ा-टुकड़ा राजनीति,
चिथड़ा-चिथड़ा शांति-सौहाद्र्र
----------------
संतोष कुमार
-----------
खरमास शुरू होते ही बीजेपी में बवंडर की तैयारी शुरू हो गई। नए अध्यक्ष की ताजपोशी अब शायद सूर्य के उत्तरायण होने के बाद हो। पर खरमास में अपने राजस्थान का बवेला जोर पकड़ेगा। संगठन चुनाव में गुट विशेष की मनमानी से त्रिगुट खफा। पर आलाकमान में मतभेद इस कदर। संगठन चुनाव रोकने का फैसला कर बिल्ली के गले में घंटी कौन बांधे। वसुंधरा, माथुर और रामदास की तिकड़ी आडवाणी, राजनाथ, जेतली, वेंकैया से मिल चुकी। पर राजनाथ मानने को तैयार नहीं। सो बुधवार को खरमास शुरू होगा। तो इधर रामदास के दिल्ली लौटते ही त्रिगुट का जमा-खर्च मंथन होगा। सो नए भूचाल की आशंका मानकर चलिए। भूचाल कैसा होगा, अपनी जानकारी में। पर आज खुलासा करना मुनासिब नहीं। सो बीजेपी और विवाद के नए चैप्टर का इंतजार करिए। वैसे भी संसद का सत्र उठान पर। सो सत्र के बाद करने को कुछ काम भी चाहिए। जैसे अंत्याक्षरी में कहते हैं ना- 'बैठे-बैठे क्या करोगे, करना है कुछ काम। शुरू करो...।' पर मंगलवार को आडवाणी ने अपने सांसदों की खूब पीठ ठोकी। सरकार को कुछ मुद्दों पर घेरने के लिए बधाई दी। बोले- 'हम विपक्ष का दायित्व निभाने में सफल रहे। सरकार ने विपक्ष की एकजुटता तोडऩे की कोशिश में लिब्राहन रपट लीक की। पर विपक्ष एकजुट रहा। लिब्राहन बहस में भी बीजेपी से ज्यादा कांग्रेस निशाने पर रही।' भले आडवाणी इसे एकजुटता कहें। पर यह सच्चाई नहीं। लिब्राहन बहस में मुलायम हों या माया के सिपहसालार। लेफ्ट हो या बीजेपी की सहयोगी जेडीयू। सबके अपने-अपने वोट बैंक। अब जब एनडीए ही एक सुर में न बोला। तो यह कैसी एकजुटता? पर शायद मौजूदा सत्र की आखिरी पार्लियामेंट्री पार्टी मीटिंग थी। सो हौसला अफजाई करना आडवाणी की मजबूरी। अब गुरुवार को कांग्रेस पार्लियामेंट्री पार्टी की मीटिंग होगी। तो सोनिया गांधी भी विपक्ष को मुंहतोड़ जवाब देने के लिए अपनों की पीठ ठोकेंगी। सांप्रदायिकता और सेक्युलरिज्म की दुहाई तो राजनीतिक फैशन में। पर सबसे अहम होगा तेलंगाना का मुद्दा। तेलंगाना की हड्डïी कांग्रेस के गले में इस कदर फंस चुकी। मंगलवार को लोकसभा में भी फजीहत से दो-चार होना पड़ा। तेलुगुदेशम ने भी तेलंगाना पर यू-टर्न ले लिया। सो लोकसभा में यूनाइटेड आंध्र का नारा लगा खूब बवाल काटा। तो बवाल में कई कांग्रेसी सांसद भी साथ हो लिए। आंध्र में दिवंगत सीएम वाईएस राजशेखर रेड्डïी के बेटे जगन मोहन भी वैल में कूद पड़े। साथ में चार कांग्रेसी केएस राव, श्रीनिवासुलू, बप्पी राजू और कृपा रानी भी। जगन मोहन ने आगे बढ़ टीडीपी के नारायण राव से हाथ भी मिलाया। अखंड आंध्र के कागज भी लहराए। सो तेलंगाना रीजन के दर्जन भर कांग्रेसी सांसद मुश्किल में पड़ गए। अनुशासन और मर्यादा का लिहाज कर ये सब भी अपनी सीटों पर खड़े हो गए। बाद में तेलंगाना रीजन के इन सांसदों ने जगन मोहन पर कार्रवाई की मांग की। अनुशासन समिति के मुखिया ए.के. एंटनी से मिलकर दरख्वास्त भी लगा दी। अब कांग्रेस जैसी मुश्किल में फंसी, जगन पर कार्रवाई संभव नहीं दिखती। वैसे भी वाईएसआर के बाद से जगन सीएम बनने की जुगत में एड़ी-चोटी लगा चुके। पर वाईएसआर ने अपने जमाने में जितना सोनिया का भरोसा जीता, दिल्ली में उतने ही विरोधी पैदा कर लिए। सो वाईएसआर के बाद विरोधियों ने जगन की मुहिम सिरे न चढऩे दी। अब जगन भी मौका नहीं चूक रहे। भले कांग्रेसी की फजीहत हो, पर पिता की तरह आंध्र की जनता का दिल जीतने में जुट गए। सो गुरुवार को सोनिया गांधी भी शायद बर्र के छत्ते में हाथ डालने से परहेज करें। आम सहमति के नाम पर पल्ला झाडऩे की कोशिश होगी। आंध्र में तेलंगाना के विरोध में भड़की आग को शांत करने के लिए मंगलवार को सीसीपीए हुई। राजनीतिक मामलों की केबिनेट कमेटी भी क्या करे। सो दो लाइन का प्रस्ताव पारित कर आंध्र की जनता से शांति और सौहाद्र्र की अपील की। पर तेलंगाना विरोधी अब बाकायदा भरोसा मांग रहे। आंध्र का बंटवारा नहीं होगा, इसका सरकारी एलान चाह रहे। पर बिल्ली के गले में घंटी कौन बांधे। वैसे भी तेलंगाना की आग पर राजनीतिक दल अलग-अलग अंदाज में मजा ले रहे। टीडीपी जब एनडीए के साथ थी, तो तेलंगाना नहीं बनने दिया। अबके विधानसभा चुनाव हुए। तो तेलंगाना के समर्थन में खड़ी हो गई। पर अब मौका देख फिर पलटी मार ली। सिर्फ टीडीपी ही नहीं। लेफ्ट वाले तेलंगाना के पक्ष में खड़े। पर गोरखालैंड के लिए राजी नहीं। माया तो यूपी को तीन टुकड़ों में बांटना चाह रहीं। पर मुलायम अखंड यूपी का राग अलाप रहे। यों मुलायम भी तेलंगाना के पक्ष में। यानी सूबाई पार्टियां खुलकर राजनीतिक दोगलेपन का खेल खेल रहीं। सो राष्टï्रीय पार्टियां मुश्किल में। सीसीपीए की मीटिंग में पवार और ममता ने भी कांग्रेस को लपेटा। तेलंगाना पर हुए फैसले में सलाह-मशविरा नहीं करने से खफा। सो गरमा-गरमी के बीच ही प्रस्ताव तय हुआ। अब शांति कायम करने की कवायद होगी। पर तेलंगाना विवाद ने कांग्रेस के साथ-साथ बीजेपी को भी कनफ्यूज कर दिया। सो सूबाई पार्टियां अपने-अपने अंदाज में रोटियां सेक रहीं। भले टुकड़ों की राजनीति में देश के अमन-चैन के चिथड़े उड़ रहे हों।
----------
15/12/2009
---------
टुकड़ा-टुकड़ा राजनीति,
चिथड़ा-चिथड़ा शांति-सौहाद्र्र
----------------
संतोष कुमार
-----------
खरमास शुरू होते ही बीजेपी में बवंडर की तैयारी शुरू हो गई। नए अध्यक्ष की ताजपोशी अब शायद सूर्य के उत्तरायण होने के बाद हो। पर खरमास में अपने राजस्थान का बवेला जोर पकड़ेगा। संगठन चुनाव में गुट विशेष की मनमानी से त्रिगुट खफा। पर आलाकमान में मतभेद इस कदर। संगठन चुनाव रोकने का फैसला कर बिल्ली के गले में घंटी कौन बांधे। वसुंधरा, माथुर और रामदास की तिकड़ी आडवाणी, राजनाथ, जेतली, वेंकैया से मिल चुकी। पर राजनाथ मानने को तैयार नहीं। सो बुधवार को खरमास शुरू होगा। तो इधर रामदास के दिल्ली लौटते ही त्रिगुट का जमा-खर्च मंथन होगा। सो नए भूचाल की आशंका मानकर चलिए। भूचाल कैसा होगा, अपनी जानकारी में। पर आज खुलासा करना मुनासिब नहीं। सो बीजेपी और विवाद के नए चैप्टर का इंतजार करिए। वैसे भी संसद का सत्र उठान पर। सो सत्र के बाद करने को कुछ काम भी चाहिए। जैसे अंत्याक्षरी में कहते हैं ना- 'बैठे-बैठे क्या करोगे, करना है कुछ काम। शुरू करो...।' पर मंगलवार को आडवाणी ने अपने सांसदों की खूब पीठ ठोकी। सरकार को कुछ मुद्दों पर घेरने के लिए बधाई दी। बोले- 'हम विपक्ष का दायित्व निभाने में सफल रहे। सरकार ने विपक्ष की एकजुटता तोडऩे की कोशिश में लिब्राहन रपट लीक की। पर विपक्ष एकजुट रहा। लिब्राहन बहस में भी बीजेपी से ज्यादा कांग्रेस निशाने पर रही।' भले आडवाणी इसे एकजुटता कहें। पर यह सच्चाई नहीं। लिब्राहन बहस में मुलायम हों या माया के सिपहसालार। लेफ्ट हो या बीजेपी की सहयोगी जेडीयू। सबके अपने-अपने वोट बैंक। अब जब एनडीए ही एक सुर में न बोला। तो यह कैसी एकजुटता? पर शायद मौजूदा सत्र की आखिरी पार्लियामेंट्री पार्टी मीटिंग थी। सो हौसला अफजाई करना आडवाणी की मजबूरी। अब गुरुवार को कांग्रेस पार्लियामेंट्री पार्टी की मीटिंग होगी। तो सोनिया गांधी भी विपक्ष को मुंहतोड़ जवाब देने के लिए अपनों की पीठ ठोकेंगी। सांप्रदायिकता और सेक्युलरिज्म की दुहाई तो राजनीतिक फैशन में। पर सबसे अहम होगा तेलंगाना का मुद्दा। तेलंगाना की हड्डïी कांग्रेस के गले में इस कदर फंस चुकी। मंगलवार को लोकसभा में भी फजीहत से दो-चार होना पड़ा। तेलुगुदेशम ने भी तेलंगाना पर यू-टर्न ले लिया। सो लोकसभा में यूनाइटेड आंध्र का नारा लगा खूब बवाल काटा। तो बवाल में कई कांग्रेसी सांसद भी साथ हो लिए। आंध्र में दिवंगत सीएम वाईएस राजशेखर रेड्डïी के बेटे जगन मोहन भी वैल में कूद पड़े। साथ में चार कांग्रेसी केएस राव, श्रीनिवासुलू, बप्पी राजू और कृपा रानी भी। जगन मोहन ने आगे बढ़ टीडीपी के नारायण राव से हाथ भी मिलाया। अखंड आंध्र के कागज भी लहराए। सो तेलंगाना रीजन के दर्जन भर कांग्रेसी सांसद मुश्किल में पड़ गए। अनुशासन और मर्यादा का लिहाज कर ये सब भी अपनी सीटों पर खड़े हो गए। बाद में तेलंगाना रीजन के इन सांसदों ने जगन मोहन पर कार्रवाई की मांग की। अनुशासन समिति के मुखिया ए.के. एंटनी से मिलकर दरख्वास्त भी लगा दी। अब कांग्रेस जैसी मुश्किल में फंसी, जगन पर कार्रवाई संभव नहीं दिखती। वैसे भी वाईएसआर के बाद से जगन सीएम बनने की जुगत में एड़ी-चोटी लगा चुके। पर वाईएसआर ने अपने जमाने में जितना सोनिया का भरोसा जीता, दिल्ली में उतने ही विरोधी पैदा कर लिए। सो वाईएसआर के बाद विरोधियों ने जगन की मुहिम सिरे न चढऩे दी। अब जगन भी मौका नहीं चूक रहे। भले कांग्रेसी की फजीहत हो, पर पिता की तरह आंध्र की जनता का दिल जीतने में जुट गए। सो गुरुवार को सोनिया गांधी भी शायद बर्र के छत्ते में हाथ डालने से परहेज करें। आम सहमति के नाम पर पल्ला झाडऩे की कोशिश होगी। आंध्र में तेलंगाना के विरोध में भड़की आग को शांत करने के लिए मंगलवार को सीसीपीए हुई। राजनीतिक मामलों की केबिनेट कमेटी भी क्या करे। सो दो लाइन का प्रस्ताव पारित कर आंध्र की जनता से शांति और सौहाद्र्र की अपील की। पर तेलंगाना विरोधी अब बाकायदा भरोसा मांग रहे। आंध्र का बंटवारा नहीं होगा, इसका सरकारी एलान चाह रहे। पर बिल्ली के गले में घंटी कौन बांधे। वैसे भी तेलंगाना की आग पर राजनीतिक दल अलग-अलग अंदाज में मजा ले रहे। टीडीपी जब एनडीए के साथ थी, तो तेलंगाना नहीं बनने दिया। अबके विधानसभा चुनाव हुए। तो तेलंगाना के समर्थन में खड़ी हो गई। पर अब मौका देख फिर पलटी मार ली। सिर्फ टीडीपी ही नहीं। लेफ्ट वाले तेलंगाना के पक्ष में खड़े। पर गोरखालैंड के लिए राजी नहीं। माया तो यूपी को तीन टुकड़ों में बांटना चाह रहीं। पर मुलायम अखंड यूपी का राग अलाप रहे। यों मुलायम भी तेलंगाना के पक्ष में। यानी सूबाई पार्टियां खुलकर राजनीतिक दोगलेपन का खेल खेल रहीं। सो राष्टï्रीय पार्टियां मुश्किल में। सीसीपीए की मीटिंग में पवार और ममता ने भी कांग्रेस को लपेटा। तेलंगाना पर हुए फैसले में सलाह-मशविरा नहीं करने से खफा। सो गरमा-गरमी के बीच ही प्रस्ताव तय हुआ। अब शांति कायम करने की कवायद होगी। पर तेलंगाना विवाद ने कांग्रेस के साथ-साथ बीजेपी को भी कनफ्यूज कर दिया। सो सूबाई पार्टियां अपने-अपने अंदाज में रोटियां सेक रहीं। भले टुकड़ों की राजनीति में देश के अमन-चैन के चिथड़े उड़ रहे हों।
----------
15/12/2009
Friday, December 4, 2009
तो अब सांसद भी मांगे आईआईएम सी पाठशाला
इंडिया गेट से
---------
तो अब सांसद भी मांगे
आईआईएम सी पाठशाला
----------------
संतोष कुमार
-----------
तो संसद का अगला हफ्ता लिब्राहन रपट के नाम होगा। मुलायम सिंह की हिंदी कापी भी आ गई। सो लोकसभा में सोम, मंगल। राज्यसभा में बुध, गुरु को बहस होगी। पर रपट में कमीशन के 17 साल के सिवा कुछ नया नहीं। अलबत्ता कुछ ऐसी खामियां, जिनकी बखियां तो उधड़ेंगी ही। पर राजनीति तो अजर-अमर। सो दोनों तरफ हल्ला ब्रिगेड और बखिया उधेड़ू दस्ता तैयार हो गए। महंगी चीनी के जमाने में भी बीजेपी को हिंदुत्व की चासनी खूब भाती। सो आरोपियों की लिस्ट में शामिल नेताओं को बहस से दूर रखा। यानी बाबरी ढांचा ढहाने की नैतिक जिम्मेदारी तो खुद ओढ़ ली। अब अगर आडवाणी खुद बचाव करते। तो बार-बार ढांचा गिराए जाने पर अफसोस जताते। ताकि सेक्युलर होने का तमगा मिल सके। सो बीजेपी ने एक तीर से दो निशाने साधे। पर अब बीजेपी की मापतोल का काम आरएसएस ने पूरा कर लिया। सो आरएसएस ने भी बैन हटा लिया। अब लिब्राहन रपट पर डी-4 भी बोलेगा। ताकि हिंदुत्व के चेहरे बीजेपी में बढ़ें। पर कांग्रेस को तो दूजे वोट बैंक की फिक्र। अब संसद में कांग्रेस की नरसिंह राव सरकार पर चौतरफा हमला होगा। तो चुपचाप सहना वोटरों को संदेश दे जाएगा। सो नैतिकता-वैतिकता को ताक पर रखने की ठान ली। कांग्रेस यूपी के नेताओं को बहस में उतारेगी। तो शुरुआत जगदंबिका पाल करेंगे। पर लिब्राहन रपट में जगदंबिका पाल भी साजिशकर्ताओं की लिस्ट में शामिल। सो कांग्रेस ने बीजेपी के उलट रणनीति अपनाई। यानी संसद में आडवाणी-जोशी मुंह नहीं खोलेंगे। तो वोटरों को मैसेज देंगे। पर कांग्रेस के नेता आरोपी की लिस्ट में शामिल हों। फिर भी मुंह न खोले। तो उनका वोट बैंक खिसकेगा। सो बीजेपी ने अपने वोट बैंक की खातिर आडवाणी-जोशी को बहस से दूर रखा। तो कांग्रेस अपने वोट बैंक की खातिर जगदंबिका पाल को उतारेगी। सिर्फ कानूनी पहलू को राजनीतिक अंदाज में परोसेंगे कपिल सिब्बल। अब अगर दोनों बड़ी पार्टियां वाकई वोटरों के प्रति ईमानदार होतीं। तो लोकसभा सचिवालय में पहला नोटिस इनका होता। पर बहस की शुरुआत सीपीआई के गुरुदास दासगुप्त करेंगे। दूसरे नंबर पर कांग्रेस, तो तीसरे नंबर पर हिंदुत्व की झंडाबरदार बीजेपी। अब भले नोटिस देकर पहला वक्ता बनने की बात छोटी सी। पर निष्ठïा की दुहाई देने वालों की तत्परता का अंदाजा तो लग ही रहा। अब कोई पहले बोले, या बाद में। पर रपट के बहाने चार दिन तक संसद की तारीख छह दिसंबर से आगे नहीं बढ़ेगी। मुलायम सिंह ने तो पहले ही कह दिया। नरसिंह राव को मनमोहन सरकार ने क्लीन चिट दिलवाई। बोले- 'गुरु राव को चेले मनमोहन की ओर से गुरु दक्षिणा में क्लीन चिट।' मुलायम-लेफ्ट-बीएसपी जैसों के निशाने पर कांग्रेस-बीजेपी दोनों होंगी। रपट संसद में पेश होने से पहले आडवाणी और मुलायम अपनी-अपनी निष्ठïा का प्रदर्शन कर चुके। आडवाणी को बाबरी मस्जिद गिरने का मलाल भी। पर किसी भी सूरत में वहां मंदिर ही बने, यही उनके जीवन की साध। अब यह कैसा मलाल, अपनी तो समझ से बाहर। पर आडवाणी की स्फूर्ति देख बीजेपी में ही लोग कहने लगे। क्या लिब्राहन रपट के सहारे पूरी पारी खेलने की तैयारी? पर आडवाणी की बात चली। तो बताते जाएं, लोकसभा चुनाव से पहले उन ने आमिर खान की 'तारे जमीं पर' देखी थी। अब भले नतीजे जो भी रहे। अब उन ने एक और मानवीय सरोकार वाली फिल्म 'जेल' देखी। सो कुछ भाजपाइयों को डर सता रहा। कहीं बीजेपी भी अब आरएसएस की 'जेल' न हो जाए। संसदीय दल की मीटिंग में पूर्णिया से सांसद उदय सिंह यह मुद्दा उठा चुके। जेलर की भूमिका में आरएसएस की दखलंदाजी पर भरी मीटिंग में भड़क उठे। तो वेंकैया को बात संभालनी पड़ी थी। पर यह तो अंदरूनी मंच पर बीजेपी सांसद की पीड़ा। अब शुक्रवार को हिमाचल के कांगड़ा से सांसद राजन सुशांत ने मौजूं मुद्दा उठाया। पर ईमानदारी भी देखिए, उन ने सभी पार्टियों में योग्य नेता की कमी बताई। लोकसभा में शून्यकाल में अति लोक महत्वपूर्ण विषय के तहत बोल रहे थे। कहा- 'सभी पार्टियों में योग्य नेताओं की कमी। देश की जनता योग्य नेता चाहती। जो सदन में बात रख सकें। सो आईपीएस, आईएफएस और आईएएम जैसा एक नेतागिरी का भी संस्थान हो। जिसका पाठ्यक्रम भी बनाया जाए। ताकि उसमें नेतागिरी की ट्रेनिंग हो।' अब जरा राजन भाई का बैक ग्राउंड बता दें। हिमाचल में चार टर्म एमएलए, पांच साल मंत्री रहे। पेशे से डाक्टर, वकील, ट्रेड यूनियनिस्ट, हार्टीकल्चरिस्ट। अबके पहली बार लोकसभा में। शायद राजन भाई को लोकसभा में कमी दिख गई। सो दिल की बात जुबां पर ले आए। वरना कभी ऐसा सुना, कोई नेता खुद के लिए ट्रेनिंग की बात करे। नेता तो खुद को खुदा मानता। एक बार संसद पहुंच जाए। तो संसद को बपौती मान चाहे जो जी में आए, कर डालता। अपने लालू यादव को ही लो। बिहार में चारा मैनेज किया। दिल्ली में रेल महकमा मिला। तो अहमदाबाद से लेकर हावर्ड यूनिवर्सिटी तक मैनेजमेंट गुरु हो गए। अब ममता दीदी मैनेजमेंट की कहानी सुनाएंगी। तो पता चलेगा, कहां से डिग्री लाए थे लालू। अब राजन भाई की बात भले सोलह आने सही। पर माने कौन। सदन में बैठे आडवाणी, सुषमा आदि हंस रहे थे। संसद तो सिर्फ वोट बैंक का अखाड़ा। सो ट्रेनिंग की बात पर नेता हंसेंगे ही।
---------
04/12/2009
---------
तो अब सांसद भी मांगे
आईआईएम सी पाठशाला
----------------
संतोष कुमार
-----------
तो संसद का अगला हफ्ता लिब्राहन रपट के नाम होगा। मुलायम सिंह की हिंदी कापी भी आ गई। सो लोकसभा में सोम, मंगल। राज्यसभा में बुध, गुरु को बहस होगी। पर रपट में कमीशन के 17 साल के सिवा कुछ नया नहीं। अलबत्ता कुछ ऐसी खामियां, जिनकी बखियां तो उधड़ेंगी ही। पर राजनीति तो अजर-अमर। सो दोनों तरफ हल्ला ब्रिगेड और बखिया उधेड़ू दस्ता तैयार हो गए। महंगी चीनी के जमाने में भी बीजेपी को हिंदुत्व की चासनी खूब भाती। सो आरोपियों की लिस्ट में शामिल नेताओं को बहस से दूर रखा। यानी बाबरी ढांचा ढहाने की नैतिक जिम्मेदारी तो खुद ओढ़ ली। अब अगर आडवाणी खुद बचाव करते। तो बार-बार ढांचा गिराए जाने पर अफसोस जताते। ताकि सेक्युलर होने का तमगा मिल सके। सो बीजेपी ने एक तीर से दो निशाने साधे। पर अब बीजेपी की मापतोल का काम आरएसएस ने पूरा कर लिया। सो आरएसएस ने भी बैन हटा लिया। अब लिब्राहन रपट पर डी-4 भी बोलेगा। ताकि हिंदुत्व के चेहरे बीजेपी में बढ़ें। पर कांग्रेस को तो दूजे वोट बैंक की फिक्र। अब संसद में कांग्रेस की नरसिंह राव सरकार पर चौतरफा हमला होगा। तो चुपचाप सहना वोटरों को संदेश दे जाएगा। सो नैतिकता-वैतिकता को ताक पर रखने की ठान ली। कांग्रेस यूपी के नेताओं को बहस में उतारेगी। तो शुरुआत जगदंबिका पाल करेंगे। पर लिब्राहन रपट में जगदंबिका पाल भी साजिशकर्ताओं की लिस्ट में शामिल। सो कांग्रेस ने बीजेपी के उलट रणनीति अपनाई। यानी संसद में आडवाणी-जोशी मुंह नहीं खोलेंगे। तो वोटरों को मैसेज देंगे। पर कांग्रेस के नेता आरोपी की लिस्ट में शामिल हों। फिर भी मुंह न खोले। तो उनका वोट बैंक खिसकेगा। सो बीजेपी ने अपने वोट बैंक की खातिर आडवाणी-जोशी को बहस से दूर रखा। तो कांग्रेस अपने वोट बैंक की खातिर जगदंबिका पाल को उतारेगी। सिर्फ कानूनी पहलू को राजनीतिक अंदाज में परोसेंगे कपिल सिब्बल। अब अगर दोनों बड़ी पार्टियां वाकई वोटरों के प्रति ईमानदार होतीं। तो लोकसभा सचिवालय में पहला नोटिस इनका होता। पर बहस की शुरुआत सीपीआई के गुरुदास दासगुप्त करेंगे। दूसरे नंबर पर कांग्रेस, तो तीसरे नंबर पर हिंदुत्व की झंडाबरदार बीजेपी। अब भले नोटिस देकर पहला वक्ता बनने की बात छोटी सी। पर निष्ठïा की दुहाई देने वालों की तत्परता का अंदाजा तो लग ही रहा। अब कोई पहले बोले, या बाद में। पर रपट के बहाने चार दिन तक संसद की तारीख छह दिसंबर से आगे नहीं बढ़ेगी। मुलायम सिंह ने तो पहले ही कह दिया। नरसिंह राव को मनमोहन सरकार ने क्लीन चिट दिलवाई। बोले- 'गुरु राव को चेले मनमोहन की ओर से गुरु दक्षिणा में क्लीन चिट।' मुलायम-लेफ्ट-बीएसपी जैसों के निशाने पर कांग्रेस-बीजेपी दोनों होंगी। रपट संसद में पेश होने से पहले आडवाणी और मुलायम अपनी-अपनी निष्ठïा का प्रदर्शन कर चुके। आडवाणी को बाबरी मस्जिद गिरने का मलाल भी। पर किसी भी सूरत में वहां मंदिर ही बने, यही उनके जीवन की साध। अब यह कैसा मलाल, अपनी तो समझ से बाहर। पर आडवाणी की स्फूर्ति देख बीजेपी में ही लोग कहने लगे। क्या लिब्राहन रपट के सहारे पूरी पारी खेलने की तैयारी? पर आडवाणी की बात चली। तो बताते जाएं, लोकसभा चुनाव से पहले उन ने आमिर खान की 'तारे जमीं पर' देखी थी। अब भले नतीजे जो भी रहे। अब उन ने एक और मानवीय सरोकार वाली फिल्म 'जेल' देखी। सो कुछ भाजपाइयों को डर सता रहा। कहीं बीजेपी भी अब आरएसएस की 'जेल' न हो जाए। संसदीय दल की मीटिंग में पूर्णिया से सांसद उदय सिंह यह मुद्दा उठा चुके। जेलर की भूमिका में आरएसएस की दखलंदाजी पर भरी मीटिंग में भड़क उठे। तो वेंकैया को बात संभालनी पड़ी थी। पर यह तो अंदरूनी मंच पर बीजेपी सांसद की पीड़ा। अब शुक्रवार को हिमाचल के कांगड़ा से सांसद राजन सुशांत ने मौजूं मुद्दा उठाया। पर ईमानदारी भी देखिए, उन ने सभी पार्टियों में योग्य नेता की कमी बताई। लोकसभा में शून्यकाल में अति लोक महत्वपूर्ण विषय के तहत बोल रहे थे। कहा- 'सभी पार्टियों में योग्य नेताओं की कमी। देश की जनता योग्य नेता चाहती। जो सदन में बात रख सकें। सो आईपीएस, आईएफएस और आईएएम जैसा एक नेतागिरी का भी संस्थान हो। जिसका पाठ्यक्रम भी बनाया जाए। ताकि उसमें नेतागिरी की ट्रेनिंग हो।' अब जरा राजन भाई का बैक ग्राउंड बता दें। हिमाचल में चार टर्म एमएलए, पांच साल मंत्री रहे। पेशे से डाक्टर, वकील, ट्रेड यूनियनिस्ट, हार्टीकल्चरिस्ट। अबके पहली बार लोकसभा में। शायद राजन भाई को लोकसभा में कमी दिख गई। सो दिल की बात जुबां पर ले आए। वरना कभी ऐसा सुना, कोई नेता खुद के लिए ट्रेनिंग की बात करे। नेता तो खुद को खुदा मानता। एक बार संसद पहुंच जाए। तो संसद को बपौती मान चाहे जो जी में आए, कर डालता। अपने लालू यादव को ही लो। बिहार में चारा मैनेज किया। दिल्ली में रेल महकमा मिला। तो अहमदाबाद से लेकर हावर्ड यूनिवर्सिटी तक मैनेजमेंट गुरु हो गए। अब ममता दीदी मैनेजमेंट की कहानी सुनाएंगी। तो पता चलेगा, कहां से डिग्री लाए थे लालू। अब राजन भाई की बात भले सोलह आने सही। पर माने कौन। सदन में बैठे आडवाणी, सुषमा आदि हंस रहे थे। संसद तो सिर्फ वोट बैंक का अखाड़ा। सो ट्रेनिंग की बात पर नेता हंसेंगे ही।
---------
04/12/2009
Monday, November 30, 2009
संसद के पास वक्त, पर 'सवाल' नहीं
इंडिया गेट से
---------
संसद के पास वक्त,
पर 'सवाल' नहीं
-------------
संतोष कुमार
-----------
लिब्राहन रपट के दोषी संसद में नहीं बोलेंगे। नैतिकता की दुहाई दे बीजेपी ने फैसला कर लिया। मंगलवार को लोकसभा में बहस होनी थी। पर बीजेपी की तैयारी धरी रह गई। अब शायद बुधवार नहीं तो अगले हफ्ते एकदिनी बहस में ही सब निपटेगा। तो न आडवाणी अपना बचाव करेंगे, न जोशी। अलबत्ता आडवाणी के उत्तराधिकारी की दौड़ में शामिल राजनाथ, सुषमा वकील होंगे। संघ के इशारे पर नाच रही बीजेपी फिर राममय होने को बेताब। अब बहस से आडवाणी, जोशी को दूर रखने का क्या मकसद? कहीं आडवाणी को रोकने की स्ट्रेटजी तो नहीं? आडवाणी छह दिसंबर को दुखद दिन करार दे चुके। मोहन भागवत से लेकर अशोक सिंघल इससे इत्तिफाक नहीं रखते। पर जो भी हो, बीजेपी ने नैतिक आधार पर आडवाणी-जोशी को तो दोषी मान ही लिया। अब राम के बहाने भले बीजेपी एकजुटता दिखाएगी। पर अंदरूनी 'लीला' का क्या? अनुशासन और गरिमा तो बीजेपी की सिर्फ किताबी बातें। लिब्राहन रपट की बहस का मुद्दा हो। तो राष्टï्रीय अध्यक्ष याचक की भूमिका में दिखाए जाते। कभी कोई महासचिव अध्यक्ष के फैसले के खिलाफ मीटिंग बॉयकाट करता। तो कई क्षत्रप संसदीय बोर्ड के फैसले को जूते की नोंक रखते। अब एक पत्रकार ने मजाक में पूछा। बीजेपी हैड क्वार्टर में अभी से संतरे का जूस मिल रहा। तो नेता चुटकी लेने से पीछे न रहे। तपाक से पूछा, क्या अब छाछ मिलना बंद हो गया? यानी राजनाथ सिंह छाछ हो गए। नितिन गडकरी संतरे का जूस। अब जब बात इतनी दिलचस्प हो। तो पत्रकार कहां चूकने वाले। सो अपने एक मित्र ने बचपन की कहानी सुना दी। दादा जी नागपुर घूमने गए। तो किसी भाई ने संतरा मंगवाया। तो किसी ने कपड़े। पर अपने इस मित्र ने लट्टïू मंगवाया। एक बार लट्टïू चलाते-चलाते दादा जी के सिर पर लग गया। सो गूमरा निकल आया। खफा होकर अपने मित्र के पिताजी ने दादा जी से कहा- 'मैं तो पहले ही कह रहा था, नागपुर से लट्टïू मत लाना।' यानी इशारा साफ, नागपुर से दिल्ली आ रहे नितिन गडकरी की ओर था। सो बीजेपी के एक बड़े नेता ने जवाब दिया- 'मेरे तो सिर पर बाल। जो गंजे हैं, उनके लिए मुश्किल।' अब हाथ कंगन को आरसी क्या, पढ़े-लिखे को फारसी क्या। दूसरी पीढ़ी में बीजेपी के कई दिग्गज, जिनके सिर पर बाल नहीं। पर दूसरा मतलब साफ, इस नेता ने इशारा कर दिया। अध्यक्ष कोई भी बने, उनके रुतबे पर असर नहीं पडऩे वाला। अब आप ही बताओ। यह बीजेपी का अंदरूनी झगड़ा नहीं, तो और क्या। फिर भी बीजेपी मीडिया पर ठीकरा फोड़ती। अब विपक्ष को आपसी लड़ाई से ही फुरसत न हो। तो वही होगा, जो सोमवार को हुआ। दोनों सदनों में हंगामे की वजह थी, बंगाल में केंद्रीय टीम भेजना। राज्यसभा में प्रश्रकाल नहीं चला। पर लोकसभा में थोड़े हंगामे के बीच ही स्पीकर मीरा कुमार ने कार्यवाही आगे बढ़ा दी। सिर्फ तीन सवालची सांसद मौजूद थे। बाकी 17 नदारद। सो आधे घंटे के भीतर ही प्रश्रों की सूची खत्म हो गई। लोकसभा के पास कोई काम नहीं बचा। सो लोकसभा भी ठप करनी पड़ी। अब समस्याओं से भरे देश में संसद के पास वक्त हो। और अपने सांसदों के पास नहीं। तो आप क्या कहेंगे? गैर हाजिर सवालचियों में कांग्रेस, बीजेपी, जदयू, शिवसेना, सीपीआई, सीपीएम समेत करीब-करीब सभी दलों के सांसद। यानी राजनीतिक हमाम में सभी नंगे निकले। बीजेपी के दो युवा वरुण और अनुराग ठाकुर तो कांग्रेस की श्रुति चौधरी भी सदन से नदारद रहीं। पर बाद में सबने बहाने गिना दिए। किसी की ट्रेन लेट। तो किसी का विमान। पर संसद की फिक्र किसी को नहीं। सवाल पूछकर गैर हाजिर रहने का मुद्दा कई दफा उठ चुका। पिछले सत्र में राज्यसभा में चेयरमैन ने चिंता जताई थी। अब मीरा कुमार सभी दलों को चि_ïी भेजेंगी। पर जब सबके अपने-अपने वोट बैंक हों। तो फिर संसद की गरिमा का ख्याल किसे हो? प्रश्रकाल संसद की आत्मा माना जाता। एक वर्कशाप में मारग्रेट अल्वा ने किस्सा सुनाया था। मेनका गांधी तब वाजपेयी सरकार में मंत्री थीं। मंत्री के नाते सत्रहवें सवाल का जवाब देना था। पर मेनका को उम्मीद नहीं थी, नंबर आएगा। सो सदन में बैठे सुडोकू खेलती रहीं। पर नंबर आ गया, तो शर्मिंदगी उठानी पड़ी। क्योंकि मेनका जवाब के लिए तैयार नहीं थीं। अब सोमवार को सुषमा ने अपने युवा सांसदों का बचाव इसी तरह किया। बोलीं- 'आम तौर पर छह सवाल ही हो पाते। सो अनुराग ठाकुर को उम्मीद नहीं थी।' पर अब विपक्ष संसद को अनुमान के तौर पर ले। तो फिर लोकतंत्र का राम ही राखा। अपने मधु लिमये ने एक बार कहा था- 'अनेक सांसद तो सदन में दिलचस्पी तक नहीं लेते। महत्वपूर्ण मुद्दों पर बहस करने की जगह कुछ पैसा बना लेने के चक्कर में रहते हैं।' लिमये के कथन की पुष्टिï तो दिसंबर 2005 में हो गई थी। जब संसद से 11 घूसखोर सवालची सांसद निकाले गए। पर अब गैर हाजिर सांसदों के लिए क्या हो? यह तो सिर्फ सवाल बनकर ही रह जाएगा। आखिर सांसदों का अपना विशेषाधिकार जो ठहरा। सो धूमिल के कविता संग्रह 'संसद से सड़क तक' की पंक्तियां याद आ गईं। उन ने लिखा- 'एक आदमी रोटी बेलता है। एक आदमी रोटी खाता है। एक तीसरा आदमी भी हो। जो न बेलता है, न खाता है। वह सिर्फ रोटी से खेलता है। मैं पूछता हूं, ये तीसरा आदमी कौन है। मेरे देश की संसद मौन है।'
----------
30/11/2009
---------
संसद के पास वक्त,
पर 'सवाल' नहीं
-------------
संतोष कुमार
-----------
लिब्राहन रपट के दोषी संसद में नहीं बोलेंगे। नैतिकता की दुहाई दे बीजेपी ने फैसला कर लिया। मंगलवार को लोकसभा में बहस होनी थी। पर बीजेपी की तैयारी धरी रह गई। अब शायद बुधवार नहीं तो अगले हफ्ते एकदिनी बहस में ही सब निपटेगा। तो न आडवाणी अपना बचाव करेंगे, न जोशी। अलबत्ता आडवाणी के उत्तराधिकारी की दौड़ में शामिल राजनाथ, सुषमा वकील होंगे। संघ के इशारे पर नाच रही बीजेपी फिर राममय होने को बेताब। अब बहस से आडवाणी, जोशी को दूर रखने का क्या मकसद? कहीं आडवाणी को रोकने की स्ट्रेटजी तो नहीं? आडवाणी छह दिसंबर को दुखद दिन करार दे चुके। मोहन भागवत से लेकर अशोक सिंघल इससे इत्तिफाक नहीं रखते। पर जो भी हो, बीजेपी ने नैतिक आधार पर आडवाणी-जोशी को तो दोषी मान ही लिया। अब राम के बहाने भले बीजेपी एकजुटता दिखाएगी। पर अंदरूनी 'लीला' का क्या? अनुशासन और गरिमा तो बीजेपी की सिर्फ किताबी बातें। लिब्राहन रपट की बहस का मुद्दा हो। तो राष्टï्रीय अध्यक्ष याचक की भूमिका में दिखाए जाते। कभी कोई महासचिव अध्यक्ष के फैसले के खिलाफ मीटिंग बॉयकाट करता। तो कई क्षत्रप संसदीय बोर्ड के फैसले को जूते की नोंक रखते। अब एक पत्रकार ने मजाक में पूछा। बीजेपी हैड क्वार्टर में अभी से संतरे का जूस मिल रहा। तो नेता चुटकी लेने से पीछे न रहे। तपाक से पूछा, क्या अब छाछ मिलना बंद हो गया? यानी राजनाथ सिंह छाछ हो गए। नितिन गडकरी संतरे का जूस। अब जब बात इतनी दिलचस्प हो। तो पत्रकार कहां चूकने वाले। सो अपने एक मित्र ने बचपन की कहानी सुना दी। दादा जी नागपुर घूमने गए। तो किसी भाई ने संतरा मंगवाया। तो किसी ने कपड़े। पर अपने इस मित्र ने लट्टïू मंगवाया। एक बार लट्टïू चलाते-चलाते दादा जी के सिर पर लग गया। सो गूमरा निकल आया। खफा होकर अपने मित्र के पिताजी ने दादा जी से कहा- 'मैं तो पहले ही कह रहा था, नागपुर से लट्टïू मत लाना।' यानी इशारा साफ, नागपुर से दिल्ली आ रहे नितिन गडकरी की ओर था। सो बीजेपी के एक बड़े नेता ने जवाब दिया- 'मेरे तो सिर पर बाल। जो गंजे हैं, उनके लिए मुश्किल।' अब हाथ कंगन को आरसी क्या, पढ़े-लिखे को फारसी क्या। दूसरी पीढ़ी में बीजेपी के कई दिग्गज, जिनके सिर पर बाल नहीं। पर दूसरा मतलब साफ, इस नेता ने इशारा कर दिया। अध्यक्ष कोई भी बने, उनके रुतबे पर असर नहीं पडऩे वाला। अब आप ही बताओ। यह बीजेपी का अंदरूनी झगड़ा नहीं, तो और क्या। फिर भी बीजेपी मीडिया पर ठीकरा फोड़ती। अब विपक्ष को आपसी लड़ाई से ही फुरसत न हो। तो वही होगा, जो सोमवार को हुआ। दोनों सदनों में हंगामे की वजह थी, बंगाल में केंद्रीय टीम भेजना। राज्यसभा में प्रश्रकाल नहीं चला। पर लोकसभा में थोड़े हंगामे के बीच ही स्पीकर मीरा कुमार ने कार्यवाही आगे बढ़ा दी। सिर्फ तीन सवालची सांसद मौजूद थे। बाकी 17 नदारद। सो आधे घंटे के भीतर ही प्रश्रों की सूची खत्म हो गई। लोकसभा के पास कोई काम नहीं बचा। सो लोकसभा भी ठप करनी पड़ी। अब समस्याओं से भरे देश में संसद के पास वक्त हो। और अपने सांसदों के पास नहीं। तो आप क्या कहेंगे? गैर हाजिर सवालचियों में कांग्रेस, बीजेपी, जदयू, शिवसेना, सीपीआई, सीपीएम समेत करीब-करीब सभी दलों के सांसद। यानी राजनीतिक हमाम में सभी नंगे निकले। बीजेपी के दो युवा वरुण और अनुराग ठाकुर तो कांग्रेस की श्रुति चौधरी भी सदन से नदारद रहीं। पर बाद में सबने बहाने गिना दिए। किसी की ट्रेन लेट। तो किसी का विमान। पर संसद की फिक्र किसी को नहीं। सवाल पूछकर गैर हाजिर रहने का मुद्दा कई दफा उठ चुका। पिछले सत्र में राज्यसभा में चेयरमैन ने चिंता जताई थी। अब मीरा कुमार सभी दलों को चि_ïी भेजेंगी। पर जब सबके अपने-अपने वोट बैंक हों। तो फिर संसद की गरिमा का ख्याल किसे हो? प्रश्रकाल संसद की आत्मा माना जाता। एक वर्कशाप में मारग्रेट अल्वा ने किस्सा सुनाया था। मेनका गांधी तब वाजपेयी सरकार में मंत्री थीं। मंत्री के नाते सत्रहवें सवाल का जवाब देना था। पर मेनका को उम्मीद नहीं थी, नंबर आएगा। सो सदन में बैठे सुडोकू खेलती रहीं। पर नंबर आ गया, तो शर्मिंदगी उठानी पड़ी। क्योंकि मेनका जवाब के लिए तैयार नहीं थीं। अब सोमवार को सुषमा ने अपने युवा सांसदों का बचाव इसी तरह किया। बोलीं- 'आम तौर पर छह सवाल ही हो पाते। सो अनुराग ठाकुर को उम्मीद नहीं थी।' पर अब विपक्ष संसद को अनुमान के तौर पर ले। तो फिर लोकतंत्र का राम ही राखा। अपने मधु लिमये ने एक बार कहा था- 'अनेक सांसद तो सदन में दिलचस्पी तक नहीं लेते। महत्वपूर्ण मुद्दों पर बहस करने की जगह कुछ पैसा बना लेने के चक्कर में रहते हैं।' लिमये के कथन की पुष्टिï तो दिसंबर 2005 में हो गई थी। जब संसद से 11 घूसखोर सवालची सांसद निकाले गए। पर अब गैर हाजिर सांसदों के लिए क्या हो? यह तो सिर्फ सवाल बनकर ही रह जाएगा। आखिर सांसदों का अपना विशेषाधिकार जो ठहरा। सो धूमिल के कविता संग्रह 'संसद से सड़क तक' की पंक्तियां याद आ गईं। उन ने लिखा- 'एक आदमी रोटी बेलता है। एक आदमी रोटी खाता है। एक तीसरा आदमी भी हो। जो न बेलता है, न खाता है। वह सिर्फ रोटी से खेलता है। मैं पूछता हूं, ये तीसरा आदमी कौन है। मेरे देश की संसद मौन है।'
----------
30/11/2009
Thursday, November 26, 2009
26/11 के गम में हो गई अथ श्री महंगाई कथा
इंडिया गेट से
---------
26/11 के गम में हो गई
अथ श्री महंगाई कथा
----------------
संतोष कुमार
-----------
शहीदों को शत शत नमन। आतंक के खिलाफ लड़ाई में देश की जनता एकजुट हो चुकी। भले संसद में सियासत हावी रही। पर देश भर में सड़कों पर जनता ने श्रद्धा की लौ जलाई। संसद में चेयर से प्रस्ताव आया। समूचे सदन ने मौन श्रद्धांजलि दी। पर 26/11 की घटना से उमड़ी जनभावना नेताओं को हिला चुकी। याद है ना, मुंबई हमले के बाद देश भर में जनता सड़कों पर उतरी। तो नेता घरों में दुबक गए थे। दबी जुबान कह रहे थे, हमारा क्या कसूर। पर इतना बड़ा हमला देश को दहला चुका था। आखिर मु_ïीभर आतंकी कैसे तमाम सुरक्षा इंतजामात का बलात्कार कर साजिश को अंजाम दे गए। सो जनता ने समूची राजनीतिक व्यवस्था को आड़े हाथ लिया। अब बरसी के मौके पर मीडिया से लेकर जनता ने श्रद्धांजलि का बीड़ा उठाया। तो अपने नेताओं को शायद नहीं सुहा रहा। सो गुरुवार को बीजेपी के आहलूवालिया काफी भड़के दिखे। संसद पहुंचे, तो मीडिया ने श्रद्धांजलि के दो शब्द मांगे। पर आहलूवालिया ने ज्ञान उड़ेल दिया। आहलूवालिया का गुस्सा, 26/11 को देश में और भी घटनाएं हुईं। पर सिर्फ मुंबई हमले को ही क्यों याद कर रहे? भले आहलूवालिया की भावना सही। उन ने जो बात कही, वह भी सही। पहले बोले- 'देश में कई ऐसी घटनाएं होती रहतीं। पर आप सिर्फ ताज की घटना इसलिए हाईलाइट कर रहे, क्योंकि वहां बड़े लोग मारे गए।' सो दिन भर खूब सुर्खियां बनीं। पर बाद में उन ने नई दलील जोड़ दी। कहा- '26 नवंबर 1949 को देश ने संविधान को स्वीकार किया। सो आज साठवीं सालगिरह। पर मीडिया उसे क्यों भुला रहा?Ó वाकई आहलूवालिया ने अच्छी बात याद दिलाई। मीडिया और देशवासियों को आहलूवालिया का साधुवाद कहना ही चाहिए। पर माननीय आहलूवालिया जी, जनता किस संविधान को याद करे? उस संविधान को, जिसका आप नेताओं ने मिलकर बैंड बजा दिया। या उस संविधान को, जिससे बड़ा नेता खुद को माने बैठे। अब तो आम जनता राजनीतिक रसूख वालों को ही माई-बाप मानने लगी। अगर नेता चाह ले, तो संविधान में संशोधन कर बल्ब को लालटेन बता दे और लालटेन को बल्ब। सो आहलूवालिया तो सिर्फ प्रतीक। अपने नेताओं का यह दर्द समझना कोई बड़ी बात नहीं। नेताओं को डर सताने लगा, चिंगारी कहीं शोला न बन जाए। सो मुद्दा कोई भी हो, नेता सियासत की लौ बुझने नहीं देते। तभी तो बीजेपी ने लोकसभा में राई को पहाड़ बना दिया। जीरो ऑवर में आडवाणी ने 26/11 के पीडि़तों को मुआवजे में देरी का सवाल उठाया। बाकायदा आंकड़े बताए। तो आडवाणी सिर्फ सुझाव के अंदाज में बात रख रहे थे। पर नंबर बढ़ाने की होड़ में अनंत कुमार ने मोर्चा संभाल लिया। जिद ठान ली, सदन के नेता प्रणव मुखर्जी जवाब दें। पर प्रणव दा ने कह दिया- 'मैं खास तौर से नेता विपक्ष को सुनने चैंबर से सदन में आया। सो हर मुद्दे पर सरकार के फौरन जवाब की परंपरा न बनाएं।Ó यानी प्रणव दा ने आडवाणी को पूरा सम्मान दिया। पर अनंत अड़ गए। तो दादा का गुस्सा सातवें आसमान पर। बोले- 'बीजेपी ने 26/11 की घटना पर राजनीति की। तो चुनाव में कीमत चुकानी पड़ी। अब फिर सियासत कर रही। सो दुबारा कीमत चुकानी पड़ेगी।Ó पर प्रणव दा के व्यवहार से खफा अनंत ने संसद के बाहर भी मामला उछाला। पर अनंत ने सहानुभूति की बात की। तो पुराने दिन भी याद दिलाने होंगे। पीडि़त परिवारों को सालभर बाद भी मुआवजा न मिलना वाकई दुखद। आंकड़ों के मुताबिक मुआवजे के 403 हकदारों में सिर्फ 118 को ही चैक मिले। कुछ को नौकरी का इंतजार। तो कई अस्पताल में सर्जरी को तरस रहे। अब आडवाणी ने दुख जताया। होम मिनिस्ट्री में अलग सेल बनाने की मांग की। ताकि कभी ऐसी नौबत न आए, जब याद दिलाने के लिए पीडि़तों को दिल्ली आना पड़े। आडवाणी की मांग को राजनीति कहना उचित नहीं। पर राजनीति का चेहरा आप खुद पढि़ए। संसद पर हमला 13 दिसंबर 2001 को हुआ। पर 2004 तक आडवाणी खुद होम मिनिस्टर थे। तब क्यों नहीं सेल बने? संसद हमले के शहीदों के परिजन 2006 तक आवाज बुलंद करते रहे। शहीद मातवर नेगी, जे.पी. यादव, कमलेश कुमारी, नानक चंद, रामपाल सिंह, विक्रम सिंह बिष्टï के परिजनों की मांग 2006 में पूरी हुई। क्या सत्ता में रहने पर नेता फर्ज भूल जाते? सिर्फ विपक्ष में रहने पर ही जनता के दर्द याद आते? सो एक लौ राजनीति की आत्मा को जगाने के लिए क्यों न जलाएं। वरना सरकार हो या विपक्ष, इतनी चालाकी नहीं दिखाते। 26/11 की बरसी की लौ के तले महंगाई पर बहस पूरी करा ली। महंगाई सातवें आसमान को भी पार कर चुकी। पर गुरुवार को बहस हुई। तो लोकसभा में गिने-चुने सांसद बैठे दिखे। देर शाम शरद पवार का जवाब भी आ गया। जवाब तो क्या बताएं। पिछले सत्र में जो कहा, उससे नया कुछ भी नहीं। इतने टन उत्पादन, इतनी खपत। कहीं कोल्ड स्टोरेज की बात। पर हकीकत क्या। थोक मंडी में जिस सामान की कीमत दो से चार रुपए। खुदरा बाजार में वही सामान 25 से 40 रुपए। उत्पादक किसान बद से बदतर हालत में। बिचौलिए की बल्ले-बल्ले। सो महंगाई पर सरकार की वही कहानी। सदन में सवाल उठा, जब घर में नहीं दाने। तो अम्मा क्यों चली भुनाने। जब आम आदमी को राहत नहीं दे सकते। तो किस विकास का ढोल पीट रहे। पर अब तो बेहतर यही, अपने नेतागण महंगाई का नाम बदलकर सस्ताई रख दें। संविधान संशोधन कर महंगाई शब्द पर बैन लगवा दें। न रहेगा बांस, न बजेगी बांसुरी।
-----------
26/11/2009
---------
26/11 के गम में हो गई
अथ श्री महंगाई कथा
----------------
संतोष कुमार
-----------
शहीदों को शत शत नमन। आतंक के खिलाफ लड़ाई में देश की जनता एकजुट हो चुकी। भले संसद में सियासत हावी रही। पर देश भर में सड़कों पर जनता ने श्रद्धा की लौ जलाई। संसद में चेयर से प्रस्ताव आया। समूचे सदन ने मौन श्रद्धांजलि दी। पर 26/11 की घटना से उमड़ी जनभावना नेताओं को हिला चुकी। याद है ना, मुंबई हमले के बाद देश भर में जनता सड़कों पर उतरी। तो नेता घरों में दुबक गए थे। दबी जुबान कह रहे थे, हमारा क्या कसूर। पर इतना बड़ा हमला देश को दहला चुका था। आखिर मु_ïीभर आतंकी कैसे तमाम सुरक्षा इंतजामात का बलात्कार कर साजिश को अंजाम दे गए। सो जनता ने समूची राजनीतिक व्यवस्था को आड़े हाथ लिया। अब बरसी के मौके पर मीडिया से लेकर जनता ने श्रद्धांजलि का बीड़ा उठाया। तो अपने नेताओं को शायद नहीं सुहा रहा। सो गुरुवार को बीजेपी के आहलूवालिया काफी भड़के दिखे। संसद पहुंचे, तो मीडिया ने श्रद्धांजलि के दो शब्द मांगे। पर आहलूवालिया ने ज्ञान उड़ेल दिया। आहलूवालिया का गुस्सा, 26/11 को देश में और भी घटनाएं हुईं। पर सिर्फ मुंबई हमले को ही क्यों याद कर रहे? भले आहलूवालिया की भावना सही। उन ने जो बात कही, वह भी सही। पहले बोले- 'देश में कई ऐसी घटनाएं होती रहतीं। पर आप सिर्फ ताज की घटना इसलिए हाईलाइट कर रहे, क्योंकि वहां बड़े लोग मारे गए।' सो दिन भर खूब सुर्खियां बनीं। पर बाद में उन ने नई दलील जोड़ दी। कहा- '26 नवंबर 1949 को देश ने संविधान को स्वीकार किया। सो आज साठवीं सालगिरह। पर मीडिया उसे क्यों भुला रहा?Ó वाकई आहलूवालिया ने अच्छी बात याद दिलाई। मीडिया और देशवासियों को आहलूवालिया का साधुवाद कहना ही चाहिए। पर माननीय आहलूवालिया जी, जनता किस संविधान को याद करे? उस संविधान को, जिसका आप नेताओं ने मिलकर बैंड बजा दिया। या उस संविधान को, जिससे बड़ा नेता खुद को माने बैठे। अब तो आम जनता राजनीतिक रसूख वालों को ही माई-बाप मानने लगी। अगर नेता चाह ले, तो संविधान में संशोधन कर बल्ब को लालटेन बता दे और लालटेन को बल्ब। सो आहलूवालिया तो सिर्फ प्रतीक। अपने नेताओं का यह दर्द समझना कोई बड़ी बात नहीं। नेताओं को डर सताने लगा, चिंगारी कहीं शोला न बन जाए। सो मुद्दा कोई भी हो, नेता सियासत की लौ बुझने नहीं देते। तभी तो बीजेपी ने लोकसभा में राई को पहाड़ बना दिया। जीरो ऑवर में आडवाणी ने 26/11 के पीडि़तों को मुआवजे में देरी का सवाल उठाया। बाकायदा आंकड़े बताए। तो आडवाणी सिर्फ सुझाव के अंदाज में बात रख रहे थे। पर नंबर बढ़ाने की होड़ में अनंत कुमार ने मोर्चा संभाल लिया। जिद ठान ली, सदन के नेता प्रणव मुखर्जी जवाब दें। पर प्रणव दा ने कह दिया- 'मैं खास तौर से नेता विपक्ष को सुनने चैंबर से सदन में आया। सो हर मुद्दे पर सरकार के फौरन जवाब की परंपरा न बनाएं।Ó यानी प्रणव दा ने आडवाणी को पूरा सम्मान दिया। पर अनंत अड़ गए। तो दादा का गुस्सा सातवें आसमान पर। बोले- 'बीजेपी ने 26/11 की घटना पर राजनीति की। तो चुनाव में कीमत चुकानी पड़ी। अब फिर सियासत कर रही। सो दुबारा कीमत चुकानी पड़ेगी।Ó पर प्रणव दा के व्यवहार से खफा अनंत ने संसद के बाहर भी मामला उछाला। पर अनंत ने सहानुभूति की बात की। तो पुराने दिन भी याद दिलाने होंगे। पीडि़त परिवारों को सालभर बाद भी मुआवजा न मिलना वाकई दुखद। आंकड़ों के मुताबिक मुआवजे के 403 हकदारों में सिर्फ 118 को ही चैक मिले। कुछ को नौकरी का इंतजार। तो कई अस्पताल में सर्जरी को तरस रहे। अब आडवाणी ने दुख जताया। होम मिनिस्ट्री में अलग सेल बनाने की मांग की। ताकि कभी ऐसी नौबत न आए, जब याद दिलाने के लिए पीडि़तों को दिल्ली आना पड़े। आडवाणी की मांग को राजनीति कहना उचित नहीं। पर राजनीति का चेहरा आप खुद पढि़ए। संसद पर हमला 13 दिसंबर 2001 को हुआ। पर 2004 तक आडवाणी खुद होम मिनिस्टर थे। तब क्यों नहीं सेल बने? संसद हमले के शहीदों के परिजन 2006 तक आवाज बुलंद करते रहे। शहीद मातवर नेगी, जे.पी. यादव, कमलेश कुमारी, नानक चंद, रामपाल सिंह, विक्रम सिंह बिष्टï के परिजनों की मांग 2006 में पूरी हुई। क्या सत्ता में रहने पर नेता फर्ज भूल जाते? सिर्फ विपक्ष में रहने पर ही जनता के दर्द याद आते? सो एक लौ राजनीति की आत्मा को जगाने के लिए क्यों न जलाएं। वरना सरकार हो या विपक्ष, इतनी चालाकी नहीं दिखाते। 26/11 की बरसी की लौ के तले महंगाई पर बहस पूरी करा ली। महंगाई सातवें आसमान को भी पार कर चुकी। पर गुरुवार को बहस हुई। तो लोकसभा में गिने-चुने सांसद बैठे दिखे। देर शाम शरद पवार का जवाब भी आ गया। जवाब तो क्या बताएं। पिछले सत्र में जो कहा, उससे नया कुछ भी नहीं। इतने टन उत्पादन, इतनी खपत। कहीं कोल्ड स्टोरेज की बात। पर हकीकत क्या। थोक मंडी में जिस सामान की कीमत दो से चार रुपए। खुदरा बाजार में वही सामान 25 से 40 रुपए। उत्पादक किसान बद से बदतर हालत में। बिचौलिए की बल्ले-बल्ले। सो महंगाई पर सरकार की वही कहानी। सदन में सवाल उठा, जब घर में नहीं दाने। तो अम्मा क्यों चली भुनाने। जब आम आदमी को राहत नहीं दे सकते। तो किस विकास का ढोल पीट रहे। पर अब तो बेहतर यही, अपने नेतागण महंगाई का नाम बदलकर सस्ताई रख दें। संविधान संशोधन कर महंगाई शब्द पर बैन लगवा दें। न रहेगा बांस, न बजेगी बांसुरी।
-----------
26/11/2009
Wednesday, November 25, 2009
26/11 की बरसी, पर मनमोहन विदेश में!
इंडिया गेट से
---------
26/11 की बरसी,पर
मनमोहन विदेश में!
-------------
संतोष कुमार
-----------
किसी ने खूब कहा है- 'जला है जिस्म जहां, दिल भी जल गया होगा। कुरेदते हो जो अब राख, जुस्तजू क्या है।' देखते-देखते 26/11 की बरसी आ गई। पर न बदली, तो सिर्फ अपनी सियासत। अब बरसी पर भी आपसी बदजुबानी न हो। सो गुरुवार को स्पीकर मीरा कुमार श्रद्धांजलि प्रस्ताव रखेंगी। सदन दो मिनट मौन की औपचारिकता भर निभाएगा। ताकि बहस का टंटा ही खत्म हो। यानी सौ दिन तो दूर, 365 दिन में अपनी सियासत अढ़ाई कोस भी नहीं चली। सो जुस्तजू तो यही, कभी तो जागेंगे अपने सियासतदां। पर 26/11 की बरसी आते-आते कई सवाल उठ खड़े हुए। आखिर अपनी तैयारी अब कितनी मुकम्मल? शहीद अशोक काम्टे की पत्नी विनीता काम्टे ने पूरी रिसर्च के बाद किताब लिखी। किताब 'टू द लास्ट बुलेट' में पुलिस की कलई खोल दी। कैसे घायल करकरे, काम्टे, सालस्कर को वक्त पर अपनी पुलिस ने मदद नहीं दी। वाकी-टॉकी के रिकार्ड खुद बता रहे, चालीस मिनट की देरी ने इन जांबाजों को कैसे शहीद कर दिया। महाराष्टï्र पुलिस हमले के बाद तो जैसे फ्रीज हो गई। पर साल भर में भी आतंकवाद से लडऩे को अपनी तैयारी दुरुस्त नहीं। मल्टी एजेंसी सेंटर, एनएसजी हब, एनआईए, समुद्री सुरक्षा के बंदोबस्त तो हुए। पर ये तो सिर्फ शाखाएं। अभी जड़ मजबूत होना बाकी। पुलिस और खुफिया तंत्र का आधुनिकीकरण सिर्फ दस्तावेजों में। भले 26/11 के बाद कोई बड़ा हमला नहीं हुआ। पर आखिर यह कैसी कामयाबी। कसाब को जिंदा पकड़ पाक को हम डोजियर भेजते रहे। पर अब एफबीआई बता रही। डेविड हेडली 26/11 का मास्टर माइंड। फिर अपनी एजेंसियां क्या जांच कर रही थीं? साल भर में किसी हेडली-राना तक फटक भी न सकीं। ऊपर से अब डिप्टी सीएम छगन भुजबल ने एक और खुलासा किया। होम मिनिस्टर आर.आर.पाटिल हमले के दिन घर में दुबके हुए थे। बुधवार को पाटिल ने सफाई दी, पुलिस के कहने पर ऐसा किया। क्या 26/11 की बरसी पर यही श्रद्धांजलि? जिन पाटिल को जिम्मेदार ठहरा कर पद से हटाया गया। सालभर में ही उसी महकमे के मालिक बन गए। विलासराव देशमुख सीएम न सही, पर मनमोहन के काबिना मंत्री तो बने ही। रही बात भाई शिवराज पाटिल की। तो धीरज रखिए, अभी कई राज्यों की गवर्नरी खाली। शायद कांग्रेस 26/11 की बरसी बीतने का ही इंतजार कर रही। ताकि छीछालेदर से बच सके। पर शिवराज के उत्तराधिकारी चिदंबरम ने भी कोई बड़ा तीर नहीं मारा। साल भर से भारत-पाक जुबानी जंग चल रही। पर ठोस कार्रवाई नहीं हुई। अब गुरुवार को 26/11 की पहली बरसी। तो भारतीयों के जख्म ताजा हो गए। सो बुधवार को रावलपिंडी के एंटी टेरर कोर्ट में जकी उर रहमान लखवी समेत सात पर चार्जशीट हो गई। लखवी को मास्टर माइंड माना गया। पर पाकिस्तान की ईमानदारी कौन नहीं जानता। वैसे ईमानदार तो हम भी नहीं। आतंकवाद से लडऩे की लफ्फाजी तो खूब करते। पर जज्बा कभी नहीं दिखता। तभी तो संसद पर हमले के मास्टर माइंड अफजल को हम तिहाड़ में आराम से रोटी-पानी खिला रहे। वोट की खातिर अफजल की फाइल इधर से उधर होती रही। पर फैसला नहीं हुआ। अभी भी फाइल दिल्ली की कांग्रेसी शीला सरकार के पास। क्या अब आतंकी भी वोट बैंक होने लगे? जब भी अफजल को फांसी की मांग उठी। तो शिवराज पाटिल से लेकर समूची कांग्रेस ने यही दलील दी। नंबर आने पर फैसला होगा। संसद पर हमले में शहीद जवानों के परिजनों ने मैडल तक लौटा दिए। पर मनमोहनवादियों के कान पर जूं नहीं रेंगी। हाल ही में 18 सितंबर को सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को आदेश दिया। दया याचिकाओं को जल्द निपटाए। पर मंगलवार को ही अपनी सरकार की ओर से संसद में दिए जवाब की बानगी देखिए- 'सरकार के पास 29 दया याचिका लंबित। संविधान के अनुच्छेद 72 के तहत फाइल निपटाने की कोई समय सीमा नहीं।Ó इस लिस्ट में अफजल का नंबर इक्कीसवां। अब संसद के हमले को आठ साल पूरे होने को। सो जरा सोचो, कसाब को कब फांसी मिलेगी। अभी तो सजा भी तय नहीं हुई। हाईकोर्ट, सुप्रीम कोर्ट, माफी याचिका, क्यूरेटिव याचिका का सफर बाकी। उससे भी बड़ी बात, बीच में कोई केस नहीं आया। तो कसाब का नंबर तीसवां होगा। सो सरकार से क्या उम्मीद करते हैं आप? शीला दीक्षित को रसूखदार हत्यारे मनु शर्मा को पैरोल दिलाने में तीन महीने की जगह महज 20 दिन लगे। पर तीन-चार साल बीत गए, अफजल की फाइल नहीं निपटी। सो 26/11 में 26 विदेशी समेत मारे गए 168 लोगों, 308 घायलों को कब न्याय मिलेगा? अपनी सरकार और राजनीतिक व्यवस्था में इच्छाशक्ति अब नहीं रही। वरना देश पर सबसे बड़े हमले की बरसी हो। और देश का मुख्य कर्ता-धर्ता व्हाइट हाउस की दावत में मशगूल हों। तो क्या कहेंगे आप? अब और नहीं 26/11, ऐसा संकल्प कौन लेगा? अगर पीएम बरसी के मौके पर देश में होते। जैसे 9/11 की हर बरसी पर अमेरिका का राष्टï्रपति देश की जनता के साथ आतंकवाद से लडऩे का संकल्प दोहराता। कुछ वैसा ही मैसेज अपने पीएम भी देते। तो आतंकवादियों के मन में खौफ पैदा होता। अपने देश की जनता में भी भरोसा पैदा होता। अमेरिकी यात्रा का प्रोग्राम दो-चार दिन आगे-पीछे होता। तो कोई महामंदी नहीं आ जाती। पर शायद पीएम को जनता को भरोसा देने से ज्यादा ओबामा से तारीफ करवाने में सुकून मिल रहा।
----------
25/11/2009
---------
26/11 की बरसी,पर
मनमोहन विदेश में!
-------------
संतोष कुमार
-----------
किसी ने खूब कहा है- 'जला है जिस्म जहां, दिल भी जल गया होगा। कुरेदते हो जो अब राख, जुस्तजू क्या है।' देखते-देखते 26/11 की बरसी आ गई। पर न बदली, तो सिर्फ अपनी सियासत। अब बरसी पर भी आपसी बदजुबानी न हो। सो गुरुवार को स्पीकर मीरा कुमार श्रद्धांजलि प्रस्ताव रखेंगी। सदन दो मिनट मौन की औपचारिकता भर निभाएगा। ताकि बहस का टंटा ही खत्म हो। यानी सौ दिन तो दूर, 365 दिन में अपनी सियासत अढ़ाई कोस भी नहीं चली। सो जुस्तजू तो यही, कभी तो जागेंगे अपने सियासतदां। पर 26/11 की बरसी आते-आते कई सवाल उठ खड़े हुए। आखिर अपनी तैयारी अब कितनी मुकम्मल? शहीद अशोक काम्टे की पत्नी विनीता काम्टे ने पूरी रिसर्च के बाद किताब लिखी। किताब 'टू द लास्ट बुलेट' में पुलिस की कलई खोल दी। कैसे घायल करकरे, काम्टे, सालस्कर को वक्त पर अपनी पुलिस ने मदद नहीं दी। वाकी-टॉकी के रिकार्ड खुद बता रहे, चालीस मिनट की देरी ने इन जांबाजों को कैसे शहीद कर दिया। महाराष्टï्र पुलिस हमले के बाद तो जैसे फ्रीज हो गई। पर साल भर में भी आतंकवाद से लडऩे को अपनी तैयारी दुरुस्त नहीं। मल्टी एजेंसी सेंटर, एनएसजी हब, एनआईए, समुद्री सुरक्षा के बंदोबस्त तो हुए। पर ये तो सिर्फ शाखाएं। अभी जड़ मजबूत होना बाकी। पुलिस और खुफिया तंत्र का आधुनिकीकरण सिर्फ दस्तावेजों में। भले 26/11 के बाद कोई बड़ा हमला नहीं हुआ। पर आखिर यह कैसी कामयाबी। कसाब को जिंदा पकड़ पाक को हम डोजियर भेजते रहे। पर अब एफबीआई बता रही। डेविड हेडली 26/11 का मास्टर माइंड। फिर अपनी एजेंसियां क्या जांच कर रही थीं? साल भर में किसी हेडली-राना तक फटक भी न सकीं। ऊपर से अब डिप्टी सीएम छगन भुजबल ने एक और खुलासा किया। होम मिनिस्टर आर.आर.पाटिल हमले के दिन घर में दुबके हुए थे। बुधवार को पाटिल ने सफाई दी, पुलिस के कहने पर ऐसा किया। क्या 26/11 की बरसी पर यही श्रद्धांजलि? जिन पाटिल को जिम्मेदार ठहरा कर पद से हटाया गया। सालभर में ही उसी महकमे के मालिक बन गए। विलासराव देशमुख सीएम न सही, पर मनमोहन के काबिना मंत्री तो बने ही। रही बात भाई शिवराज पाटिल की। तो धीरज रखिए, अभी कई राज्यों की गवर्नरी खाली। शायद कांग्रेस 26/11 की बरसी बीतने का ही इंतजार कर रही। ताकि छीछालेदर से बच सके। पर शिवराज के उत्तराधिकारी चिदंबरम ने भी कोई बड़ा तीर नहीं मारा। साल भर से भारत-पाक जुबानी जंग चल रही। पर ठोस कार्रवाई नहीं हुई। अब गुरुवार को 26/11 की पहली बरसी। तो भारतीयों के जख्म ताजा हो गए। सो बुधवार को रावलपिंडी के एंटी टेरर कोर्ट में जकी उर रहमान लखवी समेत सात पर चार्जशीट हो गई। लखवी को मास्टर माइंड माना गया। पर पाकिस्तान की ईमानदारी कौन नहीं जानता। वैसे ईमानदार तो हम भी नहीं। आतंकवाद से लडऩे की लफ्फाजी तो खूब करते। पर जज्बा कभी नहीं दिखता। तभी तो संसद पर हमले के मास्टर माइंड अफजल को हम तिहाड़ में आराम से रोटी-पानी खिला रहे। वोट की खातिर अफजल की फाइल इधर से उधर होती रही। पर फैसला नहीं हुआ। अभी भी फाइल दिल्ली की कांग्रेसी शीला सरकार के पास। क्या अब आतंकी भी वोट बैंक होने लगे? जब भी अफजल को फांसी की मांग उठी। तो शिवराज पाटिल से लेकर समूची कांग्रेस ने यही दलील दी। नंबर आने पर फैसला होगा। संसद पर हमले में शहीद जवानों के परिजनों ने मैडल तक लौटा दिए। पर मनमोहनवादियों के कान पर जूं नहीं रेंगी। हाल ही में 18 सितंबर को सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को आदेश दिया। दया याचिकाओं को जल्द निपटाए। पर मंगलवार को ही अपनी सरकार की ओर से संसद में दिए जवाब की बानगी देखिए- 'सरकार के पास 29 दया याचिका लंबित। संविधान के अनुच्छेद 72 के तहत फाइल निपटाने की कोई समय सीमा नहीं।Ó इस लिस्ट में अफजल का नंबर इक्कीसवां। अब संसद के हमले को आठ साल पूरे होने को। सो जरा सोचो, कसाब को कब फांसी मिलेगी। अभी तो सजा भी तय नहीं हुई। हाईकोर्ट, सुप्रीम कोर्ट, माफी याचिका, क्यूरेटिव याचिका का सफर बाकी। उससे भी बड़ी बात, बीच में कोई केस नहीं आया। तो कसाब का नंबर तीसवां होगा। सो सरकार से क्या उम्मीद करते हैं आप? शीला दीक्षित को रसूखदार हत्यारे मनु शर्मा को पैरोल दिलाने में तीन महीने की जगह महज 20 दिन लगे। पर तीन-चार साल बीत गए, अफजल की फाइल नहीं निपटी। सो 26/11 में 26 विदेशी समेत मारे गए 168 लोगों, 308 घायलों को कब न्याय मिलेगा? अपनी सरकार और राजनीतिक व्यवस्था में इच्छाशक्ति अब नहीं रही। वरना देश पर सबसे बड़े हमले की बरसी हो। और देश का मुख्य कर्ता-धर्ता व्हाइट हाउस की दावत में मशगूल हों। तो क्या कहेंगे आप? अब और नहीं 26/11, ऐसा संकल्प कौन लेगा? अगर पीएम बरसी के मौके पर देश में होते। जैसे 9/11 की हर बरसी पर अमेरिका का राष्टï्रपति देश की जनता के साथ आतंकवाद से लडऩे का संकल्प दोहराता। कुछ वैसा ही मैसेज अपने पीएम भी देते। तो आतंकवादियों के मन में खौफ पैदा होता। अपने देश की जनता में भी भरोसा पैदा होता। अमेरिकी यात्रा का प्रोग्राम दो-चार दिन आगे-पीछे होता। तो कोई महामंदी नहीं आ जाती। पर शायद पीएम को जनता को भरोसा देने से ज्यादा ओबामा से तारीफ करवाने में सुकून मिल रहा।
----------
25/11/2009
Tuesday, November 24, 2009
'राम कसम' अब नेताओं को 'शर्म' आती ही नहीं
इंडिया गेट से
---------
'राम कसम' अब नेताओं
को 'शर्म' आती ही नहीं
----------------
संतोष कुमार
-----------
लीकेज से आग भड़की। तो मंगलवार को ही पी. चिदंबरम ने रपट पेश कर दी। सोनिया गांधी के घर मीटिंग में स्ट्रेटजी बनी। तो बिन मनमोहन ही केबिनेट मीटिंग हो गई। पौ फटते ही प्रणव दा ने केबिनेट में रपट और एटीआर को हरी झंडी दी। संसद के दोनों सदनों में रपट पेश भी हो गई। पर सुना था शोर पहलू में बहुत, चीरा तो कतरा-ए-खूं न निकला। रपट की स्याही तो पहले ही अखबारों में। सो रपट संग एटीआर पहली नजर में कोरी ही निकली। दोषियों की लिस्ट में अटल, आडवाणी, जोशी समेत 68 नाम। पर कार्रवाई रपट में सरकार ने चुप्पी साध ली। अलबत्ता 13 पन्नों की एटीआर में सरकार लिब्राहन रपट की तेरहवीं मनाती दिखी। सहमत हैं, नोट कर लिया, जांच करेंगे, ऐसा होना चाहिए, वैसा होना चाहिए जैसे शब्दों से ही एटीआर भरी पड़ी। सांप्रदायिक हिंसा रोकने का बिल आएगा। मुकदमों की सुनवाई तेजी से होगी। पर ये सारी बातें तो पहले भी कही जा चुकीं। सो एटीआर में एकशन कम, टीयर ज्यादा। यही हाल लिब्राहन रपट का भी। अहम खुलासे तो पहले ही हो चुके। सो मंगलवार को नई बात सिर्फ यही, धर्म का राजनीति से घालमेल न हो। पर यह बात तो 1947 से ही कही जा रही। सो घालमेल न हो, फिर राजनीति काहे की होगी। तभी तो देश में महंगाई हो या गन्ना किसानों की समस्या। असम के धमाके हों या 26/11 की बरसी का मौका। पर अपनी संसद, सरकार और विपक्ष के लिए मुद्दा क्या है? बस लिब्राहन रपट, बाबरी ढांचा, अयोध्या में राम मंदिर, और कुछ नहीं। वोट बैंक की राजनीति के ठेकेदार अमर सिंहों को लग रहा। जैसे देश में समस्याओं का अंबार इसलिए, क्योंकि बाबरी मस्जिद ढह गई। तो दूसरे ठेकेदार आडवाणी-कल्याण को लग रहा, अयोध्या में राम मंदिर बन जाए। तो मानो देश में चहुं ओर खुशहाली आ जाएगी। संवैधानिक रास्ते से विवाद का हल निकले, इसमें कोई गुरेज नहीं। पर कोई व्यक्ति या राजनीतिक दल खुद को ही संविधान मान ले। तो फिर अपनी लोकतांत्रिक व्यवस्था का राम ही राखा। पर वोट की लड़ाई में दंगों की सिर्फ कब्रें खुदतीं। कभी जांच अंजाम तक नहीं पहुंचती। और अगर पहुंच भी जाए, तो देरी का न्याय बेमानी हो जाता। अब बाबरी विध्वंस की रपट आने में ही 17 साल लगे। तो न्याय मिलने तक कितने साल गुजरेंगे। बीजेपी ने तो अटल नाम जप रिपोर्ट को झुठलाना शुरू कर दिया। पर सरकार में भी इच्छाशक्ति नहीं दिख रही। तभी तो तबके कर्ताधर्ता रपट के बाद भी दहाड़ रहे। आडवाणी ने सोमवार को संसद में तेवर दिखाए। तो मंगलवार को अपने सांसदों की खूब पीठ ठोकी। तीन दिन तक संसद ठप रखने से गदगद थे। तो दूसरी तरफ दर-ब-दर कल्याण सिंह भी उसी तेवर में लौट आए। मुलायम-अमर ने दुलत्ती मार दी। सो मंगलवार को राममयी हो गए। अब आप रपट की छोडि़ए। कल्याण का इकरारनामा सुनिए। बोले- 'मेरे सामने दो विकल्प थे। ढांचा बचाऊं या कारसेवकों की जान। सो मैंने कारसेवकों को नरसंहार से बचाया। मुझे ढांचा गिरने का कोई खेद, कष्टï, पीड़ा नहीं। अयोध्या में मंदिर बनना है। सो ढांचा को तो जाना ही था।' इकरारनामे से इतर कल्याण ने खम भी ठोका। बोले- 'अब वहां मंदिर ही बनेगा, मस्जिद नहीं। भगवान राम मुसलमानों के भी पूर्वज। सो मुस्लिम समाज मंदिर निर्माण में खुद आगे आए।' क्या कल्याण उवाच किसी खास संप्रदाय को धमकी नहीं? पर बीजेपी में वापसी को बेताब कल्याण के पास और कोई रास्ता भी नहीं। लिब्राहन रपट ने सिर्फ बीजेपी नहीं, तमाम भगवा धारियों को जिंदा कर दिया। कल्याण ने तो कह दिया, बीजेपी के लिए रपट यूपी में संजीवनी बनेगी। अब बीजेपी को तय करना, कल्याण की घर वापसी कैसे हो। पर कल्याण ने कांग्रेस को भी कटघरे में उतारा। जब पूछा, मंदिर में रामलला की मूर्ति स्थापना से लेकर ताला खुलवाने और शिलान्यास तक केंद्र और राज्य में कांग्रेस की सरकार थी। तो क्या ये सारे काम कांग्रेस मस्जिद बनाने के लिए कर रही थी? यानी कल्याण की मानें, तो कांग्रेस ने रंगमंच तैयार किया। संघ परिवारियों ने तो सिर्फ मंचन किया। कल्याण ने तो यह भी कह दिया, कल से जनता की प्रतिक्रिया भी देख लेना। पर जनता का तो पता नहीं। राज्यसभा में हाथापाई जरूर हो गई। अखबारों में सपा-बीजेपी की नजदीकियां चर्चा बनी। तो मंगलवार को अमर सिंह ने कुछ नया कर दिखाया। चिदंबरम ने रपट पेश की। तो बीजेपी वालों ने 'जय श्री राम' के नारे लगाए। सो अमर सिंह धड़धड़ाते वैल में घुस बीजेपी के उपनेता एस.एस. आहलूवालिया से भिड़ गए। सपाई सांसदों ने 'या अली' के नारे लगाए। अब वरिष्ठïों के सदन में ऐसी बात हो। तो क्या कहेंगे? यही ना, ऊंची दुकान, फीका पकवान। गुस्से में हाथापाई हुई। पर माफीनामा सिर्फ मजाक बनकर रह गया। दुबारा सदन बैठा। तो अमर-आहलूवालिया ने एक-दूसरे को अपना सहपाठी बताया। चेयरमैन ने भी सख्ती नहीं दिखाई। अमर सिंह को एतराज था, जय श्री राम के नारे क्यों लगाए। तो बीजेपी की दलील, सदन हमारा मंदिर। तो नारा कहां लगाएं। पर अमर वाणी देखिए- 'मैं सबसे बड़ा राम भक्त। मैं रोज हनुमान चालीसा पढ़ता हूं। पर सदन में धार्मिक नारेबाजी बर्दाश्त नहीं।' अब अगर देश में अमर-आहलूवालिया जैसा द्वेष बढ़ा। तो जिम्मेदार कौन होगा? क्या फिर कोई लिब्राहन आयोग बनाएंगे? अपने लोकतंत्र में अब नैतिकता-मर्यादा नहीं रही। वोट बैंक की जैसी मारामारी। अब तो यही लग रहा, राम कसम अपने नेताओं को शर्म आती ही नहीं।
---------
24/11/2009
---------
'राम कसम' अब नेताओं
को 'शर्म' आती ही नहीं
----------------
संतोष कुमार
-----------
लीकेज से आग भड़की। तो मंगलवार को ही पी. चिदंबरम ने रपट पेश कर दी। सोनिया गांधी के घर मीटिंग में स्ट्रेटजी बनी। तो बिन मनमोहन ही केबिनेट मीटिंग हो गई। पौ फटते ही प्रणव दा ने केबिनेट में रपट और एटीआर को हरी झंडी दी। संसद के दोनों सदनों में रपट पेश भी हो गई। पर सुना था शोर पहलू में बहुत, चीरा तो कतरा-ए-खूं न निकला। रपट की स्याही तो पहले ही अखबारों में। सो रपट संग एटीआर पहली नजर में कोरी ही निकली। दोषियों की लिस्ट में अटल, आडवाणी, जोशी समेत 68 नाम। पर कार्रवाई रपट में सरकार ने चुप्पी साध ली। अलबत्ता 13 पन्नों की एटीआर में सरकार लिब्राहन रपट की तेरहवीं मनाती दिखी। सहमत हैं, नोट कर लिया, जांच करेंगे, ऐसा होना चाहिए, वैसा होना चाहिए जैसे शब्दों से ही एटीआर भरी पड़ी। सांप्रदायिक हिंसा रोकने का बिल आएगा। मुकदमों की सुनवाई तेजी से होगी। पर ये सारी बातें तो पहले भी कही जा चुकीं। सो एटीआर में एकशन कम, टीयर ज्यादा। यही हाल लिब्राहन रपट का भी। अहम खुलासे तो पहले ही हो चुके। सो मंगलवार को नई बात सिर्फ यही, धर्म का राजनीति से घालमेल न हो। पर यह बात तो 1947 से ही कही जा रही। सो घालमेल न हो, फिर राजनीति काहे की होगी। तभी तो देश में महंगाई हो या गन्ना किसानों की समस्या। असम के धमाके हों या 26/11 की बरसी का मौका। पर अपनी संसद, सरकार और विपक्ष के लिए मुद्दा क्या है? बस लिब्राहन रपट, बाबरी ढांचा, अयोध्या में राम मंदिर, और कुछ नहीं। वोट बैंक की राजनीति के ठेकेदार अमर सिंहों को लग रहा। जैसे देश में समस्याओं का अंबार इसलिए, क्योंकि बाबरी मस्जिद ढह गई। तो दूसरे ठेकेदार आडवाणी-कल्याण को लग रहा, अयोध्या में राम मंदिर बन जाए। तो मानो देश में चहुं ओर खुशहाली आ जाएगी। संवैधानिक रास्ते से विवाद का हल निकले, इसमें कोई गुरेज नहीं। पर कोई व्यक्ति या राजनीतिक दल खुद को ही संविधान मान ले। तो फिर अपनी लोकतांत्रिक व्यवस्था का राम ही राखा। पर वोट की लड़ाई में दंगों की सिर्फ कब्रें खुदतीं। कभी जांच अंजाम तक नहीं पहुंचती। और अगर पहुंच भी जाए, तो देरी का न्याय बेमानी हो जाता। अब बाबरी विध्वंस की रपट आने में ही 17 साल लगे। तो न्याय मिलने तक कितने साल गुजरेंगे। बीजेपी ने तो अटल नाम जप रिपोर्ट को झुठलाना शुरू कर दिया। पर सरकार में भी इच्छाशक्ति नहीं दिख रही। तभी तो तबके कर्ताधर्ता रपट के बाद भी दहाड़ रहे। आडवाणी ने सोमवार को संसद में तेवर दिखाए। तो मंगलवार को अपने सांसदों की खूब पीठ ठोकी। तीन दिन तक संसद ठप रखने से गदगद थे। तो दूसरी तरफ दर-ब-दर कल्याण सिंह भी उसी तेवर में लौट आए। मुलायम-अमर ने दुलत्ती मार दी। सो मंगलवार को राममयी हो गए। अब आप रपट की छोडि़ए। कल्याण का इकरारनामा सुनिए। बोले- 'मेरे सामने दो विकल्प थे। ढांचा बचाऊं या कारसेवकों की जान। सो मैंने कारसेवकों को नरसंहार से बचाया। मुझे ढांचा गिरने का कोई खेद, कष्टï, पीड़ा नहीं। अयोध्या में मंदिर बनना है। सो ढांचा को तो जाना ही था।' इकरारनामे से इतर कल्याण ने खम भी ठोका। बोले- 'अब वहां मंदिर ही बनेगा, मस्जिद नहीं। भगवान राम मुसलमानों के भी पूर्वज। सो मुस्लिम समाज मंदिर निर्माण में खुद आगे आए।' क्या कल्याण उवाच किसी खास संप्रदाय को धमकी नहीं? पर बीजेपी में वापसी को बेताब कल्याण के पास और कोई रास्ता भी नहीं। लिब्राहन रपट ने सिर्फ बीजेपी नहीं, तमाम भगवा धारियों को जिंदा कर दिया। कल्याण ने तो कह दिया, बीजेपी के लिए रपट यूपी में संजीवनी बनेगी। अब बीजेपी को तय करना, कल्याण की घर वापसी कैसे हो। पर कल्याण ने कांग्रेस को भी कटघरे में उतारा। जब पूछा, मंदिर में रामलला की मूर्ति स्थापना से लेकर ताला खुलवाने और शिलान्यास तक केंद्र और राज्य में कांग्रेस की सरकार थी। तो क्या ये सारे काम कांग्रेस मस्जिद बनाने के लिए कर रही थी? यानी कल्याण की मानें, तो कांग्रेस ने रंगमंच तैयार किया। संघ परिवारियों ने तो सिर्फ मंचन किया। कल्याण ने तो यह भी कह दिया, कल से जनता की प्रतिक्रिया भी देख लेना। पर जनता का तो पता नहीं। राज्यसभा में हाथापाई जरूर हो गई। अखबारों में सपा-बीजेपी की नजदीकियां चर्चा बनी। तो मंगलवार को अमर सिंह ने कुछ नया कर दिखाया। चिदंबरम ने रपट पेश की। तो बीजेपी वालों ने 'जय श्री राम' के नारे लगाए। सो अमर सिंह धड़धड़ाते वैल में घुस बीजेपी के उपनेता एस.एस. आहलूवालिया से भिड़ गए। सपाई सांसदों ने 'या अली' के नारे लगाए। अब वरिष्ठïों के सदन में ऐसी बात हो। तो क्या कहेंगे? यही ना, ऊंची दुकान, फीका पकवान। गुस्से में हाथापाई हुई। पर माफीनामा सिर्फ मजाक बनकर रह गया। दुबारा सदन बैठा। तो अमर-आहलूवालिया ने एक-दूसरे को अपना सहपाठी बताया। चेयरमैन ने भी सख्ती नहीं दिखाई। अमर सिंह को एतराज था, जय श्री राम के नारे क्यों लगाए। तो बीजेपी की दलील, सदन हमारा मंदिर। तो नारा कहां लगाएं। पर अमर वाणी देखिए- 'मैं सबसे बड़ा राम भक्त। मैं रोज हनुमान चालीसा पढ़ता हूं। पर सदन में धार्मिक नारेबाजी बर्दाश्त नहीं।' अब अगर देश में अमर-आहलूवालिया जैसा द्वेष बढ़ा। तो जिम्मेदार कौन होगा? क्या फिर कोई लिब्राहन आयोग बनाएंगे? अपने लोकतंत्र में अब नैतिकता-मर्यादा नहीं रही। वोट बैंक की जैसी मारामारी। अब तो यही लग रहा, राम कसम अपने नेताओं को शर्म आती ही नहीं।
---------
24/11/2009
Subscribe to:
Posts (Atom)