Monday, January 18, 2010

'गर अमर समाजवादी, तो पूंजीवादी कौन?

इंडिया गेट से
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 संतोष कुमार
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         कॉमरेड ज्योति बसु की अंतिम यात्रा में मंगलवार को सोनिया, आडवाणी, गडकरी जैसे दिग्गज पहुंचेंगे। यों राजनीति की अच्छी पहल। कम से कम मृत्यु के बाद तो विरोध नहीं। जब केरल के पूर्व मुख्यमंत्री ई.एम.एस. नंबूदरीपाद का 1998 में निधन हुआ। तो रायसिना हिल में अटल बिहारी वाजपेयी उसी दिन 19 मार्च को शपथ ले रहे थे। आडवाणी पहली बार होम मिनिस्टर बने। तो वाजपेयी ने नंबूदरीपाद की अंतिम यात्रा में सरकारी नुमाइंदा भेजना चाहा। आडवाणी ने विचारधारा को किनारे रख खुद जाने की इच्छा जताई। अब वही मिसाल ज्योति दा के निधन पर। सो लग रहा, राजनीति में थोड़ा लोक-लिहाज अभी बाकी। वैसे ज्योति दा वाम राजनीति के पुरोधा रहे। सो उनकी कमी हमेशा खलेगी। भले कई राजनीतिक दलों के विचार ज्योति दा से न मिलते हों। पर अंदर खाने उनकी कार्यशैली के कायल सभी। खास तौर से बंगाल में कैडर खड़ा करने की कला। जब 2004 में वाजपेयी सत्ता से हटे। तो वर्करों की निराशा देख बीजेपी को बंगाल से सीख लेने की नसीहत दी थी। सो लोगों के दिलों में खास जगह बनाने वाले ज्योति दा को अपनी भी श्रद्धांजलि। पर श्रद्धांजलि में भी कोई राजनीतिक चालबाजी दिखाए। तो आप क्या कहेंगे? यही ना... अमर सिंह। जी हां, अपना इशारा भी समाजवाद के नए-नए पहरुआ बाबू मोशाय अमर सिंह की ओर। अमर को तो बस मौका मिलना चाहिए अपनी वाणी सुनाने का। सो ज्योति दा को श्रद्धांजलि तो दी। पर मुलायम सिंह का कुनबा भाव नहीं दे रहा। तो कांग्रेस में ठौर ढूंढ रहे। सो ब्लॉगिए अमर ने लिख दिया- 'पीएम पद ठुकराने जैसा बड़ा बलिदान 1996 में ज्योति बसु के बाद 2004 में सोनिया गांधी ने किया।'  यों ये वही अमर सिंह हैं, जिन ने 18-19 मई 2004 को कसमें खाई थीं। जब बिन बुलाए अमर-मुलायम कॉमरेड हरकिशन सिंह सुरजीत के साथ दस जनपथ चले गए। पर भाव तो छोडि़ए, कांग्रेसियों ने अमर को ऐसा दुत्कारा। खाना-पानी के बजाए कड़वा घूंट पीकर लौटे। फिर आदतन मीडिया के सामने राग। अब कभी दस जनपथ नहीं जाऊंगा। पर अमर अपनी बात पर कायम रह जाएं। तो फिर काहे के अमर। यों आखिरकार मुलायम के कुनबे ने बेदखल कर दिया। मुलायम ने अमर का इस्तीफा मंजूर कर लिया। तो अब अमर सिंह का क्षत्रिय खून उबाल मार रहा। सौ-सौ जूते खाकर भी सपा में रहने की रार ठान ली। प्रेस कांफ्रेंस की। तो संजय दत्त और मुस्लिम चेहरों की फौज भी साथ लाए। ताकि मुलायम को चिढ़ा सकें। अब देश भर में क्षत्रिय सम्मेलन भी करेंगे। यों अपने जसवंत सिंह राजस्थान में यह नुस्खा अपना चुके। सो अपना तो यही कहना- जाकी रही भावना जैसी, प्रभु मूरत देखी तिन्ह तैसी। अब जरा खुद को शुरुआती कांग्रेसी कहने वाले और सोनिया के मुरीद अमर को कांग्रेस की सलामी देखिए। अपने दिग्गी राजा अर्जी डालने की सलाह दे चुके। पर अमर को जुबानी जंग में जवाब देने वाले सत्यव्रत चतुर्वेदी का अंदाज ही कुछ और। अमर को चिरकुट उन ने ही कहा था। अब कह दिया- 'जब अमर खुद को बीमार कह रहे। तो कांग्रेस में क्यों आना चाहते हैं। क्या कांग्रेस कोई सराय या नर्सिंग होम है? वाकई अमर को इलाज की जरूरत है।' यह तो रहा कांग्रेसी अंदाज। पर सही मायने में इलाज मुलायम ने कर दिया। अमर ने छह जनवरी को इस्तीफा भेजा। तो मुलायम ने सोचा, मान जाएंगे। पर अमर ब्लैकमेलिंग को उतर आए। तो शायद मुलायम का समाजवादी मन होश में आया। यों कहते हैं- बाप बड़ा ना भैया, सबसे बड़ा रुपैया। पर मुलायम ने अबके कहावत झुठला दी। अमर के साथ मुलायम परिवार की जंग में आखिर जीत परिवार की हुई। मुलायम ने भी खम ठोक दिया। कहा- 'अमर पर अब कोई बात नहीं। मैं आगे देखता हूं, पीछे नहीं।'  यानी अमर को इशारा- जो जी में आए, कर लें। सो अमर तो धड़ाम से जमीन पर आ गिरे। कहां मुंबई से ही दुबई लौटने की सोची थी। अब सोमवार को सीधे दिल्ली आ गए। पर अभी भी बिना जूता खाए सपा छोडऩे को तैयार नहीं। ठीक वैसे ही, जैसे पंचों की बात सिर-माथे, पतनाला वहीं रहेगा। अब खुद को आजाद महसूस कर रहे। सो न कुछ बोलेंगे, न कुछ करेंगे। बाकायदा मुलायम को थैंक यू भी बोला। पर बौखलाहट और पैसे का जोर कहां चुप रहने देगा। सो अमर ने कुनबा-ए-मुलायम को यदुकुल कहा। मुलायम पर व्यंग्य कसने में कोर-कसर नहीं छोड़ी। अमरवाणी का दर्द-ए-निचोड़ यही। खून के रिश्ते के आगे दोस्ती हार गई। वर्कर नहीं, परिवार बड़ा हो गया। अब दोनों गुर्दे बदल गए। जख्मी सिपाही बन गया। तो योद्धा मुलायम पीछे मुड़कर जख्मी सिपाही को क्यों देखेंगे। अब अमर सिंह प्रासंगिक नहीं। सो सहानुभूति क्यों जताएंगे मुलायम। यानी अपनी हैसियत अमर को भी दिखने लगी। सो आखिर में अमर की जो टिप्पणी लिख रहा। उसे पढ़ हंसना मत। अमर ने कहा- 'अब मैं मुलायमवादी नहीं, समाजवादी बनूंगा।' आप सोचो, गर अमर जैसे लोग समाजवादी। तो पूंजीवादी और दलाली व्यवस्था के पहरुआ कौन? अमर ने सोशलिस्ट मोहन सिंह की पैसे से मदद की। तो सोचा, समाजवाद जेब में। तभी तो मोहन सिंह ने आलोचना क्या कर दी। अमर इलाज के लिए मोहन को दी मदद वापस मांगने लगे। कहा- पहले पैसे लौटाओ, फिर आलोचना करना। सो अमर का समाजवाद आप खुद ही देख लो।
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18/01/2010

Friday, January 15, 2010

कैलेंडर, फोटू और व्यथा राज्यमंत्री की

संतोष कुमार
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           नए साल में कैलेंडरों की धूम न हो। तो नया साल नया सा नहीं लगता। पर बात किंगफिशर के कैलेंडर की नहीं। जिसकी शूटिंग पर करोड़ों खर्च होते। बंटते महज सौ-एक कॉपी। वैसे भी आम आदमी के घर किंगफिशर के कैलेंडर सज भी नहीं सकते। लोगों को मिल जाए, तो शायद घर की शोभा बढ़ाने के बजाए जलाना पसंद करेंगे। यों कैलेंडर तो सिर्फ तारीख देखने के मकसद से। पर अपने विजय माल्या पता नहीं क्या-क्या दिखाना पसंद करते। यों 'रंगीन'  कैलेंडर का रंग अब राजनीति पर भी। फर्क सिर्फ इतना, विजय माल्या का अपना अंदाज। तो राजनीति में खुद को चमकाना और चापलूसी ही मकसद। अब आप खुद ही देख लीजिए। लोकसभा चुनाव में राहुल-सोनिया गांधी कांग्रेस का बीड़ा उठाए देश भर में घूम रहे थे। तो प्रियंका ने अमेठी-रायबरेली की कमान संभाली। सो अपना चौबीसों घंटों वाले भोंपू का एक कैमरा वहीं पहुंच गया। अब प्रियंका रोज-रोज नई बात तो कहेंगी नहीं। सो कभी साडिय़ों के रंग, तो कभी साडिय़ों का इंदिरा स्टाइल। बोलने-चलने का भी इंदिरा अंदाज कैमरों में खूब कैद हुआ। चैनलों पर खूब विशेष प्रोग्राम भी चले। सो एक कांग्रेसी भक्त ने बारह फोटू छांटे और नए साल का कैलेंडर बना दिया। यानी मेहनत, न दौड़-धूप, बैठे-ठाले दरबार में नंबर बढ़ाने की स्ट्रेटजी। अब नंबर कितना बढ़ा, यह तो बाद की बात। पर एक कैलेंडर ऐसा भी, जिससे सीनियर पर जूनियर खफा हो गया। यों डीएवीपी के जरिए सालाना सरकारी कैलेंडर बनता। बीते साल के अंत में ही सूचना प्रसारण मंत्री उसका विमोचन करते। अबके भी ऐसा हुआ। सरकारी कैलेंडर में मनरेगा के साथ-साथ स्वास्थ्य मिशन, शहरीकरण जैसी यूपीए की तमाम फ्लैगशिप योजनाएं फोटू सहित। यानी परंपरा के मुताबिक सरकारी कैलेंडर में सरकारी उपलब्धियों का खूब बखान। एक कैलेंडर संसद के पीठासीन अधिकारी के दफ्तर से सालाना जारी होता। एक साल राज्यसभा सचिवालय, तो दूसरे साल लोकसभा सचिवालय की ओर से। पर अबके सीपी जोशी ने अपने मंत्रालय का अलग कैलेंडर जारी कर दिया। यों पिछले साल के सरकारी कैलेंडर में बारहों महीने नरेगा को ही समर्पित थे। तो फोटुओं में मजदूरों का काम। यानी साइट फोटू ही छाए हुए थे। पर उस कैलेंडर में अपने सीपी जोशी की भूमिका नहीं थी। अलबत्ता जोशी वाला मंत्रालय तब आरजेडी के रघुवंश बाबू के जिम्मे था। सो कांग्रेस ने सिर्फ योजनाओं को जगह देने की सोची होगी। ताकि मंत्री का फोटू देख क्रेडिट लालू की पार्टी न ले जाए। पर अबके कांग्रेसी सीपी जोशी मंत्री। तो सब कुछ अपने 'हाथ'  में। सो मंत्रालय का कैलेंडर छपा। तो सोनिया-मनमोहन के साथ जोशी भी छा गए। पर असली चूक कैलेंडर के सितंबर महीने वाले पन्ने में हुई। जोशी ने राष्टï्रपति के साथ अपना और दो सहयोगी राज्यमंत्रियों के फोटू डलवाए। पर जोशी के साथ तीन राज्यमंत्री। सो तीसरे मंत्री शिशिर अधिकारी का गुस्सा सातवें आसमान पर। वैसे भी अधिकारी ममता दीदी के सिपहसालार। सो आव देखा न ताव, सीपी जोशी पर भड़क उठे। कैलेंडर में मंत्रियों की फोटू पर आपत्ति जताई। दलील दी, मंत्री के बजाए विकास योजना को कैलेंडर में जगह दी जानी चाहिए थी। अब सुनते हैं, विवाद आगे न बढ़े। सो भले जनवरी बीतने को। पर दूसरा कैलेंडर छपवाने की तैयारी। अब जरा सोचिए, कैलेंडर में शिशिर अधिकारी का भी फोटू होता। तो विकास योजना वाली दलील देते? पर फोटू नहीं, तो एतराज जताने के लिए जनता से ज्यादा बड़ी ढाल और क्या। अब देखना होगा कि नए कैलेंडर में विकास होगा या फोटू। पर अधिकारी की नाराजगी सिर्फ कैलेंडर नहीं। कैलेंडर तो तात्कालिक कारण बना। मौलिक कारण तो राज्य मंत्रियों के दिल में हमेशा रहता। केबिनेट मंत्री अपने जूनियर राज्य मंत्रियों को काम नहीं देते। सो एनडीए राज हो या मनमोहन की पहली-दूसरी पारी। राज्यमंत्री कुढ़ते ही रहे। पिछले टर्म में मनमोहन ने तो बाकायदा केबिनेट मंत्रियों को चि_ïी भी लिखी थी। पर नतीजा वही ढाक के तीन पात रहा। कुछ दिन पहले शिशिर अधिकारी और कुछ राज्य मंत्रियों ने प्रणव मुखर्जी से दुखड़ा भी रोया था। पर केबिनेट मंत्री शायद रसूख दिखाने के आदी हो चुके। एक जमाना था, जब 1980 के दशक में बंसीलाल रेलमंत्री थे। तो माधवराव सिंधिया एमओएस थे। उन ने साफ हिदायत दे रखी थी। मेरे पास आने वाली फाइलें सिंधिया की नजरों से होकर आएं। पर क्या आज के वक्त में कोई केबिनेट मंत्री ऐसी दरियादिली दिखाएगा? शिवराज पाटिल के गृह मंत्री रहते उनके जूनियर सिर्फ बयान मंत्री रह गए थे। मनमोहन की दूसरी पारी में श्रीकांत जेना राज्यमंत्री बनने को तैयार नहीं थे। वजह, जेना यूएफ सरकार में केबिनेट मंत्री रह चुके। एनडीए राज में हुकुम देव नारायण यादव कृषि राज्यमंत्री थे। पर कुछ समय कृषि मंत्री रहे नीतिश कुमार ने कुछ काम नहीं दिया। तो खफा होकर अपने सरकारी निवास 19 कुश्क रोड पर फावड़ा-कुदाल लेकर काम पर जुट गए। साथ में मीडिया भी बुला लिया। इजहार-ए-दर्द का यादवी नमूना और क्या होगा। कृषि राज्यमंत्री को मंत्रालय में काम नहीं। तो निवास पर ही खेती करने लगे।
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15/01/2010

Thursday, January 14, 2010

मकर संक्रांति पर लो अपनी भी खिचड़ी!

संतोष कुमार
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         सूर्य उत्तरायण हो गया। हरिद्वार में आस्था के महाकुंभ की शुरुआत भी हो गई। पर सूर्य का उत्तरायण होना सभी राजनीतिक दलों के लिए शुभ नहीं रहा। यूपी में मायावती विधानसभा के बाद विधान परिषद में भी झंडाबरदार। विधान परिषद के आखिरी तीन नतीजे भी माया के हक में गए। सो दोनों सदनों में मायाराज हो गया। पर सबकी किस्मत माया जैसी नहीं। यों कांग्रेस ने शुभ मौका देख संगठन चुनाव का एलान कर दिया। पहला शुभ एलान सोनिया गांधी के चुनाव का। ताकि सब शुभ-शुभ हो। तभी तो जो औपचारिकताएं 25 जुलाई को पूरी होनी। एलान मकर संक्रांति पर ही कर दिया। पर क्या एक नाम जप से जुलाई तक कोई संकट नहीं आएगा? संकट तो पहले दिन ही, जब पटना में जगदीश टाइटलर और अनिल शर्मा के खिलाफ दलित एक्ट में एफआईआर दर्ज हो गई। बिहार कांग्रेस कार्यकारिणी की लिस्ट गुरुवार को जारी हुई थी। तो सत्ता के नशे में चूर कांग्रेस ने स्पीकर मीरा कुमार को भी मेंबर बना दिया। सिर्फ मेंबरी ही नहीं, सबके नाम के आगे जाति भी लिख दी। पर टाइटलर अब लिस्ट को कांग्रेस का अंदरूनी दस्तावेज बता रहे। अब आप ही देखो, जात-पांत से ऊपर उठने की बात करने वाले राजनेता कितने ढोंगी। यानी हजारों साल क्यों न बीत जाएं, अगर राजनीति का यही ढर्रा रहा। तो न जाति प्रथा मिटेगी, न भेदभाव और ना ही जाति के नाम पर वोट बटोरने की परंपरा। अब भले कांग्रेसी सोनिया गांधी को इस फजीहत से बचाने में जुटे। पर राजनीति का चेहरा फिर बेनकाब तो हो ही गया। राहुल गांधी के दलित बस्तियों में ठहरने पर राजनीतिक सवाल उठने लगे। तो राहुल ने खुद सफाई दी थी- 'मैं जाति पूछकर किसी के घर नहीं जाता। मैं सिर्फ यह देखता हूं कि वह इनसान गरीब है।'  अब राहुल कांग्रेस को कितना बदल पाएंगे, यह तो भविष्य के गर्भ में। पर सूर्य का उत्तरायण बीजेपी के लिए कुछ अच्छा नहीं रहा। नितिन गडकरी खरमास में ही बीजेपी के अध्यक्ष बने। अभी कुल 26 दिन ही हुए। गडकरी को अपने ही बयान पर खंडन जारी करना पड़ गया। इतना ही नहीं, गुरुवार को जब हम-आप सूर्य ग्रहण के साये में होंगे। दिल्ली के जंतर-मंतर पर नितिन गडकरी के पुतले फूंके जा रहे होंगे। जानते हैं, पुतले फूंकने वाले कौन होंगे। कांग्रेस-सपा-बसपा-वामपंथी जैसी विरोधी पार्टियां नहीं। अलबत्ता बीजेपी की दिल-अजीज सबसे बड़ी सहयोगी पार्टी जेडीयू। दिल्ली की जेडीयू शाखा गडकरी के उस बयान से नाराज। जिसमें उन ने दिल्ली-मुंबई जैसे महानगरों के लिए बाहरी लोगों को 'समस्या'  बताया। पर गुरुवार को खंडन किया। तो बोले- 'मैंने बड़े शहरों की समस्या पर ईमानदार पहल की बात कही। भारत एक है। किसी को भी देश में कहीं भी आने-जाने-बसने का संवैधानिक हक।'  यों गडकरी दो दिन पहले ही कह रहे थे- 'मीडिया से दूर रहना ही पार्टी हित में। मीडिया लिखे, तो भला। ना लिखे, तो भला। मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता।'  अब गडकरी को क्यों फर्क पड़ा, जो खंडन जारी करने की नौबत आन पड़ी। गडकरी खुद महाराष्टï्र से। सो राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने के बाद क्षेत्रीयता के सवालों पर एहतियात बरतना चाहिए था। पता नहीं किस बात से आग भड़क उठे। राज ठाकरे-बाल ठाकरे-शीला-शिवराज-तेजेंद्र खन्ना की टिप्पणियां पहले भी आग बन चुकीं। राष्टï्रीय नेता को हर बात तोल-मोल कर बोलनी चाहिए। अब क्षेत्रीयता की बात चली। तो बाल ठाकरे का नया फरमान, आस्ट्रेलिया को अब महाराष्टï्र में मैच नहीं खेलने देंगे। पाकिस्तान से भी मैच न होने का आंदोलन किया था। तो शिवसेनिकों ने वानखेड़े स्टेडियम खोद डाला। यों ठाकरे की भावना से अपना भी इत्तिफाक। आखिर आस्ट्रेलिया में भारतीयों पर नस्ली हमले थमने का नाम नहीं। अपनी सरकार तो सिर्फ गाल बजा रही। पर सवाल बाल ठाकरे से। अगर आपको आस्ट्रेलिया में रहने वाले भारतीयों से इतनी सहानुभूति। तो भारत में ही हिंदी भाषियों से इतनी नफरत क्यों? आप तो अपने देश में ही अपने लोगों को पीट या पिटवा रहे। क्या आप और आपके भतीजे की ओर से उत्तर भारतीयों पर यह नस्ली हमला नहीं? ठाकरे साहब, हिंदी भाषियों पर हमला कर आपके परिवार ने देश की एकता खोद डाली। अब शुभ-अशुभ की बात चली। तो बेचारगी के दौर से गुजर रही सपा क्यों छूटे। सूर्य ने दिशा बदली। तो अमर सिंह भी दुबई से मुंबई आ गए। पर सपा की कहानी विचित्र मोड़ पर आ गई। अब अमर ने मुलायम को एक-दूसरे का राजदार बताया। तो राजनीतिक हलकों में सीडी का बाजार गर्म हो गया। यानी अमर शुद्ध रूपेण ब्लैक मेलिंग पर उतर आए। अब अमर हमाम में कैसे, यह तो सबको मालूम। पर अमर ने ठान ली, मुलायम को भी नहीं छोड़ेंगे। यों राजनीति में सीडी का बड़ा महत्व। बुढ़ापे में एनडी तिवारी शिकार हुए। बीजेपी में संजय जोशी के अपने ही दुश्मन थे। तो मुंबई से ही दिसंबर 2005 में सैक्स सीडी जारी हुई। एक बार बिहार निवास में कुछेक सांसदों की रंगीन सीडी भी खूब चलीं। हरियाणा के पिछले चुनाव के वक्त भजनलाल की अश£ील सीडी ने खेल बिगाड़ दिया था। अमर सिंह का फोन टेपिंग कांड अभी भी सुप्रीम कोर्ट में लंबित। तब अमर और अंबिका सोनी में जैसी तकरार हुई, लिखना भी मुनासिब नहीं। सो राजनीति मा सीडी की बड़ी आग है। अब मौका मकर संक्रांति का। तो बेहतर यही, क्यों न सभी नेता कुंभ हो आएं।
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14/01/2010

Wednesday, January 13, 2010

सुबह कीमत घटाने, तो शाम को बढ़ाने पर चर्चा

'राही मनवा दुख की चिंता क्यों सताती है। दुख तो अपना साथी है। सुख है एक छांव ढलती, आती है, जाती है...।'  आम आदमी के लिए अपनी सरकार का यही संदेश। मंगलवार को टली केबिनेट कमेटी ऑन प्राइस (सीसीपी) की मीटिंग बुधवार को हो गई। पर नतीजा दोस्ती फिल्म के गीत जैसा ही। वैसे भी सरकार और आम आदमी के बीच दोस्ती हो। तो चुनावी साल से पहले राहत की उम्मीद ही बेमानी। सो सीसीपी की मीटिंग हुई। तो ऐसा कोई चौंकाऊ फैसला नहीं। जो महंगाई पर हमला बोल सके। अलबत्ता पुराने फैसले रिन्यू हो गए। अब सफेद हाथी बनी चीनी को बिना ड्यूटी आयात करने की छूट। कच्ची चीनी के आयात को पहले ही दिसंबर 2010 तक छूट मिली हुई। खुले बाजार में और भी गेहूं-चावल उतरेंगे। सब्सिडी वाले खाद्य तेलों के वितरण की समय सीमा बढ़कर 31 अक्टूबर 2010 तक। दालों पर दस रुपए की सब्सिडी पुरजोर ढंग से लागू होगी। सीसीपी में कुल 11 बिंदु तय हुए। फिर भी महंगाई की तेरहवीं के आसार नहीं। यूपी की सीएम मायावती ने कच्ची चीनी की प्रोसेसिंग पर रोक लगा रखी। सीसीपी के फैसलों में एक बिंदु यूपी सरकार के लिए भी। पर माया यों ही मान जाएं। तो फिर काहे की माया। सो अब पीएम मनमोहन सिंह सभी चीफ मिनिस्टर की मीटिंग लेंगे। सरकारी प्रेस नोट में तारीख का खुलासा नहीं। यों गणतंत्र दिवस का जश्र मनाकर अगली सुबह शायद मीटिंग हो। पर लानत-मलानत हुई। तो अब 'ज्योतिषी'  शरद पवार का अंदाज भी बदल गया। अब पवार ने खम ठोककर महंगाई को ललकारा। बोले- 'चार से आठ दिन में रोजमर्रा की वस्तुओं की और दस दिन में चीनी की कीमतों पर काबू पा लेंगे।'  पर जरा सोचिए, कैसे काबू में करेंगे महंगाई को मनमोहन और पवार? कहीं वही फार्मूला तो नहीं, जो कल आपको बताया। पहले कीमतें बढ़ा दो। फिर सेल लगाकर तीस फीसदी छूट का ऑफर। यानी गुरुवार को चीनी की कीमत 48 रुपए किलो। तो शायद दस दिन बाद 44 रुपए हो जाए। भले आपको राहत मिले, न मिले। सरकार के लिए तो बड़ी राहत की बात। सो आप 14-16 रुपए किलो वाली चीनी का जमाना गुड़ी-गुड़ी सपने की तरह भुला दें, तो ही आपकी सांस नहीं उखड़ेगी। सो पेट की आग के साथ-साथ सेहत की भी चिंता रखें। पर महंगाई की आदत अभी भी नहीं पड़ी। तो कुछ आसान नुस्खे अपनाइए। शुरुआत में थोड़े पैसे खर्च करिए। एक फर्जी मेडिकल रपट बना खुद को डायबिटिक दिखा दें। गृहणी खुद-ब-खुद चीनी में कटौती कर देंगी। एक लीटर दूध में दो लीटर पानी मिलाएं। दाल-सब्जी रसेदार (रस ट्रांसपेरेंट दिखे) हों। दिल्ली में घर है, तो ठंड के महीने में नहाना बंद कर दें। पानी की बचत तो होगी ही, कांग्रेसी सीएम शीला की बढ़ाई कीमत का बोझ भी कम पड़ेगा। अगर कोई पवार जैसे वजनदार हैं। तो जिम जाने के बजाए कम भोजन करें। यही है अपनी सरकार का महंगाई भगाओ मूल मंत्र। अपने लालबहादुर शास्त्री ने देश की शान की खातिर हफ्ते में एक दिन उपवास की अपील की थी। तो देश की जनता ने शास्त्री जी को सर-आंखों पर बिठाया था। पर मनमोहन राज में कहीं ऐसा न हो, हफ्ते में एक दिन भोजन करने की अपील जारी हो जाए। वैसे भी जनता को महंगाई में जीने में मजा आने लगा। कांग्रेस भी यही समझा रही, अगर महंगाई होती, तो हम चुनाव कैसे जीतते। पर अंदरखाने कांग्रेस को इल्म हो चुका। बिल्ली के भाग्य से हर बार छींका नहीं टूटता। पर महंगाई थामने को भी कोई उपाय नहीं सूझ रहा। सो सीसीपी में तय हो गया- आओ मीटिंग-मीटिंग खेलें। पर सनद रहे, सो बताते जाएं। मंगलवार को सीसीपी की मीटिंग टलने की वजह थी सरकार में एकराय न होना। सो बुधवार को मीटिंग हुई। तो सरकार का एक सुर सामने आया- आओ आम आदमी को मूर्ख बनाएं। सो महंगाई पर अर्थशास्त्री मनमोहन का चेहरा फिर सामने रखा। पर पीएम खुद कूदे, तो भी कोई बड़ा फैसला नहीं हुआ। सो सीएम की मीटिंग में क्या होगा। वही राज्य केंद्र पर और केंद्र राज्य पर ठीकरा फोड़ेगा। जमाखोरों पर कार्रवाई की मांग होगी। पर सवाल वही, मियां अब तक कहां आराम फरमा रहे थे। यों मीटिंग-मीटिंग का खेल भी रिन्यू हो रहा। पिछले टर्म में मनमोहन ने 21 फरवरी 2007 को सभी सीएम को चि_ïी लिखी। तो पिछले एक साल में पीएमओ की ओर से उठाए गए कदमों का जिक्र कर सहयोग मांगा। फिर 17 सितंबर 2008 को गवर्नरों की मीटिंग में भी पीएम ने चिंता जताई। पर महंगाई कम तो नहीं हुई, मनमोहन दुबारा पीएम जरूर बन गए। सो दूसरे टर्म में भी पुराना नुस्खा अपना रहे। पर काठ की हांडी बार-बार नहीं चढ़ती। पिछले टर्म में भी महंगाई रोकने को कभी ब्याज दर बढ़ाई। तो कभी पेट्रोल-डीजल के दाम। पर आम आदमी बोझ से दबता ही चला गया। अब दूसरे टर्म का दिलचस्प पहलू देखिए। सुबह सीसीपी की मीटिंग में कीमतें घटाने पर चर्चा हुई। तो देर शाम पीएमओ में पेट्रोल-डीजल की कीमतें बढ़ाने की। महंगाई घटाने का 'मनमोहिनी अर्थशास्त्र'  भी बहुत खूब। पेट्रोलियम मंत्री मुरली देवड़ा की दलील, तेल कंपनियों पर सब्सिडी का बोझ बढ़ रहा। सो पेट्रोल की कीमतें बढऩी चाहिए। कीमतों का फैसला भी कंपनियों पर छोडऩे की दलील दे रहे देवड़ा। वैसे सही भी, सरकारी कंपनी बोझ क्यों उठाए। बोझ उठाने का काम तो आम आदमी का। सरकारी कंपनी वालों को मोटी सेलरी-सुविधा भी दो। कंपनियों का खुला खेल फर्रुखाबादी भी करने दो। ----------
13/01/2010

Tuesday, January 12, 2010

तो गलत फिल्म के गाने से ही सुलझ गया बीजेपी का झगड़ा

इंडिया गेट से
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तो गलत फिल्म के गाने से ही
सुलझ गया बीजेपी का झगड़ा
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 संतोष कुमार
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            अलटा मार पलटा, शरद पवार पलट गए। केबिनेट कमेटी ऑन प्राइस की मीटिंग भी बुधवार के लिए टल गई। वैसे भी महंगाई रुकने वाली नहीं। सो मीटिंग आज हो या कल। मनमोहन को क्या फर्क पड़ता। चीनी रात भर में 44 से 48 रुपए किलो क्यों न हो जाए। मार्केटिंग का तो फंडा भी ऐसा ही। कीमतें बढ़ाकर सेल लगा दो। फिर 30-40 फीसदी छूट दे दो। शायद मनमोहन सरकार भी इसी फार्मूले की फिराक में। बढ़ी कीमतों में से दो-चार रुपए कम करा देंगे। फिर कांग्रेसी ढोल-नगाड़े ले 24 अकबर रोड पर धप-धप बजाएंगे। यही कांग्रेसी कल्चर बन चुकी। पर कल्चर के मामले में तो बीजेपी की सानी ही नहीं। अब नितिन गडकरी के हाथ कमान। सो गडकरी रोज नए फंडे गढ़ रहे। अब मंगलवार को रीजनल मीडिया के कुछ पत्रकारों से मिले। तो कई चौंकाने वाली बातें सामने आईं। यानी बिना फंड के फंडे चाहिए। तो गडकरी से मिलिए। महाराष्टï्र की राजनीति से मिले अनुभव के बेस पर ही बीजेपी जैसी राष्ट्रीय पार्टी चलाने की सोच रहे। सो पहले तो अपने धंधे गिनाए। राजनीति का समाजकरण और राष्टï्रकरण फार्मूला बताया। फिर बीजेपी का भावी एजंडा। गडकरी बीजेपी को फिर राजनीतिक शिखर पर लाने की संघ योजना से आए। सो बोले- 'बीजेपी के वोट बैंक में और दस फीसदी का इजाफा करना ही मेरा लक्ष्य।'  सो बीजेपी का नया फंडा, अपना कामगार संगठन होगा। अब तक भारतीय मजदूर संघ ही बीजेपी का श्रमिक संगठन रहा। पर अब बीजेपी को खुद के श्रमिक संगठन की कमी महसूस हो रही। सो नितिन गडकरी ने वामपंथी राह पर चलने की योजना बना ली। भले अपने गढ़ में वामपंथी खुद हांफ रहे। पर बीजेपी को वामपंथी राह ही तारणहार नजर आ रही। गडकरी की दलील, कांग्रेस की इंटक जैसी संस्था बीजेपी के पास नहीं। सो अब एससी-एसटी, महिलाओं और असंगठित कामगारों के लिए अपना संगठन बनाएगी। ताकि शहरों में खत्म हो रहे जनाधार को बढ़ा सके। यों सनद रहे, सो बता दें। जब 2004 में बीजेपी सत्ता से बाहर हुई। फिर एक बार दिल्ली में वर्किंग कमेटी हुई। तो अटल बिहारी वाजपेयी ने पार्लियामेंट एनेक्सी में नेताओं को मंत्र दिया था। कैसे वर्करों का दिल जीता जाए। सीखना हो, तो सीपीएम के गढ़ बंगाल जाओ। तब राजस्थान में वसुंधरा राजे सीएम थीं। उन ने तो फौरन दो सरकारी नुमाइंदे एसएन गुप्त और ओम बिड़ला कोलकाता भेज दिए। भले 2008 के चुनाव में बीजेपी हार गई। अब एक और चौंकाने वाली बात। खुद नितिन गडकरी सीपीआई महासचिव एबी वर्धन के अंडर में लेबरों की यूनियनबाजी कर चुके। एक बार तो गडकरी कांग्रेस के श्रमिक संगठन इंटक के अध्यक्ष भी चुन लिए गए थे। यह खुलासा कोई अपनी ओर से नहीं। खुद गडकरी ने ही किया। भारतीय मजदूर संघ वाले दत्तोपंत ठेंगड़ी भी वर्धन की एटक में काम कर चुके। सो गडकरी फार्मूला संघ की ही देन। पर गडकरी की मानें, तो संघ कभी बीजेपी में सीधे दखल नहीं देता। चलो, सीधे न सही, पीछे से ही। पर दखल देता है, ऐसा तो मान ही लिया। गडकरी ने बीजेपी के कांग्रेसीकरण से इनकार किया। पर यहां भी कबूला, अभी भी कई मायनों में पार्टी विद डिफरेंस। यानी कहीं न कहीं थोड़ी-बहुत गिरावट तो मान ली। अब गडकरी बीजेपी को राजनीतिक कम, सामाजिक-आर्थिक संगठन की तरह ज्यादा चलाना चाह रहे। सो विपक्ष की जगह विजिलेंस शब्द की मांग कर दी। अब जहां-जहां राज्यों में पार्टी विपक्ष की भूमिका में। वहां के नेताओं की मीटिंग लेंगे। ताकि बेहतर विपक्ष की भूमिका निभा सकें। उन ने तेलंगाना पर सरकार को कोसा। तो विदर्भ पर शिवसेना से इतर भुवनेश्वर वर्किंग कमेटी का प्रस्ताव दोहरा दिया। अब इंदौर में वर्किंग कमेटी होगी। तो नेताओं को टेंट में ही रहना होगा। होटल का खर्चा बीजेपी नहीं उठाएगी। भले टेंट का खर्चा होटल से ज्यादा क्यों न हो। पर यही नहीं, अब पदाधिकारियों पर भी नकेल होगी। जैसे संघ के पदाधिकारी ज्यादातर प्रवास में ही वक्त गुजारते। बीजेपी पर भी वही फार्मूला लागू होगा। सो गडकरी ने कह दिया- 'दिल्ली-मुंबई में बैठकर काम नहीं होगा। पदाधिकारियों को गांव-गांव प्रवास करना होगा। मैंने स्टेट थीम बना ली है।'  पर सवाल बीजेपी के कुछ संकटों पर हुए। तो गडकरी ने राजस्थान, पंजाब का उदाहरण दिया। बोले- 'आज सुबह राजस्थान से मुझे फोन आया। आप लोग तो छापते ही नहीं। अब राजस्थान में समूची बीजेपी एकजुटता से पंचायत चुनाव में जुटी हुई।'  पर राजस्थान का झगड़ा सुलझाने का फार्मूला पूछा। तो गदगद होकर बोले- 'मैंने सबको नया दौर का गाना सुनाया। आपको भी सुनाता हूं।... छोड़ो कल की बातें। कल की बात पुरानी...।'  पिछले पखवाड़े भर में सभी वरिष्ठï नेताओं के सहयोग और राजस्थान सुलझाने की खुशी चेहरे पर दिखी। पर जरा एक दिलचस्प पहलू देखिए। वसुंधरा गुट हो या चतुर्वेदी खेमा। नितिन गडकरी के गलत फिल्मी गाने से ही सारा झगड़ा-झंझट भूल गए। यों छोड़ो कल की बातें... गाना फिल्म नया दौर का नहीं। अलबत्ता फिल्म 'हम हिंदुस्तानी'  का गाना। पर शायद गडकरी नए अध्यक्ष। सो राजस्थान के भाजपाइयों को इशारा, अब नया दौर आ गया। गडकरी गलत फिल्म का नाम 20-22 दिनों से सुना रहे। पर देखिए, फिल्मों के शौकीन आडवाणी भी गलती सुधारने में मदद नहीं कर रहे।
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12/01/2010

Monday, January 11, 2010

कांग्रेस की लफ्फाजी या लफ्फाजी भरी कांग्रेस?

इंडिया गेट से
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कांग्रेस की लफ्फाजी या
लफ्फाजी भरी कांग्रेस?
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 संतोष कुमार
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          तो आज की शुरुआत सवाल से। क्या अपनी राजनीति की जुबान ही भद्दी हो चुकी या सिर्फ जुबान की राजनीति हो रही? माना, एचडी देवगौड़ा दंतहीन, विषहीन यानी सत्ताविहीन हो चुके। तो क्या बौखलाहट में किसी को भी डंक मारते रहेंगे। देवगौड़ा देश के पीएम रह चुके। पर कभी 'राष्ट्रीय'  न हुए, न शायद होंगे। कर्नाटक की राजनीति में ही उमड़-घुमड़ करते रहे। कभी खुद सीएम बनने की ललक। तो कभी बेटे को सीएम बनाने की अलख। सो कर्नाटक में एक ही टर्म में बीजेपी-कांग्रेस-देवगौड़ा ने सत्ता सुख भोगा। पर बीजेपी और कांग्रेस की सरकार में गौड़ा कॉमन फैक्टर रहे। कभी इधर तो कभी उधर। सो चुनाव में जनता ने इधर-उधर कहीं का न छोड़ा। यानी देवगौड़ा की बौखलाहट लाजिमी। पर पूर्व पीएम की मर्यादा भी तो कोई चीज। देवगौड़ा ने कर्नाटक के सीएम येदुरप्पा को बास्टर्ड कह दिया। देर रात जाकर माफी मांगी। तो ऐसे, मानो अहसान कर रहे। बोले- 'अगर येदुरप्पा मेरी टिप्पणी से वाकई आहत हुए हैं। तो मैं माफी मांगता हूं।'  पर राजनीति में किसकी जुबान ओछी नहीं। हाल के ही कुछ साल का मजमून आप देख लीजिए। वाजपेयी पीएम थे। तो नरेंद्र मोदी ने विरोधी दल की नेता और उनके बेटे के लिए इटली की कुतिया-जर्सी बछड़ा शब्द इस्तेमाल किया। प्रमोद महाजन ने भी मोनिका लेविंस्की से तुलना कर दी। जेतली ने पीएम मनमोहन सिंह को नाइट वॉचमैन बताया। पर कांग्रेसी भी कम नहीं। कभी पीएम वाजपेयी को गद्दार कहा। तो गुजरात चुनाव में सोनिया गांधी नरेंद्र मोदी को मौत का सौदागर कह चुकीं। हाल ही में मोदी का कांग्रेस को बुढिय़ा और गुडिय़ा कहना भी उम्दा जुबान नहीं। अब बीजेपी नेता पर भद्दी टिप्पणी हुई। तो बीजेपी देवगौड़ा को इशारों में ही मेंटल कह रही। सत्ता न होने की हताशा बताया। पर सत्ता में तो बीजेपी भी नहीं। सो बीजेपी की इस खस्ता हालत की क्या वजह? अब विनय कटियार भी गोविंदाचार्य की राह पर। तो बीजेपी कह रही- 'हमारे यहां पढऩे-पढ़ाने, अध्यात्म की परंपरा। वैसे भी कटियार सरयू किनारे बसते हैं।'  यानी हाथ कंगन को आरसी क्या, पढ़े-लिखे को फारसी क्या। कटियार को बीजेपी ने इशारा कर दिया। अब देखने वाली बात तब होगी, जब अगले महीने इंदौर के तंबू में बीजेपी की वर्किंग कमेटी-कॉउंसिल होगी। कहीं ऐसा न हो, पहले दिन ही तंबू का बंबू उखड़ जाए। पर बीजेपी को छोडि़ए। देवगौड़ा की अभद्र भाषा पर कांग्रेस प्रवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी से सवाल हुए। तो सिंघवी ने पहले जी-भर येदुरप्पा को कोसा। आखिर में नैतिक सिद्धांत और मर्यादित भाषा का पाठ पढ़ाया। पर देवगौड़ा का नाम न लिया। यानी राजनीति की मर्यादा भी वक्त के हिसाब से। पर भाषा सिर्फ गाली-गलौज की नहीं। एक भाषा आम आदमी की खातिर भी। आप जरा खुद गौर फरमाइए। महंगाई का करंट 11000 वोल्ट से दौड़ रहा। पर शरद पवार मन के साथ-साथ शरीर से भी हांफ रहे। सो कह दिया- 'महंगाई कब कम होगी, मुझे नहीं पता। मैं कोई ज्योतिषी नहीं हूं।' पर पवार शायद भूल गए। अगर वह ज्योतिषी होते, तो कुंभ के मेले में किसी घाट पर चंदन घिस रहे होते। लोगों के हाथ की रेखा देख ठगी का धंधा कर रहे होते। यों अब भी पवार का काम कुछ खास अलग नहीं। दो टर्म से देश के कृषि-खाद्य मंत्री। पर लोगों को सिर्फ झूठे दिलासे दिला रहे। यों शरद पवार हों या कांग्रेस, वक्त के हिसाब से महंगाई पर अलग-अलग दलीलें जरूर दीं। ताकि आम आदमी एक ही दलील सुनते-सुनते बोर न हो जाए। पवार ज्योतिषी नहीं। तो वित्त मंत्री रहते पी. चिदंबरम भी कह चुके- 'महंगाई रोकने को मेरे पास जादुई छड़ी नहीं।'  कभी एनडीए राज पर ठीकरा फोड़ा, तो कभी बीजिंग ओलंपिक पर। कभी आर्थिक महामंदी को कोसा। अब कांग्रेस अपना दामन बेदाग दिखाने को शरद पवार पर चढ़ बैठी। केबिनेट कमेटी ऑन प्राइस में पीएम पवार को खरी-खरी सुना चुके। इसे कहते हैं हाथी के दांत। पर क्या कांग्रेस और सरकार जिम्मेदार नहीं? सोनिया गांधी की सीडब्लूसी कई दफा प्रस्ताव पास कर चुकी। पर सरकार सोई रही। तो सोनिया ने कड़े कदम क्यों नहीं उठाए? सोनिया तो संसदीय दल की अध्यक्ष। पीएम मनमोहन हों या वित्तमंत्री प्रणव। आखिर हैं तो सोनिया द्वारा ही नियुक्त नेता। पर कांग्रेस कह रही, महंगाई रोकने को आवश्यक कदम उठाए जा रहे। फिर भी महंगाई नहीं रुक रही। सो अकेले पवार पर हमला कांग्रेस की नई लफ्फाजी। जैसे शशि थरूर पर कांग्रेस कर रही। सादगी पर कैटल क्लास, हैडली-वीजा और अब नेहरू पर सवाल उठाए। पर हमेशा की तरह कांग्रेस गरजी, बरसी नहीं। यानी लफ्फाजी में कांग्रेस की सानी नहीं। तभी तो चीन इंच-इंच करके भारतीय सीमा में घुसपैठ कर चुका। पर अपनी सरकार को देखो, न सही मैप और न ही घुसपैठ का अंदाजा। मीडिया ने घुसपैठ का मामला उठाया। तो विदेश मंत्रालय से संयम की नसीहत मिल गई। चीन के मुद्दे पर मनमोहन सरकार गांधारी की भूमिका में। कभी मैकमोहन लाइन को लेकर चीन पर दबाव नहीं बनाया। अबके लद्दाख में जैसी चीन की घुसपैठ, 1962 में चीन ने तवांग पर ऐसे ही कब्जा किया। फिर महीने भर बाद चीन-भारत युद्ध। जैसा राग चीन पर, वैसा ही आस्ट्रेलिया में नस्ली हमले पर। सो इतिहास देखकर आप खुद ही तय कर लें। आजादी से अब तक सत्ता में रहते कांग्रेस ने सिर्फ लफ्फाजी की या कांग्रेस आदतन ही लफ्फाजी भरी।
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11/01/2010

Friday, January 8, 2010

तो क्या राजनीति को भी 'निवेश' की दरकार?

इंडिया गेट से
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तो क्या राजनीति को भी
'निवेश' की दरकार?
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 संतोष कुमार
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         तो 2014 तक एक और वोट बैंक तैयार होगा! अपने एनआरआई भाई लोगों का। शुक्रवार को आठवें प्रवासी भारतीय दिवस के मौके पर पीएम ने यह भरोसा दिलाया। विज्ञान भवन में तीन दिवसीय प्रवासी भारतीय सम्मेलन शुरु हुआ। तो दोहरी नागरिकता न मिलने से खफा प्रवासियों को मनमोहन ने नया लॉलीपॉप दिखा दिया। अगले आम चुनाव तक एनआरआई को भी वोट का हक दिलाने की कोशिश करेंगे। पर जुबान से कागज तक पहुंचना आसान नहीं। दोहरी नागरिकता का मुद्दा वाजपेयी सरकार की देन। तबके पीएम वाजपेयी ने वादा तो कर दिया। पर जब संसद के सामने बिल आया। तो कई तकनीकी फच्चर आन पड़े। खूब विवाद हुआ। 'अ पर्सन ऑफ इंडियन ओरिजीन'  शब्द पर कई राय। मसलन, कितनी पुश्तों को आधार माना जाए। किस देश को अलग रखें, किसे चुने जैसी कई तकनीकी और संवैधानिक अड़चनें। सो दोहरी नागरिकता का मुद्दा 2003 से अब तक पेंडिंग। भले देश में इस मुद्दे पर बहस चलती रही। पर एनआरआई ने तो खुद को ठगा महसूस किया। भारत सरकार पर चौतरफा दबाव पड़ा। तो मनमोहन ने नया झुनझ्ुाना थमा दिया। फिर भी वोट का हक दिलाने का ठोस वादा नहीं किया। अलबत्ता उम्मीद और कोशिश शब्द का इस्तेमाल। वह भी 2014 तक। ताकि अगले आम चुनाव तक एनआरआई हायतौबा न मचा सकें। अब अगर वादा पूरा नहीं भी हुआ। तो मनमोहन का क्या। वह तो अगले चुनाव में शायद रिटायर हो जाएं। जैसे दोहरी नागरिकता का वादा निभाने से पहले ही वाजपेयी रिटायर हो गए। फिर नया नेतृत्व, नए वायदे। यही तो अपनी राजनीति का रंग। यों राजनीति के रंग कब बदल जाएं, मालूम नहीं। भले अपने एनआरआई संख्या में महज ढ़ाई करोड़। पर पैसा-पॉवर के मामले में अपनी एक अरब आबादी पर भारी। अब आप सोचो, अगर एनआरआई को वोटिंग हक मिल गया। तो लोकतंत्र का नया चारित्र कैसा होगा? कल्पना करिए, एनआरआई को वोट का हक मिल गया। नाथद्वारा से अपने सीपी जोशी एक वोट से हार रहे। और बाद में एनआरआई के वोट से जोशी जीत गए। सोचो, हू-ब-हू ऐसा हुआ होता। तो कैसा लगता। यही ना, नाथद्वारा में रहने वाली जनता के फैसले पर विदेशों में बैठे एनआरआई भारी। अब कोई उम्मीदवार आरआई यानी रेजीडेंट ऑफ इंडिया के बजाए एनआरआई के वोट से संसद या विधानसभा पहुंचे। तो वह किसकी बात ज्यादा सुनेगा? आपकी या धनकुबेर एनआरआई की। यानी राजनीति नई राह पर चलेगी। राजनेता कर्ता-धर्ता होंगे और एनआरआई नीति-नियंता। तभी तो एनआरआई की दिलचस्पी इन्फ्रास्ट्रक्चर में इनवेस्टमेंट से ज्यादा पोलिटिकल इंवेस्टमेंट में। सो मनमोहन ने एनआरआई की सोच का इजहार भी किया। बोले- 'शासन में महत्व मिलने की प्रवासियों की जायज इच्छा को मैं समझता हूं। उम्मीद करता हूं कि 2014 तक एनआरआई को वोट का हक मिल जाएगा।' पीएम ने भरोसा तो दिलाया। पर वोट के हक के पीछे कितना दबाव, इसकी झलक भी मिल गई। जब कहा- 'दरअसल, मैं तो एक कदम आगे बढ़ते हुए पूछना चाहता हूं कि प्रवासी भारतीय घर वापस लौटकर राजनीति और सार्वजनिक जीवन में क्यों नहीं शामिल होते।'  पर मनमोहन भी बखूबी समझते और एनआरआई भी। अगर वतन वापस लौटकर राजनीति में हिस्सेदारी करेंगे। तो किसी एक पार्टी के होकर रह जाएंगे। कभी सत्ता तो कभी विपक्ष में। पता नहीं कब-किस सरकार का मूड फिर जाए। तो नीति बदल धंधा चौपट कर दे। सो एनआरआई के पास पैसे की कमी नहीं। जिसकी भी सत्ता आए, अपनी धमक बनी रहे। इसी बात की कोशिश करते। अब अगर वोटिंग का हक भी मिल जाए। तो एनआरआई की पांचों उंगलियां घी में और सिर कड़ाही में। सत्ता में जो भी राजनीतिक दल होगा। एनआरआई वोट बैंक की बात को सिर्फ सुनना नहीं, अमल करना भी मजबूरी होगी। पर जैसे दोहरी नागरिकता में तकनीकी पेच। एनआरआई के वोट के हक में भी कम नहीं। कैसे चयन होगा? सुरक्षा के लिए क्या मानक होंगे? और भी कई पेच, जो पालिसी जाहिर होने के बाद दिखेंगे। पर वोट के हक के पीछे की कहानी- निवेश। मनमोहन तो खुल्लमखुल्ला बोले- 'देश में निवेश के मामले में एनआरआई रुढि़वादी रहे हैं। पर सोच बदलने की जरुरत। भारत की ओर सजगता से देखना चाहिए। निवेश के मामले में भारत भी अहम ठिकाना है।'  पीएम ने एनआरआई से विकास और राजनीति में सक्रिया भागीदारी की भी अपील की। तो क्या अब राजनीति में भी टोटा हो गया। जो हम एनआरआई को वोट का लॉलीपॉप थमा सक्रिय राजनीति में आने का न्योता दे रहे। एक अपने पूर्व पीएम लालबहादुर शास्त्री का जमाना था। जब देश में खाद्य संकट का पूर्वानुमान हुआ। तो देशवासियों से हफ्ते में एक दिन उपवास की मार्मिक अपील की। अपील के पीछे शास्त्री जी के तीन उद्देश्य थे। पहली- इससे अनाज की कमी दूर होगी। दूसरी- किसान फसल की पैदावार बढ़ाने को उत्साहित होंगे। और तीसरी- अनाज की खातिर दुनिया के सामने हाथ न पसारना पड़े। पर साठ साल में ही क्या हो गया। टेक्रोलॉजी की कमी हो। तो खुद बनाने के बजाए इंपोर्ट को तरजीह देते। रक्षा उपकरण की विदेशों से खरीद पर खुद रक्षा मंत्री एके एंटनी अफसोस जता चुके। अब एनआरआई को वोट का हक। यानी राजनीति में भी निवेश। क्या वाकई अपनी राजनीति में नेतृत्व का टोटा पड़ गया?
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08/01/2010