संतोष कुमार
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'अंधा बांटे रेवड़ी, अपने-अपनों को देय।' पर अपना देश कोई अंधेर नगरी नहीं। जो सब कुछ टके सेर हो और लोग बिन सोचे-समझे गटक जाएं। आखिर देश के प्रतिष्ठिïत अवार्ड की प्रतिष्ठïा का सवाल। सो पद्म अवार्ड पर विवाद होना ही था। रेलवे ने 26/11 के जांबाज हैड कांस्टेबल जिल्लू यादव को मैडल की सिफारिश नहीं की। पर रेल राज्यमंत्री ई. अहमद के निजी सचिव जहूर जैदी पुलिस मैडल पा गए। जिल्लू यादव ने आतंकियों से जमकर लोहा लिया। तबके रेल मंत्री लालू यादव ने दस लाख का पुरस्कार भी दिया। फिर भी रेलवे ने जिल्लू यादव को पुलिस मैडल के काबिल नहीं समझा। पर रेल मंत्रालय की कारगुजारी यहीं तक नहीं। ओलंपिक में कुश्ती के लिए कांस्य जीतने वाले सुशील कुमार को भी पद्म अवार्ड नहीं। पर बॉक्सिंग में कांस्य दिलाने वाले विजेंद्र सिंह पद्म श्री की लिस्ट में शामिल। विजेंद्र के पद्म श्री पर शायद ही किसी को एतराज हो। पर सुशील का क्या कसूर? पहली बार कुश्ती में देश के लिए ओलंपिक पदक जीता। फिर कुश्ती के वल्र्ड कप में भी परचम लहराया। पर ऐसी अनदेखी हो। तो किसका दिल नहीं दुखेगा। पर सरकार के पास दिल ही कहां, जो दुखे। दिल होता, तो हिरणों के दिल पर तीर चलाने वाले सैफ अली खान पद्म श्री कैसे हो जाते। अभी तक सैफ के खिलाफ केस चल रहा। पर शायद सत्तारूढ़ दल से नवाब पटौदी-शर्मिला की नजदीकियां पद्म श्री दिला गईं। सो अपने राजस्थान के विश्रोई समाज के लोग खफा। वाकई सैफ ने ऐसा क्या कर दिया, जो कला क्षेत्र गौरवान्वित हो। कहीं ऐसा तो नहीं, हाथों पर करीना के नाम का गोदना गुदवा सैफ सुर्खियों में रहे। तो सरकार की आंखें चौंधिया गई हों। महाराष्टï्र में बीजेपी-शिवसेना ने तो खुला विरोध जताया। पर विरोध के मायने तो तब, जब सरकार भूल स्वीकार करने का साहस रखे। यहां तो समूची सरकार खुलेआम बचाव में उतरी। अमेरिका में रहने वाले एनआरआई संतसिंह चटवाल का नाम पद्म भूषण की लिस्ट में आया। तो बीजेपी के गोपीनाथ मुंडे ने फौरन पीएम को चि_ïी लिख मारी। चटवाल के खिलाफ सीबीआई जांच। बिल क्लिंटन के साथ भारत आए थे। तो बाकायदा गिरफ्तार भी हो चुके। खुद को दिवालिया भी घोषित किया था। पर पद्म भूषण मिला। तो एटमी करार में अपनी भूमिका का बखान कर रहे। विपक्षी दलों को भी लताड़ा। सो प्रकाश जावडेकर ने पूछा- 'क्या अब दलालों को भी पद्म अवार्ड मिलने लगा?' पर चटवाल की भाषा ऐसी, जैसे अवार्ड के भूखे हों। बोले- 'राजनीतिक दलों की परवाह नहीं। वे आते-जाते रहते हैं।' आखिर चटवाल का मिजाज चढ़े भी क्यों ना। अपना विदेश से लेकर गृह मंत्रालय तक चट्टïान की तरह पीछे खड़ा। गृह मंत्रालय ने बयान जारी किया। तो खुद केसों का हवाला दिया। जरा आप खुद ही गौर फरमा लें। पहले तो चटवाल के कसीदे पढ़े गए। फिर पांच केस का हवाला। जिनमें सीबीआई ने खुद ही तीन केस बंद कर दिए। बाकी दो मामलों में अदालत से बरी। अब आप ही सोचो, इतने विवादास्पद लोगों को पद्म भूषण देना कहां तक उचित? अवार्ड तो वाकई रेवड़ी बन गए। सरकार जिसे चाहे, बांटती फिरे। चेहरा छिपाने को बाबा आम्टे, जोहरा सहगल जैसे कुछ योग्य नाम शामिल किए जाते। ताकि ईमानदार छवि के आभा मंडल में कुछ यों ही बाईपास हो जाएं। अगर सरकार अवार्ड को रेवड़ी की तरह न बांटे। तो कभी परमवीर चक्र विजेता अब्दुल हामिद की पत्नी अनाज के लिए राशन कार्ड मांगती न दिखे। पर अपने साठ साल के गणतंत्र पर तमाचा नहीं तो और क्या। जो अब्दुल हामिद की पत्नी दाने-दाने को मोहताज। पर साठ साल में ही शायद देश की हालत ऐसी हो चुकी। मानो, अवार्ड या मैडल सिर्फ शो केस में सजाने की चीज। वाकई अवार्ड या मैडल में राजनीति-अफसरशाही की घुसपैठ न होती। तो ऐसा नहीं होता कि राजीव गांधी को मृत्यु के छह महीने बाद ही भारत रत्न मिल जाता। और अपने लौह पुरुष सरदार बल्लभ भाई पटेल को भारत रत्न मिलने में 41 साल लग जाते। इंदिरा गांधी, वी.वी. गिरि, कामराज तो 70 के दशक में ही भारत रत्न हो गए। पर संविधान रचयिता भीमराव अंबेडकर को 1990 में भारत रत्न मिला। आजादी के अहम सेनानी मौलाना अबुल कलाम आजाद 1992 में औपचारिक भारत रत्न हुए। असम के स्वतंत्रता सेनानी गोपीनाथ वारदोलोई को मरणोपरान्त 41 साल बाद तब भारत रत्न मिला। जब असम गण परिषद वाजपेयी सरकार में थी। जयप्रकाश नारायण, जिन ने राजनीति की दिशा बदल दी। उन्हें भी मृत्यु के 19 साल बाद तब भारत रत्न से नवाजा गया। जब यूनाइटेड फ्रंट की केंद्र में सरकार बनी। जेपी के चेले हुकूमत के अगुआ बने। अमत्र्यसेन को पहले नोबल मिला। फिर भारत रत्न। आखिरी भारत रत्न 2001 में उस्ताद बिस्मिल्ला खां हुए। तबसे नौ साल हो गए। किसी को भारत रत्न नहीं। वैसे भी जब अवार्डों पर राजनीति हावी हो। तो भारत रत्न पर विवाद की मुसीबत कौन मोल ले। सो सरकार पद्म विभूषण, भूषण और श्री में ही गोल-गपाड़ा कर रही। वैसे भी अब जमाना काफी बदल चुका। नौ महीने में बराक ओबामा शांति का नोबल ले जाते। तो फिर चटवाल, सैफ को अवार्ड पर एतराज बेवजह। आखिर जब जमाना ही फिक्सिंग का। तो इकलौता अवार्ड ही अछूता क्यों रहे? सो लोगों को सम्मानित करने वाला सम्मान अब खुद के लिए 'सम्मान' मांग रहा।
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27/01/2010
Wednesday, January 27, 2010
गणतंत्र भले साठ का हुआ पर सठिया गए नेता
गणतंत्र के सालाना जश्र को राजपथ सज गया। हर बार की तरह कदम से कदम मिलाते अपने जवान दिखेंगे। रंग-बिरंगी झांकियां होंगी। कुल मिलाकर भारत की अद्भुत क्षमता का प्रदर्शन होगा। पर आम आदमी को झलकियां पहले ही दिख गईं। जब कांग्रेस और शरद पवार ने महंगाई-महंगाई खेलने की ठानी। पिछले हफ्ते दस दिन बीत गए। पर चीनी हो या बाकी जरूरत के सामान। कीमतें कम होनी तो दूर, अलबत्ता बढ़ गईं। सो ग्यारहवें दिन इतवार को फिर पवार उवाच। अबके पवार ने महंगाई के लिए पीएम को भी लपेटा। तो संदेश यही था, महंगाई रोकना सरकार के बूते में नहीं। यों सोमवार को पवार आदतन पलट गए। पर कांग्रेस ने नसीहत दे दी। मनीष तिवारी बोले- 'कृषि मंत्रालय को राज्यों के साथ सक्रियता से काम करने की जरूरत।' पर पवार खफा न हों, सो उनके बयान को केबिनेट की सामूहिक जिम्मेदारी से जोड़ दिया। यानी कांग्रेस-पवार के बीच नूरा-कुश्ती जारी। सो गणतंत्र से गण गायब हुआ। सिर्फ तंत्र ही शेष। सो अब 'जनता द्वारा, जनता का, जनता के लिए' सिर्फ कहने भर की बात। तंत्र पर राजनीति, अफसरशाही हावी। संविधान रचयिताओं के गणतंत्र के मंसूबों पर मौजूदा तंत्र ने पानी फेर दिया। समूची व्यवस्था पर अपना लबादा ओढ़ा दिया। सिर्फ न बदला, तो सालाना जश्र पर दिखावे का दस्तूर। सो अबके सिर्फ गणतंत्र की 60वीं सालगिरह नहीं। वोट की व्यवस्था देखने वाला चुनाव आयोग भी 60 साल का हो गया। सोमवार को हीरक जयंती मनाई। तो इतिहास पर खूब इतराया। पर राजनीति की छाप से अछूता नहीं रहा समारोह। गुजरात में नरेंद्र मोदी ने अनिवार्य वोटिंग का कानून बना दिया। कांग्रेस के दिग्गी राजा तो पहले ही तानाशाही रवैया बता खारिज कर चुके। अब सीईसी नवीन चावला ने भी व्यवहारिक बताया। यों अनिवार्य वोटिंग का मामला कोई आज-कल का मुद्दा नहीं। पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एसपी सेन वर्मा ने 1968 में वोट न डालने वालों पर जुर्माने का सुझाव दिया था। उन ने बेल्जियम, नीदरलैंड, आस्ट्रेलिया, क्यूबा, आस्ट्रिया जैसे देशों में 'मनी फाइन प्लान' की नजीर भी दी। पर चुनाव सुधार की बातें हमेशा आईं-गईं। उन ने आयोग पर राजनीतिक दबाव की बातें भी स्वीकार की थीं। अब नवीन चावला भले खुद को बेदाग बताएं। पर चावला का इतिहास शक की गुंजाइश छोड़ जाता। सो जब वोट का पहरुआ आयोग ही राजनीतिक पिट्ठू होगा। तो काहे का गणतंत्र। संविधान बनाने वालों ने रात-दिन एक कर नि:स्वार्थ भाव से देश के भविष्य का खाका खींचा। पर साठ साल में ही व्यवस्था चलाने वालों ने देश को बूढ़ा कर दिया। कहीं देश को छोटे-छोटे राज्यों में बांटने की कोशिश। तो कहीं राज ठाकरे जैसे सूबेदार पैदा हो चुके। अब गणतंत्र के मुंह पर इससे बड़ा तमाचा क्या होगा। जो राज ठाकरे खुलेआम पोस्टर लगाकर हिंदी भाषियों को धमका रहे। मुंबई में रहना है, तो मराठी सीखनी होगी। जो सीखना नहीं चाहता, घर लौट जाए। क्या मुंबई राज ठाकरे की बपौती हो गई? पर सैंया भए कोतवाल, तो डर काहे का। विलासराव देशमुख सीएम थे। तो भी राज के खिलाफ सिर्फ जुबान चलाई। अब अशोक चव्हाण, तो वह भी राज को इशारा कर ही रहे। पर राज जैसी जुबान की कमी नहीं। जब सितंबर 2007 में वंदे मातरम के सामूहिक गान पर विवाद हुआ। मुस्लिम समाज का एतराज था। तो देहरादून में बीजेपी की वर्किंग कमेटी चल रही थी। तब विनय कटियार ने जोश में नारा दिया- 'भारत में रहना है, तो वंदे मातरम कहना होगा।' पर भला हो वाजपेयी का। जिन ने मीटिंग के भीतर बात संभाल ली। फिर नारा आया था- 'भारत में रहना होगा, वंदे मातरम कहना होगा।' यानी अपने पास संविधान तो है। पर अमल कराने की इ'छाशक्ति किसी में नहीं। संविधान और कानून का फायदा एक खास वर्ग ही उठा पा रहा। व्यवस्था के रहनुमाओं ने साठ साल में संविधान को सही तरीके से लागू ही नहीं होने दिया। अलबत्ता गांव-गरीब के बीच एक ही संदेश गया। संविधान और कानून उसी का, जिसकी लाठी। नक्सलबाडी से शुरू नक्सलवाद भले 13 राज्यों में फैल गया। शिक्षा का स्तर आज भी रटंत से ऊपर नहीं। स्वास्थ्य सेवा निजी मकडज़ाल में। राजनीति का तो कहना ही क्या। अब साठ साल में गणतंत्र का सठियाना न कहें। तो और क्या कहेंगे। मनमोहन सरकार की मंत्री कृष्णा तीरथ ने इश्तिहार में पाकिस्तानी एयर चीफ मार्शल का फोटू छपवा दिया। हल्ला मचा, तो पीएमओ ने माफी मांग ली। पर कृष्णा तीरथ का तुर्रा देखिए। खेद जताया, पर कोई अफसोस नहीं। अलबत्ता बोलीं- 'फोटू नहीं, संदेश देखिए।' कृष्णा उवाच देख-सुन यही लगा। गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर कृष्णा को भी पद्म विभूषण मिल जाए। तो ठीक रहेगा। आखिर यह कोई छोटा-मोटा काम नहीं। कोई 'सपूत' ढूंढते-ढूंढते पाकिस्तान चला जाए। वहां से तनवीर अहमद महमूद का फोटू ढूंढ लाए। तो यह आसान काम नहीं। पर पद्म अवार्ड की लिस्ट में कृष्णा का नाम तो नहीं। अपनी व्यवस्था की उम्मीद के हिसाब से कुछ नाम मिल ही गए। पीएम वाजपेयी के घुटने का आपरेशन कर चितरंजन राणावत पद्म भूषण हुए थे। अब मनमोहन की सर्जरी करने वाले डाक्टर रमाकांत मदनमोहन पांडा भी पद्म भूषण हो गए। सो फिर वही सवाल। क्या पीएम का आपरेशन पद्म अवार्ड का पैमाना? पर जब कोई बांटे रेवड़ी। तो अपना क्या, पैमाना क्या। सो कुल मिलाकर अपना गणतंत्र भले साठ का हुआ पर सठिया गए नेता और चौपट हुई व्यवस्था। -------
25/01/2010
25/01/2010
Thursday, January 21, 2010
क्षेत्रीय दलों के भंवर में फंसी बीजेपी-कांग्रेस
संतोष कुमार
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कहते हैं, तोल-मोल के बोल। पर राजनीति में फार्मूला उल्टा। पहले बोल, फिर तोल-मोल। सो कांग्रेस हो या बीजेपी, अपने ही जाल में उलझ गईं। मकर संक्रांति के दिन जब यहीं पर राजनीति की खिचड़ी लिखी। तो ऑस्ट्रेलिया में भारतीयों पर नस्ली हमले की तुलना ठाकरे बंधुओं के कारनामों से की। पर तब उम्मीद न थी, ठाकरे बंधु इतनी जल्दी कोई शिगूफा ढूंढ लाएंगे। अब संयोग ही देखिए। जब गुरुवार को ऑस्ट्रेलियाई पीएम केविन रूड नस्ली हमले पर अफसोस जता रहे थे। मुंबई में चचा-भतीजे की जोड़ी उत्तर भारतीयों, खास तौर से गरीब टेक्सी चालकों पर ल_ï बरसाने की तैयारी में जुटे थे। अब राज के गुंडे सड़कों पर फिर वही दृश्य दोहराएंगे, जो करीब डेढ़ साल पहले दिखा चुके। अबके भी आग तो पहले से ही लगाई जा रही थी। जब राज ठाकरे ने खुलेआम धमकी दी। सरकार इस साल के 4500 टेक्सी परमिट सिर्फ मराठियों को दे। वरना सड़कों पर नॉन मराठियों की टेक्सी चलने नहीं देंगे। पर राज की आग को सरकार के मुखिया अशोक चव्हाण ने भी हवा दे दी। बिना तोल-मोल के राज के समर्थन में बोल गए। तो दिल्ली तक कांग्रेसियों की घिग्घी बंध गई। सो गुरुवार को अशोक चव्हाण पलटी मार गए। अब बोले- 'टेक्सी चालकों के लिए स्थानीय भाषा आनी चाहिए, चाहे वह मराठी हो या हिंदी-गुजराती।' कांग्रेस ने भी ऐसी ही दलील दी। महाराष्टï्र में ऐसा कानून इक्कीस साल पुराना। पर चचा-भतीजा इतने में कहां मानने वाले। चचा लंबे समय से कुर्सी से महरूम। तो भतीजा पहली बार तेरह सीटें जीत नशे में चूर। हिंदी के खिलाफ राज ठाकरे का एपीसोड तो अबू आजमी के साथ विधानसभा में हो चुका। पर राज जब तक नाम को हकीकत में न बदल दें, चुप नहीं बैठने वाले। सो चालीस साल पहले जो चचा ने दक्षिण भारतीयों के खिलाफ किया। बदले जमाने में भतीजा वही नुस्खा उत्तर भारतीयों के खिलाफ अपना रहा। कांग्रेस ने भी ठाकरे परिवार में फूट का फायदा उठाया। ताकि तीसरी बार भी सत्ता मिल जाए। कांग्रेस को वाकई फायदा भी हुआ। पर अशोक चव्हाण की कल की जुबां ऐसी। अब तक सिर्फ शह देती रही सरकार पूरी तरह से राज के रंग में रंगने लगी। यानी ऑस्ट्रेलिया हो या महाराष्टï्र, सत्तारूढ़ कांग्रेस का रुख एक जैसा। ऑस्ट्रेलिया में नस्ली हमले पर भी केंद्र की कांग्रेसी सरकार गाल बजा रही। तो महाराष्टï्र में ठाकरे बंधुओं का उत्तर भारतीयों पर नस्ली हमला भी कांग्रेसी सरकार के संरक्षण में ही। पर कांग्रेस शायद इतिहास भूल रही। भिंडरांवाला भी कांग्रेस की ही पैदाइश रहे। पर बाद में वही कांग्रेस के लिए नासूर बन गया। विश्व का इतिहास भी कुछ ऐसा ही। ओसामा बिन लादेन सोवियत संघ के खिलाफ अमेरिका की पैदाइश। पर अब वही लादेन अमेरिका पर कितना लद चुका। यह आप खुद ही देख रहे। अमेरिका पूरे घोड़े खोल चुका। पर अभी तक लादेन जिंदा या मुर्दा नहीं मिला। सो भविष्य में राज ठाकरे भी कांग्रेस के लिए नासूर ही साबित होंगे। फिलहाल कांग्रेस ने तीन स्थानीय भाषाओं में हिंदी का नाम लेकर बचाव तो कर लिया। पर राज का रोडछाप नाटक अभी बाकी। सो कांग्रेस तो राज ठाकरे के क्षेत्रीय भंवर में उलझ ही चुकी। वही हाल बड़ी राष्टï्रीय पार्टी बीजेपी का भी। यों नितिन गडकरी फिलहाल संभल-संभल कर बोल रहे। पर टेक्सी परमिट के मामले में बीजेपी की सहयोगी शिवसेना की भाषा राज जैसी ही। खुद उद्धव मुंबई में आने-जाने वालों के लिए भी परमिट की पैरवी कर चुके। अब देखो, कहां बीजेपी। जिसके आदर्श श्यामाप्रसाद मुखर्जी परमिट सिस्टम के खिलाफ शहीद हो गए। अब टेक्सी परमिट हो या महाराष्टï्र में घुसने का परमिट। बीजेपी का शिवसेवा से नाता तोडऩा तो दूर, उसके खिलाफ बोल भी नहीं पा रही। पर बीजेपी की मुश्किल सिर्फ महाराष्टï्र नहीं। महाराष्टï्र से आए नितिन गडकरी ने सबसे पहले बीजेपी को झारखंड में सत्ता दिलाई। अपने फैसले को जायज ठहराया। पर अब शिबू सोरेन का समर्थन करना गले की फांस बन गया। शिबू ने चुनावों में नक्सलियों की खूब मदद ली। सो सीएम बनने के बाद कर्ज अदा कर रहे। नक्सलवादियों के खिलाफ चल रहे ऑपरेशन रुकवा दिए। झारखंड में नक्सलियों के होने का सवाल ही खारिज कर दिया। पर बीजेपी केंद्रीय स्तर पर नक्सलवाद के खिलाफ निर्णायक जंग की पैरोकार। सो नक्सलवाद के मुद्दे पर झारखंड में सरकार दांव पर लगी। तो केंद्र में प्रतिष्ठïा। पर राजनाथ सिंह अभी शिबू से बात करने की दलील दे रहे। यानी जब दोनों बड़ी राष्ट्रीय पार्टियां क्षेत्रीय दलों के भंवर में फंसी हों। तो फिर क्या आम आदमी, क्या उत्तर भारतीय। और क्या देश की सुरक्षा।
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21/01/2010
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कहते हैं, तोल-मोल के बोल। पर राजनीति में फार्मूला उल्टा। पहले बोल, फिर तोल-मोल। सो कांग्रेस हो या बीजेपी, अपने ही जाल में उलझ गईं। मकर संक्रांति के दिन जब यहीं पर राजनीति की खिचड़ी लिखी। तो ऑस्ट्रेलिया में भारतीयों पर नस्ली हमले की तुलना ठाकरे बंधुओं के कारनामों से की। पर तब उम्मीद न थी, ठाकरे बंधु इतनी जल्दी कोई शिगूफा ढूंढ लाएंगे। अब संयोग ही देखिए। जब गुरुवार को ऑस्ट्रेलियाई पीएम केविन रूड नस्ली हमले पर अफसोस जता रहे थे। मुंबई में चचा-भतीजे की जोड़ी उत्तर भारतीयों, खास तौर से गरीब टेक्सी चालकों पर ल_ï बरसाने की तैयारी में जुटे थे। अब राज के गुंडे सड़कों पर फिर वही दृश्य दोहराएंगे, जो करीब डेढ़ साल पहले दिखा चुके। अबके भी आग तो पहले से ही लगाई जा रही थी। जब राज ठाकरे ने खुलेआम धमकी दी। सरकार इस साल के 4500 टेक्सी परमिट सिर्फ मराठियों को दे। वरना सड़कों पर नॉन मराठियों की टेक्सी चलने नहीं देंगे। पर राज की आग को सरकार के मुखिया अशोक चव्हाण ने भी हवा दे दी। बिना तोल-मोल के राज के समर्थन में बोल गए। तो दिल्ली तक कांग्रेसियों की घिग्घी बंध गई। सो गुरुवार को अशोक चव्हाण पलटी मार गए। अब बोले- 'टेक्सी चालकों के लिए स्थानीय भाषा आनी चाहिए, चाहे वह मराठी हो या हिंदी-गुजराती।' कांग्रेस ने भी ऐसी ही दलील दी। महाराष्टï्र में ऐसा कानून इक्कीस साल पुराना। पर चचा-भतीजा इतने में कहां मानने वाले। चचा लंबे समय से कुर्सी से महरूम। तो भतीजा पहली बार तेरह सीटें जीत नशे में चूर। हिंदी के खिलाफ राज ठाकरे का एपीसोड तो अबू आजमी के साथ विधानसभा में हो चुका। पर राज जब तक नाम को हकीकत में न बदल दें, चुप नहीं बैठने वाले। सो चालीस साल पहले जो चचा ने दक्षिण भारतीयों के खिलाफ किया। बदले जमाने में भतीजा वही नुस्खा उत्तर भारतीयों के खिलाफ अपना रहा। कांग्रेस ने भी ठाकरे परिवार में फूट का फायदा उठाया। ताकि तीसरी बार भी सत्ता मिल जाए। कांग्रेस को वाकई फायदा भी हुआ। पर अशोक चव्हाण की कल की जुबां ऐसी। अब तक सिर्फ शह देती रही सरकार पूरी तरह से राज के रंग में रंगने लगी। यानी ऑस्ट्रेलिया हो या महाराष्टï्र, सत्तारूढ़ कांग्रेस का रुख एक जैसा। ऑस्ट्रेलिया में नस्ली हमले पर भी केंद्र की कांग्रेसी सरकार गाल बजा रही। तो महाराष्टï्र में ठाकरे बंधुओं का उत्तर भारतीयों पर नस्ली हमला भी कांग्रेसी सरकार के संरक्षण में ही। पर कांग्रेस शायद इतिहास भूल रही। भिंडरांवाला भी कांग्रेस की ही पैदाइश रहे। पर बाद में वही कांग्रेस के लिए नासूर बन गया। विश्व का इतिहास भी कुछ ऐसा ही। ओसामा बिन लादेन सोवियत संघ के खिलाफ अमेरिका की पैदाइश। पर अब वही लादेन अमेरिका पर कितना लद चुका। यह आप खुद ही देख रहे। अमेरिका पूरे घोड़े खोल चुका। पर अभी तक लादेन जिंदा या मुर्दा नहीं मिला। सो भविष्य में राज ठाकरे भी कांग्रेस के लिए नासूर ही साबित होंगे। फिलहाल कांग्रेस ने तीन स्थानीय भाषाओं में हिंदी का नाम लेकर बचाव तो कर लिया। पर राज का रोडछाप नाटक अभी बाकी। सो कांग्रेस तो राज ठाकरे के क्षेत्रीय भंवर में उलझ ही चुकी। वही हाल बड़ी राष्टï्रीय पार्टी बीजेपी का भी। यों नितिन गडकरी फिलहाल संभल-संभल कर बोल रहे। पर टेक्सी परमिट के मामले में बीजेपी की सहयोगी शिवसेना की भाषा राज जैसी ही। खुद उद्धव मुंबई में आने-जाने वालों के लिए भी परमिट की पैरवी कर चुके। अब देखो, कहां बीजेपी। जिसके आदर्श श्यामाप्रसाद मुखर्जी परमिट सिस्टम के खिलाफ शहीद हो गए। अब टेक्सी परमिट हो या महाराष्टï्र में घुसने का परमिट। बीजेपी का शिवसेवा से नाता तोडऩा तो दूर, उसके खिलाफ बोल भी नहीं पा रही। पर बीजेपी की मुश्किल सिर्फ महाराष्टï्र नहीं। महाराष्टï्र से आए नितिन गडकरी ने सबसे पहले बीजेपी को झारखंड में सत्ता दिलाई। अपने फैसले को जायज ठहराया। पर अब शिबू सोरेन का समर्थन करना गले की फांस बन गया। शिबू ने चुनावों में नक्सलियों की खूब मदद ली। सो सीएम बनने के बाद कर्ज अदा कर रहे। नक्सलवादियों के खिलाफ चल रहे ऑपरेशन रुकवा दिए। झारखंड में नक्सलियों के होने का सवाल ही खारिज कर दिया। पर बीजेपी केंद्रीय स्तर पर नक्सलवाद के खिलाफ निर्णायक जंग की पैरोकार। सो नक्सलवाद के मुद्दे पर झारखंड में सरकार दांव पर लगी। तो केंद्र में प्रतिष्ठïा। पर राजनाथ सिंह अभी शिबू से बात करने की दलील दे रहे। यानी जब दोनों बड़ी राष्ट्रीय पार्टियां क्षेत्रीय दलों के भंवर में फंसी हों। तो फिर क्या आम आदमी, क्या उत्तर भारतीय। और क्या देश की सुरक्षा।
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21/01/2010
Wednesday, January 20, 2010
महंगाई पर भी क्यों न हो इमरजेंसी जैसी एकजुटता?
संतोष कुमार
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जे बात। इसे कहते हैं पवारनामा। अब दूध की कीमतें भी बढ़ेंगी। ज्योतिषी शरद पवार की काली जुबान से ब्रह्मïवाक्य निकल गया। पवार चले थे चीनी की कीमत कम करने। पर जरा कीमतों में कटौती का पवार फार्मूला देखिए। दूध महंगा होगा, तो लोगबाग चाय और दूध कम पीएंगे। चीनी की खपत कम होगी, तो मांग कम होगी। सो चीनी के दाम खुद-ब-खुद गिरेंगे। पर दूध की कीमतें तीन महीने पहले ही बढ़ी थीं। अब बुधवार को पवार दूध उत्पादकों की भाषा बोले। उत्तर भारत में दूध की किल्लत बताई। तो पवार उवाच सुन ऐसा लगा, मानो कल रात सोते वक्त पवार को पीने को दूध नहीं मिला। सो तड़के भन्नाते हुए उठ किल्लत का एलान कर दिया। अब तो पवार के हर बयान में निजी झुंझलाहट ज्यादा नजर आती। तभी तो दूध की किल्लत पर जो भाषा बोले। आम आदमी के नहीं, दूधियों के मंत्री दिखे। बोले- 'कीमतें बढ़ाने का फैसला नहीं हुआ, तो राज्यों को दूध खरीदने में मुश्किल पेश आएगी।' यानी दूधियों को पवार का इशारा हो गया। अब कोई मंत्री किल्लत पैदा करने का इशारा करे। तो दूध ही क्या, आम आदमी पानी को भी तरस जाए। पर अब कोई पवार-मनमोहन से पूछे, क्या हुआ तेरा वादा। कहां दस दिन में महंगाई कम करने का दावा। पिछले बुधवार को केबिनेट कमेटी ऑन प्राइस की मीटिंग के बाद पवार ने दस में बस का खम ठोका था। पर जुमा-जुमा आठ दिन ही हुए। चीनी और रोजमर्रा की वस्तुओं की कीमतें तो कम नहीं हुईं। अलबत्ता बाबू मोशाय ने दूध की कीमतें बढ़वाने के लिए दूधियों के सिर पर हाथ रख दिया। सो दूध की कीमतें बढऩी तय। साथ ही पेट्रोल-डीजल भी कतार में। अब तो यही लग रहा, चुनाव के वक्त सत्तारूढ़ दल को चंदा देने वाले जमाखोर पूरी भरपाई नहीं कर लेते। महंगाई कम होना तो दूर, थमने वाली भी नहीं। चुनाव के वक्त राजनीतिक दल इस बात की फिक्र कहां करते। चुनावी चंदा चोरी से आ रहा या मंदिर की दानपेटी से। अब जिन जमाखोरों ने चंदे दिए होंगे, उन पर कार्रवाई कैसे होगी। पिछले हफ्ते महंगाई का शोर ज्यादा मचा। तो कांग्रेस-मनमोहन के कान में भी आवाज पड़ी। सो दिखाने को मीटिंगबाजी कर ली। शायद सोचा होगा, दो-चार रुपए महंगाई कम करा देंगे। पर जब चंदा देने वालों से बात हुई होगी। तो उन लोगों ने बैलेंस शीट दिखा दी होगी। आम आदमी को निचोडऩे के लिए कुछ और वक्त मांग लिया होगा। अपना अंदाजा यों ही नहीं। जब सरकार कभी महंगाई पर हाथ खड़ा करे। कभी दस दिन में नकेल कसने का दावा। तो आप ही सोचो, है ना कहीं न कहीं दाल में काला। शरद पवार ने दस दिन में चीनी की कीमत घटाने का वादा किया। तो पूरा करने को दूध की कीमत बढ़ाएंगे। अपने प्रणव मुखर्जी तो कई दफा हाथ खड़े कर चुके। पर सरकार के मुखिया होने के नाते पीएम मनमोहन का राग, कोशिश कर रहे। अब राहुल गांधी का बयान देखिए। राहुल बाबा बीजेपी के गढ़ मध्य प्रदेश में घुसे हुए। सो अपनी जानकारी के आधार पर कहा या ज्योतिषी पवार के दावे पर। यह तो पता नहीं, पर राहुल बोले- 'महंगाई अब थोड़े दिनों की मेहमान।' मनमोहन के एक मंत्री सलमान खुर्शीद ने फर्रुखाबाद में बयान दिया। महंगाई के लिए सिर्फ केंद्र नहीं, राज्य सरकार भी दोषी। चलो देर से ही सही, केंद्र को दोषी तो माना। यानी राहुल हों या सलमान, महंगाई पर इजहार-ए-जुर्म तो कर ही लिया। अब बताओ- कौन सच्चा, कौन झूठा। किसका मुंह काला और किसका बोलबाला। कांग्रेस को जब-जब महंगाई की चिंता हुई। खबरें प्लांट करने में बीजेपी को भी मात दे दी। कभी कहा, मनमोहन ने पवार को डांट लगा दी। तो कभी पवार की क्षमता पर सवाल उठाए। अब मनमोहन केबिनेट के जूनियर मंत्री जयराम रमेश ने बीटी बैंगन का गुस्सा पवार पर उतार दिया। बीटी बैंगन के प्रमोशन को देश में घूम रहे जयराम रमेश पर्यावरणवादियों के विरोध को झेल रहे। सो मंगलवार को अहमदाबाद में सवाल हुआ। बैंगन का मामला कृषि मंत्रालय का। तो जयराम क्यों घूम रहे। बस फिर क्या था, जयराम तुनक पड़े। बोले- 'कृषि मंत्रालय में आज-कल क्रिकेट चल रहा। मंत्री खेल में व्यस्त।' यानी कांग्रेस-पवार का रिश्ता तो पति-पत्नी जैसा। तुम्हें सहा न जाए, तुम बिन रहा भी न जाए। पर फिर भी विपक्ष दबाव बनाने में नाकाम। यों बुधवार को आडवाणी-गडकरी की रहनुमाई में बीजेपी ने पीएम के घर अलख जगाई। पर भरोसा वही मिला, जो आम आदमी को मिलता। राज्यों में क्षत्रप खुद उलझे हुए। मायावती को तो मौके की तलाश थी। सो दूध के बहाने मनमोहन को धमकी दे दी। बुधवार को होने वाली सीएम मीटिंग से पहले पवार को बर्खास्त करो। वरना मीटिंग का बॉयकॉट करेंगे। वैसे भी माया मीटिंग में गईं। तो चीनी किल्लत पर सवालों में उलझेंगी। सो न जाने का पवार ने बहाना दे दिया। मुलायम, माया, लालू, पासवान, नीतिश, करुणा तमाम राजनीतिक क्षत्रपों को भी महंगाई की चिंता। पर सिर्फ राजनीतिक वजह से। सो महंगाई सियासी चाल में उलझ चुकी। अगर विपक्षी आम आदमी के हित में एकजुट हो जाएं। जैसे इंदिरा गांधी की इमरजेंसी के खिलाफ समूचा विपक्ष एकजुट हुआ। तो इंदिरा की ईंट से ईंट बज गई थी। कुछ ऐसा महंगाई पर हो जाए। तो मनमोहन सरकार की चूलें हिल जाएं। पर असलियत तो यह, न सत्तापक्ष और न विपक्ष ईमानदारी से कीमतें कम कराना नहीं चाहते।
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20/01/2010
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जे बात। इसे कहते हैं पवारनामा। अब दूध की कीमतें भी बढ़ेंगी। ज्योतिषी शरद पवार की काली जुबान से ब्रह्मïवाक्य निकल गया। पवार चले थे चीनी की कीमत कम करने। पर जरा कीमतों में कटौती का पवार फार्मूला देखिए। दूध महंगा होगा, तो लोगबाग चाय और दूध कम पीएंगे। चीनी की खपत कम होगी, तो मांग कम होगी। सो चीनी के दाम खुद-ब-खुद गिरेंगे। पर दूध की कीमतें तीन महीने पहले ही बढ़ी थीं। अब बुधवार को पवार दूध उत्पादकों की भाषा बोले। उत्तर भारत में दूध की किल्लत बताई। तो पवार उवाच सुन ऐसा लगा, मानो कल रात सोते वक्त पवार को पीने को दूध नहीं मिला। सो तड़के भन्नाते हुए उठ किल्लत का एलान कर दिया। अब तो पवार के हर बयान में निजी झुंझलाहट ज्यादा नजर आती। तभी तो दूध की किल्लत पर जो भाषा बोले। आम आदमी के नहीं, दूधियों के मंत्री दिखे। बोले- 'कीमतें बढ़ाने का फैसला नहीं हुआ, तो राज्यों को दूध खरीदने में मुश्किल पेश आएगी।' यानी दूधियों को पवार का इशारा हो गया। अब कोई मंत्री किल्लत पैदा करने का इशारा करे। तो दूध ही क्या, आम आदमी पानी को भी तरस जाए। पर अब कोई पवार-मनमोहन से पूछे, क्या हुआ तेरा वादा। कहां दस दिन में महंगाई कम करने का दावा। पिछले बुधवार को केबिनेट कमेटी ऑन प्राइस की मीटिंग के बाद पवार ने दस में बस का खम ठोका था। पर जुमा-जुमा आठ दिन ही हुए। चीनी और रोजमर्रा की वस्तुओं की कीमतें तो कम नहीं हुईं। अलबत्ता बाबू मोशाय ने दूध की कीमतें बढ़वाने के लिए दूधियों के सिर पर हाथ रख दिया। सो दूध की कीमतें बढऩी तय। साथ ही पेट्रोल-डीजल भी कतार में। अब तो यही लग रहा, चुनाव के वक्त सत्तारूढ़ दल को चंदा देने वाले जमाखोर पूरी भरपाई नहीं कर लेते। महंगाई कम होना तो दूर, थमने वाली भी नहीं। चुनाव के वक्त राजनीतिक दल इस बात की फिक्र कहां करते। चुनावी चंदा चोरी से आ रहा या मंदिर की दानपेटी से। अब जिन जमाखोरों ने चंदे दिए होंगे, उन पर कार्रवाई कैसे होगी। पिछले हफ्ते महंगाई का शोर ज्यादा मचा। तो कांग्रेस-मनमोहन के कान में भी आवाज पड़ी। सो दिखाने को मीटिंगबाजी कर ली। शायद सोचा होगा, दो-चार रुपए महंगाई कम करा देंगे। पर जब चंदा देने वालों से बात हुई होगी। तो उन लोगों ने बैलेंस शीट दिखा दी होगी। आम आदमी को निचोडऩे के लिए कुछ और वक्त मांग लिया होगा। अपना अंदाजा यों ही नहीं। जब सरकार कभी महंगाई पर हाथ खड़ा करे। कभी दस दिन में नकेल कसने का दावा। तो आप ही सोचो, है ना कहीं न कहीं दाल में काला। शरद पवार ने दस दिन में चीनी की कीमत घटाने का वादा किया। तो पूरा करने को दूध की कीमत बढ़ाएंगे। अपने प्रणव मुखर्जी तो कई दफा हाथ खड़े कर चुके। पर सरकार के मुखिया होने के नाते पीएम मनमोहन का राग, कोशिश कर रहे। अब राहुल गांधी का बयान देखिए। राहुल बाबा बीजेपी के गढ़ मध्य प्रदेश में घुसे हुए। सो अपनी जानकारी के आधार पर कहा या ज्योतिषी पवार के दावे पर। यह तो पता नहीं, पर राहुल बोले- 'महंगाई अब थोड़े दिनों की मेहमान।' मनमोहन के एक मंत्री सलमान खुर्शीद ने फर्रुखाबाद में बयान दिया। महंगाई के लिए सिर्फ केंद्र नहीं, राज्य सरकार भी दोषी। चलो देर से ही सही, केंद्र को दोषी तो माना। यानी राहुल हों या सलमान, महंगाई पर इजहार-ए-जुर्म तो कर ही लिया। अब बताओ- कौन सच्चा, कौन झूठा। किसका मुंह काला और किसका बोलबाला। कांग्रेस को जब-जब महंगाई की चिंता हुई। खबरें प्लांट करने में बीजेपी को भी मात दे दी। कभी कहा, मनमोहन ने पवार को डांट लगा दी। तो कभी पवार की क्षमता पर सवाल उठाए। अब मनमोहन केबिनेट के जूनियर मंत्री जयराम रमेश ने बीटी बैंगन का गुस्सा पवार पर उतार दिया। बीटी बैंगन के प्रमोशन को देश में घूम रहे जयराम रमेश पर्यावरणवादियों के विरोध को झेल रहे। सो मंगलवार को अहमदाबाद में सवाल हुआ। बैंगन का मामला कृषि मंत्रालय का। तो जयराम क्यों घूम रहे। बस फिर क्या था, जयराम तुनक पड़े। बोले- 'कृषि मंत्रालय में आज-कल क्रिकेट चल रहा। मंत्री खेल में व्यस्त।' यानी कांग्रेस-पवार का रिश्ता तो पति-पत्नी जैसा। तुम्हें सहा न जाए, तुम बिन रहा भी न जाए। पर फिर भी विपक्ष दबाव बनाने में नाकाम। यों बुधवार को आडवाणी-गडकरी की रहनुमाई में बीजेपी ने पीएम के घर अलख जगाई। पर भरोसा वही मिला, जो आम आदमी को मिलता। राज्यों में क्षत्रप खुद उलझे हुए। मायावती को तो मौके की तलाश थी। सो दूध के बहाने मनमोहन को धमकी दे दी। बुधवार को होने वाली सीएम मीटिंग से पहले पवार को बर्खास्त करो। वरना मीटिंग का बॉयकॉट करेंगे। वैसे भी माया मीटिंग में गईं। तो चीनी किल्लत पर सवालों में उलझेंगी। सो न जाने का पवार ने बहाना दे दिया। मुलायम, माया, लालू, पासवान, नीतिश, करुणा तमाम राजनीतिक क्षत्रपों को भी महंगाई की चिंता। पर सिर्फ राजनीतिक वजह से। सो महंगाई सियासी चाल में उलझ चुकी। अगर विपक्षी आम आदमी के हित में एकजुट हो जाएं। जैसे इंदिरा गांधी की इमरजेंसी के खिलाफ समूचा विपक्ष एकजुट हुआ। तो इंदिरा की ईंट से ईंट बज गई थी। कुछ ऐसा महंगाई पर हो जाए। तो मनमोहन सरकार की चूलें हिल जाएं। पर असलियत तो यह, न सत्तापक्ष और न विपक्ष ईमानदारी से कीमतें कम कराना नहीं चाहते।
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20/01/2010
Tuesday, January 19, 2010
नौ जून 2006 को भी तो सुध ली थी मनमोहन ने!
संतोष कुमार
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काम के, न काज के, दुश्मन अनाज के। साउथ ब्लॉक में मनमोहन सर की क्लास लगी। तो राज्य मंत्रियों का यही दर्द उमड़ पड़ा। जब घर में बड़ा भाई छोटे को खिलौना देना तो दूर, छूने भी न दे। तो छोटा रोता-भागता मां के पास जाता। शाम को थका-हारा पिता घर आए। तो बड़े भाई की जमकर शिकायत होती। पर पिता की नजर में तो दोनों बच्चे एक जैसे प्यार के हकदार। सो बेचारे पिता की मुश्किल लाजिमी। मनमोहन के सरकारी परिवार की कहानी भी यही। सो जब मंगलवार को मनमोहन ने सुध ली। तो कुछ ने भावना का खुलकर इजहार किया। तो कुछ राजनीतिक कारीगरी दिखा गए। मनमोहन मंत्रिमंडल में कुल 78 मेंबर। केबिनेट में मनमोहन को मिला 33 बड़े भैया। सात इंडिपेंडेंट चार्ज वाले मझोले। बाकी 38 छोटे भाई लोग। सो मनमोहन की क्लास में 33 छोटे भाई पहुंचे। तो दर्जन भर ने खुलकर दुखड़ा रोया। ममतावादी को शिकायत कांग्रेसियों से। तो कांग्रेसी केएच मुनिअप्पा को ममता से। शिशिर अधिकारी का दर्द तो शनिवार को यहीं बता चुके। पर अब अधिकारी को मौका मिला। तो अपने सीपी जोशी को कैसे छोड़ते। अगर राज्यमंत्रियों में कोई संतुष्टï था। तो सिर्फ करुणानिधिवादी एसएस पलानिमणिक्कम। जो अपने प्रणव दा के मातहत वित्त राज्यमंत्री। पर डीएमके से विभागों की डील में रेवेन्यू मिला हुआ। वैसे भी करुणानिधि समर्थन की एवज में सत्ता का लिखित समझौता करने वाले। सो अपने सचिन पायलट गठबंधन की मजबूरी बखूबी समझ रहे। वैसे भी ए. राजा डीएमके के कोटे से। सो शिकायत करना, मतलब सरकार को मुश्किल में डालना। सो सचिन ने चुप रहना बेहतर समझा। यानी जिन राज्यमंत्रियों के सीनियर पावरफुल। उनने शिकायत के बजाए सुझाव का फार्मूला अपनाया। अब अंदाज भले कुछ भी हो। पर शिकायतों का लब्बोलुवाब एक जैसा। केबिनेट मंत्री फाइल नहीं आने देते। मीटिंग तक में नहीं बुलाया जाता। कार्यक्रम की सूचना नहीं मिलती। नीतिगत मामलों में राय नहीं ली जाती। सो जब सीनियर मंत्री ही भाव नहीं देते। तो सैक्रेट्री कहां तवज्जो देने वाले। कुछ राज्य मंत्रियों ने तो यहां तक कहा। जब सैक्रेट्री से फाइल मांगी, तो जवाब मिला- 'केबिनेट मंत्री ने मना कर रखा है।' पर कोई फाइल नहीं, तो काम क्या। तो उसका जवाब भी सैक्रेट्री के जरिए ही जूनियर मंत्रियों को मिल रहा। केबिनेट मंत्री जूनियरों को कह रहे। तुम उद्घाटन करो, फीता काटो, मौज करो, बाकी हम देख लेंगे। पर मनमोहन के सामने शिकायतों की लिस्ट यहीं तक नहीं रुकी। अलबत्ता राज्यमंत्रियों ने जो इजहार किया। वह तथ्य चौंकाने वाले। राज्यमंत्रियों को अपने विभाग का बजट भी मालूम नहीं। यों सरकारी वेबसाइट पर सब उपलब्ध। फिर भी राज्यमंत्री को नहीं पता। तो फिर राज्यमंत्रियों की दिलचस्पी का अंदाजा भी आप लगा लें। पर पीएम ने सबकी सुन ली। आखिर में पीएमओ से दो लाइन की रिलीज जारी हुई। तो कहा- 'पीएम ने राज्य मंत्रियों की क्षमता के बेहतर इस्तेमाल के तौर-तरीकों पर चर्चा की। राज्य मंत्रियों को पीएम ने शासन में प्रभावी भूमिका निभाने का अनुरोध भी किया।' पर राज्यमंत्रियों का यह दर्द कोई नया नहीं। वाजपेयी सरकार के वक्त कृषि राज्यमंत्री हुकुमदेव नारायण यादव का अपने सरकारी निवास में ही खेती करने का किस्सा आपको बता चुके। पर मनमोहन राज की कहानी के क्या कहने। पिछले टर्म में भी राज्यमंत्री इसी कदर रुसवा थे। तो मनमोहन ने कांतीलाल भूरिया से फिशरी विभाग लेकर लालूवादी तस्लीमुद्दीन को दिया था। फिर भी दर्द बढ़ता ही गया। तो मनमोहन ने नौ जून 2006 को एक चि_ïी सभी काबिना मंत्रियों को लिखी। अब उस चि_ïी का मजमून भी देख लो- 'आप सभी जानते हैं कि हमारे पास पूरे समय के लिए राज्यमंत्री हैं, जो विभिन्न विभागों के केबिनेट मंत्रियों के मातहत जुड़े हैं। लेकिन पिछले कुछ समय से मैं बहुत से मामलों में यह देख रहा हूं कि राज्यमंत्रियों को दफ्तर के कामकाज के संदर्भ में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां नहीं दी जा रहीं। जिससे हम सुशासन के लिए नीति निर्धारण में उन मंत्रियों के अनुभवों और क्षमताओं से वंचित रह जाते हैं। इन सब पृष्ठïभूमि के तहत मैं आपसे अनुरोध करता हूं कि इस पर विचार करते हुए राज्यमंत्रियों को ज्यादा से ज्यादा जिम्मेदारियां दें। ताकि हम एक तरफ सरकार की कार्य प्रणाली को मजबूत कर सकें और दूसरी तरफ अपने नेतृत्व में उन मंत्रियों की क्षमता और अनुभवों को विकसित करने में सहयोग करें। आप इस बात को मानेंगे कि इससे न सिर्फ हमारी सरकार की छवि सुधरेगी, बल्कि हमारी सरकार के कामकाज की धारणा के बारे में भी सुधार होगा।' अब पीएमओ की ताजा रिलीज और नौ जून 2006 की उस चि_ïी की तुलना करें। कोई फर्क नजर आया? पर पीएम ने अबके फिर राज्य मंत्रियों को भरोसा दिलाया। केबिनेट की अगली मीटिंग में सीनियरों से बात करूंगा। केबिनेट सैक्रेट्री को नोट तैयार करने की हिदायत दी। पर होगा क्या। यही ना, मनमोहन तारीख बदल वही चि_ïी फिर भिजवा देंगे। या जुबानी बात करेंगे। पर केबिनेट मंत्री अपना वजन क्यों घटाएंगे? यों सिर्फ सीनियरों का ही दोष नहीं। राज्यमंत्री मुस्तैद हों। तो काम करने से कोई कब तक रोक सकेगा। पर लाल बत्ती मिल जाए। तो कामकाज में रुचि कहां रह जाती। सो काबिना मंत्री जूनियर की अरुचि का फायदा क्यों न उठाएं।
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19/01/2010
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काम के, न काज के, दुश्मन अनाज के। साउथ ब्लॉक में मनमोहन सर की क्लास लगी। तो राज्य मंत्रियों का यही दर्द उमड़ पड़ा। जब घर में बड़ा भाई छोटे को खिलौना देना तो दूर, छूने भी न दे। तो छोटा रोता-भागता मां के पास जाता। शाम को थका-हारा पिता घर आए। तो बड़े भाई की जमकर शिकायत होती। पर पिता की नजर में तो दोनों बच्चे एक जैसे प्यार के हकदार। सो बेचारे पिता की मुश्किल लाजिमी। मनमोहन के सरकारी परिवार की कहानी भी यही। सो जब मंगलवार को मनमोहन ने सुध ली। तो कुछ ने भावना का खुलकर इजहार किया। तो कुछ राजनीतिक कारीगरी दिखा गए। मनमोहन मंत्रिमंडल में कुल 78 मेंबर। केबिनेट में मनमोहन को मिला 33 बड़े भैया। सात इंडिपेंडेंट चार्ज वाले मझोले। बाकी 38 छोटे भाई लोग। सो मनमोहन की क्लास में 33 छोटे भाई पहुंचे। तो दर्जन भर ने खुलकर दुखड़ा रोया। ममतावादी को शिकायत कांग्रेसियों से। तो कांग्रेसी केएच मुनिअप्पा को ममता से। शिशिर अधिकारी का दर्द तो शनिवार को यहीं बता चुके। पर अब अधिकारी को मौका मिला। तो अपने सीपी जोशी को कैसे छोड़ते। अगर राज्यमंत्रियों में कोई संतुष्टï था। तो सिर्फ करुणानिधिवादी एसएस पलानिमणिक्कम। जो अपने प्रणव दा के मातहत वित्त राज्यमंत्री। पर डीएमके से विभागों की डील में रेवेन्यू मिला हुआ। वैसे भी करुणानिधि समर्थन की एवज में सत्ता का लिखित समझौता करने वाले। सो अपने सचिन पायलट गठबंधन की मजबूरी बखूबी समझ रहे। वैसे भी ए. राजा डीएमके के कोटे से। सो शिकायत करना, मतलब सरकार को मुश्किल में डालना। सो सचिन ने चुप रहना बेहतर समझा। यानी जिन राज्यमंत्रियों के सीनियर पावरफुल। उनने शिकायत के बजाए सुझाव का फार्मूला अपनाया। अब अंदाज भले कुछ भी हो। पर शिकायतों का लब्बोलुवाब एक जैसा। केबिनेट मंत्री फाइल नहीं आने देते। मीटिंग तक में नहीं बुलाया जाता। कार्यक्रम की सूचना नहीं मिलती। नीतिगत मामलों में राय नहीं ली जाती। सो जब सीनियर मंत्री ही भाव नहीं देते। तो सैक्रेट्री कहां तवज्जो देने वाले। कुछ राज्य मंत्रियों ने तो यहां तक कहा। जब सैक्रेट्री से फाइल मांगी, तो जवाब मिला- 'केबिनेट मंत्री ने मना कर रखा है।' पर कोई फाइल नहीं, तो काम क्या। तो उसका जवाब भी सैक्रेट्री के जरिए ही जूनियर मंत्रियों को मिल रहा। केबिनेट मंत्री जूनियरों को कह रहे। तुम उद्घाटन करो, फीता काटो, मौज करो, बाकी हम देख लेंगे। पर मनमोहन के सामने शिकायतों की लिस्ट यहीं तक नहीं रुकी। अलबत्ता राज्यमंत्रियों ने जो इजहार किया। वह तथ्य चौंकाने वाले। राज्यमंत्रियों को अपने विभाग का बजट भी मालूम नहीं। यों सरकारी वेबसाइट पर सब उपलब्ध। फिर भी राज्यमंत्री को नहीं पता। तो फिर राज्यमंत्रियों की दिलचस्पी का अंदाजा भी आप लगा लें। पर पीएम ने सबकी सुन ली। आखिर में पीएमओ से दो लाइन की रिलीज जारी हुई। तो कहा- 'पीएम ने राज्य मंत्रियों की क्षमता के बेहतर इस्तेमाल के तौर-तरीकों पर चर्चा की। राज्य मंत्रियों को पीएम ने शासन में प्रभावी भूमिका निभाने का अनुरोध भी किया।' पर राज्यमंत्रियों का यह दर्द कोई नया नहीं। वाजपेयी सरकार के वक्त कृषि राज्यमंत्री हुकुमदेव नारायण यादव का अपने सरकारी निवास में ही खेती करने का किस्सा आपको बता चुके। पर मनमोहन राज की कहानी के क्या कहने। पिछले टर्म में भी राज्यमंत्री इसी कदर रुसवा थे। तो मनमोहन ने कांतीलाल भूरिया से फिशरी विभाग लेकर लालूवादी तस्लीमुद्दीन को दिया था। फिर भी दर्द बढ़ता ही गया। तो मनमोहन ने नौ जून 2006 को एक चि_ïी सभी काबिना मंत्रियों को लिखी। अब उस चि_ïी का मजमून भी देख लो- 'आप सभी जानते हैं कि हमारे पास पूरे समय के लिए राज्यमंत्री हैं, जो विभिन्न विभागों के केबिनेट मंत्रियों के मातहत जुड़े हैं। लेकिन पिछले कुछ समय से मैं बहुत से मामलों में यह देख रहा हूं कि राज्यमंत्रियों को दफ्तर के कामकाज के संदर्भ में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां नहीं दी जा रहीं। जिससे हम सुशासन के लिए नीति निर्धारण में उन मंत्रियों के अनुभवों और क्षमताओं से वंचित रह जाते हैं। इन सब पृष्ठïभूमि के तहत मैं आपसे अनुरोध करता हूं कि इस पर विचार करते हुए राज्यमंत्रियों को ज्यादा से ज्यादा जिम्मेदारियां दें। ताकि हम एक तरफ सरकार की कार्य प्रणाली को मजबूत कर सकें और दूसरी तरफ अपने नेतृत्व में उन मंत्रियों की क्षमता और अनुभवों को विकसित करने में सहयोग करें। आप इस बात को मानेंगे कि इससे न सिर्फ हमारी सरकार की छवि सुधरेगी, बल्कि हमारी सरकार के कामकाज की धारणा के बारे में भी सुधार होगा।' अब पीएमओ की ताजा रिलीज और नौ जून 2006 की उस चि_ïी की तुलना करें। कोई फर्क नजर आया? पर पीएम ने अबके फिर राज्य मंत्रियों को भरोसा दिलाया। केबिनेट की अगली मीटिंग में सीनियरों से बात करूंगा। केबिनेट सैक्रेट्री को नोट तैयार करने की हिदायत दी। पर होगा क्या। यही ना, मनमोहन तारीख बदल वही चि_ïी फिर भिजवा देंगे। या जुबानी बात करेंगे। पर केबिनेट मंत्री अपना वजन क्यों घटाएंगे? यों सिर्फ सीनियरों का ही दोष नहीं। राज्यमंत्री मुस्तैद हों। तो काम करने से कोई कब तक रोक सकेगा। पर लाल बत्ती मिल जाए। तो कामकाज में रुचि कहां रह जाती। सो काबिना मंत्री जूनियर की अरुचि का फायदा क्यों न उठाएं।
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19/01/2010
Monday, January 18, 2010
'गर अमर समाजवादी, तो पूंजीवादी कौन?
इंडिया गेट से
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संतोष कुमार
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कॉमरेड ज्योति बसु की अंतिम यात्रा में मंगलवार को सोनिया, आडवाणी, गडकरी जैसे दिग्गज पहुंचेंगे। यों राजनीति की अच्छी पहल। कम से कम मृत्यु के बाद तो विरोध नहीं। जब केरल के पूर्व मुख्यमंत्री ई.एम.एस. नंबूदरीपाद का 1998 में निधन हुआ। तो रायसिना हिल में अटल बिहारी वाजपेयी उसी दिन 19 मार्च को शपथ ले रहे थे। आडवाणी पहली बार होम मिनिस्टर बने। तो वाजपेयी ने नंबूदरीपाद की अंतिम यात्रा में सरकारी नुमाइंदा भेजना चाहा। आडवाणी ने विचारधारा को किनारे रख खुद जाने की इच्छा जताई। अब वही मिसाल ज्योति दा के निधन पर। सो लग रहा, राजनीति में थोड़ा लोक-लिहाज अभी बाकी। वैसे ज्योति दा वाम राजनीति के पुरोधा रहे। सो उनकी कमी हमेशा खलेगी। भले कई राजनीतिक दलों के विचार ज्योति दा से न मिलते हों। पर अंदर खाने उनकी कार्यशैली के कायल सभी। खास तौर से बंगाल में कैडर खड़ा करने की कला। जब 2004 में वाजपेयी सत्ता से हटे। तो वर्करों की निराशा देख बीजेपी को बंगाल से सीख लेने की नसीहत दी थी। सो लोगों के दिलों में खास जगह बनाने वाले ज्योति दा को अपनी भी श्रद्धांजलि। पर श्रद्धांजलि में भी कोई राजनीतिक चालबाजी दिखाए। तो आप क्या कहेंगे? यही ना... अमर सिंह। जी हां, अपना इशारा भी समाजवाद के नए-नए पहरुआ बाबू मोशाय अमर सिंह की ओर। अमर को तो बस मौका मिलना चाहिए अपनी वाणी सुनाने का। सो ज्योति दा को श्रद्धांजलि तो दी। पर मुलायम सिंह का कुनबा भाव नहीं दे रहा। तो कांग्रेस में ठौर ढूंढ रहे। सो ब्लॉगिए अमर ने लिख दिया- 'पीएम पद ठुकराने जैसा बड़ा बलिदान 1996 में ज्योति बसु के बाद 2004 में सोनिया गांधी ने किया।' यों ये वही अमर सिंह हैं, जिन ने 18-19 मई 2004 को कसमें खाई थीं। जब बिन बुलाए अमर-मुलायम कॉमरेड हरकिशन सिंह सुरजीत के साथ दस जनपथ चले गए। पर भाव तो छोडि़ए, कांग्रेसियों ने अमर को ऐसा दुत्कारा। खाना-पानी के बजाए कड़वा घूंट पीकर लौटे। फिर आदतन मीडिया के सामने राग। अब कभी दस जनपथ नहीं जाऊंगा। पर अमर अपनी बात पर कायम रह जाएं। तो फिर काहे के अमर। यों आखिरकार मुलायम के कुनबे ने बेदखल कर दिया। मुलायम ने अमर का इस्तीफा मंजूर कर लिया। तो अब अमर सिंह का क्षत्रिय खून उबाल मार रहा। सौ-सौ जूते खाकर भी सपा में रहने की रार ठान ली। प्रेस कांफ्रेंस की। तो संजय दत्त और मुस्लिम चेहरों की फौज भी साथ लाए। ताकि मुलायम को चिढ़ा सकें। अब देश भर में क्षत्रिय सम्मेलन भी करेंगे। यों अपने जसवंत सिंह राजस्थान में यह नुस्खा अपना चुके। सो अपना तो यही कहना- जाकी रही भावना जैसी, प्रभु मूरत देखी तिन्ह तैसी। अब जरा खुद को शुरुआती कांग्रेसी कहने वाले और सोनिया के मुरीद अमर को कांग्रेस की सलामी देखिए। अपने दिग्गी राजा अर्जी डालने की सलाह दे चुके। पर अमर को जुबानी जंग में जवाब देने वाले सत्यव्रत चतुर्वेदी का अंदाज ही कुछ और। अमर को चिरकुट उन ने ही कहा था। अब कह दिया- 'जब अमर खुद को बीमार कह रहे। तो कांग्रेस में क्यों आना चाहते हैं। क्या कांग्रेस कोई सराय या नर्सिंग होम है? वाकई अमर को इलाज की जरूरत है।' यह तो रहा कांग्रेसी अंदाज। पर सही मायने में इलाज मुलायम ने कर दिया। अमर ने छह जनवरी को इस्तीफा भेजा। तो मुलायम ने सोचा, मान जाएंगे। पर अमर ब्लैकमेलिंग को उतर आए। तो शायद मुलायम का समाजवादी मन होश में आया। यों कहते हैं- बाप बड़ा ना भैया, सबसे बड़ा रुपैया। पर मुलायम ने अबके कहावत झुठला दी। अमर के साथ मुलायम परिवार की जंग में आखिर जीत परिवार की हुई। मुलायम ने भी खम ठोक दिया। कहा- 'अमर पर अब कोई बात नहीं। मैं आगे देखता हूं, पीछे नहीं।' यानी अमर को इशारा- जो जी में आए, कर लें। सो अमर तो धड़ाम से जमीन पर आ गिरे। कहां मुंबई से ही दुबई लौटने की सोची थी। अब सोमवार को सीधे दिल्ली आ गए। पर अभी भी बिना जूता खाए सपा छोडऩे को तैयार नहीं। ठीक वैसे ही, जैसे पंचों की बात सिर-माथे, पतनाला वहीं रहेगा। अब खुद को आजाद महसूस कर रहे। सो न कुछ बोलेंगे, न कुछ करेंगे। बाकायदा मुलायम को थैंक यू भी बोला। पर बौखलाहट और पैसे का जोर कहां चुप रहने देगा। सो अमर ने कुनबा-ए-मुलायम को यदुकुल कहा। मुलायम पर व्यंग्य कसने में कोर-कसर नहीं छोड़ी। अमरवाणी का दर्द-ए-निचोड़ यही। खून के रिश्ते के आगे दोस्ती हार गई। वर्कर नहीं, परिवार बड़ा हो गया। अब दोनों गुर्दे बदल गए। जख्मी सिपाही बन गया। तो योद्धा मुलायम पीछे मुड़कर जख्मी सिपाही को क्यों देखेंगे। अब अमर सिंह प्रासंगिक नहीं। सो सहानुभूति क्यों जताएंगे मुलायम। यानी अपनी हैसियत अमर को भी दिखने लगी। सो आखिर में अमर की जो टिप्पणी लिख रहा। उसे पढ़ हंसना मत। अमर ने कहा- 'अब मैं मुलायमवादी नहीं, समाजवादी बनूंगा।' आप सोचो, गर अमर जैसे लोग समाजवादी। तो पूंजीवादी और दलाली व्यवस्था के पहरुआ कौन? अमर ने सोशलिस्ट मोहन सिंह की पैसे से मदद की। तो सोचा, समाजवाद जेब में। तभी तो मोहन सिंह ने आलोचना क्या कर दी। अमर इलाज के लिए मोहन को दी मदद वापस मांगने लगे। कहा- पहले पैसे लौटाओ, फिर आलोचना करना। सो अमर का समाजवाद आप खुद ही देख लो।
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18/01/2010
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संतोष कुमार
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कॉमरेड ज्योति बसु की अंतिम यात्रा में मंगलवार को सोनिया, आडवाणी, गडकरी जैसे दिग्गज पहुंचेंगे। यों राजनीति की अच्छी पहल। कम से कम मृत्यु के बाद तो विरोध नहीं। जब केरल के पूर्व मुख्यमंत्री ई.एम.एस. नंबूदरीपाद का 1998 में निधन हुआ। तो रायसिना हिल में अटल बिहारी वाजपेयी उसी दिन 19 मार्च को शपथ ले रहे थे। आडवाणी पहली बार होम मिनिस्टर बने। तो वाजपेयी ने नंबूदरीपाद की अंतिम यात्रा में सरकारी नुमाइंदा भेजना चाहा। आडवाणी ने विचारधारा को किनारे रख खुद जाने की इच्छा जताई। अब वही मिसाल ज्योति दा के निधन पर। सो लग रहा, राजनीति में थोड़ा लोक-लिहाज अभी बाकी। वैसे ज्योति दा वाम राजनीति के पुरोधा रहे। सो उनकी कमी हमेशा खलेगी। भले कई राजनीतिक दलों के विचार ज्योति दा से न मिलते हों। पर अंदर खाने उनकी कार्यशैली के कायल सभी। खास तौर से बंगाल में कैडर खड़ा करने की कला। जब 2004 में वाजपेयी सत्ता से हटे। तो वर्करों की निराशा देख बीजेपी को बंगाल से सीख लेने की नसीहत दी थी। सो लोगों के दिलों में खास जगह बनाने वाले ज्योति दा को अपनी भी श्रद्धांजलि। पर श्रद्धांजलि में भी कोई राजनीतिक चालबाजी दिखाए। तो आप क्या कहेंगे? यही ना... अमर सिंह। जी हां, अपना इशारा भी समाजवाद के नए-नए पहरुआ बाबू मोशाय अमर सिंह की ओर। अमर को तो बस मौका मिलना चाहिए अपनी वाणी सुनाने का। सो ज्योति दा को श्रद्धांजलि तो दी। पर मुलायम सिंह का कुनबा भाव नहीं दे रहा। तो कांग्रेस में ठौर ढूंढ रहे। सो ब्लॉगिए अमर ने लिख दिया- 'पीएम पद ठुकराने जैसा बड़ा बलिदान 1996 में ज्योति बसु के बाद 2004 में सोनिया गांधी ने किया।' यों ये वही अमर सिंह हैं, जिन ने 18-19 मई 2004 को कसमें खाई थीं। जब बिन बुलाए अमर-मुलायम कॉमरेड हरकिशन सिंह सुरजीत के साथ दस जनपथ चले गए। पर भाव तो छोडि़ए, कांग्रेसियों ने अमर को ऐसा दुत्कारा। खाना-पानी के बजाए कड़वा घूंट पीकर लौटे। फिर आदतन मीडिया के सामने राग। अब कभी दस जनपथ नहीं जाऊंगा। पर अमर अपनी बात पर कायम रह जाएं। तो फिर काहे के अमर। यों आखिरकार मुलायम के कुनबे ने बेदखल कर दिया। मुलायम ने अमर का इस्तीफा मंजूर कर लिया। तो अब अमर सिंह का क्षत्रिय खून उबाल मार रहा। सौ-सौ जूते खाकर भी सपा में रहने की रार ठान ली। प्रेस कांफ्रेंस की। तो संजय दत्त और मुस्लिम चेहरों की फौज भी साथ लाए। ताकि मुलायम को चिढ़ा सकें। अब देश भर में क्षत्रिय सम्मेलन भी करेंगे। यों अपने जसवंत सिंह राजस्थान में यह नुस्खा अपना चुके। सो अपना तो यही कहना- जाकी रही भावना जैसी, प्रभु मूरत देखी तिन्ह तैसी। अब जरा खुद को शुरुआती कांग्रेसी कहने वाले और सोनिया के मुरीद अमर को कांग्रेस की सलामी देखिए। अपने दिग्गी राजा अर्जी डालने की सलाह दे चुके। पर अमर को जुबानी जंग में जवाब देने वाले सत्यव्रत चतुर्वेदी का अंदाज ही कुछ और। अमर को चिरकुट उन ने ही कहा था। अब कह दिया- 'जब अमर खुद को बीमार कह रहे। तो कांग्रेस में क्यों आना चाहते हैं। क्या कांग्रेस कोई सराय या नर्सिंग होम है? वाकई अमर को इलाज की जरूरत है।' यह तो रहा कांग्रेसी अंदाज। पर सही मायने में इलाज मुलायम ने कर दिया। अमर ने छह जनवरी को इस्तीफा भेजा। तो मुलायम ने सोचा, मान जाएंगे। पर अमर ब्लैकमेलिंग को उतर आए। तो शायद मुलायम का समाजवादी मन होश में आया। यों कहते हैं- बाप बड़ा ना भैया, सबसे बड़ा रुपैया। पर मुलायम ने अबके कहावत झुठला दी। अमर के साथ मुलायम परिवार की जंग में आखिर जीत परिवार की हुई। मुलायम ने भी खम ठोक दिया। कहा- 'अमर पर अब कोई बात नहीं। मैं आगे देखता हूं, पीछे नहीं।' यानी अमर को इशारा- जो जी में आए, कर लें। सो अमर तो धड़ाम से जमीन पर आ गिरे। कहां मुंबई से ही दुबई लौटने की सोची थी। अब सोमवार को सीधे दिल्ली आ गए। पर अभी भी बिना जूता खाए सपा छोडऩे को तैयार नहीं। ठीक वैसे ही, जैसे पंचों की बात सिर-माथे, पतनाला वहीं रहेगा। अब खुद को आजाद महसूस कर रहे। सो न कुछ बोलेंगे, न कुछ करेंगे। बाकायदा मुलायम को थैंक यू भी बोला। पर बौखलाहट और पैसे का जोर कहां चुप रहने देगा। सो अमर ने कुनबा-ए-मुलायम को यदुकुल कहा। मुलायम पर व्यंग्य कसने में कोर-कसर नहीं छोड़ी। अमरवाणी का दर्द-ए-निचोड़ यही। खून के रिश्ते के आगे दोस्ती हार गई। वर्कर नहीं, परिवार बड़ा हो गया। अब दोनों गुर्दे बदल गए। जख्मी सिपाही बन गया। तो योद्धा मुलायम पीछे मुड़कर जख्मी सिपाही को क्यों देखेंगे। अब अमर सिंह प्रासंगिक नहीं। सो सहानुभूति क्यों जताएंगे मुलायम। यानी अपनी हैसियत अमर को भी दिखने लगी। सो आखिर में अमर की जो टिप्पणी लिख रहा। उसे पढ़ हंसना मत। अमर ने कहा- 'अब मैं मुलायमवादी नहीं, समाजवादी बनूंगा।' आप सोचो, गर अमर जैसे लोग समाजवादी। तो पूंजीवादी और दलाली व्यवस्था के पहरुआ कौन? अमर ने सोशलिस्ट मोहन सिंह की पैसे से मदद की। तो सोचा, समाजवाद जेब में। तभी तो मोहन सिंह ने आलोचना क्या कर दी। अमर इलाज के लिए मोहन को दी मदद वापस मांगने लगे। कहा- पहले पैसे लौटाओ, फिर आलोचना करना। सो अमर का समाजवाद आप खुद ही देख लो।
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18/01/2010
Friday, January 15, 2010
कैलेंडर, फोटू और व्यथा राज्यमंत्री की
संतोष कुमार
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नए साल में कैलेंडरों की धूम न हो। तो नया साल नया सा नहीं लगता। पर बात किंगफिशर के कैलेंडर की नहीं। जिसकी शूटिंग पर करोड़ों खर्च होते। बंटते महज सौ-एक कॉपी। वैसे भी आम आदमी के घर किंगफिशर के कैलेंडर सज भी नहीं सकते। लोगों को मिल जाए, तो शायद घर की शोभा बढ़ाने के बजाए जलाना पसंद करेंगे। यों कैलेंडर तो सिर्फ तारीख देखने के मकसद से। पर अपने विजय माल्या पता नहीं क्या-क्या दिखाना पसंद करते। यों 'रंगीन' कैलेंडर का रंग अब राजनीति पर भी। फर्क सिर्फ इतना, विजय माल्या का अपना अंदाज। तो राजनीति में खुद को चमकाना और चापलूसी ही मकसद। अब आप खुद ही देख लीजिए। लोकसभा चुनाव में राहुल-सोनिया गांधी कांग्रेस का बीड़ा उठाए देश भर में घूम रहे थे। तो प्रियंका ने अमेठी-रायबरेली की कमान संभाली। सो अपना चौबीसों घंटों वाले भोंपू का एक कैमरा वहीं पहुंच गया। अब प्रियंका रोज-रोज नई बात तो कहेंगी नहीं। सो कभी साडिय़ों के रंग, तो कभी साडिय़ों का इंदिरा स्टाइल। बोलने-चलने का भी इंदिरा अंदाज कैमरों में खूब कैद हुआ। चैनलों पर खूब विशेष प्रोग्राम भी चले। सो एक कांग्रेसी भक्त ने बारह फोटू छांटे और नए साल का कैलेंडर बना दिया। यानी मेहनत, न दौड़-धूप, बैठे-ठाले दरबार में नंबर बढ़ाने की स्ट्रेटजी। अब नंबर कितना बढ़ा, यह तो बाद की बात। पर एक कैलेंडर ऐसा भी, जिससे सीनियर पर जूनियर खफा हो गया। यों डीएवीपी के जरिए सालाना सरकारी कैलेंडर बनता। बीते साल के अंत में ही सूचना प्रसारण मंत्री उसका विमोचन करते। अबके भी ऐसा हुआ। सरकारी कैलेंडर में मनरेगा के साथ-साथ स्वास्थ्य मिशन, शहरीकरण जैसी यूपीए की तमाम फ्लैगशिप योजनाएं फोटू सहित। यानी परंपरा के मुताबिक सरकारी कैलेंडर में सरकारी उपलब्धियों का खूब बखान। एक कैलेंडर संसद के पीठासीन अधिकारी के दफ्तर से सालाना जारी होता। एक साल राज्यसभा सचिवालय, तो दूसरे साल लोकसभा सचिवालय की ओर से। पर अबके सीपी जोशी ने अपने मंत्रालय का अलग कैलेंडर जारी कर दिया। यों पिछले साल के सरकारी कैलेंडर में बारहों महीने नरेगा को ही समर्पित थे। तो फोटुओं में मजदूरों का काम। यानी साइट फोटू ही छाए हुए थे। पर उस कैलेंडर में अपने सीपी जोशी की भूमिका नहीं थी। अलबत्ता जोशी वाला मंत्रालय तब आरजेडी के रघुवंश बाबू के जिम्मे था। सो कांग्रेस ने सिर्फ योजनाओं को जगह देने की सोची होगी। ताकि मंत्री का फोटू देख क्रेडिट लालू की पार्टी न ले जाए। पर अबके कांग्रेसी सीपी जोशी मंत्री। तो सब कुछ अपने 'हाथ' में। सो मंत्रालय का कैलेंडर छपा। तो सोनिया-मनमोहन के साथ जोशी भी छा गए। पर असली चूक कैलेंडर के सितंबर महीने वाले पन्ने में हुई। जोशी ने राष्टï्रपति के साथ अपना और दो सहयोगी राज्यमंत्रियों के फोटू डलवाए। पर जोशी के साथ तीन राज्यमंत्री। सो तीसरे मंत्री शिशिर अधिकारी का गुस्सा सातवें आसमान पर। वैसे भी अधिकारी ममता दीदी के सिपहसालार। सो आव देखा न ताव, सीपी जोशी पर भड़क उठे। कैलेंडर में मंत्रियों की फोटू पर आपत्ति जताई। दलील दी, मंत्री के बजाए विकास योजना को कैलेंडर में जगह दी जानी चाहिए थी। अब सुनते हैं, विवाद आगे न बढ़े। सो भले जनवरी बीतने को। पर दूसरा कैलेंडर छपवाने की तैयारी। अब जरा सोचिए, कैलेंडर में शिशिर अधिकारी का भी फोटू होता। तो विकास योजना वाली दलील देते? पर फोटू नहीं, तो एतराज जताने के लिए जनता से ज्यादा बड़ी ढाल और क्या। अब देखना होगा कि नए कैलेंडर में विकास होगा या फोटू। पर अधिकारी की नाराजगी सिर्फ कैलेंडर नहीं। कैलेंडर तो तात्कालिक कारण बना। मौलिक कारण तो राज्य मंत्रियों के दिल में हमेशा रहता। केबिनेट मंत्री अपने जूनियर राज्य मंत्रियों को काम नहीं देते। सो एनडीए राज हो या मनमोहन की पहली-दूसरी पारी। राज्यमंत्री कुढ़ते ही रहे। पिछले टर्म में मनमोहन ने तो बाकायदा केबिनेट मंत्रियों को चि_ïी भी लिखी थी। पर नतीजा वही ढाक के तीन पात रहा। कुछ दिन पहले शिशिर अधिकारी और कुछ राज्य मंत्रियों ने प्रणव मुखर्जी से दुखड़ा भी रोया था। पर केबिनेट मंत्री शायद रसूख दिखाने के आदी हो चुके। एक जमाना था, जब 1980 के दशक में बंसीलाल रेलमंत्री थे। तो माधवराव सिंधिया एमओएस थे। उन ने साफ हिदायत दे रखी थी। मेरे पास आने वाली फाइलें सिंधिया की नजरों से होकर आएं। पर क्या आज के वक्त में कोई केबिनेट मंत्री ऐसी दरियादिली दिखाएगा? शिवराज पाटिल के गृह मंत्री रहते उनके जूनियर सिर्फ बयान मंत्री रह गए थे। मनमोहन की दूसरी पारी में श्रीकांत जेना राज्यमंत्री बनने को तैयार नहीं थे। वजह, जेना यूएफ सरकार में केबिनेट मंत्री रह चुके। एनडीए राज में हुकुम देव नारायण यादव कृषि राज्यमंत्री थे। पर कुछ समय कृषि मंत्री रहे नीतिश कुमार ने कुछ काम नहीं दिया। तो खफा होकर अपने सरकारी निवास 19 कुश्क रोड पर फावड़ा-कुदाल लेकर काम पर जुट गए। साथ में मीडिया भी बुला लिया। इजहार-ए-दर्द का यादवी नमूना और क्या होगा। कृषि राज्यमंत्री को मंत्रालय में काम नहीं। तो निवास पर ही खेती करने लगे।
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15/01/2010
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नए साल में कैलेंडरों की धूम न हो। तो नया साल नया सा नहीं लगता। पर बात किंगफिशर के कैलेंडर की नहीं। जिसकी शूटिंग पर करोड़ों खर्च होते। बंटते महज सौ-एक कॉपी। वैसे भी आम आदमी के घर किंगफिशर के कैलेंडर सज भी नहीं सकते। लोगों को मिल जाए, तो शायद घर की शोभा बढ़ाने के बजाए जलाना पसंद करेंगे। यों कैलेंडर तो सिर्फ तारीख देखने के मकसद से। पर अपने विजय माल्या पता नहीं क्या-क्या दिखाना पसंद करते। यों 'रंगीन' कैलेंडर का रंग अब राजनीति पर भी। फर्क सिर्फ इतना, विजय माल्या का अपना अंदाज। तो राजनीति में खुद को चमकाना और चापलूसी ही मकसद। अब आप खुद ही देख लीजिए। लोकसभा चुनाव में राहुल-सोनिया गांधी कांग्रेस का बीड़ा उठाए देश भर में घूम रहे थे। तो प्रियंका ने अमेठी-रायबरेली की कमान संभाली। सो अपना चौबीसों घंटों वाले भोंपू का एक कैमरा वहीं पहुंच गया। अब प्रियंका रोज-रोज नई बात तो कहेंगी नहीं। सो कभी साडिय़ों के रंग, तो कभी साडिय़ों का इंदिरा स्टाइल। बोलने-चलने का भी इंदिरा अंदाज कैमरों में खूब कैद हुआ। चैनलों पर खूब विशेष प्रोग्राम भी चले। सो एक कांग्रेसी भक्त ने बारह फोटू छांटे और नए साल का कैलेंडर बना दिया। यानी मेहनत, न दौड़-धूप, बैठे-ठाले दरबार में नंबर बढ़ाने की स्ट्रेटजी। अब नंबर कितना बढ़ा, यह तो बाद की बात। पर एक कैलेंडर ऐसा भी, जिससे सीनियर पर जूनियर खफा हो गया। यों डीएवीपी के जरिए सालाना सरकारी कैलेंडर बनता। बीते साल के अंत में ही सूचना प्रसारण मंत्री उसका विमोचन करते। अबके भी ऐसा हुआ। सरकारी कैलेंडर में मनरेगा के साथ-साथ स्वास्थ्य मिशन, शहरीकरण जैसी यूपीए की तमाम फ्लैगशिप योजनाएं फोटू सहित। यानी परंपरा के मुताबिक सरकारी कैलेंडर में सरकारी उपलब्धियों का खूब बखान। एक कैलेंडर संसद के पीठासीन अधिकारी के दफ्तर से सालाना जारी होता। एक साल राज्यसभा सचिवालय, तो दूसरे साल लोकसभा सचिवालय की ओर से। पर अबके सीपी जोशी ने अपने मंत्रालय का अलग कैलेंडर जारी कर दिया। यों पिछले साल के सरकारी कैलेंडर में बारहों महीने नरेगा को ही समर्पित थे। तो फोटुओं में मजदूरों का काम। यानी साइट फोटू ही छाए हुए थे। पर उस कैलेंडर में अपने सीपी जोशी की भूमिका नहीं थी। अलबत्ता जोशी वाला मंत्रालय तब आरजेडी के रघुवंश बाबू के जिम्मे था। सो कांग्रेस ने सिर्फ योजनाओं को जगह देने की सोची होगी। ताकि मंत्री का फोटू देख क्रेडिट लालू की पार्टी न ले जाए। पर अबके कांग्रेसी सीपी जोशी मंत्री। तो सब कुछ अपने 'हाथ' में। सो मंत्रालय का कैलेंडर छपा। तो सोनिया-मनमोहन के साथ जोशी भी छा गए। पर असली चूक कैलेंडर के सितंबर महीने वाले पन्ने में हुई। जोशी ने राष्टï्रपति के साथ अपना और दो सहयोगी राज्यमंत्रियों के फोटू डलवाए। पर जोशी के साथ तीन राज्यमंत्री। सो तीसरे मंत्री शिशिर अधिकारी का गुस्सा सातवें आसमान पर। वैसे भी अधिकारी ममता दीदी के सिपहसालार। सो आव देखा न ताव, सीपी जोशी पर भड़क उठे। कैलेंडर में मंत्रियों की फोटू पर आपत्ति जताई। दलील दी, मंत्री के बजाए विकास योजना को कैलेंडर में जगह दी जानी चाहिए थी। अब सुनते हैं, विवाद आगे न बढ़े। सो भले जनवरी बीतने को। पर दूसरा कैलेंडर छपवाने की तैयारी। अब जरा सोचिए, कैलेंडर में शिशिर अधिकारी का भी फोटू होता। तो विकास योजना वाली दलील देते? पर फोटू नहीं, तो एतराज जताने के लिए जनता से ज्यादा बड़ी ढाल और क्या। अब देखना होगा कि नए कैलेंडर में विकास होगा या फोटू। पर अधिकारी की नाराजगी सिर्फ कैलेंडर नहीं। कैलेंडर तो तात्कालिक कारण बना। मौलिक कारण तो राज्य मंत्रियों के दिल में हमेशा रहता। केबिनेट मंत्री अपने जूनियर राज्य मंत्रियों को काम नहीं देते। सो एनडीए राज हो या मनमोहन की पहली-दूसरी पारी। राज्यमंत्री कुढ़ते ही रहे। पिछले टर्म में मनमोहन ने तो बाकायदा केबिनेट मंत्रियों को चि_ïी भी लिखी थी। पर नतीजा वही ढाक के तीन पात रहा। कुछ दिन पहले शिशिर अधिकारी और कुछ राज्य मंत्रियों ने प्रणव मुखर्जी से दुखड़ा भी रोया था। पर केबिनेट मंत्री शायद रसूख दिखाने के आदी हो चुके। एक जमाना था, जब 1980 के दशक में बंसीलाल रेलमंत्री थे। तो माधवराव सिंधिया एमओएस थे। उन ने साफ हिदायत दे रखी थी। मेरे पास आने वाली फाइलें सिंधिया की नजरों से होकर आएं। पर क्या आज के वक्त में कोई केबिनेट मंत्री ऐसी दरियादिली दिखाएगा? शिवराज पाटिल के गृह मंत्री रहते उनके जूनियर सिर्फ बयान मंत्री रह गए थे। मनमोहन की दूसरी पारी में श्रीकांत जेना राज्यमंत्री बनने को तैयार नहीं थे। वजह, जेना यूएफ सरकार में केबिनेट मंत्री रह चुके। एनडीए राज में हुकुम देव नारायण यादव कृषि राज्यमंत्री थे। पर कुछ समय कृषि मंत्री रहे नीतिश कुमार ने कुछ काम नहीं दिया। तो खफा होकर अपने सरकारी निवास 19 कुश्क रोड पर फावड़ा-कुदाल लेकर काम पर जुट गए। साथ में मीडिया भी बुला लिया। इजहार-ए-दर्द का यादवी नमूना और क्या होगा। कृषि राज्यमंत्री को मंत्रालय में काम नहीं। तो निवास पर ही खेती करने लगे।
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15/01/2010
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