Tuesday, March 2, 2010

व्हाट एन 'आइडिया' सोनिया जी!

होली में अबके महंगाई ने खूब हुल्लड़ मचाया। रंगों का त्योहार बेरंग न कहलाए। सो आम आदमी ने भी राजनीतिक पैंतरा आजमाया। सादगी की चादर ओढ़ हल्के में होली मना ली। ताकि बच्चे यह न कहें, गरीबी ने होली का रंग फीका कर दिया। पर तंगहाली को आम आदमी कब तक सादगी की चादर में ढांपेगा। राजनेता को तो देश पर राज भी करना, नेतागिरी भी। सो दोहरी जिंदगी नेताओं की फितरत में। तभी तो नेता विलासिता की जिंदगी भी जीते। दिखावे को सादगी का ढिंढोरा भी पीटते। अब आम आदमी राजनीति के पेच में इतना माहिर कहां। यों कहावत है, घूरे के दिन तो बारह साल बाद फिरते। पर अपने संविधान निर्माताओं का धन्यवाद करिए। जिन ने आम आदमी को पांच साल में दिन फिराने का हथियार दे रखा। पर लोकतंत्र के इस हथियार में भी नेताओं ने भ्रष्टïाचार का घुन घुसेड़ रखा। सो चुनावी माहौल में दारू से लेकर पैसा बंटने की खबरें आम हो जातीं। अगर नेताओं की नजर में वोट बिकाऊ न होते। तो सोचिए, पेट्रोल-डीजल की बढ़ी कीमतों पर सत्ताधारी ऐसी हेकड़ी दिखाते? बजट पास हुआ नहीं, जनता की जेब से पैसे झपटने शुरू कर दिए। क्या आम आदमी इसी बजट का इंतजार कर रहा था? माना, सरकार ने भविष्य को ध्यान में रखा। तो क्या देश के भविष्य निर्माण में आम आदमी का कोई महत्व नहीं? क्या जिनकी आमदनी महीने में पचास हजार से ऊपर, सिर्फ वही देश के भविष्य निर्माता? आप ही सोचिए, पचास हजार कमाने वालों को टेक्स में थोड़ी छूट न मिलती। वही रकम आम आदमी के फायदे में इस्तेमाल हो जाती। तो क्या देश पीछे चला जाता? क्या महंगाई टीम मनमोहन को नहीं दिख रही? आखिरकार पेट्रोल-डीजल की बढ़ी कीमत का सबसे ज्यादा असर किस पर पड़ेगा? अब ऐसा तो होगा नहीं, पेट्रोल-डीजल की कीमतें बढ़ीं। तो पीएम मनमोहन के काफिले में से एक गाड़ी कम हो जाएगी। अगर सचमुच कुछ कम होगा, तो वह आम आदमी का पेट होगा। फिर भी आम आदमी के हित में कोई सहानुभूतिपूर्ण बयान नहीं। अलबत्ता पीएम ने उडऩखटोले में से ही देश को आकाशवाणी दी। पेट्रोल-डीजल की बढ़ी कीमतें वापस नहीं होंगी। भविष्य को देखकर फैसले लिए, वैसे भी सबको खुश करना संभव नहीं। यों बीजेपी ने पीएम की आकाशवाणी को अहंकारवाणी कहा। अब बुधवार को भी विपक्ष संसद चलने देगा, ऐसी उम्मीद नहीं दिख रही। होली की थकान के बावजूद आंध्र में टीडीपी सड़कों पर उतरी। केरल में लेफ्ट का यूनियन और दिल्ली में बीजेपी। पर सिर्फ विपक्ष ही नहीं, होली से पहले यूपीए के घटक करुणानिधि और ममता अपने तेवर दिखा चुके। अब अगर ममता-करुणा को छोड़ दें। तो भी समूचे विपक्ष की एकजुटता सरकार की नाक में दम कर चुकी। पर कांग्रेस ने रार ठान ली, कम से कम विपक्ष के आगे घुटने नहीं टेकेंगे। सो प्रणव मुखर्जी बजट पेश करने के बाद कीमत वापसी पर कभी हां, कभी ना की मुद्रा में। पर सऊदी अरब से लौटते हुए पीएम ने आकाशवाणी सुनाई। तो कुछ समय के लिए कीमत वापस न लेने की गांठ और मजबूती से बांध ली। पर विपक्ष का महाजोट कांग्रेस की चूलें हिला चुका। बीजेपी ने तो कट मोशन लाने का एलान कर दिया। यानी भले महंगाई पर कामरोको प्रस्ताव के तहत बहस को सरकार राजी नहीं हुई। पर कट मोशन को कैसे टालेगी? अगर समूचा विपक्ष अड़ गया, तो सदन में वोटिंग अनिवार्य। ऐसे में मुश्किल होगी, तो सरकार के करुणा और ममता की। विपक्षी महाजोट भी कितने पानी में, यह साबित हो जाएगा। पर विपक्षी तेवर देख कांग्रेस सोचने को मजबूर। सो पीएम आकाशवाणी कर जैसे ही धरती पर उतरे। सात रेसकोर्स रोड में दरबार सज गया। कांग्रेस कोर कमेटी ने सोनिया गांधी की रहनुमाई में खूब मत्थापच्ची की। पर सिर दर्द एक हो, तो इलाज हो। मनमोहन केबिनेट के बवाली मंत्री कहिए या विदेश राज्यमंत्री। शशि थरूर फिर बयान बहादुरी की जंग में अव्वल निकले। पर कांग्रेस की कोर कमेटी थरूर के बारे में कुछ भी फैसला करे। आम आदमी को कोई सरोकार नहीं। आम आदमी तो यही पूछ रहा, महंगाई आसमान से कब जमीं पर आएगी। अब महंगाई का तो पता नहीं, पर कांग्रेस ने विपक्ष की धार भौंथरी करने की बिसात बिछा दी। अभी कीमत में कुछ कटौती की, तो क्रेडिट विपक्ष को जाएगा। पर चूल्हा-चौका अपना, तो खाना विपक्ष कैसे पकाए। सो कोर कमेटी ने तय किया, फिलहाल कीमत वापस नहीं लेंगे। इससे पीएम की बात रह जाएगी। पर बुधवार को प्रणव दादा बजट पर कांग्रेसी सांसदों से मिलेंगे। गुरुवार को कांग्रेस पार्लियामेंट्री पार्टी की मीटिंग होगी। तो सोनिया गांधी की जनहित वाणी निकलेगी। फिर कहा जाएगा, कांग्रेसी सांसदों की भावना का ध्यान रख सोनिया गांधी ने सरकार से पेट्रोल-डीजल की कीमतें घटाने की अपील की। ऐसा नहीं हुआ, तो दस जनपथ से साउथ ब्लॉक एक चि_ïी जरूर पहुंचेगी। फिर पूरा रोलबैक तो नहीं, डीजल में बड़ी कटौती कर जनमुखी चेहरा दिखाएगी। कांग्रेस में यह परंपरा कोई नई नहीं। हर बार जनहितैशी फैसले का क्रेडिट दस जनपथ को दिया जाता। देखी कांग्रेस की रणनीति। इसे कहते हैं, 'व्हाट एन आइडिया सोनिया जी।' वाकई कांग्रेस की रणनीति आम आदमी समझ जाए। तो वह आम क्यों कहलाए। साठ साल से आम आदमी को इसी सियासत ने तो खास न होने दिया।
----------
02/03/2010

Friday, February 26, 2010

जब चला काला जादू, आंख बंद, डिब्बा गायब

बंगाल काला जादू के लिए खूब मशहूर। सो अबके बजट में प्रणव दा का जादू सिर चढ़कर बोला। अब कोई बड़ा चुनाव होता। तो ऐसा जादू दादा क्या, कोई भी न दिखाता। ले-देकर बिहार के चुनाव इसी साल। जहां कांग्रेस की हालत वैसी ही, जैसे महंगाई के मारे आम आदमी की। सो जादूगर की जादूगरी देखिए। टेक्स स्लैब में बड़ा बदलाव कर शर्ट की जेब में पैसे डाले, पेंट की जेब से निकाल लिए। यों टेक्स छूट में अपने जैसों को कोई राहत नहीं मिली। अलबत्ता हायर-मिडिल क्लास की बल्ले-बल्ले। पर पलक झपकते ही पेट्रोल-डीजल की एक्साइज ड्यूटी बढ़ गई। बजट तो बाद में पारित होगा। कीमतें शुक्रवार की आधी रात से ही बढ़ गईं। सो जिनको भी राहत मिली, उन लोगों के चेहरे पर मोनालिसा सी मुस्कान। आखिर हंसे या रोए, कोई समझ नहीं पा रहा। महंगाई पर एक दिन पहले संसद में महाभारत हो। दूसरे दिन सरकार महंगाई की आग में पेट्रोल-डीजल डाल देगी, ऐसा किसी ने सपने में भी सोचा न होगा। सो विपक्ष को तो संजीवनी मिल गई। अरसे बाद पहली बार विपक्ष में ऐसी एकजुटता दिखी। जब बिना फ्लोर स्ट्रेटजी बनाए समूचा विपक्ष वाक आउट कर गया। क्या लेफ्ट, क्या लालू, क्या मुलायम। सब बीजेपी के संग हो लिए। इंदिरा राज में जैसे इमरजेंसी के खिलाफ विपक्ष एकजुट था। अबके महंगाई पर मनमोहन सरकार के खिलाफ। मुलायम सिंह ने तो यही एलान किया, इमरजेंसी जैसी जंग लड़ेंगे। पर कहीं होली के हुल्लड़ में विपक्षी तेवर हैंग ओवर न हो जाएं। वैसे हैंग ओवर उतारने के लिए संसद में होली के अगले दिन भी छुट्टी हो गई। अब विपक्ष की धार बुधवार को दिखेगी। पर प्रणव दादा ने तो पेट्रोल-डीजल के दाम बढ़ा आम आदमी को कह दिया। बुरा न मानो, होली है। अब कांग्रेस ने यों ही ऐसी जुर्रत नहीं की। अलबत्ता मौका देख कड़े फैसले लिए। सोशल सैक्टर में आवंटन बढ़ाया। ताकि चुनाव आते-आते असर दिखने लगे। फिलहाल महंगाई का शोर। तो कांग्रेसियों को मानसून का भरोसा। अपने प्रणव दा ने भाषण की शुरुआत में ही इंद्र देवता के सामने हाथ फैला दिए। बेहतर मानसून की उम्मीद जताई। कांग्रेस यही मानकर चल रही। मानसून के बाद नई फसल आएगी। तो महंगाई खुद दम तोड़ देगी। सो सोशल सैक्टर और कर्मचारी वर्ग के लिए बजट का पिटारा खुल गया। प्रणव दा ने आंकड़ों की बाजीगरी जमकर दिखाई। टेक्स में राहत दी। तो ढिंढोरा पीटा, 26,000 करोड़ राजस्व की हानि होगी। यानी कर्मचारियों पर अहसान जताने की कोशिश। पर बजट में ही खुलासा हो गया। डीजल-पेट्रोल जैसी चीजों पर अप्रत्यक्ष कर लगा सरकार 46,500 करोड़ की उगाही करेगी। यानी कुल जमा 20,500 करोड़ का मुनाफा। पर आम आदमी को क्या मिला। जिन लोगों को टेक्स में छूट मिली। उनके लिए न छूट बड़ी बात, न पेट्रोल-डीजल की बढ़ी कीमतें। जिंदगी तो मुहाल उस आम आदमी की। जो दाल-रोटी सस्ती होने की उम्मीद लगाए बैठा था। पर बदले में क्या मिला। भले पेट्रोल-डीजल से गरीब का सीधा सरोकार नहीं। पर ढुलाई के बहाने फिर कीमतों में उछाल आएगा। शहरी महिलाओं के लिए माइक्रोवेब ओवन सस्ते तो हो गए। पर सोना-चांदी थोड़ी-बहुत मात्रा में ही सही, हर महिला इस्तेमाल करती। फिर भी प्रणव दा ने फिक्र नहीं की। अलबत्ता सोना-चांदी, हीरे-जवाहरात सब महंगी कर दीं। वैसे भी सोना आम महिलाओं को तो चिढ़ा ही रहा था। अब प्रणव दा ने ऐसी कारीगरी दिखाई। सपने में भी देख आम महिला डर जाएगी। अब गांव-गरीब की बात करने वाली सरकार का भी हिसाब-किताब देखिए। राहुल बाबा दलित एजंडे पर मायावती से मोर्चा ले रहे। सो मुकुल वासनिक के मंत्रालय का बजट 80 फीसदी बढ़ गया। पर नरेगा की नब्ज देखिए। पिछले बजट में 39,000 करोड़ के करीब था। अबके 40,100 करोड़ रुपए। अपनी संसद पिछले सत्र में शिक्षा के मौलिक हक का कानून पास कर चुकी। पर पिछले बजट में 26,800 करोड़ आवंटन हुआ था। अबके नया कानून बन जाने के बाद भी आवंटन 31,036 करोड़ पर अटका। हरित क्रांति पर प्रणव दा ने खूब जोर दिया। झारखंड, उड़ीसा, छत्तीसगढ़, पूर्वी यूपी, बंगाल में क्रांति का विस्तार करेंगे। पर बजट आवंटन हुआ महज 400 करोड़। यानी ऊंट के मुंह में जीरा। आज भी देश का 58 फीसदी रोजगार कृषि से जुड़ा। पर 400 करोड़ से क्या होगा। देश में पैदावार घट रही। अंधाधुंध औद्योगिकीकरण से कृषि का रकबा घट रहा। आर्थिक समीक्षा में कृषि क्षेत्र की गिरावट स्पष्टï हो चुकी। बजट में कृषि ऋण की ब्याज दर पांच फीसदी कर दी। किसान कर्ज माफी की सीमा छह माह के लिए बढ़ा दी। फिर भी दादा का हाथ तंग दिखा। कृषि का विकास कैसे हो, इसकी कहीं फिक्र नहीं। पर खाद्य सुरक्षा बिल जल्द आएगा। अपने रुपए का निशान बनेगा। ताकि दुनिया के मनी क्लब में भारत भी शामिल हो। यूनिक आईडी कार्ड से लेकर परियोजनाओं की मॉनीटरिंग, नक्सलवाद से निपटने की भी योजना। पर बजट भाषण के सवा घंटे बाद दादा ने बजट का मजा किरकिरा कर दिया। मुरली देवड़ा की फांस सीधे अपने गले में ले ली। कुल मिलाकर बजट का निचोड़ यही। चुनाव की दीर्घकालिक रणनीति बना कांग्रेस ने कृषि और महंगाई को भगवान भरोसे छोड़ दिया।
---------
26/02/2010

Thursday, February 25, 2010

इतना विकास, बाप रे बाप!

चलो, संसद भी महंगाई से निपट ली। यूपीए के छह साल में नौवीं बार बहस हुई। तो पहली मर्तबा सांसदों में दिलचस्पी दिखी। भले कामरोको प्रस्ताव खारिज हो गया। पर अबके नियम 193 के तहत विशेष चर्चा हुई। प्रश्रकाल को स्थगित करना पड़ा। सो विपक्ष इसी से गदगद हो गया। गुरुवार को संसद ने ठाना, सातवें आसमान की महंगाई सात घंटे में निपटा देंगे। अब बहस तो निपट गई, बाकी महंगाई की तो आप ही जानें। पर राजनीति के चंगुल में फंसी महंगाई की चर्चा तो ऐसी रही- 'तुम्हारी भी जय-जय, हमारी भी जय-जय। न तुम हारे, न हम हारे।' विपक्ष ने जनता की आवाज बुलंद कर दी। तो सरकार ने भी अपने गीत सुना दिए। वैसे भी अपनी संसद यों ही गोल नहीं। नेता गोल संसद की तरह आम आदमी को गोल-मोल घुमाने में माहिर हो चुके। अब संसद भवन का डिजाइन बनाने वाले ब्रिटिश वास्तुकार हरबर्ट बेकर ने क्या सोचकर संसद गोल बनाई, पता नहीं। पर अपने नेताओं ने इसका यही निचोड़ निकाला, एक बार चुनकर लोकतंत्र के मंदिर में आ जाओ। फिर आम आदमी तो खुद-ब-खुद मंदिर की परिक्रमा करता फिरेगा। सो संसद में शरद पवार ने बहस का जवाब दिया। तो लगा, मानो शरद पवार आम आदमी से पूछ रहे- महंगाई किस चिडिय़ा का नाम? पवार ने सरकारी आंकड़े गिनाए। कुछ राज्यों की चि_िïयां सुनाईं। तो महंगाई कहीं नहीं दिखी। पवार ने एक और करिश्मा दिखाया। कल के पांच बड़े अखबारों की खबरें भी लोकसभा में सुनाईं। तो उसमें महंगाई कम होने की खबरें थीं। अब जरा अखबारों के नाम देखिए। फाइनेंशियल एक्सप्रेस, अमर उजाला, हिंदुस्तान टाइम्स, बिजनेस लाइन के नाम गिनाए। अब अमर उजाला को छोड़ दें, तो बाकी कौन से अखबार सुदूर गांव तक पहुंचते? अब देश का मंत्री अखबारी खबरों को महंगाई घटने का आधार बनाए। तो आप क्या कहेंगे। पर सरकार का आपसी विरोधाभास ही देखिए। पवार ने तमाम ऐसी दलीलें दीं। जिनमें दावा किया, महंगाई तेजी से घट रही। पर दूसरी तरफ प्रणव मुखर्जी की आर्थिक समीक्षा कुछ और कह रही। समीक्षा की मानें, तो महंगाई पर फिलहाल नियंत्रण संभव नहीं। महंगाई के लिए प्रबंधन नीति को खूब कोसा। समीक्षा में कहा गया- 'खाद्यान्न फसलों के मामले में संतोषजनक स्थिति और रबी की सुधरी हुई फसल का ध्यान नहीं रखा गया। आयातित चीनी को बाजार में लाने की देरी से अनिश्चितता पैदा हुई। सो चीनी की कीमतें चढ़ गईं।Ó यानी निशाने पर शरद पवार। पर पवार कहां मानने वाले। वह तो महंगाई को चिढ़ाते हुए आ बैल मुझे मार कह रहे। पर गोल संसद में गोलमाल यहीं खत्म नहीं होता। पवार हों या प्रणव, बहस में शामिल हुए। तो राज्यों पर ठीकरा फोडऩे में पीछे नहीं रहे। अब कोई पूछे, अगर महंगाई के लिए राज्य सरकारें जिम्मेदार। तो फिर कांग्रेसी राज्यों में महंगाई क्यों नहीं कम हो रही। अब प्रणव दा की समीक्षा ने तो पेट्रोल-डीजल के दाम बढ़ाने का भी इशारा कर दिया। यानी संसद की बहस का निचोड़ यही, राजनीतिक छींटाकशी में आम आदमी का दर्द छू-मंतर हो गया। बहस की शुरुआत विपक्ष के हमलावर तेवरों से हुई। वैसे भी बीजेपी नए नेतृत्व के साथ मुस्तैद हो चुकी। सो लोकसभा में सुषमा स्वराज ने मोर्चा खोला। तो राज्यसभा में अरुण जेतली ने समान संभाली। लखनऊ में राजनाथ सिंह ने लाठियां खाईं। पर बहस के वक्त सत्तापक्ष की बेशर्मी भी खूब दिखी। मंत्री हो या सत्तापक्ष की बैंचों पर बैठे सांसद। ठीक वैसे ही मुस्करा रहे थे, जैसे रुचिका छेड़छाड़ कांड के दोषी एसपीएस राठौर के चेहरे पर कोर्ट से बाहर आते दिखी थी। भले आम आदमी महंगाई से त्रस्त हो। पर कांग्रेसियों की ठसक ही कहेंगे कि आंकड़ों में जनता का दर्द उलझा दिया। सुषमा ने महंगाई को महाघोटाला बता ताबड़तोड़ हमले किए। सरकार की इधर का माल उधर करने की नीति पर सवाल उठाए। तो कांग्रेस की गंभीरता का अंदाजा आप इसी से लगा लें कि महंगाई पर कांग्रेस की नुमाइंदगी शिवसेना से आयातित संजय निरुपम ने की। सो निरुपम शिवसेनिक वाले अंदाज में ही दिखे। कुतर्कों से विपक्ष के आरोपों का जवाब देने की कोशिश की। पर होना तो यह चाहिए था, समूचा सदन महंगाई के खिलाफ एकजुट होकर संकल्प लेता। पर विपक्ष ने आरोप लगाए, सरकार ने जवाब दे दिया। बस महंगाई गायब हो गई। अब अगर सरकार की दलील मान भी लें। बफर स्टॉक से लेकर विपक्ष के तमाम आरोप निराधार मान लें। तो फिर सवाल वही, महंगाई क्यों बढ़ रही? यों आर्थिक समीक्षा में मंदी से उबरने का एलान। पर महंगाई अभी और मुंह फैलाएगी। सरकार अब भी मानसून पर निगाह टिकाए बैठी। नई फसल आए, और महंगाई कम हो। पर सोचो, मानसून ने फिर ठेंगा दिखाया, तो क्या होगा। पर कांग्रेस को फिक्र नहीं। फिलहाल बिहार को छोड़ कोई बड़ा चुनाव नहीं। सो आर्थिक सुधार की नई पहल होगी। विनिवेश का दायरा बढ़ेगा। ताकि खाद्य सुरक्षा बिल और शिक्षा के मौलिक हक कानून के लिए धन जुटा सके। पर देश के खजाने की खस्ता हालत खुद देख लो। कृषि विकास दर में तीन गुनी गिरावट दर्ज हुई। राजकोषीय घाया बढ़कर छह फीसदी हो गया। फिर भी सरकार ने 2010-11 में 8.75 फीसदी विकास दर का दावा किया। चार साल बाद दुनिया की सबसे तेज अर्थव्यवस्था बनने का दंभ भरा। पर यह कैसा विकास? जहां देश तो तरक्की कर रहा, पर आम आदमी फटेहाल। महंगाई ऐसे छलांग मार रही, आम आदमी की जुबां से यही आवाज निकल रही- 'बाप रे बाप, इतनी महंगाई।' बेहतर यही, शुक्रवार को प्रणव दा के बजट से ज्यादा उम्मीद करना बेमानी।
----------
25/02.2010

Wednesday, February 24, 2010

आखिर कब तक बेचारा रेलवे बिन 'चारा' दूध दे?

वाकई सचिन जैसा कोई नहीं। दोहरा शतक मार ग्वालियर में इतिहास रच दिया। कैरियर के आखिरी पड़ाव पर भी जोशीले जवानों को बता दिया। गर हो जज्बा, तो उम्र आड़े नहीं आ सकती। सचिन तेंदुलकर के रिकार्ड कभी टूटें या न टूटें, वह तो सही मायने में भविष्य के आदर्श हो गए। उधर सचिन ने युवाओं को भविष्य दिखाया। इधर ममता बनर्जी ने रेलवे के भविष्य का खाका परोस दिया। अबके ममता एक्सप्रेस विजन की पटरी पर दौड़ी। यों माल भाड़ा और यात्री किराए में बढ़ोतरी न कर सामाजिक सरोकार का संकल्प भी दोहराया। पर मुख्य फोकस रेलवे का भविष्य संवारना रहा। सो विजन-2020 का संकल्प जताया। सालाना एक हजार किलोमीटर रेल लाइन बिछाने का लक्ष्य। अगले दस साल में नेटवर्क में 25 हजार किलोमीटर इजाफे की तैयारी। काम को अंजाम देने के लिए सौ दिन के भीतर टास्क फोर्स बनेगी, जो निवेश के मामले तेजी से निपटाएगी। रेलवे का निजीकरण नहीं होगा। पर बिजनेस कम्युनिटी को निवेश का न्योता दे दिया। यों लक्ष्य तो वाकई सुहाना। पर कहीं यह सपना बनकर न रह जाए। खुद ममता ने बजट भाषण में बताया। जब देश आजाद हुआ, तो 1950 में रेल के पास 53,596 किलोमीटर की लाइन थी। अ_ïावन साल बीत गए। पर आंकड़ा कहां पहुंचा, मालूम है। अपने रेल नेटवर्क का विस्तार महज 64,015 किलोमीटर पर सिमटा हुआ। यानी 58 साल में न जाने कितने मंत्री आए-गए। पर नई लाइनें बिछीं सिर्फ 10,419 किलोमीटर। सालाना औसत देखिए। तो महज 180 किलोमीटर लाइन हर साल बिछी। ऐसा क्यों न हो। अपने देश में जितने भी रेल मंत्री आए-गए। सबने शपथ तो संविधान की ली। पर रेलवे को राजनीतिक टूल बनाकर चुनाव में इस्तेमाल किया। जिस प्रदेश का मंत्री, उस प्रदेश की तो हमेशा से मौजां ही मौजां होती रहीं। सो अबके ममता अपने बंगाल पर मेहरबान। तो कोई अचरज नहीं। पर लालू को रेलवे रिवर्स गियर में जाता दिख रहा। यों लालू भूल गए, उन ने तो रेलवे को ऐसा चूसा। जितना बिहार को भी पंद्रह साल नहीं चूस पाए होंगे। पर बात रेल मंत्री के क्षेत्र प्रेम की। तो ममता बनर्जी की कर्मभूमि पर जन्मभूमि भारी पड़ी। ममता ने सबको सौगातें दीं। पर बंगाल को कुछ ज्यादा मिला। वैसे भी मंत्री बंगाल की वजह से बनीं। सो जैसे बाकी मंत्री रेल को अपना आधार मजबूत करने का जरिया बनाते रहे। वैसा उन ने भी किया। अब जरा बंगाल को क्या मिला। आप खुद देख लें। विश्व स्तरीय स्टेशन दस एलान हुए। तो दो बंगाल के खाते में गए। मल्टीफंकशनल कॉप्लेक्स 93 में से आधा दर्जन बंगाल गए। छह बॉटलिंग प्लांट में से एक बागल गया। डबल डेकर की शुरुआत दिल्ली-कोलकाता के बीच होगी। चौवन नई ट्रेनों में 28 बंगाल के खाते में। टेगोर जयंती के नाम पर हावड़ा-बोलपुर में म्यूजियम। संगीत अकादमी, सांस्कृतिक परिसर, अनुसंधान केंद्र, डिब्बों के आधुनिकीकरण, किसानों के लिए रेफ्रीजिरेटेड कंटेनर भी बाया बंगाल। बाकी सर्वे आदि आप छोड़ दो। तो कुल मिलाकर ममता ने बंगाल चुनाव की बड़ी बिसात बिछा दी। उन ने सिर्फ रेलवे नहीं, किसान, स्वास्थ्य, शिक्षा जैसे तमाम पहलू छूकर बता दिया। अपनी रेल का यार्ड रायटर्स बिल्डिंग में ही बनेगा। ममता गठबंधन की सरकार में मंत्री ठहरीं। सो कांग्रेस की मांग को भी बजट में पूरी जगह दी। अमेठी हो या रायबरेली, कांग्रेस को ममता ने खुश कर दिया। अब रेलवे के जरिए राजनीति की बिसात बिछे। तो रेलवे का विजन कहां पूरा होगा। वाहवाही लूटने को बजट में हर साल सैकड़ों ट्रेन का एलान होता। पर कभी ट्रेनों में भीड़ कम होती दिखी? समय पर ट्रेनें स्टेशन पहुंचीं? साफ-सफाई और खान-पान तो ऐसा, मुसाफिर यही कहकर मंजिल तक पहुंच जाते। छोड़ो, एक दिन की ही तो बात है। पर बंगाल एक्सप्रेस दौड़ाकर भी ममता रेलवे के कायापलट का दावा कर रहीं। बांग्ला में एक विचार रखा- 'नहीं नहीं भय, होबे होबे जय। खुले जाबे एई द्वार।' यानी डरो नहीं, तो जीत अवश्य मिलेगी। रास्ते अपने आप खुल जाएंगे। पर कब तक रेलवे बिना 'चारा' दूध देगा। नेताओं ने रेलवे को दुधारू गाय बना खूब दुहा। पर विकास धेला न हुआ। सो अब धड़ाधड़ दुर्घटनाएं हो रहीं और मुसाफिर को मंजिल तक पहुंचाने वाली ट्रेन मुसाफिरों का ही खून पी रही। लालू ने सरप्लस दिखाने के चक्कर में रेल को निचोड़ दिया। सो मुसीबत ममता के बजट में साफ दिख रही। योजनाओं का एलान तो खूब हुआ। पर धन कहां से आएगा, किसी को मालूम नहीं। अब आप ही सोचो, रेलवे का विजन-2020 कैसे पूरा होगा। आजादी के 58 साल बाद रेलवे का नेटवर्क रेंगता दिखा। बजट में ममता ने भारत-चीन युद्ध के बाद निराशा से उबरने के लिए नेहरू के अनुरोध पर लगा मंगेशकर का गाया गीत... जरा याद करो कुर्बानी... गाया। तो चीन की रेलवे का इतिहास बता दें। अपनी आजादी के वक्त भारत की तुलना में चीन के पास एक चौथाई रेल लाइनें भी नहीं थीं। चीन की राजधानी बीजिंग से गूंगजाऊ की 1100 किलोमीटर की दूरी तय करने में तीन से चार दिन लग जाते थे। पर आज हर रोज चीनी यात्री महज तीन घंटे में यह यात्रा पूरी कर रहे। वर्ष 2012 तक चीन में रेल लाइनों की लंबाई 79,900 किलोमीटर से बढ़कर 1,10,000 किलोमीटर पहुंच जाएगी। भारत में कैसी हालत, खुद ममता ने बजट में बता दिया। सो कब तक यों ही रेलवे को नेतागण राजनीति की दुधारू गाय बना दुहेंगे? मुसाफिरों की जिंदगी मुश्किल में डालेंगे?
----------
24/02/2010

Tuesday, February 23, 2010

क्या जब जले बस, बरपे हंगामा तभी होगी बहस?

वैसे तो नियम-कायदे ताक पर रखने में अपने नेताओं का कोई सानी नहीं। कायदे बनते बाद में, उसके नुक्स पहले ही निकाल लेते। पता नहीं अपने ही बनाए कायदे कब गले आ पड़ें। सो खतरे के वक्त नुक्स आपातकालीन दरवाजे की तरह काम आते। फिर भी मुसीबत का फंदा कस जाए। तो अपनी संसद, अपनी सरकार। सो खूबसूरत फिल्म का गाना अपनी राजनीति पर मौजूं। फिल्म में सास के अत्याचार के खिलाफ रेखा-अशोक कुमार आदि यह गाना गाते हैं- 'सारे नियम तोड़ दो, नियम पर चलना छोड़ दो। इंकलाब जिंदाबाद।' जब चौदहवीं लोकसभा में लाभ के पद का मामला सुर्खियां बना। जया बच्चन की बर्खास्तगी से लगी आग की आंच सोनिया गांधी तक पहुंची। तो कांग्रेसियों को लगा, प्रलय आ गई। सो सोनिया ने सांसदी छोड़ नैतिकता का ढोल पीटा। दो सत्र के गैप में ही दुबारा चुनकर लोकसभा लौट आईं। इधर मनमोहन ने भी रेवड़ी तैयार कर लीं। सो पलक झपकते ही लाभ के पद का बिल पास हो गया। जिन-जिन पदों में लाभ की गुंजाइश दिखी, सारे पद कानून से राहत पा गए। तभी तो सोमनाथ चटर्जी को भी सांसदी नहीं छोडऩी पड़ी। सरकार ने विपक्ष से भी लाभ के पद की लिस्ट मांग ली। पर विपक्ष ने नैतिकता दिखा लिस्ट नहीं दी। तबके राष्टï्रपति कलाम ने बिल को देश के लिए एक समान न बता संसद को वापस लौटा दिया। तो कांग्रेसियों को शर्म नहीं आई। अलबत्ता कलाम को ही चुनौती देने लगे। अगले सत्र में वही बिल जस का तस फिर भेज दिया। पर भला हो भैरोंसिंह शेखावत का। जिन ने बीच-बचाव कर देश को संवैधानिक संकट से बचा लिया। कलाम और सरकार के बीच शेखावत ने नया रास्ता निकाला। इधर संसद ने लाभ के पद पर सुधार के लिए जेपीसी गठित की। उधर कलाम ने बिल को मंजूरी दे दी। यानी जब बात नेताओं के अपने फायदे की हो। तो कायदा-कानून गया भाड़ में। अब महंगाई पर बहस की बात हुई। तो नेताओं ने आम आदमी के हित की चिंता को नियम-कायदे के पेच में उलझा दिया। वैसे भी आम आदमी का पेट कोई नेशनल एडवाइजरी काउंसिल का दफ्तर नहीं। जो सरकार आनन-फानन में उपाय ढूंढ ले। याद है ना, सोनिया इसी एनएसी की मुखिया थीं। लाभ के पद विवाद में यही पद छोडऩा पड़ा था। अब एनएसी समेत कई ऐसे पद, जिन पर बैठ सांसद दोहरा लाभ उठा सकते। आखिर सांसद कोई ऐरा-गैरा तो होता नहीं। लाखों की जनता ने आंखों का नूर बना सिर पर बिठाया। सो बोझ उठाना उसी जनता की मजबूरी। नेताओं का क्या, वह तो सरकारी आवास में सरकारी भोजन का लुत्फ उठा सरकारी खर्चे पर ही सैर-सपाटा कर रहे। यानी नेताओं के लिए महंगाई तो जाके पैर न फटी बिवाई, सो का जाने पीर पराई वाली कहावत जैसी। सो पहले दिन ही संसद पर भारी पड़ी महंगाई। अब तो ऐसी रार ठन चुकी। रेल बजट, आम बजट को छोड़ बाकी दिन शायद हंगामे में ही गुजरें। विपक्ष को सिर्फ कामरोको प्रस्ताव के तहत बहस चाहिए। तो सरकार में इतना बूता नहीं, जो महंगाई पर वोटिंग का जोखिम उठा ले। महंगाई पर वाकई पहली बार विपक्ष की ऐसी एकजुटता दिखी। जब वैचारिक मतभेद भुला लेफ्ट-बीजेपी-सपा-बसपा-आरजेडी सुर में सुर मिला रहे। अंदरखाने सत्तापक्ष के दो बड़े घटक ममता और करुणानिधि भी महंगाई पर त्यौरियां चढ़ा चुके। सो सरकार को डर, कहीं वोटिंग में विपक्ष से हारे। तो जनता को क्या मुंह दिखाएंगे। महंगाई ऐसी विकराल, हारने पर इस्तीफे का नैतिक दबाव बढ़ जाएगा। सो संसदीय कार्यमंत्री पी.के. बंसल से लेकर खुद प्रणव दा तक। साफ कर दिया, सदन के नियम सांसदों ने ही बनाए। सो नियम से ही काम होगा। बंसल की दलील, कामरोको प्रस्ताव हाल के गंभीर विषयों पर लाए जाते। महंगाई तो लंबे समय से चली आ रही। सो सामान्य चर्चा ही होगी। वाकई यूपीए के पहले टर्म में सात बार, दूसरे टर्म में एक बार महंगाई पर बहस हो चुकी। पर महंगाई नहीं रुकी। विपक्ष की नई नेता सुषमा स्वराज ने सदन में परिचय के बाद यही दलील दी। तो सरकार नियमों में महंगाई को बांधने की कोशिश कर रही। कौन नहीं जानता, जब नियम 193 के तहत चर्चा होती। तो सदन में कोरम के भी लाले पड़ जाते। अगर कामरोको प्रस्ताव में चर्चा होती। तो समूची मीडिया और देश की निगाहें टिक जातीं। नियमों के फेर में गंभीरता का पुट होता। पर कांग्रेसी और सरकार उल्टा चोर कोतलाव को डांटे की मुद्रा में। विपक्ष को हंगामाई साबित करने में जुटी। महंगाई को सामान्य मुद्दा बता रही। सो गुरुदास दासगुप्त ने सवाल पूछा। क्या कामरोको प्रस्ताव लाने के लिए बसें जलानी पड़ेंगी? वाकई अपनी सरकार शायद हिंसा की भाषा ही समझती। क्या महंगाई पर संसद में बहस के लिए दासगुप्त का ही फार्मूला अपनाना पड़ेगा? नक्सलवादी जब हिंसा का तांडव मचा रहे। तो सरकार बातचीत को तैयार हो रही। पर जब नक्सलबाड़ी में असमानता से नक्सलवाद का बीज पनपा। तब सरकार खामोश बैठी रही। यों नक्सली जो कर रहे, लोकतंत्र में जायज नहीं। पर महंगाई का हाल भी कुछ वैसा ही। देश के तेरह अमीर मंदी के दौर में अपनी संपत्ति ढाई गुनी कर गए। पर बीस रुपए दिहाड़ी पर जिंदगी जीने वाली 77 फीसदी आबादी महंगाई के बोझ तले पिस गई। तो क्या संसद या सरकार महंगाई से पिसी आम जनता की फिक्र तभी करेगी। जब सड़कों पर बसें जलेंगी, चौतरफा हंगामा बरपेगा? क्या सड़कों पर हिंसा ही कामरोको प्रस्ताव का आधार? क्या पेट की आग अपनी संसद और सरकार के लिए गंभीर मुद्दा नहीं? ----------
23/02/2010

Monday, February 22, 2010

तो क्या हारेगा संसद और जीतेगी महंगाई?

 संतोष कुमार
-----------
   जन, गण, मन और महामहिम के अभिभाषण से नए साल का पहला सत्र शुरू हो गया। अभिभाषण भले राष्टï्रपति के नाम से होता। पर सही मायने में यह केबिनेट का ही दस्तावेज। सो अभिभाषण को लेकर वही पुराना राग। सत्ताधारी दल सरकार की वाहवाही कर रहे। तो विपक्षी दल नाम के अनुरूप। बीजेपी में किसी ने सरकारी इश्तिहार कहा। तो किसी ने पुरानी बोतल में पुरानी शराब। पर कांग्रेस ने उपलब्धियों और भविष्य की सोच का दस्तावेज बताया। अब भविष्य का दस्तावेज आम आदमी को हड़काने वाला हो। तो फिर यह दस्तावेज कांग्रेस को ही मुबारक। आखिर महंगाई पर कितने बहाने बनाएगी सरकार। कभी बीजिंग ओलंपिक, कभी महामंदी, कभी एनडीए राज पर दोषारोपण, तो कभी आम आदमी के खाने की आदत में बदलाव बहाने बने। मौसम की तो पूछो ही मत। जब-जब मौसम बदला, शरद पवार ने सुर्रा छोड़ महंगाई बढ़वा दी। जो चीज महंगी न होनी थी, पवार के बयान से रातों-रात महंगी हो गई। महंगाई के हर आंकड़े के साथ सरकार ने अपने माथे की लकीरें भी दिखाईं। पर महंगाई न रुकनी थी, न रुकी। दस दिन में महंगाई रोकने के दावे तो कबके फुस्स हो गए। अब दो महीने का वक्त लिया। तो वक्त से पहले नया बहाना ढूंढ लिया। राष्टï्रपति अभिभाषण में सरकार की दलील वाकई शर्मनाक। जरा और भी गौर फरमाइए। सरकार ने किसानों को उपज मूल्य ज्यादा दिया। इसलिए महंगाई बढ़ी। सरकार ने सोशल सैक्टर में ज्यादा धन लगाया। इसलिए महंगाई बढ़ी। सरकार ने नरेगा जैसी योजनाओं में लोगों को काम दिया। सो सौ रुपए से कम दिहाड़ी पाने वाले ज्यादा अमीर हो गए। क्रय शक्ति अचानक बढ़ गई। सो मांग बढ़ी, आपूर्ति घट गई। अब सरकार की इस दलील को क्या कहेंगे आप। अपनी नजर में यही, सरकार आम आदमी को अब सिर्फ चिढ़ा ही नहीं रही। अलबत्ता अहसानफरामोश भी बता रही। अभिभाषण में कहा- 'महंगाई सर्वांगीण विकास की स्कीमों में कार्यान्वयन की झलक है।' दलील ऐसी, मानो आम आदमी की गैरत को दुत्कारते हुए यही कह रही- 'तुम्हें इतना कुछ दिया। आमदनी बढ़ा दी, विकास दर बढ़ा दी, फिर भी थोड़ी सी महंगाई बर्दाश्त नहीं कर पा रहे। शर्म आनी चाहिए।'  अब सरकार आम आदमी के हित में ऐसी दलील दे। तो संसद में बहसबाजी बेमायने ही समझो। यानी सरकार भी अपनी मजबूरी समझ चुकी। सो विपक्ष के तीखे तेवर देख सहम गई। बीजेपी सबसे पहले महंगाई पर बहस चाहती। ताकि इंदौर से जो संकल्प लेकर लौटी, उसे पूरा कर सके। सो बीजेपी ने ठान लिया। बहस होगी, तो कामरोको प्रस्ताव के तहत। कामरोको प्रस्ताव के तहत आखिर में वोटिंग का प्रावधान। सो सरकार को डर, महंगाई पर विपक्ष के साथ कुछ घटक दलों ने भी जुगलबंदी कर ली। तो भरी संसद में मुंह काला होगा, इस्तीफे का नैतिक दबाव भी। वैसे भी विपक्ष की बदली सूरत और सीरत सरकार की नींद उड़ा चुकीं। बीजेपी की कमान अब पूरी तरह से युवा नेतृत्व के हाथ। सो युवा अब बड़ी जिम्मेदारी और बड़े ओहदे के साथ भविष्य की लड़ाई लड़ेंगे। आडवाणी तो युवा खासतौर से नितिन गडकरी के इतने मुरीद हो चुके। इंदौर में मंच पर तारीफ कर नहीं थके। सो अब सोमवार को ब्लॉग पर गडकरीनामा लिख दिया। मंगलवार को पहली बार गडकरी संसदीय दल की मीटिंग में शिरकत करेंगे। तो वहां भी इंदौर जैसा जोश भरने की कोशिश होगी। यानी कुल मिलाकर महंगाई से ज्यादा विपक्ष की बदली सूरत-सीरत सरकार को चौकन्नी कर रही। तभी तो दिखाने को परंपरा तोड़ धन्यवाद प्रस्ताव से पहले सरकार बहस को राजी हो गई। पर कोमरोको प्रस्ताव का जोखिम उठाने से कतरा रही। यों महंगाई इतनी बेलगाम हो चुकी। कामरोको आए या दामरोको, आम आदमी को राहत मिलती नहीं दिख रही। वैसे भी पिछले कुछ सालों से संसद के हर सत्र में महंगाई पर चर्चा धार्मिक अनुष्ठïान बन चुकी। सत्र से पहले राजनीतिक दल महंगाई पर कुर्ता फाड़ते। पर सदन में बहस होती, तो महज मु_ïीभर सांसद हाजिरी बजाने को रह जाते। सो सरकार भी आनन-फानन में बहस पूरी करा लेती। पर विपक्ष अबके खम ठोककर यही कह रहा। अगर 21 अप्रैल से पहले महंगाई पर नकेल न कसी। तो मनमोहन को गद्दी से उतार कर ही दम लेंगे। अब बीजेपी जनता में खोया अपना भरोसा कितना लौटा पाई। यह तो 21 अप्रैल को ही दिखेगा, जब महंगाई के खिलाफ संसद पर हल्ला बोल होगा। पर अब तो मनमोहन सरकार के सहयोगी ही नहीं, कांग्रेसी भी महंगाई को बला मान रहे। सोमवार को मीडिया ने संसद के अहाते में कुछ नेताओं से सवाल पूछे। क्या देश को महंगाई मंत्री चाहिए? तो विपक्ष का जवाब छोडि़ए। कांग्रेसी लालसिंह हों या जगदंबिका पाल या मंत्री सलमान खुर्शीद। जवाब का अंदाज अलग, पर मान लिया, महंगाई बड़ी बलवान। पर अपनी सरकार तो कबकी हार मान चुकी। अभिभाषण की दलीलें भी यही साफ कर रहीं, महंगाई काबू से बाहर जा चुकी। अब एकमात्र उम्मीद देश की संसद से। पर अपनी संसद सत्ता की कटपुतली हो चुकी। सो मंगलवार को महंगाई और अपनी संसद के बीच महामुकाबला होगा। तो उम्मीद यही, जीतेगी महंगाई, हारेगा संसद। अब ऐसा हुआ, तो संसद से भी राहत की उम्मीद खो चुका आम आदमी क्या स्वर्ग की बाट जोहेगा? गौरव दिखाने को संसद में जन, गण, मन तो हुआ। पर आम आदमी का जन, गण, मन कब? क्या आम आदमी स्वर्ग से ही राहत की उम्मीद करे?
----------
22/02/2010

Friday, February 12, 2010

तो सवाल, बीजेपी को जनता ने हराया या ईवीएम ने?

 संतोष कुमार
-----------
       क्या वाकई अपना लोकतंत्र जोखिम में है? क्या दो टर्म से मनमोहन की सरकार सचमुच जनता ने नहीं चुनी? आप मानें या न मानें, पर देश की प्रमुख विपक्षी पार्टी यही मान रही। भले शब्दों को घुमाफिरा कर सवाल उठा रही। पर निचोड़ यही- ईवीएम में बड़ा गड़बड़झाला। इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन से छेड़छाड़ संभव बता बीजेपी वापस बैलट की पैरवी कर रही। अब आगे बढऩे से पहले थोड़ा विवाद की शुरुआत देख लीजिए। मौजूदा लोकसभा चुनाव नतीजों के बाद सवाल उठे। दिल्ली के पूर्व चीफ सैक्रेट्री उमेश सहगल ने सुर्रा छोड़ा। तो बीजेपी ने फौरन कैच कर लिया। आडवाणी ने सवाल उठाए। तो यहीं पर हमने भी सवाल का स्वागत किया। तब चुनाव आयोग से यही उम्मीद भी जताई थी कि अगर विपक्ष को एतराज है। तो परीक्षण होने दे। ऐसा हुआ भी, चुनाव आयोग ने तीन दिन की खुली चुनौती दी। पर ईवीएम को झुठलाने वाला कोई शख्स नहीं पहुंचा। अभी 25 जनवरी को जब चुनाव आयोग ने अपनी हीरक जयंती मनाई। तो आडवाणी ने फिर सवाल उठाए। पर कहीं बहस शुरू नहीं हुई। सो अब बीजेपी वर्किंग कमेटी के मेंबर और मशहूर सैफोलॉजिस्ट जीवीएल नरसिम्हा राव ने किताब लिख दी। किताब का नाम 'डैमोक्रेसी एट रिस्क!' रखा। जिसकी प्रस्तावना खुद आडवाणी ने लिखी। शुक्रवार को नितिन गडकरी ने लोकार्पण किया। तो मौके पर तीन-तीन विदेशी एक्सपर्ट ईवीएम झुठलाने को बुलाए गए थे। जर्मनी, नीदरलैंड और यूएसए के एक्सपर्टों का लब्बोलुवाब यही रहा। ईवीएम के साथ पेपर बैकअप भी हो। पर बीजेपी की असली पोल तो समारोह के अहम गैस्ट पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त जीवीजी कृष्णमूर्ति ने खोलकर रख दी। उन ने बीजेपी की बैलट सिस्टम वाली मांग पर कुछ नहीं कहा। अलबत्ता बीजेपी को उम्दा सुझाव दे गए। अब बीजेपी कितना अमल करेगी, यह तो मालूम नहीं। पर शायद आप-हम कृष्णमूर्ति की राय से सहमत होंगे। उन ने जो कहा, उसका लब्बोलुवाब यही- 'ईवीएम की क्वालिटी इंप्रूव होनी चाहिए। यह आरोप लगाना सही नहीं होगा कि कांग्रेस शासित राज्यों में ही ईवीएम का दुरुपयोग हो रहा। बीजेपी शासित राज्यों में भी दुरुपयोग संभव। सो बेहतर यही होगा, आरोप-प्रत्यारोप के बजाए ईवीएम की क्वालिटी इंप्रूव करने के लिए सभी पार्टियों की कमेटी बने और फिर व्यापक चर्चा हो।' पर बीजेपी नेता ने तो किताब में दुनिया भर से खूब तथ्य जुटाए। कैसे जर्मनी की फैडरल कोर्ट ने ईवीएम के इस्तेमाल को असंवैधानिक बताया। कैसे दुनिया भर के बड़े अखबारों में इस बाबत लेख छपे। यानी अब अदालती लड़ाई में बीजेपी के राव तमाम तथ्य परोसेंगे। पर सवाल, बीजेपी हो या सैफोलॉजिस्ट जीवीएल नरसिम्हा राव। अबके आखिर ऐसा क्या हो गया, जो ईवीएम पर एतबार नहीं। अपना मानना तो यही, यह वक्त का दोष। जब नरसिम्हा राव महज सैफोलॉजिस्ट थे। तो अरुण जेतली ने इन्हीं के आंकड़ों से कर्नाटक, बिहार आदि चुनावों में जीत की बिसात बिछाई थी। पर नागपुर अधिवेशन में जैसे ही उन्हें वर्किंग कमेटी मेंबर बनाया गया। उसके बाद के सारे अनुमान फेल होते गए। अब राव अपनी गलती तो स्वीकारेंगे नहीं। सो बेजुबान मशीन पर ही हमला बोल दिया। यही हाल बीजेपी का। याद है ना, 2004 में ऐसा फील गुड था। कांग्रेस तक को यही उम्मीद थी, एनडीए ही सत्ता में लौटेगा। बीजेपी में तो तब कई सूरमा नए सिरे से मंत्रालय का विभाग भी तय कर चुके थे। पर जब 13 मई 2004 को नतीजे आए। तो वही आसमान से गिरे, खजूर पर अटके वाली कहावत हो गई। पर तब ईवीएम में खोट नजर नहीं आया। आखिर आता भी कैसे। खुद एनडीए ने देश भर में ईवीएम को हरी झंडी दी। ईवीएम का प्रयोग 1982 में केरल की परुर विधानसभा के 50 बूथों पर हुआ। फिर 1989-90 में मध्य प्रदेश, राजस्थान की पांच-पांच और दिल्ली की छह सीटों में। पर 2002 से पूरे देश में अनिवार्य। तब मौजूदा सवाल उठाने वाले सत्तानशीं थे। अब बीजेपी में 2004 वाली स्थिति 2009 में भी रही। बीजेपी को लंगड़ी लोकसभा की उम्मीद थी। खुद सबसे बड़ी पार्टी बनने का अनुमान था। यूपीए के बिखराव को मनमोहन की विदाई माने बैठी थी। बीजेपी के रणनीतिकार आंध्र, तमिलनाडु और उड़ीसा की स्थानीय राजनीति का गुणा-भाग कर बहुमत का कागजी आंकड़ा बना चुके थे। पर पूरी ताकत लगाने के बाद भी सत्ता नसीब नहीं हुई। तो लोकतंत्र में कोई भी पार्टी सीधे जनता पर दोष कैसे मढ़े। सो नया टोटका निकला। जनता ने नहीं, ईवीएम ने हराया। यानी जनता का भरोसा जीतने की कोशिश नहीं की। पर लगातार हार की झेंप मिटाने के लिए लोकतंत्र को जोखिम में बता रही। पर बीजेपी भूल गई, 2004 से 2009 के बीच सिवा आपसी खींचतान के पार्टी ने ऐसा कुछ नहीं किया, जो जनता का भरोसा लौट सके। अगर ईवीएम का दुरुपयोग मान भी लें। तो फिर गुजरात, हिमाचल, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, कर्नाटक, उत्तराखंड, बिहार, पंजाब जैसे राज्यों में बीजेपी-एनडीए कैसे जीती? गुजरात में मोदी की हैट्रिक क्या मशीनी छेड़छाड़ से हुई? बिहार में तो लालू-राबड़ी राज तब खत्म हुआ, जब लालू केंद्र में पॉवरफुल थे। तब लालू ने कपार्ट के महानिदेशक सप्तर्षि की चि_ïी आगे कर चुनाव आयोग को कटघरे में खड़ा किया था। पर बीजेपी ने आयोग का बचाव किया। अब बीजेपी हाथ पीछे से घुमाकर वही कान पकड़ रही, जो लालू ने पकड़ा था। बेहतर तो यही होता, बीजेपी फिर जनता का भरोसा हासिल करने में जुटती। ईवीएम से नुकसान होता, तो बीजेपी आंकड़ों में इतनी मजबूत विपक्ष न होती।
---------
12/02/2010