Friday, January 21, 2011

‘जिम्मेदारी’ तो नहीं, नेता सिर्फ ‘जिमदारी’ समझते

इसे कहते हैं, अब आया ऊंट पहाड़ के नीचे। टू-जी स्पेक्ट्रम घोटाले में कैग की रपट को कपिल सिब्बल जमकर कोस रहे थे। कैग के खिलाफ सिब्बल की चार्जशीट कांग्रेस को भी भा गई थी। सो संगठन और सरकार की जुगलबंदी कैग को झुठलाने में जुटी रहीं। पर शुक्र है, शुक्रवार को सिब्बल की शामत आ गई। सुप्रीम कोर्ट ने सिब्बल को कड़ी फटकार लगाई। तो संसद की पीएसी ने भी सवाल उठाए। बीजेपी को हमलावर होने का फिर मौका मिल गया। तो कांग्रेस की बोलती बंद हो गई। सिब्बल की तो सिट्टी-पिट्टी गुम। सो दिन भर सुप्रीम कोर्ट और पीएसी की नसीहत पर मंथन करने के बाद मीडिया से मुखातिब हुए। तो आवाज से हेकड़ी नदारद थी। बोले- हमने अपनी बात जनता के सामने रखी थी। किसी भी संवैधानिक संस्था का निरादर नहीं किया, न किसी के काम में दखल दिया। बतौर टेलीकॉम मंत्री मुझे मेरी जिम्मेदारी का अहसास। मुझे वकील की जिम्मेदारी भी पता। सो मैं संस्था के निरादर की बात सोच भी नहीं सकता। सिब्बल वाणी सुन एक और कहावत याद आई। चौबेजी चले थे छब्बे बनने, दुबे बनकर लौट आए। पर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी में वही आशंका, जो सिब्बल की सात जनवरी की प्रेस कांफ्रेंस के बाद हमने भी जताई थी। जस्टिस जे.एस. सिंघवी और ए.के. गांगुली की बैंच ने सिब्बल की टिप्पणी पर कहा- यह दुर्भाग्यपूर्ण है। मंत्री को जिम्मेदारी का कुछ अहसास होना चाहिए। ताकि उनके बयानों से जांच पर कोई फर्क न पड़े। बैंच ने बाकायदा सीबीआई को हिदायत दी- किसी के भी बयानों से प्रभावित हुए बिना घोटाले की जांच करे। अब कोर्ट सीबीआई को भले लाख हिदायत दे, पर सीबीआई तो सरकार का जिन्न। आका जो हुक्म देता, उसे हर कीमत पर पूरा करता। सो सीबीआई की बात तो होती रहेगी। फिलहाल बात सिब्बल की। जिन ने बतौर टेलीकॉम मंत्री समूचे घोटाले पर परदा डालने की कोशिश की। जब सिब्बल ने सात जनवरी को कैग रपट को झुठलाया, तो मंत्री कम वकील अधिक दिखे। स्पेक्ट्रम घोटाले के आंकड़े पर भारी-भरकम प्रजेंटेशन के साथ खूब दलीलें दीं। और आखिर में जनता को समझाने की कोशिश की, स्पेक्ट्रम घोटाला हुआ ही नहीं। तब सिब्बल सुप्रीम कोर्ट की कई तल्ख टिप्पणियों को नजरअंदाज कर चुके थे। कोर्ट ने एक बार कहा था- इस घोटाले में जितना दिख रहा, मामला उससे कहीं आगे है। पर पेशे से वकील सिब्बल ने कह दिया- जितना कहा जा रहा, उससे कई गुना कम क्या, कुछ नजर ही नहीं आ रहा। सचमुच सिब्बल ने आंकड़ों का ऐसा जाल बुना था, घोटालों को एक नील 76 खरब के बजाए, सीधा निल (शून्य) बता दिया। सो सिब्बल के अनाड़ीपन पर अब पीएसी के अध्यक्ष मुरली मनोहर जोशी ने स्पीकर को चिट्ठी लिख दी। मीरा कुमार को लिखी चिट्ठी में उन ने कई गंभीर सवाल उठाए। क्या संसद में रपट पेश हो जाने के बाद विभागीय मंत्री को टिप्पणी करने का हक है? जबकि मंत्रालय को अपना पक्ष रखने के लिए पूरा वक्त दिया गया। क्या कैग के खिलाफ बयान देने से पहले सिब्बल ने पीएम के संज्ञान में या अनुमति ली थी? अगर इसका जवाब हां है, तो सुप्रीम कोर्ट की निगरानी वाली सीबीआई जांच, पीएसी और कैग का कोई मतलब नहीं। इससे लोकतंत्र पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा। जोशी ने स्पीकर से अनुरोध किया कि मंत्रियों को ऐसी बयानबाजी से रोका जाए। वरना मंत्री और संवैधानिक संस्थाओं में टकराव पैदा हो सकता है। पर क्या इतनी फजीहत के बाद सिब्बल, सरकार और कांग्रेस जिम्मेदारी समझेंगे? सुप्रीम कोर्ट ने जिम्मेदारी की बात की। पर बिहार के कुछ गांवों में जिमदारी शब्द का प्रचलन। जिसका मतलब बपौती से। सो सरकार अपनी जिम्मेदारी क्या समझेगी, यह तो वही जाने। पर इसमें कोई शक नहीं, सत्ता को नेतागण अपनी जिमदारी (बपौती) ही समझते। सो सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी के बाद सरकार को शर्मिंदगी महसूस हो रही होगी, ऐसा नहीं लगता। जब सुप्रीम कोर्ट ने सीधे पीएम और पीएमओ पर सवाल उठाए। अल्टीमेटम देकर पीएमओ से हलफनामा लिया। सरकार और कांग्रेस को तब शर्म नहीं आई, तो भला अब कैसी उम्मीद? संसदीय इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ, जब कोर्ट ने सीधे पीएम पर टिप्पणी की। पर समूची कांग्रेस पीएम के बचाव में उतरी। राहुल गांधी ने पीएम से मुलाकात कर यहां तक कह दिया- कोर्ट की टिप्पणी से शर्मिंदगी वाली कोई बात नहीं। सो मौजूदा सरकार को तो जूते और प्याज खाने की आदत हो चुकी। वैसे भी कोर्ट की कितनी परवाह, यह तो ब्लैकमनी के मामले में भी साफ। स्पेक्ट्रम घोटाले में कोर्ट सख्त न होता, तो सरकार बैक फुट पर न होती। समझौतों की दलील देकर काले धन के चोरों का नाम लेने से परहेज। पर अबू सलेम के मामले में भी तो समझौता। तो क्या न्यायपालिका भी कार्यपालिका के समझौते के दायरे में होंगी? ट्रायल कोर्ट ने तो शुरुआत में ही कह दिया था- कोर्ट अपना काम करेगा, सरकार के समझौते से मतलब नहीं। अब शुक्रवार को सिब्बल पर कोर्ट की फटकार से कांग्रेस को सांप सूंघ गया। तो अभिषेक मनु सिंघवी बोले- मामला कोर्ट में, सो टिप्पणी नहीं करेंगे। फिर सवालों की बौछार हुई। तो बोले- मंत्री से पूछिए। पर क्या कांग्रेस अपना कहा भूल गई? आठ जनवरी को इसी मंच से कांग्रेस ने कैग को खरी-खरी सुना सिब्बल की सराहना की थी। पर अब भ्रष्टाचार से लडऩे का महज संदेश देने में जुटे मनमोहन। शुक्रवार को इधर सुप्रीम कोर्ट ने फटकारा। उधर जीओएम की मीटिंग शुरू हो गई।
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21/01/2011

Thursday, January 20, 2011

अब तो जरूरत ‘सरकार पोर्टेबिलिटी सेवा’ की भी

ना, ना करते मंत्रियों ने नई जिम्मेदारी संभाल ही ली। कल तक वीरभद्र सिंह नए मंत्रालय का पता पूछ रहे थे। गिल की आंखें गीली थीं। पर गुरुवार को सूरज खिला, तो मुरझाए चेहरे वाले मंत्री खिलखिलाते मंत्रालय पहुंच गए। भला कौन लाल बत्ती का रुतबा छोडऩा चाहेगा? रही बात महकमे की, तो कौन मंत्री काम करने के लिए बैठता? हां, इस बात का अफसोस हो सकता कि मलाई काटने वाला मंत्रालय नहीं मिला। वरना जो मंत्री या नेता देश व समाज की सेवा करना चाहे, तो किसी विभाग में रहकर कर सकता। पर जैसी राजा की सोच, वैसी दरबारियों की भी। सो जब महंगाई पर मनमोहन हताशा भरी टिप्पणी कर रहे। तो मंत्रियों से कैसी उम्मीद। सो सुषमा स्वराज ने चुटकी ली- अगर पीएम ज्योतिषी नहीं, तो कम से कम अर्थशास्त्री ही बन जाते। महंगाई ने आम आदमी का जीना मुहाल कर रखा। पर सरकार सिर्फ मुंहजोरी कर रही। यही हाल भ्रष्टाचार के मुद्दे पर भी। जब तक सुप्रीम कोर्ट ने फटकार नहीं लगाई, मनमोहन को काला धन याद नहीं आया। तो गुरुवार को नए-नवेले केबिनेट की पहली मीटिंग में ही पीएम ने देश का मन मोहने की कोशिश की। काले धन पर केबिनेट मीटिंग में चिंता जताई। पर जरा चिंता के कारण देखिए। मीडिया में लगातार खबरें आ रहीं, इस बात से मनमोहन परेशान। सो प्रणव दा ने प्रेस कांफ्रेंस कर जल्द सफाई देने का भरोसा दिया। पर पीएम ने साफ कर दिया- विदेशी बैंकों के खातों से जुड़ी जानकारी वाले नाम का खुलासा सरकार नहीं करेगी। सरकार समझौते से बंधी हुई। अगर सार्वजनिक कर दिया, तो भविष्य में ऐसी जानकारी नहीं मिल पाएगी। यानी कोर्ट की फटकार से ही सही, कुछ ब्लैकमनी वापस ले आएगी सरकार। पर विदेशों में काला धन छुपाने वालों का काला चेहरा आम जनता कभी नहीं देख पाएगी। यानी राजनीतिक दलों की बल्ले-बल्ले। कुछ पैसा सरकारी खजाने में जाएगा, तो कुछ चुनावी चंदे में। अब नवनियुक्त पहली केबिनेट मीटिंग में काले धन पर कहानी गढ़ दी। पर वोटरों को रिझाने का नया नुस्खा अपना लिया। अब हर साल 25 जनवरी राष्ट्रीय मतदाता दिवस के तौर पर मनेगा। जिसका स्लोगन होगा- वोटर होने पर गर्व, वोट के लिए तैयार। भले देश के वोटरों को चुनाव के बाद सिर्फ झुनझुना मिले। पर अब हर साल झुनझुना बजाने का दिन भी मुकर्रर हो गया। काश, महंगाई-भ्रष्टाचार से निजात दिलाने की भी कोई तारीख मुकर्रर होती। तो देश का वोटर वोट देने के बाद कभी रोने को मजबूर न होता। यों मतदाता दिवस का मकसद वोटरों में जागरूकता पैदा करना। देश के मतदाता 2004 और 2009 के चुनाव में अपनी जागरूकता का परिचय दे चुके। पर क्या सियासत करने वालों का हथकंडा बदला? महंगाई, भ्रष्टाचार, आतंकवाद, नक्सलवाद, किसानों की आत्महत्या, ब्लैकमनी पर तो वोट बैंक की राजनीति होती ही थी। अब तिरंगा भी वोट बैंक का हथियार बन गया। तिरंगे की ओट में शुरू हुई बीजेपी की राष्ट्रीय एकता यात्रा गुरुवार को दिल्ली पहुंच गई। तो बीजेपी के युवाओं ने देशभक्ति की हुंकार भरने में अपना गला बैठा लिया। पर बीजेपी के इस तिरंगा प्रेम पर अफसोस तब हुआ। जब मंच के ठीक सामने पहली पंक्ति में दो तिरंगे झंडे एक वर्कर के जूते के नीचे दबे दिखे। जोश में तिरंगे की कोई सुध नहीं। सो बीजेपी मीडिया सेल के एक वर्कर से कहना पड़ा। तब जाकर जूते के नीचे से तिरंगा हटा। अब बीजेपी की इस तिरंगा यात्रा का क्या मकसद? नाम एकता यात्रा, पर काम भावना भडक़ा कर अपना वोट बैंक साधना। सो मौका देख जम्मू-कश्मीर के सीएम उमर अब्दुल्ला भी मैदान में कूद चुके। उमर को अलगावादियों को साधना। सो बीजेपी की यात्रा को श्रीनगर के लालचौक पहुंचने से पहले ही रोकने की कोशिश करेंगे। बीजेपी दिल से यही चाहती। अगर बीजेपी सचमुच लाल चौक पर झंडा फहराना चाहती। तो इतनी बड़ी यात्रा के तामझाम की जरूरत नहीं थी। शायद बीजेपी वाले भूल चुके होंगे। तीन साल पहले ही बीजेपी राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य और जम्मू-कश्मीर के सह प्रभारी सरदार आर.पी. सिंह ने भी लाल चौक पर झंडा फहराया था। आर.पी. सिंह ने राजबाग से लाल चौक तक 1200 मुस्लिम कार्यकर्ताओं के साथ भारत माता की जयकार करते हुए 26 जनवरी 2008 को झंडा फहराया। पर तब ऐसा तामझाम नहीं। सो मकसद तो साफ दिख रहा। अब राजनीति के ऐसे दौर में मतदाता दिवस मनाकर क्या कर लेंगे नेता? जब सुप्रीम कोर्ट चाबुक चलाता, तो भ्रष्टाचार और काले धन पर सरकार की नींद खुल जाती। भ्रष्टाचार का मुद्दा संसद का शीतकालीन सत्र लील चुका। सो 21 फरवरी से शुरू हो रहे बजट सत्र के पहले मनमोहन ने लोगों को ऐसे संदेश देना शुरू किया। मानो, ब्लैकमनी वापस लाने की पहल अपनी मर्जी से कर रहे। आखिर जनता कब तक एक बार वोट डाल पांच साल की सजा भुगतती रहेगी? नए-नवेले ग्रामीण विकास मंत्री विलासराव देशमुख पर सुप्रीम कोर्ट ने दस लाख का जुर्माना लगाया था। एक किसान की खुदकुशी के मामले में बतौर सीएम देशमुख ने अपराधी को बचाने की कोशिश की थी। अब वही गांव-किसान का विकास करेंगे। सो गुरुवार को जब अपने मनमोहन ने देश भर में मोबाइल नंबर पोर्टेबिलिटी सेवा लाँच की। तो जेहन में एक सवाल आया- क्या सरकार पोर्टेबिलिटी सेवा 19 रुपए में नहीं मिल सकती? अगर जनता की उम्मीद पर सरकार खरी न उतरे। तो पांच साल के भीतर सरकार बदलने का भी हक हो।
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20/01/2011




Wednesday, January 19, 2011

‘मनमोहिनी रैसिपी’ और जायकेदार केबिनेट!

जब दाल में नमक अधिक हो जाए, तो आप क्या करते हैं? यही ना, पानी गरम किया, दाल में डाला और घोंट दिया। अपने मनमोहन ने केबिनेट फेरबदल में यही काम किया। भ्रष्टाचार और महंगाई ने 20 महीने में ही मनमोहन की दूसरी पारी का जायका बिगाड़ दिया। सो केबिनेट को जायकेदार बनाने की रैसिपी सचमुच लाजवाब। मनमोहन केबिनेट में तीन नए चेहरे शामिल किए गए। तो 32 मंत्रियों के विभाग बदले गए। पांच का प्रमोशन हुआ। पर छुट्टी किसी की नहीं हुई। यानी इतने बड़े फेरबदल में सिर्फ छह के शपथ ग्रहण से ही समारोह निपट गया। अब जरा मनमोहन की ‘केबिनेट रैसिपी’ देखिए। फाइव स्टार मुंबइया कल्चर के विलास राव देशमुख अब गांव के विकास का काम देखेंगे। तो बीस महीने से गांव का काम देख रहे सी.पी. जोशी अब सडक़ नापेंगे। सडक़ वाले कमलनाथ शहर चले गए। शहर वाले जयपाल रेड्डी अब पेट्रोल का कुआं देखेंगे। तो पेट्रोलियम में रहते कंपनियों का प्रवक्ता बने मुरली देवड़ा अब देश की सभी कंपनियों के मामले देखेंगे। महंगाई पर ऊल-जलूल बयान देने वाले कांग्रेसी कोटे के राज्यमंत्री के.वी. थॉमस अब स्वतंत्र प्रभार वाले मंत्री हो गए। सोचो, जब पवार के जूनियर रहते इतना कैरा-कैरा बयान दिया। अब तो पवार नहीं, पॉवर एकला मिल गया। सो सोचो, क्या करेंगे थॉमस। प्याज की कीमत बढ़ी। तो थॉमस ने कहा था- इसमें कोई हैरानी की बात नहीं। इस साल प्याज की बढ़ी। पिछले साल आलू की बढ़ी थी। पर थॉमस ने यह नहीं बताया, अगले साल किसकी बढ़ेगी। सो मनमोहन ने फौरन प्रमोशन दे दिया। अब आप अपनी जेब को पकडक़र अगले साल का इंतजार करिए। यूपी चुनाव को फोकस कर अहम बदलाव हुए। स्वतंत्र प्रभार के दो राज्यमंत्री सलमान खुर्शीद और श्रीप्रकाश जायसवाल को अब केबिनेट रेंक मिल गया। तो केबिनेट मंत्री रह चुके बेनीप्रसाद वर्मा नए चेहरे के तौर पर शामिल किए गए। पर स्वतंत्र प्रभार का राज्यमंत्री बनाया गया। वर्मा पर सपा डोरे डाल रही थी। सो साधने के लिए कांग्रेस ने मंत्रालय को साधन बनाया। यों रुतबा घटने से बेनीप्रसाद वर्मा नाराज या खुश, यह तो आने वाला वक्त बताएगा। पर फेरबदल में मनमोहन ने खेल मंत्री एम.एस. गिल की गिल्ली उड़ा दी। अब गिल खेल के मैदान से हटकर सांख्यिकीय आंकड़ों की गिनती करेंगे। क्षत्रिय नेता वीरभद्र सिंह की वीरता को धता बता फौलाद (इस्पात) से सूक्ष्म-लघु व मध्य उपक्रम मामलों का मंत्री बना दिया। कभी आंख दिखाने वाले करुणानिधि अबके करुण क्रंदन करते रह गए। मनमोहन ने सहयोगियों के साथ वैसा ही सलूक किया, जैसा कांग्रेस का डीएनए। केबिनेट फेरबदल में एनसीपी को ठगा, तो तृणमूल और डीएमके को ठेंगा दिखाया। गठबंधन में छोटे दलों को उल्लू कैसे बनाया जाता, यह कोई कांग्रेस से पूछे। तृणमूल-डीएमके को कुछ नहीं मिला। बेचारे टी.आर. बालू बाट जोहते रह गए। सहयोगियों के मामले में मनमोहन के तेवर ने उम्मीद दिखाई। शरद पवार का वजन कम किया। तो बदले में प्रफुल्ल पटेल को ठग लिया। नागरिक उड्डयन मंत्रालय से हटा नाम का भारी उद्योग मंत्रालय थमा दिया। अब जरा केबिनेट फेरबदल की राजनीतिक त्रिकोणमिति भी देखिए। अपनों को घोटा, सहयोगियों को लपेटा और यूपी का चुनावी कोटा। पंच सितारा कल्चर वाले विलासराव देशमुख गांव में विकास के साथ-साथ पंचायत भी करेंगे। पर इस दांव से पवार को साधने की भी रणनीति। रोजगार गारंटी का मॉडल यूपीए सरकार ने महाराष्ट्र से लिया। शरद पवार कृषि मंत्रालय संभाल रहे। सो अब गांव-गरीब के मामले पर महाराष्ट्र के दो क्षत्रप आमने-सामने। यानी गांव के विकास पर महाराष्ट्र की राजनीति भारी। पर इस भारी-भरकम खेल में हल्के पड़ गए सी.पी. जोशी। यों सडक़ परिवहन व राजमार्ग मंत्रालय का रुतबा भी कम नहीं। पर सोनिया-राहुल के ड्रीम प्रोजैक्ट वाली मिनिस्ट्री से विदाई खुद में एक अहम सवाल। यों जोशी का गांव से सडक़ तक का सफर सिर्फ मराठा राजनीति का शिकार नहीं। अलबत्ता सी.पी. जोशी प्रचार में पिछड़ गए। यूपीए-वन में ग्रामीण विकास मंत्री रघुवंश प्रसाद ने नरेगा में जितना बांटा नहीं, उससे अधिक बांचा। पर यूपीए-टू में जोशी ने जितना बांटा, उसका आधा भी नहीं बांच पाए। सो गांव से सडक़ नापने की बारी आई। तो जोशी बोले- सोनिया-मनमोहन ने चुनौतीपूर्ण दायित्व सौंपा। सो आशा पर खरा उतरने का भरसक प्रयास करेंगे। देश में गुणवत्ता वाली सडक़ों का निर्माण मेरी प्राथमिकता होगी। अब सडक़ों की गुणवत्ता तो काम के बाद दिख ही जाएगी। फिलहाल सरकार की गुणवत्ता दिख गई। महंगाई-भ्रष्टाचार के महामौसम में मनमोहन ने केबिनेट बदलाव की पहल की। तो आस बंधी- कुछ ऐसा होगा, सब मोहित हो जाएंगे। पर मनमोहन के बदलाव से भी बीजेपी नहीं बदली। बोली- मनमोहन में किसी को हटाने की हिम्मत नहीं। सचमुच फिलहाल मनमोहन ने डीएमके के दबाव को दबा दिया। पर लगे हाथ भरोसा भी दिया- बजट सत्र के बाद फिर होगा फेरबदल। यानी तब तक तमिलनाडु चुनाव में डीएमके की औकात सामने आ जाएगी। फिर कांग्रेस तेल और तेल की धार देख तोल-मोल करेगी। सो मनमोहन-टू के पहले फेरबदल में परफोर्मेंस नहीं, पॉलिटिक्स हावी रही। अब सोनिया गांधी की टीम बनने के बाद मनमोहन की टीम की असली तस्वीर सामने आएगी। पर फिलहाल पहले फेरबदल में मजबूरी की मूरत साबित हुए मनमोहन। अब आगाज ऐसा, तो अंजाम क्या होगा?
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19/01/2011

Tuesday, January 18, 2011

ब्लैकमनी पर नेता नहीं, अब असांज से उम्मीद

मुझसे न पूछो, महंगाई कब कम होगी। यह कह आखिरकार शरद पवार ने सरेंडर कर दिया। मौका देख मनमोहन ने भी टेंडर जारी कर दिया। बुधवार शाम पांच बजे मनमोहन की दूसरी पारी का पहला फेरबदल होगा। वैसे भी प्याज के बाद टमाटर भी अपने लाल रंग पर इतराने लगा। सो बेफिक्र मनमोहन ने जनता को राहत देने के बजाए अपनों में रेवड़ी बांटने को तरजीह दी। पर मनमोहन सरकार झंझावात के जिस दौर से गुजर रही, केबिनेट में फेरबदल भी इम्तिहान से कम नहीं। देखने वाली बात होगी, मनमोहन साफ-सुथरी छवि वालों को मंत्री बना अपनी छवि सुधारते हैं या फिर वही मजबूरी। यों मंत्री बनाना या हटाना पीएम का विशेषाधिकार। पर अब तक छनकर जितने नाम आए, उनमें चौंकाने वाला नाम टीआर बालू का। डीएमके कोटे से राजा की विदाई के बाद एक मंत्रालय देना गठबंधन की जरूरत। पर इतनी भद्द पिटने के बाद भी बालू को केबिनेट में शामिल करना पड़ा। तो यूपीए-टू में मजबूत पीएम की छवि लेकर उभरे मनमोहन अबके निढाल नजर आएंगे। सनद रहे, सो याद दिलाते जाएं। जब मनमोहन की दूसरी पारी में केबिनेट लिस्ट बनी, तो उन ने डीएमके को राजा-बालू छोड़ किसी और का नाम भेजने को कहा। पीएमओ की ओर से बाकायदा खबरें बांची गईं- मनमोहन अबके सिर्फ साफ छवि वालों को तरजीह देंगे। पर गठबंधन की मजबूरी की वजह से दोनों की बात रह गई। करुणानिधि ने बालू को ड्रॉप कर राजा को मंत्री बनवा लिया। पर जिस तरह राजा के कारनामे ने मनमोहन सरकार के मुंह पर कालिख पोत दी। भ्रष्टाचार आज ऐसा मुद्दा बन चुका, मनमोहन की गाड़ी हिचकोले खा रही। फिर भी राजा की जगह बालू आए, तो समझो, अब मनमोहन का ब्रेक फेल हो चुका। बाकी मंत्रियों का इतिहास शपथ ग्रहण समारोह के बाद बताएंगे। पर चौदह उद्योगपतियों की ओर से लिखी गई चिट्ठी सरकार की पोल खोल रही। इनमें कई राजनेता भी। पर चिट्ठी का लब्बोलुवाब- पहले सरकार के कामकाज से संतुष्टि का अहसास होता था। पर अब ऐसी भावना नहीं दिख रही। भ्रष्टाचार और महंगाई पर तत्काल कार्रवाई की जरूरत। वरना अर्थव्यवस्था को भारी नुकसान होगा। सो मंगलवार को बीजेपी ने चिट्ठी को जरिया बना सवाल उठाया। इनमें से कई लोग सरकारी पदों पर काम कर चुके। सो मनमोहन बताएं, इस पीड़ा की क्या वजह? पर पीड़ा की वजह कोई तब बताए, जब पीड़ा का अहसास हो। सुप्रीम कोर्ट की तल्ख टिप्पणियों के बावजूद सरकार ने सीवीसी पी.जे. थॉमस का बचाव किया। तो सरकार से क्या उम्मीद रखेंगे आप। सो बीजेपी ने मौजूं सवाल उठाया। बोली- यह कैसी सरकार, जो एक दागदार सीवीसी को बचा रही। और एक ईमानदार सीएजी को कटघरे में खड़ा कर रही। सचमुच सरकार ने नीति, नैतिकता, शर्म-हया, आम आदमी की चिंता वगैरह सब ताक पर रख दिया। तभी तो विदेशों में ब्लैक मनी जमा करने वालों का नाम सार्वजनिक नहीं कर रही। अपना सुप्रीम कोर्ट भी दो दिन पहले टिप्पणी कर चुका- नाम का खुलासा करने में क्यों हिचकिचा रही सरकार? अब विपक्ष ने भी मंगलवार को वही सवाल दोहराया। पर भले विपक्ष के सवाल सरकार को असर न करते हों। पर अमेरिका को नाकों चने चबवाने वाले जूलियन असांज के हाथ लगी सीडी ने होश उड़ा दिए। मनमोहन सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के सामने विदेशों में काला धन जमा करने वालों का नाम सार्वजनिक नहीं किया। अलबत्ता सुप्रीम कोर्ट में दलील दी- हम सील बंद लिफाफे में आपको नाम दे सकते, पर सार्वजनिक नहीं कर सकते। आखिर यह सरकार की कैसी मजबूरी? पर दलील की हकीकत भी देख लो। जर्मनी से सरकार को 50 खाताधारियों के नाम मिले। पर सुप्रीम कोर्ट को बताए सिर्फ छब्बीस। अब देश की जनता को विकीलिक्स से उम्मीदें बंधीं। चार दशक से ब्लैकमनी का मामला उठ रहा। पर किसी सरकार ने ईमानदार पहल नहीं की। अनुमान को सच मानें, तो कुल जीडीपी का दुगुना ब्लैकमनी विदेशी बैंकों में जमा। स्विस बैंक के एक डायरेक्टर ने कुछ समय पहले खुलासा किया था। भारतीयों के 280 लाख करोड़ रुपए अकेले स्विस बैंक में जमा। जिससे तीस साल तक देश का टेक्सलैस बजट बन सकता। साठ करोड़ भारतीयों को रोजगार मिल सकते। देश के किसी गांव से राजधानी दिल्ली तक चार लेन की सडक़ें बनाई जा सकतीं। करीब 500 सामाजिक परियोजनाओं को हमेशा के लिए मुफ्त बिजली दी जा सकती। हर भारतीय को साठ साल तक दो हजार रुपए मासिक दिए जा सकते। ब्लैकमनी वापस आने के बाद भारत को न वल्र्ड बैंक न आईएमएफ के आगे झोली फैलाने की जरूरत। पर कौन करेगा ऐसी ईमानदार पहल? कोई साफ छवि का नेता नहीं दिख रहा। जिससे कोई उम्मीद रखी जाए। कांग्रेस की सरकार भ्रष्टाचार पर चौतरफा घिरी। मनमोहन उस आग में झुलस चुके। बोफोर्स पर आईटी ट्रिब्यूनल के फैसले ने सोनिया को भी कटघरे में खड़ा कर दिया। विपक्ष तो अपनी ही विरासत से सवालों में। तभी तो आम आदमी के हित के नाम पर नेता ऐसे नाक-भौं सिकोड़ते, मानो आम आदमी के पसीने की दुर्गंध आ रही हो। सो अब विकीलिक्स ने उम्मीद की किरण दिखाई। अमेरिका के दबाव में भी नहीं झुकने वाला असांज ब्लैकमनी से कितना परदा उठा पाते, यह कौतूहल का विषय। तो क्या चार दशक में जो अपने नेता नहीं कर सके, असांज कर दिखाएगा? अगर कर दिया, तो क्या सरकार कार्रवाई करेगी?
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18/01/2011

Monday, January 17, 2011

गर हिटलर होता, तो हमारी सरकार को सलाम ठोकता!

मनमोहन सरकार आज-कल खूब धूम मचा रही। लाज-शर्म का परदा फाड़ सरकार भ्रष्टाचार के आरोपी सीवीसी पी.जे. थॉमस के बचाव में उतर आई। पर उसी परदे के कपड़े से केबिनेट मंत्री पद की शपथ लेने को कुछ नेता पतलून सिलवा रहे। पर आम आदमी की पतलून के चिथड़े-चिथड़े हो चुके। बीते मंगल-बुध को महंगाई पर काबू पाने के लिए पीएम ने हाई-लेवल मैराथन मीटिंगें कीं। पर आदत से मजबूर सरकार ने शनिवार को महंगाई की आग में पेट्रोल डाल दी। अब ऐसी सरकार को सरकार कहेंगे, या बिजनेसमैन? जिसे कंपनियों के कथित घाटे की चिंता, आम आदमी की नहीं। आखिर अर्थशास्त्र का यह कौन सा फार्मूला, जो दो दिन कीमतें काबू में करने की मीटिंग में बिताओ। तीसरे दिन कीमतें बढ़ा दो। ऐसे लोगों को अर्थशास्त्री कहेंगे या विनाश शास्त्री? एक वरिष्ठ नेता ने सोमवार को हरियाणा से जुड़ा मशहूर चुटकुला सुनाया। घर की बेटी छत से गिर गई। दर्द से कराह रही थी। सो घर के लोगों में किसी ने हल्दी-दूध पिलाने, तो किसी ने गर्म पानी से सेकने, तो किसी ने मालिश करने की सलाह दी। इसी सलाहबाजी के बीच घर का सबसे बुजुर्ग पहुंचा। तो उन ने सलाह दी- लडक़ी के नाक-कान छिदवा दो। एक साथ सारा दर्द झेल जाएगी और लगे हाथ सारा काम निपट जाएगा। मनमोहन सरकार ने शायद यही नुस्खा अपना लिया। जब आम आदमी महंगाई की मार झेल ही रहा। महंगाई काबू करने का कोई उपाय नहीं मिल रहा। तो अपनी नवरत्न कंपनियों को घाटे में क्यों जाने दें। सो ताबड़तोड़ पेट्रोल के दाम बढ़ाए जा रहे। थोड़े दिन का इंतजार करिए, डीजल भी डील-डौल दिखाएगा। रसोई गैस बदहजमी न करे, तो आप कहना। मनमोहन का करिश्मा देखिए, नेहरू-गांधी परिवार से इतर बतौर पीएम सातवें साल के सात महीने पूरे हुए। और पिछले सात महीने में सात बार पेट्रोल की कीमतें बढ़ चुकीं। अब तो मनमोहन सरकार ने असंवेदनशीलता की सारी हदें पार कर दीं। पहले तो पीएसयू यानी सरकारी नवरत्न कंपनियों को खुली लूट मचाने की छूट दी। अब नया ट्रेंड शुरू हो रहा। आम तौर पर आतंकवादी भीड़-भाड़ वाले बाजार में हमले के लिए शनिवार का दिन चुनते थे। ताकि अधिक से अधिक लोग शिकार हो सकें। अब उसी तर्ज पर शनिवार को महंगाई चोट करने लगी। सरकार ने शनिवार को पेट्रोल की कीमतों में ढाई रुपए से भी अधिक का इजाफा कर दिया। ताकि सोमवार को जब लोग-बाग गाड़ी लेकर घर से निकलें, तो कंपनियों को फायदा हो। पर सिर्फ गाड़ीवान ही नहीं, इस कीमत बढ़ोतरी का असर समूची आवाम पर पड़ेगा। सो यह सचमुच महंगाई रूपी आतंकवाद, जिसकी चोट आम आदमी को घुट-घुट कर मरने को मजबूर कर रही। आतंकवादी हमले में तो लोग मौके पर ही मर जाते। समूचा घटनास्थल लाल रंग में रंग जाता। पर महंगाई रूपी आतंकवाद का घाव इससे कहीं बढक़र। आम आदमी इस आतंकवाद से ठीक से नहीं मर पा रहा, जीना मुहाल जरूर हो चुका। महंगाई ने लोगों का खून निचोडऩा शुरू कर दिया। पर कीमत बढ़ाऊ मंत्री मुरली देवड़ा की तान ने सोमवार को सचमुच चौंका दिया। देवड़ा बोले- नवरत्न कंपनियां बेहद नुकसान झेल रही थीं। इन कंपनियों को हम घाटे से लहू-लुहान होने की अनुमति नहीं दे सकते। देवड़ा की मुरली की धुन समझ गए ना आप? मतलब, भले आम आदमी का खून महंगाई की चोट से थक्का बन जाए। पर कंपनियों को खरोंच भी नहीं आनी चाहिए। देवड़ा ने इसी बढ़ोतरी को अंतिम नहीं बताया। अलबत्ता अभी और चोट झेलने की चेतावनी दे दी। बोले- इस बढ़ोतरी के बाद भी पेट्रोलियम कंपनियां प्रति लीटर सवा से डेढ़ रुपया घाटा सह रहीं। यानी आम आदमी सरकार का अहसान माने, सिर्फ दो रुपए 52 पैसे की बढ़ोतरी की। सो बढ़ोतरी को ना देखो, सवा रुपए की राहत पर ध्यान दो। काश, हिटलर या मुसोलिनी जिंदा होता। तो आम आदमी के प्रति सरकार की इस नफरत भरी भावना को देख हमारे नेताओं को सलाम जरूर ठोकता। सरकार की हिम्मत देख हिटलर का वह कारनामा याद आ गया। जब यहूदियों और अपने विरोधियों को मौत के घाट उतारने के लिए गोलियां महंगी पडऩे लगीं। तो हिटलर ने उस महंगाई से बचने का नुस्खा अपनाया। एक ऐसी कोठरी बनवाई, जिसमें सिर्फ एक सुराख था, जिसके जरिए जहरीली गैस छोड़ी जाती थी। इस कवायद से हिटलर एक साथ सैकड़ों लोगों को तड़पा-तड़पा कर मौत के घाट उतारता था। अब महंगाई और अपनी सरकार का आलम देख यही लग रहा। आम आदमी महंगाई की जहरीली गैस से घुट-घुट कर मरने को मजबूर। यों दिखावा करने को ममता-पवार-करुणा ने मनमोहन सरकार को तेवर दिखाए। तो कांग्रेस ने मजबूरी की तान छेड़ कंपनियों से गुजारिश की- कम से कम कीमतें बढ़ाने की वजह भी जनता को बता दो। यानी कांग्रेस बचावी मुद्रा में। सो बीजेपी ने लूट करार दिया। पर अपनी जनता क्या कर रही? इस लूट पर बूट पहने जनता क्या यों पेट्रोल पंप पर लाइन लगाएगी? पेट्रोल के दाम जिस दिन बढ़ते, उस दिन हर पंप पर जाम लग जाता। आखिर ऐसी मानसिकता क्यों? क्या घंटों लाइन में लगकर एक दिन टंकी फुल करवा लेने से जिंदगी पर महंगाई असर नहीं करेगी? अब बहुत हो चुका। पेट्रोल पंप पर लाइन लगाने, चौक-चौराहों पर बैठ सरकार को कोसने के बजाए सडक़ों पर उतरे। भेड़चाल छोड़ आंदोलन का शंखनाद करे। तो देश का हर आदमी जेपी बन सकता। अगर आप जेपी न बनें, तो सरकार इतने 'पी.जे. थॉमस' खड़े कर देगी। हम-आप महंगाई के मकडज़ाल में उलझ कर मर जाएंगे। सो अब जागो, और आगे बढ़ो.., जब तक..।
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17/01/2011

Friday, January 14, 2011

गण तो हुआ गौण, तंत्र दिखा रहा तेवर

सूर्य दक्षिणायन से उत्तरायण हो गया। पर दक्षिण हो या उत्तर, पूरब हो या पश्चिम। न मनमोहन सरकार महंगाई रोक पाई, न भ्रष्टाचार पर सीबीआई चार्जशीट दाखिल कर पाई। यों सूर्य ने दिशा बदली, तो शुक्रवार को प्रणव दा भी तेवर में दिखे। बोले- सरकार यह महंगाई बर्दाश्त नहीं करेगी। प्रणव उवाच सोलह आने सही। महंगाई सरकार कहां बर्दाश्त कर रही, बर्दाश्त तो बेचारा आम आदमी कर रहा। कांग्रेसी कृषि राज्यमंत्री के.वी. थॉमस ने तो बेशर्मी की मखमली चादर ओढ़ ली। बोले- कीमतों में बढ़ोतरी कोई बड़ी बात नहीं। पिछले साल आलू की कीमतें बढ़ गई थीं। इस साल प्याज की बढ़ गईं। सो इसमें हायतौबा क्यों? तो आइए कांग्रेसी के.वी. थॉमस के इस प्रवचन पर जय हो का उद्घोष करें। साथ ही गांठ बांध लें, महंगाई से निजात नहीं मिलने वाली। दुआ इतनी करिए- महंगाई जहां पहुंची, वहीं ठहर जाए। अब महंगाई पर सरकारी तेवर के नतीजे दिख गए। भ्रष्टाचार पर कांग्रेस अधिवेशन में सोनिया के पांच मंत्रों का कितना असर, शुक्रवार को वह भी दिख गया। कॉमनवेल्थ घोटाले में गिरफ्तार टी.एस. दरबारी को आखिरकार जमानत मिल गई। सीबीआई साठ दिन के भीतर चार्जशीट दाखिल नहीं कर पाई। सो सरकार घोटालेबाजों पर कार्रवाई में कितनी फुर्ती दिखा रही, बताने की जरूरत नहीं। किसी परिवार का बच्चा अपनी जिम्मेदारी से भटक जाता। तो घर वाले उलाहना देते- काम का न काज का, सौ मन अनाज का। अब आप अपनी सरकार को क्या कहेंगे, आप खुद ही तय करिए। यों राजनीति में कोई एक दल ऐसा हो, तो कुछ कहें। यहां तो सबके सब मायावी। अब आप यूपी के मायाराज को ही देख लो। जबसे कानून-व्यवस्था के मामले में नीतिश कुमार का कमाल और चुनावी असर देखा। तबसे माया भी ऐसे राजनीतिक संदेश देने की कवायद कर रहीं। सो बांदा रेप कांड में बीएसपी एमएलए पुरुषोत्तम नरेश द््िववेदी को फौरन सस्पेंड किया। पर गिरफ्तारी में काफी देर लगा दी। सो शुक्रवार को कोर्ट में पेशी के बाद एमएलए के तेवर में कोई कमी नहीं। नाम से पुरुषोत्तम, यानी सबसे उत्तम पुरुष। उसके बाद भी नाम में नरेश लगा लिया। पर काम ऐसा घिनौना, फिर भी शर्म नहीं। सो आरोपी एमएलए बोला- राजनीतिक साजिश के तहत मुजे फंसाया गया, मैं बदला लूंगा। अब कोई आरोपी एमएलए पुलिस की गिरफ्त में रहते हुए ऐसा तेवर दिखाए, तो यह सत्ता के वरदहस्त के बिना मुमकिन नहीं। यानी सत्ता का मतलब ही अब गरीब-मजलुमों को सताओ, खास लोगों पर मेहरबानी दिखाओ। तभी तो शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट ने काले धन के मामले पर सख्ती दिखाई। मनमोहन सरकार से पूछा- जिन भारतीयों के काले धन विदेशी बैंक में जमा, उन नामों का खुलासा क्यों नहीं कर रही? आखिर खुलासा करने में क्या परेशानी है? सचमुच काला धन जमा करने वाले लोगों पर कार्रवाई से परहेज कर रही सरकार। पैसे वालों के लिए देश का कानून मुट्ठी में, और आम आदमी के लिए कानून के हाथ लंबे हो जाते। सो शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट ने फर्जी मुठभेड़ के आरोप के मामले में भी अहम टिप्पणी की। जुलाई 2010 में आंध्र-महाराष्ट्र के बार्डर पर आंध्र पुलिस ने माओवादी नेता चेरुकुरी राजकुमार उर्फ आजाद और पत्रकार हेमचंद्र पांडे को मार गिराया था। जिसके बाद पुलिस ने मुठभेड़ की कहानी रची। पर पोस्टमार्टम रिपोर्ट ने पुलिसिया दावे पर सवाल खड़ा कर दिया। पुलिस का दावा था- करीब 20 नक्सलियों के जंगल में घूमने की सूचना मिली। जिसके बाद मौके पर पहुंच पुलिस ने रुकने को कहा। तो सामने से फायरिंग शुरू हुई। पुलिस ने जवाबी कार्रवाई की, तो आजाद और पांडे की मौत हो गई। सो सवाल उठा- बीस में से सिर्फ यही दो लोग कैसे मारे गए। पोस्टमार्टम रिपोर्ट में भी स्पष्ट हो गया, आजाद और पांडे को प्वाइंट ब्लैंक रेंज से गोली मारी गई। सो मुठभेड़ की न्यायिक जांच कराने की मांग हुई। मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। तो पहली नजर में कोर्ट ने भी माना, कहीं कुछ गड़बड़ जरूर। सो केंद्र और आंध्र प्रदेश की सरकार को नोटिस जारी कर दिया। छह हफ्ते का वक्त देते हुए जस्टिस आफताब आलम और आर.एन. लोढ़ा की पीठ ने कहा- हमें उम्मीद है कि इसका जवाब मिलेगा, एक अच्छा और विश्वसनीय जवाब मिलेगा। पर बैंच ने एक एतिहासिक टिप्पणी की। कहा- हम गणराज्य को अपने ही बच्चों को मारने की अनुमति नहीं दे सकते। यानी कोर्ट ने लोकतंत्रीय गणतंत्र का हवाला दिया। पर आज की राजनीति की हकीकत यही- गण तो गौण हो गए, तंत्र की तानाशाही आम आदमी पर चल रही। अब सवाल दिग्विजय और उनकी कांग्रेस से। सिर्फ गुजरात की सोहराबुद्दीन मुठभेड़ और दिल्ली की बटला हाउस मुठभेड़ पर ही जुबान क्यों खुलती? क्या कांग्रेसी मानवाधिकार के चश्मे से सिर्फ वोट बैंक ही दिखता? अब सुप्रीम कोर्ट ने तल्खी दिखाई, तो शुक्रवार को विधि मंत्री वीरप्पा मोइली ने हमेशा की तरह टिप्पणी का स्वागत किया। बोले- सचमुच ऐसा नहीं होना चाहिए। मोइली को ऐसी टिप्पणियों में महारत। हर बार कह देंगे- ऐसा होना चाहिए, वैसा होना चाहिए। पर करते-धरते कुछ नहीं। बांदा रेप कांड में पीडि़त लडक़ी को सुरक्षा दिए जाने और तेजी से इंसाफ की पैरवी की। पर कॉमनवेल्थ में सीबीआई की तेजी कहां गई? महंगाई पर प्रणव दा, चिदंबरम, मोंटेक जैसे धुरंधर प्रवचन दे रहे। पर अब जनता प्रवचन नहीं, जवाब मांग रही।
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14/01/2011

Thursday, January 13, 2011

चुनावी भोजन यानी, घर में नहीं दाने, अम्मा चली भुनाने

 तो इसे कहते हैं- 'घर में नहीं दाने, अम्मा चली भुनाने।' लोकसभा चुनाव के वक्त सोनिया गांधी ने मैनीफेस्टो में खाद्य सुरक्षा बिल का वादा तो कर दिया। पर अब वादा निभाने में सरकार को नानी याद आ रही। चुनावी वादों पर अक्सर बाद में यही कहानी देखने को मिलती। जब वोट बटोरने की होड़ मची थी। तब सोनिया ने चुनावी भोजन की झलक दिखा खूब वोट बटोरे। पर अब जब सत्ता में आने के बाद परोसने की बारी आई, तो पीएम की कमेटी ने पत्तल ही छीन ली। मनमोहन की बनाई एक्सपर्ट कमेटी ने सोनिया की एडवाइजरी काउंसिल के प्रस्ताव को बेहिचक नामंजूर कर दिया। रंगराजन कमेटी ने रपट में साफ कर दिया- जितना अनाज बांटने की योजना, उतना अनाज सरकार के पास नहीं। रपट के मुताबिक- एनएसी की सिफारिश मानी जाए, तो योजना के लिए पहले चरण में 66.76 मिलियन टन और अंतिम चरण में 71.98 मिलियन टन अनाज की जरूरत होगी। पर उत्पादन और प्रबंध के मौजूदा ट्रैंड के मुताबिक 2011-12 में 56.35 मिलियन टन और 2013-14 में 57.61 मिलियन टन का स्टॉक ही संभव। सो एनएसी के प्रस्ताव को चरणबद्ध तरीके से भी लागू करना मुमकिन नहीं। यानी चुनावी घोषणा पत्र अब कांग्रेस और सरकार के बीच सिर दर्द बन गया। सो सवाल- चुनावी वायदों से पहले नेता सोचते क्यों नहीं? जब सोनिया गांधी 2009 के लोकसभा चुनाव का मैनीफैस्टो जारी कर रही थीं, तो मंच पर मनमोहन भी मौजूद थे। उसी मंच से सोनिया ने पहली बार नेहरू-गांधी परिवार से इतर मनमोहन को पीएम के उम्मीदवार के तौर पर प्रोजैक्ट किया था। सो मैनीफैस्टो में खाद्य सुरक्षा बिल का वादा कोई तुगलकी फरमान की तरह नहीं आया होगा। अलबत्ता कांग्रेस के धुरंधरों ने पूरा मंथन किया होगा। मनमोहन सरकार की दूसरी पारी के 20 महीने पूरे हो रहे। संसद में राष्ट्रपति के अभिभाषण के जरिए दो बार भोजन के अधिकार वाले इस बिल का राग भी अलापा जा चुका। अब जरा बिल का इतिहास बता दें। शरद पवार की मिनिस्ट्री ने बिल का ड्राफ्ट तैयार किया। पर सरकारी ढर्रे वाले इस बिल को सोनिया की रहनुमाई वाली नेशनल एडवाइजरी काउंसिल ने नामंजूर कर दिया। एनएसी ने बिल की महत्ता को ध्यान में रख अपना ड्राफ्ट तैयार कर पीएम को भेज दिया। पीएम ने अपने आर्थिक सलाहकार सी. रंगराजन की रहनुमाई में एक्सपर्ट कमेटी बना दी। जिसकी रपट ने अब कांग्रेस और सरकार को आमने-सामने कर दिया। सोनिया की एनएसी ने बिल की ऐतिहासिकता और बारीकियों को ध्यान में रख संवेदना दिखाई। एनएसी ने दो चरणों में देश की 72 से 75 फीसदी आबादी तक सस्ता अनाज पहुंचाने का प्रस्ताव रखा। जिसमें बीपीएल परिवार को 35 किलो, तो एपीएल को 20 किलो अनाज प्रति माह दिए जाने का प्रावधान। पर सरकार 25 किलो अनाज देने के पक्ष में। सरकार की ओर से अनाज की जगह पैसे देने का भी प्रस्ताव था। पर भ्रष्टाचार की संभावना जता एनएसी ने खारिज कर दिया। अब जरा पीएम की एक्सपर्ट कमेटी के दो सुझाव भी देखिए। पहले सुझाव को तो कमेटी ने खुद ही मुश्किल बता दिया। सो आप दूसरा विकल्प देखिए- सिर्फ जरूरतमंद परिवारों को दो रुपए किलो गेहूं और तीन रुपए किलो चावल का कानूनी अधिकार दिया जाए। जबकि बाकी के लिए एक्जीक्यूटिव आर्डर निकाल कर स्टॉक में उपलब्धता के आधार पर बांटा जाए। यों कमेटी ने बीपीएल जनसंख्या की एनएसी की राय जरूर मान ली। सोनिया की एनएसी ने सचमुच संवेदना दिखाई। अर्जुन सेन गुप्त कमेटी ने रपट दी थी- देश में 84 करोड़ लोग ऐसे, जो महज 20 रुपए की दिहाड़ी पर गुजर-बसर कर रहे। सो एनएसी ने इस पूरी आबादी को भोजन का मौलिक हक देने का प्रस्ताव बनाया। खाद्य सुरक्षा बिल में कई बारीकियां। अब तक समाज बीपीएल-एपीएल में बंटा दिखता। पर बिल के मुताबिक तीन हिस्से दिखेंगे। बीपीएल-एपीएल के अलावा 25 फीसदी वह आबादी, जो बिल के दायरे से बाहर होगी। फिर अनाज का भंडारण भी कानूनी बाध्यता होगी। पर यहीं एक सवाल- क्या देश उत्पादन बढ़ाने की स्थिति में है? किसानों की सब्सिडी धीरे-धीरे खत्म हो रही। न्यूनतम समर्थन मूल्य में हाल की बढ़ोतरी को छोड़ दें, तो आजादी के बाद से अब तक किसानों को सिर्फ झुनझुना थमाया जाता रहा। अब कानून लागू होगा, तो किसान भी समर्थन मूल्य बढ़ाने की मांग करेंगे। सस्ता अनाज पाने वाले परिवार कीमत बढ़ोतरी का विरोध करेंगे। ऐसे में सरकार की मुश्किल- या तो सब्सिडी दे, या फिर समाज में संघर्ष पैदा होने दे। सब्सिडी के मामले में मनमोहन सरकार का रवैया छुपा नहीं। ऐसे में न बिल का मकसद पूरा होगा, न सोनिया के महत्वाकांक्षी बिल का सपना। आम आदमी के हित में मनमोहन सरकार का हाथ कितना तंग, महंगाई ने दिखा दिया। महंगाई पर गुरुवार को कुछ कदम उठे। पर कोई कदम ऐसा नहीं, जो महंगाई को नीचे ला सके। यानी महंगाई पर तो सोनिया भी कुछ नहीं कर पाईं। अब खाद्य सुरक्षा बिल की बारी, जो नरेगा की तरह आसान नहीं। जैसे सूचना के हक बिल पर सोनिया-मनमोहन में मतभेद थे। अब भोजन के हक वाले बिल पर भी। सो चुनौती सोनिया के लिए, सरकार की दलील मानेंगी या मजबूर करेंगी। पर भोजन को मौलिक हक का वैधानिक दर्जा दिलाना सचमुच सोनिया गांधी के लिए लिटमस टेस्ट जैसा। अब सोनिया चुनावी वादा निभाएंगी या घर में नहीं दाने.. की सरकारी दलील मानेंगी, वक्त ही बताएगा।
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13/01/2011