Thursday, February 3, 2011

कस्टडी में ‘श्री’ राजा, पर करवटें बदल रही कांग्रेस

मिस्र में हालात बद से बदतर हो गए। मुबारक विरोधी और समर्थकों के बीच हिंसक दौर शुरू हो गया। तो अब हताश हुस्नी मुबारक ने मीडिया पर निशाना साध लिया। मीडिया को ब्लैक आउट किया गया। कई मीडिया वालों पर जासूसी का आरोप लगा, पिटाई तक हो गई। तो संयुक्त राष्ट्र के सैक्रेट्री जनरल बान की मून ने दुनिया से अपील की। मिस्र में अभिव्यक्ति की आजादी की रक्षा की जाए। अब मुबारक के रहते मीडिया की कितनी रक्षा होगी, यह तो बाद की बात। पर अपने देश में घोटालाधिराज ए. राजा की रक्षा में डीएमके जरूर उतर आई। कांग्रेस भी राजा की गिरफ्तारी से जेपीसी की वैतरिणी पार मान रही। पर पहले बात डीएमके की, जिसने पार्टी के प्रचार सचिव पद से राजा का इस्तीफा नामंजूर कर दिया। करुणानिधि ने सियासत का गुणा-भाग कर राजा को पार्टी से नहीं निकाला। अलबत्ता विपक्ष की हाय-तौबा पर बेशर्मी दिखा दी। डीएमके ने खम ठोककर कहा- गिरफ्तारी से यह साबित नहीं होता कि राजा दोषी। पर राजा ने किस तरह कट ऑफ डेट खिसका पसंदीदा कंपनियों को टैंडर दिए, एक कंपनी ने प्रावधान बदले जाने से एक दिन पहले ही ड्राफ्ट जमा कराए। बाकी राजा की चहेती नौ कंपनियां जेब में ड्राफ्ट लेकर पहुंची थीं। सो स्पेक्ट्रम की सही मायने में हकदार कंपनी ड्राफ्ट बनवाने में ही फंसी रही। रीयल एस्टेट वाले सस्ते दाम पर स्पेक्ट्रम लूट ले गए। बाद में कई गुना अधिक दाम पर विदेशी कंपनियों को बेच दिया। ये सारे ऐसे तथ्य, जिन्हें कोई अंधा भी आसानी से पढ़ ले। पर राजा डीएमके की मजबूरी, सो बचाव करना लाजिमी। गर राजा डीएमके से भी दर-ब-दर हुए, तो कलई खुलने का डर। साथ ही दलित वोट का समीकरण भी बिगड़ता। सो सही मायने में करुणानिधि राजा का नहीं, अलबत्ता खुद का बचाव कर रहे। यों करुणा की इस मजबूरी का राजनीतिक फायदा सीधे कांग्रेस को मिल रहा। डीएमके ने कांग्रेस की मांग के अनुरूप सीटें दे दीं। फिर भी कांग्रेस की मुश्किलें अभी कम नहीं। विपक्ष जेपीसी की मांग छोडऩे को राजी नहीं। पर अब कांग्रेस दलील दे रही- हमने जेपीसी को छोड़ पीएसी, मल्टी एजेंसी, सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में सीबीआई जांच, जस्टिस पाटिल कमेटी की जांच करा दी। विपक्ष की मांग के मुताबिक अब राजा की गिरफ्तारी भी हो गई। सो विपक्ष को और क्या चाहिए। अब पहले संसद में जेपीसी जांच के औचित्य पर बहस हो, फिर विचार होगा। पर अपनी ही दलील में कांग्रेस ने सवाल छोड़ दिया। जब सरकार इतनी तरह की जांच करा रही, तो सिर्फ जेपीसी से परहेज क्यों? क्या बाकी जांच में लीपापोती की गुंजाइश? जेपीसी में भी बहुमत सत्तापक्ष का होता। फिर परहेज का मतलब स्पष्ट। अब इस बात के आसार, अगर पीएसी खुद से जेपीसी जांच की सिफारिश कर दे। तो सरकार के पास कोई विकल्प नहीं बचेगा। सो विपक्ष को घेरने के लिए कांग्रेस का मिशन कर्नाटक जारी। गुरुवार को अभिषेक मनु सिंघवी ने पूछा- राजा मामले में पीएम पर सवाल उठाने वाले सुषमा-जेतली-आडवाणी-जसवंत कर्नाटक मुद्दे पर आंख मूंदे क्यों बैठे? हमने तो बिना दोष साबित हुए कार्रवाई की। पर कर्नाटक में गवर्नर की ओर से मुकदमे की सिफारिश के बावजूद येदुरप्पा को क्यों नहीं हटाया? अगर नैतिकता की शुरुआत करनी है, तो कर्नाटक-उत्तराखंड से हो। सो कांग्रेस ने दबी जुबान में ही कह दिया- क्रिकेट-फुटबाल के ग्राउंड तो होते हैं, पर सियासत में कोई मॉरल ग्राउंड नहीं। सो गुरुवार को सीवीसी मसले पर भी सुप्रीम कोर्ट में सरकार ने कह दिया- सीवीसी थॉमस पर चार्जशीट कोई धब्बा नहीं। ‘यानी दाग अच्छे हैं।’ पर सुप्रीम कोर्ट ने फिर लताड़ा। पूछा- क्या सिलेक्शन कमेटी के सामने थॉमस का सर्विस रिकार्ड रखा गया था? तो सरकार की ओर से जवाब दिया गया- तबके सीवीसी प्रत्यूष सिन्हा ने थॉमस की नियुक्ति को हरी झंडी दी थी। पर कोर्ट ने दो-टूक कहा- नियुक्ति में सीवीसी आखिरी फैसले नहीं लेता। अब सरकार किस स्तर तक गिरेगी, पता नहीं। पर गुरुवार को ए. राजा जब पटियाला हाउस कोर्ट में पेश किए गए। सीबीआई को पांच दिन की रिमांड मिल गई। पर उनके वकील ने इशारा कर दिया- टू-जी आवंटन पर सारे फैसले केबिनेट की सहमति से हुए। सो सिर्फ राजा पर कार्रवाई क्यों? यानी इस खेल में हाथ बहुतों का। सो कहीं ऐसा न हो, मामला ठंडा करने को अभी सीबीआई फुर्ती दिखा रही। पर जैसे ही राजनीतिक माहौल ठंडा हुआ, आकाओं का केस दबाने में माहिर सीबीआई अपना पैंतरा शुरू न कर दे। सिख विरोधी दंगे, पेट्रोल पंप आवंटन, बोफोर्स, चारा घोटाला, आय से अधिक संपत्ति के माया-मुलायम-लालू मुकदमे इस बात के साक्षी। सीबीआई की ओर से सत्ताधीशों को बचाने का प्रयास इतनी दफा हुआ, कोर्ट ने निगरानी तक का काम अपने हाथ में ले लिया। सो जुडिशियल एक्टीविज्म का मुद्दा हमेशा उठता रहा। अब भी घोटालों पर कार्रवाई हो रही, तो इसी एक्टीविज्म की वजह से। सो एक तरफ राजनीतिक हमलों से कांग्रेस बैक फुट पर। तो दूसरी तरफ कोर्ट की लगातार मिल रही फटकार। अब कोर्ट को जवाब देने से पहले सीबीआई ने राजा को कस्टडी में तो ले लिया। पर राजनीतिक-अदालती मोर्चे पर घिरी कांग्रेस करवटें बदल रही।
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03/02/2011

Wednesday, February 2, 2011

परिवर्तन की आहट से राजा की निकली ‘बारात’

आखिर घोटालाधिराज ए. राजा का बाजा बज गया। सीबीआई ने चौथी बार पूछताछ के बाद गिरफ्तार कर लिया। टू-जी स्पेक्ट्रम घोटाले में राजा की परछाईं रहे निजी सचिव आर.के. चंदोलिया और संचार सचिव सिद्धार्थ बेहुरिया भी गिरफ्तार हो गए। तो कांग्रेस फ्रंट फुट पर खेलने लगी। बीजेपी ने राजनीतिक-जनदबाव का नतीजा बताया। जयललिता ने राजनीतिक हथकंडा। पर गिरफ्तारी के बाद भी विपक्ष ने एक सुर में जेपीसी की मांग दोहरा दी। यानी बजट सत्र में विपक्ष फिर हमलावर रुख अपनाने के मूड में। राजा की गिरफ्तारी से विपक्ष के आरोप सच साबित हुए। सो अब सवालों के घेरे में पीएम, जो तीन साल से राजा के राज को जानकर भी अनजान बने रहे। पर हुस्नी मुबारक की तरह जनता का भरोसा खो रही मनमोहन सरकार के लिए राजा की गिरफ्तारी ऑक्सीजन। सो कांग्रेस ने विपक्ष पर पलटवार किया। अपने अभिषेक मनु सिंघवी बोले- सीबीआई जांच की निष्पक्षता पर सवाल उठाने वालों को अब जवाब मिल गया। कानून अपना काम कर रहा, कांग्रेस कोई दखल नहीं दे रही। उन ने बीजेपी को फिर आईना दिखाया। बोले- अगर राजा की गिरफ्तारी राजनीतिक दबाव का नतीजा। तो यही दबाव बीजेपी कर्नाटक में क्यों नहीं दिखाती? सो बीजेपी ने कोर ग्रुप में मंथन किया। काले जादू से बचने के लिए येदुरप्पा आज-कल सूर्य नमस्कार कर रहे। पर बेचारी बीजेपी येदुरप्पा के काले जादू से परेशान। संसद में येदुरप्पा ही ऐसा मुद्दा, जो विपक्ष की एकता में दरार डाल दे। पर बीजेपी के लिए राहत की बात, राजा की गिरफ्तारी के बाद समूचे विपक्ष ने जेपीसी जांच की मांग को जायज ठहराया। सीताराम येचुरी, जयललिता, जेतली ने खम ठोककर कहा- जेपीसी की मांग और मजबूत हुई। जेपीसी जांच का दायरा बड़ा होता है। सिस्टम में क्या गड़बड़ी है, यह जेपीसी ही पता कर सकती। पर कांग्रेस और सरकार की रणनीति फिलहाल सुप्रीम कोर्ट को संतुष्ट करने की। अगले गुरुवार को सीबीआई स्टेटस रिपोर्ट दाखिल करेगी। तो सरकार को उम्मीद, अब तक की कार्रवाई पर अदालत संतोष जताएगी। गर सचमुच ऐसा हुआ, तो कांग्रेस को बजट सत्र में मजबूत ढाल मिल जाएगी। सो राजा की गिरफ्तारी सीबीआई ने कोई मर्जी से नहीं की। अलबत्ता कांग्रेस और करुणानिधि की राजनीतिक डील का नतीजा। जब तक करुणा की कृपा नहीं थी, कांग्रेस कुछ नहीं कर पाई। पर चुनावी मौसम में करुणा को भी मुश्किल, मनमोहन सरकार की छवि तो पूछो ही मत। सो भले कांग्रेस राजा की गिरफ्तारी करा इतराए। डीएमके से गठबंधन टूटने की आशंका खारिज करे। पर क्या कांग्रेस के पास इसके सिवा कोई चारा था? आखिर बकरे की अम्मा कब तक खैर मनाती? आए दिन सुप्रीम कोर्ट की तल्ख टिप्पणियां, राजनीतिक घेरेबंदी और जनमानस में उठ रहे सवालों ने सरकार को मजबूर कर दिया। पर अब गिरफ्तारी ने विपक्ष को और धारदार बना दिया। बीजेपी की प्रवक्ता निर्मला सीतारमन बोलीं- संसद का शीत सत्र कांग्रेस के अहंकार और जिद से हंगामे में खत्म हुआ, यह बात आज साबित हो गई। सो अब पीएम को बताना होगा, जिस राजा को चार पूछताछ में ही जांच एजेंसी ने गिरफ्तारी के लाइक समझा। पीएम तीन साल तक चुप क्यों रहे? हम जेपीसी की मांग पर अभी भी अड़े हुए। यों विपक्ष रेल और आम बजट की संवैधानिक औपचारिकता में खलल नहीं डालेगा। पर बाकी सत्र की तस्वीर अभी साफ नहीं। भ्रष्टाचार के मामले में राजा का पीएम ने कई बार बचाव किया। नवंबर 2010 में सीएजी की रपट के बाद राजा का इस्तीफा हुआ। जबकि इस घोटाले की एफआईआर दो साल पहले दर्ज हो चुकी। और तो और, तमाम खुलासों के बावजूद मौजूदा संचार मंत्री कपिल सिब्बल ने सात जनवरी को प्रेस कांफ्रेंस कर यह साबित करने में रत्ती भर भी कसर नहीं छोड़ी कि राजा बेकसूर। सिब्बल ने घोटाले के आंकड़े को झुठलाते हुए निल बतलाया था। इससे पहले भी आठ दिसंबर को सिब्बल ने यह कहते हुए राजा का बचाव किया था- प्रमोद महाजन की बनाई नीति को राजा ने अपनाया। यानी सिब्बल ने राजा को निर्दोष बताया। पर अब सिब्बल महाराज क्या कहेंगे? जब सब-कुछ सही था, तो राजा गिरफ्तार क्यों हुए? कांग्रेस ने बजट सत्र से पहले राजा की गिरफ्तारी करा विपक्ष की धार कमजोर करने की कोशिश की। राजा को मधु कोड़ा बनाने की कोशिश की। पर सवाल- क्या एकला राजा ने प्रजा को इतना लूटा होगा? स्पेक्ट्रम यानी परछाईं के इस खेल में कितने बड़े खिलाड़ी, अभी खुलासा होना बाकी। सो राजा की गिरफ्तारी ही इति श्री नहीं। राजा तो सिर्फ मोहरा, असली राजदारों का पर्दा उठना बाकी। गिरफ्तारी तब तक सार्थक नहीं, जब तक भ्रष्टाचारियों को नजीर पेश करने वाली सजा न मिले। कहीं ऐसा न हो, हमेशा की तरह राजा की गिरफ्तारी भी राजनीतिक ड्रामा भर रह जाए। जमानत पर छूटकर राजा-प्रजा और सरकार मुकदमा-मुकदमा खेलते रह जाएं। पर फिलहाल सरकार और विपक्ष राजा की गिरफ्तारी से राजनीतिक समीकरण बनाने में जुटे। यों बिहार में डंका बजाने के बाद पहली बार दिल्ली पहुंचे नीतिश कुमार ने सोलह आने सही फरमाया। भ्रष्टाचार से बने माहौल में राजनीतिक परिवर्तन की आहट सुनाई दे रही। सो सचमुच नीतिश उवाच से राजा की गिरफ्तारी के निहितार्थ निकल रहे।
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02/02/2011

Tuesday, February 1, 2011

उपदेशक तो बहुतेरे, कोई अनुकरणीय क्यों नहीं?

एक सुविचार है- उपदेश देने से बेहतर है उदाहरण बनना। पर मौजूदा हालात में अब ऐसे विचार सिर्फ सुनने-सुनाने को ही रह गए। समाज सुविधाभोगी बन रहा। सो जब तक खुद पर कुछ न बीते, जन चेतना जागृत नहीं होती। वरना महंगाई, भ्रष्टाचार, भाई-भतीजावाद की इस अंधाधुंध दौड़ में अपनी जनता शुतुरमुर्ग की तरह रेत में सिर डाले न बैठती। चौक-चौराहे, गली-नुक्कड़ लोग व्यवस्था को कोसने में अब पानी भी नहीं पीते। पर व्यवस्था को बदबूदार बनाने वाले नेताओं को सबक सिखाने का जज्बा सो चुका। मिस्र के आंदोलन ने साबित कर दिया, गर जनता ठान ले, तो व्यवस्था को बपौती मानने वाले भागते फिरेंगे। सचमुच अब हुस्नी मुबारक के मुबारक भरे दिन खत्म होने को। मंगलवार को सेना ने एलान कर दिया- आंदोलनकारियों पर बल प्रयोग नहीं होगा। करीब दस लाख लोगों ने काहिरा में एतिहासिक मार्च कर मुबारक को शुक्रवार तक का अल्टीमेटम दे दिया। पर भारत में दाल की कीमत तीस से सौ रुपए हो जाए, आटा आठ से बाईस रुपए हो जाए, चीनी सोलह से छत्तीस हो जाए, दूध तेरह से तीस हो जाए, पेट्रोल तीस से साठ हो जाए, प्याज दस से अस्सी रुपए हो जाए, फिर भी हम-आप सिर्फ आंसू बहाते रहते। काश, सत्ता में बैठे लोगों को आंसू बहाने के लिए जनता मजबूर करने लगे। तो व्यवस्था को बपौती समझने वालों का नशा काफूर हो जाए। आंदोलन की मानसिकता अगर जल्द नहीं जागी। तो सरकार एक तरफ महंगाई पर उपदेश देगी, दूसरी तरफ बढ़ाएगी। कॉमनवेल्थ गेम्स पर पीएम ने शुंगलू कमेटी बनाई थी। पर तीन महीने में रपट नहीं आनी थी, सो कमेटी को एक्सटेंशन मिल गया। यों अंतरिम रिपोर्ट दी, तो पीएम ने केबिनेट सैक्रेट्री को भेज दी। पर मांग ऐसे की, मानो, पीएम नहीं, विपक्ष के नेता हों। पीएम ने कहा- दोषियों पर सख्त कार्रवाई हो। पर कोई पूछे- कार्रवाई कौन करेगा? गेम्स के फौरन बाद कलमाड़ी को आयोजन समिति से क्यों नहीं हटाया गया? क्या अजय माकन के खेल मंत्री बनने का इंतजार हो रहा था? स्पेक्ट्रम घोटाले में सरकार जेपीसी न बनाने की जिद पर अड़ी। सो अब हंगामे का संकट बजट सत्र पर भी मंडरा रहा। यों मान लिया, कॉमनवेल्थ या स्पेक्ट्रम मामले में जांच चल रही। पर सीवीसी थॉमस के मामले में सरकार या कांग्रेस नजीर पेश क्यों नहीं कर रही? अब तो आईने की तरह साफ हो गया- चार्जशीटेड थॉमस जानबूझ कर सीवीसी बनाए गए। सरकार के इस कबूलनामे के बाद सुषमा स्वराज ने हलफनामा देने का फैसला वापस ले लिया। पर थॉमस ने कोर्ट में नया हलफनामा देकर खुद को निर्दोष और ईमानदार बताया। मीडिया पर छवि बिगाडऩे का आरोप मढ़ा। खुद को राजनीतिक लड़ाई का शिकार बता रहे। यानी अब थॉमस विवाद का पटाक्षेप सुप्रीम कोर्ट ही करेगा। पर तमाम झंझावातों से जूझ रही सरकार और कांग्रेस की हालत कैसी, मंगलवार को सोनिया गांधी ने फिर इजहार किया। चौधरी रणवीर सिंह की स्मृति में डाक टिकट जारी होने का समारोह था। पर सोनिया ने मौजूदा हालात पर चिंता जता सच कबूल लिया। उन ने माना, लोकतंत्र के नाम पर लूटतंत्र चल रहा। सोनिया बोलीं- सत्ता और धन ही सब-कुछ नहीं। सत्ता का सुख ही सब-कुछ नहीं। फिर उस सुख की भी एक सीमा है। एक सीमा तक ही उसका उपयोग हो सकता। उसके बाद यह सिर्फ लोभ और लालच है, एक भ्रम है, जिसके पीछे दुनिया भाग रही। यानी ‘सोनिया सार’ से स्पष्ट हो गया, मनमोहन सरकार कैसा काम कर रही। सोनिया ने चौधरी रणवीर सिंह को अनुकरणीय बताया। बोलीं- उन ने 64 साल की उम्र में राजनीति से रिटायरमेंट ले लिया था। ऐसे आदर्शों का आज महत्व बढ़ जाता है, क्योंकि सत्ता और लालसा के लिए अंधी दौड़ मची है। अब चौंसठ पार के किन नेताओं पर इशारा, सबको मालूम। मनमोहन की एक्सपर्ट कमेटी ने सोनिया की एनएसी के फूड सीक्योरिटी बिल को नामंजूर कर दिया। पीएम से लेकर तमाम बड़े मंत्री चौंसठ पार के। यानी सोनिया ने अगले चुनाव तक सीनियरों के रिटायरमेंट का इशारा कर दिया। सोनिया ने आजादी के वक्त की सोच और आज की सोच में फर्क को भी कबूला। यानी कांग्रेस अब आजादी के वक्त जैसी सोच वाली पार्टी नहीं रही। सोनिया ने सार्वजनिक जीवन का अर्थ भी समझाया। बोलीं- सार्वजनिक जीवन का अर्थ यह है कि हम आम आदमी के दुख और दर्द को समझें, उसे दूर करने के लिए संघर्ष करें। पर खुद सोनिया सरकार की सुपर बॉस। कांग्रेस वर्किंग कमेटी महंगाई पर नकेल को कई दफा प्रस्ताव पास कर चुकी। भ्रष्टाचार से निपटने का संकल्पी अधिवेशन हो चुका। पर कितना असरकारक रहा ‘सोनिया सार’? मंगलवार को बरेली में आईटीबीपी के 416 पद की भर्ती के लिए सात लाख लोग पहुंचे। बरेली में अराजकता की स्थिति बन गई। क्या यही है मनमोहन सरकार की विकास दर? टमाटर-प्याज के बाद खाने के तेल के दाम बढ़ गए। मिस्र की घटना से पेट्रोल के दाम फिर बढ़ें, तो हैरानी नहीं। सो सवाल- उपदेश देना तो आसान, पर कोई उदाहरण क्यों नहीं बनता? राजनीति में अब ऐसा कोई व्यक्तित्व क्यों नहीं, जिसका अनुकरण किया जा सके। उपदेश तो जनता पिछले छह साल से सुन रही। क्या देश अब थॉमसों, पवारों, कलमाडिय़ों, राजाओं का अनुकरण करे?
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01/02/2011

Monday, January 31, 2011

गर मैं चोर, तो तू डाकू, जय हो लोकतंत्र की!

लोकतंत्र की आड़ में तानाशाही के दिन अब लद चुके। काहिरा की कहानी इसकी ताजा मिसाल। मिस्र के राष्ट्रपति हुस्नी मुबारक ने जन दबाव में नई सरकार बना दी। पहली बार उपराष्ट्रपति भी बनाया। पर जनता ने मुबारक को सत्ता से विदा करने का मन बना लिया। सो आंदोलन थमने का नाम नहीं। पर मुबारक तीन दशक से कुर्सी से ऐसे चिपके हुए, हटने का नाम नहीं ले रहे। आंदोलन कुचलने को तानाशाही तरीका अख्तियार कर लिया। पर इतिहास साक्षी, आखिर में जीत जन आंदोलन की ही होती। सो लोकतंत्र को बपौती समझने वालों के लिए ऐसे आंदोलन एक सबक। जैसे हुस्नी मुबारक कुर्सी छोडऩे को राजी नहीं। कुछ वैसे ही अपने सीवीसी पी.जे. थॉमस। सुप्रीम कोर्ट के सवालों और देश भर में हो रही फजीहत के बावजूद थॉमस ताल ठोक कर कह रहे- मैं तो सीवीसी, इस्तीफा क्यों दूं। मनमोहन सरकार भी समझ नहीं पा रही, थॉमस पर क्या रुख अपनाए? कभी बचाव में उतरती, तो कभी सिट्टी-पिट्टी गुम। गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट में एटार्नी जनरल जी.ई. वाहनवती ने दो-टूक झूठ कह दिया- थॉमस की नियुक्ति करने वाले पैनल के सामने चार्जशीट का मामला संज्ञान में नहीं लाया गया। सो बतौर नेता प्रतिपक्ष पैनल में शामिल सुषमा स्वराज ने फौरन मोर्चा खोल दिया। सरकार पर झूठ बोलने का आरोप लगा, खुद हलफनामा दाखिल करने का एलान कर दिया। पर अगले दिन कांग्रेस ने नया पैंतरा आजमाया। दलील दी- मिनिट्स में चार्जशीट की चर्चा नहीं। पर हाथ कंगन को आरसी क्या, पढ़े-लिखे को फारसी क्या। सुषमा स्वराज ने थॉमस की नियुक्ति के फैसले पर दस्तखत के साथ ही लिख दिया था- आई डिसएग्री। यानी बिना चर्चा के कोई ऐसा क्यों लिखेगा। अब सोमवार को खुद होम मिनिस्टर पी. चिदंबरम ने खुलासा कर दिया- सुषमा स्वराज ने जो कहा, वह सोलह आने सही। पैनल ने थॉमस के चार्जशीट पर चर्चा की थी। पर बहुमत से थॉमस की नियुक्ति का फैसला लिया गया। चिदंबरम ने एक और बात कही- स्वाभाविक रूप से कोई महत्वपूर्ण बात हुई होगी। जिस पर सुषमा असहमत रही होंगी। जब चर्चा हुई होगी, तभी असहमति की बात आई। याद रखिए, बिना चर्चा के असहमति का सवाल ही नहीं उठता। अब होम मिनिस्टर के इस बयान के बाद कांग्रेस क्या कहेगी? चिदंबरम ने तो मिनिट्स की दलील भी खारिज कर दी। कहा- मिनिट्स में चर्चा का ब्यौरा नहीं, सिर्फ फैसला लिखा होता। पर चिदंबरम ने एक बार फिर थॉमस की नियुक्ति को जायज ठहराया। अब एटार्नी जनरल ने सुप्रीम कोर्ट में जो कहा, उसे किसकी दलील मानें? अगर सुषमा ने कोर्ट में हलफनामा दाखिल करने का एलान न किया होता। तो सरकार अपने ही एटार्नी जनरल की राय को खारिज नहीं करती। सुषमा कोर्ट जाएं, उससे पहले ही सरकार ने सच कबूल लिया। पर झूठ बोलने वाले एटार्नी जनरल का क्या होना चाहिए? यों अब ए.जी. के बचाव में कहा जा रहा- उन ने यह नहीं कहा कि पैनल के सामने थॉमस के चार्जशीट की चर्चा नहीं हुई। अलबत्ता उन ने यह कहा कि पेपर और फाइल सर्कुलेट नहीं किए गए। सो फिर वही बात, एक झूठ को छुपाने के लिए सौ झूठ का सहारा। सोमवार को कांग्रेस ने थॉमस के  बचाव में कई फाइलें खंगाल डालीं। बीजेपी और लेफ्ट को आईना दिखाते हुए खुद पीछे खड़ी हो गई। कांग्रेस के कानूनदां युवा प्रवक्ता मनीष तिवारी खासे तेवर में बोले- थॉमस के खिलाफ चार्जशीट की बात करने वाली बीजेपी ने भी तो वाजपेयी सरकार के वक्त अयोध्या केस में चार्जशीटेड प्रभात कुमार को केबिनेट सैक्रेट्री बनाया था। जबकि आई.के. गुजराल के पीएम रहते जब प्रभात कुमार का मामला आया था, तो इसी चार्जशीट के आधार पर खारिज कर दिया गया था। फिर तिवारी ने केरल की वामपंथी सरकार को भी याद दिलाया- कैसे केरल सरकार ने अक्टूबर 2006 में थॉमस के खिलाफ मुकदमे की अनुमति मांगी थी। पर सितंबर 2007 में इसी वामपंथी सरकार ने थॉमस को केरल का चीफ सैक्रेट्री बना दिया। अब इसे मनीषियाई दलील कहें या खिसियाई? ऐसी दलीलों का साफ मतलब- अगर मैं चोर, तो तू डकैत। क्या यह लोकतंत्र की आड़ में मनमर्जी नहीं? आखिर सरकार क्या संदेश देना चाह रही? महंगाई, भ्रष्टाचार ने देश की साख पर बट्टा लगा दिया। स्पेक्ट्रम घोटाले में राजा से फिर पूछताछ हुई। पर अभी तक ठोस कार्रवाई नहीं हुई। सुप्रीम कोर्ट में दस फरवरी को स्टेटस रिपोर्ट देने के लिए सीबीआई तेजी का दिखावा कर रही। इधर सिब्बल की बनाई जस्टिस पाटिल कमेटी ने प्रक्रिया की खामी पर अपनी रपट सौंप दी। राजा समेत कई अधिकारियों को जिम्मेदार बताया गया। पर अभी पूरी रपट का खुलासा होना बाकी। रपट सामने आएगी, तो राजनीति भी तय। पर सवाल, देश इस गर्त से कब निकलेगा? भ्रष्टाचार-महंगाई ने निवेश का माहौल बिगाड़ा। नरेगा के ढोल तो सुहाने, पर अब तक बंटे एक लाख छह हजार करोड़ में साठ फीसदी बांटने वाले ही खा गए। श्रम, बीमा, बैंकिंग सुधार अभी भी अधर में। सरकार और सोनिया की एनएसी में एक राय नहीं। रही-सही कसर पर्यावरण के नाम पर जयराम पूरी कर रहे।
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31/01/2011

Friday, January 28, 2011

मनमोहन नहीं, केरल कैडर की सरकार!

 सौ, लाख नहीं, अब खरबों टके का सवाल- पी.जे. थॉमस पर सरकार क्या रुख अपनाएगी? शुक्रवार को दिन भर कांग्रेस खेमे में मत्थापच्ची होती रही। देर शाम हाई-पॉवर वाली कोर ग्रुप की थॉमसाई मीटिंग तय थी। पर आखिरी वक्त में मीटिंग रद्द हो गई। वजह सोनिया गांधी का बीमार होना बताया गया। अस्वस्थता की वजह से ही सोनिया गणतंत्र दिवस समारोह में भी शिरकत नहीं कर पाई थीं। अब शायद सोनिया तो दो-चार दिन में भली-चंगी हो जाएंगी। पर सवाल- सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियों से बीमार मनमोहन सरकार स्वस्थ कैसे होगी? कोर ग्रुप की मीटिंग रद्द हुई। तो पीएम-प्रणव की अकेले में गुफ्तगू हुई। विधि मंत्री वीरप्पा मोइली तो गुरुवार रात ही पीएम से मिल आए। पर थॉमस मुद्दे का हल नहीं मिल रहा। सुषमा स्वराज ने मैदान में कूद सरकार की मुसीबत और बढ़ा दी। अब अगर सुषमा ने बतौर सिलेक्शन कमेटी मेंबर हलफनामा पेश कर दिया। तो सीधे पीएम और होम मिनिस्टर भी पक्षकार हो जाएंगे। सो शुक्रवार को कांग्रेस ने ऑफ द रिकार्ड नया झूठ बांचा। सुषमा ने पीएम-चिदंबरम के सामने थॉमस के खिलाफ चार्जशीट का मामला उठाया था। पर कांग्रेस की ताजा दलील- मीटिंग की मिनिट्स में चार्जशीट की कोई बात नहीं। सुषमा ने चार्जशीट की बात तब उठाई, जब कमेटी थॉमस का नाम एप्रूव कर चुकी थी। अब एक झूठ को छुपाने के लिए कांग्रेस कितना झूठ बोलेगी, आप अंदाजा लगा लें। सुषमा ने एप्रूवल लेटर पर दस्तखत करते हुए ऊपर लिख दिया- ‘आई डिसएग्री’। यानी सुषमा ने असहमति जताई। तो इसका आधार भी दस्तखत से पहले ही बताया होगा। यानी थॉमस के नाम पर मनमोहन-चिदंबरम की ओर से मोहर लगने के बाद सुषमा ने जो समझदारी दिखाई, कांग्रेस बचाव का रास्ता नहीं ढूंढ पा रही। अब आडवाणी ने भी खुलासा किया- जब मैं विपक्ष का नेता था, तभी ऐसे विवाद शुरू हो गए थे। तो मैंने सरकार से कहा था, जिस पैनल में विपक्ष के नेता को रखे जाने का नियम, उसमें किसी भी नियुक्ति के लिए एक से अधिक नाम होना चाहिए। पर सरकार ने सीवीसी के लिए तीन नाम जरूर रखे। फिर भी थॉमस के नाम पर ही अड़ी रही। जबकि सुषमा ने थॉमस को छोड़ बाकी दो नामों में से किसी को भी चुनने का सुझाव दिया था। ये सब बातें अब एक तथ्य, जिन्हें नकारा नहीं जा सकता। पर सवाल- सरकार ने थॉमस नाम पर हठधर्मिता क्यों अपनाई? अब थॉमस गले की फांस बन गए। तो कनफ्यूज्ड सरकार कभी बचाव में उतर आती, तो कभी कदम पीछे खींच लेती। थॉमस को सीवीसी बनाने के लिए सरकार ने खूंटा गाड़ दिया। पर खूंटा उखाडऩे की हिम्मत नहीं। थॉमस ठहरे नौकरशाह। सो नैतिकता को जेब में डाल कुर्सी छोडऩे को राजी नहीं। अब जब सैंया भए कोतवाल, तो भला थॉमस राजनीतिक फायदे के लिए सरकार का मोहरा क्यों बनें? पर थॉमस विवाद ने एक नई थ्योरी शुरू कर दी। आईएएस लॉबी में आजकल दावे के साथ एक गॉसिप चल रहा- थॉमस को हटाना मनमोहन सरकार के बूते में नहीं। वजह- थॉमस केरल कैडर के आईएएस। अब जरा केंद्र सरकार में महत्वपूर्ण पदों पर काबिज नौकरशाहों और उनके राजनीतिक संरक्षकों पर गौर करिए। कैबिनेट सैक्रेट्री के.एम. चंद्रशेखर केरल कैडर से। पीएम के प्रिंसीपल सैक्रेट्री टी.के.ए. नायर केरल कैडर से। देश के होम सैक्रेट्री जी.के. पिल्लई केरल कैडर से। देश के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार शिवशंकर मेनन केरल से। सीवीसी पी.जे. थॉमस के बारे में तो दोहराने की जरूरत नहीं। देश के योजना आयोग में सैक्रेट्री सुधा पिल्लई केरल कैडर से, रिश्ते में होम सैक्रेट्री जी.के. पिल्लई की पत्नी। यानी देश की बागडोर भले राजनीतिक तौर से मनमोहन संभाल रहे। पर प्रशासन पूरी तरह से केरल कैडर के नौकरशाहों के हाथ। अब सवाल- राजनीतिक संरक्षण के बिना नौकरशाह इतने मजबूत कैसे? सरकार में इतने बड़े पदों पर नियुक्ति क्या बिना दस जनपथ की हरी झंडी के संभव? केरल में जब करुणाकरण ने ए.के. एंटनी के खिलाफ मोर्चा खोला था। तो सिर्फ सोनिया के कहने पर ही एंटनी ने सीएम की कुर्सी छोड़ी थी। अब एंटनी केंद्र में रक्षा मंत्री। पर सोनिया के सबसे विश्वस्त सिपहसालार। जिन बड़ी मीटिंगों में सोनिया शामिल नहीं हो सकतीं, उनकी ब्रीफिंग एंटनी ही सोनिया को करते। भले सरकार में कई जीओएम के मुखिया प्रणव दा हों। पर हर जीओएम में एंटनी जरूर मिल जाएंगे। सच्चाई यही, सोनिया कभी भी प्रणव-चिदंबरम जैसे नेताओं को फ्री हैंड नहीं छोड़तीं। सनद रहे, सो 2008 का एक वाकया भी याद दिलाते जाएं। जब एटमी डील पर लेफ्ट ने समर्थन वापसी का मन बना लिया था। प्रणव दा के घर सीताराम येचुरी फैसलाकुन मीटिंग करने पहुंचे। तो उस मीटिंग में एंटनी भी भेजे गए थे। सो मनमोहन लाख चाह लें, थॉमस को नहीं हटा सकते। बाबा रामदेव ने शुक्रवार को सही फरमाया- मनमोहन व्यक्तिगत तौर से ईमानदार। पर राजनीतिक तौर से नहीं। सचमुच थॉमस मामले पर हुई किरकिरी से अब यही लग रहा, देश में मनमोहन नहीं, केरल कैडर की सरकार चल रही।
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28/01/2011

Thursday, January 27, 2011

थॉमस पर और कितनी थू-थू कराएगी सरकार?

अब तो टमाटर-प्याज-अंडे महंगे हो गए। तो आम आदमी भला गुस्से में क्या खाक बरसाएगा? सो सरकार अपना जूता अपने ही सिर मारने लगी। अपने गणतंत्र दिवस के अगले दिन ही सुप्रीम कोर्ट में सीवीसी पी.जे. थॉमस मामले में सुनवाई हुई। तो मानो, सरकार को सांप सूंघ गया। यों 17 जनवरी को जब हलफनामा दाखिल किया। तो थॉमस को ईमानदार छवि का काबिल उम्मीदवार बताया। फिर थॉमस ने भी कोर्ट के नोटिस का जवाब दिया। तो अपने ऊपर लगे आरोपों को राजनीतिक षडयंत्र का हिस्सा बताया। पर गुरुवार को चीफ जस्टिस एस.एच. कपाडिय़ा की बैंच ने सिर्फ इतना भर पूछा- क्या सरकार को थॉमस के खिलाफ चार्जशीट की जानकारी थी? क्या सीवीसी की नियुक्ति में सही प्रक्रिया का पालन किया गया था? पर अटार्नी जनरल जी.ई. वाहनवती ने जवाब दिया- कोलेजियम के सामने यह मुद्दा नहीं लाया गया, न ही पेश किए गए बायोडाटा में ऐसा कोई पहलू था। यानी कुल मिलाकर सरकार ने थॉमस के खिलाफ चार्जशीट होने की जानकारी से इनकार कर दिया। अब सवाल- थॉमस की नियुक्ति पर कितना थू-थू कराएगी सरकार? सितंबर में जब थॉमस सीवीसी बनाए गए। तो तीन मेंबरी कोलेजियम में सुषमा स्वराज ने अपना विरोध जताया। उन ने केरल के पॉम ऑयल घोटाले में थॉमस के खिलाफ चार्जशीट का जिक्र किया। पर बाकी दो मेंबर यानी पीएम-होम मिनिस्टर ने तय कर लिया था। सो विपक्ष की नेता की ना के बावजूद थॉमस सीवीसी बनाए गए। बीजेपी ने बाकायदा राष्ट्रपति का दरवाजा खटखटाया। थॉमस की नियुक्ति पर दस्तखत न करने की गुहार लगाई। पर तब होम मिनिस्टर पी. चिदंबरम ने थॉमस को क्लीन चिट दी थी। सो सात सितंबर को थॉमस की बतौर सीवीसी शपथ हो गई। फिर कांग्रेस ने तो किला फतह करने वाले अंदाज में बीजेपी पर कई दिनों तक लगातार हमले बोले। बीजेपी को संवैधानिक संस्था का मान गिराने वाली करार दिया। अब कांग्रेस बताए, सुप्रीम कोर्ट में वाहनवती ने सच बोला या झूठ? अगर सरकार के संज्ञान में थॉमस के खिलाफ चार्जशीट का मामला नहीं था। तो फिर सवाल सरकार की साख का। जब देश का पीएम और होम मिनिस्टर सीवीसी जैसे महत्वपूर्ण पद पर किसी व्यक्ति को तैनात कर रहे हों और उस व्यक्ति के भूत-वर्तमान का पता न हो। तो ऐसी सरकार से क्या उम्मीद। क्या पता कल को ताजमहल, लालकिला और कुतुब मीनार का टेंडर निकल जाए। फिर सरकार कहे- हमें पता नहीं था। किसी भी सरकारी नियुक्ति से पहले वैरीफिकेशन और सिक्युरिटी क्लीयरेंस की प्रक्रिया निभाई जाती। पर थॉमस के मामले में ऐसा क्यों नहीं किया? यों सीवीसी की नियुक्ति में चौतरफा घिरी सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में गुरुवार को जानबूझकर झूठ बोला। थॉमस की शपथ से पहले चिदंबरम क्लीन चिट दे चुके। तो शपथ के बाद मनमोहन-चिदंबरम ने खम ठोकते हुए कहा था- हमने सही कदम उठाया। तीन नामों के पैनल में से सबसे उम्दा उम्मीदवार चुना। अब पीएम-एचएम जवाब दें- जब सही कदम उठाया, उम्दा उम्मीदवार चुना। तो अब सुप्रीम कोर्ट में हेकड़ी क्यों नहीं दिखा पा रहे? नियुक्ति के वक्त क्लीन चिट दी। मामला सुप्रीम कोर्ट गया। पहली सुनवाई में ही 22 नवंबर को कोर्ट ने पूछा- एक अभियुक्त सीवीसी कैसे हो सकता? बैंच ने माना, आपराधिक मुकदमा झेल रहा व्यक्ति अगर सीवीसी होगा। तो हर कदम पर सवाल उठेंगे। ऐसा व्यक्ति दूसरे की आपराधिक फाइल को आगे कैसे बढ़ाएगा? पर तब अटार्नी जनरल वाहनवती ने दलील दी थी- अगर नियुक्ति के मूल मानदंड के मुताबिक सवाल उठने लगे, तो संवैधानिक पद पर किसी की भी नियुक्ति नहीं हो पाएगी। पर थॉमस ने तो बाद में निर्लज्जता की सारी हदें पार करते हुए कहा- तेल घोटाले में मेरे खिलाफ भ्रष्टाचार नहीं, सिर्फ आपराधिक मुकदमा। उन ने सुप्रीम कोर्ट की कई तल्ख टिप्पणियों के बावजूद इस्तीफा देने से इनकार कर दिया। अब फिसल गए, तो हर-हर गंगे कर रही सरकार। सो विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज भी थॉमस विवाद में सीधे कूद पड़ीं। सुप्रीम कोर्ट में अटार्नी जनरल की राय को सफेद झूठ करार देते हुए एफीडेविट डालने का एलान कर दिया। बोलीं- नियुक्ति के वक्त मैंने पॉम ऑयल घोटाले में थॉमस के खिलाफ चार्जशीट का मामला कोलीजियम में उठाया था। लेकिन सच सामने लाने को अब मैं खुद कोर्ट में एफीडेविट दूंगी। सुषमा की बात में दम, क्योंकि बीजेपी ने थॉमस की शपथ से पहले ही यह मुद्दा उछाल राष्ट्रपति से अपील की थी। सो अब कांग्रेस को काटो, तो खून नहीं। गुरुवार को शकील अहमद बोले- यह मामला सरकार और सुप्रीम कोर्ट के बीच। पर सुषमा कोर्ट जाना चाहें, तो जा सकतीं। अब थॉमस मामले की सुनवाई अगले हफ्ते होगी। तो पता नहीं सरकार कौन सा नया राग सुनाएगी। थॉमस के खिलाफ चार्जशीट की जानकारी सरकार को शायद तब मिली, जब करुणाकरण का देहांत हो गया। सुप्रीम कोर्ट ने पॉम ऑयल घोटाले में ट्रायल को हरी झंडी दिखा दी। अब जिस सरकार को अपने मुलाजिम की जानकारी नहीं। वह भला मजबूर जनता की क्या फिक्र करेगी?
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27/01/2011

Tuesday, January 25, 2011

अराजक होता ‘तंत्र’, लुटता-पिटता ‘गण’

अंधा बांटे रेवड़ी, अपनों-अपनों को देय। सचमुच नेताओं ने अपने गणतंत्र को सठियाने को मजबूर कर दिया। सो गणतंत्र के इकसठ साल पूरे होने की पूर्व संध्या पर हर साल की तरह पद्म अवार्ड का एलान हुआ। तो मनमोहन सरकार ने अंधा और रेवड़ी की कहावत फिर चरितार्थ कर दी। गांव के लोगों को पेटू बताकर महंगाई से मुंह चुराने वाले योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह आहलूवालिया पद्म विभूषण हो गए। यानी देश के दूसरे सर्वोच्च नागरिक सम्मान से मनमोहन ने अपने दोस्त को नवाज दिया। क्या महंगाई का ठीकरा गांव के गरीबों पर फोडऩा नागरिक सेवा कहलाता? वाजपेयी सरकार में सत्ता की चाबी घुमाने वाले बृजेश मिश्र भी मनमोहन राज में पद्म विभूषण हो गए। एटमी डील पर बीजेपी की नैया डुबो, मनमोहन को पार लगाया। सो देश का दूसरा सर्वोच्च नागरिक सम्मान मिल गया। अब नागरिक सम्मान ऐसे बंटेंगे, तो गणतंत्र का क्या सम्मान होगा? सो संकटों से जूझ रहा अपना देश गणतंत्र के बासठवें साल में प्रवेश कर रहा। पर चुनाव में बेरंग हुआ विपक्ष अब तिरंगे से राजनीति का रंग ढूंढ रहा। तो सरकार ब्लैकमनी के मामले में दिल से ब्लैक दिख रही। गणतंत्र की पूर्व संध्या पर वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी ने ब्लैकमनी पर सफाई पेश की। तो एक बार फिर काले चोरों का नाम बताने से इनकार कर दिया। पर दलील दी- जब आयकर विभाग जांच के बाद मुकदमा दायर करेगा। तो नाम खुद-ब-खुद सामने आ जाएंगे। यों प्रणव दा ने माना, पिछले 18 महीने में 15,000 करोड़ रुपए काले धन का पता चला। जिनसे 34,601 करोड़ रुपए की कर वसूली हुई। पर सवाल- क्या सिर्फ टेक्स चोरी की कार्रवाई से ही काला धन सफेद हो जाएगा? काले चोरों ने देश का धन चुराकर विदेशों में जमा किया। तो क्या यह देश के साथ अपराध नहीं? आखिर समझौते की ओट में चोरों का नाम छुपाने का क्या मतलब? अब प्रणव दा ने पांच सूत्री कार्य योजना का एलान किया। पर बीजेपी का आरोप- नाम खुला, तो कांग्रेस को परेशानी होगी। सो सरकार में काले धन पर संकल्प का अभाव। अगर सरकारें ठान लें, तो क्या कुछ नहीं हो सकता। बीजेपी की तिरंगा यात्रा को रोकने की उमर अब्दुल्ला ने ठान ली। सो मंगलवार को लखनपुर बार्डर पर ही यात्रा को रोक दिया। तमाम छोटे-बड़े नेता गिरफ्तार कर लिए गए। पर गिरफ्तारी के बाद सुषमा-जेतली ने तिरंगे की आन की खातिर खूब तेवर दिखाए। जेतली बोले- आजादी से पहले तिरंगा उठाने वालों को गिरफ्तार किया जाता था। अब जम्मू-कश्मीर में फिर वैसा ही हुआ। सुषमा ने क्रोध का इजहार करते हुए पूछा- हमारा अपराध क्या? हम तो तिरंगा फहराने आए थे। अलगाववादियों की चुनौती स्वीकार की। सो हमें सुरक्षा नहीं चाहिए। भले तिरंगा फहरा कर लाल चौक से हम जिंदा लौटें या मुर्दा। पर सरकार ने तिरंगे पर पहरा लगा अलगाववादियों को संरक्षण दिया। यों सुषमा की दलील सोलह आने सही। पर अपना फिर वही सवाल- लाल चौक पर तिरंगा फहरा लेने से क्या अलगाववाद खत्म हो जाएगा? क्या कश्मीर समस्या सुलझ जाएगी? अगर बीजेपी का जवाब हां, तो फिर सवाल- जम्मू-कश्मीर की सत्ता में भागीदार और केंद्र के छह साल के राज में हर साल झंडा फहरा कर अलगाववाद खत्म क्यों नहीं कर लिया? क्यों आडवाणी हुर्रियत वालों को बुलाकर मेज गोल-गोल करते रहे? कभी कोई नेता आम आदमी के लिए जिंदा या मुर्दा का संकल्प क्यों नहीं लेता? पर बात तिरंगा यात्रा की। तो गिरफ्तारी के बाद सीएम उमर अब्दुल्ला ने भी संदेश दिया। बोले- लाल चौक भारत का हिस्सा। पर शांति भंग नहीं होने दी जाएगी। उमर ने न सिर्फ बीजेपी की यात्रा रोकी। अलबत्ता अलगाववादियों को भी रोकने का बंदोबस्त कर रखा। श्रीनगर के लाल चौक पर जबर्दस्त पहरा। पर चोरी-छिपे बीजेपी के कुछ वर्कर श्रीनगर पहुंच चुके। सुषमा ने खुद इस बात का एलान किया। सो सबकी निगाह गणतंत्र दिवस पर। दिल्ली में राजनाथ सिंह राजघाट पर भूखे पेट धरना दिए बैठे। पर देश का आम आदमी ने कितनी रात भूख में गुजारी, क्या किसी नेता को सही आंकड़ा मालूम? तिरंगे का सम्मान हो, पर तीन रंग के सही अर्थ की तरह। वोट बैंक के लिए रंगों का मतलब नहीं बदलना चाहिए। पर अफसोस, इकसठ साल में ही नेताओं ने गणतंत्र का बैंड बजा दिया। मंगलवार को प्रणव दा ने ब्लैकमनी पर सफाई दी। बीजेपी ने तिरंगे पर रंग दिखाया। महाराष्ट्र के मनमाड़ में तेल माफियाओं ने मिलावट से रोकने वाले एडीएम को जिंदा जला दिया। तो न्याय व्यवस्था की लेटलतीफी, बच्चियों पर जुल्म से आहत उत्सव शर्मा ने गाजियाबाद कोर्ट के बाहर आरुषि के पिता राजेश तलवार पर फरसे से हमला कर दिया। इसी शख्स ने रुचिका गिरहोत्रा कांड के दोषी एसपीएस राठौड़ पर भी हमला किया था। सो अब भले उत्सव शर्मा की मानसिक हालत खराब बताई जा रही। पर अपने गणतंत्र के लिए यह सबक, कैसे इकसठ साल में ही दम घुट रहा। भ्रष्टाचार हो या गरीबी, पानी सिर से निकलने के बाद नया कानून बनाने का सुर्रा भर छोड़ दिया जाता। सो नेताओं की वजह से आज व्यवस्था से भी लोगों का भरोसा उठता दिख रहा। पद्म अवार्ड ने भी मंगलवार को इसका नमूना दिखा दिया। पिछली बार ओलंपिक में जीतने वाले तमाम खिलाडिय़ों को पद्म अवार्ड मिल गए। पर गांव का छोरा और कुश्ती में बाजी मारने वाला सुशील छूट गया था। सो अबके सरकार ने भूल सुधार कर ली। यानी सचमुच आज गणराज्य तो लुट-पिट रहा। तंत्र में बैठने वाले मलाई मार रहे।
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25/01/2011