Tuesday, February 8, 2011

सरस्वती पूजा के दिन सबको आई सद्बुद्धि

घोटालों का मौसम विदा होने का नाम नहीं ले रहा। सो उधर टू-जी स्पेक्ट्रम घोटाले के राजा की रिमांड बढ़ी। तो इधर एस बैंड स्पेक्ट्रम पर पीएमओ को सफाई देनी पड़ी। पीएमओ की मानो, तो ऐसी किसी डील को मंजूरी नहीं दी गई। सो नुकसान की खबर गलत। पर पीएम के मातहत अंतरिक्ष विभाग का जिम्मा संभाल चुके पृथ्वीराज चव्हाण ने 2010 में ही घोटाला सामने आने की बात मानी। तो पीएम के अधीन अंतरिक्ष विभाग ने भी अपनी सफाई में माना- एंट्रिक्स और देवास के बीच 28 जनवरी 2005 को हुए करार की विभागीय समीक्षा हो रही है और जनता के हित में सरकार हर संभव कदम उठाएगी। सो दूसरे दिन भी विपक्ष ने पीएम पर निशाना साधा। बीजेपी के रविशंकर प्रसाद ने पूछा- मिस्टर पीएम, और कितने घोटाले होंगे। उन ने सोनिया गांधी की चुप्पी पर भी सवाल उठाए। विपक्षी खेमे से अब एस बैंड स्पेक्ट्रम को भी जेपीसी के दायरे में लाने की मांग होने लगी। सो बदलते मौसम, यानी सर्दी-गर्मी के बीच बसंत ऋतु का आगमन हुआ। तो सरकार की सोच भी बदलने लगी। राजा की तरह अगर पीएम पर भी विपक्षी बंदूकें तन गईं। तो मिड-टर्म पोल के सिवा कोई विकल्प नहीं। सो देर से ही सही, कांग्रेस दुरुस्त आ रही। बसंत पंचमी के दिन संसद का गतिरोध तोडऩे के लिए मीटिंग हुई। सो ज्ञान की देवी मां सरस्वती की कृपा ही कहिए, पक्ष-विपक्ष सबकी अक्ल के बल्ब जल उठे। संसद की गरिमा की सुध अब जुबां पर आने लगी। भ्रष्टाचार पर जेपीसी जांच की मांग ने संसद के शीत सत्र की बलि ली। अब तलवार बजट सत्र पर भी लटकती दिखी। सो सब-कुछ लुटाकर कांग्रेस होश में लौट आई। मंगलवार की सर्वदलीय मीटिंग में तुरत-फुरत फैसला तो नहीं हुआ। पर जेपीसी के आसार अब बनने लगे। मीटिंग में प्रणव मुखर्जी ने साफ इशारा कर दिया- संसद की कार्यवाही सुचारु ढंग से चले, इसके लिए कोई भी कीमत अधिक नहीं होगी। यानी जेपीसी पर अब तक सीधा ना कर रही कांग्रेस ने अपने कदम पीछे खींच लिए। विपक्ष ने भी मीटिंग के बाद गतिरोध खत्म होने की उम्मीद जताई। सुषमा स्वराज ने तो प्रणव दा से भी अधिक स्पष्ट कह दिया- शीत सत्र में भी जेपीसी नकारने की एक भी वजह सरकार स्पष्ट नहीं कर पाई। सहयोगी दल भी जेपीसी पर एतराज नहीं कर रहे थे। पर अब आज की मीटिंग से मुझे काफी से अधिक उम्मीद बंधी है कि सत्र शुरू होने पर सरकार जेपीसी मान जाएगी और संसद चलेगी। पर सरकार की ओर से औपचारिक जवाब आना अभी बाकी है। सुषमा के बयान का मतलब साफ, अनौपचारिक सहमति तो बन गई, पर औपचारिकता की चादर में सरकार अपनी खाल बचाएगी। सीताराम येचुरी ने भी कह दिया- सरकार जेपीसी के बारे में सदन में प्रस्ताव लाए, तो हम चर्चा को तैयार। पर हम चाहते हैं, संसद चले और जेपीसी भी हो। गुरुदास दासगुप्त ने तो तस्वीर ही साफ कर दी। बोले- जेपीसी को लेकर गतिरोध टूटने की पूरी उम्मीद। पर जेपीसी के गठन की घोषणा संसद के भीतर ही की जा सकती। वरना विशेषाधिकार हनन का मामला बनेगा। पर कांग्रेस सीधे जेपीसी की हामी भरने के बजाए संसद को ढाल बनाने की रणनीति अपना रही। सो विपक्ष के कड़े तेवर को देखते हुए कांग्रेस ने प्रस्ताव पर वोटिंग का फार्मूला छोड़ दिया। अब सत्र की शुरुआत तक सब ठीक-ठाक रहा, तो पहले दिन ही सरकार सदन में प्रस्ताव लाएगी। जिस पर सभी दल अपनी-अपनी बात रखेंगे। आखिर में सरकार की ओर से सदन की भावना का सम्मान करते हुए जेपीसी का एलान हो जाएगा। पर उससे पहले एक और फैसलाकुन सर्वदलीय मीटिंग होगी। जिसमें जेपीसी के टर्म एंड रिफरेंस से लेकर सदस्यों के नाम पर भी अनौपचारिक चर्चा होने के आसार। कांग्रेस ने तो मंगलवार को ही कह दिया- जेपीसी मानेंगे, पर अपनी शर्तें भी जोड़ेंगे। सो कहीं शर्त के चक्कर में फिर कोई गड़बड़झाला न हो जाए। वैसे भी भ्रष्टाचार के मुद्दे पर तीन महीने तक सब-कुछ लुटा कांग्रेस अब होश में आ रही। जेपीसी न मानने के तमाम हथकंडे धरे रह गए। राजा के उत्तराधिकारी कपिल सिब्बल ने तो सीएजी को ही झुठला दिया था। पर अब राजा गिरफ्तार हो चुके। तो सिब्बल को कुछ नहीं सूझ रहा। सिब्बल ने जस्टिस शिवराज पाटिल कमेटी भी गठित की थी। जिसमें 2003 की एनडीए सरकार के वक्त से ही गड़बड़ी की रिपोर्ट। सो अब एनडीए सरकार में संचार मंत्री रहे अरुण शौरी ने मोर्चा खोला। सिब्बल को राजा का वकील बताया। बोले- सिब्बल हमेशा राजा को बचाने की कोशिश कर रहे। जस्टिस पाटिल की रिपोर्ट भी गलतबयानी और सरकार को मदद करने वाली। शौरी ने दावा किया- मेरे पास कुछ ऐसे दस्तावेज, जिन्हें दबाया गया और कैग के सामने पेश नहीं किया गया। यानी शौरी ने सिब्बल को चेतावनी दे दी। सो अपने हर मोहरे पिटवा चुकी कांग्रेस के पास अब जेपीसी के सिवा कोई रास्ता नहीं। विपक्ष ने मंगलवार को नरमी से ही सही, पर राग वही- संसद चलाना चाहते, पर पहले जेपीसी बने। सो कभी झुकती, कभी अकड़ती कांग्रेस अब लेटने को मजबूर हो गई। अब जेपीसी से भ्रष्टाचार का क्या बिगड़ेगा, यह तो पता नहीं। पर संसद के दिन जरूर बहुरेंगे।
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08/02/2011

Monday, February 7, 2011

‘हाथ’ में नहीं अपनी लगाम, न्यायपालिका को नसीहत

बजट सत्र का क्या होगा, तस्वीर अभी साफ नहीं। सोमवार को स्पीकर मीरा कुमार ने लोकसभा के नेताओं की मीटिंग ली। पर हालात जस के तस। सो अब निगाह मंगलवार की प्रणव दा वाली मीटिंग पर टिकीं। कांग्रेस जेपीसी की मांग पर सरेंडर नहीं दिखना चाहती। पर फिलहाल विपक्ष को लोकसभा में जेपीसी पर बहस और वोटिंग का फार्मूला भी नामंजूर। अब तो टू-जी के बाद इसरो से जुड़े एस बैंड स्पेक्ट्रम आवंटन में घोटाले का खुलासा हो रहा। इसरो सीधे पीएम के मातहत। देवास मल्टीमीडिया के चेयरमैन एम.जी. चंद्रशेखर पीएम के वैज्ञानिक सलाहकार रह चुके। इसी कंपनी को 70 मैगाहार्ट्ज वाला एस बैंड महज एक हजार करोड़ रुपए में आवंटित हुआ। पर सरकारी कंपनी एमटीएनएल-बीएसएनएल को इसी की कीमत साढ़े बारह हजार करोड़ रुपए चुकानी पड़ी। सो सीएजी की रपट में अनियमितता का खुलासा हुआ। तो कहा जा रहा- यह घोटाला टू-जी से भी बड़ा। यानी टू-जी घोटाला 1.76 लाख करोड़ का। तो इसके बारे में अनुमान दो लाख करोड़ से अधिक का। अब संचार मंत्रालय के घोटाले में राजा कुर्सी छोड़ जेल गए। अगर इसरो से जुड़े मामले में कैग ने घोटाले को पुख्ता कर दिया। तो सवाल- पीएम मनमोहन का क्या होगा? सोमवार को विपक्ष ने सीधे पीएम से जवाब मांग लिया। लेफ्ट ने इस मामले में भी जेपीसी की मांग कर दी। सो क्या करे या ना करे, कांग्रेस को समझ नहीं आ रहा। पर सुप्रीम कोर्ट और राजनीतिक मोर्चे से बेभाव की पड़ रही मार से कांग्रेस अब दर्द महसूस करने लगी। अपने पीएम मनमोहन सिंह ने इतवार को अपना सारा दर्द उड़ेल दिया। जब हैदराबाद में आयोजित कॉमनवेल्थ लॉ कांफ्रेंस में चीफ जस्टिस एस.एच. कपाडिय़ा की मौजूदगी में बोले- सरकार की जिम्मेदारी तय करने में न्यायिक समीक्षा की भूमिका अहम। पर इसका इस्तेमाल शासन के दो अन्य अंगों- कार्यपालिका और विधायिका में दखल के लिए नहीं होना चाहिए। यानी न्यायिक सक्रियता से मनमोहन सरकार की सांसें फूल रहीं। पर न्यायपालिका को नसीहत देने से पहले पीएम ने अपनी सरकार की दशा क्यों नहीं देखी? कैसे एक गरीब किसान की आत्महत्या के केस से रसूखदार साहूकार को बचाने वाला नेता केंद्र में ग्रामीण विकास मंत्री बन जाता। कैसे चार्जशीटेड नौकरशाह सीवीसी बन जाता। बोफोर्स मामले के दलाल के खाते खुलवा दिए जाते। सिख विरोधी नरसंहार के आरोपियों की फाइल बंद कर दी जाती। अनाज भले सड़ जाए, पर भुखमरी के शिकार लोगों तक नहीं पहुंचता। अगर कार्यपालिका-विधायिका में बैठे महानुभाव निष्ठा के साथ काम करें, तो न्यायपालिका क्यों दखल देगी? अपने संविधान में कार्यपालिका, विधायिका, न्यायपालिका की अपनी-अपनी लक्ष्मण रेखा। पर जब एक पलड़ा कमजोर पड़ता, तो दूसरा हावी दिखने लगता। सो मनमोहन को अपनी सरकार में न्यायपालिका का दखल नजर आ रहा। तो उसके जिम्मेदार खुद मनमोहन। आखिर सीवीसी पी.जे. थॉमस पर इतनी पंगु क्यों? कोर्ट में अलग-अलग स्टैंड लेकर खुद ही भद्द पिटवा रही। अब सोमवार को थॉमस के वकील ने ऐसी दलील दी, शर्म भी पानी मांगे। कहा- जब देश के 153 सांसद आपराधिक रिकार्ड वाले, तो सीवीसी थॉमस क्यों नहीं? यानी जब दागी लोग सांसद बन सकते, तो सीवीसी क्यों नहीं। थॉमस के वकील ने नियुक्ति को सुप्रीम कोर्ट के समीक्षा दायरे से बाहर करार दिया। अगर न्यायपालिका गलत, तो आम लोगों का उस पर इतना भरोसा क्यों? गाहे-ब-गाहे मनमोहन कोर्ट को तो नसीहत दे रहे। कभी सड़े अनाज के मामले में, तो कभी स्पेक्ट्रम-थॉमस जैसे मामलों में। पर नेता कभी अपनी इमेज क्यों नहीं सुधारते? न्यायपालिका का इस्तेमाल सहूलियत के लिए नहीं। पीएम की नजर में कोर्ट की हाल की टिप्पणियां दखलंदाजी, तो सवाल- स्पेक्ट्रम घाटले में विपक्ष की धार कमजोर करने के लिए सीबीआई जांच को सुप्रीम कोर्ट ने मॉनीटर करवाने का फैसला किसने लिया? इतिहास तो यही इशारा कर रहा- जब नेताओं, मंत्रियों, अफसरों ने गठजोड़ कर लोकतंत्र के क्रियाकर्म का प्रोग्राम बना लिया, तब न्यायपालिका ने अपने दायरे के तहत सक्रिय और प्रभावी भूमिका का बीड़ा उठाया। जैन हवाला कांड हो या संचार टैंडर घोटाला। मकान आवंटन में भ्रष्टाचार हो या हवाला कांड में चार्जशीट का मामला। लक्खूभाई पाठक या सेंट किट्स मामले हों या चारा घोटाला। झारखंड मुक्ति मोर्चा रिश्वत कांड हो या बोफोर्स घोटाला। सभी मामलों में तभी नई जान आई, जब अदालतों ने कदम उठाया। सीबीआई तो हमेशा आकाओं को बचाने में लगी रही। सो चीफ जस्टिस एम. एन. वेंकटचलैया ने तो जैन हवाला मामले में तत्कालीन सीबीआई डायरेक्टर विजय रामाराव को निजी तौर पर जवाबदेह बनाया। कई बार कोर्ट की जांच पर मॉनीटरिंग सवालों के घेरे में रही। पर जस्टिस जे.एस. वर्मा ने साफ कर दिया था- मॉनीटरिंग का मतलब कार्यपालिका का अधिकार हथियाना नहीं, उसके कर्तव्य निर्वहन का अहसास कराना। जस्टिस चेनप्पा रेड्डी ने कहा था- अदालतों को निगरानी का काम इसलिए हाथ में लेना पड़ा, क्योंकि उसके आदेशों को पूरा करने में कार्यपालिका का रिकार्ड खराब रहा है। सचमुच न्यायपालिका तो संविधान और कानून के दायरे में अपनी बात रखती। पर कार्यपालिका-विधायिका कैसे काम करतीं, किसी भी आम आदमी से पूछकर देखो।
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07/02/2011

Friday, February 4, 2011

मनमोहन, प्रणव और अलादीन का चिराग

मिस्र में हुस्नी मुबारक के खिलाफ अल्टीमेटम के आखिरी दिन यानी डे ऑफ डिपार्चर से जनता की ताकत दिख गई। आंदोलन से झुके मुबारक सत्ता छोडऩे को राजी। पर अव्यवस्था का हौव्वा दिखा रहे। अपनी कांग्रेस ने भी जेपीसी के मसले पर हमेशा ओछी राजनीति का डर दिखाया। पर इबके मार, इबके मार करते-करते कांग्रेस ने अपने सारे मोहरे पिटवा लिए। जेपीसी की मांग ठुकराने को नित-नए फार्मूले लाई। पर न कोर्ट से, न संसद में राहत मिली। सो शीत सत्र से अब तक चौतरफा पड़ी मार से कराह रही कांग्रेस ने आखिर जेपीसी पर सरेंडर कर दिया। जेपीसी की मांग सीधे-सीधे तो नहीं कबूली। पर संसद में बहस के बाद वोटिंग को राजी हो गई। यानी पहले विपक्ष के जेपीसी वाले प्रस्ताव पर बहस हो, फिर वोटिंग। अगर सदन का बहुमत जेपीसी के पक्ष में गया, तो सरकार राजी। कांग्रेस ने चेहरा बचाने को अब आखिरी पत्ता भी चल दिया। अब जेपीसी का प्रस्ताव लोकसभा में पारित हो गया। तो संसद के सम्मान में अपनी आन छुपा लेगी। अगर प्रस्ताव गिर गया, तो विपक्ष को हंगामाई साबित करने का मौका मिल जाएगा। यानी अब जेपीसी पर वही नंबर गेम होगा, जो 22 जुलाई 2008 को मनमोहन ने अपनी सरकार बचाने के लिए खेला था। सो इम्तिहान यूपीए के घटक दलों का। लोकसभा में ममता-पवार-करुणा का रुख ही जेपीसी का भविष्य तय करेगा। तीनों अब तक गाहे-ब-गाहे जेपीसी की मांग का समर्थन करते आए। सो अब संसद के बजट सत्र में तय होगा, सरकार सचमुच जेपीसी को राजी या फिर राजनीतिक पेंतरेबाजी। सरकार का भरोसा आखिर कोई कैसे करे। कपिल सिब्बल अभी भी एनडीए की नीति को स्पेक्ट्रम घोटाले की वजह बता रहे। शुक्रवार को सिब्बल ने फिर कहा- स्पेक्ट्रम आवंटन में 2003 के बाद सबने गलत फैसले लिए। एनडीए सरकार के मंत्री ने पहले आओ, पहले पाओ की नीति लागू कर दी। जो 31 अक्टूबर 2003 के केबिनेट फैसले का भी उल्लंघन। पर सवाल- अगर एनडीए की नीति गलत थी, तो यूपीए सरकार में बने नियंता कौन सी नींद में थे? एनडीए ने गलती की, तो जनता ने मई 2004 में सबक सिखा दिया। पर यूपीए सरकार भी अगर एनडीए के ढर्रे पर चली। तो सवाल- मंत्री के पास सोचने की क्षमता नहीं थी? चुनाव लडऩे के लिए अपने जनप्रतिनिधित्व कानून में बाकायदा यह शर्त- मानसिक रूप से दिवालिया व्यक्ति चुनाव नहीं लड़ सकता। सचमुच मंत्री को मानसिक दिवालिया नहीं कहा जा सकता, क्योंकि इतना बड़ा घोटाला बिना दिमाग के संभव नहीं। अगर सिब्बल की दलील मान भी लें। तो तब करीब छह-आठ महीने विपक्ष में और पिछले छह साल से सत्ता में बैठी कांग्रेस ने बीजेपी को कटघरे में खड़ा क्यों नहीं किया? जब खुद कांग्रेस की गर्दन फंसी, तो भ्रष्टाचार पर सख्ती दिखाने के बजाए आरोप-प्रत्यारोप क्यों? और तो और, जब 2003 के बाद हुए सारे फैसले गलत, तो सात जनवरी को सिब्बल ने राजा को क्लीन चिट कैसे दी? सुविधा की राजनीति में देश का कितना बेड़ा गर्क करेगी सरकार? यों पहली बार मनमोहन ने भ्रष्टाचार पर जोरदार बातें कीं। बातें तो पहले भी करते रहे। पर अबके यह माना- भ्रष्टाचार से सुशासन की जड़ें खोखली हो रहीं। तेज विकास की राह में रोड़ा बन रहा। इसके कारण अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर हमारी छवि धूमिल होती है और यह हमें अपने लोगों के सामने शर्मिंदा करता है। सचमुच बात तो पीएम ने पते की कही। पर पता नहीं तीन साल से राजा का पता क्यों नहीं बदल पा रहे? जिस राजा को तीन साल पहले जेल में होना चाहिए था, वह मनमोहन के मंत्री बने रहे। मनमोहन की चिट्ठियों को भी नजरअंदाज कर दिया। पर मनमोहन की नजर-ए-इनायत रही। अगर पीएम ने तभी कार्रवाई का साहस दिखाया होता, तो शर्मिंदगी की नौबत न आती। पर मनमोहन ने शुक्रवार को जो कहा, क्या उस पर अमल भी करेंगे? या फिर सुविधा के मुताबिक महज बयान ही रह जाएगा। या फिर जैसे महंगाई पर छह साल से बयान दे रहे, वैसा ही होगा। मनमोहन ने भ्रष्टाचार के साथ-साथ शुक्रवार को महंगाई पर भी बात की। पर महंगाई से अधिक चिंता विकास दर को लेकर जताई। पीएम पूरी ताकत लगाकर बोले- महंगाई आर्थिक विकास की तीव्र गति के लिए गंभीर खतरा। इससे गरीब और कमजोर वर्ग के लोगों पर असर पड़ रहा। सो महंगाई पर तत्काल काबू पाने की जरूरत। इधर माननीय पीएम ने तुरंत काबू की बात की। तो उधर वित्तमंत्री प्रणव मुखर्जी बोले- हमारे पास कोई अलादीन का चिराग नहीं, जो महंगाई को तत्काल काबू में कर लिया जाए। आप ऐसी उम्मीद नहीं कर सकते कि आपके पास अलादीन का चिराग है, जिसको रगड़ें और परेशानी छू-मंतर हो जाए। प्रणव दा ने सही कहा। भइया, जब महंगाई छह साल से बढ़वाते आ रहे, तो भला एक दिन में कैसे कम होगी? काश, जनता के पास वोट के बजाए अलादीन का चिराग होता। तो क्या पांच साल झेलने की नौबत आती? अब भी आम आदमी न समझे, तो कांग्रेस का क्या। एक तो महंगाई मार रही, ऊपर से सरकार की ऐसी भाषा। अकर्मण्यता को छिपाने के लिए अलादीन का चिराग ढूंढ रहे। पर प्रणव दा यह क्यों नहीं समझ रहे, गर सब-कुछ चिराग का जिन्न ही कर लेता। तो क्या अपने लिए आलीशान महल नहीं बनवा लेता, चिराग में ही क्यों रहता?
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04/02/2011

Thursday, February 3, 2011

कस्टडी में ‘श्री’ राजा, पर करवटें बदल रही कांग्रेस

मिस्र में हालात बद से बदतर हो गए। मुबारक विरोधी और समर्थकों के बीच हिंसक दौर शुरू हो गया। तो अब हताश हुस्नी मुबारक ने मीडिया पर निशाना साध लिया। मीडिया को ब्लैक आउट किया गया। कई मीडिया वालों पर जासूसी का आरोप लगा, पिटाई तक हो गई। तो संयुक्त राष्ट्र के सैक्रेट्री जनरल बान की मून ने दुनिया से अपील की। मिस्र में अभिव्यक्ति की आजादी की रक्षा की जाए। अब मुबारक के रहते मीडिया की कितनी रक्षा होगी, यह तो बाद की बात। पर अपने देश में घोटालाधिराज ए. राजा की रक्षा में डीएमके जरूर उतर आई। कांग्रेस भी राजा की गिरफ्तारी से जेपीसी की वैतरिणी पार मान रही। पर पहले बात डीएमके की, जिसने पार्टी के प्रचार सचिव पद से राजा का इस्तीफा नामंजूर कर दिया। करुणानिधि ने सियासत का गुणा-भाग कर राजा को पार्टी से नहीं निकाला। अलबत्ता विपक्ष की हाय-तौबा पर बेशर्मी दिखा दी। डीएमके ने खम ठोककर कहा- गिरफ्तारी से यह साबित नहीं होता कि राजा दोषी। पर राजा ने किस तरह कट ऑफ डेट खिसका पसंदीदा कंपनियों को टैंडर दिए, एक कंपनी ने प्रावधान बदले जाने से एक दिन पहले ही ड्राफ्ट जमा कराए। बाकी राजा की चहेती नौ कंपनियां जेब में ड्राफ्ट लेकर पहुंची थीं। सो स्पेक्ट्रम की सही मायने में हकदार कंपनी ड्राफ्ट बनवाने में ही फंसी रही। रीयल एस्टेट वाले सस्ते दाम पर स्पेक्ट्रम लूट ले गए। बाद में कई गुना अधिक दाम पर विदेशी कंपनियों को बेच दिया। ये सारे ऐसे तथ्य, जिन्हें कोई अंधा भी आसानी से पढ़ ले। पर राजा डीएमके की मजबूरी, सो बचाव करना लाजिमी। गर राजा डीएमके से भी दर-ब-दर हुए, तो कलई खुलने का डर। साथ ही दलित वोट का समीकरण भी बिगड़ता। सो सही मायने में करुणानिधि राजा का नहीं, अलबत्ता खुद का बचाव कर रहे। यों करुणा की इस मजबूरी का राजनीतिक फायदा सीधे कांग्रेस को मिल रहा। डीएमके ने कांग्रेस की मांग के अनुरूप सीटें दे दीं। फिर भी कांग्रेस की मुश्किलें अभी कम नहीं। विपक्ष जेपीसी की मांग छोडऩे को राजी नहीं। पर अब कांग्रेस दलील दे रही- हमने जेपीसी को छोड़ पीएसी, मल्टी एजेंसी, सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में सीबीआई जांच, जस्टिस पाटिल कमेटी की जांच करा दी। विपक्ष की मांग के मुताबिक अब राजा की गिरफ्तारी भी हो गई। सो विपक्ष को और क्या चाहिए। अब पहले संसद में जेपीसी जांच के औचित्य पर बहस हो, फिर विचार होगा। पर अपनी ही दलील में कांग्रेस ने सवाल छोड़ दिया। जब सरकार इतनी तरह की जांच करा रही, तो सिर्फ जेपीसी से परहेज क्यों? क्या बाकी जांच में लीपापोती की गुंजाइश? जेपीसी में भी बहुमत सत्तापक्ष का होता। फिर परहेज का मतलब स्पष्ट। अब इस बात के आसार, अगर पीएसी खुद से जेपीसी जांच की सिफारिश कर दे। तो सरकार के पास कोई विकल्प नहीं बचेगा। सो विपक्ष को घेरने के लिए कांग्रेस का मिशन कर्नाटक जारी। गुरुवार को अभिषेक मनु सिंघवी ने पूछा- राजा मामले में पीएम पर सवाल उठाने वाले सुषमा-जेतली-आडवाणी-जसवंत कर्नाटक मुद्दे पर आंख मूंदे क्यों बैठे? हमने तो बिना दोष साबित हुए कार्रवाई की। पर कर्नाटक में गवर्नर की ओर से मुकदमे की सिफारिश के बावजूद येदुरप्पा को क्यों नहीं हटाया? अगर नैतिकता की शुरुआत करनी है, तो कर्नाटक-उत्तराखंड से हो। सो कांग्रेस ने दबी जुबान में ही कह दिया- क्रिकेट-फुटबाल के ग्राउंड तो होते हैं, पर सियासत में कोई मॉरल ग्राउंड नहीं। सो गुरुवार को सीवीसी मसले पर भी सुप्रीम कोर्ट में सरकार ने कह दिया- सीवीसी थॉमस पर चार्जशीट कोई धब्बा नहीं। ‘यानी दाग अच्छे हैं।’ पर सुप्रीम कोर्ट ने फिर लताड़ा। पूछा- क्या सिलेक्शन कमेटी के सामने थॉमस का सर्विस रिकार्ड रखा गया था? तो सरकार की ओर से जवाब दिया गया- तबके सीवीसी प्रत्यूष सिन्हा ने थॉमस की नियुक्ति को हरी झंडी दी थी। पर कोर्ट ने दो-टूक कहा- नियुक्ति में सीवीसी आखिरी फैसले नहीं लेता। अब सरकार किस स्तर तक गिरेगी, पता नहीं। पर गुरुवार को ए. राजा जब पटियाला हाउस कोर्ट में पेश किए गए। सीबीआई को पांच दिन की रिमांड मिल गई। पर उनके वकील ने इशारा कर दिया- टू-जी आवंटन पर सारे फैसले केबिनेट की सहमति से हुए। सो सिर्फ राजा पर कार्रवाई क्यों? यानी इस खेल में हाथ बहुतों का। सो कहीं ऐसा न हो, मामला ठंडा करने को अभी सीबीआई फुर्ती दिखा रही। पर जैसे ही राजनीतिक माहौल ठंडा हुआ, आकाओं का केस दबाने में माहिर सीबीआई अपना पैंतरा शुरू न कर दे। सिख विरोधी दंगे, पेट्रोल पंप आवंटन, बोफोर्स, चारा घोटाला, आय से अधिक संपत्ति के माया-मुलायम-लालू मुकदमे इस बात के साक्षी। सीबीआई की ओर से सत्ताधीशों को बचाने का प्रयास इतनी दफा हुआ, कोर्ट ने निगरानी तक का काम अपने हाथ में ले लिया। सो जुडिशियल एक्टीविज्म का मुद्दा हमेशा उठता रहा। अब भी घोटालों पर कार्रवाई हो रही, तो इसी एक्टीविज्म की वजह से। सो एक तरफ राजनीतिक हमलों से कांग्रेस बैक फुट पर। तो दूसरी तरफ कोर्ट की लगातार मिल रही फटकार। अब कोर्ट को जवाब देने से पहले सीबीआई ने राजा को कस्टडी में तो ले लिया। पर राजनीतिक-अदालती मोर्चे पर घिरी कांग्रेस करवटें बदल रही।
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03/02/2011

Wednesday, February 2, 2011

परिवर्तन की आहट से राजा की निकली ‘बारात’

आखिर घोटालाधिराज ए. राजा का बाजा बज गया। सीबीआई ने चौथी बार पूछताछ के बाद गिरफ्तार कर लिया। टू-जी स्पेक्ट्रम घोटाले में राजा की परछाईं रहे निजी सचिव आर.के. चंदोलिया और संचार सचिव सिद्धार्थ बेहुरिया भी गिरफ्तार हो गए। तो कांग्रेस फ्रंट फुट पर खेलने लगी। बीजेपी ने राजनीतिक-जनदबाव का नतीजा बताया। जयललिता ने राजनीतिक हथकंडा। पर गिरफ्तारी के बाद भी विपक्ष ने एक सुर में जेपीसी की मांग दोहरा दी। यानी बजट सत्र में विपक्ष फिर हमलावर रुख अपनाने के मूड में। राजा की गिरफ्तारी से विपक्ष के आरोप सच साबित हुए। सो अब सवालों के घेरे में पीएम, जो तीन साल से राजा के राज को जानकर भी अनजान बने रहे। पर हुस्नी मुबारक की तरह जनता का भरोसा खो रही मनमोहन सरकार के लिए राजा की गिरफ्तारी ऑक्सीजन। सो कांग्रेस ने विपक्ष पर पलटवार किया। अपने अभिषेक मनु सिंघवी बोले- सीबीआई जांच की निष्पक्षता पर सवाल उठाने वालों को अब जवाब मिल गया। कानून अपना काम कर रहा, कांग्रेस कोई दखल नहीं दे रही। उन ने बीजेपी को फिर आईना दिखाया। बोले- अगर राजा की गिरफ्तारी राजनीतिक दबाव का नतीजा। तो यही दबाव बीजेपी कर्नाटक में क्यों नहीं दिखाती? सो बीजेपी ने कोर ग्रुप में मंथन किया। काले जादू से बचने के लिए येदुरप्पा आज-कल सूर्य नमस्कार कर रहे। पर बेचारी बीजेपी येदुरप्पा के काले जादू से परेशान। संसद में येदुरप्पा ही ऐसा मुद्दा, जो विपक्ष की एकता में दरार डाल दे। पर बीजेपी के लिए राहत की बात, राजा की गिरफ्तारी के बाद समूचे विपक्ष ने जेपीसी जांच की मांग को जायज ठहराया। सीताराम येचुरी, जयललिता, जेतली ने खम ठोककर कहा- जेपीसी की मांग और मजबूत हुई। जेपीसी जांच का दायरा बड़ा होता है। सिस्टम में क्या गड़बड़ी है, यह जेपीसी ही पता कर सकती। पर कांग्रेस और सरकार की रणनीति फिलहाल सुप्रीम कोर्ट को संतुष्ट करने की। अगले गुरुवार को सीबीआई स्टेटस रिपोर्ट दाखिल करेगी। तो सरकार को उम्मीद, अब तक की कार्रवाई पर अदालत संतोष जताएगी। गर सचमुच ऐसा हुआ, तो कांग्रेस को बजट सत्र में मजबूत ढाल मिल जाएगी। सो राजा की गिरफ्तारी सीबीआई ने कोई मर्जी से नहीं की। अलबत्ता कांग्रेस और करुणानिधि की राजनीतिक डील का नतीजा। जब तक करुणा की कृपा नहीं थी, कांग्रेस कुछ नहीं कर पाई। पर चुनावी मौसम में करुणा को भी मुश्किल, मनमोहन सरकार की छवि तो पूछो ही मत। सो भले कांग्रेस राजा की गिरफ्तारी करा इतराए। डीएमके से गठबंधन टूटने की आशंका खारिज करे। पर क्या कांग्रेस के पास इसके सिवा कोई चारा था? आखिर बकरे की अम्मा कब तक खैर मनाती? आए दिन सुप्रीम कोर्ट की तल्ख टिप्पणियां, राजनीतिक घेरेबंदी और जनमानस में उठ रहे सवालों ने सरकार को मजबूर कर दिया। पर अब गिरफ्तारी ने विपक्ष को और धारदार बना दिया। बीजेपी की प्रवक्ता निर्मला सीतारमन बोलीं- संसद का शीत सत्र कांग्रेस के अहंकार और जिद से हंगामे में खत्म हुआ, यह बात आज साबित हो गई। सो अब पीएम को बताना होगा, जिस राजा को चार पूछताछ में ही जांच एजेंसी ने गिरफ्तारी के लाइक समझा। पीएम तीन साल तक चुप क्यों रहे? हम जेपीसी की मांग पर अभी भी अड़े हुए। यों विपक्ष रेल और आम बजट की संवैधानिक औपचारिकता में खलल नहीं डालेगा। पर बाकी सत्र की तस्वीर अभी साफ नहीं। भ्रष्टाचार के मामले में राजा का पीएम ने कई बार बचाव किया। नवंबर 2010 में सीएजी की रपट के बाद राजा का इस्तीफा हुआ। जबकि इस घोटाले की एफआईआर दो साल पहले दर्ज हो चुकी। और तो और, तमाम खुलासों के बावजूद मौजूदा संचार मंत्री कपिल सिब्बल ने सात जनवरी को प्रेस कांफ्रेंस कर यह साबित करने में रत्ती भर भी कसर नहीं छोड़ी कि राजा बेकसूर। सिब्बल ने घोटाले के आंकड़े को झुठलाते हुए निल बतलाया था। इससे पहले भी आठ दिसंबर को सिब्बल ने यह कहते हुए राजा का बचाव किया था- प्रमोद महाजन की बनाई नीति को राजा ने अपनाया। यानी सिब्बल ने राजा को निर्दोष बताया। पर अब सिब्बल महाराज क्या कहेंगे? जब सब-कुछ सही था, तो राजा गिरफ्तार क्यों हुए? कांग्रेस ने बजट सत्र से पहले राजा की गिरफ्तारी करा विपक्ष की धार कमजोर करने की कोशिश की। राजा को मधु कोड़ा बनाने की कोशिश की। पर सवाल- क्या एकला राजा ने प्रजा को इतना लूटा होगा? स्पेक्ट्रम यानी परछाईं के इस खेल में कितने बड़े खिलाड़ी, अभी खुलासा होना बाकी। सो राजा की गिरफ्तारी ही इति श्री नहीं। राजा तो सिर्फ मोहरा, असली राजदारों का पर्दा उठना बाकी। गिरफ्तारी तब तक सार्थक नहीं, जब तक भ्रष्टाचारियों को नजीर पेश करने वाली सजा न मिले। कहीं ऐसा न हो, हमेशा की तरह राजा की गिरफ्तारी भी राजनीतिक ड्रामा भर रह जाए। जमानत पर छूटकर राजा-प्रजा और सरकार मुकदमा-मुकदमा खेलते रह जाएं। पर फिलहाल सरकार और विपक्ष राजा की गिरफ्तारी से राजनीतिक समीकरण बनाने में जुटे। यों बिहार में डंका बजाने के बाद पहली बार दिल्ली पहुंचे नीतिश कुमार ने सोलह आने सही फरमाया। भ्रष्टाचार से बने माहौल में राजनीतिक परिवर्तन की आहट सुनाई दे रही। सो सचमुच नीतिश उवाच से राजा की गिरफ्तारी के निहितार्थ निकल रहे।
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02/02/2011

Tuesday, February 1, 2011

उपदेशक तो बहुतेरे, कोई अनुकरणीय क्यों नहीं?

एक सुविचार है- उपदेश देने से बेहतर है उदाहरण बनना। पर मौजूदा हालात में अब ऐसे विचार सिर्फ सुनने-सुनाने को ही रह गए। समाज सुविधाभोगी बन रहा। सो जब तक खुद पर कुछ न बीते, जन चेतना जागृत नहीं होती। वरना महंगाई, भ्रष्टाचार, भाई-भतीजावाद की इस अंधाधुंध दौड़ में अपनी जनता शुतुरमुर्ग की तरह रेत में सिर डाले न बैठती। चौक-चौराहे, गली-नुक्कड़ लोग व्यवस्था को कोसने में अब पानी भी नहीं पीते। पर व्यवस्था को बदबूदार बनाने वाले नेताओं को सबक सिखाने का जज्बा सो चुका। मिस्र के आंदोलन ने साबित कर दिया, गर जनता ठान ले, तो व्यवस्था को बपौती मानने वाले भागते फिरेंगे। सचमुच अब हुस्नी मुबारक के मुबारक भरे दिन खत्म होने को। मंगलवार को सेना ने एलान कर दिया- आंदोलनकारियों पर बल प्रयोग नहीं होगा। करीब दस लाख लोगों ने काहिरा में एतिहासिक मार्च कर मुबारक को शुक्रवार तक का अल्टीमेटम दे दिया। पर भारत में दाल की कीमत तीस से सौ रुपए हो जाए, आटा आठ से बाईस रुपए हो जाए, चीनी सोलह से छत्तीस हो जाए, दूध तेरह से तीस हो जाए, पेट्रोल तीस से साठ हो जाए, प्याज दस से अस्सी रुपए हो जाए, फिर भी हम-आप सिर्फ आंसू बहाते रहते। काश, सत्ता में बैठे लोगों को आंसू बहाने के लिए जनता मजबूर करने लगे। तो व्यवस्था को बपौती समझने वालों का नशा काफूर हो जाए। आंदोलन की मानसिकता अगर जल्द नहीं जागी। तो सरकार एक तरफ महंगाई पर उपदेश देगी, दूसरी तरफ बढ़ाएगी। कॉमनवेल्थ गेम्स पर पीएम ने शुंगलू कमेटी बनाई थी। पर तीन महीने में रपट नहीं आनी थी, सो कमेटी को एक्सटेंशन मिल गया। यों अंतरिम रिपोर्ट दी, तो पीएम ने केबिनेट सैक्रेट्री को भेज दी। पर मांग ऐसे की, मानो, पीएम नहीं, विपक्ष के नेता हों। पीएम ने कहा- दोषियों पर सख्त कार्रवाई हो। पर कोई पूछे- कार्रवाई कौन करेगा? गेम्स के फौरन बाद कलमाड़ी को आयोजन समिति से क्यों नहीं हटाया गया? क्या अजय माकन के खेल मंत्री बनने का इंतजार हो रहा था? स्पेक्ट्रम घोटाले में सरकार जेपीसी न बनाने की जिद पर अड़ी। सो अब हंगामे का संकट बजट सत्र पर भी मंडरा रहा। यों मान लिया, कॉमनवेल्थ या स्पेक्ट्रम मामले में जांच चल रही। पर सीवीसी थॉमस के मामले में सरकार या कांग्रेस नजीर पेश क्यों नहीं कर रही? अब तो आईने की तरह साफ हो गया- चार्जशीटेड थॉमस जानबूझ कर सीवीसी बनाए गए। सरकार के इस कबूलनामे के बाद सुषमा स्वराज ने हलफनामा देने का फैसला वापस ले लिया। पर थॉमस ने कोर्ट में नया हलफनामा देकर खुद को निर्दोष और ईमानदार बताया। मीडिया पर छवि बिगाडऩे का आरोप मढ़ा। खुद को राजनीतिक लड़ाई का शिकार बता रहे। यानी अब थॉमस विवाद का पटाक्षेप सुप्रीम कोर्ट ही करेगा। पर तमाम झंझावातों से जूझ रही सरकार और कांग्रेस की हालत कैसी, मंगलवार को सोनिया गांधी ने फिर इजहार किया। चौधरी रणवीर सिंह की स्मृति में डाक टिकट जारी होने का समारोह था। पर सोनिया ने मौजूदा हालात पर चिंता जता सच कबूल लिया। उन ने माना, लोकतंत्र के नाम पर लूटतंत्र चल रहा। सोनिया बोलीं- सत्ता और धन ही सब-कुछ नहीं। सत्ता का सुख ही सब-कुछ नहीं। फिर उस सुख की भी एक सीमा है। एक सीमा तक ही उसका उपयोग हो सकता। उसके बाद यह सिर्फ लोभ और लालच है, एक भ्रम है, जिसके पीछे दुनिया भाग रही। यानी ‘सोनिया सार’ से स्पष्ट हो गया, मनमोहन सरकार कैसा काम कर रही। सोनिया ने चौधरी रणवीर सिंह को अनुकरणीय बताया। बोलीं- उन ने 64 साल की उम्र में राजनीति से रिटायरमेंट ले लिया था। ऐसे आदर्शों का आज महत्व बढ़ जाता है, क्योंकि सत्ता और लालसा के लिए अंधी दौड़ मची है। अब चौंसठ पार के किन नेताओं पर इशारा, सबको मालूम। मनमोहन की एक्सपर्ट कमेटी ने सोनिया की एनएसी के फूड सीक्योरिटी बिल को नामंजूर कर दिया। पीएम से लेकर तमाम बड़े मंत्री चौंसठ पार के। यानी सोनिया ने अगले चुनाव तक सीनियरों के रिटायरमेंट का इशारा कर दिया। सोनिया ने आजादी के वक्त की सोच और आज की सोच में फर्क को भी कबूला। यानी कांग्रेस अब आजादी के वक्त जैसी सोच वाली पार्टी नहीं रही। सोनिया ने सार्वजनिक जीवन का अर्थ भी समझाया। बोलीं- सार्वजनिक जीवन का अर्थ यह है कि हम आम आदमी के दुख और दर्द को समझें, उसे दूर करने के लिए संघर्ष करें। पर खुद सोनिया सरकार की सुपर बॉस। कांग्रेस वर्किंग कमेटी महंगाई पर नकेल को कई दफा प्रस्ताव पास कर चुकी। भ्रष्टाचार से निपटने का संकल्पी अधिवेशन हो चुका। पर कितना असरकारक रहा ‘सोनिया सार’? मंगलवार को बरेली में आईटीबीपी के 416 पद की भर्ती के लिए सात लाख लोग पहुंचे। बरेली में अराजकता की स्थिति बन गई। क्या यही है मनमोहन सरकार की विकास दर? टमाटर-प्याज के बाद खाने के तेल के दाम बढ़ गए। मिस्र की घटना से पेट्रोल के दाम फिर बढ़ें, तो हैरानी नहीं। सो सवाल- उपदेश देना तो आसान, पर कोई उदाहरण क्यों नहीं बनता? राजनीति में अब ऐसा कोई व्यक्तित्व क्यों नहीं, जिसका अनुकरण किया जा सके। उपदेश तो जनता पिछले छह साल से सुन रही। क्या देश अब थॉमसों, पवारों, कलमाडिय़ों, राजाओं का अनुकरण करे?
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01/02/2011

Monday, January 31, 2011

गर मैं चोर, तो तू डाकू, जय हो लोकतंत्र की!

लोकतंत्र की आड़ में तानाशाही के दिन अब लद चुके। काहिरा की कहानी इसकी ताजा मिसाल। मिस्र के राष्ट्रपति हुस्नी मुबारक ने जन दबाव में नई सरकार बना दी। पहली बार उपराष्ट्रपति भी बनाया। पर जनता ने मुबारक को सत्ता से विदा करने का मन बना लिया। सो आंदोलन थमने का नाम नहीं। पर मुबारक तीन दशक से कुर्सी से ऐसे चिपके हुए, हटने का नाम नहीं ले रहे। आंदोलन कुचलने को तानाशाही तरीका अख्तियार कर लिया। पर इतिहास साक्षी, आखिर में जीत जन आंदोलन की ही होती। सो लोकतंत्र को बपौती समझने वालों के लिए ऐसे आंदोलन एक सबक। जैसे हुस्नी मुबारक कुर्सी छोडऩे को राजी नहीं। कुछ वैसे ही अपने सीवीसी पी.जे. थॉमस। सुप्रीम कोर्ट के सवालों और देश भर में हो रही फजीहत के बावजूद थॉमस ताल ठोक कर कह रहे- मैं तो सीवीसी, इस्तीफा क्यों दूं। मनमोहन सरकार भी समझ नहीं पा रही, थॉमस पर क्या रुख अपनाए? कभी बचाव में उतरती, तो कभी सिट्टी-पिट्टी गुम। गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट में एटार्नी जनरल जी.ई. वाहनवती ने दो-टूक झूठ कह दिया- थॉमस की नियुक्ति करने वाले पैनल के सामने चार्जशीट का मामला संज्ञान में नहीं लाया गया। सो बतौर नेता प्रतिपक्ष पैनल में शामिल सुषमा स्वराज ने फौरन मोर्चा खोल दिया। सरकार पर झूठ बोलने का आरोप लगा, खुद हलफनामा दाखिल करने का एलान कर दिया। पर अगले दिन कांग्रेस ने नया पैंतरा आजमाया। दलील दी- मिनिट्स में चार्जशीट की चर्चा नहीं। पर हाथ कंगन को आरसी क्या, पढ़े-लिखे को फारसी क्या। सुषमा स्वराज ने थॉमस की नियुक्ति के फैसले पर दस्तखत के साथ ही लिख दिया था- आई डिसएग्री। यानी बिना चर्चा के कोई ऐसा क्यों लिखेगा। अब सोमवार को खुद होम मिनिस्टर पी. चिदंबरम ने खुलासा कर दिया- सुषमा स्वराज ने जो कहा, वह सोलह आने सही। पैनल ने थॉमस के चार्जशीट पर चर्चा की थी। पर बहुमत से थॉमस की नियुक्ति का फैसला लिया गया। चिदंबरम ने एक और बात कही- स्वाभाविक रूप से कोई महत्वपूर्ण बात हुई होगी। जिस पर सुषमा असहमत रही होंगी। जब चर्चा हुई होगी, तभी असहमति की बात आई। याद रखिए, बिना चर्चा के असहमति का सवाल ही नहीं उठता। अब होम मिनिस्टर के इस बयान के बाद कांग्रेस क्या कहेगी? चिदंबरम ने तो मिनिट्स की दलील भी खारिज कर दी। कहा- मिनिट्स में चर्चा का ब्यौरा नहीं, सिर्फ फैसला लिखा होता। पर चिदंबरम ने एक बार फिर थॉमस की नियुक्ति को जायज ठहराया। अब एटार्नी जनरल ने सुप्रीम कोर्ट में जो कहा, उसे किसकी दलील मानें? अगर सुषमा ने कोर्ट में हलफनामा दाखिल करने का एलान न किया होता। तो सरकार अपने ही एटार्नी जनरल की राय को खारिज नहीं करती। सुषमा कोर्ट जाएं, उससे पहले ही सरकार ने सच कबूल लिया। पर झूठ बोलने वाले एटार्नी जनरल का क्या होना चाहिए? यों अब ए.जी. के बचाव में कहा जा रहा- उन ने यह नहीं कहा कि पैनल के सामने थॉमस के चार्जशीट की चर्चा नहीं हुई। अलबत्ता उन ने यह कहा कि पेपर और फाइल सर्कुलेट नहीं किए गए। सो फिर वही बात, एक झूठ को छुपाने के लिए सौ झूठ का सहारा। सोमवार को कांग्रेस ने थॉमस के  बचाव में कई फाइलें खंगाल डालीं। बीजेपी और लेफ्ट को आईना दिखाते हुए खुद पीछे खड़ी हो गई। कांग्रेस के कानूनदां युवा प्रवक्ता मनीष तिवारी खासे तेवर में बोले- थॉमस के खिलाफ चार्जशीट की बात करने वाली बीजेपी ने भी तो वाजपेयी सरकार के वक्त अयोध्या केस में चार्जशीटेड प्रभात कुमार को केबिनेट सैक्रेट्री बनाया था। जबकि आई.के. गुजराल के पीएम रहते जब प्रभात कुमार का मामला आया था, तो इसी चार्जशीट के आधार पर खारिज कर दिया गया था। फिर तिवारी ने केरल की वामपंथी सरकार को भी याद दिलाया- कैसे केरल सरकार ने अक्टूबर 2006 में थॉमस के खिलाफ मुकदमे की अनुमति मांगी थी। पर सितंबर 2007 में इसी वामपंथी सरकार ने थॉमस को केरल का चीफ सैक्रेट्री बना दिया। अब इसे मनीषियाई दलील कहें या खिसियाई? ऐसी दलीलों का साफ मतलब- अगर मैं चोर, तो तू डकैत। क्या यह लोकतंत्र की आड़ में मनमर्जी नहीं? आखिर सरकार क्या संदेश देना चाह रही? महंगाई, भ्रष्टाचार ने देश की साख पर बट्टा लगा दिया। स्पेक्ट्रम घोटाले में राजा से फिर पूछताछ हुई। पर अभी तक ठोस कार्रवाई नहीं हुई। सुप्रीम कोर्ट में दस फरवरी को स्टेटस रिपोर्ट देने के लिए सीबीआई तेजी का दिखावा कर रही। इधर सिब्बल की बनाई जस्टिस पाटिल कमेटी ने प्रक्रिया की खामी पर अपनी रपट सौंप दी। राजा समेत कई अधिकारियों को जिम्मेदार बताया गया। पर अभी पूरी रपट का खुलासा होना बाकी। रपट सामने आएगी, तो राजनीति भी तय। पर सवाल, देश इस गर्त से कब निकलेगा? भ्रष्टाचार-महंगाई ने निवेश का माहौल बिगाड़ा। नरेगा के ढोल तो सुहाने, पर अब तक बंटे एक लाख छह हजार करोड़ में साठ फीसदी बांटने वाले ही खा गए। श्रम, बीमा, बैंकिंग सुधार अभी भी अधर में। सरकार और सोनिया की एनएसी में एक राय नहीं। रही-सही कसर पर्यावरण के नाम पर जयराम पूरी कर रहे।
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31/01/2011