Monday, February 14, 2011

फैसला ही नहीं, लकीर भी खींचे न्यायपालिका

कभी महंगाई तो कभी भ्रष्टाचार, आखिर सरकार कबूलने लगी। शासन के कामकाज में ही नहीं, नैतिकता में भी गिरावट। होम मिनिस्टर पी. चिदंबरम ने पहले महंगाई को सरकार के बूते से बाहर बताया। अब शासन और नैतिक स्तर पर गिरावट की बात मान ली। पर नेताओं की फितरत कैसी, यह भी दोहरा दी। चिदंबरम ने कहा- ऐसी गिरावट कोई नई बात नहीं। यानी सत्ता का नाजायज फायदा उठाने में कोई दल पीछे नहीं। पर भ्रष्टाचार के मुद्दे ने जनता के बीच जगह बना ली। उधर मिस्र में हुस्नी मुबारक का तीन दशक का राज खत्म हो गया। सो भारत में भी कुछ लोग वैसी ही क्रांति की बात कर रहे। ऑन लाइन चर्चाओं में लोग एक-दूसरे से पूछ रहे- क्या अपने यहां भी कोई तहरीर स्क्वायर है? पर क्या अब अपने देश में क्रांति की मानसिकता है? लोगबाग चौपालों पर चर्चा खूब करेंगे। पर मानसिकता वही- भगत सिंह पैदा हो, पर पड़ोसी के घर। सचमुच जनता में क्रांति की भावना नहीं रही। समाज सुविधा भोगी हो चुका। या यों कहें- जो सुविधा भोगी नहीं, वह दो जून की रोटी जुगाडऩे में ही दिन-रात बिता देता। सो क्रांति की अलख कैसे जगे? यों अब बीजेपी मिस्र की क्रांति से प्रभावित। सो देश में जेपी जैसा आंदोलन खड़ा करना चाहती। पर जेपी जैसा कौन, यह बीजेपी को मालूम नहीं। आखिर मालूम भी कैसे हो, जब राजनीति से लोगों का भरोसा उठ चुका। क्या आज देश में कोई ऐसा सर्वमान्य नेता, जिसे क्रांति का अगुआ बनाया जा सके? पर जनता के दिल की चिंगारी कब शोला बन जाए, पता नहीं चलता। सो महंगाई-भ्रष्टाचार से जूझ रही कांग्रेस ने बजट सत्र से पहले फिर मत्थापच्ची की। जेपीसी पर सर्वदलीय मीटिंग के बात कांग्रेस कोर ग्रुप की सोमवार को पहली मीटिंग हुई। तो जेपीसी के तौर-तरीकों पर चर्चा हुई। विपक्ष की धार भोंथरी करने के लिए कांग्रेस जेपीसी को तो राजी। पर संसद में बहस के बाद। राष्ट्र्पति अभिभाषण के अगले दिन ही विपक्ष जेपीसी का एलान चाह रहा। पर कांग्रेस ने सोमवार को बीजेपी को घेरा। मनीष तिवारी बोले- स्पेक्ट्रम पर एनडीए राज की कलई खुल रही, सो बीजेपी बहस से कतरा रही। यानी शौरीनामा से कांग्रेस को राहत की उम्मीद। बजट सत्र में जेपीसी की बहस होगी, तो अरुण शौरी का भी मामला आएगा। पर बीजेपी को घेरने की सोच रही कांग्रेस अपने बड़बोले मंत्रियों का क्या करेगी? विदेश मंत्री यूएन में जाकर पुर्तगाली विदेश मंत्री का भाषण पढ़ आते। चिदंबरम-सिब्बल-जयराम के तो बोल बड़े ही अनमोल। सोमवार को ऊर्जा मंत्री सुशील कुमार शिंदे ने नई ऊर्जा भर दी। कह दिया- पीएम 90 फीसदी विकास दर चाहते। अब इसे ऊर्जा मंत्री की ऊर्जा कहें या पॉवरकट। जब नौ फीसदी विकास दर लाने में खुद सरकार हांफ रही। इतनी विकास दर में ही महंगाई अपना तांडव नृत्य दिखा रही। तो सोचिए, 90 फीसदी में क्या हाल होगा। इतना ही नहीं जब आठ-नौ फीसदी विकास दर में एक नील 76 खरब तक के घोटाले हो रहे। जब 90 फीसदी होगा, तो सोचिए, इकाई-दहाई वाले अपने नंबरिंग सिस्टम का क्या होगा? पर फिलहाल बात संसद सत्र की तैयारी की। कांग्रेस अब जनता की नब्ज भांप जेपीसी को राजी दिख रही। तो बीजेपी को भी कर्नाटक मामले में सोमवार को थोड़ी राहत मिल गई। कर्नाटक हाईकोर्ट ने विधानसभा स्पीकर के फैसले पर मुहर लगा दी। पांच निर्दलीय एमएलए की याचिका खारिज कर दी। अब ये एमएलए सुप्रीम कोर्ट जाने का दावा कर रहे। पर गवर्नर हंसराज भारद्वाज अब क्या करेंगे। उन ने स्पीकर के फैसले की वजह से ही येदुरप्पा सरकार को दुबारा बहुमत हासिल करने की हिदायत दी थी। पर हाईकोर्ट ने स्पीकर के फैसले को जायज माना। मौकापरस्त निर्दलीय एमएलए पहले बीजेपी से जुड़े। पर बाद में पाला बदल लिया। यों विश्वासमत हासिल करने का येदुरप्पाई तरीका भी जायज नहीं। पर गवर्नर हंसराज ने भी मिशनरी क्लब में शामिल होने की ठान रखी। गवर्नरों के जेहादी तेवरों की कई कहानी। राजस्थान में चौथे चुनाव के बाद किसी को बहुमत नहीं मिला। तो विरोधी दलों ने संयुक्त मोर्चा बना महारावल लक्ष्मण सिंह को नेता चुना। पर तब गवर्नर संपूर्णानंद ने मोर्चे से कम सीट वाली कांग्रेस के नेता मोहनलाल सुखाडिय़ा को शपथ दिला दी। हरियाणा में 1982 में लोकदल-बीजेपी गठबंधन की सीटें सबसे अधिक थीं। राज्यपाल जी.डी. तपासे ने राजभवन में समर्थकों की परेड की हिदायत दी। पर परेड से एक दिन पहले ही तपासे ने तपाक से भजनलाल को सीएम पद की शपथ दिला दी। सिब्ते रजी, एस.सी. जमीर, रोमेश भंडारी, बूटा सिंह, रामलाल, वेंकट सुब्बैया जैसे कई गवर्नर अपने जेहादी तेवर दिखा इतिहास में नाम दर्ज करा चुके। पर गवर्नरों को ऐसा मौका पाला बदलू विधायकों की वजह से ही मिलता। सो कर्नाटक हाईकोर्ट ने तकनीकी आधार पर स्पीकर के फैसले को सही ठहराया। पर इतिहास साक्षी, गवर्नर और विधानसभा स्पीकरों ने मौका मिलने पर संविधान का मखौल उड़ाने में कभी कसर नहीं छोड़ी। सो मौकापरस्त नुमाइंदों को सजा भी मिलनी चाहिए। न्यायपालिका का फैसला सही। पर फिर कभी ऐसा न हो, ऐसी लकीर भी न्यायपालिका को ही खींचनी होगी। अपने नेताओं पर जनता को एतबार नहीं। सो शासन की कमजोरी हो या नैतिकता में गिरावट या लक्ष्मण रेखा का उल्लंघन। न्यायपालिका को ही लकीर खींचनी होगी।
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14/02/2011

Friday, February 11, 2011

‘अर्थशास्त्र’ को क्यों चुभ रही ‘नैतिकता’?

हर घोटाले की तरह अब एस-बैंड घोटाले को भी झुठलाने की कोशिश हो रही। टू-जी स्पेक्ट्रम में कांग्रेस और पीएम ने शुरुआत में राजा को खूब बचाया। पर सीएजी ने बाजा बजाया, तो अब वही राजा जेल की हवा खा रहे। फिर कॉमनवेल्थ घोटाले में संसद से सडक़ तक जमकर लीपापोती की। पर कैसे धीरे-धीरे परतें उधड़ीं, कलमाड़ी एंड कंपनी के लोगबाग शिकंजे में आए। अब शुक्रवार को कलमाड़ी के ओएसडी शेखर देव गिरफ्तार कर लिए गए। अब ओएसडी अपने आका के हुक्म को बिना कोई काम तो करेगा नहीं। सो सवाल- जब पीए या ओएसडी गिरफ्तार हुआ, तो आका कलमाड़ी क्यों नहीं? अब इसरो से जुड़े घोटाले का खुलासा हुआ। सीधे पीएम तक आंच पहुंची। तो पहले पीएमओ ने कोई डील न होने की सफाई दी। फिर लीगल ओपीनियन के बाद बी.के. चतुर्वेदी की रहनुमाई में कमीशन बना दिया। अब शुक्रवार को संचार मंत्री कपिल सिब्बल बचाव में उतरे। बोले- जब इसरो का देवास के साथ कांट्रेक्ट लागू ही नहीं हुआ। तो स्पेक्ट्रम आवंटन का सवाल कहां से उठता? पर देवास मल्टीमीडिया ने तो शिकंजा कस दिया। देवास ने कहा- करार रद्द नहीं किया जा सकता। गुरुवार को ही कंपनी के अध्यक्ष रामचंद्रन विश्वनाथन ने कहा- उनकी कंपनी ने इस आवंटन को हासिल करने के लिए सभी योग्यता पूरी कीं और सरकार से सभी मंजूरी ली हैं। फरवरी 2006 में केबिनेट और अंतरिक्ष विभाग ने उसकी पुष्टि की थी। ऐसे में इस करार से कोई पक्ष अब पीछे नहीं हट सकता। हम स्पेक्ट्रम मिलने का इंतजार कर रहे हैं, जिसमें पहले ही दो साल की देर हो चुकी है। यानी अब सिब्बल चाहे जितनी सफाई दें या शब्दों का जाल बुनें। पर कंपनी ने दो-टूक कह दिया- स्पेक्ट्रम देना होगा। वरना कानूनी कार्रवाई होगी। अगर करार तोड़ा गया, तो सरकार को हर्जाना भी भरना पड़ेगा। अब कंपनी पुचकारने से मान गई, तो ठीक। वरना सरकार फिर सांसत में होगी। सो कपिल सिब्बल के खिलाफ अरुण शौरी ने मोर्चा खोला। टू-जी घोटाले पर जस्टिस पाटिल कमेटी की रपट खारिज कर दी। सिब्बल पर राजा को बचाने का आरोप मढ़ा। शौरी ने टू-जी घोटाले में पीएम की चुप्पी पर भी सवाल उठाए। पर कांग्रेस शौरी की दलील को बौखलाहट बता रही। यों बौखलाहट किस खेमे में, यह तो कांग्रेसी बेहतर जानते। तभी तो गाहे-ब-गाहे पीएम और कांग्रेसी नेता सुप्रीम कोर्ट की सक्रियता पर सवाल उठा रहे। सो शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट ने फिर तल्खी दिखाई। सुनवाई तो अमर सिंह फोन टेपिंग मामले की हो रही थी। पर पीएम के बयान से खफा सुप्रीम कोर्ट ने कहा- कोई भी सरकार मजबूत न्यायपालिका नहीं चाहती। न्यायपालिका के लिए आवंटित बजट को ही देखिए, जो जीडीपी के एक फीसदी से भी कम है। कोर्ट ने निचली अदालतों में मामला लटके रहने पर चिंता जताई। पर कहा- देश में अदालतों और मैन पॉवर की कमी। सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी सोलह आने सही। सरकार में कोई भी हो, सब-कुछ अपनी मुट्ठी में कर लेना चाहता। संसद को तो सत्ताधारी अपनी बपौती बना ही चुके। जुडिशियरी को गिरफ्त में लेने की अंदरखाने खूब बिसातें बिछतीं। भले मनमोहन जुडिशियरी को दायरे में रहने की नसीहत दें। कार्यपालिका-विधायिका के काम-काज में दखलंदाजी पर एतराज जताएं। पर इतिहास साक्षी- नेताओं ने कैसे जुडिशियरी को प्रभावित करने की कोशिश की। संविधान लागू होने के बाद से 1972 तक परंपरा रही रिटायर होने वाले चीफ जस्टिस की सलाह से दूसरे वरिष्ठ जज को चीफ जस्टिस बनाने की। यों 1964 में स्वास्थ्य कारणों से जफर इमाम को वरिष्ठता के बावजूद चीफ जस्टिस नहीं बनाया गया। पर 1973 में जब चीफ जस्टिस सीकरी रिटायर हुए। तो जस्टिस शेलट, हेगड़े और ग्रोवर की वरिष्ठता लांघ अजीत नाथ रे को बना दिया गया। तब सीकरी ने कहा था- यह सरकारी निर्णय राजनीतिक था। जस्टिस छागला ने इसे न्यायिक इतिहास का सर्वाधिक अंधेरा दिन करार दिया। तब विधि के जानकार पालकीवाला ने कहा था- अनुभव से हमें सीखना चाहिए कि राजनीति में न्याय के तत्वों का प्रवेश उचित, पर न्याय में राजनीति का प्रवेश विनाशकारी। इस नियुक्ति के विरोध में शेलट, हेगड़े और ग्रोवर ने इस्तीफा दे दिया था। यही प्रक्रिया जनवरी 1977 में भी दोहराई गई, जब जस्टिस रे रिटायर हुए, तो एच.आर. खन्ना का नंबर था। पर जस्टिस मिर्जा हमीदुल्ला बेग चीफ जस्टिस बनाए गए। सो खन्ना ने इस्तीफा दे दिया। अब मनमोहन से सवाल- क्या इंदिरा राज के ये दो उदाहरण जुडिशियरी में दखल नहीं थे? भ्रष्टाचार अपने चरम पर। फिर भी कोई कठोर संदेश देने के बजाए जुडिशियरी पर खीझ उतरना नकारापन नहीं, तो और क्या। कोर्ट ने सड़ते अनाज को मुफ्त बांटने की सलाह दी थी। तो पीएम ने नीतिगत मामलों में दखल बताया था। पर पीएम ने अभी तक देश को यह नहीं बताया, सड़ते अनाज, गरीबों की योजना में हो रहे भ्रष्टाचार, महंगाई, असुरक्षा, भूख को लेकर सरकार की क्या नीति? अर्थशास्त्री मनमोहन आखिर संतुलन क्यों नहीं बना पा रहे? सचमुच जब भी नैतिकता और अर्थशास्त्र के बीच झगड़ा हुआ। जीत हमेशा अर्थशास्त्र की हुई। स्वार्थ कभी भी खुद को पीछे नहीं हटाता, जब तक कि उसे मजबूर करने के लिए कोई और बड़ी ताकत मौजूद न हो। सो अर्थशास्त्री मनमोहन के राज में धूल फांक रही नैतिकता। सवाल- भ्रष्टाचार पर लगाम लगाने की कोर्ट की नैतिक टिप्पणी सरकार को क्यों चुभ रही?
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11/02/2011




Thursday, February 10, 2011

भ्रष्टाचार पर मनमोहन के बोल बड़े अनमोल

स्पेक्ट्रम से ऐसा ‘बैंड’ बजेगा, मनमोहन सरकार ने सोचा न होगा। टू-जी स्पेक्ट्रम की कहानी तो एकता कपूर के सीरियल की तरह, जो खत्म होने का नाम नहीं ले रही। पर सीरियल टू-जी से पहले इसरो के एस-बैंड की बात। मनमोहन ने एस-बैंड स्पेक्ट्रम को लेकर हुए करार की जांच के लिए हाई लेवल कमेटी गठित कर दी। पहले कानूनी सलाह ली थी। पर करार को सीधे रद्द करना मुमकिन नहीं। सो पूर्व केबिनेट सचिव बी.के. चतुर्वेदी की रहनुमाई में दो मेंबरी आयोग बन गया। आयोग एंट्रेक्स और देवास मल्टीमीडिया के बीच हुए करार के तकनीकी, वाणिज्यिक, प्रक्रियात्मक और वित्तीय पहलुओं की समीक्षा करेगा। आयोग को एक महीने में रपट सौंपने की हिदायत। पर चतुर्वेदी को आयोग का मुखिया बनाना विपक्ष को नहीं जमा। विपक्ष का एतराज, आवंटन प्रक्रिया में चतुर्वेदी खुद शामिल थे। तो अब उनसे निष्पक्ष जांच की उम्मीद कैसे की जा सकती? पर लगातार घोटालों से कांग्रेसी अब खीझने लगे। गुरुवार को सवाल हुआ, तो खीझते हुए कांग्रेस प्रवक्ता मनीष तिवारी बोले- अब सवाल न उठाएं, आयोग की रपट का इंतजार करें। सचमुच बेचारी कांग्रेस कितने सवालों का जवाब दे। टू-जी हो या एस, कांग्रेस का लगातार बैंड बज रहा। अब अगर देवास मल्टीमीडिया पुचकारने से राजी नहीं हुआ। तो पीएमओ तक पहुंच रही घोटालों की आंच को कांग्रेस शांत नहीं कर पाएगी। जांच के लिए बनने वाली ऐसी सरकारी कमेटियों का मकसद क्या होता, किसी से छुपा नहीं। सो चौतरफा घिरी कांग्रेस बजट सत्र में जेपीसी की ओर कदम बढ़ा चुकी। पर यहां तो घोटालों की पूरी काली बदरा सरकार के सिर घुमड़ रही। सीवीसी पी.जे. थॉमस पर गुरुवार को सुनवाई पूरी हो गई। पर सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुरक्षित रख लिया। आखिरी सुनवाई में कोर्ट ने नियुक्ति के दिशा-निर्देश बदलने के भी संकेत दिए। पूछा- क्या नियुक्ति पैनल में विपक्ष के नेता को वीटो दिया जा सकता? अब गाइड लाइंस क्या होंगी, यह तो बाद की बात। पर ऐसे पैनलों में नेता विपक्ष का अधिकार जरूर बढऩा चाहिए। वरना सरकार के दो नुमाइंदे और तीसरे विपक्ष के नेता हों। तो हमेशा सरकार अपनी मर्जी ही थोपेगी। विपक्ष का नेता हमेशा शृंगारिक ही रह जाएगा। सो आम सहमति के लिए तीनों के पास वीटो होना चाहिए। पर फिलहाल थॉमस को लेकर सुप्रीम कोर्ट के फैसले का इंतजार। यों थॉमस हों या टू-जी या काला धन, कोर्ट की हर टिप्पणी से सरकार के मन में छुपे काले चोर का ही आभास हो रहा। सो गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट ने काले धन के मामले में सरकार को फिर आगाह किया। विदेशी बैंकों में काला धन जमा करने वाला पुणे का व्यापारी हसन अली देश से फरार न हो, इसके लिए जरूरी कदम उठाने की हिदायत दी। कोर्ट ने सरकार से कहा- यह सुनिश्चित करना आपका कर्तव्य है कि हसन अली मुकदमा चलाए जाने के लिए देश में मौजूद रहे। कोर्ट की सख्ती का ही असर, अब सरकार ने औपचारिक तौर पर मुकदमा दर्ज करने के बाद काला धन जमा करने वालों का नाम सार्वजनिक करने का भरोसा दिया। यानी देर से ही सही, सरकार लाइन पर आने लगी। सचमुच अगर अपनी जुडिशियरी ने साख बनाकर न रखी होती, तो व्यवस्था का क्या हाल करते ये नेता। सो गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट ने टू-जी स्पेक्ट्रम घोटाले में सीबीआई की फिर नकेल कसी। कोर्ट ने इशारा कर दिया- चाहे जो भी हो, केस अंजाम तक पहुंचेगा। गुरुवार को ही टू-जी घोटाले के राजा की रिमांड चार दिन और बढ़ी। इसी केस में स्वान कंपनी के प्रमोटर शाहिद बलवा भी ट्रांजिट रिमांड पर सीबीआई के कब्जे में। अब राजा-बलवा को आमने-सामने पर सीबीआई तार जोड़ेगी। पर बात सुप्रीम कोर्ट की, जिसने मामले की अलग से सुनवाई के लिए विशेष अदालत गठित करने का आदेश दिया। देश की बाकी अदालतों को भी हिदायत- इस मामले में कोई ऐसा आदेश पारित न करे, जो जांच में खलल डालने वाला हो। कोर्ट ने दो-टूक कहा- इस मामले की जांच में सीबीआई पर कोई दबाव नहीं होना चाहिए। ताकि वह खुलकर मामले की जांच कर सके। पर फिलहाल सीबीआई अभियुक्तों की रिमांड कम दिन के लिए ही मांग रही है, जिससे लगता है कि उसके हाथ बंधे हुए हैं। सो सीबीआई ने फौरन भरोसा दिया- 31 मार्च को राजा के खिलाफ भ्रष्टाचार और धोखाधड़ी का मामला दायर करेगी। पर सुप्रीम कोर्ट ने स्पेक्ट्रम घोटाले की गंभीरता और व्यापकता की ओर इशारा करते हुए कहा- ‘हमें लगता है कि बड़ी संख्या में ऐसे लोग हैं, जो समझते हैं कि वो ही कानून हैं। कानून इन लोगों को गिरप्तार करे, उनके नाम फोब्र्स या अरबपतियों की सूची में आने से कुछ नहीं होता है।’ सुप्रीम कोर्ट ने इशारा तो कर दिया। पर सीबीआई कितनी ईमानदारी से फर्ज निभाएगी, यह तो वक्त बताएगा। यों गुरुवार को ट्रेनी आईएएस को संबोधित करते हुए अपने पीएम ने जो ज्ञान बांचा, सचमुच ‘मनमोहन सार’ ही समझो। उन ने सार्वजनिक जीवन में ईमानदारी की अपील करते हुए कहा- जब नेता और नौकरशाह अपने कार्य और व्यवहार में ईमानदारी की राह से भटक जाते हैं, तो लोग आहत होते हैं। सार्वजनिक सेवाओं में भ्रष्टाचार की इजाजत नहीं दे सकते। हमें नहीं भूलना चाहिए, भारत अभी भी एक ऐसा देश, जहां लाखों लोगों को भूखे रहना पड़ता। पर सवाल- मनमोहन को यह बात इतनी देर के बाद ही क्यों समझ आई? स्पेक्ट्रम घोटाला हुआ 2008 में। मनमोहन ने कार्रवाई की 2010 के आखिर में।
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10/02/2011

Wednesday, February 9, 2011

दुख की एक और दुखान्तिका!

क्या अपना तंत्र साठ साल में ही नाकारा हो चुका? क्या बदलते जमाने के साथ तंत्र कदमताल करने में सक्षम नहीं? या फिर तंत्र में बैठे लोग काम ही नहीं करना चाहते? मासूम आरुषि का मर्डर हुआ, पर किसने किया, मिस्ट्री बनी हुई। सो सवाल- क्या अब देश में अपराधी अपनी जांच एजेंसियां ही नहीं, सबसे बड़ी जांच एजेंसी सीबीआई से भी अधिक शातिर हो गए? अगर सचमुच ऐसी बात, तो अपनी व्यवस्था की हालत वैसी ही, जैसे महाभारत काल में शर-शैया पर पड़े भीष्म पितामह की। सीबीआई ने आरुषि केस को बंद करने की अर्जी दी थी। पर बुधवार को गाजियाबाद की विशेष अदालत ने सीबीआई की क्लोजर रिपोर्ट तो नहीं मानी। अलबत्ता उसी रिपोर्ट को आधार बना आरुषि के मां-बाप यानी तलवार दंपति को आरोपी मान लिया। अदालत के फैसले से हताश तलवार परिवार अब ऊपरी अदालत में चुनौती देगा। ऊपरी अदालतों में केस क्या मोड़ लेगा, यह तो वक्त बताएगा। पर सीबीआई की क्लोजर रिपोर्ट कितनी भरोसेमंद? जब 15 मई 2008 को आरुषि की हत्या हुई, तो यूपी पुलिस ने शुरुआती जांच में ही पिता राजेश तलवार को मुजरिम ठहरा दिया। तलवार 23 मई को गिरफ्तार कर लिए गए। पर यूपी पुलिस की जांच में मीन-मेख निकाला जाने लगा। तो आजिज होकर मायावती सरकार ने सीबीआई जांच की सिफारिश कर दी। पहली जून 2008 से सीबीआई की भारी-भरकम 25 मेंबरी टीम ने जांच शुरू कर दी। जांच टीम का मुखिया यूपी काडर से ही सीबीआई में पदस्थ अरुण कुमार को बनाया गया। शुरुआती जांच में ही यूपी पुलिस की परतें खुलने लगीं। सीबीआई ने आरुषि की मां नूपुर तलवार का दो बार लाई डिटेक्ट टेस्ट किया। राजेश तलवार का भी लाई डिटेक्शन टेस्ट हुआ। पर दोनों में ही कोई नतीजा नहीं निकला। फिर तीन नौकरों की गिरफ्तारी हुई। बारह जुलाई को राजेश तलवार जमानत पर रिहा हुए। चार सितंबर 2009 को सीएफएसएल हैदराबाद ने माना कि आरुषि के जांच सैंपल बदले गए हैं। लैबोरेट्री में भेजे गए कपड़े पर भी खून के धब्बे नहीं थे। अरुण कुमार की रहनुमाई वाली जांच टीम ने तलवार दंपति को क्लीन चिट दे दी। पर यूपी काडर के अरुण वापस बुला लिए गए। तो नई टीम ने जांच का जिम्मा संभाला। पर अंधेरे में अधिक तीर चलाने से बचते हुए सीबीआई ने यूपी पुलिस को ही आदर्श बना लिया। यानी लौटकर ‘सीबीआई’ घर को आ गई। यूपी पुलिस ने शुरुआती जांच में ही तलवार दंपति पर जो शक जताया, आखिरकार अल्टी-पल्टी मारते सीबीआई ने वही राग अलाप दिया। सो सीबीआई की पहली रिपोर्ट पर भरोसा करें या आखिरी रपट पर? सीबीआई ने रपट में परिस्थितिजन्य साक्ष्य के आधार पर तलवार दंपति को आरोपी ठहराया। सो राजेश तलवार की भाभी वंदना तलवार ने बुधवार को सवाल उठाया। पूछा- राजेश-नूपुर का क्या कसूर? बेटी की हत्या के वक्त वे दोनों घर में थे, क्या यही कसूर? हमारा दर्द कोई नहीं समझता। क्या कोई मां-बाप ऐसा करेगा? वंदना तलवार ने मौजूं सवाल उठाया। अगर किसी परिवार में किसी व्यक्ति की हत्या हो जाए और अपराधी का पता न चले, तो क्या जांच एजेंसियां परिवार वालों को ही गुनहगार ठहराएंगी? अगर जांच एजेंसियां इसी ढर्रे पर चल पड़ीं। तो तो क्या अपराधियों के मनोबल नहीं बढ़ेंगे? तलवार दंपति को सीबीआई रपट के मुताबिक आरोपी मान भी लिया जाए। तो क्या ये दोनों पेशेवर अपराधी, जो सीबीआई के हर दांव को झूठा साबित कर दें? तलवार दंपति पर शक होना लाजिमी। पर सीबीआई ने तो केस दर्ज करने के बजाए केस बंद करने की सिफारिश की। यानी क्लोजर रिपोर्ट की वजह से सीबीआई के नकारेपन की खिल्ली न उड़े, सो मां-बाप को ही जिम्मेदार ठहरा दिया। अब सीबीआई की दलील ऊपरी अदालतों में कितनी ठहर पाएगी, इसका इंतजार करना होगा। पर सवाल फिर वही- क्या देश की सबसे बड़ी जांच एजेंसी इतनी पंगु हो चुकी कि अपराधी को नहीं पकड़ सकती? जेसिका लाल केस में क्या हुआ था? निचली अदालत ने सभी आरोपियों को बरी कर दिया। तो मीडिया ने सवाल उठाया- क्या जेसिका को किसी ने नहीं मारा? तो अपना तंत्र नींद से जागा। अब केस का अंतिम पड़ाव सबके सामने। रुचिका गिरहोत्रा केस में 19 साल तक जांच एजेंसियों ने क्या किया? पर जब मीडिया में सवाल उठे, तो रुतबे वाला एसपीएस राठौड़ जेल की चारदीवारी में बैठा दिन गिन रहा। अब सीबीआई से एक और सवाल- जब आरुषि केस में परिस्थितिजन्य साक्ष्य तलवार दंपति के खिलाफ। तो निठारी कांड में मोनिंदर सिंह पंढेर के बजाए उसका नौकर सुरिंदर कोली को ही हर केस में उम्रकैद और फांसी क्यों मिल रही? निठारी की डी-5 कोठी में कोली ने जो कुछ भी किया, क्या सालों तक पंढेर को भनक नहीं लगी? अब तलवार परिवार दोहरे दुख के साथ आगे बढ़ेगा। पर कब तक, कहना मुश्किल। अपने तंत्र की यही खामी। कई बार निर्दोष कोर्ट-कचहरी के चक्कर लगाता मर जाता, अपराधी बेखौफ घूमता। ताजा उदाहरण 26/11 के गुनहगार आतंकी कसाब का ही लो। अपने तंत्र की इतनी बड़ी खामी, 26 महीने हो चुके। पर अभी तक कानूनी प्रक्रिया में ही केस फंसा हुआ। सो शहीद मेजर उन्नीकृष्णन के चाचा के. मोहनन ने पिछले हफ्ते संसद भवन के सामने आत्मदाह कर लिया। क्या यही है अपना तंत्र?
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09/02/2011

Tuesday, February 8, 2011

सरस्वती पूजा के दिन सबको आई सद्बुद्धि

घोटालों का मौसम विदा होने का नाम नहीं ले रहा। सो उधर टू-जी स्पेक्ट्रम घोटाले के राजा की रिमांड बढ़ी। तो इधर एस बैंड स्पेक्ट्रम पर पीएमओ को सफाई देनी पड़ी। पीएमओ की मानो, तो ऐसी किसी डील को मंजूरी नहीं दी गई। सो नुकसान की खबर गलत। पर पीएम के मातहत अंतरिक्ष विभाग का जिम्मा संभाल चुके पृथ्वीराज चव्हाण ने 2010 में ही घोटाला सामने आने की बात मानी। तो पीएम के अधीन अंतरिक्ष विभाग ने भी अपनी सफाई में माना- एंट्रिक्स और देवास के बीच 28 जनवरी 2005 को हुए करार की विभागीय समीक्षा हो रही है और जनता के हित में सरकार हर संभव कदम उठाएगी। सो दूसरे दिन भी विपक्ष ने पीएम पर निशाना साधा। बीजेपी के रविशंकर प्रसाद ने पूछा- मिस्टर पीएम, और कितने घोटाले होंगे। उन ने सोनिया गांधी की चुप्पी पर भी सवाल उठाए। विपक्षी खेमे से अब एस बैंड स्पेक्ट्रम को भी जेपीसी के दायरे में लाने की मांग होने लगी। सो बदलते मौसम, यानी सर्दी-गर्मी के बीच बसंत ऋतु का आगमन हुआ। तो सरकार की सोच भी बदलने लगी। राजा की तरह अगर पीएम पर भी विपक्षी बंदूकें तन गईं। तो मिड-टर्म पोल के सिवा कोई विकल्प नहीं। सो देर से ही सही, कांग्रेस दुरुस्त आ रही। बसंत पंचमी के दिन संसद का गतिरोध तोडऩे के लिए मीटिंग हुई। सो ज्ञान की देवी मां सरस्वती की कृपा ही कहिए, पक्ष-विपक्ष सबकी अक्ल के बल्ब जल उठे। संसद की गरिमा की सुध अब जुबां पर आने लगी। भ्रष्टाचार पर जेपीसी जांच की मांग ने संसद के शीत सत्र की बलि ली। अब तलवार बजट सत्र पर भी लटकती दिखी। सो सब-कुछ लुटाकर कांग्रेस होश में लौट आई। मंगलवार की सर्वदलीय मीटिंग में तुरत-फुरत फैसला तो नहीं हुआ। पर जेपीसी के आसार अब बनने लगे। मीटिंग में प्रणव मुखर्जी ने साफ इशारा कर दिया- संसद की कार्यवाही सुचारु ढंग से चले, इसके लिए कोई भी कीमत अधिक नहीं होगी। यानी जेपीसी पर अब तक सीधा ना कर रही कांग्रेस ने अपने कदम पीछे खींच लिए। विपक्ष ने भी मीटिंग के बाद गतिरोध खत्म होने की उम्मीद जताई। सुषमा स्वराज ने तो प्रणव दा से भी अधिक स्पष्ट कह दिया- शीत सत्र में भी जेपीसी नकारने की एक भी वजह सरकार स्पष्ट नहीं कर पाई। सहयोगी दल भी जेपीसी पर एतराज नहीं कर रहे थे। पर अब आज की मीटिंग से मुझे काफी से अधिक उम्मीद बंधी है कि सत्र शुरू होने पर सरकार जेपीसी मान जाएगी और संसद चलेगी। पर सरकार की ओर से औपचारिक जवाब आना अभी बाकी है। सुषमा के बयान का मतलब साफ, अनौपचारिक सहमति तो बन गई, पर औपचारिकता की चादर में सरकार अपनी खाल बचाएगी। सीताराम येचुरी ने भी कह दिया- सरकार जेपीसी के बारे में सदन में प्रस्ताव लाए, तो हम चर्चा को तैयार। पर हम चाहते हैं, संसद चले और जेपीसी भी हो। गुरुदास दासगुप्त ने तो तस्वीर ही साफ कर दी। बोले- जेपीसी को लेकर गतिरोध टूटने की पूरी उम्मीद। पर जेपीसी के गठन की घोषणा संसद के भीतर ही की जा सकती। वरना विशेषाधिकार हनन का मामला बनेगा। पर कांग्रेस सीधे जेपीसी की हामी भरने के बजाए संसद को ढाल बनाने की रणनीति अपना रही। सो विपक्ष के कड़े तेवर को देखते हुए कांग्रेस ने प्रस्ताव पर वोटिंग का फार्मूला छोड़ दिया। अब सत्र की शुरुआत तक सब ठीक-ठाक रहा, तो पहले दिन ही सरकार सदन में प्रस्ताव लाएगी। जिस पर सभी दल अपनी-अपनी बात रखेंगे। आखिर में सरकार की ओर से सदन की भावना का सम्मान करते हुए जेपीसी का एलान हो जाएगा। पर उससे पहले एक और फैसलाकुन सर्वदलीय मीटिंग होगी। जिसमें जेपीसी के टर्म एंड रिफरेंस से लेकर सदस्यों के नाम पर भी अनौपचारिक चर्चा होने के आसार। कांग्रेस ने तो मंगलवार को ही कह दिया- जेपीसी मानेंगे, पर अपनी शर्तें भी जोड़ेंगे। सो कहीं शर्त के चक्कर में फिर कोई गड़बड़झाला न हो जाए। वैसे भी भ्रष्टाचार के मुद्दे पर तीन महीने तक सब-कुछ लुटा कांग्रेस अब होश में आ रही। जेपीसी न मानने के तमाम हथकंडे धरे रह गए। राजा के उत्तराधिकारी कपिल सिब्बल ने तो सीएजी को ही झुठला दिया था। पर अब राजा गिरफ्तार हो चुके। तो सिब्बल को कुछ नहीं सूझ रहा। सिब्बल ने जस्टिस शिवराज पाटिल कमेटी भी गठित की थी। जिसमें 2003 की एनडीए सरकार के वक्त से ही गड़बड़ी की रिपोर्ट। सो अब एनडीए सरकार में संचार मंत्री रहे अरुण शौरी ने मोर्चा खोला। सिब्बल को राजा का वकील बताया। बोले- सिब्बल हमेशा राजा को बचाने की कोशिश कर रहे। जस्टिस पाटिल की रिपोर्ट भी गलतबयानी और सरकार को मदद करने वाली। शौरी ने दावा किया- मेरे पास कुछ ऐसे दस्तावेज, जिन्हें दबाया गया और कैग के सामने पेश नहीं किया गया। यानी शौरी ने सिब्बल को चेतावनी दे दी। सो अपने हर मोहरे पिटवा चुकी कांग्रेस के पास अब जेपीसी के सिवा कोई रास्ता नहीं। विपक्ष ने मंगलवार को नरमी से ही सही, पर राग वही- संसद चलाना चाहते, पर पहले जेपीसी बने। सो कभी झुकती, कभी अकड़ती कांग्रेस अब लेटने को मजबूर हो गई। अब जेपीसी से भ्रष्टाचार का क्या बिगड़ेगा, यह तो पता नहीं। पर संसद के दिन जरूर बहुरेंगे।
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08/02/2011

Monday, February 7, 2011

‘हाथ’ में नहीं अपनी लगाम, न्यायपालिका को नसीहत

बजट सत्र का क्या होगा, तस्वीर अभी साफ नहीं। सोमवार को स्पीकर मीरा कुमार ने लोकसभा के नेताओं की मीटिंग ली। पर हालात जस के तस। सो अब निगाह मंगलवार की प्रणव दा वाली मीटिंग पर टिकीं। कांग्रेस जेपीसी की मांग पर सरेंडर नहीं दिखना चाहती। पर फिलहाल विपक्ष को लोकसभा में जेपीसी पर बहस और वोटिंग का फार्मूला भी नामंजूर। अब तो टू-जी के बाद इसरो से जुड़े एस बैंड स्पेक्ट्रम आवंटन में घोटाले का खुलासा हो रहा। इसरो सीधे पीएम के मातहत। देवास मल्टीमीडिया के चेयरमैन एम.जी. चंद्रशेखर पीएम के वैज्ञानिक सलाहकार रह चुके। इसी कंपनी को 70 मैगाहार्ट्ज वाला एस बैंड महज एक हजार करोड़ रुपए में आवंटित हुआ। पर सरकारी कंपनी एमटीएनएल-बीएसएनएल को इसी की कीमत साढ़े बारह हजार करोड़ रुपए चुकानी पड़ी। सो सीएजी की रपट में अनियमितता का खुलासा हुआ। तो कहा जा रहा- यह घोटाला टू-जी से भी बड़ा। यानी टू-जी घोटाला 1.76 लाख करोड़ का। तो इसके बारे में अनुमान दो लाख करोड़ से अधिक का। अब संचार मंत्रालय के घोटाले में राजा कुर्सी छोड़ जेल गए। अगर इसरो से जुड़े मामले में कैग ने घोटाले को पुख्ता कर दिया। तो सवाल- पीएम मनमोहन का क्या होगा? सोमवार को विपक्ष ने सीधे पीएम से जवाब मांग लिया। लेफ्ट ने इस मामले में भी जेपीसी की मांग कर दी। सो क्या करे या ना करे, कांग्रेस को समझ नहीं आ रहा। पर सुप्रीम कोर्ट और राजनीतिक मोर्चे से बेभाव की पड़ रही मार से कांग्रेस अब दर्द महसूस करने लगी। अपने पीएम मनमोहन सिंह ने इतवार को अपना सारा दर्द उड़ेल दिया। जब हैदराबाद में आयोजित कॉमनवेल्थ लॉ कांफ्रेंस में चीफ जस्टिस एस.एच. कपाडिय़ा की मौजूदगी में बोले- सरकार की जिम्मेदारी तय करने में न्यायिक समीक्षा की भूमिका अहम। पर इसका इस्तेमाल शासन के दो अन्य अंगों- कार्यपालिका और विधायिका में दखल के लिए नहीं होना चाहिए। यानी न्यायिक सक्रियता से मनमोहन सरकार की सांसें फूल रहीं। पर न्यायपालिका को नसीहत देने से पहले पीएम ने अपनी सरकार की दशा क्यों नहीं देखी? कैसे एक गरीब किसान की आत्महत्या के केस से रसूखदार साहूकार को बचाने वाला नेता केंद्र में ग्रामीण विकास मंत्री बन जाता। कैसे चार्जशीटेड नौकरशाह सीवीसी बन जाता। बोफोर्स मामले के दलाल के खाते खुलवा दिए जाते। सिख विरोधी नरसंहार के आरोपियों की फाइल बंद कर दी जाती। अनाज भले सड़ जाए, पर भुखमरी के शिकार लोगों तक नहीं पहुंचता। अगर कार्यपालिका-विधायिका में बैठे महानुभाव निष्ठा के साथ काम करें, तो न्यायपालिका क्यों दखल देगी? अपने संविधान में कार्यपालिका, विधायिका, न्यायपालिका की अपनी-अपनी लक्ष्मण रेखा। पर जब एक पलड़ा कमजोर पड़ता, तो दूसरा हावी दिखने लगता। सो मनमोहन को अपनी सरकार में न्यायपालिका का दखल नजर आ रहा। तो उसके जिम्मेदार खुद मनमोहन। आखिर सीवीसी पी.जे. थॉमस पर इतनी पंगु क्यों? कोर्ट में अलग-अलग स्टैंड लेकर खुद ही भद्द पिटवा रही। अब सोमवार को थॉमस के वकील ने ऐसी दलील दी, शर्म भी पानी मांगे। कहा- जब देश के 153 सांसद आपराधिक रिकार्ड वाले, तो सीवीसी थॉमस क्यों नहीं? यानी जब दागी लोग सांसद बन सकते, तो सीवीसी क्यों नहीं। थॉमस के वकील ने नियुक्ति को सुप्रीम कोर्ट के समीक्षा दायरे से बाहर करार दिया। अगर न्यायपालिका गलत, तो आम लोगों का उस पर इतना भरोसा क्यों? गाहे-ब-गाहे मनमोहन कोर्ट को तो नसीहत दे रहे। कभी सड़े अनाज के मामले में, तो कभी स्पेक्ट्रम-थॉमस जैसे मामलों में। पर नेता कभी अपनी इमेज क्यों नहीं सुधारते? न्यायपालिका का इस्तेमाल सहूलियत के लिए नहीं। पीएम की नजर में कोर्ट की हाल की टिप्पणियां दखलंदाजी, तो सवाल- स्पेक्ट्रम घाटले में विपक्ष की धार कमजोर करने के लिए सीबीआई जांच को सुप्रीम कोर्ट ने मॉनीटर करवाने का फैसला किसने लिया? इतिहास तो यही इशारा कर रहा- जब नेताओं, मंत्रियों, अफसरों ने गठजोड़ कर लोकतंत्र के क्रियाकर्म का प्रोग्राम बना लिया, तब न्यायपालिका ने अपने दायरे के तहत सक्रिय और प्रभावी भूमिका का बीड़ा उठाया। जैन हवाला कांड हो या संचार टैंडर घोटाला। मकान आवंटन में भ्रष्टाचार हो या हवाला कांड में चार्जशीट का मामला। लक्खूभाई पाठक या सेंट किट्स मामले हों या चारा घोटाला। झारखंड मुक्ति मोर्चा रिश्वत कांड हो या बोफोर्स घोटाला। सभी मामलों में तभी नई जान आई, जब अदालतों ने कदम उठाया। सीबीआई तो हमेशा आकाओं को बचाने में लगी रही। सो चीफ जस्टिस एम. एन. वेंकटचलैया ने तो जैन हवाला मामले में तत्कालीन सीबीआई डायरेक्टर विजय रामाराव को निजी तौर पर जवाबदेह बनाया। कई बार कोर्ट की जांच पर मॉनीटरिंग सवालों के घेरे में रही। पर जस्टिस जे.एस. वर्मा ने साफ कर दिया था- मॉनीटरिंग का मतलब कार्यपालिका का अधिकार हथियाना नहीं, उसके कर्तव्य निर्वहन का अहसास कराना। जस्टिस चेनप्पा रेड्डी ने कहा था- अदालतों को निगरानी का काम इसलिए हाथ में लेना पड़ा, क्योंकि उसके आदेशों को पूरा करने में कार्यपालिका का रिकार्ड खराब रहा है। सचमुच न्यायपालिका तो संविधान और कानून के दायरे में अपनी बात रखती। पर कार्यपालिका-विधायिका कैसे काम करतीं, किसी भी आम आदमी से पूछकर देखो।
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07/02/2011

Friday, February 4, 2011

मनमोहन, प्रणव और अलादीन का चिराग

मिस्र में हुस्नी मुबारक के खिलाफ अल्टीमेटम के आखिरी दिन यानी डे ऑफ डिपार्चर से जनता की ताकत दिख गई। आंदोलन से झुके मुबारक सत्ता छोडऩे को राजी। पर अव्यवस्था का हौव्वा दिखा रहे। अपनी कांग्रेस ने भी जेपीसी के मसले पर हमेशा ओछी राजनीति का डर दिखाया। पर इबके मार, इबके मार करते-करते कांग्रेस ने अपने सारे मोहरे पिटवा लिए। जेपीसी की मांग ठुकराने को नित-नए फार्मूले लाई। पर न कोर्ट से, न संसद में राहत मिली। सो शीत सत्र से अब तक चौतरफा पड़ी मार से कराह रही कांग्रेस ने आखिर जेपीसी पर सरेंडर कर दिया। जेपीसी की मांग सीधे-सीधे तो नहीं कबूली। पर संसद में बहस के बाद वोटिंग को राजी हो गई। यानी पहले विपक्ष के जेपीसी वाले प्रस्ताव पर बहस हो, फिर वोटिंग। अगर सदन का बहुमत जेपीसी के पक्ष में गया, तो सरकार राजी। कांग्रेस ने चेहरा बचाने को अब आखिरी पत्ता भी चल दिया। अब जेपीसी का प्रस्ताव लोकसभा में पारित हो गया। तो संसद के सम्मान में अपनी आन छुपा लेगी। अगर प्रस्ताव गिर गया, तो विपक्ष को हंगामाई साबित करने का मौका मिल जाएगा। यानी अब जेपीसी पर वही नंबर गेम होगा, जो 22 जुलाई 2008 को मनमोहन ने अपनी सरकार बचाने के लिए खेला था। सो इम्तिहान यूपीए के घटक दलों का। लोकसभा में ममता-पवार-करुणा का रुख ही जेपीसी का भविष्य तय करेगा। तीनों अब तक गाहे-ब-गाहे जेपीसी की मांग का समर्थन करते आए। सो अब संसद के बजट सत्र में तय होगा, सरकार सचमुच जेपीसी को राजी या फिर राजनीतिक पेंतरेबाजी। सरकार का भरोसा आखिर कोई कैसे करे। कपिल सिब्बल अभी भी एनडीए की नीति को स्पेक्ट्रम घोटाले की वजह बता रहे। शुक्रवार को सिब्बल ने फिर कहा- स्पेक्ट्रम आवंटन में 2003 के बाद सबने गलत फैसले लिए। एनडीए सरकार के मंत्री ने पहले आओ, पहले पाओ की नीति लागू कर दी। जो 31 अक्टूबर 2003 के केबिनेट फैसले का भी उल्लंघन। पर सवाल- अगर एनडीए की नीति गलत थी, तो यूपीए सरकार में बने नियंता कौन सी नींद में थे? एनडीए ने गलती की, तो जनता ने मई 2004 में सबक सिखा दिया। पर यूपीए सरकार भी अगर एनडीए के ढर्रे पर चली। तो सवाल- मंत्री के पास सोचने की क्षमता नहीं थी? चुनाव लडऩे के लिए अपने जनप्रतिनिधित्व कानून में बाकायदा यह शर्त- मानसिक रूप से दिवालिया व्यक्ति चुनाव नहीं लड़ सकता। सचमुच मंत्री को मानसिक दिवालिया नहीं कहा जा सकता, क्योंकि इतना बड़ा घोटाला बिना दिमाग के संभव नहीं। अगर सिब्बल की दलील मान भी लें। तो तब करीब छह-आठ महीने विपक्ष में और पिछले छह साल से सत्ता में बैठी कांग्रेस ने बीजेपी को कटघरे में खड़ा क्यों नहीं किया? जब खुद कांग्रेस की गर्दन फंसी, तो भ्रष्टाचार पर सख्ती दिखाने के बजाए आरोप-प्रत्यारोप क्यों? और तो और, जब 2003 के बाद हुए सारे फैसले गलत, तो सात जनवरी को सिब्बल ने राजा को क्लीन चिट कैसे दी? सुविधा की राजनीति में देश का कितना बेड़ा गर्क करेगी सरकार? यों पहली बार मनमोहन ने भ्रष्टाचार पर जोरदार बातें कीं। बातें तो पहले भी करते रहे। पर अबके यह माना- भ्रष्टाचार से सुशासन की जड़ें खोखली हो रहीं। तेज विकास की राह में रोड़ा बन रहा। इसके कारण अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर हमारी छवि धूमिल होती है और यह हमें अपने लोगों के सामने शर्मिंदा करता है। सचमुच बात तो पीएम ने पते की कही। पर पता नहीं तीन साल से राजा का पता क्यों नहीं बदल पा रहे? जिस राजा को तीन साल पहले जेल में होना चाहिए था, वह मनमोहन के मंत्री बने रहे। मनमोहन की चिट्ठियों को भी नजरअंदाज कर दिया। पर मनमोहन की नजर-ए-इनायत रही। अगर पीएम ने तभी कार्रवाई का साहस दिखाया होता, तो शर्मिंदगी की नौबत न आती। पर मनमोहन ने शुक्रवार को जो कहा, क्या उस पर अमल भी करेंगे? या फिर सुविधा के मुताबिक महज बयान ही रह जाएगा। या फिर जैसे महंगाई पर छह साल से बयान दे रहे, वैसा ही होगा। मनमोहन ने भ्रष्टाचार के साथ-साथ शुक्रवार को महंगाई पर भी बात की। पर महंगाई से अधिक चिंता विकास दर को लेकर जताई। पीएम पूरी ताकत लगाकर बोले- महंगाई आर्थिक विकास की तीव्र गति के लिए गंभीर खतरा। इससे गरीब और कमजोर वर्ग के लोगों पर असर पड़ रहा। सो महंगाई पर तत्काल काबू पाने की जरूरत। इधर माननीय पीएम ने तुरंत काबू की बात की। तो उधर वित्तमंत्री प्रणव मुखर्जी बोले- हमारे पास कोई अलादीन का चिराग नहीं, जो महंगाई को तत्काल काबू में कर लिया जाए। आप ऐसी उम्मीद नहीं कर सकते कि आपके पास अलादीन का चिराग है, जिसको रगड़ें और परेशानी छू-मंतर हो जाए। प्रणव दा ने सही कहा। भइया, जब महंगाई छह साल से बढ़वाते आ रहे, तो भला एक दिन में कैसे कम होगी? काश, जनता के पास वोट के बजाए अलादीन का चिराग होता। तो क्या पांच साल झेलने की नौबत आती? अब भी आम आदमी न समझे, तो कांग्रेस का क्या। एक तो महंगाई मार रही, ऊपर से सरकार की ऐसी भाषा। अकर्मण्यता को छिपाने के लिए अलादीन का चिराग ढूंढ रहे। पर प्रणव दा यह क्यों नहीं समझ रहे, गर सब-कुछ चिराग का जिन्न ही कर लेता। तो क्या अपने लिए आलीशान महल नहीं बनवा लेता, चिराग में ही क्यों रहता?
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04/02/2011