Wednesday, March 16, 2011

बेभाव की पड़ती, तो बिलबिला उठते नेता

कुर्सी छिन गई, पर थॉमस की ठसक नहीं जा रही। अब थॉमस ने राष्ट्रपति को चिट्ठी लिख सुप्रीम कोर्ट के फैसले को गैरकानूनी बताया। बाकायदा अनुच्छेद 143 के तहत राष्ट्रपति रैफरेंस की सलाह दी। थॉमस की दलील- संविधान की व्याख्या करने वाले मुद्दे पर फैसले के लिए पांच जजों की बैंच का होना जरूरी। पर सीवीसी मसले में तीन जजों की बैंच ने फैसला दिया। सो यह फैसला निष्प्रभावी माना जाए। पर थॉमस ऐसी दलील तीन जजों की बैंच के सामने भी दे चुके। फिर भी रार ठाने बैठे हुए। शायद उन ने भी अब ठान लिया- बदनाम हो ही गए, तो अब शर्म का परदा क्यों। सो पूरी ताकत लगा सुप्रीम कोर्ट को ही गलत ठहराने की मुहिम में जुट गए। अपनी व्यवस्था को चलाने वाले नेताओं-नौकरशाहों का अब यही शगल बन गया। सो जब कोई मामला खुद के खिलाफ आ जाता, तो नाक-भौं सिकोडऩे लगते। चाहे बीजेपी हो या कांग्रेस या फिर लेफ्ट और अन्य क्षेत्रीय पार्टियां। मन की हो, तो वाह, नहीं तो आह। तभी तो दिल्ली के लोकायुक्त ने सीएम शीला के करीबी मंत्री राजकुमार चौहान को हटाने की सिफारिश राष्ट्रपति को भेज दी। चौहान ने एक व्यापारी को टेक्स से बचाने के लिए वैट कमिश्नर को धमकाया था। सो लोकायुक्त ने जांच में आरोप को सच पाया। चौहान अपनी सफाई में मजबूत दलील नहीं पेश कर पाए। पर सिफारिश को पखवाड़ा भर होने वाला। फिर भी शीला दीक्षित ने राजकुमार चौहान का राज नहीं छीना। अब बुधवार को दिल का गुबार जुबां पर आ ही गया। मैडम शीला फरमा रहीं- लोकायुक्त के अधिकारों की समीक्षा होनी चाहिए। पर कांग्रेस और शीला को यह भी बताना चाहिए- जब कर्नाटक में बीजेपी के मंत्रियों के खिलाफ लोकायुक्त ने टिप्पणी की, तो मोर्चा क्यों खोला। येदुरप्पा ने तो आरोपी मंत्री को हटाने में कोई देर नहीं की। पर दिल्ली की कांग्रेसी सीएम शीला को दर्द क्यों हो रहा? लोकायुक्त के अधिकार कर्नाटक में सही, तो दिल्ली में गलत कैसे? सीएजी की रिपोर्ट जब मुफीद नहीं लगी, तो कांग्रेस ने खूब सवाल उठाए। खुद शीला लो-फ्लोर बस की खरीब के मामले में सीएजी की रिपोर्ट को कूड़ेदान में फेंकने वाली टिप्पणी कर चुकीं। कपिल सिब्बल ने तो टू-जी स्पेक्ट्रम घोटाले को ही झुठला दिया। अब उसी घोटाले के महाराजा ए. राजा के खिलाफ 31 मार्च तक सीबीआई चार्जशीट दाखिल करने जा रही। सरकार की जांच एजेंसी प्रवर्तन निदेशालय मंगलवार को ही सुप्रीम कोर्ट को बता चुका- इस घोटाले में छह देशों में हवाला के जरिए पैसे का लेन-देन हुआ। सो सिब्बल-शीला के दावों की हवा तो उनकी ही जांच एजेंसियां निकाल रहीं। अब तो जेपीसी के कांग्रेसी अध्यक्ष पी.सी. चाको भी रंग दिखाने लगे। यों जेपीसी की अभी पहली मीटिंग भी नहीं हुई। पर चाको ने मुरली मनोहर जोशी की रहनुमाई वाली पीएसी की जांच के दायरे पर सवाल उठा दिया। पर जेपीसी बनने से पहले इन्हीं चाको की कांग्रेस पीएसी की मुरीद थी। खुद मनमोहन पीएसी के सामने पेशी की पेशकश कर चुके। अब जेपीसी बन गई, तो कांग्रेस को पीएसी का दायरा बढ़ता दिख रहा। सो चाको बतौर जेपीसी अध्यक्ष कांग्रेसी रंग दिखाएंगे या सचमुच संसद का मान रखेंगे, यह आने वाला वक्त बताएगा। पर स्पेक्ट्रम घोटाले में बुधवार को एक नया मोड़ आ गया। जब ए. राजा के बेहद करीबी रहे सादिक बाशा की रहस्यमयी मौत हो गई। परिवार वालों और चेन्नई पुलिस ने सुसाइड बताया। पर परिस्थितियां ऐसीं, हत्या की साजिश से सीधे-सीधे इनकार भी नहीं किया जा सकता। सादिक बाशा की कंपनी में राजा की बीवी डायरेक्टर थीं। बाशा को राजा का फंड मैनेज करने वाला कहा जाता था। सीबीआई अब तक चार बार पूछताछ कर चुकी थी। कहा जा रहा था- राजा का कोई बेहद करीबी सीबीआई का एप्रूवर बनने वाला। यानी बाशा सरकारी गवाह बन जाता, तो राजदारों की पोल खुल जाती। सीबीआई ने बाशा को फिर पूछताछ के लिए समन किया था। पर उससे पहले ही कथित आत्महत्या ने सबको चोंका दिया। खुद सीबीआई इसे आश्चर्यजनक मौत करार दे रही। तो टू-जी घोटाले का पर्दाफाश करने वाले सुब्रहमण्यम स्वामी की दलील- बाशा की मौत से जांच प्रभावित होगी। बीजेपी ने तो सीधे-सीधे हत्या की आशंका जता दी। पर कांग्रेस की जयंती नटराजन ने सीधी टिप्पणी के बजाए बीजेपी पर चुटकी ली। बोलीं- बीजेपी कुछ अधिक जागरूक है। सो हत्या का निष्कर्ष निकाल लिया। बीजेपी को हर बात में षडयंत्र ही नजर आता। पर हम रिपोर्ट का इंतजार करेंगे। अब जयंती के जवाब का मतलब समझना मुश्किल नहीं। पर सत्तापक्ष हो या विपक्ष, किसी की हेकड़ी कम नहीं। बुधवार को गुजरात के मुद्दे पर राज्यसभा में रार ठन गई। वायब्रेंट गुजरात में हजारों करोड़ों के निवेश पर एमओयू दस्तखत हुए। गुजरात कांग्रेस की ओर से शिकायती चिट्ठी आई। तो संघीय ढांचे को अनदेखा कर आयकर विभाग के अधिकारी अनुराग शर्मा ने नोटिस भेज दिया। सो अरुण जेतली ने सरकार से जवाब मांगा। केंद्र-राज्य की इस लड़ाई में आसंदी पर बैठे सभापति हामिद अंसारी भी घेरे में आ गए। पर गुजरात के मुद्दे ने बीजेपी के अंदरूनी मतभेद को एक बार फिर सतह पर ला दिया। लोकसभा में यह मुद्दा एक सैकिंड के लिए भी नहीं उठा।
---------
16/03/2011

Tuesday, March 15, 2011

तो क्या सरकार वाया वाशिंगटन चल रही?

ममता बनर्जी ने रेल बजट में राज्य सरकारों के लिए लुभावनी स्कीम जारी की। तो लगा, अब राज्य सरकारें रेलवे की व्यवस्था को दुरुस्त रखने में जोर देंगी। रेल बजट में ममता ने एलान किया था- रेल परिचालन में जिस राज्य का ट्रेक रिकार्ड उम्दा रहेगा, उसे बजट से इतर दो जोड़ी ट्रेन और सीएम की मर्जी के दो प्रोजैक्ट दिए जाएंगे। पर बजट लागू होने से पहले ही ममता स्कीम का बंटाधार हो गया। यूपी जाट आंदोलन की आग से सुलग उठा। पखवाड़े भर से जाट रेलवे ट्रेक पर बैठे हुए। लगातार ट्रेनें रद्द हो रहीं। कुछ ट्रेनों को लंबे रूट से चलाया जा रहा। मंगलवार को जाट आंदोलनकारी दिल्ली तक पहुंच गए। सो संसद में भी मामला गूंजा। अपने रामदास अग्रवाल ने राज्यसभा में जोर-शोर से मसला उठाया। केंद्र सरकार पर ढिलाई बरतने का आरोप मढ़ा। पूछा- क्या केंद्र सरकार खून-खराबा चाहती है? अब कोई और सवाल उठाता, तो हम भी नहीं पूछते। पर सवाल रामदास अग्रवाल ने उठाया। सो गुर्जर आंदोलन के वक्त भाई रामदास की रामधुन भी याद दिलाते जाएं। जब राजस्थान में पहली बार गुर्जर अपने हक की लड़ाई के लिए रेलवे ट्रेक पर बैठे। तो बीजेपी की सरकार थी। गुर्जरों पर गोलियां चलाई गईं। तो सबसे पहले बीजेपी के साहिब सिंह वर्मा ने आलोचना की। अपनी बेबाकी के लिए पहचाने जाने वाले उन्हीं दिवंगत वर्मा की मंगलवार को ही जयंती भी। पर बात रामदास की। उस वक्त राजस्थान की सीएम ने गुर्जरों को धमकी देते हुए कहा था- एनफ इज एनफ। सो अपना मानना यही, शीशे के घरों में रहने वालों को दूसरे घर पर पत्थर नहीं फैंकना चाहिए। आंदोलन कांग्रेस राज में हो या बीजेपी के राज में या फिर माया-मुलायम के राज में। ऐसे आंदोलनों को जायज नहीं ठहराया जा सकता। आठ करोड़ लोग अपने निजी हक के लिए 125 करोड़ लोगों को परेशान नहीं कर सकते। आम मुसाफिर आंदोलन की मार झेल रहा। परदेस में काम करने वाले लोग आंदोलन की वजह से होली के त्योहार पर भी अपने घर नहीं जा पा रहे। हर बार आंदोलन के लिए सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचाया जाता। पर सवाल- फिर उसी सरकार से अपने हित की मांग क्यों करते? दूसरों की आजादी में खलल डालने वाले आंदोलन को आंदोलन नहीं कहा जा सकता। जब राष्ट्रपिता महात्मा गांधी अहिंसक रास्तों से देश को आजादी दिला सकते। जापान जैसा देश एटमी विनाश के बाद उठ कर विकसित देश बन सकता। तो अपने देश में आंदोलन की रूपरेखा जापानियों जैसी क्यों नहीं? पर अपने नेताओं को वोट बैंक की राजनीति अधिक मुफीद लगती। सो आंदोलन के वक्त विपक्ष में बैठने वाला अपने दिन भूल जाता। राजनीतिक सौहाद्र्र कफन ओढक़र बैठ जाता। सो सामाजिक सौहाद्र्र का माहौल कैसे बने? चुनावी घमासान में नेताओं की जुबान बिना ब्रेक के चलती। सो वोट बटोरने के लिए आरक्षण का सुर्रा छोड़ देते। पर सत्ता में आने पर वही सुर्रा अपने लिए मुसीबत बन जाता। अब जाट आंदोलन तेज हो गया। तो मंगलवार को सामाजिक न्याय व अधिकारिता मंत्री मुकुल वासनिक और गृहमंत्री पी. चिदंबरम ने जाट नेताओं को बातचीत का न्योता दिया। अपनी सरकार के कान में पता नहीं कौन सी बीमारी। जो बिना आंदोलन के आवाज गूंजती ही नहीं। पर अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा फोन करें, तो एक की जगह दो-दो आवाज सुनाई देने लगतीं। अब अमेरिका से जुड़े नए खुलासे को ही देखो। विकीलिक्स ने खुलासा किया- अमेरिकी हित को देखते हुए यूपीए-वन में मणिशंकर अय्यर को पेट्रोलियम मंत्रालय से हटा मुरली देवड़ा को कमान दी गई। वजह बताई गई- मणिशंकर ईरान-भारत गैस पाइपलाइन के हिमायती थे। जो अमेरिका को पसंद नहीं। सो मणिशंकर को मंत्रालय से हटाया गया। पर अब मणिशंकर कह रहे- पेट्रोलियम मंत्रालय तो मुझे अस्थायी तौर पर दिया गया था। पर तबके अमेरिकी राजदूत डेविड मलफोर्ड ने अपने आका को दस्तावेज भेजे। जिसमें खास तौर से उल्लेख किया गया कि पेट्रोलियम मंत्रालय में बदलाव अमेरिका-भारत के संबंधों के मद्देनजर हुआ। अब ऐसी सरकार को क्या कहेंगे? कभी कॉरपोरेट लॉबिस्ट केबिनेट मंत्री और विभाग तय करते, तो कभी अंकल सैम की खातिर विभाग बांटे जाते। सो मंगलवार को संसद के दोनों सदनों में विकीलिक्स के खुलासे पर विपक्ष ने मोर्चा खोला। अपने जसवंत सिंह ने मनमोहन सरकार की विदेश नीति को चिंताजनक बताया। तो पूर्व विदेश राज्यमंत्री शशि थरूर ने सरकार की विदेश नीति का समर्थन करते हुए दलील दी- इसी नीति के चलते विकास दर बढ़ रही। तो क्या भारत की सरकार अब वाशिंगटन से चलेगी? परमाणुवीय जनदायित्व बिल को लेकर मानसून सत्र में कितना हंगामा बरपा था। अमेरिकी जिद के आगे मनमोहन ने विपक्ष को अनसुना सा कर दिया था। बाद में कुछ बातें मानीं, पर आज भी किसी एटमी अनहोनी की स्थिति में मुआवजे की कीमत देखिए। तो अमेरिका और भारत में 23 गुने का फर्क। तब बीजेपी के यशवंत सिन्हा ने बढिय़ा जुमला दिया था- क्या अमेरिकियों का खून खून और भारतीयों का खून पानी? सचमुच अपनी विदेश नीति लचर दिख रही। अमेरिकी शह पर पड़ोसी पाक पैंतरेबाजी करता रहता। तो दूसरा पड़ोसी चीन अपनी चालबाजियों से बाज नहीं आता। नेपाल में माओवाद पसर चुका। तो श्रीलंका से भी संबंध बेहतर नहीं।
----------
15/03/2011

Monday, March 14, 2011

जापान तो उठ जाएगा, पर अपने नेता कितना गिरेंगे?

कहते हैं- मुसीबत अकेले नहीं आती। चाहे कुदरत के कहर से जूझ रहा जापान हो या अपनों के कारनामों से बदनाम हो रही यूपीए सरकार। पहले भूकंप, फिर सुनामी, ज्वालामुखी और अब परमाणु रिएक्टरों में हो रहे विस्फोट से रिसाव तक। पैंसठ साल बाद जापान एक बार फिर विनाश के कगार पर खड़ा। फर्क सिर्फ इतना, छह और नौ अगस्त 1945 की तबाही मानव निर्मित थी। पर अबके प्राकृतिक आपदा। सो मुश्किल घड़ी में मदद को दुनिया के हाथ आगे बढऩे लगे। सोमवार को अपने पीएम मनमोहन सिंह ने भी संसद में बयान देकर दुख जताया। दिल खोलकर मदद की पेशकश कर दी। पर जापान की मुसीबत ने भारत की भी चिंता बढ़ा दी। सो मनमोहन ने देश के परमाणु ठिकानों की सुरक्षा की समीक्षा के निर्देश दिए। ताकि सुनामी और भूकंप जैसी प्राकृतिक विपदाओं के प्रभाव को आसानी से झेला जा सके। यानी जापान के जलजले ने एटमी डील के पैरोकार मनमोहन की चिंता बढ़ा दी। यों जापान की तबाही का फिलहाल अनुमान लगाना नामुमकिन। सो बात यूपीए सरकार की मुसीबत की। सोमवार को संसदीय कार्य मंत्री पवन कुमार बंसल को लेकर संसद में बलवा हुआ। दोनों सदनों की कार्यवाही विपक्ष ने तयशुदा रणनीति के तहत नहीं चलने दी। चंडीगढ़ बूथ आवंटन में घपले का आरोप लगा बंसल के इस्तीफे की मांग की। चंडीगढ़ के कृष्णा मार्केट में आगजनी के शिकार लोगों को दुकानें मिलनी थीं। पर बूथ माफिया सक्रिय हो गए। सो मजिस्ट्रेट जांच शुरू हुई। चंडीगढ़ के पूर्व अतिरिक्त उपायुक्त कैप्टेन पी.एस. शेरगिल ने अपनी रपट में आरोप लगाया- बूथ माफिया को पवन कुमार बंसल का संरक्षण हासिल था। सो रपट का खुलासा होने के बाद सोमवार को बीजेपी ने चंडीगढ़ में बंसल के घर का घेराव किया। तो संसद में कार्यवाही नहीं चलने दी। विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज ने लोकसभा में, तो राज्यसभा में राजीव प्रताप रूड़ी ने मोर्चा संभाला। फिर बंसल ने पूरी तैयारी के साथ जवाब दिया। जांच रपट पर सवाल खड़े किए। बोले- मैं किसी भी जांच को तैयार। विपक्ष के नेता ही अपने सांसदों की एक कमेटी बना लें। अगर मैं रत्ती भर भी गलत पाया गया, तो कभी संसद की ओर मुंह नहीं करूंगा। भावुकता से भरे बंसल ने सारे आरोपों को बीजेपी की साजिश करार दिया। उन ने सुषमा स्वराज और नवजोत सिंह सिद्धू को चंडीगढ़ से चुनाव लडऩे की चुनौती भी दे दी। पर सुषमा ने बंसल की चुनौती को हवा में उड़ाया या चुनौती से भागने की कोशिश की, यह तो वही जानें। पर ऐसा जतलाया, मानो बंसल चुनौती के काबिल नहीं। बोलीं- बंसल को हराने के लिए सुषमा को जाने की जरूरत नहीं। सुषमा का नाम लेकर कोई स्थानीय नेता भी खड़ा हो जाए, तो बंसल को हरा देगा। अब कौन सच्चा, कौन झूठा, यह जांच की बात। पर बीजेपी ने सीबीआई जांच की मांग की। तो बंसल ने सोलह आने सही कहा। एक तरफ सीबीआई पर भरोसा नहीं, दूसरी तरफ उसी से जांच की मांग का क्या मतलब? सचमुच बीजेपी को अपने गिरेबां में झांकने की जरूरत। सोमवार को संसद में सीबीआई जांच और इस्तीफे की मांग की। पर बैंगलुरु में बीजेपी के ही सीएम बी. एस. येदुरप्पा ने अपने खिलाफ लगे आरोपों पर इस्तीफा तो दूर, सीबीआई जांच से भी इनकार कर दिया। बोले- मुझे सीबीआई पर भरोसा नहीं। अब इसे बीजेपी का अंतद्र्वंद्व ना कहें, तो क्या कहें? थॉमस मसले पर बीजेपी का अंतर्विरोध जगजाहिर हो चुका। सो सोमवार को दोनों सदनों में एक जैसी रणनीति का दिखावा किया। पर क्या अंदरूनी कलह ढांपने के लिए संसद को ढाल बनाना सही? यों संसद की फिक्र किसे। सोमवार को हंगामा बंसल के मुद्दे पर हुआ। कांग्रेस-बीजेपी की भिड़ंत बीजेपी-सपा में बदल गई। कांग्रेसी तो मजे लेने लगे। पर सोमवार को सदन में जो हुआ, सचमुच लोकतंत्र को शर्मसार करने वाला। बंसल अपनी सफाई के साथ-साथ सुषमा-सिद्धू को चुनौती देकर बैठ गए। पर सुषमा जवाब देने खड़ी हुईं, तो स्पीकर मीरा कुमार ने अनुमति न देकर सपा के अखिलेष यादव का नाम पुकार लिया। यों सुषमा की दलील सही। जब मंत्री ने नाम लेकर चुनौती दी। तो जवाब देने का उनका हक। वैसे भी विपक्ष का नेता बोलने को खड़ा हो। तो परंपरा यही, स्पीकर अनुमति दे देता। पर मीरा कुमार ने ऐसा नहीं किया। सो सुषमा के इशारे पर उत्तेजित बीजेपी सांसद वैल में आ गए। पर बीजेपी के हंगामे से अबके सपा वाले नाराज हो गए। यूपी की माया सरकार ने पिछले दिनों सपाइयों पर डंडे बरसाए। जेल में ठूंस दिया। सो सपाई पहले से ही बौखलाए। सदन में सपा के नीरज और धर्मेंद्र ने खुलेआम कह दिया- अब जब भी सुषमा-आडवानी बोलेंगे। हम बोलने नहीं देंगे। पर बीजेपी की जिद के बाद स्पीकर ने सुषमा को मौका दिया। तो मुलायम सिंह जैसे वरिष्ठ नेता दनदनाते हुए वैल में सुषमा के सामने खड़े हो गए। हंगामा खूब बरपा। नौबत गाली-गलौज, हाथापाई तक आ गई। सदन स्थगित होने के बाद मां-बहन की गाली-गलौज तो हुई ही। सपा के नीरज शेखर और बीजेपी के अनंत कुमार के बीच बाहर निकल कर देख लेने की चुनौतीबाजी भी हो गई। सो अब सवाल- संसद में बैठे अपने माननीय नेता कितना गिरेंगे? जापान इस कुदरती कहर के बाद भी न सिर्फ उठेगा, बल्कि और मजबूत होकर खड़ा होगा। जापान हिरोशिमा-नागासाकी विस्फोट के बाद ऐसा करके दिखा चुका। पर अपनी गिरी हुई राजनीति कब उठेगी?
----------
14/03/2011

Friday, March 11, 2011

तो भ्रष्टाचार के मौसम में बढा दी सांसद निधि

‘क्या पैसा-पैसा करती है.. क्यों पैसे पे तू मरती है.... पैसे की लगा दूं ढ़ेरी.. दे दना दन पैसा-पैसा.. मैं बारिश कर दूं पैसे की जो तू हो जाए मेरी..।’ फ्लॉप हिंदी सिनेमा दे-दना-दन के इस गाने को अपना प्रणव दा ने सांसदों को सुपरहिट बना दिया। दे दना दन सांसदों की निधि बढ़ा दी। भले आम बजट से आम आदमी को कोई फौरी राहत नहीं मिली। पर बजट चर्चा के जवाब में वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी ने सांसदों को मुंहमांगी मुराद थमा दी। सांसद निधि को एक झटके में बढ़ाकर दो से पांच करोड़ कर दिया। सो बहस में सरकार की आलोचना करने वाले सांसद भी गदगद हो गए। क्या विपक्ष, क्या लेफ्ट और क्या सत्ता पक्ष, कुल मिलाकर समूचे सदन ने मेजें थपथपा कर खुशी का इजहार किया। सो प्रणव दा के जवाब के वक्त सदन में शांति रही। प्रणव दा की ओर से पेट्रोल की कीमत बढऩे का एलान भी विपक्ष की मदहोशी नहीं तोड़ पाई। सो उन ने विपक्ष को खूब आड़े हाथों लिया। बजट को रोजगार विहीन बताने पर प्रणव ने मनरेगा की याद दिलाई। यूपीए राज में उठे चार बड़े कदमों- राइट टू एम्पलॉयमेंट, राइट टू इन्फोर्मेशन, राइट टू एजुकेशन और अब राइट टू फूड का जिक्र किया। पर सिवा काले धन के विपक्ष ने टोका-टाकी तक नहीं की। सो सवाल, सांसद निधि क्या सांसदों का मुंह बंद करने के लिए बढ़ाई गई? बजट पर हुई बहस में विपक्ष ने जोर-शोर से महंगाई, किसान, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार का मुद्दा उठाया था। पर प्रणव दा ने यहां भी चतुराई दिखा दी। आम आदमी को तो महंगाई की मार अभी और झेलनी पड़ेगी। सो दादा ने सीधे आम आदमी की आवाज उठाने वाले नुमाइंदों के मुंह पर ‘निधि’ मार दी। प्रणव दा का ऐसा मंत्र देख सोमनाथ दादा की याद आ गई। दोनों बंगाल की राजनीति के पुरोधा। दोनों ने केंद्र की राजनीति में बड़ा मुकाम हासिल किया। पर फर्क देखिए- सोमनाथ दा ने सांसद निधि में घपले का मर्ज समझ हकीम की तरह ईलाज करने की कोशिश की। भले सांसद निधि को खत्म कराने में सफल नहीं हो पाए। पर प्रणव दा ने तो मर्ज को समझकर उसे और हवा दे दी। वह भी तब, जब बिहार जैसे बेहद पिछड़े राज्य ने हाल ही में ऐतिहासिक कदम उठा विधायक निधि खत्म कर दी। नीतिश सरकार की इस पहल के बाद सांसद निधि भी खत्म होने की आस थी। पर प्रणव मुखर्जी ने उसमें ढ़ाई गुना इजाफा कर दिया। सचमुच ईमानदार आदमी हमेशा कोने में खड़ा रोता ही रहेगा, क्योंकि भ्रष्टाचार के इस मौसम में ईमानदारी किसी काम की नहीं। सांसद निधि के मामले में भ्रष्टाचार की शिकायतें कोई नई बात नहीं। ऑपरेशन दुर्योधन में पकड़े गए 11 सांसद सवाल के बदले घूसकांड में बर्खास्त हो चुके। फिर ऑपरेशन चक्रव्यूह में करीब सात सांसद फंसे थे, जो सांसद निधि में घपलेबाजी पर ही आधारित था। पर सांसद निधि के घपलेबाज सांसद चौदहवीं लोकसभा में सस्ते में छूट गए थे। सो सांसद निधि को लेकर हर बार बहस हुई। पर बहुमत सांसद इसे खत्म करने के बजाए बढ़ाने की पैरवी करते रहे। सांसद निधि को दो से पांच करोड़ करने की मांग वाजपेयी सरकार के वक्त से चली आ रही। पर तब अरुण शौरी ने भ्रष्टाचार की कथा सुना वाजपेयी को रोक लिया। अपने ही सांसद शौरी के खिलाफ खड़े हो गए। फिर भी शौरी नहीं माने। पर महंगाई, भ्रष्टाचार के भंवर में गोते लगा रही मनमोहन सरकार ने अबके एक झटके में अमलीजामा पहना दिया। यों इस निधि की शुरुआत महाराष्ट्र से हुई। राम नाईक अस्सी के दशक में विधायक थे। चुनाव क्षेत्र से लोग छोटे-मोटे काम के लिए आते थे। कहीं खरंजा, कहीं सीवर, तो कही पुलिया आदि। सो राम नाईक ने मुहिम चलाई और महाराष्ट्र में निधि तय हो गई। फिर राम नाईक जब सांसद बने, तो वही मुहिम दोहरा दी। आखिर पांच साल की मेहनत ने रंग दिखाया। नरसिंह राव की सरकार ने एक करोड़ की सांसद निधि तय कर दी। शुरुआती साल में ही इसके नतीजे दिखने लगे। ठेकेदार ठेका हासिल करने के लिए सांसदों तक 15 से 20 फीसदी कमीशन पहुंचाने लगे। सो फिर निधि दो करोड़ करने की मांग हुई। और अब पूरे पांच करोड़ तय हो गए। पर क्या कमीशनखोरी बंद हो जाएगी? बीस नहीं, अगर 15 फीसदी भी कमीशन जोड़ें। तो पांच करोड़ का सालाना कमीशन हुआ पिचहत्तर लाख। यानी मासिक कमीशन छह लाख पच्चीस हजार। अब किसी सांसद को बैठे-ठाले 6.25 लाख मिले और क्षेत्र में काम भी दिखे। तो भला कौन सांसद ऐसी निधि का विरोध करेगा। यह तो सांसदों के हाल में बढ़े वेतन-भत्ते से कहीं अधिक। सो सवाल- मनमोहन सरकार ने आम आदमी को राहत देने के बजाए सांसदों को तोहफा क्यों थमाया? प्रणव दा ने खुद माना, इस बढ़ोतरी से खजाने पर 2, 370 करोड़ रुपए का अतिरिक्त बोझ पड़ेगा। अब कोई पूछे, सांसद निधि अभी नहीं बढ़ाते। तो कौन सी आफत टूट पड़ती। आज तो सबसे बड़ी जरुरत आम आदमी को महंगाई से निजात दिलाने की है। पर शुक्रवार को सरकार ने आम आदमी को महंगाई का डर दिखाया। तेल की कीमतें बढ़ाने का इशारा किया। पर सांसदों को रेवड़ी थमा दी। ताकि आम आदमी काटे घास, मलाई काटे सांसद। जैसे ब्लैक मनी के मामले में हसन अली को जमानत मिल गई। सेशन कोर्ट ने माना, जांच एजेंसी के पास पुख्ता सबूत नहीं। यानी सरकार ने जान-बूझकर कमजोर केस बनवाया। सो टू-जी मामले में भले निगरानी सुप्रीम कोर्ट की। पर तथ्य तो सीबीआई को ही जुटाना। सो होगा वही, जो मंजूर-ए-मनमोहन सरकार होगा।
-------------
11/03/2011

Thursday, March 10, 2011

पीएम की ‘सफाई’ और शीला का ‘समाजशास्त्र’

तो थॉमस पर पीएम की ‘सफाई’ पृथ्वी‘राज’ की फांस बन गई। विपक्ष ने देशव्यापी जनसंघर्ष अभियान छेड़ दिया। महाराष्ट्र के सीएम पद से इस्तीफे की मांग तेज कर दी। सो गुरुवार को पृथ्वीराज चव्हाण दिल्ली तलब हो गए। दस जनपथ से लेकर सात रेस कोर्स रोड तक बचाव की रणनीति पर मंथन हुआ। अहमद पटेल से मिलते हुए चव्हाण ने सोनिया गांधी के सामने सफाई पेश की। फिर महाराष्ट्र कांग्रेस के प्रभारी मोहन प्रकाश के साथ बचावी एजंडे पर मंथन। चव्हाण ने अपनी सफाई में हर जगह थॉमसाई इतिहास को दोहराया। पर अब इतिहास बांचने से क्या होगा, जब चुनावी राज्यों में पार्टी का भूगोल खराब होता दिख रहा। वामपंथी दलों ने तो थॉमस मुद्दे को केरल-बंगाल में भुनाने का एलान भी कर दिया। सो अब सवाल- ‘आदर्श’ पर अशोक चव्हाण की बलि लेने वाली कांग्रेस अपने पृथ्वी राज का क्या करेगी? पीएम ने संसद में ‘हाथ’ की ऐसी सफाई दिखाई, पृथ्वी का दामन दागदार हो गया। सो हताशा में चव्हाण ने भी झूठी कथा सुना दी। कह दिया- थॉमस मुद्दे पर केरल सरकार से रिपोर्ट मांगी गई थी, पर उसमें चार्जशीट की कोई जानकारी नहीं थी। पर अब केरल के सीएम वी.एस. अच्युतानंदन ने चव्हाण को झूठा बता दिया। बोले- थॉमस पर सारी जानकारी केंद्र को भेजी थी। यानी थॉमस पर साफ-सफाई के खेल में कांग्रेस ‘सर्फ एक्सेल’ का इश्तिहार बना रही। एक दाग छुड़ाने के चक्कर में दाग पर दाग लगाए जा रही। तभी तो पीएम ने संसद में सफाई दी, तो चव्हाण पर ठीकरा फोड़ दिया। चव्हाण ने केरल सरकार पर। और अब आलाकमान से मुलाकात के बाद चव्हाण ने चुप्पी की चादर ओढ़ ली। गुरुवार को बोले- पीएम की सफाई के बाद थॉमस मामले पर अब मुझे कुछ नहीं कहना। सीवीसी के पैनल के तीन नाम की सूची तैयार करने की जिम्मेदारी मेरी थी। यानी साफ-सफाई के लपेटे में पीएम के बाद सीधे दस जनपथ पर आंच न आए। सो आज की राजनीति के ‘पृथ्वीराज चव्हाण’ ने लड़े बिना ही हथियार डाल दिए। पर पीएम की सफाई हो चव्हाण की चुप्पी, सवाल अभी बहुतेरे। माना, पीएम को कार्मिक मंत्रालय ने थॉमस के केस के बारे में जानकारी नहीं दी। पर जब मीटिंग में सुषमा स्वराज ने मुद्दा उठाया। तो पीएम ने भरोसा क्यों नहीं किया? क्या लोकतंत्र में विपक्ष की अहमियत खत्म हो गई? अगर पीएम 24 घंटे के लिए थॉमस की नियुक्ति रोक तथ्यों की जांच करवा लेते। तो कौन सी आफत टूट पड़ती? अभी भी तो सीवीसी बिना चीफ के काम कर रहा। पर सत्ता का नशा सिर चढ़ कर बोला। सो अब सुप्रीम कोर्ट के डंडे से समूची सरकार सीधी हो गई। राज्यसभा में सीताराम येचुरी ने भी एक मौजूं सवाल उठाया। पूछा- जब टू-जी स्पेक्ट्रम घोटाले के मामले में भी थॉमस पर सूई घूम रही थी, तो पीएम ने खुद पड़ताल क्यों नहीं कराई? इसके अलावा एक और सबसे अहम सवाल। जब तीन नामों के पैनल में सिर्फ थॉमस के नाम पर आपत्ति थी। तो पीएम ने बाकी अन्य दो नामों पर विचार क्यों नहीं किया? आखिर थॉमसाई जिद का क्या मतलब? क्या पैनल में बाकी दो नाम सिर्फ खानापूर्ति के लिए रखे गए थे? पर जैसी सरकार, वैसा ही विपक्ष। कोई मजबूत विपक्ष होता, तो ऐसे हालातों में सरकार की डोली उठ चुकी होती। पर यहां तो दोनों सदनों के नेता विपक्ष ही आपस में लड़ रहे। आडवाणी जैसे वटवृक्षी नेता अफसोस जता रहे कि आज कोई वीपी सिंह जैसा नेता नहीं। यानी विपक्ष ने खुद को कमजोर मान लिया। जबकि टू-जी हो या थॉमस जी, अब बोफोर्स से बड़ा मुद्दा बन चुकी। पर विपक्ष में इतनी ताकत ही नहीं, इसलिए किसी वीपी सिंह की बाट जोह रही। कांग्रेस भी अब हर काम डंके की चोट पर कर रही। तभी तो टूटने की कगार पर पहुंच चुके डीएमके-कांग्रेस गठबंधन को बचा लिया। सीट-सीबीआई का समझौता कर कांग्रेस बाजी मार गई। सो राजनीतिक नैतिकता तो सिर्फ सुनने-सुनाने की कहानी भर। जैसे आज आडवाणी कह रहे- कोई वीपी होता, तो....। वैसा ही एक दिन आएगा, जब नई पीढ़ी को उनके बाप-दादा कहानी सुनाएंगे- राजनीति में कभी नैतिकवान नेता हुआ करते थे..। पर अफसोस, आज के नेता आईना देखने के बजाए मौजूदा समाज को कोस रहे। दिल्ली की महिला सीएम शीला तीसरा टर्म सरकार चला रही। महिला दिवस के दिन सूरज के उजाले में दिल्ली की एक लडक़ी और बुजुर्ग महिला की हत्या हो गई। पर आत्ममंथन के बजाए मैडम शीला समाजशास्त्र पढ़ा रहीं। गुरुवार को बोलीं- राधिका तंवर हत्याकांड में पुलिस के साथ-साथ समाज भी जिम्मेदार। कहने-सुनने में दलील बिल्कुल सही। पर बंदूक थामे व्यक्ति से क्या कोई मुकाबला करेगा? अगर किसी ने हिम्मत दिखा भी दी। तो पुलिस स्टेशन के इतने चक्कर लगाने पड़ते, लोग पुलिस के नाम से सिहर उठते। अपनी पुलिस आज भी ब्रिटिश मानसिकता वाली। किसी भी राजनेता ने पुलिस रिफॉर्म पर ध्यान नहीं दिया। यही वजह है कि आज भी पुलिस को लोग सम्मान नहीं, खौफ की नजरों से देखते हैं। पुलिस को आम लोगों का दोस्त बनाने की राजनीतिक पहल कभी नहीं हुई। ताकि समाज के लोग हिम्मत से आगे बढ़े। पर शीला को तो ऐसी भाषणबाजी की आदत हो चुकी। महिला पत्रकार सौम्या विश्वनाथन की हत्या हुई, तो शीला ने महिलाओं को रात में बाहर न निकलने की नसीहत दे दी। दिल्ली में क्राइम बढ़ा, तो बाहरियों को जिम्मेदार ठहराया। जबकि शीला खुद बाहरी।
----------
10/03/2011




Friday, March 4, 2011

भ्रष्टाचार के ‘मोड़’ पर क्वात्रोची बरी!

कहने को संसद सर्वोच्च, पर विधानसभा चुनाव भारी पड़ रहा। चुनाव की खातिर बजट सत्र का गला घोंटने पर सत्तापक्ष-विपक्ष में जबर्दस्त सहमति बन गई। सो संसद सत्र रिशिड्यूल होना तय। अब पहला चरण होली के बाद 25 मार्च तक चलेगा। फिर चुनावी शोर खत्म होने के बाद 23 मई से 10 जून के बीच दसेक दिन का सत्र बुलाया जाएगा। सो संसद सत्र पर मंडराए चुनावी बादल से कवि सुदामा पांडे धूमिल की कुछ पंक्तियां याद आ गईं। जिनमें लिखा- संसद तेल की वह घानी है, जिसमें आधा तेल है और आधा पानी है। और यदि यह सच नहीं है, तो यहां एक ईमानदार आदमी को अपनी ईमानदारी का मलाल क्यों है। जिसने सत्य कह दिया है, उसका बुरा हाल क्यों है? धूमल की ये पंक्तियां कवि की कल्पना नहीं, सच्चाई। संसद में कोई भी सरकार सच का सामना नहीं करना चाहती। विपक्ष भी विरोध की रस्म-अदायगी कर चुप बैठ जाता। सो थॉमस मसले पर शुक्रवार को बीजेपी ने चुप्पी की चादर ओढ़ ली। पर पहली बार पीएम ने जम्मू जाकर जुबान खोली। तो बतौर पीएम जिम्मेदारी कबूल ली। सुप्रीम कोर्ट के फैसले के सम्मान की बात दोहराई, भविष्य में ऐसा न होने का भरोसा दिलाया। पर सूखी-सूखी जिम्मेदारी कबूलने का क्या मतलब? अब तो एक और झूठ सामने आया। गुरुवार को कानून मंत्री मोइली ने थॉमस के इस्तीफे की पुष्टि की थी। पर शुक्रवार को थॉमस के वकील ने न सिर्फ इस्तीफे से इनकार किया। अलबत्ता फैसले के खिलाफ अपील करने का खम ठोक दिया। सो अब कांग्रेसी खेमा दलील दे रहा- इस्तीफे की कोई जरूरत ही नहीं। चूंकि सुप्रीम कोर्ट ने नियुक्ति रद्द की। सो अधिसूचना जारी होगी। पर थॉमस का मामला निपटा नहीं, बोफोर्स केस ने विपक्ष को एक और मुद्दा थमा दिया। दिल्ली की तीसहजारी कोर्ट ने सीबीआई की क्लोजर रिपोर्ट मान ली। बोफोर्स सौदे में दलाली खाने वाले ओतावियो क्वात्रोची के खिलाफ अब केस बंद हो गया। सीबीआई ने भ्रष्टाचार के इस मौसम में सबसे बड़ा केस बंद करवा बाकियों को इशारा कर दिया। अब जरा बोफोर्स केस बंद करने की सीबीआई की दलील देखिए- पच्चीस साल बीत चुके। ढाई सौ करोड़ खर्च हो चुके। क्वात्रोची को भारत नहीं लाया जा सका। सो अब केस को आगे चलाने का कोई मतलब नहीं। दलील तो सही, पर सवाल बहुतेरे। आखिर क्वात्रोची को भारत लाने में सीबीआई और सरकार सफल क्यों नहीं हुईं, यह कौन बताएगा? बोफोर्स केस में सरकार बदलने के साथ आए उतार-चढ़ाव का जवाब कौन देगा? अगर क्वात्रोची को कांग्रेस की सरकार आरोपियों की लिस्ट से बाहर कर रही। तो सवाल- क्या आजादी के बाद भी विदेशी हमारे देश के खजाने को यों ही लूट ले जाएंगे? अंग्रेजों ने सोने की चिडिय़ा भारत का खूब दोहन किया। पर आजाद देश को विदेशियों के हाथ लुटाने वालों की यह कैसी राष्ट्रभक्ति? अब निचली अदालत से ही सही। फिलहाल क्वात्रोची बोफोर्स केस से तो बरी ही हो गए। सो मनमोहन सरकार अब चाहे, तो क्वात्रोची की थोड़ी और मदद कर सकती। जैसे दिसंबर 2005 में एडीशनल सोलीसीटर जनरल बी. दत्ता को भेजकर क्वात्रोची के लंदन स्थित बैंक खाते डिफ्रीज करवाए। क्वात्रोची को दलाली की रकम निकालने की इजाजत दे दी। अब किसी कानून के जानकार को भेज दें। ताकि क्वात्रोची भारत सरकार पर मानहानि का मुकदमा कर सके। आखिर 25 साल तक किसी को आरोपी बनाना और फिर आखिर में केस बंद करना किसी यातना से कम नहीं। रेड कार्नर नोटिस की वजह से इंटरपोल ने मलेशिया और अर्जेंटिना में दो बार गिरफ्तार किया। कई दिन जेल में बिताने पड़े। पर आखिरकार भारत ने सोची-समझी देरी कर मलेशिया और अर्जेंटिना की अदालत से भी क्वात्रोची को रिहा होने दिया। सो सीबीआई की क्लोजर रिपोर्ट को मिली अदालती मंजूरी के बाद तो क्वात्रोची मानहानि का दावा करने के हकदार। शायद ऐसा कर दिया। तो जितनी रकम दलाली में नहीं मिली होगी, उससे अधिक मिल जाएगी। वैसे भी भारत की जनता भले गरीब हो। पर नेताओं के लिए देश वैसे ही सोने की चिडिय़ा, जैसे अंग्रेजों के समय थी। तभी तो घोटाले नहीं, यहां एक नील 76 खरब के महाघोटाले होते। सत्तर हजार करोड़ के कॉमनवेल्थ होते। ‘आदर्शों’ की तो कमी नहीं देश में। पर ऐसे माहौल में जब बोफोर्स केस की फाइल बंद करने का फैसला सुनाने चीफ मैट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट विनोद यादव पहुंचे। तो कुर्सी पर बैठते ही मजरूह सुल्तानपुरी की दो लाइन सुना दीं- ‘वो अफसाना जिसे अंजाम तक लाना न हो मुमकिन, उसे एक खूबसूरत मोड़ देकर छोडऩा अच्छा।’ यानी मजिस्ट्रेट ने सीबीआई की दलील मान ली। पर सवाल- क्या भ्रष्टाचार के सागर में डूबे देश के ताजा माहौल को ‘खूबसूरत मोड़’ कहेंगे? आखिर राजाओं-कलमाडिय़ों को क्या संदेश मिलेगा? यही ना, केस को लंबा उलझाओ। आखिर में सत्ता के बलबूते फाइल तो बंद हो ही जाएगी। यों फाइलें तो खुलती और बंद होती रहेंगी। पर शुक्रवार को राजनीति की एक बुलंद आवाज हमेशा के लिए बंद हो गई। वरिष्ठ कांग्रेसी नेता अर्जुन सिंह का निधन हो गया। वह भी उसी दिन, जिस दिन सोनिया गांधी ने अपनी कांग्रेस वर्किंग कमेटी का एलान किया। अर्जुन वर्किंग कमेटी में स्थायी आमंत्रित सदस्य बनाए गए। पर सोनिया की वर्किंग कमेटी मनमोहन के केबिनेट फेरबदल जैसी ही रही।
-------------
04/03/2011

Thursday, March 3, 2011

निर्लज्जता के पार जाएगी कांग्रेस या जाएंगे पीएम?

आखिर चांटा खाकर ही मनमोहन सरकार मानी। गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट ने सीवीसी पी.जे. थॉमस की नियुक्ति को अवैध ठहराया। तो थॉमस ने इस्तीफा दिया। पर कोर्ट की पहली टिप्पणी के बाद जब पहली दिसंबर को होम मिनिस्टर से मिल थॉमस बाहर निकले। तो तेवर दिखाते हुए कहा था- मैं सीवीसी का बिग बॉस। पर सुप्रीम कोर्ट के सवालों से तभी साफ था, थॉमस को जाना होगा। दो दिसंबर को यहीं पर लिखा था- चाहे जो भी हो, थॉमस की विदाई तय। कांग्रेस को तय करना कि सुप्रीम कोर्ट की चपत से ही थॉमस को चलता करती या चांटा खाकर। सचमुच कांग्रेस का इतिहास चांटा खाकर ही मानने का। चाहे बिहार के गवर्नर बूटा सिंह का मामला हो या झारखंड के गवर्नर सिब्ते रजी को लेकर हुई किरकिरी का। या फिर गोवा के गवर्नर एससी जमीर का। सो कांग्रेस का जमीर तो अब चिकना घड़ा हो चुका। सुप्रीम कोर्ट की चाहे जितनी थाप पड़े, असर नहीं पड़ता। पर गुरुवार को कोर्ट ने न सिर्फ थॉमस की नियुक्ति को गैरकानूनी ठहराया। अलबत्ता पहली बार कांग्रेसी चिकने घड़े पर छाप दिखी। चीफ जस्टिस एचएस कपाडिय़ा की रहनुमाई वाली बैंच ने कहा- थॉमस की नियुक्ति में कमेटी ने सीवीसी जैसी संस्था की गरिमा को ध्यान में नहीं रखा। सिर्फ बायोडाटा के आधार पर नियुक्ति गलत। ऐसी नियुक्तियां नौकरशाही तक सीमित न हों। अन्य क्षेत्र के लोगों पर भी विचार हो। कोर्ट ने माना, थॉमस की नियुक्ति में यह नहीं देखा गया कि जिस व्यक्ति को सीवीसी बनाया जा रहा, वह करप्शन से लडऩे में कितना सक्षम। इसलिए थॉमस की नियुक्ति अवैध। सो जैसे ही फैसला आया, समूची सरकार को सांप सूंघ गया। विधि मंत्री वीरप्पा मोइली संसद भवन में भागते-भागते पीएम के पास जाते दिखे। चिदंबरम तो ऐसे निकल गए, मानो, मुंह में जुबान नहीं। शंख की तरह नाद करने वाले कांग्रेसी प्रवक्ता फटे बांस नजर आए। यों कांग्रेस और सरकार ने थॉमस का बचाव करने में कसर नहीं छोड़ी। अटार्नी जनरल तक ने झूठ बोला। जब सुषमा स्वराज ने आंखें दिखाईं। तो चिदंबरम ने सुषमा को सही ठहरा बात संभाल ली। अब दबी जुबान में कह रही- हमने तो थॉमस से कई बार इस्तीफा देने को कहा। पर वह नहीं माने। अब ऐसी दलीलें तो महज खाल बचाने की कोशिश। पर सवाल- जब सुषमा स्वराज ने बतौर नेता प्रतिपक्ष एतराज जताया। तो पीएम-चिदंबरम क्यों नहीं माने? तब चिदंबरम ने थॉमस को पॉमोलिन ऑयल घोटाले में क्लीन चिट दी। खुद मनमोहन-चिदंबरम ने सात सितंबर को थॉमस के शपथ ग्रहण समारोह के बाद खम ठोककर कहा था- हमने सही कदम उठाया। तीन नामों के पैनल में सबसे बेहतर उम्मीदवार चुना। अब मनमोहन बताएं- क्या इसे बेहतर उम्मीदवार कहते हैं? सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद थॉमस नाम की घंटी सीधे मनमोहन के गले बंध गई। गुरुवार को समूचे विपक्ष ने मोर्चा खोल दिया। सो संसद के दोनों सदन ठप हो गए। अब विपक्ष चिदंबरम का इस्तीफा मांग रहा। पीएम को भी इशारा कर दिया। सो पीएम को संसद में सफाई देनी होगी। पर राम जेठमलानी ने तो बेलौस कह दिया- पीएम अपनी ईमानदार छवि का बहुत बेजा फायदा उठा चुके। अब किसी न किसी को संसदीय जवाबदेही तो लेनी होगी। आडवाणी बोले- साठ साल में कभी ऐसा नहीं हुआ, जब पीएम की ओर से हुई नियुक्ति को कोर्ट ने अवैध ठहराया हो। सो पीएम-सोनिया को नैतिक जिम्मेदारी लेनी होगी। अरुण जेतली ने भी कहा- अब सिर्फ पीएम ही जवाब दे सकते। उन्हें गुमराह किया गया या खुद गुमराह हो गए थे। सो टू-जी स्पेक्ट्रम घोटाले पर गठबंधन की मजबूरी का राग अलापने वाले मनमोहन अब कौन सा नया कुतर्क देंगे? यों मोइली ने बाद में माना, कोर्ट का फैसला सरकार के लिए सबक। पर अब बचाव में कांग्रेस क्या करेगी? पीएम खुद अपनी नैतिकता तय करेंगे। या कांग्रेस बहुमत के दम पर उनसे ही गाड़ी खिंचवाएगी, यह देखना होगा। पर अब कांग्रेस के पास कोई तर्क नहीं। यों राजनीति में बचाव के लिए कुतर्कों की भी कमी नहीं। पर मनमोहन के ‘मोहिनी’ रूप का सच अब खुल चुका। सो देर शाम पीएम निवास पर कांग्रेस कोर ग्रुप की इमरजेंसी मीटिंग हुई। पर अब कांग्रेस चाहे जितनी मीटिंगें करे, सरकार की साख को बट्टा लग चुका। थॉमस मामले पर जूते, प्याज, टमाटर, अंडे सब खा लिए। सो अब कांग्रेस को ही तय करना, निर्लज्जता की सारी हदें पार कर कुतर्क गढ़ेगी या पीएम पद छोड़ेंगे? थॉमस तो निर्लज्जता की पराकाष्ठा पार कर ही चुके थे। जब उन ने हलफनामा देकर कहा था- मेरे खिलाफ क्रिमीनल केस, करप्शन का नहीं। बाकायदा सुप्रीम कोर्ट के अधिकार को ही चुनौती दे दी थी कि उनकी नियुक्ति की न्यायिक समीक्षा नहीं की जा सकती। देखिए, कैसा राज आ गया- जब चोर कोतवाल को उसका हक बताने लगे। यों कोर्ट के फैसले का एक असर दिखा। गुरुवार को पीएमओ ने फोन कर अन्ना हजारे को सूचना दी- अपनी सहूलियत के मुताबिक आकर पीएम से मिल सकते हैं। हजारे पिछले पांच महीने से लोकपाल बिल पर बात करने के लिए टाइम मांग रहे थे। अब 27 मार्च से आमरण अनशन की चेतावनी दे दी थी। पर कोर्ट के फैसले ने गुरुवार ही पीएमओ को सद्बुद्धि दे दी। सो थॉमस पर आए फैसले, उस पर हुई सियासत और अब तक के घटनाक्रम का एक ही निचोड़- यह मनमोहन सरकार की राजनैतिक, न्यायिक, संवैधानिक हार।
----------
03/03/2011