Wednesday, April 6, 2011

तहरीर-ए-स्क्वायर की शक्ल लेता जंतर-मंतर!

तो चिंगारी अब शोला बनती जा रही। अन्ना हजारे के अनशन में लोगों का हुजूम उमड़ रहा। सो मंगलवार तक अन्ना के आंदोलन को गैर जरूरी और वक्त से पहले का कदम बता रही कांग्रेस अब गुहार लगा रही। बुधवार को सरकार बातचीत को राजी हो गई। शरद पवार भी जीओएम छोडऩे को तैयार। यों छोडऩे वाले ऐसे लफ्फाजी नहीं करते। पर दिन भर की लफ्फाजी के बाद देर शाम पवार ने सिर्फ जीओएम से हटने की इच्छा को चिट्ठी में लिख मनमोहन को भिजवा दिया। अब कांग्रेस चाहे जो कहे, अन्ना के आंदोलन का असर दिखने लगा। सो केबिनेट मंत्री वीरप्पा मोइली से लेकर अंबिका सोनी भी मैदान में कूदे। दलील दी- सरकार ने कभी अन्ना के सुझावों को नकारा नहीं। यानी अब सरकार को लग रहा- भैंस पानी में जाए, उससे पहले ही हांक लो। सो अन्ना को मनाने के लिए संपर्क के सारे सूत्र खोल दिए। नित नई दलीलें दी जा रहीं, ताकि आंदोलन की महत्ता बढ़ न सके। कांग्रेस और कानून मंत्री वीरप्पा मोइली ने फिर संसदीय मर्यादा की दुहाई दी। अगले सत्र में बिल पेश करने की इच्छा जताई। जीओएम के सामने सुझाव रखने की सलाह दी। यहां तक पेशकश कर दी- संयुक्त समिति की मांग पर हम गौर करने को तैयार। हमने कभी सिद्धांत रूप से संयुक्त समिति के गठन को ना नहीं कहा। अब अगर सरकार सचमुच संयुक्त समिति का गठन कर दे, तो अन्ना हजारे का आंदोलन भी थम जाएगा। पर दूसरे दिन भी अन्ना का उपवास जारी। फिर भी सरकार की ओर से सिर्फ जुबानी हलचल हो रही। तभी तो मोइली ने संसद की पारदर्शिता का बखान किया। बोले- बिल का ड्राफ्ट तैयार हो चुका है। पर यह तब तक आखिरी रूप नहीं लेगा, जब तक स्टैंडिंग कमेटी में चर्चा नहीं हो जाती। कोई भी बिल लुकाछिपी से पारित नहीं होता। अपनी संसद के कामकाज का तरीका सबसे पारदर्शी। यानी सरकार तय नहीं कर पा रही, अन्ना के आंदोलन पर क्या कहें और क्या करें। कांग्रेस प्रवक्ता जयंती नटराजन ने मोइली उवाच ही दोहराया। साथ में कह गईं- देश में हमेशा संसद ही बिल पारित करती आई। बाहरी लोग बिल को तय नहीं करते। अगर हर कोई भूख हड़ताल करने लगे, तो देश कैसे चलेगा? अब हाथ कंगन को आरसी क्या, पढ़े-लिखे को फारसी क्या। पर सवाल कांग्रेस से- माना बाहरी लोग बिल तय नहीं करते। तो सोनिया गांधी की नेशनल एडवाइजरी काउंसिल क्या आसमान से उतर कर आई? कांग्रेस जिन अन्ना हजारे को बाहरी बताना चाह रही, वह आज देश की जनता की आवाज हैं। पर सोनिया ने गिने-चुने लोगों को एनएसी का मेंबर बनाया। पीएम मनमोहन ने मजबूरी में मान्यता दी। अब जब सोनिया गांधी के लिए सरकार एनएसी का गठन कर संवैधानिक जामा पहना सकती। तो अन्ना और उनके समर्थकों को क्यों नहीं? जब एनएसी के मेंबर बड़े-बड़े कानून का ड्राफ्ट बना सरकार को भेज सकते। सरकार ना-नुकर के बाद भी उस ड्राफ्ट को कानूनी शक्ल देने के लिए बाध्य हो सकती। तो भला अन्ना की आवाज को कांग्रेस बाहरी कैसे बता सकती? वैसे भी अपनी संसद भले बिल पारित करने की औपचारिकता निभाती हो। पर क्या यह सच नहीं, संसद में पास होने वाला हर बिल मंत्रालयों में ही अंतिम रूप ले लेता? अपने कानूनविद लक्ष्मीमल सिंघवी ने तो यही कहा था। उनके मुताबिक- यह सत्य है कि कानून बनाने और टेक्स लगाने की सर्वोपरि सत्ता संसद में निहित है। पर वास्तविकता यह है कि विधि अधिनियमों का गर्भाधान और जन्म मंत्रालयों में होता है, संसद में तो सिर्फ मंत्रोच्चारण के साथ उनका उपनयन संस्कार होता और औपचारिक यज्ञोपवीत दे दिया जाता। अब सवाल- यह कैसा तंत्र, जिसमें सिर्फ चुनाव तक जनता जनार्दन की जय होती। सत्ता में बैठने के बाद जनता से दूर हो जाते। अब संसदीय मर्यादा की दुहाई देकर जनता की आवाज दबाने की कोशिश हो रही। यों कांग्रेस लाख दलीलें दे, पर अन्ना ने पीएम को खुला पत्र लिख बता दिया- यह आजादी की दूसरी लड़ाई। किसी के उकसावे पर नहीं। सचमुच महात्मा गांधी ने भी ऐसे ही अंग्रेजी संसदीय मर्यादा का ख्याल रखा होता। तो भारत की आजादी की तारीख और साल शायद कुछ और होते। कांग्रेस भूल रही, जब जनता सडक़ों पर उतरती, तो फिर मर्यादा नहीं, मकसद सामने होता। सो अन्ना ने अब अनशन स्थल पर नेताओं के लिए नो एंट्री का बोर्ड टंगवा दिया। मंगलवार को शरद यादव जैसे-तैसे बोल आए। पर बुधवार को उमा भारती और ओम प्रकाश चौटाला को उलटे पांव लौटना पड़ा। सो अब अपने नेता और नौकरशाह अपनी खैर मनाएं। नवरात्र के इन दिनों में देवी से दुआ करें, जंतर-मंतर सचमुच में तहरीर-ए-स्क्वायर न बन जाए।
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06/04/2011

Tuesday, April 5, 2011

तो अबके तय हो ही जाए, ‘लोक’ बड़ा या ‘तंत्र’

क्रिकेट के बाद करप्शन कांग्रेस को फिर कुरेदने लगा। भ्रष्टाचार के खिलाफ अबके मुहिम राजनीतिक नहीं, छोटे गांधी के नाम से मशहूर अन्ना हजारे ने छेड़ी। अब तक विपक्ष या स्वामी रामदेव जैसे इक्के-दुक्के लोग आवाज उठाते। तो राजनीतिक बता दबा दी जाती। पर पहली दफा भ्रष्टाचार के खिलाफ अन्ना हजारे जैसी गैर-विवादित छवि मैदान में। जिनकी अपनी कोई निजी संपत्ति नहीं। सो अन्ना की चोट सह पाना सरकार के लिए आसान नहीं होगा। दूसरी आजादी की लड़ाई का शंखनाद करते हुए अन्ना मंगलवार से आमरण अनशन पर बैठ गए। स्वामी अग्निवेश, किरण बेदी, अरविंद केजरीवाल जैसी कई सामाजिक हस्तियां भी अन्ना के साथ जुड़ गईं। मंगलवार को देश भर में अन्ना के अनशन का असर दिखा। देश भर में लोगों ने उपवास रखा, रैलियां निकालीं। सो सोमवार तक अकड़ रही कांग्रेस मंगलवार को सकपका गई। अन्ना से अनशन खत्म करने की अपील की। पर कांग्रेस से पहले मनमोहन और उनका महकमा एड़ी-चोटी का जोर लगा चुका। फिर भी अन्ना हजारे भ्रष्टाचार के खिलाफ अपनी मुहिम से पीछे नहीं हटे। सो अन्ना की मुहिम की राजनीतिक बढ़त लेने बीजेपी मैदान में कूद पड़ी। अन्ना से उपवास तोडऩे का अनुरोध तो किया। पर सरकार को कटघरे में खड़ा करने से नहीं चूकी। सो अब दबी जुबान में कांग्रेसी अन्ना के आंदोलन को भी संघ की साजिश समझाने में जुटे। खीझ में कांग्रेसी अंटशंट गालियां भी निकाल रहे। पर देश के लिए सर्वस्व लुटाने सडक़ों पर उतरे अन्ना हजारे को जन-भावना का अनुमान। सो बोले- सरकार मेरे अनशन से नहीं डरती। उसे डर है, तो बस यह कि पब्लिक भडक़ेगी। तो उसकी सरकार गिर जाएगी। इसलिए मुझे लगता है कि सरकार तीन-चार दिन में झुकेगी। और उसे जन-लोकपाल बिल की मांग माननी पड़ेगी। सचमुच गांधीवादी अन्ना से सरकार सहमी हुई। अन्ना अब तक सौ से अधिक बार आमरण अनशन कर चुके। छह मंत्री और चार सौ नौकरशाहों के खिलाफ मुहिम को अंजाम तक पहुंचा कर ही दम लिया। मनमोहन ने सरकार जब नौकरशाही के दबाव में सूचना के हक कानून में संशोधन करने की सोची। तो मुखालफत की पहली आवाज अन्ना ने ही उठाई। अब अन्ना जन-लोकपाल बिल की मांग कर रहे। ताकि भ्रष्टाचार का जड़ से खात्मा हो। पर नेताओं-नौकरशाहों का दिल है कि भरेगा नहीं। सो सरकार अपनी मर्जी का लोकपाल बिल थोपना चाहती। पर अन्ना ने ठान लिया- अब जनता का बिल ही कानून बनेगा। जन-लोकपाल में स्वत: संज्ञान, सारी शक्तियों से लैस, तय समय में जांच और कार्रवाई दोषी को कड़ी सजा का प्रावधान। और 11 सदस्यीय संस्था की बात, जिनमें आधे सरकार के, तो आधे सीधे जनता के लोग हों। पर सरकारी लोकपाल में भ्रष्टाचार को झुनझुना बनाने की कोशिश। मसलन, शिकायतों पर पहले अनुमति लेनी होगी। कार्रवाई नहीं, परामर्श देने का अधिकार होगा। नौकरशाहों और जजों के खिलाफ जांच का प्रावधान नहीं। सजा भी महज छह से सात महीने की। घोटालों की रिकवरी की कोई व्यवस्था नहीं। सो सात मार्च की मुलाकात में ही पीएम ने अन्ना हजारे के सामने अपनी असमर्थता जता दी। पीएम ने बजट सत्र और पांच राज्यों के चुनाव के बाद दुबारा बात करने का भरोसा दिया। सो अन्ना को यह बात चुभ गई। बोले- जिस जनता ने उन्हें कुर्सी पर बिठाया, उसके लिए टाइम नहीं। हमारे बिल को इसलिए नहीं मान रहे, क्योंकि सबका खाना-पीना (रिश्वत) बंद हो जाएगा। पर सरकार की दलील- लोकपाल बिल पर विचार के लिए जीओएम बना हुआ। फिर भी आंदोलनकारियों ने संयुक्त समिति की मांग की। ताकि जन-लोकपाल बिल पर विचार हो। अन्ना की दलील- भ्रष्टाचार से लडऩे को देश में बहुतेरे कानून। पर सब हाथी के दिखाने वाले दांत। अब कुछ ऐसा हो, जो काट सके। पर सरकार के लिए मुश्किल- नौकरशाही को कैसे मनाए। भ्रष्टाचार का कोई भी किस्सा उठाकर देखो, नेता-नौकरशाह का गठजोड़ दिख जाएगा। टू-जी के राजा हों, या कॉमनवेल्थ के खिलाड़ी कलमाड़ी या कारगिल शहीद की विधवाओं के लिए बनी आदर्श इमारत की बलि चढ़े अशोक चव्हाण। हर खेल में नेता-नौकरशाह का गठजोड़ जन-जाहिर। अपने पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त टी.एन. शेषन ने 1993 में भारतीय अफसरशाही को पॉलिश्ड कॉल गल्र्स की संज्ञा दी थी। नौकरशाह सचमुच किसी न किसी नेता को गॉड फादर बना इशारों पर काम करते। जिसका प्रतिफल वरिष्ठता लांघ मलाईदार पद के रूप में मिलता। सो 42 साल से लोकपाल बिल धूल फांक रहा। कभी किसी राजनीतिक दल ने लोकपाल बिल को अमल में लाने का साहस नहीं दिखाया। सो तबसे अब तक 13 सरकारें आईं-गईं, लोकपाल बिल भी लोकसभा में पेश होता और खत्म हो जाता। यानी नौकरशाही अपनी मनमर्जी पर अंकुश लगाना नहीं चाहती। अंग्रेजों ने भारत में जैसी नौकरशाही शुरू की, आज तक वही चलता आ रहा। सो अपने लोक-सेवक अभी भी कानून के संरक्षक या प्रतीक नहीं, अलबत्ता मालिक ही समझते। पर अन्ना हजारे ने उम्मीद की किरण जगा दी। बुजुर्ग नेतृत्व में युवा एक बार फिर सडक़ों पर उतर रहा। सो कहीं भ्रष्टाचार के महासागर में डुबकी लगा रही कांग्रेस की सरकार के लिए अन्ना का आंदोलन ताबूत में आखिरी कील साबित न हो।
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05/04/2011

Friday, April 1, 2011

शिक्षा के हक को नहीं धन, पर क्रिकेट को लूट की छूट

क्या दुआएं, क्या यज्ञ, क्या हवन, क्या नमाज और क्या गंगा आरती। टोटकेबाजी की तो पूछो मत। एक मॉडल तो नंगई पर उतारू। सो कुल मिलाकर क्रिकेट वल्र्ड कप का नशा अब पागलपन में तब्दील हो गया। अपनी मनमोहन सरकार तो मोहाली सेमीफाइनल से ही ऐसी अभिभूत, मालदार आईसीसी को टेक्स छूट दे दी। पर बदले में आईसीसी ने अपनी औकात दिखा दी। भारत के टीवी चैनलों को फाइनल मैच की कवरेज से रोक दिया। टीवी चैनलों पर पाबंदी सिर्फ मैच ही नहीं, प्रेस कांफ्रेंस और नैट प्रेक्टिस तक लागू होगी। सो शुक्रवार को आईसीसी के खिलाफ मीडिया ने बिगुल फूंका। तो आईसीसी पर मेहरबान अपनी सरकार भी लपेटे में आ गई। बीजेपी ने सीधे आईसीसी के मुखिया शरद पवार से जवाब मांगा। कपिल देव ने भी आलोचना करते हुए सवाल उठाया- इतने अहम मैच की कवरेज से मीडिया को दूर कैसे रखा जा सकता? पर आईसीसी हो या बीसीसीआई या शरद पवार। तीनों के लिए सिर्फ पैसे की अहमियत, बाकी जाएं भाड़ में। जिन चैनलों को प्रसारण का अधिकार मिला हुआ, सिर्फ उनका फायदा बढ़ाने के लिए आईसीसी ने यह कदम उठाया। पर जब भारत में हो रहे मैच की कवरेज से भारतीय मीडिया को वंचित रखा जा रहा। यानी भारत सरकार से छूट भी ले रही और भारतीय इलैक्ट्रॉनिक मीडिया को आंखें भी दिखा रही। वह भी तब, जब अपने शरद पवार आईसीसी के प्रेसीडेंट। पर जब दिन भर आईसीसी और शरद पवार की खिंचाई हुई। बीजेपी-कांग्रेस ने मोर्चेबंदी कर मैच से पहले मामला सुलझाने की मांग की। तो आखिरकार देर से ही सही, आईसीसी दुरुस्त आई। शुक्रवार की देर शाम मीडिया कवरेज से बैन हट गया। यों शरद पवार से भला और उम्मीद भी क्या। जिन ने बतौर कृषि मंत्री आम जनता का बेड़ गर्क कर दिया। जब भी मुंह खोला, महंगाई बढ़ा दी। पर जब सरकारी खजाने को लूटना हो, तो पवार चुप रहना मुनासिब समझते। गुरुवार की केबिनेट मीटिंग में यही हुआ। जब आईसीसी वल्र्ड कप को टेक्स छूट का मामला आया। तो पवार चुपचाप बैठे रहे। पर पवार के खास-उल-खास और एनसीपी कोटे से मंत्री प्रफुल्ल पटेल ने केबिनेट में टेक्स छूट की पैरवी की। अपने मनमोहन भी शायद मन बना चुके थे। पर खानापूर्ति के लिए खेल मंत्री अजय माकन से राय मांगी। तो माकन ने टेक्स छूट की मुखालफत की। माकन ने दलील दी, ऐसे में अन्य खेल संगठन भी सरकार से छूट की मांग करेंगे। क्रिकेट टूर्नामेंट को छूट देने का कोई तुक नहीं बनता। वैसे भी आईसीसी कोई सामाजिक संस्था नहीं, अलबत्ता पेशेवर और मुनाफा कमाने के लिए बनाई गई संस्था। माकन ने अपनी सरकार को आईना भी दिखाया। जब दलील दी- खेल मंत्रालय का बजट कम किया गया। तो ऐसे में क्रिकेट को टेक्स छूट क्यों? अब जरा वल्र्ड कप 2011 के आयोजन से आमदनी, खर्च और भारत सरकार की ओर से मिलने वाली टेक्स छूट को देखो। इस वल्र्ड कप से आईसीसी को कुल 1,476 करोड़ रुपए की आमदनी होगी। पर इस पूरे टूर्नामेंट का खर्चा महज 571 करोड़ रुपए होने की संभावना। यानी कुल 905 करोड़ की अतिरिक्त आमदनी आईसीसी को होने जा रही। फिर भी अपनी सरकार जो छूट दे रही, उसका आंकड़ा करीबन 45 करोड़ रुपया बन रहा। सो केबिनेट मीटिंग में अजय माकन के साथ-साथ अंबिका सोनी, कुमारी शैलजा और अन्य मंत्रियों ने भी टेक्स छूट का विरोध किया। केबिनेट मीटिंग में पवार टेक्स छूट के विरोधियों को हैरानगी से देखते रहे। पर आखिर में फैसला आईसीसी के फेवर में गया। सो अब सवाल- पवार ने इस केबिनेट मीटिंग में शिरकत क्यों की। जबकि वह खुद आईसीसी के मुखिया भी। ऐसे में नीयत पर सवाल उठना लाजिमी। सो अब सवाल पवार से- क्या यह मुफ्तखोरी नहीं? जब सुप्रीम कोर्ट ने सड़ रहे अनाज को बरबादी से बचाने के लिए गरीबों में बांटने का आदेश दिया। तो पवार ने मुफ्तखोरी की आदत को बढ़ावा देने वाला बताया था। अपने मनमोहन ने कार्यपालिका के अधिकार में दखल बताया था। पर अब कोई पूछे- 905 करोड़ का सीधा मुनाफा कमाने वाली संस्था को 45 करोड़ की टेक्स छूट क्यों? किसी आम नागरिक की सालाना आमदनी आयकर छूट की सीमा से महज हजार रुपए भी आगे बढ़ जाए, तो दस फीसदी टेक्स चुकाना पड़ता। शुक्रवार को जब टेक्स छूट के मामले पर देश में बवाल मचा। तो संयोग देखिए, आज के दिन यानी पहली अप्रैल 2010 को राइट टू एजूकेशन का कानून देश में लागू हुआ था। पर यूपी, बिहार समेत कई राज्यों, यहां तक कि राजस्थान के सीएम अशोक गहलोत ने भी केंद्र-राज्य के खर्च अनुपात को 85:15 करने की मांग की थी। पर मनमोहन सरकार ने किसी की नहीं सुनी। पर क्रिकेट के लिए सबकी सुन रहे। किसी ने सच ही कहा है- गरीबों को देने में दर्द होता है, अमीरों को देने में खुशी। अपनी सरकार को अब क्या कहें। पर आईसीसी भी मानो शर्म का परदा उतार चुकी। महज 45 करोड़ की छूट के लिए भारत सरकार के सामने गिड़गिड़ाई। केबिनेट मीटिंग में पवार ने प्रफुल्ल पटेल को एक बार भी नहीं रोका। हद तो तब पार हो गई, जब विश्व कप ट्राफी को कस्टम ड्यूटी से बचाने के लिए आईसीसी ने कमर्शियल वैल्यू जीरो बता दी। पर कस्टम विभाग ने ट्राफी को रोक आकलन करवाया। तो साठ लाख कीमत आंकी गई। सुनते हैं, कस्टम विभाग ने 22 लाख की ड्यूटी लगा दी।
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01/04/2011



Thursday, March 31, 2011

रिकार्ड पंद्रहवीं जनगणना और 15वीं लोकसभा का

तो अपनी जनसंख्या के शुरुआती आंकड़े जारी हो गए। पर जनसंख्या से पहले बात क्रिकेट और कूटनीति की। भारत-पाक की क्रिकेट कूटनीति का सूत्रधार अमेरिका गदगद हो गया। भारत में अमेरिकी राजदूत टिमोथी रोमर बोले- मीडिया जिसे क्रिकेट कूटनीति कह रहा, हम उसके साथ आगे बढऩे के लिए दोनों देशों की सराहना करते हैं। यानी मनमोहन-गिलानी वार्ता पर अमेरिकी मोहर लग गई। सो अब जब क्रिकेट वल्र्ड कप समापन की ओर, तो मनमोहन केबिनेट ने तोहफा थमा दिया। आईसीसी को वल्र्ड कप से होने वाली आमदनी में टेक्स छूट दे दी। शनिवार को वल्र्ड कप का शोर थम जाएगा। फिर आईपीएल की गूंज होगी। सो क्रिकेट की बातें होती रहेंगी। फिलहाल बात जनसंख्या के ताजा आंकड़ों की। तो अब भारत की आबादी एक अरब 21 करोड़ हो गई। यानी पिछले दस साल में देश की आबादी कुल 18 करोड़ बढ़ी। अब भारत और चीन की आबादी का अंतर 23 करोड़ 80 लाख से घटकर महज 13 करोड़ 10 लाख रह गया। पर राहत की बात यह, पिछली जनगणना के मुकाबले अबके जनसंख्या वृद्धि की दर में करीब चार फीसदी की कमी आई। पहले यह दर 21.5 फीसदी थी, अब 17.6 रह गई। देश का कुल लिंगानुपात 1971 से अब तक के सबसे ऊंचे स्तर 940 पर पहुंच गया। यानी पिछली जनगणना के मुकाबले सात का इजाफा। अब एक हजार पुरुषों के मुकाबले 940 महिलाएं। पर विकास की अंधाधुंध दौड़ में भागते भारत को जनसंख्या का यह ताजा आंकड़ा आईना भी दिखा रहा। छह साल की उम्र तक के बच्चों के लिंगानुपात में गिरावट बेडिय़ों में जकड़े समाज की कड़वी सच्चाई। बच्चों का लिंगानुपात आजाद भारत के सबसे निचले स्तर पर पहुंच गया। कुल 3.08 फीसदी की कमी दर्ज की गई। जिनमें बालकों की संख्या में 2.42 फीसदी की कमी, तो बालिकाओं की संख्या में 3.80 फीसदी की कमी। यानी राज्य और केंद्र स्तर पर चल रही लाडली योजनाएं जमीन पर कम, कागजों में अधिक चल रहीं। भ्रूण हत्या की कड़वी सच्चाई भी आंकड़ों में जगजाहिर। पंजाब, हरियाणा में लिंगानुपात बढ़ा, पर अभी भी देश में सबसे कम। हरियाणा के झज्जर जिले में तो 774 का ही अनुपात। महिलाओं की साक्षरता दर में दस फीसदी की बढ़ोतरी दर्ज की गई। पर तमाम आंकड़ों के बावजूद अपने देश में जनसंख्या नियंत्रण की कोई स्पष्ट नीति नहीं। फिर भी सुकून, 1911-21 का अपवाद छोड़ दें, तो यह पहला मौका, जब पिछले दशक की तुलना में जनसंख्या वृद्धि दर में कमी आई। पर संयोग कहिए या कुछ और, भारत की पंद्रहवीं जनगणना जनता की जागरूकता को दर्शा रही। तो देश की पंद्रहवीं लोकसभा भ्रष्टाचार के मामले में परचम लहरा रही। जनसंख्या वृद्धि की रफ्तार घटी, पर राजनेताओं के भाव बढ़ गए। जब 1993 में नरसिंह राव की सरकार खतरे में थी। तो महज 45 लाख में सांसद बिके। लालू ने सात साल में 900 करोड़ का चारा घोटाला किया। बोफोर्स दलाली कांड भी याद करिए। तो महज 64 करोड़ का मामला था। फिर सांसदों की महामंदी का भी एक दौर आया, जब 2005 में अपने 11 सांसद चवन्नी-अठन्नी में बिकते धरे गए। पर जैसे ही जुलाई 2008 में मनमोहन ने विश्वास मत हासिल करने की ठानी। सांसदों के रेट 25 करोड़ तक पहुंच गए। कई सांसदों को तो निजी विमान का भी ऑफर हो गया। रही-सही कसर अपने ए. राजा ने पूरी कर दी। जनसंख्या के आंकड़े तो हमने गिन लिए। पर टू-जी स्पेक्ट्रम घोटाले की रकम को गिनना फिलहाल अपनी जांच एजेंसी के बूते से भी बाहर। यों सीएजी ने जो 1.76 लाख करोड़ का आंकड़ा दिया, उसे आमजन की भाषा में तोड़ें। तो अमूमन एक नील 76 खरब रुपए का बनता। यानी आम आदमी की तो छोडि़ए, शायद मशीन भी इन रुपयों को गिनते-गिनते हांफ जाए। कॉमनवेल्थ घोटाले का भी आंकड़ा 70,000 करोड़ बताया जा रहा। आदर्श जैसी तो कई मीनारें घोटाले की नींव पर खड़ीं। सोचो, अगर इसरो की एस- बैंड डील रद्द न होती, तो राजा का घोटाला पीछे छूट जाता। अब टू-जी स्पेक्ट्रम घोटाले की कड़ी खत्म होने का नाम नहीं ले रही। कॉमनवेल्थ पर शुंगलू रिपोर्ट ने शीला दीक्षित, उपराज्यपाल तेजेंद्र खन्ना और सुरेश कलमाड़ी के चेहरे से नकाब हटा दिया। शीला ने तो फौरन केबिनेट मीटिंग बुला कमेटी की रपट खारिज कर दी। सो यह चोरी और सीना जोरी नहीं, तो और क्या? पीएम की बनाई कमेटी को सीएम शीला ने ठुकरा दिया। पर सवाल- जब शुंगलू रपट को आधार बना प्रसार भारती के सीईओ बी.एस. लाली हटाए गए। तो शीला पर पीएम चुप क्यों? अगर शीला-खन्ना-कलमाड़ी बेदाग, तो भला लाली को सजा क्यों? अब जब भ्रष्टाचार पर दोहरे मापदंड होंगे, तो भला देश की आबादी की चिंता क्यों होगी? सो अब जनता खुद ही जागरूक हो रही। जनसंख्या वृद्धि दर में गिरावट होने लगी। पर मनमोहन सरकार की विकास दर ने नेताओं की जेब को ऐसा झोला बना दिया, जो कभी भरता नहीं। सो पंद्रहवीं जनगणना और पंद्रहवीं लोकसभा का रिकार्ड आपके सामने।
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31/03/2011

Wednesday, March 30, 2011

क्रिकेट के शोर में दब गया बापू का अपमान

क्रिकेट का नशा सिर चढक़र बोला। सो बापू के अपमान की याद केंद्र सरकार को तब आई, जब मोहाली का मैच शुरू हो गया। पर गुजरात के सीएम नरेंद्र मोदी ने फुर्ती दिखाई। राज्य विधानसभा में जोसफ लेलीवेल्ड की किताब पर पाबंदी का एलान किया। महाराष्ट्र सरकार ने भी बापू पर लिखी विवादास्पद किताब को बैन कर दिया। दोनों राज्यों में पक्ष-विपक्ष ने एक सुर में लेलीवेल्ड की किताब को विकृत और निराधार करार दिया। नरेंद्र मोदी ने तो इसे लेखन की विकृत प्रकृति और तार्किक सोच वाले लोगों की भावनाओं को आहत करने वाला करार दिया। बोले- महात्मा गांधी को बदनाम करने वाली इस किताब के जरिए लेखक ने करोड़ों लोगों की भावनाओं को आहत किया है। सो सार्वजनिक रूप से माफी मांगनी चाहिए। महाराष्ट्र, गुजरात के सभी राजनीतिक दलों ने एक सुर में इसे राष्ट्रपिता का अपमान करार देते हुए लेखक के खिलाफ कड़े कदम उठाने की मांग की। ताकि भविष्य में कोई फिर ऐसा दुस्साहस न करे। पर केंद्र सरकार कान में रुई डालकर बैठी हुई। अमेरिका में यह किताब सोमवार से ही बिक्री के लिए उपलब्ध हो चुकी। पर क्रिकेट की कूटनीति में मशगूल मनमोहन सरकार तीसरे दिन यानी बुधवार को भी महज योजना बनाती दिखी। गनीमत, किताब के सुर्खियों में आने के तीसरे दिन अपनी सरकार ने जुबां खोली। विधि मंत्री वीरप्पा मोइली बोले- सरकार इस किताब को भारत में बैन करने की योजना बना रही। फिर भी मोइली के मुंह से गुजरात और महाराष्ट्र के नेताओं जैसी कोई कठोर टिप्पणी नहीं निकली। अलबत्ता बोले- किताब में राष्ट्रीय नेता के खिलाफ की गई अभद्र टिप्पणी को सरकार ने गंभीरता से लिया है। अब जब लेखक की आलोचना में भी सरकार कंजूसी बरत रही। तो कार्रवाई क्या खाक होगी। महाराष्ट्र कांग्रेस अध्यक्ष मानिक राव ठाकरे ने जोसेफ लेलीवेल्ड के खिलाफ सख्त कार्रवाई की मांग की। पर ठाकरे यह भूल रहे, मामला अमेरिका से जुड़ा। सो सख्त कार्रवाई तो दूर, मनमोहन सरकार सख्त भाषा का भी इस्तेमाल नहीं कर पा रही। साख बचाने को भारत में भले बैन लगा दे। पर दुनिया में किताब को बैन करवाने की कुव्वत नहीं। ऐसे में तो कोई भी भारतीय विदेश से यह किताब खरीद सकता। फिर सिर्फ भारत में बैन का क्या औचित्य रह जाएगा? पर सरकार ही नहीं, विपक्ष भी बापू के अपमान पर बेफिक्र दिख रहा। सरकार को घेरने का एक भी मौका न चूकने वाली बीजेपी अभी भी खामोश बैठी। यों कांग्रेस-बीजेपी की लाज दोनों की राज्य सरकार ने बचा ली। पर बतौर प्रमुख विपक्ष बीजेपी की न तो कोई टिप्पणी, न ही किसी नेता का ट्वीट आया। अलबत्ता बीजेपी के नेता अब स्वीट-स्वीट सपने देखने लगे। मंगलवार को सुषमा स्वराज ने तो असम में अपने बूते बीजेपी की सरकार का दावा कर दिया। यों सपने देखना कोई बुरी बात नहीं। पर जो पार्टी कुल 126 की विधानसभा में फिलहाल दस सीटों पर हो और कुल 25 सीट जीतने का लक्ष्य लेकर चली हो। वह गठबंधन की सरकार का दावा करे, तो समझ में आने वाली बात। पर अपने बूते का दावा खयाली पुलाव से कम नहीं। असम में विपक्ष बिखरा हुआ। सो कांग्रेस की राह आसान दिख रही। फिर भी बीजेपी नेताओं के दावे कम नहीं। बुधवार को तो वेंकैया नायडू ने असम ही नहीं, केंद्र सरकार का भविष्य बतला दिया। वेंकैया का दावा- कांग्रेस की रहनुमाई वाली यूपीए सरकार छह महीने में गिर जाएगी और मध्यावधि चुनाव होगा। भ्रष्टाचार के मुद्दे पर मनमोहन सरकार को जाना होगा। क्योंकि मौजूदा शासन में हुए कई घोटालों से लोग ऊब चुके। पर सवाल- यूपीए सरकार अगर भरोसा खो चुकी, तो बीजेपी ने जनता का भरोसा पाने वाला कौन सा काम कर लिया? कर्नाटक में येदुरप्पाई छत्रप राज बीजेपी की परेशानी बना हुआ। अंदरूनी गुटबाजी खत्म होने का नाम नहीं ले रही। पर बात गांधी जी के अपमान से जुड़े मामले की। बुधवार को भले वीरप्पा मोइली बोले। गुजरात की बीजेपी और महाराष्ट्र की कांग्रेस-एनसीपी सरकार ने किताब पर बैन लगा दिया। पर क्रिकेट मैच के चक्कर में बीजेपी-कांग्रेस की दुकानें बंद रहीं। राजनीतिक दल ही नहीं, सरकार का शीर्ष नेतृत्व मोहाली की महफिल में बैठा। बाकी जो बच गए, टीवी स्क्रीन से चिपके रहे। सो क्रिकेट के शोर में बापू के अपमान का मसला दब गया।
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30/03/2011

Tuesday, March 29, 2011

दिल मिलता नहीं, 1948 से ही हाथ मिलाते आ रहे

राष्ट्रपिता का अपमान आखिर कब तक सहन करेगा हिंदुस्तान? पत्रकारिता के क्षेत्र में दिए जाने वाले सबसे बड़े पुलित्जर पुरस्कार से नवाजे जा चुके अमेरिकी लेखक जोसेफ लेलीवेल्ड ने अबके यह गुस्ताखी की। अपनी किताब- ग्रेट सोल: महात्मा गांधी एंड हिज स्ट्रगल विद इंडिया, में महात्मा गांधी को समलैंगिक बताया। जर्मन व्यक्ति हर्मन कोलेनबाश से रिश्ते बताए। पर तथ्यों के बिना संबंधों की कहानी गढ़ दी। अमेरिकी लेखक भूल गया, महात्मा गांधी ही एकमात्र ऐसे शख्स, जिन ने अपनी जिंदगी की नकारात्मक चीजें भी सहज ढंग से परोसीं। बापू ने अपनी आत्मकथा: सत्य के प्रयोग, में कड़वे-मीठे सारे सच उड़ेल दिए। ऐसी आत्मकथा शायद ही देखने को मिलती। फिर भी दुनिया के कुछ लोग गांधी जी के सहारे सुर्खियां बटोरने का मौका ढूंढते रहते। पर गांधी जी के जीवन पर शोध करने वाले कभी सही तस्वीर नहीं पेश कर पाए। किसी ने तारीफ की, तो सिर्फ सकारात्मक पहलू ही ढूंढे। किसी ने आलोचना की, तो सिर्फ नकारात्मक पहलू ही दिखाए। समग्र पहलू कभी किसी और ने नहीं परोसा। यों असली तस्वीर तो खुद गांधी जी अपनी आत्मकथा में दिखा गए। दुनिया को बतला दिया- वह भी हाड़-मांस के बने एक आम इनसान। पर सवाल- अमेरिकी लेखक लेलीवेल्ड ने ऐसा दुस्साहस कैसे किया? क्या दुनिया भर में गांधी जी के अहिंसा के सिद्धांत को मिली मान्यता अब खटक रही? कहीं दुनिया पर अपनी हिंसक ताकत का रौब दिखाने वाला अमेरिका की यह टटपुंजिया हरकत तो नहीं? देश-दुनिया को बापू ने लाठी की ताकत दिखाई। पर लाठी से ही सारे आंदोलन सफल होने लगें, तो अमेरिकी हथियारों के जखीरे का क्या होगा? सो हो-न-हो, अपना मानना तो यही, बापू की छवि को धूमिल करने का यह कुत्सित प्रयास। इससे पहले अमेरिका में ही स्वामी विवेकानंद और रामकृष्ण परमहंस के संबंधों पर कीचड़ उछाला जा चुका। यों अमेरिका की छोडि़ए, बापू के ऊपर कीचड़ उछाले जाने के बाद भी भारत सरकार चुप बैठी। वैसे मौजूदा सरकार से उम्मीद भी क्या रखें। जब बापू के खड़ाऊं, चश्मे, कटोरी, चम्मच विदेशों में नीलाम हो रहे थे। तो अपनी सरकार हाथ पर हाथ रखे बैठी थी। वह तो भला हो विजय माल्या का, जिन ने नीलामी में बाजी मारी। भले माल्या की कमाई शराब के धंधे की हो। पर नीयत तो अपनी सरकार से कहीं अच्छी। मनमोहन सरकार को तो अंकल सैम का हुक्म मानने की आदत पड़ चुकी। तभी तो मंगलवार को बापू पर लगे लांछन का कोई खंडन या निंदा नहीं की। अलबत्ता अंकल सैम के इशारे पर मोहाली के सेमीफाइनल को क्रिकेट के बजाए कूटनीति का मंच बना दिया। सो मंगलवार को भी ऐसा लगा, मानो देश में सिर्फ क्रिकेट ही बचा। बुधवार को तो समूचे देश में कफ्र्यू जैसे हालात ही नजर आएंगे। चंडीगढ़ में तो सुरक्षा के ऐसे पुख्ता बंदोबस्त कि चिडिय़ा भी चूं नहीं कर सकती। मनमोहन ने गिलानी की खातिरदारी के लिए डिनर की तैयारी कर ली। दोनों पीएम की मीटिंग का बैक ग्राउंड मंगलवार को होम सैक्रेटरियों ने तय कर लिया। गृह सचिव स्तर की वार्ता के  बाद साझा बयान जारी हुआ। तो अमेरिकी एजंडे के मुताबिक कई मुद्दों पर सहमति बन गई। अब मुंबई हमले की जांच के लिए अपना न्यायिक जांच दल पाक जा सकेगा। पर बदले में भारत को भी समझौता ब्लास्ट केस की जानकारी साझा करनी होगी। यानी दोनों तरफ से न्यायिक जांच दल आएंगे-जाएंगे। पर सवा दो साल में पाकिस्तान सवा दो कदम भी नहीं चला। तो अब भला क्या उम्मीद? पाकिस्तान कभी भी सकारात्मक सोच के साथ वार्ता की मेज पर नहीं बैठा। अगर 1947 से अब तक का इतिहास पलटकर देखें। तो यही देखने को मिलेगा कि पाक की ग्रंथि में ईमानदारी नाम की चीज नहीं। अब अगर अपना जांच दल पाक जाएगा, मुंबई हमले के साजिशकर्ताओं से पूछताछ करेगा। तो क्या पाक हुक्मरान भारतीय जांच दल के निष्कर्ष को कबूल कर लेगा? अब तक पाक ने साजिशकर्ताओं की आवाज के नमूने तक नहीं लेने दिए। पाक की निचली अदालत ने इस मामले को खारिज कर दिया। पर अब पाकिस्तानी दलील- हाईकोर्ट में अपील दायर की गई, जहां से सकारात्मक नतीजे की उम्मीद। अब पाक चाहे जो दलील दे, पाक की न्यायपालिका की ईमानदारी भी जगजाहिर। भले पाक में फिलहाल लोकतांत्रिक हुकूमत। पर आईएसआई और सेना की नकेल कसने की हिम्मत नहीं। गृह सचिव स्तरीय वार्ता में जाली नोट, साइबर अपराध, मानव तस्करी जैसे मुद्दे भी शामिल थे। भारत ने जाली नोट के मामले में कई आईएसआई मुलाजिमों के नाम बताए। पर क्या पाक हुक्मरान कार्रवाई करेगा? आतंकवाद के मसले पर जब पाकिस्तानी जांच दल भारत आएगा, तो फिर कोई नई थ्योरी न गढ़ दे। समझौता ब्लास्ट में कई भारतीयों के हाथ सामने आए। सो आखिर में कहीं पाक यह न कह दे- दोनों देश अपने-अपने आतंकवाद के शिकार। वैसे पाक की यही फितरत रही। सो गृह सचिव स्तर पर हॉट लाइन शुरू हो जाए या जांच की रिपोर्ट साझा होने लगे। पर जब तक नीयत में खोट रहेगा, कोई भी वार्ता कैसे सफल होगी? सो क्रिकेट की आड़ में कूटनीति पुरानी ही राह पर। सन 1948 से अब तक दोनों देशों के दिल मिले, न मिले, हाथ मिलाने की कोशिशें जारी।
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29/03/2011

 

Monday, March 28, 2011

क्रिकेट, कूटनीति, काला धन और कोर्ट

अब तो देश में और कोई मुद्दा नहीं क्रिकेट के सिवा। सो क्रिकेट में फिर कूटनीति घुस गई। अपने पीएम मनमोहन के न्योते पर पाक के पीएम यूसुफ रजा गिलानी भी मोहाली में मैच देखने पहुंचेंगे। तो भारत-पाक रिश्तों में पड़ी गांठ को सुलझाने की कोशिश होगी। पर यह कोई द्विपक्षीय वार्ता नहीं, अलबत्ता रिश्तों पर पड़ी बर्फ को पिघलाने की कोशिश। यानी मोहाली में क्रिकेट और कूटनीति का समागम होगा। पर कुछ कांग्रेसियों को अभी से आशंका, मोहाली तक तो सब ठीक। फिर कहीं खुदा न खास्ता पाक फाइनल में पहुंचा। तो वानखेड़े स्टेडियम में शिवसेनिकों को कैसे संभालेंगे? लोग अभी 26/11 के जख्म नहीं भूले। वैसे भी शिवसेनिकों को वानखेड़े स्टेडियम की पिच खोदने का अच्छा-खासा अनुभव। साख खो रही शिवसेना को राजनीति के लिए भला इससे बेहतर मौका क्या मिलेगा। पर पाक भी कम फिक्रमंद नहीं। पाकिस्तानी गृहमंत्री रहमान मलिक ने तो पहले ही मैच फिक्सिंग की आशंका जता दी। अपने खिलाडिय़ों को फिक्सिंग से दूर रहने की कड़ी नसीहत दी। तो पाक खिलाड़ी बौखला गए। सो अब देश की निगाहें इस सवाल पर टिकीं। क्या पाक पीएम गिलानी मोहाली से सिर्फ कूटनीति कर विदा होंगे, या अपने खिलाडिय़ों को भी साथ लिवा ले जाएंगे? या क्या फिर शिवसेनिकों को अपनी राजनीति चमकाने का मौका मिलेगा? बाल ठाकरे ने तो ट्रेलर दिखा दिया। गिलानी-जरदारी को न्योते पर एतराज जता मनमोहन सरकार को सलाह दी- कसाब और अफजल को भी मोहाली का मैच दिखाओ। यों क्रिकेट और राजनीति का गठजोड़ कोई नई बात नहीं। पिछले वल्र्ड कप से जब अपनी टीम फिसड्डी बनकर लौटी थी। तो देश का नजारा छोडि़ए, अपने सांसद आग-बबूला हो गए थे। इसी वल्र्ड कप से पहले दक्षिण अफ्रीका में अपनी टीम पिटी थी। तो अपने सांसद ऐसे उखड़े, तबके कोच ग्रेग चैपल ने सांसदों को अपने काम पर ध्यान देने की नसीहत तक दे डाली थी। इतना ही नहीं, इस बार की तरह पिछले वल्र्ड कप में भी सरकार क्रिकेट के रंग में सराबोर थी। आम आदमी के लिए भले सरकार फुर्ती न दिखाए। पर दूरदर्शन पर क्रिकेट का प्रसारण करवाने के लिए अध्यादेश तक ले आई थी। आम आदमी को चाहे रोटी-पानी मिले, न मिले, क्रिकेट जरूर देखें। अपने लोगों की सोच भी अजीब हो गई। कभी सिर पर ऐसे बिठाएंगे, मानो भगवान हों। पर टीम एकाध मैच हारी नहीं कि दुआ मांगने वाले हाथ पुतले फूंकने लगते। पिछले वल्र्ड कप के वक्त तो प्रशंसकों ने टीम इंडिया की अर्थी तक निकाल दी थी। क्रिकेट टीम के प्रदर्शन की फिक्र सबको होती। देश में आतंकवादी हमले हो जाएं। अपने जवान आतंकियों का मुकाबला करते शहीद हो जाएं। किसानों पर लाठियां भांजी जाएं। महिलाओं-बच्चों का शोषण हो। तो आंखों में आंसू ढूंढे नहीं मिलते। अब तो बापू की जयंती हो या पुण्यतिथि, रस्म अदायगी भर रह गई। पर सचिन, धौनी, सहवाग, युवराज सस्ते में आउट हो जाएं, तो लोगों को खाना हजम नहीं होता। क्रिकेट अब धर्म बन गया। ओलंपिक के जन्मदाता पियरे द कुबर्तिन ने कहा था- खेल में एक की हार, दूसरे की जीत तय। सो खेल को खेल भावना से खेलना चाहिए। पर क्रिकेट के मामले में यह कितना सच? भारत-पाक का सेमीफाइनल ही लो, ऐसा लग रहा, मानो मोहाली में जंग होने जा रही। आखिर ऐसा क्यों न हो, जब खुद पीएम क्रिकेट को कूटनीति से जोड़ रहे। सचमुच क्रिकेट को देश ने जितना प्यार दिया, राष्ट्रीय खेल हाकी को उतनी ही दुत्कार मिली। हाकी खिलाड़ी जब राष्ट्रपति के हाथों पुरस्कार लेने दिल्ली पहुंचते, तो उन्हें पहाडग़ंज के सस्ते होटलों में ठहराया जाता। पर अगर क्रिकेटर आ जाएं, तो मौर्या-ताज से नीचे बात नहीं होती। हाकी खिलाड़ी साधारण टेक्सी में राष्ट्रपति भवन पहुंचते। तो अपने क्रिकेटर्स या तो महंगी कार में जाएंगे, या कुछ तो ऐसे जो पद्म पुरस्कार लेने राष्ट्रपति भवन पहुंचना अपनी शान के खिलाफ समझते। उन दोनों खिलाडिय़ों का नाम वल्र्ड कप के बाद याद दिलाएंगे। पर वजह बता दें, वे दोनों खिलाड़ी राष्ट्रपति भवन इसलिए नहीं गए, क्योंकि विज्ञापन की शूटिंग में व्यस्त थे। सो अल्पसंख्यक कल्याण के लिए जस्टिस सच्चर कमेटी की पैरोकार कांग्रेस और सरकार को अपनी एक सलाह- क्यों न हाकी के लिए भी कोई जस्टिस सच्चर कमेटी गठित करे। पर हाकी नहीं, बात क्रिकेट की। सिर पर ऐसा जुनून चढ़ा हुआ, टीवी खोलो या अखबार। या फिर किसी दफ्तर में घुस जाओ, आपको यही लगेगा- देश में कोई और गम नहीं सिवा क्रिकेट के। क्रिकेट, बालीवुड और अंडरवल्र्ड का रिश्ता किसी से छुपा नहीं। तभी तो काला धन जमा करने वालों पर कभी नकेल नहीं कसी। सोमवार को सुप्रीम कोर्ट ने पूछ ही लिया- सरकार की जांच सिर्फ हसन अली तक ही सीमित। यह तो सिर्फ एक ही व्यक्ति, बाकी कहां हैं? कोर्ट ने सीधा सवाल उठाया- जांच एजेंसियां 2008 से क्यों सोई हुई थीं। तब कार्रवाई क्यों की, जब हमने पहल की। अगर रिट याचिका दायर न होती, तो कुछ नहीं होता। अब कोर्ट की इस टिप्पणी के बाद कांग्रेसी क्या कहेंगे? जो अब तक दावा कर रहे थे- काले धन पर जो भी जानकारी जुटाई, हमने जुटाई, एनडीए ने नहीं। पर अब सुप्रीम कोर्ट ने सरकार की बदनीयती से परदा हटा दिया। साफ हो गया- काला धन हो या राजा का बाजा बजना, सब सुप्रीम कोर्ट की सक्रियता से हुआ। वरना अपनी सरकार तो क्रिकेट का लीग मैच ही खेल रही थी। कोर्ट ने जब, जिसका नाम लिया, उस पर कार्रवाई कर दी। मोहाली जैसा कोई कड़ा मुकाबला नहीं करती।
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28/03/2011