Tuesday, January 12, 2010

तो गलत फिल्म के गाने से ही सुलझ गया बीजेपी का झगड़ा

इंडिया गेट से
---------
तो गलत फिल्म के गाने से ही
सुलझ गया बीजेपी का झगड़ा
------------------
 संतोष कुमार
-----------
            अलटा मार पलटा, शरद पवार पलट गए। केबिनेट कमेटी ऑन प्राइस की मीटिंग भी बुधवार के लिए टल गई। वैसे भी महंगाई रुकने वाली नहीं। सो मीटिंग आज हो या कल। मनमोहन को क्या फर्क पड़ता। चीनी रात भर में 44 से 48 रुपए किलो क्यों न हो जाए। मार्केटिंग का तो फंडा भी ऐसा ही। कीमतें बढ़ाकर सेल लगा दो। फिर 30-40 फीसदी छूट दे दो। शायद मनमोहन सरकार भी इसी फार्मूले की फिराक में। बढ़ी कीमतों में से दो-चार रुपए कम करा देंगे। फिर कांग्रेसी ढोल-नगाड़े ले 24 अकबर रोड पर धप-धप बजाएंगे। यही कांग्रेसी कल्चर बन चुकी। पर कल्चर के मामले में तो बीजेपी की सानी ही नहीं। अब नितिन गडकरी के हाथ कमान। सो गडकरी रोज नए फंडे गढ़ रहे। अब मंगलवार को रीजनल मीडिया के कुछ पत्रकारों से मिले। तो कई चौंकाने वाली बातें सामने आईं। यानी बिना फंड के फंडे चाहिए। तो गडकरी से मिलिए। महाराष्टï्र की राजनीति से मिले अनुभव के बेस पर ही बीजेपी जैसी राष्ट्रीय पार्टी चलाने की सोच रहे। सो पहले तो अपने धंधे गिनाए। राजनीति का समाजकरण और राष्टï्रकरण फार्मूला बताया। फिर बीजेपी का भावी एजंडा। गडकरी बीजेपी को फिर राजनीतिक शिखर पर लाने की संघ योजना से आए। सो बोले- 'बीजेपी के वोट बैंक में और दस फीसदी का इजाफा करना ही मेरा लक्ष्य।'  सो बीजेपी का नया फंडा, अपना कामगार संगठन होगा। अब तक भारतीय मजदूर संघ ही बीजेपी का श्रमिक संगठन रहा। पर अब बीजेपी को खुद के श्रमिक संगठन की कमी महसूस हो रही। सो नितिन गडकरी ने वामपंथी राह पर चलने की योजना बना ली। भले अपने गढ़ में वामपंथी खुद हांफ रहे। पर बीजेपी को वामपंथी राह ही तारणहार नजर आ रही। गडकरी की दलील, कांग्रेस की इंटक जैसी संस्था बीजेपी के पास नहीं। सो अब एससी-एसटी, महिलाओं और असंगठित कामगारों के लिए अपना संगठन बनाएगी। ताकि शहरों में खत्म हो रहे जनाधार को बढ़ा सके। यों सनद रहे, सो बता दें। जब 2004 में बीजेपी सत्ता से बाहर हुई। फिर एक बार दिल्ली में वर्किंग कमेटी हुई। तो अटल बिहारी वाजपेयी ने पार्लियामेंट एनेक्सी में नेताओं को मंत्र दिया था। कैसे वर्करों का दिल जीता जाए। सीखना हो, तो सीपीएम के गढ़ बंगाल जाओ। तब राजस्थान में वसुंधरा राजे सीएम थीं। उन ने तो फौरन दो सरकारी नुमाइंदे एसएन गुप्त और ओम बिड़ला कोलकाता भेज दिए। भले 2008 के चुनाव में बीजेपी हार गई। अब एक और चौंकाने वाली बात। खुद नितिन गडकरी सीपीआई महासचिव एबी वर्धन के अंडर में लेबरों की यूनियनबाजी कर चुके। एक बार तो गडकरी कांग्रेस के श्रमिक संगठन इंटक के अध्यक्ष भी चुन लिए गए थे। यह खुलासा कोई अपनी ओर से नहीं। खुद गडकरी ने ही किया। भारतीय मजदूर संघ वाले दत्तोपंत ठेंगड़ी भी वर्धन की एटक में काम कर चुके। सो गडकरी फार्मूला संघ की ही देन। पर गडकरी की मानें, तो संघ कभी बीजेपी में सीधे दखल नहीं देता। चलो, सीधे न सही, पीछे से ही। पर दखल देता है, ऐसा तो मान ही लिया। गडकरी ने बीजेपी के कांग्रेसीकरण से इनकार किया। पर यहां भी कबूला, अभी भी कई मायनों में पार्टी विद डिफरेंस। यानी कहीं न कहीं थोड़ी-बहुत गिरावट तो मान ली। अब गडकरी बीजेपी को राजनीतिक कम, सामाजिक-आर्थिक संगठन की तरह ज्यादा चलाना चाह रहे। सो विपक्ष की जगह विजिलेंस शब्द की मांग कर दी। अब जहां-जहां राज्यों में पार्टी विपक्ष की भूमिका में। वहां के नेताओं की मीटिंग लेंगे। ताकि बेहतर विपक्ष की भूमिका निभा सकें। उन ने तेलंगाना पर सरकार को कोसा। तो विदर्भ पर शिवसेना से इतर भुवनेश्वर वर्किंग कमेटी का प्रस्ताव दोहरा दिया। अब इंदौर में वर्किंग कमेटी होगी। तो नेताओं को टेंट में ही रहना होगा। होटल का खर्चा बीजेपी नहीं उठाएगी। भले टेंट का खर्चा होटल से ज्यादा क्यों न हो। पर यही नहीं, अब पदाधिकारियों पर भी नकेल होगी। जैसे संघ के पदाधिकारी ज्यादातर प्रवास में ही वक्त गुजारते। बीजेपी पर भी वही फार्मूला लागू होगा। सो गडकरी ने कह दिया- 'दिल्ली-मुंबई में बैठकर काम नहीं होगा। पदाधिकारियों को गांव-गांव प्रवास करना होगा। मैंने स्टेट थीम बना ली है।'  पर सवाल बीजेपी के कुछ संकटों पर हुए। तो गडकरी ने राजस्थान, पंजाब का उदाहरण दिया। बोले- 'आज सुबह राजस्थान से मुझे फोन आया। आप लोग तो छापते ही नहीं। अब राजस्थान में समूची बीजेपी एकजुटता से पंचायत चुनाव में जुटी हुई।'  पर राजस्थान का झगड़ा सुलझाने का फार्मूला पूछा। तो गदगद होकर बोले- 'मैंने सबको नया दौर का गाना सुनाया। आपको भी सुनाता हूं।... छोड़ो कल की बातें। कल की बात पुरानी...।'  पिछले पखवाड़े भर में सभी वरिष्ठï नेताओं के सहयोग और राजस्थान सुलझाने की खुशी चेहरे पर दिखी। पर जरा एक दिलचस्प पहलू देखिए। वसुंधरा गुट हो या चतुर्वेदी खेमा। नितिन गडकरी के गलत फिल्मी गाने से ही सारा झगड़ा-झंझट भूल गए। यों छोड़ो कल की बातें... गाना फिल्म नया दौर का नहीं। अलबत्ता फिल्म 'हम हिंदुस्तानी'  का गाना। पर शायद गडकरी नए अध्यक्ष। सो राजस्थान के भाजपाइयों को इशारा, अब नया दौर आ गया। गडकरी गलत फिल्म का नाम 20-22 दिनों से सुना रहे। पर देखिए, फिल्मों के शौकीन आडवाणी भी गलती सुधारने में मदद नहीं कर रहे।
---------
12/01/2010

Monday, January 11, 2010

कांग्रेस की लफ्फाजी या लफ्फाजी भरी कांग्रेस?

इंडिया गेट से
---------
कांग्रेस की लफ्फाजी या
लफ्फाजी भरी कांग्रेस?
--------------
 संतोष कुमार
-----------
          तो आज की शुरुआत सवाल से। क्या अपनी राजनीति की जुबान ही भद्दी हो चुकी या सिर्फ जुबान की राजनीति हो रही? माना, एचडी देवगौड़ा दंतहीन, विषहीन यानी सत्ताविहीन हो चुके। तो क्या बौखलाहट में किसी को भी डंक मारते रहेंगे। देवगौड़ा देश के पीएम रह चुके। पर कभी 'राष्ट्रीय'  न हुए, न शायद होंगे। कर्नाटक की राजनीति में ही उमड़-घुमड़ करते रहे। कभी खुद सीएम बनने की ललक। तो कभी बेटे को सीएम बनाने की अलख। सो कर्नाटक में एक ही टर्म में बीजेपी-कांग्रेस-देवगौड़ा ने सत्ता सुख भोगा। पर बीजेपी और कांग्रेस की सरकार में गौड़ा कॉमन फैक्टर रहे। कभी इधर तो कभी उधर। सो चुनाव में जनता ने इधर-उधर कहीं का न छोड़ा। यानी देवगौड़ा की बौखलाहट लाजिमी। पर पूर्व पीएम की मर्यादा भी तो कोई चीज। देवगौड़ा ने कर्नाटक के सीएम येदुरप्पा को बास्टर्ड कह दिया। देर रात जाकर माफी मांगी। तो ऐसे, मानो अहसान कर रहे। बोले- 'अगर येदुरप्पा मेरी टिप्पणी से वाकई आहत हुए हैं। तो मैं माफी मांगता हूं।'  पर राजनीति में किसकी जुबान ओछी नहीं। हाल के ही कुछ साल का मजमून आप देख लीजिए। वाजपेयी पीएम थे। तो नरेंद्र मोदी ने विरोधी दल की नेता और उनके बेटे के लिए इटली की कुतिया-जर्सी बछड़ा शब्द इस्तेमाल किया। प्रमोद महाजन ने भी मोनिका लेविंस्की से तुलना कर दी। जेतली ने पीएम मनमोहन सिंह को नाइट वॉचमैन बताया। पर कांग्रेसी भी कम नहीं। कभी पीएम वाजपेयी को गद्दार कहा। तो गुजरात चुनाव में सोनिया गांधी नरेंद्र मोदी को मौत का सौदागर कह चुकीं। हाल ही में मोदी का कांग्रेस को बुढिय़ा और गुडिय़ा कहना भी उम्दा जुबान नहीं। अब बीजेपी नेता पर भद्दी टिप्पणी हुई। तो बीजेपी देवगौड़ा को इशारों में ही मेंटल कह रही। सत्ता न होने की हताशा बताया। पर सत्ता में तो बीजेपी भी नहीं। सो बीजेपी की इस खस्ता हालत की क्या वजह? अब विनय कटियार भी गोविंदाचार्य की राह पर। तो बीजेपी कह रही- 'हमारे यहां पढऩे-पढ़ाने, अध्यात्म की परंपरा। वैसे भी कटियार सरयू किनारे बसते हैं।'  यानी हाथ कंगन को आरसी क्या, पढ़े-लिखे को फारसी क्या। कटियार को बीजेपी ने इशारा कर दिया। अब देखने वाली बात तब होगी, जब अगले महीने इंदौर के तंबू में बीजेपी की वर्किंग कमेटी-कॉउंसिल होगी। कहीं ऐसा न हो, पहले दिन ही तंबू का बंबू उखड़ जाए। पर बीजेपी को छोडि़ए। देवगौड़ा की अभद्र भाषा पर कांग्रेस प्रवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी से सवाल हुए। तो सिंघवी ने पहले जी-भर येदुरप्पा को कोसा। आखिर में नैतिक सिद्धांत और मर्यादित भाषा का पाठ पढ़ाया। पर देवगौड़ा का नाम न लिया। यानी राजनीति की मर्यादा भी वक्त के हिसाब से। पर भाषा सिर्फ गाली-गलौज की नहीं। एक भाषा आम आदमी की खातिर भी। आप जरा खुद गौर फरमाइए। महंगाई का करंट 11000 वोल्ट से दौड़ रहा। पर शरद पवार मन के साथ-साथ शरीर से भी हांफ रहे। सो कह दिया- 'महंगाई कब कम होगी, मुझे नहीं पता। मैं कोई ज्योतिषी नहीं हूं।' पर पवार शायद भूल गए। अगर वह ज्योतिषी होते, तो कुंभ के मेले में किसी घाट पर चंदन घिस रहे होते। लोगों के हाथ की रेखा देख ठगी का धंधा कर रहे होते। यों अब भी पवार का काम कुछ खास अलग नहीं। दो टर्म से देश के कृषि-खाद्य मंत्री। पर लोगों को सिर्फ झूठे दिलासे दिला रहे। यों शरद पवार हों या कांग्रेस, वक्त के हिसाब से महंगाई पर अलग-अलग दलीलें जरूर दीं। ताकि आम आदमी एक ही दलील सुनते-सुनते बोर न हो जाए। पवार ज्योतिषी नहीं। तो वित्त मंत्री रहते पी. चिदंबरम भी कह चुके- 'महंगाई रोकने को मेरे पास जादुई छड़ी नहीं।'  कभी एनडीए राज पर ठीकरा फोड़ा, तो कभी बीजिंग ओलंपिक पर। कभी आर्थिक महामंदी को कोसा। अब कांग्रेस अपना दामन बेदाग दिखाने को शरद पवार पर चढ़ बैठी। केबिनेट कमेटी ऑन प्राइस में पीएम पवार को खरी-खरी सुना चुके। इसे कहते हैं हाथी के दांत। पर क्या कांग्रेस और सरकार जिम्मेदार नहीं? सोनिया गांधी की सीडब्लूसी कई दफा प्रस्ताव पास कर चुकी। पर सरकार सोई रही। तो सोनिया ने कड़े कदम क्यों नहीं उठाए? सोनिया तो संसदीय दल की अध्यक्ष। पीएम मनमोहन हों या वित्तमंत्री प्रणव। आखिर हैं तो सोनिया द्वारा ही नियुक्त नेता। पर कांग्रेस कह रही, महंगाई रोकने को आवश्यक कदम उठाए जा रहे। फिर भी महंगाई नहीं रुक रही। सो अकेले पवार पर हमला कांग्रेस की नई लफ्फाजी। जैसे शशि थरूर पर कांग्रेस कर रही। सादगी पर कैटल क्लास, हैडली-वीजा और अब नेहरू पर सवाल उठाए। पर हमेशा की तरह कांग्रेस गरजी, बरसी नहीं। यानी लफ्फाजी में कांग्रेस की सानी नहीं। तभी तो चीन इंच-इंच करके भारतीय सीमा में घुसपैठ कर चुका। पर अपनी सरकार को देखो, न सही मैप और न ही घुसपैठ का अंदाजा। मीडिया ने घुसपैठ का मामला उठाया। तो विदेश मंत्रालय से संयम की नसीहत मिल गई। चीन के मुद्दे पर मनमोहन सरकार गांधारी की भूमिका में। कभी मैकमोहन लाइन को लेकर चीन पर दबाव नहीं बनाया। अबके लद्दाख में जैसी चीन की घुसपैठ, 1962 में चीन ने तवांग पर ऐसे ही कब्जा किया। फिर महीने भर बाद चीन-भारत युद्ध। जैसा राग चीन पर, वैसा ही आस्ट्रेलिया में नस्ली हमले पर। सो इतिहास देखकर आप खुद ही तय कर लें। आजादी से अब तक सत्ता में रहते कांग्रेस ने सिर्फ लफ्फाजी की या कांग्रेस आदतन ही लफ्फाजी भरी।
---------
11/01/2010

Friday, January 8, 2010

तो क्या राजनीति को भी 'निवेश' की दरकार?

इंडिया गेट से
---------
तो क्या राजनीति को भी
'निवेश' की दरकार?
-------------
 संतोष कुमार
------------
         तो 2014 तक एक और वोट बैंक तैयार होगा! अपने एनआरआई भाई लोगों का। शुक्रवार को आठवें प्रवासी भारतीय दिवस के मौके पर पीएम ने यह भरोसा दिलाया। विज्ञान भवन में तीन दिवसीय प्रवासी भारतीय सम्मेलन शुरु हुआ। तो दोहरी नागरिकता न मिलने से खफा प्रवासियों को मनमोहन ने नया लॉलीपॉप दिखा दिया। अगले आम चुनाव तक एनआरआई को भी वोट का हक दिलाने की कोशिश करेंगे। पर जुबान से कागज तक पहुंचना आसान नहीं। दोहरी नागरिकता का मुद्दा वाजपेयी सरकार की देन। तबके पीएम वाजपेयी ने वादा तो कर दिया। पर जब संसद के सामने बिल आया। तो कई तकनीकी फच्चर आन पड़े। खूब विवाद हुआ। 'अ पर्सन ऑफ इंडियन ओरिजीन'  शब्द पर कई राय। मसलन, कितनी पुश्तों को आधार माना जाए। किस देश को अलग रखें, किसे चुने जैसी कई तकनीकी और संवैधानिक अड़चनें। सो दोहरी नागरिकता का मुद्दा 2003 से अब तक पेंडिंग। भले देश में इस मुद्दे पर बहस चलती रही। पर एनआरआई ने तो खुद को ठगा महसूस किया। भारत सरकार पर चौतरफा दबाव पड़ा। तो मनमोहन ने नया झुनझ्ुाना थमा दिया। फिर भी वोट का हक दिलाने का ठोस वादा नहीं किया। अलबत्ता उम्मीद और कोशिश शब्द का इस्तेमाल। वह भी 2014 तक। ताकि अगले आम चुनाव तक एनआरआई हायतौबा न मचा सकें। अब अगर वादा पूरा नहीं भी हुआ। तो मनमोहन का क्या। वह तो अगले चुनाव में शायद रिटायर हो जाएं। जैसे दोहरी नागरिकता का वादा निभाने से पहले ही वाजपेयी रिटायर हो गए। फिर नया नेतृत्व, नए वायदे। यही तो अपनी राजनीति का रंग। यों राजनीति के रंग कब बदल जाएं, मालूम नहीं। भले अपने एनआरआई संख्या में महज ढ़ाई करोड़। पर पैसा-पॉवर के मामले में अपनी एक अरब आबादी पर भारी। अब आप सोचो, अगर एनआरआई को वोटिंग हक मिल गया। तो लोकतंत्र का नया चारित्र कैसा होगा? कल्पना करिए, एनआरआई को वोट का हक मिल गया। नाथद्वारा से अपने सीपी जोशी एक वोट से हार रहे। और बाद में एनआरआई के वोट से जोशी जीत गए। सोचो, हू-ब-हू ऐसा हुआ होता। तो कैसा लगता। यही ना, नाथद्वारा में रहने वाली जनता के फैसले पर विदेशों में बैठे एनआरआई भारी। अब कोई उम्मीदवार आरआई यानी रेजीडेंट ऑफ इंडिया के बजाए एनआरआई के वोट से संसद या विधानसभा पहुंचे। तो वह किसकी बात ज्यादा सुनेगा? आपकी या धनकुबेर एनआरआई की। यानी राजनीति नई राह पर चलेगी। राजनेता कर्ता-धर्ता होंगे और एनआरआई नीति-नियंता। तभी तो एनआरआई की दिलचस्पी इन्फ्रास्ट्रक्चर में इनवेस्टमेंट से ज्यादा पोलिटिकल इंवेस्टमेंट में। सो मनमोहन ने एनआरआई की सोच का इजहार भी किया। बोले- 'शासन में महत्व मिलने की प्रवासियों की जायज इच्छा को मैं समझता हूं। उम्मीद करता हूं कि 2014 तक एनआरआई को वोट का हक मिल जाएगा।' पीएम ने भरोसा तो दिलाया। पर वोट के हक के पीछे कितना दबाव, इसकी झलक भी मिल गई। जब कहा- 'दरअसल, मैं तो एक कदम आगे बढ़ते हुए पूछना चाहता हूं कि प्रवासी भारतीय घर वापस लौटकर राजनीति और सार्वजनिक जीवन में क्यों नहीं शामिल होते।'  पर मनमोहन भी बखूबी समझते और एनआरआई भी। अगर वतन वापस लौटकर राजनीति में हिस्सेदारी करेंगे। तो किसी एक पार्टी के होकर रह जाएंगे। कभी सत्ता तो कभी विपक्ष में। पता नहीं कब-किस सरकार का मूड फिर जाए। तो नीति बदल धंधा चौपट कर दे। सो एनआरआई के पास पैसे की कमी नहीं। जिसकी भी सत्ता आए, अपनी धमक बनी रहे। इसी बात की कोशिश करते। अब अगर वोटिंग का हक भी मिल जाए। तो एनआरआई की पांचों उंगलियां घी में और सिर कड़ाही में। सत्ता में जो भी राजनीतिक दल होगा। एनआरआई वोट बैंक की बात को सिर्फ सुनना नहीं, अमल करना भी मजबूरी होगी। पर जैसे दोहरी नागरिकता में तकनीकी पेच। एनआरआई के वोट के हक में भी कम नहीं। कैसे चयन होगा? सुरक्षा के लिए क्या मानक होंगे? और भी कई पेच, जो पालिसी जाहिर होने के बाद दिखेंगे। पर वोट के हक के पीछे की कहानी- निवेश। मनमोहन तो खुल्लमखुल्ला बोले- 'देश में निवेश के मामले में एनआरआई रुढि़वादी रहे हैं। पर सोच बदलने की जरुरत। भारत की ओर सजगता से देखना चाहिए। निवेश के मामले में भारत भी अहम ठिकाना है।'  पीएम ने एनआरआई से विकास और राजनीति में सक्रिया भागीदारी की भी अपील की। तो क्या अब राजनीति में भी टोटा हो गया। जो हम एनआरआई को वोट का लॉलीपॉप थमा सक्रिय राजनीति में आने का न्योता दे रहे। एक अपने पूर्व पीएम लालबहादुर शास्त्री का जमाना था। जब देश में खाद्य संकट का पूर्वानुमान हुआ। तो देशवासियों से हफ्ते में एक दिन उपवास की मार्मिक अपील की। अपील के पीछे शास्त्री जी के तीन उद्देश्य थे। पहली- इससे अनाज की कमी दूर होगी। दूसरी- किसान फसल की पैदावार बढ़ाने को उत्साहित होंगे। और तीसरी- अनाज की खातिर दुनिया के सामने हाथ न पसारना पड़े। पर साठ साल में ही क्या हो गया। टेक्रोलॉजी की कमी हो। तो खुद बनाने के बजाए इंपोर्ट को तरजीह देते। रक्षा उपकरण की विदेशों से खरीद पर खुद रक्षा मंत्री एके एंटनी अफसोस जता चुके। अब एनआरआई को वोट का हक। यानी राजनीति में भी निवेश। क्या वाकई अपनी राजनीति में नेतृत्व का टोटा पड़ गया?
----------
08/01/2010

Thursday, January 7, 2010

संघरुपेण संवाद, विश्वास, और सड़कों पर बीजेपी

इंडिया गेट से
---------
संघरुपेण संवाद, विश्वास,
और सड़कों पर बीजेपी
-------------
 संतोष कुमार
-----------
          बदली आबोहवा में बीजेपी नए सफर को निकल पड़ी। गढ़ के रक्षक गडकरी ने गुरुवार को पदाधिकारियों की पहली मीटिंग ली। तो मंच पर तिकड़ी नहीं, चौकड़ी बैठी। बीजेपी की सभी अहम मीटिंगों में पहले अध्यक्ष और दोनों सदनों के नेता बैठा करते थे। यों वाजपेयी के सक्रिय रहते मंच भी पर तिकड़ी यानी अटल-आडवाणी और अध्यक्ष बैठते थे। पर वाजपेयी सक्रिय नहीं रहे। तो राज्यसभा के नेता को भी मंच पर जगह मिल गई। तभी से जसवंत का ओहदा और बढ़ गया। अब आडवाणी खुद अटल की भूमिका में। पर दूसरी पीढ़ी अपना कद क्यों घटाए। सो मंच पर अब आडवाणी, सुषमा, जेतली और गडकरी की कुर्सी लगने लगी। पार्लियामेंट्री बोर्ड की मीटिंग वाले कमरे में भी संचालन साइड की तीन बड़ी कुर्सियां हटाकर चार छोटी कुर्सियां लगा दी गई। अब आप सोच रहे होंगे, कुर्सी का किस्सा क्यों? आपकी सोच सोलह आने सही। कोई कहीं भी बैठे, क्या फर्क पड़ता। पर बीजेपी में सारी लड़ाई तो कुर्सी की ही। तभी तो आडवाणी सन्यास को राजी नहीं। जसवंत को बतौर राज्यसभा नेता मंच पर जगह मिली। तो अरुण जेतली क्यों त्याग की मूर्ति बनें। भले कुर्सी की साइज ही घटानी क्यों न पड़ जाए। यों बताते जाएं। दिल्ली मैट्रो की ट्रेन में भी कुछ ऐसा ही हुआ। पहले ट्रेनों के डिब्बे आए। तो सीटें चौड़ी और स्टैंडिंग सीटें कम थीं। अब नए डिब्बे फिर जर्मनी से मंगाए गए। तो डिब्बा अत्याधुनिक हो गया। सीटों की साइज छोटी, पर स्टैंडिंग सीटें दुगुनी हो गईं। अब बीजेपी में सीटों का यह फार्मूला कहां से आया। मालूम नहीं। पर आप खुद ही देख लो। संसदीय मापदंडों में राज्यसभा उच्च सदन और लोकसभा निम्र। पर अहमियत में लोकसभा सर्वोपरि। लोकसभा के आधार पर ही सरकारें बनती-बिगड़ती। सो सिर्फ सुषमा स्वराज को मंच पर कुर्सी मिलती। तो जेतली शायद हजम नहीं कर पाते। सो आडवाणी ने कुर्सी का किस्सा सुलझाने को उम्दा फार्मूला अपनाया। फार्मूला बना- 'सबका भला हो। पर शुरुआत मुझ से हो।'  सो बीजेपी में अपनों का भला भी कराया। आडवाणी खुद भी वटवृक्ष हो गए। सो कुर्सी के खेल से गुजर चुकी बीजेपी को नए अध्यक्ष नितिन गडकरी ने नया मंत्र दिया। राजनाथ वाली टीम की पहली मीटिंग ली। तो गडकरी ने संवाद पर जोर दिया। नई टीम तो राष्टï्रीय परिषद के अनुमोदन के बाद गठित होगी। गुरुवार को मीटिंग में अध्यक्ष के औपचारिक चुनाव और अनुमोदन की तारीख भी तय हो गई। फरवरी में वेलेंटाइन डे से पहले आठ, नौ, दस तारीख को अध्यक्ष का चुनाव। फिर 17 को इंदौर में एकदिनी वर्किंग कमेटी और 18-19 को परिषद की मीटिंग। उसके बाद जब गडकरी नई टीम बनाएंगे। तो उसमें अपनी छाप तो छोड़ेंगे ही। पर पुरानी टीम में नई ऊर्जा डालने की कोशिश गुरुवार को ही की। मीडिया के जरिए नेताओं के बीच होने वाले संवाद पर नसीहत दी। बोले- 'आपलोग परस्पर विश्वास कायम करें। आपसी विश्वास के साथ संगठन में नई आशा जगाएं। आपस में लोकतांत्रिक तरीके से संवाद स्थापित करें, फिर किसी कार्य को अंजाम दें।'  गडकरी कंक्रीट-पत्थर के काम से ही राजनीति में ऊपर उठे। सो उन ने पदाधिकारियों को संगठन की महत्ता भी उसी अंदाज में समझाई। कहा- 'इमारत तभी बुलंद रहती, जब नींव मजबूत हो। पार्टी की नींव संगठनात्मक ढांचा है, जिसे मिलजुल कर मजबूत करें।'  यानी गडकरी ने कबूल लिया, बीजेपी की नींव कमजोर हुई। खुद मोहन भागवत कई बार कह चुके। बीजेपी राख से भी उठ खड़ी होगी। तब वाकई बीजेपी का तांडव उसे राख की ओर ले जा रहा था। पर अब गडकरी ने कमान संभाली। सो संघ का तय एजंडा अब अमल में ला रहे। संवाद और आपसी विश्वास बहाली का तो मंत्र दिया ही। पदाधिकारियों को कंप्यूटर और एसी कमरों से बाहर निकल ज्यादा से ज्यादा प्रवास का फरमान सुना दिया। संघ 2004 से ही बीजेपी को पथ से भटका बता रहा। सत्ता में बैठकर धार कुंद हो गई। अब गडकरी महंगाई पर विरोध का पहला बगुल फूंकेंगे। अ_ïारह जनवरी से मार्च के दूसरे हफ्ते तक तीन फेज में आंदोलन होगा। पर आंदोलन सिर्फ महंगाई नहीं, गडकरी की रहनुमाई में जोश का भी द्योतक होगा। अब आंदोलन पहले की तरह फुसफुसा और टोकन का विरोध साबित होगा। या विपक्ष सही में गंभीर हुआ, इसकी झलक तो तभी दिखेगी। फिलहाल तो संघरुपेण गडकरी अपने मिशन की ओर बढ़ रहे। बीजेपी को एसी कमरों से निकाल सड़कों पर उतार रहे। पर क्या वाकई बीजेपी अपने पुराने तेवरों में लौट पाएगी? आखिर आम जनता कैसे भरोसा करेगी? जब बीजेपी बनी थी। तो महीने भर बाद छह मई 1980 को पंचनिष्ठïाएं व्यक्त की थी। राष्टï्रवाद, लोकतंत्र, प्रभावकारी धर्मनिरपेक्षता, गांधीवादी समाजवाद और सिद्धांतपरक साफ-सुथरी राजनीति। पर जैसे-जैसे बीजेपी का ग्राफ बढ़ा। बीजेपी सत्ता तक पहुंची। तो बीजेपी को डंडा-झंडा वही रहा। पर एजंडा बदल गया। एनडीए सरकार बनने के बाद 28-30 दिसंबर 1999 को चेन्नई में परिषद हुई थी। आडवाणी ने एक ड्रफ्ट जारी किया, जिसे चेन्नई घोषणापत्र कहा गया। जिसमें कहा गया था- हर कार्यकर्ताओं को अच्छी तरह समझना चाहिए कि राजग के एजंडे के सिवा पार्टी का अपना कोई एजंडा नहीं है। यानी राम मंदिर समेत सभी विवादित मुद्दे किनारे। सो संघरुपेण गड़करी फार्मूला कितना चलेगा, यह तो वक्त ही बताएगा।
--------
07/01/2010

Wednesday, January 6, 2010

'अमर प्रेम' की अजब 'गाथा'

इंडिया गेट से
---------
'अमर प्रेम'  की अजब 'गाथा'
----------------
 संतोष कुमार
-----------
     तो समाजवादी पार्टी में अब अमर-वाणी नहीं। पर कब तक, यह तो अमर-मुलायम ही जानें। नए साल की छुट्टिïयां मनाने दुबई गए अमर सिंह ने इस्तीफा फैक्स किया। सिर्फ सपा और सांसदी नहीं छोड़ी, पार्टी संगठन के सारे पद छोड़ दिए। सो सपा में खलबली मची। पर राजनीतिक जगत में एक और अमर-ड्रामे का संदेश गया। अमर सिंह ने इस्तीफे की वजह सेहत बताई। पर बातों ही बातों में सपा में घटती साख का दर्द बयां कर दिया। सो अटकलें लगीं, भाई अमर अब कांग्रेस में जाएंगे। पर 'अमर ड्रामा' का मंचन कई बार हो चुका। सो कांग्रेस ने 'अच्छे पड़ोस'  की भूमिका में मजा लिया। अपने दिग्गी राजा ने चुटकी तो ली ही, अमर सिंह को फिर औकात बता दी। दिग्विजय सिंह बोले- 'कांग्रेस में कोई सांसद, पूर्व सांसद या विधायक शामिल होना चाहे। तो पहले स्टेट यूनिट को आवेदन दे। स्टेट यूनिट अपनी सिफारिश के साथ प्रभारी महासचिव को भेजेगा। फिर उस पर सोनिया गांधी अंतिम फैसला लेंगी।'  यों दिग्गी-अमर के रिश्ते लोकसभा चुनाव से पहले ही जगजाहिर हो चुके। सो दिग्गी मौका क्यों चूकते। लोकसभा चुनाव के वक्त जब कांग्रेस और सपा में सीटों के तालमेल पर बात चल रही थी। अमर-मुलायम तो सोनिया-राहुल से मिल दिग्गी राजा को तालमेल की वार्ता से दूर रखने की मांग कर आए थे। पर अमर की दाल नहीं गली और ना ही सपा-कांग्रेस गठजोड़ हुआ। बाकी चुनाव नतीजे तो आपको याद ही होंगे। पर बात सपा की अमर कहानी की। जब कोई खुद को संगठन से बड़ा समझने लगे। तो वही समस्याएं होतीं, जो अमर के साथ हो रहीं। धन बल से अमर ने सपा में पैठ बना ली। पर मुगालता पाल लिया, बिन अमर सपा कुछ नहीं। खुद को सपा का खेवनहार मान बैठे। अब पूछ कम होने लगी। तो इस्तीफे का नाटक शुरू कर दिया। यों अमर सिंह कोई पहली बार इस्तीफा नहीं दे रहे। पहले भी दो बार ऐसा कर चुके। पर सोशलिस्ट मुलायम केपीटलिस्ट के चंगुल में। सो हर बार अमर को मना लेते। अबके भी मुलायम ने यही दावा किया। पर कहानी में थोड़ा ट्विस्ट। पहले अमर की नाराजगी का शिकार मुलायम परिवार से इतर कोई और हुआ। लोकसभा चुनाव के वक्त रामपुर सीट से आजम खान जया प्रदा को टिकट देने के खिलाफ थे। सो अमर-आजम में ठन गई। आखिर समाजवाद और पूंजीवाद की लड़ाई में अमर की ही जीत हुई। सपा के संस्थापकों में से एक रहे आजम विदा हो गए। आजम से पहले अमर की रार राज बब्बर से ठनी। तो राज बब्बर भी किनारे हो गए। पर उन्हीं राज बब्बर ने कांग्रेस का टिकट हासिल कर सपा के किले उखाड़ दिए। वैसे भी मुलायम सिंह के लिए अबके विवाद सुलझाना आसान नहीं। अमर के निशाने पर अबके राज बब्बर या आजम नहीं। अलबत्ता सीधे मुलायम के दुलारे और होशियार भाई रामगोपाल यादव। फिरोजाबाद उपचुनाव में मुलायम की बहू डिंपल हार गईं। सपा की साख को बट्टïा लगा। तो अमर सिंह ने हार की वजह नेताजी और परिवार का अतिआत्मविश्वास बता दिया। सो मुलायम के भाई रामगोपाल ने अमर को हद में रहने की सलाह दी। आखिरकार मुलायम फिर अमर के घर गए। सुलह करा ली। पर अबके क्या होगा? अमर का ट्रैक रिकार्ड तो जगजाहिर। जिस परिवार में घुसे, परिवार को तोड़कर ही बाहर निकले। सो शायद रामगोपाल ने अमर को दरवाजा दिखाने की स्ट्रेटजी बना ली। तभी तो अमर का गुस्सा रामगोपाल तक ही घूमता दिखा। जब बोले- 'रामगोपाल को राष्टï्रीय प्रवक्ता बना दो। वही चुनाव जिताएंगे। रामगोपाल ने मुलायम-जनेश्वर को ही सपा का नेता बताया। मुझे अपना सहयोगी। पर मेरे नाम के आगे न श्री लगाया, न पीछे जी। सो मैं आहत हूं।' अब कोई श्री और जी के लिए इस्तीफे का ड्रामा करे। तो क्या कहेंगे आप? परिवार तोडऩे में अंबानी परिवार का किस्सा तो ताजा। एटमी डील पर मनमोहन सरकार को समर्थन दिया। तो डील की खासियत की वजह से नहीं। अलबत्ता अलग से 'राजनीतिक डील'  की थी। याद होगा, कैसे अमर ने मुकेश अंबानी पर दबाव बनाने के लिए विंड फाल टैक्स का सुर्रा छोड़ा था। पेट्रोलियम मंत्री मुरली देवड़ा और तबके वित्त मंत्री पी. चिदंबरम की नाक में दम कर दिया। पीएम तक से मिल आए। पर कांग्रेस के आगे दाल नहीं गली। कांग्रेसी सत्यव्रत चतुर्वेदी ने तो कई बार अमर पर निशाना साधा। एक बार तो उन ने अमर को चिरकुट कह दिया। भन्नाए अमर ने फौरन मीडिया बुलाई। सीना फुलाकर बोले- 'हां मैं चिरकुट हूं।'  राज बब्बर ने दलाल कहा था। तब भी अमर ने इकरार किया। एटमी डील पर लेफ्ट ने मनमोहन का साथ छोड़ा। तो अमर-मुलायम ने लेफ्ट का साथ छोड़ मनमोहन का दामन थाम लिया। तो आडवाणी ने मौजूं टिप्पणी की थी। जब सपा के लिए 'लाल सलाम से दलाल सलाम तक' शब्द का इस्तेमाल किया। अमर की यही खासियत नहीं। याद है, 2004 में दस जनपथ से बेइज्जत होकर निकाले गए। कसमें खाईं, पर एटमी डील के वक्त सब भुला दिया। तभी तो कहा जाता- 'अमर प्रेम की अजब गाथा।'  अमर से दुश्मन से ज्यादा दोस्त ही सतर्क रहते। पता नहीं कब, कहां मुंह खुल जाए। तो क्या अब राजनीति में चिरकुटों और दलालों को भी नाम में श्री या जी का संबोधन चाहिए?
--------
06/01/2010

Tuesday, January 5, 2010

तेलंगाना: सांप-छछूंदर वाली हालत में कांग्रेस और सरकार

इंडिया गेट से
---------
तेलंगाना: सांप-छछूंदर वाली
हालत में कांग्रेस और सरकार
---------------
 संतोष कुमार
-----------
        तो तेलंगाना मुद्दे ने सरकार का तेल निकाल दिया। मंगलवार को ऑल पार्टी मीटिंग भी हो गई। पर आग बुझने का नाम नहीं ले रही। अलबत्ता तेलंगाना पर कांग्रेस और सरकार तिल-तिल फंसती जा रही। के. चंद्रशेखर राव की अनशन की हड़बड़ी में सरकार ने एलान तो कर दिया। पर दूरगामी प्रभाव नहीं भांप पाई। सो दबाव में फैसला लेकर अब नतीजा भुगत रही। जो आम राय का रोड मैप पहले तैयार होना चाहिए था। सरकार अब तैयार कर रही। पर जैसे हालात, सहमति की डोर कहीं दिखती नहीं। वैसे भी आम सहमति संभव नहीं। जब अलग-अलग वैचारिक ग्रुप ताकत दिखा रहे। तेलंगाना के मसले पर अलग-अलग दलों के बीच ही मतभेद नहीं। एक ही दल के भीतर भी कड़े मतभेद। कांग्रेस, तेलुगुदेशम, लेफ्ट फ्रंट और चिरंजीवी की प्रजा राज्यम। चारों में अंदर ही दो-फाड़। तेलंगाना रीजन से आने वाले नेता अलग राज्य की लड़ाई लड़ रहे। तो दूसरा पक्ष अखंड आंध्र की। सबके अपने-अपने निजी हित और स्वार्थ। सो आम सहमति के नाम पर तो न नौ मन तेल होगा, न राधा नाचेगी। आम सहमति नहीं बनने वाली। फिर भी पी. चिदंबरम कवायद कर रहे। तो नतीजा वही होगा, जो मंगलवार को हुआ। मीटिंग शुरू हुई। तो चिदंबरम के चेहरे पर तेरह बजे थे। तेलंगाना पर खुफिया रपट चिदंबरम ने ही दस जनपथ पहुंचाई। फौरन किचन केबिनेट में विचार हुआ। तो सोनिया गांधी के सलाहकारों ने भी कोई खासी मशक्कत नहीं की। अलबत्ता नौ दिसंबर की रात को ही हड़बड़ी में केबिनेट बुलाकर अलग तेलंगाना की प्रक्रिया शुरू करने का एलान हो गया। एलान चूंकि चिदंबरम ने किया। रपट भी चिदंबरम ने दी। सो अब सारा ठीकरा चिदंबरम के सिर। कांग्रेस तो एक ही राग अलाप रही। तेलंगाना का मुद्दा सरकार के पाले में। सो अपनी बात सरकारी मंच पर कहेंगे। यानी कोल्हू में गर्दन फंसी। तो खुद कांग्रेस और सरकार का तेल निकल गया। सो मीटिंग में चिदंबरम ने संसदीय ज्ञान खूब बघारा। लोकतंत्र में राजनीतिक दलों की जिम्मेदारी का अहसास कराया। तो विधानसभा चुनाव के वक्त सभी दलों की तेलंगाना पर भूमिका भी याद दिलाई। वाकई तब चिरंजीवी हो या चंद्रबाबू, लेफ्ट हो या राइट। सब तेलंगाना के पक्ष में थे। कांग्रेस ने भी मैनीफेस्टो में वादा दोहराया था। अब सिर्फ बीजेपी में अलग तेलंगाना पर एक राय। बाकी सब आपस में ही बंटे हुए। सो चिदंबरम ने आंध्र में भड़की हिंसा पर चिंता जताई। राज्य में अमन-चैन बहाल हो, इसकी जिम्मेदारी सभी दलों पर डाल दी। कहा- 'अगर हम मामला नहीं सुलझा पाए, तो माओवादी खुश होंगे।'  फिर भी मीटिंग में तेलुगुदेशम के दो एम.पी. थे। तो एक तेलंगाना के पक्ष में, दूसरा विरोध में। कांग्रेसी नुमाइंदों का भी यही हाल। लेफ्ट फ्रंट में सीपीआई तेलंगाना के पक्ष में, तो सीपीएम विरोध में। एआईएमआईएम के ओबैसी न तीन में, न तेरह में। सो राष्टï्रपति राज की मांग की। प्रजा राज्यम ने एक हाई पॉवर कमेटी का सुझाव दिया। जो सभी ग्रुप से बात करे। पर बीजेपी के बंडारू दत्तात्रेय ने पहले कांग्रेस और सरकार से रुखनामा मांगा। फिर बजट सत्र में ही बिल लाने की मांग की। पर चिदंबरम को मीटिंग का कोई नतीजा नहीं दिखा। तो ऐसी बातचीत जारी रखने का सुर्रा छोड़ दिया। बोले- 'मुझे लगता है, कोई भी समूह आगे बातचीत के खिलाफ नहीं है।' पर बीजेपी ने फौरन आपत्ति जताई। तो सबसे अहम किरदार के. चंद्रशेखर राव ने मीटिंग में मुंह न खोला। केसीआर भांप चुके, बोतल से निकला जिन अब 'विश'  पूरी करके जाएगा। भले आज नहीं तो कल। यानी तेलंगाना के लिए केसीआर किरदार। तो अखंड आंध्र के नाम पर जगन मोहन का खेल चल रहा। वाईएसआर के जमाने वाली समूची उद्योग लॉबी जगन मोहन के साथ। सो जगन मोहन सीएम नहीं, तो कांग्रेस नहीं के खेल में जुटे हुए। यानी कुल मिलाकर चिदंबरम बाबू फंस गए। मुंबई हमले के बाद मनमोहन ने होम मिनिस्टर बनाया। तो चिदंबरम ने बाबूगिरी पर नकेल कस दी। शासन तंत्र को मुस्तैद कर दिया। पर तेलंगाना चिदंबरम के लिए पहला राजनीतिक टेस्ट। सो जल्दबाजी का फैसला गले की फांस बन गया। चिदंबरम ने ही तेलंगाना का एलान किया। फिर पखवाड़े भर बाद आम सहमति की दलील दी थी। सो चिदंबरम की हालत सांप-छछूंदर वाली हो गई। बड़े-बुजुर्ग तो सांप-छछूंदर पर मौजूं कहानी सुनाते। सांप को शाप मिला हुआ। अगर सांप छछूंदर को निगल जाए, तो भी मरेगा। अगर छोड़ दे, तो छछूंदर के काटने से भी सांप मरेगा। सो पेशे से वकील चिदंबरम राजनीति के कटघरे में फंस गए। चार घंटे मीटिंग चली। पर नतीजे में निकली कुल जमा चार शब्दों की अपील- 'राज्य में शांति, सौहार्द और कानून व्यवस्था बनाए रखी जाए।'  यानी आम सहमति को इन्हीं चार शब्दों की श्रद्धांजलि। अब भी अमन-चैन बहाल न हुआ। तो चिदंबरम का भविष्य क्या होगा?
----------
05/01/2010

Monday, January 4, 2010

मैडल वापसी काफी नहीं, 'राठौरों' से मुक्ति कब?

इंडिया गेट से
---------
मैडल वापसी काफी नहीं,
'राठौरों'  से मुक्ति कब?
-------------
 संतोष कुमार
-----------
          सोचो, मीडिया आवाज न उठाता। रुचिका केस में अदालती फैसले को दिन का घटनाक्रम मान आगे बढ़ जाता। तो क्या बात इतनी दूर तलक जाती? क्या 19 साल से कुंभकर्णी नींद सोई सरकार जागती? अब रुचिका के गुनहगार एसपीएस राठौर पर मुकदमों का बोझ। होम मिनिस्ट्री भी मैडल छीनने का फैसला कर चुकी। तो यह अपनी मीडिया की वाहवाही नहीं। अलबत्ता फर्ज के मुताबिक सजग प्रहरी की भूमिका निभाई। पर कटघरे में रसूख की राजनीति। आखिर जब तक जनता सड़कों पर नहीं उतरती। तब तक व्यवस्था के कान पर जूं क्यों नहीं रेंगती। अब होम सैक्रेट्री जी.के. पिल्लई की रहनुमाई वाली कमेटी ने मैडल वापस लेने की सिफारिश कर दी। तो हरियाणा के सीएम भूपेंद्र सिंह हुड्डïा की फुर्ती देखिए। इधर कमेटी की मीटिंग में फैसला होना था। उधर तड़के ही हुड्डïा की चि_ïी चिदंबरम को पहुंच गई। मैडल वापस लेने की अर्जी लगा दी। पर हुड्डïा कोई नवा-नवा सीएम नहीं। पांच साल से हरियाणा की कुर्सी पर काबिज। पर राठौर के खिलाफ सिफारिश तब भेजी। जब केंद्र सरकार मैडल छीनने का मन बना चुकी थी। पर अहम सवाल, मैडल छीनने से क्या होगा? इन 19 साल में हरियाणा और केंद्र में कई सरकारें आईं-गईं। पर राठौर के चेहरे से मुस्कराहट नहीं गई। जब 1990 में रुचिका के साथ छेड़छाड़ का मामला आया। तो तबके डीजीपी आर.आर. सिंह की विभागीय जांच में राठौर दोषी पाए गए। पर राठौर की राजनीतिक पकड़ ने बाल बांका न होने दिया। अब 19 साल बाद पदक छीनने से क्या रुचिका के परिवार को शांति मिलेगी? संसद पर हमले के शहीदों के परिजनों ने दो साल पहले मैडल राष्टï्रपति के लौटा दिए। पर सरकार की बेशर्मी देखिए। न आतंकी अफजल को फांसी चढ़ाई। न शहीदों के परिजनों को कोई ऐसा भरोसा दिलाया, जिससे मैडल वापस ले सकें। यानी सरकार की निगाह में मैडल अहमियत नहीं रखते। आखिर मैडल और सम्मान को सरकार झुनझुने के तौर पर इस्तेमाल करती। वैसे भी मैडल बांटने के सिर्फ दो पैमाने। पहला- सत्ता की चारणगिरी। दूसरा- सहानुभूति बटोरने और उपलब्धियां भुनाने की। भले सरकार किसी भी राजनीतिक दल की हो। अब आप खुद ही देख लो। जब वाजपेयी पीएम थे। डा. चितरंजन राणावत ने घुटने का आपरेशन किया। तो राणावत को पद्म श्री मिल गया। राणावत की काबिलियत पर सवाल नहीं। सवाल सरकार के इरादे पर। क्या पीएम के घुटने का आपरेशन पद्म श्री का पैमाना? अगर ऐसा, तो अबके 26 जनवरी पर पीएम मनमोहन की हर्ट सर्जरी करने वाले डाक्टर को क्यों न मिले पद्म श्री? अभी हाल का किस्सा लो। तो प्रख्यात कवि अशोक चक्रधर ने लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के खूब स्लोगन रचे। सो चुनाव बाद कांग्रेस ने चक्रधर को हिंदी अकादमी दिल्ली का उपाध्यक्ष बना दिया। पर काफी विरोध हुआ। कई बड़े लोगों ने इस्तीफा दे दिया। तो भी सरकार ने फैसला पलटा नहीं। अलबत्ता चक्रधर को एक और हिंदी संस्थान का अध्यक्ष बना दिया। अब दो-तीन साल पहले का एक अजीब-ओ-गरीब किस्सा भी देख लो। छत्तीसगढ़ में एक ऐसे शिक्षक को राष्टï्रपति पुरस्कार मिला। जो आठ साल से स्कूल ही नहीं गए। अलबत्ता पदस्थापना के तौर पर सीएम सैक्रेटेरिएट में रहे। सो सीएम से नजदीकी ने राष्टï्रपति पुरस्कार दिला दिया। गुजरात के डी.जी. बंजारा फर्जी एनकाउंटर कर मैडल पाते गए। पर अपनी सरकार कभी पानी बाबा के नाम से मशहूर राजेंद्र सिंह जैसे लोगों के बारे में नहीं सोचती। भले राजेंद्र सिंह को मैग्सेसे पुरस्कार किसी अन्य देश से क्यों न मिल जाए। सहानुभूति के लिए शहीदों के परिजनों को अवार्ड देना तो परंपरा बन गई। पर उपलब्धियां भुनाने को भी हरभजन, धोनी जैसों को पद्म श्री मिल जाता। भले विज्ञापनों की शूटिंग में व्यस्त धोनी-हरभजन के पास देश का नागरिक सम्मान लेने की फुरसत न हो। पर राजनीति और अफसरशाही में चोली-दामन का ऐसा रिश्ता बन चुका। जो एक-दूसरे के बिना नंगा दिखे। सो नेता को भी रसूख चाहिए। अफसरशाही को भी राजनीतिक वरदहस्त। सो दोनों मिल-बांट कर रेवड़ी खाते। अपने-अपनों को मैडल और सम्मान दिला जाते। पर उंगली न उठे, सो एकाध बाबा आम्टे जैसे लोगों को भी सम्मान दिया जाता। ताकि एक ईमानदार-योग्य की छतरी में सारे बेईमान समा जाएं। अफसरानों में किसी एक राजनेता को गॉड फादर मानकर उसके इशारों पर चलने की आदत। सो राजनीतिक कमिटेड अफसरों को ईमानदार और योग्य अफसरों की वरिष्ठïता लांघकर पुरस्कृत करने का भी चलन आम। तभी तो खुद अफसर रहे देश के पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त टी.एन. शेषन ने अपनी अफसरशाही को 'पॉलिश्ड कॉल गल्र्स'  की उपाधि दी थी। आजादी से पहले और अबकी अफसरशाही में कोई खास फर्क नहीं। सो चालाक अफसरान स्पष्टïवादिता के बजाए 'जी हुजूरी'  से नहीं हिचकिचाते। तभी तो पुलिस रिफॉर्म की फाइल धूल फांक रही। आतंकी पुलिस की नाक के नीचे से भाग रहे। पर सिर्फ पुलिस मैडल ही नहीं, अपना सर्वोच्च राष्टï्रीय सम्मान भारत रत्न भी राजनीति से सराबोर। तभी तो इंदिरा गांधी को 1971 में राजीव गांधी को मरणोपरांत 1991 में ही भारत रत्न मिल गया। पर सरदार पटेल को 1991 में, मौलाना अबुल कलाम आजाद को 1992 में। सुभाष चंद्र बोस को भी 1992 में नवाजा गया। पर सुप्रीम कोर्ट के दखल से नेताजी का नाम लिस्ट से हटाना पड़ा।
---------
04/01/2010