Friday, April 9, 2010

एक थे पाटिल और एक हैं चिदंबरम

शुक्रवार को एक फिल्म रिलीज हुई, जो आपको परदे पर नजर नहीं आएगी। फिल्म का नाम है- राजनीति की नैतिकता। पी. चिदंबरम ने इस्तीफे की पेशकश की। अब यह सब अचानक से नहीं हुआ। अलबत्ता जैसे पूरी फिल्म की शूटिंग पहले हो जाती और बढिय़ा मुहुर्त देख रिलीज होता। ठीक वैसे ही शुक्रवार को हुआ। जब दंतेवाड़ा के नक्सली हमले पर नैतिकता का बड़ा खेल हुआ। चिदंबरम सीआरपीएफ के शौर्य दिवस प्रोग्राम में थे। वहीं नैतिक जिम्मेदारी ओढऩे का एलान कर दिया। पीएम-सोनिया से मिलकर अपनी बात कह चुके। अब ये बातें तो सार्वजनिक तौर से हुई। पर बैक डोर से प्लांट हो गया, चिंदबरम ने इस्तीफे की पेशकश की। बस क्या था, चारों तरफ राजनीतिक पारा चढ़ गया। चिंदबरम के बिछाए राजनीतिक जाल में अपने तो अपने विपक्षी भी फंस गए। सफाई आने लगी, पीएम ने इस्तीफा मंजूर नहीं किया। विपक्षी बीजेपी ने तो दो कदम आगे बढकर कह दिया। चिदंबरम इस्तीफा न दे, नहीं तो यह नक्सलियों की जीत होगी। अब किसी केबिनेट मंत्री के लिए विपक्ष ऐसी भावना दिखाए। तो क्या समझेंगे आप? यही ना, देखो कितना अच्छा मंत्री है। अब अगर अंदरखाने कहीं किसी कांग्रेसी के मन में खुन्नस भी हो। तो दबानी पड़ जाएगी। चिदंबरम का यही दर्द तो उभर कर सामने आया। उनने कहा, प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष तौर पर मुझसे पूछा जा रहा था। इस घटना के लिए कौन जिम्मेदार है। सो दंतेवाड़ा हमले की पूरी जिम्मेदारी मैं लेता हूं। अब पूछने वालों को जवाब भी मिल गया। चिदंबरम ने एक ही स्ट्रोक से अपनी राजनीतिक हैसियत भी बढ़ा ली। पर इस्तीफे की खबरों में कितना दम, यह खुद प्रणव मुखर्जी ने बता दिया। सवाल हुआ, तो दादा ने साफ कह दिया। अफवाहों पर यकीन न करो। यानी नक्सली हमले में अपनों की आलोचना से आहत चिदंबरम ने सोच-समझकर इस्तीफे का राजनीतिक पासा फेंका। अगर चिदंबरम ने छत्तीसगढ़ से लौटते ही पीएम से मिल अपनी मंशा जता दी थी। तो क्या राजनीतिक नौटंकी दिखाने के लिए शुक्रवार का इंतजार कर रहे थे? उसी दिन देश को कह देते, जिम्मेदारी लेता हूं। पर नेता इतनी ईमानदारी दिखाने लगे। तो फिर राजनेता कहां, समाज सेवक हो जाएं। अब चिदंबरम का बतौर होम मिनिस्टर हिसाब-किताब लें। तो कोई शक नहीं, उनने 26/11 के हमले के बाद खुफिया तंत्र का कायापलट कर दिया। अधिकारियों को जिम्मेदारी का अहसास कराया। पर नक्सलवाद के खिलाफ लड़ाई में थोड़ी चूक कर गए। राजनीतिक नंबर बढ़ाने के चक्कर में लालगढ़ गए। तो बुद्धदेव भट्टाचार्य से ही उलझ गए। अपनी शेखी बघारने को एलान कर दिया। नक्सलवादी कायर हैं, जंगलों में छुपे बैठे। अब सुरक्षा बल किसी खास ऑपरेशन में जुटे हों और होम मिनिस्टर ऐसा उकसाने वाला बयान दे। तो क्या कहेंगे आप। आखिर वही हुआ, जंगल के हर रास्ते से वाकिफ नक्सलियों ने ऐसा जाल बिछाया। अपने सीआरपीएफ के जवान समझ ही नहीं पाए। चिदंबरम के बयान का जवाब नक्सलियों ने 76 सुरक्षा बलों को मार कर दिया। वैसे नक्सली वाकई कायराना हरकत पर उतारु। पर गांव में कहावत है ना, मरखाने बैल को लाल कपड़ा दिखाओगे, तो वह सींग मारेगा ही। नक्सलियों ने चिदंबरम के बयान को लाल कपड़ा समझ लिया। अब चिदंबरम नैतिक जिम्मेदारी ओढ़ रहे और वाकई उन्हें अपनी भूल का अहसास। तो सिर्फ पेशकश क्यों, इस्तीफा देकर चले जाते। भले पीएम पद पर रहने की मनुहार करते, अगर अपनी गलती का अहसास है तो कतई नहीं मानते। अगर चिदंबरम इस्तीफे की पेशकश कर रहे। तो इसका क्या मतलब निकाला जाए। यही ना, नक्सलवाद के खिलाफ बनाई अपनी रणनीति के आगे चिदंबरम हार गए। ऑपरेशन ग्रीन हंट आखिर चिदंबरम की ही तैयारी। पर इस्तीफा देकर अपनी ही योजना का नाकाम बता रहे। अगर नक्सलवाद के खिलाफ युद्ध छेड़ा है। तो युद्ध में कुर्बानी तो होंगी ही। अगर व्यवस्था में जज्बा, तो ईंट का जवाब पत्थर से दें। साथ ही कुर्बानी देने वाले जवानों के परिवार की जिम्मेदारी भी सरकार की। पर नेताओं से उम्मीद करना बेमानी ही। तभी तो शुक्रवार को जब चिदंबरम के इस्तीफे की पेशकश पर राजनीतिक पारा चढ़ा। तो कांग्रेस ने साफ कर दिया, इस्तीफा नहीं माना जाएगा। पर लगे हाथ एक और बात कही, जरा आप भी सुन लो। अभिषेक मनु सिंघवी बोले- च्हम रमण सिंह का इस्तीफा नहीं मांग रहे।ज् यानी कांग्रेसी पैंतरा, जब रमण नहीं तो चिदंबरम क्यों? पर रमण सिंह का इस्तीफा नैतिकता के किस फॉर्मूले से मांगेगी कांग्रेस? नक्सलियों के खिलाफ राज्य और केंद्र का यूनीफाइड कमांड अब तक नहीं बना। तो जिम्मेदार कौन? रमण सिंह तो अभी भी लडऩे का जज्बा दिखा रहे। चिदंबरम की तरह नहीं, जो मैदान छोडऩे की तैयारी कर रहे। वैसे जो भी हो, चिदंबरम और उनके पूर्ववर्ती शिवराज पाटिल में एक बड़ा फर्क तो दिखा। हर आतंकी धमाके के बाद शिवराज पाटिल सिर्फ जुबान चलाते। पर इस्तीफे की पेशकश तो छोडि़ए, इस्तीफा शब्द आते ही एनडीए राज के हमले गिना देते। पर चिदंबरम ने भले राजनीति के लिए ही सही, कम से कम इस्तीफे की पेशकश तो की।
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09/04/2010

Thursday, April 8, 2010

ये लो महंगाई पर अब कमेटी-कमेटी का खेल

महंगाई पर मत्थापच्ची करने फिर बैठी सरकार। छह फरवरी को सीएम कांफ्रेंस में चतुराई दिखा पीएम ने कोर कमेटी बना ली थी। दस राज्यों के सीएम और खुद पीएम-प्रणव-पवार-मोंटेक मेंबर हो गए। एक्सपर्ट के नाते पीएम के आर्थिक सलाहकार सी. रंगराजन भी शामिल किए गए। यानी महंगाई भगाने नहीं, अलबत्ता जिम्मेदारी से भागने का पूरा बंदोबस्त तभी हो गया। सो दस राज्यों में चार विपक्षी एनडीए शासित बिहार, पंजाब, छत्तीसगढ़, गुजरात। तो पांच यूपीए शासित आंध्र, असम, महाराष्ट्र, हरियाणा, तमिलनाडु और एक वामपंथियों का बंगाल। मकसद साफ था, अब विपक्ष सिर्फ केंद्र पर ठीकरा न फोड़ सके। यों राजनेताओं का जो भी मकसद हो। आम आदमी को तो महंगाई की आदत पड़ चुकी। सो पीएम-सीएम खामखाह दिमाग पर बोझ ले रहे। जेब पर महंगाई का बोझ तो आम आदमी उठा ही रहा। फिर देश की और भी कई समस्याएं। वैसे भी एयरकंडीशंड कमरों में बैठकर राजकाज चलाना आसान नहीं होता। सो सत्तानशीं दिमागदारों को सलाह, बेवजह स्ट्रेस न लें। आखिर उम्र भी कोई चीज होती। सो पहले अपनी सेहत का ख्याल रखें। आम आदमी का क्या, वह तो जैसा पैदा हुआ, वैसा ही मर जाएगा। पर नेतागण तो देश की महान विभूतियां। कितनी भट्ठियों में तपकर आज सेवाभाव से देश का भला कर रहे। सो हे नेताओं, कुछ विश्राम भी कर लें। ताकि आगे भी इसी तल्लीनता के साथ सेवारत रह सकें। देश के पीएम मनमोहन ने तो छह फरवरी को ही कह दिया था। महंगाई का बुरा दौर अब खत्म हो चुका और जल्द ही कीमतें नीचे की ओर आएंगी। भले तबसे अब तक में दूध-सब्जी, पेट्रोल-डीजल, रसोई गैस आदि की कीमतें बढ़ गईं। पर आम आदमी को कौन समझाए। देश हित में भी नेताओं को कुछ फैसले लेने पड़ते हैं। अपने नेता कितने दबाव में काम करते हैं, कौन समझेगा। आम आदमी पर थोड़ी सी बोझ क्या बढ़ी, हो-हल्ला करने लगे। भइया नेता लोग जमीन से उठकर आए। सो जमीनी हकीकत समझने के लिए गांवों में जाने की जरुरत नहीं पड़ती। एयरकंडीशंड कमरों में बैठकर ही काम हो जाए। तो कमर को तकलीफ क्यों देवें नेताजी। वैसे भी जब किसी का जीवन स्तर ऊपर उठता है। तो वह पीछे मुडक़र नहीं देखता। फिर भी यह नेताओं की मेहरबानी समझिए। गुरुवार को सात रेस कोर्स पर पीएम-सीएम की कोर कमेटी ने घंटों सिर खपाया। नेताओं की इस कड़ी मिहनत की तो तारीफ होनी चाहिए। पर नहीं हो रही, सो अपनी तो यही सलाह। अभी क्यों महंगाई पर मत्थापच्ची कर रहे। अभी न तो कोई चुनाव और न ही कोई किर्गिजस्तान जैसा जन विद्रोह। सो जैसे पहली पारी के आखिरी बजट में मनमोहन सरकार ने किसानों की कर्ज माफी और छठा वेतन आयोग लागू करने के चक्कर में खजाना लुटाया। अबके भी जब चुनावी शंखनाद हो, तब कुछ ऐसा ही करतब दिखा दे। अपनी जनता का क्या, वह तो क्षणिक मात्र को नाराज होती। सो फिर चुनावी महीनों तक के लिए झोली भर दो। ईवीएम में वोट ले लो और कर लो सत्ता मुट्ठी में। अब सत्ताधारियों के पास चुनावी जीत का लाजवाब मंत्र। तो विपक्ष के आंदोलनों से डरने की क्या जरुरत। गुरुवार को वामदलों ने महंगाई के खिलाफ प्रदर्शन और जेल भरो आंदोलन किया। तो बीजेपी ने 21 अप्रैल की रैली की योजना बनाई। नितिन गडकरी की टीम की पहली मीटिंग हुई। तो महंगाई पर यूपीए सरकार को झुकाने का खम ठोका। पर आंदोलन की हवा कैसे निकल रही, आप खुद देख लो। इंदौर अधिवेशन के मंच से गडकरी ने 10 लाख की भीड़ जुटा संसद घेरने का एलान किया था। पर गुरुवार को अनंत कुमार आंकड़ा बताने के बजाए कहां से कितनी ट्रेन आएंगी, यही बताते रहे। अब ट्रेन एकला बीजेपी वर्करों के लिए तो आएगी नहीं। वैसे भी ट्रेनें चलाने का काम रेल मंत्रालय का। पर फिलहाल बीजेपी ट्रेनें गिन रही। मध्यप्रदेश से कहीं भीड़ कम न हो जाए। सो प्रदेश अध्यक्ष के चयन का मामला रैली तक टाल दिया। वैसे भी मध्यप्रदेश में उमा भारती को लेकर बीजेपी संकट में। शिवराज तो उमा की वापसी के खिलाफ धमकी पर उतर आए। राजस्थान, बिहार, दिल्ली जैसे राज्यों में अंदरुनी सिर-फुटव्वल संगठन चुनाव नहीं होने दे रहा। पर गुरुवार को टीम गडकरी की पहली मीटिंग हुई। तो गडकरी ने रोडमैप बताया। नेताओं को महीने में आठ दिन प्रवास करने, संगठनात्मक-राजनीतिक-चुनावी योजना तैयार करने और बूथ कमेटियों दुरुस्त करने का मंत्र दिया। हर साल दस हजार लोगों को विचारधारा के हिसाब से प्रशिक्षण देने की भी योजना बनी। गडकरी ने हर स्तर के नेताओं को जमीन से जुडऩे की हिदायत भी दी। अब गडकरी की बीजेपी में कितनी चल रही, यह तो चार महीने में ही साफ हो चुका। सो हे सत्ताधारियों, क्यों व्यर्थ विपक्ष से डरते हो। विपक्षी बीजेपी वाले तो आपस में ही एक-दूसरे से डरे हुए। सो 21 अप्रैल के आंदोलन की चिंता छोड़ दो। तुम तो एयरकंडीशंड कमरों में बैठकर देश के भविष्य की तस्वीर बनाओ। जैसे गुरुवार को सात रेस कोर्स में बनाई गई। पीएम-सीएम की कोर कमेटी ने महंगाई पर मंथन के बाद अलग-अलग तीन कमेटियां बना दीं। अब आप ही देखो, मंथन करने बैठे कुल जमा पंद्रह लोग। पर निपटें कैसे, पल्ले नहीं पड़ा। सो 15 मेंबरों में ही तीन कमेटी बन गई। अब पीएम-सीएम की कोर कमेटी दो महीने बाद रपट के साथ मिलेगी। तब तक संसद में वित्त विधेयक पारित हो चुका होगा। अब छह फरवरी की मीटिंग के दो महीने बाद मीटिंग हुई। तो महंगाई बढ़ चुकी। अब फिर दो महीने बाद क्या होगा, यह कौन जाने।
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08/04/2010

Wednesday, April 7, 2010

और भी गम हैं जमाने में हैदराबादी ड्रामे के सिवा

बेगानी शादी में दीवाने 'अब्दुल्लों' को आखिर बोरिया-बिस्तर बांधना पड़ा। शोएब-आयशा में समझौता हो गया। आखिर शोएब ने तलाक, तलाक, तलाक कह दिया। तो सानिया-शोएब के निकाह में जबरन बाराती बनने को बेकरार अपनी बिरादरी वालों को मायूसी हाथ लगी। सो भले सानिया मिर्जा का घर न सही, चैनलों के दफ्तरों में ही महफिल सज गई। किसी ने शोएब को झूठा कहा। तो किसी ने तलाकनामे को आधार बना अपनी खबरों को पुष्ट करना शुरु कर दिया। शोएब-आयशा एपीसोड खत्म हुआ, तो चैनलों ने विशेष एपीसोड बना दिए। दिन भर इन्हीं खबरों को ऐसे परोसा। मानो, देश में और कोई गम ही नहीं। मंगलवार को नक्सली हमले में अपने 76 जवान शहीद हुए। तो बुधवार को बिहार से एक बड़ी खबर आई। पर अपने चैनलों के लिए महज नीचे की पट्टी पर चलने वाली खबर रही। पटना की एक अदालत ने 16 दबंगों को फांसी और आठ को आजीवन कारावास की सजा सुनाई। मामला पहली दिसंबर 1997 का था। भूमि मामले को लेकर दबंगों की बनाई रणबीर सेना ने 58 दलितों का नरसंहार कर दिया था। जिनमें 27 महिलाएं और 16 बच्चे भी शामिल थे। बिहार के लक्ष्मणपुर बाथे गांव में रणबीर सेना वाले सोन नदी पार कर घुसे। जिस नाव से नदी पार की, उसे चलाने वाले मल्लाह को भी मार दिया। फिर आधी रात के करीब गांव में घुस लोगों को बाहर निकाला और गोलियों से भून दिया। तीन घंटे चले इस कत्ल-ए-आम ने पूरा गांव ही उजाड़ दिया था। तबके राष्ट्रपति के.आर. नारायणन इस घटना से इतने आहत हुए कि उन्होंने इसे राष्ट्रीय शर्म करार दिया था। अब बुधवार को उस पर ऐतिहासिक फैसला आया। तो अपने चैनलों के लिए यह शायद बड़ी खबर नहीं थी। आईपीएल में कोई टीम जीते या हारे, तो फौरन लाइव होने लगता, ब्रेकिंग न्यूज चलने लगती। क्या भूमिहीन मजदूरों को मिले न्याय में कुछ ब्रेकिंग नहीं? क्या संजय दत्त, और सिद्धू के केस ही मीडिया के तराजू पर खरी उतरती? अब दांतेवाड़ा की घटना ही लीजिए। बुधवार को जगदलपुर में शहीदों को विशेष श्रद्धांजलि दी गई। पर दिन के वक्त चैनलों ने शोएब-आयशा-सानिया विवाद को ही फोकस किया। क्या नक्सलियों का इतना बड़ा हमला अपनी मीडिया के लिए एक दिनी घटना भर? प्राइम टाइम में चैनलों ने नक्सली हमले से जुड़ी खबरें भी परोसी। पर जरा नमूना देखिए। एक चैनल ने पांच हैडलाईन दिखाए, जिसमें से तीन सिर्फ और सिर्फ शोएब-आयशा-सानिया से जुड़े थे। श्रद्धांजलि और होम मिनिस्टर पी. चिदंबरम का एलान चौथी खबर थी। यों एकाध चैनल ऐसा भी, जिसने ईमानदारी दिखाई। नक्सलवादी हमले और बाद की कहानी को विस्तार से परोसा। नक्सलियों के हमले को चिदंबरम ने सरकार के खिलाफ युद्ध तो करार दिया। पर सेना के इस्तेमाल से इनकार कर गए। इंटेलीजेंस की नाकामी को भी नकारा। तो सवाल, आखिर चूक कहां हुई? अपने सुरक्षा बलों पर जंगल में छुपकर रहने वाले नक्सली भारी कैसे पड़े? नक्सलियों को ट्रेनिंग कहां से मिल रही? नक्सलियों को हथियार और बम तैयार करने के साजो-समान कहां से सप्लाई हो रहे? पर सरकार को कटघरे में खड़ा करने और बार-बार की कुर्बानी का हिसाब दिलाने के बजाए कुछ चैनलों को शोएब-आयशा-सानिया विवाद में मजा आ रहा था। तो क्या टीआरपी की होड़ में चैनल वाले सिर्फ चॉकलेटी चेहरों को ही दिखाएंगे? क्या देश के लिए खून बहाने वाले जवानों की कोई कीमत नहीं? यों एकाध चैनल ने मानवीय मूल्यों से जुड़ी खबरों को फोकस जरुर किया। पर तब, जब हैदराबादी ड्रामे का परदा गिर गया। सो मीडिया के लिए मंथन की घड़ी, आखिर चौैथा स्तंभ किसके लिए काम कर रहा? अगर मीडिया ने इतना शोर-शराबा न मचाया होता। तो मामला कूटनीतिक स्तर तक नहीं पहुंचता। पर पाक हुकूमत ऐसे मामलों में टांग अड़ाने से कहां पीछे रहने वाली। अब कोई पूछे, शोएब-आयशा-सानिया एपीसोड में देश की बाकी जनता का क्या हित रहा? तीनों परिवार का निजी मामला था। सो निजी तरीके से निपटा लिए। अब पूरे एपीसोड में शोएब जीता या आयशा, यह कहने नहीं, समझने की बात। आयशा ने शोएब की पत्नी होने का दावा किया था। शोएब ने आयशा से निकाह कबूला, पर माहा मानकर। अब तलाकनामे को ही देख लो। शोएब ने माहा और आयशा दोनों नाम को तलाक दिए। आयशा के परिवार ने एफआईआर वापस ले ली। अब आप ही तय करिए, कौन जीता-कौन हारा। इस पूरे विवाद में इतना भर हुआ कि दोनों पक्षों की बात रह गई और बुद्धू बना अपना मीडिया। अब सानिया और शोएब का निकाह होगा। और चैनल वाले बहस का मुद्दा बनाएंगे। इससे भी मन नहीं भरा, तो निकाह के दिन जबरन तांक-झांक की कोशिश होगी। अगर शादी कवरेज का मौका मिल गया। तो फिर चैनल वाले रिसेप्शन-हनीमून और बच्चे होने तक की कहानी दिखाने को बेताब होंगे। इतना ही नहीं, सानिया-शोएब का रिश्ता कब तक टिकेगा, इसकी भी कहानी गढ़ी जाने लगी। कहीं सट्टे लग रहे, तो अपने कुछ ज्योतिषी पोथा खोलकर बैठ गए। अब चैनल वालों को कुछ नहीं मिला, तो इन्हीं ज्योतिषियों को स्टूडियों में बुला शुरु हो जाएंगे। क्या यही अपनी विजुअल मीडिया का पैमाना? मुंबई हमला हो या निजी जिंदगी में तांक-झांक का मुद्दा विजुअल मीडिया हमेशा सवालों के घेरे में रहा। मुंबई हमले के बाद न्यूज ब्रॉडकास्टर एसोसिएशन ने खुद की आचार संहिता तो बना ली। पर जिम्मेदारी तय नहीं की। ----------
07/04/2010

Tuesday, April 6, 2010

राह भटके नक्सली, तो राजनीति भी कम नहीं

हमलों के बाद हरकत में आना और फिर राजनीति करना अपनी व्यवस्था की फितरत बन चुकी। नक्सलवाद अब नासूर बन चुका। राजनेता अपने शरीर का नासूर डॉक्टरी के इलाज से ठीक कर लेते। पर अपनी व्यवस्था के इस नासूर को खत्म करने का साहस नहीं। तभी तो नक्सलवादियों के हौंसले इतने बुलंद। मंगलवार की सुबह देश के लिए अमंगलकारी साबित हुआ। ऑपरेशन ग्रीन हंट में जुटे करीब 75 जवान शहीद हो गए। छत्तीसगढ़ के दांतेवाड़ा में नक्सलियों ने छुप कर घात लगाया। तो अपने सुरक्षा बल संभल नहीं पाए। होम मिनिस्टर पी. चिदंबरम ने दो दिन पहले नक्सलियों को कायर कहा। तो बौखलाए नक्सलियों ने अपनी कायरता भी दिखा दी। पर सवाल, अगर हिंसा के जरिए ही नक्सली हक छीनने को आमादा। तो सामने आकर वार क्यों नहीं करते। अगर व्यवस्था की खामी से खफा हर कोई इसी तरह बंदूक उठा ले। तो फिर व्यवस्था कहां रह जाएगी? चारों तरफ अराजकता ही अराजकता का माहौल होगा। अगर वाकई व्यवस्था से लडऩा है, तो व्यवस्था में घुसना होगा। समाज की मुख्यधारा में शामिल होकर ताकत दिखानी होगी। अगर बंदूक के जरिए व्यवस्था को झुकाया जाने लगा। तो क्या भरोसा, कल को माओवादी व्यवस्था में कोई बंदूक नहीं उठाएगा? पर असलियत तो यह, नक्सलवाद अपनी राह से भटक चुका। नक्सलबाड़ी से आंदोलन की शुरुआत करने वाले कानू सान्याल अंतिम दिनों में इसी भटकाव से आहत थे। अब मंगलवार को देश पर सबसे बड़ा नक्सली हमला हुआ। सीरआरपीएफ के 80 से ज्यादा जवान मौत के घाट उतार दिए गए। तो दिल्ली में नक्सल समर्थक जायज ठहराने को सडक़ों पर उतर आए। ऑपरेशन ग्रीन हंट को नाजायज ठहराया, पर सुरक्षा बलों की हत्या को जायज। अब ये समर्थक कोई और नहीं। कहीं कोई नक्सली या आतंकी सजा पा जाए। तो ये फौरन मानवाधिकार का राग अलापेंगे। क्या देश की मासूम जनता का कोई मानवाधिकार नहीं? क्या देश की सुरक्षा में अपना जीवन न्योछावर करने वाले जवानों का कोई मानवाधिकार नहीं? आखिर कब तक सुरक्षा बल कुर्बानी देते रहेंगे? सुरक्षा बल भी इंसान हैं, उनका भी परिवार है। पर नक्सलियों को अपने निजी स्वार्थ के सिवा कुछ नहीं दिख रहा। यों जैसी नक्सली मानसिकता, वैसी ही अपनी राजनीति भी। हर चीज को वोट के चश्मे से देखते हैं राजनीतिक दल। तभी तो वाजपेयी राज में नक्सलियों के खिलाफ शुरु हुआ युनीफाइड कमांड ऑपरेशन यूपीए की पहली पारी में पूरी तरह से ठप रहा। तबके होम मिनिस्टर नक्सलियों को अपना भाई बता समझाने का प्रवचन संसद में देते रहे। अबके चिदंबरम ने ऑपरेशन ग्रीन हंट शुरु किया, तो एक्शन से ज्यादा बयानबाजी करते दिखे। नक्सलवाद और आतंकवाद जैसे अहम मुद्दे पर भी कभी राजनीतिक एकता नहीं दिखती। अलबत्ता सुविधा की राजनीति सबको मुफीद। झारखंड में शिबू-बीजेपी की सरकार नक्सलियों के प्रति नरमी दिखाती। तो बीजेपी जुबान सिल कर बैठ जाती। अब बीजेपी शासित छत्तीसगढ़ के दांतेवाड़ा में हमले हुए। तो सरकार के हर एक्शन को ब्लैंक समर्थन का एलान कर दिया। यों राजीव प्रताप रूड़ी फिर भी राजनीति कर ही गए। कहा, चिदंबरम के तौर-तरीकों से सहमत नहीं। पर फिलहाल राजनीति नहीं करेंगे। अब आप इसे राजनीति नहीं कहेंगे, तो क्या कहेंगे। सरकार में शामिल ममता बनर्जी तो ग्रीन हंट के खिलाफ ही थीं। ममता का मन रेल भवन में नहीं लग रहा। वह तो रेल भवन से सीधे रायटर्स बिल्डिंग के लिए रेलवे लाईन बिछा रहीं। सो उनकी नजर में ऑपरेशन ग्रीन हंट नहीं, अलबत्ता रेड हंट है। पर अब नक्सलियों ने तांडव मचाया, तो ममता सर्वदलीय मीटिंग की मांग कर रहीं। अब आप ही सोचो, सर्वदलीय मीटिंग में क्या होगा? क्या नेता नक्सलियों से लडऩे जाएंगे? नेताओं को तो सिर्फ वोट बैंक साधाना आता। बाकी देश और व्यवस्था जाए भाड़ में। तभी तो मंगलवार को 80 से ज्यादा सुरक्षा बल मारे गए। तो सरकार की ओर से वही घिसा-पिटा बयान आया। नक्सली मर्डरर हैं। मुंहतोड़ जवाब देंगे। सघन कार्रवाई करेंगे। नक्सलियों को बख्शा नहीं जाएगा। आदि....आदि......। अब ऐसे बयानों से कब तक जनता को ठगेंगे नेता? इससे पहले 2005 में दांतेवाड़ा में ही 30 जवानों को नक्सलियों ने उड़ा दिया था। फिर 2007 में बीजापुर में 55 जवान मारे गए। पिछले साल जुलाई में 29 पुलिस वाले मारे गए थे। नक्सलवादियों का दावा देश के 165 जिले उनके नियंत्रण में। सिर्फ 2006 का आंकड़ा बताता है, नक्सलवादियों ने 930 से ज्यादा हमले किए। इन हमलों में हजारों निर्दोष लोग मारे गए। जबकि 2002 में 1465, 2003 में 1597, 2004 में 1533 और 2005 में 1608 जगहों पर नक्सली हमले हुए। याद है, मार्च 2007 में झामुमो के सांसद सुनील महतो को नक्सलियों ने मंच पर चढक़र गोलियों से भून दिया था। अब फिर हर बार की तरह गृह मंत्रालय नक्सल प्रभावित राज्यों के पुलिस प्रमुखों की बैठक करेगा। पीएम भी मुख्यमंत्रियों के साथ शायद बात करें। हर बार की तरह तल्खी दिखेगी और फिर कैलेंडर का पन्ना बदलते ही सबकुछ बदल जाएगा। सो अब कोई क्या कहे, अगर नक्सली अपनी राह से भटक चुके। तो राजनीति भी संभली हुई नहीं।
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06/04/2010

Monday, April 5, 2010

बैठक नहीं, बिल पर 'बैठने' की तैयारी कहिए

बजट सत्र पार्ट-टू के प्रोमो दिखने लगे। अब संसद के सुनहरे पर्दे पर दिखने वाली फिल्म पार्ट-वन का सिक्वल होगी। या कुछ नयापन होगा, यह तो वक्त आने पर ही मालूम पड़ेगा। पर फिल्म के प्रसारण की तैयारी शुरु हो गई। महिला बिल पर सोमवार को सर्वदलीय बैठक हुई। तो नतीजा वही ढाक के तीन पात रहे। यादवी तिकड़ी टस से मस नहीं हुई। अलबत्ता सरकार की सहयोगी ममता बनर्जी ने छौंका लगा दिया। यादवों का हौंसला बढ़ाने को खड़ी हो गईं। यों ममता बिल के साथ, पर दिल से नहीं। महिला आरक्षण के खिलाफ नहीं, पर पश्चिम बंगाल के चुनाव की तैयारी में लगीं। सो उनने बिल में अल्पसंख्यक आरक्षण का तडक़ा लगा दिया। प्रणव मुखर्जी की रहनुमाई में संसद भवन में बैठक हुई। सरकार की ओर से प्रणव, चिदंबरम, मोईली, पवन बंसल, पृथ्वीराज चव्हाण, ममता, पवार, नारायणसामी मौजूद थे। पर ममता ने छौंक लगाई, तो पवार मुस्कराते दिखे। इसे कहते हैं- घर को आग लगी घर के ही चिराग से। बैठक बुलाई विरोधियों को मनाने के लिए। पर अपने ही विरोधी के पाले में जा बैठे। सो अब बीजेपी ने भी राजनीतिक पेच फंसा दिया। यादवी तिकड़ी ने कोटा के भीतर पिछड़ी-अल्पसंख्यक महिला का कोटा हुए बिना बिल पर राजी नहीं। तो अब बीजेपी कह रही, कोटा के भीतर कोटा मंजूर नहीं। सुषमा स्वराज ने तो बाकायदा गिल फार्मूले का राग अलाप दिया। यानी राजनीतिक दल खुद ही 33 फीसदी महिलाओं को टिकट दें। पर आधा सफर तय करने के बाद कोई वापस घर लौटे और फिर मंजिल तय करने की बात कहे, तो उसे आप क्या कहेंगे? यों सुषमा का इसमें कोई कसूर नहीं। अलबत्ता महिला बिल पर बीजेपी खुद से दो-चार हो रही। बीजेपी में कई ऐसे नेता, जो मौजूदा बिल के खिलाफ झंडा उठाए खड़े। याद है ना, जब राज्यसभा में बिल पास हुआ था। तब बीजेपी ने अंदरुनी बवाल थामने को आडवाणी के घर मीटिंग भी बुलाई थी। पर मीटिंग में सुषमा-मेनका की तीखी झड़प हो गई। कई सांसदों ने अपने नए नेतृत्व पर सवाल भी उठा दिए। सो बीजेपी अब हर कदम फूंक-फूंक कर रख रही। तभी तो सुषमा ने सोमवार को नया पेच फंसाया। आम राय के पक्ष में, पर कोटा के भीतर कोटा नामंजूर। अब आप ही देखो, न नौ मन तेल होगा, न राधा नाचेगी। विरोधी कोटा की जिद छोडऩे का राजी नहीं। तो बीजेपी कोटा के खिलाफ मुखर हो उठी। इतना ही नहीं, बीजेपी मार्शल इस्तेमाल के भी खिलाफ। अब सरकार की मुश्किल तो बढनी तय। अव्वल तो मार्शल बुलाकर बिल पास कराने की हिम्मत नहीं। अगर किया भी, तो अबके बीजेपी साथ नहीं देगी। अगर हंगामे के बीच वोटिंग कराया, तो हिंसक हंगामे से कोई इनकार नहीं कर सकता। राज्यसभा में तो महज सात हंगामाई थे। जिनने चेयरमैन की माइक तोड़ दी। फाइलों को गेंद की तरह उछाला। कमाल अख्तर ने तो कांच का गिलास सदन में तोड़ नस काटने तक की कोशिश की थी। सो सात बवालियों को सदन से बाहर फिंकवाने के लिए सरकार ने करीब 70 मार्शल सदन में बुलाए। पर लोकसभा में तस्वीर दूसरी। मुलायम, लालू, शरद और माया के ही सिपहसलारों को मिलाकर करीब 70 सांसद। ममता के 19 सांसद अभी छोड़ दें। तो क्या 70 सांसदों को सदन से बाहर निकलवाने के लिए 700 मार्शल बुलाए जाएंगे? अगर बुलाया भी तो, लोकसभा में इतनी जगह कहां होगी? क्या मार्शलों के लिए भी अलग से लोकसभा बनेगी? पर कांग्रेस इतनी हिमाकत दिखा पाएगी, यह संभव नहीं दिखता। अगर मार्शल नहीं बुलाया, तो मौजूदा बिल का पास होना संभव नहीं दिखता। यह बात कांग्रेस भी बाखूबी समझ रही, बीजेपी भी। सो फिलहाल बैठक-बैठक खेल रहे हैं राजनेता। कांग्रेस भी माहौल बना रही। विधि मंत्री वीरप्पा मोईली कई दफा कह चुके। बिना किसी बदलाव के दूसरे पार्ट में लोकसभा में बिल लाएंगे। अब कोई पूछे. जब कोई बदलाव नहीं करना। सरकार के पास कोई नया आईडिया नहीं। तो फिर काहे की सर्वदलीय बैठक बुलाई? अब फिर बैठक बुलाने का एलान। तो क्या बिल विरोधियों का स्टैंड सरकार या कांग्रेस को मालूम नहीं। आखिर जो स्टैंड 14 साल में नहीं बदला। वह क्या एक-दो बैठकों में बदल जाएगा? सो सोमवार की बैठक भी फेल हुई। पर यों कहिए कि कांग्रेस हो या बीजेपी या लेफ्ट या बाकी बिल विरोधी, सबकी इच्छा पूरी हो रही। सभी महिला आरक्षण के पक्ष में। पर फिर वही कहावत- पंचों की राय सिर माथे, पर पतनाला वहीं लगेगा। यादवी तिकड़ी को कोटा में कोटा चाहिए। अब बीजेपी को कोटा नहीं चाहिए। तो आखिर रास्ता क्या निकले? अगर सरकार कोटा में कोटा को राजी भी हो जाए। तो बीजेपी पेच फंसाएगी। या विरोधी किसी दूसरे फार्मूले पर राजी हो गए। तो कांग्रेस अपना मजबूत इरादा दिखाने को फिर पुराने बिल का ही राग अलाप देगी। यानी महिला बिल नहीं, सहुलियत की राजनीति सबका फार्मूला। सो बजट सत्र के दूसरे हिस्से में कांग्रेस भी राजनीति करेगी। महिला बिल एजंडे में शामिल होगा, उस दिन हाई-वोल्टेज ड्रामा और आखिर में ठंडे बस्ते का मुंह खुल जाएगा। पर बिल कब एजंडे में आएगा? अपना मानना तो यही, जिस दिन 21 अप्रैल को बीजेपी महंगाई के खिलाफ दस लाख लोगों के साथ संसद के घेराव का खम ठोक रही। हो न हो, लोकसभा के एजंडे में उस दिन महिला बिल शामिल हो जाए। ताकि अपने टीवी चैनलों का एके-47 संसद में ही रहे, बाहर न जाए। सो कुल मिलाकर बैठक-बैठक खेल बिल पर बैठने की तैयारी में हैं अपने नेतागण। --------
05/04/2010

Wednesday, March 31, 2010

तो आधुनिक ‘शाहजहां’ अभी नहीं छोडेंगे पद!

विरासत की राजनीति कहें या राजनीतिक विरासत। करुणानिधि परिवार में फिर जंग शुरु हो गई। करुणानिधि के बड़े बेटे अझागिरी ने फिर नेतृत्व का सुर्रा छोड़ा। करूणा के सिवा किसी को नेता न मानने का एलान कर दिया। तो इशारा साफ तौर से छोटे भाई स्टालिन के मंसूबों पर पानी फेरना था। सो बुधवार को खुद करुणा का बयान आया। कह दिया- नए नेतृत्व का फैसला पार्टी करेगी, यह उनका हक नहीं। अब क्षेत्रीय दलों में नेतृत्व कैसे तय होता, यह छुपाने की बात नहीं। पर मौका मुफीद न देख करुणा ने फिलहाल विवाद पर पानी डालना बेहतर समझा। यों कब तक विवाद को थामने की नाकाम कोशिश करेंगे करुणानिधि। वैसे करुणानिधि की इच्छा तमिलनाडु ही नहीं, देश के लोगों को भी मालूम। सो उनने केंद्र में मनमोहन सरकार को समर्थन की वसूली परिवार के झगड़े निपटाने में ही की। कभी भतीजे दयानिधि मारन को मंत्री बनाया। जून 2007 में अपनी बेटी कनीमोझी को राज्यसभा भिजवाया। मनमोहन की दूसरी पारी में अझागिरी को केबिनेट मंत्री बनवाया। ताकि राज्य में स्टालिन अपनी स्थिति और मजबूत कर सकें। पर अझागिरी का मन दिल्ली से ज्यादा चेन्नई में। सो तीन साल बाद उनने फिर उत्तराधिकार का सुर्रा छोड़ दिया। तीन साल पहले यानी मई 2007 की घटना। तब यहीं पर लिखा था- च्करुणानिधि कहीं दूसरे शाहजहां न बन जाएं।ज् अब सनद रहे, सो वही कहानी फिर बताते जाएं। तब जंग की शुरुआत ‘दिनाकरण’ अखबार में छपे सर्वेक्षण से हुई थी। सर्वेक्षण एसी नेल्सन एजेंसी के सहयोग से हुआ था। सर्वेक्षण का नाम था- ‘मक्कल मनासू’ यानी जनता की सोच। सर्वेक्षण में करुणानिधि के बड़े बेटे एमके अझगिरी को सिर्फ दो फीसदी जनता ने उत्तराधिकारी माना। जबकि छोटे बेटे एमके स्टालिन को 70 फीसदी ने। वैसे दयानिधि मारन को भी 20 फीसदी लोगों ने करुणानिधि का उत्तराधिकारी माना। पर सर्वेक्षण एमके अझगिरी को रास नहीं आया। सो अझगिरी समर्थकों ने मदुरई स्थित अखबार के दफ्तर पर धावा बोल दिया। पेट्रोल बम से आग लगा दी। दो कंप्यूटर आपरेटर और एक सुरक्षा गार्ड मारा गया। अखबार किसी बाहरी का नहीं। अलबत्ता मारन बंधुओं का ही था। सो सत्ता और परिवार के घालमेल में केस दब गया। करुणानिधि तभी रिटायरमेंट की जुगत में थे। पर बड़े बेटे के विद्रोह ने कुर्सी पर बिठाए रखा। यों बाद में करुणानिधि ने स्वास्थ्य वजहों को ही आधार बना स्टालिन को डिप्टी सीएम बना लिया। अझागिरी को केंद्र में मंत्री बनवा दिया। फिर भी उत्तराधिकार की जंग खत्म नहीं हो रही। अब अगर पार्टी के नाम पर या अपनी पसंद के नाम पर करुणानिधि ने स्टालिन को चुना। तो बगावत तय समझिए। विरासत की राजनीति का आखिर यही हश्र होता है। यही हुआ था मुगल शासक शाहजहां के साथ। वाकई शाहजहां और करुणानिधि में काफी चीजें ऐसी, जो मेल खाती। शाहजहां के भी चार बेटे थे। करुणानिधि के भी चार। वैसे करुणानिधि की दो बेटियां भी। करुणानिधि ने तीन शादियां कीं। पहली बीवी से एक बेटा एमके मुत्थू। दूसरी बीवी दयालू अम्मा से एक बेटी, तीन बेटे। तीसरी बीवी रजाथी से एक बेटी कनीमोझी जो अब राज्यसभा में। शाहजहां के भी चार बेटे थे- दारा, शुजा, औरंगजेब और मुराद। चारों में दारा सबसे बुद्धिमान। शाहजहां दारा को ही उत्तराधिकारी बनाना चाहते थे। पर जैसे अपने करुणानिधि एलान नहीं कर रहें, शाहजहां ने भी नहीं किया। वैसे जनता में दारा को ही युवराज माना जाता था। जैसे तमिलनाडु में स्टालिन माने जा रहे। करुणा ने भी अपने बेटे-बेटियों को राजनीति में अलग-अलग मुकाम दे रखा। जैसे शाहजहां ने चारों बेटों को चार प्रांतों की कमान सौंप रखी थी। उत्तर में दारा, पूर्व में शुजा, दक्षिण में औरंगजेब और पश्चिम में मुराद। सितंबर 1657 में शाहजहां बीमार पड़े। तो अफवाह फैली- शाहजहां की मृत्यु अवश्यंभावी। दारा उस वक्त पिता के पास था। सो शुजा, औरंगजेब और मुराद ने गोटियां भिड़ाई। सबसे पहले शुजा ने खुद को सम्राट घोषित कर दिल्ली कूच किया। फिर मुराद भी शुजा की राह पर चल पड़े। पर औरंगजेब ने खुद को सम्राट घोषित नहीं किया। दिल्ली कूच जरूर किया। शाहजहां ने इन तीनों बागी राजकुमारों को वापस लौटने का फरमान सुनाया। पर राजकुमार नहीं माने। मजबूरन शाहजहां ने शाही फरमान की अवज्ञा पर सैन्य कार्रवाई की। फरवरी 1658 में शाही सेना के हाथ बनारस के निकट शुजा पराजित हुए। इस बीच औरंगजेब ने तिकड़मी चाल चली। भाई मुराद से समझौता कर लिया। अब दोनों की मिलीजुली सेना ने शाही सेना का मुकाबला किया। अप्रैल 1658 में शाही सेना औरंगजेब से पराजित हुई। इतिहास में इसे ‘धरमत की लड़ाई’ के नाम से जाना जाता है। यही नहीं, औरंगजेब अब और आगे बढ़ा। अगले महीने ही अपने बड़े भाई दारा को युद्ध में परास्त किया। दारा-औरंगजेब की लड़ाई इतिहास में ‘सामूगढ़ का युद्ध’ के नाम से मशहूर। अब जब औरंगजेब के रास्ते साफ हो गए। तो उसने मुराद को बंदी बना लिया। दिल्ली पर औरंगजेब का कब्जा हो गया। सिंहासन में कोई कील न हो, सो औरंगजेब ने मुराद और दारा को मृत्यु दंड दे दिया। उत्तराधिकार की लड़ाई में औरंगजेब ने किला फतह किया। पर तमिलनाडु में करुणानिधि के उत्तराधिकारी बनने की जंग कौन सा नया इतिहास रचेगी, यह तो आने वाला वक्त ही बताएगा।
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31/03/2010

Monday, March 29, 2010

ब्रांड एंबेसडर बनाम राजनीति का टुच्चा ब्रांड

बांद्रा-वर्ली सी लिंक आखिर कुरुक्षेत्र बन गया। कांग्रेस ने तमाम आलोचनाएं तो सह लीं। पर जब नरेंद्र मोदी ने मोर्चा खोल दिया, तो पेट में गुडग़ुड़ी होनी ही थी। मोदी ने शनिवार को एसआईटी के सामने करीब दस घंटे बिताए। तो इतवार को आईपीएल मैच का लुत्फ उठाया। फिर देर रात सरकारी वेबसाइट पर बयान जारी हो गया। अमिताभ पर सवाल उठाने वाले तालिबानी मानसिकता के। यानी मोदी ने कांग्रेस की सोच को तालिबानी करार दिया। सो अब तक अमिताभ का सैद्धांतिक विरोध कर रही कांग्रेस ने सीधे बच्चन पर हल्ला बोल दिया। पहले अंबिका सोनी ने मोदी को हताश बताया। तो शाम को कांग्रेस प्रवक्ता मनीष तिवारी पूरी तैयारी के साथ पहुंचे। अब कांग्रेस को मालूम, मोदी के मुंह लगे, तो मुंहजोरी होनी तय। सो अमिताभ से सवाल पूछा। कहा- च्पहले ब्रांड एंबेसडर के नाते अमिताभ बताएं, गुजरात दंगे पर उनकी क्या राय। क्या वह गुजरात दंगे की निंदा करते हैं या मोदी और उनकी सरकार की पीठ थपथपाते हैं?ज् अब अमिताभ हों या कोई और, दंगे की निंदा सभी करेंगे। पर कांग्रेस ने बतौर एंबेसडर सवाल पूछा, ताकि वाया अमिताभ फिर मोदी को घेर सके। वरना दंगे पर राय पूछने वाले सवाल का अभी क्या औचित्य। कांग्रेस शायद भूल रही, अमिताभ गुजरात के पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए ब्रांड एंबेसडर बने। किसी दंगे को सही ठहराने के लिए नहीं। यों मोदी की वजह से कांग्रेस अमिताभ से भी खार खाए नहीं बैठी। दो दशक से भी ज्यादा हो चुके, बच्चन परिवार के प्रति कांग्रेस का नजरिया जगजाहिर। यों इस आधार पर ब्रांड एंबेसडर तय होने लगे। तो फिर किसी को भी कांग्रेस सरकार का ब्रांड एंबेसडर नहीं बनना चाहिए। अगर कांग्रेस राज में देश के कई हिस्सों में हुए दंगों को छोड़ दें। तो भी 1984 के सिख विरोधी दंगे को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। खुद कांग्रेस के वर्करों ने सिखों के नरसंहार में भूमिका निभाई। तब पीएम राजीव गांधी ने जो कहा था, कोई नहीं भुला सकता। उन ने कहा था- जब कोई बड़ा पेड़ गिरता है, तो धरती हिलती ही है। कैसे सिख समुदाय को घरों से निकाल कर जिंदा जलाया जा रहा था। गले में जलते टायर डाले जा रहे थे। उस नरसंहार को 25 साल हो चुके। पर अब तक पीडि़तों को न्याय नहीं मिला। कांग्रेस ने माफी भी तब मांगी, जब देश का पीएम सिख समुदाय से बना। नानावती रपट के बाद जब जगदीश टाइटलर को केबिनेट से इस्तीफा देना पड़ा। तो बहस के दौरान राज्यसभा में मनमोहन सिंह ने सिख समुदाय और देश से माफी मांगी। क्या प्रायश्चित के लिए कांग्रेस सिख पीएम का इंतजार कर रही थी? क्या 1984 के बाद और मनमोहन के पीएम बनने से पहले कांग्रेस का जमीर नहीं जागा? अब अगर कांग्रेस अमिताभ से सवाल पूछ रही, राजनीति में घसीटने की कोशिश कर रही। तो इतिहास के कुछ सवालों के जवाब कांग्रेस को भी देना चाहिए। ऑपरेशन ब्लू स्टार के वक्त कैप्टेन अमरेंद्र सिंह ने राज्यसभा की सांसदी और कांग्रेस क्यों छोड़ दी थी? प्रख्यात लेखक खुशवंत सिंह ने तो पद्मश्री भी लौटा दिया था। तो क्या यह मान लिया जाए, इन दोनों का विरोध आतंकवाद को समर्थन देने वाला था? या फिर इंदिरा गांधी का ऑपरेशन ब्लू स्टार गलत था? इंदिरा गांधी की हत्या के बाद सिखों का नरसंहार किया गया। पर आज भी इंदिरा के हत्यारे सतवंत और बेअंत सिंह एसजीपीसी के म्यूजियम में शहीदों में शुमार। जिस भिंडरांवाला को देश विरोधी माना गया, खुद इंदिरा गांधी ने पंजाब विधानसभा चुनाव के वक्त मुकेरियां की एक जनसभा में मंच शेयर किया था। ऐसे सवाल तो कई होंगे, पर इतिहास से सबक लेकर आगे बढऩा चाहिए। ना कि इतिहास को ढाल बनाकर नाजायज को जायज ठहराया जाना चाहिए। अगर अमिताभ महाराष्ट्र सरकार के न्योते पर सी लिंक के दूसरे उद्घाटन समारोह में गए। तो इसमें मोदी कहां से आ गए। अगर मोदी के साथ अमिताभ के मंच शेयर करने पर कांग्रेस को एतराज। तो फिर इतवार को ही सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस के.जी. बालाकृष्णन ने भी मंच शेयर किया। अब मोदी के साथ खड़े अमिताभ कांग्रेस की नजर में गलत। तो क्या चीफ जस्टिस पर भी सवाल उठेंगे? अगर यही राजनीति का पैमाना, तो विरोध की जगह छुआछूत जगह लेगी। अपने संविधान में छुआछूत को दूर करने के लिए विशेष बंदोबस्त किए गए। पर राजनीति की छुआछूत कैसे दूर होगी? आखिर अमिताभ ने कुछ ऐसा नहीं किया, जो इतना बखेड़ा हो। पर बेवजह की राजनीति करना शायद कांग्रेस की फितरत हो गई। सो अब इसे टुच्चई की राजनीति कहें या राजनीति का टुच्चापन, आप ही तय करें। अब कांग्रेस अमिताभ के निजी व्यक्तित्व के सम्मान की दलील दे रही। तो सवाल, अमिताभ से दिक्कत थी, पर अर्थ ऑवर प्रोग्राम से अभिषेक कैसे गायब हो गए। अभिषेक तो गुजरात के ब्रांड एंबेसडर नहीं। फिर भी शीला सरकार ने प्रोग्राम से अभिषेक के पोस्टर-क्लिपिंग हटवा दिए। अब यह कैसी एलर्जी, पर्यावरण-वन मंत्री जयराम रमेश बाघ बचाओ कार्यक्रम में इसलिए नहीं गए कि अमिताभ वहां थे। महाराष्ट्र के सीएम अशोक चव्हाण तो इतना सहम गए, मराठी साहित्य सम्मेलन में अमिताभ का सामना न हो, सो एक दिन पहले ही शिरकत कर आए। अब दस जनपथ को खुश करने के लिए इसे कैसी राजनीति कहेंगे। पर नैतिकता की उम्मीद किससे। सोमवार को सोनिया गांधी फिर एनएसी की चेयर परसन हो गईं। साल 2006 में लाभ के पद विवाद में फंसीं। तो सांसदी और एनएसी छोड़ दी थी। अब चार साल बाद उसी कुर्सी पर विराजमान होने का क्या मतलब?
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29/03/2010