कॉमनवेल्थ घोटाला हो या कश्मीर की किचकिच, खत्म नहीं होने वाली। पर पहले बात घोटाले की। तो जरा कॉमनवेल्थ के आयोजन से हुए फायदे को देखिए। अपने भारत की रैंकिंग ग्लोबल करप्शन इंडेक्स में 84 वें से 87 वें पर पहुंच गई। यानी करप्शन में अपना देश सीधे तीन पायदान छलांग मार गया। बेचारा चीन ओलंपिक कराने के बाद भी 78वें नंबर पर झक मार रहा। सचमुच ऐसे दो-चार कॉमनवेल्थ और हो गए। तो भ्रष्टाचारी देशों की सूची में अपना भारत अव्वल होगा। वैसे भी भ्रष्टाचारियों पर अपने यहां कार्रवाई गाहे-ब-गाहे ही होती। अब देख लो, कॉमनवेल्थ गेम्स को निपटे तेरह दिन हो गए। पर इसे जांच की तेरहवीं न कहें, तो और क्या कहें। अभी तक पीएम की बनाई शुंगलू कमेटी ने जांच का खाका तक नहीं बनाया। कुछ और वक्त लगने की बात कर रहे। यानी तब तक कलमाड़ी-शीला-जयपाल-गिल-अंबिका एंड कंपनियों को कागज बदलने को काफी वक्त मिल जाएगा। अब कोई पूछे, देश को कब तक यों ही लूटते रहेंगे नेता-नौकरशाह? भ्रष्टाचारी देशों की सूची में भारत लगातार आगे बढ़ रहा। फिर भी नेताओं को शर्म नहीं आ रही। अब तो ऐसा लग रहा, कोई उम्दा खरीददार मिल जाए, तो ये देश को भी बेचने से नहीं चूकेंगे। कश्मीर पर जिस तरह राष्ट्र विरोधी बयानों का दौर शुरू हुआ, इस अंदेशे की पुष्टि कर रहा। अलगाववादी नेता सैयद अली शाह गिलानी और अरुंधती राय ने 21 अक्टूबर को दिल्ली में सेमिनार कर आजाद कश्मीर की अलख जगाई। जब सेमिनार में कुछ देशभक्तों ने तिरंगे झंडे लहराए। तो चिदंबरम की दिल्ली पुलिस ने झंडा लहराने वालों को बाहर कर राष्ट्र विरोधियों को संरक्षण दिया। अब गिलानी-अरुंधती के बोल ने केंद्र सरकार को मुश्किल में डाला। तो राष्ट्रद्रोह का मुकदमा चलाने की मंजूरी देनी पड़ी। पर एफआईआर दर्ज करने में अभी इफ एंड बट का खेल। सरकार को डर, गिरफ्तारी से कोई बवाल न मच जाए। सरकार की ऐसी ही लचर नीतियों ने अलगाववाद को हमेशा शह दी। तभी तो देश विरोधी बयान देने के बाद भी अरुंधती राय को कोई मलाल नहीं। अलबत्ता भारत को ही धता बता रहीं। केंद्रीय गृह मंत्रालय ने मुकदमे की हरी झंडी दी। तो अरुंधती राय ने बयान जारी कर कह दिया- मैंने लाखों लोगों के न्याय की बात कही। पर जिस देश में न्याय मांगने वालों को जेल भेजने की बात हो। ऐसे देश में मुझे दया आती है। अब अगर अरुंधती को सचमुच देश पर दया आ रही। तो क्यों नहीं पाकिस्तान की नागरिकता लेकर पीओके में हो रहे जुल्म के खिलाफ आवाज उठातीं? अभिव्यक्ति की आजादी का मतलब यह नहीं, कोई राष्ट्र विरोधी बयान देना शुरू कर दे। खुद विधि मंत्री वीरप्पा मोइली ने गिलानी और अरुंधती की टिप्पणी को अत्यधिक दुर्भाग्यपूर्ण करार दिया। सीधे-सीधे उन ने देशद्रोह बता दिया। पर सवाल, कार्रवाई में इतनी देरी क्यों? जम्मू-कश्मीर के पूर्व सीएम और केंद्रीय मंत्री फारुख अब्दुल्ला ने भी माना। अभिव्यक्ति की आजादी का बेजा इस्तेमाल हो रहा। फारुख बेलौस बोले- हिंदुस्तानी ही हिंदुस्तान का बेड़ा गर्क कर रहे। कुछ लोग आजादी की अभिव्यक्ति का इस कदर फायदा उठा रहे, जिसकी कोई सीमा नहीं। तो इसमें फारुख क्या करें। यों बेजा इस्तेमाल की बात तो फारुख ने सोलह आने सही कही। पर वह कुछ भी करने में असक्षम, यह सही नहीं। फारुख के बेटे उमर ही जम्मू-कश्मीर के सीएम। अगर वोट बैंक की राजनीति छोड़ दें, तो अलगाववादियों पर नकेल कसना कोई बड़ी बात नहीं। पर खुद उमर ने विधानसभा के भीतर अभिव्यक्ति की आजादी का कैसा इस्तेमाल किया, क्या फारुख ने नहीं देखा? जब उमर कश्मीर के विलय पर सवालिया निशान लगा रहे थे, तब फारुख ने क्या किया? घाटी में जाकर फारुख हों या पडगांवकर या मनमोहन, वही बात करते, जो अलगाववादियों को पसंद। सो कश्मीर सिर्फ राजनीति का मुद्दा बनकर रह गई। कांग्रेस इस कदर फंस चुकी कि अरुंधती की हैसियत पर सवाल उठा उनका निजी बयान बता रही। पर बीजेपी ने हमेशा की तरह पडगांवकर से लेकर अरुंधती-गिलानी के खिलाफ मोर्चा खोल दिया। यों बीजेपी के भीतर विभीषणों की कमी नहीं। राम जेठमलानी ने पार्टी लाइन के उलट पडगांवकर का समर्थन किया। बीजेपी के बयानों को बचकाना और अशिष्ट हरकत कह गए। पर बेचारी बीजेपी कुछ नहीं कर पाई। खाल बचाने को प्रकाश जावडेकर बोले- जेठमलानी तो जेठमलानी हैं। वह उनकी निजी राय, पार्टी सहमत नहीं। पर कोई पूछे, अगर जेठमलानी को बीजेपी अशिष्ट और बचकानी नजर आ रही। तो उसके टिकट से सांसद क्यों बने हुए? बीजेपी को भी जेठमलानी की राय पार्टी लाइन के इतर दिख रही। तो कार्रवाई क्यों नहीं कर रही? अपने जसवंत सिंह को निजी हैसियत से किताब लिखने पर इसी बीजेपी ने बर्खास्त कर दिया था। जसवंत पर विचारधारा के उलट काम करने का आरोप लगाया। पर जेठमलानी क्या कर रहे? जातीय जनगणना हो या इस्लामाबाद में हुई कृष्णा-कुरैशी की साझा प्रेस कांफ्रेंस में कृष्णा की चुप्पी का मसला। भरी सभा में जेठमलानी ने अपनी ही बीजेपी का चीरहरण किया। पर जेठमलानी के हाथ चीरहरण करवा बीजेपी को मजा आ रहा। राज्यसभा में पांच अगस्त को जेठमलानी ने एसएम कृष्णा की सराहना की थी। अब पडगांवकर का बचाव कर रहे। पर बीजेपी निजी विचार बता भाग नहीं सकती। कश्मीर के मसले पर जब पीएम से बीजेपी का डेलीगेशन पिछली बार मिला। तो आडवाणी-जेतली-सुषमा के साथ चौथे अहम शख्स जेठमलानी ही थे। सो कश्मीर पर जेठमलानी की राय को बीजेपी निजी बताकर भाग नहीं सकती।
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26/10/2010
Tuesday, October 26, 2010
Monday, October 25, 2010
कश्मीर की ‘कील’ पर बयानों का हथौड़ा
मंगलवार को तिरेसठ साल पूरे हो जाएंगे कश्मीर के भारत में विलय को। छब्बीस अक्टूबर 1947 को विलय पत्र पर महाराजा हरि सिंह ने दस्तखत किए थे। पर यह कश्मीर का दुर्भाग्य, कहने को तो धरती का स्वर्ग। पर कभी अमन-चैन नहीं रहा। घाटी कभी अमेरिका-ब्रिटेन की कुटिल कूटनीति की, तो कभी अपने सियासतदानों के वोट बैंक की राजनीति की शिकार हुई। जब भारत आजाद हुआ, तब दुनिया दो हिस्सों में बंटी थी। सो अंग्रेजों ने रणनीति के तहत पहले भारत के दो टुकड़े करवाए। फिर रियासत-ए-कश्मीर को भारत-पाक के बीच हमेशा के लिए विवाद का मुद्दा बना दिया। अब अमेरिका अपनी सहूलियत के मुताबिक कभी पाक को शह देता। तो कभी हाथी के दिखाने वाले दांत की तरह भारत के साथ थोथी सहानुभूति। पर जब घर दुरुस्त न हो, तो बाहर वाले मजा उठाएंगे ही। जम्मू-कश्मीर के तथाकथित होनहार और युवा सीएम उमर अब्दुल्ला ने अपनी कुर्सी बचाने को कश्मीर के विलय पर ही सवाल उठा दिए थे। सो ऐसी बहस छिड़ी, अब सुर्खियां पाने को तथाकथित मानवाधिकारवादी झोला-झंडा उठाए निकल पड़े। अरुंधती राय पहले नक्सलवादियों के पक्ष में बोल सुर्खियां बटोर चुकीं। तो भला कश्मीर की आग में भुट्टा सेकने से क्यों चूकतीं? सो उन ने भी कश्मीर के विलय पर सवाल उठा दिए। अरुंधती राय ने भारत सरकार को ब्रिटिश साम्राज्यवाद का प्रतिरूप बता दिया। आरोप लगाया- पूर्वोत्तर में असंतोष को दबाने के लिए सेना में भर्ती कश्मीरियों का, तो कश्मीरियों की आवाज दबाने के लिए सेना में भर्ती पूर्वोत्तर के लोगों का इस्तेमाल कर रही सरकार। अब अरुंधती राय के बयान का मतलब आप खुद निकालें। पर अरुंधती से एक सवाल, क्या कश्मीर को पाक के हवाले कर देना चाहिए? अरुंधती तो काफी पढ़ी-लिखी और इतिहास को समझने वाली। फिर कश्मीर के इन हालात के लिए कौन जिम्मेदार, यह नहीं जानतीं? पाक ने कश्मीर को हथियाने के लिए तब खूब तिकड़म की। जिन्ना ने अपने अंग्रेज सैन्य सचिव को तीन बार महाराजा के पास भेजा। जिन्ना ने जबरन विलय की रणनीति भी बना ली थी। पाकिस्तानी कबाइलियों की घुसपैठ बढ़ गई थी। फिर भी कामयाबी नहीं मिली, तो पाक ने हमला बोल दिया। तब महाराजा हरि सिंह ने सूझ-बूझ दिखा भारत में विलय का फैसला लिया। फिर भारतीय सेना ने श्रीनगर पहुंच पाक कबाइलियों को मार भगाया। अब अरुंधती बताएं, किसने कश्मीर की आजादी को दासता में बदलने की कोशिश की? अपने देश में सचमुच कथित मानवाधिकावारियों ने राष्ट्र विरोधी बयान देना अपना फैशन बना लिया। नक्सलवादी हों या अलगाववादी, अगर सरकार वार्ता को राजी। तो फिर हिंसा क्यों नहीं छोड़ते? कुछ हिस्सों का विकास से दूर हो जाना एक गलती। पर जब तक बात नहीं होगी, काम कैसे होगा? अगर नक्सली बंदूक से बोलेंगे, तो फिर सरकार से आप निहत्थे जंगल में आने की कैसे सोच सकते? पता नहीं ऐसे मानवाधिकारवादियों को क्या हो गया, जिन्हें संसद पर हमले के दोषी अफजल का मानवाधिकार तो दिखता है। पर संसद हमले में शहीद अपने सुरक्षा बलों के परिजनों के आंसू नहीं दिखते। नक्सलवादियों-अलगाववादियों के पैरोकार अगर सचमुच देश से प्रेम करते, तो क्यों नहीं खुद मध्यस्थ की भूमिका निभाते? मीडिया के सामने चार बौद्धिक बातें कर लेना कोई बुद्धिमानी नहीं। बुद्धिमानी तो तब दिखेगी, जब पैरोकार पहल कर नक्सलवाद-अलगाववाद के नासूर को खत्म करने में अहम किरदार निभाएं। पर असलियत कुछ और। जब ऐसे मुद्दे नहीं होंगे। तो ऐसे बुद्धिजीवियों के पास करने को क्या बचेगा? यही हाल राजनेताओं का, जो कभी वोट बैंक से जुड़े मुद्दे दफन नहीं होने देते। अब कश्मीर जून से सितंबर तक सुलगता रहा। तो दिल्ली से सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल गया। अब केंद्र ने वार्ताकारों का नया समूह गठित किया। तो पेशे से पत्रकार दिलीप पडगांवकर की रहनुमाई में तीनों मेंबर घाटी पहुंचे। पर काम शुरू करने से पहले ही ऐसा बयान दिया, बखेड़ा खड़ा हो गया। पडगांवकर ने कश्मीर समस्या के समाधान में पाकिस्तान को शामिल किए जाने की जरूरत बता दी। यानी अरसे से जो बात अलगाववादी कह रहे, वही कह दिया। सो बीजेपी ने पीएमओ से सफाई मांगी। कांग्रेस को कुछ न सूझा, तो पडगांवकर पर ही छोड़ दिया। पर इतना जरूर कहना पड़ा- समूचे कश्मीर नहीं, पाक से सिर्फ उसके कब्जे वाले कश्मीर पर ही बातचीत हो सकती। यानी केंद्र में सरकार किसी की भी हो, सभी 22 फरवरी 1994 के संसद के संकल्प से बंधे हुए। जिसमें साफ कहा गया- जम्मू-कश्मीर भारत का अभिन्न हिस्सा। पीओके को फिर से हासिल करने का काम बाकी, जिसे जल्द पूरा किया जाना चाहिए। अब पडगांवकर-अरुंधती के बयानों को कौन सा संकल्प कहेंगे? माना, समस्या के समाधान के लिए खुले मन से बात हो। पर खुले मन का मतलब यह नहीं, भारत को पाकिस्तान के हवाले कर दें। वार्ताकार यह क्यों भूल रहे, भौगोलिक सीमा एक शाश्वत सच है। वार्ताकार अगर अलगाववादियों की जुबान बोलेंगे, तो फिर वार्ता के क्या मायने? पडगांवकर के बयान से कांग्रेस ठहरी, तो बीजेपी हमलावर। पर कश्मीर के विलय पर उंगली उठा चुके सीएम उमर ने सराहना की। सो कश्मीर मुद्दा कभी सुलझेगा, दूर-दूर तक आसार नहीं दिख रहे। पहल तो कई दफा हो चुकी। पर जितनी बार बात हुई, बनी कम, बिगड़ी अधिक। वार्ताकार का मतलब तो अब सरकार की ओर से अपने पसंदीदा लोगों को नौकरी देना हो गया। ---------
25/10/2010
25/10/2010
Friday, October 22, 2010
....तो गांव के लोग अब पेटू हो गए!
सचमुच नेताओं को शर्म है कि आती नहीं। आम आदमी जैसे-तैसे महंगाई झेल ही रहा। पर नेताओं को अब गरीबों का झेलना भी गवारा नहीं। इनका वश चले, तो गरीबी भले न मिटे, गरीबों को जरूर मिटा देंगे। सो अबके योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह आहलूवालिया ने महंगाई का ठीकरा गांव-गरीबों पर फोड़ दिया। अब इसे बेहयाईपन की हद पार करना न कहें, तो क्या कहेंगे? यों राजनीतिक नफा-नुकसान के लिहाज से आहलूवालिया सही फरमा रहे। सोचो, जब इंदिरा गांधी ने गरीबी हटाओ का नारा दिया था। तभी गरीबी मिट जाती, तो आज कांग्रेस क्या घास छीलती? सोनिया-मनमोहन राज में फिर यह नारा कैसे बनता- कांग्रेस का हाथ, गरीब और आम आदमी के साथ। तभी तो दादी इंदिरा से पोता राहुल तक, गरीबी ही राजनीतिक जुमला बनी हुई। अगर गरीब सुखी-संपन्न हो गए, तो फिर राजनीति की दिशा बदल जाएगी। वोट बैंक नाम की चिडिय़ा फुर्र हो जाएगी। सो मोंटेक ने बेलाग कह दिया- गांवों के लोगों की आय और जीवन स्तर बढऩे से खाद्य पदार्थों की मांग बढ़ी। इसीलिए महंगाई भी बढ़ी। अगर सीधे-सपाट लहजे में मोंटेक उवाच को समझें। तो मतलब यही, गांव के लोग अब पेटू हो गए। यही भाषा अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति जार्ज बुश इस्तेमाल कर चुके। उन ने वैश्विक महंगाई का जिम्मेदार भारत-चीन को ठहराया था। भारत-चीन के लोगों खदोड़ कह दिया था। सो मोंटेक भले अपने योजना आयोग का जिम्मा संभाल रहे। पर लंबे समय तक अमेरिका में काम कर चुके। सो अमेरिकी वेश-भूषा, रहन-सहन के साथ अब भाषा भी वैसी हो गई। पर मनमोहन के बयान बहादुरों में सिर्फ मोंटेक ही नहीं। शरद पवार, मुरली देवड़ा, जयराम रमेश यहां तक कि खुद मनमोहन भी इस होड़ में शामिल। सनद रहे, सो बता दें। अपने शरद पवार ने जब-जब मुंह खोला, महंगाई बढ़ी। हर बार ऐसे बयान दिए, गरीबों का जख्म कुरेद दिया। एक बार कहा था- मैं कोई ज्योतिषी नहीं, जो बताऊं, महंगाई कब कम होगी। फिर चीनी महंगी हुई। तो बयान दिया- चीनी नहीं खाएंगे, तो मर नहीं जाएंगे। फिर चावल उत्पादक राज्यों में रोटी खाने वाली जनता को जिम्मेदार बता दिया। साग-सब्जी, फल महंगे हुए। तो पवार ने कहा था- जब पेप्सी-कोला खरीद सकते, तो महंगी फल-सब्जी क्यों नहीं। पर पवार को छोडि़ए। सही मायने में पवार देश के कृषि मंत्री नहीं, क्रिकेट मंत्री कहे जाते। पर महंगाई ने जब-जब कांग्रेस को घेरा, कांग्रेस और उसकी सरकार ने बेशर्मी की सारी लक्ष्मण रेखा लांघ दी। बाईस मई-2004 को मनमोहन पीएम बने। नवंबर से ही महंगाई ने अपने तेवर दिखाने शुरू कर दिए। फिर वित्त मंत्री रहते चिदंबरम ने बजट पेश किया, तो कुत्ते के खाने वाले बिस्किट की कीमतें घटा दीं। पर बाहर महंगाई पर सवाल हुआ, तो मुस्कराते हुए कहा था- कुत्ते के बिस्किट का दाम घटा दिया। फिर महंगाई रोकने को कोई जादू की छड़ी नहीं वाला बयान तो चिदंबरम से लेकर सिब्बल तक और पूरी कांग्रेस कई बार दे चुकी। पेट्रोल, डीजल, रसोई गैस के दाम बढ़े, तो पेट्रोलियम मंत्री मुरली देवड़ा ने कंपनियों को फायदा पहुंचाने के लिए जनता को भगवान भरोसे छोड़ दिया। शीला दीक्षित की अहंकारी टिप्पणियां तो कई बार अपना खून जला चुकीं। चुनाव से पहले गैस के दाम पर सब्सिडी दी, पर चुनाव बाद बेशर्मी से सब्सिडी हटा ली। शीला ने भी कहा था- अकेले महंगाई नहीं बढ़ी, लोगों की आमदनी भी बढ़ी। सो महंगाई पर हाय-तौबा करने की जरूरत नहीं। अब कांग्रेसी नेताओं के इतने सारे बयानात देखने-सुनने के बाद मोंटेक सिंह आहलूवालिया का बयान कांग्रेसी सोच को आगे बढ़ाने वाला ही लग रहा। पर जिस गांव-गरीब को मोंटेक ने पेटू कहा। अब अधिक पीछे नहीं, इसी साल लालकिले के प्राचीर से पीएम मनमोहन जो योजना आयोग के अध्यक्ष भी, उन ने महंगाई पर कुछ यों फरमाया था। उन ने कहा था- महंगाई से सबसे अधिक गरीब प्रभावित हुए। पर मनमोहन के जूनियर मोंटेक तो गरीब को महंगाई का जिम्मेदार बता रहे। आखिर कब तक गांव-गरीब को छलेगी कांग्रेस सरकार। महंगाई के लिए और कितनी वजहें गिनाई जाएंगी? पहले महंगाई को एनडीए से विरासत में मिली बताया। फिर बीजिंग ओलंपिक पर ठीकरा फोड़ा। कभी लोगों की खान-पान की आदत में बदलाव वजह बताई। अब गांव की समृद्धि को वजह बता दिया। सो सवाल राहुल गांधी से। जो भारत को दो हिस्सों यानी, चमकता और पिछड़ा भारत में बांट चुके। खुद को गांव-गरीब का रहनुमा बताते फिर रहे। अब राहुल बताएं, मोंटेक के बयान से कैसे एक ही पायदान पर खड़ा होगा भारत? गांव में आज भी अधिकतर आबादी ऐसी, जो महज दो जून की रोटी के लिए सुबह से शाम तक संघर्ष करती। पर गांव-गरीब की बात करने वाली कांग्रेस महंगाई के इस दौर में गरीबों के खाली पेट को सहलाना तो दूर, उलटे लात मार रही। सो अब कांग्रेस पर जनता कैसे एतबार करे। बिहार चुनाव में सोनिया-राहुल-मनमोहन ने चीख-चीख कर कहा- बिहार के विकास के लिए हमने पैसा दिया। तो शुक्रवार को बीजेपी ने पूछ लिया- क्या इन तीनों ने अपनी निजी संपत्ति में से दिया? पर नेताओं का क्या, अभी कुछ, घंटे भर बाद कुछ। गांव-गरीब की फिक्र तो छोडि़ए, देश को भी भगवान भरोसे छोड़ रखा। अलगाववादी नेता सैयद अलीशाह गिलानी अब दिल्ली में आकर पृथक कश्मीर की आवाज बुलंद कर गए। पर अपनी पुलिस ने तिरंगा झंडा लहराने वालों को सेमिनार हॉल से ही बाहर कर दिया। सो नेताओं से अब लाज की कैसी उम्मीद?
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22/10/2010
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22/10/2010
Thursday, October 21, 2010
मोदी ने दी चोट, तो कांग्रेस को भी दिखा ईवीएम में खोट
कहते हैं ना, सांच को आंच नहीं। कर्नाटक की राजनीति में इस बार भी सभी राजनीतिक दल नंगई पर उतर आए। पिछली विधानसभा में कांग्रेस-जेडीएस-बीजेपी ने कैसे बारी-बारी सत्ता का बीस-बीस महीने बलात्कार किया, किसी से छुपा नहीं। बीजेपी को तब बीस महीने का पूरा हक नहीं मिला। तो अबके सरकार बचाने में सत्ता के दुरुपयोग की कोई कसर नहीं छोड़ रही। सो खरीद-फरोख्त के खेल में कोई पीछे नहीं। कोई स्टिंग कर रहा, तो कोई विधायक तोड़ रहा। कुल मिलाकर लोकतंत्र की ऐसी-तैसी करने को सभी ओवरटाइम कर रहे। कभी अपना देश सोने की चिडिय़ा कहलाता था। तो अंग्रेज सारा सोना लूट ले गए। पर आजादी के बाद नेताओं ने राजनीति को सोने का अंडा देने वाली मुर्गी बना दिया। सो अब कुर्सी बचानी हो या करप्शन करके बचना हो, सब कुछ बिकाऊ हो गया। चाहे जब एमपी-एमएलए खरीद लो, चाहे जब करप्शन का एक हिस्सा जांच करने वालों को सरका दो। सारा मामला रफा-दफा। गुरुवार को इसकी एक मिसाल भी मिल गई। कॉमनवेल्थ घोटाले में इनकम टेक्स डिपार्टमेंट कैसे लगातार छापे मार रहा। मानो, भ्रष्टाचार की कलई चंद दिनों में खोलकर रख देगा। पर झूठ के पांव नहीं होते। अब आईटी डिपार्टमेंट की हकीकत का एक और नमूना देखिए। करीब चार हजार करोड़ के घोटाले के मामले में झारखंड के पूर्व सीएम मधु कोड़ा फिलहाल जेल की हवा खा रहे। पर कोड़ा के खिलाफ तथ्य जुटाने वाले अधिकारी उज्ज्वल चौधरी को जांच से हटाने पर डिपार्टमेंट इस कदर आमादा कि सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया। राजनीतिक दबाव में जब चौधरी के ट्रांसफर की कोशिश हुई। तो झारखंड हाईकोर्ट ने रोक लगा दी। पर आईटी डिपार्टमेंट ने अटार्नी जनरल के जरिए सुप्रीम कोर्ट में अर्जी लगाई। गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के फैसले पर चार हफ्ते का स्टे लगा दिया। यानी जांच अधिकारी उज्ज्वल की विदाई तय हो गई। अब अपनी व्यवस्था को क्या कहेंगे। कॉमनवेल्थ गेम्स में 70 हजार करोड़ रुपए लुटाए गए। जो देश के शिक्षा बजट से करीब छह गुना अधिक। अगर यह धन शिक्षा या किसी अन्य मद में खर्च होता, तो आने वाली पीढ़ी को कुछ कर दिखाने का बेहतर मौका मिलता। पर गेम्स से क्या मिला? कॉमनवेल्थ गेम्स के रिकार्ड न तो मान्य और न ही कोई अनोखा रिकार्ड बनाया। खिलाडिय़ों के ऊपर महज साढ़े तीन सौ करोड़ खर्च हुए। बाकी आयोजन करने वालों ने मिल-बांट लिए। अब देखो, पहले गेम्स के नाम पर भ्रष्टाचार। बेतहाशा धन खर्च किया गया। अब जांच के नाम पर धन खर्च होगा। पर मिलेगा क्या? कल को कोई बड़ा नेता फंस गया। तो जांच अधिकारी बदलने में कितना वक्त लगेगा? झारखंड में मधु कोड़ा को बचाने के लिए आखिर आईटी डिपार्टमेंट इतना सक्रिय क्यों? भ्रष्टाचार तो अब सत्ता की जोड़-तोड़ में संजीवनी बन चुका। माया-मुलायम-लालू के केस अपनी कहानी खुद बता रहे। सो नेता अब कम से कम समय में अपनी सात पीढ़ी को संपन्न बना लेना चाहता। तभी तो जनता की नब्ज भांपना भूल चुके नेता। देश का वोटर अब इतना परिपक्व हो चुका कि नेताओं को चुनाव बाद ही असली तस्वीर दिखती। जैसे ऊपर वाले की लाठी में आवाज नहीं होती। वैसे ही लोकतंत्र में जनता की लाठी भी हो गई। सो हारने वाले नेता दिल से हार नहीं कबूल पा रहे। याद करिए, कैसे आडवाणी के मंसूबों पर पानी फिरा। तो बेजुबान, बेचारी ईवीएम मशीन को हार का जिम्मेदार ठहराने लगे। बीजेपी नेता ने तो तथ्यों का विश्लेषण कर किताब लिख डाली। पर अब यही रोग कांग्रेस को भी लग गया। गुजरात में मोदी का मैजिक कांग्रेस के लिए रहस्य बना। पिछले विधानसभा चुनाव के बाद तो कांग्रेसी कहने लगे थे- मोदी को कैसे हराना है, यह मोदी से ही पूछो। पर अब पंचायत चुनाव में भी मोदी मैजिक चला। तो कांग्रेस ने मशीन पर ठीकरा फोड़ दिया। गुजरात प्रदेश कांग्रेस ने दिल्ली में गुहार लगाई। चुनाव आयोग को बाकायदा शिकायत सौंप दी। कांग्रेस प्रवक्ता मोहन प्रकाश बोले- मोदी मैजिक की पोल अब खुल गई। पर सवाल, जब ईवीएम में खोट, तो अपने नवीन चावला के जरिए ठीक क्यों नहीं करवाया? क्या सिर्फ गुजरात के ईवीएम में खोट? अगर विधानसभा और लोकसभा चुनाव में हारने वाली पार्टी ईवीएम पर ऐसे ही ठीकरा फोडऩे लगे। तो लोकतंत्र का क्या होगा? अपने नेताओं में हार कबूलने का साहस क्यों नहीं? क्यों नहीं समझ पा रहे, अब देश के परिपक्व वोटरों को बरगलाना खालाजी का घर नहीं। जनता के निर्णय अब ऐसे होने लगे, बड़े-बड़े रणनीतिकार तो क्या, सैफोलॉजिस्ट भी सौंफ फांकते दिख रहे। पर नेता अपनी हार के लिए मशीन को जिम्मेदार ठहरा रहे। मानो, जनता कुछ भी नहीं। अब बिहार चुनाव का पहला दौर गुरुवार को निपट गया। तो शेखचिल्लियों ने खूब दावे किए। रामविलास पासवान ने तो 90 फीसदी जनता को लोजपा-राजद गठबंधन के साथ बताया। यों देर शाम चुनाव आयोग ने आंकड़े जारी किए। तो पता चला, कुल 54 फीसदी ही वोट पड़े। लालू-पासवान अबके नीतिश का तख्ता पलटने का दंभ भर रहे। पर ऐसा न हुआ, तो लालू-पासवान भी ईवीएम मशीन पर ठीकरा फोड़ें, तो कोई हैरानी नहीं। अब शायद यही परंपरा बनने वाली। हर राज्य में विपक्ष मशीन को ढाल बना हार की खीझ मिटाएगा।
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21/10/2010
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21/10/2010
Wednesday, October 20, 2010
लो अब गाली-गलौज का कॉमनवेल्थ भी हुआ शुरू
कॉमनवेल्थ घोटाले की कड़ी से कड़ी जुडऩे लगी। पहले दिन बीजेपी नेता सुधांशु मित्तल निशाने पर रहे। तो दूसरे दिन खेल गांव बनाने वाली कंपनी एम्मार-एमजीएफ का खेल बिगड़ गया। डीडीए के पास जमा 183 करोड़ की बैंक गारंटी जब्ती का नोटिस जारी हो गया। पर अभी तो सिर्फ ठेका लेने वाली कंपनियों पर शिकंजा कसा। यक्ष प्रश्न, ठेका देने वाले नौकरशाहों-नेताओं ने कितना खाया, इसकी परतें कब उधड़ेंगी? अब ठेकेदारों पर कार्रवाई में तेजी दिखाने से क्या होगा? ठेकेदार तो अपना टेंडर भरते। यह तो देने वाले पर निर्भर, किस कंपनी को ठेका दे। सो सवाल, ठेका देते वक्त नौकरशाहों-नेताओं ने होश क्यों गंवाया? अब जब सब कुछ लुट गया, तो होश में आ रहे। सो फिर वही सवाल- सब कुछ लुटा के होश में आए, तो क्या किया। दिन में चिराग जलाए, तो क्या किया। अब डीडीए को एम्मार-एमजीएफ के काम में खोट नजर आ रहा। अपनी खाल बचाने को सारा ठीकरा कंपनी के सिर मढ़ दिया। पर आर्थिक मंदी के दौर में जब कंपनी ने हाथ पीछे खींच लिए, तो डीडीए ने अधिक कीमत देकर 333 फ्लैट खरीद लिए। एम्मार-एमजीएफ को करीबन 700 करोड़ का बेलआउट पैकेज दिया गया। पर तब डीडीए ने कोई खोट नहीं बताया। अब रपट में कह रही- मंजूरी से अधिक फ्लैट बनाए गए। नक्शे में भी हेर-फेर कर एरिया बदल दिया गया। पर डीडीए पर कौन भरोसा करे। दुनिया की भ्रष्ट संस्थाओं में भारत से अपनी डीडीए ही मुकाबले में टिक पाती। डीडीए तो भ्रष्टाचार का पर्याय बन चुकी। सो जब कॉमनवेल्थ लूट में मौका मिला, तो दिल खोलकर कंपनी को सरकारी धन लुटाया। कंपनी से कमीशन लेकर अपनी जेब भरी। पर विडंबना देखिए, जो डीडीए खुद संदेह के घेरे में, वह दूसरी कंपनी पर आरोप लगा रही। अब ऐसे में भ्रष्टाचार की जांच कैसे होगी, यह जांच करने वाले ही जानें। तीन महीने में जांच रपट सौंपे जाने का एलान तो हो गया। पर दबी जुबान शीलावादी नौकरशाह कहते फिर रहे- तीन महीने में जांच कोई खालाजी का घर नहीं। कम से कम छह महीने तो लगेंगे ही। सो कहीं ऐसा न हो, कॉमनवेल्थ की जांच बोफोर्स घोटाले की तरह हो जाए। जहां घोटाले की रकम से कई गुना अधिक जांच में खर्च हो गए। बीजेपी ने तो मौजूदा जांच को पहले ही बेमतलब बता दिया। नितिन गडकरी के बाद बुधवार को प्रकाश जावडेकर बोले- जब मौजूदा सीएजी-सीवीसी जांच में सरकारी महकमों पर सहयोग न करने का आरोप लगा रहे। तो पूर्व सीएजी भला क्या जांच कर लेंगे? जांच की आंच सचमुच बड़ी मछलियों तक पहुंचेगी, उम्मीद कम। शायद कांग्रेस भी बखूबी समझ रही, सो फिलहाल शुरुआती तेवर सख्त दिखाने को ताबड़तोड़ कार्रवाई हो रही। बुधवार को प्रवर्तन निदेशालय ने आयोजन समिति के महासचिव ललित भनोट को तलब कर लिया। लगे हाथ सुरेश कलमाड़ी से भी पूछताछ का सुर्रा छोड़ दिया। अब कांग्रेस किसे बलि का बकरा बनाएगी, यह बाद की बात। पर सुधांशु मित्तल ने तो मोर्चा खोल दिया। मंगलवार को इनकम टेक्स-सीबीआई के छापे पड़े। दिन भर मित्तल ही सुर्खियों में रहे। सो बुधवार को मित्तल सफाई देने आ गए। उन ने छापेमारी को राजनीतिक बदले की कार्रवाई बताया। अब मित्तल से कांग्रेस राजनीतिक बदला लेगी, ऐसी मित्तल की राजनीतिक हैसियत नहीं। गर मित्तल अपनी ही पार्टी बीजेपी के लिए ऐसा कह रहे, तो माना जा सकता। मित्तल को लेकर तो बीजेपी में लोकसभा चुनाव के वक्त जबर्दस्त सिर-फुटव्वल हो चुकी। यों बीजेपी भी मित्तल को अपना सगा मानने से इनकार कर रही। ताकि घोटाले की जांच में मित्तल फंसे, तो आसानी से दूरी बना सके। पर जरा मित्तल की सफाई भी सुनिए। बोले- जहां 77 हजार करोड़ का घोटाला, वहां 29 लाख की क्या बिसात? बकौल मित्तल, उनकी कंपनी को सिर्फ 29 लाख का ठेका मिला। तो वह कॉमनवेल्थ घोटाले के चोरों के सरताज कैसे हो गए। यों मित्तल की बात में दम। पर घोटाला 77 हजार करोड़ का हो या 29 लाख का। घोटाला तो घोटाला ही होता है। सो मित्तल की ईमानदार सफाई में बेईमानी की जबर्दस्त बू आ रही। करीब-करीब ऐसी ही ईमानदार सफाई शीला सरकार, कलमाड़ी एंड कंपनी, डीडीए आदि-आदि सभी दे रहे। पर ईमानदार सफाई में बेईमानी खुद-ब-खुद जगजाहिर हो रही। सो भ्रष्टाचार के मामले में चोर-चोर मौसेरे भाई अब एक-दूसरे के खिलाफ गाली-गलौज पर उतर आए। अब जिसका नाम उछल रहा, वही खीझ रहा। मंगलवार को गडकरी ने पीएम पर निशाना साधा। तो आरोपों का जवाब देने की बजाए कांग्रेस प्रवक्ता मनीष तिवारी पर्सनल हो गए। कांग्रेस खिसियानी बिल्ली की तरह गडकरी पर लपकी। प्रवक्ता ने गडकरी को बिगड़ैल बच्चा बताया। मजाक बनाते हुए बोले- बीजेपी की पूरी प्रेस कांफ्रेंस का निचोड़ यही- खोदा पहाड़, निकला गडकरी। सो बुधवार को तो बीजेपी आग-बबूला दिखी। प्रकाश जावडेकर ने चेतावनी दे दी। शीशे के घर में रहने वाले दूसरों के घरों पर पत्थर नहीं फेंकते। बोले- कांग्रेस नेता भाषा में संयम बरतें, वरना वैसी भाषा का इस्तेमाल करना हमें भी आता है। उन ने कांग्रेस को इशारा भी कर दिया, अगर बीजेपी के अध्यक्ष को गाली देना बंद नहीं किया। तो यह न भूले, कांग्रेस के पास भी अध्यक्ष है। हम भी सोनिया पर फूल नहीं बरसाएंगे। यानी सोनिया गांधी के खिलाफ पर्सनल टिप्पणी की धमकी दे दी। सो भ्रष्टाचार की जांच का क्या हश्र होगा, पता नहीं। पर अब गाली-गलौज का कॉमनवेल्थ शुरू मानिए।
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20/10/2010
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Tuesday, October 19, 2010
तो आइए मिलकर कहें- जय हो भ्रष्टाचार की!
'हू इज द फादर ऑफ करप्शन?' तमाम सर्च इंजनों पर नजर फिराते दिन निकल गए। माउस क्लिक करते-करते उंगलियां दुख गईं। पर इस सवाल का जवाब नहीं मिला। सो आखिर में यही निष्कर्ष निकाला, भ्रष्टाचार भी आस्था का विषय। एक ऐसी आस्था, जो सभी मजहबों से ऊपर। यों भ्रष्टाचार कोई देवी या देवता, यह साफ नहीं। पर दोनों में से जो भी हों, सबके लिए पूजनीय। सचमुच 'जेब' से भ्रष्टाचार की जय बोलो, तो सारे काम चट हो जाते। काम कराने वालों को भी तकलीफ नहीं, काम करने वाले भी धन मिलने के बाद तन-मन से काम कर देते। पर कहीं जेब पर दिल हावी हो गया, तो इतने धक्के खाने पड़ते कि ईमानदारी पानी मांगने लगती। तभी तो कहा जाता- कोई भी व्यक्ति तभी तक ईमानदार, जब तक बेईमानी का मौका न मिले। सो भ्रष्टाचार तो ऐसा अमृत रस, जिसे पीकर हर सरकारी मुलाजिम अपनी जिंदगी खुशहाल बनाना चाहता। सो आप खुद ही सोचकर देखो, अगर भ्रष्टाचार न होता, तो दुनिया कितनी बेरंग होती। सारे काम आसानी से होते, तो सरकारी बाबुओं और आम लोगों में क्या फर्क रह जाता। कुल मिलाकर माहौल में नीरसता ही दिखती। पर भ्रष्टाचार ने सचमुच कमाल कर दिया। भ्रष्टाचार से रोजगार के नए अवसर पैदा हो गए। व्यवस्था के नीति-नियंता नियति के बराबर खड़े हो गए। यानी भ्रष्टाचार ऐसा खेल बन गया, जितना खेलो, उतना मजा आता। पहले लूटने के लिए भ्रष्टाचार होते, फिर जांच के नाम पर लूट मचाई जाती। भ्रष्टाचार का मतलब यही, लूट लो, जितनी लूट सकते हो, ताकि अंत काल में पछताना न पड़े। अगर भ्रष्टाचार न होता, तो नेताओं-नौकरशाहों-बाबुओं की जिंदगी कितनी तनहा होती। पर भ्रष्टाचार ने इन लोगों पर प्राण वायु जैसा असर किया। अब जो चीज प्राण वायु बन चुकी हो, वह भला कैसे अलग हों। तभी तो भ्रष्टाचार के खिलाफ बातें बड़ी-बड़ी होतीं, पर कार्रवाई नहीं। भ्रष्टाचार की जानकारी आखिर किसे नहीं। कई सरकारी महकमे ऐसे, जहां ऊपर से नीचे तक सभी अधिकारियों की भ्रष्ट कमाई इतनी कि सैलरी हर महीने का बोनस नजर आती। इनकम टेक्स, सेल्स टेक्स, कस्टम, तहसील जैसे मलाईदार महकमों में ट्रांसफर के लिए कैसे राजनीतिक अर्जियां लगाई जातीं, कौन नहीं जानता। अगर भ्रष्टाचार न होता, तो आज कॉमनवेल्थ गेम्स भी न होते। भारत ने मेजबानी ली, तो मेजबानी के पीछे की कहानी मणिशंकर अय्यर बता चुके। कैसे कॉमनवेल्थ के सभी देशों को लाखों में भुगतान किए गए। सो कॉमनवेल्थ गेम्स की तैयारी शुरू हुई, तो भ्रष्टाचार का हिस्सा पहले बंट गया। पर खेल के बाद जब भ्रष्टाचार के खेल से परदा उठा। तो भ्रष्टाचारियों के नकाब उतरने लग गए। सो सरकार को लगा, टेबल के नीचे का भ्रष्टाचार टेबल के ऊपर दिख गया। तो जनता को जवाब देना भारी पड़ेगा। सो अब भ्रष्टाचार की जांच होगी। तो देखिए, जांच के कितने फायदे होंगे। अब जांच तक कलमाड़ी एंड कंपनी की आयोजन समिति बनी रहेगी। यानी वेतन-भत्ते मिलते रहेंगे। भ्रष्टाचार की जांच से एक और फायदा, रिटायर हो चुके सीएजी वी.के. शुंगलू को काम मिल गया। विपक्षी दल बीजेपी को भी भ्रष्टाचार पर रिसर्च करने की जरूरत महसूस हुई। अपनी मीडिया को भी रपट से पहले ही परतें उधेडऩे का मौका मिल गया। अब आप खुद ही देखिए, अगर कॉमनवेल्थ गेम्स न हुए होते, तो भ्रष्टाचार न होता। भ्रष्टाचार न होता, तो नितिन गडकरी को तथ्य जुटाने की जहमत नहीं उठानी पड़ती। पीएम को जांच कमेटी नहीं बनानी पड़ती। राजनीतिक दलों को आरोप-प्रत्यारोप का मौका नहीं मिलता। सो उधर कॉमनवेल्थ गेम्स की जांच शुरू हुई, इधर राजनीति का धंधा चल पड़ा। बीजेपी अध्यक्ष नितिन गडकरी ने मंगलवार को जो दस्तावेज जारी किए, उसके पन्ने तो नहीं गिने जा सके। पर अमूमन डेढ़-दो किलो वजन जरूर होगा। गडकरी ने सीधे पीएम मनमोहन को कटघरे में खड़ा किया। भ्रष्टाचार में पीएमओ को जिम्मेदार बताया। दलील दी, पीएम के तैनात चार अधिकारी आयोजन समिति के हर फैसले में शामिल रहे। सो पीएम जिम्मेदारी से नहीं बच सकते। पर सवाल गडकरी से, कर्नाटक में एक मंत्री का बेटा जमीन घोटाले में फंसा। तो सीएम येदुरप्पा ने यह कहते हुए कार्रवाई नहीं की, बेटे की सजा बाप क्यों भुगते। अब गडकरी बताएं, गर अधिकारी भ्रष्ट निकले, तो पीएम जिम्मेदार कैसे। अगर यही फार्मूला, तो फिर बीजेपी नेता सुधांशु मित्तल के घर छापेमारी की जिम्मेदारी बीजेपी अध्यक्ष क्यों नहीं लेते? मंगलवार को कॉमनवेल्थ घोटाले के मामले में बीजेपी नेता के घर छापे पड़े। तो कांग्रेस को ढाल मिल गई। मनीष तिवारी ने गडकरी को बिगड़ैल बच्चा बता उनके आरोप खारिज कर दिए। बोले- जांच की आंच बीजेपी नेताओं तक पहुंच रही, सो गडकरी डर गए। पर गडकरी की ओर से जांच के लिए जेपीसी की मांग से किनारा कर लिया। सीधे जवाब से कन्नी काटते हुए बोले- यह सरकार को तय करना है, पर फिलहाल शुंगलू कमेटी सक्षम। पर गडकरी ने तो मौजूदा जांच को परदा डालने वाली बताया। यानी मौजूदा जांच सिर्फ प्रशासनिक स्तर तक सीमित रहेगी। मंत्रियों तक आंच नहीं पहुंचेगी। वैसे भी शीला-जयपाल-गिल-कलमाड़ी ने तो अपने अधिकारियों को कागज दुरुस्त करने की हिदायत दे दी। सो जांच का क्या हश्र हुआ, यह तो तीन महीने बाद ही मालूम पड़ेगा। पर कदम जो भी उठे, इतना तो तय है, अपने देश से भ्रष्टाचार न उठेगा, न मिटेगा। भ्रष्टाचार अब एक ऐसा धर्म, जिसमें सबकी आस्था। ऐसा कर्म, जिसे सब करना चाहते। लेने वाला भी खुश, देने वाला भी खुश। सो आइए मिलकर कहें- भ्रष्टाचार की जय हो।
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19/10/2010
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19/10/2010
Monday, October 18, 2010
कॉमनवेल्थ से बिहार तक अब दे दना-दन
कर्नाटक का किस्सा तो क्लीयर नहीं हुआ। पर कॉमनवेल्थ में करप्शन की जांच को कमेटियां बन गईं। सीएजी विनोद राय ने तीन महीने में रपट सौंपने का एलान कर दिया। प्रधानमंत्री की ओर से बनाई वी.के. शुंगलू कमेटी से इतर सीएजी ने जांच के लिए अपनी कुल 24 टीम गठित कीं। जिनमें 15 टीम दिल्ली सरकार के विभागों में पड़ताल करेंगी। चार टीमें आयोजन समिति की, तो चार टीमें सीपीडब्ल्यूडी की। एक टीम सभी 23 टीमों की मानीटरिंग करेगी, ताकि जांच का काम जल्द पूरा हो सके। यानी जांच में जबर्दस्त तेजी दिखाई जा रही। पर क्या सचमुच करप्शन की कलई खुलेगी, या सिर्फ मनोवैज्ञानिक तेजी? घोटालों या करप्शन के मामले में जांच तो हमेशा तेजी से शुरू हुई। पर कितने मामले अंजाम तक पहुंचे? वह भी जब, ऐसे मामलों में कोई बड़ी राजनीतिक पार्टी और राजनेता फंसा हो। तो जांच वैसे भी कछुआ चाल अपना लेती। इराक तेल दलाली के मामले में यूएन की वोल्कर रपट ने भारत से दो नामों का खुलासा किया था। पहला- नटवर सिंह, दूसरा- कांग्रेस पार्टी। यानी अनाज के बदले तेल घोटाले में बड़े लोग फंसने लगे। तो कांग्रेस ने तयशुदा फार्मूले के तहत नटवर सिंह को बलि का बकरा बना दिया। फिर जस्टिस आर.एस. पाठक की रहनुमाई में जांच कमेटी बनी। आखिर नटवर को किस तरह मनमोहन केबिनेट और फिर कांग्रेस से बाहर का दरवाजा दिखाया गया, दोहराने की जरूरत नहीं। पर वोल्कर रपट में तो कांग्रेस का भी नाम था। अब सीएजी की ही बात लो। सीएजी जैसी संस्था पर खुद कांग्रेसी सीएम शीला सवाल उठा चुकीं। ऐसी संस्था को ही बेमानी बता चुकीं। तो आप खुद सोचो, सीएजी की रपट से क्या हो जाएगा? मान लो, सीएजी ने भ्रष्टाचार की पूरी कलई खोल दी, तो क्या होगा। यही ना, संसद के बजट सत्र में दो-चार दिन विपक्ष के हंगामे से दोनों सदन ठप होंगे। फिर दिखलाने को मामला सीबीआई को सौंप दिया जाएगा। इसके बावजूद हायतौबा मचती रही, तो बलि का बकरा कलमाड़ी तैयार। पर कलमाड़ी ने तो विजयादशमी पर ही खम ठोक दिया। चेतावनी दे दी- मुझे कॉमनवेल्थ का रावण बनाने की कोशिश न की जाए। कलमाड़ी खुल्लमखुल्ला बोले- आयोजन समिति के हर फैसले में पीएम के तैनात अधिकारी भी शामिल। अब कलमाड़ी उवाच का मतलब जो न समझे, वह सबसे बड़ा अनाड़ी। पर कलमाड़ी अब यहीं तक खामोश नहीं रहने वाले। दिल्ली की सीएम शीला दीक्षित ने पॉलिटीकल मैनेजर की तरह कॉमनवेल्थ की सफलता की वाहवाही मैनेज कर ली। चैनलों पर इंटरव्यू में ऐसा साबित करने लगीं। मानो, उन ने बेड़ा पार न लगाया होता, तो कॉमनवेल्थ का बेड़ गर्क हो जाता। तभी तो शीला के मैनेजमेंट से दिल्ली के उपराज्यपाल उखड़ गए। उन ने पीएम को चिट्ठी लिखकर शीला की शिकायत कर दी। पर जब कॉमनवेल्थ के करप्शन की जांच की कार्रवाई शुरू हुई। तो शीला ने सीधे कलमाड़ी पर उंगली उठा दी। ताकि सारा फोकस आयोजन समिति में हुए घपले पर हो जाए। सो वक्त की नजाकत भांप कलमाड़ी पहले चुप रहे। पर शीला वार जारी रहा, तो उन ने पलटवार किया। शीला को अपने गिरेबां में झांकने की नसीहत दी। कलमाड़ी ने दो-टूक कह दिया- आयोजन समिति को तो सिर्फ 1620 करोड़ मिले, शीला सरकार को 16000 करोड़ मिले थे। सो पहले शीला अपने भ्रष्टाचार को देखें। अब सवाल, जब पीएम जांच कराने ही जा रहे थे। तो शीला ने कलमाड़ी पर उंगली क्यों उठाई? अपना दामन साफ दिखाने के लिए कलमाड़ी पर कीचड़ क्यों उछाला? शीला संवैधानिक पद पर बैठी हुईं। सो उनके आरोप जांच की दिशा मोडऩे में अहम हो सकते। पर जांच तो कॉमनवेल्थ की तैयारियों में हुए समूचे भ्रष्टाचार की होनी। अब अगर शीला सरकार के दामन पर कोई दाग नहीं, तो खुद के दामन को साफ दिखाने के लिए किसी और पर कीचड़ उछालने की क्या जरूरत? ऐसा तो लोग तभी करते, जब खुद के मन में कोई चोर हो। शीला के कॉमनवेल्थ से पहले वाले बयान याद करिए। तब उन ने सारा दारोमदार भगवान पर छोड़ दिया था। पर जब खेल सफल हो गया। तो खुद को ही भगवान साबित करने में जुटीं। सो रंगारंग के बाद अब दे दना-दन शुरू हो गया। कॉमनवेल्थ में किसने नहीं खाया? सो कांग्रेस ने अब हमेशा की तरह बीच का रास्ता अपनाया। जांच की रफ्तार बढ़ेगी, दो-चार दिन नए खुलासे और सुर्खियां बनेंगी। फिर धीरे-धीरे मामला ठंडे बस्ते में। सो शीला-कलमाड़ी को संयम में रहने की नसीहत दी। जांच रपट तक आरोप-प्रत्यारोप न करने की हिदायत दी। अब देखिए, अपनी जनता की याददाश्त को नेता कैसे कमजोर समझते। तभी तो सिर्फ चुनावी साल में ही आम जनता के लिए खजाना लुटाया जाता। बाकी तीन-चार साल में अपना खजाना भरने में लगे रहते नेता। अब राजनीति की मौकापरस्ती देखिए। बिहार चुनाव की बिसात बिछी, तो आरोप-प्रत्यारोप का दौर शुरू हो गया। पहले राहुल गांधी, फिर पीएम मनमोहन और सोमवार को सोनिया गांधी। तीनों ने नीतिश कुमार को नकारा बताया। केंद्र का पैसा डकारने का आरोप लगाया। पर जनता की याददाश्त को कैसे कमजोर समझते नेता। बानगी देखिए, पांच मई 2009 को लोकसभा चुनाव के आखिरी राउंड से पहले राहुल गांधी ने प्रेस कांफ्रेंस की। तो नीतिश कुमार को बेहतरीन काम करने वाला सीएम बताया। नरेगा में भी उम्दा प्रदर्शन करने वाला बताया। तो जवाब में तब नीतिश ने भी राहुल को थैंक यू कहा। पर महज एक साल में क्या हो गया? यानी नीतिश पर हमला हो या कॉमनवेल्थ की जांच, झूठा ही सही, पर मान लो।
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18/10/2010
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18/10/2010
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