Friday, October 29, 2010

अब तो सारे घोटाले 'आदर्श' ही होते!

आखिर शुक्रवार बीजेपी के लिए दो-दो शगुन लेकर आया। गुजरात में मोदी के दिल-अजीज अमित शाह को जमानत मिल गई। तो कर्नाटक में स्पीकर के फैसले पर हाईकोर्ट ने मोहर लगा दी। सो गुरुवार तक कलह में उलझी बीजेपी ने शुक्रवार को ही दिवाली मना ली। पता नहीं दिवाली आते-आते शगुन कब अपशकुन में बदल जाए। सो बीजेपी हैडक्वार्टर में जमकर आतिशबाजी हुई। पर दोनों शगुन में फर्क देखिए। जश्न में कर्नाटक में येदुरप्पा सरकार को मिली मजबूती का असर नहीं, अलबत्ता अमित शाह को मिली जमानत की खुशी छलक रही थी। बीजेपी के वर्कर सिर्फ मोदी नाम का जयकारा लगा रहे थे। सीबीआई के तमाम विरोधों के बावजूद हाईकोर्ट में राम जेठमलानी की दलील काम कर गई। सो जेठमलानी को लेकर बीजेपी में हो रहे विरोध का जवाब मिल गया। अब सीबीआई जमानत के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट जाने की सोच रही। तो उधर कर्नाटक में जेडी-एस ने सुप्रीम कोर्ट जाने का एलान कर दिया। पर दोनों ही फैसले कांग्रेस की पेशानी पर बल डाल गए। सो कर्नाटक पर पुराना राग ही अलापा। बोली- अल्पमत की सरकार को बहुमत में बदला गया। पर सवाल, अब कांग्रेस क्या करेगी? येदुरप्पा सरकार को बर्खास्त करने के लिए गवर्नर हंसराज भारद्वाज जेहाद पर उतर चुके थे। पर क्या अब कांग्रेस हंसराज को वापस बुलवाएगी? रही बात खरीद-फरोख्त की, तो इस हमाम में कौन नंगा नहीं? छत्तीसगढ़, झारखंड, गोवा में कांग्रेस ने क्या किया था? अजीत जोगी कैसे बीजेपी के एमएलए खरीदते धरे गए, क्या कांग्रेस भूल गई। झारखंड में अल्पमत वाले शिबू सोरेन को कैसे शपथ दिलाई गई। सुप्रीम कोर्ट ने हथौड़ा चलाया, तो कांग्रेस कैसे भन्नाकर रह गई, कौन नहीं जानता? गोवा में तो खरीद-फरोख्त की फैक्ट्री। सो गवर्नर एससी जमीर के जरिए गोवा में कांग्रेस कितने खेल कर चुकी, क्या भूल गई। यानी बीजेपी हो या कांग्रेस या अन्य कोई दल, नैतिकता किसी में नहीं बची। अब गुजरात में अमित शाह को जमानत मिल गई। तो कांग्रेस ने सीधी टिप्पणी से परहेज किया। पर सीबीआई का बचाव करना नहीं भूली। कांग्रेस प्रवक्ता मनीष तिवारी बोले- बीजेपी दोहरे मापदंड अपना रही। हरेन पंड्या केस में सीबीआई अच्छी, तो अमित शाह केस में बुरी कैसे हो गई। पर सीबीआई की हकीकत कौन नहीं जानता। शुक्रवार को ही सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई को एक बार फिर लताड़ पिलाई। टू-जी स्पेक्ट्रम घोटाले में सीबीआई ने छह महीने का और वक्त मांगा। तो कोर्ट ने उसके इरादे पर संदेह जताया। सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणी की- आखिर सीबीआई कब तक जांच करेगी? अभी तक मंत्री अपने पद पर बना हुआ। सीबीआई का इरादा कुछ नहीं करने का दिख रहा। सचमुच सीबीआई सत्ताधारी दल की कठपुतली बनकर रह गई। सो कोर्ट की फटकार के बाद भी सीबीआई वही करती, जो राजनीतिक आका चाहते। तभी तो भ्रष्टाचार के मामले में कभी बड़े नेताओं पर कार्रवाई नहीं होती। गुरुवार को भी सुप्रीम कोर्ट ने भ्रष्टाचार के एक मामले में ऐसी ही टिप्पणी की। कहा- सिर्फ छोटी मछलियां ही क्यों, शार्क और मगरमच्छ क्यों नहीं फंसते? अब मुंबई के आदर्श सोसायटी फ्लैट घोटाले की कलई खुली। तो महाराष्ट्र के कांग्रेसी सीएम अशोक चव्हाण सीबीआई जांच की पैरवी कर रहे। पर जरा पहले फ्लैट की कहानी बता दें। कारगिल शहीदों की विधवाओं को मकान देने के लिए छह मंजिला इमारत का फैसला हुआ। जिस एरिया में जमीन मिली, वहीं पास में नेवी के कई अहम ठिकाने। पर नेताओं-अफसरान और सेना के शीर्ष पद से रिटायर लोगों ने जमकर बंदरबाट की। कब छह मंजिला इमारत इकत्तीस मंजिला बन गई, किसी को पता नहीं चला। आखिर पता चलता भी कैसे, जब नेता-अफसर ने अपने सगे-संबंधियों के नाम एक नहीं, चार-छह फ्लैट करवा लिए। खुद सीएम अशोक चव्हाण की सास और दिल्ली में रहने वाले चचिया ससुर के नाम फ्लैट। सो जब बवाल मचा, तो सीएम के रिश्तेदारों ने सोसायटी की सदस्यता से इस्तीफा दे दिया। सीएम ने राजनीतिक साजिश करार दिया। पर कोई पूछे, तीन टर्म से कांग्रेस की ही सरकार, तो क्या बीजेपी साजिश कर रही? अब सवाल, नेताओं-नौकरशाहों से, क्या उन्हें कभी शर्म आएगी? शहीद की विधवाओं के नाम पर बनने वाले फ्लैट में भी कब्जा जमा लिया। तो फिर भ्रष्टाचार पर अंकुश कैसे लगेगा? आदर्श सोसायटी घोटाले की परतें तो अभी और उधड़ेंगी। पर भ्रष्टाचार के महिमामंडन में कांग्रेस जैसी निर्लज्जता शायद ही कहीं दिखे। कांग्रेस जो भी करती, डंके की चोट पर। बीजेपी वाले तो थोड़ा भी नहीं खाते कि उल्टी हो जाती। पर आप कांग्रेस का इतिहास देख लो। तो सिर्फ आदर्श फ्लैट घोटाला ही नहीं, सारे घोटाले 'आदर्श' ही दिखेंगे। बोफोर्स घोटाले में दलाली से अधिक जांच पर खर्च हो गए। पर क्या कांग्रेस ने राजीव गांधी तक आंच आने दी? राव सरकार के वक्त झामुमो रिश्वत कांड हुआ। पर वह कांग्रेस के लिए आदर्श। झारखंड में ही निर्दलीय एमएलए कोड़ा को सीएम बनवा दिया। फिर जो लूट मची, वह भी एक आदर्श। सोनिया गांधी की रैली के लिए चंदा उगाही करते माणिक राव ठाकरे धरे गए। बिहार में कांग्रेस सचिव सागर रायका छह लाख रुपए के साथ पकड़े गए। तो यह भी कांग्रेस का अपना आदर्श। अब कॉमनवेल्थ घोटाले को ही लीजिए। किसी बड़े नेता पर कार्रवाई नहीं होने वाली। अलबत्ता सरकारी अफसर ही नपेंगे।
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29/10/2010

Thursday, October 28, 2010

असली जंग सुषमा-जेतली की, मोदी तो सिर्फ बहाना

दिवाली के मौके पर बीजेपी में होली का हुड़दंग मच गया। सुषमा-मोदी मनभेद से बीजेपी बदनाम हुई। तो नितिन गडकरी दौड़ते-भागते आडवाणी को शरणागत हुए। गडकरी को समझ नहीं आया, कैसे इस मसले को सुलझाएं। नरेंद्र मोदी तो सुषमा के बयान पर पहले ही नाराजगी जता चुके। इस बीच खबर चल गई, गडकरी ने सुषमा को हिदायत दी कि किसी की भावना को ठेस पहुंचाने वाला बयान न दें। सो गडकरी की हालत न इधर की रही, न उधर की। न मोदी की शिकायत को नजरअंदाज कर सकते, न सुषमा से कुछ कह सकते। यानी जूनियर नेता को अध्यक्ष बनाने का नतीजा दिख गया। जब जनसंघ के जमाने में पहली बार 1960 में संघ के पूर्णकालिक स्वयंसेवक बछराज अध्यक्ष बनाए गए। तब अटल बिहारी वाजपेयी ने भी जूनियर को अध्यक्ष नहीं कबूला। उन ने तो विजयवाड़ा अधिवेशन का खुला बहिष्कार किया था। अबके भले गडकरी के खिलाफ कोई बॉयकाट नहीं हुआ। पर गडकरी अध्यक्ष की कुर्सी पर होते हुए भी सीनियर नेताओं के सामने बौने ही बने हुए। दूसरी पीढ़ी के नेताओं सुषमा, जेतली, मोदी, वेंकैया, अनंत के बीच कोई होड़ न मचे, सो गडकरी को कमान सौंपी गई। पर अब सीनियरों की कलह को गडकरी कैसे थामें। सो आडवाणी के घर मीटिंग हुई। पर तब तक सुषमा की नाराजगी भी बढ़ चुकी थी। सुबह से ही खबर चल रही थी, गडकरी ने सुषमा को हिदायत दी। यों मीटिंग के बाद गडकरी कुछ नहीं बोले। पर पटना में मौजूद सुषमा हत्थे से उखड़ गईं। पहले तो गडकरी से हुई इस तरह की किसी बात का खंडन किया। फिर मोदी से मतभेद को नकारा। पर उसके बाद सुषमा ने जो आरोप लगाए, बीजेपी में वर्चस्व की लड़ाई का आगाज हो गया। उन ने कहा- जो मैंने कही नहीं, मेरे मुंह में डालकर छापी गई। पर दिल्ली में बैठा कोई शरारत कर रहा है। वह मेरे और नरेंद्र भाई के बीच मतभेद पैदा कर अपना स्वार्थ साधना चाहता है। या कॉमनवेल्थ घोटाले से ध्यान बंटाने के लिए साजिश भी हो सकती है। पर उन ने इससे इनकार नहीं किया कि इस साजिश में पार्टी का कोई शामिल। यानी सुषमा ने खुल्लमखुल्ला आरोप लगाया- दिल्ली में बैठा कोई नेता उनके खिलाफ मीडिया में खबरें प्लांट कर रहा। सनद रहे, सो याद दिला दें। जब उमा भारती की राजनीतिक हैसियत बढऩे लगी थी, तब मीडिया में खूब खबरें चलीं। फिर उमा ने अरुण जेतली, प्रमोद महाजन सरीखे नेताओं पर खबरें प्लांट करने का आरोप लगाया था। उमा की नाराजगी इस कदर बढ़ गई कि उन ने आडवाणी की रहनुमाई वाली मीटिंग से वॉकआउट किया। छह साल पहले भले वह तारीख दस नवंबर थी। पर दिन धनतेरस का था। फिर भी बीजेपी ने महिला नेत्री को पार्टी से निकाल दिया। अब दिवाली से पहले बीजेपी में एक और वरिष्ठ महिला नेत्री को खबरें प्लांटेशन की शिकायत। यों सुषमा का अपना कद और अलग सोच। सो उमा जैसे हश्र की बात कोई सोच भी नहीं सकता। पर महिलाओं के प्रति बीजेपी की सोच का एक और नमूना। जब-जब महिला नेत्री आगे बढ़ी, बीजेपी के पुरुष नेताओं ने टंगड़ी मारने में देर नहीं की। अपने राजस्थान में वसुंधरा राजे वसुंधरा राजे ने अपना मुकाम खड़ा किया। तो किस तरह कुर्सी छोडऩे के लिए मजबूर किया गया, दोहराने की जरूरत नहीं। अब जबसे सुषमा स्वराज ने विपक्ष के नेता पद की जिम्मेदारी संभाली। मनमोहन की दूसरी पारी में विपक्ष ने नाको चने चबवा दिए। सो बीजेपी में दूसरे पीएम इन वेटिंग की होड़ शुरू हो गई। राज्यसभा में अरुण जेतली ने नेता विपक्ष की कुर्सी संभाली। सो सुषमा-जेतली की नजर अब पीएम की कुर्सी पर गड़ गई। अंदरखाने पार्टी के भीतर अपनी-अपनी लॉबी बनाने की कोशिश होने लगी। दोनों नेता राज्यों में अपना प्रभाव जमाने में जुट गए। पर इस खेल में सुषमा थोड़ी पिछड़ गईं। पेशे से वकील होने के नाते जेतली अधिक तेज-तर्रार निकले। अभी भी बीजेपी में जेतली कैंप का जबर्दस्त दबदबा। पर जेतली की सबसे बड़ी कमी, जनता के बीच सुषमा जैसी अपील नहीं। बीजेपी का इतिहास इसी बात का साक्षी। आडवाणी तेज-तर्रार होते हुए भी कभी पीएम नहीं बन पाए। उदारवादी और जनता के दिलों पर राज करने वाले वाजपेयी बाजी मार गए। यों सत्ता अभी बीजेपी के लिए दूर की कौड़ी। पर लट्ठमलट्ठा शुरू हो गई। अगर सत्ता का मौका मिला, तो राजनीतिक कौशल, महिला और जनता की पसंद होने के नाते सुषमा भी वाजपेयी की तरह गठबंधन में सर्वस्वीकार्य हो सकतीं। सो अभी से ही गुरु घंटालों ने खेल खराब करना शुरू कर दिया। सुषमा ने पटना में ऐसा कुछ नहीं कहा, जो मोदी को बुरा लगे। बीजेपी हमेशा से गैलेक्सी ऑफ लीडर की बात करती। सुषमा ने भी यही कहा था- हर जगह जादूगर अलग-अलग। यानी गुजरात में मोदी, तो बिहार में सुशील-नीतिश। सो मोदी को किसी ने उकसाया या खुद की महत्वाकांक्षा ने जोर मारा, यह मालूम नहीं। पर पीएम इन वेटिंग की कुर्सी की दौड़ शुरू मानिए। नरेंद्र मोदी तो गठबंधन में कभी स्वीकार्य होंगे, आसार नहीं दिखते। सो असली जंग सुषमा बनाम जेतली, नरेंद्र मोदी तो सिर्फ बहाना बन गए। यों सुषमा-मोदी में मतभेद से भी इनकार नहीं। जब पटना कार्यकारिणी में मोदी के इश्तिहारों ने बंटाधार किया। तब भी सुषमा ने नाराजगी जताई थी। यों अरुण जेतली और मोदी की खूब छनती। सो ताजा मतभेद जेतली-सुषमा के बीच होड़ का ही नतीजा। पितृ पुरुष की भूमिका में आ चुके आडवाणी का दिल मोदी के लिए धडक़ता। तो दिमाग से जेतली-सुषमा के बीच बराबर का संतुलन बनाए रखा।
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28/10/2010

Wednesday, October 27, 2010

अब मोदी की मारी बीजेपी बेचारी

चले थे हरि भजन को, ओटन लगे कपास। सचमुच बीजेपी में दो-चार महीने से अधिक शांति नहीं रह सकती। जब तक आपस में टंगड़ी मार राजनीति न खेलें, बीजेपी को राजनीति का मजा नहीं आता। सो बीजेपी में फिर वर्चस्व की जंग छिड़ गई। नीतिश कुमार के वीटो ने नरेंद्र मोदी को बिहार चुनाव प्रचार में घुसने नहीं दिया। तो अब सुषमा स्वराज ने कह दिया- बिहार में नरेंद्र मोदी की आवश्यकता ही नहीं। यहां पहले से ही नीतिश और सुशील मोदी का जादू चल रहा। यानी सुषमा का मतलब, गुजरात में मोदी का जादू चल रहा, पर बिहार में नहीं चलेगा। सो मोदी समर्थक खफा हो गए। कर्नाटक के एक उत्साही विधायक ने भारत के विकास के लिए गुजरात का विकास शीर्षक से मोदीनुमा इश्तिहार छपवा दिया। यों इश्तिहार में गुजरात के स्थानीय चुनाव में चले मोदी मैजिक का बखान। पर सुषमा के बयान के ठीक बाद आए इश्तिहार का राजनीतिक अर्थ निकलना ही था। बुधवार को बीजेपी की उपाध्यक्ष नजमा हेपतुल्ला ने भी सुषमा का नाम नहीं लिया। पर दो-टूक बोलीं- गुजरात से बाहर भी मोदी का जादू चल रहा। नजमा ने बाकायदा दादर नगरहवेली और दमनदीव के स्थानीय चुनाव के आंकड़े गिना दिए। सारा क्रेडिट मोदी मैजिक को दिया। सो बीजेपी की अंदरूनी कलह का अंदाजा आप खुद लगा लें। बीजेपी के भीतर दूसरी पीढ़ी में सिरमौर बनने की होड़ किस कदर बढ़ चुकी, आप खुद देख लें। नरेंद्र मोदी का कहा बीजेपी में कोई नहीं टाल सकता। तो भला शिवराज, रमण क्यों पीछे रहें। सो जब भी मौका मिलता, ये भी आलाकमान के मंसूबे पर पानी फेरने से नहीं चूकते। अब ताजा नमूना बुधवार को ही दिख गया, जब बीजेपी की सबसे महत्वाकांक्षी योजना अंत्योदय के क्रियान्वयन की केंद्रीय टीम में प्रदीप गांधी शामिल हो गए। रमण ने छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनाव के वक्त प्रदीप गांधी को चुनाव समन्वय की टीम में जोड़ा था। पर बवाल मचा, तो हटाए गए। फिर प्रदेश कार्यकारिणी में चुपके से शामिल करा दिया। अब धीरे-धीरे प्रदीप गांधी को केंद्रीय टीम में जगह दिला दी। सनद रहे सो बता दें, प्रदीप गांधी कौन? तो जरा याद करिए ऑपरेशन दुर्योधन। संसद में सवाल पूछने के लिए 11 सांसद कैमरे में अठन्नी-चवन्नी घूस लेते धरे गए थे। महज दस दिन में संसद की आचरण समिति ने बर्खास्तगी की सिफारिश की। तो 23 दिसंबर 2005 को घूसखोर सवालची सांसदों को आउट कर संसद ने इतिहास रच दिया था। प्रदीप गांधी इनमें से एक थे। इन 11 सांसदों में बीजेपी का बहुमत था। प्रदीप गांधी हमेशा से रमण सिंह के दुलारे रहे। लोकसभा में भी रमण की खाली सीट राजसमंद से चुनकर पहुंचे थे। यों भ्रष्टाचारियों को जगह देने में बीजेपी ही नहीं, कांग्रेस भी माहिर। इन सवालची सांसदों में बीएसपी के राजा रामपाल आउट हुए थे। अब यूपी कांग्रेस का राहुल गांधी ने बेड़ा पार लगाया। तो सांसदी की एक सीट से राजा रामपाल ने भी शोभा बढ़ाई। सो नैतिकता के खेल में कोई भी राजनीतिक दल कपड़ा पहनना नहीं चाहता। पर बात बीजेपी की, रमण ने प्रदीप गांधी की एंट्री कराई। पर शिवराज सिंह ने उमा भारती की एंट्री में रोड़ा अटका रखा। यानी बीजेपी के क्षत्रप अब आलाकमान की छाती पर मूंग दल रहे। पर बीजेपी फिलहाल मोदी के वीटो से परेशान। मोदी ने वीटो लगाकर राम जेठमलानी को राजस्थान से राज्यसभा की मेंबरी दिला दी। बीजेपी का कोई नेता इसके लिए राजी नहीं था। पर मोदी ने ठान लिया, तो फिर किसकी मजाल, जो ना करने की हिमाकत करे। नरेंद्र मोदी को गुजरात दंगे से जुड़े मामले में बचाने का ठेका जेठमलानी ने लिया। तो मोदी ने फिर किसी की परवाह नहीं की। आखिरकार नितिन गडकरी को बीजेपी के टिकट से जेठमलानी को मेंबरी देनी पड़ी। पर जेठमलानी के बोल बीजेपी को अब भारी पड़ रहे। यों जब बड़़बोले जेठमलानी को टिकट दिया गया। तभी बीजेपी के एक प्रवक्ता ने कह दिया था- अब हर रोज सफाई देने के लिए तैयार रहना पड़ेगा। सो जातीय जनगणना की मुखालफत, एसएम कृष्णा का समर्थन कर बीजेपी को असहज कर चुके जेठमलानी ने कश्मीर के वार्ताकार दिलीप पडगांवकर का समर्थन कर मुश्किल बढ़ा दी। बीजेपी ने जेठमलानी की निजी राय बता पल्ला तो झाड़ लिया। पर पार्टी दो खेमों में बंट गई। एक धड़ा अनुशासनात्मक कार्रवाई चाह रहा। तो दूसरे में चाहकर भी हिम्मत नहीं। बुधवार को जेठमलानी ने तो यहां तक कह दिया- मंच से प्रवक्ता का कुछ बोल जाना कोई पार्टी लाइन नहीं। मुझे किसी ने नहीं बताया कि पार्टी लाइन क्या है। सो मैं माफी नहीं मांगूंगा। अब बीजेपी दोहरी मुश्किल में। पार्टी ने पडगांवकर के बयान का विरोध किया। जेठमलानी समर्थन कर रहे। पर मुश्किल, न अपना बयान वापस ले सकती, न जेठमलानी पर कार्रवाई कर सकती। कश्मीर पर वार्ताकार पडगांवकर ने दिल्ली लौटने के बाद लालकृष्ण आडवाणी से बात करने का एलान कर दिया। सो अब बीजेपी का स्टैंड क्या रहेगा, यह देखना होगा। बीजेपी के सहयोगी जेडीयू ने भी जेठमलानी का समर्थन कर मुश्किल बढ़ा दी। अब आखिर में सवाल, जब गुजरात दंगे में राज्य सरकार की कोई भूमिका नहीं। तो एक वकील के पीछे समूची बीजेपी दांव पर क्यों? जेठमलानी की वजह से जिन-जिन का टिकट कट गया, अब खुलकर बोल रहे। एक ने यहां तक कह दिया- जेठमलानी कैसे जीते हैं, सबको मालूम। नरेंद्र मोदी के सिवा पार्टी में कोई उन्हें पसंद नहीं करता। पर मोदी की पकड़ मजबूत हो रही। सो मोदी की मारी बेचारी बीजेपी ठीक से सिसक भी नहीं पा रही।
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27/10/2010

Tuesday, October 26, 2010

अभिव्यक्ति की आजादी से ‘गुलाम’ हुई कांग्रेस-बीजेपी

कॉमनवेल्थ घोटाला हो या कश्मीर की किचकिच, खत्म नहीं होने वाली। पर पहले बात घोटाले की। तो जरा कॉमनवेल्थ के आयोजन से हुए फायदे को देखिए। अपने भारत की रैंकिंग ग्लोबल करप्शन इंडेक्स में 84 वें से 87 वें पर पहुंच गई। यानी करप्शन में अपना देश सीधे तीन पायदान छलांग मार गया। बेचारा चीन ओलंपिक कराने के बाद भी 78वें नंबर पर झक मार रहा। सचमुच ऐसे दो-चार कॉमनवेल्थ और हो गए। तो भ्रष्टाचारी देशों की सूची में अपना भारत अव्वल होगा। वैसे भी भ्रष्टाचारियों पर अपने यहां कार्रवाई गाहे-ब-गाहे ही होती। अब देख लो, कॉमनवेल्थ गेम्स को निपटे तेरह दिन हो गए। पर इसे जांच की तेरहवीं न कहें, तो और क्या कहें। अभी तक पीएम की बनाई शुंगलू कमेटी ने जांच का खाका तक नहीं बनाया। कुछ और वक्त लगने की बात कर रहे। यानी तब तक कलमाड़ी-शीला-जयपाल-गिल-अंबिका एंड कंपनियों को कागज बदलने को काफी वक्त मिल जाएगा। अब कोई पूछे, देश को कब तक यों ही लूटते रहेंगे नेता-नौकरशाह? भ्रष्टाचारी देशों की सूची में भारत लगातार आगे बढ़ रहा। फिर भी नेताओं को शर्म नहीं आ रही। अब तो ऐसा लग रहा, कोई उम्दा खरीददार मिल जाए, तो ये देश को भी बेचने से नहीं चूकेंगे। कश्मीर पर जिस तरह राष्ट्र विरोधी बयानों का दौर शुरू हुआ, इस अंदेशे की पुष्टि कर रहा। अलगाववादी नेता सैयद अली शाह गिलानी और अरुंधती राय ने 21 अक्टूबर को दिल्ली में सेमिनार कर आजाद कश्मीर की अलख जगाई। जब सेमिनार में कुछ देशभक्तों ने तिरंगे झंडे लहराए। तो चिदंबरम की दिल्ली पुलिस ने झंडा लहराने वालों को बाहर कर राष्ट्र विरोधियों को संरक्षण दिया। अब गिलानी-अरुंधती के बोल ने केंद्र सरकार को मुश्किल में डाला। तो राष्ट्रद्रोह का मुकदमा चलाने की मंजूरी देनी पड़ी। पर एफआईआर दर्ज करने में अभी इफ एंड बट का खेल। सरकार को डर, गिरफ्तारी से कोई बवाल न मच जाए। सरकार की ऐसी ही लचर नीतियों ने अलगाववाद को हमेशा शह दी। तभी तो देश विरोधी बयान देने के बाद भी अरुंधती राय को कोई मलाल नहीं। अलबत्ता भारत को ही धता बता रहीं। केंद्रीय गृह मंत्रालय ने मुकदमे की हरी झंडी दी। तो अरुंधती राय ने बयान जारी कर कह दिया- मैंने लाखों लोगों के न्याय की बात कही। पर जिस देश में न्याय मांगने वालों को जेल भेजने की बात हो। ऐसे देश में मुझे दया आती है। अब अगर अरुंधती को सचमुच देश पर दया आ रही। तो क्यों नहीं पाकिस्तान की नागरिकता लेकर पीओके में हो रहे जुल्म के खिलाफ आवाज उठातीं? अभिव्यक्ति की आजादी का मतलब यह नहीं, कोई राष्ट्र विरोधी बयान देना शुरू कर दे। खुद विधि मंत्री वीरप्पा मोइली ने गिलानी और अरुंधती की टिप्पणी को अत्यधिक दुर्भाग्यपूर्ण करार दिया। सीधे-सीधे उन ने देशद्रोह बता दिया। पर सवाल, कार्रवाई में इतनी देरी क्यों? जम्मू-कश्मीर के पूर्व सीएम और केंद्रीय मंत्री फारुख अब्दुल्ला ने भी माना। अभिव्यक्ति की आजादी का बेजा इस्तेमाल हो रहा। फारुख बेलौस बोले- हिंदुस्तानी ही हिंदुस्तान का बेड़ा गर्क कर रहे। कुछ लोग आजादी की अभिव्यक्ति का इस कदर फायदा उठा रहे, जिसकी कोई सीमा नहीं। तो इसमें फारुख क्या करें। यों बेजा इस्तेमाल की बात तो फारुख ने सोलह आने सही कही। पर वह कुछ भी करने में असक्षम, यह सही नहीं। फारुख के बेटे उमर ही जम्मू-कश्मीर के सीएम। अगर वोट बैंक की राजनीति छोड़ दें, तो अलगाववादियों पर नकेल कसना कोई बड़ी बात नहीं। पर खुद उमर ने विधानसभा के भीतर अभिव्यक्ति की आजादी का कैसा इस्तेमाल किया, क्या फारुख ने नहीं देखा? जब उमर कश्मीर के विलय पर सवालिया निशान लगा रहे थे, तब फारुख ने क्या किया? घाटी में जाकर फारुख हों या पडगांवकर या मनमोहन, वही बात करते, जो अलगाववादियों को पसंद। सो कश्मीर सिर्फ राजनीति का मुद्दा बनकर रह गई। कांग्रेस इस कदर फंस चुकी कि अरुंधती की हैसियत पर सवाल उठा उनका निजी बयान बता रही। पर बीजेपी ने हमेशा की तरह पडगांवकर से लेकर अरुंधती-गिलानी के खिलाफ मोर्चा खोल दिया। यों बीजेपी के भीतर विभीषणों की कमी नहीं। राम जेठमलानी ने पार्टी लाइन के उलट पडगांवकर का समर्थन किया। बीजेपी के बयानों को बचकाना और अशिष्ट हरकत कह गए। पर बेचारी बीजेपी कुछ नहीं कर पाई। खाल बचाने को प्रकाश जावडेकर बोले- जेठमलानी तो जेठमलानी हैं। वह उनकी निजी राय, पार्टी सहमत नहीं। पर कोई पूछे, अगर जेठमलानी को बीजेपी अशिष्ट और बचकानी नजर आ रही। तो उसके टिकट से सांसद क्यों बने हुए? बीजेपी को भी जेठमलानी की राय पार्टी लाइन के इतर दिख रही। तो कार्रवाई क्यों नहीं कर रही? अपने जसवंत सिंह को निजी हैसियत से किताब लिखने पर इसी बीजेपी ने बर्खास्त कर दिया था। जसवंत पर विचारधारा के उलट काम करने का आरोप लगाया। पर जेठमलानी क्या कर रहे? जातीय जनगणना हो या इस्लामाबाद में हुई कृष्णा-कुरैशी की साझा प्रेस कांफ्रेंस में कृष्णा की चुप्पी का मसला। भरी सभा में जेठमलानी ने अपनी ही बीजेपी का चीरहरण किया। पर जेठमलानी के हाथ चीरहरण करवा बीजेपी को मजा आ रहा। राज्यसभा में पांच अगस्त को जेठमलानी ने एसएम कृष्णा की सराहना की थी। अब पडगांवकर का बचाव कर रहे। पर बीजेपी निजी विचार बता भाग नहीं सकती। कश्मीर के मसले पर जब पीएम से बीजेपी का डेलीगेशन पिछली बार मिला। तो आडवाणी-जेतली-सुषमा के साथ चौथे अहम शख्स जेठमलानी ही थे। सो कश्मीर पर जेठमलानी की राय को बीजेपी निजी बताकर भाग नहीं सकती।
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26/10/2010

Monday, October 25, 2010

कश्मीर की ‘कील’ पर बयानों का हथौड़ा

मंगलवार को तिरेसठ साल पूरे हो जाएंगे कश्मीर के भारत में विलय को। छब्बीस अक्टूबर 1947 को विलय पत्र पर महाराजा हरि सिंह ने दस्तखत किए थे। पर यह कश्मीर का दुर्भाग्य, कहने को तो धरती का स्वर्ग। पर कभी अमन-चैन नहीं रहा। घाटी कभी अमेरिका-ब्रिटेन की कुटिल कूटनीति की, तो कभी अपने सियासतदानों के वोट बैंक की राजनीति की शिकार हुई। जब भारत आजाद हुआ, तब दुनिया दो हिस्सों में बंटी थी। सो अंग्रेजों ने रणनीति के तहत पहले भारत के दो टुकड़े करवाए। फिर रियासत-ए-कश्मीर को भारत-पाक के बीच हमेशा के लिए विवाद का मुद्दा बना दिया। अब अमेरिका अपनी सहूलियत के मुताबिक कभी पाक को शह देता। तो कभी हाथी के दिखाने वाले दांत की तरह भारत के साथ थोथी सहानुभूति। पर जब घर दुरुस्त न हो, तो बाहर वाले मजा उठाएंगे ही। जम्मू-कश्मीर के तथाकथित होनहार और युवा सीएम उमर अब्दुल्ला ने अपनी कुर्सी बचाने को कश्मीर के विलय पर ही सवाल उठा दिए थे। सो ऐसी बहस छिड़ी, अब सुर्खियां पाने को तथाकथित मानवाधिकारवादी झोला-झंडा उठाए निकल पड़े। अरुंधती राय पहले नक्सलवादियों के पक्ष में बोल सुर्खियां बटोर चुकीं। तो भला कश्मीर की आग में भुट्टा सेकने से क्यों चूकतीं? सो उन ने भी कश्मीर के विलय पर सवाल उठा दिए। अरुंधती राय ने भारत सरकार को ब्रिटिश साम्राज्यवाद का प्रतिरूप बता दिया। आरोप लगाया- पूर्वोत्तर में असंतोष को दबाने के लिए सेना में भर्ती कश्मीरियों का, तो कश्मीरियों की आवाज दबाने के लिए सेना में भर्ती पूर्वोत्तर के लोगों का इस्तेमाल कर रही सरकार। अब अरुंधती राय के बयान का मतलब आप खुद निकालें। पर अरुंधती से एक सवाल, क्या कश्मीर को पाक के हवाले कर देना चाहिए? अरुंधती तो काफी पढ़ी-लिखी और इतिहास को समझने वाली। फिर कश्मीर के इन हालात के लिए कौन जिम्मेदार, यह नहीं जानतीं? पाक ने कश्मीर को हथियाने के लिए तब खूब तिकड़म की। जिन्ना ने अपने अंग्रेज सैन्य सचिव को तीन बार महाराजा के पास भेजा। जिन्ना ने जबरन विलय की रणनीति भी बना ली थी। पाकिस्तानी कबाइलियों की घुसपैठ बढ़ गई थी। फिर भी कामयाबी नहीं मिली, तो पाक ने हमला बोल दिया। तब महाराजा हरि सिंह ने सूझ-बूझ दिखा भारत में विलय का फैसला लिया। फिर भारतीय सेना ने श्रीनगर पहुंच पाक कबाइलियों को मार भगाया। अब अरुंधती बताएं, किसने कश्मीर की आजादी को दासता में बदलने की कोशिश की? अपने देश में सचमुच कथित मानवाधिकावारियों ने राष्ट्र विरोधी बयान देना अपना फैशन बना लिया। नक्सलवादी हों या अलगाववादी, अगर सरकार वार्ता को राजी। तो फिर हिंसा क्यों नहीं छोड़ते? कुछ हिस्सों का विकास से दूर हो जाना एक गलती। पर जब तक बात नहीं होगी, काम कैसे होगा? अगर नक्सली बंदूक से बोलेंगे, तो फिर सरकार से आप निहत्थे जंगल में आने की कैसे सोच सकते? पता नहीं ऐसे मानवाधिकारवादियों को क्या हो गया, जिन्हें संसद पर हमले के दोषी अफजल का मानवाधिकार तो दिखता है। पर संसद हमले में शहीद अपने सुरक्षा बलों के परिजनों के आंसू नहीं दिखते। नक्सलवादियों-अलगाववादियों के पैरोकार अगर सचमुच देश से प्रेम करते, तो क्यों नहीं खुद मध्यस्थ की भूमिका निभाते? मीडिया के सामने चार बौद्धिक बातें कर लेना कोई बुद्धिमानी नहीं। बुद्धिमानी तो तब दिखेगी, जब पैरोकार पहल कर नक्सलवाद-अलगाववाद के नासूर को खत्म करने में अहम किरदार निभाएं। पर असलियत कुछ और। जब ऐसे मुद्दे नहीं होंगे। तो ऐसे बुद्धिजीवियों के पास करने को क्या बचेगा? यही हाल राजनेताओं का, जो कभी वोट बैंक से जुड़े मुद्दे दफन नहीं होने देते। अब कश्मीर जून से सितंबर तक सुलगता रहा। तो दिल्ली से सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल गया। अब केंद्र ने वार्ताकारों का नया समूह गठित किया। तो पेशे से पत्रकार दिलीप पडगांवकर की रहनुमाई में तीनों मेंबर घाटी पहुंचे। पर काम शुरू करने से पहले ही ऐसा बयान दिया, बखेड़ा खड़ा हो गया। पडगांवकर ने कश्मीर समस्या के समाधान में पाकिस्तान को शामिल किए जाने की जरूरत बता दी। यानी अरसे से जो बात अलगाववादी कह रहे, वही कह दिया। सो बीजेपी ने पीएमओ से सफाई मांगी। कांग्रेस को कुछ न सूझा, तो पडगांवकर पर ही छोड़ दिया। पर इतना जरूर कहना पड़ा- समूचे कश्मीर नहीं, पाक से सिर्फ उसके कब्जे वाले कश्मीर पर ही बातचीत हो सकती। यानी केंद्र में सरकार किसी की भी हो, सभी 22 फरवरी 1994 के संसद के संकल्प से बंधे हुए। जिसमें साफ कहा गया- जम्मू-कश्मीर भारत का अभिन्न हिस्सा। पीओके को फिर से हासिल करने का काम बाकी, जिसे जल्द पूरा किया जाना चाहिए। अब पडगांवकर-अरुंधती के बयानों को कौन सा संकल्प कहेंगे? माना, समस्या के समाधान के लिए खुले मन से बात हो। पर खुले मन का मतलब यह नहीं, भारत को पाकिस्तान के हवाले कर दें। वार्ताकार यह क्यों भूल रहे, भौगोलिक सीमा एक शाश्वत सच है। वार्ताकार अगर अलगाववादियों की जुबान बोलेंगे, तो फिर वार्ता के क्या मायने? पडगांवकर के बयान से कांग्रेस ठहरी, तो बीजेपी हमलावर। पर कश्मीर के विलय पर उंगली उठा चुके सीएम उमर ने सराहना की। सो कश्मीर मुद्दा कभी सुलझेगा, दूर-दूर तक आसार नहीं दिख रहे। पहल तो कई दफा हो चुकी। पर जितनी बार बात हुई, बनी कम, बिगड़ी अधिक। वार्ताकार का मतलब तो अब सरकार की ओर से अपने पसंदीदा लोगों को नौकरी देना हो गया। ---------
25/10/2010

Friday, October 22, 2010

....तो गांव के लोग अब पेटू हो गए!

सचमुच नेताओं को शर्म है कि आती नहीं। आम आदमी जैसे-तैसे महंगाई झेल ही रहा। पर नेताओं को अब गरीबों का झेलना भी गवारा नहीं। इनका वश चले, तो गरीबी भले न मिटे, गरीबों को जरूर मिटा देंगे। सो अबके योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह आहलूवालिया ने महंगाई का ठीकरा गांव-गरीबों पर फोड़ दिया। अब इसे बेहयाईपन की हद पार करना न कहें, तो क्या कहेंगे? यों राजनीतिक नफा-नुकसान के लिहाज से आहलूवालिया सही फरमा रहे। सोचो, जब इंदिरा गांधी ने गरीबी हटाओ का नारा दिया था। तभी गरीबी मिट जाती, तो आज कांग्रेस क्या घास छीलती? सोनिया-मनमोहन राज में फिर यह नारा कैसे बनता- कांग्रेस का हाथ, गरीब और आम आदमी के साथ। तभी तो दादी इंदिरा से पोता राहुल तक, गरीबी ही राजनीतिक जुमला बनी हुई। अगर गरीब सुखी-संपन्न हो गए, तो फिर राजनीति की दिशा बदल जाएगी। वोट बैंक नाम की चिडिय़ा फुर्र हो जाएगी। सो मोंटेक ने बेलाग कह दिया- गांवों के लोगों की आय और जीवन स्तर बढऩे से खाद्य पदार्थों की मांग बढ़ी। इसीलिए महंगाई भी बढ़ी। अगर सीधे-सपाट लहजे में मोंटेक उवाच को समझें। तो मतलब यही, गांव के लोग अब पेटू हो गए। यही भाषा अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति जार्ज बुश इस्तेमाल कर चुके। उन ने वैश्विक महंगाई का जिम्मेदार भारत-चीन को ठहराया था। भारत-चीन के लोगों खदोड़ कह दिया था। सो मोंटेक भले अपने योजना आयोग का जिम्मा संभाल रहे। पर लंबे समय तक अमेरिका में काम कर चुके। सो अमेरिकी वेश-भूषा, रहन-सहन के साथ अब भाषा भी वैसी हो गई। पर मनमोहन के बयान बहादुरों में सिर्फ मोंटेक ही नहीं। शरद पवार, मुरली देवड़ा, जयराम रमेश यहां तक कि खुद मनमोहन भी इस होड़ में शामिल। सनद रहे, सो बता दें। अपने शरद पवार ने जब-जब मुंह खोला, महंगाई बढ़ी। हर बार ऐसे बयान दिए, गरीबों का जख्म कुरेद दिया। एक बार कहा था- मैं कोई ज्योतिषी नहीं, जो बताऊं, महंगाई कब कम होगी। फिर चीनी महंगी हुई। तो बयान दिया- चीनी नहीं खाएंगे, तो मर नहीं जाएंगे। फिर चावल उत्पादक राज्यों में रोटी खाने वाली जनता को जिम्मेदार बता दिया। साग-सब्जी, फल महंगे हुए। तो पवार ने कहा था- जब पेप्सी-कोला खरीद सकते, तो महंगी फल-सब्जी क्यों नहीं। पर पवार को छोडि़ए। सही मायने में पवार देश के कृषि मंत्री नहीं, क्रिकेट मंत्री कहे जाते। पर महंगाई ने जब-जब कांग्रेस को घेरा, कांग्रेस और उसकी सरकार ने बेशर्मी की सारी लक्ष्मण रेखा लांघ दी। बाईस मई-2004 को मनमोहन पीएम बने। नवंबर से ही महंगाई ने अपने तेवर दिखाने शुरू कर दिए। फिर वित्त मंत्री रहते चिदंबरम ने बजट पेश किया, तो कुत्ते के खाने वाले बिस्किट की कीमतें घटा दीं। पर बाहर महंगाई पर सवाल हुआ, तो मुस्कराते हुए कहा था- कुत्ते के बिस्किट का दाम घटा दिया। फिर महंगाई रोकने को कोई जादू की छड़ी नहीं वाला बयान तो चिदंबरम से लेकर सिब्बल तक और पूरी कांग्रेस कई बार दे चुकी। पेट्रोल, डीजल, रसोई गैस के दाम बढ़े, तो पेट्रोलियम मंत्री मुरली देवड़ा ने कंपनियों को फायदा पहुंचाने के लिए जनता को भगवान भरोसे छोड़ दिया। शीला दीक्षित की अहंकारी टिप्पणियां तो कई बार अपना खून जला चुकीं। चुनाव से पहले गैस के दाम पर सब्सिडी दी, पर चुनाव बाद बेशर्मी से सब्सिडी हटा ली। शीला ने भी कहा था- अकेले महंगाई नहीं बढ़ी, लोगों की आमदनी भी बढ़ी। सो महंगाई पर हाय-तौबा करने की जरूरत नहीं। अब कांग्रेसी नेताओं के इतने सारे बयानात देखने-सुनने के बाद मोंटेक सिंह आहलूवालिया का बयान कांग्रेसी सोच को आगे बढ़ाने वाला ही लग रहा। पर जिस गांव-गरीब को मोंटेक ने पेटू कहा। अब अधिक पीछे नहीं, इसी साल लालकिले के प्राचीर से पीएम मनमोहन जो योजना आयोग के अध्यक्ष भी, उन ने महंगाई पर कुछ यों फरमाया था। उन ने कहा था- महंगाई से सबसे अधिक गरीब प्रभावित हुए। पर मनमोहन के जूनियर मोंटेक तो गरीब को महंगाई का जिम्मेदार बता रहे। आखिर कब तक गांव-गरीब को छलेगी कांग्रेस सरकार। महंगाई के लिए और कितनी वजहें गिनाई जाएंगी? पहले महंगाई को एनडीए से विरासत में मिली बताया। फिर बीजिंग ओलंपिक पर ठीकरा फोड़ा। कभी लोगों की खान-पान की आदत में बदलाव वजह बताई। अब गांव की समृद्धि को वजह बता दिया। सो सवाल राहुल गांधी से। जो भारत को दो हिस्सों यानी, चमकता और पिछड़ा भारत में बांट चुके। खुद को गांव-गरीब का रहनुमा बताते फिर रहे। अब राहुल बताएं, मोंटेक के बयान से कैसे एक ही पायदान पर खड़ा होगा भारत? गांव में आज भी अधिकतर आबादी ऐसी, जो महज दो जून की रोटी के लिए सुबह से शाम तक संघर्ष करती। पर गांव-गरीब की बात करने वाली कांग्रेस महंगाई के इस दौर में गरीबों के खाली पेट को सहलाना तो दूर, उलटे लात मार रही। सो अब कांग्रेस पर जनता कैसे एतबार करे। बिहार चुनाव में सोनिया-राहुल-मनमोहन ने चीख-चीख कर कहा- बिहार के विकास के लिए हमने पैसा दिया। तो शुक्रवार को बीजेपी ने पूछ लिया- क्या इन तीनों ने अपनी निजी संपत्ति में से दिया? पर नेताओं का क्या, अभी कुछ, घंटे भर बाद कुछ। गांव-गरीब की फिक्र तो छोडि़ए, देश को भी भगवान भरोसे छोड़ रखा। अलगाववादी नेता सैयद अलीशाह गिलानी अब दिल्ली में आकर पृथक कश्मीर की आवाज बुलंद कर गए। पर अपनी पुलिस ने तिरंगा झंडा लहराने वालों को सेमिनार हॉल से ही बाहर कर दिया। सो नेताओं से अब लाज की कैसी उम्मीद?
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22/10/2010

Thursday, October 21, 2010

मोदी ने दी चोट, तो कांग्रेस को भी दिखा ईवीएम में खोट

कहते हैं ना, सांच को आंच नहीं। कर्नाटक की राजनीति में इस बार भी सभी राजनीतिक दल नंगई पर उतर आए। पिछली विधानसभा में कांग्रेस-जेडीएस-बीजेपी ने कैसे बारी-बारी सत्ता का बीस-बीस महीने बलात्कार किया, किसी से छुपा नहीं। बीजेपी को तब बीस महीने का पूरा हक नहीं मिला। तो अबके सरकार बचाने में सत्ता के दुरुपयोग की कोई कसर नहीं छोड़ रही। सो खरीद-फरोख्त के खेल में कोई पीछे नहीं। कोई स्टिंग कर रहा, तो कोई विधायक तोड़ रहा। कुल मिलाकर लोकतंत्र की ऐसी-तैसी करने को सभी ओवरटाइम कर रहे। कभी अपना देश सोने की चिडिय़ा कहलाता था। तो अंग्रेज सारा सोना लूट ले गए। पर आजादी के बाद नेताओं ने राजनीति को सोने का अंडा देने वाली मुर्गी बना दिया। सो अब कुर्सी बचानी हो या करप्शन करके बचना हो, सब कुछ बिकाऊ हो गया। चाहे जब एमपी-एमएलए खरीद लो, चाहे जब करप्शन का एक हिस्सा जांच करने वालों को सरका दो। सारा मामला रफा-दफा। गुरुवार को इसकी एक मिसाल भी मिल गई। कॉमनवेल्थ घोटाले में इनकम टेक्स डिपार्टमेंट कैसे लगातार छापे मार रहा। मानो, भ्रष्टाचार की कलई चंद दिनों में खोलकर रख देगा। पर झूठ के पांव नहीं होते। अब आईटी डिपार्टमेंट की हकीकत का एक और नमूना देखिए। करीब चार हजार करोड़ के घोटाले के मामले में झारखंड के पूर्व सीएम मधु कोड़ा फिलहाल जेल की हवा खा रहे। पर कोड़ा के खिलाफ तथ्य जुटाने वाले अधिकारी उज्ज्वल चौधरी को जांच से हटाने पर डिपार्टमेंट इस कदर आमादा कि सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया। राजनीतिक दबाव में जब चौधरी के ट्रांसफर की कोशिश हुई। तो झारखंड हाईकोर्ट ने रोक लगा दी। पर आईटी डिपार्टमेंट ने अटार्नी जनरल के जरिए सुप्रीम कोर्ट में अर्जी लगाई। गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के फैसले पर चार हफ्ते का स्टे लगा दिया। यानी जांच अधिकारी उज्ज्वल की विदाई तय हो गई। अब अपनी व्यवस्था को क्या कहेंगे। कॉमनवेल्थ गेम्स में 70 हजार करोड़ रुपए लुटाए गए। जो देश के शिक्षा बजट से करीब छह गुना अधिक। अगर यह धन शिक्षा या किसी अन्य मद में खर्च होता, तो आने वाली पीढ़ी को कुछ कर दिखाने का बेहतर मौका मिलता। पर गेम्स से क्या मिला? कॉमनवेल्थ गेम्स के रिकार्ड न तो मान्य और न ही कोई अनोखा रिकार्ड बनाया। खिलाडिय़ों के ऊपर महज साढ़े तीन सौ करोड़ खर्च हुए। बाकी आयोजन करने वालों ने मिल-बांट लिए। अब देखो, पहले गेम्स के नाम पर भ्रष्टाचार। बेतहाशा धन खर्च किया गया। अब जांच के नाम पर धन खर्च होगा। पर मिलेगा क्या? कल को कोई बड़ा नेता फंस गया। तो जांच अधिकारी बदलने में कितना वक्त लगेगा? झारखंड में मधु कोड़ा को बचाने के लिए आखिर आईटी डिपार्टमेंट इतना सक्रिय क्यों? भ्रष्टाचार तो अब सत्ता की जोड़-तोड़ में संजीवनी बन चुका। माया-मुलायम-लालू के केस अपनी कहानी खुद बता रहे। सो नेता अब कम से कम समय में अपनी सात पीढ़ी को संपन्न बना लेना चाहता। तभी तो जनता की नब्ज भांपना भूल चुके नेता। देश का वोटर अब इतना परिपक्व हो चुका कि नेताओं को चुनाव बाद ही असली तस्वीर दिखती। जैसे ऊपर वाले की लाठी में आवाज नहीं होती। वैसे ही लोकतंत्र में जनता की लाठी भी हो गई। सो हारने वाले नेता दिल से हार नहीं कबूल पा रहे। याद करिए, कैसे आडवाणी के मंसूबों पर पानी फिरा। तो बेजुबान, बेचारी ईवीएम मशीन को हार का जिम्मेदार ठहराने लगे। बीजेपी नेता ने तो तथ्यों का विश्लेषण कर किताब लिख डाली। पर अब यही रोग कांग्रेस को भी लग गया। गुजरात में मोदी का मैजिक कांग्रेस के लिए रहस्य बना। पिछले विधानसभा चुनाव के बाद तो कांग्रेसी कहने लगे थे- मोदी को कैसे हराना है, यह मोदी से ही पूछो। पर अब पंचायत चुनाव में भी मोदी मैजिक चला। तो कांग्रेस ने मशीन पर ठीकरा फोड़ दिया। गुजरात प्रदेश कांग्रेस ने दिल्ली में गुहार लगाई। चुनाव आयोग को बाकायदा शिकायत सौंप दी। कांग्रेस प्रवक्ता मोहन प्रकाश बोले- मोदी मैजिक की पोल अब खुल गई। पर सवाल, जब ईवीएम में खोट, तो अपने नवीन चावला के जरिए ठीक क्यों नहीं करवाया? क्या सिर्फ गुजरात के ईवीएम में खोट? अगर विधानसभा और लोकसभा चुनाव में हारने वाली पार्टी ईवीएम पर ऐसे ही ठीकरा फोडऩे लगे। तो लोकतंत्र का क्या होगा? अपने नेताओं में हार कबूलने का साहस क्यों नहीं? क्यों नहीं समझ पा रहे, अब देश के परिपक्व वोटरों को बरगलाना खालाजी का घर नहीं। जनता के निर्णय अब ऐसे होने लगे, बड़े-बड़े रणनीतिकार तो क्या, सैफोलॉजिस्ट भी सौंफ फांकते दिख रहे। पर नेता अपनी हार के लिए मशीन को जिम्मेदार ठहरा रहे। मानो, जनता कुछ भी नहीं। अब बिहार चुनाव का पहला दौर गुरुवार को निपट गया। तो शेखचिल्लियों ने खूब दावे किए। रामविलास पासवान ने तो 90 फीसदी जनता को लोजपा-राजद गठबंधन के साथ बताया। यों देर शाम चुनाव आयोग ने आंकड़े जारी किए। तो पता चला, कुल 54 फीसदी ही वोट पड़े। लालू-पासवान अबके नीतिश का तख्ता पलटने का दंभ भर रहे। पर ऐसा न हुआ, तो लालू-पासवान भी ईवीएम मशीन पर ठीकरा फोड़ें, तो कोई हैरानी नहीं। अब शायद यही परंपरा बनने वाली। हर राज्य में विपक्ष मशीन को ढाल बना हार की खीझ मिटाएगा।
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21/10/2010