Thursday, November 4, 2010

गरीबों को ‘दीया’ छीन कब तक जलेगा चिराग?

त्योहारी सीजन का यही अनोखापन, कब वक्त बीत जाता, पता भी नहीं चलता। अपने नेताओं के झूठे वादों की तरह नहीं, जिसके इंतजार में उम्र निकल जाती। पर वादा निभाने का दिन कभी नहीं आता। तभी तो गरीबी के अभिशाप को मिटाने की कभी ईमानदार कोशिश नहीं हुई। अगर गरीबी दूर हो गई, तो फिर राजनेताओं को तो वोट के लाले पड़ जाएंगे। सो गरीबी ऐसा पटाखा हो गई, जिसे चुनावों में हर नेता फोड़ जश्न मनाता। एक चुनाव में हाथ अगर गरीब के साथ होता, तो अगले चुनाव में नारा बदल आम आदमी के साथ हो जाता। कोई दल कभी हिंदुत्व का झंडा उठाता। तो अगले चुनाव में राष्ट्रवाद का नारा। यानी शब्दों की जुगाली तो कोई नेताओं से सीखे। सो आम आदमी कहो या गरीब, अब महंगाई पर सरकार से किसी करिश्मे की उम्मीद नहीं कर रहा। अलबत्ता महंगाई को आत्मसात कर त्योहार मना रहा। आखिर जनता निकम्मी सरकारों से उम्मीद भी क्या करे। जब चुनावी मौसम होता, तो तोहफों की बारिश कर देते। पर जैसे ही सत्ता मिल जाती, नशा सिर चढक़र बोलने लगता। वैसे भी अबके दिवाली के मौके पर मनमोहन सरकार को त्योहार से अधिक बराक ओबामा दौरे की फिक्र। सो सरकारी अमला त्योहारी छुट्टी के बावजूद दौरे की तैयारी में जुटा। बीजेपी ने ओबामा की संरक्षणवादी नीति पर विरोध दर्ज कराने का एलान कर दिया। तो विदेश सचिव निरुपमा राव ने भोपाल त्रासदी के गुनहगार वारेन एंडरसन को छोटा मुद्दा बता दिया। निरुपमा बोलीं, एंडरसन से भी बड़े मुद्दे हैं, जिन पर राष्ट्रपति ओबामा से बात होगी। अब इसे संवेदनाशून्य बयान न कहें, तो क्या कहें। जिस त्रासदी ने भोपाल के लोगों की कई पीढी तबाह कर दी। उसके मुख्य गुनहगार को भारत लाने की बात अपने विदेश मंत्रालय की नजर में ऐरा-गैरा मुद्दा। वैसे कांग्रेसी सरकार से उम्मीद भी क्या। जब भरी संसद में वारेन एंडरसन को भगाने के रिकार्ड नहीं होने का एलान कर दिया गया। तो अब क्या उम्मीद? पर पिछली दिवाली से इस दिवाली राजनीतिक उथल-पुथल इस बात का सबूत कि वक्त हमेशा एक जैसा नहीं होता। पिछले साल दिवाली के वक्त बीजेपी तमाम झंझावातों से गुजर रही थी। महंगाई, आर्थिक मंदी और आतंकवाद जैसे मुद्दों के बावजूद लोकसभा चुनाव की हार ने बीजेपी को इतना हिला दिया था कि नींव हिलने लगी थी। राजस्थान विधानसभा में विपक्ष के नेता पद से वसुंधरा राजे के इस्तीफे को लेकर तबके अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने घोड़े खोल रखे थे। याद करिए, 17 अक्टूबर की दिवाली से ठीक पहले धनतेरस के दिन 15 अक्टूबर को पार्लियामेंट्री बोर्ड की मीटिंग में कैसे लालकृष्ण आडवाणी ने वसुंधरा से इस्तीफा लेने का फैसला वापस लेने की अपील की। पर राजनाथ सिंह ने आडवाणी तक की अपील खारिज कर दी थी। बोर्ड की मीटिंग में तनाव इस कदर बढ गया कि चार घंटे तक मंथन चलता रहा। पर धनतेरस के दिन बीजेपी अब महिला नेत्रियों पर कोई अहम फैसले से परहेज करती। उमा भारती को 10 नवंबर 2004 को धनतेरस के दिन ही सस्पेंड किया था। यानी पिछली दिवाली बीजेपी अपना ही दिवाला निकालने में लगी थी। पर कैडर बेस पार्टी होने का यही फर्क होता। साल भर बाद ही दिवाली में बीजेपी में शांति का माहौल। बीजेपी नेताओं ने बड़े इत्मिनान के साथ दिवाली मनाई। पर पिछले साल सत्ता में वापसी के बाद दिवाली पर घी का दीया जलाने वाली कांग्रेस इस बार फटेहाल। टू-जी स्पेक्ट्रम घोटाले में सुप्रीम कोर्ट की तल्ख टिप्पणी तक आ चुकी। पर ए. राजा को संचार मंत्रालय से हटाने की हिम्मत नहीं जुटा पा रही कांग्रेस। कॉमनवेल्थ घोटाले और मुंबई आदर्श सोसायटी घोटाले के तो वाकई क्या कहने। भ्रष्टाचार के मुद्दे ने कांग्रेस को इस कदर घेर रखा कि अब कांग्रेस कुछ कहने के बजाए, दबी जुबान कहती फिर रही- भ्रष्टाचार को जिंदगी का हिस्सा हो चुका। अब दबी जुबान ही सही, कोई सत्ताधारी पार्टी ऐसी सोच रखती हो। तो आप उससे देश हित की क्या उम्मीद रखेंगे? पर वक्त का पहिया घूमने में देर नहीं लगती। तभी तो पिछली दिवाली बीजेपी टेंशन मेें थी। तो अबके कांग्रेस फटेहाल दिख रही। भ्रष्टाचार से धन तो जुटा लिए। आम आदमी का पैसा अपनी जेब में भर लिया। जनता गरीबी और महंगाई के बोझ तले दबी। पर कांग्रेस भ्रष्टाचार को पनाह देने में लगी हुई। अब सवाल, आम आदमी का ‘दीया’ छीन कांग्रेस कब तक अपना ‘चिराग’ जलाएगी? भ्रष्टाचार की हांडी तो एक-न-एक दिन फूटेगी ही। चारा घोटाले वाले लालू आज किस कदर पानी मांग रहे। बोफोर्स ने कैसे देश में तख्ता पलट कर दिया। यह किसी को भी नहीं भूलना चाहिए। पर राजनीति की बातें तो होती रहेंगी। फिलहाल दीपावली की आप सबको ढेर सारी शुभकामनाएं।
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04/11/2010

Wednesday, November 3, 2010

लुटे-पिटे ओबामा से भला कैसी उम्मीद?

तो धनतेरस भी बीत गया। बाजारों में खूब रौनक रही, लोगों ने दिल खोलकर खरीददारी की। भले भारत दो हिस्सों दिखता हो, जैसा खुद राहुल गांधी कह रहे। पर अपने भारत की यही बड़ी खासियत, त्योहार के रंग में लोग इस कदर रंग जाते। अमीरी-गरीबी का फर्क भले कुछ पल के लिए ही सही, पर मिट सा जाता। अपनी संस्कृति में यही अनोखापन, जो विविधता से भरे भारत को एक सूत्र में पिरोए रखता। पर देखिए, जहां त्योहार हमारी एकता का आदर्श बन जाता। वहां आदर्श के नाम पर नेता-नौकरशाह कितनी लूट मचाते। बुधवार को नौ सेना ने रक्षा मंत्रालय को अपनी अंतरिम रपट दी। तो साफ कर दिया, सोसायटी की जमीन पर सेना का हक। पर महाराष्ट्र सरकार भी अपना दावा जताती रही है। नौ सेना ने सोसायटी को एनओसी नहीं दी। सुरक्षा के लिहाज से मौजूदा इमारत को खतरा भी बताया। अब सवाल अपनी नौ सेना से भी। नेताओं-नौकरशाहों की नीयत तो हमेशा ही रेवडियों की खातिर लपलपाई रहती। पर नौ सेना के अहम ठिकानों के बिलकुल पास में 31 मंजिला इमारत खड़ी हो गई। तो नौ सेना को तब क्यों नहीं दिखा। इतनी बड़ी इमारत कोई रातों-रात तो खड़ी नहीं हो गई। सो सवाल, नौ सेना ने पहले ही इस इमारत का निर्माण रुकवाने को कोई ठोस कदम क्यों नहीं उठाए? अपना इरादा नौ सेना की क्षमता पर संदेह का नहीं। पर सेना की रपट से ही यह सवाल निकल रहा। आखिर नौ सेना किस तरह से सुरक्षा का जिम्मा संभाल रही थी, जो इतनी बड़ी इमारत बन गई और उसे पता भी नहीं चला? यानी इस आदर्श घोटाले में सबके सब एक ही थाली के चट्टे-बट्टे निकले। अगर सेना के कुछ वरिष्ठ अधिकारियों की मिलीभगत नहीं होती। तो इतनी बड़ी भ्रष्ट इमारत खड़ी नहीं हो पाती। सो आदर्श फ्लैट धारको में नेताओं-नौकरशाहों के साथ-साथ सेना के नामी-गिरामी हस्तियों की भी कलई खुल गई। अब तक खुद को पाक बताने वाले विलासराव देशमुख के भी चेहरे से नकाब उतर गया। जब कानूनी सीमा से बाहर जाकर आदर्श सोसायटी को फायदा दिलाया। सो आदर्श के चक्कर में फर्श घिस रही कांग्रेस। ऊपर से कॉमनवेल्थ करप्शन पर बीजेपी लगातार परतें उधेडऩे में जुटी। नितिन गडकरी ने केबिनेट के फैसलों के नोट जारी कर दिया। तो शाहनवाज हुसैन ने आरोप लगाया, घोटाले में कांग्रेस खुद चोर और चौकीदार बनी बैठी। सो कांग्रेस अबके भ्रष्टाचार के जाल में बुरी तरह फंस चुकी। मंगलवार के कांग्रेस अधिवेशन में भ्रष्टाचार पर चुप्पी मीडिया की सुर्खियां बनी। तो बुधवार को कांग्रेस प्रवक्ता मनीष तिवारी सफाई देने मैदान में आए। उनने मीडिया की समझ पर सवाल उठा अपनी समझनदानी बड़ी बता दी। बोले- आपलोग सोनिया गांधी के भाषण को सही ढंग से समझ नहीं पाए। उन्होंने वर्करों को बुनियादी मूल्य न भूलने और संयम-सादगी का मंत्र दिया था, जिसमें संदेश साफ निहित है। यानी कांग्रेस भ्रष्टाचार के सिवा बाकी सभी मुद्दो पर सीधा-सीधा बोलती है। अब इसे राजनीतिक बेशर्मी नहीं, तो और क्या कहेंगे? भ्रष्टाचार का इतना बड़ा मुद्दा, पर कांग्रेस सीधा बोलने से बच रही। अब अगर मनीष तिवारी की दलील मान भी लें। तो क्या मंगलवार को सोनिया का भाषण दिग्वििजय सिंह को भी समझ नहीं आया। उन ने तो मंगलवार को ही कहा था, जरुरी नहीं हर मंच से भ्रष्टाचार की बात हो। सो कांग्रेस के वाकई क्या कहने। अब अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा के दौरे के बाद फिर हंगामा बरपेगा। बीजेपी ने संसद में घेरने की पुख्ता रणनीति बना ली। पर उससे पहले बराक ओबामा के स्वागत की तैयारी में मनमोहन सरकार बिछ चुकी। दिवाली के मौके पर मुंबई छावनी में तब्दील हो गई। ओबामा के संग तीन हजार से अधिक लोग आ रहे। सो अमेरिका मुंबई विजिट पर रोजाना 900 करोड़ खर्च करेगा। अब आप ही सोचिए, ओबामा का सीधे भारत की आर्थिक नगरी मुंबई में आना। सारा फोकस मुंबई पर करना, क्या यों ही। सही मायने में भारत में दिवाली का जश्न, तो उधर अमेरिका में बराक ओबामा का दिवाला निकल गया। लोकप्रियता के शिखर पर पहुंच जिस तरह अमेरिका के पहले अश्वेत राष्ट्रपति होने का गौरव हासिल किया। अब धराशायी मार्केट की तरह लोकप्रियता भी गिर गई। मध्यावधि चुनाव में ओबामा की पार्टी डेमोक्रेटिक का हाउस ऑफ रिप्रजेंटेटिव में बहुमत खत्म हो गया। अब रिपब्लिकन ने बहुमत हासिल कर लिया। सीनेट में भी रिपब्लिकन डेमोक्रेट के करीब आ गई। यानी 21 महीने में ही ओबामा लुट गए। यों व्यक्तिगत तौर पर लोग ओबामा को पसंद करते, पर उनकी नीतियां बेअसर साबित हुई। आर्थिक मंदी से उबरने में नाकाम ओबामा अब भारत दौरे से खुद उम्मीद लगाए बैठे। सो दौरे से पहले ही कह दिया, सुरक्षा परिषद में स्थाई सदस्यता, दोहरी टेक्नोलॉजी का मामला बेहद जटिल। पर एक पते की बात कह गए ओबामा। उनने पाक को मुंबई हमले के दोषियों पर जिम्मेदार कार्रवाई की नसीहत दी। तो लगे हाथ, रणनीतिक साझेदारी के लिए भारत को अपनी टॉप पालिसी बताया। आखिर में कहा, दुनिया में बहुत नेताओं से मिला। पर उनमें मनमोहन सर्वाधिक अदभूत नेता। यानी कुल मिलाकर अमेरिका हमें जुबानी सराहना देगा, बदले में भारत के बाजार में अपना माल खपाने का बंदोबस्त कर जाएगा। वैसे भी लुटे-पिटे ओबामा से भारत भला उम्मीद भी क्या करे।
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03/11/2010

Tuesday, November 2, 2010

तो भ्रष्टाचार पर चुप्पी भी कांग्रेसी ‘आदर्श’

तो कांग्रेस की एक दिनी चौपाल आधे दिन में ही निपट गई। एआईसीसी मेंबरों का चुनाव न होना था, न हुआ। अलबत्ता परंपरा के मुताबिक सोनिया गांधी को ही मनोनयन का हक मिल गया। सो सोनिया बोलीं, मनोनयन की डगर इतनी आसान नहीं। सो कुछ लोगों को घाटा उठाने को तैयार रहना होगा। पर लगे हाथ उन ने यह भी कह दिया, धीरज रखने से कांग्रेस में कभी-न-कभी नंबर आ ही जाता है। यों यह कितना सच, आप प्रणव दा से ही पूछ लो। अब सोनिया गांधी सीडब्लूसी का एलान चाहे जब करें। पर अधिवेशन में राहुल गांधी का जादू खूब चला। कांग्रेसियों ने तालकटोरा स्टेडियम को राहुलमय कर दिया। अब भले राहुल का बोलना एजंडे में नहीं था। पर राहुल बोलेंगे, ऐसा तय ही था। आप पुराना इतिहास पलट कर देख लें। पर हमेशा राहुल को वर्करों के अनुरोध पर बुलवाने की परंपरा। सो अबके भी राहुल ने उसी तरह माइक संभाला। पर फर्क, अब राहुल राजनीति के माहिर खिलाड़ी हो चुके। सो उन ने कांग्रेस को एकमात्र राष्ट्रीय पार्टी और गरीबों का रहनुमा बताया। पिछले छह साल में राहुल ने जिस भरत की खोज की। उसकी कहानी सुन सभी कांग्रेसी गदगद दिखे। मां सोनिया का चेहरा तो गर्व से दमक उठा। राहुल ने दोहराया- ‘आज दो हिंदुस्तान। एक गरीब, तो दूसरा खुशहाल। अब दोनों हिंदुस्तान को जोडऩे की जरुरत और यह काम सिर्फ कांग्रेस पार्टी ही कर सकती।’ यों राहुल की दो हिंदुस्तान वाली थ्योरी सोलह आने सही। पर कांग्रेस ही देश का गरीबों का उद्धार कर सकती, यह समझना मुश्किल। आजादी के 63 साल में करीब 50-55 साल कांग्रेस का ही राज रहा। चौथी लोकसभा तक तो करीब-करीब पूरे देश में कांग्रेस ही शासन में बनी रही। फिर राज्यों में थोड़ी-बहुत तस्वीर जरुर बदली। तो अब सवाल उठना लाजिमी, क्या देश से गरीबी दूर करने के लिए कांग्रेस को फिर से 50-55 साल चाहिए। खुद इंदिरा गांधी ने 1971 में गरीबी हटाओ का नारा देकर चुनावी जीत का डंका बजाया था। पर 40 साल बाद भी कांग्रेस वही चुनावी नारे दोहरा रही। तो इसके क्या मायने? अधिवेशन में राहुल के कसीदे सिर्फ मेंबरों ने ही नहीं, खुद सोनिया ने भी पढ़े। उन ने युवा कांग्रेस और एनएसयूआई में लोकतांत्रित तरीके से नेता चुनने को सराहा। राहुल का नाम लिए बिना बोलीं, युवाओं का रूझान तेजी से कांग्रेस की ओर हो रहा। पर जिस लोकतंत्र की दुहाई सोनिया ने दी। जरा उसका एक नमूना भी देख लें। यूपी में युवा कांग्रेस के चुनाव में महज एक वोट पाने वाले शैफ अली नकवी अब उपचुनाव में लखीमपुर सदर से कांग्रेस उम्मीदवार हो गए। नकवी के अब्बा जफर अली लखीमपुर से कांग्रेसी सांसद। सो राहुल गांधी की लोकतांत्रिक पहल की कलई तो ताजा उदाहरण ही खोल रहा। पर कांग्रेस की कथनी और करनी हमेशा से जुदा रही। तभी तो घोटालों नहीं, महाघोटालों के साए में कांग्रेस अधिवेशन हुआ। सोनिया-मनमोहन-राहुल-प्रणव ने भाषण तो खूब दिए। पर घोटालों-भ्रष्टाचार के आगे जुबां बंद ही रहे। अधिवेशन में कॉमनवेल्थ करप्शन के सिरमौर सुरेश कलमाड़ी और आदर्शवादी अशोक चव्हाण भी मौजूद थे। पर मंच से कोई संदेश नहीं आया। अपने मनमोहन तो सिर्फ सोनिया का गुणगान ही करते रह गए। यानी भ्रष्टाचार के मसले पर कांग्रेस ने अधिवेशन में ‘आदर्श’ चुप्पी साध ली। यों सोनिया ने अपने संबोधन में पर्यावरण पर राजीव गांधी के एक कथन को उद्धृत जरुर किया। जिसके मुताबिक, जब कभी पर्यावरण को नुकसान पहुंचता है, तब भारत के एक अंश का विनाश होता है। सो पर्यावरण का जिक्र आया, तो लगा, अब चव्हाण का आदर्श भी बताएंगी। अपने जयराम रमेश ने सोमवार को ही कह दिया था। आदर्श सोसायटी में पर्यावरण मानकों की अनदेखी हुई, सो कुछ फ्लोर ढहाए जा सकते। सचमुच आदर्श सोसायटी के कुछ फ्लोर नहीं, पूरी इमारत ढहा देनी चाहिए। कारगिल के वक्त सेनाध्यक्ष रहे वीपी मलिक ने तो इसे शर्म की इमारत करार दे यही सुझाव दिया। सेना अधिकारियों की मिलीभगत से मलिक बेहद व्यथित दिखे। पर क्या नेता ऐसा होने देंगे? शायद नहीं, भाई-भतीजावाद और भ्रष्टाचार तो राजनीति की जड़। सो कोई अपनी जड़े भला क्यों खोदेगा? आम आदमी की दुहाई तो सिर्फ वोट बटोरने का जरिया। सो सोनिया ने भ्रष्टाचार पर मौन साधा, तो महंगाई पर वही पहले जैसी चिंता। राज्यों के सिर ठीकरा फोड़ा। बोलीं- ‘कालाबाजारियों पर कार्रवाई करना राज्य की जिम्मेदारी।’ अब अगर सोनिया की दलील मान भी लें। तो सवाल, कांग्रेस शासित दिल्ली, राजस्थान, हरियाणा, असम, आंध्र जैसे राज्यों में महंगाई कम क्यों नहीं हो रहे? क्या वहां की सरकारें भी कालाबाजारियों से मिली हुई? यह सवाल खुद सोनिया के भाषण से उठ रहा। पर कांग्रेस हमेशा से अपनी ठसक भरी राजनीति के लिए जानी जाती। तभी तो सोनिया ने अयोध्या फैसले के मद्देनजर शांति समाधान की बात नहीं की। अलबत्ता बाबरी विध्वंस की याद दिला मुस्लिम वोट बैंक को साधने की कोशिश की। पर ताजा फैसला तो जमीन विवाद में आया। कांग्रेस दोनों पक्षों में एकता के प्रयास कर सकती थी। पर हाईकोर्ट के फैसले से कांग्रेस को राजनीतिक उल्लू सीधा होता नहीं दिख रहा। सो दोनों मामलों को जोडक़र बयानबाजी कर रही। पर भ्रष्टाचार का मुद्दा कांग्रेस के लिए गंभीर नहीं, क्योंकि इसमें कांग्रेसी झुलस रहे। सो भ्रष्टाचार पर अधिवेशन में चुप्पी मुद्दा बनी। बीजेपी ने हमला बोला। तो दिग्वििजय सिंह ने बेहिचक कह दिया। जरुरी नहीं हर मंच से भ्रष्टाचार की चर्चा हो। यानी कांग्रेस की जय हो। इतने बड़े अधिवेशन में भ्रष्टाचार पर न बोलना भी एक ‘आदर्श।’
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02/11/2010

Monday, November 1, 2010

‘आदर्श’ साए में कांग्रेस का आदर्श अधिवेशन!

तो घो’टाले का मतलब, जिसे घुमा-फिराकर टाल दिया जाए। सो कांग्रेस अब सभी ‘आदर्शवादियों’ को बचाने में जुट गई। हनुमान भक्त बराक ओबामा सचमुच अशोक चव्हाण के लिए हनुमान साबित हुए। सो ‘ओबामा संजीवनी’ पाकर सोमवार को चव्हाण मुंबई लौट गए। पर जाते-जाते कह गए, और भी बहुत सारे काम हैं आदर्श सोसायटी घोटाले के सिवा। इधर चव्हाण की किस्मत की रिपोर्ट बनाने में जुटे प्रणव मुखर्जी ने भी एलान कर दिया, अभी जांच में और वक्त लगेगा। यानी कम से कम दिवाली और ओबामा विजिट तक चव्हाण की कुर्सी को कोई खतरा नहीं। दबी जुबान में अब कांग्रेसी भी कह रहे, राहुल की पसंद को हटाना आसान नहीं। अब चव्हाण की कुर्सी बचेगी या खिसकेगी, यह ओबामा विजिट के बाद ही तय होगा। पर राहुल गांधी की पसंद का हश्र देखिए। जम्मू-कश्मीर के सीएम उमर अब्दुल्ला भी राहुल की पसंद। तमाम झंझावातों के बीच भी राहुल ने उमर का समर्थन किया था। पर उमर का राजनीतिक अनाड़ीपन अब किसी से छुपा नहीं। महाराष्ट्र के सीएम पद पर अशोक चव्हाण भी राहुल की ही पसंद। पर संयोग देखिए, जब दीपावली के मौके पर सोना कुलांचे मार रहा। तभी राहुल के दोनों खरा सोना उमर-अशोक सही मायने में खोटा सिक्का साबित हुए। अब कोई पूछे, आदर्श घोटाले पर राहुल गांधी ने खामोशी की चादर क्यों ओढ़ रखी है? यानी पूरे घटनाक्रम में चव्हाण की कुर्सी बचती दिख रही। विलासराव देशमुख को अपनी मंशा पर पानी फिरता दिखा। तो फौरन अशोक चव्हाण पर हमला बोल दिया। खुद के इरादे को पाक, चव्हाण को नापाक बताने की कोशिश की। कहा- ‘मैंने सीएम रहते आदर्श सोसायटी सिर्फ सेना से जुड़े मौजूदा और रिटायर्ड लोगों के लिए मंजूरी दी थी। पर अशोक चव्हाण ने बतौर राजस्व मंत्री इसके प्रावधान बदल सिविलियन के लिए भी खोल दिया। अगर सोसायटी सिर्फ फौजियों के लिए होती। तो इतनी हाय-तौबा न मचती।’ यानी देशमुख ने सारा ठीकरा चव्हाण के सिर फोड़ दिया। पर सभी ‘आदर्शवादी नंगों’ को कांग्रेस पहचान चुकी। सो जांच कमेटी के सदस्य और महाराष्ट्र कांग्रेस के प्रभारी एके एंटनी ने विलासराव को कड़ी फटकार लगाई। महाराष्ट्र के सभी कांग्रेसियों को भी जुबान बंद रखने की हिदायत दे दी गई। कांग्रेस की मुश्किल सिर्फ चव्हाण का घोटाले में नाम आना नहीं, अलबत्ता राज्य के सभी बड़े कांग्रेसी फंस रहे। अब अगर चव्हाण की बलि ली गई। तो फिर आदर्श लूट में उछल रहे नामों देशमुख-शिंदे-नारायण राणे कैसे बचेंगे? सचमुच आदर्श सोसायटी घोटाले के हमाम में सभी नंगे हो गए। आदर्श लूट का सिलसिला 2000 से ही शुरु हुआ। जब केंद्र में एनडीए का, तो महाराष्ट्र में शिवसेना के नारायण राणे सीएम थे। सो आदर्श फ्लैट धारकों में नारायण राणे के सिफारिशी और तबके केंद्रीय पर्यावरण मंत्री सुरेश प्रभु का भी नाम सामने आ रहा। यानी आदर्श सोसायटी फ्लैट की फाइल जहां-जहां गई, वही फ्लैट का मालिक बन बैठा। सो धीरे-धीरे इमारत छह मंजिला से इकत्तीस मंजिला बन गई। डीएम से लेकर सीएम तक, सबने ‘आदर्श’ स्थापित कर दिया। अब सबके सब फंस रहे। तो स्थानीय प्रशासन चुस्त हो गया। बीएमसी ने सोसायटी में कारगिल से जुड़े परिवारों को छोडक़र बाकी सभी के पानी के कनेक्शन काट दिए। बिजली विभाग ने 24 घंटे का अल्टीमेटम दे रखा। सो मानवाधिकार और ऑक्यूपेशन सर्टिफिकेट पर रोक लगाने के खिलाफ सोसायटी के कुछ लोग अब बांबे हाईकोर्ट पहुंच गए। अब अगर मामला कानूनी पचड़े में फंसा। तो कांग्रेस को संसद में बचाव का मौका मिल जाएगा। बीजेपी अध्यक्ष नीतिन गडकरी ने तो सोमवार को एलान कर दिया, संसद में इस घोटाले को जोर-शोर से उठाया जाएगा। पर कांग्रेस अभी इस पड़ताल में जुटी कि एनडीए के समय के कुछ ऐसे कागज हाथ लग जाए, जिससे विपक्ष को मुंहतोड़ जवाब दे सके। कांग्रेस की मुसीबत यह कि आदर्श सोसायटी को कारगिल शहीद के परिवारों से जुड़ा बताया जा रहा। ताबूत घोटाले में कांग्रेस ने कैसे जार्ज फर्नांडिस का तीन साल तक बायकॉट किया और नारे लगाए, खुद नहीं भूली। अब कांग्रेस को डर, कहीं विपक्ष ने इसे मुद्दा बनाने में सफलता हासिल कर ली। तो कांग्रेस को बेभाव की पड़ेगी। पर अभी यह साबित होना बाकी। अब अगर जमीन महाराष्ट्र सरकार की निकली। कारगिल परिवारों की बात नहीं आई। तो चव्हाण की कुर्सी सलामत रहेगी। कांग्रेस नेता और आदर्श सोसायटी के अहम कर्ताधर्ता कन्हैया लाल गिडवानी तो मीडिया पर ही भडक़े हुए। दावा किया- जमीन महाराष्ट्र सरकार की, खुद सेना ने भी सर्टिफिकेट दिया। हमारे पास लिखित में किसी कांग्रेसी नेता ने सिफारिश नहीं की। पर गिडवानी भूल रहे, खुद तबके सीएम विलासराव देशमुख ने कबूला- आदर्श सोसायटी सेना के लिए मंजूरी दी। अब जरा गिडवानी का एक और बयान देखिए। आदर्श सोसायटी के सी-फेसिंग होने और हाई-फाई होने पर टिप्पणियां हो रही। सो गिडवानी बोले- समुद्र के किनारे बसी झोपड़ट्टी वाले तो चौबीसों घंटे सी-फेसिंग ही रहते, पर कोई सवाल नहीं उठता। अब गिडवानी के बोल को आप क्या कहेंगे? अपनी नजर में चोरी और सीनाजोरी इसे ही कहते हैं। पर आदर्श घोटाले के साए में कांग्रेस का अधिवेशन तीन साल बाद मंगलवार को होने जा रहा। पर क्या लगातार चौथी बार कांग्रेस की कमान संभालने वालीं सोनिया गांधी से कोई नए आदर्श की उम्मीद करें? सचमुच ऐसे ‘आदर्श’ को तो भ्रष्टाचार भी सलाम ठोकती।
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01/11/2010

Friday, October 29, 2010

अब तो सारे घोटाले 'आदर्श' ही होते!

आखिर शुक्रवार बीजेपी के लिए दो-दो शगुन लेकर आया। गुजरात में मोदी के दिल-अजीज अमित शाह को जमानत मिल गई। तो कर्नाटक में स्पीकर के फैसले पर हाईकोर्ट ने मोहर लगा दी। सो गुरुवार तक कलह में उलझी बीजेपी ने शुक्रवार को ही दिवाली मना ली। पता नहीं दिवाली आते-आते शगुन कब अपशकुन में बदल जाए। सो बीजेपी हैडक्वार्टर में जमकर आतिशबाजी हुई। पर दोनों शगुन में फर्क देखिए। जश्न में कर्नाटक में येदुरप्पा सरकार को मिली मजबूती का असर नहीं, अलबत्ता अमित शाह को मिली जमानत की खुशी छलक रही थी। बीजेपी के वर्कर सिर्फ मोदी नाम का जयकारा लगा रहे थे। सीबीआई के तमाम विरोधों के बावजूद हाईकोर्ट में राम जेठमलानी की दलील काम कर गई। सो जेठमलानी को लेकर बीजेपी में हो रहे विरोध का जवाब मिल गया। अब सीबीआई जमानत के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट जाने की सोच रही। तो उधर कर्नाटक में जेडी-एस ने सुप्रीम कोर्ट जाने का एलान कर दिया। पर दोनों ही फैसले कांग्रेस की पेशानी पर बल डाल गए। सो कर्नाटक पर पुराना राग ही अलापा। बोली- अल्पमत की सरकार को बहुमत में बदला गया। पर सवाल, अब कांग्रेस क्या करेगी? येदुरप्पा सरकार को बर्खास्त करने के लिए गवर्नर हंसराज भारद्वाज जेहाद पर उतर चुके थे। पर क्या अब कांग्रेस हंसराज को वापस बुलवाएगी? रही बात खरीद-फरोख्त की, तो इस हमाम में कौन नंगा नहीं? छत्तीसगढ़, झारखंड, गोवा में कांग्रेस ने क्या किया था? अजीत जोगी कैसे बीजेपी के एमएलए खरीदते धरे गए, क्या कांग्रेस भूल गई। झारखंड में अल्पमत वाले शिबू सोरेन को कैसे शपथ दिलाई गई। सुप्रीम कोर्ट ने हथौड़ा चलाया, तो कांग्रेस कैसे भन्नाकर रह गई, कौन नहीं जानता? गोवा में तो खरीद-फरोख्त की फैक्ट्री। सो गवर्नर एससी जमीर के जरिए गोवा में कांग्रेस कितने खेल कर चुकी, क्या भूल गई। यानी बीजेपी हो या कांग्रेस या अन्य कोई दल, नैतिकता किसी में नहीं बची। अब गुजरात में अमित शाह को जमानत मिल गई। तो कांग्रेस ने सीधी टिप्पणी से परहेज किया। पर सीबीआई का बचाव करना नहीं भूली। कांग्रेस प्रवक्ता मनीष तिवारी बोले- बीजेपी दोहरे मापदंड अपना रही। हरेन पंड्या केस में सीबीआई अच्छी, तो अमित शाह केस में बुरी कैसे हो गई। पर सीबीआई की हकीकत कौन नहीं जानता। शुक्रवार को ही सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई को एक बार फिर लताड़ पिलाई। टू-जी स्पेक्ट्रम घोटाले में सीबीआई ने छह महीने का और वक्त मांगा। तो कोर्ट ने उसके इरादे पर संदेह जताया। सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणी की- आखिर सीबीआई कब तक जांच करेगी? अभी तक मंत्री अपने पद पर बना हुआ। सीबीआई का इरादा कुछ नहीं करने का दिख रहा। सचमुच सीबीआई सत्ताधारी दल की कठपुतली बनकर रह गई। सो कोर्ट की फटकार के बाद भी सीबीआई वही करती, जो राजनीतिक आका चाहते। तभी तो भ्रष्टाचार के मामले में कभी बड़े नेताओं पर कार्रवाई नहीं होती। गुरुवार को भी सुप्रीम कोर्ट ने भ्रष्टाचार के एक मामले में ऐसी ही टिप्पणी की। कहा- सिर्फ छोटी मछलियां ही क्यों, शार्क और मगरमच्छ क्यों नहीं फंसते? अब मुंबई के आदर्श सोसायटी फ्लैट घोटाले की कलई खुली। तो महाराष्ट्र के कांग्रेसी सीएम अशोक चव्हाण सीबीआई जांच की पैरवी कर रहे। पर जरा पहले फ्लैट की कहानी बता दें। कारगिल शहीदों की विधवाओं को मकान देने के लिए छह मंजिला इमारत का फैसला हुआ। जिस एरिया में जमीन मिली, वहीं पास में नेवी के कई अहम ठिकाने। पर नेताओं-अफसरान और सेना के शीर्ष पद से रिटायर लोगों ने जमकर बंदरबाट की। कब छह मंजिला इमारत इकत्तीस मंजिला बन गई, किसी को पता नहीं चला। आखिर पता चलता भी कैसे, जब नेता-अफसर ने अपने सगे-संबंधियों के नाम एक नहीं, चार-छह फ्लैट करवा लिए। खुद सीएम अशोक चव्हाण की सास और दिल्ली में रहने वाले चचिया ससुर के नाम फ्लैट। सो जब बवाल मचा, तो सीएम के रिश्तेदारों ने सोसायटी की सदस्यता से इस्तीफा दे दिया। सीएम ने राजनीतिक साजिश करार दिया। पर कोई पूछे, तीन टर्म से कांग्रेस की ही सरकार, तो क्या बीजेपी साजिश कर रही? अब सवाल, नेताओं-नौकरशाहों से, क्या उन्हें कभी शर्म आएगी? शहीद की विधवाओं के नाम पर बनने वाले फ्लैट में भी कब्जा जमा लिया। तो फिर भ्रष्टाचार पर अंकुश कैसे लगेगा? आदर्श सोसायटी घोटाले की परतें तो अभी और उधड़ेंगी। पर भ्रष्टाचार के महिमामंडन में कांग्रेस जैसी निर्लज्जता शायद ही कहीं दिखे। कांग्रेस जो भी करती, डंके की चोट पर। बीजेपी वाले तो थोड़ा भी नहीं खाते कि उल्टी हो जाती। पर आप कांग्रेस का इतिहास देख लो। तो सिर्फ आदर्श फ्लैट घोटाला ही नहीं, सारे घोटाले 'आदर्श' ही दिखेंगे। बोफोर्स घोटाले में दलाली से अधिक जांच पर खर्च हो गए। पर क्या कांग्रेस ने राजीव गांधी तक आंच आने दी? राव सरकार के वक्त झामुमो रिश्वत कांड हुआ। पर वह कांग्रेस के लिए आदर्श। झारखंड में ही निर्दलीय एमएलए कोड़ा को सीएम बनवा दिया। फिर जो लूट मची, वह भी एक आदर्श। सोनिया गांधी की रैली के लिए चंदा उगाही करते माणिक राव ठाकरे धरे गए। बिहार में कांग्रेस सचिव सागर रायका छह लाख रुपए के साथ पकड़े गए। तो यह भी कांग्रेस का अपना आदर्श। अब कॉमनवेल्थ घोटाले को ही लीजिए। किसी बड़े नेता पर कार्रवाई नहीं होने वाली। अलबत्ता सरकारी अफसर ही नपेंगे।
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29/10/2010

Thursday, October 28, 2010

असली जंग सुषमा-जेतली की, मोदी तो सिर्फ बहाना

दिवाली के मौके पर बीजेपी में होली का हुड़दंग मच गया। सुषमा-मोदी मनभेद से बीजेपी बदनाम हुई। तो नितिन गडकरी दौड़ते-भागते आडवाणी को शरणागत हुए। गडकरी को समझ नहीं आया, कैसे इस मसले को सुलझाएं। नरेंद्र मोदी तो सुषमा के बयान पर पहले ही नाराजगी जता चुके। इस बीच खबर चल गई, गडकरी ने सुषमा को हिदायत दी कि किसी की भावना को ठेस पहुंचाने वाला बयान न दें। सो गडकरी की हालत न इधर की रही, न उधर की। न मोदी की शिकायत को नजरअंदाज कर सकते, न सुषमा से कुछ कह सकते। यानी जूनियर नेता को अध्यक्ष बनाने का नतीजा दिख गया। जब जनसंघ के जमाने में पहली बार 1960 में संघ के पूर्णकालिक स्वयंसेवक बछराज अध्यक्ष बनाए गए। तब अटल बिहारी वाजपेयी ने भी जूनियर को अध्यक्ष नहीं कबूला। उन ने तो विजयवाड़ा अधिवेशन का खुला बहिष्कार किया था। अबके भले गडकरी के खिलाफ कोई बॉयकाट नहीं हुआ। पर गडकरी अध्यक्ष की कुर्सी पर होते हुए भी सीनियर नेताओं के सामने बौने ही बने हुए। दूसरी पीढ़ी के नेताओं सुषमा, जेतली, मोदी, वेंकैया, अनंत के बीच कोई होड़ न मचे, सो गडकरी को कमान सौंपी गई। पर अब सीनियरों की कलह को गडकरी कैसे थामें। सो आडवाणी के घर मीटिंग हुई। पर तब तक सुषमा की नाराजगी भी बढ़ चुकी थी। सुबह से ही खबर चल रही थी, गडकरी ने सुषमा को हिदायत दी। यों मीटिंग के बाद गडकरी कुछ नहीं बोले। पर पटना में मौजूद सुषमा हत्थे से उखड़ गईं। पहले तो गडकरी से हुई इस तरह की किसी बात का खंडन किया। फिर मोदी से मतभेद को नकारा। पर उसके बाद सुषमा ने जो आरोप लगाए, बीजेपी में वर्चस्व की लड़ाई का आगाज हो गया। उन ने कहा- जो मैंने कही नहीं, मेरे मुंह में डालकर छापी गई। पर दिल्ली में बैठा कोई शरारत कर रहा है। वह मेरे और नरेंद्र भाई के बीच मतभेद पैदा कर अपना स्वार्थ साधना चाहता है। या कॉमनवेल्थ घोटाले से ध्यान बंटाने के लिए साजिश भी हो सकती है। पर उन ने इससे इनकार नहीं किया कि इस साजिश में पार्टी का कोई शामिल। यानी सुषमा ने खुल्लमखुल्ला आरोप लगाया- दिल्ली में बैठा कोई नेता उनके खिलाफ मीडिया में खबरें प्लांट कर रहा। सनद रहे, सो याद दिला दें। जब उमा भारती की राजनीतिक हैसियत बढऩे लगी थी, तब मीडिया में खूब खबरें चलीं। फिर उमा ने अरुण जेतली, प्रमोद महाजन सरीखे नेताओं पर खबरें प्लांट करने का आरोप लगाया था। उमा की नाराजगी इस कदर बढ़ गई कि उन ने आडवाणी की रहनुमाई वाली मीटिंग से वॉकआउट किया। छह साल पहले भले वह तारीख दस नवंबर थी। पर दिन धनतेरस का था। फिर भी बीजेपी ने महिला नेत्री को पार्टी से निकाल दिया। अब दिवाली से पहले बीजेपी में एक और वरिष्ठ महिला नेत्री को खबरें प्लांटेशन की शिकायत। यों सुषमा का अपना कद और अलग सोच। सो उमा जैसे हश्र की बात कोई सोच भी नहीं सकता। पर महिलाओं के प्रति बीजेपी की सोच का एक और नमूना। जब-जब महिला नेत्री आगे बढ़ी, बीजेपी के पुरुष नेताओं ने टंगड़ी मारने में देर नहीं की। अपने राजस्थान में वसुंधरा राजे वसुंधरा राजे ने अपना मुकाम खड़ा किया। तो किस तरह कुर्सी छोडऩे के लिए मजबूर किया गया, दोहराने की जरूरत नहीं। अब जबसे सुषमा स्वराज ने विपक्ष के नेता पद की जिम्मेदारी संभाली। मनमोहन की दूसरी पारी में विपक्ष ने नाको चने चबवा दिए। सो बीजेपी में दूसरे पीएम इन वेटिंग की होड़ शुरू हो गई। राज्यसभा में अरुण जेतली ने नेता विपक्ष की कुर्सी संभाली। सो सुषमा-जेतली की नजर अब पीएम की कुर्सी पर गड़ गई। अंदरखाने पार्टी के भीतर अपनी-अपनी लॉबी बनाने की कोशिश होने लगी। दोनों नेता राज्यों में अपना प्रभाव जमाने में जुट गए। पर इस खेल में सुषमा थोड़ी पिछड़ गईं। पेशे से वकील होने के नाते जेतली अधिक तेज-तर्रार निकले। अभी भी बीजेपी में जेतली कैंप का जबर्दस्त दबदबा। पर जेतली की सबसे बड़ी कमी, जनता के बीच सुषमा जैसी अपील नहीं। बीजेपी का इतिहास इसी बात का साक्षी। आडवाणी तेज-तर्रार होते हुए भी कभी पीएम नहीं बन पाए। उदारवादी और जनता के दिलों पर राज करने वाले वाजपेयी बाजी मार गए। यों सत्ता अभी बीजेपी के लिए दूर की कौड़ी। पर लट्ठमलट्ठा शुरू हो गई। अगर सत्ता का मौका मिला, तो राजनीतिक कौशल, महिला और जनता की पसंद होने के नाते सुषमा भी वाजपेयी की तरह गठबंधन में सर्वस्वीकार्य हो सकतीं। सो अभी से ही गुरु घंटालों ने खेल खराब करना शुरू कर दिया। सुषमा ने पटना में ऐसा कुछ नहीं कहा, जो मोदी को बुरा लगे। बीजेपी हमेशा से गैलेक्सी ऑफ लीडर की बात करती। सुषमा ने भी यही कहा था- हर जगह जादूगर अलग-अलग। यानी गुजरात में मोदी, तो बिहार में सुशील-नीतिश। सो मोदी को किसी ने उकसाया या खुद की महत्वाकांक्षा ने जोर मारा, यह मालूम नहीं। पर पीएम इन वेटिंग की कुर्सी की दौड़ शुरू मानिए। नरेंद्र मोदी तो गठबंधन में कभी स्वीकार्य होंगे, आसार नहीं दिखते। सो असली जंग सुषमा बनाम जेतली, नरेंद्र मोदी तो सिर्फ बहाना बन गए। यों सुषमा-मोदी में मतभेद से भी इनकार नहीं। जब पटना कार्यकारिणी में मोदी के इश्तिहारों ने बंटाधार किया। तब भी सुषमा ने नाराजगी जताई थी। यों अरुण जेतली और मोदी की खूब छनती। सो ताजा मतभेद जेतली-सुषमा के बीच होड़ का ही नतीजा। पितृ पुरुष की भूमिका में आ चुके आडवाणी का दिल मोदी के लिए धडक़ता। तो दिमाग से जेतली-सुषमा के बीच बराबर का संतुलन बनाए रखा।
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28/10/2010

Wednesday, October 27, 2010

अब मोदी की मारी बीजेपी बेचारी

चले थे हरि भजन को, ओटन लगे कपास। सचमुच बीजेपी में दो-चार महीने से अधिक शांति नहीं रह सकती। जब तक आपस में टंगड़ी मार राजनीति न खेलें, बीजेपी को राजनीति का मजा नहीं आता। सो बीजेपी में फिर वर्चस्व की जंग छिड़ गई। नीतिश कुमार के वीटो ने नरेंद्र मोदी को बिहार चुनाव प्रचार में घुसने नहीं दिया। तो अब सुषमा स्वराज ने कह दिया- बिहार में नरेंद्र मोदी की आवश्यकता ही नहीं। यहां पहले से ही नीतिश और सुशील मोदी का जादू चल रहा। यानी सुषमा का मतलब, गुजरात में मोदी का जादू चल रहा, पर बिहार में नहीं चलेगा। सो मोदी समर्थक खफा हो गए। कर्नाटक के एक उत्साही विधायक ने भारत के विकास के लिए गुजरात का विकास शीर्षक से मोदीनुमा इश्तिहार छपवा दिया। यों इश्तिहार में गुजरात के स्थानीय चुनाव में चले मोदी मैजिक का बखान। पर सुषमा के बयान के ठीक बाद आए इश्तिहार का राजनीतिक अर्थ निकलना ही था। बुधवार को बीजेपी की उपाध्यक्ष नजमा हेपतुल्ला ने भी सुषमा का नाम नहीं लिया। पर दो-टूक बोलीं- गुजरात से बाहर भी मोदी का जादू चल रहा। नजमा ने बाकायदा दादर नगरहवेली और दमनदीव के स्थानीय चुनाव के आंकड़े गिना दिए। सारा क्रेडिट मोदी मैजिक को दिया। सो बीजेपी की अंदरूनी कलह का अंदाजा आप खुद लगा लें। बीजेपी के भीतर दूसरी पीढ़ी में सिरमौर बनने की होड़ किस कदर बढ़ चुकी, आप खुद देख लें। नरेंद्र मोदी का कहा बीजेपी में कोई नहीं टाल सकता। तो भला शिवराज, रमण क्यों पीछे रहें। सो जब भी मौका मिलता, ये भी आलाकमान के मंसूबे पर पानी फेरने से नहीं चूकते। अब ताजा नमूना बुधवार को ही दिख गया, जब बीजेपी की सबसे महत्वाकांक्षी योजना अंत्योदय के क्रियान्वयन की केंद्रीय टीम में प्रदीप गांधी शामिल हो गए। रमण ने छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनाव के वक्त प्रदीप गांधी को चुनाव समन्वय की टीम में जोड़ा था। पर बवाल मचा, तो हटाए गए। फिर प्रदेश कार्यकारिणी में चुपके से शामिल करा दिया। अब धीरे-धीरे प्रदीप गांधी को केंद्रीय टीम में जगह दिला दी। सनद रहे सो बता दें, प्रदीप गांधी कौन? तो जरा याद करिए ऑपरेशन दुर्योधन। संसद में सवाल पूछने के लिए 11 सांसद कैमरे में अठन्नी-चवन्नी घूस लेते धरे गए थे। महज दस दिन में संसद की आचरण समिति ने बर्खास्तगी की सिफारिश की। तो 23 दिसंबर 2005 को घूसखोर सवालची सांसदों को आउट कर संसद ने इतिहास रच दिया था। प्रदीप गांधी इनमें से एक थे। इन 11 सांसदों में बीजेपी का बहुमत था। प्रदीप गांधी हमेशा से रमण सिंह के दुलारे रहे। लोकसभा में भी रमण की खाली सीट राजसमंद से चुनकर पहुंचे थे। यों भ्रष्टाचारियों को जगह देने में बीजेपी ही नहीं, कांग्रेस भी माहिर। इन सवालची सांसदों में बीएसपी के राजा रामपाल आउट हुए थे। अब यूपी कांग्रेस का राहुल गांधी ने बेड़ा पार लगाया। तो सांसदी की एक सीट से राजा रामपाल ने भी शोभा बढ़ाई। सो नैतिकता के खेल में कोई भी राजनीतिक दल कपड़ा पहनना नहीं चाहता। पर बात बीजेपी की, रमण ने प्रदीप गांधी की एंट्री कराई। पर शिवराज सिंह ने उमा भारती की एंट्री में रोड़ा अटका रखा। यानी बीजेपी के क्षत्रप अब आलाकमान की छाती पर मूंग दल रहे। पर बीजेपी फिलहाल मोदी के वीटो से परेशान। मोदी ने वीटो लगाकर राम जेठमलानी को राजस्थान से राज्यसभा की मेंबरी दिला दी। बीजेपी का कोई नेता इसके लिए राजी नहीं था। पर मोदी ने ठान लिया, तो फिर किसकी मजाल, जो ना करने की हिमाकत करे। नरेंद्र मोदी को गुजरात दंगे से जुड़े मामले में बचाने का ठेका जेठमलानी ने लिया। तो मोदी ने फिर किसी की परवाह नहीं की। आखिरकार नितिन गडकरी को बीजेपी के टिकट से जेठमलानी को मेंबरी देनी पड़ी। पर जेठमलानी के बोल बीजेपी को अब भारी पड़ रहे। यों जब बड़़बोले जेठमलानी को टिकट दिया गया। तभी बीजेपी के एक प्रवक्ता ने कह दिया था- अब हर रोज सफाई देने के लिए तैयार रहना पड़ेगा। सो जातीय जनगणना की मुखालफत, एसएम कृष्णा का समर्थन कर बीजेपी को असहज कर चुके जेठमलानी ने कश्मीर के वार्ताकार दिलीप पडगांवकर का समर्थन कर मुश्किल बढ़ा दी। बीजेपी ने जेठमलानी की निजी राय बता पल्ला तो झाड़ लिया। पर पार्टी दो खेमों में बंट गई। एक धड़ा अनुशासनात्मक कार्रवाई चाह रहा। तो दूसरे में चाहकर भी हिम्मत नहीं। बुधवार को जेठमलानी ने तो यहां तक कह दिया- मंच से प्रवक्ता का कुछ बोल जाना कोई पार्टी लाइन नहीं। मुझे किसी ने नहीं बताया कि पार्टी लाइन क्या है। सो मैं माफी नहीं मांगूंगा। अब बीजेपी दोहरी मुश्किल में। पार्टी ने पडगांवकर के बयान का विरोध किया। जेठमलानी समर्थन कर रहे। पर मुश्किल, न अपना बयान वापस ले सकती, न जेठमलानी पर कार्रवाई कर सकती। कश्मीर पर वार्ताकार पडगांवकर ने दिल्ली लौटने के बाद लालकृष्ण आडवाणी से बात करने का एलान कर दिया। सो अब बीजेपी का स्टैंड क्या रहेगा, यह देखना होगा। बीजेपी के सहयोगी जेडीयू ने भी जेठमलानी का समर्थन कर मुश्किल बढ़ा दी। अब आखिर में सवाल, जब गुजरात दंगे में राज्य सरकार की कोई भूमिका नहीं। तो एक वकील के पीछे समूची बीजेपी दांव पर क्यों? जेठमलानी की वजह से जिन-जिन का टिकट कट गया, अब खुलकर बोल रहे। एक ने यहां तक कह दिया- जेठमलानी कैसे जीते हैं, सबको मालूम। नरेंद्र मोदी के सिवा पार्टी में कोई उन्हें पसंद नहीं करता। पर मोदी की पकड़ मजबूत हो रही। सो मोदी की मारी बेचारी बीजेपी ठीक से सिसक भी नहीं पा रही।
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27/10/2010