Saturday, November 20, 2010

तो पीएम कागज से, राजा खजाने से खेलते रहे!

'चुप-चुप खड़े हो, जरूर कोई बात है...।' घोटालों पर खामोशी को विपक्ष ने मौन स्वीकृति करार दिया। तो पहले सोनिया गांधी और अब खुद मनमोहन ने भी लंबी चुप्पी तोड़ दी। जब एटमी डील पर मनमोहन चौतरफा घिर गए थे। तो एचटी समिट में सोनिया गांधी और मनमोहन सिंह ने लाचारी भरी टिप्पणी की थी। तब दोनों ने एक सुर में कहा था, एक डील न होने से जिंदगी खत्म नहीं होती। पर जब मनमोहन ने डील को अपनी आन का मुद्दा बना लिया। तो लेफ्ट की समर्थन वापसी के बावजूद पूरा करके दम लिया। भले सरकार बचाने को सांसदों की जमकर खरीद-फरोख्त हुई। सत्ता की खातिर नैतिकता को ठेंगा दिखा दिया। लोकसभा में करोड़ों की गड्डियां लहराई गईं। तब मनमोहन ने सरकार बचाने की खातिर हुए इस भ्रष्टाचार पर आंखें मूंद लीं। अब भ्रष्टाचार के मौसम की चपेट में खुद पीएम आ गए। तो दो हफ्ते तक संसद की कार्यवाही हंगामे की भेंट चढऩे के बाद एचटी समिट में ही पीएम ने जुबान खोली। तो जैसी लाचारगी एटमी डील के वक्त मनमोहन के बयान में थी। अबके उससे कुछ अलग नहीं। भ्रष्टाचार के मुद्दे ने सरकार को इस कदर घेर लिया। अब बाहर निकलने का रास्ता नहीं दिख रहा। सो पीएम ने न सिर्फ विपक्ष से संसद चलने देने की अपील की। अलबत्ता घोटाले के दोषियों को न बख्शने का भरोसा भी दिलाया। पर संसद आखिर कैसे चलेगी, जब विपक्ष की जेपीसी की मांग को न नकारा, न स्वीकारा। बोले- संसद का सत्र चल रहा। सो जेपीसी पर यहां बोलना सही नहीं। अब आप खुद अंदाजा लगा लें, अगर सरकार बैकफुट पर न होती, तो किसी भी मंच से जेपीसी खारिज कर देते। प्रणव दा तो लगातार इस मांग को खारिज कर रहे। पर जैसे पीएम ने तेल और तेल की धार देखते हुए जेपीसी पर चतुराई भरा बयान दिया। प्रणव दा भी कुछ ऐसा ही करते। बाहर इनकार, पर उन ने अब तक विपक्ष को जेपीसी न मानने का औपचारिक जवाब नहीं दिया। यानी सरकार की हालत कितनी पतली, बतलाने की जरूरत नहीं। सो विपक्ष भी आक्रामक हो चुका। अब सीधे पीएम पर निशाना साधा। तो इशारों में ही पीएम के इस्तीफे की भी मांग कर दी। पर अपनों का कुकर्म बीजेपी को कर्म ही पूजा नजर आ रहा। कर्नाटक के सीएम येदुरप्पा का पाप जगजाहिर। फिर भी बीजेपी ने अभय दान दे दिया। शुक्रवार की आधी रात तक मीटिंग चली। पर बीजेपी के भ्रष्टाचार का पैमाना देखिए। दलील दी गई, जब केंद्र में सरकार न जेपीसी मान रही, न पीएम के इस्तीफे की हलचल। सो येदुरप्पा की बलि लेकर थोथी नैतिकता दिखाने का कोई मतलब नहीं। यानी नैतिकता की राजनीतिक परिभाषा यही, पहले तुम, फिर हम। येदुरप्पा ने तो बेंगलुरु पहुंच कर बेशर्मी भरा बयान भी दे दिया। बोले- आरोप लगने वाले कितने मंत्रियों-मुख्यमंत्रियों ने अब तक इस्तीफा दिया। खुद को पाक-साफ बता इस्तीफे से इनकार किया। पर कोई पूछे, जब इतने पाक-साफ थे। तो जमीन लौटाई क्यों? पर सुप्रीम कोर्ट की तल्ख टिप्पणी की आड़ में फिलहाल बीजेपी की तोप गोले दाग रही। सो अब सबकी निगाह मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट में होने वाली सुनवाई पर। सुप्रीम कोर्ट ने पीएम की चुप्पी पर सवाल उठाए थे। तो शनिवार को हलफनामा देकर पीएमओ ने सफाई दे दी। टू-जी स्पेक्ट्रम मामले में पूरी क्रोनोलॉजी यानी तारीखवार ब्यौरा सौंप दिया। सुब्रहमण्यम स्वामी की सभी छह चिट्ठियों पर पीएमओ में हुए विचार और संबंधित विभाग को भेजने का हवाला दिया। यानी पीएमओ ने सरकारी प्रक्रिया के तहत अपनी जिम्मेदारी का ईमानदारी से निर्वाह किया। अब कोर्ट पीएमओ के हलफनामे से संतुष्ट होगा या नहीं, यह मंगलवार को मालूम पड़ेगा। पर याचिका कर्ता स्वामी ने भी कबूला, पूरे मामले में पीएम गुनहगार नहीं। पर सवाल, देश का मुखिया सिर्फ कागजी कार्रवाई ही करता रहा? लूटने वाले अपनी जेब भरते रहे। पर पीएम ने सब कुछ जानकर भी अनजान होने का रुख क्यों अपनाया? हलफमाने का निचोड़ यही, पीएमओ कभी चुप नहीं रहा। अलबत्ता लेटरबाजी करता रहा। अब मनमोहन इम्तिहान की घड़ी बता रहे। पर इस चुनौती के लिए जिम्मेदार कौन?
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20/11/2010

Friday, November 19, 2010

तो दूसरी पारी में कांग्रेस बढ़ी, नैतिकता सिकुड़ी!

तो जेपीसी पर संसद का दंगल नहीं थमा। टू-जी ने सरकार का ऐसा वन-टू का फोर किया, पीएम की जुबां नहीं खुल रही। कांग्रेसी अब बेबाक कह रहे, सिर्फ कोर्ट में जवाब देंगे। सचमुच सुप्रीम कोर्ट ने दिन में तारे न दिखाए होते। तो विपक्ष के तेवर कांग्रेस कबका पस्त कर चुकी होती। पर कोर्ट का डंडा ऐसा चला, कांग्रेस की सांस उखड़ रही। तो विपक्ष को मानो संजीवनी मिल गई। सो विपक्ष ने खम ठोक दिया- जेपीसी नहीं, तो संसद की कार्यवाही भी नहीं। पर सत्तापक्ष से प्रणव मुखर्जी भी पीछे नहीं रहे। एलान कर दिया- जेपीसी मंजूर नहीं। विपक्ष पहले पीएसी की रपट का इंतजार करे। प्रणव दा ने विपक्ष से एक बार फिर संसद चलने देने की अपील की। सोमवार से पहले एक और कोशिश करेंगे। फिर भी बात न बनी, तो शीत सत्र को भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ाने का विकल्प भी खुला। सो सरकार के साथ-साथ विपक्ष भी पसोपेश में, आखिर बाकी मुद्दों का क्या होगा। पर फिलहाल जैसी रार ठनी, गतिरोध खत्म होने के आसार नहीं दिख रहे। भ्रष्टाचार की बयार ऐसी चल रही, कोई बच नहीं पा रहा। विपक्ष संसद में हावी, पर कर्नाटक में बीजेपी का कुकर्म परेशान कर रहा। यों शुक्रवार को सीएम येदुरप्पा के परिजनों ने सरकारी जमीन वापस लौटा दी। पर बीजेपी अभी भी कार्रवाई से बच रही। येदुरप्पा दिल्ली तलब किए गए। पर न्यायिक जांच की आड़ में कुर्सी बचाने की कोशिश हो रही। अब आप खुद ही देख लो। जमीन डिनोटीफाई कर अपनों को रेवड़ी बांटने के मामले की जांच का एलान हुआ। पर पिछले दस साल तक के मामले जांच के दायरे में होंगे। यानी सरकारी जमीन को कौडिय़ों के भाव लुटाने के मामले में बीजेपी ही नहीं, कांग्रेस-जेडीएस भी शामिल। पर सवाल, क्या बीजेपी को नैतिकता नहीं दिख रही? यों शुक्रवार को एसएस आहलूवालिया ने एलान कर दिया- हमारा सीएम दोषी पाया गया, तो निकाल बाहर करेंगे। पर बीजेपी भूल रही, अशोक चव्हाण अभी दोषी पाए नहीं गए थे। नैतिकता तो सचमुच सिर्फ कहने की बात। सत्ता के लिए सब कुछ करेगा का फार्मूला ही सबके लिए। राजनीति में तो नैतिकता अब कहने भर की भी नहीं रही। सिर्फ और सिर्फ सत्ता के लिए किसी को शिबू सोरेन से हाथ मिलाने में हिचक नहीं। तो कोई रेड्डी बंधुओं के नखरे सहने को तैयार। कभी राजीव हत्याकांड पर बने जैन कमीशन की रिपोर्ट में डीएमके पर उंगली उठी। तो कांग्रेस ने संयुक्त मोर्चा की सरकार गिराने में देर नहीं की। फिर डीएमके ने सत्ता के शिखर तक पहुंची बीजेपी का दामन थाम मलाई काटी। फिर 2004 में वही डीएमके कांग्रेस के साथ खड़ी हो गई। यूपीए-टू में मनमोहन और कांग्रेस थोड़ी मजबूत हुई। तो मनमोहन ने ए. राजा और टीआर बालू को मंत्रालय में न लेने का विचार रखा। पर मनमोहन की नहीं चली। मनमोहन तो सिर्फ कांग्रेस की ओर से पीएम पद पर मनोनीत व्यक्ति। असल में नेता तो सोनिया गांधी। सो सत्ता के लिए सोनिया गांधी ने तब जो समझौता किया, आज उसके काले छींटे मनमोहन पर पड़ रहे। सो टू-जी स्पेक्ट्रम घोटाले के कर्ताधर्ता ए. राजा के मामले में पीएम मनमोहन से बड़ी जवाबदेही सोनिया गांधी की। पर सरकार के मुखिया होने के नाते विपक्ष और न्यायपालिका की तोप मनमोहन की ओर घूमी हुई। सो सवालों के लपेटे में कांग्रेस का राज दरबार न आ जाए, इसलिए कांग्रेस का शीर्ष ब्रिगेड मनमोहन के बचाव में उतर आया। जनार्दन द्विवेदी ने तो पहले ही एलान कर दिया- पीएम के साथ थे, हैं और रहेंगे। अब शुक्रवार को राहुल गांधी ने भी बचाव किया। तो बोले- पीएम पर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी में शर्म की कोई बात नहीं और ना ही पीएम के लिए कोई असहज स्थिति। अब अगर राहुल की बात छोड़ दें। तो राजनीति में शर्म नाम की कोई चीज ही नहीं। अगर शर्म की बात होती, तो ए. राजा की जगह संचार मंत्रालय संभालने वाले कपिल सिब्बल यह नहीं कहते, दुनिया में हर जगह भ्रष्टाचार है। उन ने पीएमओ की कलई खोलने वाले सुब्रहमण्यम स्वामी की हैसियत पर भी सवाल उठा दिए। पर सवाल, क्या किसी हैसियत वाले आदमी को ही पीएम से सवाल पूछने का हक? अब शनिवार को सुप्रीम कोर्ट में पीएम के जवाब पर सबकी निगाह होगी। पर फर्क देखिए, शुक्रवार को जहां राहुल ने कोर्ट की टिप्पणी से शर्मिंदगी को अलग कर दिया। वहां मां सोनिया गांधी राजनेता कम, दार्शनिक अंदाज में प्रवचन देतीं दिखीं। इंदिरा गांधी की जयंती पर तीन मूर्ति भवन में समारोह हुआ। तो उन ने जो कहा, उसका लब्बोलुवाब देखिए। आर्थिक तरक्की के बीच नैतिकता का पतन हुआ। लालच और भ्रष्टाचार बढ़ा और नैतिकता सिकुड़ी। देश में करोड़पति बढ़े, तो गरीबी भी बढ़ी। करोड़ों लोग दो जून की रोटी नहीं जुटा पा रहे। विकास ही सब कुछ नहीं। हम कैसा समाज चाहते हैं, यह सोचना होगा। आजादी के सिद्धांतों से खिलवाड़ हुआ। यानी कुल मिलाकर सोनिया ने तरक्की का सेहरा मनमोहन के सिर बांधने की कोशिश की। भ्रष्टाचार का सेहरा राजा के सिर। पर सवाल, पिछले छह-सात साल से कांग्रेस की ही सरकार। फिर गरीबी-अमीरी का फासला क्यों बढ़ा। नैतिकता के पतन पर नकेल क्यों नहीं कसी? देश में महंगाई हुई, तो विकास की चादर में ढक दिया। अब भ्रष्टाचार को भी विकास की चादर में ढांपने की कोशिश। तो ऐसे प्रवचन को अपना नमन।
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19/11/2010

Thursday, November 18, 2010

तो कांग्रेसी पाप का घड़ा कब तक ढोएंगे मिस्टर क्लीन?

देश से गांव, गांव से देश की यात्रा यों तो महज हफ्ते-दस दिन की रही। पर इस बीच देश में बहुत कुछ घट गया। अभी भी अपना गांव राजनीतिक कोलाहलों से अनजान त्योहारी मौसम में ही रमा हुआ। गांव में कार्तिक स्नान का दौर चल रहा। पर देश का मौसम स्कैम, स्कैंडल और करप्शन के रंग में ऐसा डूबा हुआ, मानो घोटालों की सेल लगी हो। हर कोई भ्रष्टाचार की गंगोत्री में डुबकी लगाता दिख रहा। क्या डीएम, क्या सीएम और क्या पीएम, कोई अछूता नहीं। ‘आदर्शवादी’ अशोक चव्हाण को कांग्रेस ने सचमुच का आदर्श बना दिया। जिस दिन बराक ओबामा ‘इंडिया’ को स्थायी सीट की झप्पी दे ‘भारत’ में अपना माल खपाने का जुगाड़ कर गए। उसी शाम अशोक का ताज छीन शोक मनाने के लिए छोड़ दिया। कांग्रेस ने नजीर पेश करने की कोशिश की। फौरन राहुल गांधी का बयान आ गया- अब साफ छवि का व्यक्ति ही सीएम होगा। सो एक चव्हाण चूके, तो इतिहास नहीं, वर्तमान के पृथ्वीराज चव्हाण को राज मिल गया। पर भ्रष्टाचार की अम्मा कांग्रेस कब तक खैर मनाती। महाराष्ट्र में आदर्श सोसायटी घोटाला और कॉमनवेल्थ घोटाले का शोर अभी थमा भी नहीं। टू-जी स्पेक्ट्रम घोटाले की परतें तेजी से उधड़ीं। तो सबसे पहले घोटालों के राजा केबिनेट मंत्री ए. राजा की छुट्टी हुई। बकरीद से पहले सुप्रीम कोर्ट ने पीएम पर ऐसी तल्ख टिप्पणी की। कांग्रेस हलाल हुई, पर उफ तक नहीं कर पाई। टू-जी स्पेक्ट्रम घोटाले में देश को पौने दो लाख करोड़ का चूना लगा। पर तमाम घटनाक्रम में पीएम की चुप्पी को लेकर कोर्ट ने सवाल उठाए। तो राजनीतिक भूचाल आ गया। सो बीजेपी ही नहीं, समूचे विपक्ष ने मोर्चा खोल दिया। सभी घोटालों की जांच के लिए जेपीसी की मांग कर दी। पर कांग्रेस जेपीसी के लिए राजी नहीं। सो संसद के शीत सत्र को मानो (शीत) ठंड लग गई। लगातार छठे दिन भी संसद नहीं चली। गतिरोध खत्म करने की कोशिशें हो चुकीं। पर दोनों पक्षों ने रार ठान ली। सो गतिरोध जस का तस बरकरार। यों भले छठवें दिन भी संसद नहीं चली। पर हालात इतनी तेजी से बदले कि सत्ता पक्ष हो या विपक्ष, दोनों के छक्के छूट रहे। नैतिकता और लोकतंत्र की दुहाई दे रही बीजेपी को अपनी करनी और कथनी परेशान कर रही। केंद्र में बीजेपी जेपीसी की मांग कर रही। तो कर्नाटक में बीजेपी की येदुरप्पा सरकार जमीन घोटाले में फंस गई। पहले तो येदुरप्पा ने दस्तावेज जारी कर सफाई दी। जमीन डिनोटीफाई करने का काम पहले के भी सीएम करते रहे। यानी उनने मान लिया, हमाम में सभी नंगे। फिर भी नितिन गडकरी ने येदुरप्पा को क्लीन चिट दे दी। पर नैतिकता के भूत ने बीजेपी की लंगोटी पकड़ ली। तो अब येदुरप्पा ने अपने परिजनों की ओर से कौडिय़ों के भाव खरीदी गई सरकारी जमीन लौटाने का एलान कर दिया। पर यही काम तो आदर्श घोटालेबाज अशोक चव्हाण ने भी किया था। तब बीजेपी क्यों नहीं मानी। यों कर्नाटक की सियासत में जितने भी ट्विस्ट आ रहे, सब बीजेपी की अंदरूनी खींचतान का ही नतीजा। पर बात दिल्ली के राजनीतिक धमाल की। सुप्रीम कोर्ट ने भले पीएमओ को नोटिस जारी नहीं किया। पर पीएम को जवाब दाखिल करने के लिए शनिवार तक का वक्त देना भी किसी नोटिस से कम नहीं। सो सरकार ही नहीं, समूची कांग्रेस की सिट्टी-पिट्टी गुम हो चुकी। बात सिर्फ ए. राजा तक सीमित रहती, तो कांग्रेस मोर्चा संभाल लेती। पर मनमोहन की चुप्पी को लेकर सीधे सुप्रीम कोर्ट ने सवाल उठा दिए। जो बात जनता के दिल में थी, कोर्ट ने जुबान से कह दी। सो मामला सिर्फ राजनीतिक नहीं, अब न्यायिक हो गया। पीएमओ की ओर से शनिवार को हलफनामा दाखिल होगा। जिसमें टू-जी स्पेक्ट्रम के बारे में पूरा ब्यौरा होगा। ताकि पीएम की चुप्पी पर सवाल न उठे। पर स्पेक्ट्रम घोटाले में कोर्ट की टिप्पणी के बाद मनमोहन पर राजनीतिक हमले भी तेज हो चुके। आडवाणी ने पीएम से सफाई मांगी। तो गुरुवार को सीताराम येचुरी ने भी कहा- जब इस्तीफा देने वाला मंत्री कह रहा, सब कुछ पीएम की जानकारी में हुआ। तो पीएम को संसद में सफाई देनी होगी। अब मनमोहन की छवि दांव पर। मिस्टर क्लीन कहलाने वाले मनमोहन आखिर क्या करें। राजनीति में छवि बनाने से बड़ी चुनौती उसे बरकरार रखने की। वाजपेयी ने छह दशक में जो छवि बनाई। बतौर पीएम गुजरात दंगे ने एक कलंक लगा दिया। वाजपेयी तो तभी नरेंद्र मोदी को हटाना चाहते थे। पर पार्टी की वजह से चुप रहना पड़ गया। यही हाल मनमोहन का, जिन ने पहले टर्म में न सही, पर दूसरे टर्म में डीएमके कोटे से टीआर बालू और ए. राजा को केबिनेट में शामिल न करने का खम ठोक दिया था। पर पार्टी नेतृत्व की वजह से समझौता करना पड़ा। तो बालू न सही, राजा की ताजपोशी हो गई। अब राजनीतिक मजबूरी की वजह से सत्ता में कई लुटेरे हिस्सेदार हो गए। सो मनमोहन चुप रहे। अब पार्टी के पाप का ठीकरा मनमोहन की पगड़ी पर फूट रहा। पर इस छवि के साथ क्या मनमोहन पीएम रहना पसंद करेंगे? अगर रहेंगे, तो हंसी के पात्र ही बनेंगे। हो न हो, मनमोहन ने इस्तीफे की पेशकश भी कर दी हो। पर कांग्रेस की मजबूरी, अभी राहुल कुर्सी के लिए पूरी तरह तैयार नहीं। गर मनमोहन हटे, तो फिर जबर्दस्त सफाई अभियान चलाना पड़ेगा। पर मनमोहन ने अंतरात्मा की मान कुर्सी छोड़ी, तो छवि सचमुच बनी रहेगी। पर फिलहाल अपने राजनीतिक गुरु नरसिंह राव की तरह मनमोहन भी मौनी बाबा बने हुए।
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18/11/2010

Thursday, November 4, 2010

गरीबों को ‘दीया’ छीन कब तक जलेगा चिराग?

त्योहारी सीजन का यही अनोखापन, कब वक्त बीत जाता, पता भी नहीं चलता। अपने नेताओं के झूठे वादों की तरह नहीं, जिसके इंतजार में उम्र निकल जाती। पर वादा निभाने का दिन कभी नहीं आता। तभी तो गरीबी के अभिशाप को मिटाने की कभी ईमानदार कोशिश नहीं हुई। अगर गरीबी दूर हो गई, तो फिर राजनेताओं को तो वोट के लाले पड़ जाएंगे। सो गरीबी ऐसा पटाखा हो गई, जिसे चुनावों में हर नेता फोड़ जश्न मनाता। एक चुनाव में हाथ अगर गरीब के साथ होता, तो अगले चुनाव में नारा बदल आम आदमी के साथ हो जाता। कोई दल कभी हिंदुत्व का झंडा उठाता। तो अगले चुनाव में राष्ट्रवाद का नारा। यानी शब्दों की जुगाली तो कोई नेताओं से सीखे। सो आम आदमी कहो या गरीब, अब महंगाई पर सरकार से किसी करिश्मे की उम्मीद नहीं कर रहा। अलबत्ता महंगाई को आत्मसात कर त्योहार मना रहा। आखिर जनता निकम्मी सरकारों से उम्मीद भी क्या करे। जब चुनावी मौसम होता, तो तोहफों की बारिश कर देते। पर जैसे ही सत्ता मिल जाती, नशा सिर चढक़र बोलने लगता। वैसे भी अबके दिवाली के मौके पर मनमोहन सरकार को त्योहार से अधिक बराक ओबामा दौरे की फिक्र। सो सरकारी अमला त्योहारी छुट्टी के बावजूद दौरे की तैयारी में जुटा। बीजेपी ने ओबामा की संरक्षणवादी नीति पर विरोध दर्ज कराने का एलान कर दिया। तो विदेश सचिव निरुपमा राव ने भोपाल त्रासदी के गुनहगार वारेन एंडरसन को छोटा मुद्दा बता दिया। निरुपमा बोलीं, एंडरसन से भी बड़े मुद्दे हैं, जिन पर राष्ट्रपति ओबामा से बात होगी। अब इसे संवेदनाशून्य बयान न कहें, तो क्या कहें। जिस त्रासदी ने भोपाल के लोगों की कई पीढी तबाह कर दी। उसके मुख्य गुनहगार को भारत लाने की बात अपने विदेश मंत्रालय की नजर में ऐरा-गैरा मुद्दा। वैसे कांग्रेसी सरकार से उम्मीद भी क्या। जब भरी संसद में वारेन एंडरसन को भगाने के रिकार्ड नहीं होने का एलान कर दिया गया। तो अब क्या उम्मीद? पर पिछली दिवाली से इस दिवाली राजनीतिक उथल-पुथल इस बात का सबूत कि वक्त हमेशा एक जैसा नहीं होता। पिछले साल दिवाली के वक्त बीजेपी तमाम झंझावातों से गुजर रही थी। महंगाई, आर्थिक मंदी और आतंकवाद जैसे मुद्दों के बावजूद लोकसभा चुनाव की हार ने बीजेपी को इतना हिला दिया था कि नींव हिलने लगी थी। राजस्थान विधानसभा में विपक्ष के नेता पद से वसुंधरा राजे के इस्तीफे को लेकर तबके अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने घोड़े खोल रखे थे। याद करिए, 17 अक्टूबर की दिवाली से ठीक पहले धनतेरस के दिन 15 अक्टूबर को पार्लियामेंट्री बोर्ड की मीटिंग में कैसे लालकृष्ण आडवाणी ने वसुंधरा से इस्तीफा लेने का फैसला वापस लेने की अपील की। पर राजनाथ सिंह ने आडवाणी तक की अपील खारिज कर दी थी। बोर्ड की मीटिंग में तनाव इस कदर बढ गया कि चार घंटे तक मंथन चलता रहा। पर धनतेरस के दिन बीजेपी अब महिला नेत्रियों पर कोई अहम फैसले से परहेज करती। उमा भारती को 10 नवंबर 2004 को धनतेरस के दिन ही सस्पेंड किया था। यानी पिछली दिवाली बीजेपी अपना ही दिवाला निकालने में लगी थी। पर कैडर बेस पार्टी होने का यही फर्क होता। साल भर बाद ही दिवाली में बीजेपी में शांति का माहौल। बीजेपी नेताओं ने बड़े इत्मिनान के साथ दिवाली मनाई। पर पिछले साल सत्ता में वापसी के बाद दिवाली पर घी का दीया जलाने वाली कांग्रेस इस बार फटेहाल। टू-जी स्पेक्ट्रम घोटाले में सुप्रीम कोर्ट की तल्ख टिप्पणी तक आ चुकी। पर ए. राजा को संचार मंत्रालय से हटाने की हिम्मत नहीं जुटा पा रही कांग्रेस। कॉमनवेल्थ घोटाले और मुंबई आदर्श सोसायटी घोटाले के तो वाकई क्या कहने। भ्रष्टाचार के मुद्दे ने कांग्रेस को इस कदर घेर रखा कि अब कांग्रेस कुछ कहने के बजाए, दबी जुबान कहती फिर रही- भ्रष्टाचार को जिंदगी का हिस्सा हो चुका। अब दबी जुबान ही सही, कोई सत्ताधारी पार्टी ऐसी सोच रखती हो। तो आप उससे देश हित की क्या उम्मीद रखेंगे? पर वक्त का पहिया घूमने में देर नहीं लगती। तभी तो पिछली दिवाली बीजेपी टेंशन मेें थी। तो अबके कांग्रेस फटेहाल दिख रही। भ्रष्टाचार से धन तो जुटा लिए। आम आदमी का पैसा अपनी जेब में भर लिया। जनता गरीबी और महंगाई के बोझ तले दबी। पर कांग्रेस भ्रष्टाचार को पनाह देने में लगी हुई। अब सवाल, आम आदमी का ‘दीया’ छीन कांग्रेस कब तक अपना ‘चिराग’ जलाएगी? भ्रष्टाचार की हांडी तो एक-न-एक दिन फूटेगी ही। चारा घोटाले वाले लालू आज किस कदर पानी मांग रहे। बोफोर्स ने कैसे देश में तख्ता पलट कर दिया। यह किसी को भी नहीं भूलना चाहिए। पर राजनीति की बातें तो होती रहेंगी। फिलहाल दीपावली की आप सबको ढेर सारी शुभकामनाएं।
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04/11/2010

Wednesday, November 3, 2010

लुटे-पिटे ओबामा से भला कैसी उम्मीद?

तो धनतेरस भी बीत गया। बाजारों में खूब रौनक रही, लोगों ने दिल खोलकर खरीददारी की। भले भारत दो हिस्सों दिखता हो, जैसा खुद राहुल गांधी कह रहे। पर अपने भारत की यही बड़ी खासियत, त्योहार के रंग में लोग इस कदर रंग जाते। अमीरी-गरीबी का फर्क भले कुछ पल के लिए ही सही, पर मिट सा जाता। अपनी संस्कृति में यही अनोखापन, जो विविधता से भरे भारत को एक सूत्र में पिरोए रखता। पर देखिए, जहां त्योहार हमारी एकता का आदर्श बन जाता। वहां आदर्श के नाम पर नेता-नौकरशाह कितनी लूट मचाते। बुधवार को नौ सेना ने रक्षा मंत्रालय को अपनी अंतरिम रपट दी। तो साफ कर दिया, सोसायटी की जमीन पर सेना का हक। पर महाराष्ट्र सरकार भी अपना दावा जताती रही है। नौ सेना ने सोसायटी को एनओसी नहीं दी। सुरक्षा के लिहाज से मौजूदा इमारत को खतरा भी बताया। अब सवाल अपनी नौ सेना से भी। नेताओं-नौकरशाहों की नीयत तो हमेशा ही रेवडियों की खातिर लपलपाई रहती। पर नौ सेना के अहम ठिकानों के बिलकुल पास में 31 मंजिला इमारत खड़ी हो गई। तो नौ सेना को तब क्यों नहीं दिखा। इतनी बड़ी इमारत कोई रातों-रात तो खड़ी नहीं हो गई। सो सवाल, नौ सेना ने पहले ही इस इमारत का निर्माण रुकवाने को कोई ठोस कदम क्यों नहीं उठाए? अपना इरादा नौ सेना की क्षमता पर संदेह का नहीं। पर सेना की रपट से ही यह सवाल निकल रहा। आखिर नौ सेना किस तरह से सुरक्षा का जिम्मा संभाल रही थी, जो इतनी बड़ी इमारत बन गई और उसे पता भी नहीं चला? यानी इस आदर्श घोटाले में सबके सब एक ही थाली के चट्टे-बट्टे निकले। अगर सेना के कुछ वरिष्ठ अधिकारियों की मिलीभगत नहीं होती। तो इतनी बड़ी भ्रष्ट इमारत खड़ी नहीं हो पाती। सो आदर्श फ्लैट धारको में नेताओं-नौकरशाहों के साथ-साथ सेना के नामी-गिरामी हस्तियों की भी कलई खुल गई। अब तक खुद को पाक बताने वाले विलासराव देशमुख के भी चेहरे से नकाब उतर गया। जब कानूनी सीमा से बाहर जाकर आदर्श सोसायटी को फायदा दिलाया। सो आदर्श के चक्कर में फर्श घिस रही कांग्रेस। ऊपर से कॉमनवेल्थ करप्शन पर बीजेपी लगातार परतें उधेडऩे में जुटी। नितिन गडकरी ने केबिनेट के फैसलों के नोट जारी कर दिया। तो शाहनवाज हुसैन ने आरोप लगाया, घोटाले में कांग्रेस खुद चोर और चौकीदार बनी बैठी। सो कांग्रेस अबके भ्रष्टाचार के जाल में बुरी तरह फंस चुकी। मंगलवार के कांग्रेस अधिवेशन में भ्रष्टाचार पर चुप्पी मीडिया की सुर्खियां बनी। तो बुधवार को कांग्रेस प्रवक्ता मनीष तिवारी सफाई देने मैदान में आए। उनने मीडिया की समझ पर सवाल उठा अपनी समझनदानी बड़ी बता दी। बोले- आपलोग सोनिया गांधी के भाषण को सही ढंग से समझ नहीं पाए। उन्होंने वर्करों को बुनियादी मूल्य न भूलने और संयम-सादगी का मंत्र दिया था, जिसमें संदेश साफ निहित है। यानी कांग्रेस भ्रष्टाचार के सिवा बाकी सभी मुद्दो पर सीधा-सीधा बोलती है। अब इसे राजनीतिक बेशर्मी नहीं, तो और क्या कहेंगे? भ्रष्टाचार का इतना बड़ा मुद्दा, पर कांग्रेस सीधा बोलने से बच रही। अब अगर मनीष तिवारी की दलील मान भी लें। तो क्या मंगलवार को सोनिया का भाषण दिग्वििजय सिंह को भी समझ नहीं आया। उन ने तो मंगलवार को ही कहा था, जरुरी नहीं हर मंच से भ्रष्टाचार की बात हो। सो कांग्रेस के वाकई क्या कहने। अब अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा के दौरे के बाद फिर हंगामा बरपेगा। बीजेपी ने संसद में घेरने की पुख्ता रणनीति बना ली। पर उससे पहले बराक ओबामा के स्वागत की तैयारी में मनमोहन सरकार बिछ चुकी। दिवाली के मौके पर मुंबई छावनी में तब्दील हो गई। ओबामा के संग तीन हजार से अधिक लोग आ रहे। सो अमेरिका मुंबई विजिट पर रोजाना 900 करोड़ खर्च करेगा। अब आप ही सोचिए, ओबामा का सीधे भारत की आर्थिक नगरी मुंबई में आना। सारा फोकस मुंबई पर करना, क्या यों ही। सही मायने में भारत में दिवाली का जश्न, तो उधर अमेरिका में बराक ओबामा का दिवाला निकल गया। लोकप्रियता के शिखर पर पहुंच जिस तरह अमेरिका के पहले अश्वेत राष्ट्रपति होने का गौरव हासिल किया। अब धराशायी मार्केट की तरह लोकप्रियता भी गिर गई। मध्यावधि चुनाव में ओबामा की पार्टी डेमोक्रेटिक का हाउस ऑफ रिप्रजेंटेटिव में बहुमत खत्म हो गया। अब रिपब्लिकन ने बहुमत हासिल कर लिया। सीनेट में भी रिपब्लिकन डेमोक्रेट के करीब आ गई। यानी 21 महीने में ही ओबामा लुट गए। यों व्यक्तिगत तौर पर लोग ओबामा को पसंद करते, पर उनकी नीतियां बेअसर साबित हुई। आर्थिक मंदी से उबरने में नाकाम ओबामा अब भारत दौरे से खुद उम्मीद लगाए बैठे। सो दौरे से पहले ही कह दिया, सुरक्षा परिषद में स्थाई सदस्यता, दोहरी टेक्नोलॉजी का मामला बेहद जटिल। पर एक पते की बात कह गए ओबामा। उनने पाक को मुंबई हमले के दोषियों पर जिम्मेदार कार्रवाई की नसीहत दी। तो लगे हाथ, रणनीतिक साझेदारी के लिए भारत को अपनी टॉप पालिसी बताया। आखिर में कहा, दुनिया में बहुत नेताओं से मिला। पर उनमें मनमोहन सर्वाधिक अदभूत नेता। यानी कुल मिलाकर अमेरिका हमें जुबानी सराहना देगा, बदले में भारत के बाजार में अपना माल खपाने का बंदोबस्त कर जाएगा। वैसे भी लुटे-पिटे ओबामा से भारत भला उम्मीद भी क्या करे।
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03/11/2010

Tuesday, November 2, 2010

तो भ्रष्टाचार पर चुप्पी भी कांग्रेसी ‘आदर्श’

तो कांग्रेस की एक दिनी चौपाल आधे दिन में ही निपट गई। एआईसीसी मेंबरों का चुनाव न होना था, न हुआ। अलबत्ता परंपरा के मुताबिक सोनिया गांधी को ही मनोनयन का हक मिल गया। सो सोनिया बोलीं, मनोनयन की डगर इतनी आसान नहीं। सो कुछ लोगों को घाटा उठाने को तैयार रहना होगा। पर लगे हाथ उन ने यह भी कह दिया, धीरज रखने से कांग्रेस में कभी-न-कभी नंबर आ ही जाता है। यों यह कितना सच, आप प्रणव दा से ही पूछ लो। अब सोनिया गांधी सीडब्लूसी का एलान चाहे जब करें। पर अधिवेशन में राहुल गांधी का जादू खूब चला। कांग्रेसियों ने तालकटोरा स्टेडियम को राहुलमय कर दिया। अब भले राहुल का बोलना एजंडे में नहीं था। पर राहुल बोलेंगे, ऐसा तय ही था। आप पुराना इतिहास पलट कर देख लें। पर हमेशा राहुल को वर्करों के अनुरोध पर बुलवाने की परंपरा। सो अबके भी राहुल ने उसी तरह माइक संभाला। पर फर्क, अब राहुल राजनीति के माहिर खिलाड़ी हो चुके। सो उन ने कांग्रेस को एकमात्र राष्ट्रीय पार्टी और गरीबों का रहनुमा बताया। पिछले छह साल में राहुल ने जिस भरत की खोज की। उसकी कहानी सुन सभी कांग्रेसी गदगद दिखे। मां सोनिया का चेहरा तो गर्व से दमक उठा। राहुल ने दोहराया- ‘आज दो हिंदुस्तान। एक गरीब, तो दूसरा खुशहाल। अब दोनों हिंदुस्तान को जोडऩे की जरुरत और यह काम सिर्फ कांग्रेस पार्टी ही कर सकती।’ यों राहुल की दो हिंदुस्तान वाली थ्योरी सोलह आने सही। पर कांग्रेस ही देश का गरीबों का उद्धार कर सकती, यह समझना मुश्किल। आजादी के 63 साल में करीब 50-55 साल कांग्रेस का ही राज रहा। चौथी लोकसभा तक तो करीब-करीब पूरे देश में कांग्रेस ही शासन में बनी रही। फिर राज्यों में थोड़ी-बहुत तस्वीर जरुर बदली। तो अब सवाल उठना लाजिमी, क्या देश से गरीबी दूर करने के लिए कांग्रेस को फिर से 50-55 साल चाहिए। खुद इंदिरा गांधी ने 1971 में गरीबी हटाओ का नारा देकर चुनावी जीत का डंका बजाया था। पर 40 साल बाद भी कांग्रेस वही चुनावी नारे दोहरा रही। तो इसके क्या मायने? अधिवेशन में राहुल के कसीदे सिर्फ मेंबरों ने ही नहीं, खुद सोनिया ने भी पढ़े। उन ने युवा कांग्रेस और एनएसयूआई में लोकतांत्रित तरीके से नेता चुनने को सराहा। राहुल का नाम लिए बिना बोलीं, युवाओं का रूझान तेजी से कांग्रेस की ओर हो रहा। पर जिस लोकतंत्र की दुहाई सोनिया ने दी। जरा उसका एक नमूना भी देख लें। यूपी में युवा कांग्रेस के चुनाव में महज एक वोट पाने वाले शैफ अली नकवी अब उपचुनाव में लखीमपुर सदर से कांग्रेस उम्मीदवार हो गए। नकवी के अब्बा जफर अली लखीमपुर से कांग्रेसी सांसद। सो राहुल गांधी की लोकतांत्रिक पहल की कलई तो ताजा उदाहरण ही खोल रहा। पर कांग्रेस की कथनी और करनी हमेशा से जुदा रही। तभी तो घोटालों नहीं, महाघोटालों के साए में कांग्रेस अधिवेशन हुआ। सोनिया-मनमोहन-राहुल-प्रणव ने भाषण तो खूब दिए। पर घोटालों-भ्रष्टाचार के आगे जुबां बंद ही रहे। अधिवेशन में कॉमनवेल्थ करप्शन के सिरमौर सुरेश कलमाड़ी और आदर्शवादी अशोक चव्हाण भी मौजूद थे। पर मंच से कोई संदेश नहीं आया। अपने मनमोहन तो सिर्फ सोनिया का गुणगान ही करते रह गए। यानी भ्रष्टाचार के मसले पर कांग्रेस ने अधिवेशन में ‘आदर्श’ चुप्पी साध ली। यों सोनिया ने अपने संबोधन में पर्यावरण पर राजीव गांधी के एक कथन को उद्धृत जरुर किया। जिसके मुताबिक, जब कभी पर्यावरण को नुकसान पहुंचता है, तब भारत के एक अंश का विनाश होता है। सो पर्यावरण का जिक्र आया, तो लगा, अब चव्हाण का आदर्श भी बताएंगी। अपने जयराम रमेश ने सोमवार को ही कह दिया था। आदर्श सोसायटी में पर्यावरण मानकों की अनदेखी हुई, सो कुछ फ्लोर ढहाए जा सकते। सचमुच आदर्श सोसायटी के कुछ फ्लोर नहीं, पूरी इमारत ढहा देनी चाहिए। कारगिल के वक्त सेनाध्यक्ष रहे वीपी मलिक ने तो इसे शर्म की इमारत करार दे यही सुझाव दिया। सेना अधिकारियों की मिलीभगत से मलिक बेहद व्यथित दिखे। पर क्या नेता ऐसा होने देंगे? शायद नहीं, भाई-भतीजावाद और भ्रष्टाचार तो राजनीति की जड़। सो कोई अपनी जड़े भला क्यों खोदेगा? आम आदमी की दुहाई तो सिर्फ वोट बटोरने का जरिया। सो सोनिया ने भ्रष्टाचार पर मौन साधा, तो महंगाई पर वही पहले जैसी चिंता। राज्यों के सिर ठीकरा फोड़ा। बोलीं- ‘कालाबाजारियों पर कार्रवाई करना राज्य की जिम्मेदारी।’ अब अगर सोनिया की दलील मान भी लें। तो सवाल, कांग्रेस शासित दिल्ली, राजस्थान, हरियाणा, असम, आंध्र जैसे राज्यों में महंगाई कम क्यों नहीं हो रहे? क्या वहां की सरकारें भी कालाबाजारियों से मिली हुई? यह सवाल खुद सोनिया के भाषण से उठ रहा। पर कांग्रेस हमेशा से अपनी ठसक भरी राजनीति के लिए जानी जाती। तभी तो सोनिया ने अयोध्या फैसले के मद्देनजर शांति समाधान की बात नहीं की। अलबत्ता बाबरी विध्वंस की याद दिला मुस्लिम वोट बैंक को साधने की कोशिश की। पर ताजा फैसला तो जमीन विवाद में आया। कांग्रेस दोनों पक्षों में एकता के प्रयास कर सकती थी। पर हाईकोर्ट के फैसले से कांग्रेस को राजनीतिक उल्लू सीधा होता नहीं दिख रहा। सो दोनों मामलों को जोडक़र बयानबाजी कर रही। पर भ्रष्टाचार का मुद्दा कांग्रेस के लिए गंभीर नहीं, क्योंकि इसमें कांग्रेसी झुलस रहे। सो भ्रष्टाचार पर अधिवेशन में चुप्पी मुद्दा बनी। बीजेपी ने हमला बोला। तो दिग्वििजय सिंह ने बेहिचक कह दिया। जरुरी नहीं हर मंच से भ्रष्टाचार की चर्चा हो। यानी कांग्रेस की जय हो। इतने बड़े अधिवेशन में भ्रष्टाचार पर न बोलना भी एक ‘आदर्श।’
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02/11/2010

Monday, November 1, 2010

‘आदर्श’ साए में कांग्रेस का आदर्श अधिवेशन!

तो घो’टाले का मतलब, जिसे घुमा-फिराकर टाल दिया जाए। सो कांग्रेस अब सभी ‘आदर्शवादियों’ को बचाने में जुट गई। हनुमान भक्त बराक ओबामा सचमुच अशोक चव्हाण के लिए हनुमान साबित हुए। सो ‘ओबामा संजीवनी’ पाकर सोमवार को चव्हाण मुंबई लौट गए। पर जाते-जाते कह गए, और भी बहुत सारे काम हैं आदर्श सोसायटी घोटाले के सिवा। इधर चव्हाण की किस्मत की रिपोर्ट बनाने में जुटे प्रणव मुखर्जी ने भी एलान कर दिया, अभी जांच में और वक्त लगेगा। यानी कम से कम दिवाली और ओबामा विजिट तक चव्हाण की कुर्सी को कोई खतरा नहीं। दबी जुबान में अब कांग्रेसी भी कह रहे, राहुल की पसंद को हटाना आसान नहीं। अब चव्हाण की कुर्सी बचेगी या खिसकेगी, यह ओबामा विजिट के बाद ही तय होगा। पर राहुल गांधी की पसंद का हश्र देखिए। जम्मू-कश्मीर के सीएम उमर अब्दुल्ला भी राहुल की पसंद। तमाम झंझावातों के बीच भी राहुल ने उमर का समर्थन किया था। पर उमर का राजनीतिक अनाड़ीपन अब किसी से छुपा नहीं। महाराष्ट्र के सीएम पद पर अशोक चव्हाण भी राहुल की ही पसंद। पर संयोग देखिए, जब दीपावली के मौके पर सोना कुलांचे मार रहा। तभी राहुल के दोनों खरा सोना उमर-अशोक सही मायने में खोटा सिक्का साबित हुए। अब कोई पूछे, आदर्श घोटाले पर राहुल गांधी ने खामोशी की चादर क्यों ओढ़ रखी है? यानी पूरे घटनाक्रम में चव्हाण की कुर्सी बचती दिख रही। विलासराव देशमुख को अपनी मंशा पर पानी फिरता दिखा। तो फौरन अशोक चव्हाण पर हमला बोल दिया। खुद के इरादे को पाक, चव्हाण को नापाक बताने की कोशिश की। कहा- ‘मैंने सीएम रहते आदर्श सोसायटी सिर्फ सेना से जुड़े मौजूदा और रिटायर्ड लोगों के लिए मंजूरी दी थी। पर अशोक चव्हाण ने बतौर राजस्व मंत्री इसके प्रावधान बदल सिविलियन के लिए भी खोल दिया। अगर सोसायटी सिर्फ फौजियों के लिए होती। तो इतनी हाय-तौबा न मचती।’ यानी देशमुख ने सारा ठीकरा चव्हाण के सिर फोड़ दिया। पर सभी ‘आदर्शवादी नंगों’ को कांग्रेस पहचान चुकी। सो जांच कमेटी के सदस्य और महाराष्ट्र कांग्रेस के प्रभारी एके एंटनी ने विलासराव को कड़ी फटकार लगाई। महाराष्ट्र के सभी कांग्रेसियों को भी जुबान बंद रखने की हिदायत दे दी गई। कांग्रेस की मुश्किल सिर्फ चव्हाण का घोटाले में नाम आना नहीं, अलबत्ता राज्य के सभी बड़े कांग्रेसी फंस रहे। अब अगर चव्हाण की बलि ली गई। तो फिर आदर्श लूट में उछल रहे नामों देशमुख-शिंदे-नारायण राणे कैसे बचेंगे? सचमुच आदर्श सोसायटी घोटाले के हमाम में सभी नंगे हो गए। आदर्श लूट का सिलसिला 2000 से ही शुरु हुआ। जब केंद्र में एनडीए का, तो महाराष्ट्र में शिवसेना के नारायण राणे सीएम थे। सो आदर्श फ्लैट धारकों में नारायण राणे के सिफारिशी और तबके केंद्रीय पर्यावरण मंत्री सुरेश प्रभु का भी नाम सामने आ रहा। यानी आदर्श सोसायटी फ्लैट की फाइल जहां-जहां गई, वही फ्लैट का मालिक बन बैठा। सो धीरे-धीरे इमारत छह मंजिला से इकत्तीस मंजिला बन गई। डीएम से लेकर सीएम तक, सबने ‘आदर्श’ स्थापित कर दिया। अब सबके सब फंस रहे। तो स्थानीय प्रशासन चुस्त हो गया। बीएमसी ने सोसायटी में कारगिल से जुड़े परिवारों को छोडक़र बाकी सभी के पानी के कनेक्शन काट दिए। बिजली विभाग ने 24 घंटे का अल्टीमेटम दे रखा। सो मानवाधिकार और ऑक्यूपेशन सर्टिफिकेट पर रोक लगाने के खिलाफ सोसायटी के कुछ लोग अब बांबे हाईकोर्ट पहुंच गए। अब अगर मामला कानूनी पचड़े में फंसा। तो कांग्रेस को संसद में बचाव का मौका मिल जाएगा। बीजेपी अध्यक्ष नीतिन गडकरी ने तो सोमवार को एलान कर दिया, संसद में इस घोटाले को जोर-शोर से उठाया जाएगा। पर कांग्रेस अभी इस पड़ताल में जुटी कि एनडीए के समय के कुछ ऐसे कागज हाथ लग जाए, जिससे विपक्ष को मुंहतोड़ जवाब दे सके। कांग्रेस की मुसीबत यह कि आदर्श सोसायटी को कारगिल शहीद के परिवारों से जुड़ा बताया जा रहा। ताबूत घोटाले में कांग्रेस ने कैसे जार्ज फर्नांडिस का तीन साल तक बायकॉट किया और नारे लगाए, खुद नहीं भूली। अब कांग्रेस को डर, कहीं विपक्ष ने इसे मुद्दा बनाने में सफलता हासिल कर ली। तो कांग्रेस को बेभाव की पड़ेगी। पर अभी यह साबित होना बाकी। अब अगर जमीन महाराष्ट्र सरकार की निकली। कारगिल परिवारों की बात नहीं आई। तो चव्हाण की कुर्सी सलामत रहेगी। कांग्रेस नेता और आदर्श सोसायटी के अहम कर्ताधर्ता कन्हैया लाल गिडवानी तो मीडिया पर ही भडक़े हुए। दावा किया- जमीन महाराष्ट्र सरकार की, खुद सेना ने भी सर्टिफिकेट दिया। हमारे पास लिखित में किसी कांग्रेसी नेता ने सिफारिश नहीं की। पर गिडवानी भूल रहे, खुद तबके सीएम विलासराव देशमुख ने कबूला- आदर्श सोसायटी सेना के लिए मंजूरी दी। अब जरा गिडवानी का एक और बयान देखिए। आदर्श सोसायटी के सी-फेसिंग होने और हाई-फाई होने पर टिप्पणियां हो रही। सो गिडवानी बोले- समुद्र के किनारे बसी झोपड़ट्टी वाले तो चौबीसों घंटे सी-फेसिंग ही रहते, पर कोई सवाल नहीं उठता। अब गिडवानी के बोल को आप क्या कहेंगे? अपनी नजर में चोरी और सीनाजोरी इसे ही कहते हैं। पर आदर्श घोटाले के साए में कांग्रेस का अधिवेशन तीन साल बाद मंगलवार को होने जा रहा। पर क्या लगातार चौथी बार कांग्रेस की कमान संभालने वालीं सोनिया गांधी से कोई नए आदर्श की उम्मीद करें? सचमुच ऐसे ‘आदर्श’ को तो भ्रष्टाचार भी सलाम ठोकती।
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01/11/2010