Friday, November 26, 2010

लो हजार रुपए के घोटाले में 35 पैसे की नैतिकता

26/11 की दूसरी बरसी भी बीत गई। पर अपनी सरकार आज भी वही राग अलाप रही, जो दो साल पहले अलापा था। दोषियों को नहीं बख्शेंगे.. पाक ने गुनहगारों पर ठोस कार्रवाई नहीं की। पर सिर्फ यह कहते-कहते कब तक श्रद्धांजलि देंगे नेता? मुंबई में श्रद्धांजलि के कई कार्यक्रम हुए। अपनी संसद ने भी श्रद्धांजलि की रस्म अदा कर हंगामा शुरू कर दिया। सो 11वें दिन भी संसद नहीं चली। प्रणव मुखर्जी ने संसद न चलने का ठीकरा विपक्ष के सिर फोड़ दिया। कांग्रेसी खेमे से लगातार यही संदेश देने की कोशिश हो रही। ताकि जनता विपक्ष को संसद के कामकाज में रुकावट का जिम्मेदार माने। पर विपक्ष भी कम नहीं। विपक्ष का मानना यही, अगर संसद भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ रही, तो कांग्रेस की मंशा ही सवालों के घेरे में होगी। यानी पक्ष-विपक्ष की अपनी-अपनी रणनीति में संसद रण बन गई। शुक्रवार को लोकसभा स्पीकर मीरा कुमार ने सरकारी पक्ष से बातचीत के बाद आडवाणी-सुषमा को फोन घुमाया। बिहार में नीतिश कुमार के शपथ ग्रहण में गए आडवाणी-सुषमा ने स्पीकर को अपना पुराना स्टैंड दोहरा दिया। स्पीकर ने सरकार की ओर से बहस के प्रस्ताव पर राजी होने की अपील की थी। पर आडवाणी-सुषमा ने जेपीसी के सिवा कोई अन्य प्रस्ताव मानने से इनकार कर दिया। सचमुच भ्रष्टाचार के जितने बड़े खुलासे हो रहे, संसद में बहस का कोई औचित्य नहीं। अगर संसद में बहस हो भी, तो क्या होगा। यही ना, सभी दलों को संख्या बल के आधार पर भाषण देने का टाइम दिया जाएगा। फिर आखिर में संबंधित विभाग के मंत्री अपना जवाब दे देंगे। बस अथ श्री भ्रष्टाचार कथा का शीतकालीन अध्याय खत्म। सो कांग्रेस बिना किसी लोकलाज के खम ठोककर कह रही- सरकार चलाने का जनादेश हमको मिला। सो विपक्ष हमें डिक्टेट न करे। अब कोई पूछे, कांग्रेस को अगर सरकार चलाने का जनादेश मिला, तो क्या विपक्ष का गला घोंट देगी? कांग्रेस यह भूल रही, किसी देश में लोकतंत्र तभी तक जिंदा, जब तक विपक्ष की अलग हैसियत हो। यह नहीं कि सत्ता के नशे में सत्ताधारी दल विपक्ष की हर आवाज को जनादेश की आड़ में कुचल दे। सो फिर वही सवाल- टू-जी स्पेक्ट्रम घोटाला हो या कॉमनवेल्थ घोटाले या आदर्श सोसायटी के बाद अब फर्जी हाउसिंग लोन घोटाला। अगर कांग्रेस का दामन पाक-साफ, तो किसी भी जांच से परहेज क्यों? कांग्रेस और सरकार की ओर से दलील दी जा रही- जेपीसी बन गई, तो कभी पीएम, तो कभी मंत्री को तलब कर विपक्ष अखबारबाजी करेगा। जिससे सरकार की किरकिरी होगी। पर अगर कांग्रेस एक कदम आगे बढक़र सोचे। तो यह भी संभव, जेपीसी की जांच में कांग्रेस और सरकार के खिलाफ आरोप साबित नहीं हुए। तो अखबारबाजी करने वाले विपक्ष का मुंह कैसा रह जाएगा। पक्ष हो या विपक्ष, अब जनता राजनीति के हर दांव-पेच बखूबी समझने लगी। बिहार का जनादेश इसकी ताजा मिसाल। फिर भी राजनीतिक दल सबक नहीं ले रहे। अलबत्ता सरकार और विपक्ष की जिद में ठप संसद को भी अपनी नैतिक जीत बताने की कोशिश हो रही। बीजेपी ने कर्नाटक में येदुरप्पा को न हटाकर सरकार बचा ली। तो येदुरप्पा ने नैतिकता का ढिंढोरा पीटने में कोई कसर नहीं छोड़ी। पहले तो अपने बेटे-बेटियों को मुख्यमंत्री के सरकारी आवास से बाहर कर दिया। फिर देश भर के अखबारों में बड़े-बड़े इश्तिहार छापकर कर्नाटक में सुशासन का संकल्प जताया। यानी कर्नाटक एपीसोड तो निपट चुका। फिलहाल संसद में धारावाहिक चल रहा, जो एक-दो ब्रेक के साथ ही खत्म हो जाता। शुक्रवार को तीन ब्रेक लिए। फिर भी संसद नहीं चली। सो अब कांग्रेस ने नैतिकता-नैतिकता खेलना शुरू कर दिया। विपक्ष को कोसने के बाद खुद को नैतिक दिखाने के लिए संसदीय कार्य मंत्री पवन कुमार बंसल ने एलान कर दिया। जब तक संसद में गतिरोध रहेगा, कांग्रेस के सांसद भत्ता नहीं लेंगे। पर माकपाई सीताराम येचुरी बोले- कांग्रेस संसद में कामकाज नहीं चाहती। हम तो यहां काम करने आते हैं। अब किसकी मंशा कैसा, यह आप जानो। पर कांग्रेस की नैतिकता का अंकगणित भी देखते जाओ। स्पेक्ट्रम घोटाला हुआ पौने दो लाख करोड़ का। यानी हिंदी में एक नील 76 खरब, तो अंग्रेजी में 1.76 ट्रिलियन। अपने देश में अरब-खरब के बाद लोग गिनती भूल जाते। पर यहां घोटाला शंख तक पहुंचने वाला था। अब अगर सिर्फ स्पेक्ट्रम घोटाले से कांग्रेस की नैतिकता को भाग दें। तो 11 दिन में कांग्रेस को लोकसभा के 208 और राज्यसभा के 72 सांसदों के भत्ते मिला दें। तो रोजाना 2000 रुपए के हिसाब से बने कुल 61लाख 60 हजार। यानी एक नील 76 खरब रुपए के घोटाले का महज 0.000035 फीसदी। आम भाषा में समझें, तो एक हजार रुपए के घोटाले में महज 35 पैसे की नैतिकता। इस अंकगणित में कॉमनवेल्थ के 70 हजार करोड़ के घोटाले शामिल नहीं। कांग्रेस भूल गई, तहलका में बंगारू लक्ष्मण ने सिर्फ एक लाख रुपए रिश्वत ली थी। तो कांग्रेस ने सत्रह दिन संसद ठप किया था। पर अबके तो इतना बड़ा घोटाला कि अपना नंबरिंग सिस्टम भी छोटा पड़ रहा। फिर भी कांग्रेस जेपीसी को राजी नहीं। अलबत्ता 35 पैसे की नैतिकता का झंडा फहरा रही। ये तो वही बात हो गई, जैसे भ्रष्टाचार के समंदर से एक बाल्टी नैतिकता का निकालना।
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26/11/2010

Thursday, November 25, 2010

संविधान नहीं, पक्ष-विपक्ष की जिद संसद पर हावी

आंध्र में कांग्रेस को आशा की किरण मिल गई। नल्लारी किरण कुमार रेड्डी ने सीएम की कुर्सी संभाल ली। तो अब शुक्रवार को नीतिश कुमार तीसरी बार बिहार के मुख्यमंत्री पद की शपथ लेंगे। बिहार में जेडीयू-बीजेपी दोनों की सीटें छप्पर फाड़ कर बढ़ीं। पर जनादेश के निहितार्थ को दोनों नेतृत्व ने बखूबी समझा। सो तय हो गया, पुराने फार्मूले पर ही सरकार का गठन होगा। अगर एक ने भी अपनी बढ़ी ताकत को सौदेबाजी का हथियार बनाया होता। तो गठबंधन में दरार लाजिमी थी। पर जनता के समझदारी भरे फैसले को जितनी सौम्यता से नीतिश ने कबूला, उतना ही संयम बीजेपी ने भी दिखाया। पर कांग्रेस को राहुल का फेल होना हजम नहीं हो रहा। यों सोनिया गांधी ने पहले दिन ही कमान संभाल लाइन दे दी। सो गुरुवार को कांग्रेस ने बिहार में राहुल के फेल होने को मीडिया की गलत धारणा बताया। जयंती नटराजन बोलीं- राहुल युवाओं के आदर्श हैं। कांग्रेस का चेहरा हैं, उन ने पार्टी महासचिव की हैसियत से प्रचार किया। जिससे कांग्रेस का काडर भविष्य के लिए प्रेरित हुआ। अब कांग्रेस की ऐसी टिप्पणी कोई चौकाने वाली बात नहीं। जीत का सेहरा हमेशा गांधी परिवार के सिर बांधने की परंपरा। हार का ठीकरा स्थानीय नेतृत्व पर। वैसे भी बिहार के नतीजों के दूसरे दिन ही इलाहाबाद की रैली में चाटुकार कांग्रेसियों ने अपनी भक्ति का भोंडा प्रदर्शन कर दिया। जब पोस्टरों में सोनिया को भारत माता, तो राहुल गांधी को कृष्ण दिखाया। अब कांग्रेसी चाहे जितनी दलीलें दें, पर बिहार की जनता ने काम को जनादेश देकर अपना संदेश दे दिया। सो जनता की उम्मीदों को पूरा करने हनक के साथ नीतिश शुक्रवार को फिर कमान संभालेंगे। तो विकास की पटरी पर लौटा बिहार अब रफ्तार भरेगा। पर दुर्भाग्य, लोकतंत्र के सबसे बड़े मंदिर में दस दिन से कोई काम नहीं हो रहा। अलबत्ता पक्ष-विपक्ष की रार यही संदेश दे रही। भले संसद का सत्र भ्रष्टाचार की बलि चढ़ जाए, पर किसी भ्रष्टाचारी को बलि चढ़ाने वाली जेपीसी नहीं बनेगी। सो अब सत्रावसान की खबरें जोर पकडऩे लगीं। तो सरकार और कांग्रेस पर भ्रष्टाचार से भागने का आरोप न लगे, सो विपक्ष को हंगामाई साबित करने की मुहिम तेज हो गई। गुरुवार को राज्यसभा के चेयरमैन हामिद अंसारी ने मीटिंग बुलाई। पर संसदीय कार्य मंत्री पवन बंसल ने दोहरा दिया, जेपीसी नहीं मानेंगे। सरकार और कांग्रेस के संकटमोचक प्रणव मुखर्जी ने भी हाथ खड़े कर दिए। बोले- मैं नहीं जानता यह गतिरोध कैसे खत्म होगा। मैं समाधान नहीं ढूंढ पा रहा, फिर भी कोशिश कर रहा हूं। लोकसभा स्पीकर मीरा कुमार ने एक बार फिर गतिरोध दूर करने और सदन चलने देने की अपील की। यानी सरकार की ओर से यह संदेश देने की कोशिश तेज हो गई कि वह संसद चलाने के पक्ष में। पर विपक्ष अड़ंगा डाल रहा। प्रणव दा और बंसल ने बाकायदा विपक्ष को चुनौती दी, अगर पीएसी की जांच और सरकार पर भरोसा नहीं। तो अविश्वास प्रस्ताव लेकर आए। बंसल ने तेरह दिसंबर तक सत्र चलाने की मंशा का इजहार किया। पर भ्रष्टाचार की जांच में अविश्वास प्रस्ताव का क्या मतलब? विपक्ष ने सरकार को अल्पमत में नहीं बताया। अलबत्ता भ्रष्टाचारियों को शिकंजे में लाने के लिए जेपीसी की मांग की। अगर सरकार के मन में कोई खोट न होता, तो जेपीसी पर ऐसी रार न ठनती। अब भले सरकार जुबां से तेरह दिसंबर तक सत्र चलाने का एलान कर रही। पर गुरुवार की सारी बयानबाजियों में मंशा समय पूर्व सत्रावसान की ही। सो सत्तापक्ष की रणनीति भांप विपक्ष भी अब अपना नंबर बढ़ाने में जुट गया। गुरुवार को सारे मुलायमवादी जेपीसी की मांग को लेकर संसद के परिसर में धरने पर बैठ गए। अगर 1962, 1965, 1971 और कारगलि युद्ध को छोड़ दें। तो विपक्ष के बारे में हमेशा अवसरवादी होने की धारणा बनी हुई। विपक्ष की भूमिका का मतलब सिर्फ यहीं तक सीमित रह गया कि हमेशा ऐसे मौकों की तलाश करो, जिससे सरकार पर छींटाकशी की जा सके। चरित्र हनन कर जनता में छवि बिगाड़ी जा सके। कुल मिलाकर सत्तापक्ष को बदनाम कर ही विपक्ष अपनी भूमिका की इतिश्री मान लेता। पर सत्तापक्ष को भी संसद की फिक्र नहीं रही। संसद को हमेशा ऐसे घुमाने की कोशिश की, मानो बपौती हो। वरना भ्रष्टाचार के इतने बड़े-बड़े खुलासे हो रहे। सुप्रीम कोर्ट से आए दिन ऐसी टिप्पणियां आ रहीं, जो सरकार को शर्मसार कर रहीं। फिर भी ऐसे बर्ताव कर रही, मानो, शर्म-हया बेच खाई हो। गुरुवार को भी सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई को लताड़ा। पूछा, अब तक स्पेक्ट्रम घोटाले में पूर्व संचार मंत्री ए. राजा से पूछताछ क्यों नहीं हुई। कोर्ट एक दिन पहले ही इस घोटाले को महाघोटाला करार दे चुकी। फिर भी सरकार का गुरूर देखिए, जेपीसी नहीं मान रही। अब पक्ष-विपक्ष की इसी कटुता के बीच 26/11 की दूसरी बरसी का वक्त आ गया। पर क्या श्रद्धांजलि महज औपचारिकता भर होगी या संसद एकजुट होकर आतंकवाद को कुचलने का सच्चा संकल्प लेगा? सिर्फ मुंबई हमला ही नहीं, 26/11 की तारीख अपने संविधान के लिए भी अहम। इकसठ साल पहले 26/11 को ही संविधान सभा ने देश के संविधान को मंजूरी दी थी। पर अफसोस, आज संविधान नहीं, सत्तापक्ष और विपक्ष की जिद संसद पर हावी।
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25/11/2010

Wednesday, November 24, 2010

तो अब लफ्फाजी नहीं, सिर्फ विकास मांग रही जनता

बिहार में विकास ने लालू-पासवान का बंटाधार किया। आंध्र में के. रोसैया की अकर्मण्यता ने सीएम की कुर्सी छीन ली। तो कर्नाटक में नैतिकता पर ब्लैकमेल भारी पड़ा। बीजेपी ने येदुरप्पा को सीएम बनाए रखने का एलान कर दिया। पर बुधवार के दो विलेनों की बात फिर कभी। फिलहाल बात सिर्फ हीरो की। बिहार चुनाव में नीतिश कुमार की ऐसी आंधी चली, लालू की लालटेन बुझ गई। पासवान का झोंपड़ा उड़ गया। अब ऐसी आंधी हो, तो कांग्रेस के पंजे की क्या बिसात। देश के इतिहास में किसी गठबंधन को मिली अब तक की सबसे बड़ी जीत एनडीए के नाम दर्ज हुई। जेडीयू और बीजेपी दोनों का स्ट्राइक रेट इतना जबर्दस्त, मान्यता प्राप्त विपक्ष के लिए भी मोहताज होगी बिहार विधानसभा। एकला किसी भी दल को विपक्ष के लिए जरूरी दस फीसदी सीटें नहीं मिलीं। सो लालू-पासवान खिसियानी बिल्ली की तरह खंभा नोंच रहे। लोकसभा के बाद विधानसभा में भी पिटे लालू जनादेश पचा नहीं पा रहे। अलबत्ता लालू-पासवान ने नीतिश को मिले तीन चौथाई बहुमत को जादुई और रहस्यमयी नतीजा करार दिया। बाकायदा ताल ठोकी- महीने भर में तथाकथित जनादेश से रहस्य का परदा उठाएंगे। लालू-पासवान की हताशा ऐसी, नीतिश को तो बधाई दी, बीजेपी को नहीं। अब विकास की ऐसी जीत हो, तो पंद्रह साल तक बिहार का बेड़ा गर्क करने वालों के पेट में दर्द लाजिमी। वह भी तब, जब लालू की बीवी राबड़ी दोनों सीटों से चुनाव हार गई हों। पासवान के दोनों भाई बिना किसी मशक्कत के निपट गए हों। तो चुनाव नतीजों पर ऐसी बौखलाहट को सांत्वना के नजरिए से ही देखना चाहिए। अब लालू-पासवान भी कहीं बेजुबान ईवीएम पर हार का ठीकरा फोड़ें, तो कोई हैरानी नहीं। लालू ने यही कहा- अभी बोलूंगा, तो आप लोग कहोगे, हार से भन्नाकर बोल रहे। इसलिए एक महीने बाद बोलूंगा। लालू को शायद अपने दिन याद आ रहे, जब बैलेट बॉक्स से जिन निकला करते थे। पर सही मायने में लालू-पासवान के लिए यह गंभीर मंथन का वक्त। पासवान युग का तो लोकसभा में ही अंत हो चुका। अब विधानसभा के नतीजे लालू युग के अवसान के द्योतक। यों राजनीति में उठने-गिरने का दौर चलता रहता। लालू-पासवान ने अपनी तुलना इंदिरा गांधी से की। जब इमरजेंसी के बाद इंदिरा का सफाया हो गया था। पर दो साल बाद दमखम से इंदिरा लौटीं। हार के बाद लौटने का ऐसा जज्बा काबिल-ए-तारीफ। पर लालू-पासवान भूल गए, इंदिरा लौटीं, तो जनता पार्टी की कलह की वजह से। अगर लालू सचमुच राजनीतिक वापसी चाहते, तो ईमानदार ही नहीं, समझदार विपक्ष की भूमिका निभानी होगी। यों ही हार पर लकीर पीटते रहे, तो फकीर बन घूमते रह जाएंगे। नीतिश कुमार को प्रचंड बहुमत मिलना, जितना गदगद करने वाला, उतना ही चिंता का भी विषय। इतिहास साक्षी, जब-जब जनता ने किसी दल को प्रचंड बहुमत दिया, तो अगला चुनाव उसके लिए घातक साबित हुआ। नीतिश कुमार को जनता के हर तबके का वोट मिला। तो सबके मन में सिर्फ यही, विकास की रफ्तार से उसका इलाका महरूम न हो। अगर नीतिश उम्मीदों पर खरे नहीं उतरे, तो जनता खुद जवाब देगी। सो नतीजों में छुपे संदेश को भांप चुके नीतिश ने भी पूरी सौम्यता दिखाई। माना, इतनी बड़ी जीत से चिंता बढ़ी। उनके पास कोई जादुई छड़ी नहीं। पर जनता के विश्वास और अपनी लगन से कामयाबी हासिल करेंगे। सचमुच नीतिश को मिले जनादेश में बदलते बिहार की महक ही नहीं, और भी उम्मीदें। बिहार की जनता ने विकास का खांचा देखा, जिसमें लालू कहीं फिट नहीं। सो नीतिश को ऐसा जनादेश दिया, जिसमें अब कोई इफ एंड बट की गुंजाइश नहीं। लोगों ने माना, नीतिश के पांच साल में भले रामराज नहीं, पर नीतिश के इरादे नेक। सो लोगों ने जात-पांत से ऊपर उठकर नीतिश को सामाजिक समरसता का हीरो बनाया। भले बिहार की राजनीति से जात-पांत अभी दूर नहीं हुआ। पर विकास के मुद्दे ने जातीय राजनीति की दीवार को कमजोर जरूर किया। यूपी के बाद बिहार में सामाजिक समरसता की लहर चली। मायावती के सोशल इंजीनियरिंग ने यूपी में मिसाल पेश की थी। तो अब पेशे से इलैक्ट्रॉनिक इंजीनियर नीतिश कुमार ने ऐसा शॉक दिया, लालू-पासवान ठीक से बोल नहीं पा रहे। रही बात कांग्रेस की, तो सीधे सोनिया गांधी ने बयान दे दिया, बिहार से अधिक उम्मीद नहीं थी। पर कोई पूछे, नौ सीट से चार पर आने की उम्मीद थी? बीजेपी नेता अरुण जेतली ने सही फरमाया, बिहार की जनता ने परिवारवाद की राजनीति को नकार विकास को अपनाया। सो बिहार में न राहुल चले, न लालू की बीवी राबड़ी जीतीं। न पासवान के भाई, न लालू को छोड़ गए दोनों साले साधु-सुभाष। सो नीतिश का जादू देख बाकी नेताओं में बधाई देने की होड़ मच गई। बीजेपी के तमाम दिग्गजों ने तो बधाई दी ही। होम मिनिस्टर पी. चिदंबरम ने कहा- बिहार की जनता ने विकास का मुद्दा स्वीकार किया। अब सवाल कांग्रेस से- फिर सोनिया-राहुल चुनावी सभाओं में नीतिश के विकास का मखौल क्यों उड़ा रहे थे? पर कांग्रेस की जैसी परंपरा, चाटुकारों ने राहुल फैक्टर को अगले चुनाव की तैयारी बताया। पीएम, सोनिया, मोदी सब बुधवार को नीतिश के मुरीद दिखे। पर चुनाव नतीजों में जितनी जनता की उम्मीद, उतनी ही आशंका भी पैदा कर रही। बीजेपी-जेडीयू दोनों मजबूत हुईं, पर जेडीयू अपने बूते बहुमत से महज आठ-दस सीट दूर। सो गठबंधन के रिश्तों पर भी सबकी निगाह होगी। पर फिलहाल तो बिहार में लुट गए लालू, पिट गए पासवान। कांग्रेस का तो क्रिया-कर्म हो गया।
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24/11/2010

Tuesday, November 23, 2010

तो ‘जेपीसी’ का मतलब, जनता ही पहचाने चोर

न येदुरप्पा गए, न जेपीसी बनी और न संसद में शांति हुई। पीएम से मुलाकात के बाद प्रणव दा ने विपक्ष को बता दिया, जेपीसी नहीं बनाएंगे। सो नौवें दिन भी संसद नहीं चली। अब कब तक संसद ऐसे ही ठप होने को बैठती रहेगी, यह सत्तापक्ष और विपक्ष को भी मालूम नहीं। भ्रष्टाचार के भंवर में जैसी कांग्रेस, वैसी बीजेपी भी उलझी हुई। सो गैर कांग्रेस, गैर बीजेपी दलों के नेता जमकर चुटकियां ले रहे। इतिहास का जिक्र कर फरमा रहे- जेपीसी बनने से पहले बोफोर्स पर 45 दिन, हर्षद मेहता घोटाले पर 17 दिन और यूटीआई घोटाले पर 14 दिन संसद ठप रही थी। सो स्पेक्ट्रम मामले में अभी तो सिर्फ नौ दिन ही हुए। यानी इतिहास गवाह, ऐसे मामलों में सरकार को घुटने टेकने ही पड़े। पर अबके हमाम में बीजेपी-कांग्रेस एक साथ नंगी खड़ीं। अगर जेपीसी बनी और येदुरप्पा ने इस्तीफा नहीं दिया, तो भी संसद में गतिरोध बना रहेगा। यानी नैतिकता की सौदेबाजी में संसद सिसक रही। बीजेपी को जैसे ही सरकार ने जेपीसी न बनाने का इशारा किया। येदुरप्पा के इस्तीफे का मामला टाल दिया। बड़े जतन के बाद अरुण जेतली, वेंकैया ने येदुरप्पा को पार्टी का आदेश मानने के लिए राजी किया। पर मंगलवार तडक़े बीजेपी को असली नैतिकता का अहसास हुआ। बीजेपी के सूरमाओं की दलील, जब स्पेक्ट्रम मामले में जेपीसी नहीं बन रही। दो हफ्ते के हंगामे के बावजूद पीएम के कान पर जूं नहीं रेंग रही। तो बेमतलब येदुरप्पा का इस्तीफा लेकर कर्नाटक में चल रही अपनी सरकार को खतरे में क्यों डाले। येदुरप्पा ने बगावती तेवर दिखा ऐसे ही आलाकमान के माथे पर पसीने ला दिए। येदुरप्पा के समर्थन में नरेंद्र मोदी भी उतर आए। सो बीजेपी ने भविष्य के चक्कर में वर्तमान की परवाह नहीं की। कर्नाटक में अगले महीने ही पंचायत चुनाव होने। और तो और, येदुरप्पा का लिंगायत समाज पर ऐसा प्रभाव। अगर बीजेपी सख्ती से हटाने का फैसला करे, तो कर्नाटक में बीजेपी का बंटाधार तय। मंगलवार को पार्लियामेंट्री पार्टी की मीटिंग में कई येदुरप्पाई सांसदों ने आडवाणी के सामने येदुरप्पा को न हटाने की मांग की। यानी कुल मिलाकर येदुरप्पा की ताकत और जेपीसी पर केंद्र के रवैये को देख बीजेपी ने फिलहाल येदुरप्पा को अभयदान दे दिया। पर कर्नाटक बीजेपी में इतनी कलह, यह शांति अधिक लंबी नहीं। अब कर्नाटक से बेफिक्र आडवाणी ने सांसदों को इशारा कर दिया। सरकार पहली बार इस कदर घिरी, सो जेपीसी की मांग नहीं छोडऩी। पर कांग्रेस भी कम नहीं। भ्रष्टाचार पर भले जूते और प्याज वाली कहावत चरितार्थ। फिर भी जेपीसी को राजी नहीं। कांग्रेस को डर, अगर जेपीसी ने पीएम को तलब कर लिया, तब क्या होगा। सचमुच कांग्रेस ईमानदार होती, तो जेपीसी से न डरती। वैसे भी इतना बड़ा घोटाला कोई राजा अकेले नहीं कर सकता। राजा की हालत तो वैसी ही, जैसी झारखंड के पूर्व सीएम मधु कोड़ा की। खाया-पीया चार आना, गिलास तोड़ा बारह आना। कांग्रेस के एक वरिष्ठतम नामी-गिरामी नेता तो येदुरप्पा की कुर्सी न जाने से बेहद खफा दिखे। बोले- एक फ्लैट की वजह से हमारे सीएम की कुर्सी ले ली। और बीजेपी अपना सीएम नहीं हटा रही। अगर यही फार्मूला चला, तो हमारी तो पूरी केबिनेट ही खाली हो जाएगी। यानी भ्रष्टाचार के इस खेल में सब हिस्सेदार, यह मजाक में ही सही, पर कांग्रेसी नेता भी कबूल रहे। फिर भी शर्म है कि आती नहीं। सीवीसी के तौर पर थॉमस की नियुक्ति न्यायिक सवालों के घेरे में आई। तो कांग्रेस नेताओं से सुप्रीम कोर्ट जैसा ही सवाल हुआ। आखिर आरोपी को ही सीवीसी क्यों बनाया? तो कांग्रेस नेता की हद देखिए। बोले- अगर किसी डाक्टर को डायबिटीज हो जाए, तो इसका मतलब यह नहीं कि वह दूसरे डायबिटिक मरीज का इलाज नहीं कर सकता। सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी पर जब कांग्रेस नेता ऐसे मजाक बनाएं। तो फिर नैतिकता की उम्मीद करना मूर्खता ही। पर कुल मिलाकर कांग्रेस ने मन बना लिया, जेपीसी नहीं मानेंगे। सुप्रीम कोर्ट में भी पीएमओ के हलफनामे पर सुनवाई अभी पूरी नहीं हुई। बुधवार को कोई उम्मीद। पर कोर्ट की जिस टिप्पणी को लेकर पीएम सवालों के घेरे में आए। उस बैंच ने मीडिया को खरी-खोटी सुना दी। बैंच के मुताबिक उन ने पीएम का नाम नहीं लिया। पर मीडिया ने गलत ढंग से पेश कर इसे राजनीतिक रंग दे दिया। मंगलवार को कोर्ट में अटार्नी जनरल और याचिकाकर्ता सुब्रह्मण्यम स्वामी के बीच दलीलों का दौर चला। तो अटार्नी जनरल ने साफ कर दिया, मुकदमा दायर करने के लिए मंजूरी की जरूरत ही नहीं थी। पर स्वामी ने दलील दी, मुकदमा दायर करने के बाद मंजूरी की बात आती। सो उन ने पहले ही यह मांग कर दी। अब कांग्रेस जेपीसी न मानने के पीछे संवैधानिक वजह गिना रही। ताकि लोगों में यह संदेश न जाए कि भ्रष्टाचार की जांच से कांग्रेस भाग रही। कांग्रेस प्रवक्ता शकील अहमद ने दलील दी, संवैधानिक परंपरा के मुताबिक सीएजी रपट की जांच पीएसी ही करती। यानी जेपीसी और येदुरप्पा के चक्कर में संसद का तो राम ही राखा। वैसे भी बुधवार को सबकी नजर बिहार पर होगी। सो जेपीसी का गठन होगा या नहीं, यह तो बाद की बात। पर सत्तापक्ष और विपक्ष के इस नैतिक खेल में अब जनता ही जेपीसी। संसद चलाने को भले दोनों के बीच कोई सौदेबाजी हो जाए। पर असली जेपीसी तो तब होगी, जब जनता पहचानेगी चोर।
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23/11/2010

Monday, November 22, 2010

अब बने जेपीसी और जाएं येदुरप्पा, तो ही संसद में शांति

कहते हैं आदतें बदली जा सकतीं, पर लत नहीं छूट सकती। शायद कांग्रेस को जूते और प्याज खाने की लत पड़ चुकी। सो न सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियां असर कर रहीं, न नैतिकता झकझोर पा रही। अभी टू-जी स्पेक्ट्रम का पेच सुलझा नहीं। सुप्रीम कोर्ट ने सीवीसी पी.जे. थॉमस की नियुक्ति पर सवाल उठा दिए। मनमोहन सरकार ने विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज की आपत्ति को ताक पर रखकर थॉमस के लिए वीटो लगा दिया। तब कांग्रेस ने बीजेपी को खूब खरी-खोटी सुनाई थीं। अब सुप्रीम कोर्ट ने हू-ब-हू वही कहा, जो विपक्ष की नेता ने कहा था। थॉमस के खिलाफ पॉम आयल घोटाले में चार्जशीट दाखिल हो चुकी। पर तब होम मिनिस्टर चिदंबरम ने भी थॉमस को क्लीन चिट दी थी। अब चीफ जस्टिस एस.एच. कपाडिय़ा की रहनुमाई वाली बैंच ने सीधा पूछ लिया- एक अभियुक्त सतर्कता आयुक्त कैसे हो सकता? बैंच ने माना, आपराधिक मुकदमा झेल रहा व्यक्ति अगर सीवीसी होगा, तो हर कदम पर सवाल उठेंगे। जब वह खुद आपराधिक मामले में अभियुक्त होगा, तो दूसरे की फाइल कैसे बढ़ाएगा? कोर्ट ने केंद्र सरकार को याद दिलाया, सीबीआई भी सीवीसी को रिपोर्ट करती। पर अटार्नी जनरल ने अपने आका की बेशर्मी भरी भाषा का इस्तेमाल किया। दलील दी, अगर नियुक्ति के मूल मानदंड के मुताबिक सवाल उठने लगे। तो संवैधानिक पद पर किसी की भी नियुक्ति नहीं हो पाएगी। क्योंकि किसी की भी नियुक्ति को चुनौती दी जा सकती है। यों अटार्नी जनरल तो महज सरकारी मुलाजिम। पर कांग्रेस ने टू-जी की तर्ज पर सीवीसी के मामले में भी कह दिया- शर्मिंदगी जैसी कोई बात नहीं। यों कांग्रेस की दलील भी सही। जब शर्म को कोई स्पेक्ट्रम बनाकर बेच खाए, तो शर्मिंदगी कैसी। गवर्नरों का मामला हो या मुख्य चुनाव आयुक्त का। कांग्रेस ने कभी लोक-लाज की परवाह नहीं की। विपक्ष ने एड़ी-चोटी एक कर ली। पर पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त नवीन चावला का क्या बिगड़ा? बूटा सिंह, सिब्ते रजी, एससी जमीर जैसे जेहादी गवर्नरों ने कैसी संवैधानिक निष्ठा दिखाई, किसी से छुपी नहीं। पर सवाल कांग्रेस से, क्या संवैधानिक पदों पर बूटाओं, चावलाओं से दूर नजर क्यों नहीं दौड़ा पाती? ताकि विपक्ष की हर धार भोंथरी हो सके। याद करिए, वाजपेयी राज में हुए राष्ट्रपति चुनाव का वक्त। कैसे वाजपेयी ने गुजरात दंगों की स्याह हटाने के लिए राष्ट्रपति पद पर एपीजे अब्दुल कलाम का नाम प्रस्तावित किया। कैसे कलाम के नाम पर ऐतिहासिक राजनीतिक एकता बन गई। पर कांग्रेस कभी बूटाओं, चावलाओं से ऊपर नहीं उठती। लोकतंत्र की मर्यादा की फिक्र होती। तो इमरजेंसी के बाद बने शाह कमीशन ने चावला का जो इतिहास लिखा। उसके बाद किसी राजनीतिक दल से ऐसी जिद की उम्मीद नहीं। पर कांग्रेस ने मुख्य चुनाव आयुक्त गोपालस्वामी की सिफारिश के बावजूद चावला को बरकरार रखा। कांग्रेस की ऐसी राजनीतिक धौंस की कहानी अनेक। पर पाप का घड़ा कभी न कभी तो फूटता ही है। सो स्पेक्ट्रम, आदर्श, कॉमनवेल्थ और अब सीवीसी का मामला। कांग्रेस पर एक साथ लाठियां बरस रहीं। सो बेचारी कांग्रेस किस-किस का जवाब दे। संसद की कार्यवाही तो तीसरे हफ्ते भी लकवाग्रस्त। पर भ्रष्टाचार के भूचाल को थामने के लिए कांग्रेस जेपीसी तक को राजी नहीं। जब कांग्रेस खुद को ईमानदार मान रही। तो कोई और जांच हो या जेपीसी, परहेज क्यों? पर सोमवार को भी संसद के गतिरोध पर कोई फैसला नहीं हो सका। अलबत्ता पिछले मंगलवार और अब सोमवार को हुई सर्वदलीय मीटिंग के बीच कांग्रेस बुरी तरह घिर गई। सोमवार को विपक्ष के साथ-साथ लेफ्ट और सरकार की सहयोगी तृणमूल ने भी जेपीसी की मांग कर दी। पर प्रणव दा ने पीएसी के साथ बहुउद्देश्यीय जांच एजेंसी का प्रस्ताव रखा। सो नतीजा ढाक के तीन पात ही रहा। सुषमा स्वराज ने रिलायंस से जुड़ी नीरा राडिया के टेप को आधार बनाकर दो-टूक कह दिया- अब जेपीसी के बिना कुछ भी संभव नहीं। उन ने कहा- ताजा खुलासे से अब ऐसा लग रहा, लोकतंत्र के चारों स्तंभ लडख़ड़ा गए। मीडिया और कारॅपोरेट जगत की सांठगांठ से मंत्री बनाने और विभाग देने की बात का खुलासा हो रहा। यानी अब सरकार का जेपीसी से बचकर भागना मुमकिन नहीं। पर चेहरा बचाने को अब बीजेपी से गुहार लगा रही। बीजेपी ने कर्नाटक के सीएम येदुरप्पा को विदा करने का मन बना लिया। पर येदुरप्पा की बगावत से परेशान। फिर भी बीजेपी नेताओं को उम्मीद, मान-मनोव्वल कर येदुरप्पा को हटाएंगे। ताकि संसद में बीजेपी निशाने पर न आ जाए। सरकार ने जेपीसी का इशारा विपक्ष को कर दिया। पर येदुरप्पा की वजह से मुश्किलें होंगी। सो माना जा रहा, मंगलवार को पहले बीजेपी की ओर से येदुरप्पा के इस्तीफे का एलान होगा। फिर सरकार जेपीसी को हरी झंडी दिखाएगी। सो कांग्रेस प्रवक्ता जयंती नटराजन ने सोमवार को साफ कहा- हमारी नजर कर्नाटक पर। यानी मंगलवार को संसद का गतिरोध टूटने और सब कुछ मंगलमय होने की उम्मीद। सरकार के पास अब कोई विकल्प भी नहीं। मंगलवार को ही पीएम के हलफनामे पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई। सो कोर्ट का रुख सत्र का भविष्य तय करेगा। फिलहाल सोमवार को पीएम मनमोहन और सीएम येदुरप्पा पुट्टापार्थी जाकर सत्य साईंबाबा का आशीर्वाद ले आए। मनमोहन के इस्तीफे की तो कोई बात नहीं। येदुरप्पा मुद्दे पर बीजेपी में राजस्थान दोहरा रहा।
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22/11/2010

Saturday, November 20, 2010

तो पीएम कागज से, राजा खजाने से खेलते रहे!

'चुप-चुप खड़े हो, जरूर कोई बात है...।' घोटालों पर खामोशी को विपक्ष ने मौन स्वीकृति करार दिया। तो पहले सोनिया गांधी और अब खुद मनमोहन ने भी लंबी चुप्पी तोड़ दी। जब एटमी डील पर मनमोहन चौतरफा घिर गए थे। तो एचटी समिट में सोनिया गांधी और मनमोहन सिंह ने लाचारी भरी टिप्पणी की थी। तब दोनों ने एक सुर में कहा था, एक डील न होने से जिंदगी खत्म नहीं होती। पर जब मनमोहन ने डील को अपनी आन का मुद्दा बना लिया। तो लेफ्ट की समर्थन वापसी के बावजूद पूरा करके दम लिया। भले सरकार बचाने को सांसदों की जमकर खरीद-फरोख्त हुई। सत्ता की खातिर नैतिकता को ठेंगा दिखा दिया। लोकसभा में करोड़ों की गड्डियां लहराई गईं। तब मनमोहन ने सरकार बचाने की खातिर हुए इस भ्रष्टाचार पर आंखें मूंद लीं। अब भ्रष्टाचार के मौसम की चपेट में खुद पीएम आ गए। तो दो हफ्ते तक संसद की कार्यवाही हंगामे की भेंट चढऩे के बाद एचटी समिट में ही पीएम ने जुबान खोली। तो जैसी लाचारगी एटमी डील के वक्त मनमोहन के बयान में थी। अबके उससे कुछ अलग नहीं। भ्रष्टाचार के मुद्दे ने सरकार को इस कदर घेर लिया। अब बाहर निकलने का रास्ता नहीं दिख रहा। सो पीएम ने न सिर्फ विपक्ष से संसद चलने देने की अपील की। अलबत्ता घोटाले के दोषियों को न बख्शने का भरोसा भी दिलाया। पर संसद आखिर कैसे चलेगी, जब विपक्ष की जेपीसी की मांग को न नकारा, न स्वीकारा। बोले- संसद का सत्र चल रहा। सो जेपीसी पर यहां बोलना सही नहीं। अब आप खुद अंदाजा लगा लें, अगर सरकार बैकफुट पर न होती, तो किसी भी मंच से जेपीसी खारिज कर देते। प्रणव दा तो लगातार इस मांग को खारिज कर रहे। पर जैसे पीएम ने तेल और तेल की धार देखते हुए जेपीसी पर चतुराई भरा बयान दिया। प्रणव दा भी कुछ ऐसा ही करते। बाहर इनकार, पर उन ने अब तक विपक्ष को जेपीसी न मानने का औपचारिक जवाब नहीं दिया। यानी सरकार की हालत कितनी पतली, बतलाने की जरूरत नहीं। सो विपक्ष भी आक्रामक हो चुका। अब सीधे पीएम पर निशाना साधा। तो इशारों में ही पीएम के इस्तीफे की भी मांग कर दी। पर अपनों का कुकर्म बीजेपी को कर्म ही पूजा नजर आ रहा। कर्नाटक के सीएम येदुरप्पा का पाप जगजाहिर। फिर भी बीजेपी ने अभय दान दे दिया। शुक्रवार की आधी रात तक मीटिंग चली। पर बीजेपी के भ्रष्टाचार का पैमाना देखिए। दलील दी गई, जब केंद्र में सरकार न जेपीसी मान रही, न पीएम के इस्तीफे की हलचल। सो येदुरप्पा की बलि लेकर थोथी नैतिकता दिखाने का कोई मतलब नहीं। यानी नैतिकता की राजनीतिक परिभाषा यही, पहले तुम, फिर हम। येदुरप्पा ने तो बेंगलुरु पहुंच कर बेशर्मी भरा बयान भी दे दिया। बोले- आरोप लगने वाले कितने मंत्रियों-मुख्यमंत्रियों ने अब तक इस्तीफा दिया। खुद को पाक-साफ बता इस्तीफे से इनकार किया। पर कोई पूछे, जब इतने पाक-साफ थे। तो जमीन लौटाई क्यों? पर सुप्रीम कोर्ट की तल्ख टिप्पणी की आड़ में फिलहाल बीजेपी की तोप गोले दाग रही। सो अब सबकी निगाह मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट में होने वाली सुनवाई पर। सुप्रीम कोर्ट ने पीएम की चुप्पी पर सवाल उठाए थे। तो शनिवार को हलफनामा देकर पीएमओ ने सफाई दे दी। टू-जी स्पेक्ट्रम मामले में पूरी क्रोनोलॉजी यानी तारीखवार ब्यौरा सौंप दिया। सुब्रहमण्यम स्वामी की सभी छह चिट्ठियों पर पीएमओ में हुए विचार और संबंधित विभाग को भेजने का हवाला दिया। यानी पीएमओ ने सरकारी प्रक्रिया के तहत अपनी जिम्मेदारी का ईमानदारी से निर्वाह किया। अब कोर्ट पीएमओ के हलफनामे से संतुष्ट होगा या नहीं, यह मंगलवार को मालूम पड़ेगा। पर याचिका कर्ता स्वामी ने भी कबूला, पूरे मामले में पीएम गुनहगार नहीं। पर सवाल, देश का मुखिया सिर्फ कागजी कार्रवाई ही करता रहा? लूटने वाले अपनी जेब भरते रहे। पर पीएम ने सब कुछ जानकर भी अनजान होने का रुख क्यों अपनाया? हलफमाने का निचोड़ यही, पीएमओ कभी चुप नहीं रहा। अलबत्ता लेटरबाजी करता रहा। अब मनमोहन इम्तिहान की घड़ी बता रहे। पर इस चुनौती के लिए जिम्मेदार कौन?
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20/11/2010

Friday, November 19, 2010

तो दूसरी पारी में कांग्रेस बढ़ी, नैतिकता सिकुड़ी!

तो जेपीसी पर संसद का दंगल नहीं थमा। टू-जी ने सरकार का ऐसा वन-टू का फोर किया, पीएम की जुबां नहीं खुल रही। कांग्रेसी अब बेबाक कह रहे, सिर्फ कोर्ट में जवाब देंगे। सचमुच सुप्रीम कोर्ट ने दिन में तारे न दिखाए होते। तो विपक्ष के तेवर कांग्रेस कबका पस्त कर चुकी होती। पर कोर्ट का डंडा ऐसा चला, कांग्रेस की सांस उखड़ रही। तो विपक्ष को मानो संजीवनी मिल गई। सो विपक्ष ने खम ठोक दिया- जेपीसी नहीं, तो संसद की कार्यवाही भी नहीं। पर सत्तापक्ष से प्रणव मुखर्जी भी पीछे नहीं रहे। एलान कर दिया- जेपीसी मंजूर नहीं। विपक्ष पहले पीएसी की रपट का इंतजार करे। प्रणव दा ने विपक्ष से एक बार फिर संसद चलने देने की अपील की। सोमवार से पहले एक और कोशिश करेंगे। फिर भी बात न बनी, तो शीत सत्र को भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ाने का विकल्प भी खुला। सो सरकार के साथ-साथ विपक्ष भी पसोपेश में, आखिर बाकी मुद्दों का क्या होगा। पर फिलहाल जैसी रार ठनी, गतिरोध खत्म होने के आसार नहीं दिख रहे। भ्रष्टाचार की बयार ऐसी चल रही, कोई बच नहीं पा रहा। विपक्ष संसद में हावी, पर कर्नाटक में बीजेपी का कुकर्म परेशान कर रहा। यों शुक्रवार को सीएम येदुरप्पा के परिजनों ने सरकारी जमीन वापस लौटा दी। पर बीजेपी अभी भी कार्रवाई से बच रही। येदुरप्पा दिल्ली तलब किए गए। पर न्यायिक जांच की आड़ में कुर्सी बचाने की कोशिश हो रही। अब आप खुद ही देख लो। जमीन डिनोटीफाई कर अपनों को रेवड़ी बांटने के मामले की जांच का एलान हुआ। पर पिछले दस साल तक के मामले जांच के दायरे में होंगे। यानी सरकारी जमीन को कौडिय़ों के भाव लुटाने के मामले में बीजेपी ही नहीं, कांग्रेस-जेडीएस भी शामिल। पर सवाल, क्या बीजेपी को नैतिकता नहीं दिख रही? यों शुक्रवार को एसएस आहलूवालिया ने एलान कर दिया- हमारा सीएम दोषी पाया गया, तो निकाल बाहर करेंगे। पर बीजेपी भूल रही, अशोक चव्हाण अभी दोषी पाए नहीं गए थे। नैतिकता तो सचमुच सिर्फ कहने की बात। सत्ता के लिए सब कुछ करेगा का फार्मूला ही सबके लिए। राजनीति में तो नैतिकता अब कहने भर की भी नहीं रही। सिर्फ और सिर्फ सत्ता के लिए किसी को शिबू सोरेन से हाथ मिलाने में हिचक नहीं। तो कोई रेड्डी बंधुओं के नखरे सहने को तैयार। कभी राजीव हत्याकांड पर बने जैन कमीशन की रिपोर्ट में डीएमके पर उंगली उठी। तो कांग्रेस ने संयुक्त मोर्चा की सरकार गिराने में देर नहीं की। फिर डीएमके ने सत्ता के शिखर तक पहुंची बीजेपी का दामन थाम मलाई काटी। फिर 2004 में वही डीएमके कांग्रेस के साथ खड़ी हो गई। यूपीए-टू में मनमोहन और कांग्रेस थोड़ी मजबूत हुई। तो मनमोहन ने ए. राजा और टीआर बालू को मंत्रालय में न लेने का विचार रखा। पर मनमोहन की नहीं चली। मनमोहन तो सिर्फ कांग्रेस की ओर से पीएम पद पर मनोनीत व्यक्ति। असल में नेता तो सोनिया गांधी। सो सत्ता के लिए सोनिया गांधी ने तब जो समझौता किया, आज उसके काले छींटे मनमोहन पर पड़ रहे। सो टू-जी स्पेक्ट्रम घोटाले के कर्ताधर्ता ए. राजा के मामले में पीएम मनमोहन से बड़ी जवाबदेही सोनिया गांधी की। पर सरकार के मुखिया होने के नाते विपक्ष और न्यायपालिका की तोप मनमोहन की ओर घूमी हुई। सो सवालों के लपेटे में कांग्रेस का राज दरबार न आ जाए, इसलिए कांग्रेस का शीर्ष ब्रिगेड मनमोहन के बचाव में उतर आया। जनार्दन द्विवेदी ने तो पहले ही एलान कर दिया- पीएम के साथ थे, हैं और रहेंगे। अब शुक्रवार को राहुल गांधी ने भी बचाव किया। तो बोले- पीएम पर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी में शर्म की कोई बात नहीं और ना ही पीएम के लिए कोई असहज स्थिति। अब अगर राहुल की बात छोड़ दें। तो राजनीति में शर्म नाम की कोई चीज ही नहीं। अगर शर्म की बात होती, तो ए. राजा की जगह संचार मंत्रालय संभालने वाले कपिल सिब्बल यह नहीं कहते, दुनिया में हर जगह भ्रष्टाचार है। उन ने पीएमओ की कलई खोलने वाले सुब्रहमण्यम स्वामी की हैसियत पर भी सवाल उठा दिए। पर सवाल, क्या किसी हैसियत वाले आदमी को ही पीएम से सवाल पूछने का हक? अब शनिवार को सुप्रीम कोर्ट में पीएम के जवाब पर सबकी निगाह होगी। पर फर्क देखिए, शुक्रवार को जहां राहुल ने कोर्ट की टिप्पणी से शर्मिंदगी को अलग कर दिया। वहां मां सोनिया गांधी राजनेता कम, दार्शनिक अंदाज में प्रवचन देतीं दिखीं। इंदिरा गांधी की जयंती पर तीन मूर्ति भवन में समारोह हुआ। तो उन ने जो कहा, उसका लब्बोलुवाब देखिए। आर्थिक तरक्की के बीच नैतिकता का पतन हुआ। लालच और भ्रष्टाचार बढ़ा और नैतिकता सिकुड़ी। देश में करोड़पति बढ़े, तो गरीबी भी बढ़ी। करोड़ों लोग दो जून की रोटी नहीं जुटा पा रहे। विकास ही सब कुछ नहीं। हम कैसा समाज चाहते हैं, यह सोचना होगा। आजादी के सिद्धांतों से खिलवाड़ हुआ। यानी कुल मिलाकर सोनिया ने तरक्की का सेहरा मनमोहन के सिर बांधने की कोशिश की। भ्रष्टाचार का सेहरा राजा के सिर। पर सवाल, पिछले छह-सात साल से कांग्रेस की ही सरकार। फिर गरीबी-अमीरी का फासला क्यों बढ़ा। नैतिकता के पतन पर नकेल क्यों नहीं कसी? देश में महंगाई हुई, तो विकास की चादर में ढक दिया। अब भ्रष्टाचार को भी विकास की चादर में ढांपने की कोशिश। तो ऐसे प्रवचन को अपना नमन।
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19/11/2010