तो मौसम ने कांग्रेस का झंडा मुरझा दिया। मंगलवार को कांग्रेस ने 126वां स्थापना दिवस मनाया। तो मौसमी थपेड़ों के बीच 24 अकबर रोड पर कांग्रेसियों का जमावड़ा लगा। ठंड और बारिश के मिलेजुले कहर के बीच सोनिया गांधी ने झंडा फहराया। पर अबके मौसम की दोहरी मार से झंडे में पहले जैसी लहर नहीं दिखी। घोटालों की फेहरिश्त ने तो तोते उड़ा ही रखे। बाकी कोई भी ऐसा दिन नहीं, जब नए संकट पैदा न हो रहे। तेलंगाना की फांस गले पड़ चुकी। राजस्थान में गुर्जर आंदोलन कांग्रेस सरकार के लिए नासूर बन चुका। पर मौसम की मार से सिर्फ कांग्रेस ही नहीं, बीजेपी भी हलकान। घोटालों पर कांग्रेस तो शान से कह चुकी- नो जेपीसी। पर भ्रष्टाचार को सरकार के खिलाफ निर्णायक जंग मुद्दा बना चुकी बीजेपी को अब अपनी परछाईं ही सता रही। मुरली मनोहर जोशी के जोश ने बीजेपी के होश फाख्ता कर दिए। सो मंगलवार को विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज ने ट्विट किया। बोलीं- पीएम की पेशकश निरर्थक। जब पीएसी को मंत्री को बुलाने का अधिकार नहीं। तो पीएम की बात दूर। पीएसी का काम सिर्फ अकाउंट देखना। घोटाले की जवाबदेही और निष्कर्ष तक सिर्फ जेपीसी ही पहुंच सकती। यानी जोशी की दलील को सुषमा ने खारिज किया। सिर्फ सुषमा नहीं, बीजेपी के कई धुरंधर जोशी के जोश से परेशान। सो अंदरखाने जोशी की सक्रियता पर फिर सवाल उठ रहे। पर कांग्रेस अब भी जोशी की मुरीद। सो शकील अहमद बोले- जोशी अपनी संवैधानिक जिम्मेदारी निभा रहे। अगर बीजेपी का आपस में मतभेद, तो वह जोशी को पीएसी से वापस ले ले। या सुषमा स्वराज खुद इस्तीफा दे दें। अब बीजेपी नेताओं में छिड़े कोल्ड वॉर का कांग्रेस खूब लुत्फ उठा रही। जोशी के साथ हमदर्दी पर खुद कांग्रेस नेता ही चुटकी ले रहे। कोई सोमनाथ चटर्जी से तुलना कर रहा। तो कोई आडवाणी से बदला बता रहा। यों आडवाणी से बदले की बात गले उतरने वाली नहीं। पर सोमनाथ से तुलना सटीक बैठ रही। जब मनमोहन की पहली पारी में एटमी डील ने यूपीए-लेफ्ट का तलाक करवा दिया। तो सोमनाथ चटर्जी ने अपनी पार्टी सीपीएम के कहने पर भी स्पीकर की कुर्सी नहीं छोड़ी। उन ने भी संवैधानिक जिम्मेदारी की दुहाई दी। तब कांग्रेस ने सोमनाथ पर भी वैसा ही भरोसा जताया, जैसा अब जोशी पर जता रही। सो आखिर में सीपीएम ने सोमनाथ चटर्जी को पार्टी से बर्खास्त कर दिया। सोमनाथ ने पार्टी लाइन से हट पद की खातिर इतिहास रच दिया। अब वही काम मुरली मनोहर जोशी कर रहे। जोशी संसद की पीएसी के मुखिया के नाते संवैधानिक जिम्मेदारी निभा रहे। पर बीजेपी उनकी तेजी से मुश्किल में फंसी हुई। जैसे सोमनाथ दादा को यूपीए से लेफ्ट की समर्थन वापसी का फैसला रास नहीं आया था। वैसे ही जोशी को विपक्ष की जेपीसी की मांग रास नहीं आ रही। सो वह पीएसी को ही बेहतर बता रहे। अब सुषमा की यह बात सोलह आने सही- पीएम को बुलाना तो दूर, पीएसी मंत्री को भी नहीं बुला सकती। पर जोशी तो पहले ही कह चुके- यहां पीएम को समन करने जैसी बात ही नहीं। अलबत्ता खुद पीएम ने पेशकश की। तो इस बारे में पीएसी समय आने पर फैसला कर सकती। सो इन हालात में बीजेपी लेफ्ट बनेगी या जोशी सोमनाथ, यह वक्त ही बतलाएगा। पर फिलहाल सिर्फ जोशी ही नहीं, जेठमलानी के बोल भी बीजेपी की पोल खोल रहे। रायपुर की जिला अदालत ने मानवाधिकार कार्यकर्ता डाक्टर विनायक सेन को देशद्रोही बता उम्र कैद की सजा सुना दी। सेन लंबे समय से आदिवासी इलाकों में निस्वार्थ काम करते रहे। पर राज्य सरकार की आंखों में चढ़ गए। सो नक्सली सांठगांठ का आरोप लगा। पर अदालती फैसले ने देश नहीं, दुनिया में भूचाल ला दिया। एमनेस्टी इंटरनेशनल से लेकर दुनिया के नामचीन बुद्धिजीवियों ने फैसले पर सवाल उठाए। पर नक्सलवाद के खिलाफ बंदूक से लडऩे की पक्षधर रही बीजेपी ने फैसले को जायज ठहराया। वैसे भी छत्तीसगढ़ में बीजेपी की सरकार। कांग्रेस ने तो न्यायिक प्रक्रिया का हवाला देकर बीच का रास्ता अख्तियार कर लिया। पर सुषमा ने ट्विट कर सेन के खिलाफ फैसले को तर्कसंगत बताने की कोशिश की। अब बीजेपी की मजबूरी हो या नीति, पर जेठमलानी ने सारी कसर पूरी कर दी। उन ने सेन को उम्र कैद की सजा को वाहियात फैसला करार दिया। ऊपरी अदालत में पैरवी करने का एलान भी। जेठमलानी बोले- सेन के खिलाफ मुकदमे में कोई दम नहीं। सेन की पैरवी करना मेरे लिए सम्मान की बात होगी। पर बीजेपी के सम्मान का क्या होगा? सो बीजेपी ने एक बार फिर जेठमलानी की राय को निजी बताया। राजीव प्रताप रूड़ी बोले- जेठमलानी वकील हैं, किसी का भी मुकदमा लड़ सकते हैं। बीजेपी ने कुछ नहीं कहा। यानी जेठमलानी के आगे बीजेपी फिर नतमस्तक। जबसे बीजेपी की टिकट पर राजस्थान से राज्यसभा सांसद बने। तबसे यह तीसरा मौका, जब बीजेपी को चौराहे पर ले आए। जब बीजेपी ने भारत-पाक विदेश मंत्री स्तर वार्ता के बाद राज्यसभा में एस.एम. कृष्णा को घेरा। तो जेठमलानी ने वेंकैया-जावडेकर की दलील को धता बता कृष्णा की चुप्पी को शिष्टाचार का तकाजा बताया था। बीजेपी ने कश्मीर के वार्ताकार दिलीप पडगांवकर पर उंगली उठाई। तो जेठमलानी ने इसे बचकानी और अशिष्ट हरकत करार दिया। सचमुच जेठमलानी कोई बीजेपी की नीति से प्रभावित होकर नहीं आए। अलबत्ता राज्यसभा की मेंबरी तो गुजरात की फीस समझिए। कुल मिलाकर सर्दी के मौसम में जोशी और जेठमलानी बीजेपी को गर्मी का अहसास दिला रहे।
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28/12/2010
Tuesday, December 28, 2010
Monday, December 27, 2010
बीजेपी की मुरली, कांग्रेस के मनोहर और जोशी का जोश
सचमुच समय बड़ा बलवान। कैसे ए. राजा एनडीए राज से यूपीए की दूसरी पारी तक मंत्री रहे। पर वक्त ने ऐसा मुंह मोड़ा, राजा से रंक हो गए। तो दूसरी तरफ बीजेपी में अलग-थलग पड़े मुरली मनोहर जोशी सुर्खियों के सरताज बने। कभी बीजेपी में अटल-आडवाणी-मुरली मनोहर की तिकड़ी हुआ करती थी। पर जोशी के साथ वक्त ने ऐसा दगा किया, अटल-आडवाणी आगे निकल गए। जोशी किनारे पर किताब पढ़ते रह गए। यानी बीजेपी में इतिहास बनने के कगार पर पहुंचे जोशी को इतिहास रचने का मौका मिल गया। सो अब वही मुरली मनोहर कांग्रेस के लिए तो सचमुच के मनोहर हो गए। बीजेपी ने जोशी को पीएसी का अध्यक्ष बनवाया। अब टू-जी स्पेक्ट्रम घोटाले की जांच पीएसी कर रही। पर जोशी को पार्टी की ओर से डिक्टेशन मंजूर नहीं। सो अपने तौर-तरीके से जांच का काम आगे बढ़ा रहे। पर जेपीसी की मांग को लेकर संसद का सत्र ठप कर चुकी बीजेपी में खलबली मची हुई। सो सोमवार को पीएसी की मीटिंग के बाद जोशी ने सफाई दी- सबको मालूम था, अगला पीएसी अध्यक्ष ही स्पेक्ट्रम घोटाले की जांच करेगा। जनवरी 2010 से ही जांच की प्रक्रिया शुरू। सो मैं तो सिर्फ जिम्मेदारी निभा रहा। यानी जोशी की सफाई बीजेपी का दर्द बयां कर रही। सो बीजेपी में आजकल भस्मासुर की कहानी खूब सुनी-सुनाई जा रही। भस्मासुर ने कठोर तपस्या कर भगवान शंकर से वरदान हासिल कर लिया। भोले बाबा ने भलमनसाहत में वरदान दे दिया- जिसके सिर पर हाथ रखोगे, वह भस्म हो जाएगा। बस क्या था, भस्मासुर ने इस वरदान का परीक्षण किसी और पर करने के बजाए भगवान शंकर पर ही करने की ठान ली। सो वक्त ने करवट ली, तो भोले बाबा भागे-भागे विष्णु भगवान के दर पहुंच गए। उसके बाद मोहिनी रूप धर भगवान विष्णु ने क्या किया, सबको मालूम। अब जोशी को भले बीजेपी जो माने, पर अपनी ओर से भस्मासुर कहना उचित नहीं। यों इतना सच जरूर, कांग्रेस मोहिनी रूप धर जोशी को मोह रही। सो सोमवार को पीएसी के कटघरे में सीएजी विनोद राय की पेशी हुई। तो दूसरी तरफ मनमोहन ने जो कांग्रेस अधिवेशन में एलान किया था, वह चिट्ठी में लिख जोशी को भेज दिया। यानी पीएसी चाहे, तो वह पेश होने को तैयार। पर जोशी ने साफ कर दिया- उचित समय पर ही फैसला होगा। यों तकनीकी तौर पर पीएसी को यह अधिकार नहीं। अगर पीएम को बुलाना भी पड़ा, तो स्पीकर की मंजूरी लेनी होगी। पर जोशी ने मीटिंग के बाद अपना इरादा जता दिया, जब कहा- पीएम ने पीएसी की ओर से मांगी गई रपट के मुताबिक पर्याप्त दस्तावेज मुहैया करा दिए हैं। अब हाथ कंगन को आरसी क्या, पढ़े-लिखे को फारसी क्या। कांग्रेस ने तो विपक्ष की जेपीसी की मांग खारिज करते हुए फिर कह दिया- अगर मुरली मनोहर जोशी की क्षमता और दक्षता पर बीजेपी को भरोसा नहीं, तो यह उसकी परेशानी। यानी एनडीए राज में कांग्रेस ने जिन्हें पोंगा पंडित कहा, अब वही ढाल बन गए। कांग्रेस ने तो बोफोर्स ने सबक ले ठान लिया- भले सरकार चली जाए, जेपीसी नहीं बनाएंगे। कांग्रेस की दलील- बोफोर्स के वक्त जेपीसी बना बड़ी गलती की। जिसका विपक्ष ने दो दशक तक फायदा उठाया। पर आखिर में राजीव गांधी कोर्ट से पाक-साफ हुए। यानी कांग्रेस की दो-टूक- जेपीसी पर अतीत का अनुभव ठीक नहीं। सो अब वही भूल नहीं दोहराएंगे। अब मुश्किल बीजेपी की। सो फिर जेपीसी की मांग की। शाहनवाज हुसैन बोले- पीएम कहीं भी जाएं, हमें लेना-देना नहीं। पर जेपीसी के बिना कोई निष्कर्ष नहीं निकल सकता। सुषमा स्वराज ने ट्विटर पर लिखा- जब पीएसी और जेपीसी में फर्क नहीं, तो रूल बुक में अलग-अलग प्रावधान क्यों? पर बीजेपी के एक तीजे नेता की दलील- अगर पीएसी नहीं बुला सकती, तो बिना टर्म एंड रेफरेंस के जेपीसी भी नहीं बुला सकती। अपने जोशी ने तो साफ कह दिया- भले पीएसी का काम सिर्फ अकाउंट की जांच करना, पर किस पॉलिसी की वजह से गड़बड़ हुई, इसकी भी जांच कर सकती। जोशी ने सिर्फ सीएजी की 2003 से दी गई रपट पर ही नहीं, एनडीए काल तक की फाइल खंगालने का इरादा जता दिया। वैसे भी बीजेपी स्पेक्ट्रम घोटाले के जाल में फंसती जा रही। नीरा राडिया के करीबियों में अब अनंत कुमार का भी नाम आ गया। सरकार ने एलान कर दिया- अनंत ने मंत्री रहते नीरा को गोपनीय जानकारी लीक की, इसकी जांच होगी। तब एक कन्नड़ अखबार ने क्लिंटन-मोनिका के संबंधों का हवाला देते हुए राडिया को अनंत की मोनिका बताया था। जिसके खिलाफ अनंत कुमार की पत्नी ने कोर्ट में चुनौती दी थी। सो अब बीजेपी ने तोप में सिर्फ पीएम के नाम के गोले भरने शुरू कर दिए। कांग्रेस और सरकार की आक्रामक रणनीति के जवाब में अब बीजेपी यह भी मंथन कर रही। अगर बजट सत्र तक जेपीसी नहीं बनी, तो सत्र के दौरान पीएम के बॉयकाट का भी दांव खेला जा सकता। यानी सदन में जैसे ही पीएम आएं, कम से कम बीजेपी उठकर चली जाए। सो कांग्रेस-बीजेपी के बीच लेटर वॉर पहले ही शुरू हो चुके। पर कांग्रेस को तो पीएसी रपट का इंतजार। सोमवार को पीएसी में सीएजी विनोद राय से पूछा गया- कैसे 1.76 लाख करोड़ के आंकड़े तक पहुंचे? आकलन 2003 से क्यों किया? सीएजी ने आंकड़े के तीन मापदंड गिना दिए। अब यह आंकड़ा 57,666 करोड़ से 1.76 लाख करोड़ तक हो सकता। पर फिलहाल जोशी ने तो साफ कर दिया, जेपीसी ही सब कुछ नहीं।
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27/12/2010
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27/12/2010
Friday, December 24, 2010
कलमाड़ी को कल, राजा को रंक बनाने की तैयारी?
तो कलमाड़ी को कल और राजा को रंक बनाने की तैयारी पूरी समझो। शुक्रवार को कॉमनवेल्थ घोटाले में कलमाड़ी के मुंबई, पुणे, दिल्ली ठिकानों पर सीबीआई ने छापे मारे। तो स्पेक्ट्रम घोटाले में पूर्व संचार मंत्री ए. राजा से सीबीआई हैडक्वार्टर में पूछताछ हुई। अर्श से फर्श पर आना इसे ही कहते हैं। एक वक्त था, जब राजा इसी सीजीओ कॉम्प्लेक्स में साइरन बजाती लाल बत्ती वाली गाड़ी के साथ चमचमाते इलैक्ट्रॉनिक्स निकेतन के अपने दफ्तर में पहुंचते थे। पर शुक्रवार को जब सीजीओ कॉम्प्लेक्स के सीबीआई दफ्तर पहुंचे। तो चेहरे पर जबर्दस्ती की मुस्कान छलक रही थी। आखिर ऐसा हो भी क्यों ना, कभी मंत्री के रौब के साथ आते थे। अबके आरोपी बनकर आए। राजा से नौ घंटे की पूछताछ हुई। तो कलमाड़ी से आठ घंटे तक। पर दोनों ने तो सफाई पेश की, व्यवस्था की सारी गंदगी दिखा गए। राजा हों या कलमाड़ी, एक ही दलील- जो भी किया, टॉप बॉस की नॉलेज में। मतलब राजा लंबे समय से कहते आ रहे- टू-जी स्पेक्ट्रम आवंटन में पीएम को भरोसे में लेकर कदम आगे बढ़ाया। अब यही बात कलमाड़ी ने भी कह दी। सीबीआई के छापे ने कलमाड़ी के दिल पर छाप छोड़ दी। सो कलमाड़ी बोले- मैंने अकेले कोई फैसला नहीं लिया। अब कलमाड़ी उवाच का मतलब कोई अनाड़ी भी समझ जाए। कलमाड़ी ने यह नहीं कहा कि उनके हाथों कुछ गलत हुआ। अलबत्ता कॉमनवेल्थ घोटाले में आयोजन के लिए बना समूचा एक्जीक्यूटिव बोर्ड शामिल। यानी सीधे-सीधे पीएमओ पर इशारा। अब आप सीधे-सपाट शब्दों में राजा और कलमाड़ी उवाच का निहितार्थ निकालें। तो मतलब यही- हम सब चोर हैं। सो चोरी की सजा भला किसी एक को क्यों मिले। बीजेपी अध्यक्ष नितिन गडकरी ने तो छलावा करार दिया। शायद महाराष्ट्र प्रेम जाग गया। सो गडकरी का आरोप- कलमाड़ी को बलि का बकरा बनाया जा रहा। वैसे भी कलमाड़ी से अब कांग्रेस ही किनारा कर रही। सो गडकरी सहानुभूति दिखा रहे। पर बात कांग्रेस की, जिसने कलमाड़ी के तेवर देख शुक्रवार को साफ कर दिया, कलमाड़ी अपनी सफाई खुद देंगे। छापों से कांग्रेस कोई राजनीतिक संदेश नहीं देना चाहती, अलबत्ता यह न्यायिक प्रक्रिया का हिस्सा। यानी कलमाड़ी को समझाने की कोशिश, छापे राजनीतिक इशारे पर नहीं डाले गए। पर कलमाड़ी की गर्जना यहीं नहीं थमी। उन ने साफ कहा- कॉमनवेल्थ के आयोजन में कुल जितना खर्च हुआ, उसका महज चार से पांच फीसदी उनकी रहनुमाई वाली आयोजन समिति के जिम्मे था। यानी कलमाड़ी ने तेवर दिखा इशारों में ही सवाल दाग दिया- बाकी 95 फीसदी की जिम्मेदारी भी तय हो। सचमुच कॉमनवेल्थ में कलमाड़ी की भूमिका सिर्फ आयोजन तक सीमित। असली घोटाला तो इन्फ्रास्ट्रक्चर में हुआ, जहां स्टेडियम के पुनरुद्धार पर ही अरबों लुट गए। सडक़ें बार-बार बनाईं-उखाड़ी गईं। सडक़ किनारे हर तीसरे दिन नई टाइल्स बिछती रहीं। कभी गमले में पौधे, तो कभी पौधे में गमले लगाए गए। कभी तेल में गाड़ी, तो कभी गाड़ी में तेल डाले गए। नेहरू स्टेडियम के बाहर ताश के पत्ते की तरह ढहा पुल भला कौन भूल सकता। सो जितनी जिम्मेदारी कलमाड़ी की, उतनी ही दिल्ली की शीला सरकार, जयपाल रेड्डी के शहरी विकास मंत्रालय और एम.एस. गिल के खेल मंत्रालय की भी। पर कांग्रेस की हमेशा यही रणनीति, मछली को जाल में फंसा, मगरमच्छों को छोड़ देती। अगर भ्रष्टाचार के खिलाफ ईमानदार दृष्टिकोण होता। तो राजा पर शिकंजा कसने में तीन साल और कलमाड़ी के घर छापा मारने में महीनों नहीं बीतते। अब राजा-कलमाड़ी की दलील दूरगामी प्रभाव डालने वाली। अगर दोनों आरोपी ही ऐसा कह रहे, तो भला कांग्रेस किस मुंह से विपक्ष को गलत ठहरा रही। विपक्ष के आरोपों में दम नहीं होता, तो संसद सत्र के वक्त सरकार बचाव की मुद्रा में नहीं दिखती। ऐसा भी नहीं कि यूपीए सरकार ने हंगामे में संसद सत्र को खाली-खाली बीत जाने दिया हो। मनमोहन की पहली पारी के शुरुआती दिन याद करिए, जब दागी मंत्री के मसले पर कैसी रार ठनी थी। बिना विपक्ष के बजट पारित हुआ था। सो भले राजा को रंक और कलमाड़ी को बीता हुआ कल बना कांग्रेस खुद को बेदाग साबित करने की कोशिश करे। पर जनता सब कुछ समझती। अब तो कपिल सिब्बल भी सुब्रहमण्यम स्वामी के निशाने पर आ गए। पीएम को पाती लिख अल्टीमेटम दे दिया। सिब्बल को टेलीकॉम मिनिस्ट्री से नहीं हटाया, तो कोर्ट जाएंगे। स्वामी की दलील, सिब्बल के इस विभाग में मंत्री बनने से जांच प्रभावित होंगी। क्योंकि सिब्बल अनिल अंबानी के वकील रह चुके। एक और कंपनी जिसमें दाऊद का पैसा लगा था, उसके भी वकील रह चुके। दोनों कंपनी स्पेक्ट्रम घोटाले की जांच के दायरे में। सो सिब्बल के रहने से जांच निष्पक्ष नहीं कही जा सकती। अब पीएम क्या करेंगे, यह तो मालूम नहीं। पर उन ने शुक्रवार को शरद पवार की खैर-खबर जरूर ली। महाराष्ट्र के सीएम पृथ्वीराज चव्हाण की रहनुमाई में सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल बारिश से फसल के नुकसान पर मुआवजे की मांग लेकर गया था। पर प्याज की बढ़ती कीमत से परेशान पीएम ने प्रतिनिधिमंडल के सामने ही पवार से पूछ लिया। प्याज पर क्या कर रहे? कांग्रेस ने तो मंच से कह दिया- कीमतों पर काबू पाने के लिए जितने उपाय किए, पवार की खैर-खबर भी उसी का हिस्सा। सो सिर्फ भ्रष्टाचार ही नहीं, कांग्रेस का गठबंधन धर्म भी चौराहे पर।
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24/12/2010
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24/12/2010
Thursday, December 23, 2010
तिवारी ही नहीं, समूची व्यवस्था का डीएनए हो!
तो शुक्रवार को सीबीआई भ्रष्टाचार के राजा की खैर-खबर लेगी। सो गुरुवार को ही कांग्रेस के संकटमोचक प्रणव दा गरजे। संसद का समूचा सत्र ठप करने के लिए देश से माफी मांगे विपक्ष। प्रणव दा स्पेक्ट्रम घोटाले पर बहस के लिए पहले ही विशेष सत्र की पेशकश कर चुके। पर विपक्ष ने टका सा जवाब दे दिया। अब बहस नहीं, जांच और कार्रवाई चाहिए। सो पक्ष-विपक्ष का यह वाचाल तंत्र कहां थमेगा, मालूम नहीं। पर यूपीए सरकार की पोल सहयोगी ही खोल रहे। अब अगर राजा की गिरफ्तारी हुई, तो कांग्रेस-डीएमके दोराहे पर खड़ी होंगी। पर तलवार सिर्फ कांग्रेस-डीएमके के रिश्ते पर ही नहीं, अब तृणमूल कांग्रेस ने भी मोर्चा खोल दिया। बंगाल में केंद्रीय बल के दुरुपयोग से खफा ममता बनर्जी तो नाता तोडऩे की धमकी दे ही चुकीं। गुरुवार को ममतावादी सुदीप बंदोपाध्याय ने कांग्रेस की कलई खोली। बोले- हम सबसे बड़े घटक, पर सरकार हमसे कोई सलाह-मशविरा नहीं करती। हमें मीडिया के जरिए खबरें मिलतीं। कोई न्यूनतम साझा कार्यक्रम नहीं। भले कांग्रेस और तृणमूल के बीच बंगाल चुनाव में सीट बंटवारे को लेकर एक-दूसरे पर दबाव की रणनीति चल रही हो। पर इसमें भी कोई शक-शुबहा नहीं, मौजूदा परिस्थितियों में यूपीए के घटक दल कांग्रेस के रवैये से असहज हो रहे। चुनावी राज्य तमिलनाडु, बंगाल में घटक दल कांग्रेस की कारगुजारियों का नफा-नुकसान तोलने में जुटे हुए। ममता को खास तौर से डर सता रहा, महंगाई और भ्रष्टाचार पर कांग्रेस की रणनीति से बंगाल में रायटर्स बिल्डिंग का सपना अधूरा न रह जाए। सो तृणमूल ने संसद सत्र के वक्त भी जेपीसी की पैरवी की थी। पर कांग्रेस अपनी जिद पकड़े बैठी। सो तृणमूल ने सहयोगी दलों को न पूछने का आरोप लगाना शुरू कर दिया। अब जब गठबंधन ही इतना असहज हो रहा। कांग्रेस अपने घटक दलों की भी नहीं सुन रही। तो सोचिए, जनता की बात क्या खाक सुनेगी? यों सवाल तृणमूल से भी- जब कांग्रेस मान नहीं दे रही, तो अपमान के साथ सत्ता में क्यों बैठी हुई? अब तृणमूल चाहे जो कहे, पर सत्ता की मलाई तो काट ही रही। कांग्रेस की धौंस की राजनीति का शिकार किसी को होना पड़ रहा, तो वह आम आदमी। प्याज की ‘लाली’ ने अब टमाटर को और ‘लाल’ कर दिया। कांग्रेस के एतिहासिक महाधिवेशन की शुरुआत और अंत ने आम आदमी की जेब पर डाका डाला। दूध के बाद प्याज की कीमत रातों-रात इतिहास बनाने निकल पड़ी। तो पहली बार महंगाई से कांग्रेस की आंखों में आंसू आ गए। शायद इसे प्याज की बादशाहत ही कहेंगे, जिसने 24 घंटे के भीतर राहुल गांधी से लेकर पीएम तक को हिला दिया। प्याज दिल्ली में बीजेपी की सरकार को खून के आंसू रुला चुकी। सो कांग्रेस ने ताबड़तोड़ कदम उठाए। तो प्याज की कीमतों में सीधे 30 फीसदी की गिरावट दर्ज हो गई। निर्यात पर रोक, आयात पर सब्सिडी जैसे सरकारी उपायों से जल्द और गिरावट के आसार। सो आप खुद देख लो, अगर कोई भी सरकार नेक नीयत से काम करे। तो आम आदमी लुटा-पिटा या ठगा महसूस नहीं करेगा। पर असल में हुआ क्या। जब प्याज ने आम आदमी को रुलाना शुरू किया, तो कृषि/क्रिकेट मंत्री शरद पवार ने हमेशा की तरह कालाबाजारियों को इशारा कर दिया। अपने शरद पवार जब भी मुंह खोलते, आम आदमी के खिलाफ ही बोलते। चाहे चीनी की कीमत हो या दूध की, जब-जब पवार बोले, कीमतों ने जबर्दस्त छलांग लगाई। अबके पवार ने फौरन कह दिया- तीन हफ्ते तक प्याज की कीमत नीचे नहीं आने वाली। पर पीएमओ हरकत में आया। तो हफ्तों की बात कौन करे, चौबीस घंटे के भीतर कीमतें उलटी दिशा में लौटने लगीं। पर मनमोहन सरकार के बड़बोले मंत्री सिर्फ पवार ही नहीं। पवार के महकमे में जूनियर मंत्री के.वी. थॉमस ने खीझते हुए कहा- मैं कोई जादूगर नहीं, जो बताऊं, कीमत कब कम होंगी। पर गुरुवार शाम होते-होते कृषि सचिव का बयान आ गया। एक हफ्ते में कीमतें नीचे आ जाएंगी। फिर कृषि मंत्रालय के अधीन संस्था नैफेड ने दो-तीन दिन में कीमत कम होने का दावा किया। सो अब आप खुद ही देख लो, एक ही महकमे के चार लोग यानी कृषि मंत्री, कृषि राज्यमंत्री, कृषि सचिव और नैफेड के अधिकारी बोले, पर चारों के अलग-अलग बोल। पर सबसे पते की बात तो दिल्ली की सीएम शीला आंटी ने की। प्याज के दाम से बेदम शीला मीडिया पर भडक़ते हुए बोलीं- कहां बढ़ रहे हैं दाम, आप लोग बढ़ा रहे हो दाम। अब अपनी इस व्यवस्था को क्या कहेंगे आप? अगर भ्रष्टाचार के वार से चोटिल मनमोहन ने प्याज पर दखल न दिया होता। तो प्याज की कीमत में हुई थोड़ी गिरावट भी नहीं होती। सो गुरुवार को ही जब दिल्ली हाईकोर्ट ने कांग्रेस नेता नारायण दत्त तिवारी को डीएनए टेस्ट कराने का आदेश दिया। तो फैसला देख यही लगा- भले देर हो, पर अंधेर नहीं। रोहित शेखर नाम के शख्स ने तिवारी को अपना जैविक पिता बताया। पर तिवारी मानने को राजी नहीं। सो हाईकोर्ट ने कहा- तिवारी संविधान से ऊपर नहीं। नाजायज औलाद को समाज में कैसा दंश झेलना पड़ता, सबको मालूम। संविधान के तहत रोहित को इस बात का हक कि वह अपने जैविक पिता की खोज करे। इसमें निजता की कोई बात ही नहीं। अब भले रोहित शेखर के हित में एन.डी. तिवारी का डीएनए हो जाए। पर सवाल, देशहित में अपनी समूची व्यवस्था का डीएनए क्यों न हो? भ्रष्टाचार और महंगाई चरम पर। फिर भी प्याज ने यह साफ कर दिया। अगर सरकार सही सोच व ईमानदारी से काम करे, तो क्या नहीं हो सकता।
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23/12/2010
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23/12/2010
Wednesday, December 22, 2010
तो भ्रष्टाचार पर राजनीति की अपनी-अपनी रणनीति
अब तो प्याज महंगा हो गया। शरद पवार ने जैसे ही मुंह खोला, प्याज रुलाने लगी। कांग्रेस की हालत खराब हो गई। महाधिवेशन जिस दिन शुरू हुआ था, उस दिन दूध की कीमत बढ़ी थीं। अब खत्म हो गया, तो प्याज दम निकाल रहा। सो अपने राहुल गांधी ने पवार-तवार को छोड़ सीधे पीएम पर जिम्मेदारी डाल दी। लाग-लपेट के बिना कह दिया- पीएम इस समस्या का समाधान ढूंढ लेंगे। अब सरकार प्याज बेचे या तेल, जनता तो कड़ाही में प्याजी की तरह भुन रही। सो महंगी प्याज के मारे राजनीतिक दल भ्रष्टाचार पर फिलहाल सिर्फ जूते बरसा रहे। कांग्रेस ने तीन दिन के महाधिवेशन में बीजेपी के भ्रष्टाचार पर जूते बरसाए। तो संसद के बाद बुधवार से विपक्ष ने सडक़ों पर यही काम शुरू कर दिया। पर बीजेपी-कांग्रेस के बीच शुरू भ्रष्टाचार के महासंग्राम से पहले बात अपने राजस्थान में मचे उपद्रव की। गहलोत सरकार को हाईकोर्ट से राहत नहीं मिली। कोर्ट ने गुर्जरों के पांच फीसदी आरक्षण पर साल भर की रोक लगा दी। नए सिरे से सर्वे कराने के निर्देश दिए। अब सरकार के पास सुप्रीम कोर्ट जाने का विकल्प। पर गुर्जर समाज ने हाईकोर्ट में समुचित पक्ष नहीं रखने का आरोप सरकार के सिर मढ़ दिया। बाकायदा आंदोलन को और तेज करने का एलान हो गया। सो अब साल 2010 के बाकी बचे नौ दिन में क्या-क्या होगा। क्या देश आंदोलन की आग में झुलस कर ठहर जाएगा। या फिर जल्द किसी समाधान की उम्मीद? सचमुच 2007 से ऐसा कोई साल नहीं बचा, जब राजस्थान गुर्जर आंदोलन की आग में न झुलसा हो। साल 2010 में उम्मीद नहीं थी। पर जाते-जाते उम्मीद पर पानी फिर गया। सो सडक़ से संसद तक साल 2010 ने सिर्फ संकट पैदा किया। लालकृष्ण आडवाणी ने तो बुधवार को एलान भी कर दिया- साल 2010 घोटालों का वर्ष रहा। पर उन ने पीएम को फार्मूला भी सुझाया- अगर जेपीसी मान लो, तो घोटालों का वर्ष नहीं कहेंगे। यों एनडीए की महासंग्राम रैली के दोनों तरफ साल के दस घोटाले बैनर-पोस्टर चस्पा थे। बीजेपी ने तो बाकायदा घोटालों का वर्ष 2010 नाम से पुस्तिका भी जारी कर दी। जिसमें चालू वर्ष के दस घोटाले गिनाए। जरा आप भी देख लें। टू-जी स्पेक्ट्रम, कॉमनवेल्थ, आदर्श सोसायटी, सड़ा अनाज, मुद्रास्फीति, चावल आयात, जनवितरण प्रणाली, सीवीसी की नियुक्ति, आईपीएल, एलआईसी हाउसिंग लोन और सत्यम घोटाला। सो बीजेपी ने अब कहना शुरू कर दिया- कांग्रेस का हाथ घोटालों के साथ। एनडीए की रैली में अरुण जेतली महफिल लूट ले गए। उन ने पीएम को चुनौती दी- अगर सच छुपाना नहीं चाहते, तो जेपीसी का सामना करें। वरना कुर्सी छोड़ दें। यानी विपक्ष ने अब राजा-राडिया को छोड़ सारा फोकस पीएम पर कर दिया। आडवाणी ने तो एलान कर दिया- अब विपक्ष के इस अभियान में मनमोहन ही हमारे निशाने पर होंगे। रैली में आडवाणी का दर्द भी उभर आया, जब उन ने 2009 के लोकसभा चुनाव की याद ताजा की। बोले- जब 2009 में मैंने कहा था, मनमोहन कमजोर पीएम। तो मेरे साथियों ने एतराज जता ईमानदार बताया था। पर आज साबित हो रहा, पीएम का पद कमजोर नहीं, अलबत्ता उस पद पर बैठा व्यक्ति कमजोर। जो हर अहम फैसले के लिए दस जनपथ की ओर निगाह जमाए बैठता। आडवाणी ने लगे हाथ पीएम को सलाह भी दी- पीएम पद की शक्तियों को इस्तेमाल कर जेपीसी बनाएं। अकाली रतन सिंह अजनाला ने तो यहां तक कह दिया- मनमोहन सिंह ऐसे पीएम, जिनकी कुर्सी के नीचे सारे लुटेरे बैठे हुए। यानी पीएसी के सामने सफाई देने की पेशकश कर मनमोहन ने विपक्ष को घेरने का मौका दे दिया। यों मुरली मनोहर जोशी की रहनुमाई वाली पीएसी 27 दिसंबर को तय करेगी, पीएम को बुलाना है या नहीं। पर कांग्रेस की नजर में पीएम का पीएसी वाला दांव एक साहसिक कदम। दिग्विजय सिंह तो सोमवार को ही इसे मास्टर स्ट्रोक बता चुके। सो बुधवार को जब एनडीए ने महासंग्राम के मंच से सीधा पीएम के खिलाफ बिगुल फूंका। तो कांग्रेस प्रवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने आरोप का जवाब देने के बजाए पलटवार किया। बोले- बीजेपी यानी बंगारू-जूदेव पार्टी को भ्रष्टाचार विरोधी रैली का नैतिक हक नहीं। जिस पार्टी ने भ्रष्टाचार में मील के पत्थर बनाए, जिस पार्टी का अध्यक्ष रिश्वत लेते पकड़ा गया, वह पार्टी भला क्या बात करेगी। यानी राजनीति में भ्रष्टाचार की फिर वही कहानी। भ्रष्टाचार के हमाम में सभी राजनीतिक दल एक जैसे। सो खुद को देखने के बजाए दोनों पक्ष एक-दूसरे को नंगा बता मखौल उड़ा रहे। बीजेपी की रणनीति, अगर राजा जेल गए, तो मुद्दा ठंडा पड़ जाएगा। सो सीधे पीएम को निशाना बनाओ। ताकि बजट सत्र तक मुद्दा जिंदा रखा जा सके। पर कांग्रेस की रणनीति कुछ अलग। भले देखने में कांग्रेस के बयान हताशा भरे लग रहे हों। पर रणनीतिकारों की मानें, तो पलटवार की मजबूत वजह। पिछले लोकसभा चुनाव में तमाम अटकलों को विराम देते हुए कांग्रेस ने 206 सीटें हासिल कीं। तो जीत के पीछे नरेगा जैसी महत्वाकांक्षी सामाजिक योजना अहम फैक्टर रहीं। सो अब कांग्रेस का मानना यही- नरेगा, सूचना का हक, शिक्षा का हक और अब भोजन का हक देने की तैयारी। सो सामाजिक योजनाओं से जमीनी स्तर पर कांग्रेस मजबूत हुई और होगी। इसलिए विपक्ष के आरोपों का मुंहतोड़ जवाब देते हुए उन योजनाओं पर ही फोकस किया जाए। यानी भ्रष्टाचार पर कांग्रेस की आक्रामकता योजनाबद्ध रणनीति का हिस्सा। तो बीजेपी को बोफोर्स दोहराने की उम्मीद।
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22/12/2010
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22/12/2010
Tuesday, December 21, 2010
अब तो जवाब मांग रहा देश, यह कैसा आंदोलन?
गुर्जर आंदोलन की आग में राजस्थान फिर झुलस उठा। पिछले चार साल में चौथी बार ऐसा आंदोलन हो रहा। हर बार की तरह अबके भी आंदोलन देश का चौथा निकाल रहा। पांच फीसदी आरक्षण का मसला हाईकोर्ट में लंबित। पर आंदोलन के कर्ता-धर्ताओं ने एलान कर दिया- अब पांच फीसदी लेकर ही उठेंगे। तो क्या एक बार फिर देश आंदोलन की आग में झुलसकर अपाहिज बनेगा? आखिर आंदोलन का क्या मकसद? माना, सरकार के बहरे कान बिना शोर-शराबे या हिंसा के नहीं सुनते। पर अपने फायदे के लिए समूचे देश को ठहरा देना कहां तक न्यायसंगत? वसुंधरा सरकार के वक्त 2007 में 29 मई से दो जून तक हिंसक आंदोलन हुए। फिर जून 2008 में 27 दिन तक आंदोलन हुए। तो वसुंधरा सरकार ने पांच फीसदी आरक्षण के साथ-साथ सवर्णों को 14 फीसदी आरक्षण का भी पासा फेंक दिया। पर चुनाव बाद सत्ता बदली। तो गुर्जर आरक्षण का मसला अशोक गहलोत सरकार के गले की हड्डी बन गई। तबके गवर्नर एस.के. सिंह आरक्षण के मुखर विरोधी थे। सो उन ने बीजेपी राज में विधानसभा से पारित प्रस्ताव में फच्चर फंसा दिया। तो बीजेपी को सियासत का मौका मिल गया। वसुंधरा राज में खुद को किसी दल से बाहर का बताने वाले कर्नल किरोड़ी सिंह बैंसला गहलोत सरकार के आते-आते भगवा रंग में रंग चुके थे। बाकायदा बीजेपी के टिकट से कांग्रेसी नमोनारायण मीणा के खिलाफ टोंक-सवाई माधोपुर सीट से चुनावी मैदान में कूदे। पर कांटे की टक्कर में मीणा बच गए, बैंसला को कांटा चुभ गया। सो जब जुलाई 2009 में बीजेपी के समर्थन से बैंसला ने झंडा उठाया। कांग्रेस सरकार पर आठ महीने तक फाइल दबाने का आरोप लगा आंदोलन का एलान किया। तो सरकार के हाथ-पांव फूल गए। विधानसभा में तब जो हुल्लड़ मचा, दोहराने की जरूरत नहीं। बीजेपी के एमएलए ने टेबल पर चढ़ माइक फेंके, कागज लहराए। पर खुद गुर्जर आंदोलन का दंश झेल चुकी बीजेपी का तब और अब शह देने का क्या मकसद? क्या विपक्ष में आ जाने से राजनीतिक जिम्मेदारी का मकसद बदल जाता? ऐसे आंदोलनों के वक्त राजनीतिक एका की जरूरत, ताकि कोई हिंसक घटना न हो। पर लाशों की राजनीति नेताओं के बायोडाटा का हिस्सा बन चुकी। अब चाहे कांग्रेस राज में पिछली बार कोई हिंसक वारदात नहीं हुई। अलबत्ता दिल्ली के दखल से गवर्नर-सीएम ने बीजेपी राज के प्रस्ताव को ही मान लिया। तब चीफ मिनिस्टर ने आंदोलन थामने का क्रेडिट लेते हुए दलील दी थी- आठ महीने का वक्त कानूनविदों की राय लेने में लग गया। हम चाहते थे कि भविष्य में कोई कानूनी अड़चन न आए। पर जैसे गुर्जर आंदोलन में बीजेपी दोषी, वैसी ही कांग्रेस भी। अब कोई पूछे, जब आठ महीने कानूनविदों की राय लेने में बिता दिए। तो अब फिर मामला कोर्ट में क्यों पेंडिंग? यानी वोट बैंक की राजनीति में ईमानदार कोई नहीं। सो अबके कर्नल बैंसला ने एलान किया- चाहे सीएम आ जाएं या मध्यस्थ विश्वेंद्र सिंह या कोई तीस मार खां। जब तक पांच फीसदी आरक्षण नहीं मिलता, नहीं उठेंगे। पर सवाल हुआ- कोर्ट के आगे सरकार के हाथ बंधे हुए। तो बैंसला की दलील- सरकारी भरती की प्रक्रिया कोर्ट के फैसले तक रोक दो। क्या लोकतंत्र में निजी हित के लिए समाज के बाकी तबकों का हित दबाना उचित? रेल की पटरियां उखाडऩे और राजमार्ग को ठप करने से किसका नुकसान होगा? क्या किसी नेता की यात्रा रुक रही या काफिला ठहर रहा? आखिर में नुकसान तो आम नागरिकों को हो रहा। लोग स्टेशनों पर ठंड में ठिठुर रहे। जीवन अस्तव्यस्त हो रहा। सो आंदोलन के रहनुमाओं को जवाब देना होगा, यह कैसा आंदोलन? यह कैसी जिद, जो दूसरों की आजादी में खलल डाले? हर बार आंदोलन से सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचाया जाता। फिर उसी सरकार से अपने हित की मांग क्यों? सत्रहवीं शताब्दी में इंग्लैंड के सिविल वार में आंदोलन शब्द का विशेष प्रचलन हुआ। तब क्राम वेल की सेना के हर रेजीमेंट में प्रतिनिधि निर्वाचित किए गए। हर प्रतिनिधि को आंदोलनकर्ता कहा गया। फिर फ्रांसीसी क्रांति के वक्त आंदोलनकर्ता उन्हें कहा गया, जिन ने दंगा-फसाद कराने की कोशिश की। बाद में इंग्लैंड में इसी शब्द का इस्तेमाल शांतिपूर्ण आंदोलन के लिए हुआ। जिसका मकसद लोकमत से संसद को इस बात के लिए प्रेरित करना था कि वह कानून में सुधार करे। वामपंथियों ने आंदोलन का मतलब उग्र बना दिया। पर अपने देश में जनआंदोलन का श्रेय राष्ट्रपिता महात्मा गांधी को। उन ने शांति, प्रेम और अहिंसा से अंग्रेजों को मजबूर कर दिया। पर उग्र आंदोलन की शुरुआत 1948 में कम्युनिस्टों ने की। जब कलकत्ता थीसिस घोषित किया गया। आजादी को अधूरी बता कम्युनिस्टों ने बल प्रयोग से उलटने का एलान किया। रक्तरंजित क्रांति शुरू कर दी। ट्रेन-बैंक लूटे गए। देश में कड़ा विरोध हुआ। तो केंद्र-राज्य ने मिलकर हिंसा को कुचल दिया। बाद में देश में कई ऐसे आंदोलन हुए। पर अब वोट बैंक की राजनीति ने आंदोलनों को हवा देनी शुरू कर दी। सो अब जवाब आंदोलनकारियों को देना होगा, वह किस प्रकार का आंदोलन कर रहे? हिंसक आंदोलन का दर्द उस परिवार से पूछिए, जिनके घरों के चिराग बुझ गए। सो अपनी अपील, सर्वजन के हित में गुर्जर समाज खुद अमन-चैन का बीड़ा उठाए। अगर सरकार के बहरे कान तक आवाज पहुंचानी। तो रेल की पटरी उखाड़ आम जनता को नुकसान न पहुंचाएं। अलबत्ता महात्मा गांधी की तरह अहिंसा का मार्ग अपनाएं।
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21/12/2010
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21/12/2010
Monday, December 20, 2010
जनता की छोड़ो, आओ भ्रष्टाचार-भ्रष्टाचार खेलें
कांग्रेस की तीन दिनी महाकथा का समापन हो गया। अब इसे महाधिवेशन कहिए या कार्नीवल। कांग्रेस की यही खूबी, जो भी हो, डंके की चोट पर करती। चाहे वह पाप हो या पुण्य का काम। सो भ्रष्टाचार के साये में कांग्रेस ने मंथन तो किया। पर बीजेपी को खरी-खरी सुना ही कर्तव्य की इतिश्री कर ली। अब कोई विपक्षी दल ऐसा मंथन करे, तो सत्ता से दूरी का दर्द समझा जा सकता। पर जब सत्ता में बैठी कांग्रेस ऐसा कर रही, तो भ्रष्टाचार का भला क्या बिगड़ेगा? बीजेपी ने अगर पाप किया, या कर रही। तो आज वही गठरी सिर पर ढोने को मजबूर। पर कांग्रेस उस पाप से अपना पाप नहीं छुपा सकती। कर्नाटक पर भले बीजेपी दोहरापन दिखा रही। पर क्या विपक्ष के रवैये से देश में कांग्रेस को लूट का लाइसेंस मिल गया? कांग्रेस को स्पेक्ट्रम, आदर्श और कॉमनवेल्थ घोटाले पर जवाब देना था। पर कांग्रेस ने शायद इन घोटालों की मजबूत जड़ें देख लीं। सो अब जब कांग्रेस को कोई सुगम राह नहीं दिख रही। तो आक्रमण ही बेहतर बचाव का मंत्र अपना लिया। संसद का सत्र लोकतंत्र में काला इतिहास बना गया। तो अब कांग्रेसी जेपीसी को ही कमतर बताने में जुट गए। सोनिया-राहुल-पीएम और गाल बजाने वाले दिग्विजय ने एक सुर में पीएसी को बेहतर बताया। मंगलवार को मनमोहन ने तुरुप का पत्ता फेंका। बीजेपी नेता मुरली मनोहर जोशी की रहनुमाई वाली पीएसी के सामने पेश होने का ऑफर कर दिया। बोले- सीएजी रपट के बाद मंत्री को हटाया। सीबीआई, ईडी, सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जज से जांच, सुप्रीम कोर्ट की मॉनीटरिंग और पीएसी की जांच चल रही। पीएसी के पास वह सारी शक्तियां, जो जेपीसी को दी जा सकतीं। सो जेपीसी का कोई मतलब नहीं। पर बीजेपी ने संसद ठप किया, जबकि मेरे पास छुपाने को कुछ नहीं। अब कोई पूछे- छुपाने को कुछ नहीं, तो जेपीसी क्यों नहीं? जब आप आधा दर्जन एजेंसियों से जांच कराने को राजी। तो जेपीसी से भागने का कुछ तो मतलब होगा। बीजेपी के अरुण जेतली ने तो फौरन सवाल उठाया- चुप्पी तोडऩे के लिए पीएम का स्वागत। पर शासनकर्ता जांच के लिए खुद मंच का चयन नहीं कर सकता। अगर पीएम गलत नहीं, तो सीमित अधिकार वाली पीएसी से जांच पर जोर क्यों दे रहे? उन ने आरोप मढ़ा- पीएम देश से बहुत सी बातें छुपा रहे। मसलन, तीन साल तक मनमोहन चुप क्यों रहे? कैग रपट से पहले तक राजा का बचाव क्यों करते रहे? सीवीसी पद पर दागी थॉमस के लिए वीटों क्यों किया? सिर्फ जेतली नहीं, वामपंथी सीताराम येचुरी ने भी पीएम को अपने दिन याद कराए। येचुरी बोले- एनडीए काल में मनमोहन ने जेपीसी के लिए तीन हफ्ते तक संसद का बॉयकाट किया था। सो दोहरे मापदंड न अपनाएं। यानी भ्रष्टाचार अब विशुद्ध रूप से राजनीति के मैदान का फुटबाल बन गया। तू चोर, तो मैं भी चोर की लड़ाई शुरू हो गई। विपक्ष ने संसद के बाद सडक़ पर बिगुल फूंका। तो कांग्रेस महाधिवेशन से सोनिया ने भी हुंकार भरी। जैसे विपक्ष मैदान में, वैसे हम भी कूदेंगे। बाकायदा विपक्ष की रैलियों के जवाब में विधानसभा वार रैली का एलान कर दिया। सोनिया ने अपने समापन भाषण में दो-टूक कहा- हमारा रिकार्ड एनडीए से बेहतर। पी. चिदंबरम ने तो भविष्यवाणी कर दी- अगले एक दशक तक बीजेपी सत्ता में नहीं आने वाली। उन ने विपक्ष को बतलाया, हम शासन करना जानते हैं। ऐसा ही गुरूर कांग्रेस ने बोफोर्स के वक्त भी दिखलाया था। अबके तो 206 सांसद को ही तीन चौथाई बहुमत मानकर फूल रही। पर सवाल- एनडीए से तुलना करना ही शासन? या कांग्रेस सिर्फ शासन करना ही जानती, सुशासन देना नहीं? आखिर यह कैसा मंथन, जब भ्रष्टाचार अपने चरम पर। तो कांग्रेस अपना दामन साफ दिखाने के बजाए बीजेपी के दामन में झांक रही। आतंकवाद के मुद्दे पर तो सख्त कार्रवाई के बजाए मजहबी चासनी लगाई जा रही। अयोध्या फैसले और बिहार की हार के बाद कांग्रेस की तय रणनीति के तहत दिग्विजय सिंह ने मुस्लिम वोट के ध्रुवीकरण की कमान थाम ली। सो अब बीजेपी भी मान रही, दिग्विजय का यह हथकंडा कांग्रेस-बीजेपी दोनों के लिए फायदेमंद। यानी वोट बैंक का चश्मा पहन दोनों खेल रहे। पर महाधिवेशन से आम आदमी को क्या मिला? पीएम ने महंगाई की बात की। तो इस बात की खुशी जताई कि महंगाई दर कम हो रही और मार्च तक साढ़े पांच फीसदी पर ले आएंगे। पर मंगलवार को ही एक खबर सुनने को मिली- चंडीगढ़ में एक व्यक्ति को जब प्याज की कीमत 65 रुपए बताई गई। तो हार्ट अटैक हो गया। मनमोहन राज में महंगाई दर भले ऊपर-नीचे होती रही। पर महंगाई हमेशा बढ़ती रही। चिदंबरम ने एनडीए का मखौल उड़ाया। विकास दर की ढपली बजाई। पर देश की जनता देख रही, किसका कितना विकास हुआ। भ्रष्टाचार के आरोपों को महाधिवेशन के मंच से निराधार बताया गया। तो सवाल- किस आधार पर राजा का इस्तीफा लिया? सीबीआई, ईडी, पाटिल कमेटी, शुंगलू कमेटी, सुप्रीम कोर्ट की मॉनीटरिंग, इनकम टेक्स और सीएजी क्या लकीर पीट रहीं? यानी कुल मिलाकर कांग्रेस महाधिवेशन में भ्रष्टाचार पर भजन तो हुआ। पर भ्रष्टाचार या भ्रष्टाचारियों के खिलाफ कार्रवाई से अधिक बीजेपी को कोसा। भ्रष्टाचार का पर्दाफाश तो नहीं, पर विपक्ष के आरोपों का पर्दाफाश करने का खम ठोक दिया। अब विपक्ष और कांग्रेस दोनों जनजागरण अभियान चलाएंगी। कोई भी भ्रष्टाचार पर उदाहरण पेश करने को तैयार नहीं। अलबत्ता भ्रष्टाचार-भ्रष्टाचार खेल रहीं। ताकि जनता इसी उधेड़बुन में उलझ जाए कि भ्रष्टाचार के इस खेल में कौन सांपनाथ, कौन नागनाथ।
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20/12/2010
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20/12/2010
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