Thursday, December 30, 2010

बीजेपी: 2010 में सुकून से शुरू, संघर्ष पर खत्म

 तो अब साल 2010 भी विदा होने जा रहा। समय तो सतत चलते रहने का नाम। सो साल 2011 के आगमन में महज कुछ घंटों का इंतजार। पर बीते साल का लेखा-जोखा भी जरूरी। सो आज बात बीजेपी के सफरनामे की। साल 2009 की चुनावी हार ने बीजेपी को ऐसा दर्द दिया, उबरने में काफी वक्त लग गया। अंदरूनी उठापटक इस कदर, पार्टी की मिट्टी पलीद होने लगी। तो संघ प्रमुख मोहन भागवत ने कैंसर बता कीमोथेरेैपी की सलाह दी। फिर कहा था- राख से भी उठ खड़ी होगी बीजेपी। सो जब 2009 के आखिर में 19 दिसंबर को संघ ने बीजेपी का किला बचाने को नागपुर से नितिन गडकरी को भेजा। तो सचमुच बीजेपी के साल 2010 की शुरुआत सुकून भरी रही। पार्टी की कमान गडकरी ने, तो संसद की कमान दिल्ली में बैठे धुरंधर सुषमा-जेतली ने संभाली। सो फरवरी के इंदौर अधिवेशन में जब टेंट में नेता ठहराए गए। तो तालमेल से भरी बीजेपी नए जोश में दिखी। पर शुरुआत में बीजेपी का चेहरा बदला, तो साल का अंत होते-होते चाल और चरित्र ही बदल गया। गडकरी ने महानगरों की समस्या के लिए बाहरी लोगों को जिम्मेदार ठहराया। तो सबसे पहले एनडीए की सहयोगी जेडीयू ने पुतला फूंक गडकरी को सलामी दी। इंदौर मीटिंग के बाद गडकरी को अपनी नई टीम बनाने में मत्थापच्ची करनी पड़ी। गडकरी ने अध्यक्षी संभालते ही एलान किया था- काम को पुरस्कार, नकारों को नमस्कार। पर जब मार्च में टीम गडकरी का एलान हुआ। तो नाम बड़े, दर्शन छोटे की कहावत चरितार्थ हो गई। नाम वाले कुर्सी ले गए, काम वाले कमर पकड़ कर बैठ गए। सो सीपी ठाकुर, शत्रुघ्न सिन्हा, अमित ठाकर, शाहनवाज हुसैन, बीसी खंडूरी, प्रकाश जावडेकर  जैसे नेताओं ने मोर्चा खोल दिया। ठाकुर ने चेतावनी दी- इस टीम से गडकरी का दस फीसदी वोट बढ़ाने का सपना पूरा नहीं हो सकता। फिर 27 अप्रैल को महंगाई पर कटौती प्रस्ताव ने तो बीजेपी की ही पतंग काट डाली। झारखंड में शिबू सोरेन के साथ बनी बीजेपी की सरकार लडख़ड़ा गई। पर महीने भर झारखंड के झमेले में बीजेपी का चरित्र उजागर हो गया। कभी समर्थन वापसी, तो कभी सीएम पद का लालच। आखिर में बीजेपी ने झारखंड की सरकार गंवाई, जूते और प्याज भी खाए। पर एक बार अनैतिक काम कर चुकी बीजेपी ने दूसरी बार शर्म नहीं की। साल बीतने से पहले शिबू संग झारखंड में फिर सरकार बना ही ली। सो झारखंड बीजेपी के चाल, चरित्र की नजीर बना। तो कटौती प्रस्ताव की हार ने बीजेपी के चेहरे का रंग भी बता दिया। जब मई में चंडीगढ़ की रैली में गडकरी ने लालू-मुलायम को सोनिया का तलवा चाटने वाला कुत्ता कह दिया। बवाल मचा, तो माफी मांग ली। पर गडकरी के सिर्फ इसी बोल ने नहीं, उन ने दिग्विजय को औरंगजेब की औलाद, तो अफजल की फांसी में देरी के लिए कांग्रेस नेताओं का दामाद कह दिया। सिख विरोधी दंगे को गुजरात दंगे से जोड़ फिर सफाई दी। अयोध्या में मंदिर के बाजू में मस्जिद पर स्पष्टीकरण देना पड़ा था। पर बीजेपी की बड़ी फजीहत पटना कार्यकारिणी में हुई। जब नरेंद्र मोदी ने बिहार में हीरो बनने की कोशिश की। तो नीतिश कुमार ने खरी-खरी सुना भोज का न्योता वापस ले लिया। कोसी बाढ़ राहत में गुजरात से आए पांच करोड़ भी लौटा दिए। फिर कर्नाटक में येदुरप्पा सरकार ने भ्रष्टाचार की वजह से तीन संकट झेले। भ्रष्टाचार विरोधी मुहिम में कर्नाटक ने बीजेपी की धार भौंथरी कर दी। येदुरप्पा ने ऐसी धौंस दिखाई, आला नेतृत्व चाहकर भी हटाने की हिम्मत न कर सका। पर जून में जसवंत सिंह की वापसी पार्टी के लिए अच्छी पहल रही। फिर भी जसवंत की बर्खास्तगी के वक्त दी गई दलीलों का बीजेपी जवाब नहीं दे पाई। सो जसवंत की वापसी करा बीजेपी ने विचाराधारा का चोगा उतार फेंका। फिर राजस्थान से राम जेठमलानी को राज्यसभा भेज विचारधारा का क्रिया-कर्म कर डाला। यों साल 2010 में बतौर विपक्ष बीजेपी की भूमिका असरदार रही। संसद का कोई भी सत्र ऐसा नहीं बीता, जब सुषमा-जेतली की जुगलबंदी ने सरकार को कटघरे में खड़ा न किया हो। भले अनैतिक, पर इसी साल खोया झारखंड वापस लिया। अयोध्या जमीन विवाद पर एतिहासिक फैसला बीजेपी में नई ऊर्जा भर गया। बिहार की जीत बीजेपी के लिए बड़ी सौगात बनी। भले नीतिश लहर ने कमाल दिखाया। पर बीजेपी का स्ट्राइक रेट नीतिश से उम्दा रहा। फिर भी सौगात बीजेपी में शांति नहीं, संघर्ष लेकर आई। मोदी मैजिक पर सुषमा के बयान से बवाल मचा। सुषमा बनाम मोदी जंग सतह पर आ गई। सीबीआई दुरुपयोग और अमित शाह की गिरफ्तारी के मुद्दे पर संसद में चुप्पी ने दरार और बढ़ा दी। सुषमा और अरुण जेतली ने नई भूमिका में लॉबी बनानी शुरू की। तो वर्चस्व की लड़ाई साफ दिखने लगी। इसी साल बेटे के टिकट के लिए सीपी ठाकुर का प्रदेश अध्यक्ष से इस्तीफा। यशवंत सिन्हा का पंजाब के प्रभारी से इस्तीफा। गडकरी के बेटे की शाही शादी में कुबेर के खजाने जैसा लुटाना। उस पर आडवाणी की नाराजगी। अब आखिर में साल जाते-जाते मुरली मनोहर जोशी का पीएसी के रूप में जोश। सो गुरुवार को बीजेपी ने मान-मनोव्वल कर जोशी से बयान जारी करवा दिया। पर जोशी के स्पष्टीकरण से बीजेपी के चाल, चरित्र, चेहरे का भी स्पष्टीकरण हो गया। खुद गडकरी ने एक इंटरव्यू में मान लिया- कर्नाटक में येदुरप्पा ने जो किया। वह भले अनैतिक, पर असंवैधानिक नहीं। अब आप साल भर में बीजेपी कहां से कहां पहुंची, खुद देख लो। साल 2010 की शुरुआत बीजेपी ने सुकून से की, पर फिर संघर्ष का दौर चल रहा। आने वाला साल भी उत्तराखंड में मुसीबत लेकर आ रहा।
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30/12/2010

Wednesday, December 29, 2010

भविष्य की इमारत के लिए कांग्रेस ने की डेंट की पुताई

तो बाप बड़ा न भैया और न रुपैया। सबसे बड़ी वोट की नैया, जिसे पार लगाने को कांग्रेस ने संजय गांधी को श्मशान से लाकर मारने में भी हिचक नहीं दिखाई। वैसे भी वोट की खातिर गड़े मुर्दे उखाडऩा राजनीति की फितरत। सो इमरजेंसी की कालिमा का दंश झेल रही कांग्रेस ने अपनी 125वीं वर्षगांठ के समापन पर एक किताब जारी की। जिसका शीर्षक दिया- द कांग्रेस एंड द मेकिंग ऑफ द इंडियन नेशन। यानी जस नाम, तस व्याख्या। कांग्रेस ने यह किताब इतिहास बतलाने को नहीं, इतिहास में लगे दाग धोने के लिए लिखी। सो कांग्रेस ने रणनीतिक तौर पर संजय गांधी को इमरजेंसी का खलनायक करार दे दिया। इमरजेंसी के सच को कांग्रेस ने पहली बार कबूला। पर मीठा-मीठा गप और कड़वा-कड़वा थू। वैसे भी नेहरू-गांधी खानदान पर कांग्रेस भला दाग कैसे देख सकती। संजय गांधी की बीवी मेनका और बेटा वरुण अब बीजेपी के कमल खिला रहे। सो स्वर्गीय संजय का बोझ भला स्वर्गीय राजीव का परिवार क्यों उठाता। कांग्रेस ने किताब में माना, इमरजेंसी के वक्त पीएम इंदिरा गांधी के हाथ असीमित ताकत आ गई थी। संजय गांधी तभी अहमियत वाले नेता बनकर उभरे। कांग्रेस ने इंदिरा के आपातकाल को शुरुआत में सराहनीय बताया। कांग्रेस की मानें, तो जनता के एक बड़े वर्ग ने इमरजेंसी का स्वागत किया था। पर संजय गांधी की ओर से जबरन नसबंदी और झुग्गी-झोंपड़ी हटाने के कार्यक्रम ने नाराजगी पैदा कर दी। यानी इमरजेंसी के सारे दाग कांग्रेस ने स्वर्गीय संजय गांधी को पार्सल कर दिए। किताब में जेपी के आंदोलन को संविधानेतर और अलोकतांत्रिक करार दिया। जेपी को ईमानदार और निस्वार्थी तो बताया। पर सिद्धांतों का ढीला व्यक्ति करार दिया। किताब में संजय गांधी के लिए जितनी कड़वाहट, उससे कई गुना अधिक मिठास सोनिया-राहुल के लिए। विधानसभा चुनाव में बेहतर काम के लिए राहुल की पीठ ठोकी गई। राहुल-सोनिया की तुलना राष्ट्रपिता महात्मा गांधी से। किताब में कहा गया- जैसे महात्मा गांधी ने सत्ता का त्याग किया, वैसे ही सोनिया-राहुल ने सत्ता का त्याग कर मिसाल पेश की। यानी कांग्रेस ने सच का सामना तो किया, पर अपनी सहूलियत के मुताबिक। जो मुद्दे कांग्रेस को जड़ से हिला देते, उनको किताब में सिर्फ छुआ गया। पर जो मुद्दे सीधे वोट बैंक से जुड़े, कांग्रेस ने रिश्तों की बलि चढ़ाकर मैसेज दे दिया। अयोध्या फैसले, गुजरात दंगे के कई मामलों में मोदी को क्लीन चिट, बिहार चुनाव में पटखनी के बाद से कांग्रेस ने मुस्लिम वोट को वापस लाने की मुहिम छेड़ रखी। गाहे-ब-गाहे दिग्विजय सिंह के बयान और बुराड़ी के अधिवेशन मंच से सोनिया की मौजूदगी में उनकी गर्जना सबूत दे चुके। पर यह भी एक एतिहासिक तथ्य, इमरजेंसी के समय जबरन नसबंदी का विरोध तो सबने किया। पर सबसे तीखा विरोध अल्पसंख्यक समुदाय में हुआ। सो कांग्रेस ने इमरजेंसी की बदनामी का ठीकरा संजय के सिर फोड़ दिया। कांग्रेस की कारीगरी देखिए, लिखा तो 125 साल का इतिहास। पर तुष्टिकरण का तडक़ा लगाके। कांग्रेस की दलील- संजय की वजह से बदनामी हुई। पर कोई पूछे, कांग्रेस को यह तथ्य ढूंढने में 35 साल क्यों लग गए? क्या राहुल गांधी की पारी का इंतजार हो रहा था? कांग्रेस की इस किताब का मकसद राहुल के रूप में एक नई कांग्रेस को सत्ता में पहुंचाना। पर सिर्फ लिख देने से इतिहास नहीं बदलता, न लोगों के दिलों पर पड़ी छाप मिटती। अगर इमरजेंसी की कालिमा के लिए सिर्फ संजय जिम्मेदार। तो इंदिरा के पास असीमित शक्ति होने की दलील कैसे दे रही कांग्रेस? इमरजेंसी थोपते ही इंदिरा ने तमाम विपक्षी नेताओं को जेल में कैसे ठूंसा। मीडिया, नौकरशाह, पुलिस और यहां तक कि न्यायपालिका का भी गला घोंटा गया। अगर कांग्रेस ने किताब में तथ्य लिखे। तो कांग्रेसी किताब से इतर यह भी तथ्य, बिना किसी आरोप के एक लाख लोग हिरासत में रखे गए। नौकरशाह आंख मूंदकर इंदिरा-संजय का आदेश मानने को मजबूर किए गए। यहां तक एलान कर दिया गया- विरोध करने वालों पर गोली चली, तो आश्रितों को बोलने का कोई हक नहीं। मानवाधिकार का गला घोंटने के लिए इंदिरा ने कोर्ट का भी मुंह बंद करने की कोशिश की। सो बुधवार को शरद यादव ने सही कहा- इमरजेंसी का ठीकरा किसी एक व्यक्ति पर नहीं थोपा जा सकता। खुद पीएम इंदिरा ने हर फैसला लिया। सचमुच इंदिरा का वरदहस्त न होता, तो संजय मनमानी नहीं कर सकते थे। जैसे सोनिया-राहुल के पास कोई सरकारी पद नहीं। तब संजय गांधी के पास भी नहीं था। इमरजेंसी के वक्त बाकायदा मीडिया और बालीवुड पर दबाव बनाया गया कि वह संजय को भावी पीएम पेश करे। यह खुलासा खुद फिल्म अभिनेता देवानंद अपनी किताब- रोमांसिंग विद लाइफ में कर चुके। मीडिया की हालत तो तब कैसी थी, यह आडवाणी की बतौर सूचना-प्रसारण मंत्री इमरजेंसी के बाद की गई टिप्पणी से देख लो। आडवाणी ने कहा- सरकार ने आपको झुकने के लिए कहा। पर आप तो रेंगने लगे। अब कांग्रेस का कबूलनामा कितना रंग लाएगा, यह बाद की बात। पर अतीत की नींव पर भविष्य का निर्माण करने के लिए कांग्रेस ने नींव पर पड़े डेंट की पुताई शुरू कर दी। ताकि भविष्य की इमारत साफ-सुथरी दिखे।
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29/12/2010

Tuesday, December 28, 2010

सर्दी में भी ‘जेठ’ की तपिश महसूस कर रही बीजेपी

 तो मौसम ने कांग्रेस का झंडा मुरझा दिया। मंगलवार को कांग्रेस ने 126वां स्थापना दिवस मनाया। तो मौसमी थपेड़ों के बीच 24 अकबर रोड पर कांग्रेसियों का जमावड़ा लगा। ठंड और बारिश के मिलेजुले कहर के बीच सोनिया गांधी ने झंडा फहराया। पर अबके मौसम की दोहरी मार से झंडे में पहले जैसी लहर नहीं दिखी। घोटालों की फेहरिश्त ने तो तोते उड़ा ही रखे। बाकी कोई भी ऐसा दिन नहीं, जब नए संकट पैदा न हो रहे। तेलंगाना की फांस गले पड़ चुकी। राजस्थान में गुर्जर आंदोलन कांग्रेस सरकार के लिए नासूर बन चुका। पर मौसम की मार से सिर्फ कांग्रेस ही नहीं, बीजेपी भी हलकान। घोटालों पर कांग्रेस तो शान से कह चुकी- नो जेपीसी। पर भ्रष्टाचार को सरकार के खिलाफ निर्णायक जंग मुद्दा बना चुकी बीजेपी को अब अपनी परछाईं ही सता रही। मुरली मनोहर जोशी के जोश ने बीजेपी के होश फाख्ता कर दिए। सो मंगलवार को विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज ने ट्विट किया। बोलीं- पीएम की पेशकश निरर्थक। जब पीएसी को मंत्री को बुलाने का अधिकार नहीं। तो पीएम की बात दूर। पीएसी का काम सिर्फ अकाउंट देखना। घोटाले की जवाबदेही और निष्कर्ष तक सिर्फ जेपीसी ही पहुंच सकती। यानी जोशी की दलील को सुषमा ने खारिज किया। सिर्फ सुषमा नहीं, बीजेपी के कई धुरंधर जोशी के जोश से परेशान। सो अंदरखाने जोशी की सक्रियता पर फिर सवाल उठ रहे। पर कांग्रेस अब भी जोशी की मुरीद। सो शकील अहमद बोले- जोशी अपनी संवैधानिक जिम्मेदारी निभा रहे। अगर बीजेपी का आपस में मतभेद, तो वह जोशी को पीएसी से वापस ले ले। या सुषमा स्वराज खुद इस्तीफा दे दें। अब बीजेपी नेताओं में छिड़े कोल्ड वॉर का कांग्रेस खूब लुत्फ उठा रही। जोशी के साथ हमदर्दी पर खुद कांग्रेस नेता ही चुटकी ले रहे। कोई सोमनाथ चटर्जी से तुलना कर रहा। तो कोई आडवाणी से बदला बता रहा। यों आडवाणी से बदले की बात गले उतरने वाली नहीं। पर सोमनाथ से तुलना सटीक बैठ रही। जब मनमोहन की पहली पारी में एटमी डील ने यूपीए-लेफ्ट का तलाक करवा दिया। तो सोमनाथ चटर्जी ने अपनी पार्टी सीपीएम के कहने पर भी स्पीकर की कुर्सी नहीं छोड़ी। उन ने भी संवैधानिक जिम्मेदारी की दुहाई दी। तब कांग्रेस ने सोमनाथ पर भी वैसा ही भरोसा जताया, जैसा अब जोशी पर जता रही। सो आखिर में सीपीएम ने सोमनाथ चटर्जी को पार्टी से बर्खास्त कर दिया। सोमनाथ ने पार्टी लाइन से हट पद की खातिर इतिहास रच दिया। अब वही काम मुरली मनोहर जोशी कर रहे। जोशी संसद की पीएसी के मुखिया के नाते संवैधानिक जिम्मेदारी निभा रहे। पर बीजेपी उनकी तेजी से मुश्किल में फंसी हुई। जैसे सोमनाथ दादा को यूपीए से लेफ्ट की समर्थन वापसी का फैसला रास नहीं आया था। वैसे ही जोशी को विपक्ष की जेपीसी की मांग रास नहीं आ रही। सो वह पीएसी को ही बेहतर बता रहे। अब सुषमा की यह बात सोलह आने सही- पीएम को बुलाना तो दूर, पीएसी मंत्री को भी नहीं बुला सकती। पर जोशी तो पहले ही कह चुके- यहां पीएम को समन करने जैसी बात ही नहीं। अलबत्ता खुद पीएम ने पेशकश की। तो इस बारे में पीएसी समय आने पर फैसला कर सकती। सो इन हालात में बीजेपी लेफ्ट बनेगी या जोशी सोमनाथ, यह वक्त ही बतलाएगा। पर फिलहाल सिर्फ जोशी ही नहीं, जेठमलानी के बोल भी बीजेपी की पोल खोल रहे। रायपुर की जिला अदालत ने मानवाधिकार कार्यकर्ता डाक्टर विनायक सेन को देशद्रोही बता उम्र कैद की सजा सुना दी। सेन लंबे समय से आदिवासी इलाकों में निस्वार्थ काम करते रहे। पर राज्य सरकार की आंखों में चढ़ गए। सो नक्सली सांठगांठ का आरोप लगा। पर अदालती फैसले ने देश नहीं, दुनिया में भूचाल ला दिया। एमनेस्टी इंटरनेशनल से लेकर दुनिया के नामचीन बुद्धिजीवियों ने फैसले पर सवाल उठाए। पर नक्सलवाद के खिलाफ बंदूक से लडऩे की पक्षधर रही बीजेपी ने फैसले को जायज ठहराया। वैसे भी छत्तीसगढ़ में बीजेपी की सरकार। कांग्रेस ने तो न्यायिक प्रक्रिया का हवाला देकर बीच का रास्ता अख्तियार कर लिया। पर सुषमा ने ट्विट कर सेन के खिलाफ फैसले को तर्कसंगत बताने की कोशिश की। अब बीजेपी की मजबूरी हो या नीति, पर जेठमलानी ने सारी कसर पूरी कर दी। उन ने सेन को उम्र कैद की सजा को वाहियात फैसला करार दिया। ऊपरी अदालत में पैरवी करने का एलान भी। जेठमलानी बोले- सेन के खिलाफ मुकदमे में कोई दम नहीं। सेन की पैरवी करना मेरे लिए सम्मान की बात होगी। पर बीजेपी के सम्मान का क्या होगा? सो बीजेपी ने एक बार फिर जेठमलानी की राय को निजी बताया। राजीव प्रताप रूड़ी बोले- जेठमलानी वकील हैं, किसी का भी मुकदमा लड़ सकते हैं। बीजेपी ने कुछ नहीं कहा। यानी जेठमलानी के आगे बीजेपी फिर नतमस्तक। जबसे बीजेपी की टिकट पर राजस्थान से राज्यसभा सांसद बने। तबसे यह तीसरा मौका, जब बीजेपी को चौराहे पर ले आए। जब बीजेपी ने भारत-पाक विदेश मंत्री स्तर वार्ता के बाद राज्यसभा में एस.एम. कृष्णा को घेरा। तो जेठमलानी ने वेंकैया-जावडेकर की दलील को धता बता कृष्णा की चुप्पी को शिष्टाचार का तकाजा बताया था। बीजेपी ने कश्मीर के वार्ताकार दिलीप पडगांवकर पर उंगली उठाई। तो जेठमलानी ने इसे बचकानी और अशिष्ट हरकत करार दिया। सचमुच जेठमलानी कोई बीजेपी की नीति से प्रभावित होकर नहीं आए। अलबत्ता राज्यसभा की मेंबरी तो गुजरात की फीस समझिए। कुल मिलाकर सर्दी के मौसम में जोशी और जेठमलानी बीजेपी को गर्मी का अहसास दिला रहे।
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28/12/2010

Monday, December 27, 2010

बीजेपी की मुरली, कांग्रेस के मनोहर और जोशी का जोश

 सचमुच समय बड़ा बलवान। कैसे ए. राजा एनडीए राज से यूपीए की दूसरी पारी तक मंत्री रहे। पर वक्त ने ऐसा मुंह मोड़ा, राजा से रंक हो गए। तो दूसरी तरफ बीजेपी में अलग-थलग पड़े मुरली मनोहर जोशी सुर्खियों के सरताज बने। कभी बीजेपी में अटल-आडवाणी-मुरली मनोहर की तिकड़ी हुआ करती थी। पर जोशी के साथ वक्त ने ऐसा दगा किया, अटल-आडवाणी आगे निकल गए। जोशी किनारे पर किताब पढ़ते रह गए। यानी बीजेपी में इतिहास बनने के कगार पर पहुंचे जोशी को इतिहास रचने का मौका मिल गया। सो अब वही मुरली मनोहर कांग्रेस के लिए तो सचमुच के मनोहर हो गए। बीजेपी ने जोशी को पीएसी का अध्यक्ष बनवाया। अब टू-जी स्पेक्ट्रम घोटाले की जांच पीएसी कर रही। पर जोशी को पार्टी की ओर से डिक्टेशन मंजूर नहीं। सो अपने तौर-तरीके से जांच का काम आगे बढ़ा रहे। पर जेपीसी की मांग को लेकर संसद का सत्र ठप कर चुकी बीजेपी में खलबली मची हुई। सो सोमवार को पीएसी की मीटिंग के बाद जोशी ने सफाई दी- सबको मालूम था, अगला पीएसी अध्यक्ष ही स्पेक्ट्रम घोटाले की जांच करेगा। जनवरी 2010 से ही जांच की प्रक्रिया शुरू। सो मैं तो सिर्फ जिम्मेदारी निभा रहा। यानी जोशी की सफाई बीजेपी का दर्द बयां कर रही। सो बीजेपी में आजकल भस्मासुर की कहानी खूब सुनी-सुनाई जा रही। भस्मासुर ने कठोर तपस्या कर भगवान शंकर से वरदान हासिल कर लिया। भोले बाबा ने भलमनसाहत में वरदान दे दिया- जिसके सिर पर हाथ रखोगे, वह भस्म हो जाएगा। बस क्या था, भस्मासुर ने इस वरदान का परीक्षण किसी और पर करने के बजाए भगवान शंकर पर ही करने की ठान ली। सो वक्त ने करवट ली, तो भोले बाबा भागे-भागे विष्णु भगवान के दर पहुंच गए। उसके बाद मोहिनी रूप धर भगवान विष्णु ने क्या किया, सबको मालूम। अब जोशी को भले बीजेपी जो माने, पर अपनी ओर से भस्मासुर कहना उचित नहीं। यों इतना सच जरूर, कांग्रेस मोहिनी रूप धर जोशी को मोह रही। सो सोमवार को पीएसी के कटघरे में सीएजी विनोद राय की पेशी हुई। तो दूसरी तरफ मनमोहन ने जो कांग्रेस अधिवेशन में एलान किया था, वह चिट्ठी में लिख जोशी को भेज दिया। यानी पीएसी चाहे, तो वह पेश होने को तैयार। पर जोशी ने साफ कर दिया- उचित समय पर ही फैसला होगा। यों तकनीकी तौर पर पीएसी को यह अधिकार नहीं। अगर पीएम को बुलाना भी पड़ा, तो स्पीकर की मंजूरी लेनी होगी। पर जोशी ने मीटिंग के बाद अपना इरादा जता दिया, जब कहा- पीएम ने पीएसी की ओर से मांगी गई रपट के मुताबिक पर्याप्त दस्तावेज मुहैया करा दिए हैं। अब हाथ कंगन को आरसी क्या, पढ़े-लिखे को फारसी क्या। कांग्रेस ने तो विपक्ष की जेपीसी की मांग खारिज करते हुए फिर कह दिया- अगर मुरली मनोहर जोशी की क्षमता और दक्षता पर बीजेपी को भरोसा नहीं, तो यह उसकी परेशानी। यानी एनडीए राज में कांग्रेस ने जिन्हें पोंगा पंडित कहा, अब वही ढाल बन गए। कांग्रेस ने तो बोफोर्स ने सबक ले ठान लिया- भले सरकार चली जाए, जेपीसी नहीं बनाएंगे। कांग्रेस की दलील- बोफोर्स के वक्त जेपीसी बना बड़ी गलती की। जिसका विपक्ष ने दो दशक तक फायदा उठाया। पर आखिर में राजीव गांधी कोर्ट से पाक-साफ हुए। यानी कांग्रेस की दो-टूक- जेपीसी पर अतीत का अनुभव ठीक नहीं। सो अब वही भूल नहीं दोहराएंगे। अब मुश्किल बीजेपी की। सो फिर जेपीसी की मांग की। शाहनवाज हुसैन बोले- पीएम कहीं भी जाएं, हमें लेना-देना नहीं। पर जेपीसी के बिना कोई निष्कर्ष नहीं निकल सकता। सुषमा स्वराज ने ट्विटर पर लिखा- जब पीएसी और जेपीसी में फर्क नहीं, तो रूल बुक में अलग-अलग प्रावधान क्यों? पर बीजेपी के एक तीजे नेता की दलील- अगर पीएसी नहीं बुला सकती, तो बिना टर्म एंड रेफरेंस के जेपीसी भी नहीं बुला सकती। अपने जोशी ने तो साफ कह दिया- भले पीएसी का काम सिर्फ अकाउंट की जांच करना, पर किस पॉलिसी की वजह से गड़बड़ हुई, इसकी भी जांच कर सकती। जोशी ने सिर्फ सीएजी की 2003 से दी गई रपट पर ही नहीं, एनडीए काल तक की फाइल खंगालने का इरादा जता दिया। वैसे भी बीजेपी स्पेक्ट्रम घोटाले के जाल में फंसती जा रही। नीरा राडिया के करीबियों में अब अनंत कुमार का भी नाम आ गया। सरकार ने एलान कर दिया- अनंत ने मंत्री रहते नीरा को गोपनीय जानकारी लीक की, इसकी जांच होगी। तब एक कन्नड़ अखबार ने क्लिंटन-मोनिका के संबंधों का हवाला देते हुए राडिया को अनंत की मोनिका बताया था। जिसके खिलाफ अनंत कुमार की पत्नी ने कोर्ट में चुनौती दी थी। सो अब बीजेपी ने तोप में सिर्फ पीएम के नाम के गोले भरने शुरू कर दिए। कांग्रेस और सरकार की आक्रामक रणनीति के जवाब में अब बीजेपी यह भी मंथन कर रही। अगर बजट सत्र तक जेपीसी नहीं बनी, तो सत्र के दौरान पीएम के बॉयकाट का भी दांव खेला जा सकता। यानी सदन में जैसे ही पीएम आएं, कम से कम बीजेपी उठकर चली जाए। सो कांग्रेस-बीजेपी के बीच लेटर वॉर पहले ही शुरू हो चुके। पर कांग्रेस को तो पीएसी रपट का इंतजार। सोमवार को पीएसी में सीएजी विनोद राय से पूछा गया- कैसे 1.76 लाख करोड़ के आंकड़े तक पहुंचे? आकलन 2003 से क्यों किया? सीएजी ने आंकड़े के तीन मापदंड गिना दिए। अब यह आंकड़ा 57,666 करोड़ से 1.76 लाख करोड़ तक हो सकता। पर फिलहाल जोशी ने तो साफ कर दिया, जेपीसी ही सब कुछ नहीं।
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27/12/2010

Friday, December 24, 2010

कलमाड़ी को कल, राजा को रंक बनाने की तैयारी?

तो कलमाड़ी को कल और राजा को रंक बनाने की तैयारी पूरी समझो। शुक्रवार को कॉमनवेल्थ घोटाले में कलमाड़ी के मुंबई, पुणे, दिल्ली ठिकानों पर सीबीआई ने छापे मारे। तो स्पेक्ट्रम घोटाले में पूर्व संचार मंत्री ए. राजा से सीबीआई हैडक्वार्टर में पूछताछ हुई। अर्श से फर्श पर आना इसे ही कहते हैं। एक वक्त था, जब राजा इसी सीजीओ कॉम्प्लेक्स में साइरन बजाती लाल बत्ती वाली गाड़ी के साथ चमचमाते इलैक्ट्रॉनिक्स निकेतन के अपने दफ्तर में पहुंचते थे। पर शुक्रवार को जब सीजीओ कॉम्प्लेक्स के सीबीआई दफ्तर पहुंचे। तो चेहरे पर जबर्दस्ती की मुस्कान छलक रही थी। आखिर ऐसा हो भी क्यों ना, कभी मंत्री के रौब के साथ आते थे। अबके आरोपी बनकर आए। राजा से नौ घंटे की पूछताछ हुई। तो कलमाड़ी से आठ घंटे तक। पर दोनों ने तो सफाई पेश की, व्यवस्था की सारी गंदगी दिखा गए। राजा हों या कलमाड़ी, एक ही दलील- जो भी किया, टॉप बॉस की नॉलेज में। मतलब राजा लंबे समय से कहते आ रहे- टू-जी स्पेक्ट्रम आवंटन में पीएम को भरोसे में लेकर कदम आगे बढ़ाया। अब यही बात कलमाड़ी ने भी कह दी। सीबीआई के छापे ने कलमाड़ी के दिल पर छाप छोड़ दी। सो कलमाड़ी बोले- मैंने अकेले कोई फैसला नहीं लिया। अब कलमाड़ी उवाच का मतलब कोई अनाड़ी भी समझ जाए। कलमाड़ी ने यह नहीं कहा कि उनके हाथों कुछ गलत हुआ। अलबत्ता कॉमनवेल्थ घोटाले में आयोजन के लिए बना समूचा एक्जीक्यूटिव बोर्ड शामिल। यानी सीधे-सीधे पीएमओ पर इशारा। अब आप सीधे-सपाट शब्दों में राजा और कलमाड़ी उवाच का निहितार्थ निकालें। तो मतलब यही- हम सब चोर हैं। सो चोरी की सजा भला किसी एक को क्यों मिले। बीजेपी अध्यक्ष नितिन गडकरी ने तो छलावा करार दिया। शायद महाराष्ट्र प्रेम जाग गया। सो गडकरी का आरोप- कलमाड़ी को बलि का बकरा बनाया जा रहा। वैसे भी कलमाड़ी से अब कांग्रेस ही किनारा कर रही। सो गडकरी सहानुभूति दिखा रहे। पर बात कांग्रेस की, जिसने कलमाड़ी के तेवर देख शुक्रवार को साफ कर दिया, कलमाड़ी अपनी सफाई खुद देंगे। छापों से कांग्रेस कोई राजनीतिक संदेश नहीं देना चाहती, अलबत्ता यह न्यायिक प्रक्रिया का हिस्सा। यानी कलमाड़ी को समझाने की कोशिश, छापे राजनीतिक इशारे पर नहीं डाले गए। पर कलमाड़ी की गर्जना यहीं नहीं थमी। उन ने साफ कहा- कॉमनवेल्थ के आयोजन में कुल जितना खर्च हुआ, उसका महज चार से पांच फीसदी उनकी रहनुमाई वाली आयोजन समिति के जिम्मे था। यानी कलमाड़ी ने तेवर दिखा इशारों में ही सवाल दाग दिया- बाकी 95 फीसदी की जिम्मेदारी भी तय हो। सचमुच कॉमनवेल्थ में कलमाड़ी की भूमिका सिर्फ आयोजन तक सीमित। असली घोटाला तो इन्फ्रास्ट्रक्चर में हुआ, जहां स्टेडियम के पुनरुद्धार पर ही अरबों लुट गए। सडक़ें बार-बार बनाईं-उखाड़ी गईं। सडक़ किनारे हर तीसरे दिन नई टाइल्स बिछती रहीं। कभी गमले में पौधे, तो कभी पौधे में गमले लगाए गए। कभी तेल में गाड़ी, तो कभी गाड़ी में तेल डाले गए। नेहरू स्टेडियम के बाहर ताश के पत्ते की तरह ढहा पुल भला कौन भूल सकता। सो जितनी जिम्मेदारी कलमाड़ी की, उतनी ही दिल्ली की शीला सरकार, जयपाल रेड्डी के शहरी विकास मंत्रालय और एम.एस. गिल के खेल मंत्रालय की भी। पर कांग्रेस की हमेशा यही रणनीति, मछली को जाल में फंसा, मगरमच्छों को छोड़ देती। अगर भ्रष्टाचार के खिलाफ ईमानदार दृष्टिकोण होता। तो राजा पर शिकंजा कसने में तीन साल और कलमाड़ी के घर छापा मारने में महीनों नहीं बीतते। अब राजा-कलमाड़ी की दलील दूरगामी प्रभाव डालने वाली। अगर दोनों आरोपी ही ऐसा कह रहे, तो भला कांग्रेस किस मुंह से विपक्ष को गलत ठहरा रही। विपक्ष के आरोपों में दम नहीं होता, तो संसद सत्र के वक्त सरकार बचाव की मुद्रा में नहीं दिखती। ऐसा भी नहीं कि यूपीए सरकार ने हंगामे में संसद सत्र को खाली-खाली बीत जाने दिया हो। मनमोहन की पहली पारी के शुरुआती दिन याद करिए, जब दागी मंत्री के मसले पर कैसी रार ठनी थी। बिना विपक्ष के बजट पारित हुआ था। सो भले राजा को रंक और कलमाड़ी को बीता हुआ कल बना कांग्रेस खुद को बेदाग साबित करने की कोशिश करे। पर जनता सब कुछ समझती। अब तो कपिल सिब्बल भी सुब्रहमण्यम स्वामी के निशाने पर आ गए। पीएम को पाती लिख अल्टीमेटम दे दिया। सिब्बल को टेलीकॉम मिनिस्ट्री से नहीं हटाया, तो कोर्ट जाएंगे। स्वामी की दलील, सिब्बल के इस विभाग में मंत्री बनने से जांच प्रभावित होंगी। क्योंकि सिब्बल अनिल अंबानी के वकील रह चुके। एक और कंपनी जिसमें दाऊद का पैसा लगा था, उसके भी वकील रह चुके। दोनों कंपनी स्पेक्ट्रम घोटाले की जांच के दायरे में। सो सिब्बल के रहने से जांच निष्पक्ष नहीं कही जा सकती। अब पीएम क्या करेंगे, यह तो मालूम नहीं। पर उन ने शुक्रवार को शरद पवार की खैर-खबर जरूर ली। महाराष्ट्र के सीएम पृथ्वीराज चव्हाण की रहनुमाई में सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल बारिश से फसल के नुकसान पर मुआवजे की मांग लेकर गया था। पर प्याज की बढ़ती कीमत से परेशान पीएम ने प्रतिनिधिमंडल के सामने ही पवार से पूछ लिया। प्याज पर क्या कर रहे? कांग्रेस ने तो मंच से कह दिया- कीमतों पर काबू पाने के लिए जितने उपाय किए, पवार की खैर-खबर भी उसी का हिस्सा। सो सिर्फ भ्रष्टाचार ही नहीं, कांग्रेस का गठबंधन धर्म भी चौराहे पर।
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24/12/2010

Thursday, December 23, 2010

तिवारी ही नहीं, समूची व्यवस्था का डीएनए हो!

तो शुक्रवार को सीबीआई भ्रष्टाचार के राजा की खैर-खबर लेगी। सो गुरुवार को ही कांग्रेस के संकटमोचक प्रणव दा गरजे। संसद का समूचा सत्र ठप करने के लिए देश से माफी मांगे विपक्ष। प्रणव दा स्पेक्ट्रम घोटाले पर बहस के लिए पहले ही विशेष सत्र की पेशकश कर चुके। पर विपक्ष ने टका सा जवाब दे दिया। अब बहस नहीं, जांच और कार्रवाई चाहिए। सो पक्ष-विपक्ष का यह वाचाल तंत्र कहां थमेगा, मालूम नहीं। पर यूपीए सरकार की पोल सहयोगी ही खोल रहे। अब अगर राजा की गिरफ्तारी हुई, तो कांग्रेस-डीएमके दोराहे पर खड़ी होंगी। पर तलवार सिर्फ कांग्रेस-डीएमके के रिश्ते पर ही नहीं, अब तृणमूल कांग्रेस ने भी मोर्चा खोल दिया। बंगाल में केंद्रीय बल के दुरुपयोग से खफा ममता बनर्जी तो नाता तोडऩे की धमकी दे ही चुकीं। गुरुवार को ममतावादी सुदीप बंदोपाध्याय ने कांग्रेस की कलई खोली। बोले- हम सबसे बड़े घटक, पर सरकार हमसे कोई सलाह-मशविरा नहीं करती। हमें मीडिया के जरिए खबरें मिलतीं। कोई न्यूनतम साझा कार्यक्रम नहीं। भले कांग्रेस और तृणमूल के बीच बंगाल चुनाव में सीट बंटवारे को लेकर एक-दूसरे पर दबाव की रणनीति चल रही हो। पर इसमें भी कोई शक-शुबहा नहीं, मौजूदा परिस्थितियों में यूपीए के घटक दल कांग्रेस के रवैये से असहज हो रहे। चुनावी राज्य तमिलनाडु, बंगाल में घटक दल कांग्रेस की कारगुजारियों का नफा-नुकसान तोलने में जुटे हुए। ममता को खास तौर से डर सता रहा, महंगाई और भ्रष्टाचार पर कांग्रेस की रणनीति से बंगाल में रायटर्स बिल्डिंग का सपना अधूरा न रह जाए। सो तृणमूल ने संसद सत्र के वक्त भी जेपीसी की पैरवी की थी। पर कांग्रेस अपनी जिद पकड़े बैठी। सो तृणमूल ने सहयोगी दलों को न पूछने का आरोप लगाना शुरू कर दिया। अब जब गठबंधन ही इतना असहज हो रहा। कांग्रेस अपने घटक दलों की भी नहीं सुन रही। तो सोचिए, जनता की बात क्या खाक सुनेगी? यों सवाल तृणमूल से भी- जब कांग्रेस मान नहीं दे रही, तो अपमान के साथ सत्ता में क्यों बैठी हुई? अब तृणमूल चाहे जो कहे, पर सत्ता की मलाई तो काट ही रही। कांग्रेस की धौंस की राजनीति का शिकार किसी को होना पड़ रहा, तो वह आम आदमी। प्याज की ‘लाली’ ने अब टमाटर को और ‘लाल’ कर दिया। कांग्रेस के एतिहासिक महाधिवेशन की शुरुआत और अंत ने आम आदमी की जेब पर डाका डाला। दूध के बाद प्याज की कीमत रातों-रात इतिहास बनाने निकल पड़ी। तो पहली बार महंगाई से कांग्रेस की आंखों में आंसू आ गए। शायद इसे प्याज की बादशाहत ही कहेंगे, जिसने 24 घंटे के भीतर राहुल गांधी से लेकर पीएम तक को हिला दिया। प्याज दिल्ली में बीजेपी की सरकार को खून के आंसू रुला चुकी। सो कांग्रेस ने ताबड़तोड़ कदम उठाए। तो प्याज की कीमतों में सीधे 30 फीसदी की गिरावट दर्ज हो गई। निर्यात पर रोक, आयात पर सब्सिडी जैसे सरकारी उपायों से जल्द और गिरावट के आसार। सो आप खुद देख लो, अगर कोई भी सरकार नेक नीयत से काम करे। तो आम आदमी लुटा-पिटा या ठगा महसूस नहीं करेगा। पर असल में हुआ क्या। जब प्याज ने आम आदमी को रुलाना शुरू किया, तो कृषि/क्रिकेट मंत्री शरद पवार ने हमेशा की तरह कालाबाजारियों को इशारा कर दिया। अपने शरद पवार जब भी मुंह खोलते, आम आदमी के खिलाफ ही बोलते। चाहे चीनी की कीमत हो या दूध की, जब-जब पवार बोले, कीमतों ने जबर्दस्त छलांग लगाई। अबके पवार ने फौरन कह दिया- तीन हफ्ते तक प्याज की कीमत नीचे नहीं आने वाली। पर पीएमओ हरकत में आया। तो हफ्तों की बात कौन करे, चौबीस घंटे के भीतर कीमतें उलटी दिशा में लौटने लगीं। पर मनमोहन सरकार के बड़बोले मंत्री सिर्फ पवार ही नहीं। पवार के महकमे में जूनियर मंत्री के.वी. थॉमस ने खीझते हुए कहा- मैं कोई जादूगर नहीं, जो बताऊं, कीमत कब कम होंगी। पर गुरुवार शाम होते-होते कृषि सचिव का बयान आ गया। एक हफ्ते में कीमतें नीचे आ जाएंगी। फिर कृषि मंत्रालय के अधीन संस्था नैफेड ने दो-तीन दिन में कीमत कम होने का दावा किया। सो अब आप खुद ही देख लो, एक ही महकमे के चार लोग यानी कृषि मंत्री, कृषि राज्यमंत्री, कृषि सचिव और नैफेड के अधिकारी बोले, पर चारों के अलग-अलग बोल। पर सबसे पते की बात तो दिल्ली की सीएम शीला आंटी ने की। प्याज के दाम से बेदम शीला मीडिया पर भडक़ते हुए बोलीं- कहां बढ़ रहे हैं दाम, आप लोग बढ़ा रहे हो दाम। अब अपनी इस व्यवस्था को क्या कहेंगे आप? अगर भ्रष्टाचार के वार से चोटिल मनमोहन ने प्याज पर दखल न दिया होता। तो प्याज की कीमत में हुई थोड़ी गिरावट भी नहीं होती। सो गुरुवार को ही जब दिल्ली हाईकोर्ट ने कांग्रेस नेता नारायण दत्त तिवारी को डीएनए टेस्ट कराने का आदेश दिया। तो फैसला देख यही लगा- भले देर हो, पर अंधेर नहीं। रोहित शेखर नाम के शख्स ने तिवारी को अपना जैविक पिता बताया। पर तिवारी मानने को राजी नहीं। सो हाईकोर्ट ने कहा- तिवारी संविधान से ऊपर नहीं। नाजायज औलाद को समाज में कैसा दंश झेलना पड़ता, सबको मालूम। संविधान के तहत रोहित को इस बात का हक कि वह अपने जैविक पिता की खोज करे। इसमें निजता की कोई बात ही नहीं। अब भले रोहित शेखर के हित में एन.डी. तिवारी का डीएनए हो जाए। पर सवाल, देशहित में अपनी समूची व्यवस्था का डीएनए क्यों न हो? भ्रष्टाचार और महंगाई चरम पर। फिर भी प्याज ने यह साफ कर दिया। अगर सरकार सही सोच व ईमानदारी से काम करे, तो क्या नहीं हो सकता।
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23/12/2010

Wednesday, December 22, 2010

तो भ्रष्टाचार पर राजनीति की अपनी-अपनी रणनीति

अब तो प्याज महंगा हो गया। शरद पवार ने जैसे ही मुंह खोला, प्याज रुलाने लगी। कांग्रेस की हालत खराब हो गई। महाधिवेशन जिस दिन शुरू हुआ था, उस दिन दूध की कीमत बढ़ी थीं। अब खत्म हो गया, तो प्याज दम निकाल रहा। सो अपने राहुल गांधी ने पवार-तवार को छोड़ सीधे पीएम पर जिम्मेदारी डाल दी। लाग-लपेट के बिना कह दिया- पीएम इस समस्या का समाधान ढूंढ लेंगे। अब सरकार प्याज बेचे या तेल, जनता तो कड़ाही में प्याजी की तरह भुन रही। सो महंगी प्याज के मारे राजनीतिक दल भ्रष्टाचार पर फिलहाल सिर्फ जूते बरसा रहे। कांग्रेस ने तीन दिन के महाधिवेशन में बीजेपी के भ्रष्टाचार पर जूते बरसाए। तो संसद के बाद बुधवार से विपक्ष ने सडक़ों पर यही काम शुरू कर दिया। पर बीजेपी-कांग्रेस के बीच शुरू भ्रष्टाचार के महासंग्राम से पहले बात अपने राजस्थान में मचे उपद्रव की। गहलोत सरकार को हाईकोर्ट से राहत नहीं मिली। कोर्ट ने गुर्जरों के पांच फीसदी आरक्षण पर साल भर की रोक लगा दी। नए सिरे से सर्वे कराने के निर्देश दिए। अब सरकार के पास सुप्रीम कोर्ट जाने का विकल्प। पर गुर्जर समाज ने हाईकोर्ट में समुचित पक्ष नहीं रखने का आरोप सरकार के सिर मढ़ दिया। बाकायदा आंदोलन को और तेज करने का एलान हो गया। सो अब साल 2010 के बाकी बचे नौ दिन में क्या-क्या होगा। क्या देश आंदोलन की आग में झुलस कर ठहर जाएगा। या फिर जल्द किसी समाधान की उम्मीद? सचमुच 2007 से ऐसा कोई साल नहीं बचा, जब राजस्थान गुर्जर आंदोलन की आग में न झुलसा हो। साल 2010 में उम्मीद नहीं थी। पर जाते-जाते उम्मीद पर पानी फिर गया। सो सडक़ से संसद तक साल 2010 ने सिर्फ संकट पैदा किया। लालकृष्ण आडवाणी ने तो बुधवार को एलान भी कर दिया- साल 2010 घोटालों का वर्ष रहा। पर उन ने पीएम को फार्मूला भी सुझाया- अगर जेपीसी मान लो, तो घोटालों का वर्ष नहीं कहेंगे। यों एनडीए की महासंग्राम रैली के दोनों तरफ साल के दस घोटाले बैनर-पोस्टर चस्पा थे। बीजेपी ने तो बाकायदा घोटालों का वर्ष 2010 नाम से पुस्तिका भी जारी कर दी। जिसमें चालू वर्ष के दस घोटाले गिनाए। जरा आप भी देख लें। टू-जी स्पेक्ट्रम, कॉमनवेल्थ, आदर्श सोसायटी, सड़ा अनाज, मुद्रास्फीति, चावल आयात, जनवितरण प्रणाली, सीवीसी की नियुक्ति, आईपीएल, एलआईसी हाउसिंग लोन और सत्यम घोटाला। सो बीजेपी ने अब कहना शुरू कर दिया- कांग्रेस का हाथ घोटालों के साथ। एनडीए की रैली में अरुण जेतली महफिल लूट ले गए। उन ने पीएम को चुनौती दी- अगर सच छुपाना नहीं चाहते, तो जेपीसी का सामना करें। वरना कुर्सी छोड़ दें। यानी विपक्ष ने अब राजा-राडिया को छोड़ सारा फोकस पीएम पर कर दिया। आडवाणी ने तो एलान कर दिया- अब विपक्ष के इस अभियान में मनमोहन ही हमारे निशाने पर होंगे। रैली में आडवाणी का दर्द भी उभर आया, जब उन ने 2009 के लोकसभा चुनाव की याद ताजा की। बोले- जब 2009 में मैंने कहा था, मनमोहन कमजोर पीएम। तो मेरे साथियों ने एतराज जता ईमानदार बताया था। पर आज साबित हो रहा, पीएम का पद कमजोर नहीं, अलबत्ता उस पद पर बैठा व्यक्ति कमजोर। जो हर अहम फैसले के लिए दस जनपथ की ओर निगाह जमाए बैठता। आडवाणी ने लगे हाथ पीएम को सलाह भी दी- पीएम पद की शक्तियों को इस्तेमाल कर जेपीसी बनाएं। अकाली रतन सिंह अजनाला ने तो यहां तक कह दिया- मनमोहन सिंह ऐसे पीएम, जिनकी कुर्सी के नीचे सारे लुटेरे बैठे हुए। यानी पीएसी के सामने सफाई देने की पेशकश कर मनमोहन ने विपक्ष को घेरने का मौका दे दिया। यों मुरली मनोहर जोशी की रहनुमाई वाली पीएसी 27 दिसंबर को तय करेगी, पीएम को बुलाना है या नहीं। पर कांग्रेस की नजर में पीएम का पीएसी वाला दांव एक साहसिक कदम। दिग्विजय सिंह तो सोमवार को ही इसे मास्टर स्ट्रोक बता चुके। सो बुधवार को जब एनडीए ने महासंग्राम के मंच से सीधा पीएम के खिलाफ बिगुल फूंका। तो कांग्रेस प्रवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने आरोप का जवाब देने के बजाए पलटवार किया। बोले- बीजेपी यानी बंगारू-जूदेव पार्टी को भ्रष्टाचार विरोधी रैली का नैतिक हक नहीं। जिस पार्टी ने भ्रष्टाचार में मील के पत्थर बनाए, जिस पार्टी का अध्यक्ष रिश्वत लेते पकड़ा गया, वह पार्टी भला क्या बात करेगी। यानी राजनीति में भ्रष्टाचार की फिर वही कहानी। भ्रष्टाचार के हमाम में सभी राजनीतिक दल एक जैसे। सो खुद को देखने के बजाए दोनों पक्ष एक-दूसरे को नंगा बता मखौल उड़ा रहे। बीजेपी की रणनीति, अगर राजा जेल गए, तो मुद्दा ठंडा पड़ जाएगा। सो सीधे पीएम को निशाना बनाओ। ताकि बजट सत्र तक मुद्दा जिंदा रखा जा सके। पर कांग्रेस की रणनीति कुछ अलग। भले देखने में कांग्रेस के बयान हताशा भरे लग रहे हों। पर रणनीतिकारों की मानें, तो पलटवार की मजबूत वजह। पिछले लोकसभा चुनाव में तमाम अटकलों को विराम देते हुए कांग्रेस ने 206 सीटें हासिल कीं। तो जीत के पीछे नरेगा जैसी महत्वाकांक्षी सामाजिक योजना अहम फैक्टर रहीं। सो अब कांग्रेस का मानना यही- नरेगा, सूचना का हक, शिक्षा का हक और अब भोजन का हक देने की तैयारी। सो सामाजिक योजनाओं से जमीनी स्तर पर कांग्रेस मजबूत हुई और होगी। इसलिए विपक्ष के आरोपों का मुंहतोड़ जवाब देते हुए उन योजनाओं पर ही फोकस किया जाए। यानी भ्रष्टाचार पर कांग्रेस की आक्रामकता योजनाबद्ध रणनीति का हिस्सा। तो बीजेपी को बोफोर्स दोहराने की उम्मीद।
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22/12/2010