Friday, March 25, 2011

हंगामा हुआ, बहस भी, पर निचोड़ क्या निकला?

वल्र्ड कप फाइनल से पहले संसद के बजट सत्र का परदा गिर गया। आखिरी दिन भी संसद हंगामे से अछूती नहीं रही। कॉमनवेल्थ घोटाले पर पीएम की बनाई वी.के. शुंगलू कमेटी ने रपट दी। तो अब कलमाड़ी संग शीला-खन्ना की भी कलई खुल गई। सो शुक्रवार को संसद के दोनों सदनों में शीला के इस्तीफे, तो उपराज्यपाल तेजेंद्र खन्ना पर कार्रवाई की मांग हुई। लोकसभा में खुद आडवाणी ने मोर्चा संभाला। सरकार से फौरन रपट सदन में पेश करने की मांग की। यों कहावत है- भागते भूत की लंगोटी ही सही। पर सरकार ऐसे भागी, लंगोटी भी हाथ में न आने दी। दोनों सदन दोपहर होते-होते अनिश्चितकाल के लिए स्थगित हो गए। पर पहले संसदीय कार्यमंत्री ने विपक्ष से थोड़ा समय मांग लिया। यानी अब मानसून सत्र तक के लिए सरकार सुकून में। पर बजट सत्र की शुरुआत शीत सत्र के काले साये के साथ हुई। सरकार ने जेपीसी तो बना दी। पर अब जाते-जाते शुंगलू रपट ने विपक्ष को सडक़ की लड़ाई का मुद्दा थमा दिया। सच कहें, तो कॉमनवेल्थ का असली खेल तो अब शुरू हुआ। शुंगलू रपट का इशारा देखें, तो कॉमनवेल्थ के हमाम में सब एक जैसे। क्या कलमाड़ी, क्या तेजेंद्र खन्ना और क्या मैडम शीला। कलमाड़ी पर शिकंजा तो सीबीआई पहले ही कस चुकी। पर सीबीआई डाल-डाल, तो कलमाड़ी पात-पात निकले। कागजों में ऐसा कॉमनवेल्थ गेम खेला, सीबीआई चकरघिन्नी हो रही। हर फैसले में कलमाड़ी ने शीला सरकार और मनमोहन सरकार के मुलाजिमों की हरी झंडी ली। फिर अपने दस्तखत किए। सो सीबीआई के अधिकारी कलमाड़ी की फाइल देख आजकल सिर पर झंडू बाम लगा रहे। पर कॉमनवेल्थ की सफलता की शेखी बघारने वाली शीला और शीला की शिकायत करने वाले तेजेंद्र अब क्या करेंगे? सही मायने में कॉमनवेल्थ घोटाले की जांच में जुटीं कंपनियां अब आयोजकों को मैडल थमा रहीं। सो सच से परदा उठ गया, पर क्या कांग्रेस सच का सामना करेगी? यों जब लोकायुक्त की सिफारिश के बाद दिल्ली का एक मंत्री राजकुमार चौहान तक नहीं हटाया गया। तो सीएम शीला को हटाने की उम्मीद कांग्रेस से कैसे की जा सकती? पर आखिरी दिन सिर्फ शुंगलू रपट नहीं, विकीलिक्स ने भी एक नया धमाका किया। देश की एकता और अक्षुण्णता शपथ लेने वाले केंद्रीय मंत्री कैसी सोच रखते, साफ हो गया। गृहमंत्री पी. चिदंबरम ने अमेरिकी अधिकारियों से बातचीत में कहा था- अगर उत्तर भारत न होता, तो हमारा देश तेजी से विकास करता। यानी चिदंबरम बाल ठाकरे, उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे के सगे निकले। पर चिदंबरम भूल गए, जिस राज्य से वह खुद आते, वहीं से घोटालों के महाराजा ए. राजा भी आते। पर नेताओं में यही कमी, कभी अपने गिरेबां में नहीं झांकते। चिदंबरम की ऐसी सोच कोई नई नहीं। कॉमनवेल्थ से पहले भी दिल्ली वालों को डंडे के जोर पर सुधारने का दंभ भर चुके। सो संसद में चिदंबरम खास तौर से लालू-मुलायम का निशाना बने। चिदंबरम के इस्तीफे की मांग हुई। पर बीजेपी ने सिर्फ एतराज जता चिदंबरम को बख्श दिया। सो सत्र के समापन पर दोनों सदनों के पीठासीन अधिकारियों ने संतोष जताया। कहा- शीत सत्र के मुकाबले बजट सत्र में कुछ तो काम हुआ। पर सरकार और विपक्ष जमकर अपनी पीठ ठोक रहीं। सत्र समापन के बाद सुषमा, जेतली ने चार अहम सफलताएं गिनाईं। जिनमें जेपीसी का गठन, सीवीसी थॉमस का मामला, जनहित के मुद्दे और आक्रामकता के साथ-साथ विपक्ष की सकारात्मक सोच भी शामिल। सुषमा बोलीं- बजट सत्र में सिर्फ राजनीतिक ही नहीं, जनहित के मुद्दे भी खूब उठे। जैसे सोमालिया लुटेरे, अमेरिका ट्राइवेली यूनिवर्सिटी में भारतीय छात्रों के पैरों में रेडियो कॉलर, तमिल मछुआरों की सुरक्षा आदि। पर क्या चुनाव की खातिर सिकुड़े संसद सत्र से सचमुच जनता का भला हुआ? संसद में हंगामा हुआ, बहस भी हुई। पर निचोड़ क्या निकला? विपक्ष ने सरकार को घेरने की कोशिश की। फिर वोट के बदले नोट कांड की बहस में पीएम की खरी-खरी सुननी पड़ी। पर अगले दिन ही पेंशन बिल पेश करने में घिरी सरकार को बचा लिया। अब सत्र निपट गया। तो अरुण जेतली ने भड़ास निकाली। पीएम ने कहा था- आडवाणी पीएम पद पर जन्मसिद्ध अधिकार मानते थे। इसलिए वह मुझे माफ नहीं कर पा रहे। पर अब जेतली ने चुटकी ली- मनमोहन का बयान कहीं पे निगाहें, कहीं पे निशाना। जेतली के मुताबिक पीएम ने भले आडवाणी का नाम लिया। पर उनका इशारा गांधी-नेहरू खानदान की ओर था। सो जेतली की चतुर चाल से संसदीय कार्य मंत्री पवन बंसल सोच में पड़ गए। खीझते हुए बोले- जेतली ही जानें, वह क्या कहना चाहते हैं। यानी समझ कर भी बंसल ने नासमझी का ढोंग रचा। पर पक्ष-विपक्ष की तू-तू, मैं-मैं तो चलती रहेगी। सो बात संसद सत्र से मिले संदेश की। भ्रष्टाचार के मुद्दे के साथ सत्र की शुरुआत हुई। आखिर जेपीसी का गठन हो गया। पर समूचे सत्र से भ्रष्टाचार पर देश को कोई कठोर संदेश नहीं मिला। अलबत्ता पक्ष हो या विपक्ष, सब एक-दूसरे का अतीत खंगालने और कपड़े उतारने में ही लगे रहे। अपने-अपने वोट बैंक को ध्यान में रख सबने मुद्दे उठाने की कोशिश की। आखिर में जेपीसी बनाम पीएसी जंग छिडऩे की नौबत। यानी फिर वही पुराने सवाल- संसद की प्रासंगिकता क्या रह गई। संसदीय मूल्यों में लगातार गिरावट, पर किसी को फिक्र नहीं।
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25/03/2011

Thursday, March 24, 2011

जेपीसी बनाम पीएसी और चुनावी चोंचलेबाजी

राजस्थान विधानसभा का सत्र तय मियाद से पहले खत्म क्या हुआ। समूचा विपक्ष वसुंधरा राजे की रहनुमाई में दिल्ली कूच कर गया। राष्ट्रपति, लोकसभा स्पीकर के सामने अलख जगाई। पर होना-जाना कुछ नहीं। संसद हो या विधानसभाएं, सत्तापक्ष अपनी बपौती समझता। चाहे सत्ता में कोई भी राजनीतिक दल हो। तभी तो राजनीतिबाज आमजन का भरोसा खोते जा रहे। सत्ताधारी सत्र का इस्तेमाल महज संवैधानिक खानापूर्ति के लिए करते। तो विपक्ष खुद को एक्टिव साबित करने के लिए। पर सत्र में किसकी कितनी रुचि, इसका नमूना गुरुवार को लोकसभा में दिख भी गया। अपने नमोनारायण मीणा ने पेंशन निधि विनियामक और विकास प्राधिकरण बिल पेश किया। तो लेफ्ट ने मत विभाजन की मांग कर दी। पर सदन में सत्तापक्ष और विपक्ष की बैंचें खाली पड़ी थीं। सो संसदीय कार्य मंत्री पवन बंसल के तो हाथ-पांव फूल गए। स्पीकर मीरा कुमार ने मत विभाजन की मांग मान प्रक्रिया शुरू कर दी। तो बंसल प्वाइंट ऑफ आर्डर उठा लाए। नियम 72 के तहत विरोध को गलत ठहराया। पर दोनों पक्षों की करीब दस मिनट चली नोंकझोंक में कांग्रेस ने सांसदों को सदन में बुला लिया। फिर आरजेडी के रघुवंश बाबू ने बंसल के प्वाइंट ऑफ आर्डर को गलत बताया। क्योंकि स्पीकर की ओर से अनुमति के बाद ऐसा करना नियम के अनुकूल नहीं था। सो आखिर में स्पीकर ने अनुमति दी। मतविभाजन हुआ, तो 43 के मुकाबले 115 मतों से बिल पेश हो गया। पर आप चौंकिए मत, लोकसभा में सांसदों की संख्या सिर्फ 158 ही नहीं। रिकार्ड के मुताबिक 543 सांसद। पर सांसदों की जनहित में रुचि दोपहर बाद तब दिखी, जब अपनी नजर मोटेरा के सरदार पटेल स्टेडियम में हुए क्रिकेट मैच पर पड़ी। सत्तापक्ष और विपक्ष के कई माननीय सांसद भारत-आस्ट्रेलिया के क्वार्टर फाइनल मैच की विशेष दर्शक दीर्घा में दिखे। सो न संसद, न देश की फिक्र। जाट आंदोलन थमने का नाम नहीं ले रहा। पर अदालतें सक्रिय, तो सरकार खामोश बैठी हुई। अब अपने नेताओं से कोई पूछे- जब आरक्षण नहीं दे सकते, तो चुनावी चोंचलेबाजी करते क्यों हो? ऐसे नेताओं को तो चुनाव प्रचार में सेंटर फ्रैश च्वइंगम खिलाकर भेजना चाहिए। ताकि जुबान बंद रख सकें। चुनावी चोंचलेबाजी ने ही अपने राजस्थान में चार बार गुर्जर आंदोलन करा दिए। पर नेताओं की जुबां है कि मानती नहीं। अब पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव हो रहे। तो गुरुवार को तमिलनाडु के दोनों बड़े दलों ने चुनावी वायदे किए। करुणानिधि ने कालेज के पहले वर्ष के छात्रों को लेपटॉप देने का बात की। तो जयललिता ने 11वीं क्लास में ही लेपटॉप का वादा कर दिया। मुफ्त पंखे, मिक्सर, ग्राइंडर और गरीबों को मिनरल वाटर देने का भी वादा। जयललिता ने भले खुद शादी नहीं की। पर सत्ता में आईं, तो गरीब महिला मतदाताओं को चार ग्राम सोने का मंगल सूत्र देंगी। करुणा-जया ने और भी कई वादे किए। पर क्या ऐसे वादे वोट को खरीदने की कोशिश नहीं? अपनी नजर में यह न सिर्फ वोट खरीदना, अलबत्ता गरीबी और लोकतंत्र से भद्दा मजाक। पिछले चुनाव में करुणा ने कलर टीवी का वादा किया। सत्ता में आकर टीवी तो बंटवाया। पर गरीबों ने टीवी लेकर वापस दुकान में सस्ते दाम पर बेच दिए। क्योंकि उनके पास केबल के पैसे नहीं, बिजली उपलब्ध नहीं। सो टीवी रख अपनी गरीबी का उपहास क्यों बनाएं। अब जब लोकतंत्र के मंदिर में सांसद-विधायक बिकने लगे। तो वोटर को खरीदने की कोशिश क्यों नहीं होगी। चुनाव सुधार की बातें तो खूब होतीं। पर जो बात सभी राजनीतिक दलों को नुकसान पहुंचाए, उसे लागू ही नहीं करते। सनद रहे, सो बताते जाएं। राष्ट्रीय मोर्चा की सरकार के वक्त विधि मंत्री दिनेश गोस्वामी की अध्यक्षता में चुनाव सुधार कमेटी बनी थी। मई 1990 में गोस्वामी कमेटी ने करीब तीन दर्जन से अधिक सुझाव दिए। पर उनमें से दो दर्जन सिफारिशें कभी लागू नहीं हुईं। इन्हीं सिफारिशों में एक थी- सभी चुनावी मुद्दों की जांच के लिए संसद की स्थायी समिति गठित हो। पर राजनीतिक दलों ने इस सुझाव को ठंडे बस्ते में डाल दिया। सो अब मंगल सूत्र भी चुनावी हो गया। गरीब को मिनरल वाटर का सपना दिखाया जा रहा। पर किसको कोसें और किसकी सराहना करें। राज्य से केंद्र तक सब एक ही थाली के चट्टे-बट्टे। भ्रष्टाचार, महंगाई राजनीति का मुद्दा बनकर रह गईं। गुरुवार को टू-जी घोटाले पर बनी जेपीसी की पहली मीटिंग हुई। तो अध्यक्ष पी.सी. चाको ने वही कहा, जो जेपीसी गठन के वक्त कांग्रेस दबी जुबान से कह रही थी। यानी जेपीसी में बीजेपी कोटे से पूर्व मंत्री यशवंत-जसवंत-हरेन पाठक को लेकर एतराज। अब चाको लोकसभा स्पीकर से मिल इन तीनों को हटाने की मांग करेंगे। कांग्रेस तो तभी मांग करने वाली थी। पर सीवीसी थॉमस के मुद्दे ने मजबूर कर दिया था। कांग्रेस को डर, जेपीसी में बीजेपी के दबंगों के सामने अपने मेंबर दब्बू न रह जाएं। पर कांग्रेस तो नहीं, अब जेपीसी के मुखिया चाको ने वही बात की। लगे हाथ मुरली मनोहर की रहनुमाई वाली पीएसी को दायरे में रखने की भी मांग होगी। सो मुश्किल में कांग्रेस। जिस पीएसी और जोशी की सराहना करते नहीं थकती थी, अब क्या कहेगी? चाको की दलील- संसद की दो कमेटी एक ही जांच नहीं कर सकतीं। यानी अब संसदीय कमेटी में सिविल वार की नौबत। संसद में कमेटियां भिड़ रहीं, तो चुनावी मैदान में नेताओं की चोंचलेबाजी चालू आहे।
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24/03/2011

Wednesday, March 23, 2011

तो शे‘रबाजी में गीदड़ ही दिखा लोकतंत्र!

तेईस मार्च 1931 को भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को अंग्रेजों ने फांसी पर लटका दिया। भगत सिंह को फांसी 24 मार्च को दी जानी थी। पर उनके इंकलाब का खौफ अंग्रेजों पर इतना था। एक दिन पहले ही चुपके से फांसी पर चढ़ा दिए। अंग्रेजों को आभास हो गया था, गर तय समय पर फांसी हुई। तो लोगों की भीड़ अंग्रेजी हुकूमत के लिए खतरा बन जाएगी। बुधवार को अपनी संसद ने 80वें शहादत दिवस पर भगत, राजगुरु, सुखदेव को श्रद्धांजलि दी। पीठासीन अधिकारियों ने शहीदों से प्रेरणा लेने की नसीहत दी। पर आजकल स्वाधीनता सेनानी सिर्फ जयंती और पुण्य तिथि के दिन ही याद किए जाते। प्रेरणा तो लोग अब राडियाओं, राजाओं, कलमाडिय़ों से लेते। हर कोई जल्द से जल्द टाटा, बिड़ला, अंबानी बनने का ख्वाब देखता। संसद ने बुधवार को शहीद त्रिमूर्ति का स्मरण किया। तो भूल गए, भगत सिंह ने फांसी से पहले क्या कहा था। उन ने कहा था- ‘अंग्रेजों के बाद जो हम पर राज करेंगे। वह भी देश को लूटेंगे। सो मैं फिर पैदा होऊंगा।’ सचमुच युवा अवस्था में ही भगत सिंह ने देश की बुढ़ाती व्यवस्था का चेहरा भांप लिया था। आज व्यवस्था में करीब-करीब हर कोई तभी तक ईमानदार, जब तक बेईमानी का मौका नहीं मिलता। पर अफसोस, कोई अपने घर में भगत सिंह नहीं चाहता। सो अपनी व्यवस्था महज ड्रामा बनकर रह गई। जब चाहे जो अपनी ढपली बजा जाता। अब बुधवार को वोट के बदले नोट कांड पर अपने प्रकांड नेताओं ने खूब भाषणबाजी की। पर कोई निचोड़ नहीं निकला, अलबत्ता मनमोहन ने अपनी बात दोहरा दी- निचुड़े हुए नींबू को और मत निचोड़ो। देश में बहुतेरे मुद्दे, जिनकी चिंता करने की जरूरत। विपक्ष पश्चिम एशिया के देशों में चल रहे संघर्ष पर चर्चा करे, न कि विकीलिक्स के खुलासे पर। यानी विकीलिक्स की पुष्टि को पीएम ने फिर धता बता दिया। बहस के बीच में संसदीय कार्यमंत्री पी.के. बंसल ने तो विकीलिक्स को साइबर आतंकवाद से जोड़ दिया। राज्यसभा में होम मिनिस्टर पी. चिदंबरम ने वोट के बदले नोट कांड के वक्त हुए स्टिंग ऑपरेशन की जांच पर विशेष जोर दिया। चिदंबरम बोले- स्टिंग ऑपरेशन की योजना एक राजनीतिक दल (बीजेपी) ने बनाई थी। जो अपने सांसदों के लिए खरीददार की तलाश में था, ताकि स्टिंग को अंजाम दिया जा सके। यानी अब भी वोट के बदले नोट कांड से परदा उठाने की कोई बात नहीं। अलबत्ता पीएम हों या चिदंबरम, पूरे प्रकरण को ही गलत बता रहे। पर सवाल- जब लेफ्ट ने समर्थन खींच लिया था। तब 22 जुलाई के विश्वास मत से पहले 14 जुलाई को ही सीपीआई के महासचिव ए.बी. वर्धन ने खुलासा किया- मनमोहन एक-एक सांसद को खरीदने में जुटे। सांसद घोड़े बन चुके। मंडी में एक-एक घोड़े की कीमत 25-25 करोड़ रुपए लग रही। सचमुच एक-एक वोट की जुगाड़ में मनमोहन सरकार जुटी हुई थी। जेल में बंद सांसदों की तो जुलाई 2008 में समझो मौज आ गई। अब भले मनमोहन-चिदंबरम जुलाई 2008 के विश्वास मत को बहुमत बताएं। पर सनद रहे, सो याद दिलाते जाएं। मनमोहन सरकार के ही मंत्री रामविलास पासवान ने 18 जुलाई 2008 को कहा था- 272 का जादुई आंकड़ा दोनों में से किसी के पास नहीं, यही ईमानदारी की बात। अब कोई पूछे- फिर विश्वास मत में बहुमत का आंकड़ा कैसे जुटा? जिन विपक्षी सांसदों ने पलटूराम की उपाधि धारण की, क्या यों ही? गुरुदास दासगुप्त ने तो साफ कहा- संसदीय लोकतंत्र के इतिहास में यह एक अभूतपूर्व घटना, जब विश्वास मत के दौरान विपक्ष के कई सांसद गैर-हाजिर रहे। शरद यादव ने भी कहा- अखबार ने क्या लिखा, उस पर नहीं जाऊंगा। पर जिस तरह से 19 सांसदों ने पाला बदला था, मैंने अपनी आंखों से देखा। मेरी पार्टी के भी दो सांसद थे। जिनमें एक धन के लालच में, तो दूसरा टिकट के लालच में पलटी मार गया। सो बहुमत के लिए नोट का खेल हुआ, इसे कोई दिल से इनकार नहीं कर सकता। सो बहस के दौरान सुषमा स्वराज ने मनमोहन पर खूब तीर चलाए। बोलीं- पीएम अपनी भलमनसाहत का सहारा लेकर दूसरों पर ठीकरा फोड़ते हैं। देश में महंगाई, तो शरद पवार, कॉमनवेल्थ घोटाला, तो कलमाड़ी, टू-जी घोटाला, तो राजा जिम्मेदार। और जहां कुछ नहीं पता, वहां गठबंधन की मजबूरी। सो अब पीएम के बहानों से जनता तंग आ चुकी। अब लोग पूछ रहे- पीएम पद पर बने रहने की क्या मजबूरी है? सुषमा ने शायराना अंदाज में पीएम के जमीर को ललकारा। बोलीं- न इधर-उधर की तू बात कर, ये बता कि काफिला क्यों लुटा? हमें रहजनों से गिला नहीं, तेरी रहबरी का सवाल है। पर पीएम ने बुधवार को भी नया पेंतरा ढूंढ लिया। विपक्ष ने संसदीय जांच रपट के आधार पर झूठा बताया, तो पीएम ने बुधवार को इसका ठीकरा पूर्व स्पीकर सोमनाथ चटर्जी के सिर फोड़ दिया। बोले- जांच कमेटी की रिपोर्ट के बाद 16 दिसंबर 2008 को सदन में सोमनाथ ने जो बात कही, मैंने वही कहा। पर पीएम ने चतुराई दिखाई। सुषमा ने पीएम पर तीर चलाए थे। तो पीएम ने सीधे आडवाणी की दुखती रग पर हाथ रख दिया। बोले- आडवाणी को विश्वास था कि पीएम बनना उनका जन्मसिद्ध अधिकार है। सो उन ने मुझे इस बात के लिए कभी माफ नहीं किया कि मैं पीएम हूं। आखिर में सुषमा की शायरी पर पीएम ने भी शे‘र मारा- माना कि तेरी दीद के काबिल नहीं हूं मैं, तू मेरा शौक तो देख, मेरा इंतजार तो देख। पर शे‘र-ओ-शायरी के बीच समूची बहस का निचोड़ क्या निकला। मुद्दे वहीं रह गए। यानी शे‘रबाजी में लोकतंत्र को गीदड़ बना दिया।
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23/03/2011

Tuesday, March 22, 2011

पक्ष-विपक्ष की ‘प्रतिष्ठा’ में पिस रहा आम आदमी

विकीलिक्स के बवाल से कांग्रेस-बीजेपी दोनों कटघरे में। उधर वोट के बदले नोट कांड पर पीएम की सफाई को जूलियन असांज ने भी नकार दिया। अपने केबल को सबूतों के आधार पर पुख्ता बताया। तो इधर विपक्ष ने मंगलवार को भी सरकार की नाक में दम कर दिया। राज्यसभा तो दोनों पक्षों की जिद के आगे निढाल हो गई। पर लोकसभा की कार्यवाही रेंग-रेंग कर चली। वह भी तब, जब सरकार की जिद को देख विपक्ष ने सदन से वाकआउट कर दिया। सो बिना विपक्ष ही वित्त विधेयक पर चर्चा शुरू हो गई। विपक्ष ने भी एलान कर दिया- जब तक पीएम के बयान पर अल्पकालिक चर्चा नहीं होती, सदन की कार्यवाही में हिस्सा नहीं लेंगे। विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज बोलीं- हमने वाकआउट कर अपना विरोध दर्ज करा दिया। पर मंगलवार को पक्ष-विपक्ष के बीच की नोंकझोंक किसी बचकानेपन से कम नहीं। रार सिर्फ इस बात को लेकर ठनी, पहले पीएम के बयान पर अल्पकालिक बहस हो या वित्त विधेयक पर चर्चा। विपक्ष की अपनी दलील, तो सरकार के लिए सबसे महत्वपूर्ण वित्त विधेयक। सो प्रणव मुखर्जी ने सदन की बैठक से पहले ही सुषमा स्वराज को फोन किया। पर सुषमा नहीं मानीं। फिर सदन में प्रणव-सुषमा के बीच दलीलों का दौर चला। आखिर सदन की कार्यवाही रोकनी पड़ी। फिर सुषमा ने प्रणव दा को फोन घुमाया। फार्मूला सुझाया- अगर लोकसभा में वित्त विधेयक, तो राज्यसभा में पीएम के बयान पर बहस होने दें। ताकि विपक्ष को सरकार पर एतबार हो जाए। विपक्ष को आशंका, पहले वित्त विधेयक पारित हो गया, तो सरकार पीएम के बयान पर बहस को राजी नहीं होगी। अब अगर विपक्ष की आशंका को सच भी मान लें, तो सवाल- हंगामे का क्या मतलब? मंगलवार को वित्त विधेयक पर चर्चा शुरू हो गई। विकीलिक्स के खुलासे पर बहस इसके बाद ही होगी। यानी संसद में पक्ष-विपक्ष की लड़ाई अब सिर्फ प्रतिष्ठा से जुडक़र रह गई। हर मुद्दे पर दोनों के बीच प्रतिष्ठा आड़े आ जाती। पर बात विकीलिक्स की। तो मुश्किल में बीजेपी। एटमी डील पर बीजेपी के दोहरेपन का खुलासा हुआ। तो अब विकीलिक्स ने गुजरात के सीएम नरेंद्र मोदी को लेकर अमेरिका के दोहरेपन को जगजाहिर कर दिया। जब यूपीए की ताजा-ताजा सरकार बनी थी। अपने नटवर सिंह टीम मनमोहन के विदेश मंत्री हुआ करते थे। तब प्रवासी गुजरातियों के कार्यक्रम में नरेंद्र मोदी को बतौर चीफ गेस्ट जाना था। पर अमेरिका ने नरेंद्र मोदी को न तो कूटनीतिक वीजा दिया, ना ही निजी। गुजरात दंगे की छाप को अमेरिका ने वीजा न देने का आधार बनाया। तब कांग्रेस दो घंटे तक ऊहापोह में रही। संसद का सत्र चल रहा था। पर सरकार सोच नहीं पा रही थी, मोदी का बचाव करे या अमेरिका का विरोध। सरकार की ऊहापोह ने विपक्ष को हमलावर होने का मौका दे दिया। तब जाकर होश में लौटी मनमोहन सरकार ने अमेरिका के सामने विरोध जताया। क्योंकि सवाल नरेंद्र मोदी का नहीं, भारत के एक प्रांत के निर्वाचित सीएम के अपमान से जुड़ा था। पर अपनी राजनीति की यही विडंबना, हर मामले में वोट बैंक जुड़ जाता। अब जिस अमेरिका ने मोदी को वीजा नहीं दिया था। वही अमेरिका कितना डरा-डरा सा था, इसका खुलासा विकीलिक्स के जरिए हो गया। बाकायदा अमेरिका ने मोदी की जासूसी कराई। मोदी के ताकतवर होने का अहसास हुआ। सो दूतावास के जरिए संबंध सुधारने की कोशिशें होने लगीं। यानी आज लीबिया पर हमला हो या अमेरिका के अन्य कथित मानवीय कदम, सब महज दिखावा। सही मायने में अमेरिका किसी का सगा नहीं हो सकता। सो मंगलवार को मोदी ने अमेरिका पर पलटवार किया। विकीलिक्स की रपट को प्रामाणिक बताया। अब चाहे जो भी हो, मोदी का कद एक बार फिर बीजेपी के अन्य नेताओं से ऊपर हो गया। पर बीजेपी की मुश्किल- विकीलिक्स की एक रपट को सही माने, तो दूसरी को झुठलाए कैसे? सो एटमी डील पर बीजेपी के डबल स्टैंडर्ड की भी पुष्टि मानकर चलिए। वैसे बीजेपी की अंदरूनी खींचतान अभी भी कम नहीं। संसद के दोनों सदनों के नेताओं में सरकार को घेरने की होड़ मची रहती। पर आजकल सुषमा स्वराज को सत्तापक्ष से मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा। जब भी कुछ बोलने को खड़ी होतीं, बिना मुंह खोले की कांग्रेसी प्वाइंट ऑफ आर्डर उठा देते। हंगामा शुरू हो जाता। सो पिछले हफ्ते और अब मंगलवार को भी सुषमा के लिए आडवाणी को बैटिंग करनी पड़ी। बोले- जब भी नेता विपक्ष खड़ी होती हैं, ट्रेजरी बैंच से रोकने की कोशिश की जाती है। सरकार यह भूल रही, विपक्ष के नेता को बोलने से रोकने का खामियाजा समूचे शीत सत्र के ठप होने के तौर पर भुगत चुकी। अब आडवाणी की इस दलील का मतलब आप खुद निकालें। पर लोकतंत्र में विपक्ष का मतलब सिर्फ विरोध करना ही नहीं। विपक्ष हर मुद्दे पर सदन को बंधक नहीं बना सकता। अब विपक्ष की वित्त विधेयक से गैरहाजिरी को क्या कहेंगे आप? प्रणव दा ने एयर कंडीशंड अस्पताल में इलाज से सर्विस टेक्स वापस ले राहत तो दी। पर लीबिया संकट के मद्देनजर महंगाई रूपी आफत के बादल मंडरा दिए। जल्द पेट्रोल-डीजल के दाम बढऩे का इशारा कर दिया। पर लीबिया के खिलाफ हो रहे अमेरिकी हमले की निंदा का प्रस्ताव लाने को राजी नहीं। सो कुल मिलाकर पक्ष-विपक्ष की प्रतिष्ठा की लड़ाई में पिस रहा बेचारा आम आदमी।
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22/03/2011

Monday, March 21, 2011

कहीं राजनीति, तो कहीं तेल का खेल

तो होली पर बीजेपी का मुंह काला हो गया। विकीलिक्स ने एटमी डील पर विपक्ष के दोहरेपन का खुलासा क्या किया, होली के दिन बीजेपी रंग भी पहचान नहीं पाई। एटमी डील पर बीजेपी ने विरोध का ऐसा झंडा उठाया, मनमोहन सरकार खतरे में पड़ गई थी। लेफ्ट ने समर्थन खींच लिया था। पर अब खुलासा हुआ- बीजेपी के दांत खाने के और, दिखाने के और थे। बीजेपी ने एटमी डील का न सिर्फ विरोध किया था, अलबत्ता आडवाणी ने सत्ता में आने पर रिव्यू का भी एलान कर दिया था। पर विकीलिक्स के जरिए बात खुली- बीजेपी नेताओं ने अमेरिका को पहले ही बता दिया था। दिखावे पर न जाओ, अपनी अक्ल लगाओ। यानी डील का विरोध करना राजनीतिक चाल। पर बीजेपी डील के खिलाफ नहीं। और तो और, बीजेपी के नेता शेषाद्रि चारी ने तो अमेरिकी अधिकारी राबर्ट ब्लैक को यहां तक कह दिया था- हमारी विदेश नीति के प्रस्ताव पर ध्यान न दो। खुलासे के मुताबिक खुद आडवाणी ने भी अमेरिका को भरोसा दिलवाया था- बीजेपी सत्ता में आएगी, तो डील रिव्यू नहीं कराएगी। अब हाथ कंगन को आरसी क्या, पढ़े-लिखे को फारसी क्या। बीजेपी के लिए विकीलिक्स ऐसी फांस बनी, जो न उगली जाए, न निगली जाए। जिस विकीलिक्स को आधार बना मनमोहन को मजबूर किया, अब खुद क्या कहेगी बीजेपी? यों सत्ता में बीजेपी हो या कांग्रेस, अमेरिका के आगे दुम हिलाती रहीं। सो जब डील पर बीजेपी के भीतर चिक-चिक हो रही थी, तभी साफ हो गया था। बीजेपी सिर्फ विरोध के लिए विरोध कर रही। सो अब वोट के बदले नोट कांड के पूर्व की परिस्थितियां देखें, तो कहीं न कहीं बीजेपी भी जिम्मेदार। बीजेपी डील की पैरोकार थी। अगर दिखावे का विरोध न करती। तो न नौ मन तेल होता, न राधा नाचती। शायद न सरकार संकट में आती, न बहुमत का भोंडा प्रदर्शन होता। पर कहते हैं ना- राजनीति, प्यार और जंग में सबकुछ जायज। अब बीजेपी की राजनीति की तो पोल खुल गई। सो बात कांग्रेस और तृणमूल के बीच ‘प्यार’ भरे रिश्ते की। कांग्रेस ने बंगाल में तमिलनाडु दोहराने की कोशिश की। पर आखिर में बिलबिलाती नजर आई। यों कांग्रेस के लिए सुखद संदेश यही रहा- न तमिलनाडु में गठबंधन टूटा, न बंगाल में दरका। पर तमिलनाडु में कांग्रेस ने करुणा को करुण कर दिया। तो बंगाल में ममता की ‘ममता’ पर ही निर्भर रहना पड़ा। तमिलनाडु में कांग्रेस ने अपनी मांग 48 से बढ़ाते-बढ़ाते 63 सीट तक कर दीं। ना-नुकर करते-करते करुणानिधि को भी मानना पड़ा। टू-जी स्पेक्ट्रम घोटाले की जांच की आंच में डीएमके को झुलसा कांग्रेस ने मंशा पूरी की। पर बंगाल में ममता के राजनीतिक पेच ने कांग्रेस को पंक्चर कर दिया। कांग्रेस ने ममता से पहले 98 सीट मांगी। तो ममता ने 45 से गिनती शुरू की। फिर कांग्रेस 75 पर आई, तो ममता भी 50 पर आईं। फिर 60 और आखिर में 64 की लकीर खींच ममता ने बिना कांग्रेस की बाट जोहे अपने 228 उम्मीदवारों का एलान कर दिया। कांग्रेस के लिए 64 और दो सीट एसयूसीआई के लिए छोड़ दीं। सो कांग्रेस के लिए अब काटो तो खून नहीं। कांग्रेस की प्रतिष्ठा धूल धूसरित हो गई। सो कई राउंड की बातचीत के बाद ममता महज कांग्रेसी चेहरे से धूल झाडऩे को तैयार हुईं। आखिर में एक और सीट थमा कांग्रेस को हैसियत बता दी। पर गठबंधन बच गया, तो बंगाल कांग्रेस के प्रभारी शकील अहमद बोले- यह न आत्म समर्पण, न समझौता, यह गठबंधन है। पर जो भी हो, गठबंधन के खेल में कांग्रेस का तेल निकल गया। सो अब बात असली तेल की, जिसकी खातिर अमेरिका ने मित्र देशों के साथ मिल लीबिया पर हमला बोल दिया। लीबिया में तानाशाह कर्नल गद्दाफी के खिलाफ जन आंदोलन छिड़ा हुआ। दोतरफा संघर्ष चल रहा। सो अब दुनिया के कथित दादागण अपनी दादागिरी पर उतर आए। गद्दाफी के ठिकानों समेत कई जगहों पर हवाई हमले शुरू हो गए। पर सवाल- दुनिया के दादाओं को यह लाइसेंस किसने दिया? इराक में रासायनिक हथियार के नाम पर हमला बोला। इराक को नेस्तनाबूद कर दिया। पर रासायनिक हथियार का रा भी नहीं मिला। अब इराक के तेल के कुएं से अमेरिका और मित्र देशों की कंपनियां मालामाल हो रहीं। अगर सचमुच अमेरिका एंड कंपनी लोकतंत्र की पैरोकार, तो क्या हवाई हमले के सिवा कोई और विकल्प नहीं? हवाई हमले में शिकार हो रहे निर्दोष नागरिकों की जिम्मेदारी कौन लेगा? अपने भारत और पड़ोसी चीन ने हमले पर खेद जताया। हिंसा छोडऩे की अपील की। पर सिर्फ घरेलू राजनीति में ही दिखावा नहीं। अंतर्राष्ट्रीय मंच पर भी दिखावे हो रहे। भारत कभी ईरान का पैरोकार रहा। अमेरिका ने घुडक़ी दी, तो विरोध किया। अब तो अमेरिका के हर कदम में भारत साथ दे रहा। पर मौका देख कभी परदे के पीछे, तो कभी सामने आ जाता। सो बात अमेरिका और सहयोगी देशों की, तो आप इतिहास पलट कर देख लो। कभी इन देशों के इरादे नेक नहीं रहे। लीबिया पर हमला भी लोकतंत्र लाना नहीं, अलबत्ता तेल के कुएं पर कब्जा जमाना।
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21/03/2011

 

Friday, March 18, 2011

नैतिकता का दहन, संसद में हुड़दंग

मराठी में एक कहावत है- गुड़घ्याला बाशिंग बांधले। यानी कुर्सी की खातिर कोई इतना अधीर, सिर का सेहरा घुटने पर बांध ले। जब मनमोहन सरकार की पहली पारी पर एटमी संकट छाया। तो अमेरिका की खातिर राजनीति के तरकश से सारे तीर निकाले गए। एटमी डील खतरे में थी। सो अमेरिका की निगाहें वाया दूतावास मनमोहन सरकार पर ही गड़ी थीं। येन-केन-प्रकारेण मनमोहन ने कुर्सी तो बचा ली। पर सेहरा सिर से ऐसा सरका, संभाले नहीं संभल रहा। सत्ता के नशे में विपक्ष को अनदेखा किया। विपक्ष भी सरकार को दिखाने के बजाए आपस में ही एक-दूसरे को देखने लगा। सो कांग्रेस पर तबसे ही जो नशा चढ़ा, उतरने का नाम नहीं। अब 22 जुलाई 2008 का विश्वास मत लोकतंत्र के साथ विश्वासघात साबित हो रहा। तो कांग्रेस ने नैतिकता को जेब में रख ताल ठोक दी। विकीलिक्स के खुलासे ने अमेरिकी प्रेम और खरीद-फरोख्त की पुष्टि की। तो अब कांग्रेसी दलील देखिए- विपक्ष ने 2009 के चुनाव में भी ऐसे आरोप लगाए। पर जनता ने खारिज कर दिया। संसद के दोनों सदनों में दूसरे दिन भी यही मुद्दा उछला। पर पीएम मनमोहन ने पहले इंडिया टुडे कान्क्लेव में सफाई दी। फिर दोपहर बाद संसद में। पर दोनों सफाई के बीच ‘हाथ’ ने अपना कमाल दिखा दिया। इंडिया टुडे कान्क्लेव में मनमोहन बोले- सांसदों की खरीद-फरोख्त हुई, इसकी कोई जानकारी नहीं। और ना ही मैंने किसी को अधिकृत किया। पर जब कुछ घंटों बाद संसद में बयान पढ़ा, तो भाषा और तेवर भी बदल गए। उन ने न सिर्फ विपक्ष को आईना दिखाया, अलबत्ता बेहिचक कह दिया- यूपीए सरकार और कांग्रेस के किसी भी सदस्य ने विश्वास मत जीतने के लिए कोई गैर-कानूनी तरीका अख्तियार नहीं किया। चलो मान लिया, पर सवाल 25 करोड़ का- विश्वास मत के दिन 19 सांसदों ने क्रास वोटिंग क्यों की? अपनी पार्टी के पलटूराम क्यों बने? नेताओं से नि:स्वार्थ काम करने की उम्मीद तो कतई नहीं की जा सकती। अठन्नी-चवन्नी में बिकने वाले सांसद मुफ्त में मनमोहन सरकार तो नहीं बचाएंगे। अब जरा पीएम की सफाई का मतलब भी देख लो। इंडिया टुडे कान्क्लेव में पीएम ने किसी को अधिकृत न करने वाली दलील दी। तो सवाल- क्या ऐसे काम के लिए पीएम अपने लैटर हैड पर किसी को अधिकृत करेंगे? पीएम ने संसद में सफाई दी, तो कांग्रेस और सरकार की ओर से ऐसे गैर-कानूनी काम को नकारा। पर पीएम ने यह नहीं कहा- विश्वास मत के लिए सांसदों की कोई खरीद-फरोख्त नहीं हुई। सो नोट के बदले वोट कांड का भूत तीन साल बाद आया या तीस साल बाद आए, कांग्रेस कभी कबूल नहीं करेगी। सो पीएम के बयान पर लोकसभा में सुषमा स्वराज ने स्पष्टीकरण की अनुमति मांगी। तो स्पीकर ने ठुकरा दिया। पर राज्यसभा में सभापति हामिद अंसारी ने सचमुच इतिहास बना दिया। राज्यसभा में मंत्री या पीएम के बयान पर स्पष्टीकरण मांगने की परंपरा। पर शुक्रवार को पीएम के बयान के बाद अंसारी ने अनुमति नहीं दी। तो विपक्ष ने हंगामा शुरू कर दिया। सो अंसारी ने चौंकाने वाली दलील दी। बोले- चूंकि पीएम ने स्वत: बयान नहीं दिया, अलबत्ता विपक्ष की मांग पर दिया। सो रूल 251 के तहत स्पष्टीकरण नहीं मांगा जा सकता। उन ने अपनी व्यवस्था को पुष्ट करने के लिए 24 अप्रैल 1987 की एक रूलिंग भी परोस दी। यह रूलिंग किस मुद्दे पर आई थी, आप सुनते जाओ। बोफोर्स घोटाले पर तत्कालीन पीएम राजीव गांधी ने बयान दिया। विपक्ष ने स्पष्टीकरण मांगा, तो तत्कालीन  सभापति शंकरदयाल शर्मा ने यह कहते हुए स्पष्टीकरण की अनुमति नहीं दी कि अगले दिन इस मुद्दे पर विस्तृत बहस होनी है। सो विपक्ष ने दोनों सदनों में पीएम के बयान पर बहस का नोटिस थमा दिया। पर सीताराम येचुरी ने तो तभी चुटकी ली- 24 साल पीछे की रूलिंग लागू करने के बजाए पिछले हफ्ते अपनाई गई परंपरा का अनुसरण क्यों नहीं करते? पर सभापति नहीं माने। सरकार ने भी ठान ली थी, सो पवन बंसल बोले- विपक्ष की हर बात नहीं मानेंगे। यानी जो बात मुफीद, वही बात मानेगी सरकार। पर सवाल- जब मनमोहन को भरोसा, जुलाई 2008 में कुछ गलत नहीं किया। तो विपक्ष के सवालों का जवाब देने में संकोच कैसा? संसद में आकर बयान पढ़ दिया और चलते बने, यह कैसी परंपरा? अपनी संसद में यही देखने को मिलता। सभी दलों के सांसद बोलते, आखिर में मंत्री जवाब देता और कथा समाप्त हो जाती। मनमोहन ने भी शुक्रवार को वही किया। बोले- नोट के बदले वोट कांड में संसदीय जांच कमेटी को भी निष्कर्ष तक पहुंचने वाले सबूत नहीं मिले। विपक्ष भूल गया, चुनाव में जनता ने क्या जवाब दिया। जिस 14वीं लोकसभा में बीजेपी के 138 सांसद थे, 15वीं में घटकर 116 रह गए। लेफ्ट भी 59 से घटकर 24 पर अटक गया। सिर्फ कांग्रेस की सीटें 145 से बढक़र 206 हो गईं। अब इस दलील में सचमुच कोई तर्क या सिर्फ घमंड, आप ही तय करिए। अगर चुनाव जीतने से घूसखोरी, भ्रष्टाचार और अपराध को छूट मिलने लगे, तो फिर मनमोहन चुनाव सुधार की बात क्यों कर रहे? लालू, मुलायम, शिबू, माया, मुख्तार अंसारी, शहाबुद्दीन, ए. राजा जैसे लोग भी चुनाव जीत चुके। मनमोहन फार्मूले के मुताबिक तो इन्हें भी मुकदमेबाजी से मुक्त कर देना चाहिए। क्या सत्ता में आने का मतलब, सरकार कुछ भी कर सकती? अब होली के इस मौके पर संसद में हुड़दंग तो जारी। पर होलिका दहन से ठीक पहले मनमोहन सरकार ने नैतिकता का दहन कर दिया।
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18/03/2011

Thursday, March 17, 2011

तो क्या ‘चौदहवीं के चांद’ पर लगा दाग नहीं धुलेगा?

भ्रष्टाचार का भूकंप अब मनमोहन सरकार की सुनामी बन गई। नित-नए झटकों से सरकार को दो-चार होना पड़ रहा। सीडब्ल्यूजी, टू-जी, आदर्श और थॉमस के बाद अब विकीलिक्स की फांस गले पड़ गई। अमेरिका से एटमी डील की खातिर मनमोहन ने सरकार दांव पर लगा दी थी। बाईस जुलाई 2008 को मनमोहन ने विश्वासमत जीता। पर लोकतंत्र का मंदिर दागदार हो गया। अब विकीलिक्स ने खुलासा किया, कैसे बहुमत के लिए सांसदों की खरीद-फरोख्त हुई। कथित तौर पर कैप्टेन सतीश शर्मा का करीबी नचिकेता कपूर अमेरिकी दूतावास के अधिकारी से मिला था। नोटों से भरे बैग दिखा बतलाया था- सांसदों को खरीदने के लिए 50-60 करोड़ रुपए साथ लेकर चल रहे। यों नचिकेता और सतीश शर्मा का आरोपों से इनकार। पर सतीश शर्मा से जान-पहचान की बात नचिकेता ने कबूल की। विकीलिक्स के खुलासे में वोट के बदले निजी विमान भी रिश्वत में देने का ऑफर हुआ था। अजित सिंह की रालोद के सांसदों को खरीदने के लिए 40 करोड़ रुपए दिए गए। ये सारे खुलासे विकीलिक्स ने अमेरिकी दस्तावेज के आधार पर किए। सो गुरुवार को संसद में जमकर हंगामा हुआ। कांग्रेसियों को तो सांप सूंघ गया। एटमी डील पर मनमोहन की वैतरिणी पार लगाने वाले मुलायम भी विपक्ष के साथ सुर मिला जांच की मांग करने लगे। पर भ्रष्टाचार रूपी भूकंप के झटके खा रही सरकार के लिए यह खुलासा मारक साबित हो रहा। पहली बार समूचे विपक्ष ने सीधे मनमोहन सिंह से इस्तीफा मांगा। आडवाणी-सुषमा समेत सभी विपक्षी पार्टियों के नेताओं ने दो-टूक कहा- अब यूपीए सरकार को शासन में बने रहने का कोई हक नहीं। यों विपक्ष की मांग सौ फीसदी सही। पर विकीलिक्स का खुलासा कुछ नया नहीं। जब 22 जुलाई 2008 को मनमोहन ने अपने राजनीतिक गुरु नरसिंह राव की तरह ही विश्वास मत का इतिहास रचा। तब बीजेपी ने क्या किया? भले सबूत न हों, पर इसमें कोई शक नहीं कि विश्वास मत के लिए सांसदों की खरीद-फरोख्त हुई। सदस्यता और निष्ठा को दांव पर लगाकर 19 सांसदों ने यों ही पाला नहीं बदला होगा। क्रॉस वोटिंग करने वाले गैर कांग्रेसी दलों के सांसद 15वीं लोकसभा में कांग्रेसी टिकट पर चुनकर आए। भ्रष्टाचार पर कांग्रेस के डीएनए का एक और नमूना देखिए। सिर्फ वोट के बदले नोट कांड ही नहीं, सवाल के बदले घूस कांड में लोकसभा से बर्खास्त तबके बसपाई सांसद राजा रामपाल 15वीं लोकसभा में कांग्रेस के सांसद हैं। सो राजनीति बेहयाईपन की कोई सीमा रेखा नहीं। जिस चौदहवीं लोकसभा के विश्वासमत पर पंद्रहवीं लोकसभा में हंगामा बरपा। उस 14वीं लोकसभा में सबसे अधिक बीजेपी के सांसद भ्रष्ट थे। ऑपरेशन दुर्योधन, चक्रव्यूह, वोट के बदले नोट तक बीजेपी के कुल सांसद धरे गए। यानी उस लोकसभा में बीजेपी के कुल 138 सांसद से गुणा-भाग करें, तो औसतन बीजेपी का हर नौवां सांसद भ्रष्ट था। सो वोट के बदले नोट कांड के बाद आडवाणी ने ठोक-बजाकर उम्मीदवार उतारने का एलान किया। बीजेपी ने अपनी चुनाव समिति की मीटिंग टाल नए मापदंड तय किए- अब जिताऊ से अधिक टिकाऊ को अहमियत देंगे। ताकि चुनकर आने के बाद सांसद बिकाऊ न बनें। सचमुच कोई मजबूत विपक्ष होता, तो सर्कस बन चुकी मनमोहन सरकार का तख्ता पलट चुका होता। पर लोकसभा चुनाव के वक्त बीजेपी अंदरूनी कलह की शिकार रही। अध्यक्ष और पोल मैनेजर खुलेआम लड़ते रहे। सो भ्रष्टाचार, आतंकवाद और महंगाई जैसे तमाम मुद्दों के बावजूद मनमोहन सरकार सत्ता में वापस लौटी। विपक्ष न तो विकल्प के तौर पर मैदान में खड़ा हो सका और ना ही मनमोहन सरकार को घेर सका। सो कांग्रेस न सिर्फ सत्ता में लौटी, अलबत्ता मजबूत होकर लौटी। पर विपक्ष की कमजोरी ने कांग्रेस की जीत में नशा घोल दिया। सो सत्ता के नशे में गलतियों का पहाड़ खड़ा हो गया। कांग्रेस को इल्म तब हुआ, जब सुप्रीम कोर्ट ने हथौड़ा मारा। अब विकीलिक्स के ताजा खुलासे पर कांग्रेस और प्रणव दा की दलील देखिए। चूंकि यह मामला 14वीं लोकसभा का, सो 15वीं लोकसभा में डिस्कस नहीं हो सकता। मौजूदा सरकार सिर्फ 15वीं लोकसभा के लिए जिम्मेदार, 14वीं के लिए नहीं। प्रणव दा ने खुलासे की न पुष्टि की, न खंडन किया। पर इसके लिए भी दलील देखिए- दूतावास को राजनयिक संरक्षण हासिल, सो सरकार के लिए पुष्टि या खंडन करना संभव नहीं। पर विपक्ष के नेता अरुण जेतली ने पलटवार किया। बोले- चूंकि यह अपराध भारत में हुआ, इसमें भारतीय शामिल थे। सो राजनयिक छूट का मुद्दा नहीं उठता। जेतली और प्रणव दा के बीच जमकर तकरार हुई। पर क्या 14वीं के चांद पर लगा यह दाग नहीं धुलेगा? भले अजित सिंह की पार्टी के सांसदों ने सरकार के खिलाफ वोट दिया हो। पर पैसे के लेन-देन से अभी इनकार नहीं। लोकसभा में 22 जुलाई 2008 को चार बजकर चार मिनट पर बीजेपी के तीन सांसद अशोक अर्गल, महावीर भगोरा और फग्गन सिंह कुलस्ते ने अमर सिंह एंड कंपनी की ओर से दिए गए एक करोड़ के नोटों की गड्डियां सदन में लहराईं। बाद में संसद की जांच कमेटी बनी, तो नोट लहराने वाले ही अपराधी हो गए। अमर सिंह को क्लीन चिट मिल गई। पर सवाल- पाला बदलने वाले सांसदों ने क्या नि:स्वार्थ वोट दिया? एटमी डील की खातिर मनमोहन ने साम, दाम, दंड, भेद सब लगा दिए। विश्वास मत से पहले ही गुरुदास दासगुप्त ने खुलासा किया था- 25 करोड़ में बिक रहे सांसद।
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17/03/2011