इंडिया गेट से
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तेलंगाना: सांप-छछूंदर वाली
हालत में कांग्रेस और सरकार
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संतोष कुमार
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तो तेलंगाना मुद्दे ने सरकार का तेल निकाल दिया। मंगलवार को ऑल पार्टी मीटिंग भी हो गई। पर आग बुझने का नाम नहीं ले रही। अलबत्ता तेलंगाना पर कांग्रेस और सरकार तिल-तिल फंसती जा रही। के. चंद्रशेखर राव की अनशन की हड़बड़ी में सरकार ने एलान तो कर दिया। पर दूरगामी प्रभाव नहीं भांप पाई। सो दबाव में फैसला लेकर अब नतीजा भुगत रही। जो आम राय का रोड मैप पहले तैयार होना चाहिए था। सरकार अब तैयार कर रही। पर जैसे हालात, सहमति की डोर कहीं दिखती नहीं। वैसे भी आम सहमति संभव नहीं। जब अलग-अलग वैचारिक ग्रुप ताकत दिखा रहे। तेलंगाना के मसले पर अलग-अलग दलों के बीच ही मतभेद नहीं। एक ही दल के भीतर भी कड़े मतभेद। कांग्रेस, तेलुगुदेशम, लेफ्ट फ्रंट और चिरंजीवी की प्रजा राज्यम। चारों में अंदर ही दो-फाड़। तेलंगाना रीजन से आने वाले नेता अलग राज्य की लड़ाई लड़ रहे। तो दूसरा पक्ष अखंड आंध्र की। सबके अपने-अपने निजी हित और स्वार्थ। सो आम सहमति के नाम पर तो न नौ मन तेल होगा, न राधा नाचेगी। आम सहमति नहीं बनने वाली। फिर भी पी. चिदंबरम कवायद कर रहे। तो नतीजा वही होगा, जो मंगलवार को हुआ। मीटिंग शुरू हुई। तो चिदंबरम के चेहरे पर तेरह बजे थे। तेलंगाना पर खुफिया रपट चिदंबरम ने ही दस जनपथ पहुंचाई। फौरन किचन केबिनेट में विचार हुआ। तो सोनिया गांधी के सलाहकारों ने भी कोई खासी मशक्कत नहीं की। अलबत्ता नौ दिसंबर की रात को ही हड़बड़ी में केबिनेट बुलाकर अलग तेलंगाना की प्रक्रिया शुरू करने का एलान हो गया। एलान चूंकि चिदंबरम ने किया। रपट भी चिदंबरम ने दी। सो अब सारा ठीकरा चिदंबरम के सिर। कांग्रेस तो एक ही राग अलाप रही। तेलंगाना का मुद्दा सरकार के पाले में। सो अपनी बात सरकारी मंच पर कहेंगे। यानी कोल्हू में गर्दन फंसी। तो खुद कांग्रेस और सरकार का तेल निकल गया। सो मीटिंग में चिदंबरम ने संसदीय ज्ञान खूब बघारा। लोकतंत्र में राजनीतिक दलों की जिम्मेदारी का अहसास कराया। तो विधानसभा चुनाव के वक्त सभी दलों की तेलंगाना पर भूमिका भी याद दिलाई। वाकई तब चिरंजीवी हो या चंद्रबाबू, लेफ्ट हो या राइट। सब तेलंगाना के पक्ष में थे। कांग्रेस ने भी मैनीफेस्टो में वादा दोहराया था। अब सिर्फ बीजेपी में अलग तेलंगाना पर एक राय। बाकी सब आपस में ही बंटे हुए। सो चिदंबरम ने आंध्र में भड़की हिंसा पर चिंता जताई। राज्य में अमन-चैन बहाल हो, इसकी जिम्मेदारी सभी दलों पर डाल दी। कहा- 'अगर हम मामला नहीं सुलझा पाए, तो माओवादी खुश होंगे।' फिर भी मीटिंग में तेलुगुदेशम के दो एम.पी. थे। तो एक तेलंगाना के पक्ष में, दूसरा विरोध में। कांग्रेसी नुमाइंदों का भी यही हाल। लेफ्ट फ्रंट में सीपीआई तेलंगाना के पक्ष में, तो सीपीएम विरोध में। एआईएमआईएम के ओबैसी न तीन में, न तेरह में। सो राष्टï्रपति राज की मांग की। प्रजा राज्यम ने एक हाई पॉवर कमेटी का सुझाव दिया। जो सभी ग्रुप से बात करे। पर बीजेपी के बंडारू दत्तात्रेय ने पहले कांग्रेस और सरकार से रुखनामा मांगा। फिर बजट सत्र में ही बिल लाने की मांग की। पर चिदंबरम को मीटिंग का कोई नतीजा नहीं दिखा। तो ऐसी बातचीत जारी रखने का सुर्रा छोड़ दिया। बोले- 'मुझे लगता है, कोई भी समूह आगे बातचीत के खिलाफ नहीं है।' पर बीजेपी ने फौरन आपत्ति जताई। तो सबसे अहम किरदार के. चंद्रशेखर राव ने मीटिंग में मुंह न खोला। केसीआर भांप चुके, बोतल से निकला जिन अब 'विश' पूरी करके जाएगा। भले आज नहीं तो कल। यानी तेलंगाना के लिए केसीआर किरदार। तो अखंड आंध्र के नाम पर जगन मोहन का खेल चल रहा। वाईएसआर के जमाने वाली समूची उद्योग लॉबी जगन मोहन के साथ। सो जगन मोहन सीएम नहीं, तो कांग्रेस नहीं के खेल में जुटे हुए। यानी कुल मिलाकर चिदंबरम बाबू फंस गए। मुंबई हमले के बाद मनमोहन ने होम मिनिस्टर बनाया। तो चिदंबरम ने बाबूगिरी पर नकेल कस दी। शासन तंत्र को मुस्तैद कर दिया। पर तेलंगाना चिदंबरम के लिए पहला राजनीतिक टेस्ट। सो जल्दबाजी का फैसला गले की फांस बन गया। चिदंबरम ने ही तेलंगाना का एलान किया। फिर पखवाड़े भर बाद आम सहमति की दलील दी थी। सो चिदंबरम की हालत सांप-छछूंदर वाली हो गई। बड़े-बुजुर्ग तो सांप-छछूंदर पर मौजूं कहानी सुनाते। सांप को शाप मिला हुआ। अगर सांप छछूंदर को निगल जाए, तो भी मरेगा। अगर छोड़ दे, तो छछूंदर के काटने से भी सांप मरेगा। सो पेशे से वकील चिदंबरम राजनीति के कटघरे में फंस गए। चार घंटे मीटिंग चली। पर नतीजे में निकली कुल जमा चार शब्दों की अपील- 'राज्य में शांति, सौहार्द और कानून व्यवस्था बनाए रखी जाए।' यानी आम सहमति को इन्हीं चार शब्दों की श्रद्धांजलि। अब भी अमन-चैन बहाल न हुआ। तो चिदंबरम का भविष्य क्या होगा?
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05/01/2010
Tuesday, January 5, 2010
Monday, January 4, 2010
मैडल वापसी काफी नहीं, 'राठौरों' से मुक्ति कब?
इंडिया गेट से
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मैडल वापसी काफी नहीं,
'राठौरों' से मुक्ति कब?
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संतोष कुमार
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सोचो, मीडिया आवाज न उठाता। रुचिका केस में अदालती फैसले को दिन का घटनाक्रम मान आगे बढ़ जाता। तो क्या बात इतनी दूर तलक जाती? क्या 19 साल से कुंभकर्णी नींद सोई सरकार जागती? अब रुचिका के गुनहगार एसपीएस राठौर पर मुकदमों का बोझ। होम मिनिस्ट्री भी मैडल छीनने का फैसला कर चुकी। तो यह अपनी मीडिया की वाहवाही नहीं। अलबत्ता फर्ज के मुताबिक सजग प्रहरी की भूमिका निभाई। पर कटघरे में रसूख की राजनीति। आखिर जब तक जनता सड़कों पर नहीं उतरती। तब तक व्यवस्था के कान पर जूं क्यों नहीं रेंगती। अब होम सैक्रेट्री जी.के. पिल्लई की रहनुमाई वाली कमेटी ने मैडल वापस लेने की सिफारिश कर दी। तो हरियाणा के सीएम भूपेंद्र सिंह हुड्डïा की फुर्ती देखिए। इधर कमेटी की मीटिंग में फैसला होना था। उधर तड़के ही हुड्डïा की चि_ïी चिदंबरम को पहुंच गई। मैडल वापस लेने की अर्जी लगा दी। पर हुड्डïा कोई नवा-नवा सीएम नहीं। पांच साल से हरियाणा की कुर्सी पर काबिज। पर राठौर के खिलाफ सिफारिश तब भेजी। जब केंद्र सरकार मैडल छीनने का मन बना चुकी थी। पर अहम सवाल, मैडल छीनने से क्या होगा? इन 19 साल में हरियाणा और केंद्र में कई सरकारें आईं-गईं। पर राठौर के चेहरे से मुस्कराहट नहीं गई। जब 1990 में रुचिका के साथ छेड़छाड़ का मामला आया। तो तबके डीजीपी आर.आर. सिंह की विभागीय जांच में राठौर दोषी पाए गए। पर राठौर की राजनीतिक पकड़ ने बाल बांका न होने दिया। अब 19 साल बाद पदक छीनने से क्या रुचिका के परिवार को शांति मिलेगी? संसद पर हमले के शहीदों के परिजनों ने दो साल पहले मैडल राष्टï्रपति के लौटा दिए। पर सरकार की बेशर्मी देखिए। न आतंकी अफजल को फांसी चढ़ाई। न शहीदों के परिजनों को कोई ऐसा भरोसा दिलाया, जिससे मैडल वापस ले सकें। यानी सरकार की निगाह में मैडल अहमियत नहीं रखते। आखिर मैडल और सम्मान को सरकार झुनझुने के तौर पर इस्तेमाल करती। वैसे भी मैडल बांटने के सिर्फ दो पैमाने। पहला- सत्ता की चारणगिरी। दूसरा- सहानुभूति बटोरने और उपलब्धियां भुनाने की। भले सरकार किसी भी राजनीतिक दल की हो। अब आप खुद ही देख लो। जब वाजपेयी पीएम थे। डा. चितरंजन राणावत ने घुटने का आपरेशन किया। तो राणावत को पद्म श्री मिल गया। राणावत की काबिलियत पर सवाल नहीं। सवाल सरकार के इरादे पर। क्या पीएम के घुटने का आपरेशन पद्म श्री का पैमाना? अगर ऐसा, तो अबके 26 जनवरी पर पीएम मनमोहन की हर्ट सर्जरी करने वाले डाक्टर को क्यों न मिले पद्म श्री? अभी हाल का किस्सा लो। तो प्रख्यात कवि अशोक चक्रधर ने लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के खूब स्लोगन रचे। सो चुनाव बाद कांग्रेस ने चक्रधर को हिंदी अकादमी दिल्ली का उपाध्यक्ष बना दिया। पर काफी विरोध हुआ। कई बड़े लोगों ने इस्तीफा दे दिया। तो भी सरकार ने फैसला पलटा नहीं। अलबत्ता चक्रधर को एक और हिंदी संस्थान का अध्यक्ष बना दिया। अब दो-तीन साल पहले का एक अजीब-ओ-गरीब किस्सा भी देख लो। छत्तीसगढ़ में एक ऐसे शिक्षक को राष्टï्रपति पुरस्कार मिला। जो आठ साल से स्कूल ही नहीं गए। अलबत्ता पदस्थापना के तौर पर सीएम सैक्रेटेरिएट में रहे। सो सीएम से नजदीकी ने राष्टï्रपति पुरस्कार दिला दिया। गुजरात के डी.जी. बंजारा फर्जी एनकाउंटर कर मैडल पाते गए। पर अपनी सरकार कभी पानी बाबा के नाम से मशहूर राजेंद्र सिंह जैसे लोगों के बारे में नहीं सोचती। भले राजेंद्र सिंह को मैग्सेसे पुरस्कार किसी अन्य देश से क्यों न मिल जाए। सहानुभूति के लिए शहीदों के परिजनों को अवार्ड देना तो परंपरा बन गई। पर उपलब्धियां भुनाने को भी हरभजन, धोनी जैसों को पद्म श्री मिल जाता। भले विज्ञापनों की शूटिंग में व्यस्त धोनी-हरभजन के पास देश का नागरिक सम्मान लेने की फुरसत न हो। पर राजनीति और अफसरशाही में चोली-दामन का ऐसा रिश्ता बन चुका। जो एक-दूसरे के बिना नंगा दिखे। सो नेता को भी रसूख चाहिए। अफसरशाही को भी राजनीतिक वरदहस्त। सो दोनों मिल-बांट कर रेवड़ी खाते। अपने-अपनों को मैडल और सम्मान दिला जाते। पर उंगली न उठे, सो एकाध बाबा आम्टे जैसे लोगों को भी सम्मान दिया जाता। ताकि एक ईमानदार-योग्य की छतरी में सारे बेईमान समा जाएं। अफसरानों में किसी एक राजनेता को गॉड फादर मानकर उसके इशारों पर चलने की आदत। सो राजनीतिक कमिटेड अफसरों को ईमानदार और योग्य अफसरों की वरिष्ठïता लांघकर पुरस्कृत करने का भी चलन आम। तभी तो खुद अफसर रहे देश के पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त टी.एन. शेषन ने अपनी अफसरशाही को 'पॉलिश्ड कॉल गल्र्स' की उपाधि दी थी। आजादी से पहले और अबकी अफसरशाही में कोई खास फर्क नहीं। सो चालाक अफसरान स्पष्टïवादिता के बजाए 'जी हुजूरी' से नहीं हिचकिचाते। तभी तो पुलिस रिफॉर्म की फाइल धूल फांक रही। आतंकी पुलिस की नाक के नीचे से भाग रहे। पर सिर्फ पुलिस मैडल ही नहीं, अपना सर्वोच्च राष्टï्रीय सम्मान भारत रत्न भी राजनीति से सराबोर। तभी तो इंदिरा गांधी को 1971 में राजीव गांधी को मरणोपरांत 1991 में ही भारत रत्न मिल गया। पर सरदार पटेल को 1991 में, मौलाना अबुल कलाम आजाद को 1992 में। सुभाष चंद्र बोस को भी 1992 में नवाजा गया। पर सुप्रीम कोर्ट के दखल से नेताजी का नाम लिस्ट से हटाना पड़ा।
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04/01/2010
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मैडल वापसी काफी नहीं,
'राठौरों' से मुक्ति कब?
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संतोष कुमार
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सोचो, मीडिया आवाज न उठाता। रुचिका केस में अदालती फैसले को दिन का घटनाक्रम मान आगे बढ़ जाता। तो क्या बात इतनी दूर तलक जाती? क्या 19 साल से कुंभकर्णी नींद सोई सरकार जागती? अब रुचिका के गुनहगार एसपीएस राठौर पर मुकदमों का बोझ। होम मिनिस्ट्री भी मैडल छीनने का फैसला कर चुकी। तो यह अपनी मीडिया की वाहवाही नहीं। अलबत्ता फर्ज के मुताबिक सजग प्रहरी की भूमिका निभाई। पर कटघरे में रसूख की राजनीति। आखिर जब तक जनता सड़कों पर नहीं उतरती। तब तक व्यवस्था के कान पर जूं क्यों नहीं रेंगती। अब होम सैक्रेट्री जी.के. पिल्लई की रहनुमाई वाली कमेटी ने मैडल वापस लेने की सिफारिश कर दी। तो हरियाणा के सीएम भूपेंद्र सिंह हुड्डïा की फुर्ती देखिए। इधर कमेटी की मीटिंग में फैसला होना था। उधर तड़के ही हुड्डïा की चि_ïी चिदंबरम को पहुंच गई। मैडल वापस लेने की अर्जी लगा दी। पर हुड्डïा कोई नवा-नवा सीएम नहीं। पांच साल से हरियाणा की कुर्सी पर काबिज। पर राठौर के खिलाफ सिफारिश तब भेजी। जब केंद्र सरकार मैडल छीनने का मन बना चुकी थी। पर अहम सवाल, मैडल छीनने से क्या होगा? इन 19 साल में हरियाणा और केंद्र में कई सरकारें आईं-गईं। पर राठौर के चेहरे से मुस्कराहट नहीं गई। जब 1990 में रुचिका के साथ छेड़छाड़ का मामला आया। तो तबके डीजीपी आर.आर. सिंह की विभागीय जांच में राठौर दोषी पाए गए। पर राठौर की राजनीतिक पकड़ ने बाल बांका न होने दिया। अब 19 साल बाद पदक छीनने से क्या रुचिका के परिवार को शांति मिलेगी? संसद पर हमले के शहीदों के परिजनों ने दो साल पहले मैडल राष्टï्रपति के लौटा दिए। पर सरकार की बेशर्मी देखिए। न आतंकी अफजल को फांसी चढ़ाई। न शहीदों के परिजनों को कोई ऐसा भरोसा दिलाया, जिससे मैडल वापस ले सकें। यानी सरकार की निगाह में मैडल अहमियत नहीं रखते। आखिर मैडल और सम्मान को सरकार झुनझुने के तौर पर इस्तेमाल करती। वैसे भी मैडल बांटने के सिर्फ दो पैमाने। पहला- सत्ता की चारणगिरी। दूसरा- सहानुभूति बटोरने और उपलब्धियां भुनाने की। भले सरकार किसी भी राजनीतिक दल की हो। अब आप खुद ही देख लो। जब वाजपेयी पीएम थे। डा. चितरंजन राणावत ने घुटने का आपरेशन किया। तो राणावत को पद्म श्री मिल गया। राणावत की काबिलियत पर सवाल नहीं। सवाल सरकार के इरादे पर। क्या पीएम के घुटने का आपरेशन पद्म श्री का पैमाना? अगर ऐसा, तो अबके 26 जनवरी पर पीएम मनमोहन की हर्ट सर्जरी करने वाले डाक्टर को क्यों न मिले पद्म श्री? अभी हाल का किस्सा लो। तो प्रख्यात कवि अशोक चक्रधर ने लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के खूब स्लोगन रचे। सो चुनाव बाद कांग्रेस ने चक्रधर को हिंदी अकादमी दिल्ली का उपाध्यक्ष बना दिया। पर काफी विरोध हुआ। कई बड़े लोगों ने इस्तीफा दे दिया। तो भी सरकार ने फैसला पलटा नहीं। अलबत्ता चक्रधर को एक और हिंदी संस्थान का अध्यक्ष बना दिया। अब दो-तीन साल पहले का एक अजीब-ओ-गरीब किस्सा भी देख लो। छत्तीसगढ़ में एक ऐसे शिक्षक को राष्टï्रपति पुरस्कार मिला। जो आठ साल से स्कूल ही नहीं गए। अलबत्ता पदस्थापना के तौर पर सीएम सैक्रेटेरिएट में रहे। सो सीएम से नजदीकी ने राष्टï्रपति पुरस्कार दिला दिया। गुजरात के डी.जी. बंजारा फर्जी एनकाउंटर कर मैडल पाते गए। पर अपनी सरकार कभी पानी बाबा के नाम से मशहूर राजेंद्र सिंह जैसे लोगों के बारे में नहीं सोचती। भले राजेंद्र सिंह को मैग्सेसे पुरस्कार किसी अन्य देश से क्यों न मिल जाए। सहानुभूति के लिए शहीदों के परिजनों को अवार्ड देना तो परंपरा बन गई। पर उपलब्धियां भुनाने को भी हरभजन, धोनी जैसों को पद्म श्री मिल जाता। भले विज्ञापनों की शूटिंग में व्यस्त धोनी-हरभजन के पास देश का नागरिक सम्मान लेने की फुरसत न हो। पर राजनीति और अफसरशाही में चोली-दामन का ऐसा रिश्ता बन चुका। जो एक-दूसरे के बिना नंगा दिखे। सो नेता को भी रसूख चाहिए। अफसरशाही को भी राजनीतिक वरदहस्त। सो दोनों मिल-बांट कर रेवड़ी खाते। अपने-अपनों को मैडल और सम्मान दिला जाते। पर उंगली न उठे, सो एकाध बाबा आम्टे जैसे लोगों को भी सम्मान दिया जाता। ताकि एक ईमानदार-योग्य की छतरी में सारे बेईमान समा जाएं। अफसरानों में किसी एक राजनेता को गॉड फादर मानकर उसके इशारों पर चलने की आदत। सो राजनीतिक कमिटेड अफसरों को ईमानदार और योग्य अफसरों की वरिष्ठïता लांघकर पुरस्कृत करने का भी चलन आम। तभी तो खुद अफसर रहे देश के पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त टी.एन. शेषन ने अपनी अफसरशाही को 'पॉलिश्ड कॉल गल्र्स' की उपाधि दी थी। आजादी से पहले और अबकी अफसरशाही में कोई खास फर्क नहीं। सो चालाक अफसरान स्पष्टïवादिता के बजाए 'जी हुजूरी' से नहीं हिचकिचाते। तभी तो पुलिस रिफॉर्म की फाइल धूल फांक रही। आतंकी पुलिस की नाक के नीचे से भाग रहे। पर सिर्फ पुलिस मैडल ही नहीं, अपना सर्वोच्च राष्टï्रीय सम्मान भारत रत्न भी राजनीति से सराबोर। तभी तो इंदिरा गांधी को 1971 में राजीव गांधी को मरणोपरांत 1991 में ही भारत रत्न मिल गया। पर सरदार पटेल को 1991 में, मौलाना अबुल कलाम आजाद को 1992 में। सुभाष चंद्र बोस को भी 1992 में नवाजा गया। पर सुप्रीम कोर्ट के दखल से नेताजी का नाम लिस्ट से हटाना पड़ा।
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04/01/2010
Friday, January 1, 2010
कांग्रेस मार रही खर्राटे, बीजेपी करेगी पहरेदारी
इंडिया गेट से
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कांग्रेस मार रही खर्राटे,
बीजेपी करेगी पहरेदारी
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संतोष कुमार
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नया साल आया, तो नई शुरुआत भी होगी। सो बीजेपी ने संकल्प लिया। अब संकल्प नया या पुराना, आगे बात करेंगे। पर बीजेपी वॉचडॉग की भूमिका निभाएगी। यों आडवाणी मनमोहन की दूसरी पारी में अपने सांसदों की सक्रियता पर खूब पीठ ठोक चुके। सो अबकी भूमिका में नया अंदाज क्या होगा, मालूम नहीं। पर बीजेपी दस का दम दिखाएगी। नए साल में सरकार पर निगाह रखने को दस मुद्दे तय हो गए। सो आप भी मुद्दे देख लो। पहला- महंगाई, जो कांग्रेस राज में खूब तेजी से बढ़ी। पर सरकार रोकने में नाकाम। संसद में बहस हुई। तो गिन-गिनाकर बहस के वक्त सदन में 17 सांसद दिखे। यानी विपक्ष हो या सत्तापक्ष। जनता के मुद्दों में किसका कितना इंटरेस्ट, आप सबको बखूबी मालूम। दूसरा- आतंकवाद और नक्सलवाद। तीसरा- पाकिस्तान से संबंध की नीति। चौथा- रंगनाथ मिश्र रपट। जिस पर सरकार ढाई साल बाद भी एटीआर पेश करने की हिमाकत नहीं दिखा सकी। पर खुद एनडीए में रंगनाथ रपट पर एक राय नहीं। सो बीजेपी अपने एजंडे पर खेलेगी। यानी बीजेपी की दलील, अगर रपट पर अमल हुआ। तो एससी, एसटी, ओबीसी के आरक्षण अधिकार कम होंगे। पांचवां- महिला आरक्षण बिल। जिस पर संसद का बहुमत तो साथ, पर आम सहमति नहीं। सो गेंद सरकार के पाले में। पर बीजेपी भला अकेली कांग्रेस को क्रेडिट क्यों लेने दे। सो गाहे-ब-गाहे मुद्दा उठाएगी। छठा- सिख विरोधी दंगों के आरोपियों पर कार्रवाई। बीते साल के आखिरी दिन सरकार ने सज्जन कुमार के खिलाफ केस चलाने की हरी झंडी दे दी। पर जगदीश टाइटलर की तकदीर का फैसला नहीं। वैसे भी टाइटलर अब बिहार कांग्रेस के प्रभारी। जहां राहुल गांधी का फार्मूला लागू होने वाला। इसी साल बिहार विधानसभा का चुनाव होगा। तो नीतिश की अग्रि परीक्षा होगी। दूसरी तरफ लालू-पासवान की जमीन के लिए जद्दोजहद। पर यूपी में कांग्रेस का जीर्णोद्धार कर चुके राहुल अब बिहार का रुख करेंगे। यों बिहार में बीजेपी की राह भी आसान नहीं। जब उड़ीसा में बीजू जनता दल से बीजेपी का गठजोड़ टूटा। तो खुद बीजेपी के नेताओं ने यही हश्र बिहार में होने का अंदेशा जताया। सो सीटों का तालमेल नीतिश और बीजेपी का रिश्ता तय करेगा। सातवां- कश्मीर की स्वायत्तता की फिर से उठ रही मांग। यों स्वायत्तता की मांग कोई नई बात नहीं। नेशनल कांफ्रेंस ने 1996 के विधानसभा चुनाव में स्वायत्तता को मुख्य चुनावी मुद्दा बनाया। दो तिहाई बहुमत से सत्ता में आई। तो इस मसले पर डा. कर्ण सिंह की रहनुमाई में कमेटी बना दी। बाद में कमेटी की सिफारिशों पर राज्य विधानसभा ने स्वायत्तता प्रस्ताव केंद्र सरकार को भेजा। पर एनडीए की सहयोगी नेशनल कांफ्रेंस की सरकार होने के बाद भी केंद्र सरकार ने चार जुलाई 2000 को स्वायत्तता प्रस्ताव नामंजूर कर दिया। प्रस्ताव को देश की एकता के खिलाफ बताया गया। अब फिर जम्मू-कश्मीर में एनसी की सरकार। अबके भी फारुक अब्दुल्ला केंद्र सरकार में साझीदार। आठवां- किसान समस्या। नौवां- तेलंगाना। जिसकी आग नहीं बुझ रही। और आखिरी- सरकार के कामकाज के तौर-तरीकों पर निगरानी। ताकि कहीं चूक हो, तो सरकार को बेनकाब कर सकें। यों बीजेपी ने जिम्मेदार विपक्ष के नाते संसद में इन मुद्दों पर सरकार को सुझाव देने का भी एलान किया। अब आपने दस का दम देख लिया होगा। सो सोचो, ऐसे कौन से मुद्दे, जिन पर बीजेपी ने बीते साल सवाल नहीं उठाए? कुल मिलाकर बीजेपी में नएपन की उमंग। सो साफ-सफाई कर पुराने मुद्दे को ही नए साल का संकल्प बना लिया। पर बीजेपी खुद के झगड़ों से कितना दूर रह पाएगी। नितिन गडकरी ने चापलूसी और गुलदस्ते पर पाबंदी लगाई। पर नंबर बढ़ाने वाले कहां मानते। तभी तो साहिब सिंह के बेटे प्रवेश वर्मा ने गडकरी को चांदी का मुकुट पहना दिया। गडकरी ने खुशी-खुशी पहन भी लिया। अब खुद गडकरी ने नई बात कह दी। यों मीडिया से दूरी बनाने की बात कर रहे थे। पर दिल्ली में नए-नए। सो पहचान बढ़ाने में जुटे। एक टीवी इंटरव्यू में खुलासा कर दिया। आडवाणी तो नरेंद्र मोदी को अध्यक्ष बनाना चाह रहे थे। पर मोदी ने दिल्ली आने से इनकार कर दिया। अब गडकरी उवाच आडवाणी की सत्ता को चुनौती या कुछ और। यह तो गडकरी और मोहन भागवत ही जानें। पर असली खेल तब शुरू होगा। जब गडकरी अपनी नई टीम का एलान कर देंगे। तभी मालूम पड़ेगा, बीजेपी मनमोहन सरकार को दस का दम दिखाएगी। या अपने झगड़ों में दम तोड़ेगी। पर नया अध्यक्ष, नया साल। सो बीजेपी नई-नई दिख रही। अब नए साल के संकल्प पर वाकई बीजेपी आगे बढ़े। तो वॉचडॉग कहलाए। अपने लेफ्ट वालों के पास अब कुछ बचा नहीं। सो कोई संकल्प नहीं लिया। पर पीएम को चि_ïी लिख दी। ताकि नेताजी सुभाष चंद्र बोस की जयंती 23 जनवरी को देश प्रेम दिवस घोषित किया जा सके। अब कोई पूछे, जब मनमोहन सरकार को पिछले टर्म में लेफ्टिए उंगली पर नचा रहे थे। तब ऐसा क्यों नहीं कराया? अब बंगाल में डूब रहे। तो नदी किनारे लोटा लेकर नहा रहे। पर कांग्रेस को देखिए। नया साल था। तो सोनिया गांधी सपरिवार लक्षद्वीप में छुट्टïी मना रहीं। सो संकल्प कौन लेगा। वैसे भी कांग्रेस का सितारा खुद-ब-खुद बुलंद हो रहा। तो नए संकल्प की क्या जरूरत। यानी न्यू ईयर रिजोल्यूशन- कांग्रेस मार रही खर्राटे, बीजेपी करेगी पहरेदारी।
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01/01/2010
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कांग्रेस मार रही खर्राटे,
बीजेपी करेगी पहरेदारी
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संतोष कुमार
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नया साल आया, तो नई शुरुआत भी होगी। सो बीजेपी ने संकल्प लिया। अब संकल्प नया या पुराना, आगे बात करेंगे। पर बीजेपी वॉचडॉग की भूमिका निभाएगी। यों आडवाणी मनमोहन की दूसरी पारी में अपने सांसदों की सक्रियता पर खूब पीठ ठोक चुके। सो अबकी भूमिका में नया अंदाज क्या होगा, मालूम नहीं। पर बीजेपी दस का दम दिखाएगी। नए साल में सरकार पर निगाह रखने को दस मुद्दे तय हो गए। सो आप भी मुद्दे देख लो। पहला- महंगाई, जो कांग्रेस राज में खूब तेजी से बढ़ी। पर सरकार रोकने में नाकाम। संसद में बहस हुई। तो गिन-गिनाकर बहस के वक्त सदन में 17 सांसद दिखे। यानी विपक्ष हो या सत्तापक्ष। जनता के मुद्दों में किसका कितना इंटरेस्ट, आप सबको बखूबी मालूम। दूसरा- आतंकवाद और नक्सलवाद। तीसरा- पाकिस्तान से संबंध की नीति। चौथा- रंगनाथ मिश्र रपट। जिस पर सरकार ढाई साल बाद भी एटीआर पेश करने की हिमाकत नहीं दिखा सकी। पर खुद एनडीए में रंगनाथ रपट पर एक राय नहीं। सो बीजेपी अपने एजंडे पर खेलेगी। यानी बीजेपी की दलील, अगर रपट पर अमल हुआ। तो एससी, एसटी, ओबीसी के आरक्षण अधिकार कम होंगे। पांचवां- महिला आरक्षण बिल। जिस पर संसद का बहुमत तो साथ, पर आम सहमति नहीं। सो गेंद सरकार के पाले में। पर बीजेपी भला अकेली कांग्रेस को क्रेडिट क्यों लेने दे। सो गाहे-ब-गाहे मुद्दा उठाएगी। छठा- सिख विरोधी दंगों के आरोपियों पर कार्रवाई। बीते साल के आखिरी दिन सरकार ने सज्जन कुमार के खिलाफ केस चलाने की हरी झंडी दे दी। पर जगदीश टाइटलर की तकदीर का फैसला नहीं। वैसे भी टाइटलर अब बिहार कांग्रेस के प्रभारी। जहां राहुल गांधी का फार्मूला लागू होने वाला। इसी साल बिहार विधानसभा का चुनाव होगा। तो नीतिश की अग्रि परीक्षा होगी। दूसरी तरफ लालू-पासवान की जमीन के लिए जद्दोजहद। पर यूपी में कांग्रेस का जीर्णोद्धार कर चुके राहुल अब बिहार का रुख करेंगे। यों बिहार में बीजेपी की राह भी आसान नहीं। जब उड़ीसा में बीजू जनता दल से बीजेपी का गठजोड़ टूटा। तो खुद बीजेपी के नेताओं ने यही हश्र बिहार में होने का अंदेशा जताया। सो सीटों का तालमेल नीतिश और बीजेपी का रिश्ता तय करेगा। सातवां- कश्मीर की स्वायत्तता की फिर से उठ रही मांग। यों स्वायत्तता की मांग कोई नई बात नहीं। नेशनल कांफ्रेंस ने 1996 के विधानसभा चुनाव में स्वायत्तता को मुख्य चुनावी मुद्दा बनाया। दो तिहाई बहुमत से सत्ता में आई। तो इस मसले पर डा. कर्ण सिंह की रहनुमाई में कमेटी बना दी। बाद में कमेटी की सिफारिशों पर राज्य विधानसभा ने स्वायत्तता प्रस्ताव केंद्र सरकार को भेजा। पर एनडीए की सहयोगी नेशनल कांफ्रेंस की सरकार होने के बाद भी केंद्र सरकार ने चार जुलाई 2000 को स्वायत्तता प्रस्ताव नामंजूर कर दिया। प्रस्ताव को देश की एकता के खिलाफ बताया गया। अब फिर जम्मू-कश्मीर में एनसी की सरकार। अबके भी फारुक अब्दुल्ला केंद्र सरकार में साझीदार। आठवां- किसान समस्या। नौवां- तेलंगाना। जिसकी आग नहीं बुझ रही। और आखिरी- सरकार के कामकाज के तौर-तरीकों पर निगरानी। ताकि कहीं चूक हो, तो सरकार को बेनकाब कर सकें। यों बीजेपी ने जिम्मेदार विपक्ष के नाते संसद में इन मुद्दों पर सरकार को सुझाव देने का भी एलान किया। अब आपने दस का दम देख लिया होगा। सो सोचो, ऐसे कौन से मुद्दे, जिन पर बीजेपी ने बीते साल सवाल नहीं उठाए? कुल मिलाकर बीजेपी में नएपन की उमंग। सो साफ-सफाई कर पुराने मुद्दे को ही नए साल का संकल्प बना लिया। पर बीजेपी खुद के झगड़ों से कितना दूर रह पाएगी। नितिन गडकरी ने चापलूसी और गुलदस्ते पर पाबंदी लगाई। पर नंबर बढ़ाने वाले कहां मानते। तभी तो साहिब सिंह के बेटे प्रवेश वर्मा ने गडकरी को चांदी का मुकुट पहना दिया। गडकरी ने खुशी-खुशी पहन भी लिया। अब खुद गडकरी ने नई बात कह दी। यों मीडिया से दूरी बनाने की बात कर रहे थे। पर दिल्ली में नए-नए। सो पहचान बढ़ाने में जुटे। एक टीवी इंटरव्यू में खुलासा कर दिया। आडवाणी तो नरेंद्र मोदी को अध्यक्ष बनाना चाह रहे थे। पर मोदी ने दिल्ली आने से इनकार कर दिया। अब गडकरी उवाच आडवाणी की सत्ता को चुनौती या कुछ और। यह तो गडकरी और मोहन भागवत ही जानें। पर असली खेल तब शुरू होगा। जब गडकरी अपनी नई टीम का एलान कर देंगे। तभी मालूम पड़ेगा, बीजेपी मनमोहन सरकार को दस का दम दिखाएगी। या अपने झगड़ों में दम तोड़ेगी। पर नया अध्यक्ष, नया साल। सो बीजेपी नई-नई दिख रही। अब नए साल के संकल्प पर वाकई बीजेपी आगे बढ़े। तो वॉचडॉग कहलाए। अपने लेफ्ट वालों के पास अब कुछ बचा नहीं। सो कोई संकल्प नहीं लिया। पर पीएम को चि_ïी लिख दी। ताकि नेताजी सुभाष चंद्र बोस की जयंती 23 जनवरी को देश प्रेम दिवस घोषित किया जा सके। अब कोई पूछे, जब मनमोहन सरकार को पिछले टर्म में लेफ्टिए उंगली पर नचा रहे थे। तब ऐसा क्यों नहीं कराया? अब बंगाल में डूब रहे। तो नदी किनारे लोटा लेकर नहा रहे। पर कांग्रेस को देखिए। नया साल था। तो सोनिया गांधी सपरिवार लक्षद्वीप में छुट्टïी मना रहीं। सो संकल्प कौन लेगा। वैसे भी कांग्रेस का सितारा खुद-ब-खुद बुलंद हो रहा। तो नए संकल्प की क्या जरूरत। यानी न्यू ईयर रिजोल्यूशन- कांग्रेस मार रही खर्राटे, बीजेपी करेगी पहरेदारी।
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01/01/2010
Thursday, December 31, 2009
लोकतंत्र की परिपक्वता की मिसाल रहेगा बीता साल
इंडिया गेट से
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लोकतंत्र की परिपक्वता की
मिसाल रहेगा बीता साल
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संतोष कुमार
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समय और लहरें किसी का इंतजार नहीं करतीं। सो 2009 आया और नौ-दो-ग्यारह हो गया। अब समय का चक्र 2010 में। सो नूतन वर्ष की आपको शुभकामना। पर बीता साल रोजमर्रा की जिंदगी में ग्रहण लगाता रहा। अबके नए साल की शुरुआत ही चंद्र ग्रहण से। चांद पर यों दाग बहुतेरे। सो विज्ञान के दौर में शुभ-अशुभ के फेर में पड़ हम-आप क्यों वक्त गंवाएं। अब चंद्र ग्रहण लगे या सूर्य ग्रहण, कोई फर्क नहीं पड़ता। बीते साल अपना चंद्रयान चांद पर पहुंच गया। तो ऐसा रहस्योद्घाटन। दुनिया ताकती रह गई। भले अपना चंद्रयान नाकाम हो गया। पर नाकामी से भी भारत ने नई इबारत लिख दी। चांद पर पानी की खोज करने वाला देश बन गया भारत। पर अमेरिका की नासा को लगा, बादशाहत टूट रही। तो चांद पर और धब्बा लगाने क्रेटर भेज दिया। क्रेटर ने चांद पर जोरदार टक्कर मारी। ताकि पानी की थाह विस्तार से लगा सके। वैसे भी अमेरिका अब जुगाड़ में माहिर हो चुका। तभी तो 2009 में ही बराक ओबामा पहले अश्वेत राष्टï्रपति बने। उसी साल शांति का नोबल भी मिल गया। शायद यही कमाल की बात रही। सो जहां 2008 में भारत औसतन हर महीने आतंकी हमले का शिकार रहा। वहां 2009 में कोई हमला नहीं। अपने होम मिनिस्टर पी. चिदंबरम ने क्रेडिट किस्मत को दिया, खुफिया विभाग को नहीं। सो किस्मत की चाबी किसके हाथ, आप खुद समझ लो। पर आतंकी हमले न सही, नक्सलियों ने नाक में दम कर दिया। पुलिस बल की नाक में घुसकर बाल नोंच डाले। लालगढ़ से लेकर राजधानी एक्सप्रेस नक्सली कब्जे में गया। अब चिदंबरम नक्सलियों से निपटने में दो-तीन साल का वक्त लगने की बात कर रहे। सो सिर्फ साल बीता, संकट नहीं। चुनौतियां 2010 में भी मुंह बाए खड़ीं। बीते साल देश की गरीबी पर अंग्रेज डायरेक्टर ने 'स्लमडॉग मिलेनियर' फिल्म बनाई। तो ऑस्कर मिल गया। ऑस्कर से सबसे ज्यादा खुशी कांग्रेस को हुई। फिल्म के गाने का पेटेंट करा लिया। पर गरीबी के प्रदर्शन पर काहे की खुशी। सो जब मनमोहन दुबारा सत्ता में लौटे। तो राष्टï्रपति अभिभाषण में वादा किया। पांच साल में देश स्लम मुक्त होगा। पर गाड़ी कितनी आगे बढ़ी, अपने को मालूम नहीं। अकेले मुंबई की 54 फीसदी आबादी झुग्गियों में रहती। गरीबी के मामले में भी देश पीछे नहीं। सो कहीं पांच साल बाद मनमोहन यही वादा न दोहरा दें। महंगाई और मंदी पर तो यही हुआ। महंगाई बढ़ती रही, मनमोहन-चिदंबरम-मोंटेक और अब प्रणव दिलासा देते रहे। विदा लेते साल में खाद्य वस्तुओं की महंगाई दर 20 फीसदी तक पहुंच गई। भले जनता ने समस्या देने वाली कांग्रेस पर ही एतबार किया। पर शेक्सपीयर ने कहा था- 'जिसने एक बार धोखा दे दिया हो, उसका विश्वास नहीं करना चाहिए।' फिर भी जनता ने मनमोहन पर भरोसा जताया। तो अबके हिसाब-किताब चाहिए। पर योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह आहलूवालिया अब महंगाई शब्द सुनकर ही कुर्सी से खड़े हो जाते। अब मोंटेक कुर्सी से खड़े हों या बैठे रहें। पर आम आदमी की तो खाट खड़ी हो चुकी। सो अब कांग्रेस और सरकार के पास कोई बहानेबाजी नहीं। जनता एक सीमा तक ही धैर्य रख सकती। जिसकी मिसाल 26/11 के हमले के बाद राजनेताओं को मिल चुकी। वाकई 2009 अपने लोकतंत्र की परिपक्वता का साल रहा। जनता ने तमाम रणनीतिकारों और क्षत्रपों को ऐसी धूल चटाई। लालू-पासवान-मुलायम-माया-चंद्रबाबू-जयललिता-कारत-वर्धन-देवगौड़ा जैसे क्षत्रप घर-घर जाकर पानी मांग रहे। मार्च 2009 तक जिन लेफ्टियों-लालुओं को महंगाई नहीं दिखती थी। अब महंगाई पर आंदोलन कर रहे। क्षेत्रीय ताकतें कांग्रेस के बढ़ते ग्राफ से इस कदर सहमीं। सबको जमीन दिखने लगी। सो 2009 में जनता ने कमाल दिखाया। तो दिग्गज अब जमीन पर जड़ें जमाने में जुटे। इसी साल अक्टूबर में बिहार के चुनाव। फिर कई और चुनाव आएंगे। सो क्षेत्रीय दल फिर पैर जमाने में लग गए। यानी 2009 समूची राजनीति के लिए सबक। भले जनता बीती ताहि बिसार देगी। पर आगे की सुध नहीं ली। तो जनता की लाठी में आवाज नहीं, सिर्फ चोट होती। अगर चोट का असली दर्द पूछना हो। तो बीजेपी से पूछ लो। सो 2010 में बीजेपी नई शुरुआत की सोच रही। नितिन गडकरी ने फिल्मी गीत गुनगुना दिया- 'छोड़ो कल की बातें, कल की बात पुरानी।' पर बीजेपी को सिर्फ संगठन की फिक्र। सरकार के सामने 2010 में कई बड़ी चुनौतियां। महंगाई पर नकेल हो। तेलंगाना की सुलगी आग पर पानी डालना। संसद पर हमले का दोषी अफजल तिहाड़ में। मुंबई हमले का एकमात्र जिंदा आतंकी कसाब पर फैसला आना बाकी। सो सरकार को आतंकवाद पर वोट की फिक्र किए बिना मजबूत जिगरा दिखाना होगा। बीते साल में महिला बिल पर स्टेंडिंग कमेटी की रपट आ चुकी। सो 2010 में बिल पारित कराने की चुनौती। पर सबसे अहम, देश की साख बचाना। जो नेतागिरी के जाल में उलझ चुकी। जी हां, बात कॉमन वैल्थ गेम्स की। जिसकी तैयारी पर 2009 में खूब सवाल उठे। नए साल के आखिरी महीनों में खेल होना। पर कहीं ऐसा न हो, अपने राजनेता देश की साख को भी 'खेल' बना दें। जैसे 2009 के आखिर में क्रिकेट के कोटला मैदान ने कलंकित किया। पर नया साल है। तो सोच पुरानी क्यों रहे। सो 2010 में उम्मीद यही। व्यवस्था की जड़ों में पहुंचे खाद-पानी। तो कम हो आम आदमी की समस्या। पर कहीं ऐसा न हो, नए साल की उमंग मौसम के करबट लेते ही हवा हो जाए।
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31/12/2009
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लोकतंत्र की परिपक्वता की
मिसाल रहेगा बीता साल
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संतोष कुमार
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समय और लहरें किसी का इंतजार नहीं करतीं। सो 2009 आया और नौ-दो-ग्यारह हो गया। अब समय का चक्र 2010 में। सो नूतन वर्ष की आपको शुभकामना। पर बीता साल रोजमर्रा की जिंदगी में ग्रहण लगाता रहा। अबके नए साल की शुरुआत ही चंद्र ग्रहण से। चांद पर यों दाग बहुतेरे। सो विज्ञान के दौर में शुभ-अशुभ के फेर में पड़ हम-आप क्यों वक्त गंवाएं। अब चंद्र ग्रहण लगे या सूर्य ग्रहण, कोई फर्क नहीं पड़ता। बीते साल अपना चंद्रयान चांद पर पहुंच गया। तो ऐसा रहस्योद्घाटन। दुनिया ताकती रह गई। भले अपना चंद्रयान नाकाम हो गया। पर नाकामी से भी भारत ने नई इबारत लिख दी। चांद पर पानी की खोज करने वाला देश बन गया भारत। पर अमेरिका की नासा को लगा, बादशाहत टूट रही। तो चांद पर और धब्बा लगाने क्रेटर भेज दिया। क्रेटर ने चांद पर जोरदार टक्कर मारी। ताकि पानी की थाह विस्तार से लगा सके। वैसे भी अमेरिका अब जुगाड़ में माहिर हो चुका। तभी तो 2009 में ही बराक ओबामा पहले अश्वेत राष्टï्रपति बने। उसी साल शांति का नोबल भी मिल गया। शायद यही कमाल की बात रही। सो जहां 2008 में भारत औसतन हर महीने आतंकी हमले का शिकार रहा। वहां 2009 में कोई हमला नहीं। अपने होम मिनिस्टर पी. चिदंबरम ने क्रेडिट किस्मत को दिया, खुफिया विभाग को नहीं। सो किस्मत की चाबी किसके हाथ, आप खुद समझ लो। पर आतंकी हमले न सही, नक्सलियों ने नाक में दम कर दिया। पुलिस बल की नाक में घुसकर बाल नोंच डाले। लालगढ़ से लेकर राजधानी एक्सप्रेस नक्सली कब्जे में गया। अब चिदंबरम नक्सलियों से निपटने में दो-तीन साल का वक्त लगने की बात कर रहे। सो सिर्फ साल बीता, संकट नहीं। चुनौतियां 2010 में भी मुंह बाए खड़ीं। बीते साल देश की गरीबी पर अंग्रेज डायरेक्टर ने 'स्लमडॉग मिलेनियर' फिल्म बनाई। तो ऑस्कर मिल गया। ऑस्कर से सबसे ज्यादा खुशी कांग्रेस को हुई। फिल्म के गाने का पेटेंट करा लिया। पर गरीबी के प्रदर्शन पर काहे की खुशी। सो जब मनमोहन दुबारा सत्ता में लौटे। तो राष्टï्रपति अभिभाषण में वादा किया। पांच साल में देश स्लम मुक्त होगा। पर गाड़ी कितनी आगे बढ़ी, अपने को मालूम नहीं। अकेले मुंबई की 54 फीसदी आबादी झुग्गियों में रहती। गरीबी के मामले में भी देश पीछे नहीं। सो कहीं पांच साल बाद मनमोहन यही वादा न दोहरा दें। महंगाई और मंदी पर तो यही हुआ। महंगाई बढ़ती रही, मनमोहन-चिदंबरम-मोंटेक और अब प्रणव दिलासा देते रहे। विदा लेते साल में खाद्य वस्तुओं की महंगाई दर 20 फीसदी तक पहुंच गई। भले जनता ने समस्या देने वाली कांग्रेस पर ही एतबार किया। पर शेक्सपीयर ने कहा था- 'जिसने एक बार धोखा दे दिया हो, उसका विश्वास नहीं करना चाहिए।' फिर भी जनता ने मनमोहन पर भरोसा जताया। तो अबके हिसाब-किताब चाहिए। पर योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह आहलूवालिया अब महंगाई शब्द सुनकर ही कुर्सी से खड़े हो जाते। अब मोंटेक कुर्सी से खड़े हों या बैठे रहें। पर आम आदमी की तो खाट खड़ी हो चुकी। सो अब कांग्रेस और सरकार के पास कोई बहानेबाजी नहीं। जनता एक सीमा तक ही धैर्य रख सकती। जिसकी मिसाल 26/11 के हमले के बाद राजनेताओं को मिल चुकी। वाकई 2009 अपने लोकतंत्र की परिपक्वता का साल रहा। जनता ने तमाम रणनीतिकारों और क्षत्रपों को ऐसी धूल चटाई। लालू-पासवान-मुलायम-माया-चंद्रबाबू-जयललिता-कारत-वर्धन-देवगौड़ा जैसे क्षत्रप घर-घर जाकर पानी मांग रहे। मार्च 2009 तक जिन लेफ्टियों-लालुओं को महंगाई नहीं दिखती थी। अब महंगाई पर आंदोलन कर रहे। क्षेत्रीय ताकतें कांग्रेस के बढ़ते ग्राफ से इस कदर सहमीं। सबको जमीन दिखने लगी। सो 2009 में जनता ने कमाल दिखाया। तो दिग्गज अब जमीन पर जड़ें जमाने में जुटे। इसी साल अक्टूबर में बिहार के चुनाव। फिर कई और चुनाव आएंगे। सो क्षेत्रीय दल फिर पैर जमाने में लग गए। यानी 2009 समूची राजनीति के लिए सबक। भले जनता बीती ताहि बिसार देगी। पर आगे की सुध नहीं ली। तो जनता की लाठी में आवाज नहीं, सिर्फ चोट होती। अगर चोट का असली दर्द पूछना हो। तो बीजेपी से पूछ लो। सो 2010 में बीजेपी नई शुरुआत की सोच रही। नितिन गडकरी ने फिल्मी गीत गुनगुना दिया- 'छोड़ो कल की बातें, कल की बात पुरानी।' पर बीजेपी को सिर्फ संगठन की फिक्र। सरकार के सामने 2010 में कई बड़ी चुनौतियां। महंगाई पर नकेल हो। तेलंगाना की सुलगी आग पर पानी डालना। संसद पर हमले का दोषी अफजल तिहाड़ में। मुंबई हमले का एकमात्र जिंदा आतंकी कसाब पर फैसला आना बाकी। सो सरकार को आतंकवाद पर वोट की फिक्र किए बिना मजबूत जिगरा दिखाना होगा। बीते साल में महिला बिल पर स्टेंडिंग कमेटी की रपट आ चुकी। सो 2010 में बिल पारित कराने की चुनौती। पर सबसे अहम, देश की साख बचाना। जो नेतागिरी के जाल में उलझ चुकी। जी हां, बात कॉमन वैल्थ गेम्स की। जिसकी तैयारी पर 2009 में खूब सवाल उठे। नए साल के आखिरी महीनों में खेल होना। पर कहीं ऐसा न हो, अपने राजनेता देश की साख को भी 'खेल' बना दें। जैसे 2009 के आखिर में क्रिकेट के कोटला मैदान ने कलंकित किया। पर नया साल है। तो सोच पुरानी क्यों रहे। सो 2010 में उम्मीद यही। व्यवस्था की जड़ों में पहुंचे खाद-पानी। तो कम हो आम आदमी की समस्या। पर कहीं ऐसा न हो, नए साल की उमंग मौसम के करबट लेते ही हवा हो जाए।
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31/12/2009
Wednesday, December 30, 2009
तो साल 2009: कांग्रेस ने सिर्फ दर्द दिया, दवा नहीं
इंडिया गेट से
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तो साल 2009: कांग्रेस ने
सिर्फ दर्द दिया, दवा नहीं
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संतोष कुमार
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तो सफरनामा- 2009 में आज बात कांग्रेस की। शुरुआती दिन 26/11 की कालिमा में ही गुजरे। पर अरसे बाद देश में जागरूकता दिखी। जब जनता ने आतंकवाद को राजनीतिक मुद्दा नहीं बनने दिया। अलबत्ता ऐसी लहर चली। कांग्रेस हो या बीजेपी, मुंह छुपाती दिखीं। पर सेमीफाइनल में बीजेपी का राजस्थान किला ढहना। कांग्रेस की उम्मीद बढ़ा गया। सो आतंकवाद के मसले पर स्ट्रेटजिक बैटिंग की। पाक से युद्ध जैसा माहौल बना वैश्विक कूटनीति पर फोकस किया। ताकि चुनावी जीत का आधार बुना जा सके। सो राजस्थान की जीत का क्रेडिट राहुल गांधी को गया। तो फोटोजनिक फेस वाले राहुल पर भी धुन सवार हुई। सो फौरन कांग्रेस का चापलूस तंत्र एक्टिव हो गया। मनमोहन 2009 की शुरुआत में ही अस्वस्थ हो गए। गणतंत्र दिवस की परेड में शामिल न हो सके। सोनिया ने मनमोहन का आधा काम प्रणव दा को दिया। तो आधा ए.के. एंटनी को। गणतंत्र दिवस से दो दिन पहले एम्स में मनमोहन की हर्ट सर्जरी हुई। लगा, मनमोहन की पारी खत्म। सो राहुल बाबा को साउथ ब्लॉक भेजने की मांग शुरू हो गई। पर सोनिया गांधी ने चतुराई दिखाई। मैनीफेस्टो एलान के दिन 24 मार्च को मनमोहन को ही पीएम प्रोजैक्ट कर दिया। गांधी-नेहरू खानदान से इतर पहली बार कांग्रेस ने पीएम प्रोजैक्ट किया। सो मनमोहन के हौसले भी बुलंद। पर सोनिया ने राहुल को प्रोजैक्ट न कर 2014 की नींव रखी। सो 2009 का चुनाव लैब टेस्ट के आधार पर हुआ। राहुल ने शॉर्ट टर्म और लाँग टर्म स्ट्रेटजी बनाई। कांग्रेस ने यूपीए का नेशनल अलायंस नहीं बनाया। अलबत्ता राज्यों में तालमेल का फार्मूला रखा। तो लालू-पासवान तमतमा उठे। सो यूपीए बिखरने लगा। राहुल ने भी एकला मोर्चा संभाला। तो वोटरों में नई उम्मीद जगी। राहुल का दलितों के घर जाना तो विरोधियों को आज भी चुभ रहा। पर राहुल की मंजिल तय। सो राहुल तैयार स्क्रिप्ट से आगे बढ़ रहे। तभी तो कांग्रेस के युवा नेतृत्व में वंशवाद की झलक। पर राहुल का चेहरा सुर्खियां दिलाने लगा। तो कांग्रेस समस्याओं का चोला फेंक इतिहास से उपलब्धियों का झोला ले आई। आम चुनाव के लिए 'जय होÓ की धुन एक करोड़ में खरीद ली। भले खुद को गांधी की कांग्रेस बताने वाली मौजूदा कांग्रेस बापू के चश्मा, घड़ी, खड़ाऊं, चम्मच आदि नीलामी में खरीद नहीं पाई। वह तो शराब किंग विजय माल्या को थेंक्स। जिन ने भले शराब के पैसे से, पर बापू की अमानत तो बचा ली। पर कांग्रेस ने 'जय हो' गीत से फील गुड का अहसास कराया। यों कांग्रेसी रणनीतिकारों को बात जल्द समझ आ गई। महंगाई और मंदी बेलगाम घोड़े की तरह बढ़ती गई। तो कांग्रेस ने 'जय हो' की पैरोडी वापस ले ली। फिर चुनावी समर के बीच जूता प्रकरण। सिख विरोधी दंगों के आरोपियों सज्जन, टाइटलर को टिकट मिला। तो सिख समुदाय का घाव हरा हो गया। ऊपर से मनमोहन की मातहत सीबीआई ने कोर्ट में केस बंद करने की रपट दे दी। सो सरकार की लीपापोती देख जरनैल सिंह का पत्रकार मन मजहबी हो गया। भले नैतिक रूप से जरनैल का पी. चिदंबरम पर जूता फेंकना गलत। पर एक समाज का दर्द था। सो सात अप्रैल को जूता उछला। दो दिन के भीतर सज्जन, टाइटलर का टिकट कट गया। पर सीबीआई के बेजा इस्तेमाल की कहानी सिर्फ यही नहीं। बोफोर्स दलाली का मामला भी सीबीआई ने बंद करने की ठानी। क्वात्रोची को क्लीन चिट देने की रपट कोर्ट में। भले बवाल मचा। पर कांग्रेस ने राजनीति की ठसक नहीं छोड़ी। चुनाव आयुक्त नवीन चावला को हटाने की सिफारिश गोपाल स्वामी ने की। पर कांग्रेस ने चावला को हटाना तो दूर, सीईसी बना दिया। फिर भी विपक्ष लड़ाई को अंजाम तक नहीं पहुंचा सका। अलबत्ता बीजेपी आपस में इस कदर लड़ी-मरी। जनता का भरोसा सत्ता से ज्यादा विपक्ष से उठ गया। सो महंगाई, महामंदी जैसी विकराल समस्या के बावजूद कांग्रेस जीती। तो सत्ता के नशे में मगरूर। जनता का दुख-दर्द भुला दिया। सो हर जीत के साथ जनता की जेब पर डाका। आम चुनाव के बाद मीरा कुमार को पहली महिला स्पीकर बनाना। फिर सौ दिनी योजना की होड़ में बंटाधार की नीति। सो मनमोहन के सौ दिन छोडि़ए, 222 दिन बीत गए। पर महंगाई न थमी, न थमने वाली। सो सत्ता के नशे में चूर कांग्रेस ने पहले सत्र में ही कई गलतियां कीं। शर्म-अल-शेख का साझा बयान। सी.पी. जोशी का सदन में फंसना। जजों की संपत्ति वाला बिल वापस लेने की नौबत। स्वाइन फ्लू की मार और सरकार की नाकामी। पर जब जनता की समस्या कांग्रेस के बूते से बाहर हो गई। तो ध्यान बंटाने को सादगी का खेल। कैसे मनमोहन के मंत्री कृष्णा, थरूर का फाइव स्टार में मौज उड़ाना। राहुल का ट्रेन से जाना। सोनिया का 'कैटल क्लास' में सफर। चीन की धौंस-पट्टïी पर मनमोहन का गांधारी बनना। आतंकी डेविड हैडली के मामले में अमेरिका का दोगलापन। पर मनमोहन अभी भी अमेरिका के बेस्ट स्टूडेंट बनने में लगे। अब साल के अंत में एन.डी. तिवारी का सेक्स स्कैंडल वाला दाग। लिब्राहन और रंगनाथ मिश्र रपट की आंच तो बाद में। तेलंगाना की आग बुझ नहीं रही। आंध्र में वाई.एस.आर. की हादसे में मौत से कांग्रेस को भारी क्षति। सो अब आंध्र संभाले न संभल रहा। चिदंबरम ने अगले साल पांच जनवरी को फिर मीटिंग बुला ली। सो अब कोई पूछे, कहां है करिश्माई चेहरा? यानी कुल मिलाकर 2009 में कांग्रेस की नहीं, परिस्थितियों की जीत हुई। तीसरे मोर्चे ने आधार खोया। बीजेपी खुद में उलझी। सो मजबूर जनता ने कांग्रेस से ही अर्जी लगाई- 'तुम्हीं ने दर्द दिया है, तुम्हीं दवा देना।'
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30/12/2009
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तो साल 2009: कांग्रेस ने
सिर्फ दर्द दिया, दवा नहीं
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संतोष कुमार
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तो सफरनामा- 2009 में आज बात कांग्रेस की। शुरुआती दिन 26/11 की कालिमा में ही गुजरे। पर अरसे बाद देश में जागरूकता दिखी। जब जनता ने आतंकवाद को राजनीतिक मुद्दा नहीं बनने दिया। अलबत्ता ऐसी लहर चली। कांग्रेस हो या बीजेपी, मुंह छुपाती दिखीं। पर सेमीफाइनल में बीजेपी का राजस्थान किला ढहना। कांग्रेस की उम्मीद बढ़ा गया। सो आतंकवाद के मसले पर स्ट्रेटजिक बैटिंग की। पाक से युद्ध जैसा माहौल बना वैश्विक कूटनीति पर फोकस किया। ताकि चुनावी जीत का आधार बुना जा सके। सो राजस्थान की जीत का क्रेडिट राहुल गांधी को गया। तो फोटोजनिक फेस वाले राहुल पर भी धुन सवार हुई। सो फौरन कांग्रेस का चापलूस तंत्र एक्टिव हो गया। मनमोहन 2009 की शुरुआत में ही अस्वस्थ हो गए। गणतंत्र दिवस की परेड में शामिल न हो सके। सोनिया ने मनमोहन का आधा काम प्रणव दा को दिया। तो आधा ए.के. एंटनी को। गणतंत्र दिवस से दो दिन पहले एम्स में मनमोहन की हर्ट सर्जरी हुई। लगा, मनमोहन की पारी खत्म। सो राहुल बाबा को साउथ ब्लॉक भेजने की मांग शुरू हो गई। पर सोनिया गांधी ने चतुराई दिखाई। मैनीफेस्टो एलान के दिन 24 मार्च को मनमोहन को ही पीएम प्रोजैक्ट कर दिया। गांधी-नेहरू खानदान से इतर पहली बार कांग्रेस ने पीएम प्रोजैक्ट किया। सो मनमोहन के हौसले भी बुलंद। पर सोनिया ने राहुल को प्रोजैक्ट न कर 2014 की नींव रखी। सो 2009 का चुनाव लैब टेस्ट के आधार पर हुआ। राहुल ने शॉर्ट टर्म और लाँग टर्म स्ट्रेटजी बनाई। कांग्रेस ने यूपीए का नेशनल अलायंस नहीं बनाया। अलबत्ता राज्यों में तालमेल का फार्मूला रखा। तो लालू-पासवान तमतमा उठे। सो यूपीए बिखरने लगा। राहुल ने भी एकला मोर्चा संभाला। तो वोटरों में नई उम्मीद जगी। राहुल का दलितों के घर जाना तो विरोधियों को आज भी चुभ रहा। पर राहुल की मंजिल तय। सो राहुल तैयार स्क्रिप्ट से आगे बढ़ रहे। तभी तो कांग्रेस के युवा नेतृत्व में वंशवाद की झलक। पर राहुल का चेहरा सुर्खियां दिलाने लगा। तो कांग्रेस समस्याओं का चोला फेंक इतिहास से उपलब्धियों का झोला ले आई। आम चुनाव के लिए 'जय होÓ की धुन एक करोड़ में खरीद ली। भले खुद को गांधी की कांग्रेस बताने वाली मौजूदा कांग्रेस बापू के चश्मा, घड़ी, खड़ाऊं, चम्मच आदि नीलामी में खरीद नहीं पाई। वह तो शराब किंग विजय माल्या को थेंक्स। जिन ने भले शराब के पैसे से, पर बापू की अमानत तो बचा ली। पर कांग्रेस ने 'जय हो' गीत से फील गुड का अहसास कराया। यों कांग्रेसी रणनीतिकारों को बात जल्द समझ आ गई। महंगाई और मंदी बेलगाम घोड़े की तरह बढ़ती गई। तो कांग्रेस ने 'जय हो' की पैरोडी वापस ले ली। फिर चुनावी समर के बीच जूता प्रकरण। सिख विरोधी दंगों के आरोपियों सज्जन, टाइटलर को टिकट मिला। तो सिख समुदाय का घाव हरा हो गया। ऊपर से मनमोहन की मातहत सीबीआई ने कोर्ट में केस बंद करने की रपट दे दी। सो सरकार की लीपापोती देख जरनैल सिंह का पत्रकार मन मजहबी हो गया। भले नैतिक रूप से जरनैल का पी. चिदंबरम पर जूता फेंकना गलत। पर एक समाज का दर्द था। सो सात अप्रैल को जूता उछला। दो दिन के भीतर सज्जन, टाइटलर का टिकट कट गया। पर सीबीआई के बेजा इस्तेमाल की कहानी सिर्फ यही नहीं। बोफोर्स दलाली का मामला भी सीबीआई ने बंद करने की ठानी। क्वात्रोची को क्लीन चिट देने की रपट कोर्ट में। भले बवाल मचा। पर कांग्रेस ने राजनीति की ठसक नहीं छोड़ी। चुनाव आयुक्त नवीन चावला को हटाने की सिफारिश गोपाल स्वामी ने की। पर कांग्रेस ने चावला को हटाना तो दूर, सीईसी बना दिया। फिर भी विपक्ष लड़ाई को अंजाम तक नहीं पहुंचा सका। अलबत्ता बीजेपी आपस में इस कदर लड़ी-मरी। जनता का भरोसा सत्ता से ज्यादा विपक्ष से उठ गया। सो महंगाई, महामंदी जैसी विकराल समस्या के बावजूद कांग्रेस जीती। तो सत्ता के नशे में मगरूर। जनता का दुख-दर्द भुला दिया। सो हर जीत के साथ जनता की जेब पर डाका। आम चुनाव के बाद मीरा कुमार को पहली महिला स्पीकर बनाना। फिर सौ दिनी योजना की होड़ में बंटाधार की नीति। सो मनमोहन के सौ दिन छोडि़ए, 222 दिन बीत गए। पर महंगाई न थमी, न थमने वाली। सो सत्ता के नशे में चूर कांग्रेस ने पहले सत्र में ही कई गलतियां कीं। शर्म-अल-शेख का साझा बयान। सी.पी. जोशी का सदन में फंसना। जजों की संपत्ति वाला बिल वापस लेने की नौबत। स्वाइन फ्लू की मार और सरकार की नाकामी। पर जब जनता की समस्या कांग्रेस के बूते से बाहर हो गई। तो ध्यान बंटाने को सादगी का खेल। कैसे मनमोहन के मंत्री कृष्णा, थरूर का फाइव स्टार में मौज उड़ाना। राहुल का ट्रेन से जाना। सोनिया का 'कैटल क्लास' में सफर। चीन की धौंस-पट्टïी पर मनमोहन का गांधारी बनना। आतंकी डेविड हैडली के मामले में अमेरिका का दोगलापन। पर मनमोहन अभी भी अमेरिका के बेस्ट स्टूडेंट बनने में लगे। अब साल के अंत में एन.डी. तिवारी का सेक्स स्कैंडल वाला दाग। लिब्राहन और रंगनाथ मिश्र रपट की आंच तो बाद में। तेलंगाना की आग बुझ नहीं रही। आंध्र में वाई.एस.आर. की हादसे में मौत से कांग्रेस को भारी क्षति। सो अब आंध्र संभाले न संभल रहा। चिदंबरम ने अगले साल पांच जनवरी को फिर मीटिंग बुला ली। सो अब कोई पूछे, कहां है करिश्माई चेहरा? यानी कुल मिलाकर 2009 में कांग्रेस की नहीं, परिस्थितियों की जीत हुई। तीसरे मोर्चे ने आधार खोया। बीजेपी खुद में उलझी। सो मजबूर जनता ने कांग्रेस से ही अर्जी लगाई- 'तुम्हीं ने दर्द दिया है, तुम्हीं दवा देना।'
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30/12/2009
Tuesday, December 29, 2009
तो साल 2009, बीजेपी में जो हारा, वही सिकंदर
इंडिया गेट से
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तो साल 2009, बीजेपी में
जो हारा, वही सिकंदर
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संतोष कुमार
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तुम जियो हजारों साल, साल के दिन हों पचास हजार। पर न कोई हजार साल जी सकता। न साल के दिन पचास हजार हो सकते। सो 365 दिन बाद 2009 भी विदा ले रहा। अब महज कुछ घंटों का इंतजार, फिर 2010 का स्वागत। सो आखिरी दिन में लेखाजोखा भी जरूरी। तो आज शुरुआत बीजेपी के सफरनामे से। साल 2008 का अंत न देश के लिए शुभ रहा, न बीजेपी के लिए। देश ने 26/11 का दंश झेला। तो बीजेपी सेमीफाइनल में कांग्रेस से पिछड़ गई। राजस्थान का मजबूत किला ढह गया। तो हंगामे का आगाज भी वहीं से हुआ। यों शेखावत को चुनाव लडऩा नहीं था। पर वसुंधरा से नाराज बाबोसा ने पासा फेंका। सो समूची बीजेपी हिल गई। राजनाथ सिंह को मैदान में उतरना पड़ा। तो उन ने लोक-लिहाज नहीं किया। अलबत्ता शेखावत को गंगा स्नान के बाद कुंए में न नहाने की सलाह दी। अब जब रात हो इतनी मतवाली। तो सुबह का आलम क्या होगा। यह तो बीजेपी से पूछिए। शुरुआत पुरोधा ने की। तो बाकी कहां पीछे रहते। बीस जनवरी को कल्याण सिंह ने बीजेपी छोड़ दी। लोकसभा का चुनावी समर शुरू हुआ। तो आडवाणी खुद को भावी पीएम कम, मौजूदा पीएम की तरह व्यवहार करने लगे। हर अहम मसले पर विशेषज्ञों की मीटिंग। फिर नई कार्ययोजना का एलान। सो इर्द-गिर्द ऐसे लोगों का जमावड़ा हो गया। आडवाणी जमीनी हकीकत भांप नहीं पाए। समर में कांग्रेस से मुकाबला तो बाद में। पर पहले बीजेपी ने आपस में नेट प्रेक्टिस की। जेतली, वेंकैया में पोल मैनेजर बनने की होड़। बीजेपी में जूरासिक पार्क जैसा माहौल था। नागपुर में ही राजनाथ ने भी हिंदुत्व एक्सप्रेस दौड़ाई। पर दिल्ली आते ही जैसे बीजेपी का ब्रेक डाउन हो गया। राजनाथ की सत्ता को पोल मैनेजर अरुण जेतली की चुनौती मिल गई। एक-दो दिन नहीं, पूरे बारह दिन ड्रामा चला। जेतली ने राजनाथ की रहनुमाई वाली सीईसी का बॉयकॉट किया। मुद्दा सिर्फ इतना था, राजनाथ ने सुधांशु मित्तल को पूर्वोत्तर का इंचार्ज बनाया था। आडवाणी भी जेतली को मना नहीं पाए। पूरे चुनाव के टिकट बंट गए। पर जेतली-राजनाथ की रार ठनी रही। यों अरुण का संकट सुलझा भी नहीं था। तभी गांधी-नेहरू खानदान के भाजपाई वारिस वरुण गांधी का भड़काऊ भाषण आ गया। बीजेपी ने वरुण का जमकर बचाव किया। पर आखिर में फोरेंसिक लैब ने पुष्टिï कर दी। भड़काऊ बयान वरुण का ही। सो बीजेपी अपने किए पर औंधे मुंह गिरी। लगा, जैसे वक्त भी बीजेपी का साथ देने को तैयार नहीं। चुनावी समर में ही उड़ीसा में नवीन पटनायक से गठजोड़ टूटा। कंधार प्रकरण पर बीजेपी बचाव में ही उलझी रही। ऐसा लगा, मानो कंधार एपीसोड बीजेपी का। आडवाणी कहीं भी साझीदार नहीं। सो चुनाव नतीजे चौंकाने वाले रहे। आडवाणी का सपना चूर हो गया। तो पद छोडऩे की पेशकश की। पर हाई वोल्टेज ड्रामे के बाद फिर खिवैया बन गए। फिर हार पर बीजेपी में जो आपसी मर्दन हुआ। किसी से छुपा नहीं। जसवंतनामा, यशवंतनामा, शौरीनामा सब में एक ही आवाज। हराने वाले को इनाम क्यों? निशाने पर जेतली ही, जिन्हें आडवाणी ने राज्यसभा में नेता बना दिया। पर आडवाणी के इर्द-गिर्द चौकड़ी में शामिल सुधींद्र कुलकर्णी, स्वप्रदास गुप्त जैसे लोग चुनाव से पहले सलाहकार थे। बीजेपी हार गई, तो पत्रकार बनकर खाल खींचने लगे। फिर शिमला चिंतन बैठक। जसवंत के जिन्ना प्रेम पर बर्खास्तगी। हार का मंथन हुआ। तो घाव केंद्र में था, ऑपरेशन राज्यों का कर दिया। यशवंत ने कामराज फार्मूले की मांग की। पर कुर्सी कौन छोड़ रहा। बीजेपी के कर्ता-धर्ता इसी में खुश। भले खुद न जीते, पर लेफ्ट तो हार गया। उत्तराखंड से बी.सी. खंडूरी की विदाई। राजस्थान में ओम प्रकाश माथुर का इस्तीफा। फिर कई राज्यों के क्षत्रप बदल दिए। पर वसुंधरा की बारी आई। तो अगस्त से अक्टूबर तक जो हुआ। बीजेपी नहीं भुला सकती। सो शिमला चिंतन में बीजेपी की चिंता कम, चिता ज्यादा दिखी। अरुण शौरी का राजनाथ को हंप्टी-डंप्टी कहना। बीजेपी में नेतृत्व परिवर्तन पर संघ के मुखिया मोहन भागवत का डी-4 फार्मूला। मनोहर पारिकर का आडवाणी को सड़ा अचार कहना। वसुंधरा प्रकरण पर पार्लियामेंट्री बोर्ड में आडवाणी-राजनाथ का टकराना। कर्नाटक में रेड्डïी बंधु के दबाव में बीजेपी का येदुरप्पा को झुकाना। महाराष्टï्र चुनाव में भी नितिन गडकरी की रहनुमाई वाली बीजेपी की लुटिया डूबना। सो कुल मिलाकर सुर्खियों में बीजेपी रही। पर सिर्फ नकारात्मक खबरों से। आखिर में हार का यही मंथन। जिन-जिन ने रणनीति बनाई। सबका प्रमोशन हो गया। या यों कहें, सबने राज्यों पर ठीकरा फोड़ कुर्सी बांट लीं। आडवाणी भीष्म हो गए। जेतली, सुषमा को भी बड़ा पद। गडकरी तो चुनाव जीते और जिताए बिना ही राष्टï्रीय अध्यक्ष हो गए। राजस्थान का संगठन चुनाव वाला विवाद तो याद होगा। अब वहां भी सबको कुर्सी मिल गई। तो फिलहाल ऊं शांति। यानी 2009 में बीजेपी, जो हारा, वही सिकंदर। और अब साल के आखिर में नैतिकता की आहुति दे शिबू से हाथ मिला लिया। सो 2010 कैसा होगा, राम ही राखा। विपक्ष के तौर पर बीजेपी भरोसा खो चुकी। यह खुलासा खुद बीजेपी के सर्वेक्षण में हो चुका। चुनाव के वक्त जीवीएल नरसिंह राव का सर्वे आया। बानवै फीसदी लोगों ने महंगाई को बड़ा मुद्दा माना। पर चौंकाने वाली बात, समाधान करने वालों में 90 फीसदी लोगों ने मनमोहन को वोट दिए। महज सात फीसदी ने आडवाणी को। सो विपक्ष का भरोसा कितना, खत्म हो चुका। आप देख लो।
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29/12/2009
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तो साल 2009, बीजेपी में
जो हारा, वही सिकंदर
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संतोष कुमार
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तुम जियो हजारों साल, साल के दिन हों पचास हजार। पर न कोई हजार साल जी सकता। न साल के दिन पचास हजार हो सकते। सो 365 दिन बाद 2009 भी विदा ले रहा। अब महज कुछ घंटों का इंतजार, फिर 2010 का स्वागत। सो आखिरी दिन में लेखाजोखा भी जरूरी। तो आज शुरुआत बीजेपी के सफरनामे से। साल 2008 का अंत न देश के लिए शुभ रहा, न बीजेपी के लिए। देश ने 26/11 का दंश झेला। तो बीजेपी सेमीफाइनल में कांग्रेस से पिछड़ गई। राजस्थान का मजबूत किला ढह गया। तो हंगामे का आगाज भी वहीं से हुआ। यों शेखावत को चुनाव लडऩा नहीं था। पर वसुंधरा से नाराज बाबोसा ने पासा फेंका। सो समूची बीजेपी हिल गई। राजनाथ सिंह को मैदान में उतरना पड़ा। तो उन ने लोक-लिहाज नहीं किया। अलबत्ता शेखावत को गंगा स्नान के बाद कुंए में न नहाने की सलाह दी। अब जब रात हो इतनी मतवाली। तो सुबह का आलम क्या होगा। यह तो बीजेपी से पूछिए। शुरुआत पुरोधा ने की। तो बाकी कहां पीछे रहते। बीस जनवरी को कल्याण सिंह ने बीजेपी छोड़ दी। लोकसभा का चुनावी समर शुरू हुआ। तो आडवाणी खुद को भावी पीएम कम, मौजूदा पीएम की तरह व्यवहार करने लगे। हर अहम मसले पर विशेषज्ञों की मीटिंग। फिर नई कार्ययोजना का एलान। सो इर्द-गिर्द ऐसे लोगों का जमावड़ा हो गया। आडवाणी जमीनी हकीकत भांप नहीं पाए। समर में कांग्रेस से मुकाबला तो बाद में। पर पहले बीजेपी ने आपस में नेट प्रेक्टिस की। जेतली, वेंकैया में पोल मैनेजर बनने की होड़। बीजेपी में जूरासिक पार्क जैसा माहौल था। नागपुर में ही राजनाथ ने भी हिंदुत्व एक्सप्रेस दौड़ाई। पर दिल्ली आते ही जैसे बीजेपी का ब्रेक डाउन हो गया। राजनाथ की सत्ता को पोल मैनेजर अरुण जेतली की चुनौती मिल गई। एक-दो दिन नहीं, पूरे बारह दिन ड्रामा चला। जेतली ने राजनाथ की रहनुमाई वाली सीईसी का बॉयकॉट किया। मुद्दा सिर्फ इतना था, राजनाथ ने सुधांशु मित्तल को पूर्वोत्तर का इंचार्ज बनाया था। आडवाणी भी जेतली को मना नहीं पाए। पूरे चुनाव के टिकट बंट गए। पर जेतली-राजनाथ की रार ठनी रही। यों अरुण का संकट सुलझा भी नहीं था। तभी गांधी-नेहरू खानदान के भाजपाई वारिस वरुण गांधी का भड़काऊ भाषण आ गया। बीजेपी ने वरुण का जमकर बचाव किया। पर आखिर में फोरेंसिक लैब ने पुष्टिï कर दी। भड़काऊ बयान वरुण का ही। सो बीजेपी अपने किए पर औंधे मुंह गिरी। लगा, जैसे वक्त भी बीजेपी का साथ देने को तैयार नहीं। चुनावी समर में ही उड़ीसा में नवीन पटनायक से गठजोड़ टूटा। कंधार प्रकरण पर बीजेपी बचाव में ही उलझी रही। ऐसा लगा, मानो कंधार एपीसोड बीजेपी का। आडवाणी कहीं भी साझीदार नहीं। सो चुनाव नतीजे चौंकाने वाले रहे। आडवाणी का सपना चूर हो गया। तो पद छोडऩे की पेशकश की। पर हाई वोल्टेज ड्रामे के बाद फिर खिवैया बन गए। फिर हार पर बीजेपी में जो आपसी मर्दन हुआ। किसी से छुपा नहीं। जसवंतनामा, यशवंतनामा, शौरीनामा सब में एक ही आवाज। हराने वाले को इनाम क्यों? निशाने पर जेतली ही, जिन्हें आडवाणी ने राज्यसभा में नेता बना दिया। पर आडवाणी के इर्द-गिर्द चौकड़ी में शामिल सुधींद्र कुलकर्णी, स्वप्रदास गुप्त जैसे लोग चुनाव से पहले सलाहकार थे। बीजेपी हार गई, तो पत्रकार बनकर खाल खींचने लगे। फिर शिमला चिंतन बैठक। जसवंत के जिन्ना प्रेम पर बर्खास्तगी। हार का मंथन हुआ। तो घाव केंद्र में था, ऑपरेशन राज्यों का कर दिया। यशवंत ने कामराज फार्मूले की मांग की। पर कुर्सी कौन छोड़ रहा। बीजेपी के कर्ता-धर्ता इसी में खुश। भले खुद न जीते, पर लेफ्ट तो हार गया। उत्तराखंड से बी.सी. खंडूरी की विदाई। राजस्थान में ओम प्रकाश माथुर का इस्तीफा। फिर कई राज्यों के क्षत्रप बदल दिए। पर वसुंधरा की बारी आई। तो अगस्त से अक्टूबर तक जो हुआ। बीजेपी नहीं भुला सकती। सो शिमला चिंतन में बीजेपी की चिंता कम, चिता ज्यादा दिखी। अरुण शौरी का राजनाथ को हंप्टी-डंप्टी कहना। बीजेपी में नेतृत्व परिवर्तन पर संघ के मुखिया मोहन भागवत का डी-4 फार्मूला। मनोहर पारिकर का आडवाणी को सड़ा अचार कहना। वसुंधरा प्रकरण पर पार्लियामेंट्री बोर्ड में आडवाणी-राजनाथ का टकराना। कर्नाटक में रेड्डïी बंधु के दबाव में बीजेपी का येदुरप्पा को झुकाना। महाराष्टï्र चुनाव में भी नितिन गडकरी की रहनुमाई वाली बीजेपी की लुटिया डूबना। सो कुल मिलाकर सुर्खियों में बीजेपी रही। पर सिर्फ नकारात्मक खबरों से। आखिर में हार का यही मंथन। जिन-जिन ने रणनीति बनाई। सबका प्रमोशन हो गया। या यों कहें, सबने राज्यों पर ठीकरा फोड़ कुर्सी बांट लीं। आडवाणी भीष्म हो गए। जेतली, सुषमा को भी बड़ा पद। गडकरी तो चुनाव जीते और जिताए बिना ही राष्टï्रीय अध्यक्ष हो गए। राजस्थान का संगठन चुनाव वाला विवाद तो याद होगा। अब वहां भी सबको कुर्सी मिल गई। तो फिलहाल ऊं शांति। यानी 2009 में बीजेपी, जो हारा, वही सिकंदर। और अब साल के आखिर में नैतिकता की आहुति दे शिबू से हाथ मिला लिया। सो 2010 कैसा होगा, राम ही राखा। विपक्ष के तौर पर बीजेपी भरोसा खो चुकी। यह खुलासा खुद बीजेपी के सर्वेक्षण में हो चुका। चुनाव के वक्त जीवीएल नरसिंह राव का सर्वे आया। बानवै फीसदी लोगों ने महंगाई को बड़ा मुद्दा माना। पर चौंकाने वाली बात, समाधान करने वालों में 90 फीसदी लोगों ने मनमोहन को वोट दिए। महज सात फीसदी ने आडवाणी को। सो विपक्ष का भरोसा कितना, खत्म हो चुका। आप देख लो।
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29/12/2009
Monday, December 28, 2009
कैसे हो 'रिफॉर्म', जब चालू आहे चापलूसी
इंडिया गेट से
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कैसे हो 'रिफॉर्म', जब
चालू आहे चापलूसी
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संतोष कुमार
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अब पुलिस थाने में शिकायत ही एफआईआर। रुचिका गिरहोत्रा प्रकरण तूल पकड़ चुका। इंसाफ की जंग कोर्ट से बाहर सड़कों पर शुरु हुई। तो संवेदनशीलता दिखाने की होड़ मच गई। सो सोमवार को होम मिनिस्ट्री ने सभी स्टेट को सर्कुलर जारी कर दिया। थाने में की गई शिकायत को ही एफआईआर माना जाए। पर शिकायत यानी तहरीर भी कोई पुलिस वाला न ले। तो कौन क्या कर लेगा। जब देश में पीएम की चि_ïी का सीएम पर कोई असर नहीं पड़ता। तो आम आदमी की राठौर जैसे पुलिसिए के सामने क्या बिसात। अब बीजेपी नेता शांताकुमार ने खुलासा किया। रुचिका केस को सुन तबके पीएम वाजपेयी रो पड़े थे। उनने हरियाणा के सीएम ओमप्रकाश चौटाला को कड़ी चि_ïी लिखी थी। तो खुद चौटाला-भजनलाल अपनी तरफ से कड़े कदम उठाने की दलील दे रहे। पर क्या देश की व्यवस्था इतनी नाकारी हो चुकी। जो पीएम-सीएम सबकी पहल के बाद भी रुचिका को इंसाफ मिलने में 19 साल लग गए? यों अभी भी रुचिका को अधूरा इंसाफ मिला। अधेड़ उम्र के राठौर ने 14 साल की लड़की से जबर्दस्ती करनी चाही। आखिर उस लड़की को सुसाइड करना पड़ा। फिर भी केस इतना कमजोर बनाया गया। राठौर को महज छह महीने की सजा मिली। सो तहरीर को एफआईआर बनाने से क्या होगा। जब तक पुलिस तंत्र न बदले। रुचिका केस में तो यही हुआ। रुचिका केस में दोषी हरियाणा के पूर्व डीजीपी एसपीएस राठौर तब आईजी थे। सो महीने-साल नहीं, अलबत्ता पूरे नौ साल तक एफआईआर दर्ज नहीं हुई। उल्टा रुचिका के परिवार को प्रताडऩा सहनी पड़ी। पुलिस ने ही झूठे केस में फंसा परिवार को हरियाणा छोडऩे को मजबूर कर दिया। सो सिर्फ सर्कुलर जारी होने से समस्या खत्म नहीं होने वाली। जब तक पुलिस का अंदाज नहीं बदलेगा। तब तक लोग पुलिस से खौफ खाते रहेंगे। और पुलिसिए भी अंग्रेजों की मानसिकता से ऊपर नहीं उठेंगे। सो जब तक पुलिस रिफॉर्म पर अमल नहीं होता। तहरीर को एफआईआर मानने से कुछ नहीं होगा। जरुरत तो इस बात की है, पुलिस रिफॉर्म की बातें सिर्फ कागजों तक सिमट कर न रहे। हर बार पुलिस रिफॉर्म को शोर मचता। पर बिल्ली के गले में घंटी कौन बांधे। बस इसी चक्कर में फिर फाइलों में गुम हो जाता। जबकि सुप्रीम कोर्ट तक पुलिस रिफॉर्म की बात कह चुका। पर राज्यों की फंडिंग के चक्कर में गाड़ी आगे नहीं खिसक रही। सो न पुलिस बदल रही, न पुलिसिया चेहरा और खौफ। आज भी, आम आदमी की आंखों के सामने पुलिस गुजर जाए। तो मन में सुरक्षा का भाव नहीं, अलबत्ता आंखों में खौफ का साया दिखता। आखिर हो क्यों ना। पुलिस वाले तो हुकूमत के इशारे पर चलते। सो जब जिसकी सरकार बनी। पसंद के ऑफीसर मलाईदार-रुतबेदार पदों पर काबिज हो जाते। सो राजनेता भी मौजूदा पुलिस तंत्र के ही आदी। अब वही होम मिनिस्ट्री राठौर का मैडल छीनने जा रही। पर 19 साल तक कहां सोई रही सरकार? यों मैडल कैसे लोगों को मिलता, अब किसी से यह बात छुपी नहीं। मैडल तो छोडि़ए, अब पद्मश्री हो या पद्मविभूषण। हर जगह घालमेल और सत्ता का साया साफ दिख जाता। सो मैडल के लिए फर्जी मुठभेड़ की खबरें आम हो चुकीं। लोकशाही में भी नेतागण राजशाही चाहते। सो प्रतिबद्ध नौकरशाही की दरकार सबको। सनद रहे, सो याद दिलाते जाएं। दिसंबर 1969 में तबकी पीएम इंदिरा गांधी ने नौकरशाही से प्रतिबद्धता की मांग की थी। नौकरशाहों से अपनी राजनीतिक विचारधारा का समर्थन करने को कहा। सो बवाल मचा, तो उन ने नौ फरवरी 1970 को इंस्टीट्यूट ऑफ इंजीनियर्स में सफाई दी। चाटुकार सरकारी कर्मचारी तंत्र नहीं चाहिए। पर इंदिरा को जो कहना था, वह कह चुकी थीं। सो नेताओं में रूतबे का, तो नौकरशाही में चमचागिरी का रोग। यानी अब अगर पुलिस तंत्र का सुधार करना पड़ा। तो राजनीति में भी आमूल-चूल बदलाव लाने होंगे। पर न नौ मन तेल होगा, न राधा नाचेगी। एफआईआर से पूर्व पीएम नरसिंह राव पर भी हुए। पर क्या कभी सजा मिली? शिबू सोरेन की झामुमो को खरीद कर राव ने अल्पमत सरकार बचाई। पर 17 साल हो गए। नरसिंह राव तो अब दुनिया में नहीं रहे। पर शिबू का भी कुछ नहीं बिगड़ा। अलबत्ता सत्ता के समीकरण जरुर बदल गए। शिबू कभी कांग्रेस खेमे में बैठते थे। अबके सत्ता की खातिर बीजेपी के साथ हो लिए। पर शिबू की पार्टी तो एक क्षेत्र विशेष की ठहरी। पर बीजेपी की नैतिकता कहां गई? जिस शिबू की खातिर मनमोहन को दागी केबिनेट का मुखिया कहा। शिबू के नाम पर संसद से सड़क तक खूब घोड़े दौड़ाए। अब उसी शिबू के साथ गलबहियां। पर जरा नितिन गडकरी की नई दलील सुनिए। सत्ता की राजनीति अलग और संगठन की अलग। कांग्रेस तो 125 वीं सालगिरह पर ही खूब इतरा रही। पीएम मनमोहन हों या सोनिया गांधी। गांधी-नेहरू खानदान को ही देश का पर्याय बता रहे। मनमोहन ने सोमवार को कहा- 'अगर कांग्रेस कमजोर हुआ, तो भारत कमजोर होगा। सो कांग्रेस को मजबूत करे।' उनने सोनिया के ऐसे कसीदे पढ़े। अपने राजनीतिक गुरु नरसिंह राव को भूला दिया। नई आर्थिक नीति का श्रेय भी राजीव गांधी को दे दिया। यानी सोनिया ने दो बार पीएम बनाया। तो मनमोहन ने भी अपनी उदारीकरण की नीति बतौर रिटर्न गिफ्ट गांधी-नेहरु खानदान को थमा कर्ज उतार लिया। अब पुलिस तंत्र हो या राजनीतिक तंत्र। जब तक चापलूसी बंद नहीं होगी। तब तक व्यवस्था का राम ही राखा।
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28/12/2009
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कैसे हो 'रिफॉर्म', जब
चालू आहे चापलूसी
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संतोष कुमार
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अब पुलिस थाने में शिकायत ही एफआईआर। रुचिका गिरहोत्रा प्रकरण तूल पकड़ चुका। इंसाफ की जंग कोर्ट से बाहर सड़कों पर शुरु हुई। तो संवेदनशीलता दिखाने की होड़ मच गई। सो सोमवार को होम मिनिस्ट्री ने सभी स्टेट को सर्कुलर जारी कर दिया। थाने में की गई शिकायत को ही एफआईआर माना जाए। पर शिकायत यानी तहरीर भी कोई पुलिस वाला न ले। तो कौन क्या कर लेगा। जब देश में पीएम की चि_ïी का सीएम पर कोई असर नहीं पड़ता। तो आम आदमी की राठौर जैसे पुलिसिए के सामने क्या बिसात। अब बीजेपी नेता शांताकुमार ने खुलासा किया। रुचिका केस को सुन तबके पीएम वाजपेयी रो पड़े थे। उनने हरियाणा के सीएम ओमप्रकाश चौटाला को कड़ी चि_ïी लिखी थी। तो खुद चौटाला-भजनलाल अपनी तरफ से कड़े कदम उठाने की दलील दे रहे। पर क्या देश की व्यवस्था इतनी नाकारी हो चुकी। जो पीएम-सीएम सबकी पहल के बाद भी रुचिका को इंसाफ मिलने में 19 साल लग गए? यों अभी भी रुचिका को अधूरा इंसाफ मिला। अधेड़ उम्र के राठौर ने 14 साल की लड़की से जबर्दस्ती करनी चाही। आखिर उस लड़की को सुसाइड करना पड़ा। फिर भी केस इतना कमजोर बनाया गया। राठौर को महज छह महीने की सजा मिली। सो तहरीर को एफआईआर बनाने से क्या होगा। जब तक पुलिस तंत्र न बदले। रुचिका केस में तो यही हुआ। रुचिका केस में दोषी हरियाणा के पूर्व डीजीपी एसपीएस राठौर तब आईजी थे। सो महीने-साल नहीं, अलबत्ता पूरे नौ साल तक एफआईआर दर्ज नहीं हुई। उल्टा रुचिका के परिवार को प्रताडऩा सहनी पड़ी। पुलिस ने ही झूठे केस में फंसा परिवार को हरियाणा छोडऩे को मजबूर कर दिया। सो सिर्फ सर्कुलर जारी होने से समस्या खत्म नहीं होने वाली। जब तक पुलिस का अंदाज नहीं बदलेगा। तब तक लोग पुलिस से खौफ खाते रहेंगे। और पुलिसिए भी अंग्रेजों की मानसिकता से ऊपर नहीं उठेंगे। सो जब तक पुलिस रिफॉर्म पर अमल नहीं होता। तहरीर को एफआईआर मानने से कुछ नहीं होगा। जरुरत तो इस बात की है, पुलिस रिफॉर्म की बातें सिर्फ कागजों तक सिमट कर न रहे। हर बार पुलिस रिफॉर्म को शोर मचता। पर बिल्ली के गले में घंटी कौन बांधे। बस इसी चक्कर में फिर फाइलों में गुम हो जाता। जबकि सुप्रीम कोर्ट तक पुलिस रिफॉर्म की बात कह चुका। पर राज्यों की फंडिंग के चक्कर में गाड़ी आगे नहीं खिसक रही। सो न पुलिस बदल रही, न पुलिसिया चेहरा और खौफ। आज भी, आम आदमी की आंखों के सामने पुलिस गुजर जाए। तो मन में सुरक्षा का भाव नहीं, अलबत्ता आंखों में खौफ का साया दिखता। आखिर हो क्यों ना। पुलिस वाले तो हुकूमत के इशारे पर चलते। सो जब जिसकी सरकार बनी। पसंद के ऑफीसर मलाईदार-रुतबेदार पदों पर काबिज हो जाते। सो राजनेता भी मौजूदा पुलिस तंत्र के ही आदी। अब वही होम मिनिस्ट्री राठौर का मैडल छीनने जा रही। पर 19 साल तक कहां सोई रही सरकार? यों मैडल कैसे लोगों को मिलता, अब किसी से यह बात छुपी नहीं। मैडल तो छोडि़ए, अब पद्मश्री हो या पद्मविभूषण। हर जगह घालमेल और सत्ता का साया साफ दिख जाता। सो मैडल के लिए फर्जी मुठभेड़ की खबरें आम हो चुकीं। लोकशाही में भी नेतागण राजशाही चाहते। सो प्रतिबद्ध नौकरशाही की दरकार सबको। सनद रहे, सो याद दिलाते जाएं। दिसंबर 1969 में तबकी पीएम इंदिरा गांधी ने नौकरशाही से प्रतिबद्धता की मांग की थी। नौकरशाहों से अपनी राजनीतिक विचारधारा का समर्थन करने को कहा। सो बवाल मचा, तो उन ने नौ फरवरी 1970 को इंस्टीट्यूट ऑफ इंजीनियर्स में सफाई दी। चाटुकार सरकारी कर्मचारी तंत्र नहीं चाहिए। पर इंदिरा को जो कहना था, वह कह चुकी थीं। सो नेताओं में रूतबे का, तो नौकरशाही में चमचागिरी का रोग। यानी अब अगर पुलिस तंत्र का सुधार करना पड़ा। तो राजनीति में भी आमूल-चूल बदलाव लाने होंगे। पर न नौ मन तेल होगा, न राधा नाचेगी। एफआईआर से पूर्व पीएम नरसिंह राव पर भी हुए। पर क्या कभी सजा मिली? शिबू सोरेन की झामुमो को खरीद कर राव ने अल्पमत सरकार बचाई। पर 17 साल हो गए। नरसिंह राव तो अब दुनिया में नहीं रहे। पर शिबू का भी कुछ नहीं बिगड़ा। अलबत्ता सत्ता के समीकरण जरुर बदल गए। शिबू कभी कांग्रेस खेमे में बैठते थे। अबके सत्ता की खातिर बीजेपी के साथ हो लिए। पर शिबू की पार्टी तो एक क्षेत्र विशेष की ठहरी। पर बीजेपी की नैतिकता कहां गई? जिस शिबू की खातिर मनमोहन को दागी केबिनेट का मुखिया कहा। शिबू के नाम पर संसद से सड़क तक खूब घोड़े दौड़ाए। अब उसी शिबू के साथ गलबहियां। पर जरा नितिन गडकरी की नई दलील सुनिए। सत्ता की राजनीति अलग और संगठन की अलग। कांग्रेस तो 125 वीं सालगिरह पर ही खूब इतरा रही। पीएम मनमोहन हों या सोनिया गांधी। गांधी-नेहरू खानदान को ही देश का पर्याय बता रहे। मनमोहन ने सोमवार को कहा- 'अगर कांग्रेस कमजोर हुआ, तो भारत कमजोर होगा। सो कांग्रेस को मजबूत करे।' उनने सोनिया के ऐसे कसीदे पढ़े। अपने राजनीतिक गुरु नरसिंह राव को भूला दिया। नई आर्थिक नीति का श्रेय भी राजीव गांधी को दे दिया। यानी सोनिया ने दो बार पीएम बनाया। तो मनमोहन ने भी अपनी उदारीकरण की नीति बतौर रिटर्न गिफ्ट गांधी-नेहरु खानदान को थमा कर्ज उतार लिया। अब पुलिस तंत्र हो या राजनीतिक तंत्र। जब तक चापलूसी बंद नहीं होगी। तब तक व्यवस्था का राम ही राखा।
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28/12/2009
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