अपने देश में नेताओं-नौकरशाहों का विजन शायद कहीं गुम हो गया। एक छोटा सा किस्सा बताएं। दिल्ली मैट्रो में आजकल एक इश्तिहार देखने को मिल रहा। भारत सरकार के अधीन एक जनसंख्या नियंत्रण का विभाग है। जिसने अखबारी कतरन के अंदाज में लिखा है- सोमवार, 20 मार्च 2030, भारत से हारने पर चीन में जश्न का माहौल। इश्तिहार का मतलब, 2030 में अपनी जनसंख्या आज के दर के हिसाब से चीन को पीछे छोड़ देगी। यों जागरुकता पैदा करने के लिए इश्तिहार वाकई बहुत अच्छा। पर डेटलाइन देख अपना दिमाग ठनका। ख्याल आया, वाकई कितनी लंबी सोचकर आइडिया निकाला। सो तसल्ली के लिए अपना मोबाईल निकाल डेट चेक किया। तो जितनी इश्तिहार के संदेश से खुशी हुई, उतना ही दुख डेट और दिन देख कर हुआ। सही मायने में 20 मार्च 2030 को दिन सोमवार नहीं, अलबत्ता बुधवार होगा। अब कहने वाले कहेंगे, दिन से क्या फर्क पड़ता, संदेश देखो। पर देश का भविष्य बनाने वाले अगर मन में जो आया, वही करने लगे। तो फिर देश का भविष्य कैसा होगा? यों बात बहुत छोटी है, पर सरकार के विजन की पोल खोल रही। जिसे पता करने में अपने जैसे को महज तीन-चार सेकेंड लगे। क्या कोई सरकारी मुलाजिम इतनी जहमत नहीं उठा सकता? अब जवाब मांगें भी, तो किससे। महंगाई का भूत 2004 से पीछा कर रहा। अब तो महंगाई सुरसा के मुंह से अधिक फैल चुकी। पर विजन का नमूना आप खुद देख लो। आरबीआई ने मंगलवार को एलान किया। मार्च 2011 तक महंगाई दर को कम कर 5.5 फीसदी वार्षिक दर पर लाएंगे। पर महंगाई काबू करने का फिर वही पुराना नुस्खा आजमाया। सीआरआर से लेकर ब्याज दर बढ़ा दिए। यानी महंगाई के आदी लोगों पर एक और बोझ। पर महंगाई के रुप अनेक। याद होगा, हाल ही में विपक्ष ने कैसे महंगाई के खिलाफ इमरजेंसी जैसी एकजुटता दिखाई। अब बुधवार को बीजेपी की महारैली। रामलीला मैदान से संसद मार्च होगा। इंदौर में नितिन गडकरी ने तो दस लाख भीड़ जुटाने का खम ठोका था। पर मौसम का मिजाज देख बीजेपी अब आंकड़ेबाजी से परहेज कर रही। मौसम की मार रैली पर न पड़े। सो दिल्ली में प्याज के मुद्दे पर सरकार गंवाने वाली बीजेपी ने मौसम से निपटने के लिए प्याज ककी बोरियों का पूरा बंदोबस्त किया। ताकि वर्करों को लू न लगे। वर्करों को प्याज के साथ नींबू और कुछ हर्बल टॉफियां भी बांटने की तैयारी। प्रदर्शनकारियों पर वाटर कैनन छोड़े जाएं, इसकी गुहार खुद बीजेपी ने संबंधित विभाग से लगाई। अब बीजेपी के संसद घेरो संघर्ष का भले पल भर को सरकार पर असर पड़े। पर महंगाई का बाल बांका भी होता नहीं दिख रहा। वैसे जब विपक्षी एकजटुता में भी महंगाई अलग-अलग हों। तो सरकार क्यों परेशान हो। बुधवार को बीजेपी की रैली, तो अगले मंगलवार यानी 27 अप्रैल को लेफ्ट की रहनुमाई में 13 दलों ने भारत बंद का एलान कर रखा। सो संसद में सरकार को घेरने में सफल विपक्षी महाजोट ने फिर पहल की। लेफ्ट ने एनडीए को भारत बंद में शामिल होने का न्योता भेजा। एनडीए के संयोजक शरद यादव ने न्योता बीजेपी को अग्रेषित कर दिया। पर बीजेपी ने अभी जवाब नहीं दिया। पहले बीजेपी बुधवार की अपनी रैली देखेगी। गडकरी की रहनुमाई में बीजेपी के पहले विशाल प्रदर्शन की ताकत का इम्तिहान। पर संसद में एकजुट विपक्ष सडक़ पर साथ नहीं। बीजेपी की दलील, संसद में सरकार को घेरने के लिए मुद्दों पर आधारित सहमति के लिए विपक्षी महाजोट बना। सो संसद के बाहर ऐसी एकजुटता का फिलहाल कोई सवाल ही नहीं। यानी जनता के आंदोलन में महंगाई की आग पर सबकी अपनी-अपनी राजनीतिक रोटी। या यों कहें कि बीजेपी की महंगाई अलग और लेफ्ट की अलग। सो आप ही सोचिए, कैसे कम होगी महंगाई? वैसे भी महंगाई का असर आम आदमी पर हो रहा। सो आजकल बड़े लोगों की चर्चा संसद और मीडिया में खूब हो रही। शशि थरूर ने भले इस्तीफा दे दिया। पर मंगलवार को अचानक सफाई देने लोकसभा पहुंचे। अपना दर्द फिर उड़ेला। पीएम से गुहार लगाई, सभी आरोपों की जांच कराएं। अब तक के लंबे सार्वजनिक जीवन में बेदाग होने की दुहाई दी। एक कवि की पंक्ति सुनाकर बोलें, भारत का नाम आने पर गर्व का अहसास होता है। केरल का नाम आने पर रगों में खून दौडऩे लगता है। पर केरल की बात आई, तो सीताराम येचुरी ने बखूबी जवाब दिया। पूछा, केरल के बीपीएल के लिए खून क्यों नहीं दौड़ता। क्या सिर्फ आईपीएल के लिए खून दौड़ रहा। पर सोमवार के बजाए मंगलवार को थरूर की सफाई से अपना माथा ठनका। जो थरूर पीएम के आने से पहले तक इस्तीफे को राजी नहीं थे। अब इस्तीफे को नैतिकता बता रहे। सो लगा, देर-सबेर थरूर फिर मनमोहन केबिनेट की शोभा बढ़ाएंगे। जैसे तहलका कांड के बाद जार्ज फर्नांडिस गए और फिर रक्षा मंत्री पद पर ही लौट आए थे। यानी थरूर की खातिर सरकार ने अपने विजन का घोड़ा दौड़ा दिया। भले आम आदमी को महंगाई से निजात दिलाने में सरकार का विजन कुंद पड़ गया हो। कुछ यही हाल आईपीएल का भी। जैसे थरूर इस्तीफे को राजी नहीं थे। वैसे ही अब ललित मोदी तैयार नहीं। पर मंगलवार को संसद भवन में प्रणव-पवार-चिदंबरम बैठे। तो तय हो गया, मोदी को जाना होगा। बीसीसीआई चीफ शशांक मनोहर दिल्ली आकर पवार से मिले। पवार ने अरुण जेतली से बात की। पर मोदी का गेम ओवर शाायद आईपीएल फाइनल के बाद होगा।
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20/04/2010
Tuesday, April 20, 2010
Monday, April 19, 2010
थरूर तो गए, अब थरथरा रहा आईपीएल
न खुदा ही मिला, न विसाल-ए-सनम, न इधर के रहे, न उधर के। आखिर सरकार की थू-थू करा शशि थरूर विदा हो गए। सुनंदा पुष्कर ने भी कोच्चि टीम में अपने शेयर तज दिए। सो सारा एपीसोड देख चंद्रमोहन याद आ गए। चंद्रमोहन यानी भजनलाल के बेटे। बाप को कांग्रेस ने 2004 में सीएम नहीं बनाया था। तो तुष्टीकरण फॉर्मूले में बेटा चंद्रमोहन डिप्टी सीएम हो गया। पर प्यार के आगे ओहदा क्या चीज। सो पहली बीवी के रहते चंद्रमोहन ऐसे इश्क में पड़े। मजहब बदल खुद चांद मोहम्मद और प्रेमिका अनुराधा फिजां बन गईं। फिर डिप्टी सीएम की कुर्सी को ठुकरा फिजां संग नई पारी की शुरुआत। अब सुनंदा की वजह से थरूर की कुर्सी गई। तो कोई पूछे, और कितने चांद मोहम्मद होंगे कांग्रेस में? वाकई प्यार अंधा होता है, तभी तो चाहने वाले दुनियादारी की परवाह नहीं करते। शाहजहां ने अपनी बेगम मुमताज के लिए ताजमहल खड़ी कर दी। दुनिया का आठवां अजूबा बना डाला। यहां तो सिर्फ 70 करोड़ के शेयर और विदेश राज्य मंत्री की छोटी सी कुर्सी थी। वह भी महज एक दोस्त की खातिर। वैसे भी मनमोहन के राज्य मंत्रियों की व्यथा किसी से छुपी नहीं। पर दुनिया भी कम जुल्मी नहीं। ताजमहल के बनाने और खर्च या कारीगरों के हाथ काटे जाने की घटना पर तो कभी इतनी हायतौबा नहीं मची। जितनी मुफ्त शेयर को लेकर मची। अब भले थरूर का सुनंदा से रिश्ता शादी तक नहीं पहुंचा। पर इस्तीफे ने साफ कर दिया, सुनंदा को मुफ्त में 70 करोड़ के शेयर दिलाए थे। अब कोई बड़े ओहदे पर बैठा व्यक्ति यों ही पद का बेजा इस्तेमाल तो नहीं करेगा। यों मनमोहन का दिल अबके भी थरूर को हटाने को तैयार नहीं था। पर हालात और दस्तावेजी सबूतों ने मनमोहन को मजबूर कर दिया। वैसे भी मनमोहन अपना वीटो लगा एक बार थरूर को कांग्रेस से अभयदान दिला चुके। तब थरूर ने पं. नेहरू की विदेश नीति को कटघरे में खड़ा किया था। पर दुनिया में राजनय कौशल से अपनी साख बनाने वाले थरूर अबके थोड़ी चूक कर गए। सो अपने ही देश में साख पर बट्टा लगा लिया। पर थरूर-मोदी के बीच विवाद ने देश का इतना भला किया, बोतल से भ्रष्टाचार का जिन्न बाहर निकाल दिया। विपक्षी महाजोट ने भी थरूर की विदाई को सराहा। पर ललित मोदी को छोडऩे के मूड में कोई भी नहीं। विपक्ष ने सोमवार को सरकार के हाथ और मजबूत कर दिए। अब विपक्ष ने सीधे आईपीएल को निशाने पर लिया। सबका आरोप, आईपीएल में स्विस बैंक, मॉरीशस और दुबई के रास्ते काले धन को सफेद बनाया जा रहा है। सीपीआई के गुरुदास दासगुप्त ने संसद की संयुक्त समिति (जेपीसी) से जांच की मांग की। समूचे आईपीएल पर बैन लगाने की पैरवी भी। मुलायम ने विदेशी खेल बताया। शरद यादव ने सट्टेबाजी का अड्डा। पर लालू यादव बैन के हिमायती नहीं। सो उन ने क्रिकेट का राष्ट्रीयकरण करने का सुझाव रखा। ताकि क्रिकेट सीधे खेल मंत्रालय के अधीन हो। यानी लालू की खुन्नस बीसीसीआई से। पर लालू की एक बड़ी टीस भी सदन में उभर कर सामने आ ही गई। लालू के बेटे तेजस्वी यादव भी क्रिकेटर। आईपीएल की डेयरडेविल्स टीम में भी शामिल। सो आप खुद लालू वाणी पर गौर फरमाएं- मैं बेटे को मैच खेलते देखने गया था। पर वहां देखा कि ओवर के बीच में मेरा बेटा तौलिया और पानी लेकर पिच की ओर दौड़ा। जहां वह पसीना पोछ रहा था। मैं यह देखकर शर्मसार हो गया कि यादवों की देश में...। अब लालू की टीस की वजह तो आप समझ गए होंगे। पर संसद में मुद्दा गरमाया। तो अब तक आईपीएल की निगरानी से छिटक रहे प्रणव मुखर्जी तैयारी के साथ सदन में पहुंचे। वैसे भी थरूर को विदा कर चुकी सरकार का मनोबल बढ़ा हुआ। सो घर की सफाई के बाद अब बाहर का बीड़ा उठाया। वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी ने एलान कर दिया, चाहे जो भी हो, अगर दोषी पाया गया, तो बख्शा नहीं जाएगा। इधर प्रणव दा ने एलान किया। उधर इनकम टेक्स विभाग ने आईपीएल-बीसीसीआई को नोटिस भेज दिया। दस सवालों के जवाब के साथ-साथ आईपीएल की पूरी बैलेंस शीट, सभी फ्रैंचाइजी मालिकों का नाम-पता और फंडिंग का ब्यौरा मांग लिया। वह भी 23 अप्रैल दोपहर तीन बजे से पहले-पहले। यानी थरूर गए, तो अब ललित मोदी की बारी। यों बीसीसीआई मोदी की आईपीएल कमिश्नरी छीनने का मन बना चुका। तो खुफिया और इनकम टेक्स विभाग को कई चौंकाने वाले सबूत मिल रहे। कथित तौर पर खुफिया रपट में कहा गया, चार साल पहले मोदी के पास कर्ज चुकाने को पैसे नहीं थे। अब मोदी के पास निजी विमान, यॉट, लक्जरी गाडिय़ा और दुनिया के तमाम ऐशोआराम हैं। यानी बीसीसीआई हटाए या नहीं हटाए। पर मोदी सरकारी शिकंजे में खुद ही फंस गए। ट्वीटर के जरिए थरूर को फंसाने की होशियारी दिखाई। पर अब बोरिया-बिस्तर गोल होता दिख रहा। यों मोदी की बीजेपी से नजदीकियां जगजाहिर। सो बीजेपी अब बचाव की मुद्रा में कह रही, जो भी दोषी हो, उस पर कार्रवाई हो। अप्रवासी मामलों के मंत्री वायलार रवि ने भी मोदी की बीजेपी से नजदीकी पर सवाल उठाया। पर कांग्रेसी जयंती नटराजन ने सीधा निशाना साधा। बीजेपी में ऐसे मामलों पर कार्रवाई का साहस ही नहीं। अब जो भी हो, पर कांग्रेस ने भी साहस कब दिखाया, सबको मालूम। अगर दस्तावेजी सबूत न मिलते, तो थरूर फिर ट्वीटर पर इठलाते मिल जाते।
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19/04/2010
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19/04/2010
Friday, April 16, 2010
तो आईपीएल का मतलब इंडियन पार्लियामेंट्री लीग
तो आईपीएल आखिर इंडियन पार्लियामेंट्री लीग हो गया। शुक्रवार को दोनों सदनों की पिच पर जोरदार मैच हुआ। सो संसद की कार्यवाही थम गई। पर कांग्रेस फिलहाल इस विवाद में कूदने से परहेज कर रही। सो शशि थरूर को दो-टूक कह दिया, अपना बचाव खुद करिए। विपक्षी एकजुटता ने फिर खम ठोका। तो लोकसभा में थरूर के बयान से ठीक पहले सोनिया गांधी से प्रणव-एंटनी मिले। फिर प्रणव ने बंसल-सामी को रणनीति समझा दी। सो हंगामे के बीच थरूर का बयान हुआ। सदन में थरूर की आवाज दब गई। सो थरूर ने बाहर मीडिया के सामने पूरा बयान पढ़ा। अब जरा थरूर की सफाई की बानगी देखिए। बतौर मंत्री या सांसद किसी को फायदा नहीं पहुंचाया। आईपीएल की नीलामी प्रक्रिया को प्रभावित नहीं किया। तीस साल के कैरियर में अभी तक कोई दाग नहीं। सुनंदा से संबंध को गलत तरीके से जोड़ा गया। हिस्सेदारों के बारे में जानकारी नहीं थी। सिर्फ संरक्षक के नाते सलाह दी। केरल में क्रिकेट जैसे महत्वपूर्ण खेल को बढ़ावा मिले। सो फ्रेंचाइजी लेने वालों की नहीं, अलबत्ता केरल की मदद की। यानी यूएन का महासचिव बनने का सपना देखने वाले थरूर क्षेत्रीयता की राजनीति पर उतर आए। अपने बचाव में केरल की जनता को भडक़ाने की कोशिश। अब थरूर की ठाकरेवादी राजनीति का असर क्या होगा, यह बाद की बात। पर उन ने जो सफाई पेश की, खुद ही उलझ गए। अब कोई पूछे, थरूर को रोंदेव्यू के हिस्सेदारों के बारे में पता नहीं था। तो संरक्षक कैसे बन गए? विदेश राज्यमंत्री पद पर बैठा व्यक्ति क्या सिर्फ केरल के नाम पर किसी का भी संरक्षक बनने को तैयार हो जाएगा? मानो, कल को डी. कंपनी का गुर्गा कोई फर्म बनाकर ऐसा करे। तो क्या थरूर उसके लिए भी राजी होंगे? पर कहते हैं ना, चोर की दाढ़ी में तिनका। थरूर को बाकायदा मालूम था, सुनंदा पुष्कर को भी शेयर मिलेगा। वैसे कहावत है, प्यार, जंग और राजनीति में सब जायज। अब भले सुनंदा सिर्फ थरूर की दोस्त। पर ऐसी दोस्ती, जिसके शादी में बदलने की अटकलें। सो किसी ऊंचे ओहदे पर बैठे राजनेता से कोई कैसी उम्मीद रखेगा? क्या अपने नेता या फिल्म कलाकार कभी बेमतलब चैरिटी करते? आखिर थरूर ने ललित मोदी या बीसीसीआई से जुड़े किसी भी व्यक्ति से कोच्चि टीम के लिए मदद क्यों मांगी? अगर मान भी लें, थरूर ने संरक्षकी के लिए इकन्नी न ली। पर फ्रेंचाइजी में इतनी दिलचस्पी क्यों ली? अगर थरूर वाकई बेदाग, तो उनकी ईमानदारी के साथ कांग्रेस खड़ी क्यों नहीं हो रही? अपनी ही पार्टी को क्यों नहीं समझा पा रहे थरूर? अब जिस थरूर की सफाई को मंत्री पद तक पहुंचाने वाली कांग्रेस गले से नीचे नहीं उतार पा रही। जुबान सिलकर बैठ गई। उस थरूर पर देश की जनता क्यों भरोसा करे। थरूर ने बयान दे दिया, तो क्या दूध का दूध और पानी का पानी हो गया? अगर थरूर सचमुच बेदाग, तो पद का मोह क्यों? आरोप लगा है, तो इस्तीफा देकर जांच का एलान क्यों नहीं करते? ताकि आम जनता का भरोसा कायम हो। याद है, पिछली लोकसभा में कांग्रेसी माणिकराव गावित गृह राज्यमंत्री थे। एक फर्जी व्यक्ति ने गावित की आवाज में यूपी की एक जेल में फोन किया। जेलर को हिदायतें दीं। तब जी-न्यूज पर यह खुलासा हुआ। तो गावित ने जांच तक संसद आने और मंत्रालय जाने से इनकार कर दिया। खुद सुषमा स्वराज ने कहा था- मैं गावित को जानती हूं। यह उनकी आवाज नहीं हो सकती। सरकार तय समय सीमा में जांच कराए। आखिर वही हुआ, हफ्ते भर में साबित हो गया, वह गावित की आवाज नहीं थी। पर शायद जमीन की राजनीति करने वाले गावित जैसा जज्बा एसी कमरों और पांच सितारा की राजनीति करने वाले थरूर में नहीं। कई सवाल तो थरूर की सफाई से ही उठ गए। सो विपक्षी महाजोट फिर तैयार हो गया। अब विपक्ष थरूर से नहीं, सरकार के मुखिया मनमोहन से जवाब चाहता। कांग्रेस ने भी गेंद मनमोहन के पाले में डाल दी। याद है ना, पिछली बार जब थरूर ने नेहरू की विदेश नीति पर सवाल उठाए थे। तो समूची कांग्रेस पिल पड़ी थी। पर तब मनमोहन ने दलील दी, यूएन चुनाव लड़ चुके थरूर को हटाने से दुनिया में गलत संदेश जाएगा। सो थरूर बच गए। अबके फिर विवाद, तो सोनिया-प्रणव-एंटनी ने तय किया। अब थरूर से उनके संरक्षक ही निपटें। पर मुश्किल एक हो, तो मनमोहन निपटें। यहां तो हर साख पे परेशानी। अब ममता बनर्जी ने संसद सत्र के बॉयकाट का मन बना लिया। बंगाल में नक्सलियों के खिलाफ चल रहे ऑपरेशन को राज्य प्रायोजित आतंकवाद बता रहीं। ममता के सिपहसालार सुदीप बंदोपाध्याय का दावा, वित्तमंत्री-गृह मंत्री से शिकायत कर चुके। अब तक कुछ नहीं हुआ। सो संसद सत्र में हिस्सा नहीं लेंगे। अब विपक्ष इस मुद्दे को शायद बाद में उठाए। फिलहाल थरूर पर सरकार को थरथराने की रणनीति। सो थरूर की किस्मत पीएम तय करेंगे। पर थरूर नपें या न नपें, जंग छेडऩे वाले ललित मोदी का नपना तय हो गया। सो बीजेपी भी कह रही, बीसीसीआई चाहे जो कार्रवाई करे। पर किससे बात छुपी हुई, राजस्थान चुनाव के वक्त बीजेपी का वित्तीय मामला ललित मोदी के ही जिम्मे था।
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16/04/2010
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16/04/2010
Thursday, April 15, 2010
तो कांग्रेसी 'लैंड माइन' से कैसे जूझेंगे चिदंबरम?
ब्रेक के बाद पहला दिन विपक्ष के नाम रहा। विपक्ष ने लंबे वक्त के बाद ऐसा जिम्मेदाराना रुख अपनाया। यों तो सुर्खियों में छाने वाले मुद्दे को ही बीजेपी तरजीह देती। सो बीजेपी पहले दिन शशि थरूर का मुद्दा उछालना चाहती थी। पर एनडीए मीटिंग में शरद यादव ने दंतेवाड़ा कांड को प्राथमिकता देने की पैरवी की। सो थरूर से पहले गुरुवार को नक्सली हमले पर बहस हुई। अब शुक्रवार को थरूर मुद्दा भी गरमाएगा। सो थरूर ने भी जवाबी तैयारी शुरु कर दी। गुरुवार को सोनिया-प्रणव से मिले। पर प्रणव दा ने अभी थरूर के बयान को हरी झंडी नहीं दिखाई। यों पुरानी नसीहत दोहरा दी, अपना बचाव खुद करें। अब भले कांग्रेस थरूर से दूरी दिखाए। पर आईपीएल के सभी मालिकों के नामों का खुलासा हुआ। तो अटकलें इस बात की भी, थरूर से भी किसी बड़े मंत्री का नाम आ सकता है। अगर सचमुच ऐसा हुआ, तो फिर कांग्रेस क्या करेगी? यों आईपीएल का फंदा कांग्रेस की फांस तो बाद में बनेगी। पर गुरुवार को दंतेवाड़ा की बहस में कांग्रेसी छोटी-छोटी टिप्पणियों से ही इस कदर बौखलाए। लोकसभा की कार्यवाही कई बार स्थगित करनी पड़ी। एजंडा पेपर में दंतेवाड़ा पर होम मिनिस्टर के बयान का भी जिक्र नहीं था। सो समूचे विपक्ष ने फिर एकजुटता दिखाई। आखिरकार बिन बयान ही लोकसभा में बहस शुरू हो गई। पर राज्यसभा में पहले चिदंबरम का बयान हुआ। तो उन ने फिर अपनी इच्छाशक्ति का इजहार किया। नक्सली समस्या से निपटने के लिए समझदारी, मजबूत हृदय और सहनशक्ति की जरूरत पर बल दिया। पर लोकसभा में बीजेपी से यशवंत सिन्हा ने मोर्चा संभाला। तो राज्यसभा में खुद विपक्ष के नेता अरुण जेतली ने। आखिर बहस का हश्र वही हुआ, जो सत्तापक्ष और विपक्ष के बीच होना चाहिए था। बीजेपी ने कांग्रेस पर नक्सलियों से सांठगांठ का आरोप लगाया। तो सदन को सुचारू ढंग से चलाने के लिए जिम्मेदार संसदीय कार्य मंत्री पवन बंसल और उनके जूनियर नारायण सामी ने हंगामा मचाया। बीजेपी पर सांठगांठ का आरोप लगाया। सो स्पीकर मीरा कुमार को कार्यवाही रोकनी पड़ी। अब भले सदन में न सही, यशवंत ने बाद में वही सवाल उठाए। कैसे 2004 में कांग्रेस ने आंध्र में नक्सलियों से सांठगांठ की। तबके होम मिनिस्टर हैदराबाद नक्सलियों से वार्ता करने गए। लाखों नक्सलियों ने हैदराबाद की सडक़ों पर खुलेआम मार्च किया था। पर चिदंबरम और कांग्रेस की दुखती रग को बड़े सलीके से छेड़ा। होम मिनिस्टर पी. चिदंबरम जितने अपनों के निशाने पर। बीजेपी के उतने ही दुलारे बने। सो गुरुवार को बीजेपी के नेताओं के भाषणों का निचोड़ निकालें। तो बीजेपी का नया जुमला यही बनेगा- देश का नेता कैसा हो, पी. चिदंबरम जैसा हो। जेतली हों या यशवंत, चिदंबरम के खूब कसीदे पढ़े। संदेश देने की कोशिश की- देखो, एक जिम्मेदार विपक्ष के नाते हम नक्सलवाद की समस्या के प्रति होम मिनिस्टर के साथ खड़े हुए। पर कांग्रेस पार्टी अपने ही मंत्री का घेराव कर रही। अपने ही मंत्री से कांग्रेसी इस्तीफा मांग रहे। पर हम माओवादियों को खुशी मनाने का मौका नहीं देना चाहते। जेतली ने मणिशंकर अय्यर, ममता बनर्जी, दिग्विजय सिंह की ओर से चिदंबरम पर उठाए सवाल का जिक्र किया। सिर्फ इतना ही नहीं, राजनीति के फनकार जेतली ने भिगो-भिगोकर मारने में कसर नहीं छोड़ी। कहा- क्या देश का होम मिनिस्टर घायल सिपाही के तौर पर मुकाबला कर सकेगा? उन ने चिदंबरम को सलाह दी, अपनी पार्टी के आधी माओवादी मानसिकता वाले लोगों को नजरअंदाज करें। विपक्ष उनके साथ खड़ा है। पर जरा विपक्ष की रणनीति देखिए। चिदंबरम की तारीफ कर नक्सलवाद के खिलाफ सख्त रवैये की पैरवी कर रही। तो कांग्रेस को नक्सलियों के प्रति नरम दिखाने की कोशिश। सो मुश्किल चिदंबरम की। चिदंबरम नक्सलियों के खिलाफ कठोर रुख जारी रखें। तो चिदंबरम की बौद्धिकता के शिकार दिग्विजय जैसे लोग बीजेपी के स्टैंड पर चलना बताएंगे। अगर कठोर रुख से पलटे, तो विपक्ष को समूची सरकार पर हमले का मौका मिलेगा। सो अपनी ही चाल में कांग्रेस उलझ गई। पर बहस के बाद चिदंबरम ने लोकसभा में जवाब दिया। तो अपनों के विरोध का असर चेहरे और जुबान पर दिख रहा था। उन ने सेना के इस्तेमाल से पल्ला झाड़ा। पर अपने विरोधियों को जनवरी 2009 का एआईसीसी का प्रस्ताव भी पढक़र सुनाया। जिसमें कांग्रेस ने नक्सली समस्या को लॉ एंड आर्डर, सामाजिक-आर्थिक और बातचीत का जिक्र किया था। सो चिदंबरम ने नीति के साथ चलने की दलील दी। कहा- बातचीत के दरवाजे कभी बंद नहीं। विकास भी होगा। पर लॉ एंड आर्डर समस्या ज्यादा गंभीर। सो संसद में बहस तो पूरी हो गई। भले अपने जवान नक्सलियों के लैंड माइन को नाकाम कर किला फतह कर लें। पर सबसे अहम सवाल, अपनों के बिछाए 'लैंड माइन' से कैसे जूझेंगे पी. चिदंबरम?
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15/04/2010
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15/04/2010
Wednesday, April 14, 2010
कांग्रेस को भी लगा बीजेपी वाला रोग
बजट सत्र के दूसरे चरण की तैयारी हो गई। विपक्ष के तरकश में थरूर, एटमी दायित्व बिल, महिला आरक्षण, महंगाई के खिलाफ कटौती प्रस्ताव जैसे मुद्दे। तो सत्ता पक्ष की राह में कांटे ही कांटे। अब थरूर पर भले राजनीतिक पारा चढा हुआ। पर शशि थरूर असम में छुट्टियां मनाने चले गए। पीएम मनमोहन ने वाशिंगटन से ही एलान कर दिया। जांच के बाद ही थरूर पर कोई कार्रवाई संभव। यानी पीएम के लौटने तक आईपीएल की परतें उधड़ती रहेंगी। बुधवार को थरूर को धमकी भरा एसएमएस आया। तो उधर ललित मोदी ने मजाक उड़ाया, मुझे भी धमकी आई। सो संसद में आईपीएल का करप्शन सिर चढक़र बोलेगा। पर असली मुसीबत आंतरिक सुरक्षा की। विपक्ष ने ब्रेक के बाद पहले दिन ही दंतेवाड़ा कांड पर कामरोको प्रस्ताव लाने का एलान कर दिया। आडवाणी के घर मीटिंग में एनडीए ने तय किया। अब जब दंतेवाड़ा हमले पर होम मिनिस्टर चिदंबरम के खिलाफ अपने ही जहर बुझे तीर छोड़ रहे। तो विपक्ष भला क्यों चूके। चिदंबरम ने इस्तीफे की पेशकश का सुर्रा छोड़ विरोधियों को चित करने की सोची। पर विरोध थमने का नाम नहीं। तभी तो पीएम के आदेश पर जारी कैबिनेट सैक्रेटरी के.एम. चंद्रशेखर के फरमान की धज्जियां अपनों ने ही उड़ा दी। कांग्रेस के जनरल सैक्रेट्री दिग्विजय सिंह ने बाकायदा लेख लिखकर सवाल उठाए। तो रेल मंत्री ममता बनर्जी ने कोलकाता में साफ कर दिया। बंगाल में चल रहा नक्सल विरोधी ऑपरेशन ग्रीन हंट बंद हो। ममता की दलील, ऑपरेशन जनता और विपक्ष को कुचलने की साजिश है। सो संसद में सरकार कैसे अपना बचाव करेगी, यही देखने वाली बात। यों नक्सली ऑपरेशन के खिलाफ ममता की मजबूरी अलग। पर कोई पूछे, दिग्गी राजा की क्या मजबूरी, जो उनने मीडिया के जरिए चिदंबरम के खिलाफ मोर्चा खोला? दिग्विजय ने चिदंबरम को बौद्धिक अकड़ू, ज्यादा बुद्धिमान और जिद्दी बताया। नक्सलवाद के खिलाफ चिदंबरम के तौर-तरीकों को कटघरे में खड़ा किया। कहा- च्चिदंबरम माओवादी समस्या को लॉ एंड ऑर्डर की तरह देख रहे हैं। जबकि इसे आदिवासी समस्या के नजरिए से देखा जाना चाहिए।ज् उनने चिदंबरम के जिद्दी रवैया पर कुछ यूं फोकस किया। लिखा- च्मैंने जब चिदंबरम के सामने अपना सुझाव रखा। तो उन्होंने इसे अपनी जिम्मेदारी मानने से इनकार कर दिया। जबकि केबिनेट की सामूहिक जिम्मेदारी के सिद्धांत के तहत होम मिनिस्टर का यह फर्ज बनता है कि वह मुद्दे को संपूर्णता में केबिनेट के समक्ष रखे, न कि मतांध होकर।ज् यानी खुन्नस की जड़, चिदंबरम ने भाव नहीं दिया। पर दिग्गी राजा किसकी पैरवी कर रहें? क्या बंदूक थामे नक्सली से बातचीत होगी? अगर विकास की मुख्य धारा में शामिल होना है। तो बंदूक छोड़ बातचीत की मेज पर आना होगा। पर दिग्गी कभी हिंदू आतंकवाद का जुमला उछालते। तो कभी बटला हाउस मुठभेड में मारे गए आतंकियों के घर जाकर सहानुभूति जताते। यों दिग्गी राजा ने बीजेपी को भी निशाने पर लिया। छत्तीसगढ़ में बीजेपी की चुनावी जीत को नक्सली सांठगांठ का नतीजा बताया। राज्य की जिम्मेदारी पर भी सवाल उठाए। पर असली निशाना चिदंबरम और नक्सलियों से निपटने का उनका तरीका ही रहा। अब दिग्गी राजा अपनी ही सरकार के होम मिनिस्टर पर इतना बड़ा आरोप मढ़े। तो बिना राहुल-सोनिया की सहमति संभव नहीं। चिदंबरम ने इस्तीफे की खबरें प्लांट की थी। तो समूची कांग्रेस असहज हो गई। चिदंबरम की नक्सलियों पर सख्ती कुछ कांग्रेसियों को हजम नहीं हो रही। या यों कहें, कांग्रेस एक तरफ सख्ती, तो दूसरी तरफ नरमी का संदेश देना चाह रही। पर दिग्गी राजा ने अपने लेख में कुछ अहम सवाल उठाए। मसलन, नक्सली समस्या जंगली क्षेत्र में रहने वाले लोगों की उम्मीद को नजर अंदाज कर नहीं सुलझ सकती। क्या इन तक जनवितरण प्रणाली, मनरेगा, स्वास्थ्य मिशन और अन्य गरीबपरक नीतियां पहुंची? क्या हमारी वन नीति, खनन नीति, भूमि व जल नीति जनता केंद्रित हैं? उस ऐतिहासिक पेसा कानून का क्या हुआ, आदिवासियों में पंचायती व्यवस्था के लिए बनी थी? क्या जन सहयोग के बिना सिर्फ पुलिस-सेना के जरिए नक्सल समस्या सुलझ जाएगी? बुलेट नक्सलियों की बंदूक से निकले या पुुलिस की बंदूक से। आखिरकार शिकार आम हिंदुस्तानी ही होगा। सो उस क्षेत्र की समस्या सुलझाए बिना नक्सलवाद से नहीं निपटा जा सकता। अब भले दिग्गी राजा की बात सही। पर सवाल देख यही लगा, दिग्गी राजा सत्ता पक्ष के नेता कम, विपक्ष के ज्यादा हैं। अब कोई दिग्गी राजा से पूछे, आजादी के साठ साल तक आदिवासी मुख्यधारा से नहीं जुड़ पाएं। तो जिम्मेदार किस सरकार की नीतियां। देश में करीब 50 साल तक कांग्रेस का ही राज रहा। जिन नीतियों की बात दिग्गी ने की, पिछले छह साल से मनमोहन सरकार क्या कर रही। रही बात राजनीतिक सांठगांठ की। तो वाकई नेता ही एक-दूसरे की पोल खोल सकते। पर दिग्गी राजा को अपनी बात कहने के लिए सार्वजनिक मंच की जरुरत क्यों पड़ी? आखिर मुद्दे ने तूल पकड़ा। तो कांग्रेस ने बटला की तर्ज पर दिगगी को फिर नसीहत दी। निजी राय भी पार्टी फोरम पर ही रखे। अब दिग्गी की निजी राय हो या किसी के इशारे पर दी गई। कांग्रेस को भी बीजेपी का रोग लग गया। जैसे बीजेपी में पार्टी फोरम से पहले नेता मीडिया में बोलते। वैसे ही अब कांग्रेस ने किया।
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14/04/2010
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14/04/2010
Tuesday, April 13, 2010
आईपीएल, फ्रेंचाइजी की गुगली और 'वो' !
दूसरी बीवी का कनफोड़ू शोर अभी ठीक से थमा भी नहीं कि अब तीसरी बीवी का किस्सा गूंजने लगा। शोएब मलिक ने आयशा को तलाक तो दिया। पर हायतौबा ऐसी मची, तीन दिन पहले ही सानिया से निकाह हो गया। अब रस्में निकाहनामे के बाद पूरी हो रहीं। पर तीसरी बीवी का किस्सा सीधे राजनीति से जुड़ा। दो-तीन दिनों से लगातार खबरें आ रही, विदेश राज्यमंत्री शशि थरूर तीसरी शादी करने जा रहे। अब भले थरूर तलाक देकर तीसरी शादी रचा लें। पर विवादों से थरूर का रिश्ता ऐसा, जो शायद कभी तलाक नहीं हो। अब जिस सुनंदा पुष्कर से शादी की अटकलें लग रही। उसी को लेकर विवाद हो गया। आईपीएल के अगले सीजन से कोच्चि और पुणे की टीम भी मैदान में उतरेगी। हाल ही में दोनों टीमों की बोली लग चुकी। पुणे टीम को सहारा ने खरीदा, तो कोच्चि में रोंदेवू कंपनी के साथ कई शेयरहोल्डर। अब दोनों टीमें खेलेगी तो अगले सीजन में, पर बखेड़ा इसी सीजन में हो गया। आईपीएल कमिश्नर ललित मोदी और शशि थरूर में ठन गई। मोदी की मानो, तो थरूर ने कोच्चि टीम की खरीददादी में खेल किया। रोंदेवू कंपनी की आड़ में अपनी दोस्त सुनंदा पुष्कर को 75 करोड़ के शेयर भी दिलाए। बकौल मोदी, शेयरहोल्डरों के नाम सार्वजनिक नहीं करने को थरुर ने दबाव डाला। पर थरूर इससे इनकार कर रहे। अलबत्ता उनने मोदी पर ही पलटवार किया। मोदी ने रोंदेवू को बोली प्रक्रिया से हटने के लिए दबाव बनाया। यों थरूर ने मोदी से फोन पर बातचीत कबूला। अब किसने, किसके कहने पर क्या किया। यह तो बाद की बात। पर इतना साफ हो गया, थरूर हों या मोदी, किसी की कमीज एक-दूसरे से सफेद नहीं। मोदी ने थरूर पर सुनंदा के जरिए पैसा लगाने का आरोप मढ़ा। तो थरूर के ओएसडी जैकब जोसेफ ने दोहरे आरोप लगाए। पंजाब टीम में ललित मोदी के रिश्तेदारों के पैसे लगे। तो यूएस में मोदी पर ड्रग केस का मामला। यानी अपने बचाव के चक्कर में दोनों एक-दूसरे की पोल-पट्टी ही खोल रहे। वैसे भी आईपीएल का मकसद क्रिकेट को बढ़ावा देना था ही नहीं। अलबत्ता खाली सीजन में कैसे अकूत धन उगाही हो। इसका फंडा ललित मोदी ने बीसीसीआई को सुझाया। फंड का इतना बड़ा फंडा देख आखिर किसका ईमान नहीं डोलेगा। सो किसी जमाने में एक-दूसरे के दुश्मनों को भी आईपीएल ने एक कर दिया। शरद पवार जब पहली बार बीसीसीआई का चुनाव हारे। तब अरुण जेतली ने रणवीर सिंह महेंद्रा को जिताने में ताकत झोंकी थी। फिर अपने राजस्थान में बीजेपी सरकार ऑर्डिनेंस लाई। तो मोदी की वजह से जेतली ने राजनीति का भी लिहाज नहीं किया। अपनी पार्टी की ही सरकार के खिलाफ केस की पैरवी की। सो जेतली की तब ललित मोदी के साथ-साथ वसुंधरा राजे से भी छत्तीस का आंकड़ा था। पर जैसे ही आईपीएल का फंडा आया। राजस्थान विधानसभा चुनाव की डुगडुगी बजी। तो जेतली-वसुंधरा की राजनीतिक एकता भी बन गई। आईपीएल के कमिश्नर ललित मोदी हुए, तो जेतली को गवर्निंग बॉडी में जगह मिल गई। यानी आईपीएल ने बड़े-बड़े रिश्ते बनाए। पर विवाद की ताजा वजह, एक मंत्री की प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष हिस्सेदारी का। वैसे भी थरूर मंत्रालय के कामकाज से ज्यादा ट्वीटर की दुनिया में ही रहते। सो मंत्री बने साल भर भी नहीं हुए। पर विवादों की लिस्ट देखिए। मिस्र के शर्म-अल-शेख में मनमोहन-गिलानी साझा बयान हुआ। भारत में विरोध के सुर गूंजे। तो थरूर ने साझा बयान को यों ही बताकर बखेड़ा बढ़ाया था। फिर फाइव स्टार से निकलना पड़ा और सादगी का फार्मूला दिया गया। तो जिस इकॉनॉमी क्लास में सोनिया गांधी तक ने सफर किया। उसे थरूर ने मवेशियों का क्लास बता दिया। नेहरू की विदेश नीति पर सवाल, गांधी जयंती की छुट्टी पर सवाल और फिर भारतीय राजनीति में बहस की गुंजाईश न होने की टिप्पणी। हर बार थरूर को विरोधियों के साथ-साथ अपनों की भी फटकार सुननी पड़ी। पर सुधरने का नाम नहीं। अब आईपीएल की कोच्चि टीम की फ्रैंचाईजी का विवाद। तो राजनीतिक पारा चढ़ा ही, मामला सुप्रीम कोर्ट भी पहुंच गया। बीजेपी ने फौरन पीएम से मांग कर दी, थरूर को बर्खास्त करें। कांग्रेस भी गंभीर हुई, तो विदेश मंत्री एस.एम. कृष्णा और राजीव शुक्ल दस जनपथ तलब हुए। मामले का जायजा लिया गया। तो देर शाम कांग्रेस ने बीसीसीआई का मामला बता दूरी बना ली। शायद पीएम के विदेश दौरे से लौटने का इंतजार। बीसीसीआई भी मीटिंग बुला चुकी। मोदी से भी जवाब तलब कर लिया गया। पर क्या देश में क्रिकेट ही सबकुछ? नेता जी, और भी गम हैं जमाने में क्रिकेट के सिवा। पर जब क्रिकेट में की गुगली और 'वो' का तडक़ा लग जाए। तो फिर कोई गम नहीं। कैसे हरियाणा के डिप्टी सीएम चंद्रमोहन ने फिजा के लिए कुर्सी गंवा दी थी। अब आईपीएल को ही लो। पंजाब टीम के प्रमुख प्रीति जिंटा और नेस वाडिया, दोनों की शादी की चर्चा लंबे समय से। राजस्थान रॉयल्स में शिल्पा पहले मालकिन बनीं। फिर शेयर होल्डर राज कुंद्रा से शादी। मुंबई टीम मुकेश ने बीवी नीता के नाम पर खरीदा। रॉयल चैलेंजर्स के मालिक विजय माल्या तो दीपिका पादुकोण को लकी चाम्र्स बनाकर हर मैच में बिठाते। अब सुनंदा से थरूर की तीसरी शादी की खबर और कोच्चि टीम की फ्रैंचाईजी पर मोदी-थरुर की गुगली।
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13/04/2010
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13/04/2010
आग लगी है! आओ मिलकर खोदे कुआं
तो अब सरकारी फरमान जारी हो गया। आंतिरक सुरक्षा के मसले पर सिवा होम मिनिस्ट्री के कोई जुबान नहीं खोले। केबिनेट सेक्रेटरी के.एम. चंद्रशेखर का सर्कुलर सभी विभाग को पहुंचा। तो इशारों ही इशारों में नसीहत अपने सेना प्रमुखों को थी। दंतेवाड़ा नक्सली हमले के बाद बदहवासी में जैसी बयानबाजी हुई। छत्तीसगढ़ के सीएम रमण सिंह ने तो बाकायदा एतराज भी जताया था। पर सोमवार को वायुसेना प्रमुख पीवी नाईक ने फिर सवाल उठाया। अगर नक्सलियों के खिलाफ हवाई बम गिराए गए। तो ढ़ाई सौ किलोग्राम वाले बम का असर कम से कम आठ सौ मीटर तक होगा। सो पहले जनहानि की स्पष्ट नीति तय हो। यों नाईक की बात सोलह आने सही। वायुसेना घरेलू जंग के लिए नहीं बनाई गई। अन्य देशों से लड़ाई के हिसाब से मारक क्षमता वाले अस्त्र-शस्त्र तैयार किए गए। अब वाकई उन बमों का इस्तेमाल अपने ही देश में हो। तो नक्सलियों को नुकसान होगा ही, आसपास रहने वाले निर्दोष लोगों की कई पीढिय़ां उसके दुष्परिणाम भुगतेंगी। जैसे जापान में हिरोशिमा-नागासाकी के लोग भुगत रहे। इराक-अफगानिस्तान में भी अमेरिकी बमों का असर आनेे वाली पीढियों पर दिखने लगा है। सो वायु सेना प्रमुख जो कह रहे, वह हथियारों की मारक क्षमता को समझते हुए। पर नक्सली हमले में 76 जवानों की मौत ने राजीतिक व्यवस्था को हिलाकर रख दिया। सो होम मिनिस्टर पी. चिदंबरम ने वायु सेना के इस्तेमाल की संभावना जता दी। तो थल सेना के इस्तेमाल की जरुरत पर भी बहस छिड़ गई। पीएम से लेकर होम मिनिस्टर तक। थल सेना प्रमुख से वायु सेना प्रमुख तक। मंत्रियों से लेकर राजनीतिक दलों तक। सबके बयानों में विरोधाभास दिखने लगा। अब सर्कुलर तो जारी हो गया, पर नेताओं की जुबां पर कौन लगाम कस सकता? अपनी व्यवस्था की तो अजब कहानी हो चुकी। जैसे आतंकवादी हमलों के बाद अपना तंत्र मुस्तैद होता था। अब नक्सलवादी हमले में भी वही हाल हो गया। ऑपरेशन ग्रीन हंट शुरु तो कर दिया। नक्सलियों को डरपोक-कायर कहकर उकसाने की कोशिश भी शुुरु कर दी। ताकि नक्सली सामने आकर लड़े। पर गुरिल्ला युद्ध में माहिर नक्सलियों ने जवानों को छकाया। पहली बार इतनी बड़ी तादाद में अपने जवान में मारे गए। तो भी सीआरपीएफ से लेकर होम मिनिस्ट्री तक, सबने जवानों के प्रशिक्षण पर उठे सवाल खारिज कर दिए। पर कहते हैं ना, झूठ के पांव नहीं होते। अब सरकार ने तय किया, सीआरपीएफ के जवानों को कमांडो और गुरिल्ला युद्ध में माहिर करने को पूर्व सैनिक भर्ती किए जाएंगे। यानी जंगल युद्ध में निपुण रहे रिटायर्ड फौजी अब सीआरपीएफ को ट्रेंड करेंगे। पर यह कैसी व्यवस्था, जो बीती घटना के हिसाब से खुद को तैयार करती? अगर कल को नक्सली भी आतंकियों की तरह कोई और तरीका अपनाए। तो क्या फिर जवानों के नए सिरे से ट्रेनिंग दी जाएगी? क्या व्यवस्था के पास अपना कोई विजन नहीं? क्या सिर्फ जुबान चलाना ही राजनीतिक व्यवस्था की खासियत? मौजूदा व्यवस्था का रुख देखकर तो यही आभास हो रहा। तभी तो आग लगने के बाद कुआं खोद रहे। नक्सलियों ने 76 जवान मार दिए। तो अब सरकार को ट्रेनिंग याद आ रहा। वाकई नक्सली युद्ध में अपने जवान तो झोंक दिए जाते। पर उनकी सुविधा की फिक्र शायद ही कोई करता। जंगली क्षेत्र से नावाकिफ सुरक्षा बलों को सिर्फ आदेश दिया जाता। फलां जगह जाकर कैंप करो। पर कैसे जाना है, कौन आगे का रास्ता बताएगा या रास्ते में कौन सी समस्याएं आ सकती हैं, यह बताने वाला कोई नहीं। बड़े अधिकारी तो एसी कमरों में बैठकर सिर्फ फरमान जारी कर देते। यही हाल अधिकारियों के ऊपर बैठे राजनीतिक आकाओं की। तभी तो जैसे नक्सली हमले के बाद ट्रेनिंग की बात हो रही। कुछ वैसा ही हाल महिला आरक्षण बिल का। राज्यसभा से बिल पास हो गया। तो लोकसभा में आम सहमति की कवायद हो रही। बिल में संशोधन की गुंजाईश पर भी मंथन हो रहा। पर महिला बिल का विरोध राज्यसभा में पारित कराने से पहले भी था। सो आम सहमति के प्रयास पहले ही कर लेते। वरना, जैसे राज्यसभा में पास कराया, कांग्रेस वैसी ही हिम्मत लोकसभा में भी दिखाए। पर आग लगने के बाद कुआं खोदना अपनी राजनीति की आदत। अब देखो, राज्यसभा से भले बिल पास हुआ। पर आरक्षण के बाद मुश्किलें किसकी बढेंगी। लोकसभा के करीब 138 उन सांसदों की परेशानी बढेगी, जिनकी सीटें आरक्षण की भेंट चढेगी। सो विरोध के स्वर सभी दलों में। आखिर जिन क्षत्रपों की परंपरागत सीटें जाएंगी, वह क्या करेंगे? सवाल महिला आरक्षण बिल के समर्थन या विरोध का नहीं है। अलबत्ता करीब 138 सांसदों के राजनीतिक कैरियर का है, जो बिना सांसद बने बिन पानी मछली हो जाएंगे। सो तड़प अपना अस्तित्व बचाने की। पर विरोध के लिए अलग-अलग पैतरे आजमाए जा रहे। कोई पिछड़ों की, तो कोई मुस्लिमों के आरक्षण की आवाज बुलंद कर रहा। कभी उलेमा फतवा जारी कर रहे, कभी पर्सन लॉ बोर्ड। खुद बीजेपी-कांग्रेस के ज्यादातर नेता बिल के हक में नहीं। अब आप ही सोचिए, जब परिसीमन को लेकर इतना बखेड़ा हुआ था। तो महिला बिल पर क्या होगा, यहां तो अस्तित्व की लड़ाई है। तभी तो आपसे कहा, देश की सुरक्षा का मामला हो या आधी आबादी के हक की लड़ाई का। आग लगने के बाद कुआं खोदने में मशगूल हैं अपने नेता। -----
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