आखिर कसाब पर फैसला आ गया। सभी 86 मामलों में गुनहगार साबित हुआ। सो सजा में अब किसी को कोई शक नहीं। शक है, तो सिर्फ इस बात का। क्या सचमुच सजा के फैसले पर अमल होगा? या अफजल की तरह ही कतार में, यह तो वक्त बताएगा। पर फिलहाल सबकी निगाह मंगलवार के इंतजार में। जब स्पेशल कोर्ट कसाब को सजा सुनाएगा। अब मंगलवार को कसाब की जिंदगी तय हो जाएगी। पर झारखंड की सियासत का क्या होगा, पता नहीं। बीजेपी ने झामुमो को मंगलवार तक का अल्टीमेटम दिया था। पर नितिन गडकरी से मिल शिबू के बेटे हेमंत रांची पहुंचे। तो एलान कर दिया, शिबू बने रहेंगे। बेचारी बीजेपी हक्कीबक्की रह गई। सो सोमवार को आडवाणी-सुषमा-जेतली ने संसद भवन में मीटिंग की। फिर शाम को आडवाणी के घर गडकरी-सुषमा-जेतली समेत बड़े दिग्गज जमे। पर बीजेपी फैसला नहीं ले पा रही। अब तो झारखंड की कुर्सी पर मौजां ही मौजां सिर्फ सपना भर। पर फजीहत जमकर हो रही। सो बीजेपी के चाल, चरित्र, चेहरे में फजीहत भी जुड़ गई। बीजेपी 28 अप्रैल को ही आर या पार कर लेती। तो न सिर्फ वर्करों का मनोबल बढ़ता। जनता के बीच बीजेपी खम ठोककर कहती, देखो, जनहित में कर दी कुर्सी कुर्बान। पर शिबू-हेमंत ने ऐसा पासा फेंका, बीजेपी लार टपकाने लगी। छोटी कुर्सी कुर्बान कर बड़ा हीरो बन जाती। पर बड़ी कुर्सी के लालच में छोटापन दिखा दिया। शिबू की गलती को माफ कर अपनी रहनुमाई में सरकार बनाने को राजी हो गई। पर शिबू कोई राजनीति के अनाड़ी नहीं। जो छोटी सी भूल की खातिर बड़ी कुर्सी छोड़ दें। सो गडकरी के घर शनिवार को झामुमो नेता जुटे। तो तीन घंटे तक तर्क-वितर्क चलता रहा। हेमलाल मुर्मू ने शिबू के कुर्सी से हटते ही पार्टी में टूट का अंदेशा जताया। तो अपने राजनाथ ने कह दिया, ऐसे नहीं तो वैसे कुर्सी जाएगी ही। फिर झामुमो ने शिवसेना का उदाहरण रखा। कैसे राष्ट्रपति चुनाव में शिवसेना ने एनडीए के खिलाफ वोट किया। सो बीजेपी से सवाल पूछा, तब बीजेपी ने शिवसेना से नाता क्यों नहीं तोड़ा। तो बीजेपी ने जवाब दिया, शिवसेना ने तब डंके की चोट पर प्रतिभा पाटिल को वोट दिया था। शिबू सोरेन ने तो भरोसा दिया एनडीए को, वोट यूपीए को डाल आए। सो शिवसेना ने उस वक्त जो किया, वह उसका सिद्धांत था। अबके शिबू ने जो किया, वह विश्वासघात। आखिर में बीजेपी ने दो-टूक कह दिया, कांग्रेस के कुशासन से झारखंड को बचाने के प्रति झामुमो वाकई ईमानदार। तो बीजेपी की रहनुमाई में सरकार बनाने को राजी हो, वरना समर्थन वापसी का फैसला लागू होगा। बीजेपी ने सोचा, मजबूर शिबू पर दबाव बनाएंगे। तो सीएम की कुर्सी मिल जाएगी। पर शिबू की गुगली में बीजेपी गोल-गोल घूमने लगी। अब झारखंड के झमेले से बाहर कैसे निकले, बीजेपी को समझ नहीं आ रहा। या यों कहें, गुरुजी ने झारखंड के जंगलों में बीजेपी ऐसा फंसा दिया। बीजेपी प्यास के मारे तड़प रही। बीजेपी ने राष्ट्रीय पार्टी होने की हेकड़ी दिखाई। तो शिबू-हेमंत ने अपनी सियासत शुरू कर दी। झारखंड की राजनीति में गुरुजी का कितना दबदबा, यह तो विधानसभा के आंकड़े ही बता रहे। तमाम आरोपों के बाद भी शिबू 18 एमएलए ले आए। अब दिल्ली में कुछ, और रांची में हेमंत वाणी कुछ और। तो इसके पीछे क्या वजह, यह तो सोमवार को बीजेपी नेताओं की पेशानी देखकर समझ आ गया। शिबू सोरेन ने सुबह ही गडकरी-सुषमा-जेतली को फोन घुमाया। अपील की, झारखंड केबिनेट की बैठक होने जा रही। सो अपने मंत्रियों को शामिल होने के लिए कहें। पर बिना मंत्रियों से पूछे ही तीनों सूरमाओं ने कह दिया, केबिनेट मीटिंग में बीजेपी का मंत्री नहीं आएगा। पर गुरुजी कोई नाम के ही गुरु नहीं। बीजेपी कोटे के मंत्री केबिनेट बैठक में जाने को तैयार हो रहे थे। तभी दिल्ली में बैठे सूरमाओं को भनक लग गई। तो डिप्टी सीएम रघुवर दास समेत कइयों को फोन घुमाया गया। पर इन मंत्रियों की चालाकी देखिए। सीधे फोन पर नहीं आए, अलबत्ता मातहतों के जरिए संदेशा दिलवाया। अभी बाहर से आते हैं, तो बात करवाते हैं। सो सूरमाओं को बात समझ आ गई। फौरन आडवाणी के घर जमा हुए। पर तब तक बीजेपी कोटे के मंत्री शिबू की रहनुमाई में कई सरकारी फैसलों को हरी झंडी दे चुके थे। यानी झारखंड की इस राजनीति में गुरुजी ने बीजेपी को बता दिया, गुरिल्ला युद्ध किसे कहते हैं। अब तक बीजेपी समर्थन वापसी की हेकड़ी दिखा रही थी। पर खुद के एमएलए टूटते दिख रहे। सो आडवाणी के घर फैसला हुआ, आज-कल में पर्यवेक्षक भेजा जाए। विधायकों से बात कर तत्काल समर्थन वापसी की चिट्ठी सौंप दो। ताकि न नौ मन तेल होगा, न राधा नाचेगी। अब इस झारखंड के झंझट में कौन पिटा, यह बताने की जरूरत नहीं। बीजेपी की हालत तो उस कहावत वाली हो गई। चले थे हरि भजन को, ओटन लगे कपास। कहां बीजेपी सीएम बनाने का सपना देख रही थी। पर पूरे एपीसोड में सिर्फ फजीहत करवाई। अब सुषमा स्वराज कह रहीं, इस हफ्ते आर या पार का फैसला हो जाएगा। मंगलवार का अल्टीमेटम दिया तो गुरुजी को था। पर खुद के लिए कब्रगाह बन गया। आखिर गुरुजी ने बीजेपी को बता दिया, झारखंड में यों ही लोग उन्हें गुरु नहीं कहते।
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03/05/2010
Monday, May 3, 2010
Friday, April 30, 2010
दो दिन की फजीहत, फिर मौजां ही मौजां
एक मशहूर कहावत है- भानुमती ने खसम किया, बुरा किया। करके छोड़ा, उससे बुरा किया। छोडक़र फिर पकड़ा, ये तो कमाल ही किया। अब बीजेपी बुरा न माने, पर झारखंड में बीजेपी-झामुमो का रिश्ता कुछ ऐसा ही हो गया। जब शिबू संग दिसंबर में बीजेपी ने गलबहियां कीं। तो राजीव प्रताप रूड़ी जैसे कइयों ने आपत्ति जताई थी। पर तब बीजेपी ने सभी रूडिय़ों की राय को निजी बता खारिज कर दिया। अबके कट मोशन में शिबू ने दगा किया। तो बीजेपी दगाबाज बता दूर हो गई। समर्थन वापसी का फैसला बुधवार को हुआ। शुक्रवार आते-आते फैसला टल गया। बीजेपी ने जनता के हित में लिया समर्थन वापसी का फैसला अपने हित की खातिर होल्ड पर रख दिया। अब होल्ड तो सिर्फ दिखावा। असल में फैसला रद्द समझिए। अब झारखंड में सिर्फ नेतृत्व परिवर्तन होगा, गठबंधन में कोई बदलाव नहीं। बीजेपी पार्लियामेंट्री बोर्ड शुक्रवार को फिर बैठा। तो सहमति बन गई, नए फार्मूले पर सरकार बनाई जाए। सो अब कोई शक नहीं, शिबू की झामुमो के सहयोग से बीजेपी अपना सीएम बनाएगी। पर बाप-बेटा गच्चा न दे जाएं, सो पहले दो-टूक बात करने का फैसला हुआ। अब शनिवार को बीजेपी के रणनीतिकार बाप-बेटे से बात करेंगे। फिर बीजेपी स्टेट यूनिट के साथ शिबू-हेमंत बैठेंगे। आमने-सामने की बातचीत में मंत्रालयों की बंदरबांट होगी। ताकि शिबू बहुमत साबित करने से पहले देवगौड़ा की तरह ही कोई तेरह सूत्री फार्मूला न थमा दें। कर्नाटक में देवगौड़ा ने येदुरप्पा को सीएम बनवा दिया। पर विश्वासमत से पहले राजनाथ को तेरह सूत्री शर्त भेज दी। सो सात दिन में ही येदुरप्पा की सरकार गिर गई थी। अब कहीं शपथ ग्रहण के बाद शिबू-हेमंत ने कोई नई शर्त रख दी। तो अभी ही ऊहापोह में फंसी बीजेपी का तब क्या होगा। सो हर कदम फूंक-फूंक कर रख रही। शनिवार को शिबू-हेमंत के अलावा सभी सहयोगियों से भी बात होगी। नई सरकार का पूरा रोड मैप बनेगा। ताकि बीजेपी की रहनुमाई में बनने वाली सरकार अस्थिरता के भंवर में फंसी न रहे। बीजेपी ने जिस शिबू को विश्वासघाती बताया। अब उन पर उतना ही एतबार। बीजेपी को लग रहा, अपना सीएम बना, तो शिबू अपने बेटे हेमंत को डिप्टी सीएम बनवाएंगे। यानी शिबू को अपने बेटे के राजनीतिक कैरियर की फिक्र होगी। सो सरकार की स्थिरता बनी रहेगी। पर झामुमो के दो बड़े नेताओं ने वीटो लगा दिया। साइमन मरांडी और टेकलाल महतो एनडीए के साथ जाने के खिलाफ। दोनों ने एलान कर दिया, हम यूपीए के साथ सरकार चाहते हैं। शिबू के वोट का मतलब भी यही बताया। पर शिबू की असली रणनीति कुछ और थी। शिबू को अपनी खातिर कोई सीट नहीं मिल रही थी। सो यूपीए को पटाने की कोशिश की। अपनी मर्जी से सरकार के पक्ष में वोट किया। ताकि कांग्रेस गदगद हो अपनी गोद में बिठा ले। फिर झारखंड में बेटा, तो केंद्र में अपनी बात बन जाए। पर कांग्रेस ने भाव नहीं दिया। वैसे भी एक-दो वोट से सरकार की सेहत पर कोई फर्क नहीं पडऩे वाला था। सो कांग्रेस ने बेवजह आफत मोल लेना मुफीद न समझा। अब शिबू-हेमंत करते क्या, सो उलटे पांव लौट आए। बीजेपी से मिन्नतें शुरू कर दीं। सीएम की कुर्सी का ऑफर बीजेपी भी ठुकरा नहीं पाई। पर मुश्किल, साइमन और टेकलाल का टेक कैसे हटाए। अब भले मंत्री पद की रेवड़ी से टेक हट जाए। अर्जुन मुंडा या यशवंत सिन्हा में से कोई सीएम हो जाएं। पर बीजेपी जनता और अपने वर्करों को कैसे समझाएगी। आखिर मंगलवार को कट मोशन पर मुंह की खाई। तो बुधवार को शिबू से समर्थन वापसी की चाल चल दी। गुरुवार को गवर्नर से मिलने का टाइम तीन बार बदला। फिर भी समर्थन वापसी की चिट्ठी नहीं सौंप चरित्र दिखा दिया। आखिर में शुक्रवार को चेहरा भी साफ हो गया। जब पार्लियामेंट्री बोर्ड ने अपना ही फैसला रोक लिया। सो शुक्रवार को जब अनंत कुमार ने यह एलान किया, समर्थन वापसी का फैसला होल्ड पर। तो लगा, अपने देश के मतदाता बहुत पहले मैच्योर हो चुके। बीजेपी ने तो जनहित का फैसला होल्ड पर रखा। पर जनता तो बीजेपी को पहले ही होल्ड कर चुकी। छह साल सत्ता में बिठाकर पार्टी विद डिफरेंस देख लिया। सो 2004 के बाद 2009 में भी जनता ने विपक्षी बैंच पर ही होल्ड कर दिया। अब बीजेपी भी जनता के जुल्म-ओ-सितम कब तक सहती। सो बाहरी आवरण उतार दिया। झारखंड में 36 से 30, 30 से 18 सीट पर आ गई। फिर भी कह रही, जनता चाह रही, झारखंड में सरकार बनाए। पर जरा शुक्रवार को हुए पार्लियामेंट्री बोर्ड की कहानी बताते जाएं। आला नेता इस बात को तो राजी थे, अपनी सरकार बन जाए। पर झमेला यही, बुधवार का फैसला शुक्रवार को ही कैसे पलट दें। मीडिया में होने वाली किरकिरी भारी पड़ेगी। सो झारखंड के झमेले पर बोर्ड के सामने तीन बातें रखी गईं। फैसला पलटने से होने वाली फजीहत, शिबू-हेमंत की चिट्ठी और सरकार गठन का नया फार्मूला। आखिर में जब सबने राय दी, तो निचोड़ यही निकला। भले दो-चार दिन मीडिया में फजीहत हो, पर सीएम की कुर्सी नहीं छोडऩी चाहिए। जब सरकार बन जाएगी, तो मीडिया और लोग भूल जाएंगे। आखिर संपादकीय से अपनी राजनीति नहीं चलाई जा सकती। तो समझ गए ना आप। यही है बीजेपी की नई थ्योरी। दो दिन की फजीहत, फिर कुर्सी पर बैठ मौजां ही मौजां। चाल, चरित्र, चेहरा तो 1980 के दशक की बात।
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30/04/2010
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30/04/2010
Thursday, April 29, 2010
कभी बीजेपी भी चाल, चरित्र, चेहरे वाली पार्टी थी!
आखिर वही हुआ, जो बीजेपी की कहानी में हमेशा होता आया। बीजेपी ने फिर साबित कर दिया, सत्ता के आगे नीति, नैतिकता, सिद्धांत कुछ भी नहीं। कर्नाटक में जो एच. डी. देवगौड़ा के बेटे कुमारस्वामी ने अक्टूबर 2007 में किया। अब शिबू सोरेन के बेटे हेमंत सोरेन कर रहे। सो बाप को किनारे कर अपनी सियासत चमकाने में जुट गए। राजनीति का ऐसा पासा फेंका, आम आदमी के हित की बजाए कुर्सी दिखने लगी। सो समर्थन खींचने की धमकी महज घुडक़ी बनकर रह गई। सीएम की कुर्सी का लॉलीपॉप देख बीजेपी के मुंह से लार टपकने लगी। सो बुधवार को किए फैसले पर गुरुवार को भी अमल नहीं कर पाई। बीजेपी पार्लियामेंट्री बोर्ड ने इमरजेंसी मीटिंग बुला फैसला तो ले लिया। पर अमल के बजाए सौदेबाजी कर रही। हेमंत सोरेन ने ऐसा फार्मूला दिया, न उगले बन रहा, न निगले। सो गुरुवार को समर्थन वापसी पर बीजेपी ने भरपूर ड्रामा किया। पहले कहा, गवर्नर को 11 बजे मिलकर समर्थन वापसी की चिट्ठी देंगे। फिर एलान हुआ, सभी एमएलए पांच बजे गवर्नर से मिलेंगे। फिर सात बजे और अब मामला शुक्रवार के लिए टल गया। अब कोई पूछे, समर्थन वापसी की चिट्ठी देने में काहे की ड्रामेबाजी। अगर जनता के हित में सरकार की कुर्बानी देने का फैसला किया। तो उसी झामुमो के समर्थन से खुद की सरकार बनाने में क्यों जुटी? हेमंत सोरेन ने यही फार्मूला दिया है बीजेपी को। हेमंत ने बुधवार ही लोकसभा में शिबू के वोट को मानवीय भूल बताया था। तो गुरुवार को बाप से बीजेपी को चिट्ठी भिजवा दी। शिबू ने मुख्यमंत्री के लेटर हैड पर नितिन गडकरी और सुषमा स्वराज को माफीनामा भेजा। लोकसभा में वोट को खराब तबियत की वजह से मानवीय भूल बताया। एनडीए के साथ रहने की प्रतिबद्धता दोहराई। झारखंड के गठन में एनडीए की भूमिका का मक्खन भी लगाया। पर बीजेपी का दिल चिट्ठी से नहीं पसीजा। अलबत्ता हेमंत के फार्मूले ने गदगद कर दिया। यानी झारखंड में बीजेपी का सीएम होगा। दौड़ में यशवंत सिन्हा, अर्जुन मुंडा, रघुवर दास का नाम भी आ गया। यों अब तक यशवंत ही आगे। अब दूसरा फार्मूला भी चल रहा। बीजेपी इस फार्मूले से दोहरी रणनीति साधना चाह रही। बाबूलाल मरांडी को सीएम बनाने का ऑफर। बाकी बीजेपी-झामुमो समर्थन करें। ऐसे में बीजेपी को अपना बिछुड़ा हुआ साथी भी मिल जाएगा। शिबू से दुबारा हाथ मिलाने से भद्द भी नहीं पिटेगी। पर मरांडी झारखंड में बीजेपी को औकात में ला चुके। सो फिलहाल मरांडी बीजेपी के झांसे में फंसते नहीं दिख रहे। पर बीजेपी अपने ही जाल में फंस गई। अब किस मुंह से दुबारा शिबू की झामुमो से हाथ मिलाए। यों बीजेपी नए फॉर्मूले में दलील दे सकती, देखो, शिबू से एतराज था। सो शिबू को हटा राज्य की जनता के हित में नई सरकार बनाई। हेमंत ने फार्मूले में कुछ ऐसी ही दलील दी। ताकि बीजेपी कह सके, शिबू लोकसभा के सांसद हैं। झारखंड की सत्ता से कोई सरोकार नहीं। पर झारखंड में शिबू के बिना हेमंत की राजनीतिक हैसियत ही क्या। अब दलीलें कुछ भी हों, पर गुरुवार को पेच कहां फंस गया। चिट्ठी सौंपने में अब-तब का खेल चलता रहा। तो इधर बीजेपी झामुमो की ओर से ठोस प्रस्ताव की बाट जोहती रही। सत्ता लोलुपता ने बीजेपी को तकनकी दांव-पेच में फंसा दिया। अगर बीजेपी सीधे गवर्नर को समर्थन वापसी की चिट्ठी सौंप देती। तो गवर्नर दूसरे पक्ष कांग्रेस को बुलाकर पूछते। और फिर राष्ट्रपति राज की सिफारिश हो जाती। सो सत्ता के लालच में गवर्नर से मिलने का टाइम बदलता रहा। फार्मूला बन रहा था, बीजेपी समर्थन वापसी की चिट्ठी सौंपेगी। तो झामुमो हाथोंहाथ नेतृत्व परिवर्तन की। पर अब अगर शुक्रवार को झामुमो ने हेमंत सोरेन के फार्मूले को पार्टी के प्रस्ताव के तौर पर भेजा। तो पहले बीजेपी पार्लियामेंट्री बोर्ड बैठेगा। फिर बीजेपी समर्थन वापसी की नहीं, शायद नेतृत्व परिवर्तन की चिट्ठी सौंपेगी। गुरुवार को सुबह से लेकर रात तक बीजेपी झारखंड के झूले में ही झूलती रही। दो बार कोर ग्रुप की मीटिंग हुई। अनौपचारिक बैठकें तो अनगिनत हुईं। अब बीजेपी के इस हाई वोल्टेज ड्रामे को क्या कहेंगे आप। शिबू को विश्वासघाती बताया। पर क्या सीएम की कुर्सी मिलने से अब शिबू विश्वासपात्र हो जाएंगे? बीजेपी के एक बड़े नेता ने आज कहा- हमारा मुंह तो खुला हुआ है। अगर सामने भोजन रखा जाएगा, तो हम क्यों नहीं खाएंगे। यही बात 28 अक्टूबर 2007 को बीजेपी के एक नेता ने कही थी। कहा था- हवन तीन बजे न सही, छह बजे ही। जेडीएस ने हमारी बात मान ली, सो हम भी तो कोई सन्यासी नहीं। आखिर राजनीति इसीलिए तो कर रहे। क्या यही पार्टी विद डिफरेंस वाली बीजेपी? कल जिसे विश्वासघाती बताया, आज उसी से गलबहियां। आखिर यह राजनीति का कैसा चरित्र? कांग्रेस तो सत्ता की राजनीति करती ही रही। पर बीजेपी खुद को चाल, चरित्र, चेहरे वाली बताती रही। फिर भी बीजेपी के ड्रामे में एकता कपूर के सास भी कभी बहू थी सीरियल से भी अधिक ट्विस्ट। अब कहीं बीजेपी पर एकता कोई सीरियल बनाए। तो शायद यह टाइटल मौजूं होगा- कभी बीजेपी भी चाल, चरित्र, चेहरे वाली पार्टी थी। अब सोचो, बीजेपी को अधर में लटका कल देवगौड़ा की तरह शिबू-हेमंत किसी नई सौदेबाजी पर उतर आएं, तो हैरत नहीं।
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29/04/2010
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29/04/2010
Wednesday, April 28, 2010
यही होगा, जब अटल बिहारी की बीजेपी में हों गगन विहारी
तो वाजपेयी को दिया बर्थ-डे गिफ्ट बीजेपी ने वापस ले लिया। चार महीने पहले 25 दिसंबर को ही बीजेपी-झामुमो गठबंधन का एलान हुआ था। तो सत्ता की खातिर हुए समझौते को बीजेपी ने वाजपेयी को तोहफा बताया। पर हनीमून पीरियड में ही तलाक हो गया। बीजेपी सचमुच कटी पतंग हो गई। कट मोशन पर मुंह की तो खाई ही, अब झारखंड में बेवक्त सरकार गई सो अलग। यानी खाया-पीया कुछ नहीं, गिलास तोड़ा बारह आना। शिबू सोरेन को वोट के लिए बीजेपी ने बुलावा भेजा था। पर शिबू ने मनमोहन को वोट दे दिया। जैसे महाभारत में नकुल-सहदेव के मामा शल्य आए तो थे पांडवों की ओर से लडऩे। पर बीच रास्ते में दुर्योधन ने ऐसी आवभगत की। शल्य भ्रमित हो गए और बाद में कौरवों की ओर से लडऩा पड़ा। अब जब महाभारत युग में ऐसी भूल हुई, तो कलियुग में शिबू ने क्या गुनाह कर दिया। अब मनमोहन सरकार में कोयला मंत्री रह चुके। दिल्ली आए होंगे, तो कुछ पुरानी दोस्ती से आवभगत हो गई होगी। सो शिबू भूल गए होंगे, सीएम रहते संसद में क्या करने आए। चार महीने से शिबू को विधायकी की खातिर कोई सीट नहीं मिली। सो सांसदी अब तक नहीं छोड़ी। ऐसे में तो कोई भी कनफ्यूज हो जाएगा। सो शिबू ने मनमोहन के पक्ष में बटन दबा दिया। बीजेपी ने देखा, तो फौरन निशिकांत दुबे भेजे गए। सो शिबू ने कह दिया- जो हो गया, सो ठीक। पर बीजेपी का पारा चढऩे लगा। तो बुधवार को शिबू ने कहा- ऐसे ही हो गया। शिबू के बेटे हेमंत ने सफाई दी- भूलने की बीमारी, सो मानवीय भूल हो गई। पर जब मंगलवार को लोकसभा में मशीन खराब होने की वजह से परची से वोट पड़े। तो शिबू ने मांगकर मनमोहन के समर्थन वाली लाल परची ली। तो क्या इसे कलर ब्लाइंडनेस कहें? पर शिबू सोरेन की बात छोडि़ए। शिबू के पैंतरों के कहने ही क्या। शिबू को तो आज नहीं, दो महीने बाद ही सही, जाना ही था। पर बीजेपी के बारे में क्या कहें। क्या बीजेपी भी अल्जाइमर की मरीज? शिबू ने खिलाफ वोट किया। तो बीजेपी ने विश्वासघाती बता समर्थन खींच लिया। पार्लियामेंट्री बोर्ड की इमरजेंसी मीटिंग बुला फैसला हुआ। तो संदेश दे रही, महंगाई के मुद्दे पर समझौता नहीं। पर क्या सचमुच महंगाई की खातिर बीजेपी ने झारखंड में सरकार की शहादत दी? या खुद कट मोशन की बलि चढ़ गई? पर अब बीजेपी को शिबू विश्वासघाती दिख रहे। तो कोई पूछे, विश्वासपात्र कब दिखे? आखिर कितने घात खाने के बाद बीजेपी को विश्वासपात्र और विश्वासघाती में फर्क दिखेगा? या कहीं ऐसा तो नहीं, बीजेपी को दुलत्ती खाने की आदत पड़ चुकी। सनद रहे, सो बताते जाएं। कर्नाटक की पिछली विधानसभा की तस्वीर याद करिए। पहले बीस महीने कांग्रेस-देवगौड़ा ने सरकार चलाई। पर बाद में देवगौड़ा के बेटे कुमारस्वामी ने बीजेपी से गठजोड़ किया। सत्ता की खातिर बीजेपी ने सिद्धांत ताक पर रख दिए। पर बीस महीने सीएम रहने के बाद कुमारस्वामी ने बीजेपी को कुर्सी ट्रांसफर नहीं की। तो बीजेपी के यशवंत सिन्हा ने तब बोर्ड के फैसले का एलान किया था। देवगौड़ा को भी ऐसे ही विश्वासघाती बताया। सो कर्नाटक में राष्ट्रपति राज लगा। पर बीस दिन बाद ही बीजेपी-देवगौड़ा एक हो गए। भले सरकार हफ्ते भर में ही गिर गई। पर तब बीजेपी के एक बड़े नेता ने मौजूं टिप्पणी की थी। कहा था- हवन तीन बजे न सही, छह बजे हो। जेडीएस ने हमारी बात मान ली, सो हम भी कोई सन्यासी नहीं। आखिर राजनीति इसीलिए तो कर रहे। अब कोई पूछे, जब सत्ता ही सब कुछ। तो चाल, चरित्र, चेहरा और पार्टी विद डिफरेंस का ढकोसला क्यों? क्यों नहीं सिद्धांत का चोला फेंक कह देती, राजनीति में सब जायज। सिर्फ कर्नाटक नहीं, यूपी में मायावती को बीजेपी ने ही सीएम की कुर्सी तक पहुंचाया। पर वक्त आने पर माया ने बीजेपी को औकात दिखा दी। सो यूपी में आज माया कहां और बीजेपी कहां, जगजाहिर। हरियाणा में चौटाला से ऐसे ही मौकापरस्ती की दोस्ती और दुश्मनी। उड़ीसा में नवीन पटनायक ने कैसे धूल चटाई, सबको पता। तब बीजेपी मुगालते में थी, उड़ीसा में नवीन का ताज छिनेगा। पर जनता ने चुनाव में बैसाखी ही तोड़ दी और नवीन पूर्ण बहुमत से सत्ता में लौट आए। अब ताजा किस्सा शिबू सोरेन का। तो सुषमा कह रहीं- आडवाणी तो सीएम शिबू को बुलाने के हक में नहीं थे। पर शिबू खुद आ गए। अब इस झूठ को क्या कहें। एस.एस. आहलूवालिया ने सोमवार को एनडीए मीटिंग के बाद प्रेस कांफ्रेंस में एलान किया था- एनडीए के 153 सदस्यों को सदन में लाने का बंदोबस्त हो रहा। जिसमें सीएम शिबू और उनके ही जेल में बंद सांसद कामेश्वर बैठा भी शामिल। पर अब सवाल शिबू और झारखंड का नहीं। सवाल, कितने घात खाकर सुधरेगी बीजेपी? वर्करों की भावना से खेल झारखंड में सरकार बनाई थी। तब राजनाथ बीजेपी की स्टेयरिंग छोड़ चुके थे। गडकरी ने कुर्सी संभाल ली थी। सो दोनों को वर्कर नहीं, अपना रिकार्ड बनाने की फिक्र थी। गठबंधन बनाकर चलाना कोई गिल्ली-डंडे का खेल नहीं। वाजपेयी ने पहली बार में ही 22 दलों का इंद्रधनुषी गठबंधन बनाकर उसे बखूबी चलाया था। पर अब बीजेपी में वाजपेयी जैसे साख वाले नेता ही नहीं। अलबत्ता अटल बिहारी की बीजेपी में गगन विहारी की पूरी जमात जम चुकी। जिनका आपस में ही अहं टकराता, किसी का एक-दूसरे से सामंजस्य नहीं। हालत ऐसी हो चुकी, छोटा सा फैसला लेने में अब महीने नहीं, साल लग रहे। ऐसे में गठबंधन के दल क्या खाक साथ रहेंगे।
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28/04/2010
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28/04/2010
Tuesday, April 27, 2010
'तो जो सरकार निकम्मी है, वो सरकार बचानी है'
तो मंगलवार का दिन सरकार के लिए मंगलमय हो गया। सिख विरोधी दंगे में सीबीआई ने आखिर जगदीश टाइटलर को क्लीन चिट दिला ही दी। वाकई सीबीआई बड़े काम की चीज। तभी तो लोकसभा में विपक्ष का कट मोशन औंधे मुंह गिरा। महंगाई के मुंह में अब सेक्युलरिज्म घुस गया। सो विपक्षी एकता ढहनी ही थी। पर कट मोशन इतनी कटुता पैदा कर जाएगा, उम्मीद नहीं थी। लालू-मुलायम ने लोकसभा में ऐसा रंग बदला, गिरगिट भी देखकर शर्मसार हो जाए। आम बजट के दिन यही लालू-मुलायम सेक्युलरिज्म को किनारे रख आम आदमी की दुहाई दे रहे थे। संसद से सडक़ तक सरकार की सिट्टी-पिट्टी गुम करने की कसमें खाईं। पर अब लालू-मुलायम को याद आ गया, बीजेपी तो सांप्रदायिक पार्टी। सो लेफ्ट को चुनौती दी। बीजेपी संग वोट नहीं करो, तो सरकार के खिलाफ हम भी वोट करेंगे। पर लालू से कोई पूछे, संख्या कहां से जुटाएंगे। खुद लालू ने कटौती प्रस्ताव को रस्म अदायगी बताया। पर सेक्युलरिज्म का झंडा उठा कौन सी सरकार गिरा लेते? अब कोई पूछे, महंगाई में सांप्रदायिकता कहां से आ गई? क्या दाल, चावल, सब्जी, आटे में भी कुछ हिस्से सांप्रदायिक होने लगे? या फिर महंगाई किसी खास धर्म या जाति को ही परेशान कर रही? आखिर राजनीतिक दल किसे बेवकूफ बना रहे? मंगलवार को तेरह दलों ने महंगाई पर भारत बंद किया। संसद के दोनों सदनों में सुबह से एकजुटता दिखाई। पर जब महंगाई के खिलाफ सरकार को घेरने का निर्णायक वक्त आया, तो भाई लालू-मुलायम कट लिए। मुलायम ने वाकआउट से पहले किसान, गरीब, बेरोजगारों के लिए अनुदान की मांग रखी। पर ऐसा क्या हुआ, जो पहले ही मैदान छोड़ गए। क्या निजी तौर पर कोई अनुदान मिल गया? या कहीं कांग्रेस ने लालू-मुलायम को यह डायलॉग तो नहीं सुना दिया- मेरे पास सीबीआई है। अब जरा लालू की सुनिए। कहा- आईपीएल पर सरकार की विदाई तय थी। आईपीएल में गरीबों, बेकारों का पैसा लूटा गया। पर आडवाणी कह रहे, आईपीएल बहुत हो चुका। लालू का इतना कहना था कि बीजेपी भडक़ गई। पर लालू से पूछे, आईपीएल में किस गरीब अंबानी, विजय माल्या, श्रीनिवासन, राज कुंद्रा, प्रीति जिंटा, शाहरुख खान का पैसा लगा हुआ। आखिर लालू के लिए महंगाई से बड़ा मुद्दा आईपीएल कैसे हो गया। लगता है, अब लालू-मुलायम राजनीति की थाली के बैंगन हो गए। पर एक सीबीआई ने सिर्फ लालू-मुलायम मैनेज नहीं किए। अलबत्ता कट मोशन पर सरकार की साख बचाई। विपक्षी महाजोट की खटिया खड़ी कर दी। मायावती ने सरकार को समर्थन की पूरी कीमत वसूल ली। सुप्रीम कोर्ट में चल रहे आय से अधिक संपत्ति के मामले में सीबीआई से केस कमजोर कराया। तो जाकर मंगलवार को लखनऊ में समर्थन का एलान किया। पर जरा लालू-मुलायम की तरह मायावती की माया देखिए। प्रेस कांफ्रेंस की शुरुआत यूपीए सरकार को आड़े हाथों लेते हुए की। केंद्र पर यूपी से भेदभाव का आरोप लगाया। महंगाई, गरीबी, भुखमरी, बेरोजगारी जैसी तमाम समस्याओं की जड़ में मनमोहन सरकार की नीतियां बताईं। बोलीं- इन समस्याओं के मद्देनजर बसपा को सरकार के खिलाफ वोट करना चाहिए था। लेकिन हम नहीं चाहते कि सांप्रदायिक ताकतें सत्ता में आ जाएं। इसलिए कटौती प्रस्ताव पर यूपीए का समर्थन करेंगी। यानी सीधे शब्दों में मायावती की प्रेस कांफ्रेंस का निचोड़ बताएं। तो राजनीति का नया स्लोगन बनेगा- जो सरकार निकम्मी है, वो सरकार बचानी है। पर मायावती ने यह भी कहा- समर्थन का सीबीआई से कोई लेना-देना नहीं। अब कोई अनाड़ी ही माया पर भरोसा करेगा। याद है 2008 में जब मनमोहन विश्वास मत की तैयारी कर रहे थे। मायावती ने समर्थन नहीं दिया। तो लोकसभा में तबके बीएसपी नेता बृजेश पाठक ने आरोप लगाया था, सीबीआई का अधिकारी उनके घर आया था। दस्तावेज दिखाकर धमकी दे गया, समर्थन दो, नहीं तो शिकंजा कस देंगे। तबके स्पीकर सोमनाथ चटर्जी ने मामला होम मिनिस्ट्री को रैफर किया था। पर जब 2007 में राष्ट्रपति चुनाव हुए। तो ताज कॉरीडोर केस से समर्थन की सौदेबाजी हुई। सो बीजेपी ने सरकार पर सीबीआई के बेजा इस्तेमाल का आरोप मढ़ा। तो सबसे मौजूं बात सीताराम येचुरी ने कही। उन ने कहा- कांग्रेस ने वर्षों तक देश पर कैसे राज किया, उस अनुभव को दिखा दिया। सरकार बचाने की जोड़-तोड़ में कांग्रेस विशेषज्ञ है। वाकई कट मोशन किसी और सरकार के खिलाफ होता। तो राजनीतिक माहौल अलग होता। पर कांग्रेस की राजनीति हमेशा धौंस की रही। सो अबके भी खम ठोककर कीमतें बढ़ाईं। विपक्ष ने लाख घोड़े दौड़ाए। पर रेस में दौड़ रहे कुछ घोड़ों पर बेखौफ बंदूक तान दी। अब कांग्रेस ने विपक्षी एकता का बंटाधार कर दिया। पर माया से नजदीकी अपनी ही फांस बन गई। आखिर राहुल बाबा यूपी में माया को दुश्मन नंबर एक बताते। माया के बुतों से लेकर मनरेगा आदि मुद्दों पर कांग्रेस ने घेराबंदी की। पर अब माया ने समर्थन दिया। तो कांग्रेस प्रवक्ता जयंती नटराजन बोलीं- तबकी टिप्पणी तबके मुद्दे पर थी। वक्त के हिसाब से राजनीतिक जरूरतें बदलती कहीं। सो अब यूपी की राजनीतिक रणनीति का खुलासा वक्त आने पर करेंगे। पर कांग्रेस यह भूल रही, यूपीए-वन में कांग्रेस कमजोर थी। तो साढ़े चार साल बाद गिनती की नौबत आई। अबके कांग्रेस मजबूत, पर बहुमत की गिनती 11 वें महीने में ही करनी पड़ी। अभी तो सरकार के चार साल एक महीना बाकी।
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27/04/2010
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27/04/2010
Monday, April 26, 2010
कटौती प्रस्ताव पर कटी विपक्षी एकता की पतंग
संसद में शोरगुल थमने का नाम नहीं। पर संसद से पहले राज्यपाल प्रभा राव को अपनी श्रद्धांजलि। सोमवार को दिल का दौरा पडऩे से निधन हो गया। वाकई सहज, सीधी, सरल थीं प्रभा राव। पर कहते हैं, किसी व्यक्ति की खासियत जाननी हो, तो विरोधियों के शब्दों को देखो। संवैधानिक पद पर आसीन होने से पहले प्रभा राव कांग्रेस में थीं। पर उनके निधन के बाद बीजेपी के सांसद अर्जुन राम मेघवाल का संदेश काबिल-ए-गौर। मेघवाल ने लिखा- प्रभा राव ने सार्वजनिक जीवन में कुछ ऐसे मापदंड तय किए हैं, जिससे सार्वजनिक जीवन जीने वाला हमेशा प्रेरणा लेता रहेगा। यानी राजस्थान ही नहीं, देश के लिए अपूरणीय क्षति। अब मंगलवार को संसद भी श्रद्धांजलि देगा, फिर देर शाम वर्धा में दाह संस्कार। सो अब बात संसद में चल रहे स्यापे की। विपक्ष की तरकश में रोज नए मुद्दे जुट रहे। सरकार ऐसे मुद्दे थमा रही कि विपक्ष भी कनफ्यूज हो चुका। किस मुद्दे को उठाएं, किसे छोड़ें, समझ नहीं पा रहा। सो एक दिन आम आदमी का, तो दूसरे दिन खास आदमी का और तीसरे दिन अपनी भलाई भी देख लेता। सो पहले महंगाई का मुद्दा उठाया। फिर बीच में आईपीएल और मोदी-थरूर आ गए। अब नया मुद्दा राजनेताओं के फोन टेपिंग का। सो सोमवार को भी संसद की छुट्टी हो गई। दोनों सदनों में विपक्ष का रिंग टोन इस कदर गरजा, कामकाज ठप करना पड़ा। लोकसभा में आडवाणी ने मोर्चा संभाला, तो इमरजेंसी की याद दिलाई। जेपीसी गठित करने की मांग हुई। लगे हाथ अंग्रेज जमाने के टेलीग्राफ एक्ट में बदलाव की मांग कर दी। पर बात आगे तब बढ़े, जब सरकार टेपिंग का आरोप मान ले। यहां तो होम मिनिस्टर पी. चिदंबरम ने टेपिंग से इनकार कर दिया। पीएम ने जेपीसी की मांग ठुकरा दी। यों संसद में अभी पीएम का बयान नहीं हुआ। सोमवार को प्रणव दा ने लाख मिन्नतें कीं, साढ़े तीन बजे मनमोहन जवाब देंगे। पर विपक्ष को तो अपने मुद्दे की धार बनानी थी। भले संसद का कीमती वक्त कौड़ी क्यों न हो जाए। पर बात मुद्दे की, तो हमाम में नंगा कौन नहीं। सिस्टम तो सत्ताधारी दल का रखैल बन चुका। सो दुरुपयोग करने में कोई पीछे नहीं। तभी तो गाहे-ब-गाहे फोन टेपिंग के मुद्दे उठते रहते। अब सोमवार को टेपिंग मुद्दे का कोई हल नहीं निकला। पर मंगलवार को संसद में नया मुद्दा होगा। लोकसभा में सरकार गिलोटिन लाएगी। यानी सभी मंत्रालयों की अनुदान मांगें एक साथ वोट के लिए रखी जाएंगी। जिसका इंतजार विपक्ष समेत समूचे देश को। पेट्रोल-डीजल की कीमतें प्रणव दा ने बजट में बढ़ाई थीं। तो दो महीने पहले 26 फरवरी को हाथों में हाथ लेकर समूचे विपक्ष ने एलान किया था- कटौती प्रस्ताव लाकर कीमतें रोल बैक को मजबूर कर देंगे। पर ठीक दो महीने बाद विपक्षी कुनबा बिखर गया। यों अब भी एनडीए-लेफ्ट संग होने का दंभ भर रहे। पर लालू-मुलायम की चाल टेढ़ी हो गई। बीएसपी से तो हमेशा की तरह कांग्रेस ने सौदेबाजी कर ली। यानी अब विपक्षी एकता पस्त, तो कांग्रेस मस्त हो रही। कांग्रेस ने तो कह दिया- विपक्ष यह न भूले, यूपीए-वन से मजबूत है यूपीए-टू। सो वित्तीय प्रस्ताव पास हो जाएंगे। अब विपक्ष बिखर रहा हो, तो सरकार गदगद क्यों न हो। यों एहतियातन कांग्रेस ने सांसदों को व्हिप जारी कर दिया। व्हिप तो बीजेपी ने भी जारी किया। पर जरा राजनीति के असल दांव-पेच देखते जाइए। कहां 26 फरवरी को समूचे विपक्ष ने खम ठोका था, महंगाई के खिलाफ सरकार के घुटने टिकवा देंगे। पर दो महीने बाद खुद घुटने टेकता दिख रहा। बीजेपी ने पांच दिन पहले ही विशाल रैली भी की। पर विपक्षी कुनबे में बिखराव ने हालत पस्त की, या सरकार से कुछ सांठगांठ, यह मालूम नहीं। अब बीजेपी सरकार को मजबूर करने का खम नहीं ठोक रही। अलबत्ता बीजेपी सिर्फ इतना चाह रही, कम से कम एनडीए के 153 सांसदों के वोट रजिस्टर्ड हो जाएं। कटौती प्रस्ताव को लेकर इतनी हायतौबा मचाई। अब नहीं लाए, तो भद्द पिटेगी। सो रस्म अदा करने को मंगलवार को कटौती प्रस्ताव आएगा। बीजेपी को डर, कहीं ऐसा न हो, हंगामे में सरकार वित्तीय प्रस्ताव पास करा ले जाए। वैसे भी हंगामाई सरदारों लालू-मुलायम से सरकार की जुगलबंदी हो चुकी। सो कहीं कटौती प्रस्ताव के पक्ष में नंबर अधिक दिखा। तो हंगामे के लिए आईपीएल और फोन टेपिंग जैसे बड़े मुद्दे। वैसे भी सोमवार को विपक्षी एकता में दरार यहीं से पड़ी। बीजेपी-लेफ्ट ने फोन टेपिंग उठाया। तो लालू-मुलायम आईपीएल चाहते थे। सो लालू को यह भी मालूम न था, मंगलवार को कटौती प्रस्ताव आने वाला। अब जरा आम आदमी के पहरेदार विपक्षी दलों के चेहरे आप खुद देख लो। मंगलवार को गैर यूपीए, गैर एनडीए वाले तेरह दलों ने भारत बंद का एलान कर रखा। सो उधर महंगाई के खिलाफ भारत बंद होगा। तो इधर संसद में महंगाई का मुद्दा ही डंप हो जाएगा। विपक्ष का आखिरी हथियार है कटौती प्रस्ताव। सो उसके बाद विपक्ष से कैसी उम्मीद। विपक्ष को तो अब आईपीएल के पोस्टमार्टम और फोन टेपिंग मुद्दे में सुर्खियां नजर आ रहीं। सो आम आदमी के हित में अब मजबूती से खड़ी नहीं। सिर्फ और सिर्फ विरोध दर्ज कराने की रस्म निभाना चाहती है बीजेपी। सो जब विपक्ष ही सरेंडर कर चुका। तो भला आम आदमी की क्या बिसात। सो कटौती प्रस्ताव आएगा तो मंगलवार को। पर विपक्षी एकता की पतंग तो सोमवार को ही कट गई।
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26/04/2010
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26/04/2010
Friday, April 23, 2010
तो राजनीतिक आईपीएल में भी मैच फिक्सिंग!
यों आईपीएल का फाइनल इतवार को हो जाएगा। पर संसद में चल रहा लीग मैच खत्म नहीं हो रहा। सो शुक्रवार को संसद के दोनों सदनों में कामकाज ठप रहा। अबके समूचा विपक्ष जेपीसी की मांग पर अड़ा। तो सरकार के होश फाख्ता हो गए। विवाद में शरद पवार-प्रफुल्ल पटेल का नाम गले की हड्डी बना। संसद में कुछ ने इस्तीफा मांगा। तो कुछ जांच की मांग पर ही सिमटे रहे। सो प्रणव मुखर्जी ने मोर्चा संभाला। चेहरे पर थोड़ा गुस्सा, थोड़ा धैर्य दिखा। तो दादा ने जेपीसी का एलान नहीं किया, पर विचार का झुनझुना थमा गए। फिर भी विपक्ष नहीं माना। सो देर शाम कांग्रेस कोर ग्रुप में मंथन हुआ। पर जेपीसी को लेकर कांग्रेस ऊहापोह में फंस गई। कोर ग्रुप में दो मत उभरे। पहला- जेपीसी को भी आखिर मौजूदा एजेंसी पर ही निर्भर रहना होगा। दूसरा- जेपीसी बनी, तो अब तक जो राज सिर्फ सरकार के पास, सबको मालूम हो जाएगा। सो प्रणव दा ने अब तक की जांच का ब्यौरा रखा। फिर तय हुआ, सरकारी एजेंसी सही काम कर रही। पर विपक्ष का हंगामा जारी रहा, तो क्या होगा। सो मामला पीएम पर छोड़ दिया। अब सरकार तेल और तेल की धार देखेगी। वित्त विधेयक का फच्चर न होता, तो शायद जेपीसी की हां या ना शुक्रवार को ही हो जाती। पर सरकार की बड़ी चुनौती वित्त विधेयक पास कराने की। सो अगर अगले हफ्ते संसद में स्थितियां बदलीं। तो सरकार मामले को लटकाएगी। तब तक शायद ललित मोदी की विदाई भी हो जाए। अगर विपक्ष ने रार ठान ली। तो शायद जेपीसी गठित हो जाए। पर बीजेपी ने तो शुक्रवार को ही साफ कर दिया। सोमवार के हंगामाई एजंडे में फोन टेपिंग मुद्दा होगा। अरुण जेतली ने भी तैयारी कर ली। सो दोनों सदनों में फोन टेपिंग पर हंगामा बरपेगा। एक मैगजीन में खुलासा हुआ, यूपीए सरकार 2006 से ही कई बड़े राजनेताओं के फोन टेप करा रही। जिसमें करीब-करीब सभी दलों के नेता शामिल। कांग्रेस भी यही चाह रही, हंगामा आईपीएल से दूसरे मुद्दे पर शिफ्ट हो। पर कोर ग्रुप में एक और आकलन हुआ। भले विपक्ष जेपीसी की मांग पर एकजुट हो। पर पवार-पटेल के इस्तीफे को लेकर बंटा हुआ। अब देखो, शुक्रवार को शरद यादव, बासुदेव आचार्य, गुरुदास दासगुप्त ने इस्तीफा मांगा। पर बीजेपी जेपीसी की मांग से आगे नहीं बढ़ी। अब भले जेपीसी के बाद पवार-पटेल का इस्तीफा बीजेपी अनिवार्य बता रही। पर सोचो, जेपीसी का दायरा सीमित रखा गया, तो क्या होगा। सो बीजेपी शुक्रवार को बुरी तरह घिर गई। शशि थरूर का इस्तीफा मांगने में बीजेपी ने तनिक भी देर नहीं की। या यों कहें, ट्विटर को राजनीतिक तेवर बीजेपी ने ही दिया। सो थरूर को इस्तीफा देना पड़ा। पर अब पवार-पटेल का नाम आया। तो बीजेपी को मानो सांप सूंघ गया। इस्तीफा मांगना तो दूर, पवार-पटेल के बचाव में बीजेपी इस कदर उतरी, जितनी एनसीपी भी नहीं। सो प्रेस कांफ्रेंस में एस.एस. आहलूवालिया पहुंचे। तो मीडिया ने सवालों की झड़ी लगा दी। चौतरफा घुमाफिरा कर वही सवाल। सो आहलूवालिया खीझ गए। मीडिया से ही सवाल पूछना शुरु कर दिया। पटेल-पवार के खिलाफ एक भी सबूत दिखा दें। अब कोई पूछे, थरूर के बारे में कौन सा सबूत मिल गया था। महज ट्विटर पर ललित मोदी ने सुनंदा पुष्कर के शेयर का खुलासा किया। तो बीजेपी ने मोदी का कहा सच मान लिया। तब बीजेपी नेताओं ने सुनंदा-थरूर के रिश्ते पर खूब चुटकियां लीं। अब विवाद में प्रफुल्ल पटेल की बेटी पूर्णा का नाम आया। पूर्णा आईपीएल से जुड़ी हुई। उसने आईपीएल के सीईओ सुंदर रमन का भेजा ई-मेल अपने पिता के पीए को भेजा। फिर वही मेल थरूर तक पहुंचा। पर आहलूवालिया कह रहे, उस ई-मेल में ऐसा कुछ नहीं। उन ने मीडिया को नसीहत दी, पहले मेल पढि़ए। फिर तय करिए, वह दोषी है या नहीं। आहलूवालिया की खीझ यहीं तक नहीं। उन ने तो बाकायदा मीडिया को नैतिकता का पाठ पढ़ाना शुरू कर दिया। पर सवाल उठा, बीजेपी के ही यशवंत ने पवार-पटेल का इस्तीफा मांगा। तो असहज आहलूवालिया बोले- यशवंत ने जो कहा, उससे असहमत नहीं। जरा गौर करिए, आहलूवालिया ने यह नहीं कहा, सहमत हैं। सो सवाल, कहीं ऐसा तो नहीं, बीजेपी को डर लग रहा। आंच पवार-पटेल तक पहुंची। तो बीजेपी भी झुलसेगी। सचमुच आईपीएल विवाद पर बीजेपी में दो खेमे बन चुके। बीजेपी के कनफ्यूजन की वजह भी यही। वैसे भी आईपीएल या बीसीसीआई से जुड़े नेता चैरिटी के लिए नहीं जुड़े। दुनिया को मालूम, अपनी बीसीसीआई के पास कितना माल। सो मोदी को हटाने के बाद राजनीतिक आईपीएल के मैच फिक्सिंग की तैयारी। ललित मोदी तो अब आत्मघाती दस्ता हो गए। भले खुद जाएं, पर कइयों को बेनकाब करने की ठान चुके। सो जेपीसी की चर्चा तेज हो गई। पर इतिहास साक्षी, जेपीसी ने मामले को जितना सुलझाया नहीं, उतना लटकाए रखा। हर्षद मेहता घोटाला हो या केतन पारिख घोटाला, जेपीसी तो बनी, पर रपट आने में तीन से चार साल लग गए। यानी जेपीसी का मतलब साफ, मोदी को हटाओ, फिर जांच के नाम पर विवाद ठंडे बस्ते में। पर जेपीसी क्या तीर मार लेगी। आखिर जेपीसी को भी सरकार की जांच एजेंसियों का ही सहयोग लेना पड़ेगा। सो विवाद के बाद भी बेफिक्र शरद पवार कह रहे- जिसे जो करना है, करने दीजिए। खुद सत्ता में, प्रमुख विपक्ष बीजेपी भी साथ। तो पवार क्यों हों फिक्रमंद। बीजेपी भी आईपीएल की पिच से पवार से गठजोड़ की बिसात बिछा रही।
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23/04/2010
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23/04/2010
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