Thursday, May 13, 2010

अब तो नेता खुद ही एक-दूसरे को जानवर मानने लगे

अपने शहरी विकास मंत्रालय ने सोमवार को साफ-सुथरे शहरों की रपट जारी की थी। तो चंडीगढ़ अव्वल आया। तब किसी ने सोचा भी न होगा, एक दिन बाद ही चंडीगढ़ राजनीतिक गंदगी के लिए सुर्खियों में आएगा। पर संयोग कहें या कुछ और, बुधवार को बीजेपी अध्यक्ष नितिन गडकरी ने चंडीगढ़ को इसका हिस्सा बना दिया। चंडीगढ़ में गडकरी की पहली रैली थी। पर जोश में ऐसा होश खोया, लालू-मुलायम जैसे क्षेत्रीय दिग्गजों को कुत्ता बता गए। सोनिया गांधी का तलवा चाटने वाला कह दिया। सो राजनीतिक भूचाल मचा। तो गडकरी ने जो उगला था, फौरन निगल लिया। विरोधियों की धार तेज न हो, सो हाजमा ठीक करने को माफी भी मांग ली। पर गडकरी की दलील देखो, लालू-मुलायम को कुत्ता नहीं कहा। अलबत्ता मुहावरे का इस्तेमाल किया। पर गडकरी ने भाषाई मर्यादा तोड़ी भी, तो लालू-मुलायम जैसों के खिलाफ। सो लालू ने फौरन जवाब दिया- ऐसा मुहावरा संघ की डिक्शनरी में होता होगा। उन ने गडकरी को संस्कारों का ऐसा सबक सिखाने का खम ठोका, जिससे गडकरी कभी ऐसी भाषा का इस्तेमाल न कर सकें। अब सोचो, लालू-मुलायम संस्कार सिखाएंगे, तो गडकरी का क्या होगा? पर मुलायमवादी कोर्ट में घसीटने की तैयारी कर रहे। कांग्रेस ने तो गडकरी की राजनीतिक हैसियत पर ही सवाल उठा दिए। शकील अहमद और मनीष तिवारी बोले- गडकरी अपने पद के लिए फिट नहीं। खुद भी ऐसा मान चुके, सो ताजा टिप्पणी उनकी संकीर्ण मानसिकता की परिचायक। यानी राजनीति में मौके के हिसाब से नैतिकता और मर्यादा तय होने लगीं। गडकरी की टिप्पणी को लालू ने लोकतंत्र को कलंकित करने वाला बताया। तो कोई पूछे, चौबीस अगस्त 2006 को लोकतंत्र के सबसे बड़े मंदिर लोकसभा में लालू-प्रभुनाथ ने किसका नाम रोशन किया था? मां-बहन की गाली से लेकर किसी राहगीर को दोनों एक-दूसरे का बहनोई बता रहे थे। सदन में जमकर हाथापाई हुई थी। लोकसभा का हालिया किस्सा ही देख लो। बीजेपी के अनंत कुमार ने लालू को गद्दार कह दिया। पर खुद माफी मांगने को तैयार नहीं हुए। सो सुषमा स्वराज ने सदन में माफी मांगी। तृणमूल के सुदीप बंदोपाध्याय ने माकपाई वासुदेव आचार्य पर अभद्र टिप्पणी कर दी। तो विपक्षी खेमे के सभी नेता सदन में नैतिकता झाडऩे लगे। पर भाषाई मर्यादा बेलगाम होने के किस्से यहीं खत्म नहीं। जब एनडीए सत्ता में था, 2004 में चुनावी शंखनाद हुआ। तो प्रमोद महाजन ने सोनिया गांधी की तुलना मोनिका लेविंस्की से की थी। नरेंद्र मोदी ने राहुल को जर्सी बछड़ा, तो सोनिया को इटली की.... कह दिया था। सो तब कांग्रेस नैतिकता का पाठ पढ़ा रही थी। यों तब वाजपेयी राज था, सो वाजपेयी ने अपने नेताओं को फटकार लगाने में तनिक भी देर नहीं की थी। फिर गुजरात चुनाव में मर्यादा की हदें खूब लांघी गईं। सोनिया गांधी ने नरेंद्र मोदी को मौत का सौदागर कहा। दिग्विजय सिंह ने हिंदू आतंकवाद का जुमला दिया। तो जवाब में मोदी ने भी कांग्रेसियों को सोहराबुद्दीन जैसों का पनाहगार बता दिया। अब बुधवार को सिर्फ गडकरी ने नहीं, मध्य प्रदेश में कांग्रेस ने लोकलाज की परवाह नहीं की। यों गडकरी की भावना सोलह आने सही। लालू-मुलायम ने निजी स्वार्थ की खातिर जिस तरह गिरगिट की तरह रंग बदले। उसे जनता की राजनीति तो नहीं कह सकते। एटमी डील हो या महंगाई पर कटौती प्रस्ताव, लालू-मुलायम सुर बदल सत्ता की गोद में जाकर बैठ गए। अब लालू-मुलायम की राजनीति सीमित दायरे में। वन मैन आर्मी वाली पार्टी का वैसे भी कब, क्या स्टैंड होगा, मालूम नहीं। पर गडकरी से ऐसी जुबान की उम्मीद नहीं थी। सो बाद में उन ने माफी मांग ली। पर मध्य प्रदेश में कांग्रेसी एमएलए मर्यादा का क, ख, ग भी भूल गए। स्वर्णिम मध्य प्रदेश के नाम पर विधानसभा का विशेष सत्र चल रहा। पर कांग्रेसी सत्र का बॉयकाट कर रहे। विधानसभा की सीढ़ी पर धरना दे रहे। बुधवार को बीजेपी की एमएलए ललिता यादव थोड़ी देर से विधानसभा पहुंचीं। तो एक कांग्रेसी एमएलए ने चुटकी ली, इतनी लेट हो गईं, कैसे स्वर्णिम मध्य प्रदेश बनेगा। बीच में दूसरे ने टिप्पणी कर दी, ब्यूटी पार्लर में देर हो गई होगी। तीसरे ने जो कहा, उसे लिख नहीं सकते। सो बात विधानसभा स्पीकर ईश्वर दास रोहाणी तक पहुंची। सदन में ललिता रोईं। तो चैंबर में स्पीकर भी फूट-फूट कर रोए। फिर भी कांग्रेस ने गुरुवार को मध्य प्रदेश की घटना पर चुप्पी साधी। पर गडकरी को नैतिकता सिखा रही। आखिर यह राजनीति की कैसी मर्यादा? एक वक्त था, जब नेहरू अपने विरोधियों के खिलाफ चुनाव में या तो उम्मीदवार नहीं देते थे या कमजोर उम्मीदवार उतारते थे। वाजपेयी तक मर्यादा विरोधी और शत्रु में फर्क रहा। पर अब राजनीति निजी रंजिश वाली हो चुकी। राजनीतिक दलों की विचारधारा मर चुकी। सो सिर्फ वोट के लिए सारे तिकड़म हो रहे। तभी तो अनंत कुमार हों या लालू-मुलायम-सुदीप-मणिशंकर जैसे दिग्गज नेता। जिनका राजनीतिक कैरियर दो-तीन दशक पुराना हो चुका। पर स्तर गिर चुका। अब तो बड़े मियां ही सुभान अल्लाह। सोचो, छोटे मियां क्या करेंगे। कलराज मिश्र ने सही फरमाया, नेता संयम में रहकर भाषा का प्रयोग करें, क्योंकि नेता जनता से जुड़ा होता है और जनता पर नेता की बात का फर्क पड़ता है। सो बेहतर होगा, अब नेता जनता को दोष न दें। अब तो खुद नेता ही एक-दूसरे को जानवर बता रहे। तो सोचो, राजनीति का स्तर क्या रह गया।
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13/05/2010

Wednesday, May 12, 2010

तो कांग्रेस खेल रही दूरी बनाने-मिटाने का खेल

यों कहने को प्यार, जंग और राजनीति में सब जायज। पर जब प्यार पर पहरा लगा, तो राजनेता या तो पहरेदारों के साथ हो लिए। या फिर चुप्पी साधकर बैठ गए। सो बदलते वक्त के साथ पहरेदार अब समाज के ठेकेदार हो चुके। पर करनाल की सैशन कोर्ट ने जब तीस मार्च को मनोज-बबली हत्याकांड में कुछ ठेकेदारों को लपेटा। तो इन कथित ठेकेदारों के पेट में गुडग़ुड़ी होने लगी। मनोज-बबली का प्यार परवान चढ़ा, तो गोत्र की फिक्र नहीं की। आखिर करते भी क्यों, प्यार धर्म-जाति-गोत्र पूछकर नहीं होता। कब किस पर किसका दिल आ जाए, किसका प्यार परिणति तक पहुंचे, कोई भी नहीं जानता। शायद यही वजह है कि प्यार और कानून को अंधा कहा गया। प्यार सिर्फ इनसान को देखता है, कानून सिर्फ सबूत। पर खाप पंचायत के तुगलकी फरमान ने मनोज-बबली को जिंदगी से जुदा कर दिया। तो अदालत ने भी अपना काम बखूबी निभाया। कथित ठेकेदारों में से पांच को फांसी, एक को उम्रकैद, एक को सात साल की सजा दी। सो तबसे खाप पंचायत के लोग मुहिम पर उतारू। शुरुआत में लोगों ने तवज्जो न दी। पर हरियाणा में स्थानीय चुनाव की सुगबुगाहट शुरू हुई। तो खाप ने महापंचायत बुलाकर नवीन जिंदल समेत राज्य के सभी सांसदों से 25 मई तक रुख साफ करने को कहा। खाप के इस फरमान का असर ही कहेंगे। बीते इतवार कैथल की महापंचायत में कांग्रेस के युवा सांसद नवीन जिंदल को पहुंचना पड़ा। पर जिंदल के सिर खाप का खौफ इतना हावी, उन ने खत लिखकर समर्थन दिया। संसद में आवाज बुलंद करने का एलान कर दिया। यों जिंदल पढ़े-लिखे, प्रगतिशील विचारों के इनसान। आज भी वह दृश्य याद है, जब जिंदल 2004 के चुनाव से पहले कांग्रेस में शामिल हुए थे। तब सवाल-जवाब हुए, तो कांग्रेस के औपचारिक मंच से जिंदल ने तबके पीएम अटल बिहारी वाजपेयी की जमकर तारीफ की थी। शायद तब राजनीति की पाठशाला में शामिल हुए थे। सो लाग-लपेट नहीं था। पर अब तो सांसदी का दूसरा टर्म। सो राजनीति के पेच समझने लगे। सांसदी की कुर्सी का मोह छोडऩे का मन शायद किसी बिरले का ही होता होगा। पर जिंदल कोई बिरले नहीं। सो उन ने वोट बैंक खिसकने के डर से खाप को खुला समर्थन दिया। हिंदू मैरिज एक्ट में संशोधन की खाप की मांग को जायज ठहराया। पर बवाल मचा, खुद विधि मंत्री वीरप्पा मोइली ने ऐसी मांग को खारिज कर दिया। तो जिंदल सफाई देने लगे, ऑनर किलिंग की हिमायत नहीं की। पर खाप की मांग क्या है। खाप यही तो चाह रहा, एक गोत्र में शादी कानूनन बैन हो और कोई ऐसी जुर्रत करे, तो खाप के फरमान को अदालत में चुनौती नहीं दी जा सके। यानी खाप खुद ही पुलिस, वकील और जज की भूमिका चाह रहा। आखिर यह मांग करनाल कोर्ट के फैसले के बाद ही तो उठी। तो क्या खाप अब भी मनोज-बबली की हत्या को अपना जुर्म नहीं मानेगा? समाज की परंपरा के नाम पर मौत का फरमान देने वाला खाप कौन होता? क्या समाज के इन ठेकेदारों ने कभी भूख और गरीबी से जूझने वाले किसी परिवार की सुध ली है? जब कोई खाप किसी के घर का चूल्हा नहीं जलवा सकता। तो उसे समाज की ठेकेदारी का हक किसने दिया? समाज जोडऩे के लिए होता, उजाडऩे के लिए नहीं। अगर खाप की बात मान भी ली जाए। तो क्या प्यार करने वालों को पहले खाप की परमिट लेनी होगी? क्या कांग्रेस सांसद नवीन जिंदल को समझ नहीं, क्या चाह रहा है खाप? अब भले क्षेत्रीय राजनीति के हिसाब से जिंदल ने खाप को समर्थन दिया। पर मुश्किल में फंस गई कांग्रेस। कांग्रेस हमेशा से विवादित मुद्दों पर मध्य मार्ग ही चुनती। सो खाप के मसले पर कांग्रेस का यही स्टैंड रहा, कानून अपना काम करेगा। पर खाप के समर्थन में बोल जिंदल ने बखेड़ा खड़ा कर दिया। तो बुधवार को हरियाणा कांग्रेस के इंचार्ज पृथ्वीराज चव्हाण ने नोटिस भेज दिया। खाप पर बयानबाजी से दूर रहने की हिदायत दी। लगे हाथ सफाई मांगी, क्यों पार्टी स्टैंड के खिलाफ खाप पंचायत में हिस्सा लिया। पर कांग्रेस ने सिर्फ जिंदल के बयान से दूरी बनाई। न खाप के समर्थन में कुछ कहा, न खिलाफ। पर कोई पूछे, जिंदल को नोटिस तो दिया। पर भूपेद्र सिंह हुड्डा के करीबी राज्यसभा सांसद शादीलाल बत्रा को क्यों नहीं। बत्रा ने भी खाप की मांग का समर्थन किया। यों खाप के तुगलकी फरमान किसी से छुपे नहीं। फिर भी वोट बैंक के डर से कोई सवाल नहीं उठाता। मंगलवार को रिटायर हुए चीफ जस्टिस के.जी. बालाकृष्णन ने भी खूब फरमाया। कहा- जब हम प्यार में होते हैं, तो किसी कानून को नहीं मानते। सो कानून में संशोधन हो या नहीं.. यह सामाजिक मुद्दे हैं और लोग दर लोग विचार बदलते रहते हैं। पर समाज की इन ठेकेदारी प्रथा पर रोक नहीं लगी, तो ऐसी मांग देश की व्यवस्था के लिए नासूर बन जाएगी। जिंदल के बाद ओमप्रकाश चौटाला ने भी खम ठोका। तो वोट की खातिर सफेद झूठ बोल गए। चिदंबरम से मिले किसी और मुद्दे पर। मीडिया में आकर कह दिया, हमने हिंदू मैरिज एक्ट में संशोधन के लिए ज्ञापन दिया। सो मंगलवार को ही गृह मंत्रालय ने स्पष्टीकरण जारी कर दिया। चौटाला ने चिदंबरम से मुलाकात में ऐसी कोई बात नहीं कही। सो सियासतदानों का रंग आप खुद देख लो। पर बात कांग्रेस की, इधर बुधवार को नवीन जिंदल से दूरी बनाई। तो उधर जयराम दूरी मिटाने के लिए पी. चिदंबरम से मिले। चीन में की गई अपनी टिप्पणी पर मीडिया के सामने चुप्पी अभी भी नहीं टूटी।
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12/05/2010

Tuesday, May 11, 2010

दिल मिलें, न मिलें, मिलते रहेंगे भारत-पाक के हाथ

अमेरिका को भले पाक पर एतबार न हो। हिलेरी क्लिंटन तक को कहना पड़ गया- पाक को मालूम, कहां छुपा है लादेन। पर पाक के अधिकारी सही जानकारी नहीं दे रहे। अब भले मंगलवार को अमेरिकी प्रवक्ता ने पाक पर लगाए इल्जाम को नरम करने की कोशिश की। पर सच तो हिलेरी की जुबां से निकल चुका। आखिर पाक का ही कनेक्शन दुनिया की हर आतंकी घटना से क्यों जुड़ जाता। पर वही अमेरिका गाहे-ब-गाहे भारत को पाक से वार्ता की सलाह दे जाता। सो मुंबई हमले के गुनहगार कसाब को फांसी की सजा से पहले विदेश सचिव स्तर की बातचीत हो चुकी। अब मंगलवार को दोनों देशों के विदेश मंत्री करीब 25 मिनट तक फुनियाए। तो तय हुआ, फोन पर नहीं, आमने-सामने बतियाएंगे। जुलाई की 15 तारीख भी मुकर्रर हो गई। विदेश मंत्री एस.एम. कृष्णा इस्लामाबाद जाएंगे। तो अपने समकक्ष शाह महमूद कुरैशी से मिलेंगे। वही कुरैशी, जिन ने भारत के बातचीत के न्योते का पाकिस्तान में मजाक उड़ाया था। भारत को घुटना टेकने वाला बताया था। मुंबई हमले के बाद दोनों देशों की शांति वार्ता ठप हो चुकी थी। बाद में अमेरिकी दबाव में भारत ने आगे बढक़र हाथ बढ़ाया। तो कुरैशी ने चोरी और सीना जोरी दिखाते हुए पाक अवाम में हीरो बनने की कोशिश की। खम ठोककर कहा- देखो, जो भारत हमसे बात करने को तैयार नहीं था। आतंकवाद का आरोप मढ़ा। अब वही भारत हमसे कह रहा, आओ मिल-बैठकर बात करें। कुरैशी इतना तक कह गए। फिर भी भारत ने सचिव स्तरीय वार्ता शुरू की। अब सार्क देशों के गृह मंत्रियों की मीटिंग में 26 जून को पहले पी. चिदंबरम इस्लामाबाद जाएंगे। फिर 15 जुलाई को एस.एम. कृष्णा। पर सवाल उठना लाजिमी, आखिर पाक ने ऐसा क्या किया, जो बात आगे बढ़ रही? मुंबई हमले के दोषियों को पाक में क्या सजा मिली? किस आतंकवादी ढांचे को पाक ने नेस्तनाबूद किया? आखिर बातचीत का कोई तो आधार हो। वरना सिर्फ बात के लिए बात का क्या मतलब? अमेरिकी दबाव में कब तक भारत-पाक के बीच रस्म अदायगी वाली वार्ता होगी? शायद दोनों देशों को यह बखूबी मालूम, मजबूरी की इस वार्ता का कोई अर्थ नहीं। तभी तो कसाब को भारत की अदालत ने फांसी की सजा सुनाई। अपने चिदंबरम-कृष्णा-मोइली जैसे वरिष्ठ मंत्रियों ने इसे पाक के लिए सबक बताया। आतंक का निर्यात बंद करने की नसीहत दी। तो पाक बौखला गया। पाक प्रवक्ता ने उलटे नसीहत दी, भारतीय नेता जुबां पर संयम रखें। अब ऐसे पाक से कोई क्या उम्मीद करेगा। जब कसाब को मिली सजा पाक को नहीं पच रही। तो पाक में बैठे 26/11 के साजिशकर्ताओं को क्या सजा मिल पाएगी? पर निरर्थक नतीजे की उम्मीद में हम आगे क्यों बढ़ रहे? यह नेतृत्व की कमजोरी या मजबूरी या फिर दोनों? अंकल सैम को चुनौती देने वाली इंदिरा गांधी जैसी शख्सियत अब नहीं। मनमोहन सिंह अपनी दूसरी पारी में मजबूत होकर उभरे। पर अबके विपक्ष नहीं, टीम में शामिल सिपहसालार ही कमजोर कर रहे। मंत्रियों की बयानबाजी, आपसी भिड़ंत साल भर में ही परेशान कर चुकी। शशि थरूर के बाद अब जयराम रमेश तेवर दिखा रहे। पी. चिदंबरम वाली होम मिनिस्ट्री की नीति पर चीन जाकर सवाल उठा दिया। पीएम ने फटकार लगाई। तो चिट्ठी लिखकर सोनिया-मनमोहन से खेद जता दिया। पर मंगलवार को सवाल हुए, तो जयराम के तेवर में कोई कमी नहीं। प्रेस कांफ्रेंस में आए, तो तल्खी दिखाते हुए कह दिया- मैं यहां चीन में की गई टिप्पणी के संदर्भ में कुछ भी कहने नहीं आया हूं। पर सवालों की बौछार हुई। तो माफी या सफाई के सवाल को टाल गए। फिर पूछा गया, क्या कांग्रेस मुख्यालय जाएंगे? तो तल्खी भरे अंदाज में पलटकर पूछा, किसलिए? वैसे भी भारतीय मीडिया के सवाल जयराम को चुभ रहे होंगे। पर चीनी मीडिया के तो हीरो बन गए। चाइना डेली ने जयराम के बयान की तारीफ की। पर चाइना चालाकी दिखा गया। जयराम ने ब्रह्मपुत्र के पानी को मोडऩे के संदर्भ में टिप्पणी की थी। तो उसे खारिज कर दिया। यानी चीनी मीडिया ने जयराम का मीठा-मीठा घप, कड़वा-कड़वा थू कर दिया। फिर भी जयराम इतराएं। तो राम ही राखा। अब पड़ोसी देश के बारे में अपना मंत्री ही ऐसी टिप्पणी करने लगे। तो अपनी विदेश नीति दिग्भ्रमित होगी। चीन सीमा विवाद के बहाने लगातार तेवर दिखा रहा। तो दूसरी तरफ पाक आतंकवाद को बढ़ावा दे रहा। सो मंगलवार को दोनों विदेश मंत्रियों की बातचीत हुई। तो बीजेपी ने सवाल उठाया। जब पाक मुंबई हमले के दोषियों पर कार्रवाई नहीं कर रहा। तो भारत वार्ता की प्रक्रिया को अपग्रेड क्यों कर रहा? पहले पाक छह जनवरी 2004 का वादा निभाए। फिर वार्ता हो। पर सरकार किसी की भी हो, यही होता। कारगिल के बाद एनडीए सरकार ने वार्ता की थी। संसद पर हमले के बाद ऑपरेशन पराक्रम हुआ, फिर पाक से वार्ता हुई। सो हमाम में सब एक जैसे। पर बीजेपी की बात चली। तो झारखंड का जिक्र जरूरी। झारखंड की राजनीति उलझती जा रही। पर मंगलवार को बीजेपी की मीटिंग अपग्रेड होकर सीएम के चयन तक पहुंच गई। अब फिर संसदीय बोर्ड बैठेगा। तब कोई फैसला होगा। पर हेमंत सोरेन ने फिर 50-50 की चाल चल दी। यानी जहां से चले थे, वहीं लौट आए। कटौती प्रस्ताव के अगले दिन बीजेपी ने समर्थन वापसी का फैसला किया। फिर सत्ता की रेवड़ी देख लार टपक गई। अब सुबह का भूला शाम को घर लौट आए, तो उसे भूला नहीं कहते। पर कोई चौदह दिन बाद भी न लौटे, तो....।
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11/05/2010

Monday, May 10, 2010

पहले अमेरिका, अब चीन की पैरवी का क्या मतलब?

पंडित जवाहरलाल नेहरू के निधन की वजहों में चीन से हार का सदमा भी माना जाता। हाल ही में चीनी अतिक्रमण बढ़ा था। तो संसद और संसद के बाहर विपक्ष ने यही वजह गिना कांग्रेस को झकझोरने की खूब कोशिश की। वाकई नेहरू ने हिंदी-चीनी भाई-भाई का नारा दिया था। पर चीन ने पीठ में खंजर घोंप दिया। सो 1962 का वह जख्म आज भी कोई भारतवासी भुला नहीं पाता। वैसे भी चीन की साम्यवादी सरकार जिस नीति की पोषक, उस पर आंख मूंदकर भरोसा नहीं किया जा सकता। पर अपनी ही मिट्टी में जन्मे और रचे-बसे कुछ चीनी पैरोकार भी। सो गाहे-ब-गाहे चीनी प्रेम दिखा ही जाते। यूपीए-वन की सरकार में लेफ्ट अपने समर्थन की वसूली कर रहा था। जब-तब चीनी कंपनियों को विशेष रियायत देने की आवाज उठती रहती थी। तब लेफ्ट सरकार का हिस्सा नहीं, अलबत्ता बाहर से समर्थन दे रहा था। पर अबके सरकार के मंत्री ही चीनी कंपनी की लॉबिंग कर रहे। अपने जयराम रमेश वन व पर्यावरण मामले के स्वतंत्र प्रभार वाले राज्यमंत्री। पर लगता है, पद में स्वतंत्र क्या जुड़ा, जयराम कुछ अधिक ही स्वतंत्र हो गए। सो अबके उन ने चीन में जाकर अपने गृह मंत्रालय की मीन-मेख निकाली। दूर संचार क्षेत्र की एक चीनी कंपनी हुआवेई का निवेश भारत में नहीं हो पा रहा। अपने पी. चिदंबरम सुरक्षा कारणों से चीन के मामले में काफी सतर्क। पर कंपनी से ज्यादा जयराम रमेश को अखर गया। बीजिंग में कह दिया- गृह मंत्रालय का रुख जरूरत से ज्यादा रक्षात्मक और सावधानी बरतने वाला। सो चीनी निवेश की खातिर गृह मंत्रालय को नरम रुख अपनाना चाहिए। अब गृह मंत्रालय पर कांग्रेसी खेमे से यह दूसरी बड़ी टिप्पणी। पहले दिग्विजय सिंह उंगली उठा चुके। अब एक मंत्री ने सवाल उठा दिया। तो कांग्रेस में खलबली मच गई। हमेशा की तरह कांग्रेस ने मंत्री के बयान से दूरी बना ली। बीजिंग से सोमवार की सुबह लौटे जयराम ने पीएम से बात की। तो पीएम ने सलाह दी- दूसरे मंत्रालय के कामकाज पर टिप्पणी न करें। जहां तक चीन से संबंध का सवाल, तो सरकार के रुख में कोई भ्रम नहीं। अब आप इसे पीएम की फटकार कहेंगे, या कुछ और। अपनी नजर में तो यही लग रहा, जैसे पीएम सफाई दे रहे। वैसे विदेशी धरती पर अपने घर की पोल खोलना यूपीए सरकार की नई आदत नहीं। अपने पीएम तो देश में कभी-कभार ही बोलते। विदेश दौरे के वक्त घरेलू मुद्दों पर खुलकर बोलते। याद है, कैसे एटमी डील का वाजपेयी ने विरोध किया। तो मनमोहन ने वाशिंगटन में जॉर्ज बुश से वाजपेयी का नाम लेकर शिकायत की थी। सो जब मनमोहन ही ऐसा करें, तो फिर जयराम गलत कहां। यों जयराम ने एक गलती जरूर की। मनमोहन विदेश में जाकर विपक्ष पर हमलावर रहे। तो जयराम अपनी ही सरकार की पोल खोलने लगे। सो कांग्रेस ने फौरन बयान को गैरवाजिब बताया। उचित फोरम पर बात रखने की नसीहत दी। पर यह कोई पहला मौका नहीं, जब जयराम को ऐसी नसीहत मिली हो। वैसे तो यूपीए-टू की टीम मनमोहन में बयान बहादुरों की कमी नहीं। पर कोपेनहेगेन समिट से पहले पिछले साल अक्टूबर में भी जयराम ने सरकार की फजीहत कराई थी। जब पीएम को चिट्ठी लिख सलाह दी, भारत अपना स्टैंड बदल ले। तकनीकी के लिए सहायता की शर्त छोड़ जी-77 से खुद को अलग कर यूएस का साथ दे। यानी जयराम की सलाह थी, गुटनिरपेक्ष देशों की नेतागिरी छोड़ अमेरिका की बात मान लो। पर बवेला मचा, बीजेपी ने अमेरिका के लिए लॉबिंग करने का आरोप लगाया। खुद कांग्रेस ने अपने होनहार जयराम से दूरी बना ली। तो बीस अक्टूबर 2009 को सार्क देशों के पर्यावरण मंत्रियों की बैठक में क्योटो प्रोटोकॉल पर ही राजी होना पड़ा था। संसद में भी सफाई देनी पड़ी थी। बीटी बैंगन पर भी जयराम ने खूब लॉबिंग की। पर आखिरकार लौट के घर आना पड़ा। तो खुन्नस में वरिष्ठ मंत्रियों पर ही खीझ उठे। फिर गंदगी के मामले में देश के लिए नोबल प्राइज का सुर्रा छेड़ सुर्खियों में छाए। प्रोजैक्ट को लेकर केबिनेट में कमलनाथ से तू-तू, मैं-मैं। डिग्री लेते वक्त गाउन पहनना एक परंपरा। पर जयराम ने पहनने के बाद मंच से उसे उतार फेंका। दलील दी, यह गुलामी की निशानी। पर कोई पूछे, मंच पर आने से पहले पहना ही क्यों था? जयराम को मीडिया की सुर्खी बनना खूब पसंद। तभी तो दिन में एकाध प्रेस कांफ्रेंस कर ही लेते। पर जयराम का विवाद से यहीं नाता खत्म नहीं। यूपीए-वन में जब रामसेतु पर हलफनामे में गड़बड़ हुई थी। तो अंबिका सोनी से इस्तीफा मांगने वालों में सबसे पहले खड़े थे जयराम। पर अबके चीन की पैरवी कर फंस गए जयराम। बीजेपी तो झारखंड का अपना आचरण भूल जयराम के आचरण पर सवाल उठाए। पीएम को इस्तीफा मांगने की सलाह दी। बीजेपी ने चिदंबरम की नीति को जायज ठहराया। कहा- चीनी हैकर इतने सक्रिय हो चुके, सो चिदंबरम की नीति सही। वाकई चीन की विस्तारवादी नीति को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। चीन के बारे में यहां तक कहा जाता, उसने दुनिया के महत्वपूर्ण देशों के दस्तावेज चुराने के लिए हैकरों की एक आर्मी तैयार कर ली है। ऐसे में किसी चीनी कंपनी के हित में कोई भारतीय मंत्री इस हद तक जाए, तो क्या कहेंगे आप? आखिर चीन में ऐसी क्या आवभगत हुई, जो विदेश में देश की नीति पर सवाल उठा दिए? कभी अमेरिका, तो कभी चीन की पैरवी का क्या मतलब?
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10/05/2010

Friday, May 7, 2010

तो पक्ष-विपक्ष फील गुड में, ठगा सा आम आदमी

अब जाति पूछो साधु की। तो राजनीतिक दबाव में कबीरवाणी पलटेगी। बजट सत्र के आखिरी दिन विपक्षी दबाव असर दिखा गया। जनगणना में जाति शामिल करने की मांग पर पी. चिदंबरम ने टालू रवैया अपनाया। तो हंगामा मच गया। आखिर सोनिया-प्रणव ने लालू-शरद-मुलायम से गुफ्तगू की। फिर पीएम ने भरोसा दे ही दिया। जातीय जनगणना पर केबिनेट में जल्द फैसला करेंगे। पर सुषमा स्वराज का दावा, अब जनगणना में जाति का कॉलम शामिल होगा। सो बजट सत्र का समापन शांतिपूर्ण माहौल में हुआ। पर बजट सत्र ने कई मायनों में इतिहास रचा। राज्यसभा में महिला बिल पास हुआ। तो सात बवाली सांसदों ने मर्यादा ताक पर रख दी। मार्शल का इस्तेमाल भी इसी सत्र की गौरवगाथा में लिखा जाएगा। संसद कैसे चुनावी अखाड़ा बन चुका, इसकी मिसाल तो माननीयों ने कई बार दी। राज्यसभा में अरुण जेतली पर मणिशंकर अय्यर की अभद्र टिप्पणी। लोकसभा में सुदीप बंदोपाध्याय और वासुदेव आचार्य के बीच हुआ संवाद। फिर अनंत कुमार बनाम लालू की भिड़ंत। सबका निचोड़ आखिर में यही निकला। किसी ने माफी मांगी, तो किसी ने खेद जताया। शक्तियों से लैस संसद वैसे ही असहाय दिखी, जैसे गांव में चौक-चौराहे पर बैठा बुजुर्ग। आसंदी ने भी कोई ठोस फैसला नहीं लिया। सो सांसदों ने संसद को बपौती मान लिया। पर शुक्रवार को आखिरी दिन स्पीकर मीरा कुमार की व्यथा जुबां पर आ ही गई। सदन में बेवजह हंगामे में बीते पल-पल का ब्यौरा दिया। लगे हाथ नसीहत, अगर ऐसा ही चलता रहा, तो नहीं बचेगा संसदीय लोकतंत्र। सांसदों को सोचना होगा, कैसे छवि सुधारें, क्योंकि मीडिया और जनमानस में सांसदों की छवि खराब हो रही। अब मीरा की व्यथा जायज। पर क्या ऐसा कहने वाली वह पहली स्पीकर? सोमनाथ चटर्जी हों या मनोहर जोशी या जीएमसी बालयोगी या पीए संगमा। सबने गाहे-ब-गाहे सांसदों के हंगामे पर चिंता जताई। पर सिर्फ चेहरे बदलते रहे, सांसदों का चरित्र नहीं बदला। आखिर कैसे बदलेगा। आप गुरुवार का किस्सा लो। सुषमा स्वराज ने बतौर नेता अनंत कुमार की असंसदी टिप्पणी पर बिना इफ एंड बट के माफी मांगी। पर पता है, बीजेपी के वरिष्ठ महासचिव, नीति नियंता संसदीय बोर्ड के कर्ता-धर्ता माननीय अनंत कुमार ने बाद में क्या कहा। अनंत बोले- सुषमा ने मेरा नाम लेकर माफी नहीं मांगी। सो 543 सांसदों में कोई भी हो सकता है। अब बीजेपी की अनंत कथा को क्या कहेंगे। सुषमा स्वराज का माफीनामा क्या अनंत में सुधार ला पाया? अनंत को तो यह भी पता नहीं चला, जुबां से क्या असंसदीय शब्द निकल गया। पर शुक्रवार को जब सुषमा से पूछा गया, अबके संसद में मर्यादा तोड़ू प्रकरण खूब हुए। तो सुषमा बोलीं- भले कहीं भी पार्टी नेता कुछ बोल जाएं। पर कम से कम संसद में वाणी पर संयम होना चाहिए। पर संसदीय फोरम अब बहस के लिए नहीं रह गया। अलबत्ता राजनीतिक दल सुविधा के मुताबिक नैतिकता का मापदंड तय कर रहे। हूटिंग-शूटिंग, गाली-गलौज मानो सांसदों के स्वभाव में जुड़ गया हो। राजनीतिक दल अब विरोधी नहीं, शत्रु की भांति आपस में लडऩे लगे। राजनीतिक कटुता का एक अद्भुत नमूना पिछली लोकसभा में दिखा था। लालकृष्ण आडवाणी आतंकवादी हमले पर बोल रहे थे। तो उन ने कोयंबटूर विस्फोट का जिक्र करते हुए याद दिलाया कि अगर टीवी इंटरव्यू में लेट न हुए होते, तो शायद वह भी आतंक के शिकार हो गए होते। तभी सत्ताधारी बैंच से बैठे-बैठे एक सांसद ने टिप्पणी कर दी- अच्छा होता, अगर लेट न हुए होते। तबके स्पीकर सोमनाथ चटर्जी ने टिप्पणी सुन ली। सो चुनौती दी- हिम्मत है, तो खड़े होकर बोलो। अब तो आए दिन गुस्से में एक दल के सांसद दूसरे दल के सांसद पर कभी मुक्का तान देते, तो कभी मां-बहन की गाली दे देते। सो कब सुधरेंगे अपने माननीय, यह तो वही जानें। पर बजट सत्र में कौन जीता, कौन हारा और किसकी टांय-टांय फिस्स हुई, यह आप खुद देख लो। बजट सत्र की शुरुआत महंगाई के मुद्दे से हुई। दूसरे चरण में बीजेपी ने लाखों लोगों की रैली की। लेफ्ट की रहनुमाई में तेरह दलों ने भारत बंद किया। पर महंगाई का क्या बिगड़ा। आईपीएल पर संसद कई दिन ठप रहा। पर नतीजा क्या निकला। अब बीजेपी शशि थरूर की बलि को जीत बता रही। पर शरद पवार और प्रफुल्ल पटेल के इस्तीफे पर अब भी खामोश। आईपीएल और टेलीफोन टेपिंग पर जेपीसी की मांग पीएम ने ठुकरा दी। फिर भी बीजेपी यही कह रही- हमने संसद में नियमों की हर विधा का इस्तेमाल कर सरकार को कटघरे में खड़ा किया। पहली बार कटौती प्रस्ताव लेकर आए। आईपीएल पर थरूर का इस्तीफा कराया। जातीय जनगणना पर पीएम से वादा लिया। परमाणुवीय नुकसान के लिए सिविल दायित्व बिल का विरोध किया। अब कोई पूछे, महंगाई हो या आईपीएल या टेपिंग या सिविल दायित्व बिल, आखिर किसकी चली। सरकार ने जो चाहा, कर लिया। अगर विपक्ष रार ठान लेता, महंगाई पर कदम उठाए बिना वित्तीय कामकाज नहीं होने देंगे। तो शायद सरकार हरकत में आती। पर विपक्ष ने हर काम में साथ दिया। शुक्रवार को सिविल दायित्व बिल तभी पेश हो सका, जब बीजेपी-लेफ्ट वाकऑउट कर गए। बीजेपी ने वोटिंग की मांग नहीं की। अब यह विपक्ष और सत्तापक्ष की जुगलबंदी नहीं तो क्या? सत्तापक्ष बजट सत्र को अपनी जीत बता रहा, विपक्ष अपनी। यानी बजट सत्र से फील गुड में पक्ष और विपक्ष। पर ठगा सा रह गया, सिर्फ आम आदमी।
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07/05/2010

Thursday, May 6, 2010

26/11 से 06/05 ... पर मंजिल अभी दूर

पाक रे पाक, तेरा इरादा कितना नापाक। जुर्म करो इंडिया में, सजा मिले पाक में। क्या तभी होगा न्याय? अपनी स्पेशल कोर्ट ने कसाब को फांसी की सजा दी। तो फरीदकोट में रहने वाले कसाब के शुभचिंतकों ने जतला दिया, पाक हुक्मरान का अगला कदम क्या होगा। कसाबवादी पाकिस्तानियों ने भारत की न्याय व्यवस्था पर सवाल उठाए। दलील दी, अगर सबूत था, तो पाक की अदालत में पाक के कानून के तहत सजा मिले। पर सवाल, अब तक कितने आतंकवादियों को पाक की अदालत ने सजा दी? मौलाना अजहर मसूद, जकीउर रहमान लखवी जैसों के खिलाफ भारत ने न जाने कितने सबूत दिए। पर पाक हुक्मरान भारत के दिए हर डोजियर को डाइजेस्ट कर गए और डकार तक नहीं ली। कसाबवादी यह भी भूल गए, कैसे पाक ने कसाब को अपना मानने से इनकार कर दिया था। कसाब के साथ आए बाकी नौ आतंकियों की लाश पाक ने नहीं ली। तो इसी साल जनवरी में दफना दिया गया। पर अब न्यायिक प्रक्रिया के तहत पाक बेनकाब हुआ। तो चेहरा ढांपने को बहाने ढूंढ रहा। पाक प्रवक्ता ने कसाब को फांसी पर चुप्पी साध ली। पर भारतीय नेताओं की टिप्पणी को गैरवाजिब बता दिया। यानी पाक अब भी सबक लेने को तैयार नहीं। खुद के भस्मासुरों से पाक परेशान। दुनिया में कहीं भी आतंकी वारदात हो, उसका लिंक कहीं न कहीं पाक से ही जुड़ जाता। फिर भी पाक है, कि सुधरने का नाम नहीं। अब ताजा मुद्दा न्यूयार्क के टाइम्स स्क्वायर में कार बम का। तो आरोपी पाकिस्तानी निकला। महज 48 घंटे में अमेरिकी पुलिस ने आतंकी फैजल शहजाद को गिरफ्तार कर लिया। फौरन एफबीआई का दस्ता फैजल के पाक स्थित घर पहुंच गया। अब अमेरिका को पाक में खुली छूट। तो पाक आखिर भारत की धौंस में क्यों आएगा। तभी तो 26/11 के बाद भी पाक ने आरोपियों पर ठोस कार्रवाई नहीं की। भारत ने कूटनीतिक दबाव बनाया। पर अमेरिका का दोगलापन बीच में आ गया। अब कसाब को फांसी हुई। तो अमेरिका ने फिर पाक को सख्ती का संदेश दिया। पर मुंबई हमले का मास्टर माइंड डेविड हैडली और राणा तो अमेरिकी गिरफ्त में। हैडली पर भारतीय कानून का जोर नहीं चल सकता। अमेरिका ने उस आतंकवादी से समझौता कर लिया। सो भले निष्पक्ष न्यायिक प्रक्रिया के तहत कसाब को फांसी मिली। पर अपनी नजर में यह अधूरा न्याय। लखवी हो या हैडली-राणा अपनी पहुंच से बाहर। यों विदेश मंत्री एस.एम. कृष्णा ने कसाब की सजा को पाक के लिए सबक बताया। पाक में बैठे कसाब के आकाओं के जुर्म पर मोहर बताई। प्रत्यर्पण की कोशिश का एलान किया। पर क्या पाक से ऐसी उम्मीद है आपको? अब तो पाक ऐसे पैंतरे आजमाएगा, जिनसे भारत की जांच पर सवाल उठें। यों कसाब को सजा तथ्य और पुख्ता सबूतों के आधार पर हुई। पर वाकई अपनी जांच सवालों के घेरे में। हैडली-राणा जैसे मास्टर माइंड की भनक अपनी एजेंसी को तब मिली, जब अमेरिका ने बताया। पर अमेरिका ने अपनी एजेंसी को हैडली से पूछताछ तो दूर, चेहरा तक नहीं देखने दिया। सो पाक की गुर्राहट पर वही कहावत मौजूं- सैंया भए कोतवाल, तो डर काहे का। पर पाक की पैंतरेबाजी आगे दिखेगी। फिलहाल कसाब को फांसी की सजा ने पीडि़तों के जख्म पर थोड़ा मरहम जरूर लगाया। विशेष जज ने भी माना, कसाब के सुधरने की गुंजाइश नहीं। सो चार मामलों में फांसी, छह मामलों में उम्रकैद की सजा दी। सरकारी वकील उज्ज्वल निकम ने तो मंगलवार को ही कह दिया था, कसाब को इनसान नहीं कहा जा सकता। वह एक किलिंग मशीन है, जिसका निर्माण पाक में हुआ। सो गुरुवार को फांसी की सजा का एलान हुआ। तो पीडि़त परिवारों ने फौरन फांसी पर लटकाने की अपील की। तो सजा के अमल पर कुछ सवाल भी उठे। सचमुच जब संसद पर हमले के मास्टर माइंड अफजल गुरु को अब तक फांसी पर नहीं लटकाया गया। तो कसाब को कब लटकाएगी सरकार। जब-जब अफजल का मामला उठा, वोट बैंक की राजनीति हावी हो गई। जम्मू-कश्मीर में गुलाम नबी सीएम थे, तो रमजान महीने के आखिरी जुमे की दलील देकर फांसी की तारीख टलवा दी थी। कई मानवाधिकारवादी झोला उठाए सडक़ों पर आ गए। अफजल राष्ट्रपति को दया याचिका देने के खिलाफ था। पर झोला छाप वालों ने अफजल की पत्नी के जरिए याचिका डलवा दी। तीन-चार साल हो चुके, दया याचिका पर दिल्ली की कांग्रेस सरकार कुंडली मारकर बैठी हुई। कांग्रेसियों से पूछो। तो यही कहेंगे- लिस्ट में अफजल का नंबर आएगा, तो फैसला होगा। अब जरा दया याचिका की मौजूदा लिस्ट देखो, तो कुल 29 का आंकड़ा, जिसमें अफजल का नंबर इक्कीसवां। पिछले साल 18 सितंबर को सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को कड़ी हिदायत दी- दया याचिकाओं का जल्द निपटान करे। यूपीए सरकार की ओर से 24 नवंबर 2009 को लोकसभा में जवाब आया। माफी याचिका को लेकर संविधान के अनुच्छेद 72 में कोई समय सीमा नहीं। अब कहीं दो-तीन साल बाद भी कसाब को किसी अदालत से राहत नहीं मिली। और कसाब से पहले किसी ने राष्ट्रपति को दया याचिका की अर्जी नहीं दी। तो कसाब का नंबर तीसवां होगा। अगर संविधान के अनुच्छेद 72 में कोई समय सीमा नहीं, तो फिर फांसी और उम्रकैद की सजा में फर्क क्या? सो गुरुवार को यही सवाल उठा, क्या कसाब को फांसी होगी? मुंबई में 26/11 को हमला हुआ। अपनी अदालत ने 06/05 को सजा सुनाई। पर .... आखिरी मुकाम कहां?
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06/05/2010

Wednesday, May 5, 2010

अट्ठाईस मिनट ही मर्यादा में रह पाए अपने सांसद

अपनी संसद को सचमुच ग्रहण लग चुका। एक विवाद सुलटता नहीं, दूसरा गले पड़ जाता। दोनों सदनों में बुधवार का दिन माफीनामे का रहा। दिल से कांग्रेसी मणिशंकर अय्यर हाल-फिलहाल राष्ट्रपति कोटे से राज्यसभा में मनोनीत हुए। सोमवार को उन ने विपक्ष के नेता अरुण जेतली को फासिस्ट कह दिया था। मणिशंकर को खुन्नस थी, दंतेवाड़ा कांड पर बहस के दौरान जेतली ने इशारों में ही उन्हें हाफ माओइस्ट कह दिया था। पर मणि ने सीधी टिप्पणी कर दी। सो राज्यसभा में तबसे गतिरोध जारी था। यों सरकार के वित्तीय कामकाज में विपक्ष ने अड़ंगा नहीं लगाया। पर बाकी कामकाज ठप पड़े थे। वैसे भी राज्यसभा में बिन विपक्ष के समर्थन के कांग्रेस का एक कदम भी चलना संभव नहीं। सो सरकार में शामिल कांग्रेसी मणिशंकर से खफा हो गए। माफी मांगने का दबाव बनाया। तो मणि ने प्रणव, बंसल, पृथ्वीराज की एक नहीं सुनी। जनार्दन द्विवेदी का फरमान गया। तो भी मणि नहीं डिगे। आखिर में दस जनपथ का संदेश ही काम आया। सो बुधवार को मणिशंकर को खेद जताना पड़ा। लोकसभा में भी कुछ ऐसा ही गतिरोध था। तृणमूल के सुदीप बंदोपाध्याय ने मंगलवार को सीपीएम के वासुदेव आचार्य के खिलाफ अभद्र टिप्पणी की। पर माफी मांगने को राजी नहीं। सो बुधवार को मीरा कुमार ने आसंदी से टिप्पणी की। सुदीप के कल के आचरण और शब्द को अशोभनीय करार दिया। बोलीं- सदस्य के ऐसे आचरण को मैं खारिज करती हूं और उम्मीद करती हूं कि भविष्य में इस सदन का कोई भी सदस्य आसंदी को ऐसी कठोर टिप्पणी के लिए मजबूर नहीं करेगा। अब आसंदी से ऐसी टिप्पणी हो, फिर भी सुदीप सदन में माफी न मांगें। तो ऐसे जनाब को क्या कहेंगे आप। पर वासुदेव माफी की मांग पर अड़ गए। सो दोपहर तक सदन ठप रहा। तो विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज की ओर से फार्मूला आया। विपक्ष की ओर से तमाम दलों के नेताओं ने वासुदेव से अपील की। सुदीप को माफ कर दो। वासुदेव ने भी बड़े होने के नाते बड़ा दिल दिखाया। बात रफा-दफा हो गई। पर सुदीप का गुरूर नहीं टूटा। बोल पड़े, संसद में कैसे व्यवहार करना, यह मुझे सीपीआई से सीखने की जरूरत नहीं। वाकई ममता बनर्जी के दल को वासुदेव से सीखने की क्या जरूरत। खुद ममता ही सिखाने को काफी। उदाहरण तो कल यहीं पर आपको बता चुके। पर माफीनामा चाहे जितने हो जाएं, मर्यादा तोड़ू रोग का इलाज नहीं हो रहा। आखिर हो भी कैसे, जब कोई पीठासीन अधिकारी सख्ती न दिखाए। सिर्फ माफीनामा और भत्र्सना कर देने से मर्यादा तोडऩे वालों का कुछ नहीं बिगड़ता, ना ही कोई शर्मिंदगी महसूस होती। अलबत्ता संसद की मर्यादा धूमिल जरूर हो जाती। तभी तो दोपहर दो बजे दोनों सदनों में माफीनामा हुआ। पर अट्ठाईस मिनट बाद ही मर्यादा फिर टूट गई। जनगणना में जाति और राष्ट्रीयता को लेकर बहस शुरू हुई। बीजेपी से अनंत कुमार ने मोर्चा संभाला। तो अनंत का फोकस पूरी तरह से बांग्लादेशी घुसपैठ पर रहा। सो लालू विचलित होकर पूछ बैठे, मुद्दे पर क्यों नहीं आ रहे। अपनी पार्टी का एजंडा क्यों चला रहे। इस पर सुषमा ने जवाब दिया, क्या आरजेडी का एजंडा चलाएं। तो लालू ने आरएसएस का एजंडा बता दिया। सो जैसे कांग्रेसी संसद में विरोधियों के मुंह से सोनिया गांधी का नाम सुनकर ही भडक़ जाते। वैसे ही बीजेपी संघ परिवार का नाम सुन। सो अनंत तैश में आ गए। लालू यादव को देशद्रोही और गद्दार कह दिया। बस क्या था, हंगामा शुरू हो गया। सदन स्थगित होकर फिर बैठा। तो अनंत ने सफाई दी- मैंने लालू को गद्दार नहीं कहा। बल्कि यह कहा कि लालू तय करें, वह भारत के साथ हैं या बांग्लादेश के साथ या पाक के साथ। पर लालू गुस्से से लाल हो चुके थे। अनंत गलती मानने को राजी नहीं हुए। तो मुक्का बांध लालू अनंत को मारने दौड़े। पर मुलायम और गुरुदास दासगुप्त ने रोक लिया। सो शाम तक गतिरोध नहीं टूटा। अब सुषमा स्वराज और अनंत कुमार खम ठोककर कह रहे- जब कुछ गलत नहीं कहा, तो शब्द वापस लेना या माफी किस बात की। पर एक कहावत है, कबूतर के आंख मूंद लेने से बिल्ली भाग नहीं जाती। सदन का रिकार्ड चीख-चीखकर कह रहा, अनंत ने लालू को गद्दार कहा। सदन में शरद यादव ने भी कहा- मुझे भी ऐसा लगा, आप प्रोसीडिंग देख लो। रिकार्ड में नहीं है, तो अलग बात, पर बहुत लोगों ने सुना। शरद यादव ने सोलह आने सही कहा। अब जरा रिकार्ड में दर्ज अनंत का बयान आप देख लो- हम बांग्लादेश के साथ नहीं, घुसपैठियों के साथ नहीं, वोट बैंक पॉलिटिक्स के साथ नहीं, हम आप जैसे देश को बेचने के लिए तैयार नहीं हैं, आप देश के साथ .... (गद्दारी) कर रहे हैं। यों गद्दारी शब्द कार्यवाही से हटा दिया गया। आसंदी पर बैठे डिप्टी स्पीकर करिया मुंडा की टिप्पणी भी रिकार्ड में दर्ज। जब कहा- प्लीज डू नॉट यूज दैट वर्ड। फिर भी अनंत सीनाजोरी कर रहे, तो क्या कहेंगे। अब सुषमा-अनंत की दलील, अगर गद्दार शब्द असंसदीय। तो माधुरी गुप्ता के बारे में सदन में किस शब्द का इस्तेमाल किया जाएगा। पर बीजेपी लाख दलील दे, सदन का रिकार्ड यही कह रहा, अनंत झूठ बोल रहे। अब भी अनंत ने माफी नहीं मांगी, तो सदन में बहस संभव नहीं। अगर ऐसा हुआ, तो बीजेपी और सरकार की सांठगांठ उजागर होगी। जाति जनगणना पर सरकार में ही दो-फाड़। बिन बहस सदन अनिश्चितकाल के लिए स्थगित हुआ। तो सरकार को बचने का मौका मिल जाएगा।
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05/05/2010