Monday, May 24, 2010

बोले तो बहुत, पर कहा क्या?

बोले तो बहुत, पर कहा क्या? सातवें साल में पहुंचे पीएम मनमोहन सिंह ने सभी मसलों को छुआ। पर पीएम की बात करें, पहले जरा जिम्मेदार विपक्ष की जिम्मेदारी देखिए। आखिरकार सत्ताईसवें दिन बीजेपी ने शिबू से समर्थन खींच लिया। सो पहली मई को यहीं पर लिखी कहावत याद दिलाते जाएं। लिखा था- भानुमती ने खसम किया, बुरा किया। करके छोड़ा, उससे बुरा किया। छोडक़र फिर पकड़ा, ये तो कमाल ही किया। पर बीजेपी तो उस कहावत को भी पीछे छोड़ गई। अबके फिर साथ छोड़ा, पर गवर्नर ने शिबू को सात दिन का वक्त दिया। सो बीजेपी के चरित्र का अब क्या पता। कहीं कर्नाटक दोहराने की कोशिश न करे। यों अरुण जेतली ने अंग्रेजी में सीधे-सीधे कहा- इनफ इज इनफ। अब जेतली कह रहे- झारखंड का फैसला सामूहिक था। राजनीति में वैसे भी पहले दिन हार नहीं मानते। यानी जेतली की मानें, तो बीजेपी ने सत्ताईसवें दिन हार मानी। पर बीजेपी के इस नए चरित्र का रचयिता कौन? जब आडवाणी, जेतली, सुषमा, जोशी, यशवंत जैसे दिग्गज शिबू संग रास रचाने के खिलाफ थे। तो क्या संघ, राजनाथ और गडकरी ने बेड़ा गर्क कराया? गडकरी तो बीजेपी की राजनीति का सारा फार्मूला छोड़ सात समंदर पार बायोडीजल का फार्मूला समझ रहे। अब कोई पूछे, सत्ताईस दिन तक झारखंड को झूला झुलाने का जिम्मेदार कौन? अब झारखंड के लिए भी बीजेपी कांग्रेस को जिम्मेदार ठहरा रही। तो इसे क्या कहेंगे आप? पर कहते हैं- त्रिया चरित्रम, मनुष्यस्य भाग्यम दैवम न जानम। राजनीति का चरित्र कब, क्या होगा, किसी को नहीं मालूम। तभी तो बीजेपी ने अपना देखा नहीं, सोमवार को जंतर मंतर पर काला दिवस मनाने बैठ गई। मनमोहन यूपीए-टू का एक साल पूरा होने पर देश-विदेश की मीडिया से रू-ब-रू थे। तो बीजेपी मातम मना रही थी। अब यह मातम झारखंड का था, या वाकई विपक्ष की जिम्मेदारी। यह बीजेपी ही जाने, पर मनमोहन भी कम नहीं। भले देश में महंगाई कम होने का नाम न ले। पर मनमोहन राजनीति के माहिर खिलाड़ी हो चुके। सो सोमवार को 75 मिनट तक सवालों की बौछार हुईं। पर किसी समस्या को लेकर स्थिति साफ नहीं। यों पीएम ने महंगाई, विदेश नीति, आतंकवाद, नक्सलवाद, जातीय जनगणना, सरकार के काम को नंबर, मंत्रियों का बड़बोलापन, भ्रष्टाचार, तेलंगाना, केबिनेट में राहुल, रिटायरमेंट, कट मोशन, सीबीआई का दुरुपयोग, माया-मुलायम से डील, अफजल की फांसी, सोनिया से मतभेद, एनएसी का गठन, पानी पर राज्यों की लड़ाई, अमेरिकी एजंडे पर चलना, केंद्रीय योजनाओं में राज्यों की मनमर्जी, निजी क्षेत्र में आरक्षण जैसे दो दर्जन मुद्दे छुए। पर सिवा गांधी परिवार से जुड़े सवालों के, मनमोहन का जवाब देश को दिशा देने वाला नहीं। अब जवाब की बानगी देखिए। महंगाई दिसंबर तक काबू में लाने का एलान। जनता की तकलीफ भी बयां की। पर देश के पीएम ने उम्मीद जताई, दिसंबर तक महंगाई की दर पांच-छह फीसदी तक ले जा पाएंगे। यों अर्थशास्त्र में दर का कम होना और महंगाई का कम होना, दोनों में अंतर। वैसे भी महंगाई को लेकर यह कोई नई टिप्पणी नहीं। पिछले पांच साल में पीएम-मंत्री-योजना आयोग कई बार कह चुके। पर पीएम की चालाकी देखिए। सवाल में यह भी था- आपसे पहले के पीएम के दौर में जब मंत्री बयान देता था, तो अगले दिन महंगाई कम होती थी। पर अब जब-जब मंत्री बयान देते, महंगाई बढ़ जाती, ऐसा क्यों? आखिर वही हुआ, जिसकी उम्मीद थी। पीएम सवाल को ही गोल कर गए। आतंकवाद पर भी वही जवाब, कार्रवाई होनी चाहिए। नक्सलवाद पर केंद्र राज्य मिलकर काम करेंगे। भ्रष्टाचार पर दलील, मंत्री ए. राजा से बात हो चुकी। भ्रष्टाचार की कोई शिकायत मिलेगी, तो कार्रवाई करेंगे। क्या पीएम को भ्रष्टाचार के बारे में मालूम नहीं? सीबीआई के दुरुपयोग का सवाल हुआ। तो जवाब- हम दखल नहीं देते। माया-मुलायम से डील की बात। तो कहा- आप गलतफहमी के शिकार। जातीय जनगणना पर बात। तो जवाब- केबिनेट में अभी चर्चा जारी। विदेश नीति पर पाक के लिए सारे दरवाजे खोल दिए। तेलंगाना पर कमेटी रपट का इंतजार। नदी जल बंटवारा आने वाले समय में गंभीर मसला बनेगा। पर जिन मुद्दों का सीधा जवाब आया, उन्हें भी देखिए। मंत्रियों को नसीहत, केबिनेट मीटिंग में अपनी बात रखें, सार्वजनिक मंच पर नहीं। मंत्रियों की बला भी मनमोहन ने अपने सिर ले ली। कह दिया- दंतेवाड़ा हो या मंगलोर, बतौर पीएम संसद और देश के प्रति मेरी जवाबदेही। यानी अब कोई भी घटना हो, मंत्री को नैतिकता ओढऩे की जरूरत नहीं। फिर सवाल- सोनिया से मतभेद पर। तो पीएम ने कहा- रंच मात्र भी मतभेद नहीं। न ही एनएसी सुपर केबिनेट, अलबत्ता सलाह देने वाली संस्था। राहुल को केबिनेट में लाने की बात, तो पीएम कई बार चर्चा कर चुके। फिर सवाल राहुल के लिए गद्दी छोडऩे का हुआ। तो मनमोहन बेहिचक बोले- कांग्रेस तय करे, तो राहुल क्या, किसी के लिए भी कुर्सी छोड़ दूंगा। पर लगे हाथ रिटायरमेंट से इनकार। कहा- मेरा काम अभी अधूरा। कहीं ऐसा तो नहीं, गांधी परिवार की विरासत को लौटाना ही मनमोहन की बड़ी जिम्मेदारी? पीएम-राहुल भले पार्टी और सरकार में लोकतंत्र की बात करें। पर जैसा विशेषाधिकार राहुल का, क्या किसी और कांग्रेसी को मिल सकता? कांग्रेस में महासचिव तो दस। पर सिर्फ राहुल ही ऐसे, जो जब चाहें, केबिनेट में आ-जा सकते। सो पीएम की नेशनल प्रेस कांफ्रेंस का मकसद साफ।
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24/05/2010

Saturday, May 22, 2010

'हादसे' से हादसे तक का सफर....

 जब 2009 में लोकसभा चुनाव के नतीजे आए, तो खुद कांग्रेस भी भौंचक रह गई थी। भाजपा का भौंचक होना तो लाजिमी ही था, क्योंकि नतीजों से पहले पार्टी ने सपनों का बुर्ज खलीफा तैयार कर लिया था। तब दोनों पक्षों में चुस्की लेने वाले नेताओं ने यह कहते हुए मजाक उड़ाया, हादसा हो गया। सचमुच महंगाई, महामंदी, बेरोजगारी जैसी विकट समस्या के बावजूद मनमोहन सरकार की सत्ता में वापसी हो गई, तो भले हादसा नहीं, पर हैरानी पैदा जरूर कर गई। महंगाई तब ऐसे आगे बढ़ी, जैसे सुनामी की लहर हो। भले सुनामी की लहर बाद में कमजोर पड़ जाती, पर महंगाई कमजोर नहीं, अलबत्ता महंगाई कंट्रोल करने की बात करने वाले पस्त होकर बैठ गए। मंदी से भारत उबरा जरूर, पर आम आदमी का रस निचोड़ गया। बेरोजगारी इस कदर बढऩे लगी थी, लोगों के वेतन में बढ़ोतरी तो दूर, नौकरियां छिनने लगी थीं। तब खुद प्रणव मुखर्जी ने नियोक्ताओं को फार्मूला दिया था, नौकरी मत छीनो, भले वेतन घटा दो। यानी विपक्ष की अंदरूनी लड़ाई से इतर ऐसा कोई भी फैक्टर नहीं, जो तब सरकार के पक्ष में था। फिर भी मनमोहन सत्ता में लौटे, तो कहने वालों ने हादसे की संज्ञा दे दी। लेकिन शनिवार को मनमोहन सरकार की दूसरी पारी का पहला साल पूरा हुआ, जश्न की तैयारी थी, तभी विमान हादसे ने रंग फीका कर दिया। हादसे से सरकार का पहला साल पूरा हुआ, हादसे की छाया में ही दूसरे साल की शुरुआत। लेकिन क्या आज के हादसे के बाद भी सरकार की तंद्रा टूटेगी? नागरिक उड्डयन मंत्री प्रफुल्ल पटेल ने 15 मई को जब मंगलोर हवाई अड्डे के इस रन-वे का उद्घाटन किया था, तो खुद से आगे बढक़र माना था, अभी रन-वे की लंबाई अंतर्राष्ट्रीय मानकों के मुताबिक नहीं, सो अंतर्राष्ट्रीय विमानों के उड़ान भरने और उतरने के हिसाब से तैयार करने के लिए एक हजार फीट लंबाई बढ़ानी होगी, जिसके लिए वह सौ करोड़ की योजना मंजूर कर रहे हैं। अब हफ्ते भर बाद ही हादसा हो गया, तो सवाल, क्या रन-वे में सुधार के लिए इस हादसे का इंतजार था? दुर्घटना में किसकी गलती, यह तो जांच की बात, लेकिन क्या आज का हादसा हम, आप और हमारी सरकार को कल भी याद रहेगा? या फिर राजनीति का एडहॉकपन ही चलता रहेगा। अपनी व्यवस्था ने हमेशा पानी सिर से निकलने के बाद ही तो कदम उठाया है। महंगाई बढ़ी, तो फिक्र की, रोजगार न मिलने से युवा राह भटक गए, तो अब उन्हें वापस लाने के लिए जड़ों तक जाने की फिक्र। चुनाव हो, तो कर्ज माफी की फिक्र, वरना किसान आत्महत्या करता रहे, आम आदमी पिसता रहे, कोई फिक्र नहीं करता। अब मंगलोर विमान हादसे की जांच को कोई दिशा भी नहीं मिली कि मानवीय भूल की बात तेजी पकडऩे लगी। यानी पायलट पर दोष मढऩे की तैयारी, जो अपनी सफाई देने के लिए जिंदा होकर नहीं लौट सकता। लेकिन सवाल, जब हफ्ते भर पहले मंत्री ने रन-वे को अंतर्राष्ट्रीय मानक के मुताबिक नहीं माना, तो मंत्री-सीएम और समूचा अमला फीता काटने क्यों पहुंच गया? लेकिन हादसे पर सियासत भले आज नहीं, कल शुरू जरूर होगी। नागरिक उड्डयन मंत्री प्रफुल्ल पटेल नपे-तुले अंदाज में नैतिक जिम्मेदारी ओढ़ेंगे, इस्तीफे की वही परंपरा निभाएंगे, जो चिदंबरम-जयराम रमेश ने निभाई। लेकिन आखिर में वही होगा, जो अपनी व्यवस्था की लकीर। आज और कल हादसे की बात होगी, फिर जांच के बहाने फाइल बंद और अगले हादसे का इंतजार। यानी महंगाई से त्रस्त जनता के लिए मौजूदा सरकार की वापसी शायद किसी हादसे से कम नहीं। सो हादसे से शुरू, हादसे से पहले साल का अंत, अब अगले हादसे का इंतजार।
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22/05/2010

Friday, May 21, 2010

तो मजबूत होकर और भी मजबूर हुए मनमोहन

शनिवार को यूपीए की दूसरी पारी की पहली सालगिरह। सो सरकारी खेमा सजधज कर तैयार हो गया। पीएम के घर भोज की तैयारी। फिर सोमवार को उपलब्धियों के पिटारे के साथ मनमोहन मीडिया से रू-ब-रू होंगे। यानी पहले पेट, फिर जनता से भेंट। पर समूची कांग्रेस हफ्ते भर से फील गुड कर रही। उपलब्धियां ऐसे गिना रही, जैसे दिलीप कुमार सूट-बूट पहन कर साला मैं तो साहब बन गया.. .. गीत गुनगुना रहे। अब ऐसा नहीं कि कांग्रेस या सरकार को हकीकत मालूम न हो। जनता महंगाई से कितनी त्रस्त, किसान-गरीब की हालत कैसी, यह जगजाहिर। पर कांग्रेस अपनी नाकामी कैसे स्वीकारे। राजनीति में इतनी ईमानदारी होने लगे, तो राजनीति काजनीति हो जाए। पर यहां तो राजनीति का मतलब जनता के लिए काम से नहीं, जनता पर राज करना हो चुका। अब आप यूपीए का पिछला पांच साल छोड़ दो। सिर्फ दूसरी पारी के पहले साल का ही हिसाब-किताब देखिए। कांग्रेस ने जनता से जुड़े गंभीर से गंभीर मुद्दों पर मैदान छोडऩे की रणनीति अपनाई। विपक्ष जब-जब एकजुट हुआ, कांग्रेस ने एकता को तार-तार करने की शतरंजी चाल चल दी। महंगाई पर संसद से सडक़ तक आवाज बुलंद हुई। तो कांग्रेस ने महिला बिल का लंगड़ा घोड़ा दौड़ा दिया। अब साल पूरा हुआ, देश को हिसाब-किताब देने का वक्त। तो कहीं महंगाई, आंतरिक सुरक्षा जैसे अहम मुद्दे जश्न पर हावी न हो जाएं। सो बहस छेडऩे वाले बुद्धिजीवियों को नक्सलवाद की बहस में उलझा दिया। नक्सली हमले बढ़े, नक्सलवाद पर चिदंबरम के सख्त कदम उठे। तो कांग्रेस ने चिदंबरम की ही टांग खींच दी। नक्सलवाद पर ऐसी बहस छेड़ दी, जिसका ओर न छोर। भले नक्सली अपनी हिंसक वारदात को लगातार अंजाम दे रहे। पर गिनाने के लिए कांग्रेस के पास क्या उपलब्धि, जरा देखिए। यूनिक आई-डी कार्ड बन रहा। नरेगा का बजट बढ़ा दिया। फूड सिक्यूरिटी बिल आ रहा। नेशनल हैल्थ बिल आएगा। शिक्षा के हक को मौलिक अधिकार बनाया। महिला बिल राज्यसभा से पारित कराया। कांग्रेस की नजर में यही जनकल्याण के मुद्दे। पर असलियत तो यही, पहली पारी के मुकाबले मनमोहन की दूसरी पारी कहीं अधिक दुश्वार। महज साल भर में सरकार असहमति के भंवर में घूमती दिखी। शर्म अल शेख में विदेश नीति का चौथा हुआ। तो देश में आकर मंत्रियों-नौकरशाहों ने तेरहवीं कर दी। पहली बार बलूचिस्तान का जिक्र पाक के साथ साझा बयान में आया। मुंबई हमले के बाद अपना स्टैंड साफ था। जब तक पाक दोषियों पर कार्रवाई नहीं करेगा, बात नहीं होगी। पर कूटनीति का चालीसा तो तब हो गया, जब भारत ने खुद आगे बढक़र बातचीत की पहल की। तब पाक ने भारत को खुलेआम घुटना टेकू कहा। अमेरिकी दबाव में भारत ने वार्ता शुरू की। पर अमेरिका ने आतंकवादी डेविड हैडली से भारत को पूछताछ नहीं करने दी। सादगी को लेकर मनमोहन के दोनों विदेश मंत्रियों की संस्कृति तो सबने देखी। दस जनपथ से फटकार लगी, तब फाइव स्टार होटल छोड़ा। शशि थरूर ने तो साल भर में ही इतनी फजीहत कराई, आखिर सालगिरह से पहले ही बलि चढ़ गए। पर कांग्रेस का मतभेद यहीं खत्म नहीं हुआ। इसी साल मनमोहन के सिपहसालार केबिनेट मीटिंग में एक-दूसरे से खूब भिड़े। ममता ने महिला बिल से लेकर कटौती प्रस्ताव तक कांग्रेस को नचाया। अब पहले साल में ही दोनों के बीच दूरियां बढ़ गईं। स्पेक्ट्रम घोटाले में ए. राजा पर उंगली उठी। फिर भी मनमोहन नहीं हटा पाए। इसी साल मनमोहन और सोनिया के बीच भी दूरी दिखी। जब आरटीआई एक्ट में संशोधन को लेकर दोनों के बीच चिट्ठियों से बात हुई। मनमोहन ने खुद को दस जनपथ के साये से अलग दिखाने की कोशिश की। पर पहली पारी में लाभ के पद के विवाद की वजह से खत्म हुई राष्ट्रीय सलाहकार परिषद अबके बहाल हो गई। यों दूसरी पारी में कांग्रेस बेहद मजबूत होकर उभरी। जनता ने पिछली पारी में 145 सीटें दी थीं। तो अबके कांग्रेस के पास 207 सांसद हो गए। पर मजबूती के बाद भी सरकार मजबूर दिखी। कटौती प्रस्ताव ने मनमोहन सरकार की मजबूती की कलई खोल दी। आजाद भारत के संसदीय इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ, जब बजट में पेट्रोल-डीजल के दाम बढ़े। पहली बार विपक्ष गिलोटिन डिमांड पर कटौती प्रस्ताव लेकर आया। पर मजबूत कांग्रेस ने तिकड़म का सहारा लिया। लालू-मुलायम को लॉलीपाप दिया। तो मायावती को सीबीआई का सहारा। पर लालू-मुलायम के गैरहाजिर रहने और माया के 22 सांसदों के वोट के बाद भी मनमोहन को कुल 289 वोट मिले। अगर 22 सांसद निकाल दो, तो बचे 267 सांसद। लोकसभा में बहुमत का आंकड़ा 272 का। सो साल भर का जमा-खर्च यही, मजबूत होकर भी मजबूर सरकार। पर सिर्फ सत्ता पक्ष का ही हिसाब नहीं, विपक्ष का भी जरूरी। कांग्रेस की नीति भविष्य के हिसाब से बदल रही। युवा नेतृत्व तराशे जा रहे। पर बीजेपी का हाल किसी से छुपा नहीं। पुराने सिर-फुटव्वल छोड़ दो। तो झारखंड की कहानी बीजेपी की हालत बयां कर रही। नितिन गडकरी सिर्फ नाम के लिए गढ़ के रक्षक। खुद की जुबां पर नियंत्रण नहीं। किसी को कुत्ता कह रहे। पर जिसके लिए गडकरी ने ऐसी भाषा का इस्तेमाल किया। कुछ हिसाब उनका भी हो जाए। मुलायम-लालू अपने गिरगिटिया अंदाज की वजह से विश्वसनीयता खो रहे। तो लेफ्ट ले-देकर बंगाल का किला बचाने में जुटा।
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21/05/2010

Thursday, May 20, 2010

तो राजनीति के आगे नहीं जोर किसी का

नक्सलवाद हो या बाबरी विध्वंस या झारखंड का झंझट। हर रोज नए पहलू जुड़ते जा रहे। गुरुवार को नक्सलवाद पर शुरुआत नरेंद्र मोदी से हुई। मोदी अलीगढ़ की मंगलायतन यूनिवर्सिटी में थे। छात्रों से सवाल-जवाब हुए। एक सवाल आया- राह से भटके नौजवानों के लिए क्या मैसेज। तो मोदी ने गांधीवादी जवाब दिया। हिंसा से दुनिया में कहीं भी सफलता नहीं मिली। सो हिंसा का मार्ग छोड़ नौजवान भारतीय संविधान के दायरे में बातचीत से समस्या का हल ढूंढें। यानी मोदी ने कहा तो नक्सलियों के लिए। पर अपने विजुअल मीडिया के एक तबके ने बात घुमा दी। मोदी के हवाले से खबर चलने लगी- नक्सलियों से बातचीत कर सरकार समस्या सुलझाए। अब मोदी की जुबान से नक्सलियों के लिए ऐसी नरमी, वह भी बीजेपी के रुख के बिलकुल उलट हो। तो बीजेपी में बावेला मचना ही था। सो बीजेपी के मैनेजरों ने फुर्ती दिखाई। फौरन गुजरात सरकार के प्रवक्ता का बयान जारी हो गया। बीजेपी ने अपने मंच से भी सफाई दी। तो मोदी जिस यूनिवर्सिटी के प्रोग्राम में गए थे, उसने भी विज्ञप्ति जारी कर दी। सो बीजेपी ने मोदी सरकार के बयान से साबित करने की कोशिश की, नक्सलवाद पर कोई मतभेद नहीं। अलबत्ता हिंसा पर उतारू नक्सलियों को मुंहतोड़ जवाब देने की हिमायती। अब यह मान भी लें, मोदी के बयान को मीडिया ने बात का बतंगड़ बना दिया। तो जरा सफाई पर नजरें इनायत करिए। मोदी ने नक्सलियों से हिंसा छोडऩे की अपील तो की। पर दूसरी तरफ कठोर कार्रवाई की पैरवी। क्या ये दोनों काम साथ-साथ चल सकते? क्या ऐसे में बातचीत हो सकती? यों अपने मीडिया के एक तबके ने कुछ शरारत तो की। पर मोदी की बातचीत की पैरवी क्या सिर्फ नक्सलियों पर लागू, सरकार पर नहीं? यों बीजेपी ने अपने मतभेद छुपाने को शब्दों को इधर से उधर कर दिया। जैसे सोमवार के नक्सली हमले के बाद चिदंबरम ने अपनी लाचारी जताई। कांग्रेस ने एतराज जताया, तो चिदंबरम ने भी अपने बयान की व्याख्या बदल दी। चिदंबरम ने पहले कांग्रेस में ही मतभेद का इशारा किया था। पर बाद में राज्यों से जोड़ते हुए कह दिया- राज्य मांग करे, तो ही हवाई सहायता पर विचार। यों पहले चिदंबरम ने कहा था- पांच राज्य हवाई हमले की पैरवी कर रहे। पर सीसीएस में सबकी राय एक नहीं। अब गुरुवार को नई बात सामने आई। बुद्धदेव, नीतिश, शिबू, शिवराज, रमन ने हवाई हमले की मांग से इनकार कर दिया। सो अब सवाल, क्या खुद चिदंबरम हवाई हमले के हिमायती? तीन साल में नक्सलवाद के सफाये का एलान कहीं इसी सोच का हिस्सा तो नहीं था? अब जो भी हो, कांग्रेस ने तो चिदंबरम की नकेल कस दी। सो चिदंबरम नक्सलवाद पर काम के नहीं, नाम के मंत्री। असली नीति तो दस जनपथ से तय हो रही। यों रमन सिंह ने जब नक्सलियों को आतंकवादी बताया। तो सीधा सवाल पूछा था- वायुसेना का इस्तेमाल अब नहीं, तो कब होगा। पर अब रमन का रुख बदला। तो सिर्फ नरेंद्र मोदी की वजह से। मोदी ने बातचीत की पैरवी क्या की, अब रमन सिंह भी कह रहे- बातचीत को हम भी तैयार। पर नक्सली हिंसा तो छोड़ें। अब बातचीत के लिए राष्ट्रीय सहमति जैसी दिख रही, तो स्पष्ट नीति का एलान क्यों नहीं। आखिर नक्सलवाद पर समूची राजनीति हौचपौच क्यों दिख रही? ऐसे में कैसे निपटेंगे नक्सलवाद से। अब तो यही लग रहा, नक्सलवाद पर नेता राजनीति-राजनीति खेलेंगे। अपनी व्यवस्था का यही शगल बन चुका। दंगे का इतिहास देख लो। तो अब तक कितने मामलों में न्याय हुआ। गुरुवार को बाबरी विध्वंस का एक मामला फिर आया। लखनऊ-इलाहाबाद हाईकोर्ट की बैंच ने सीबीआई की रिवीजन पिटीशन खारिज कर दी। बाबरी से जुड़े मामले रायबरेली और लखनऊ में चल रहे। जब यह मामला सीबीआई को गया था। तो 197 और 198 के तहत दो एफआईआर दर्ज हुईं। लखनऊ में स्पेशल कोर्ट बनाया गया। सीबीआई ने दोनों एफआईआर पर एक ही चार्जशीट दाखिल की। चार्जशीट में चूक हुई, 198 का जिक्र छूट गया। तो तब बीजेपी के वकीलों ने 198 के मुकदमे को विशेष कोर्ट के दायरे से बाहर बताया। सो मामला रायबरेली भेजा गया। यानी एक केस लखनऊ में, तो एक केस रायबरेली कोर्ट भेजने का आदेश। पर मुश्किल, एक ही चार्जशीट दो अदालतों में कैसे जाए। सो सीबीआई हाईकोर्ट गई। पर गुरुवार को भी राहत नहीं मिली। अब खुद बीजेपी वाले कह रहे, इस केस का कुछ होना-जाना नहीं। वाकई 17 साल बाद भी कोई ठोस मुकदमा नहीं चल पाया। वैसे भी राजनीति के आगे किसी का जोर नहीं। अब झारखंड की सियासत ही देखिए। शिबू सोरेन फिर पलट गए। कुर्सी छोडऩे से इनकार कर दिया। यों तीस जून के बाद तो गुरुजी को जाना ही होगा। पर बीजेपी को खूब पानी पिला रहे। फिर भी बीजेपी कुर्सी का मोह नहीं छोड़ पा रही। शिबू स्पीकर की कुर्सी अपने कोटे में लेने पर अड़ गए। पर बीजेपी की दलील, पहले से बीजेपी का स्पीकर। सो दूसरा चुनाव कराने के बजाए झामुमो कुछ और मलाईदार विभाग ले ले। अब सत्ता की बंदरबांट में ठप झारखंड का दोषी कौन? सो नक्सलवाद हो या बाबरी विध्वंस या फिर झारखंड। राजनीति और राजनेताओं के आगे किसी का जोर नहीं।
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20/05/2010

Wednesday, May 19, 2010

नक्सल हो या आतंकवाद, राजनीति की बहस अनंता

नक्सलियों का तांडव जारी। पर राजनीति और अपनी व्यवस्था बहस में ही उलझी। बुधवार को छत्तीसगढ़ के सीएम रमन सिंह ने नक्सलियों को आतंकी करार दिया। लश्कर से संबंध की आशंका जताई। वायुसेना के इस्तेमाल पर जोर दिया। तो कांग्रेस ने भी लक्ष्मण रेखा के पार न जाने का खुला एलान कर दिया। नक्सलवाद के खिलाफ जंग में वायुसेना का इस्तेमाल नहीं होगा। अलबत्ता नक्सलवाद को राष्ट्रीय चुनौती मानने वाली कांग्रेस ने रमन सिंह पर ही ठीकरा फोड़ दिया। कांग्रेस ने पूछ ही लिया, जब आंध्र-महाराष्ट्र संतुलित नजरिए से नक्सलवाद को निपटा चुके। तो छत्तीसगढ़ नकारा साबित क्यों हो रहा। क्यों बीजेपी ने कभी रमन सिंह का इस्तीफा नहीं मांगा। केंद्र सिर्फ सुरक्षा बल मुहैया करा सकता, संसाधन दे सकता। पर इस्तेमाल का संवैधानिक हक राज्य का। सो छह अप्रैल को सीआरपीएफ के जवान मारे गए या सोमवार को हुईं 31 मौतें। सबकी जिम्मेदार सिर्फ राज्य सरकार। कांग्रेस की दलील यहीं खत्म नहीं। कांग्रेस का मानना है, संविधान में संघीय व्यवस्था। सो कानून व्यवस्था से निपटना राज्य की ही जिम्मेदारी। यानी कांग्रेस ने पी. चिदंबरम के बयान को नया मोड़ दे दिया। सोमवार को चिदंबरम ने नक्सलवाद के खिलाफ कार्रवाई पर अपने हाथ बंधे होने और सीमित अधिकार की बात कही। तो कांग्रेस में भूचाल आ गया। आखिर वही हुआ, जो सोनिया उवाच के खिलाफ जाने वालों का होता। कांग्रेस में चिदंबरम अलग-थलग पड़ गए। विपक्ष ने सीधे पीएम से जवाब तलब किया। तो कांग्रेस ने चिदंबरम की चाबी घुमा दी। सो चिदंबरम ने पलटी मारी। जिस बयान में सुरक्षा मामलों की केबिनेट कमेटी और अपनों के मतभेद का इशारा किया था। उसका रुख राज्य की ओर मोड़ दिया। चिदंबरम ने बयान की व्याख्या कुछ यूं कर दी, कई राज्य वायुसेना के इस्तेमाल की पैरवी कर रहे। पर यह मामला उनके अधिकार क्षेत्र में नहीं। अब चिदंबरम के बयान से असहज हुई कांग्रेस संभली। तो बुधवार को नक्सलवाद पर स्पष्ट लाइन तय कर दी। ताकि मनमोहन की दूसरी पारी के पहले सालाना जश्न का जायका न बिगड़े। शनिवार को मनमोहन की दूसरी पारी का पहला साल पूरा हो रहा। सो कांग्रेस को जबर्दस्त फील गुड। भले महंगाई ने जनता का रस निचोड़ लिया। पर कांग्रेस उपलब्धियां गिनाते-गिनाते थक गई। पहले साल में यूनिक आई-डी कार्ड, नरेगा को व्यापक बनाने, खाद्य सुरक्षा बिल, राष्ट्रीय स्वास्थ्य बिल, शिक्षा का अधिकार कानून, राज्यसभा से महिला बिल, कृषि कर्ज पर सात फीसदी ब्याज दर, विकलांगता अवसर बिल प्रमुखता से गिनाए। अब सच्चाई भी देखो। जो दाल 32 रुपए थी, सौ रुपए के करीब पहुंची। खाने-पीने की वस्तुओं के दाम इसी अनुपात में बढ़े। विदर्भ में किसानों की आत्महत्या एक साल में 50 से अधिक हुई। फिर भी कोई फील गुड कर रहा, तो अपना क्या। एनडीए ने तो छह साल राज के बाद फील गुड किया था। यहां तो पहले साल में ही इतना फील गुड। यों मनमोहन की दोनों पारी मिलाओ, तो उसका भी यह छठवां साल। सो फील गुड के मामले में दोनों मौसेरे भाई ही हुए। वैसे भी कहावत है, सावन के अंधे को हरा ही हरा नजर आता है। सो नक्सलवाद पर छिड़ी बहस से इतर कांग्रेस को जश्न ही जश्न दिख रहा। अब कांग्रेस ने साफ किया, संविधान के दायरे में रहकर ही नक्सलवाद से निपटेंगे। भारत राज्यों का संघ है, सो राज्य अपनी जिम्मेदारी निभाएं, केंद्र अपनी निभाएगा। कांग्रेस ने एक सवाल भी उठाया, अगर नक्सलवाद की बढ़ती वारदात के बाद केंद्र अनुच्छेद 355 के तहत एडवाइजरी जारी कर दे और कार्रवाई के लिए अपनी ओर से कोई कदम उठाए। तो क्या विपक्ष स्वागत करेगा? तब तो विपक्ष हो या मीडिया, आलोचना पर उतर आएंगे। ऐसे में नक्सलवाद को और शह मिल जाएगी। सो बेहतर यही, संविधान के तहत केंद्र-राज्य अपनी-अपनी जिम्मेदारी निभाएं। अब कांग्रेस की यह दलील, तो क्या चिदंबरम को संविधान की समझ नहीं? चिदंबरम ने ही तो एलान किया था, तीन साल में नक्सलवाद का सफाया कर देंगे। पिछले महीने छह अप्रैल को दंतेवाड़ा में सीआरपीएफ के 76 जवान मारे गए। तो चिदंबरम ने गृहयुद्ध बता मुंहतोड़ जवाब का खम ठोका था। पर जबसे दिग्विजय ने लेख लिखा। सोनिया ने कांग्रेसजन के नाम संदेश दिया। चिदंबरम सचमुच असहाय हो गए। सो चिदंबरम ने साफ कह दिया- सामूहिक बुद्धिमता निजी फैसले से हमेशा बेहतर होती। सचमुच चिदंबरम हवाई हमले की राज्यों की मांग से सहमत। पर अपने ही राजी नहीं। सो अपनी मजबूरी का इजहार किया। तो अलग-थलग पड़ गए। पर सिर्फ नक्सलवाद ही राजनीति का शिकार नहीं। अफजल गुरु की फाइल पर शीला और केंद्र में नूरा-कुश्ती। अब कांग्रेस की दलील, सीधे अफजल को फांसी दी। तो गलत मैसेज जाएगा। सो पहले शुरुआत की दो-चार फाइल निपटाएंगे। फिर माहौल बना अफजल को लटकाएंगे। क्या किसी आतंकवादी, वह भी लोकतंत्र के सबसे बड़े मंदिर संसद पर हमले के मास्टर माइंड को फांसी की सजा देने से कानून व्यवस्था बिगड़ जाएगी? यही दलील देकर तब जम्मू-कश्मीर के सीएम गुलाम नबी आजाद ने अफजल की फांसी रुकवाई थी। अब सीएम उमर अब्दुल्ला दबाव बना रहे। सचमुच यह कैसी व्यवस्था। जहां अफजल को सजा सुनाने में नीचे से ऊपर तक सभी अदालतों को मिलाकर कुल 31 महीने लगे। शीला ने दो लाइन की ओपिनियन देने में 43 महीने लगा दिए। पर अड़चनें अभी खत्म नहीं। सो नक्सलवाद हो या आतंकवाद, राजनीति की बहस अनंता।
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19/05/2010

Tuesday, May 18, 2010

चिदंबरम और गडकरी का गांडीव समर्पण

तो सफेद खून वालों का इलाज कैसे होगा। नक्सलवादी अब आमजन का भी खून बहाने लगे। कभी दंतेवाड़ा, कभी जगदलपुर, कभी लालगढ़ और न जाने करीब 12 राज्यों के 200 जिलों में कब जमीन रक्तरंजित हो जाए, पता नहीं। पर राजनीति से रंजित दिग्विजय सिंह जैसों का हाथ अभी भी नक्सलियों के साथ। वैसे भी जिसके सिर सोनिया का हाथ हो। वह चिदंबरम से क्या, खुदा से भी खौफ न खाए। भले नक्सलवादी सुरक्षा बलों को मारते रहें। आम नागरिक का खून बहाते रहें। देश में ही व्यवस्था के खिलाफ हिंसात्मक जंग जारी रखें। फिर भी दिग्विजय सिंह का खून नहीं खौलेगा। सोमवार को नक्सलियों ने मुसाफिर बस उड़ा दी। बस में सवार 16 एसपीओ और 15 मुसाफिरों की मौत हो गई। पर दिग्विजय का दिल है कि मानता नहीं। अभी भी नक्सलियों पर सख्ती के पक्ष में नहीं। मंगलवार को दो-टूक कहा- अगर सेना का इस्तेमाल हुआ। तो उसका भी वही हश्र होगा, जो पैरा मिलिट्री फोर्स का हुआ। ताजा घटना से कुछ दिन पहले की दिग्विजय की दलील सुनिए। नक्सलियों से पार पाना इतना आसान नहीं। बकौल दिग्विजय, दो हेलीकॉप्टर दुर्घटनाग्रस्त होकर जंगलों में गिरे थे। तो एक 28 दिन बाद मिला, एक महीने भर बाद। दिग्गी राजा का मतलब, पहले विकास हो, फिर कार्रवाई की बात। यानी फिर नक्सलवाद की जड़ तक पहुंचने का राग। पिछले महीने छह अप्रैल को नक्सलियों ने दंतेवाड़ा में 76 जवान मार गिराए। अपने होम मिनिस्टर पी. चिदंबरम ने गृह युद्ध बता मुंहतोड़ जवाब का एलान किया। तो हफ्तेभर बाद दिग्विजय सिंह ने लेख लिख दिया। चिदंबरम की नीति पर सवाल उठाए। पर कांग्रेस ने पल्ला झाड़ा। तो लगा, दिग्विजय अलग-थलग पड़ गए। पर हाथ कंगन को आरसी क्या, पढ़े-लिखे को फारसी क्या। पिछले शुक्रवार कांग्रेस का मुख पत्र जारी हुआ। तो सोनिया गांधी ने कांग्रेसजन के नाम लिखी चिट्ठी में दिग्विजय राग ही उवाचा। सोनिया ने भी नक्सलवाद की जड़ तक पहुंचने को जरूरी बताया। पिछड़े आदिवासी जिलों में विकास के न पहुंचने पर चिंता जताई। पर कोई पूछे, आजादी के 63 साल में भी विकास हर जगह नहीं पहुंचा, तो दोषी कौन? अब यह बहस का अलग मुद्दा। पर नक्सलवाद की जड़ तक कोई कैसे पहुंचे, जब खुद नक्सली अपनी जड़ों में मट्ठा डाल रहे। अब क्या नक्सलियों के डर से आम नागरिक बस में भी सफर करना बंद कर दे। अगर नक्सली भी आम नागरिक को ही निशाना बनाने लगे। तो फिर आतंकवादी और नक्सलियों में क्या फर्क? सुकमा जा रही यात्री बस सुरक्षा ड्यूटी की बस नहीं थी। जिस रास्ते पर विस्फोट किया, वह पक्की सडक़ थी। सो सोमवार को ही चिदंबरम ने गांडीव समर्पण कर दिया। नक्सलवाद के खिलाफ चिदंबरम का रुख बेहद सख्त। पर अपनों के बिछाए लैंड माइन से नहीं जूझ पा रहे चिदंबरम। तभी तो जेएनयू और सीआईआई जाकर चिदंबरम को भी दिग्विजय की लाइन बोलनी पड़ी। अब मंगलवार को चिदंबरम ने बातचीत की पेशकश कर दी। कहा- सिर्फ 72 घंटे नक्सली हिंसा रोक दें। तो सरकार बातचीत को तैयार। पर सिर्फ पेशकश में चिदंबरम की लाचारी नहीं दिख रही। अलबत्ता लाचारी का असली दांव सोमवार को ही खेल गए। कह दिया- नक्सलियों से निपटने के लिए मेरे अधिकार सीमित। मैं सिर्फ उन अधिकारों का इस्तेमाल कर सकता हूं, जो मुझे दिए गए हैं। अब देश का होम मिनिस्टर ऐसी लाचारी भरा बयान दे, तो फिर आम नागरिक की सुरक्षा किसके भरोसे? सो बीजेपी के अरुण जेतली ने अब पीएम से रुख पूछ लिया। जब कांग्रेस में इतना कनफ्यूजन। तो बेहतर होगा, पीएम जवाब दें। जेतली ने साफ कहा- आधे-अधूरे मन से लड़ाई नहीं लड़ी जा सकती। वाकई देश के गृह मंत्रालय की ऐसी दयनीय स्थिति क्यों? क्या नक्सली ऐसे ही खून बहाते रहेंगे और हम जड़ में जाने या विकास का ढोल पीटकर बहस करते रहेंगे? मरने वाले आम नागरिक का खून लाल, तो क्या नक्सलवादियों के हमदर्द का खून सफेद? चिदंबरम ने यह भी सवाल उठाया, अब हमदर्दों को जवाब देना होगा। सचमुच सोनिया हों या मनमोहन, देश की जनता को जवाब चाहिए। देश आरपार की लड़ाई चाह रहा। सो मंगलवार को पीएम ने उच्च स्तरीय मीटिंग ली। तो क्या चिदंबरम को फ्री हैंड मिलेगा? सोनिया के रुख के बाद कम से कम ऐसा तो नहीं लग रहा। चिदंबरम के दृष्टिकोण की कायल बीजेपी भी। पर कांग्रेस में चिदंबरम घायल शहीद की हालत में। तो बीजेपी में भी नितिन गडकरी का वही हाल। जब कुर्सी संभाली, तो जैसा हर संघी बौद्धिक झाड़ता। गडकरी ने भी खूब झाड़ी। पर डी-4 नेताओं के सामने एक न चली। सो छह महीने बीतने को, पर अभी तक सारे अहम फैसले पेंडिंग पड़े। टीम में किसी को अभी तक जिम्मेदारी नहीं मिली। मोर्चे भी अपनी बदहाली पर रो रहे। एकाध फैसला हुआ भी, तो टेस्ट क्रिकेट के अंदाज में। झारखंड में वही हुआ, जो शिबू ने चाहा। घुटना टेककर बीजेपी 28-28 महीने की सरकार बनाने पर राजी हो गई। पद पर किसी नए व्यक्ति के लिए छह महीने हनीमून पीरियड माना जाता। पर गडकरी छह महीने बीतने से पहले ही छुट्टी पर चले गए। विदेश दौरे पर सवाल उठने लगे। तो गडकरी ने बयान जारी कर दिया- स्टडी टूर पर यूरोप जा रहे। याद है ना, गोविंदाचार्य ने भी स्टडी के लिए ही छुट्टी ली थी। सो कुल मिलाकर चिदंबरम और गडकरी की हालत एक जैसी। सोच है, पर अपनों का साथ नहीं। सो दोनों का बयान, गांडीव समर्पण ही समझिए।
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18/05/2010

Monday, May 17, 2010

कुम्हलाने लगा विकल्प, पर दोष जनता के सिर

अब कसाब के बहाने अफजल पर नूराकुश्ती शुरू हो गई। कसाब को सजा से पहले ही होम मिनिस्ट्री ने अफजल की फाइल ढूंढनी शुरू की। तो दिल्ली की शीला सरकार को चिट्ठी गई। पूछा गया, कई बार याद दिलाया जा चुका है। पर सरकार का जवाब नहीं आया। सो सरकार अपनी राय जल्द केंद्र को भेजे। पर जवाब तो तब आएगा, जब शीला को चिट्ठी मिलेगी। शीला दीक्षित ने दो-टूक कह दिया- अफजल पर होम मिनिस्ट्री से न चिट्ठी, न कोई संदेश। वैसे भी अभी चार साल से ही फाइल शीला के पास। वाकई चिट्ठी तो भेजी गई दिल्ली के होम सैक्रेट्री को। सो शीला क्या जानें। वैसे भी शीला को अपने होम सैक्रेट्री पर कितना एतबार, आप देख लो। जेसिका लाल हत्याकांड का दोषी मनु शर्मा हरियाणा के वरिष्ठ कांग्रेसी नेता विनोद शर्मा का बेटा। पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले से पहले मनु ने मां की बीमारी के नाम पर पैरोल मांगी थी। दिल्ली के होम सैक्रेट्री ने पंद्रह दिन की सिफारिश की। पर शीला की मेहरबानी देखिए, पैरोल एक महीने का दे दिया। यानी होम सैक्रेट्री की सिफारिश महज संवैधानिक मजबूरी, फैसला तो शीला ने पहले ही कर लिया था।
पिछले साल अप्रैल में शीला ने लोकसभा चुनाव निपटने के बाद कदम उठाने का भरोसा दिलाया। पर साल बीतने को, कोई फैसला नहीं लिया। वैसे भी शीला को आम आदमी को तड़पाने से फुरसत मिले, तो अफजल की फाइल पर सोचें। तीसरी बार सीएम बनते ही शीला को काम से फुरसत ही नहीं मिल रही। पहले बसों का किराया बढ़ाया। महंगाई आसमान छूने लगी। तो राशन-पानी की दुकान लगाई। रसोई गैस, सीएनजी की दरों में इजाफा किया। पानी का बिल तिगुना कर दिया। प्रणव दा ने आम बजट में पेट्रोल-डीजल की कीमतें बढ़ाईं। तो शीला ने भी काफी मेहनत के बाद दाम बढ़ा दिए। दूध-दही, घी, साग-सब्जी की कीमतें थोड़ी-थोड़ी कर बढ़ाईं। अब सोमवार को प्रॉपर्टी की डॉक्यूमेंटेशन फीस सौ रुपए से बढ़ाकर 20 हजार रुपए कर दी। अब कोई इतनी मेहनत करे, फिर भी नाम न ले, तो शीला के साथ न्याय नहीं। पहले चुनाव में व्यस्त थीं। अब कॉमन वैल्थ गेम्स की तैयारी में। सो अफजल पर आई-गई चिट्ठी कहीं दब गई होगी। तभी तो सोमवार को बीजेपी ने पूछ लिया। कहीं ऐसा तो नहीं शीला दीक्षित अफजल को आतंकी नहीं, पर्यटक मान रही हों? अपने संविधान के तहत यह प्रावधान कि माफी याचिका पर उस सरकार की राय ली जाती, जहां अपराध हुआ हो। अब दिल्ली-मुंबई की जनता की राय लो। तो अफजल-कसाब के बारे में जनता की क्या राय होगी, क्या शीला नहीं जानतीं? पर कोई जनता की सोचे, तब कोई बात हो। यहां तो कॉमन वैल्थ के नाम पर किसके वारे-न्यारे हो रहे, पता नहीं। पर बेचारा आम आदमी लुटता-पिटता जा रहा। तभी तो स्टेशन पर भगदड़ हुई, आम यात्री मारा गया। पर ममता यात्रियों को ही जिम्मेदार ठहरा रहीं। राजनीति की ये दो बड़ी महिलाएं संवैधानिक पद पर आसीन। पर क्या सोच सचमुच आम आदमी के हित में? ममता को रेल मंत्रालय नहीं, रायटर्स बिल्डिंग की आस। सो दिल्ली की बजाए कोलकाता में अधिक समय बितातीं। नई दिल्ली स्टेशन पर भगदड़ मची। पर ममता को बंगाल के स्थानीय चुनाव से फुरसत नहीं। आखिर क्या हो गया है अपने नेताओं को। इन नेताओं के घर राजनीति की किस चक्की का आटा पहुंचता, जो खाते ही नेता बौरा जाते। आप खुद देखिए, महंगाई बढ़ी, तो शीला ने कहा- लोगों की आमदनी भी बढ़ी। ममता अपना महकमा संभाल नहीं पा रहीं। तो आम यात्री को ही जिम्मेदार बता दिया। झारखंड में शिबू सोरेन कुर्सी संभाल नहीं पा रहे। तो जनता को ही जिम्मेदार ठहरा रहे। शरद पवार ने तो महंगाई पर आम आदमी के खाने-पीने की आदत में बदलाव और अधिक खाने की प्रवृत्ति को वजह बता दिया था। अब अगर स्टेशन की भगदड़ की घटना को लें। तो नवंबर 2005 में ऐसी ही भगदड़ मची थी। तब जांच कमेटी ने सिफारिश की थी। प्लेटफार्म से वेंडर कम करो। भीड़ की मॉनीटरिंग कैमरे से हो। आखिरी वक्त में प्लेटफार्म न बदले जाएं। पर इतवार को रेलवे ने आखिरी वक्त में प्लेटफार्म बदला। सो आपाधापी में जो हुआ, सबने देखा। क्या ममता को नहीं मालूम, कैसे स्टेशन पर जनरल डिब्बे की सीटें बिकती हैं? गरीब और इज्जत की बात तो खूब करतीं। पर कभी इस ओर ध्यान क्यों नहीं? क्या ऐसे बनेगा विश्व स्तरीय स्टेशन? दिल्ली मैट्रो की व्यवस्था ही देखिए। रोजाना आठ से दस लाख मुसाफिर सफर करते। पर ऐसी अव्यवस्था क्यों नहीं? सो ममता हों या शीला, गुरुजी हों या पवार, एक खतरनाक प्रवृत्ति दिख रही। विजनरी नेताओं का दौर अब खत्म हो चुका। शेखावत, ज्योति बसु, वाजपेयी, चंद्रशेखर जैसी शख्सियत सक्रिय राजनीति में नहीं। एक वक्त था, शेखावत सती प्रथा के खिलाफ खम ठोककर खड़े हो गए। भले पूरा समाज खिलाफ हो गया। अब अपने भैरोंसिंह शेखावत नहीं रहे। राजनीति ही नहीं, इंसानियत की मिसाल थे शेखावत। पर अब नया विकल्प क्या नवीन जिंदल जैसा। पढक़र आए अमेरिका से और वोट की खातिर खड़े हो गए थाप के साथ? हरियाणा में ही बंसीलाल थे। भले चुनाव हार गए, पर मुफ्त बिजली नहीं दी। मुफ्तखोरी का हश्र देख जनता ने आखिर बंसीलाल पर ही भरोसा जताया। अब जबसे वाजपेयी अस्वस्थ। बीजेपी में कैसी मारकाट मची, सभी जानते। सचमुच बड़े दिल, बड़ी सोच वाले नेता अब राजनीति में नहीं रहे। भारतीय राजनीति में विकल्प अब खिलने से पहले ही कुम्हला रहा। अब नक्सलियों ने बस उड़ा दी। पर सरकार की नीतियां अभी भी ढुलमुल ही।
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17/05/2010