Tuesday, June 22, 2010

बिहार में होय वही, जो नीतिश रचि राखा

तो बिहार में होय वही, जो नीतिश रचि राखा। पर बीजेपी भी अब आत्मसम्मान दिखा रही। आत्मसम्मान भी पटना पहुंचकर जागा। जब नीतिश ने न्योता देकर खाना नहीं खिलाया। वैसे बीजेपी पटना में चुनावी शंखनाद के बजाए कपास ओटकर लाई। अगर पटना में ही कपास ओटने के बजाए सीधे हरि भजन किया होता, तो यह नौबत नहीं आती। आखिर नीतिश ने बीजेपी वर्किंग कमेटी के दिन जो एलान किया था, हफ्ते भर बाद उसे कागजी जामा पहना दिया। अब नया तो कुछ हुआ नहीं। पर बीजेपी को हफ्ते भर बाद समझ आई, आत्मसम्मान को ठेस पहुंचा रहे नीतिश। अब ऐसी शिकायत बिहार बीजेपी के नेता अरसे से कर रहे। एक बारगी तो सुशील कुमार मोदी के खिलाफ बीजेपी में दो-फाड़ हो गया। गुप्त वोटिंग के जरिए विधायकों की रायशुमारी करा आलाकमान ने सुशील मोदी को अभयदान दे दिया। साढ़े चार साल से बिहार बीजेपी नीतिश के आगे नतमस्तक। कभी ऐसी त्यौरियां नहीं चढ़ाईं, जैसी अबके चढ़ा रही। सो बीजेपी-जदयू विवाद में लालू, पासवान, कांग्रेस जैसे मुहाने पर पहुंच चुके दलों की लाटरी खुल गई। मानसून अभी दिल्ली तो नहीं पहुंचा। मौसम विभाग की मानें, तो मानसून बिहार में ही ठहर चुका। सो मानसून में सब नहा रहे। लालू तो दिल से दुआ कर रहे, गठबंधन कल टूटे, सो आज टूट जाए। सो उन ने नीतिश पर बिहार की छवि खराब करने का आरोप लगाया। बोले- नीतिश अल्पसंख्यकों को बेवकूफ बनाने का स्टंट कर रहे। यों बेवकूफ बनाने को ही राजनीति कहते। जिसकी मिसाल लालू ने 15 साल तक बिहार में दी, बाकी पांच साल रेलवे में। कांग्रेस तो यूपी दोहराने के चक्कर में। जैसे यूपी के चतुष्कोणीय मुकाबले में कांग्रेस बाजी मार गई। वैसे ही बिहार में चतुष्कोणीय मुकाबला चाह रही। ताकि खफा सवर्ण और मुस्लिम वोट कांग्रेस की झोली में गिरे। पर फिलहाल गठबंधन टूटने की आस लगाए विरोधियों की मंशा पूरी होती नहीं दिख रही। बीजेपी जबर्दस्त उथल-पुथल के दौर से गुजर रही। नीतिश कुमार ने नरेंद्र मोदी और वरुण गांधी को बिहार चुनाव अभियान से बाहर रखने की शर्त रख दी। सो बीजेपी के लिए अब प्रतिष्ठा का सवाल बन गया। यों बीजेपी अभी भी वही पुराना राग दोहरा रही। चुनाव में कौन नेता प्रचार करेगा और कौन नहीं, यह फैसला चुनाव के वक्त अभियान समिति करती। पर जदयू से मोदी-वरुण का नाम लेकर रखी गई शर्त गले की फांस बन गई। बीजेपी आलाकमान में फिलहाल किसी का ऐसा बूता नहीं, जो मोदी को नाराज कर सके। याद है ना, राम जेठमलानी को बीजेपी के कोटे से टिकट न देने की बात थी। पर मोदी ने चाहा, तो गडकरी ना नहीं कर सके। सो मोदी ने अब नीतिश कुमार से निजी रार ठान ली। मंगलवार को नितिन गडकरी संग नरेंद्र मोदी अपने उदयपुर में थे। तो अपनी आदत से परहेज नहीं किया। कहते हैं ना, हिरण लाख बूढ़ा हो जाए, कुलांचें भरना नहीं भूलता। बीजेपी के किसी और सीएम ने पटना में इश्तिहार देकर शेखी नहीं बघारी होगी। लेकिन मोदी की हृदय सम्राट बनने की ललक खत्म नहीं हो रही। पर वही इश्तिहार गठबंधन के लिए काल बन गया। बिहार को राहत के लिए दिए पैसे का गुणगान किया। तो नीतिश कुमार ने लौटा दिया। अब मंगलवार को उदयपुर में मोदी की वही गर्जना राजस्थान के लिए सुनाई दी। मोदी बोले- विकास की राजनीति हमारा मकसद। बहन वसुंधरा सीएम थीं, नर्मदा का पानी समय से पहले मांगा। तो हमने राजस्थान को पानी दिया। अब मुश्किल में शायद अपने अशोक गहलोत। नीतिश ने तो पांच करोड़ का चैक लौटा दिया। पर नर्मदा का पानी उलटा गुजरात कैसे लौटाएंगे। यों यह तो मजाक की बात। पर गठबंधन के लिए मंगलवार भी ऊहापोह से भरा रहा। सोमवार को सीपी ठाकुर आडवाणी-गडकरी से मिले। तो मंगलवार को सुशील कुमार मोदी और रविशंकर प्रसाद आडवाणी से मिले। बीजेपी कोर ग्रुप की मीटिंग तय हो गई। सो मीटिंग से पहले सुशील मोदी ने शरद यादव से मुलाकात की। फिर कांग्रेसी कल्चर में देर रात गडकरी ने मीटिंग की। तो बिहार बीजेपी के नेताओं ने जमकर भड़ास निकाली। पर हाईकमान गठबंधन न तोडऩे का फैसला कर चुका। सो सुबह चढ़ा पारा शाम को गिर गया। नीतिश केबिनेट की मीटिंग से बीजेपी के मंत्री गैरहाजिर होने वाले थे। पर शाम तक बात बन गई, सो पटना में मौजूद मंत्री केबिनेट में गए। अब गठबंधन भले बरकरार रहे, पर नीतिश विरोधी बीजेपी नेता अड़ गए। विवाद नीतिश ने शुरू किया, सो नीतिश ही खत्म करें। यों सचमुच राई का पहाड़ बन गया। अब दोनों को अहसास, बात कुछ अधिक दूर चली गई। पर नरेंद्र मोदी ने विवाद में सीधा हाथ डाल दिया। सो चुनाव प्रचार के मुद्दे पर बीजेपी ने कड़ी प्रतिक्रिया जाहिर की। बीजेपी के गिरिराज सिंह ने तो कह दिया- मोदी जरूर आएंगे। पर शाहनवाज और सीपी ठाकुर ने वक्त आने पर चुनाव समिति के हवाले छोड़ दिया। यों गठबंधन बचाने के लिए बीजेपी को फार्मूला मानना ही पड़ेगा। भले बीजेपी कुर्ता फाड़ क्यों न चिल्लाएं- मोदी-वरुण आएंगे, हमारे मोदी-वरुण आएंगे। पर बिहार में बीजेपी-जदयू गठबंधन रहेगा, तो आप लिख लो, होय वही, जो नीतिश रचि राखा।
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22/06/2010

Monday, June 21, 2010

एंडरसन सिर्फ गुनहगार, अपनी व्यवस्था तो पापी

भोपाल त्रासदी पर जीओएम ने पीएम को रपट सौंप दी। अब शुक्रवार को केबिनेट राहत का पिटारा खोलेगी। पर राहत से पहले बात बीजेपी पर आई आफत की। शनि अमावस के दिन 12 जून को पटना में बीजेपी-जेडीयू गठबंधन पर ऐसी साढ़े साती पड़ी। दोनों का हाल मियां-बीवी के झगड़े जैसा हो गया। जहां तुम बिन रहा भी न जाए, तुम संग सहा भी न जाए वाली स्थिति। सो गठबंधन का संकट दूर होने का नाम नहीं ले रहा। अब तो संकट दूर वही कर सकते, जिन ने संकट पैदा किया। अगर बीजेपी ने नीतिश कुमार की शर्त मान ली। पहले की तरह नरेंद्र मोदी को बिहार से दूर रखने का वादा किया। तो गठबंधन शायद बचा रहे। नीतिश कोसी बाढ़ राहत का पांच करोड़ गुजरात को लौटा बहुत आगे निकल चुके। सो मोदी से ठनी रार पर नीतिश ने समझौता कर लिया। तो बिहार में नीतिश की हालत वही होगी, जो यूपी में कल्याण सिंह को लाने से मुलायम की हुई। सो दोनों की रणनीति सिर्फ अपना-अपना वोट बैंक साधने की। फिलहाल सवर्ण वोट नीतिश सरकार से नाराज। पर गठबंधन टूटा, तो सवर्ण वोट सीधे कांग्रेस की झोली में जाएगा। बरकरार रहा, तो सवर्णों के लिए बीजेपी-जदयू के सिवा कोई विकल्प नहीं। नीतिश की भी मजबूरी, गठबंधन तोड़ कांग्रेस से हाथ नहीं मिला सकते। वैसे भी कांग्रेस का इतिहास रहा, उसने जिससे गठजोड़ किया, उसके लिए भस्मासुर साबित हुई। लालू, पासवान, मुलायम के उदाहरण पुराने नहीं। पर बीजेपी की बात दूसरी। उसने जिससे गठजोड़ किया, वह कंध पर ही बैठ गया। झारखंड हो या मायावती, देवगौड़ा हो या चौटाला-बंसीलाल। कभी बीजेपी ने अपनी ओर से गठबंधन नहीं तोड़ा। सो जैसी नीतिश की मजबूरी, वैसी ही बीजेपी की भी। अगर जदयू साथ छोड़ कांग्रेस से मिल गया। तो बीजेपी फिर राजनीतिक अछूत हो जाएगी। अभी जेडीयू जैसे दल की वजह से सांप्रदायिकता की चादर मटमैली हो चुकी। सो नीतिश को अहंकारी, अहसानफरामोश कहने के बाद भी बीजेपी गठबंधन तोडऩे का साहस नहीं जुटा पा रही। बिहार बीजेपी के अध्यक्ष सीपी ठाकुर आडवाणी से मिले। तो आडवाणी ने गडकरी से मिलने को कह दिया। सो आलाकमान की नब्ज भांप ठाकुर ने भी कह दिया, पखवाड़ा बीतने तक फैसला हो जाएगा। उधर शरद यादव भी गठबंधन न टूटने की दलील दे रहे। तो नीतिश कुमार ने कह दिया- 'टेंशन की बात नहीं, आप लोग रिलेक्स रहिए।' यानी नीतिश ने अपनी तैयारी पूरी कर ली। अब फैसला बीजेपी को करना। सो बीजेपी की स्थिति सांप-छछूंदर वाली हो गई। बीजेपी का स्थानीय नेतृत्व गठबंधन तोडऩे पर जोर दे रहा। तो केंद्रीय नेतृत्व जमीनी हकीकत से वाकिफ। सचमुच गठबंधन टूटा, तो विकास की ओर बढ़ा बिहार फिर ठहर जाएगा। सो बीजेपी के केंद्रीय नेता आज-कल यही गुनगुना रहे- 'तेरे बिन मैं कुछ भी नहीं, मेरे बिन तू कुछ भी नहीं। तेरे सारे आंसू मेरे, मेरी सारी खुशियां तेरी..। यानी गठबंधन नहीं टूटेगा, नूरी-कुश्ती चलती रहेगी। पर बेगानी शादी में अब्दुल्ला दीवाना बन कांग्रेस नाचने लगी। चैक लौटाने को नीतिश का गलत कदम बताया। पर आलोचना बीजेपी की कर रही। कांग्रेस प्रवक्ता मनीष तिवारी ने उत्साह में यहां तक कह दिया- 'अब देश में द्विध्रुवीय राजनीति की धारणा नेस्तनाबूद हो गई। सिर्फ कांग्रेस ही राष्ट्रीय दल, बाकी सिर्फ प्रासंगिक।'  यों दिल बहलाने को कांग्रेस-ए-खयाल अच्छा है। पर उन ने कट मोशन हो या भोपाल त्रासदी, बीजेपी के विरोध को बौखलाहट करार दिया। यों बौखलाहट में कौन, कांग्रेस बखूबी जानती। आखिर 26 साल पुराना पाप का घड़ा फूटा, तो कांग्रेस को गैस त्रासदी के शिकार लोग भी याद आ गए। अभी तक वहां पड़ा रासायनिक कचरा भी दिखने लगा। भोपाल त्रासदी के बाद कांग्रेस ने पीडि़तों के साथ कैसी त्रासदी की, सबका पर्दाफाश हो चुका। अब चेहरा बचाने को जीओएम बनाया। सोमवार को जीओएम की सिफारिश भी हो गई। तो 26 साल बाद पीडि़त परिवारों को दस लाख देना तय हुआ। अपंगों को पांच लाख मिलेंगे, घायलों को तीन लाख। पर जरा सोचिए, 26 साल में कितने खर्च कर चुके होंगे पीडि़त। मनीष तिवारी को गर्व, कांग्रेस ही एकमात्र राष्ट्रीय पार्टी। पर क्या ऐसी भूमिका होती है राष्ट्रीय पार्टी की? भोपाल के पीडि़त 26 साल से लगातार इसी मांग के साथ प्रदर्शन कर रहे थे कि मुआवजा मिले, पीडि़तों का इलाज हो और रासायनिक कचरा हटाया जाए। पर दंभ भरने वाली राष्ट्रीय पार्टी ने क्या किया? जब यह हादसा हुआ था, तब कांग्रेस साढ़े चार सौ सीटों के साथ केंद्र की सत्ता में थी। राज्य में भी कांग्रेस का एकछत्र राज था। पर तब तो कांग्रेस ने कुछ नहीं किया। अब 26 साल बाद कोर्ट ने लचर कानूनी दायरे में सजा दी। तो लगा, जैसा सिर्फ कांग्रेस ही नहीं, अपनी समूची व्यवस्था का जमीर जाग उठा। पर जीओएम अभी भी एंडरसन को लेकर खामोश। एंडरसन पर फिर वही पुराना राग, प्रत्यर्पण की कोशिश होगी। सुप्रीम कोर्ट में क्यूरेटिव पिटीशन डालेंगे। पर एंडरसन का क्या होगा, यह कांग्रेस भी जानती और आपको भी यहीं पर बता चुके। सो कांग्रेस हो या अपनी व्यवस्था के बाकी पहरुए, अब सिर्फ लफ्फाजी हो रही। राहत पैकेज के नाम पर एक बार फिर लूट मचेगी। सो भोपाल त्रासदी का दोषी अगर वारेन एंडरसन, तो त्रासदी के बाद के 26 साल की बदहाली के गुनहगार हम और आप। मीडिया समेत लोकतंत्र के सभी स्तंभ, जो गाहे-ब-गाहे चीख-चीख कर खुद की ईमानदारी का ढोल पीटते। असल में सबने मानवता के साथ पाप किया। लोक-लिहाज इन सभी स्तंभों के लिए तो सिर्फ कहने की बात। बाकी भोपाल अपनी व्यथा खुद कह रहा।
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21/06/2010

Saturday, June 19, 2010

तो राव पर ठीकरा कांग्रेसी मैनेजमेंट!

तो राम जेठमलानी पर बीजेपी की जिद पूरी हुई। कांग्रेस गच्चा खा गई। या यों कहें, अबके राजस्थान में जादूगर का जादू नहीं चला। सो राजस्थान में ही नहीं, कर्नाटक में भी कांग्रेस का धन-पशु वाला तुरुप नहीं चला। राजस्थान में संतोष बागड़ोदिया को निर्दलीय तो उतारा, पर फजीहत करा दी। चार निर्दलियों के जुगाड़ से अपने राम का बेड़ा पार करा लिया। अब राज्यसभा चुनाव का झंझट निपटा, तो शुक्रवार को सरकार ने भोपाल गैस पीडि़तों की सोची। पी. चिदंबरम की रहनुमाई वाली जीओएम की मीटिंग दो दिन और होगी। फिर सोमवार को पीएम को शुरुआती रिपोर्ट सौंपे जाने की संभावना। पर जरा सुध लेने की रफ्तार देखिए। जीओएम का गठन हुआ नौ जून को। पर पहली मीटिंग नौ दिन बाद हुई। वह भी तब, जब अपने मनमोहन ने दस दिन में रपट मांगी। पर बात पहली मीटिंग की। सो जीओएम ने अपनी लक्ष्मण रेखा तय कर ली। राहत, पुनर्वास और मुआवजे पर फोकस होगा। पर वारेन एंडरसन को लेकर अभी मुट्ठी बंद कर ली। चिदंबरम ने मीटिंग के बाद सभी पहलुओं पर गौर करने का भरोसा दिया। पर लगे हाथ जीओएम की लक्ष्मण रेखा भी बता दी। जैसे नक्सलवाद पर चिदंबरम ने खुद के सीमित अधिकार की दुहाई देकर हाथ खड़े किए थे। अब एंडरसन पर भी अधिकारों की दलील। जीओएम को महज राहत, पुनर्वास पर फौकस बता रहे। यानी 26 साल बाद अपने लोगों की सुध ले रही सरकार। यों 26 साल पहले जब 15-20 हजार लोग त्रासदी के शिकार हुए। तो कांग्रेस ने सिर्फ और सिर्फ वारेन एंडरसन की फिक्र की। एंडरसन पर मेहरबानी दिखाते हुए स्वदेश वापसी का पुख्ता बंदोबस्त किया। भले भोपाल की जनता त्रासदी की आग में जल रही। यों त्रासदी की आग अभी भी नहीं बुझी। सो लपटें सीधे दस जनपथ को झुलसाने लगीं। तो कांग्रेस 26 साल बाद देश के पीडि़त लोगों पर भी मेहरबान हो गई। पर एंडरसन को भगाने के आरोप से घिरी कांग्रेस की दलील सचमुच चौंकाने वाली। पंद्रह-बीस हजार भारतीयों की मौत पर एक विदेशी एंडरसन भारी पड़ा। कांग्रेस यही तो दलील दे रही। अगर तब एंडरसन को सेफ पैसेज नहीं दिया होता। तो उसका खून हो जाता। तो क्या सिर्फ अमेरिकियों का खून असली और भारतीयों का नकली? अपने मनमोहन अमेरिका और ओबामा के काफी मुरीद। पर नुकसान का मुआवजा कैसे हासिल किया जाता, यह सचमुच अमेरिका से सीखना चाहिए। मैक्सिको की खाड़ी में तेल फैलाने वाली ब्रिटिश कंपनी बीपी को आखिर 20 अरब डालर का हर्जाना भरने को राजी होना पड़ा। यह मुआवजा अमेरिकी कानून के तहत तय साढ़े सात करोड़ डालर से इतर है। हर्जाना वसूलने के लिए ओबामा ने सबसे पहले बीपी के अध्यक्ष टोनी हेवर्ड को लंदन से वाशिंगटन बुलवाया। फिर संसदीय कमेटी के सामने पेश किया। और आखिर में ब्रिटिश कंपनी को झुकना पड़ा। क्या कांग्रेस की पूर्व या मौजूदा सरकार में बराक ओबामा जैसा माद्दा है? क्या मनमोहन एंडरसन को वापस लाने की सोच भी सकते? सोचना तो दूर, अजीब-ओ-गरीब दलीलें दी जा रहीं। अब पीडि़तों के जख्म निचली अदालत के फैसले से हरे हो चुके। तो उस जख्म पर मुआवजे का मरहम लगाने की तैयारी। क्या 26 साल बाद मुआवजा सही व्यक्ति तक पहुंचेगा? जिस देश में लोग पशुओं का चारा खा जाते, बाढ़ और सूखे के शिकार लोगों का निवाला निगल जाते, जहां मंत्री अपनों को रेवड़ी बांटने में बेखोफ देश को चूना लगा जाते। ऐसे लूट तंत्र वाले देश की व्यवस्था से कैसी उम्मीद? जब 26 साल में भोपाल गैस पीडि़तों तक इंसाफ नहीं पहुंचा। तो अपनी लूटखसोट वाली व्यवस्था में मुआवजा कहां तक पहुंचेगा। कांग्रेस की हमेशा यही रणनीति। जब नानावती रिपोर्ट के बाद सिख विरोधी दंगे के शिकार परिवारों के जख्म हरे हुए, तो मनमोहन ने संसद में माफी मांगी। फिर जीओएम ने मुआवजे से मुंह बंद करने की कोशिश की। सीबीआई से जगदीश टाइटलर को बरी करवा कर ही दम लिया। अब भोपाल गैस त्रासदी में भी यही होगा। कांग्रेस कभी भी गांधी-नेहरू खानदान पर उंगली उठती नहीं देख सकती। कांग्रेस की हमेशा यही रणनीति, मीठा-मीठा दस जनपथ का, बाकी कड़वा-कड़वा कांग्रेजन का। सो भोपाल कांड में कई पूर्व अधिकारियों ने राजीव सरकार को कटघरे में खड़ा कर दिया। तो अब नया खुलासा कांग्रेस की रणनीति के मुताबिक। पूर्व विदेश सचिव एमके रसगोत्रा ने एंडरसन को सेफ पैसेज देने के मामले में नरसिंह राव को जिम्मेदार ठहरा दिया। राव को एंडरसन पर मेहरबान बताया। राजीव गांधी को पूरे मामले में पाक-साफ बताने की कोशिश की। पर राव के बेटे रंगाराव ने पिता का नाम घसीटने पर एतराज जताया। पर नेहरू-गांधी खानदान से इतर पीएम बनने वाले कांग्रेसी नेताओं को कांग्रेस कभी अपना नहीं मानती। तभी तो पिछले यूपी विधानसभा चुनाव के वक्त राहुल गांधी ने 1992 के बाबरी मस्जिद कांड के लिए राव को दोषी ठहरा दिया। तब कहा था- अगर उस वक्त नेहरू-गांधी खानदान का पीएम होता, तो बाबरी विध्वंस न होता। अब भोपाल का ठीकरा भी राव के सिर। सो अब भोपाल त्रासदी पर राजनीतिक मैनेजमेंट की तैयारी।
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Thursday, June 10, 2010

अब तो साफ हो, कौन थे अर्जुन के 'कृष्ण' ?

अब कांग्रेस डैमेज कंट्रोल में जुट गई। अभी तो जितने नेता, उतनी बातें। पर दस जनपथ से एक मास्टर स्ट्रोक आएगा। फिर भोपाल गैस त्रासदी पर भी कांग्रेस गंगा नहा लेगी। कांग्रेस में हमेशा यही होता। आप इतिहास उठाकर देख लो। पीएम की कुर्सी का त्याग हो या लाभ के पद के विवाद में सांसदी से इस्तीफा। राष्ट्रपति चुनाव हो या लोकसभा स्पीकर का। सबसे अहम, तेल की दलाली में वोल्कर रपट के बाद अपने नटवर सिंह की विदाई। नटवर जिनके खून में कांग्रेस रचा-बसा। पर कांग्रेस ने उस खून को कैसे खुद से अलग किया, सबको मालूम। यों कांग्रेस झूठ को भी सच बनाकर परोसने की कला में माहिर। जब वोल्कर रपट में तेल की दलाली की आंच कांग्रेस नेतृत्व तक पहुंचने लगी। तो बड़ी चालाकी से नटवर को हटाया गया। अगर सचमुच नटवर तेल के खेल में गुनहगार थे। तो सीधे कांग्रेस से बाहर क्यों नहीं निकाला। पर आप खुद देखो। नटवर का नाम जब वोल्कर रपट में आया, विपक्ष ने घोड़ा खोल दिया। तो मनमोहन ने पहले विदेश मंत्रालय छीना, पर केबिनेट मंत्री बने रहे। फिर कांग्रेस ने अपने मुखपत्र के संपादकीय मंडल से हटाया। पर वर्किंग कमेटी से बाहर करने से पहले जूनियर नेता कपिल सिब्बल से बयान दिलवा दिया। ताकि नटवर खुद इस्तीफा देकर कांग्रेस छोड़ जाएं। फिर जब एटमी डील पर नटवर ने मनमोहन को घेरने की कोशिश की। बीजेपी के यशवंत, सपा के अमर, लेफ्ट के सीताराम के साथ मिलकर डी-4 बनाया। तो आधी रात को कांग्रेस ने निलंबन का फैसला लिया। फिर नटवर ने पीएम मनमोहन से लेकर प्रणव मुखर्जी तक को वफादारी याद दिलाई। सो आखिर वही हुआ, नटवर को कांग्रेस से विदा होना पड़ा। यानी कांग्रेस ने वोल्कर रपट में नटवर को इस तरह उलझाए रखा कि विपक्ष आगे तक सवाल ही नहीं उठा पाया। सो कांग्रेस ने नटवर प्रकरण को लंबा खींच दस जनपथ पर उठ रही उंगली की दिशा ही मोड़ दी। यानी नटवर प्रकरण सिर्फ एक उदाहरण, ताकि भोपाल त्रासदी पर कांग्रेस की रणनीति साफ हो। अब कांग्रेस ने सियासत की बिसात बिछा दी। कांग्रेस के ही नेता एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप शुरु कर चुके। ताकि विपक्ष के सवाल की धार भोंथरी हो सके। अब गैस कांड के मुख्य अभियुक्त वारेन एंडरसन की भगाने में तत्कालीन मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह की भूमिका पर सवाल उठा। खुद तात्कालीन डीएम ने खुलासा किया। तो मध्य प्रदेश में अर्जुन के साथ मंत्री और बाद में उत्तराधिकारी बने दिग्विजय सिंह बचाव में उतर आए। भले राजनीतिक स्तर पर दोनों नेताओं के बीच छत्तीस का आंकड़ा रहा। यानी मौसेरे भाई वाली कहावत चरितार्थ हो रही। दिग्विजय की दलील देखिए, एंडरसन को भगाने में राज्य सरकार की नहीं, अलबत्ता केंद्र की भूमिका संभव। उन ने साफ तौर से माना, एंडरसन को रिहा कर अमेरिका भगाने के पीछे अमेरिकी दबाव से इनकार नहीं किया जा सकता। पर दिग्विजय के बयान के फौरन बाद कांग्रेस के सत्यव्रत चतुर्वेदी ने असहमति जता दी। सारा ठीकरा राज्य के सिर फोड़ दिया। अब आप बयानों के विरोधाभास को खुद देख लो। जब कोई सीएम बिना पीएमओ की मंजूरी के खुद विदेश नहीं जा सकता। तो वह किसी और को कैसे भगा सकता है? वह भी राज्य सरकार के विमान में। एंडरसन को रिहा करने का आदेश अब स्वर्ग सिधार चुके तबके चीफ सेक्रेट्री ब्र्हम स्वरुप ने दिया था। डीएम-एसपी ने बिना सवाल उठाए आका के हुक्म की तामील की। डीएम की कार से एंडरसन सरकारी दामाद की तरह विमान में सवार होकर दिल्ली पहुंचा था। अब सवाल, तबके सीएम अर्जुन सिंह ने चीफ सेक्रेट्री को रिहाई का आदेश किसके कहने पर दिया? यों जनता पार्टी के सर्वेसर्वा सुब्रहमण्यम स्वामी ने ट्विटर पर खुलासा किया, एंडरसन ने अर्जुन सिंह के ट्रस्ट को तीन करोड़ चंदा दिया था। पर चंदा लेकर कोई सीएम इतना बड़ा जोखिम नहीं उठा सकता। वैसे भी विदेश मामले पर राज्य नहीं, अलबत्ता केंद्र का अधिकार। सो एंडरसन को भगाने के लिए मची अफरा-तफरी बिना दिल्ली में बैठे आका के संभव नहीं। चीफ सेक्रेट्री ने तो तत्कालीन गृह सचिव के.एस. शर्मा को भरोसे में भी नहीं लिया। यानी भोपाल त्रासदी की सबसे बड़ी गुनहगार तो कांग्रेस हो गई। खुद तबके सूचना व प्रसारण मंत्री वसंत साठे ने खुलासा किया। एंडरसन को भगाए जाने की जानकारी केंद्र-राज्य दोनों को थी। सो बीजेपी ने कांग्रेस से मांग कर दी, देश से माफी मांगो। पर अब कांग्रेस अपना खेल करेगी। अर्जुन अगर कुछ बोलेंगे, तो हश्र नटवर जैसा ही होगा। अगर नहीं बोले, तो भी कांग्रेस अर्जुन को ही बलि का बकरा बनाएगी। कांग्रेस नेताओं के परस्पर विरोधी बयानों के बाद आप खुद देखना, कैसे दस जनपथ से फरमान आएगा और तमाम विरोधों की हवा उड़ जाएगी। पर सियासत की पिच पर कांग्रेस-बीजेपी चाहे जो खेल खेले। पर यह तो साफ हो चुका, भोपाल त्रासदी के शिकार लोगों को न्याय दिलाने के लिए कांग्रेस कभी ईमानदार नहीं रही। जैसे सिख विरोधी दंगे के लिए अपने मनमोहन ने बीस साल बाद देश से माफी मांगी, कुछ ऐसा ही मानसून सत्र में भोपाल त्रासदी के लिए हो जाए, तो हैरानी नहीं। पर वसंत साठे के बयान के बाद गुरुवार को मौजूदा सूचना व प्रसारण मंत्री का बयान आया। बोलीं- 'जीओएम सभी तथ्य को सामने लाएगा। देश से कुछ भी नहीं छुपाया जाएगा। सरकार पूरी पारदर्शिता बरतेगी। पीएम मनमोहन के कार्यकाल में कोई चीज छुपाई नहीं जाती।' चलो माना, मनमोहन के कार्यकाल में कुछ नहीं छुपाई जाती। तो क्या यह मान लें, 1984 वाले पीएम के कार्यकाल में बहुत कुछ छुपाया गया? इशारा साफ, एंडरसन को भगाने वाला कौन। अर्जुन सिंह तो जरिया थे,  'कृष्ण' तो दिल्ली में थे।
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10/06/2010

Wednesday, June 9, 2010

तो अपने 'नीरो' भी बसाएंगे भोपाल!

आरोप-प्रत्यारोप की राजनीति में नीरो वाली कहावत आपने कई दफा सुनी होगी। कहते हैं, जब रोम जल रहा था, तब नीरो बंसी बजा रहा था। अब संयोग कहें या कुछ और, आज के दिन ही 68 ईसवी में नीरो ने आत्महत्या की थी। आत्महत्या प्रायश्चित के लिए की या कोई और वजह, इसके लिए इतिहास खंगालना होगा। सो इतिहास की बात फिर कभी, पर अब 26 साल बाद अपनी सरकार भोपाल की त्रासदी का प्रायश्चित करने की सोच रही। यानी 26 साल तक भोपाल के पीडि़त जलते रहे, अपने खैर-ख्वाह नेता बंसी बजाते रहे। किसको मालूम नहीं था, अदालत दो साल से अधिक की सजा नहीं सुना सकती। जब एफआईआर ही कमजोर धारा में दर्ज हो। तो जज का क्या कसूर। अपनी जांच एजेंसी सीबीआई ने क्या किया, किसी से छुपा नहीं। सुप्रीम कोर्ट ने 1996 में जो फैसला दिया, वह भी सबके सामने था। पर 1984 से 1996 तक की कहानी छोड़ दो, तो उसके बाद किस राजनीतिक दल या सरकार ने भोपाल गैस पीडि़तों के लिए कुछ किया। अब अदालत ने महज दो साल की सजा सुनाई। पीडि़तों के जख्म पर फिर चोट हुई। तो अब मध्य प्रदेश की बीजेपी सरकार को भोपाल गैस पीडि़त अपनी जनता दिखने लगे। केंद्र में बैठी मनमोहन सरकार को भी ख्याल आ गया पीडि़तों की राहत और पुनर्वास का। मध्य प्रदेश के सीएम शिवराज सिंह चौहान ने पांच मेंबरी कमेटी गठित कर दी। एलान किया- 'पीडि़त राज्य की जनता। सो राज्य सरकार अब अपनी जनता का केस लड़ेगी। राज्य सरकार ऊपरी अदालत में अपील करेगी। पर पहले पांच मेंबरी कमेटी केस से जुड़े सभी कानूनी पहलुओं का अध्ययन करेगी।' यों शिवराज ने एक पते की बात कही। आईपीसी की धारा 71 के तहत हर मौत के लिए धारा 304-ए का एक अलग अपराध बनता है। सो हर मौत के लिए दो-दो साल की सजा हो, तो दोषियों को लंबी सजा संभव। पर कोई पूछे, यह बुद्धि पहले क्यों नहीं आई? जब पीडि़तों का घाव कैंसर बन गया, तो ही राजनेताओं की इंद्रियां जाग रहीं। सबको मालूम, अब वारेन एंडरसन को लाकर सजा दिलाने की कुव्वत मनमोहन सरकार में नहीं। याद है, तीन मार्च को संसद में राष्ट्रपति के अभिभाषण पर बहस हुई। आडवाणी ने ओबामा के आगे सरकार को सरेंडर बताया। तो पीएम ऐसे भडक़े, जैसे खुद ओबामा हों। उन ने कहा था- 'मैंने कई बार ओबामा से बात की है। पर यूएस की पॉलिसी में कोई बदलाव नहीं आया।' अब आप ही सोचिए, अगर यूएस की पॉलिसी में बदलाव आएगा, तो क्या ओबामा अंदरूनी पॉलिसी मनमोहन को बताएंगे? अब ऐसी पैरोकारी होगी, तो एंडरसन पर कैसी उम्मीद? पर कांग्रेस प्रवक्ता जयंती नटराजन ने मंगलवार को जुबानी रस्म अदायगी निभा ली। बोलीं- 'कांग्रेस इस बात पर दृढ़ है कि प्रत्यर्पण की प्रक्रिया में तेजी लाई जाए और वारेन एंडरसन को भारत लाकर मामले को तार्किक निष्कर्ष तक पहुंचाया जाए।' अब कानूनी अड़चन आपको कल यहीं पर बता चुके। कोई भी देश अपने नागरिक का प्रत्यर्पण नहीं करता। अलबत्ता विदेश में किए गए उसके अपराध पर देश में ही घरेलू कानून के तहत मुकदमा चलता। यानी एंडरसन का न अमेरिका में कुछ बिगड़ा, न भारत में बिगड़ेगा। अलबत्ता बुधवार को जितने खुलासे हुए, शायद नीरो का भी सिर शर्म से झुक जाए। वारेन एंडरसन को भोपाल में गिरफ्तार कर गैस्ट हाउस में रखा गया था। पर तबके चीफ सैक्रेट्री ब्रह्म स्वरूप ने डीएम मोती सिंह और एसपी स्वराज पुरी को बुलाकर एंडरसन को रिहा करने की हिदायत दी। तब कांग्रेस के अर्जुन सिंह सीएम थे। एंडरसन की रिहाई की औपचारिकता पूरी करने के बाद मोती की कार में ही एयरपोर्ट पहुंचाया गया। एयरपोर्ट पर सीएम अर्जुन सिंह का विमान आव-भगत को तैयार था। सो एंडरसन दिल्ली पहुंचे। तबके राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह से मिल अमेरिका लौट गए। अब बीजेपी-कांग्रेस दोनों एंडरसन को भारत लाने की मांग कर रहीं। पर सत्ता में रहते किसने क्या किया? अब परमाणुवीय जनदायित्व बिल संसद में पेश हो चुका। मनमोहन पास कराने को आमादा। पर बिल के प्रावधान देखिए। अगर भोपाल जैसी त्रासदी हुई, तो मरने वालों की संख्या कई गुना अधिक होगी। पर विदेशी ऑपरेटर सिर्फ पांच सौ करोड़ रुपए की भरपाई करेगा। उस पर भारत में कोई मुकदमा नहीं चलेगा। जबकि अमेरिकी कानून के मुताबिक वहां ऐसा हादसा हो, तो ऑपरेटर 12.5 बिलियन डालर की भरपाई करेगा। यानी 23 गुना अधिक। तो क्या भारतीयों के खून के मुकाबले अमेरिकियों का खून 23 गुना अधिक कीमती? पर कोई सवाल न उठे, सो दिखावे को राहत-पुनर्वास का जिम्मा केंद्र ने लिया। होम मिनिस्टर पी. चिदंबरम की रहनुमाई में नौ मंत्रियों का जीओएम बन गया। जो पुनर्वास के साथ-साथ ऐसे हादसे न हों, यह भी बताएगा। पर जीओएम का मतलब ग्रुप ऑफ मिनिस्टर नहीं, गड्ढे में ऑफिशियल मैटर। तेलंगाना, वन रेंक-वन पेंशन, जातीय जनगणना, महंगाई जैसे कई अहम मुद्दे जीओएम के सुपुर्द। पर जीओएम के गठन का मतलब ही मामले को ठंडे बस्ते में डाल देना। जीओएम की दलील देकर मनमोहन मानसून सत्र में परमाणुवीय नुकसान दायित्व बिल पास करवाएंगे। बाकी पीडि़त परिवार तो भगवान भरोसे। यही होता है अपने देश में। जब मुंबई में 26/11 हुआ, तो जाकर सिस्टम में सुधार का ख्याल आया। पर अर्जुन के बाद कांग्रेसी दिग्विजय सीएम बने। पिछले छह साल से बीजेपी सरकार। पर सब लंबी तानकर सोए रहे। अब यूनियन कार्बाइड तो डाऊ कैमिकल्स के नाम से फिर भारत में आ चुका। जिसके वकील अपने कांग्रेस के प्रवक्ता। सो पीडि़त परिवारों को न्याय के नाम पर अब सिर्फ सियासत की त्रासदी।
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09/06/2010

Tuesday, June 8, 2010

विधुर व्यवस्था का यह कैसा विधवा विलाप?

हिरोशिमा-नागासाकी पर एटम बम गिराने से पहले जब मित्र राष्ट्रों पर धुरी राष्ट्र हावी थे। तब विंस्टन चर्चिल ने न्याय व्यवस्था से जुड़े एक अधिकारी से पूछा था, अपनी न्याय व्यवस्था कैसी चल रही? पर वह अधिकारी द्वितीय विश्व युद्ध को लेकर ब्रिटेन की जनता की चिंता लेकर पहुंचा था। सो चर्चिल ने अपना सवाल बार-बार दोहराया। तो अधिकारी ने झल्लाते हुए जवाब दिया, जनता में आज यह विषय नहीं। अलबत्ता जनता यह सोच रही, मित्र राष्ट्रों का क्या होगा? पर चर्चिल ने जवाब दिया- अगर हमारी जनता समूची व्यवस्था पर भरोसा करती होगी, तो हिटलर-मुसोलिनी जैसे जीतकर भी राज नहीं कर पाएंगे। यानी जिस देश की कार्यपालिका, विधायिका, न्यायपालिका पर जनता को एतबार न हो, उसे कोई भी गुलाम बना सकता। अपनी कार्यपालिका और विधायिका से जनता का भरोसा तो उठ चुका। रही-सही कसर भोपाल की महात्रासदी पर सोमवार को आए फैसले ने पूरी कर दी। आखिर अब न्यायपालिका पर कितना भरोसा करेगा आम आदमी? खास तौर से भोपाल गैस त्रासदी के पीडि़त तो अब कोई उम्मीद नहीं बांधेंगे। जिन ने न्याय की खातिर 26 साल से एक नहीं, दो-दो लड़ाइयां लड़ीं। न्याय की उम्मीद में अभियुक्तों से भी लडऩा पड़ा, अपनी सरकार से भी। दुनिया की सबसे बड़ी औद्योगिक त्रासदी है भोपाल गैस कांड। पूरे 26 साल मुकदमा चला। पर दोषियों को सजा मिली दो साल की। उससे भी क्रूर मजाक, इधर फैसला हुआ, उधर 25 हजार के मुचलके पर दोषियों को जमानत भी मिल गई। क्या भोपाल गैस त्रासदी के शिकार लोग इसलिए 26 साल से बाट जोह रहे थे? क्या इसी व्यवस्था के जरिए भारत विकसित देश बनने की सोच रहा? अपनी व्यवस्था में बैठे लोगों की नींद अब खुल रही। भोपाल गैस कांड की जांच कर चुके तबके सीबीआई संयुक्त निदेशक बीआर लाल ने अब खुलासा किया, विदेश मंत्रालय ने इस मामले के सबसे बड़े विदेशी गुनाहगार वारेन एंडरसन के प्रत्यर्पण की पहल न करने की हिदायत दी थी। बकौल लाल, उन ने हिदायत नहीं मानी, एतराज जताया। तो उनका ट्रांसफर कर दिया गया। उन ने यह भी बता दिया, सीबीआई हमेशा से वही करती, जो सत्ता में बैठे आका का हुक्म होता। लाल की बात सोलह आने सही। पर सवाल बीआर लाल से भी। आखिर सोमवार को कोर्ट के फैसले के बाद ही नींद क्यों खुली? अब तक क्यों चुप बैठे थे लाल? क्या फैसले के बाद मीडिया ने तूल दिया, तो टीवी पर चेहरा चमकाने को खुलासा कर रहे? अब खुलासे से क्या होगा? अगर लाल इतने ही खुद्दार थे, तो तभी खुलासा क्यों नहीं किया? अब भोपाल की महात्रासदी पर 26 साल बाद विधवा विलाप करने वाले बहुतेरे। अपने विधि मंत्री वीरप्पा मोइली अब फैसले को इंसाफ का दफन होना करार दे रहे। कानून में बदलाव से लेकर फास्ट ट्रेक कोर्ट की पैरवी कर रहे। पर पिछले 26 साल में कभी ऐसा ख्याल क्यों नहीं आया? अदालत में सीबीआई ने जिस धारा के तहत चार्जशीट दाखिल की, उसमें अधिकतम सजा दो साल की। वह भी 1987 में दाखिल की। फिर सितंबर 1996 में सुप्रीम कोर्ट ने भी कोई बड़ा करिश्मा नहीं किया। अलबत्ता कमजोर धारा में ही केस दर्ज करने का फैसला सुना दिया। फिर भी 1996 से 2010 तक किसी नेता ने कोई पहल नहीं की। भोपाल त्रासदी के पीडि़त न जाने कितनी दफा जंतर-मंतर पर चीख-पुकार मचा चुके। पर लकवाग्रस्त व्यवस्था अब गूंगी-बहरी भी हो चुकी। वारेन एंडरसन को तो चार दिसंबर 1984 को ही जमानत मिल गई थी। बाकायदा विशेष विमान से वह अमेरिका लौट गया। फिर तमाम वारंट के बाद भी एंडरसन नहीं लौटा। अब सरकार पर बचाने का आरोप लगा। तो मोइली बोले- अभी एंडरसन के खिलाफ केस बंद नहीं। यों मोइली देश की जनता को सिर्फ गुमराह कर रहे। दुनिया भर में यही कानून, अगर अपराध कर कोई व्यक्ति अपने देश लौटने में कामयाब हो जाए। तो वह देश अपने नागरिक का प्रत्यर्पण नहीं करता। अलबत्ता उस व्यक्ति पर उसके ही देश में स्थानीय कानून के तहत मुकदमा चलाया जा सकता। क्या मोइली को इस कानून का ज्ञान नहीं? सो चाहे जो हो, एंडरसन अब हाथ नहीं आएगा। यही तो अपनी व्यवस्था का निकम्मापन। भोपाल त्रासदी में न्याय नहीं हुआ, तो झूठा विलाप। रुचिका छेड़छाड़ कांड में 19 साल बाद एसपीएस राठौड़ को महज छह महीने की सजा मिली। मीडिया ने तूल दिया। तो नए सिरे से केस चला। राठौड़ के मैडल छिन गए। अपनी होम मिनिस्ट्री ने देश के सभी थानों को सर्कुलर जारी कर दिया। शिकायत को ही एफआईआर मानें। रुचिका केस में नौ साल तक एफआईआर तक दर्ज नहीं हुई थी। पर 19 साल बाद फैसला आया। तो बीजेपी के शांता कुमार कहने लगे- 'रुचिका केस को सुन पीएम वाजपेयी भी रो पड़े थे। तब वाजपेयी ने सीएम चौटाला को कड़ी चिट्ठी लिखी थी।' पर क्या हुआ, बताने की जरूरत नहीं। जेसिका लाल का केस हो या नितीश कटारा का। बीएमडब्ल्यू कांड हो या फिर भोपाल जैसा ही 26 साल पुराना सिख विरोधी नरसंहार। जब व्यवस्था की पोल खुली, तो राजनेता हों या नौकरशाह, विधवा विलाप करने लगे। पर सवाल, अब विधवा विलाप का क्या मतलब? भोपाल त्रासदी में 20-25 हजार लोग मारे गए। आज भी पीडि़त परिवार उस त्रासदी का दंश झेल रहे। गुजरात दंगे से कई गुना भयावह थी भोपाल की गैस त्रासदी। पर जितना प्रो-एक्टिव सुप्रीम कोर्ट गुजरात दंगे में दिखा, क्या कभी भोपाल के लिए दिखा? अब क्या कहें अपनी व्यवस्था को। अपनी व्यवस्था ही 'विधुर' हो चुकी। सो अब 'विधवा विलाप' कैसा?
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08/06/2010

Monday, June 7, 2010

'राम' की छाया पड़ते ही बीजेपी में बवंडर

तो बीजेपी के सुराज की शुरुआत राम जेठमलानी के साथ हुई। कभी बीजेपी अटल बिहारी की पार्टी थी, अब गगनविहारी नेताओं का कब्जा हो चुका। सो वाजपेयी के अस्वस्थ होने का खूब फायदा उठा रहे। चाल, चरित्र, चेहरे की बलि तो बीजेपी पहले ही चढ़ा चुकी। अब विचारधारा और विजन की भी आहुति दे दी। जैसे कोई लालची बेटा अपने बाप की बीमारी का फायदा उठा सारी दौलत हथियाकर बैठ जाता। कुछ यही हाल अटल बिहारी की बनाई बीजेपी का हो गया। सो मुंबई में बीजेपी के सीएम कॉन्क्लेव का एजंडा तो सुराज था। पर सुराज के सबसे बड़े पैरोकार आडवाणी नहीं पहुंचे। क्यों नहीं पहुंचे, वजह बीजेपी प्रवक्ता को भी मालूम नहीं। अरुण जेतली भी नहीं गए, यशवंत सिन्हा मुंबई एयरपोर्ट जाकर लौट आए। पर वजह बीजेपी ने बताई, जेतली के किसी रिश्तेदार का निधन हो गया। तो सिन्हा कुल्लू-मनाली में छुट्टियां मना रहे थे। रविशंकर की मानें, तो राजनाथ को बुलाया ही नहीं गया था। पर नाराजगी की असली वजह भी सुनते जाइए। राज्यसभा चुनाव में टिकट बंटवारे ने बीजेपी को वापस वहीं ला खड़ा किया, जहां से गडकरी ने कमान संभाली थी। गडकरी ने भी शुरुआत में सपनों का बुर्ज खलीफा खड़ा कर दिया। पर भूल गए, समंदर के बीच बुर्ज को टिकाए रखना आसान नहीं। जेठमलानी को टिकट दिया, तो अरुण जेतली, वसुंधरा राजे, यशवंत सरीखे नेता नाराज। राजनाथ-यशवंत को तो झारखंड के टिकट में पूछा तक नहीं। बीजेपी ने अबके हर राज्य में एक बाहरी उम्मीदवार थोपने का मन बनाया। पर इतना बवंडर मचेगा, उम्मीद नहीं थी। जेठमलानी तो विशुद्ध बाहरी उम्मीदवार। पर सोमवार को अपनों के टिकट पर भी सवाल उठ गए। संघ पृष्ठभूमि से बीजेपी में आए शेषाद्रि चारी ने लेटर बम फोड़ दिया। जैसे लोकसभा चुनाव के बाद अपने जसवंत-यशवंत और शौरी ने फोड़ा था। शेषाद्रि चारी ने तरुण विजय को उत्तराखंड से टिकट दिए जाने पर एतराज जताया। गडकरी को लिखी चिट्ठी में कहा- 'अब यह साफ हो गया है कि जबसे चुनाव में पार्टी हारी है, केंद्रीय नेतृत्व विचारधारा और विजन से भटकता जा रहा है।' तरुण विजय की ओर इशारा करते हुए शेषाद्रि चारी ने लिखा- उत्तराखंड से ऐसे व्यक्ति को टिकट दिया गया, जिनकी ईमानदारी पर सवाल उठे हैं। चारी ने बाद में बेखौफ कहा- 'ऐसे व्यक्ति को टिकट दिया जाना, जिसके बारे में पार्टी का जांच कमीशन वित्तीय गड़बड़ी का दोषी मान पद से हटने को मजबूर कर चुका हो, पार्टी के लिए उचित नहीं।' अब शेषाद्रि चारी गडकरी से मिलेंगे, तो जमीनी वर्करों की उपेक्षा का सवाल फिर उठाएंगे। पर नाराजगी सिर्फ उत्तराखंड में नहीं। मध्य प्रदेश से पत्रकार चंदन मित्रा को टिकट दिया जाना कई नेताओं को नहीं पच रहा। पर मजबूरी यह है कि राज्य इकाई ने पिछली बार ही एक बाहरी के लिए केंद्र को वादा कर दिया था। सो थावरचंद गहलोत अपनी नाराजगी का इजहार दूसरे तरीके से करेंगे। पटना वर्किंग कमेटी में गडकरी से पूछा जाएगा, क्या यही है दस फीसदी वोट बढ़ाने का मंत्र? आखिर बीजेपी ने किसी दलित को टिकट क्यों नहीं दिया? अब सोचो, दलित की बात उठेगी, तो फिर महिला का भी सवाल उठेगा। बीजेपी ने एक नहीं, तीन-तीन महिलाओं नजमा-हेमा-स्मृति को दिया वादा तोड़ दिया। अब बीजेपी में जेठमलानी के खिलाफ विरोध को देख कांग्रेस ने भी संतोष बागड़ोदिया को निर्दलीय मैदान में उतार दिया। यानी अब राजस्थान में घोड़ों की मंडी सजेगी। कितने विधायकों की पौ-बारह हुई, यह तो सत्रह जून को ही मालूम पड़ेगा। पर राम जेठमलानी के आने से बीजेपी का कितना भला होगा। बीजेपी को 86 साल के जेठमलानी में भविष्य दिख रहा। जेठमलानी गुजरात दंगे के मामले में मोदी सरकार की ओर से पैरवी कर रहे। सो मोदी ने वीटो लगाकर टिकट दिलाया। क्या वकालत की फीस अब राज्यसभा की टिकट? अगर बीजेपी का यह मापदंड, तो फिर बीजेपी को कांग्रेस पर दोषारोपण हा हक नहीं। जेठमलानी की छवि आया राम-गया राम से कम नहीं। पर आडवाणी के हमेशा खास रहे। अब इसे दोनों का सिंध प्रांत से होना मानो, या कुछ और। पर वाजपेयी सरकार में मंत्री बने, तो आडवाणी की वजह से। तब भी जुडिशियरी के खिलाफ बोल बखेड़ा किया, तो जाना पड़ा। अफजल की फांसी पर बीजेपी के उलट स्टैंड। पिछले साल दस अगस्त को वड़ोदरा में उन ने कसाब के लिए भी वही राय दी थी। उन ने कहा था- 'कसाब को फांसी नहीं, जेल में सडऩे देना चाहिए।' इंदिरा के हत्यारे की पैरवी कर चुके। हर्षद मेहता, केतन पारिख का बचाव कर चुके। जेसिका लाल के मर्डरर मनु शर्मा का केस लड़ चुके। अब ललित मोदी का लड़ेंगे। सो बीजेपी कह रही- अब जेठमलानी पार्टी की भाषा बोलेंगे। सो इतिहास देख भविष्य का इंतजार करिए। बात अधिक पुरानी नहीं। जब जसवंत बीजेपी से निकाले गए, तो दस सितंबर को जयपुर में जेठमलानी ने बीजेपी में ठोस नेतृत्व का अभाव बताया था। जसवंत की बर्खास्तगी को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के खिलाफ बताया था। पर जेठमलानी को टिकट दिए जाने की असली वजह तब समझ आई, जब 16 अप्रैल 2009 को दिया जेठमलानी का एक इंटरव्यू पढ़ा। तब जेठमलानी ने कहा था- 'मेरे बेटे महेश को नॉर्थ-सेंट्रल मुंबई से टिकट देने की खबर सबसे पहले मुझे कमला ने बताई थी। कमला मेरी राखी सिस्टर।' अब आप गांव-गांव में बोली जाने वाली कहावत दोहराओ, बीजेपी को अपने हाल पर छोड़ दो।
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07/06/2010