Friday, July 30, 2010

महंगाई की मझधार में संसद का मानसून सत्र!

संसद लाचार दिख रही। सो कवि सुदामा पांडे धूमिल की कुछ पंक्तियां याद आ रहीं। उन ने लिखा- मुझसे कहा गया कि संसद देश की धडक़न को प्रतिबिंबित करने वाला दर्पण है। जनता को जनता के विचारों का नैतिक समर्पण है, लेकिन क्या यह सच है? पर हकीकत में हफ्ते भर से संसद में क्या हो रहा। सरकार ने गांठ बांध रखी, तो विपक्ष ने रार। यों सरकार ने एक चाल जरूर चली। स्पीकर-चेयरमैन की ओर से कॉमन प्रस्ताव का सुर्रा छेड़ा। महंगाई पर आसंदी से चिंता जता बहस हो जाए। ताकि नियम का फच्चर खत्म हो। पर यह फार्मूला सत्र से पहले खुद मीरा कुमार दे चुकीं। विपक्ष ने तभी प्रस्ताव ठुकरा दिया था। विपक्ष महंगाई को सरकार की नाकामी साबित करना चाह रहा। पर सरकार किसी प्रस्ताव में यह स्वीकार करने को राजी नहीं। सो बीजेपी ने शुक्रवार को कॉमन प्रस्ताव की बात खारिज कर दी। चुनौती दी- अगर सरकार खुद को बहुमत में मानती है, तो बहस की मंजूरी देकर विपक्ष के प्रस्ताव को निरस्त करे। अब अगर कॉमन प्रस्ताव की बात सच मानी जाए, तो क्या संसद के नियम सिर्फ खास लोगों के लिए? अगर संसद सचमुच जनता की धडक़न को प्रतिबिंबित करने वाला दर्पण, तो महंगाई पर नियमों का बंधन क्यों? एटमी डील की खातिर मनमोहन तो सरकार की बलि चढ़ाने को तैयार थे। पर महंगाई से त्रस्त जनता के लिए परहेज क्यों? जनता का दर्द विशेष नियम के जरिए जाहिर करने में क्या एतराज? सचमुच अपना लोकतंत्र भले विस्तृत हो चुका हो। मतदाताओं में जागरूकता भी आ चुकी हो। पर नेताओं के मायाजाल तक जनता अभी नहीं पहुंच पाई। तभी तो सोनिया गांधी और सोमनाथ जैसे दिग्गजों की कुर्सी लाभ के पद से खिसकने लगी, तो इसी संसद को मनमोहन सरकार ने नया कानून बनाने के लिए मजबूर कर दिया। बाकायदा बिल लाया गया। आनन-फानन में दोनों सदनों से पारित करा राष्ट्रपति को भेज दिया। बिल बनाते वक्त सभी दलों को संदेशा भिजवा दिया- आपके जितने भी सांसद लाभ के जिन-जिन पदों पर बैठे, उसकी लिस्ट दे दीजिए। सो कुछ ने लिस्ट थमाई, पर तब बीजेपी ने नैतिकता दिखाई। कानून भी ऐसा बना, जो बना 2007 में, पर 1950 से लागू हो गया। ताकि कोर्ट कोई अड़चन न डाल सके। ऐसा सिर्फ सोनिया और सोमनाथ जैसों के लिए ही संभव। आम आदमी की खातिर न कामरोको मंजूर, न नियम 184 के तहत चर्चा। अलबत्ता खम ठोककर कह दिया- अगर 193 के तहत चर्चा चाहिए, तो लो, वरना फूटो। यानी सरकार की ओर से दो ही फार्मूले। या तो विपक्ष 193 की चर्चा मान ले, या चेयर से कॉमन प्रस्ताव के तहत। पर बीजेपी की मजबूरी, अबके लालू-मुलायम जैसे नेता नियम 184 पर अड़े हुए। अब अगर बीजेपी ने सरकार से अंदरखाने समझौता किया, तो लालू-मुलायम को मौका मिल जाएगा। अब तक बीजेपी लालू-मुलायम पर सीबीआई के डर से तलवे चाटने का आरोप लगाती रही। सो बीजेपी चाहे भी, तो ऐसा नहीं कर सकती। शुक्रवार को एनडीए ने फिर रणनीति बनाई, तो सोमवार के लिए नोटिस स्पीकर को भिजवा दिया। एसएस आहलूवालिया ने एलान कर दिया- नियम 184 के तहत बहस नहीं मानी, तो संसद नहीं चलने देंगे। पर सरकार भी झुकने को तैयार नहीं। यों सरकार के तेवर से तो इतना साफ हो चुका, महंगाई पर चाहे जिस नियम के तहत चर्चा करा लो। महंगाई का बाल बी बांका न होगा। शुक्रवार को कांग्रेस प्रवक्ता मनीष तिवारी का बयान सचमुच आम आदमी के जख्म पर नमक लगाने वाला रहा। बोले- सरकार के रचनात्मक कदमों से महंगाई दर कम हो रही। यह खबर सभी अखबारों में छपी। सो विपक्ष अगर पढऩे की कृपा करे, तो देश और संसद पर कृपा हो जाएगी। पर मनीष तिवारी यह भूल रहे, देश के अखबारों में ही आम आदमी का दर्द कई बार छलका। क्या कांग्रेस या मनमोहन ने सुध ली। अगर सुध ली, तो नतीजा क्या निकला? आज भले महंगाई दर कम हो रही, पर महंगाई कम नहीं हुई। सो संसद में बना गतिरोध अब दूसरे हफ्ते में प्रवेश कर रहा। दोनों पक्षों के तेवर अब भी जस के तस। यों गतिरोध तोडऩे की जिम्मेदारी सत्तापक्ष की। पर हंगामे में जब खुद संसदीय कार्यमंत्री पार्टी बन जाएं, तो भला गतिरोध कहां टूटने वाला। सो फ्लोर मैनेजमेंट में सरकार फिर नकारा साबित हो रही। शुक्रवार को एक वरिष्ठ मंत्री और एक सोनिया के बेहद करीबी नेता ने साफ कर दिया। वोटिंग वाले नियम के तहत बहस कतई मंजूर नहीं करेंगे। अगर अबके मंजूर कर लिया, तो विपक्ष इसे परंपरा बना लेगा और हर छोटे से छोटे मुद्दे पर वोटिंग की मांग करेगा। अगर सचमुच विपक्ष को सरकार की विफलता नजर आ रही, तो सीधे अविश्वास प्रस्ताव लेकर आए, सरकार सामना करने को तैयार। इतना ही नहीं, मंत्री ने यह भी पूछा, क्या बहस होने से महंगाई कम हो जाएगी? अब हाथ कंगन को आरसी क्या, पढ़े-लिखे को फारसी क्या। नियम तो सिर्फ बहाना, महंगाई को तो है बढ़ते ही जाना। यानी सरकार का इरादा साफ। हफ्ते भर का हंगामा बहुत हो चुका। अब विपक्ष सदन चलने दे, वरना हंगामे में ही सारे बिल पास करा सत्र अनिश्चितकाल के लिए स्थगित करा लेंगे। यानी महंगाई के मझधार में मानसून सत्र। वैसे भी मौजूदा सत्र में सरकार के पास जितना काम नहीं, उससे अधिक घिरने वाले मुद्दे। कॉमन वैल्थ का घोटाला, सीबीआई का इस्तेमाल, भोपाल गैस त्रासदी, भारत-पाक वार्ता और अब तेलंगाना की आग भी भडक़ेगी। शुक्रवार को तेलंगाना की बारह सीटों के नतीजे आए, तो कांग्रेस का अध्यक्ष भी चुनाव हार गया।
---------
30/07/2010

Thursday, July 29, 2010

संसद सरकार की बपौती, महंगाई महज विपक्ष की

सांच को आंच नहीं, सरकार को विपक्ष रास नहीं। सो गुरुवार को भी संसद के दोनों सदन बैठने से पहले ही उठ गए। कामरोको खारिज हुआ। तो विपक्ष ने अबके नियम 184 के तहत नोटिस थमाया। पर बात घुमा-फिरा कर वोटिंग तक ही पहुंचेगी, सो सरकार को गवारा नहीं। स्पीकर मीरा कुमार ने भी तत्काल कोई रूलिंग नहीं दी। संसदीय कार्यमंत्री पवन कुमार बंसल नियम 193 के पहले के नोटिस पर अड़ गए। दलील दी, सुदीप बंदोपाध्याय और सांसद प्रेमदास राय का नोटिस 27 जुलाई को ही आया। सो पहले उस पर विचार होना चाहिए। पर अब मुश्किल मीरा कुमार की। कामरोको प्रस्ताव खारिज किया, तो प्रणव दा की दलील ही दोहरा दी। अब नियम 184 की फांस, सो सरकार की दलील के बाद सुदीप बंदोपाध्याय और राय के नोटिस को प्राथमिकता दी। तो निष्पक्षता पर सवाल उठना लाजिमी। अगर स्पीकर नियम 193 के तहत बहस की मंजूरी देती हैं। तो सवाल होगा- जिस दिन कामरोको खारिज किया, उस दिन ही रूलिंग क्यों नहीं दी? नियम 193 का नोटिस तो तब भी सामने था। पर मीरा ने रूलिंग में सिर्फ कामरोको खारिज किया, साथ ही विपक्ष को किसी और नियम में नोटिस देने को कहा। अब विपक्ष ने नियम 184 का पेच फंसाया। तो इम्तिहान मीरा का। गुरुवार को विपक्ष ने सीधे तो नहीं, इशारों में ही निष्पक्षता पर सवाल उठा दिया। सुषमा स्वराज ने मीरा के फैसले पर निराशा और दुख जताया। तो शरद यादव ने हल्के-फुल्के अंदाज में संदेश दे दिया। कहा- साल बीत गया, आपका प्रेम प्रणव बाबू की तरफ खूब झलकता है। पर हमारी ओर दया कभी नहीं होती। आपके कल के फैसले से देश की जनता को भी बहुत तकलीफ हुई। रात भर हम लोगों को नींद नहीं आई। सोचते रहे, अध्यक्ष से कैसे लड़ें। सो अब हम यह नोटिस लेकर आए। मुलायम सिंह ने भी अपने अंदाज में विरोध जता दिया। बोले- सदन नहीं चल पा रहा, तो सरकार जिम्मेदार है। आप क्यों सरकार की जिम्मेदारी ले रही हैं। विपक्ष को हमेशा स्पीकर से संरक्षण मिला। आप भी हमें संरक्षण दें। यानी कुल मिलाकर स्पीकर की रूलिंग विपक्ष का हाजमा बिगाड़ गई। पर स्पीकर से सीधे मोर्चा लिया, तो मुद्दा ही बदल जाएगा। सो शुक्रवार को फिर विपक्ष अपनी मांग दोहराएगा। यानी सब कुछ तय स्क्रिप्ट के मुताबिक होगा। शुक्रवार को भी संसद नहीं चलेगी। पर सोमवार को सब कुछ सामान्य नहीं, तो कम से कम महंगाई की चर्चा सरकारी हिसाब से निपट जाएगी। यों विपक्ष के तरकश में अभी कई ब्रह्मास्त्र। पर सरकार भी मुख्य विपक्षी दल बीजेपी को किनारे करने का फार्मूला बना चुकी। सो विपक्षी एकता का इम्तिहान अगले हफ्ते होगा। पर महंगाई को लेकर ठनी रार अब खत्म समझिए। गुरुवार को बीजेपी ने दस करोड़ हस्ताक्षरों वाला ज्ञापन महामहिम प्रतिभा पाटिल को सौंप दिया। राष्ट्रपति से मिलकर लौटे। तो महंगाई पर विपक्ष गांडीव समर्पण करता ही दिखा। आडवाणी ने बेहिचक कह दिया- हमने अपना फर्ज पूरा किया। सडक़ से संसद तक और सरकार से अब राष्ट्रपति तक अलख जगा दी। विपक्ष इससे अधिक कुछ नहीं कर सकता। सचमुच विपक्ष अब करे भी क्या। जब सरकार की जिद तानाशाही दिखने लगे। तो विपक्ष नहीं, सिर्फ जनता सबक सिखा सकती। पर मनमोहन सरकार की यह कैसी जिद। अगर सरकार को नंबर गेम का पूरा भरोसा, तो वोटिंग से डर क्यों? अगर सरकार ईमानदारी से दायित्व निभा रही। तो कामरोको या 184 के तहत बहस से परहेज क्यों? आखिर सत्तापक्ष इस जिद पर क्यों अड़ा हुआ कि वोटिंग वाले नियम के तहत बहस नहीं होने देंगे। क्या लोकतंत्र में विपक्ष की कोई हैसियत नहीं? विपक्ष ही लोकतंत्र की सही पहचान। पर विपक्ष को सत्ता के नशे में कुचलना हिटलर-मुसोलिनी से कम नहीं। हिटलर-मुसोलिनी तो विरोधियों को सीधे मरवा देते थे। पर संसद में सरकार का जो रवैया, वह भी कुछ कम नहीं। मनमोहन राज में महंगाई बढ़ी, यह खुद सोनिया-मनमोहन भी कई बार मान चुके। कई बार कांग्रेस वर्किंग कमेटी ने भी चिंता जताई। पर सरकार की दलील, विपक्ष के कामरोको या 184 के तहत चर्चा नहीं हो। अलबत्ता सुदीप बंदोपाध्याय और प्रेमदास राय के 193 वाले नोटिस पर चर्चा हो। क्या यह लोकतंत्र की निशानी? सुदीप और राय कोई विपक्षी दल के सांसद नहीं। एक तृणमूल के, तो दूसरे सिक्किम डेमोक्रेटिक फ्रंट के। दोनों मनमोहन सरकार के खेवनहार। अब सत्तापक्ष आपस में ही विपक्ष की जगह ले ले, अंदरखाने गुणा-भाग कर बहस करने लगें। तो फिर विपक्ष के क्या मायने? क्या संसद सत्तापक्ष की बपौती, जो अपनी मर्जी चलाए? महंगाई पर बहुमत विपक्ष के साथ। फिर भी न स्पीकर और न सरकार बहस को राजी। जिस नियम के तहत बहस को राजी, उसके तहत तेरह बहस हो चुकीं। पर महंगाई तो कम नहीं हुई, आम आदमी की तेरहवीं जरूर हो रही। अब तृणमूल और एसडीएफ के नोटिस का क्या मतलब। यही ना, सरकार के सहयोगी भी कीमत बढ़ोतरी को जायज नहीं मान रहे। क्या यह सरकार की संवैधानिक विफलता नहीं? आखिर सरकार ऐसा व्यवहार क्यों कर रही, मानो महंगाई सिर्फ विपक्ष की और संसद सरकार की बपौती। लोकतंत्र को सचमुच लूटतंत्र बना दिया। कॉमन वेल्थ के नाम पर जो लूट मची, उसकी पोलपट्टी तो अक्टूबर में खुलेगी। पर कलई गुरुवार को सीवीसी ने खोल दी। सतर्कता आयोग ने बता दिया- कई करोड़ का घोटाला हुआ। अधिक कीमत पर अयोग्य कंपनियों को ठेके दिए गए। महंगाई बढ़ाने में कॉमन वेल्थ की भी अहम भूमिका। सो सरकार की सफलता आप खुद देख लें।
---------
29/07/2010

Wednesday, July 28, 2010

स्पीकर के फैसले पर ‘ऑल इन वैल’

संसद न चलनी थी, न चली और बाकी बचे दो दिन भी चलनी नहीं। लोकसभा स्पीकर मीरा कुमार ने विपक्ष का कामरोको प्रस्ताव नामंजूर कर दिया। पर रूलिंग देने से पहले सबको अपना पक्ष रखने का मौका मिला। तो विपक्ष से ग्यारह और प्रणव दा समेत सत्तापक्ष से तीन लोग बोले। समूचे विपक्ष ने कामरोको प्रस्ताव मंजूर करने की खातिर दलीलें गिनाईं। विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज ने सरकार गिराने नहीं, सेंसर करने की मंशा जताई। करीब-करीब यही राय सभी विपक्षी नेताओं ने रखी। पर बीएसपी ने अपनी पोल खोल ली। मायावती के सिपहसालार दारा सिंह ने 2004 के बाद से महंगाई लगातार बढऩे की बात कही। यानी यूपीए राज पर हमला, एनडीए को क्लीन चिट। फिर भी मायावती लगातार यूपीए को समर्थन दे रहीं। लालू यादव ने भी सीबीआई के जरिए सौदेबाजी से इनकार किया। नितिन गडकरी की गाली याद दिलाई। अपनी रणनीति खुद तय करने का एलान किया। पर लालू यादव ने फिर चालाकी दिखा दी। लोकसभा में विपक्षी दलों को चुनौती दी, अगर सचमुच कांग्रेस से लडऩा है, तो 1977 की तरह पार्टियों का विसर्जन कर नया मंचा बनाइए। पर लोकसभा की लॉबी में लालूवाणी कुछ यों थी। कहा- विपक्ष एक मंच बनाए और मुझे उसका अध्यक्ष। यानी 1977 जैसी एकता की बात महज हंसी-ठिठोली समझिए। पर बात कामरोको प्रस्ताव की। जिसकी खातिर पक्ष-विपक्ष ने इतिहास कुरेदा। अपने वासुदेव आचार्य ने पुख्ता तैयारी कर रखी थी। सो स्पीकर को याद दिलाया, कैसे पूर्व के स्पीकरों ने महंगाई पर कामरोको मंजूर किया। उन ने 23 जुलाई 1973 के इंद्रजीत गुप्त के नोटिस, 21 फरवरी 1986 मधु दंडवते के नोटिस, 12 नवंबर 1993 एसएम बनर्जी के नोटिस, 13 जून 1994 रामाश्रय प्रसाद सिंह के नोटिस और अप्रैल 2007 के उदाहरण दिए। जब तत्कालीन स्पीकरों ने कामरोको प्रस्ताव पर सहमति दी। पर प्रणव मुखर्जी पूरी बहस के दौरान स्पीकर्स रूल-बुक के पन्ने पलट रहे थे। सो आखिर में उन ने 1928 से 2010 तक की रूलिंग गिनानी शुरू की। सेंट्रल असेंबली में चार सितंबर 1928 को विट्ठल भाई पटेल के फैसले की दुहाई दी। फिर जीवी मावलंकर से लेकर एमए अयंगर और जी.एस. ढिल्लन के फैसले गिनाए। प्रणव दा का निचोड़ यही रहा, कामरोको प्रस्ताव के लिए बहुमत के बावजूद मंजूरी नहीं दी जा सकती। कामरोको प्रस्ताव को आम चलन में लाना सही नहीं। कामरोको तभी लाया जा सकता, जब सरकार व्यवस्था संभालने में फेल हो चुकी हो। सो करीब डेढ़ घंटे की बहस के बाद स्पीकर फौरन फैसला नहीं दे पाईं। अलबत्ता लंच ब्रेक के बाद रूलिंग दी, तो हू-ब-हू प्रणव दा की दलीलें दोहरा दीं। मीरा कुमार ने भी 24 मई 1971 को स्पीकर जीएस ढिल्लन के फैसले की नजीर दी। यानी अगर सरकार संवैधानिक कर्तव्य का निर्वहन नहीं कर पा रही, तो ही कामरोको संभव। पर मीरा कुमार ने महंगाई को लेकर चिंता जताई। अब सवाल उठना लाजिमी। स्पीकर ने सिर्फ प्रणव दा की नजीर मानी, वासुदेव आचार्य की क्यों नहीं? पिछले छह साल में महंगाई पर संसद में तेरह बार बहस हो चुकी। नवंबर 2004 से ही मनमोहन और उनके सिपहसालार महंगाई रोकने का भरोसा दे रहे। फिर भी महंगाई दिन दूनी, रात चौगुनी बढ़ती गई। अब इतना सब कुछ होने के बाद भी महंगाई पर यही सूरत-ए-हाल, तो क्या यह विफलता नहीं? बत्तीस रुपए की दाल 85 रुपए हो गई। सोलह की चीनी तीस के पार चली गई। चालीस का तेल अस्सी के पार हो गया। तेरह का दूध बत्तीस रुपए लीटर हो गया। सेर में मिलने वाली सब्जियां अब सोने के भाव बिक रहीं। क्या यह सब मनमोहन सरकार की उपलब्धि? पर बात लोकसभा की, जहां स्पीकर ने कामरोको के खिलाफ रूलिंग दी। तो समूचा विपक्ष वैल में आ गया। एनडीए ने स्पीकर के फैसले को दुर्भाग्यपूर्ण करार दिया। यानी मीरा कुमार के फैसले से पहली बार विपक्ष नाराज। पर सवाल, मीरा ने प्रणव दा की दलील का ही जिक्र क्यों किया? उदाहरण तो वासुदेव आचार्य ने भी दिए थे। माना, ढिल्लन ने कामरोको पर जो व्यवस्था दी, वह अबके नजीर बनी। तो दलील देने वाले यह क्यों भूल रहे, ढिल्लन ने स्पीकर रहते कभी अपनी निष्पक्षता पर सवाल नहीं उठने दिए। आखिर सिर्फ मीठा-मीठा ही घप क्यों? पंडित नेहरू ने कहा था- स्पीकर का पद सम्मानित पद, सो वही व्यक्ति आसीन होने चाहिए, जो योग्य और निष्पक्ष हों। ब्रिटिश वास्तुकार हरबर्ट बेकर ने भी पद की गरिमा को देखते हुए सिंहासन का डिजाइन ऐसा बनाया। ताकि कोई भी मेंबर बोलने के लिए उठे, तो सीधे स्पीकर से मुखातिब हो। अपने यहां ब्रिटेन जैसी परंपरा तो नहीं, पर स्पीकर बनने के बाद दलगत राजनीति से अलग रहने की उम्मीद की जाती। पर इतिहास में दोनों तरह के उदाहरण। बलराम जाखड़ ने पद की मर्यादा को छोड़ बोफोर्स मामले के वक्त सरकार बचाने के लिए जेहादी उत्साह दिखाया। पर मावलंकर, नीलम संजीव रेड्डी, ढिल्लों, बलिराम भगत, के.एस. हेगड़े जैसे स्पीकरों ने परंपरा को मजबूत किया। हाल के दशक में पीए संगमा, जीएमसी बालयोगी, मनोहर जोशी और सोमनाथ चटर्जी तक ने मिसाल पेश की। यों चटर्जी पर भी खूब सवाल उठे। पर आखिर में उन ने भी अंतरात्मा की आवाज सुनी। सो स्पीकरों से यही उम्मीद की जाती, वह सत्ता की कठपुतली न बनें। अब कहीं स्पीकर मीरा कुमार से विपक्ष का टकराव न हो जाए। आखिर बुधवार को स्पीकर के खिलाफ ही तो विपक्ष वैल में कूदा।
----------
28/07/2010

Tuesday, July 27, 2010

सरकार बेईमान, तो विपक्ष भी ईमानदार नहीं

महंगाई संसद के लिए फिर डायन बन गई। जिसने जैसा ठाना, संसद के दोनों सदनों में वही किया। लालूवादी-मुलायमवादी वैल में घुसने में अबके भी अव्वल दिखे। नारा लगाया- रोको महंगाई, बांधो दाम, नहीं तो होगा चक्का जाम। पर कहीं वोटिंग की नौबत आई, सरकार ने सीबीआई दौड़ा दी। तो लालू-मुलायम का नारा पिछली बार की तरह फिर बदल जाएगा। याद है ना, जब प्रणव दा ने बजट में पेट्रोल-डीजल की कीमतें बढ़ा दीं। तो लालू-मुलायम विपक्ष के साथ गलबहियां कर नारा लगा रहे थे- जो सरकार निकम्मी है, वो सरकार बदलनी है। पर जब कटौती प्रस्ताव आया, तो लालू-मुलायम ने नारे में संशोधन कर दिया- जो सरकार निकम्मी है, वो सरकार बचानी है। पर अभी शुरुआत, सो लालू-मुलायम ही नहीं, माया भी अपनी माया दिखा रहीं। आखिर दिखाएं भी क्यों ना, जब मरीज डाक्टर के पास आएगा, तो फीस देनी ही होगी। सो फिलहाल समूचा विपक्ष सुर मिला रहा। पर वोटिंग की नौबत आई, तो महंगाई इस राजनीतिक तिकड़ी के लिए सोलह दूनी आठ हो जाएगी। सो जुगाड़ तंत्र में महारत हासिल कर चुके मनमोहन को भी महंगाई की फिक्र नहीं। मंगलवार को आरबीआई ने रेपो और रिवर्स रेपो रेट में फिर बढ़ोतरी कर दी। ताकि मध्यम वर्ग पर कर्ज का बोझ बढ़ जाए और मार्केट में तरलता बनी रहे। पर ऐसे उपाय पिछले छह साल से करती आ रही सरकार। फिर भी महंगाई नहीं रुकी। अब महंगाई रोकना सरकार के बूते में नहीं। सो येन-केन-प्रकारेण महंगाई दर घटाने की कोशिश। मनमोहन दिसंबर तक महंगाई दर पर काबू पाने का भरोसा दिला रहे। तो प्रणव दा दो महीने में। पर मनमोहन राज के पिछले छह साल में इतने भरोसे दिलाए गए, अब तो भरोसा शब्द भी अपना भरोसा खो चुका। तभी तो मनमोहन सरकार वोटिंग वाले नियम के तहत बहस से कन्नी काट रही। पर सत्तापक्ष हो या विपक्ष, किसी ने हार नहीं मानी। अलबत्ता रार ठन गई। विपक्ष कामरोको प्रस्ताव के तहत ही बहस का खम ठोक रहा। तो सरकार ने भी गांठ बांध ली, भले संसद का कामकाज रुक जाए, पर कामरोको प्रस्ताव मंजूर नहीं। यानी सरकार की नीयत में खोट। अगर महंगाई सचमुच काबू में आने वाली होती, तो सरकार खम ठोककर बहस को राजी होती। पर हंगामे के बावजूद सरकार के तेवर देखिए। लोकसभा में हंगामे के बीच ही मुरली ने तान छेड़ी। पेट्रोलियम मंत्री मुरली देवड़ा ने बयान दिया, तो कीमत बढ़ोतरी को ईको-फ्रेंडली बताया। दलील दी- पेट्रोल महंगा होगा, तो लोग न गाडिय़ां चलाएंगे, न प्रदूषण होगा। अब इसे सरकार की हताशा नहीं, तो और क्या कहेंगे। मुरली यह भूल गए, कीमत बढ़ोतरी का असर सिर्फ कार वालों पर नहीं हुआ। अलबत्ता रोजमर्रा की सभी चीजें महंगी हो गईं। पर बेसुरी सरकार से किसी सुर की उम्मीद ही कहां। साल भर से अनाज सडऩे की रपट आ रही। पर शरद पवार को कभी नहीं दिखा। अब मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट ने सवाल उठाया। लाखों टन अनाज क्यों सड़ रहा? सरकार से दो हफ्ते में जवाब मांगा। कहा- अनाज का एक भी दाना बरबाद नहीं होना चाहिए। इसे गरीबों में बांटा जाए। अगर विशेषज्ञों की मानें, तो देश में जितने टन अनाज सड़ रहा, उससे बीस करोड़ लोगों को साल भर का भोजन दिया जा सकता। पर पवार को क्रिकेट की फिक्र। मनमोहन को विकास दर की। सचमुच महंगाई की रफ्तार और पिछले छह साल में मनमोहन सरकार के बयान देखें। तो सरकार का नकारापन साफ दिखेगा। पर सरकार बेईमान, तो ईमानदार विपक्षी दल भी नहीं। महंगाई पर दो दिन का सांकेतिक हंगामा होगा। फिर किसी भी नियम के तहत बहस की खानापूर्ति होगी। पर महंगाई जहां है, उससे पीछे नहीं, आगे बढ़ेगी। अगर विपक्ष ईमानदारी से सरकार को घेरे, तो कोई मुरली देवड़ा ऐसी बेहूदी दलील देने की हिम्मत नहीं करेगा। पर बीजेपी धरना या अनशन कांची कामकोटि के शंकराचार्य की गिरफ्तारी पर करेगी। गोवा में राष्ट्रपति राज लगे, तो पणजी से जंतर-मंतर तक हिला दिया। पर बीजेपी का शीर्ष नेतृत्व कैरोसिन-रसोई गैस के दाम में बढ़ोतरी पर वैसा आंदोलन क्यों नहीं करता? रैली करने या संसद में बहस की औपचारिकता से सरकार की हिटलरशाही बंद नहीं होगी। बात अधिक पुरानी नहीं, पर विपक्षी दलों के लिए नजीर। भले ममता बनर्जी फिलहाल यूपीए का हिस्सा। पर याद है ना, सिंगूर में किसानों की जमीन की खातिर 25 दिन तक आमरण अनशन किया। तो बंगाल से लेकर रायसिनी हिल तक हिल गया। तबके राष्ट्रपति कलाम ने खुद बुद्धदेव से दो बार बात की। आखिर वही हुआ, जो ममता ने चाहा। जब बंगाल जैसे वामपंथी गढ़ में छोटी सी पार्टी की नेता ममता इतना दम-खम दिखा सकतीं। तो राष्ट्रीय पार्टी बीजेपी क्यों नहीं? अगर आडवाणी-सुषमा-जेतली-गडकरी एलान कर दें। जब तक रसोई गैस और कैरोसिन की बढ़ी कीमतें वापस नहीं होतीं, धरने पर बैठे रहेंगे। सचमुच विपक्ष ऐसा ठान ले, तो सरकार की इतनी हिम्मत नहीं, जो कीमत वापस न ले। जनता भी ऐसे नेताओं को सिर-आंखों पर बिठाती। जैसे ममता को बंगाल में। पर जुझारूपन अब राजनीति की डिक्शनरी से हट गया। सो महंगाई पर जैसी सरकार, वैसा विपक्ष। कवि सुदामा पांडे धूमिल ने सही लिखा- संसद तेल की वह घानी है, जिसमें आधा तेल और आधा पानी है। और यदि यह सच नहीं, तो एक ईमानदार आदमी को अपनी ईमानदारी का मलाल क्यों? जिसने सत्य कहा, उसका बुरा हाल क्यों?
-------------
27/07/2010

Monday, July 26, 2010

हर मुद्दे पर किचकिच, क्या यही है लोकतंत्र?

संवेदना और श्रद्धांजलि दे संसद के दोनों सदन उठ गए। सो सोमवार को संसद के गलियारे में ही जुबानी तीर चले। फिर मंगलवार की रणनीति बनी। सो महाभारत का असली शंखनाद सदन में होगा। विपक्षी एकता बरकरार रखने को बीजेपी ने गुजरात का मुद्दा पीछे धकेल महंगाई को प्राथमिकता दी। कामरोको का नोटिस दोनों सदनों में पहुंच गया। सो आसंदी के लिए भी चुनौती कम नहीं। पिछली दफा स्पीकर मीरा कुमार ने नियम की बारीकियां बता कामरोको ठुकरा दिया था। पर अबके विपक्ष ने नोटिस को तकनीकी बारीकियों से लैस कर दिया। दो सत्रों के बीच के अहम मुद्दे पर ही कामरोको प्रस्ताव लाया जा सकता। सो विपक्ष ने पेट्रोलियम पदार्थों की कीमतों में हुई बढ़ोतरी को नोटिस का आधार बनाया। पर सरकार और कांग्रेस भी खम ठोक चुकीं। बहस से एतराज नहीं, पर कामरोको या नियम 184 के तहत चर्चा मंजूर नहीं। महंगाई की नब्ज तो सरकार भांप चुकी। पर इलाज ढूंढे नहीं मिल रहा, सो वोटिंग करा खुद को खतरे में क्यों डाले। पर पक्ष हो या विपक्ष, महंगाई सिर्फ बहस का मुद्दा बनकर रह गई। यूपीए राज में शायद यह चौदहवीं बहस होगी। पर हर बहस भैंस के आगे बीन बजाने वाली ही साबित हुई। सो अबके भी कोई चमत्कार नहीं होगा। अलबत्ता दो-एक दिन हंगामा बरपेगा। फिर चैंबर मीटिंग में सारी सैटिंग हो जाएगी। पिछली दफा भी ऐसा ही हुआ था। आखिर में सरकार प्रश्नकाल स्थगन को राजी हो गई। विपक्ष कामरोको की जिद छोड़ गया। सो आप ही सोचो, इस दिखावे का क्या मतलब? सरकार तो हमेशा बहस से भागती। पर विपक्ष की यह जिम्मेदारी, सरकार को बहस में लाए। महंगाई हो या भोपाल त्रासदी या महिला बिल की बात। विपक्ष को चाहिए कि वह सरकार को गलती बताए। दुरुस्त करने के उपाय सुझाए। पर हाथ कंगन को आरसी क्या, पढ़े-लिखे को फारसी क्या। सत्तापक्ष और विपक्ष की जुगलबंदी अब खूब होने लगी। वरना आप ही सोचो, आसंदी के कमरे में मीटिंगबाजी का क्या मतलब। सदन कोई कठपुतली या नाटक का मंच तो नहीं, जहां लिखित पटकथा का मंचन भर हो। आखिर ऐसा क्यों, जनता को दिखाने के लिए दोनों पक्ष सदन को स्थगित कराने तैयार हो जाते। फिर संसद से सडक़ तक कोई जिंदाबाद के नारे लगाता, तो कोई मुर्दाबाद के। अगर सचमुच संसद में ईमानदार बहस होने लगे। तो सरकार आम आदमी के साथ इतनी हिटलरशाही नहीं कर सकती, जितनी यूपीए सरकार कर रही। पर महंगाई का मुद्दा मंगलवार को सबसे पहले उठेगा। तो यह बीजेपी की रणनीतिक मजबूरी। असल में बीजेपी की तलवार सीबीआई के मुद्दे पर म्यान से निकली। महंगाई की रस्म अदायगी होते ही गुजरात का मुद्दा गूंजेगा। सो पीएम ने सोमवार को ही मोर्चा संभाल लिया। सीबीआई के बेजा इस्तेमाल के विपक्षी आरोप को बेतुका बताया। सुप्रीम कोर्ट के आदेश और मॉनीटरिंग की दलील दी। यों सीबीआई सत्ताधारी दल की कठपुतली बन चुकी, इसमें कोई शक-शुबहा नहीं। पर पीएम के बयान का मतलब साफ। अगर विपक्ष संसद ठप करने पर अड़ा, तो जनता में नकारात्मक छवि बनाने की कोशिश होगी। पर बीजेपी भी गुजरात को लेकर समझौते के मूड में नहीं। सो अमित शाह की पैरवी के लिए राम जेठमलानी को मैदान में उतार दिया। या यों कहें, नरेंद्र मोदी ने जेठमलानी को जो गिफ्ट दिया। अब जेठमलानी रिटर्न गिफ्ट दे रहे। सो बीजेपी के एक बड़े नेता से सवाल हुआ, जेठमलानी की फीस कितनी और कौन देगा? तो जवाब आया, इकट्ठे छह साल की फीस चुका दी। यानी राजस्थान से राज्यसभा की मैंबरी के बदले जेठमलानी गुजरात में मोदी एंड कंपनी का बचाव करेंगे। पर सरकार की रणनीति अलग। कांग्रेस को मालूम, गुजरात ही एकमात्र ऐसा मुद्दा, जो विपक्ष की एकता में पलीता बन जाए। सो कांग्रेस और बीजेपी दोनों सीबीआई के मुद्दे पर हंगामाई रणनीति का इंतजार कर रहीं। यानी कम से कम पहला हफ्ता तो आप हंगामे की भेंट मानिए। महंगाई, सीबीआई, भोपाल त्रासदी, जाति जनगणना, हिंदू आतंकवाद जैसे मुद्दों पर दोनों तरफ से तीर चलेंगे। पर इसी सत्र में एक मुद्दा ऐसा भी होगा, जब संसद में भेड़चाल दिखेगी। सांसदों के वेतन-भत्ते बढऩे का बिल आएगा। तो ऐतिहासिक एकता सदन के रिकार्ड में दर्ज हो जाएगी। पर उन तीरों का क्या, जिनसे घायल हो रहा सिर्फ आम आदमी। आखिर संसद के सत्र का आम आदमी के लिए क्या महत्व? संसद में हर छोटे-बड़े मुद्दे पर पक्ष-विपक्ष में तकरार हो जाती। आपस में ही किचकिच करते रहते। क्या यही है अपना लोकतंत्र? सोमवार को मानसून सत्र का आगाज हुआ। तो कारगिल विजय दिवस की ग्यारहवीं वर्षगांठ थी। पर कारगिल को लेकर भी राजनीतिक किचकिच खूब दिखी। एनडीए काल में कारगिल युद्ध हुआ। सो यूपीए उसे दिल से अपना मानने को तैयार नहीं। बीजेपी वाले भी किसी दूसरे को कॉपी राइट देने को राजी नहीं। सो सोमवार को रक्षा मंत्री एके एंटनी ने सुबह अमर जवान ज्योति जाकर श्रद्धांजलि की रस्म निभाई। तो बीजेपी ने शाम से लेकर रात तक शहीदों को याद किया। क्या अब शहादत में भी बीजेपी और कांग्रेस? क्या संसद अपनी प्रासंगिकता खोती नहीं जा रही? आखिर किसी को भी चिंता क्यों नहीं? संसद में नक्सलवाद पर भी चर्चा होगी। पर जिस तरह सत्तापक्ष और विपक्ष प्वाइंट स्कोर करने के लिए किचकिच वाली राजनीति करते। उससे नक्सलियों को क्या संदेश जाएगा? नक्सलवादी अपनी संसद को इन्हीं हरकतों की वजह से सूअरबाड़ा कहते। हर मुद्दे पर किचकिच, क्या यही है अपना लोकतंत्र?
----------
26/07/2010

Friday, July 23, 2010

अमित शाह नहीं, फिक्र मोदी की

मानसून सत्र से पहले तलवारें खिंच गईं। अगर विपक्ष के तरकश में भारत-पाक वार्ता, महंगाई, भोपाल गैस कांड, रेल दुर्घटना, घाटी की घटना, नक्सलवाद और सरकार में आपसी खींचतान वाले मुद्दों के तीर। तो सत्तापक्ष की झोली में हिंदू आतंकवाद, कर्नाटक में अवैध खनन, बिहार का बवंडर और अब बीजेपी को अलग-थलग करने का सबसे लजीज मुद्दा गुजरात आ गया। सो खलबलाई बीजेपी ने शुक्रवार को पीएम के घर का 'लजीज' खाना ठुकरा दिया। सोहराबुद्दीन फर्जी मुठभेड़ में सीबीआई का शिकंजा नरेंद्र मोदी के दिल-अजीज मंत्री अमित शाह पर कसा। तो बीजेपी की बत्ती गुल हो गई। नरेंद्र मोदी की लिखी स्क्रिप्ट पर मंथन करने आडवाणी के घर बीजेपी की शीर्ष चौकड़ी बैठी। तो आर-पार का फैसला हो गया। बीजेपी के अरुण जेतली और सुषमा स्वराज ने मोर्चा संभाला। तो सीबीआई के बेजा इस्तेमाल का आरोप लगाया। सुषमा बोलीं- विरोधियों के खिलाफ सीबीआई के दुरुपयोग का यह ताजा उदाहरण। सो ऐसे प्रदूषित वातावरण में हम चारों का पीएम के घर लंच पर जाना जंचेगा नहीं। पर सवाल, क्या एक आरोपी मंत्री का इतने बड़े स्तर से बचाव जंच रहा? सीबीआई ने गुजरात के गृह राज्यमंत्री को दो बार समन किया। पर अमित शाह क्यों नहीं पहुंचे? अब सीबीआई ने बाकायदा चार्जशीट दाखिल कर दी। पर बीजेपी ने अमित शाह का इस्तीफा नहीं कराया। जबकि लालू-शिबू-जेपी जैसों के खिलाफ बीजेपी ने चार्जशीट पेश होते ही इस्तीफे की मांग की थी। खुद बीजेपी ऐसी नजीर पेश कर चुकी। उमा भारती जब मध्य प्रदेश की सीएम थीं। पर हुबली तिरंगा केस में फंसीं, तो बीजेपी ने रातों-रात इस्तीफा कराया। तब बीजेपी ने इस मुद्दे को खूब भुनाया। पर अब बीजेपी के चाल, चरित्र, चेहरे को क्या हो गया? अगर अमित शाह निर्दोष, तो सीबीआई के सामने आने से कतरा क्यों रहे? शाह कई दिनों से लापता, पर बीजेपी को फिक्र नहीं। गुजरात में मंत्री माया कोडनानी भी पहले ऐसे ही फरार हुई थीं। पर बाद में जेल जाना पड़ा। अब उसी राह पर अमित शाह। अगर अमित शाह सचमुच बेदाग, तो अदालत में दूध का दूध, पानी का पानी हो जाएगा। पर बीजेपी के शीर्ष नेता जिस तरह बचाव में उतरे, उसका क्या मतलब? अगर बीजेपी के आरोप को सच मान लें, तो सवाल- सीबीआई का बेजा इस्तेमाल कौन नहीं करता। अगर सीबीआई सचमुच कांग्रेस सरकार के इशारे पर शाह को फंसा रही होगी। तो कोर्ट में सीबीआई की कलई खुल जाएगी। अगर सीबीआई पर भरोसा नहीं, तो कम से कम कोर्ट पर बीजेपी को ऐतबार होगा। बीजेपी के इस आरोप में कोई दो-राय नहीं, सरकार सीबीआई का बेजा इस्तेमाल कर रही। सचमुच सीबीआई कहने भर को ‘ऑटोनॉमस बाडी’। केंद्र में जिसकी भी सरकार बनी, सीबीआई को भोंपू बनाया। जब भी राजनीतिक मुसीबत आन पड़ी, यही भोंपू बजा दिया। तभी तो सीबीआई डायरेक्टर की तैनाती में वफादारी मापदंड बन चुका। सीनियरिटी अब कुछ भी नहीं। सरकार हमेशा ऐसा डायरेक्टर ढूंढती, जो इशारे पर काम करे। तभी तो अपने राजस्थान काडर के एम.एल. शर्मा डायरेक्टर नहीं बन पाए। सीनियरिटी और अनुभव में शर्मा का नंबर था। पर डायरेक्टर बनाए गए शर्मा से एक साल जूनियर अश्विनी कुमार। जूनियर के अंडर में काम करना शर्मा को गवारा न हुआ। सो लंबी छुट्टïी पर चले गए। पर सीबीआई के बेजा इस्तेमाल में कोई राजनीतिक दल पाक-साफ नहीं। यूपी में बीजेपी से माया का गठजोड़ टूटा। तो एनडीए राज में ताज कॉरीडोर केस बन गया। जो अभी भी माया के गले की फांस। राष्टï्रपति चुनाव के वक्त माया-सोनिया मिलीं। तो बात बन गई थी। पर जब माया की मांग बढऩे लगी। तो रिश्तों में दरार आ गई। माया ‘आउट’ हुईं, तो एटमी डील के लिए मुलायम ‘इन’ हो गए। सो जब विश्वास मत का संकट आया, तो कांग्रेस ने माया को सीबीआई का हौवा दिखाया था। फिर कटमोशन के वक्त हुई सौदेबाजी भी जगजाहिर। तभी तो दस फरवरी 2009 को सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई को लताड़ पिलाई थी। जब एटमी डील की एवज में मनमोहन सरकार मुलायम को बचाने की कोशिश कर रही थी। सो कोर्ट ने सीधा सवाल पूछा था- ‘आप केंद्र सरकार के पास क्यों गए? मेरे पास क्यों नहीं आए? आप केंद्र सरकार और विधि मंत्रालय के इशारे पर काम कर रहे। अपनी मर्जी से नहीं। अब इसका (सीबीआई)भगवान ही मालिक।’ पर सीबीआई सुधरे भी कैसे। जब राजनीतिक आका गर्दन नापने को बैठे हुए। तभी तो कांग्रेस हो या बीजेपी, विपक्ष में रहते सीबीआई नहीं सुहाती। सो सचमुच सीबीआई का मतलब कांग्रेस-बीजेपी ऑफ इनवेस्टीगेशन होना चाहिए। अगर बीजेपी के अमित शाह पाक-साफ, तो भगोड़ा क्यों बने हुए? पर अब अमित शाह की गिरफ्तारी तय हो चुकी। सो बीजेपी की मुश्किल महज अमित शाह नहीं। अगर बीजेपी का शीर्ष नेतृत्व सीधे मैदान में उतरा, तो अमित की खातिर नहीं। अलबत्ता एसआईटी के सामने नरेंद्र मोदी की पेशी के बाद अब सोहराबुद्दीन फर्जी मुठभेड़ में सीबीआई का अमित शाह तक पहुंचना सीधे मोदी को झुलसाएगा। गृह राज्यमंत्री अगर पूरे मामले में लिप्त, तो सवाल गुजरात की समूची संवैधानिक व्यवस्था पर। सो बीजेपी को अमित शाह की उतनी फिक्र नहीं, जितनी हिंदू हृदय सम्राट नरेंद्र मोदी की। आडवाणी-गडकरी-जेतली-सुषमा का मनमोहन के खिलाफ एलान-ए-जंग भविष्य की तैयारी। ताकि जब तक जांच की आंच मोदी तक पहुंचे, मामला पूरी तरह से राजनीति के रंग में रंग जाए।
---------
23/07/2010

Thursday, July 22, 2010

मुरली और अमेरिका की फिरकी से हारा भारत!

होम मिनिस्ट्री क्या कांग्रेस या सरकार की शान नहीं? चिदंबरम ने कछुआ चाल वाली मिनिस्ट्री को खरगोश बना दिया। फिर भी दिग्विजय सिंह हों या एसएम कृष्णा, ऐसे उपहास क्यों बना रहे। जैसे होम मिनिस्ट्री कोई मिनिस्ट्री नहीं, अलबत्ता समूचे गांव की भौजाई हो। यों दिग्विजय के बयान के बाद कांग्रेस ने अपने बड़बोले नेताओं की नकेल फिर कसी। पर मनमोहन राज में बयान बहादुरों की कमी नहीं। गुरुवार को होम मिनिस्टर पी. चिदंबरम ने भी नाम लिए बिना चुनौती दे डाली। अगर उनसे बेहतर होम मिनिस्ट्री संभाल सकते, तो बन जाएं मंत्री। पर अब विदेश मंत्री एसएम कृष्णा के निशाने से कैसे निपटेंगे चिदंबरम। भारत-पाक की 15 जुलाई की वार्ता नाकाम हुई। अगले दिन पाकिस्तान के विदेश मंत्री शाह महमूद कुरैशी ने कैसे भारत और कृष्णा को पानी पी-पीकर कोसा, सबने देखा। अपने कृष्णा इस्लामाबाद से जैसे ही दिल्ली उतरे। तो कुरैशी के बयानों का जवाब दिया। होम सैक्रेट्री जीके पिल्लई के बयान की तुलना हाफिज सईद से किए जाने को गलत ठहराया। वार्ता की रात दोनों विदेश मंत्री जब साझा प्रेस कांफ्रेंस कर रहे थे। तो कुरैशी ने कृष्णा की मौजूदगी में भारत के होम सैक्रेट्री के बयान की तुलना आतंकी हाफिज से की थी। पर कृष्णा ने तब चुप्पी साध ली। फिर दिल्ली हवाई अड्डे पर सफाई दी, वहीं जवाब देकर माहौल खराब नहीं करना चाहते थे। यानी कृष्णा ने पिल्लई के बयान को गैरवाजिब नहीं ठहराया। पर जैसे ही अंतर्राष्ट्रीय कांफ्रेंस में काबुल गए। अमेरिकी विदेश मंत्री हिलेरी क्लिंटन से मुलाकात हुई। फिर कृष्णा तो कृष्णा, मनमोहन भी कुरैशी की भाषा बोलने लगे। अब कृष्णा भी विदेश मंत्री स्तर की बातचीत का जायका खराब करने का दोष होम सैक्रेट्री के सिर मढ़ रहे। तो मनमोहन सिंह ने भी पिल्लई को फटकार लगाई। पिल्लई के बयान को कृष्णा-मनमोहन वार्ता के माहौल को बिगाडऩे वाला मान रहे। कृष्णा ने तो यहां तक कह दिया- अगर वह होम सैक्रेट्री होते, तो डेविड हेडली के खुलासे पर बयान नहीं देते। अब कोई पूछे, डेविड हेडली से पूछताछ किसलिए की? क्या हेडली का खुलासा देश के राष्ट्रीय संग्रहालय में रखना चाहती सरकार? क्या हेडली का बयान केबिनेट मीटिंग में होने वाली बहस जैसा, जिसका खुलासा नहीं किया जा सकता? आखिर अमेरिका या पाकिस्तान को खुलासे पर एतराज क्यों? क्या भारत की अवाम को सच्चाई जानने का हक नहीं? अमेरिका का क्या, 9/11 के बाद उसके घर में कोई आतंकी हमला नहीं हुआ। सो उसने आतंकी डेविड हेडली से समझौता कर लिया। पर भारत ने कई आतंकी हमले झेले। सो आतंक फैलाने वालों को बेनकाब करना भारत सरकार की जिम्मेदारी। क्या 26/11 के बाद अमेरिकी एफबीआई ने कसाब से पूछताछ नहीं की? अमेरिका के टाइम्स स्क्वायर में बिना फटा बम मिला। तो एफबीआई सीधे फैजल के पाकिस्तानी घर पहुंच गई। पर मुंबई के हमलावर पाकिस्तान में खुले आम घूम रहे। आईएसआई और हुक्मरान पूरी सरपरस्ती दे रहे। सो अपने होम सैक्रेट्री के बयान में कुछ गलत नहीं। ना ही गलत समय पर दिया गया बयान। अलबत्ता आतंकवाद के मुद्दे पर वार्ता को केंद्रित करने के लिए हेडली के खुलासे का सार्वजनिक होना जरूरी था। अगर पाकिस्तान ईमानदार होता, तो हेडली के खुलासे के मुताबिक जांच का भरोसा दिलाता। पर आईएसआई के खिलाफ आरोप कबूलने की हिम्मत पाकिस्तान के किसी भी हुक्मरान में नहीं। सो कुरैशी की बौखलाहट उनके हर बयान में दिख रही। अमेरिका भी अपना दोमुंहापन दिखा रहा। एक तरफ पाकिस्तान को धमकी, अगर अमेरिका में कोई आतंकी हमला हुआ, तो पाक को विनाशकारी परिणाम भुगतने होंगे। पर दूसरी तरफ भारत के मामले में पाकिस्तान को शह दे रहा। तभी तो कुरैशी ने वार्ता के बाद तेवर दिखाए, अगले दिन नरमी। अब फिर तेवर दिखाने लगे। पर मनमोहन सरकार और कृष्णा की यह कैसी कूटनीति? सचमुच अमेरिकी दबाव में कूटनीति की इंतिहा हो गई। अमेरिकी प्रवक्ता पीजे क्राउले ने हेडली के बयान के सार्वजनिक होने पर चिंता तक जता दी। आखिर कब तक अमेरिका के आगे दुम हिलाती रहेगी सरकार? क्या भारत का कोई अपना आत्म सम्मान नहीं? होम सैक्रेट्री पिल्लई ने कोई अपनी मर्जी से बयान नहीं दिया होगा। सरकार ने पूरी रणनीति बनाई होगी। पर अमेरिका ने झिडक़ी लगाई। तो सारा ठीकरा पिल्लई पर फोड़ दिया। याद है ना, कैसे अमेरिका ने अपनी जांच एजेंसी को बैरंग लौटाया था। हेडली से पूछताछ तो दूर, चेहरा तक नहीं देखने दिया था। पर भारत में मनमोहन को विपक्ष ने चौतरफा घेरा। तो मनमोहन ने ओबामा से बात की। पर नवंबर 2009 में एफबीआई के जरिए छनकर आए हेडली के बयान जब मीडिया में जारी हो गए। तो अमेरिका की नीति देखिए, भारत एजेंसी को हेडली से पूछताछ की रपट शेयर करने से भी इनकार कर दिया था। अब पूछताछ कर ली, तो अमेरिका ने शर्तों का पुलंदा थमा दिया। सो अब तय करना होगा, भारत की विदेश नीति अमेरिका बनाएगा या खुद भारत। याद है ना, शर्म अल शेख में मनमोहन पाक से बातचीत को राजी हुए। तो संसद में यह कहकर बचाव किया, आतंकवाद पर कार्रवाई के बिना सार्थक बातचीत संभव नहीं। पर पाक तो आतंक पर बातचीत ही नहीं करना चाहता। सो कृष्णा के बयान से तो यही लग रहा, जीती बाजी हार गया भारत। उधर श्रीलंका के गाले मैदान पर मुरली की फिरकी ने भारत की टीम को चित किया। तो कूटनीति में अमेरिका की फिरकी ने पाक के आगे भी भारत को झुका दिया। 'एसएमके' यानी शाह महमूद कुरैशी और एसएम कृष्णा की भाषा एक हो गई।
---------
22/07/2010