Tuesday, September 7, 2010

अब तो बीजेपी का चेहरा ही हो गया ‘झारखंडी’

चार महीने बाद ही कहावत दुबारा लिखनी पड़ेगी, ऐसा सोचा नहीं था। मशहूर कहावत है- भानुमती ने खसम किया, बुरा किया। करके छोड़ा, उससे बुरा किया। छोडक़र फिर पकड़ा, ये तो कमाल ही किया। झारखंड में सत्ता की खातिर बीजेपी-शिबू फिर साथ हो गए। तो इस कहावत को भी मात दे दी। पर जब कोई शर्म-हया बेच खाए, तो क्या थूकना-चाटना और क्या जूते-प्याज खाने वाली कहावत। यों राजनीति में कोई भजन करने नहीं आया। सबका लक्ष्य सत्ता हासिल करना ही होता। पर जब कोई खम ठोककर खुद को राजनीति की दुकानदारी से अलग सामाजिक ठेकेदारी की बात करे। अलग चाल, चरित्र, चेहरे का खम ठोके। तो ऐसे सवाल उठना लाजिमी। सो बीजेपी के लिए चाल, चरित्र, चेहरा ही डायन हो गईं। अगर बीजेपी खम ठोककर कांग्रेस की तरह राजनीति करे, तो इतनी टीका-टिप्पणी शायद ही हो। पर बीजेपी कंबल ओढक़र घी पीना चाहती। जैसा अबके झारखंड में हो रहा, हू-ब-हू यही कहानी कर्नाटक में हो चुकी। कर्नाटक की पिछली विधानसभा में तीनों बड़े दलों ने बारी-बारी सत्ता का जायका लिया। कांग्रेस-जेडीएस का गठजोड़ बीस महीने बाद टूटा। तो एचडी देवगौड़ा के बेटे कुमारस्वामी ने बीजेपी को सत्ता का टुकड़ा फेंका। तो बीजेपी बड़ा दल होने के बावजूद छोटेपन की भूमिका को राजी हो गई। पर बीस महीने बाद कुमारस्वामी ने दो अक्टूबर 2007 को कुर्सी नहीं छोड़ी। तो दोनों ने एक-दूसरे की लानत-मलानत करते हुए तलाक ले ली। सो राष्ट्रपति राज लग गया। पर करीब बीस दिन बाद ही देवगौड़ा ने फिर बीजेपी को समर्थन का भरोसा दिया। तो 28 अक्टूबर 2007 को बीजेपी के एक बड़े नेता ने दबी जुबान में कहा था- हवन तीन बजे न सही, छह बजे ही। जेडीएस ने हमारी बात मान ली, सो हम भी तो कोई सन्यासी नहीं, आखिर राजनीति इसलिए तो कर रहे। यही बात बीजेपी कभी खुलकर नहीं कहती। पर कर्नाटक में सात दिन बाद ही देवगौड़ा ने फिर गच्चा दे दिया। तो बेचारी बीजेपी मुंह में खून लगे शेर की तरह देवगौड़ा पर फिर दहाडऩे लगी। सो झारखंड में क्या होगा, यह तो बाद की बात। पर पिछले चार महीने में बीजेपी ने झारखंड की खातिर अपने सिद्धांत की बलि चढ़ा दी। झारखंड में जब बीजेपी ने शिबू संग पिछले साल दिसंबर में सरकार बनाई। तो कई बड़े नेताओं ने विरोध किया था। पर सरकार बन गई। तो 27 अप्रैल को लोकसभा में कटौती प्रस्ताव के वक्त शिबू ने मनमोहन सरकार के पक्ष में वोट कर अपनी पतंग कटवा ली। बीजेपी ने इमरजेंसी मीटिंग कर समर्थन वापसी का एलान कर दिया। पर शिबू सोरेन एंड सन्स ने बीजेपी को सीएम की कुर्सी का ऑफर दिया। तो सिद्धांत और नैतिकता की दुहाई देकर समर्थन वापसी का एलान करने वाली बीजेपी महज 24 घंटे में ही पलटी मार गई। फिर महीने भर बीजेपी-झामुमो के बीच गुरिल्ला युद्ध चला। तो बीजेपी का चेहरा और बेनकाब हो गया। शिबू सोरेन के चेहरे को तो अब नकाब की जरूरत ही नहीं। पर पिछली बार मीडिया में हुई फजीहत से बीजेपी अबके संभली हुई। झारखंड में जब तक झामुमो के संग गोटी फिट नहीं हो गई, खबरें लीक नहीं होने दीं। मंगलवार को अर्जुन मुंडा विधायक दल के नेता चुन लिए गए। फिर गवर्नर के सामने सरकार बनाने का दावा पेश हो गया। अब कोई पूछे, क्या जनहित में बीजेपी-शिबू ने हाथ मिलाया? अगर जनहित का ख्याल होता, तो सरकार गिरती ही क्यों। बीजेपी ने भले कटौती प्रस्ताव पर शिबू सोरेन के धोखे को आधार बनाया था। पर सीएम की कुर्सी देखते ही शिबू पर भरोसा हो गया। यानी झारखंड में जनता का नहीं, किस्सा सिर्फ कुर्सी का। बीजेपी के आका संघ परिवारी पिछली बार भी सरकार गंवाने के मूड में नहीं थे। पर सौदेबाजी में बाजी हाथ से छूट गई। सो अबके मौका मिला, तो बीजेपी तैयार हो गई। यों आडवाणी अभी भी खिलाफ। पर संघ को खुश करने और झारखंड पर अपने पूर्व के फैसले को जायज ठहराने के लिए नितिन गडकरी हाथ-पैर मार रहे। संघ को भी झारखंड में चल रही अपनी मुहिम की फिक्र। वैसे भी अयोध्या पर 17 सितंबर को आने वाले फैसले के बाद की पृष्ठभूमि तैयार हो रही। झारखंड में धर्मांतरण मुहिम रोकने का संघ अभियान तेजी से चल रहा। तो दूसरी तरफ विधायक बैठे-बैठे थक गए। पर अगले चुनाव की तैयारी के लिए बिना सरकार चंदा उगाही संभव नहीं। सो सबने आपस में तय कर लिया, आओ सरकार बनाएं। कुछ तुम कमाओ, कुछ हम। यानी स्वार्थ की खातिर बीजेपी-शिबू साथ आ रहे, जनहित कतई नहीं। अब गवर्नर एमओएच फारुख ने भी अपनी रपट केंद्र सरकार को भेज दी। बीजेपी की ओर से सीएम पद के उम्मीदवार अर्जुन मुंडा के पक्ष में 44 एमएलए के समर्थन को माना। सो केबिनेट आज-कल में शायद राष्ट्रपति राज उठा ले। कांग्रेस भी यही रणनीति अपना रही। या यों कहें, कांग्रेस भी चाह रही, गुरुजी संग बीजेपी की सरकार बन जाए। ताकि बीजेपी पूरी तरह सत्तालोलुप साबित हो जाए। सो झारखंड की हलचल पर कांग्रेस कोर ग्रुप की अहम बैठक में पीएम, सोनिया, चिदंबरम, एंटनी ने मंथन किया। इधर झारखंड कांग्रेस के प्रभारी केशव राव ने दो-टूक कह दिया- हमारे पास नंबर नहीं, सो सरकार नहीं बनाएंगे। पर बीजेपी-शिबू की सरकार स्थायी नहीं होगी। अब कांग्रेस भले बीजेपी को बेनकाब करने की रणनीति बनाए। पर बीजेपी को क्या फर्क पड़ता। अब तो उसने भी अपना चेहरा ‘झारखंडी’ बना लिया। जैसे झारखंड अपने गठन से अब तक स्थिर नहीं। वैसे ही बीजेपी का ‘चेहरा’ भी हो गया।
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07/09/2010

Monday, September 6, 2010

कार्यपालिका पर कंट्रोल नहीं, कोर्ट को नसीहत

नक्सली कब्जे से बिहार के तीनों पुलिसिए रिहा हो गए। पर नक्सलियों ने अपना बर्बर चेहरा फिर दिखा दिया। चार बंधकों में से एक सिपाही लूकस टेटे की हत्या कर दबाव बनाया। पर दबाव रंग न लाया, तो आखिर में सारे बंधक छोड़ दिए। ताकि आम जनता की सहानुभूति बटोर सकें। पर नीतिश कुमार ने चुनौती दी, गर नक्सलियों को जनसमर्थन का इतना भरोसा। तो चुनावी समर में उतरकर लड़ें। शाम होते-होते चुनाव आयोग ने भी तारीखों का एलान कर डुगडुगी बजा दी। पर नक्सली खुद में इतने कन्फ्यूज्ड, शायद ही चुनाव लड़ें। अब चुनाव में कहीं गड़बड़ी न हो, सो आयोग ने छह फेज में चुनाव कराने का फैसला किया। आयोग ने तारीखों के चयन में त्योहार का ख्याल रखने की दलील दी। पर शायद आयोग बिहार के त्योहार को समझ ही नहीं पा रहा। दीपावली और छठ के बीच नौ नवंबर को वोटिंग होगी। जिस दिन छठ व्रत रखने वाले महिला-पुरुष उपवास पर होंगे। पर आयोग की तो छोडि़ए, यहां तो अपनी सरकार देश को उपवास कराने पर तुली हुई। भले खुले में पड़ा सरकारी अनाज सड़ जाए, पर मुफ्त नहीं बंटेगा। सुप्रीम कोर्ट ने सड़ते अनाज की खबरों के बाद आदेश क्या दिया। समूची सरकार बौखला गई। पहली बौखलाहट महंगाई बढ़ाने वाले मंत्री शरद पवार ने दिखाई। तो कोर्ट के आदेश को महज सलाह बता निकल लिए। पर मानसून सत्र के आखिरी दिन सुप्रीम कोर्ट ने ठोक बजाकर सरकारी वकील को बताया- जाकर अपने मंत्री को बता दो, मुफ्त अनाज बांटने की सलाह नहीं आदेश दिया। सो संसद में हंगामा बरपा। तो शरद पवार ने आदेश पालन करने का भरोसा दिया। पर सोमवार को साफ हो गया। सुप्रीम कोर्ट के आदेश से सिर्फ पवार नहीं बौखलाए, अलबत्ता समूची सरकार सकते में। मनमोहन ने सोमवार को संपादकों के एक समूह से मुलाकात की। तो दिल का दर्द जुबां से छलक पड़ा। भले सरकारी व्यवस्था आउट ऑफ कंट्रोल हो। पर मनमोहन ने सुप्रीम कोर्ट को लाइन ऑफ कंट्रोल दिखाया। कोर्ट को नीतिगत मामलों में दखल न देने की नसीहत दी। दो-टूक कह दिया- मुफ्त अनाज बांटना संभव नहीं। मनमोहन के इनकार की दलील देखिए। बोले- सेंतीस फीसदी बीपीएल हैं, सो मुफ्त अनाज कैसे बांटा जा सकता। मुफ्त बांटेंगे, तो किसानों को अधिक पैदावार के लिए प्रेरित करने के उपाय फेल हो जाएंगे। फिर अनाज ही नहीं होगा, तो क्या बांटेंगे। मतलब साफ- भले अनाज सड़ जाए, पर मुफ्त नहीं देंगे। सुप्रीम कोर्ट की भावना और मनमोहन की भावना का फर्क देखिए। माना, कोर्ट को नीतिगत मामलों में दखल नहीं देना चाहिए। संविधान में भी कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका की लक्ष्मण रेखा तय। तीनों के बीच संतुलन ऐसा, अगर कोई एक नाकाम हो, तो दूसरा हावी हो जाएगा। यानी कार्यपालिका लंबी तानकर सोएगी। तो न्यायपालिका को दखल का मौका मिलेगा। पर मनमोहन ने कार्यपालिका में सुधार का कोई एजंडा नहीं रखा। अलबत्ता न्यायपालिका को हद में रहने की नसीहत दी। पर सवाल, खुद पीएम 37 फीसदी बीपीएल की बात कर रहे। तो क्या यह देश और पीएम के लिए शर्म की बात नहीं कि बीपीएल के रहते भी देश में अनाज सड़ रहा? आजादी के 63 साल बाद भी बीपीएल परिवारों की संख्या इतनी अधिक, क्या कार्यपालिका की संवेदनहीनता का सबूत नहीं? पिछले छह साल से महंगाई कोहराम मचा रही। पर सरकार सिर्फ जुबानी दिलासा दिला रही। क्यों नहीं पीडीएस को दुरुस्त करने का कदम उठाया मनमोहन ने? न्यायपालिका को कार्यपालिका में दखल देने का कोई शौक नहीं। अलबत्ता हमेशा ऐसा काम करती, जिससे आ बैल मुझे मार वाली कहावत चरितार्थ हो जाती। न्यायपालिका को नसीहत कोई नई बात नहीं। सनद रहे, सो बता दें। दस दिसंबर 2007 को खुद सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस ए.के. माथुर और मार्कंडेय काटजू की बैंच ने न्यायपालिका को हद में रहने की नसीहत दी थी। सो तब भी राजनीतिक बहस छिड़ी। तो राजनेताओं के अहं का कीड़ा कुलबुलाने लगा। कोर्ट का फैसला मनमाफिक हो, तो ठीक। वरना जुडीशियल एक्टिविज्म का शिगूफा छेडऩे में नेतागण माहिर। पर सवाल, कोर्ट दखल क्यों देता? स्कूलों में एडमिशन हो या सरकारी अस्पतालों में इलाज, आम नागरिक के साथ कैसा व्यवहार होता, सभी जानते। पर कार्यपालिका ने कभी पुख्ता बंदोबस्त क्यों नहीं किया? अब अगर कोई अदालत का दरवाजा खटखटाए और अदालत आदेश दे, तो एक्टिविज्म की बात होने लगती। क्या जनता को कोर्ट से गुहार लगाने का हक नहीं? क्या न्यायपालिका में भी नेताओं की मर्जी चले? जैसा 1973 और 1977 में हो चुका। जब 1973 में वरिष्ठता के आधार पर जस्टिस शेलट, हेगड़े और ग्रोवर का नंबर था। पर तब इन तीनों से जूनियर ए.एन. रे को चीफ जस्टिस बना दिया। सो तीनों ने इस्तीफा दे दिया। इसी तरह 1977 में रे के बाद एच. आर. खन्ना का नंबर था। पर बनाए गए मिर्जा हमीदुल्ला बेग। सो खन्ना ने इस्तीफा दे दिया। पर पीआईएल के दौर से कोर्ट एक्टिव हुआ। सरकारी तंत्र ने गलतियों पर परदा डालने की कोशिश की। तो न्यायपालिका ने हथौड़ा चलाया। अगर कोर्ट एक्टिव न होता, तो जैन हवाला, सेंट किट्स मामला, चारा घोटाला, विचाराधीन कैदियों का मामला जैसे कई अहम केस फाइलों में ही दब जाते। पर कोर्ट ने नजीर पेश की। कार्यपालिका की पोल खुली, जनता ने कोर्ट का साथ दिया। सो नेताओं का भडक़ना लाजिमी।
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06/09/2010

Friday, September 3, 2010

वर्किंग कमेटी टाल बीजेपी ने खुद की खोली पोल

तो सोनिया गांधी का निर्वाचन भी निपट गया। बारिश ने भले जश्न का माहौल फीका कर दिया। पर सोनिया ने हमेशा की तरह रंग चढ़ा दिया। समारोह की शुरुआत वंदे मातरम से हुई, तो समापन जन, गण, मन से। सचमुच सोनिया ने जब राजनीतिक सफर की शुरुआत की, तब विपक्ष के कई थपेड़े झेले। पर हार नहीं मानी। सो कांग्रेसियों की खातिर सोनिया सफलता का पर्याय बन चुकीं। सोनिया ने निर्वाचन का सर्टिफिकेट हासिल करने के बाद कोई लंबा-चौड़ा भाषण नहीं फेंका, जैसा और पार्टियों के नेता फेंकते। अलबत्ता मंच पर आईं, सबका आभार जताया। बोलीं- अपने टर्म में मैंने महसूस किया कि अध्यक्ष पद देश के प्रति बड़ी जिम्मेदारी। आज कांग्रेस हर कोने, वर्ग और पीढ़ी की भावना-आकांक्षा की प्रतीक। सत्ता में हों या विपक्ष में, हमें अपनी बड़ी भूमिका का अहसास रहना चाहिए। आखिर में कांग्रेस का झंडा बुलंद रखने का भरोसा दिखा धन्यवाद कर गईं। सोनिया ने चौथी बार कांग्रेस की कमान संभाल रिकार्ड कायम किया। पर गुरुवार को सोनिया को त्याग की नसीहत देने वाली बीजेपी शुक्रवार को खामोश रही। बीजेपी के कानूनदां प्रवक्ता रविशंकर प्रसाद ने कांग्रेस का संविधान पढक़र पेच निकाला था। परिवारवाद पर निशाना साधा। अपने नितिन गडकरी ने भी वही बात कही, जो अध्यक्षी संभालने के दिन कही थी। कहा था- बीजेपी में पोस्टर चिपकाने वाला मुझ जैसा छोटा कार्यकर्ता अध्यक्ष बन सकता है। पर कांग्रेस अध्यक्ष के लिए नेहरू-गांधी खानदान का होना जरूरी। यानी बीजेपी ने शीर्ष स्तर से कांग्रेस के लोकतंत्र का मखौल उड़ाया। सो कल यहीं पर लिखा था- कांग्रेस में चेहरा, तो बीजेपी में मोहरा का लोकतंत्र। कैसे कांग्रेस खुद को नेहरू-गांधी परिवार के साये से बाहर नहीं निकाल पा रही। तो बीजेपी में संघ की मर्जी के बिना पत्ता भी नहीं हिलता। सो कल आपको बताया था, कैसे संघ हमेशा अपने मोहरे बीजेपी में फिट करता। सोनिया गांधी का तो औपचारिक चुनाव हुआ। पर बीजेपी में गडकरी पहले अध्यक्ष बने, फिर चुनाव हुआ। सो वर्करों पर अपनी मर्जी थोपने में कोई पीछे नहीं। बीजेपी में तो आज भी संगठन महासचिवों का पद संघ के पूर्णकालिक वर्कर के लिए आरक्षित। यानी बीजेपी भले स्वतंत्र संगठन हो, पर उसे चलाने वाला सीईओ संघ तैनात करता। अगर बीजेपी के वर्करों को इस दलील पर एतराज हो, तो शुक्रवार की एक कहानी देख लें। कहते हैं ना, सांच को आंच नहीं। बीजेपी ने गुरुवार को सोनिया के चयन को अलोकतांत्रिक ठहराने की कोशिश की। पर देर रात जब झंडेवालान में नितिन गडकरी, अरुण जेतली और सुषमा स्वराज की संघ के सरकार्यवाह भैयाजी जोशी से मीटिंग हुई। तो बीजेपी की ऐसी क्लास लगी, शुक्रवार को पौ फटते ही कोर ग्रुप की मीटिंग बुलानी पड़ी। बीजेपी ने 18-19 सितंबर को जम्मू में वर्किंग कमेटी का फैसला कर लिया था। तैयारियां शुरू हो गई थीं। पर संघ ने लताड़ लगाई। पूछा, किस सोच से 18-19 सितंबर को वर्किंग कमेटी करने जा रहे? संघ ने बीजेपी नेताओं को दो-टूक कह दिया- अयोध्या मामले पर 17 सितंबर को कोर्ट का फैसला आ रहा। आप लोगों को दिल्ली में बैठकर आगे की रणनीति बनानी चाहिए। पर आप जम्मू में राजनीतिक-आर्थिक और आंतरिक सुरक्षा का प्रस्ताव पारित करने जा रहे। अब बीजेपी को काटो, तो खून नहीं। सो शुक्रवार को तडक़े एलान हो गया- वर्किंग कमेटी 18-19 सितंबर को नहीं होगी। नई तारीख का एलान बाद में करेंगे। अब कोई गडकरी से पूछे, क्या इसी लोकतंत्र की बात कर रहे थे? खुद में दम नहीं, पर लोकतांत्रिक संगठन का दंभ भर रहे। गडकरी को अध्यक्ष बने साढ़े आठ महीने हो गए। पर क्या यही उपलब्धि? यों गुरुवार को बीजेपी ने कांग्रेस पर चुटकी ली थी। पर शुक्रवार को बीजेपी की चुटकी बीजेपी वालों ने ही ली। गडकरी की उपलब्धि यही, पहली बार आडवाणी खुद चलकर गडकरी के घर हुई कोर ग्रुप की मीटिंग में पहुंचे। वह भी बारहवीं मंजिल पर किराये वाले घर में। राजनाथ सिंह जब तक अध्यक्ष रहे, या तो खुद आडवाणी के घर गए या बीजेपी दफ्तर में ही मीटिंग करनी पड़ी। पर गडकरी ने साढ़े आठ महीने में ही यह उपलब्धि हासिल कर ली। यों यह तो महज चुटकी। पर सच्चाई यही, कोई भी पार्टी लोकतंत्र को तवज्जो नहीं देती। कांग्रेस तो खम ठोककर परिवार के प्रति अपनी निष्ठा जाहिर कर चुकी। पर बीजेपी नीतिगत मामलों पर संघ से दूरी का दंभ भरती। अब जब वर्किंग कमेटी तक की तारीख संघ तय करे, तो बीजेपी किस मुंह से अपनी बड़ाई कर रही? संघ के बीजेपी में दखल का खुल्लमखुल्ला इजहार आडवाणी 16 सितंबर 2005 की चेन्नई वर्किंग कमेटी में कर चुके। जब पानी पिये बिना ही संघ को कोसा था। संघ के दखल से इतने परेशान थे कि पानी पी-पीकर कोसने की फुर्सत नहीं मिली। अब जिस अयोध्या मामले पर आने वाले अदालती फैसले के मद्देनजर संघ ने बीजेपी की वर्किंग कमेटी टलवाई। उसी संघ के आनुषांगिक संगठन आपस में भिड़ते दिख रहे। विश्व हिंदू परिषद विपरीत फैसले की स्थिति में साधु-संतों को आगे करने की रणनीति बना रहा। तो बीजेपी एक बार फिर काठ की हांडी चढ़ाने की सोच रही। पर विहिप ने कह दिया- अब मंदिर मामले में बीजेपी दखल न दे। सो अयोध्या पर फैसला जब आएगा, तब आएगा। फिलहाल बीजेपी के सिर से खिजाब का रंग उतर गया। चौबीस घंटे भी न हुए, आईने की तरह साफ- अगर कांग्रेस का रिमोट दस जनपथ में, तो बीजेपी का रिमोट नागपुर के रेशमबाग में।
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03/09/2010

Thursday, September 2, 2010

कांग्रेस में ‘चेहरा’, बीजेपी में ‘मोहरा’ का लोकतंत्र

सोनिया गांधी का अध्यक्ष चुना जाना अब महज रस्म। रमजान के आखिरी शुक्रवार को बाकायदा एलान हो जाएगा। पर गुरुवार को सोनिया दरबार में मत्था टेकने को कांग्रेसियों की बेकरारी खूब दिखी। कतार ऐसी, मंत्री पर संतरी भारी पड़े। चीफ मिनिस्टर हों या केबिनेट मंत्री या सोनिया के किचिन केबिनेट के नेता। या फिर देश भर से पहुंचा हुजूम। दस जनपथ में जाने को सबको अपनी बारी का इंतजार करना पड़ा। दिल्ली की गर्मी और उमस भी एयरकंडीशंड में बैठने वाले नेताओं का हौसला पस्त नहीं कर पाई। ऐसी भक्ति गुरुवार को या तो मथुरा-वृंदावन के मंदिरों में दिखी या दस जनपथ पर। कांग्रेसी नेताओं के चेहरों पर वही भाव दिखे, जो देश भर में दही-हांडी फोडऩे वाले ग्रुपों के। पर सब नंबर से अंदर गए। नामांकन के सैट पर मैडम की मंजूरी ली। फिर ऑस्कर फर्नांडिस को सौंप आए। कुल 56 सैट में परचे आए। पर एक परचा खानापूर्ति पूरी न होने की वजह से खारिज हो गया। किसी भक्त ने अपना चेहरा दिखाने के लिए हड़बड़ी में यों ही सैट तैयार कर लिया होगा। पर बात सैट की नहीं, माइंडसैट की। परिवारवाद राजनीति की सैट धारणा बन चुकी। परिवार-परिवार खेलने में कोई राजनीतिक दल पीछे नहीं। मुलायम सिंह के बेटे अखिलेष, कल्याण सिंह के बेटे राजबीर, राजनाथ सिंह के बेटे पंकज, लालजी टंडन के बेटे गोपाल जैसे कई नेता। अपने राजस्थान में जसवंत-मानवेंद्र, वसुंधरा-दुष्यंत जैसे कई। सो परिवारवाद तो राजनीति में संस्था बन चुका। जब बीजेपी पर परिवारवाद का आरोप लगता, तो बीजेपी बचाव में कहती- नेता का बेटा नेता नहीं बनेगा, तो क्या बनेगा। पर अब सोनिया गांधी के चौथी बार कांग्रेस अध्यक्ष चुना जाना तय हो गया, तो बीजेपी की बौखलाहट कहें या घबराहट, यह आप ही तय करिए। जिन सोनिया गांधी को बीजेपी ने गूंगी गुडिय़ा कहा, उसी गुडिय़ा ने 2004 के आम चुनाव में बीजेपी को पुडिय़ा बनाकर फेंक दिया। बीजेपी फील गुड करती रह गई, जनता ने सोनिया के ऊपर हुए राजनीतिक प्रहार को खुद पर हमला माना। याद है ना 2004 के चुनाव में विदेशी मूल का मुद्दा कितना हावी था। बीजेपी के नेताओं ने सोनिया को कई अपशब्द भी कहे। इतना ही नहीं, चुनाव हारने के बाद बौखलाई बीजेपी की दो वरिष्ठ नेत्रियों ने जो सिर मुंडाने का तांडव किया, वह इतिहास बन चुका। पर 2007 में सुप्रीम कोर्ट में सोनिया के विदेशी मूल पर याचिका दायर हुई। तो चीफ जस्टिस के.जी. बालाकृष्णन ने कहा था- विदेशी मूल के किसी व्यक्ति पर संवैधानिक पाबंदी नहीं। इससे पहले हाईकोर्ट ने याचिका ठुकरा वसुधैव कुटुंबकम की बात कही थी। पर अब विदेशी मूल का मामला बीजेपी की डिक्शनरी से गायब हो चुका। सो सवाल विदेशी मूल का नहीं। गुरुवार को बीजेपी ने कांग्रेस के अध्यक्ष पद पर सोनिया के चुनाव पर फब्ती कसी। यों संगठन चुनाव हर पार्टी की अंदरूनी प्रक्रिया। कौन अध्यक्ष बनेगा, यह अंदरूनी तौर पर ही तय होता। सो लोकतांत्रिक प्रक्रिया का दंभ भरना तो हर पार्टी का ढकोसलापन। पर बीजेपी के रविशंकर प्रसाद बोले- पीएम पद की तरह अध्यक्ष पद का त्याग करके दिखाएं सोनिया, तब लोकतांत्रिक प्रक्रिया दिखेगी। बीजेपी ने कांग्रेस नेताओं को भी ललकारा। कहा- सोनिया को चुनौती देने की हिम्मत किसी में नहीं। यों बात सोलह आने सही। पर कोई पूछे, बीजेपी के किस अध्यक्ष के चुनाव में वोटिंग की नौबत आई? सीताराम केसरी और सोनिया के पहली बार के चुनाव में बाकायदा वोटिंग हुई थी। पर बीजेपी की दलील, हर बार नया अध्यक्ष बना। कांग्रेस संविधान में ब्लाक, जिला और प्रदेश अध्यक्ष के लिए दो साल का टर्म फिक्स, तो राष्ट्रीय अध्यक्ष के लिए क्यों नहीं? यानी बीजेपी के निशाने पर नेहरू-गांधी परिवार। बीजेपी का अंदरूनी लोकतंत्र कैसा, यह किसी से छुपा नहीं। सो बीजेपी की दलील पर कहावत याद आ गई- छज बोले, तो बोले, छलनी भी बोले, जिसमें खुद हजारों छेद। बीजेपी ने कांग्रेस के परिवारवाद को आड़े हाथों लिया। पर भूल गई, बीजेपी का अध्यक्ष भले कोई नेता बनता हो, पर बनता वही है, जिसे संघ चाहता। बीजेपी में अध्यक्ष ही नहीं, पार्टी का हर नीतिगत फैसला संघ की सहमति के बाद ही लिया जाता। नितिन गडकरी की अध्यक्ष पद पर ताजपोशी कार्यकर्ताओं की मंजूरी से नहीं हुई। अलबत्ता संघ ने नागपुर से दिल्ली भेजा। पर हश्र क्या हुआ, खुद गडकरी अच्छी तरह जानते। अपना दर्द कई बार नागपुर में करीबियों को बता चुके। कैसे बीजेपी का चेहरा बनने आए थे, पर मोहरा बनकर रह गए। झारखंड में शिबू संग सरकार का फैसला गडकरी के पहुंचने से पहले ही हो चुका था। मीटिंग में गडकरी पहुंचे, तो एलान करने का जिम्मा सौंप दिया गया। यों बीजेपी के ऐसे लोकतांत्रिक किस्से कई। पर अगर बीजेपी ने फब्ती कसी, तो कांग्रेस ने भी कोई लोकलिहाज नहीं किया। अलबत्ता दरबारियों ने पलट कर कह दिया- चार बार नहीं, मौका मिला तो चालीस बार सोनिया को ही अध्यक्ष बनाएंगे। मतलब साफ, कांग्रेसियों को नेहरू-गांधी खानदान का एक चेहरा चाहिए। यानी लोकतंत्र राजनीतिक दलों में सिर्फ कहने की बात। अलबत्ता दो-चार लोग बैठकर एजंडा तय करते। बाकी लाखों-करोड़ों वर्कर मानने को मजबूर। सो कुल मिलाकर कांग्रेस को हमेशा एक चेहरे की जरूरत। तो बीजेपी में बदलते चेहरे के बावजूद नेतृत्व मोहरा ही दिखता।
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02/09/2010

Wednesday, September 1, 2010

विपक्ष जीता, न सरकार, हार गया आम आदमी

 रहीम का एक दोहा है- बड़े बड़ाई ना करें, बड़े न बोलें बोल। रहिमन हीरा कब कहे, लाख टका मा मोल। पर अपने राजनेता जनता को ईवीएम का बटन दबाने के सिवा कोई हक नहीं देना चाहते। सो मानसून सत्र में किसका मान बढ़ा और किसका नहीं, यह खुद ही तय कर लिया। बीजेपी ने तो बेहिचक कह दिया- संसद सत्र में विपक्ष के बिना सरकार सून रही। यानी जहां-जहां बीजेपी ने साथ दिया, सरकार आगे बढ़ी। जहां अड़ंगा डाला, पीछे हट गई। पर संसदीय कार्य मंत्री पवन बंसल भी पलटवार करने से नहीं चूके। बोले- लोकसभा में 45 घंटे, राज्यसभा में 35 घंटे हंगामे में बरबाद हुए। फिर भी लोकसभा में बीस और राज्यसभा में दो बिल पारित कराए। यों सत्तानशीं बंसल के जवाब से कोई हैरत नहीं। सत्ता में आने के बाद राजनीतिक दल जनता के प्रति उदासीन हो ही जाते। पर विपक्ष का आत्ममुग्ध होना कितना न्यायोचित? सत्र निपटा, तो बीजेपी के दोनों नेता सुषमा स्वराज और अरुण जेतली उपलब्धि का पिटारा खोलकर बैठ गए। कहा- मानसून सत्र का निचोड़ यही, हम जीते, सरकार हारी। सुषमा बोलीं- सरकार के लिए यह सत्र रेफर एंड डेफर वाला रहा। जहां हमने साथ दिया, सरकार ने बिल पारित कराया। जहां विरोध किया, सरकार ने बिल वापस ले लिया। बतौर विपक्ष बीजेपी ने अपनी भूमिका पर आत्मसंतोष जताया। कहा- हमने सरकार को कॉमनवेल्थ, भोपाल गैस कांड, एटमी जनदायित्व बिल पर घेरा। जहां सरकार ने हमारी बात मानी, समर्थन दिया। और जहां सरकार और अन्य विपक्षी दलों ने बीजेपी का साथ नहीं दिया, वहां भी हम अपनी बात पर डटे रहे। यानी अगर बीजेपी की सारी दलील मान लें, तो मानसून सत्र में वही हुआ, जो बीजेपी ने चाहा। तो सवाल- आम आदमी को महंगाई से निजात क्यों नहीं दिला पाई? क्यों नियम 184 और कामरोको प्रस्ताव से हटकर सरकारी प्रस्ताव के आगे घुटने टेके? जम्मू-कश्मीर की बहस पर मंत्री का जवाब क्यों नहीं ले पाई? भूमि अधिग्रहण पर यूपी के किसानों ने 15 अगस्त के दिन गोलियां खाईं। पर विपक्ष ने सिर्फ संसद घेराव कर अपनी चादर क्यों फेंक दी? क्यों नहीं किसानों के लिए आर-पार की बात हुई? क्यों नहीं मौजूदा सत्र में ही भूमि अधिग्रहण बिल लाने की रार ठानी? बिल तो 2007 से ही तैयार। क्यों नहीं एटमी जनदायित्व बिल जैसी रार ठानी? क्या बराक ओबामा को खुश करने के लिए ही सरकार से हाथ मिलाया? भोपाल गैस त्रासदी की चर्चा से क्या निकला? सरकार ने तो दो-टूक कह दिया- किसके फोन से एंडरसन को छोड़ा और भगाया गया, इसका रिकार्ड नहीं। फिर भी बीजेपी ने एटमी जनदायित्व बिल पर इतनी जल्दबाजी क्यों होने दी? अगर बीजेपी चाहती, तो इसी बिल की एवज में आम आदमी की खातिर डील करती। पहले भूमि अधिग्रहण बिल लाने और महंगाई पर अंकुश की बात करती। पर विपक्ष ने ऐसा नहीं किया। सो बीजेपी मानसून सत्र को अपनी जीत बता इतनी आत्ममुग्ध क्यों, यह वही जाने। पर संसद तो लोकतंत्र का सबसे बड़ा मंदिर। संसद में किसने कैसी भूमिका निभाई, किसको कितने नंबर मिले, यह तय करने का हक जनता को। पर सरकार हो या विपक्ष, खुद ही हार-जीत तय कर रहे। सचमुच सरकार और विपक्ष की इस हार-जीत की लड़ाई में आम आदमी ठगा महसूस कर रहा। मानसून सत्र तो बीत गया, पर महंगाई लगातार डेंगू सा डंक मार रही। अब जरा हार-जीत की जंग में दोनों पक्षों का एक नमूना देखिए। मंगलवार को राज्यसभा में एजूकेशनल ट्रेबुनल बिल अटक गया। कांग्रेस के ही केशव राव ने मोर्चा खोला। तो बाकी विपक्ष भी उठ खड़ा हुआ। पर कपिल सिब्बल बिल पर वोटिंग को अड़ गए। सो संसदीय कार्य मंत्री पवन बंसल ने फौरन बात संभाली। सिब्बल को मनाने की कोशिश की। पर सिब्बल नहीं मान रहे थे। आखिर में बिल वापस लिया और गुस्से में सदन से बाहर निकल गए। सिब्बल की नाराजगी ऐसी, संसदीय कार्य मंत्री के फ्लोर मैनेजमेंट पर जेतली-सुषमा सरीखे सवाल उठा दिए। बुधवार को तो सिब्बल ने बाकायदा पीएम से मिल बंसल की शिकायत भी कर दी। पर बंसल ने भी जवाब देने में देर नहीं की। फ्लोर मैनेजमेंट को सिर्फ अपनी नहीं, बिल पेश करने वाले मंत्री की भी जिम्मेदारी बताई। अब सिब्बल बनाम बंसल में जीत सिब्बल की तो नहीं हुई। असल में जिस बिल पर सरकार में ही जंग छिड़ी, वह मामला सीधे राहुल गांधी से जुड़ा। स्टेंडिंग कमेटी की सिफारिशों को सिब्बल ने नजरअंदाज कर बिल पेश किया। इसी कमेटी में राहुल गांधी भी मेंबर। सो केशव राव ने कड़ा एतराज जताया। विपक्ष के नेता अरुण जेतली सिब्बल के घमंड से तो आहत बैठे ही थे। सिब्बल सहयोग मांगने के लिए विपक्ष के नेता के पास खुद नहीं गए। अलबत्ता एक अफसर भेज दिया। अब नेहरू-गांधी परिवार का मामला हो, तो सिब्बल की क्या बिसात। सो बंसल ने पीएम से हुई शिकायत की परवाह नहीं की। सिब्बल के धुर विरोधी जनार्दन द्विवेदी ने भी बंसल के सुर में सुर मिलाया। कहा- लोकतंत्र में सबको अपनी बात कहने का हक। केशव राव ने कुछ गलत नहीं किया। अब जरा इसी बिल पर विपक्ष की भूमिका देखिए। जेतली-सुषमा ने सरकार के फ्लोर मैनेजमेंट पर सवाल तो उठाया। पर खुद बीजेपी का यह कैसा मैनेजमेंट, जो लोकसभा में बिल पास हो गया, राज्यसभा में अटक गया। यों सुषमा बोलीं- लोकसभा में हमारे पास नंबर कम थे। पर विपक्ष ने पहले ही राज्यसभा में अटकाने की धमकी दे दी होती, तो बिल राज्यसभा तक पहुंचता ही क्यों। पर अब बीजेपी भागने का रास्ता ढूंढ रही।
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01/09/2010

Tuesday, August 31, 2010

अनाज तो बंट जाएगा, पर व्यवस्था की सड़ांध का क्या?

अंत भला, तो सब भला। मानसून सत्र का परदा गिर गया। पर आखिरी दिन सांसदों ने जमकर काम किया। सत्तापक्ष ने ताबड़तोड़ बिल निपटाए। तो विपक्ष भी जनहित के मुद्दे उठाने में पीछे नहीं रहा। सो बीजेपी अपनी पीठ आप ठोक रही। तो सरकार भी अपना काम निपटाने को उपलब्धि बता रही। पर सचमुच मानसून सत्र से अवाम को क्या मिला? महंगाई पर सत्र के शुरू में चर्चा हुई। तो आखिर में खुले में पड़ा अनाज मुफ्त बांटने को लेकर। अनाज सडऩे का मामला लंबे समय से उठ रहा। पर अपने शरद पवार लंबी तानकर सो रहे। सुप्रीम कोर्ट ने 12 अगस्त को सरकार को अनाज मुफ्त बांटने को कहा। तो 19 अगस्त को शरद पवार ने उसे कोर्ट की सलाह बता पल्ला झाड़ लिया था। पर मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट ने सख्ती दिखाई। कहा- गरीबों में मुफ्त अनाज बांटने की बात सलाह नहीं, आदेश। सो लोकसभा में खूब हंगामा बरपा। विपक्ष ने सरकार को घेरा। तो सदन में आकर पवार ने आदेश के पालन का भरोसा दिया। पर पुछल्ला जोड़ दिया, अभी सुप्रीम कोर्ट का फाइनल आर्डर नहीं मिला। यानी जब तक आर्डर नहीं मिलेगा, भले अनाज सड़ जाए, गरीबों को नहीं देगी सरकार। पवार को उम्र के पड़ाव पर पता नहीं क्या हो गया। बीते इतवार को ही बयान दिया- जब लोग कोल्ड ड्रिंक खरीद सकते, तो महंगी सब्जी क्यों नहीं। अब जब देश का कृषि व खाद्य मंत्री ऐसा बेहूदा बयान दे, तो मुफ्त अनाज की उम्मीद कैसे की जा सकती। सुप्रीम कोर्ट ने भले मानवीय दृष्टिकोण से सरकार को आदेश दिया। पर यह कितना व्यवहारिक? आखिर सरकार किस तंत्र के जरिए मुफ्त अनाज बांटेगी? पीडीएस का हाल तो अरुणाचल के पूर्व सीएम गेगांग अपांग की गिरफ्तारी से हाल ही में उजागर हुआ। सो भले सुप्रीम कोर्ट का फैसला देखने-सुनने में मन को भा रहा हो। पर हकीकत यही, अनाज बंटा, तो बिचौलियों की ही बल्ले-बल्ले होगी। जरूरतमंदों तक वैसे ही पहुंचेगा, जैसे राजीव गांधी ने गांव तक पहुंचने वाले एक रुपए की कहानी बताई थी। सरकारें जनता के मुद्दों के प्रति किस तरह उदासीन रहतीं, यह कोई छुपी हुई बात नहीं। सो सुप्रीम कोर्ट का आदेश तात्कालिक तौर पर सही। पर दीर्घकालिक हिसाब से मुफीद नहीं। कोर्ट ने कोई ऐसा आदेश नहीं दिया, जो सरकार को मजबूर करे कि हर जिले-शहर में गोदाम बने। ताकि कभी अनाज सडऩे की नौबत न आए। बदहाल पीडीएस को दुरुस्त करने की बात नहीं हुई। सो मुफ्त अनाज बांटने का आदेश सुनने में अच्छा लग रहा। पर जैसी अपनी व्यवस्था, उसमें व्यवहारिक नहीं। अब भले सुप्रीम कोर्ट की लताड़ से बचने को कागजों पर अनाज मुफ्त बंट जाए। अनाज सडऩे से बच जाए। पर व्यवस्था की सड़ांध का क्या? गरीब-गुरबों की जुबां पर व्यवस्था को कोसना कोई नई बात नहीं। पर व्यवस्था के रहनुमाओं ने कभी फिक्र नहीं की। सचमुच मानसून सत्र में भले आम आदमी के मुद्दे उठे हों। पर आम आदमी का न भला हुआ, न होने के आसार। अपने वामपंथी सीताराम येचुरी ने राज्यसभा में मौजूं सवाल उठाया। कहा- पीएम ने महंगाई पर संसद में जुबां नहीं खोली। पर अमेरिका को खुश करने वाले एटमी बिल की खातिर न सिर्फ बहस में दखल दिया, अलबत्ता दोनों सदनों में बहस के वक्त अधिकांश समय मौजूद रहे। आखिर ऐसा क्यों, अमेरिका की खातिर मानसून सत्र की अवधि बढ़ गई। अब नवंबर में बराक ओबामा भारत आ रहे। तो संसद का विशेष सत्र बुलाया जाएगा। यों आवभगत के लिए सत्र बुलाने में कुछ गलत नहीं। पर कभी किसानों की आत्महत्या पर विशेष सत्र क्यों नहीं होता? महंगाई सातवें आसमान पर, फिर भी विशेष सत्र क्यों नहीं? जनहित के मुद्दे हमेशा सियासत की भेंट क्यों चढ़ जाते? अब मंगलवार को सांसदों ने जितनी फुर्ती अपनी जेब भरने के लिए दिखाई, उतनी आम आदमी के लिए क्यों नहीं? राज्यसभा में सांसदों के वेतन-भत्ते का बिल चार बजकर 23 मिनट पर पेश हुआ। और पूरी बहस के बाद चार बजकर 52 मिनट पर पारित भी हो गया। यानी आधा घंटा भी नहीं, महज 29 मिनट में ही सांसदों की जेबें भर गईं। फिर भी बहस में मांगने वालों ने कसर नहीं छोड़ी। कांग्रेस के राशिद अल्वी ने सांसदों के वेतन पर मीडिया में मचे शोर पर खीझ निकाली। याद दिलाया, आज से दो सौ साल पहले 1814 में अमेरिकी सिनेटर की सैलरी साढ़े छह हजार रुपए थी। हमारी तनख्वाह साठ साल में 27 बार बढ़ी, पर अभी भी महज 16 हजार। पर अपने सांसद क्यों भूल जाते अमेरिका और भारत की प्रति व्यक्ति आय का फर्क। यों शिवसेना के भरत राउत ने मीडिया का साथ दिया। बोले- मीडिया की आवाज जनता की आवाज होती। सो सांसदों को आत्म मंथन करना चाहिए। उनके वेतन पर ही इतना शोर क्यों मचता? अगर हम जिम्मेदारी से काम करें, तो शोर नहीं मचेगा। बात सोलह आने सही। पर नेताओं को तो मीठा-मीठा घप, और कड़वा-कड़वा थू करने की आदत। भूल जाते, वेतन उसे दिया जाता, जिसे सरकार नौकरी पर रखती। सांसदों को तो जनता चुनकर भेजती। फिर अपनी सैलरी खुद तय करने का हक क्यों मिले? जनता को ही यह हक क्यों न दिया जाए? सही मायने में तो जन प्रतिनिधि को वेतन मिलना ही नहीं चाहिए। वह सिर्फ भत्ते के हकदार। पर आलोचनाओं के बाद भी सांसदों ने कितना लोकलिहाज किया? जाते-जाते मालामाल हो गए। सो व्यवस्था के इस चेहरे को क्या कहें? सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद अनाज तो बंट जाएगा। पर फिर वही सवाल, व्यवस्था की सड़ांध कब दूर होगी?
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31/08/2010

Monday, August 30, 2010

तो राजा के लिए बिल, राजस्थानी को झुनझुना

तो सीबीआई से शुरू, सीबीआई पर ही खत्म। मानसून सत्र के आखिर में बीजेपी को सीबीआई का मुद्दा याद आ गया। सत्र से पहले सीबीआई के बेजा इस्तेमाल पर ही पीएम के लंच का बॉयकाट किया था। पर पूरे सत्र में इस मुद्दे को प्राथमिकता नहीं दी। अब सत्र की अवधि दो दिन बढ़ गई। तो सोमवार को दोनों सदनों में बवाल काटा। घंटे भर संसद ठप करा संतुष्ट हो गई। सो चुटकी लेने वालों ने नरेंद्र मोदी इंपैक्ट बताया। यों बीजेपी की मानिए, तो मोदी का फोन आया जरूर था। पर मामला उठाने के लिए नहीं, उठाने से रोकने के लिए। गीता जौहरी ने सीबीआई की धमकी के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अर्जी डाली, तो मोदी ने मना किया। अब सच जो भी हो, इतना तो साफ हो चुका। पीएम के लंच का बॉयकाट हो या सोमवार को संसद में हंगामा, मोदी का फोन आया था। पर सीबीआई का मुद्दा निपटा, तो एनीमी प्रॉपर्टी बिल हंगामे की वजह बना। सुप्रीम कोर्ट ने राजा महमूदाबाद की 1100 प्रॉपर्टी वापस करने का आदेश दिया। तो सरकार ने फैसले को गलत मानते हुए अध्यादेश जारी कर दिया। सो राजा महमूदाबाद को संपित्त वापस नहीं मिली। अब मुस्लिम सांसदों के दबाव में सरकार अध्यादेश में संशोधन चाह रही। सलमान खुर्शीद ने मोर्चा संभाल मुस्लिम सांसदों को लामबंद किया। सोनिया-पीएम-चिदंबरम तक अलख जगाई। सो मुस्लिम वोट की खातिर सरकार इतिहास रचने को तैयार हो गई। अध्यादेश संसद सत्र न होने के वक्त लाया जाता। पर सत्र में जस का तस अध्यादेश को कानूनी जामा मिलता। अबके सरकार जिस खातिर अध्यादेश लाई, संशोधन जोड़ उसे ही पलटना चाह रही। सुप्रीम कोर्ट के फैसले को गलत बताया था। पर संशोधन के साथ बिल पास हो जाए। तो राजा महमूदाबाद को सारी प्रापर्टी वापस मिल जाएगी। सो बीजेपी ने एतराज किया। पर लालू-मुलायम को तो अपने वोट बैंक की फिक्र। बीजेपी की दलील, अगर राजा को प्रॉपर्टी वापस मिली, तो सारे किरायेदारों को बाहर कर देगा। पर चिदंबरम बीजेपी की इस आपत्ति को दूर करने को राजी थे। फिर भी बीजेपी ने प्रॉपर्टी वापस करने की मुखालफत की। सो विरोध को देखते हुए सरकार ने सोमवार को बिल वापस ले लिया। अब शीत सत्र में बिल लाने का एलान हुआ। पर सरकार के इरादे नेक नहीं। सो सुषमा स्वराज ने सदन में ही हमला बोला। पूछा- क्या सरकार कोई नया अध्यादेश लाने की सोच रही? चिदंबरम ने कोई जवाब नहीं दिया। पर चाल देखिए, मौजूदा अध्यादेश सत्र खत्म होते ही लेप्स हो जाएगा। फिर सरकार अभी जो संशोधन चाह रही थी। उसी संशोधन के साथ नया अध्यादेश ले आएगी। फिर शीत सत्र में विपक्ष ने विरोध किया, तो भी सरकार की राजनीतिक सेहत पर फर्क नहीं पड़ेगा। संविधान के तहत यह प्रावधान, अगर कोई अध्यादेश लेप्स हो जाए। तो उसके जरिए हुआ काम मान्य होगा। यानी मौजूदा अध्यादेश के तहत राजा महमूदाबाद को प्रॉपर्टी वापस नहीं मिलेगी। पर नया अध्यादेश आया, तो सरकार और लालू-मुलायम की मंशा पूरी होगी। राजा महमूदाबाद के बेटे को 24 हजार करोड़ की प्रॉपर्टी वापस मिल जाएगी। फिर जब राजा को बैठे-ठाले इतनी संपत्ति मिलेगी। तो राजा की खातिर फुर्ती दिखाने वाले दल चुनावी चंदे के साथ-साथ वोट बैंक का भी जुगाड़ कर सकेंगे। यों एनीमी प्रॉपर्टी बिल को लेकर सरकार की नीयत में खोट। तो विपक्ष भी दूध का धुला नहीं। हदबंदी कानून देश में लंबे समय से लागू। कृषि संपत्ति सीमा तय करने का कानून 1968 में बना। तो शहरी संपत्ति सीमा का कानून 1973 में। यूपी में इस कानून के मुताबिक कोई परिवार अधिक से अधिक 33 एकड़ कृषि भूमि ही रख सकता। जबकि लखनऊ जैसे शहर में सीलिंग की सीमा एक हजार वर्ग मीटर। पर अब शहर में सीलिंग का कानून रद्द हो चुका। अगर शहर सीलिंग एक्ट लागू होता। तो न अध्यादेश की जरूरत पड़ती, न वोट के सौदागर ऐसा ख्याल दिल में लाते। पर सनद रहे, सो बता दें। शहरी सीलिंग एक्ट 1999 में एनडीए राज में बतौर शहरी विकास मंत्री राम जेठमलानी ने रद्द करवाया। तब दलील दी गई, एक हजार वर्ग मीटर में मकान के अलावा छोटा सर्वेंट क्वार्टर भी नहीं बन पाता। सो कानून ही हटा दिया गया। अब कोई कानून नहीं, सो संशोधित रूप में अध्यादेश आया। तो लोकतंत्र के इस दौर में भी राजा महमूदाबाद का वारिस सचमुच का राजा होगा। वोट की खातिर नेताओं ने संसद को सचमुच कठपुतली बना दिया। पाकिस्तान जा चुके लोगों की खातिर कानून बन रहे। लालू को तो एनीमी शब्द पर ही एतराज। देश की जनता से किए वादे शायद ही कभी पूरे होते। पर एनीमी और अमेरिका के लिए कुछ भी होगा। अब सोमवार को राजस्थानी भाषा को लेकर लोकसभा में हंगामा बरपा। तो 18 दिसंबर 2006 का गृह राज्यमंत्री श्रीप्रकाश जायसवाल का वादा याद कराया गया। खम ठोककर बजट सत्र 2007 में बिल लाने का एलान किया था। पर उस लोकसभा का विसर्जन हो गया, वादा पूरा नहीं हुआ। सत्ता में आने वाले यह भूल जाते, संसद सरकार और जनता के बीच मध्यस्थ का काम करती। राजेंद्र प्रसाद ने संविधान सभा में कहा था- संसद की असली संप्रभुता इसी में कि वह अपने और जनता के हक के बीच कोई फर्क न करे। लोकतंत्र को सफल बनाना है, तो संसद को अपने अधिकारों की रक्षा के साथ-साथ जनता की आवाज सुनने को भी तैयार रहना चाहिए। पर अब संसद का इस्तेमाल सिर्फ वोट और निजी हित की खातिर होता।
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30/08/2010