'हू इज द फादर ऑफ करप्शन?' तमाम सर्च इंजनों पर नजर फिराते दिन निकल गए। माउस क्लिक करते-करते उंगलियां दुख गईं। पर इस सवाल का जवाब नहीं मिला। सो आखिर में यही निष्कर्ष निकाला, भ्रष्टाचार भी आस्था का विषय। एक ऐसी आस्था, जो सभी मजहबों से ऊपर। यों भ्रष्टाचार कोई देवी या देवता, यह साफ नहीं। पर दोनों में से जो भी हों, सबके लिए पूजनीय। सचमुच 'जेब' से भ्रष्टाचार की जय बोलो, तो सारे काम चट हो जाते। काम कराने वालों को भी तकलीफ नहीं, काम करने वाले भी धन मिलने के बाद तन-मन से काम कर देते। पर कहीं जेब पर दिल हावी हो गया, तो इतने धक्के खाने पड़ते कि ईमानदारी पानी मांगने लगती। तभी तो कहा जाता- कोई भी व्यक्ति तभी तक ईमानदार, जब तक बेईमानी का मौका न मिले। सो भ्रष्टाचार तो ऐसा अमृत रस, जिसे पीकर हर सरकारी मुलाजिम अपनी जिंदगी खुशहाल बनाना चाहता। सो आप खुद ही सोचकर देखो, अगर भ्रष्टाचार न होता, तो दुनिया कितनी बेरंग होती। सारे काम आसानी से होते, तो सरकारी बाबुओं और आम लोगों में क्या फर्क रह जाता। कुल मिलाकर माहौल में नीरसता ही दिखती। पर भ्रष्टाचार ने सचमुच कमाल कर दिया। भ्रष्टाचार से रोजगार के नए अवसर पैदा हो गए। व्यवस्था के नीति-नियंता नियति के बराबर खड़े हो गए। यानी भ्रष्टाचार ऐसा खेल बन गया, जितना खेलो, उतना मजा आता। पहले लूटने के लिए भ्रष्टाचार होते, फिर जांच के नाम पर लूट मचाई जाती। भ्रष्टाचार का मतलब यही, लूट लो, जितनी लूट सकते हो, ताकि अंत काल में पछताना न पड़े। अगर भ्रष्टाचार न होता, तो नेताओं-नौकरशाहों-बाबुओं की जिंदगी कितनी तनहा होती। पर भ्रष्टाचार ने इन लोगों पर प्राण वायु जैसा असर किया। अब जो चीज प्राण वायु बन चुकी हो, वह भला कैसे अलग हों। तभी तो भ्रष्टाचार के खिलाफ बातें बड़ी-बड़ी होतीं, पर कार्रवाई नहीं। भ्रष्टाचार की जानकारी आखिर किसे नहीं। कई सरकारी महकमे ऐसे, जहां ऊपर से नीचे तक सभी अधिकारियों की भ्रष्ट कमाई इतनी कि सैलरी हर महीने का बोनस नजर आती। इनकम टेक्स, सेल्स टेक्स, कस्टम, तहसील जैसे मलाईदार महकमों में ट्रांसफर के लिए कैसे राजनीतिक अर्जियां लगाई जातीं, कौन नहीं जानता। अगर भ्रष्टाचार न होता, तो आज कॉमनवेल्थ गेम्स भी न होते। भारत ने मेजबानी ली, तो मेजबानी के पीछे की कहानी मणिशंकर अय्यर बता चुके। कैसे कॉमनवेल्थ के सभी देशों को लाखों में भुगतान किए गए। सो कॉमनवेल्थ गेम्स की तैयारी शुरू हुई, तो भ्रष्टाचार का हिस्सा पहले बंट गया। पर खेल के बाद जब भ्रष्टाचार के खेल से परदा उठा। तो भ्रष्टाचारियों के नकाब उतरने लग गए। सो सरकार को लगा, टेबल के नीचे का भ्रष्टाचार टेबल के ऊपर दिख गया। तो जनता को जवाब देना भारी पड़ेगा। सो अब भ्रष्टाचार की जांच होगी। तो देखिए, जांच के कितने फायदे होंगे। अब जांच तक कलमाड़ी एंड कंपनी की आयोजन समिति बनी रहेगी। यानी वेतन-भत्ते मिलते रहेंगे। भ्रष्टाचार की जांच से एक और फायदा, रिटायर हो चुके सीएजी वी.के. शुंगलू को काम मिल गया। विपक्षी दल बीजेपी को भी भ्रष्टाचार पर रिसर्च करने की जरूरत महसूस हुई। अपनी मीडिया को भी रपट से पहले ही परतें उधेडऩे का मौका मिल गया। अब आप खुद ही देखिए, अगर कॉमनवेल्थ गेम्स न हुए होते, तो भ्रष्टाचार न होता। भ्रष्टाचार न होता, तो नितिन गडकरी को तथ्य जुटाने की जहमत नहीं उठानी पड़ती। पीएम को जांच कमेटी नहीं बनानी पड़ती। राजनीतिक दलों को आरोप-प्रत्यारोप का मौका नहीं मिलता। सो उधर कॉमनवेल्थ गेम्स की जांच शुरू हुई, इधर राजनीति का धंधा चल पड़ा। बीजेपी अध्यक्ष नितिन गडकरी ने मंगलवार को जो दस्तावेज जारी किए, उसके पन्ने तो नहीं गिने जा सके। पर अमूमन डेढ़-दो किलो वजन जरूर होगा। गडकरी ने सीधे पीएम मनमोहन को कटघरे में खड़ा किया। भ्रष्टाचार में पीएमओ को जिम्मेदार बताया। दलील दी, पीएम के तैनात चार अधिकारी आयोजन समिति के हर फैसले में शामिल रहे। सो पीएम जिम्मेदारी से नहीं बच सकते। पर सवाल गडकरी से, कर्नाटक में एक मंत्री का बेटा जमीन घोटाले में फंसा। तो सीएम येदुरप्पा ने यह कहते हुए कार्रवाई नहीं की, बेटे की सजा बाप क्यों भुगते। अब गडकरी बताएं, गर अधिकारी भ्रष्ट निकले, तो पीएम जिम्मेदार कैसे। अगर यही फार्मूला, तो फिर बीजेपी नेता सुधांशु मित्तल के घर छापेमारी की जिम्मेदारी बीजेपी अध्यक्ष क्यों नहीं लेते? मंगलवार को कॉमनवेल्थ घोटाले के मामले में बीजेपी नेता के घर छापे पड़े। तो कांग्रेस को ढाल मिल गई। मनीष तिवारी ने गडकरी को बिगड़ैल बच्चा बता उनके आरोप खारिज कर दिए। बोले- जांच की आंच बीजेपी नेताओं तक पहुंच रही, सो गडकरी डर गए। पर गडकरी की ओर से जांच के लिए जेपीसी की मांग से किनारा कर लिया। सीधे जवाब से कन्नी काटते हुए बोले- यह सरकार को तय करना है, पर फिलहाल शुंगलू कमेटी सक्षम। पर गडकरी ने तो मौजूदा जांच को परदा डालने वाली बताया। यानी मौजूदा जांच सिर्फ प्रशासनिक स्तर तक सीमित रहेगी। मंत्रियों तक आंच नहीं पहुंचेगी। वैसे भी शीला-जयपाल-गिल-कलमाड़ी ने तो अपने अधिकारियों को कागज दुरुस्त करने की हिदायत दे दी। सो जांच का क्या हश्र हुआ, यह तो तीन महीने बाद ही मालूम पड़ेगा। पर कदम जो भी उठे, इतना तो तय है, अपने देश से भ्रष्टाचार न उठेगा, न मिटेगा। भ्रष्टाचार अब एक ऐसा धर्म, जिसमें सबकी आस्था। ऐसा कर्म, जिसे सब करना चाहते। लेने वाला भी खुश, देने वाला भी खुश। सो आइए मिलकर कहें- भ्रष्टाचार की जय हो।
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19/10/2010
Tuesday, October 19, 2010
Monday, October 18, 2010
कॉमनवेल्थ से बिहार तक अब दे दना-दन
कर्नाटक का किस्सा तो क्लीयर नहीं हुआ। पर कॉमनवेल्थ में करप्शन की जांच को कमेटियां बन गईं। सीएजी विनोद राय ने तीन महीने में रपट सौंपने का एलान कर दिया। प्रधानमंत्री की ओर से बनाई वी.के. शुंगलू कमेटी से इतर सीएजी ने जांच के लिए अपनी कुल 24 टीम गठित कीं। जिनमें 15 टीम दिल्ली सरकार के विभागों में पड़ताल करेंगी। चार टीमें आयोजन समिति की, तो चार टीमें सीपीडब्ल्यूडी की। एक टीम सभी 23 टीमों की मानीटरिंग करेगी, ताकि जांच का काम जल्द पूरा हो सके। यानी जांच में जबर्दस्त तेजी दिखाई जा रही। पर क्या सचमुच करप्शन की कलई खुलेगी, या सिर्फ मनोवैज्ञानिक तेजी? घोटालों या करप्शन के मामले में जांच तो हमेशा तेजी से शुरू हुई। पर कितने मामले अंजाम तक पहुंचे? वह भी जब, ऐसे मामलों में कोई बड़ी राजनीतिक पार्टी और राजनेता फंसा हो। तो जांच वैसे भी कछुआ चाल अपना लेती। इराक तेल दलाली के मामले में यूएन की वोल्कर रपट ने भारत से दो नामों का खुलासा किया था। पहला- नटवर सिंह, दूसरा- कांग्रेस पार्टी। यानी अनाज के बदले तेल घोटाले में बड़े लोग फंसने लगे। तो कांग्रेस ने तयशुदा फार्मूले के तहत नटवर सिंह को बलि का बकरा बना दिया। फिर जस्टिस आर.एस. पाठक की रहनुमाई में जांच कमेटी बनी। आखिर नटवर को किस तरह मनमोहन केबिनेट और फिर कांग्रेस से बाहर का दरवाजा दिखाया गया, दोहराने की जरूरत नहीं। पर वोल्कर रपट में तो कांग्रेस का भी नाम था। अब सीएजी की ही बात लो। सीएजी जैसी संस्था पर खुद कांग्रेसी सीएम शीला सवाल उठा चुकीं। ऐसी संस्था को ही बेमानी बता चुकीं। तो आप खुद सोचो, सीएजी की रपट से क्या हो जाएगा? मान लो, सीएजी ने भ्रष्टाचार की पूरी कलई खोल दी, तो क्या होगा। यही ना, संसद के बजट सत्र में दो-चार दिन विपक्ष के हंगामे से दोनों सदन ठप होंगे। फिर दिखलाने को मामला सीबीआई को सौंप दिया जाएगा। इसके बावजूद हायतौबा मचती रही, तो बलि का बकरा कलमाड़ी तैयार। पर कलमाड़ी ने तो विजयादशमी पर ही खम ठोक दिया। चेतावनी दे दी- मुझे कॉमनवेल्थ का रावण बनाने की कोशिश न की जाए। कलमाड़ी खुल्लमखुल्ला बोले- आयोजन समिति के हर फैसले में पीएम के तैनात अधिकारी भी शामिल। अब कलमाड़ी उवाच का मतलब जो न समझे, वह सबसे बड़ा अनाड़ी। पर कलमाड़ी अब यहीं तक खामोश नहीं रहने वाले। दिल्ली की सीएम शीला दीक्षित ने पॉलिटीकल मैनेजर की तरह कॉमनवेल्थ की सफलता की वाहवाही मैनेज कर ली। चैनलों पर इंटरव्यू में ऐसा साबित करने लगीं। मानो, उन ने बेड़ा पार न लगाया होता, तो कॉमनवेल्थ का बेड़ गर्क हो जाता। तभी तो शीला के मैनेजमेंट से दिल्ली के उपराज्यपाल उखड़ गए। उन ने पीएम को चिट्ठी लिखकर शीला की शिकायत कर दी। पर जब कॉमनवेल्थ के करप्शन की जांच की कार्रवाई शुरू हुई। तो शीला ने सीधे कलमाड़ी पर उंगली उठा दी। ताकि सारा फोकस आयोजन समिति में हुए घपले पर हो जाए। सो वक्त की नजाकत भांप कलमाड़ी पहले चुप रहे। पर शीला वार जारी रहा, तो उन ने पलटवार किया। शीला को अपने गिरेबां में झांकने की नसीहत दी। कलमाड़ी ने दो-टूक कह दिया- आयोजन समिति को तो सिर्फ 1620 करोड़ मिले, शीला सरकार को 16000 करोड़ मिले थे। सो पहले शीला अपने भ्रष्टाचार को देखें। अब सवाल, जब पीएम जांच कराने ही जा रहे थे। तो शीला ने कलमाड़ी पर उंगली क्यों उठाई? अपना दामन साफ दिखाने के लिए कलमाड़ी पर कीचड़ क्यों उछाला? शीला संवैधानिक पद पर बैठी हुईं। सो उनके आरोप जांच की दिशा मोडऩे में अहम हो सकते। पर जांच तो कॉमनवेल्थ की तैयारियों में हुए समूचे भ्रष्टाचार की होनी। अब अगर शीला सरकार के दामन पर कोई दाग नहीं, तो खुद के दामन को साफ दिखाने के लिए किसी और पर कीचड़ उछालने की क्या जरूरत? ऐसा तो लोग तभी करते, जब खुद के मन में कोई चोर हो। शीला के कॉमनवेल्थ से पहले वाले बयान याद करिए। तब उन ने सारा दारोमदार भगवान पर छोड़ दिया था। पर जब खेल सफल हो गया। तो खुद को ही भगवान साबित करने में जुटीं। सो रंगारंग के बाद अब दे दना-दन शुरू हो गया। कॉमनवेल्थ में किसने नहीं खाया? सो कांग्रेस ने अब हमेशा की तरह बीच का रास्ता अपनाया। जांच की रफ्तार बढ़ेगी, दो-चार दिन नए खुलासे और सुर्खियां बनेंगी। फिर धीरे-धीरे मामला ठंडे बस्ते में। सो शीला-कलमाड़ी को संयम में रहने की नसीहत दी। जांच रपट तक आरोप-प्रत्यारोप न करने की हिदायत दी। अब देखिए, अपनी जनता की याददाश्त को नेता कैसे कमजोर समझते। तभी तो सिर्फ चुनावी साल में ही आम जनता के लिए खजाना लुटाया जाता। बाकी तीन-चार साल में अपना खजाना भरने में लगे रहते नेता। अब राजनीति की मौकापरस्ती देखिए। बिहार चुनाव की बिसात बिछी, तो आरोप-प्रत्यारोप का दौर शुरू हो गया। पहले राहुल गांधी, फिर पीएम मनमोहन और सोमवार को सोनिया गांधी। तीनों ने नीतिश कुमार को नकारा बताया। केंद्र का पैसा डकारने का आरोप लगाया। पर जनता की याददाश्त को कैसे कमजोर समझते नेता। बानगी देखिए, पांच मई 2009 को लोकसभा चुनाव के आखिरी राउंड से पहले राहुल गांधी ने प्रेस कांफ्रेंस की। तो नीतिश कुमार को बेहतरीन काम करने वाला सीएम बताया। नरेगा में भी उम्दा प्रदर्शन करने वाला बताया। तो जवाब में तब नीतिश ने भी राहुल को थैंक यू कहा। पर महज एक साल में क्या हो गया? यानी नीतिश पर हमला हो या कॉमनवेल्थ की जांच, झूठा ही सही, पर मान लो।
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18/10/2010
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18/10/2010
Friday, October 15, 2010
भुखमरी और कॉमनवेल्थ में भ्रष्टाचार का कॉकटेल
कॉमनवेल्थ के आयोजक सफलता की खुमारी में, तो देश की जनता विजयादशमी के जश्न में डूबी। सो रामायण के एक प्रसंग का जिक्र लाजिमी। जब भगवान राम लंका पर फतह कर अयोध्या लौटे। राज्याभिषेक हो गया। तब सिर्फ एक धोबी की टिप्पणी सुन राम ने अग्नि परीक्षा दे चुकी सीता को तज दिया था। पर कॉमनवेल्थ के आयोजकों पर न जाने कितने आरोप लग चुके। फिर भी किसी ठोस कार्रवाई की उम्मीद बेमानी। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने इसलिए राम राज की कल्पना की थी। पर अपने राजनेताओं ने इसे रावण राज बना दिया। कॉमनवेल्थ गेम्स में भ्रष्टाचार से तो कलमाड़ी-शीला-जयपाल-गिल, सोनिया-पीएम-बीजेपी-लेफ्ट-सपा-बसपा-लालू भी इनकार नहीं करते। पर जब सभी अनियमितता कबूल रहे। तो सवाल, भ्रष्टाचारी कौन? किसने कॉमनवेल्थ के नाम पर वेल्थ की लूट मचाई और डकार तक नहीं ली? अभी तो कॉमनवेल्थ में करप्शन का पोथा खोलने वाले कांग्रेसी दुर्वासा यानी मणिशंकर अय्यर दिल्ली नहीं लौटे। सो अगर दस जनपथ ने ताला नहीं लगाया, तो जांच एजेंसियों से पहले अय्यर की जुबान खुलेगी। अब अय्यर जब बोलेंगे, तब बोलेंगे। फिलहाल अंतरिम रिपोर्ट देकर तैयारी में भ्रष्टाचार का इशारा कर चुकी सीएजी (कैग) खेल खत्म होते ही अंतिम रिपोर्ट में जुट गई। शुक्रवार को खेलगांव से लेकर कई स्टेडियमों का दौरा किया। पर सीएजी को अपनी रपट देने में करीब तीन महीने लगेंगे। सीएजी की अंतरिम रपट के बाद सीवीसी ने भी कॉमनवेल्थ गेम्स में भ्रष्टाचार का खुलासा किया था। तो पीएमओ ने दखल देकर मामला ठंडे बस्ते में डलवाया। सो सीवीसी ने अगले ही दिन कह दिया था- हमारी प्राथमिक रिपोर्ट के आधार पर कोई निष्कर्ष न निकाला जाए। अब सीवीसी की भूमिका क्या होगी, पता नहीं। सीवीसी के कमिश्नर पीजे थामस विपक्ष की मोर्चेबंदी के बाद भी पद हासिल करने में सफल हो चुके। यानी बीजेपी को चीफ विजिलेंस कमिश्नर थामस पर भरोसा नहीं। तो जरा सीएजी की कहानी भी बता दें। सत्तापक्ष को कभी भी सीएजी रास नहीं आई। जब शीला दीक्षित की सरकार ने दुगुनी कीमत पर लो-फ्लोर बसें खरीदीं। तो सीएजी ने अपनी रपट में सवाल उठाया था। पर तब शीला दीक्षित ने सीएजी को न सिर्फ खरी-खरी सुनाई थीं, अलबत्ता रपट को कूड़ेदान में डालने को कह दिया था। इतना ही नहीं, तब कांग्रेसी शीला ने सीएजी जैसी संस्था की जरूरत पर ही सवाल उठा दिए थे। कुछ कांग्रेसियों ने तो इस संस्था को स्क्रैप करने की मांग कर दी थी। अब उसी सीएजी के जरिए कॉमनवेल्थ गेम्स घोटाले की जांच हो रही। तो शीला या कलमाड़ी से ऐसी उम्मीद करें कि रपट को मानेंगे? यों सत्ता में बैठे लोगों के लिए घालमेल करना कोई बड़ी बात नहीं। सुप्रीम कोर्ट की सात मार्च 2007 को चारा घोटाले में की गई एक टिप्पणी आप खुद देख लें। सीबीआई की विशेष अदालत से घोटाले के आरोपी बृज भूषण प्रसाद को सजा हो चुकी थी। सुप्रीम कोर्ट में जमानत के लिए उनके वकील ने दलील दी- बृजभूषण तो सिर्फ बजट अकाउंट आफीसर थे। बस इतना सुनते ही जस्टिस मार्कंडेय काटजू ने भडक़ते हुए कहा था- तुम्हें फंड का आडिट करना था, पर तुमने क्या किया? हर कोई इस मुल्क को लूट लेना चाहता है। पर भ्रष्टाचार के मामले में कभी बड़ी मछलियों को फंसते देखा आपने? सो कॉमनवेल्थ में भ्रष्टाचार का ठीकरा बड़े नेताओं पर फूटेगा, ऐसे आसार नहीं। नेताओं में तो सिर्फ वाहवाही लूटने की होड़ मचती। गलती की जिम्मेदारी कोई नहीं ओढ़ता। अब गुरुवार का ही किस्सा देखिए, गेम्स के समापन के जश्न में कैसे एक मासूम की चीख दब गई। नेहरू स्टेडियम के सामने की कालोनी में सात साल की बच्ची ममता बिजली के नंगे तार की चपेट में आ गई। पर सुरक्षा कर्मियों ने अस्पताल तक नहीं जाने दिया। आधे घंटे बाद पीसीआर की गाड़ी ममता को लेकर गई। पर तब तक मासूम ममता की मौत हो चुकी थी। अब श्रेय की होड़ में जुटे नेता बताएं, ममता की मौत का जिम्मेदार कौन? बिजली कंपनी और दिल्ली पुलिस ने तो पल्ला झाड़ लिया। पर यह शीला-कलमाड़ी का कैसा आयोजन, जो आम आदमी भले मर जाए, पर अस्पताल भी नहीं जा सकता? आयोजक ईमानदार होते, तो ममता के घर जाकर ढांढस बंधाते। पर श्रेय लूटने को बयानों का दौर चल रहा। शीला को-आर्डीनेशन की कमी बता रहीं। जब उनके जिम्मे काम आया, तो सब ठीक हो गया। ऐसा अपनी ही जुबान से बता रहीं। पर यह कैसी शेखी, एक तरफ भारत भुखमरी में चीन-पाक-श्रीलंका से भी आगे। शनिवार को वल्र्ड फूड डे, सो अंतराष्ट्रीय संस्था की रपट में यह खुलासा हुआ। विडंबना देखिए, अपने वित्त मंत्री एशिया के सर्वश्रेष्ठ वित्त मंत्री कहला रहे। पर आम आदमी को आखिर क्या मिला? सचमुच वेल्थ लुटाकर कॉमन हो गई भारत की जनता। आयोजन के राजा तो अब धन के मामले में महाराजा हो गए। आम आदमी को मिला, तो सिर्फ आभार। कांग्रेस ने शुक्रवार को शीला-कलमाड़ी-पीएम-उपराज्यपाल को श्रेय देने से इनकार कर दिया। मनीष तिवारी बोले- सफल गेम्स का श्रेय भारत की करोड़ों जनता और उनकी दुआओं को। यानी जनता को मिला सिर्फ श्रेय। कॉमनवेल्थ के नाम पर जेब भरने वाले तो अब कागज का पेट भरने में जुट गए। ताकि सीएजी, इनकम टेक्स और इनफोर्समेंट डायरेक्टरेट के शिकंजे से बच जाएं।
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15/10/2010
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15/10/2010
Thursday, October 14, 2010
‘मैडल’ के लिए अब आयोजकों में भिड़ंत
कर्नाटक में गवर्नर ‘हंस’राज ‘मोती’ चुगकर भी चूक गए। बुनकेरे सिद्धलिंगप्पा येदुरप्पा ने आखिर बहुमत सिद्ध कर ही दिया। कांग्रेस-जेडीएस ने विधानसभा में विश्वास मत टलवाने की खूब कोशिश की। हाईकोर्ट के फैसले तक फैसला न सुनाने की स्पीकर से गुहार लगाई। पर स्पीकर ने सदन का फैसला सुना दिया। तो येदुरप्पा के पक्ष में 106 वोट पड़े, विपक्ष सौ वोट पर ही सिमट गया। अब सबकी निगाह सोमवार के हाईकोर्ट के फैसले पर। अगर हाईकोर्ट ने पांच निर्दलीय एमएलए को वोटिंग की अनुमति दे दी। तो भी बीजेपी बहुमत का दावा कर रही। पर कांग्रेस-जेडीएस की हालत अब खिसियानी बिल्ली जैसी। कानून मंत्री वीरप्पा मोइली और कुमारस्वामी के बयान का एक ही मतलब, दस दिन इंतजार करिए, सरकार गिर जाएगी। यानी चुनी हुई सरकार को कांग्रेस-जेडीएस चलने नहीं देना चाह रहीं। सो कर्नाटक में खरीद-फरोख्त का बाजार अपने उफान पर। अब गवर्नर हंसराज की भूमिका पर बीजेपी ही नहीं, जेडीएस भी सवाल उठा रही। बीजेपी विश्वास मत जीत गई, तो अब कुमारस्वामी ने गवर्नर पर किसी अज्ञात के इशारे पर काम करने का आरोप लगाया। हारे हुए विपक्ष की कसक यही, गवर्नर ने दुबारा मौका क्यों दिया। पर क्या बहुमत की सरकार को बर्खास्त करना लोकतांत्रिक कदम होता? सचमुच अपने देश में नेताओं को लोकतंत्र की फिक्र ही कहां। कर्नाटक हो या कॉमनवेल्थ, लोकतंत्र पर जेबतंत्र भारी। कर्नाटक और कॉमनवेल्थ के मुख्य आयोजन का परदा गुरुवार को गिर गया। पर सोमवार से फिर नई बहस छिड़ेगी। कॉमनवेल्थ गेम्स का धूमधड़ाके के साथ समापन हो गया। तो अब श्रेय लेने की गलाकाट होड़ मच गई। सफल आयोजन के लिए दिल्ली की सीएम शीला दीक्षित टीवी चैनलों पर खूब चेहरे चमका रहीं। पर याद करिए, गेम्स से ठीक पहले शीला कैसे मीडिया को काटने दौड़ती थीं। अब सबकुछ ढंग से निपट गया। कॉमनवेल्थ गेम्स फैडरेशन के मुखिया माइक फेनेल ने जमकर तारीफ कर दी। तो रणनीति बनाकर शीला मैदान में उतरीं। खेलगांव को संवारने का जिम्मा आखिरी वक्त में पीएम ने दिल्ली सरकार को सौंपा था। सो अब शीला सारा श्रेय अकेले बटोरने में ऐसे जुट गईं, मानो, बाकी प्रशासनिक अमला घास काट रहा था। सिर्फ शीला और शीला की टीम खेलगांव के हर कमरे में झाड़ू लगा रही थीं। सो दिल्ली के उपराज्यपाल तेजेंद्र खन्ना को शीला की रणनीति फौरन समझ आ गई। उन ने पीएम को चिट्ठी लिखकर शीला की शिकायत कर दी। चिट्ठी में शीला के बयानों पर एतराज जताया। तैयारी में जुटे बाकी लोगों को किनारे करने की साजिश पर नकेल कसने की अपील की। अभी तो सिर्फ शीला और तेजेंद्र खन्ना मैदान में आए। सुरेश कलमाड़ी, जयपाल रेड्डी, एमएस गिल और केबिनेट सेक्रेट्री केएम चंद्रशेखर का कूदना बाकी। यों खेल के बीच में ही कलमाड़ी कह चुके- अब तो ओलंपिक की मेजबानी का दावा करे भारत। पर तैयारियों की असली पोल तो धीरे-धीरे खुलेगी। कहां, कितना घपला हुआ, यह भी सामने आएगा, भले बड़ी मछलियों पर कार्रवाई न हो। पर अहम सवाल, कॉमनवेल्थ गेम्स से क्या सबक ले रहे नेता? कॉमनवेल्थ गेम्स में आखिरी दिन पीएम मनमोहन हाकी का फाइनल देखने गए। पर हाकी में भारत हार गया। यों पीएम की पत्नी गुरशरण कौर सायना नेहवाल का बैडमिंटन देखने गईं, तो गोल्ड मिला। भारत-पाक के हाकी मैच में सोनिया-राहुल गए थे, तो टीम जीती। अब जो भी हो, आखिर में भारत ने पदक तालिका में दूसरा स्थान हासिल कर लिया। कुल 101 मैडल भारत के खाते में आए। मैडल जीतने वालों में खास तौर से ऐसे खिलाड़ी और एथलीट, जिन्हें सरकारी सहूलियतें नाम मात्र की मिलीं। सचमुच सहूलियतें मिलें, तो अपना भारत मैडलों के कई ऐसे सैकड़े लगा सकता। सो आयोजकों के लिए कॉमनवेल्थ गेम्स का समापन जश्न का नहीं, अलबत्ता सबक लेने का वक्त। अगर खिलाडिय़ों को समुचित प्रोत्साहन मिले, तो ओलंपिक में भी परचम लहराए। कॉमनवेल्थ में हम ऊपर से दूसरे पायदान पर आ गए। अफसोस, ओलंपिक में हमारी गिनती नीचे से शुरू होती। अपने देश के सभी खेल फैडरेशनों में नेताओं का कब्जा। सो खेल में राजनीति घुस चुकी। यानी जहां-जहां पांव पड़े संतन के....। तभी तो पिछले साल गणतंत्र दिवस के मौके पर अभिनव-विजेंदर को पद्म पुरस्कार मिल गए। पर ओलंपिक में विजेंदर की तरह ही कुश्ती में कांस्य जीतने वाले सुशील कुमार को इसी मनमोहन सरकार ने ठेंगा दिखा दिया। अब देखिए, कैसे सुशील कॉमनवेल्थ से पहले वल्र्ड चैंपियन बने। कॉमनवेल्थ में कुश्ती का गोल्ड मैडल जीता। इतना ही नहीं, कॉमनवेल्थ में सबसे लोकप्रिय एथलीट होने का भी खिताब मिला। पर चमक-दमक की दुनिया से दूर रहने वाले सुशील को पिछली बार पद्म श्री के लायक भी नहीं समझा गया। यों अबके सरकार भूल सुधार करेगी, यही उम्मीद। पर सुशील के साथ हुई नाइंसाफी खेल में घुसी राजनीति की अनौखी मिसाल। फिर भी कॉमनवेल्थ गेम्स में आए मेहमानों की विदाई से पहले क्रेडिट लेने की जैसी होड़ मची। नेता सुधरेंगे, इसकी गुंजाइश नहीं दिखती। खिलाडिय़ों के मैडल का महाकुंभ तो निपट गया। अब मैडल के लिए आयोजकों में भिड़ंत हो रही। ताकि सिर्फ सफलता का ढोल बजे। और भ्रष्टाचार की सारी कहानी उस शोर में दब जाए। -----------
14/10/2010
14/10/2010
Wednesday, October 13, 2010
कॉमनवेल्थ, कर्नाटक और क्लाइमैक्स!
तो कॉमनवेल्थ और कर्नाटक क्लाइमैक्स के दौर में पहुंच गए। गुरुवार को खेल का महाकुंभ भी निपटेगा। कर्नाटक की राजनीतिक उठापटक भी थमेगी। पर संयोग, दोनों 'खेल' निपटाने के बाद भी कर्ताधर्ता राहत की सांस नहीं ले पाएंगे। कॉमनवेल्थ गेम्स के भ्रष्टाचार की परतें फिर से उधड़ेंगी। बेतहाशा खर्च पर सवाल पहले की तरह ही उठेंगे। पर मैडल और उद्घाटन-समापन के जश्न में कहीं भ्रष्टाचार दफन न हो जाए। स्टेडियम के निर्माण पर बेतहाशा खर्च का सवाल संसद में उठा था। तो खेल मंत्री एमएस गिल ने खर्च को जायज ठहराने की नौकरशाही दलीलें खूब दी थीं। सो कॉमनवेल्थ में हुए भ्रष्टाचार को लेकर किसी को सजा मिलेगी, उम्मीद ना के बराबर। अब तो पेट भरने के बाद आयोजकों में पीठ ठोकने की होड़ मच चुकी। शीला अपनी पीठ ठोक रहीं, तो कलमाड़ी अपनी। गिल-जयपाल की भूमिका तो फिलहाल न तीन में, न तेरह में। पर बीजेपी तो इसी से गदगद कि कलमाड़ी ने उद्घाटन समारोह में ही कॉमनवेल्थ गेम्स के लिए पूर्व पीएम अटल बिहारी वाजपेयी का नाम लिया। अगर कॉमनवेल्थ के आयोजन की तारीफ हुई। तो इसमें कोई शक नहीं, श्रेय बटोरने बीजेपी भी मैदान में कूदेगी। पर कॉमनवेल्थ की बात समापन के बाद करेंगे। फिलहाल कर्नाटक में चल रहे राजनीतिक कॉमनवेल्थ की कहानी। बुधवार को बीजेपी ने गवर्नर हंसराज भारद्वाज पर हमला तेज कर दिया। आडवाणी-जेतली-सुषमा-वेंकैया ने मोर्चा उठा पीएम के दर अलख जगाई। हंसराज के समूचे राजनीतिक कैरियर और गवर्नरी का पोथा पीएम के सामने खोल दिया। बीजेपी ने हंसराज को संविधान से हटकर काम करने वाला नेता साबित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। पीएम को सौंपे ज्ञापन में बीजेपी ने कहा- हंसराज भारद्वाज राज्यपाल बनाए जाने के बावजूद राजनीतिक अतीत और राजनीति से खुद को अलग नहीं रख पाए। उन ने यह साबित कर दिया कि वह गवर्नर जैसे संवैधानिक पद के लायक नहीं हैं। अरुण जेतली बोले- कानून मंत्री के रूप में भी हंसराज भारद्वाज ने ऐसे आचरण किए। जिससे यह साफ हो गया कि संविधान से इतर उनकी एक आस्था है और अपनी वफादारी साबित करने में संविधान से इतर काम करना उनकी राजनीतिक रणनीति रही है। इतना ही नहीं, निष्पक्ष रहना हंसराज भारद्वाज के स्वभाव में ही नहीं है। यानी बीजेपी ने अपनी तरफ से सारे तथ्य गिना दिए। जैसे कभी मुख्य चुनाव आयुक्त नवीन चावला और बूटा सिंह, एससी जमीर, सिब्ते रजी के मामले में गिनवा चुकी। पर बीजेपी की शिकायत का हश्र क्या हुआ, सबको मालूम। जब सुप्रीम कोर्ट ने बिहार विधानसभा भंग करने को असंवैधानिक ठहराया, तब भी मनमोहन ने बूटा को न हटाया और न बूटा ने खुद इस्तीफा दिया। अलबत्ता जब कोर्ट ने विस्तृत फैसला दिया। तो बूटा गवर्नरी से चलता हुए। नवीन चावला के मामले में तो मुख्य चुनाव आयुक्त गोपालस्वामी की सिफारिश कूड़े के डिब्बे में डाल दी गई। सो हंसराज पर कोई कार्रवाई होगी, ऐसी उम्मीद फिलहाल तो नहीं। तभी तो बीजेपी नेताओं की शिकायत मनमोहन ने मौनी बाबा की तरह तफ्सील से सुनी। पर कोई भरोसा नहीं दिया। वैसे भी हंसराज पर कार्रवाई मनमोहन के वश की बात नहीं। जब तक हंसराज पर दस जनपथ का साया, उनकी कुर्सी पर कोई काली छाया नहीं पड़ सकती। पर गवर्नर की वजह से कांग्रेस की किरकिरी हो चुकी। यों जेहाद पर उतरे गवर्नर की सिफारिश पर बटन दबाया होता। तो कर्नाटक का मुद्दा कांग्रेस के लिए फिदायीन बन जाता। सो अबके कांग्रेस ने सब्र से काम लिया। गवर्नर की सिफारिश को किनारे कर एक और मौका देने की हिदायत दी। ताकि गवर्नर की लाज बच जाए और बीजेपी को भी शिकायत का मौका न मिले। सचमुच गवर्नर हंसराज ने कर्नाटक में जिस तरह से काम किया, अब कांग्रेस के नेता खुद चूक मान रहे। कांग्रेस मान रही, गवर्नर ने पद की मर्यादा से इतर कांग्रेस के नेता की तरह बयानबाजी की। प्रदेश कांग्रेस भी इस मुद्दे को सही ढंग से हैंडल नहीं कर पाई। अगर कांग्रेस ने पहले से ही आक्रामक तेवर अपनाया होता। तो बीजेपी को राजनीतिक बढ़त नहीं मिलती। रही-सही कसर गवर्नर हंसराज ने अपने नौकरशाह सलाहकारों की वजह से जल्दबाजी दिखाकर पूरी कर दी। अगर राष्ट्रपति की सिफारिश करने में वक्त लेते, तो शायद बीजेपी को भी बहुमत हासिल करने के तरीके पर जवाब देना भारी पड़ता। पर फौरी सिफारिश कर गवर्नर ने हवा का रुख बीजेपी के पक्ष में मोड़ दिया। अब बेभाव की पड़ी, तो गवर्नर अपनी ही चाल में फंस गए। गुरुवार को येदुरप्पा सरकार फिर से विश्वास प्रस्ताव पेश करेगी। तो 208 की विधानसभा में ही बहुमत साबित करना होगा। क्योंकि अयोग्य करार दिए गए सोलह एमएलए हाईकोर्ट जा चुके। जिनका फैसला सोमवार को आएगा। बुधवार को पांच निर्दलीयों ने जल्द राहत की मांग की। सीलबंद लिफाफे में वोट का हक मांगा। पर कोर्ट ने राहत देने से इनकार कर दिया। अब हवा का रुख देख एक निर्दलीय एमएलए की वापस बीजेपी की ओर लौटने की खबर। सो येदुरप्पा ने विश्वास मत जीत लिया। तो गवर्नर की पहली सिफारिश पर सीधे सवाल उठेंगे। यों कर्नाटक का क्लाइमैक्स भले गुरुवार को खत्म हो जाए। पर येदुरप्पा सरकार की स्थिरता पर सस्पेंस बना रहेगा। हाईकोर्ट ने साफ कर दिया- गुरुवार का विश्वास मत उसके सोमवार के फैसले से ही तय होगा।
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13/10/2010
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13/10/2010
Tuesday, October 12, 2010
दूध की जली कांग्रेस फूंक-फूंक कर पी रही छाछ
अब दिल्ली शिफ्ट हो गया कर-नाटक। सोनिया-आडवाणी के घर फैसलाकुन बैठकों का दौर चला। राष्ट्रपति राज के खौफ में बीजेपी ने अपने 105 एमएलए दिल्ली बुला लिए। ताकि राष्ट्रपति के सामने परेड करा राजनीतिक मुद्दे को धार दे सके। पर तेल की धार देख कांग्रेस ने खुद को फिसलने से बचा लिया। बिहार, झारखंड, गोवा जैसी जल्दबाजी नहीं की। गवर्नर हंसराज भारद्वाज तो बेनकाब हो चुके। सो फैसले पर फौरन मोहर लगाने की तोहमत नहीं ली। अलबत्ता बीजेपी को भी बेनकाब करने की रणनीति बनाई। केबिनेट की मीटिंग टाल गवर्नर को इशारा कर दिया। येदुरप्पा सरकार को दुबारा बहुमत साबित करने की हिदायत दें। सो सोमवार को राष्ट्रपति राज की सिफारिश करने में जेहादी तेवर दिखाने वाले हंसराज मंगलवार को सरेंडर कर गए। येदुरप्पा को फिर से बहुमत साबित करने को गुरुवार का वक्त दिया। अब कोई पूछे, जब सोमवार को गवर्नर राष्ट्रपति राज को मुफीद बता रहे थे। तो चौबीस घंटे में ही क्यों पलट गए? अगर खुद की ऐसी सोच, तो चौबीस घंटे पहले पल्ले क्यों नहीं पड़ी? सोमवार को खुद रपट दी- 120 एमएलए सरकार के खिलाफ। फिर आज क्यों मौका दे रहे? कर्नाटक राष्ट्रीय मुद्दा बन गया। तो गवर्नर हंसराज खुद मीडिया से मुखातिब हुए। करीब पौना-एक घंटे की लंबी प्रेस कांफ्रेंस में गवर्नरी का कम, नेतागिरी का अंदाज अधिक दिखा। राजनीतिक आरोपों का जवाब ऐसे दिया, मानो, गवर्नर नहीं, विपक्ष के नेता हों। बोले- मुझे कोई डिक्टेट नहीं कर सकता, ना ही मैं किसी की स्क्रिप्ट पर काम करता हूं। स्क्रिप्ट पर काम वे लोग (बीजेपी) कर रहे। और भी बहुतेरे सवाल हुए, जिनका हंसराज ने आरोप-प्रत्यारोप के अंदाज में जवाब दिया। पर हंसराज का राजनीतिक कैरियर को जानने वाले बखूबी जानते, हंसराज किसकी स्क्रिप्ट पर काम करते। यों हाथ कंगन को आरसी क्या, पढ़े-लिखे को फारसी क्या। गवर्नर ने येदुरप्पा सरकार को बहुमत साबित करने का मौका दिया। पर इसके संकेत करीब दो-ढाई घंटे पहले कर्नाटक कांग्रेस के प्रभारी महासचिव गुलाम नबी आजाद दिल्ली में दे चुके थे। जब उन ने कहा था- स्पीकर ने गलत काम किया। अयोग्य करार दिए गए विधायकों को बहाल कर येदुरप्पा सरकार फिर से विश्वास मत हासिल करे, तो हमें एतराज नहीं होगा। हू-ब-हू यही बात गवर्नर ने सीएम को लिखी चिट्ठी और प्रेस कांफ्रेंस में कही। अब आप खुद देख लो। केबिनेट कमेटी की मीटिंग नहीं हुई, सिर्फ कांग्रेस कोर ग्रुप और सोनिया की गुलाम नबी-वीरप्पा मोइली से मीटिंग हुई। तो सवाल, गवर्नर ने किसकी सलाह पर अपना फैसला बदल दिया। गवर्नर ने सचमुच पिछले कुछ दिनों से कर्नाटक में खूब खेल किया। सीएम को बिन मांगे सलाह, राष्ट्रपति-पीएम को रपट देना किसी को भी रास नहीं आया। पर जब बीजेपी के कुछेक एमएलए बागी हुए। सरकार बचाने को बीजेपी ने भी कांग्रेसी नुस्खा अपनाया। तो गवर्नर ने स्पीकर को चिट्ठी लिखकर ऐसा निर्देश दिया, कानून पानी भरता दिखा। स्पीकर को बहुमत से एक दिन पहले लिखा- अगर बागी एमएलए की सदस्यता रद्द की, तो विश्वास मत को मंजूर नहीं करेंगे। सो अब सवाल, क्या राजभवन सदन से ऊपर? हंसराज कानून मंत्री रह चुके। पर शायद पद छिनने के साथ ही कानून भूल गए। बड़े बेमन से गवर्नर बने। सो खुद को राजनीतिक धुरंधर साबित करने के चक्कर में अपना खेल खराब कर लिया। अब कर्नाटक का पेच उलझ गया। बागी एमएलए हाईकोर्ट जा चुके। पर हाईकोर्ट ने कोई फौरी फैसला नहीं सुनाया। अलबत्ता अब अगली सुनवाई 18 अक्टूबर को होगी। पर देश में गवर्नर की सिफारिश से बीजेपी ने बवाल खड़ा किया। तो गवर्नर ने दुबारा बहुमत साबित करने के लिए 14 अक्टूबर का समय दिया। अब सोचो, गर 14 अक्टूबर को येदुरप्पा ने मौजूदा 208 की विधानसभा में बहुमत हासिल कर लिया। फिर 18 अक्टूबर को अगर कोर्ट ने बागी विधायकों को अंतरिम राहत दे दी, तो क्या होगा? क्या फिर येदुरप्पा को बहुमत साबित करने के लिए कहा जाएगा? कांग्रेस की रणनीति कुछ अलग। कांग्रेस की सोच, गुरुवार को येदुरप्पा बहुमत साबित नहीं कर पाएंगे। अगर हंगामे में सोमवार का खेल दोहराया गया। तो राष्ट्रपति राज लगाने में देर नहीं होगी। पर बीजेपी पहले हिचकी। रार ठान ली, जब एक बार बहुमत साबित कर चुके। तो दुबारा क्यों करें। पर आडवाणी के घर देर शाम तक चली मीटिंग के बाद 208 की विधानसभा में बहुमत साबित करने को राजी हो गई। सो कांग्रेस और गवर्नर के लिए कर्नाटक चुनौती बना। तो बीजेपी के लिए भी अब प्रतिष्ठा की लड़ाई। कर्नाटक में पहली बार कमल खिला। पर महज दो साल में ही कमल पर इतना कीचड़ उछला, कमल का रंग मालूम नहीं पड़ रहा। भ्रष्टाचार और अंतर्कलह के इतने कारनामे हुए कि बीजेपी की साख खत्म हो चुकी। अब गवर्नर ने राजनीतिक मजबूरी के तहत एक और मौका दिया। तो साख गंवा चुकी बीजेपी के लिए खाल बचाने की चुनौती। कर्नाटक में बीजेपी के रणनीतिकार औंधे मुंह गिर चुके। सो अब बीजेपी को सरकार बचाने की फिक्र नहीं। अलबत्ता गवर्नर पर हमला तीखा कर दिया। कांग्रेस भी थोड़ी सहम गई। गर राष्ट्रपति राज लगाया, तो न सिर्फ विपक्ष से संबंध में कटुता आएगी। राज्यसभा में पास कराना भी टेढ़ी खीर होगा। तब समूची कांग्रेस की भद्द पिटेगी। सो फिलहाल कांग्रेस ने भद्द को हंसराज तक ही सीमित रखा। वैसे भी बिहार, गोवा, झारखंड में कांग्रेस तेवर दिखा भद्द पिटवा चुकी। सो अबके दूध की जली कांग्रेस छाछ भी फूंक-फूंक कर पी रही।
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12/10/2010
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12/10/2010
Monday, October 11, 2010
‘तुम करो तो लीला, हम करें तो करेक्टर ढीला’
तो हंसराज भारद्वाज भी ‘मिशनरी गवर्नर क्लब’ के मेंबर हो गए। राजनीतिक मिशन में सफल गवर्नरों की लिस्ट में कई नाम। कर्नाटक में ही बोम्मई सरकार को बर्खास्त कर गवर्नर वेंकट सुबैया, आंध्र में एनटीआर को हटा रामलाल, यूपी में कल्याण हटा व जगदंबिका को शपथ दिला रोमेश भंडारी, गोवा में परिक्कर सरकार को बर्खास्त कर एससी जमीर, झारखंड में मुंडा को रोक सैयद सिब्ते रजी, बिहार में नीतिश को रोक गवर्नर बूटा सिंह इतिहास रच चुके। यों मिशनरी गवर्नर क्लब में शामिल होने की कोशिश करने वाले बहुतेरे। पर संविधान का मखौल उड़ाने में सभी कामयाब नहीं। अपने हंसराज भारद्वाज अभी क्लब की मेंबरी से एक कदम दूर। अगर केबिनेट ने कर्नाटक की येदुरप्पा सरकार बर्खास्त करने की सिफारिश मान ली। तो समझो, काम हो गया। गवर्नर हंसराज कर्नाटक की बीजेपी सरकार को विदा करने की कोशिश पहले भी कर चुके। पर उम्दा मौका अब मिला, जब बीजेपी आदतन अंतर्कलह की शिकार। बीजेपी के डेढ़ दर्जन बागी और पांच निर्दलीय एमएलए ने समर्थन वापसी की चिट्ठी सौंप दी। तो गवर्नर ने येदुरप्पा को बहुमत साबित करने को कहा। सो सोमवार को येदुरप्पा ने विश्वास मत तो जीत लिया। पर तरीका वही, जो सत्ता में बने रहने को अपनाया जाता। बहुमत नहीं, तो बागियों को स्पीकर के जरिए वोट से वंचित कर दो। फिर मौजूदा संख्या बल में अपना बहुमत दिखा दो। कर्नाटक विधानसभा के स्पीकर केजी बोपैया ने दल-बदल कानून के तहत बीजेपी के 11 बागी और पांचों निर्दलीयों को अयोग्य करार दे दिया। सो विधानसभा में जो ड्रामा हुआ, उसे लोकतंत्र तो कतई नहीं कहेंगे। विपक्षी कांग्रेस-जेडीएस की शह पर बागियों ने सदन में कुर्ता-बनियान फाड़ डांस किया। हंगामे के बीच ही येदुरप्पा को स्पीकर ने ध्वनिमत से विश्वास मत दिला दिया। सो हंगामा और बरपा। विपक्ष गवर्नर हंसराज तक पहुंचा। तो गवर्नर ने भी अपनी रपट भेजने में देर नहीं लगाई। अयोग्य करार दिए गए पांचों निर्दलीय एमएलए हाईकोर्ट पहुंच गए। सो अब केंद्र सरकार की नजर हाईकोर्ट पर टिकी हुई। मंगलवार को केबिनेट कमेटी गवर्नर की सिफारिश पर फैसला करेगी। सो बीजेपी को डर, दक्षिण का कमल कुम्हला न जाए। नितिन गडकरी ने तडक़े ही चेतावनी दे दी, राष्ट्रपति राज लगाने की हिमाकत न करे केंद्र। पर कर्नाटक में कर-नाटक सभी एक जैसे ही पात्र। सुषमा स्वराज ने इतवार को ही राष्ट्रपति से गवर्नर हंसराज को वापस बुलाने की मांग कर दी थी। यानी विधानसभा और राजभवन में जो हुआ, सब कुछ पहले से तय था। गवर्नरी का खेल तो कांग्रेस हमेशा करती आई। जब मनमोहन पीएम और शिवराज पाटिल एचएम बने। तो चार गवर्नर यह कहकर हटाए गए थे कि इनकी पृष्ठभूमि संघ की है। फिर कांग्रेस राज में जो बने, उन ने कांग्रेसी मापदंड पर खरे उतरने की पूरी कोशिश की। गोवा में गवर्नर एससी जमीर ने पहले बीजेपी की सरकार हटाई। फिर लगातार कांग्रेस की सरकार बचाते आ रहे। परिकर सरकार दो फरवरी 2005 को बर्खास्त हुई। पर ड्रामा देखिए। बीजेपी के तीन एमएलए बागी हो गए थे। तबके स्पीकर विश्वास सतारकर ने तीनों को वोटिंग से रोका। परिकर ने विश्वास मत के लिए तीन फरवरी की तारीख तय की। तो गवर्नर जमीर ने चौबीस घंटे यानी दो फरवरी को ही बहुमत साबित करने का फरमान सुनाया। हंगामे में परिकर ने विश्वास मत जीत लिया। पर महज 25 मिनट के भीतर जमीर ने बीजेपी की सरकार बर्खास्त कर दी। देर रात कांग्रेसी प्रताप सिंह राणे को शपथ दिला बहुमत के लिए तीस दिन का समय दे दिया। सो गवर्नर का ‘जमीर’ इसी से दिख गया। फिर 2007 में बीजेपी ने कांग्रेस की दिगंबर कामथ सरकार के खिलाफ वही काम किया। कुछ विधायक तोड़े, राष्ट्रपति के सामने परेड कराई। पर स्पीकर राणे ने बागी विधायक को वोट से वंचित कर दिया। फिर बीजेपी के एमएलए गवर्नर जमीर के पास गए। तो कार्रवाई नहीं, सिर्फ विचार का भरोसा मिला। यों गोवा उठापटक की फैक्ट्री। जो भी दल सत्ता में होता, पॉवर के बेजा इस्तेमाल से परहेज नहीं। स्पीकर तो सिर्फ नाममात्र के संवैधानिक पद पर। सचमुच में ऐसे विरले ही स्पीकर, जो दलगत भावना से परे रहे। यों एक नजीर झारखंड की। अगर तबके स्पीकर इंदर सिंह नामधारी ने पद का बेजा इस्तेमाल किया होता, तो अर्जुन मुंडा की पिछली सरकार नहीं गिरती। और ना ही मधु कोड़ा जैसे भ्रष्ट सीएम बन पाते। पर उन ने आसंदी के दामन और अपनी पगड़ी पर दाग नहीं लगने दिया। अब कोड़ा को सीएम बनाने वाली कांग्रेस का बयान देखिए। मनीष तिवारी बोले- आजाद भारत में ऐसी गुंडागर्दी की कोई मिसाल नहीं होगी, जो बीजेपी ने कर्नाटक में किया। पर कोई पूछे, सदन में हंगामा करने वाले विधायकों को किस नजरिए से जनता का सेवक माना जाए? अगर बीजेपी के 11 विधायकों को येदुरप्पा पर एतबार नहीं। तो इस्तीफा देकर चुनाव क्यों नहीं लड़ लिया? लोकतंत्र में संख्या बल का महत्व। अब 117 में से 11 एमएलए अपनी मर्जी से तो सरकार नहीं चलवा सकते। पर विपक्ष ने शह दिया, तो बनियान फाडऩे लगे। सो कौन कह सकता, बागी बिके हुए नहीं थे। लोकतंत्र में अब पैसे का ही बोलबाला। करोड़ों रुपए देख किसी का भी मन डोल जाए। खरीद-फरोख्त के खेल में ईमानदार कोई भी नहीं। फर्क सिर्फ कुर्सी के मुंह का। सत्ता में बैठने वाला अपने हर काम को जायज ठहराता। पर जब वही विपक्ष में जाता, तो वही काम लोकतंत्र की हत्या और बलात्कार कहलाने लगते। यानी फर्क सिर्फ कुर्सी का, पर कहावत दोनों के लिए एक- ‘तुम करो तो लीला, हम करें तो करेक्टर ढीला।’
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11/10/2010
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11/10/2010
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